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Friday, 4 May 2012

जनरल सिंह की चेतावनी सही थी ः रक्षा समिति ने पुष्टि कर दी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4 May 2012
अनिल नरेन्द्र
थलसेना प्रमुख ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर चेताया था कि सेना के पास सैन्य सामग्री की कमी है। इस पत्र पर बड़ा हंगामा हुआ था। जनरल सिंह की कुछ लोगों ने आलोचना भी की थी पर जनरल सिंह ने जो बातें लिखी थीं उसकी अब साफ तौर पर पुष्टि हो गई है। रक्षा मामलों की संसदीय समिति ने माना है कि सेना के पास गोला-बारूद और हथियारों की भारी कमी है। ये कमियां देश की सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी हैं। रक्षा समिति ने अपनी इस आशय की रिपोर्ट सोमवार को संसद में पेश की है। समिति ने कहा है कि सेना की जरूरतों और आपूर्ति में भारी कमी है। समिति ने यह भी सुझाव दिया है कि सेना के बजट में बढ़ोतरी की जाए। सेना के पास हथियारों की कमी की जानकारी सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने 12 मार्च को प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी में दी थी। सतपाल महाराज की अध्यक्षता वाली संसदीय रक्षा समिति ने अपनी रिपोर्ट में रक्षा मंत्रालय और सरकार को इन कमियों के लिए सीधे-सीधे फटकार लगाई। समिति ने कहा कि सैन्य साजो-सामान में लगातार कमी पर सरकार का ध्यान नहीं देना आश्चर्यजनक है। फैसलों में देरी कर रक्षा मंत्रालय ने हालात को और जटिल कर दिया है। समिति ने कमियां भी गिनाईं। हेलीकाप्टरों से टैंकों तक के लिए गोला-बारूद की कमी है और किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। तोपें अब तक अपडेट नहीं। तोपों की कमी से सेना की तैयारियां प्रभावित हो रही हैं। तोपों की कमी और बोफोर्स को उन्नत करने के काम में देरी से तैयारी प्रभावित हो रही है। हेलीकाप्टरों से लेकर टैंक बेड़े के पास गोला-बारूद खत्म होने के कगार पर है। तोपखाने में फ्यूज नहीं, हवाई सुरक्षा के लगभग 97 फीसदी उपकरण बेकर हो चुके हैं। पैदल सेना के साथ-साथ विशेष फोर्सेस के पास भी जरूरी हथियारों की कमी है। समिति ने कहा कि 2012-13 में 66 हजार 032 करोड़ रुपये सैन्य साजो-सामान खरीदने के लिए दिए गए। लेकिन इनमें से सिर्प 5 हजार 520 करोड़ रुपये ही नई खरीद के लिए थे। बाकी पुरानी देनदारी थी। सरकार हमारी सेना पर जीडीपी के अनुपात में पाकिस्तान, चीन, रूस, अमेरिका और फ्रांस से भी कम खर्च कर रही है। संसदीय समिति ने एक अंग्रेजी अखबार की उस खबर को खारिज कर दिया है जिसमें 16-17 जनवरी की रात सेना की दो टुकड़ियों के दिल्ली कूच का दावा किया गया था। खबर के मुताबिक हिसार और आगरा से सेना की दो यूनिट पूरे साजो-सामान के साथ दिल्ली चल चुकी थीं। बीच रास्ते उन्हें रोककर वापस किया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि मामले में रक्षा सचिव शशिकांत शर्मा की सफाई संतोषजनक है। सेना की आवाजाही पूरी तरह प्रशिक्षण के लिए थी। इसका उद्देश्य परिचालन अभ्यास को बेहतर बनाना और खराब मौसम में भी सेना की तैयारी परखना था। अब जबकि संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट दे दी है, हम उम्मीद करते हैं कि मनमोहन सरकार इन कमियों को अविलम्ब पूरा करने का प्रयास करेगी। यह मामला सीधा देश की सुरक्षा से जुड़ता है और किसी को भी देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने की छूट नहीं दी जा सकती। रक्षा मंत्री एंटनी बेशक एक ईमानदार इंसान हों पर इसका यह मतलब नहीं कि सैन्य सामग्री की आपूर्ति से ही समझौता करें।
थलसेना प्रमुख ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर चेताया था कि सेना के पास सैन्य सामग्री की कमी है। इस पत्र पर बड़ा हंगामा हुआ था। जनरल सिंह की कुछ लोगों ने आलोचना भी की थी पर जनरल सिंह ने जो बातें लिखी थीं उसकी अब साफ तौर पर पुष्टि हो गई है। रक्षा मामलों की संसदीय समिति ने माना है कि सेना के पास गोला-बारूद और हथियारों की भारी कमी है। ये कमियां देश की सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी हैं। रक्षा समिति ने अपनी इस आशय की रिपोर्ट सोमवार को संसद में पेश की है। समिति ने कहा है कि सेना की जरूरतों और आपूर्ति में भारी कमी है। समिति ने यह भी सुझाव दिया है कि सेना के बजट में बढ़ोतरी की जाए। सेना के पास हथियारों की कमी की जानकारी सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने 12 मार्च को प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी में दी थी। सतपाल महाराज की अध्यक्षता वाली संसदीय रक्षा समिति ने अपनी रिपोर्ट में रक्षा मंत्रालय और सरकार को इन कमियों के लिए सीधे-सीधे फटकार लगाई। समिति ने कहा कि सैन्य साजो-सामान में लगातार कमी पर सरकार का ध्यान नहीं देना आश्चर्यजनक है। फैसलों में देरी कर रक्षा मंत्रालय ने हालात को और जटिल कर दिया है। समिति ने कमियां भी गिनाईं। हेलीकाप्टरों से टैंकों तक के लिए गोला-बारूद की कमी है और किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। तोपें अब तक अपडेट नहीं। तोपों की कमी से सेना की तैयारियां प्रभावित हो रही हैं। तोपों की कमी और बोफोर्स को उन्नत करने के काम में देरी से तैयारी प्रभावित हो रही है। हेलीकाप्टरों से लेकर टैंक बेड़े के पास गोला-बारूद खत्म होने के कगार पर है। तोपखाने में फ्यूज नहीं, हवाई सुरक्षा के लगभग 97 फीसदी उपकरण बेकर हो चुके हैं। पैदल सेना के साथ-साथ विशेष फोर्सेस के पास भी जरूरी हथियारों की कमी है। समिति ने कहा कि 2012-13 में 66 हजार 032 करोड़ रुपये सैन्य साजो-सामान खरीदने के लिए दिए गए। लेकिन इनमें से सिर्प 5 हजार 520 करोड़ रुपये ही नई खरीद के लिए थे। बाकी पुरानी देनदारी थी। सरकार हमारी सेना पर जीडीपी के अनुपात में पाकिस्तान, चीन, रूस, अमेरिका और फ्रांस से भी कम खर्च कर रही है। संसदीय समिति ने एक अंग्रेजी अखबार की उस खबर को खारिज कर दिया है जिसमें 16-17 जनवरी की रात सेना की दो टुकड़ियों के दिल्ली कूच का दावा किया गया था। खबर के मुताबिक हिसार और आगरा से सेना की दो यूनिट पूरे साजो-सामान के साथ दिल्ली चल चुकी थीं। बीच रास्ते उन्हें रोककर वापस किया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि मामले में रक्षा सचिव शशिकांत शर्मा की सफाई संतोषजनक है। सेना की आवाजाही पूरी तरह प्रशिक्षण के लिए थी। इसका उद्देश्य परिचालन अभ्यास को बेहतर बनाना और खराब मौसम में भी सेना की तैयारी परखना था। अब जबकि संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट दे दी है, हम उम्मीद करते हैं कि मनमोहन सरकार इन कमियों को अविलम्ब पूरा करने का प्रयास करेगी। यह मामला सीधा देश की सुरक्षा से जुड़ता है और किसी को भी देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने की छूट नहीं दी जा सकती। रक्षा मंत्री एंटनी बेशक एक ईमानदार इंसान हों पर इसका यह मतलब नहीं कि सैन्य सामग्री की आपूर्ति से ही समझौता करें।
Anil Narendra, Daily Pratap, General V.k. Singh, Vir Arjun

Tuesday, 10 April 2012

आखिर कितने दिन का युद्ध लड़ सकती है हमारी सेना?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10 April 2012
अनिल नरेन्द्र
सेना की दो इकाइयों द्वारा 16-17 जनवरी में दिल्ली की ओर बढ़ने को लेकर खबरें पहले से ही पक रही थीं और इसकी भनक सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह को भी थी। यह मार्च में ही एक अंग्रेजी पत्रिका को दिए उनके इंटरव्यू से पता चलता है। उन्होंने कहा था, `मान लीजिए, हमारी एक कोर या डिवीजन या ब्रिगेड अभ्यास कर रही तो कोई कहेगा कि ओह.. उन्होंने अभ्यास किया। यह अभ्यास नहीं था, वे कुछ और करना चाहते थे।' उन्होंने कहा, `अब आप इससे एक खबर बनाएंगे। इन दिनों कई लोग गलत मकसद से खबरें बनाना चाहते हैं।' उधर अंग्रेजी अखबार द गार्डियन ने दावा किया है कि सेना के दिल्ली कूच की खबर के पीछे एक केंद्रीय मंत्री का हाथ है। मंत्री का नाम नहीं बताया पर यह कहा गया है कि मंत्री के करीबी रिश्तेदार का संबंध रक्षा खरीद से जुड़ी लॉबी का है और यह लॉबी दोनों रक्षा मंत्री एके एंटनी और सेनाध्यक्ष जनरल सिंह से परेशान थी। आर्म्स लॉबी एंटनी के इसलिए खिलाफ थी क्योंकि एंटनी एक ईमानदार मंत्री हैं जो खरीद में कोई गड़बड़ी नहीं होने देना चाहते। एंटनी का भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान से हथियार सप्लायर, उनके एजेंट, विदेशी कम्पनियां और सेना का एक वर्ग खिलाफ है और यह चाहते हैं कि इन्हें रक्षा मंत्रालय से हटाया जाए। पिछले महीने ही एंटनी ने छह हथियार कम्पनियों को बैन किया था। इनमें चार विदेशी कम्पनियां (इजरायली मिलिट्री इंडस्ट्री, सिंगापुर टेक्नोलॉजी कारपोरेशन डिफेंस (रूस) और एक स्विट्जरलैंड की कम्पनी शामिल है।) जनरल वीके सिंह के खिलाफ यह साजिश (अगर साजिश थी) इसलिए रची गई, क्योंकि वह रक्षा सौदे में कमीशनों का धंधा नहीं चलने दे रहे थे। कूच की खबर को लीक करने के पीछे जनरल के खिलाफ राजनीतिक दलों को एकजुट करना था। सेनाध्यक्ष की साख बिगाड़ने तथा सैन्य ट्रेनिंग से जुड़ी गतिविधियां ठप करना भी एक उद्देश्य हो सकता है। भ्रष्टाचार के आरोपों से सैन्य खरीद की रफ्तार कम हुई है।अगर विद्रोह के काल्पनिक डर से सेना की ट्रेनिंग एक्सरसाइज की आजादी छिनी तो फौज की मारक क्षमता प्रभावित होगी।
भारतीय थलसेना की मारक क्षमता का सवाल जनरल वीके सिंह ने प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में उठाया था। अब एक न्यूज चैनल ने अपनी रिपोर्ट में सेना के पास गोला-बारुद की कमी की भयानक तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के मुताबिक युद्ध होने की स्थिति में सेना के पास सिर्प 10 दिनों तक लड़ने के लिए गोला-बारुद मौजूद है। यह पहली बार नहीं जब इस तरह की खबरें आई हैं। सेना काफी पहले से राजनीतिक नेतृत्व को आगाह करती आ रही है कि उसके पास जंग के लिए गोला-बारुद जैसे जरूरी सामग्री जरूरी स्तर से काफी नीचे पहुंच गया है। किसी खतरे का सामना करने की स्थिति में सेना की तैयारियों को लेकर कैग की रिपोर्ट ने भी सवाल उठाए हैं। खतरे की घंटी ः 125 एमएम टैंक के लिए गोला-बारुद जरूरी स्तर से काफी कम है। 16 हजार राउंड के लिए रूस से गोला-बारुद मिलने का इंतजार। 122 एमएम हाई एनर्जी रिड्यूस चार्ज 1.27 दिन तक चल पाएंगे। ओएफबी द्वारा मुहैया कराए गए गोला-बारुदों में काफी खराबी पाई गई। सरकार का दावा है कि युद्ध होने पर सेना के पास 30 दिनों तक का लड़ने के लिए पर्याप्त मात्रा में गोला-बारुद है। गोला-बारुद की इस कमी की बड़ी वजह घोटालों के चलते कई रक्षा कम्पनियों पर प्रतिबंध लगाना भी है। कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि कई तोपों में दूसरे विश्वयुद्ध के जमाने की तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। यदि कोई 16-17 जनवरी की खबर और उसके बाद प्रकाशित हो रही खबरों को विस्तार से पढ़े तो उसे मानना होगा कि स्थिति बेहद चिन्ताजनक है। यह निष्कर्ष भी निकलता है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में सेना और सरकार के संबंध सबसे निचले स्तर पर हैं।
A K Antony, Anil Narendra, Daily Pratap, General V.k. Singh, Indian Army, Vir Arjun

Monday, 9 April 2012

Dress Rehearsal or Warning or Conspiracy

- Anil Narndra
Had some members of the Indian Army launched a revolt against the Government? Had these Army Units carried forward their campaign to lay seize to Delhi in order to attempt a military coup? These are some of the unanswered burning questions circulating in the Capital since the Wednesday morning. In fact, the sensational expose in the Wednesday edition of the English Daily, the Indian Express created panic. According to a report by Shekhar Gupta, the editor of the newspaper, two big Army Units from Hissar and Agra had moved towards Delhi on the night of 16-17 January. Fully armed with arms and ammunition these Units of the Infantry Brigade had reached close to Delhi. But, the situation was somehow controlled. 33 Armed Division's Unit from Hissar had reached Bahadurgarh and halted there. Another Unit from Agra (12 Division) with arms and ammunition and tanks reached Palam and halted nearby. Was it a coincidence that the Army Chief General VK Singh had approached the Supreme Court on that very day, i.e.  15th January? The Indian Express report created commotion in the political circles of Delhi. 'Furore' should be a better word than the 'commotion' to describe the situation. The politicians were rendered speechless. As is habitual with the Government and as is its helplessness, the Government out rightly rejected the report, but accepted that the Units from Hissar and Agra did arrive at Bahadurgarh and Palam, but this was a routine movement of the Army. The Government has, however, not been able to explain why these Army Units moved towards Delhi without informing the Ministry of Defence? The Prime Minister Manmohan Singh said on Wednesday that this report is capable of creating fear and such reports need not be given much attention. On the question of tension between Army Chief and the Government, the Prime Minister said, 'The post of Army Chief is quite high and we must avoid doing anything that belittle the dignity of the post.' The Defence Minister, AK Antony termed the fear of any military coup by the Army as entirely baseless. He assured people that the Army will not do any thing, which may weaken the democracy. According to Antony, the patriotism of Army should not be put to doubt. The Army Spokesperson said that it is routine in the Army to carry on such exercises. Former Army Chief General Ved Prakash Malik said, 'I can only consider this as a ridiculous and mischievous report and I am of the view that this movement of the Army was part of a routine training, as such it was not necessary to notify it to the Ministry of Defence.' Former Naval Chief Admiral Arun Prakash said, 'It is most irresponsible example of journalism. I am not surprised about the objective of publishing such a report.' Terming this report wrong and ridiculous the former Chief of the Air Staff Air Chief Marshal SP Tyagi said, 'I do not consider it worth discussing.' An expert in defence studies and analysis, C Uday Bhaskar said, 'The report about movement of the Army towards Delhi is disappointing and it has caused worry about the alleged move of the Army in attempting a coup. The Indian Express report is not false, as no body has said that there was no Army Unit movement on that day. All have been terming it as an exercise. This report definitely causes concern. So far we are concerned; the reliability of the Indian Express report can not be questioned. Neither Shekhar Gupta is sensation-monger journalist, nor the Indian Express is such an irresponsible newspaper, then what happened on 15-16 night? There is nothing unusual in an exercise by single Unit, but the movement of two Units from different towns at the same time poses question, which needs an answer. The report is quite investigative.' He concludes that General VK Singh is a loyal and honest officer and this has been proved. Then, was it a dress rehearsal? But in a country like India, it is not easy to topple the political order. Any attempted military coup can not succeed without the knowledge of Delhi Area Commander (DAC). In case the Army is conducting an exercise, then the DAC must have the knowledge about it. The DAC must be asked about it. Whenever there is an exercise, then not only the Ministry of Defence, but the civilian authorities must have the information regarding it, so that suitable arrangements are made to avoid disruption of public life. One more thing has also emerged from the Indian Express report. It points to serious difference of opinions between the Army and the UPA Government. The Army is quite disappointed with this government. The Army is not happy with the Government due to the indifferent attitude of the bureaucracy in Delhi about the supply of military hardware, which is adversely affecting the capability and morale of the Army, whereas this Government is busy in dealing with scams. In other words, the Government is compromising the security of the country. In fact, this issue has two sides to it. This could be a routine military activity, because an Army Division conducts such exercises quarterly and it is not required to intimate the Government about such exercises. But, it was listed in the calendar for military exercises. A number of Divisions had already been deputed in Delhi in view of Republic Day. Moreover, it is impossible to take over Delhi with the help of a small Unit. On the other hand, it is unusual because information about movement of a Division from one area to another area is to be provided. Normally, Delhi is not selected for exercises. In spite of huge concentration of the Army in Delhi due to 26th January celebrations, why this military exercise was planned? Why did the senior officers of the concerned Division fail to realize the sensitivity of the matter? There are number of such questions, which would be answered in days to come. We, however, are of the view that the 15th January movement was not a routine military exercise. This could have been a jolt meant to awake the Government from its slumber or it could have been a dress rehearsal with a larger intent.

Friday, 6 April 2012

ड्रेस रिहर्सल या चेतावनी अथवा साजिश

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 6 April 2012
अनिल नरेन्द्र
इसी साल जनवरी के महीने में क्या भारतीय थलसेना के कुछ लोगों ने सरकार के खिलाफ बगावत की तैयारी कर ली थी? इन सैन्य टुकड़ियों ने सैन्य तख्तापलट की नीयत से क्या बाकायदा दिल्ली को घेरने के लिए मुहिम आगे बढ़ा दी थी? यह हैं कुछ ज्वलंत प्रश्न जो बुधवार सुबह से ही राजधानी में चर्चा का विषय बने रहे। दरअसल अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के बुधवार के अंक मे एक सनसनीखेज रहस्योद्घाटन से हलचल मच गई। सम्पादक शेखर गुप्ता की लिखी इस रिपोर्ट में बताया गया कि किस तरह 16-17 जनवरी की रात हिसार और आगरा से सेना की दो बड़ी टुकड़ियां दिल्ली कूच के लिए बढ़ आई थीं। तमाम गोला-बारुद से लैस इन्फैंट्री ब्रिगेड की टुकड़ियां दिल्ली के एकदम नजदीक पहुंच गई थी। किसी तरह स्थिति पर नियंत्रण पाया गया। सेना की हिसार की 33वीं आर्म्ड डिवीजन की टुकड़ी बहादुरगढ़ आकर रुक गई और यहां से आगे नहीं बढ़ी। दूसरी टुकड़ी आगरा से (12 डिवीजन) गोला-बारुद और टैंकों के साथ पालम के पास रुक गई। क्या यह इत्तेफाक था कि 16 जनवरी को ही थल सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह अपनी उम्र के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट गए थे। इंडियन एक्सप्रेस की इस रिपोर्ट से दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। हलचल कहना गलत है हड़कम्प बेहतर शब्द है। राजनेताओं के खबर सुनकर तोते उड़ गए। सरकार की जैसे आदत व मजबूरी होती है, ने रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया। रिपोर्ट को खारिज करते हुए सरकार ने यह माना है कि बटालियनें आगरा और हिसार से बहादुरगढ़ और पालम तक तो आई थी, लेकिन यह भी कहा है कि थलसेना की यह गतिविधि सामान्य है। हालांकि सरकार यह नहीं बता पा रही है कि थलसेना ने रक्षा मंत्रालय की जानकारी में लाए बिना दिल्ली के लिए कूच क्यों किया? पीएम मनमोहन सिंह ने बुधवार को कहा कि यह रिपोर्ट डर पैदा करने वाली है। ऐसी रिपोर्ट को ज्यादा तवज्जों नहीं देनी चाहिए। आर्मी चीफ और सरकार के बीच चल रही खींचतान के सवाल पर पीएम ने कहा कि आर्मी चीफ का पद बहुत ऊंचा है। हम सबकी जिम्मेदारी है कि हम ऐसा कुछ न करें जिससे इसकी गरिमा कम हो। रक्षा मंत्री एके एंटनी ने आर्मी की तरफ से किसी किस्म के तख्तापलट के डर को पूरी तरह से बकवास करार दिया। उन्होंने विश्वास जताया कि सेना ऐसा कुछ नहीं करेगी, जिससे डेमोकेसी कमजोर हो। एंटनी के मुताबिक सेना की देशभक्ति पर सवाल नहीं उठने चाहिए। रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि सेना इस किस्म के अभ्यास करती रहती है। पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल वेद प्रकाश मलिक ने कहा कि मैं तो इसे एक हास्यास्पद रिपोर्ट ही कह सकता हूं। यह किसी की शरारत लगती है। मेरा मानना है कि सेना का कूच मात्र दैनिक प्रशिक्षण का हिस्सा भर था और रक्षा मंत्रालय को इसे नोटीफाई करने की जरूरत नहीं थी। पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश की टिप्पणी थी ः पत्रकारिता का यह एक बड़ा ही गैर जिम्मेदाराना उदाहरण है। मुझे आश्चर्य नहीं है कि इस रिपोर्ट को छापने का उद्देश्य क्या था। पूर्व वायु सेनाध्यक्ष एयर चीफ मार्शल एसपी त्यागी ने कहा कि रिपोर्ट पूरी तरह गलत है और इतनी हास्यास्पद है कि मैं इसके बारे में बात भी नहीं करना चाहूंगा। सी. उदय भास्कर जो डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस है का कहना था कि जिस प्रकार सेना ने दिल्ली की ओर बढ़ने की खबर छपी उससे निराशा और चिन्ता हुई है कि जैसे सेना की कोई तख्तापलट की योजना थी। इंडियन एक्सप्रेस द्वारा दी गई यह खबर गलत नहीं है। किसी ने भी यह नहीं कहा कि सैन्य टुकड़ियों की उस दिन मूवमेंट नहीं हुई थी। सभी इसे सामान्य अभ्यास बता रहे हैं। यह रिपोर्ट चिन्ता का विषय जरूर बनता है। हमारे अनुसार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं किया जा सकता। न तो शेखर गुप्ता ऐसे सनसनीखेज फैलाने वाले पत्रकार हैं और न ही अखबार इतना गैर जिम्मेदार है, तो फिर 16-17 जनवरी को क्या हुआ? एक टुकड़ी के अभ्यास की बात समझ आती है पर एक ही दिन दो विभिन्न शहरों से लगभग एक ही समय दो टुकड़ियों की मूवमेंट प्रश्न खड़ा करते हैं। रिपोर्ट में काफी छानबीन की गई है। उनका निष्कर्ष है कि जनरल वीके सिंह एक निष्ठावान, ईमानदार अफसर हैं, यह बात साबित भी हो चुकी है। क्या यह एक ड्रेस रिहर्सल था? वैसे भारत जैसे देश में राजनीतिक सत्ता को पलटना आसान नहीं है। सत्ता पलट की कोई भी कोशिश थलसेना के दिल्ली एरिया कमांडर की जानकारी में लाए बिना सफल नहीं हो सकती। यदि थलसेना कोई अभ्यास भी कर रही है तो यह दिल्ली एरिया कमांडर को पता होना चाहिए, इसलिए दिल्ली के एरिया कमांडर से इस बारे में पूछताछ होनी चाहिए। देश में कहीं भी किसी तरह का अभ्यास किया जाता है तो इसकी पूर्व जानकारी न केवल रक्षा मंत्रालय को होनी चाहिए बल्कि सिविल अधिकारियों को पता होना चाहिए ताकि आम जनजीवन प्रभावित नहीं हों। इंडियन एक्सप्रेस की इस रिपोर्ट से एक बात और सामने आई है। वह यह कि सेना और संप्रग सरकार में भारी मतभेद हैं। सेना में इस सरकार को लेकर बेहद ज्यादा मायूसी का माहौल है। सेना इसलिए भी नाराज है कि दिल्ली में बैठे सरकारी बाबू सैन्य सामग्री की आपूर्ति पर लापरवाही बरतते हैं जिसकी वजह से सेना की क्षमता प्रभावित हो रही है और यह सरकार घोटालों से ही निपटने में अपना सारा समय बिता रही है। दूसरे शब्दों में सरकार देश की सुरक्षा से समझौता कर रही है। इस मुद्दे के दोनों पक्ष हैं। सेना की यह गतिविधि सामान्य इसलिए है कि सैन्य डिवीजन का हर 3 माह में अभ्यास होता रहता है और इसकी सरकार को जानकारी देने की जरूरत नहीं है। सैन्य अभ्यास के कैलेंडर में इस बारे में सूचना दर्ज थी। 26 जनवरी की वजह से दिल्ली में कई डिवीजन पहले से ही तैनात थीं। एक छोटी टुकड़ी से तो दिल्ली पर कब्जा नहीं हो सकता। दूसरी ओर यह असामान्य इसलिए है कि सैन्य डिवीजन के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाने पर देनी पड़ती है सूचना। सामान्यत अभ्यास के लिए दिल्ली को नहीं चुना जाता। 26 जनवरी की वजह से दिल्ली में सेना के जमावड़े के बावजूद अभ्यास की योजना क्यों बनी? संबंधित डिवीजन के वरिष्ठ अधिकारियों ने इसकी संवेदनशीलता को क्यों नहीं पहचाना? ऐसे ढेर सारे सवाल हैं जिनका उत्तर आने वाले दिनों में पता लगेगा। हमारा तो यह मानना है कि 16 जनवरी की यह मूवमेंट सामान्य अभ्यास नहीं था। हो सकता है कि सोई सरकार को जगाने के लिए यह झटका दिया गया या फिर यह किसी बड़े काम की ड़ेस रिहर्सल थी।

Saturday, 31 March 2012

जनरल वीके सिंह के पत्र ने खड़े किए सवाल

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 31 March 2012
अनिल नरेन्द्र
थल सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह द्वारा प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी जिसमें बताया गया है कि हमारे सुरक्षा बलों के पास हथियारों की कमी है, गोला-बारुद इत्यादि की कमी है, ने कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं। क्या जनरल को ऐसा पत्र लिखना चाहिए था? क्या रिटायरमेंट से कुछ दिन पहले इसको लिखने का सही समय था? यह पत्र किसने और क्यों लीक किया? इसका फालआउट क्या होगा? यह हैं जो प्रश्न आज चर्चा में हैं। जहां तक जनरल का पत्र है तो मैं समझता हूं कि अगर थल सेनाध्यक्ष देश के प्रधानमंत्री को यह चौकस करना चाहता है कि उनकी लचर नीतियों, अनिर्णयता के कारण हमारी सेनाओं में जरूरी सामान की आपूर्ति नहीं हो रही और अगर जंग होती है तो हम उसे जीत नहीं सकते, तो इसमें गलत क्या है? क्या सेनाध्यक्ष को यह राजनेताओं को बताना नहीं चाहिए कि भारतीय सेनाओं की क्षमता से समझौता किया जा रहा है और अगर इस कमी को अविलम्ब पूरा नहीं किया गया तो यह सेना के लिए घातक होगा। जहां तक इस पत्र के समय की बात है तो जनरल की आयु विवाद के बाद लिखने से थोड़ी-सी बदनीयती की बू जरूर आती है। कुछ लोग कह सकते हैं कि चूंकि सरकार ने जनरल की आयु विवाद में उनका विरोध किया था इसलिए जनरल ने बदले की भावना से यह पत्र लिखा। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न तो यह है कि यह पत्र किसने लीक किया? यह पत्र या तो आर्मी से हो सकता है या फिर प्रधानमंत्री कार्यालय से। मुझे नहीं लगता कि जनरल ने खुद इसे लीक किया होगा। मुझे शक पीएमओ पर है। अकसर पीएमओ से गोपनीय दस्तावेज लीक होते ही रहते हैं। 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले में भी कई दस्तावेज प्रधानमंत्री कार्यालय से लीक हुए। रिपोर्ट है कि जनरल ने यह पत्र चीन की बढ़ती सैन्य क्षमता को लेकर लिखा था। पत्र में सीधे तौर पर चीन की तैयारियों के मुकाबले भारत की तैयारियों को रखा गया है। यह भी कहा गया है कि भारत के रक्षा तंत्र के आधुनिकीकरण पर नौकरशाही अड़ंगे डाल रही है। जनरल सिंह ने लिखा तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में चीन खुलेआम निर्माण कार्य कर रहा है। वहीं भारतीय सेना की मौजूदगी संतोषजनक नहीं है। भारत की सैन्य तैयारियां खोखली हैं। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि हम चीन के सामने कहीं नहीं ठहरते और पाकिस्तान को हम आज भी हराने की स्थिति में हैं। वैसे सैन्य सामग्री की आपूर्ति में सैनिक अधिकारियों का भी कसूर कम नहीं। जनरल के पत्र से यह तो साफ हो ही गया है कि कई सेनाओं के अफसर बतौर कमीशन एजेंट काम कर रहे हैं। जब एमूनेशन की कमी है तो प्रैक्टिस में इतना गोला-बारुद क्यों वेस्ट किया गया? 1971 के बाद से हमारी सेना ने कोई बड़ी जंग नहीं लड़ी। इसलिए सही मायनों में हमें अपनी सेनाओं की ताजा स्थिति की सही जानकारी नहीं है। जनरल सिंह पिछले कई महीनों से अपनी आयु के विवाद में तो लगे रहे पर उन्हें सेना की तैयारी की चिन्ता नहीं हुई। क्या जनरल सिंह ने यह मिसाइल इसलिए तो नहीं दागी  कि यूपीए सरकार रक्षा बजट पर पूरा ध्यान दे और सैन्य सामग्री की आपूर्ति को प्राथमिकता दे। जो कुछ भी हो पर यह न तो देश के लिए अच्छा है और न ही हमारी सेनाओं के लिए शुभ संकेत है कि हमारी तैयारी पिछड़ चुकी है। ताजा जानकारी का देश के दुश्मन फायदा उठा सकते हैं। सरकार और सेना प्रमुख में इतनी भारी खाई भी देशहित में नहीं। अन्त में प्रश्न यह उठता है कि क्या जनरल सिंह झूठ बोल रहे हैं? क्या सैन्य सामग्री की आपूर्ति पर्याप्त नहीं है? क्या पीएमओ से यह पत्र लीक हुआ? उत्तर है आंशिक रूप से यह सभी सही हैं।

Friday, 30 March 2012

General Singh's allegations are not new, all are aware about bribes in defence deals

- Anil Narendra

Chief of the Army Staff General VK Singh has created another controversy at the fag end of his career. He has alleged that a retired Army Officer has offered him a bribe of 14 crore rupees for the supply of inferior vehicles. General Singh also said that the controversy about his date of birth was due to the fact that he was opposed to the corrupt elements in the Army. He said that the cancer of corruption has spread to such an extent that minor operations will not do, but it will need a major surgery. This statement of General Singh is no doubt quite sensational, but not unbelievable, but the question is why the General did not bring this matter to light immediately? But this is also true that talks about bribery in defence deals are nothing new. If one goes through the allegations made by General Singh, it would be evident that his target is the government and Defence Minister AK Antony. The Defence Minister did not support General Singh in the date of birth controversy. General Singh has also said that he had informed the Defence Minister about the offer of bribe. It is right that Antony has referred this matter to the CBI for investigation, as this question is still unanswered that when the General had immediately informed the Defence Minister, then why decision about handing over the case to CBI is being taken now? Was the Defence Minister waiting for General Singh to make public this matter? There is one more question that needs to be answered, why did General Singh leave this matter so casually? Whatever may be the answers for these questions, but one thing is clear that our government machinery does not have will to deal with corruption. Should we accept that the  role of middlemen is limited to the defence deals with other countries? This is very shameful for the country, which had to face immediately after independence, the jeep scam in 1948 that noow it has to face efforts made to initiate truck scam. It is clear that no effort has been made to stop those practices that are instrumental in stopping such scams. The most important question that may cause serious concern is that how an offer of bribe can be made to the Chief of Army Staff?  This indicates the extent of resolve and courage of middlemen to bribe the government machinery. It appears that no defence deal can be consummated without bribe. Iss the Parliament unaware of the bribery in defence deals? Then why this drama? Will this commission business come to stop by trading allegations? The real reason is that the Parliament has not taken any effective step to stem this evil. There is a dearth of adequate laws to effectively deal with corruption cases and to punish the middlemen engaged in corrupt practices and these middlemen exploit this situation. It would be better if we legally decide about a certain percentage as commission. We, too, in newspaper business pay commission to the hawkers to sell the newspapers. But, it must be ensured that inferior defence equipment would not be accepted in lieu of commission. This amounts to treason to the country, for which strict punishment should be meted out.

Thursday, 29 March 2012

जनरल सिंह का आरोप नया नहीं, सभी जानते हैं रक्षा सौदों में दलाली है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 29 March 2012
अनिल नरेन्द्र
अपने सेवाकाल के अंतिम दौर में थल सेना पमुख जनरल वीके सिंह ने जाते-जाते एक और विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि एक रिटायर्ड फौजी अफसर ने घटिया वाहनों की सप्लाई के बदले उन्हें 14 करोड़ रुपए की रिश्वत का पस्ताव रखा था। जनरल सिंह का यह भी कहना है कि उनकी जन्मतिथि का विवाद भी इसलिए खड़ा किया गया, क्योंकि वे सेना के भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ थे। उन्होंने कहा कि सेना में भ्रष्टाचार का कैंसर इतना फैल चुका है कि अब छोटे-मोटे ऑपरेशन से काम नहीं चलेगा, बड़ी सर्जरी ही करनी होगी। जनरल सिंह का यह कथन सनसनीखेज अवश्य है पर अविश्वसनीय नहीं पर सीधा सवाल यह उठता है कि जनरल साहब इसे तत्काल ही मामले को सामने क्यों नहीं लाए? पर यह भी सच है कि रक्षा सौदों में दलाली के लेन-देन की सुगबुगाहट जारी ही रहती है। यह हथियारों, उपकरणों से लेकर अन्य सामग्रियों की खरीद को लेकर भी सुनाई देती रहती है। अगर जनरल सिंह के नए आरोपों को ध्यान से देखा जाए तो उनका निशाना सरकार और रक्षामंत्री एके एंटनी हैं। रक्षामंत्री ने जनरल सिंह की जन्मतिथि वाले विवाद में उनका पक्ष नहीं लिया था। जनरल सिंह का यह भी कहना है कि रिश्वत की पेशकश के बारे में उन्होंने रक्षामंत्री को अवगत कराया था। यह अच्छा है कि एंटनी ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दे दिया है, क्योंकि यह पश्न अनुत्तरित है कि जब सेनाध्यक्ष ने उसी समय रक्षामंत्री को इस पकरण से अवगत करा दिया था तो फिर जांच कराने का निर्णय अब क्यों लिया जा रहा है? क्या रक्षामंत्री इसका इंतजार कर रहे थे कि सेना पमुख मामले को सार्वजनिक करें? सवाल यह भी है कि सेना पमुख ने रिश्वत की पेशकश के इस मामले को यूं ही क्यों छोड़ दिया था? इन सवालों का जवाब चाहे जो हो, यह स्पष्ट है कि हमारी सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार से निपटने की कोई इच्छाशक्ति नहीं रखता। क्या यह माना जाए कि बिचौलियों की भूमिका केवल दूसरे देशों से किए जाने वाले रक्षा सौदों में ही खत्म हो गई है? यह घोर लज्जाजनक है कि स्वतंत्रता के तुरंत बाद यानी 1948 में जीप घोटाले से दो-चार होने वाले देश को अब यह सुनने को मिल रहा है कि किसी की ओर से ट्रक घोटाले को अंजाम देने की कोशिश की गई। इससे साफ पता चलता है कि उन तौर-तरीकों को दूर करने के लिए कहीं कोई कोशिश नहीं की गई जिससे घपलों-घोटालों को रोका जा सके। सबसे चिंताजनक सवाल तो यह होना चाहिए कि कैसे सेनाध्यक्ष को रिश्वत की पेशकश हो सकती है? इससे रिश्वत देने वाले दलालों की हिम्मत और दुस्साहस का पता चलता है। क्या कोई रक्षा सौदा बिना दलाली दिए सम्पन्न हो भी सकता है या नहीं? क्या संसद सदस्य इससे परिचित नहीं कि रक्षा सौदों में दलाली होती है? फिर यह सब ड्रामा क्यों? क्या राजनीतिक आरोप-पतिआरोप से दलाली रुक जाएगी? असल वजह यह है कि संसद ने आज तक इसे रोकने का कोई पभावी कदम उठाया ही नहीं। दलालों को हतोत्साहित करने के साथ-साथ दंडित करने के उपयुक्त नियम कानूनों का अभाव है और उसी का दलाल तत्व फायदा उठाते हैं। या तो यह करें कि एक निश्चित पतिशत कमीशन कानूनी तौर से तय कर लें आखिर अखबार बेचने के लिए भी तो हम हॉकर को कमीशन देते हैं। हां कमीशन की एवज में घटिया सौदा कम से कम सुरक्षा उपकरणों में मंजूर नहीं। यह तो देश से गद्दारी है जिसकी कड़ी सजा होनी चाहिए।
Anil Narendra, Daily Pratap, General V.k. Singh, Manmohan Singh, Vir Arjun

Thursday, 9 February 2012

क्या जनरल सिंह के खिलाफ रणनीति के तहत साजिश रची गई?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9th February  2012
अनिल नरेन्द्र
थल सेना अध्यक्ष जनरल वीके सिंह की उम्र के विवाद के पीछे क्या सत्ता में बैठे कुछ लोगों ने साजिश रची थी? कम से कम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुसार तो यह सारा विवाद एक रणनीति के तहत खड़ा किया गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने मुख्य पत्र आर्गेनाइजर में एक रिपोर्ट छापी है। रिपोर्ट के मुताबिक सत्ता में शीर्ष पर बैठे लोगों ने जनरल विजय कुमार सिंह को समय से पहले रिटायर करने की साजिश पिछले साल रची थी। संघ ने आर्गेनाइजर के माध्यम से सेना प्रमुख का खुलकर समर्थन किया है और उनके खिलाफ सरकार के सख्त रुख को जनरल सिंह की ईमानदारी का नतीजा बताया है और कहा है कि कांग्रेस पार्टी के लिए वह रक्षा सौदों में आड़े आ रहे हैं। सेना प्रमुख के खिलाफ सरकार के भीतर और बाहर विशेष रूप से कांग्रेस पार्टी के भीतर के तत्वों की साजिश का यह दावा ऐसे समय सामने आया है जब उच्चतम न्यायालय ने उम्र के विवाद पर उनकी याचिका पर सरकार को अपना आदेश वापस लेने को कहा है। कानूनी विशेषज्ञों और जानकार सूत्रों ने इस बात की पुख्ता सम्भावना जाहिर की है कि सरकार अपना 30 दिसम्बर का वह आदेश वापस ले लेगी जिसके जरिये रक्षा मंत्री एके एंटनी ने सेना प्रमुख की वैधानिक याचिका खारिज कर दी थी। रक्षा मंत्री द्वारा अपनी शिकायत खारिज होने पर ही जनरल सिंह ने 16 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी जिसकी सुनवाई हो रही है। साजिश के पहलू का आधार गिनाते हुए संघ ने कहा है कि सत्ता में शीर्ष पर बैठे लोगों ने तय किया कि जनरल सिंह की जगह अपना आदमी बैठना चाहिए। सम्पादकीय में कहा गया है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के कार्यकाल में बड़ी संख्या में हुए रक्षा सौदों को इस विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि जनरल वीके सिंह की ईमानदारी सरकार के भीतर एवं बाहर तथा कांग्रेस पार्टी के रक्षा सौदे करने वालों को रास नहीं आ रही थी। व्हाट ए शेम डॉ. सिंह शीर्षक से प्रकाशित सम्पादकीय में संघ ने कहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चुप्पी भी इसी ओर इशारा करती है। संघ ने राष्ट्रपति और देश की सर्वोच्च कमांडर से आग्रह किया है कि उन्हें संकट के इस समय में प्रधानमंत्री के सामने अपने मन की बात रखनी चाहिए। संघ ने कहा कि जब इज्जत पर कीचड़ उछाली जाती जा रही हो तो चुप रहना ठीक नहीं होता और जनरल वीके सिंह ने आवाज उठाकर ठीक ही किया है। जिस तरह की प्रतिक्रिया उनके कदम पर सामने आई है उससे जाहिर है कि वह अकेले नहीं हैं, सारा राष्ट्र उनके साथ है। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि हमारी चिन्ता सरकार के फैसले को लेकर नहीं है बल्कि चिन्ता निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर है जो दुर्भावना वाली लगती है। अदालत ने कहा कि जनरल सिंह की शिकायत को सरकार ने विचार योग्य नहीं माना, तब उनके पास सुप्रीम कोर्ट आने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। संघ के आरोपों में कितना सच है यह तो सरकार ही बेहतर जानती है पर हमारा मानना है कि यह मामला बड़ी आसानी से सुलझ सकता था। जनरल सिंह का जन्म आर्मी अस्पताल में अगर हुआ था तो उस अस्पताल से जन्म तिथि क्यों नहीं पूछ सकते?
Anil Narendra, Daily Pratap, General V.k. Singh, RSS, Supreme Court, Vir Arjun

Thursday, 19 January 2012

जनरल वीके सिंह ने रचा एक नया इतिहास

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th January  2012
अनिल नरेन्द्र
विडम्बना देखिए कि दोनों पड़ोसी देशों में थलसेनाध्यक्ष सुर्खियों में हैं। अगर भारत में सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह बनाम भारत सरकार लड़ाई खुलकर सामने आ गई है तो पड़ोसी पाकिस्तान में थलसेनाध्यक्ष जनरल अशफाक कयानी की प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी की सरकार के बीच सत्ता संघर्ष सुर्खियों में है। फर्प सिर्फ इतना है कि जनरल सिंह एक व्यक्तिगत मुद्दे पर सरकार से लड़ रहे हैं और जनरल कयानी सत्ता की लड़ाई लड़ रहे हैं। खैर! हम बात करते हैं अपने जनरल वीके सिंह की। जनरल सिंह ने अन्तत वह काम कर दिया है जो भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। वह भारत सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चले गए हैं। अपनी जन्मतिथि के दावे को खारिज किए जाने के रक्षा मंत्रालय के फैसले को चुनौती देते हुए उन्होंने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी। देश के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी सेना प्रमुख ने सरकार के फैसले को अदालत में चुनौती दी है। रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में सेना प्रमुख की इस दलील को खारिज कर दिया था कि वे 1951 में पैदा हुए थे, 1950 में नहीं। समझा जाता है कि अपनी याचिका में जनरल सिंह ने कहा है कि उम्र विवाद उनके लिए कार्यकाल का नहीं बल्कि सम्मान और ईमानदारी का मामला है क्योंकि वे 13 लाख सैनिकों वाले बल का नेतृत्व करते हैं। मामला अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुका है इसलिए केस के तर्कों, तथ्यों पर विचार नहीं हो सकता पर मोटे तौर पर उलझन यह है कि सेना की फाइलों में जनरल सिंह की दो अलग-अलग जन्मतिथि दर्ज हैं। जहां उनके मैट्रिक के सर्टिफिकेट और अन्य दस्तावेजों में यह तारीख 10 मई 1951 है। रक्षा मंत्रालय ने उनकी सेवाओं के ज्यादातर मौकों पर इसे स्वीकार भी किया है। दूसरी ओर राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) के प्रवेश फार्म में उनकी जन्मतिथि 10 मई 1950 दर्शाई गई है। सेना की एक्यूटेंट ब्रांच के अनुसार सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह की जन्मतिथि 10 मई 1951 है जबकि सैन्य सचिव शाखा के अनुसार यह 10 मई 1950 है। इससे न केवल जनरल सिंह के कार्यकाल में एक साल का फर्प पड़ता है बल्कि उनके उत्तराधिकारी की लाइन में भी बड़ा परिवर्तन हो सकता है। यह बहुत दुर्भाग्य की बात है कि एक थलसेनाध्यक्ष को अपनी बात मनवाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने पड़े। यह इस यूपीए सरकार की मिसहैंडलिंग का एक और ज्वलंत उदाहरण हैं। सरकार को मामला यहां तक पहुंचने ही नहीं देना चाहिए था। जनरल सिंह के सुप्रीम कोर्ट जाने से न केवल यह स्पष्ट हो गया कि सरकार सहज समाधान खोजने में नाकाम रही बल्कि यह भी साफ हो गया कि अपने स्वाभाव के अनुरूप उसने एक और विवादास्पद मामले को लटकाए रखा। सुप्रीम कोर्ट की ओर से इस विवाद का निपटारा चाहे जैसा हो, हर कोई यह महसूस करेगा कि शीर्ष स्तर के सैन्य अधिकारी की उम्र को लेकर एक तो कोई विवाद उपजना नहीं चाहिए था और यदि वह उपजा तो उसका समाधान सद्भावनापूर्ण तरीके से होना चाहिए था। वहीं जनरल वीके सिंह के सुप्रीम कोर्ट जाने पर इस तर्प को महत्ता देना कठिन है कि आम भारतीय नागरिक की तरह वह भी अदालत जा सकते हैं, क्योंकि यह मामला थलसेनाध्यक्ष द्वारा सरकार को सुप्रीम कोर्ट में खींचने का बन गया है। यह शोभनीय प्रसंग नहीं कि जन्मतिथि को लेकर ही सही, थलसेनाध्यक्ष और सरकार सुप्रीम कोर्ट मेंआमने-सामने होंगे। भले ही यह रेखांकित करने की कोशिश की जाए कि जनरल सिंह आम नागरिक की हैसियत से अदालत गए हैं, लेकिन इस तथ्य की अनदेखी नहीं हो सकती कि वह 13 लाख सैन्यकर्मियों का नेतृत्व कर रहे भारतीय थलसेना के सर्वोच्च अधिकारी हैं। जहां इस प्रकरण से सेना, सरकार दोनों की छवि और मनोबल पर असर पड़ेगा वहीं राजनीतिक दृष्टि से कांग्रेस को इसके दुप्रभाव से बचने का प्रयास अब करना होगा। सरकार की गलती का कहीं कांग्रेस पार्टी को सियासी नुकसान न हो जाए। पांच राज्यों के चुनाव सिर पर हैं और पंजाब, उत्तराखंड जैसे राज्यों में जहां से बहुत सैनिक आते हैं और जहां बहुत रिटायर्ड सैनिक हैं पर इसका क्या असर पड़ता है यह कांग्रेस रणनीतिकारों के लिए चिन्ता का सबब बन सकता है। इस घटना से चुनाव के जातीय समीकरण भी प्रभावित हो सकते हैं।
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