Translater

Showing posts with label Akali Dal. Show all posts
Showing posts with label Akali Dal. Show all posts

Thursday, 9 February 2012

For last 37 days, Punjab and Uttarakhand administrations rendered inactive

- Anil Narendra
Election Commission of India, through its decision, has rendered the State administrations of Punjab and Uttarakhand inactive for more than a month. Election code of conduct is still effective in these States, though polling process has been completed in both the States. The code of conduct would be effective till 6th March, the date of counting of the votes. A Punjab bureaucrat commented, there is no work for us and we are just passing the time by viewing television. Elections in Punjab, Uttarakhand and Manipur have been completed, but no body knows who runs the State? Who is the Chief Minister or Chief Electoral Officer or Chief Election Commissioner (Delhi)? The irony is that, had the Election Commission given a bit of thought, this situation could have been averted. If polling in Punjab and Uttarakhand would have been held on 3rd March and results declared on 6th March, the state of uncertainty could have been avoided. It can be asked, as to what was the compulsion, which led to the administrations in these States making completely inactive. The Election Commission may argue that it wanted to hold elections at the earliest, as election dates are decided keeping a number of factors under consideration. For example, suggestions of political parties are to be kept under consideration. Then, factors like weather, school examinations, holidays, festivals etc are also considered, while finalizing elections arrangements in States. An Akali Dal leader said that we were expecting polling between 10 to 15 February, but when polling date was declared as 30th January, we were a little baffled. Last two State Assembly elections were held on 13th February in 2002 and 2007. In the election history of Uttarakhand, elections were held for the first time during the period of severe cold and snowfall in the hilly region of the State. There have been two Assembly elections in the State in 2002 and 2007, since its inception. The elections in 2002 were held on 14th February and results were declared 24th February. Similarly, 2007 elections were held on 21st February, whereas results were announced after six days on 27th February. According to EC officials the Chief Minister has still not expressd his desire to relax the code of conduct. No doubt, at present, the Chief Minister is working as a caretaker CM and he neither can transfer any officer nor can he ask for explanation, in real sense. This is also one of the reasons that bureaucrats do not take the CM seriously, because they are not sure of CM coming to power again. Uttarakhand Chief Minister, Bhuvan Chandra Khanduri had objected to the election dates decided by the Election Commission, but the EC ignored his objections. This could have been avoided, had the polling in both these States been held a few days earlier to the dates of announcement of results. The political parties are explaining this decision of Election Commission according to their different point of views. Akali-BJP say that the Chief Elections Commissioner has taken this decision to please the Congress so that he could be adjusted somewhere after his retirement.

Tuesday, 7 February 2012

पंजाब और उत्तराखंड में 37 दिनों के लिए सरकार, प्रशासन ठप

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th February  2012
अनिल नरेन्द्र
भारत के चुनाव आयोग ने अपने एक फैसले से पंजाब और उत्तराखंड राज्यों के प्रशासन को एक महीने से ज्यादा समय तक के लिए पंगु बना दिया है। हालांकि दोनों राज्यों में मतदान हो चुका है पर चुनाव आचार संहिता अभी भी लागू है। यह आचार संहिता 37 दिन के लिए यानि कि 6 मार्च तक लागू रहेगी जब तक मतगणना होगी। एक पंजाब के नौकरशाह की टिप्पणी थी कि हम तो अपना सारा समय टीवी देखकर गुजार रहे हैं, काम तो कोई है नहीं। पंजाब और उत्तराखंड व मणिपुर तीनों राज्यों में चुनाव हो चुके हैं और किसी को सही से पता नहीं कि राज्य का मालिक कौन है? मुख्यमंत्री, राज्यपाल, चीफ इलैक्टोरल ऑफिसर या मुख्य चुनाव आयुक्त (दिल्ली), कौन है जिसके आदेशों पर राज्य का प्रशासन चले? विडम्बना यह है कि यह स्थिति उत्पन्न होने से बचा जा सकता अगर चुनाव आयोग थोड़ा-सा भी ध्यान देता। अगर पंजाब, उत्तराखंड में चुनाव 3 मार्च को होते और परिणाम 6 मार्च को आता तो इस अनिश्चित स्थिति से बचा जा सकता था। सवाल यह पूछा जा सकता है कि ऐसी कौन-सी मजबूरी थी जिसकी वजह से राज्यों के प्रशासन को पूरी तरह ठप कर दिया गया। चुनाव आयोग बेशक यह दलील दे कि हम वहां जल्दी चुनाव करवाना चाहते थे क्योंकि चुनाव की तिथियों को बहुत-सी बातों को देखकर ही तय किया जाता है। उदाहरण के तौर पर राजनीतिक दलों की राय। दूसरे राज्यों में चुनाव के प्रबंधों को देखकर, मौसम, स्कूल परीक्षाएं, छुट्टियां, त्यौहार इत्यादि-इत्यादि। अकाली दल के एक नेता का कहना है कि हम थोड़ा हैरान जरूर हुए जब 30 जनवरी को पोलिंग की तिथि की घोषणा हुई, क्योंकि हम उम्मीद कर रहे थे कि चुनाव 10 से 15 फरवरी के बीच होंगे। क्योंकि पिछले दो विधानसभा चुनाव 2002 और 2007 में 13 फरवरी को चुनाव हुए थे। उत्तराखंड के चुनावी इतिहास में यह पहली बार था जब चुनाव ऐसे समय हुए जब राज्य में कड़ाके की ठंड थी, पहाड़ी इलाकों में बर्प पड़ी हुई थी। राज्य बनने के बाद 2002 और 2007 में दो बार विधानसभा चुनाव हुए। 2002 में चुनाव 14 फरवरी को हुए थे और परिणाम 24 फरवरी को घोषित कर दिए गए थे। इसी तरह 2007 में चुनाव 21 फरवरी को हुए थे और 6 दिन बाद परिणाम 27 फरवरी को घोषित कर दिए गए थे। चुनाव आयोग अधिकारियों ने कहा कि अभी तक मुख्यमंत्री ने आचार संहिता को रिलैक्स करने की कोई इच्छा प्रकट नहीं की है। बेशक मुख्यमंत्री अभी भी केयरटेकर मुख्यमंत्री हैं पर वह किसी भी अधिकारी की ट्रांसफर नहीं कर सकता, न ही सही मायनों में जवाबतलबी कर सकता है। नौकरशाह इसलिए भी मुख्यमंत्री को गम्भीरता से नहीं लेते क्योंकि वह कहते हैं कि पता नहीं कि यह दोबारा सत्ता में आए भी या नहीं? उत्तराखंड मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खंडूरी ने चुनाव आयोग द्वारा तय की गई चुनाव डेट पर ऐतराज किया था पर चुनाव आयोग ने इसे नजरअंदाज कर दिया। इस स्थिति से बचा जा सकता था अगर इन दोनों राज्यों में चुनाव परिणाम आने से कुछ दिन पहले होते। राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से चुनाव आयोग के इस फैसले का मतलब निकाल रहे हैं। अकाली-भाजपा का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने कांग्रेस को खुश करने के लिए यह किया ताकि पार्टी उनको रिटायरमेंट के बाद कहीं न कहीं एडजस्ट कर दे।
Akali Dal, Anil Narendra, BJP, Congress, Daily Pratap, Election Commission, Punjab, State Elections, Uttara Khand, Vir Arjun

Thursday, 26 January 2012

पंजाब विधानसभा चुनाव ः कैप्टन का पलड़ा भारी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 26th January  2012
अनिल नरेन्द्र
पंजाब विधानसभा चुनाव अब बिल्कुल करीब आ गए हैं। चुनाव से पहले के इस अंतिम सप्ताह में सियासी लड़ाई बहुत तेज हो गई है। कांग्रेस बनाम अकाली-भाजपा गठबंधन में से कौन अगले पांच साल पंजाब की गद्दी सम्भालेगा, जल्द तय हो जाएगा। इस बार पंजाब चुनाव में विदेशों में रहने वाले पंजाबी प्रवासी भी गहरी रुचि ले रहे हैं। राज्य के दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियां कांग्रेस व अकाली दल के पक्ष में यह प्रवासी भारतीय जोर-शोर से प्रचार कर रहे हैं। पंजाब के अखबारों में बाकायदा इन पार्टियों के पक्ष में विज्ञापन देकर प्रचार किया जा रहा है। अमेरिका में बसे पंजाबी प्रवासियों का इस चुनाव में इतनी दिलचस्पी लेने के पीछे एक कारण है अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर पर अमेरिकी टेलीविजन शो के होस्ट जेम लेनो द्वारा की गई अपमानजनक टिप्पणी। अमेरिका में एनबीसी चैनल पर चल रहे लोकप्रिय टीवी कार्यक्रम द टूनाइट शो में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की तस्वीर दिखाते हुए जेम लेनो ने कहा था कि यह अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी के लिए गर्मी के लिहाज से सम्भावित ठिकाना है। दुनियाभर के हमारे सिख भाइयों को लेनो की इस अपमानजनक टिप्पणी पर गुस्सा स्वाभाविक ही है। भारत सरकार ने इस पर सख्त आपत्ति की है। इस मुद्दे पर सारे सिख एक हैं, जो देश में हैं या दुनिया के किसी कोने में हैं। खैर! हम बात कर रहे थे पंजाब विधानसभा चुनाव की। पंजाब के मतदाता 30 जनवरी को 117 विधानसभा सीटों के लिए वोट डलेंगे। सभी राजनीतिक दल अंदरूनी मार से जूझ रहे हैं। कांग्रेस राज्य की सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ रही है वहीं सत्तारूढ़ शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी भी सभी स्टेटों पर खड़ी है। बहुजन समाज पार्टी 110, पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब 91, सीपीएम 9 और सीपीआई 14 पर लड़ रहे हैं। मुख्य मुकाबला कांग्रेस व अकाली-भाजपा में है। पहले बात करते हैं कांग्रेस की। कांग्रेस के लिए पंजाब का चुनाव जिताने का सारा दारोमदार कैप्टन अमरिन्दर सिंह के कंधों पर है। वह न केवल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं बल्कि भावी मुख्यमंत्री भी हैं। अगर पंजाब में कांग्रेस सत्ता में आती है तो कैप्टन ही अगले मुख्यमंत्री होंगे। कैप्टन इन दिनों आत्मविश्वास से भरे हुए बयान दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि अकाली-भाजपा सरकार स्वतंत्रता के बाद से पंजाब में अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार है। उन्होंने इन चुनावों में अकालियों का भ्रष्टाचार पर असहनशीलता का दावा करने को सबसे बड़ा मजाक करार दिया। कैप्टन का दावा है कि वह 117 सीटों वाली विधानसभा में कम से कम 70 सीटें जीत रहे हैं। वहीं अकाली दल की कमान थामे सुखबीर बादल दावा कर रहे हैं कि उनकी ही सरकार बनेगी। हर राजनीतिक पार्टी का उम्मीदवार जाति, धर्म और बिरादरी के वोट पक्के करने में पूरा जोर लगा रहा है। पंजाब में मालवा क्षेत्र का खासा प्रभाव है। यहां करीब 40 विधानसभा सीटें हैं और यही अकाली दल का गढ़ माना जाता है। हालांकि 2007 में यहां शिरोमणि अकाली दल को भारी झटका लगा था। हालांकि बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक श्री कांशीराम पंजाब के ही थे और यहां दलितों की आबादी भी 30 प्रतिशत है और उनकी आर्थिक स्थिति भी दूसरे राज्यों के दलितों से बेहतर है पर पार्टी यहां अपने पांव जमा नहीं सकी। स्टार-न्यूज-नेलसन ने एक ताजा चुनाव पूर्व सर्वे किया है। सर्वे के अनुसार कांग्रेस 63 सीटें जीत रही है जबकि अकाली-भाजपा गठबंधन को 53 सीटों से संतुष्ट होना पड़ेगा। तीसरे मोर्चे में सर्वे के मुताबिक पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब (मनप्रीत बादल) केवल अपनी ही सीट निकालने में कामयाब होंगे पर यह सर्वेक्षण गलत भी हो जाते हैं। फिलहाल हम यही कह सकते हैं कि कैप्टन का पलड़ा भारी लग रहा है।

पंजाब विधानसभा चुनाव अब बिल्कुल करीब आ गए हैं। चुनाव से पहले के इस अंतिम सप्ताह में सियासी लड़ाई बहुत तेज हो गई है। कांग्रेस बनाम अकाली-भाजपा गठबंधन में से कौन अगले पांच साल पंजाब की गद्दी सम्भालेगा, जल्द तय हो जाएगा। इस बार पंजाब चुनाव में विदेशों में रहने वाले पंजाबी प्रवासी भी गहरी रुचि ले रहे हैं। राज्य के दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियां कांग्रेस व अकाली दल के पक्ष में यह प्रवासी भारतीय जोर-शोर से प्रचार कर रहे हैं। पंजाब के अखबारों में बाकायदा इन पार्टियों के पक्ष में विज्ञापन देकर प्रचार किया जा रहा है। अमेरिका में बसे पंजाबी प्रवासियों का इस चुनाव में इतनी दिलचस्पी लेने के पीछे एक कारण है अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर पर अमेरिकी टेलीविजन शो के होस्ट जेम लेनो द्वारा की गई अपमानजनक टिप्पणी। अमेरिका में एनबीसी चैनल पर चल रहे लोकप्रिय टीवी कार्यक्रम द टूनाइट शो में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की तस्वीर दिखाते हुए जेम लेनो ने कहा था कि यह अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी के लिए गर्मी के लिहाज से सम्भावित ठिकाना है। दुनियाभर के हमारे सिख भाइयों को लेनो की इस अपमानजनक टिप्पणी पर गुस्सा स्वाभाविक ही है। भारत सरकार ने इस पर सख्त आपत्ति की है। इस मुद्दे पर सारे सिख एक हैं, जो देश में हैं या दुनिया के किसी कोने में हैं। खैर! हम बात कर रहे थे पंजाब विधानसभा चुनाव की। पंजाब के मतदाता 30 जनवरी को 117 विधानसभा सीटों के लिए वोट डलेंगे। सभी राजनीतिक दल अंदरूनी मार से जूझ रहे हैं। कांग्रेस राज्य की सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ रही है वहीं सत्तारूढ़ शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी भी सभी स्टेटों पर खड़ी है। बहुजन समाज पार्टी 110, पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब 91, सीपीएम 9 और सीपीआई 14 पर लड़ रहे हैं। मुख्य मुकाबला कांग्रेस व अकाली-भाजपा में है। पहले बात करते हैं कांग्रेस की। कांग्रेस के लिए पंजाब का चुनाव जिताने का सारा दारोमदार कैप्टन अमरिन्दर सिंह के कंधों पर है। वह न केवल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं बल्कि भावी मुख्यमंत्री भी हैं। अगर पंजाब में कांग्रेस सत्ता में आती है तो कैप्टन ही अगले मुख्यमंत्री होंगे। कैप्टन इन दिनों आत्मविश्वास से भरे हुए बयान दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि अकाली-भाजपा सरकार स्वतंत्रता के बाद से पंजाब में अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार है। उन्होंने इन चुनावों में अकालियों का भ्रष्टाचार पर असहनशीलता का दावा करने को सबसे बड़ा मजाक करार दिया। कैप्टन का दावा है कि वह 117 सीटों वाली विधानसभा में कम से कम 70 सीटें जीत रहे हैं। वहीं अकाली दल की कमान थामे सुखबीर बादल दावा कर रहे हैं कि उनकी ही सरकार बनेगी। हर राजनीतिक पार्टी का उम्मीदवार जाति, धर्म और बिरादरी के वोट पक्के करने में पूरा जोर लगा रहा है। पंजाब में मालवा क्षेत्र का खासा प्रभाव है। यहां करीब 40 विधानसभा सीटें हैं और यही अकाली दल का गढ़ माना जाता है। हालांकि 2007 में यहां शिरोमणि अकाली दल को भारी झटका लगा था। हालांकि बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक श्री कांशीराम पंजाब के ही थे और यहां दलितों की आबादी भी 30 प्रतिशत है और उनकी आर्थिक स्थिति भी दूसरे राज्यों के दलितों से बेहतर है पर पार्टी यहां अपने पांव जमा नहीं सकी। स्टार-न्यूज-नेलसन ने एक ताजा चुनाव पूर्व सर्वे किया है। सर्वे के अनुसार कांग्रेस 63 सीटें जीत रही है जबकि अकाली-भाजपा गठबंधन को 53 सीटों से संतुष्ट होना पड़ेगा। तीसरे मोर्चे में सर्वे के मुताबिक पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब (मनप्रीत बादल) केवल अपनी ही सीट निकालने में कामयाब होंगे पर यह सर्वेक्षण गलत भी हो जाते हैं। फिलहाल हम यही कह सकते हैं कि कैप्टन का पलड़ा भारी लग रहा है।
Akali Dal, Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Punjab, Vir Arjun

Friday, 20 January 2012

पंजाब में कांटे की टक्कर में तीसरे मोर्चे की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th January  2012
अनिल नरेन्द्र
पंजाब के उप मुख्यमंत्री व शिरोमणी अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने फजिल्का मे एक मीटिंग को संबोधित करते हुए वर्परों व नेताओं को हिदायत दी कि वे अकाली-भाजपा गठबंधन के उम्मीदवारों का पूरा समर्थन करें। गठबंधन के उम्मीदवारों का समर्थन न करने वालों को पार्टी से बाहर कर दिया जाएगा। वे रविवार को फजिल्का में भाजपा उम्मीदवार व परिवहन मंत्री सुरजीत के समर्थन में रैली को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने साथ ही आजाद पत्याशियों को भी चेतावनी दी और कहा कि जो आजाद पत्याशी वर्परों को धमकाएंगे उनसे पंजाब पुलिस व मैं खुद निपटना जानता हूं। बादल ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह डे ड्रीम सिड्रोंम (दिन में सपने देखना) से पीड़ित हैं। इसलिए वह शिअद-भाजपा को 33 सीटें तक सीमित करने और कांग्रेस के खाते में 75 सीटें आने का दावा कर रहे हैं। लगता है कि कैप्टन को दिन में सपने देखने की बीमारी है। उन्होंने कहा कि 2002 में पंजाब में जब कांग्रेस की लहर थी तब भी अकाली-भाजपा गठबंधन को 48 सीटें मिली थी, अब तो हालात बिल्कुल उल्टे हैं।
पंजाब के मतदाता 30 जनवरी को 117 विधानसभा सीटों के लिए मतदान करेंगे लेकिन कौन सी पार्टी या गठबंधन सरकार बनाएगी, इस बाबत न तो सत्तारूढ़ शिरोमणी अकाली दल-भाजपा गठबंधन आश्वस्त है और न ही कांग्रेस। पचास साल पहले 1966 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद से पंजाब सूबे की आवाम ने किसी भी राजनीतिक दल को लगातार दूसरी बार जिताकर पंजाब में शासन की कमान नहीं सौंपी है। पंजाब का राजनीतिक माहौल उसके पड़ोसी हरियाणा से मेल नहीं खाता क्योंकि हरियाणा आया राम-गया राम के कारण पूरे मुल्क में बदनाम हो चुका है। वहां सरकार बनाने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त का माहौल नहीं है। चाहे कांग्रेस हो या अकाली गठबंधन हो। कुछ लोगों का कहना है कि इस बार पंजाब में अकालियों की चुनावी नैया भाजपा के भरोसे है। राज्य में भाजपा की हालत काफी पतली है। अगर पार्टी पिछली बार की तुलना में आधी सीटें भी जीत पाने में कामयाब रहती है तो अकाली गठबंधन की सरकार बन सकती है। वैसे राज्य में भ्रष्टाचार, कालाधन या लोकपाल चुनावी मुद्दा नहीं बन पाए हैं। नवीनतम आकलन के मुताबिक कांग्रेस के साथ अकाली-भाजपा गठबंधन की कांटे की टक्कर है। अगर भाजपा को 10 सीटें भी हासिल हो गई तो गठबंधन सरकार बनाने की स्थिति में जा सकता है। पिछली बार भाजपा को 19 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। इस बार एक अन्य फैक्टर तीसरा मोर्चा भी होगा जिसे साझा मोर्चा का नाम दिया गया है। अकाली-भाजपा गठबंधन और कांग्रेस दोनों पार्टियों के लिए पंजाब के पूर्व वित्तमंत्री मनपीत बादल एक ऐसी राजनीतिक शख्सियत बन गए हैं, जिन्हें वे अनचाहे अपने कंधों पर लादे अपना-अपना राजनीतिक समीकरण बना रहे हैं। मनपीत बादल पकाश सिंह बादल के भतीजे हैं और सुखबीर के चचेरे भाई, उन्हें अक्टूबर 2010 में वित्तमंत्री व शिरोमणी अकाली दल से बर्खास्त कर दिया गया तो उन्होंने अपनी पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब का गठन किया और तब से वह चुनावी रणनीति में लगे हुए हैं। इस साझा मोर्चे मे पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब, वामपंथी दल व कुछ छोटे दल शामिल हैं। साझा मोर्चे ने सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है और कई सीटों पर मजबूत उम्मीदवार भी उतारे हैं। गौरतलब है कि पंजाब में अभी तक न तो बहुजन समाज पार्टी व न ही वामपंथी मुख्य राजनीतिक दलों का खेल बिगाड़ सके। बसपा के जनक कांशीराम पंजाब के ही थे और यहां दलितों की आबादी करीब 30 पतिशत है। बहरहाल, माकपा और भाकपा भी साझा मोर्चे में हैं। साझा मोर्चा आगामी चुनाव में क्या भूमिका निभाता है इसका पता तो चुनाव नतीजे ही बताएंगे लेकिन कांग्रेस, अकाली-भाजपा गठबंधन की कांटे की टक्कर में कुछ भी हो सकता है, हो सकता है कि तीसरा मोर्चा किंगमेकर की भूमिका में आ जाए?
Akali Dal, Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Punjab, State Elections, Vir Arjun

Friday, 13 January 2012

पंजाब में कांग्रेस बनाम अकाली-भाजपा गठबंधन लड़ाई है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13th January  2012
अनिल नरेन्द्र
पंजाब विधानसभा की 117 सीटों पर चुनाव के लिए बृहस्पतिवार को अधिसूचना जारी होने के साथ ही नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो गई। राज्य में 30 जनवरी को चुनाव होना है। मतदाता सूची के अनुसार मतदाताओं की कुल संख्या करीब एक करोड़ 74 लाख है। पंजाब का चुनावी महाभारत का कुरुक्षेत्र इस बार लम्बी विधानसभा क्षेत्र में लड़ा जा रहा है। यह अलग बात है कि इस युद्ध में कोई कृष्ण नहीं है और न ही इस बार कोई धर्मयुद्ध है। महाभारत की तरह इस बार इस युद्ध में भी एक साथ बचपन गुजारने, खेलने, पढ़ने, खाने-पीने, सोने और युवा होने वाले दो सगे भाई मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उनके छोटे भाई गुरुदास बादल चुनावी दंगल में एक-दूसरे के आमने-सामने होंगे। जिस प्रकार स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस की राजनीति नेहरू-गांधी परिवार के इर्द-गिर्द घूमती रही है, उसी तरह पंजाब की राजनीति में गिने-चुने परिवारों की परिक्रमा करती रही है। आश्चर्य की बात है कि इन परिवारों में से एक आध को छोड़कर कोई ऐसा परिवार नहीं है जिसने स्वतंत्रता प्राप्ति में कोई महत्वपूर्ण योगादन दिया हो। सरदार भगत सिंह, सुखदेव, लाल लाजपत राय, डॉ. किचलू, मदन लाल ढींगरा जैसे कद्दावर नेताओं, जिनके परिवारों ने अपना सब कुछ देश पर लुटा दिया, वे वक्त की अंधेरी गलियों में खो गए और उनका स्थान ऐसे राजनेताओं ने ले लिया जिनका सामाजिक सरोकार का दायरा सीमित ही रहा। अगर सही तौर पर देखें तो राज्य की राजनीति पांच परिवारों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। पुराने राजा-महाराजों की तरह इन्होंने भी एक दूसरे के परिवार में रिश्तेदारी जोड़कर सत्ता के समीप रहने और उसका उपयोग करने के जुगाड़ बनाए हुए हैं। इस समय बादल परिवार कैप्टन अमरिन्द्र सिंह परिवार, कैरी परिवार, मजीठिया परिवार, महल परिवार, बेअंत सिंह परिवार और बराड़ परिवार के नाम प्रमुख हैं। मुख्य मुकाबला बादल परिवार और कैप्टन अमरिन्द्र सिंह परिवार के बीच यानि कांग्रेस और अकाली दल के बीच है। प्रकाश सिंह बादल राज्य के मुख्यमंत्री है, उनके पुत्र सुखबीर बादल उप मुख्यमंत्री हैं। पंजाब विधानसभा चुनाव की सारी रणनीति सुखबीर ही संभाल रहे हैं। सुखबीर की पत्नी हरसिमन कौर का संबंध मजीठिया परिवार से है। वह अकाली दल की सांसद हैं। उधर कैप्टन अमरिन्द्र सिंह मुख्यमंत्री रह चुके हैं। इस समय वह कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष हैं। उनकी पत्नी महारानी परनीत कौर सांसद व विदेश राज्यमंत्री हैं। खालिस्तान समर्थक नेता सिमरनजीत सिंह मान उनके साढू हैं। कैप्टन का दावा है कि कांग्रेस चुनाव में करीब 70 सीटों पर जीत हासिल करेगी और पंजाब में अगली सरकार बनाएगी। कैप्टन के सगे भाई राजा मलविन्दर सिंह ने अपने साथियों सहित पार्टी छोड़कर शिरोमणी अकाली दल (बादल) में शामिल हेन की घोषणा कर दी है। हाल में स्वर्ण मंदिर के बाहर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को काले झंडे दिखाना अकाली-भाजपा योजना का हिस्सा था जब वह अपनी पत्नी के साथ इस धर्म स्थल से बाहर निकल रहे थे। पंजाब में पिछले चुनाव में भाजपा ने 19 सीटें हासिल की थी परन्तु हाल के कुछ महीनों में उसकी साख में कमी हो गई है। क्योंकि कुछ मंत्री अकाली-भाजपा गठबंधन छोड़कर जा चुके हैं और पार्टी कोई उल्लेखनीय सुधार भी नहीं कर पाई। कुल मिलाकर पंजाब में जबरदस्त टक्कर कांग्रेस, अकाली-भाजपा गठबंधन के बीच होनी तय है। बसपा और अन्य छोटे दलों की कुछ ज्यादा भूमिका नजर नहीं आ रही।
Akali Dal, Anil Narendra, BJP, Congress, Daily Pratap, Punjab, State Elections, Vir Arjun