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Friday, 15 June 2012

4.5 फीसद कोटे पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाईं फटकार

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15 June 2012
अनिल नरेन्द्र
वेंद्र सरकार ने उत्तर प्रादेश सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले जिस हड़बड़ी से बिना सोचे-समझे वोट बैंक के चक्कर में पिछड़े वर्ग यानी ओबीसी के 27 फीसदी आरक्षण के भीतर पिछड़े अल्पसंख्यकों को 4.5 फीसदी आरक्षण देने का पैसला किया था, उसका हश्र वही होना था जो हुआ। अब सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रादेश हाईं कोर्ट के पैसले पर स्थगन देने से इंकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा है कि पास आरक्षण देने के पर्यांप्त आधार नहीं हैं। गौरतलब है कि आंध्र प्रादेश की कांग्रोस सरकार ने मुस्लिमों को 4.5 फीसद आरक्षण दिया था। वेंद्र सरकार ने काफी उधेड़बुन के बाद हाईं कोर्ट के पैसले पर स्टे लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। मनमोहन सरकार ने जब यह पैसला लिया था तभी यह जाहिर हो गया था कि आरक्षण का मुद्दा न्यायिक विवेक से भटक कर खालिस राजनीतिक फायदेनुकसान पर वेंद्रित था। जनता बेववूफ नहीं है वह तब ही समझ गईं थी कि मनमोहन सरकार लोकपाल बिल से चौतरफा दबाव में है और वह जनता का ध्यान बंटाने के लिए यह आरक्षण का शोशा लाईं है। दुर्भाग्य से वेंद्र सरकार की यह चाल सफल नहीं हुईं और अल्पसंख्यक सरकार के इस लालीपॉप के चक्कर में नहीं आए और कांग्रोस को यूपी में मुंह की खानी पड़ी। कांग्रोस का आलम यह रहा कि मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के लिए तब वेंद्र सरकार के मंत्री संवैधानिक मर्यांदाओं को ताक पर रखकर बेतुकी बयानबाजी पर उतारू हो गए थे। अच्छी बात यह रही कि जो झटका पहले कांग्रोस को आंध्र प्रादेश ने दिया, तकरीबन उसी तरह का झटका पाटा को उत्तर प्रादेश के चुनावी जनादेश से भी मिला। 
बावजूद इन दो झटकों के कांग्रोस की अगुवाईं वाली यूपीए सरकार मुस्लिमों की हिमायती दिखने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंची पर यहां भी उसे हताशा ही हाथ लगी। यह समझने की जरूरत है कि आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था और इसकी आड़ में होने वाली राजनीति, ये दोनों भिन्न चीजें हैं। आरक्षण के जरिये समाज के उपेक्षित वर्ग को मुख्यधारा से जोड़ने में निाित मदद मिली है पर प्राकारांतर में राजनीतिक दलों और सरकारों ने आरक्षण को अपने राजनीतिक हित साधने का जरिया भी बना लिया जबकि किसी उपेक्षित वर्ग के उत्थान के लिए आरक्षण सिर्प एक जरिया है और वह भी समुचित अवसर उपलब्ध कराए बिना सम्भव नहीं है। सरकार अदालत को यह भी नहीं बता सकी कि किस आधार पर अल्पसंख्यकों को 4.5 फीसद आरक्षण देने का पैसला किया गया था। अभी तक सरकार के पास अदालत में कहने के लिए सिवाय इसके कोईं पुष्ट आधार नहीं है कि आरक्षण देने का पैसला उसने एक डिटेल सव्रे के बाद लिया। इस मुद्दे पर वेंद्र सरकार और कांग्रोस पाटा की फजीहत जहां एक तरफ बढ़ गईं है वहीं दूसरी तरफ एक अच्छी बात यह भी है कि आरक्षण की शुद्ध राजनीति के खिलाफ सबसे तीखा विरोध इस बार मुस्लिम समाज की तरफ से उठा है। वेंद्र सरकार अब भी अल्पसंख्यकों को बेववूफ बनाने से बाज नहीं आ रही। सलमान खुशाद संविधान संशोधन की बात कर रहे हैं। कांग्रोस मुस्लिमों में बुरी तरह से एक्सपोज हो चुकी है अब वह सरकार के झांसे में नहीं आएंगे। 
बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी आरक्षण देने के निर्णय को निरस्त करने से साफ इंकार कर दिया। न्यायमूर्ति केएस राधावृष्णन और न्यायमूर्ति जेएस खेहड़ की अवकाशकालीन पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल गौरव बनजा की दलीलें सुनने के बाद दो टूक शब्दों में कहा—हम उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक नहीं लगाएंगे। न्यायाधीशों ने भी सरकार से वही सवाल किया कि अन्य पिछड़े वर्गो के आरक्षण में से क्या धर्म के आधार पर इस तरह का वगाकरण किया जा सकता है?

Friday, 1 June 2012

आरक्षण के नाम पर अल्पसंख्यकों को गुमराह करने का असफल पयास

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1 June 2012
अनिल नरेन्द्र
केंद्र सरकार को यह मालूम था कि उत्तर पदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उसने जो कांग्रेस पार्टी को अल्पसंख्यक वोट दिलवाने की उम्मीद से अल्पसंख्यकों के लिए जो साढ़े चार पतिशत आरक्षण किया है उसे अदालत रद्द कर सकता है पर फिर भी केंद्र ने ऐसा किया। जैसी उम्मीद थी वैसा ही हुआ। आंध्र पदेश हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को तगड़ा झटका देते हुए मजहब के आधार पर आरक्षण देने से इंकार कर दिया। उल्लेखनीय है कि उत्तर पदेश विधानसभा चुनावों के दौरान केंद्र ने ओबीसी के 27 फीसद कोटे से साढ़े चार फीसद आरक्षण देने की घोषणा की थी। यह आरक्षण सभी अल्पसंख्यक वर्गों के लिए था। हालांकि माना जा रहा था कि इस घोषणा के पीछे मुस्लिम वोट बैंक को लुभाना था। ऐन वक्त पर की गई घोषणा पर चुनाव आयोग ने विधानसभा चुनावों तक इसके अमल पर रोक लगा दी थी। सरकार ने नतीजा घोषित होने के साथ ही इसे लागू कर दिया। केंद्र सरकार ने एक शगूफा छोड़ा था जो अब अदालत ने रद्द कर दिया है। सभी जानते हैं कि भारत के संविधान में धर्म आधारित आरक्षण के लिए कोई जगह नहीं है। केंद्र सरकार का यूपी विधानसभा से ठीक पहले उठाया यह कदम शुद्ध राजनीति से पेरित था और अल्पसंख्यकों को खासतौर से यूपी के मुसलमानों को बेवकूफ बनाने का एक पयास था। उच्च न्यायालय ने साफ कहा कि केंद्र सरकार का यह फैसला केवल धार्मिक आधार पर लिया गया है। इतना ही नहीं हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर लापरवाही से काम करने के लिए केंद्र सरकार को आड़े हाथ भी लिया। सरकार की ओर से यह दलील दी गई थी कि यह फैसला सच्चर समिति की सिफारिशों के आधार पर लिया गया और ऐसा करके उसने 2009 के घोषणा पत्र में दर्ज अपने वादे को पूरा किया है। बावजूद इस सबके वह यह नहीं बता सकी कि जो वादा 2009 में किया गया था उसे पूरा करने की याद 2012 में तब क्यों आई जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव कार्यकम की घोषणा होने वाली थी? शायद यही कारण रहा कि निर्वाचन आयोग ने चुनाव होने तक इस फैसले के अमल पर रोक लगा दी। निर्वाचन आयोग द्वारा इस पर रोक लगाने से साबित हो गया कि यह चुनावी लाभ के लिए लिया गया एक राजनीतिक फैसला था। अब सरकार और कांग्रेस दोनों अल्पसंख्यक आरक्षण पर हाईकोर्ट की इस चाबुक की मार से उभरने का रास्ता खोजने में लग गए हैं। सलमान खुर्शीद ने कहा है कि सरकार आंध्र पदेश हाईकोर्ट के इस फैसले को सुपीम कोर्ट में चुनौती देगी। दलील यह दी जाएगी कि यह फैसला धार्मिक नहीं भाषाई आधार पर लिया गया था। सरकार अपनी पार्टी कांग्रेस को दिलासा दे रही है कि सुपीम कोर्ट में ठीक से पक्ष रखने से अल्पसंख्यक आरक्षण का मामला सुलझ जाएगा। सरकार अपनी हार को वकीलों द्वारा ठीक से केस पस्तुत न कर पाने की वजह मान रही है। सुपीम कोर्ट में पिछड़ों के कोटे के अंदर मुस्लिमों के लिए एक निश्चित कोटे की बात रखने की मजबूत दलील देनी होगी। कोर्ट चाहेगा कि सरकार बताए कि अल्पसंख्यकों में जो पिछड़े हैं वे वास्तव में कितने पिछड़े हैं? कानून मंत्री सलमान खुर्शीद से जब यही सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि एटार्नी जनरल के लिए अदालत को समझाना मुश्किल नहीं होगा क्योंकि सरकार अल्पसंख्यक पिछड़ों की अलग से सूची नहीं बनाने जा रही है। उन्होंने कहा कि पिछड़ों का आरक्षण तय करने वाले मंडल आयोग ने जो खाका दिया है, सरकार उसके दायरे के भीतर ही कोर्ट में बात करेगी। कानून मंत्री ने स्वीकार किया कि सरकार संविधान के बाहर नहीं जा रही है। सुपीम कोर्ट इस मुद्दे पर क्या रुख अख्तियार करता है समय ही बताएगा। इससे इंकार नहीं कि अल्पसंख्यकों और विशेष तौर पर मुस्लिम समाज की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा के लिए अतिरिक्त कदम उठाए जाने की जरूरत है लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं कि ऐसा सिर्प चुनावी लाभ या वोट हासिल करने के लिए किया जाए। मुस्लिम समाज अब राजनीतिक चालबाजियों में फंसने वाला नहीं। उसने देख लिया है कि पिछले छह दशकों से इन राजनीतिक दलों ने उन्हें कैसे गुमराह कर महज वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया है।
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Saturday, 24 March 2012

मुस्लिम औरतों की बदहाली पर कोई सियासी पार्टी बोलने को तैयार नहीं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24 March 2012
अनिल नरेन्द्र
देश में मुस्लिमों के पारिवारिक कानून में सुधार व मुस्लिम निजी कानून संहिताबद्ध किए जाने की मांग अब जोर पकड़ रही है। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन से जुड़ी मुस्लिम महिला शिक्षा, सुरक्षा, रोजगार, कानून एवं सेहत के मुद्दों पर जागरुकता लाने का काम कर रही है। उत्तर प्रदेश के कई शहरों में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन व परचम संस्था संयुक्त रूप से मुस्लिम महिलाओं के बीच जाकर उन्हें सशक्त करने की नई राह दिखा रही हैं। देश में मुस्लिम महिलाओं की स्थिति हमेशा से बहस में रही है। मुस्लिम पारिवारिक कानून में सुधार करने का समय आ गया है। दिल के अरमां आंसुओं में बह गए...। हिन्दी फिल्म का यह गीत मुस्लिम बिरादरी की महिलाओं का दर्द बयां करता है। एक पति के भरोसे ही लड़कियां अपना मायका छोड़कर ससुराल आती हैं। लेकिन पति जब एक के अलावा तीन और बीवी रखने का हक शरीयत के जरिये यानि कानून न मिला हो तो हालात बदतर हो जाते हैं। इस्लाम धर्म में मुसलमानों को हालात के आधार पर चार बीवी रखने की छूट है। धर्म की आड़ में हालात कुछ लोग खुद ही गढ़ लेते हैं और इस्लाम में बताई गई परिस्थितियों को नजरअंदाज कर देते हैं। मन मुताबिक उसकी व्याख्या करते हैं। सूबे या मुल्क के सियासी दल भले ही वोटों की सियासत में चुप्पी साधे हैं। लेकिन हालात ज्यादा बिगड़ते नजर आ रहे हैं। सियासी दल अल्पसंख्यक के रूप में मुस्लिमों को आरक्षण देने की वकालत तो करते हैं लेकिन महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार पर चुप्पी साध लेते हैं। गम्भीर मुद्दों पर बोल देने के बाद वोट खिसकने के डर से दल इससे कन्नी काटना ही मुनासिब समझते हैं। ऐसा नहीं कि सभी मुस्लिम घरों में हालात बदतर हैं। लेकिन जितने भी मामले परिवार परामर्श केंद्र में पारिवारिक बिखराव के आते हैं वे ज्यादातर मुस्लिम परिवारों के ही होते हैं। 21वीं सदी में बिना किसी सुधार के डेढ़ हजार साल पहले के कानून में सुधार होना जरूरी है। शरीयत के आगे पुलिस, वर्तमान कानून और काउंसलर सभी लाचार नजर आते हैं। अली बुन्निशा की हालत कुछ ऐसी ही है। वह ग्राम सलेमपुर, थाना सादुल्लाह जनपद बलरामपुर की रहने वाली है। वह बेजुबान है। उसकी शादी फिरोज पुत्र किताबुल्लाह, ग्राम बरधार, थाना भवानीगंज जनपद सिद्धार्थ नगर में हुई थी। फिरोज कमाने के लिए सऊदी अरब चला गया। वहां उसने दूसरी शादी कर ली। अब अलीबुखशा अपने पांच साल के बेटे के साथ इंसाफ की भीख मांग रही है। बेजुबान होने की वजह से आंखों से अपना दर्द निकालती है। अब महिला थाने में चलने वाले परिवार परामर्श केंद्र के काउंसलरों नईम खान और सुनीता पांडे ने बीच का रास्ता निकालते हुए फैसला किया कि आगामी एक अप्रैल को महिला थाने से ही अली बुन्निशा की विदाई होगी। उसकी विदाई उसके जेठ से इस आशय का शपथ पत्र लेने के बाद होगी कि वह उसके पति के आने तक उसकी देखरेख और खाने-पीने का इंतजाम करेगा। दूसरा मामला हसीना खातून का है। हसीना छह बच्चों की मां हैं। शौहर आलम पर इश्क का भूत इस कदर सवार हुआ कि वह गांव की ही एक नाबालिग लड़की को भगा ले गया। बाद में 376 का आरोपी बनते हुए जेल की सजा काटकर वापस आने के बाद अपनी बीवी हसीना को छोड़ने के लिए प्रताड़ित करने लगा। इतना ही नहीं, उसने अदालत में बीवी हसीना पर विदाई का दावा भी ठोंक दिया। तीसरा मामला शबनम का है। ग्राम चंदापुर थाना शोहरतगढ़ की रहने वाली शबनम बानो के पिता मोहम्मद जकी के दरवाजे पर हाथी बांधे जाते थे। अब वे नहीं है। शबनम का निकाह मोहम्मद इस्तेकार पुत्र मोहम्मद कैशरनाथ ग्राम मैना, थाना इटावा जनपद सिद्धार्थ नगर के साथ हुआ। माता-पिता की इकलौती संतान शबनम की विदाई से पहले ही इस्तेकार अपनी पत्नी से कहने लगा कि पहले तीन लाख रुपये और पूरी जमीन मेरे नाम कर दो, तब हम तुम्हें विदा करेंगे। खास बात यह है कि 20 से 30 साल की महिलाओं का ही घर टूटता है। जनपद सहित सुबाई इलाके में दिन-प्रतिदिन महिलाओं के प्रताड़ना संबंधित घटनाओं में तेजी से इजाफा हुआ है और किसी को इसकी चिन्ता नहीं।
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Sunday, 11 March 2012

यूपी के मुस्लिम मतदाताओं ने सोच समझकर होशियारी से वोट दिया

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 11 March 2012
अनिल नरेन्द्र
यूपी के मुसलमानों ने विधानसभा चुनाव में कुछ हद तक टेक्निकल वोटिंग की, यह कहें तो शायद गलत नहीं होगा। मैं समझता हूं कि पहली बार उन्होंने ढंग से मुस्लिम हितों को ऊपर रखकर मैच्योर वोटिंग की है। उन्होंने देखा कि कौन-सी पार्टी से कौन-सा मुस्लिम उम्मीदवार जीत सकता है, उसे ही वोट दो। नतीजों ने मुस्लिम मठाधीशों को धूल चटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उत्तरी राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल से लेकर शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी की सिफारिश के उम्मीदवारों को नकार दिया गया। उलेमा काउंसिल तो प्रदेश में अपना खाता तक नहीं खोल पाई। अपने गढ़ आजमगढ़ की निजामाबाद सीट पर खड़े काउंसिल के महासचिव ताहिर मदनी चौथे स्थान पर रहे। बेहट सीट से इमाम बुखारी के दामाद और सपा उम्मीदवार अमर अली खान चुनाव हार गए। वहीं लखीमपुर खीरी से सपा उम्मीदवार इमरान हार गए। पेशे से बिल्डर इमरान को टीले वाली मस्जिद के इमाम मौलाना शाह फजल-ए-रहमान वाहवी नदवी ने टिकट दिलवाया था। मुस्लिम मतदाताओं का यह फैसला पार्टी नहीं बल्कि उम्मीदवारों के खिलाफ था। समाजवादी पार्टी अधिकांश मुस्लिम बहुल सीटों पर कामयाब रही। इसका नमूना है कि आजमगढ़ की 10 सीटों में से 9 पर सपा उम्मीदवार विजयी रहे। गौरतलब है कि यूपी की चुनावी बिसात में करीब 150 सीटें ऐसी थीं जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में थे। इसके लिए सियासी पार्टियों के बीच रस्साकसी भी खूब चली। चुनावी लाभ के लिए मुसलमानों को आरक्षण देने की होड़ से लेकर साहित्य मेले में सलमान रुशदी की आमद तक मुद्दे उठाए गए। उत्तर प्रदेश की 403 सदस्यों वाली विधानसभा में इस बार 63 मुस्लिम उम्मीदवार चुनकर आए हैं। 2007 में यह आंकड़ा 52 था। सपा के कुल 224 उम्मीदवार जीते हैं, जिनमें मुस्लिम प्रत्याशियों की संख्या 40 है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने 83 तो सपा ने 81 मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे। दोनों पार्टियों ने सभी 403 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। कांग्रेस ने अपने 359 प्रत्याशियों में 58 मुस्लिम को टिकट दिए थे। मुस्लिम बहुल इलाके में भारी मतदान हुआ। इनमें मुस्लिम महिलाओं ने अच्छी भागीदारी निभाई। सहारनपुर और आजमगढ़ के मुस्लिम बहुल क्षेत्र में तो 70 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ। बसपा के 14 मुस्लिम उम्मीदवार जीतकर आए जबकि पिछली बार 29 प्रत्याशी जीते थे। पिछले चुनाव में सपा के मुस्लिम विधायकों की संख्या 17 थी। पीस पार्टी के चार प्रत्याशी जीते जिनमें तीन मुस्लिम हैं। पार्टी के अध्यक्ष डाक्टर अयूब खलीलाबाद सीट से जीते हैं। कौमी एकता दल की ओर से माफिया से राजनीतिज्ञ बने मुख्तार अंसारी मऊ सीट से जीते हैं। सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान रामपुर से तथा वकार अहमद शाह बहराइच से जीते हैं। कांग्रेस के काजी अली खाँ रामपुर की स्बार सीट से जीते हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो यूपी के मुस्लिम मतदाताओं ने सोच-समझकर हिसाब से मतदान किया है।
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Saturday, 24 December 2011

और अब मुस्लिम आरक्षण का पत्ता

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24th December 2011
अनिल नरेन्द्र

केंद्रीय कैबिनेट ने गुरुवार को अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण का रास्ता साफ कर दिया। अब पिछड़े वर्गों के लिए तय 27 फीसदी आरक्षण में साढ़े चार फीसदी हिस्सा अल्पसंख्यकों का होगा। इसे आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का जनाधार के तौर पर देखा जा रहा है। भ्रष्टाचार, लोकपाल, ब्लैक मनी जैसे ज्वलंत मुद्दों से घिरी संप्रग सरकार ने विपक्ष में विभाजन और देश का ध्यान ज्वलंत समस्याओं से हटाने के लिए यह कदम उठाया लगता है। गुरुवार को भोजन का अधिकार देने वाले बिल को संसद में पेश करने वाली मनमोहन सरकार ने राज्य में शिक्षा संस्थानों और नौकरी में अल्पसंख्यकों को आरक्षण का रास्ता साफ करके एक तीर से कई निशाने साधने का प्रयास किया है। कुछ साल पहले रंगनाथ मिश्र आयोग ने मुसलमानों की हालत को बेहतर करने के लिए आरक्षण की सिफारिश की थी। लेकिन संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण देने की इजाजत नहीं देता। इसलिए पिछले वर्ग की सूची में अल्पसंख्यकों को आरक्षण देकर मुसलमानों को लाभ देने की कोशिश कितनी कारगर होगी, यह तो भविष्य ही बताएगा। राजनीतिक मजबूरियों के चलते सरकार ने मुस्लिम आरक्षण बेशक कर दिया हो या करने की नीयत साफ कर दी हो पर सुप्रीम कोर्ट में यह मामला ठहर पाता है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट 10 साल पहले उत्तर प्रदेश की तत्कालीन भाजपा सरकार की ऐसी पहल पर रोक लगा चुका है। उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रहने के दौरान राजनाथ सिंह ने पिछड़ों के 27 फीसदी कोटे में से ही अतिपिछड़ों को अलग से आरक्षण के लिए सामाजिक न्याय समिति बनाई थी। समिति की ही सिफारिश पर उत्तर प्रदेश सरकार ने विधानसभा से पारित उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जाति/जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण) संशोधन अधिनियम 2001 लागू तो कर दिया, लेकिन उसी सरकार के पर्यटन मंत्री रहे अशोक यादव ने उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी जबकि कुछ अन्य संगठन भी सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए थे। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राजनाथ सिंह सरकार के उस फैसले पर रोक लगा दी थी। इस बीच पिछड़ों के ही कोटे से मुसलमानों को आरक्षण की पहल पर यादव ने कहा, `चूंकि कोटे के भीतर एक और कोटे' पर सुप्रीम कोर्ट 10 साल पहले रोक लगा चुका है। ऐसे में केंद्र सरकार मुस्लिम आरक्षण को लेकर यदि वाकई गम्भीर है तो संविधान में संशोधन कराए। हकीकत तो यह है कि अलग-अलग पार्टियों की अगुवाई करने वाले पिछड़े वर्गों के कई नेता जिनमें मुसलमान भी शामिल हैं, पिछड़ों के कोटे से मुस्लिम आरक्षण के खिलाफ है, लेकिन मुस्लिम वोट के चलते वे खुलकर इसका विरोध नहीं करना चाहते। राजनीतिक दल ऐसा सिर्प इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि वह आने वाले चुनावों में मुस्लिम समुदाय के थोक वोट हासिल करना चाहते हैं। मुस्लिम आरक्षण की वकालत करने वाले दलों के पास इस सवाल का शायद ही कोई जवाब हो कि उन्हें अभी तक इस सप्रदाय का पिछड़ापन क्यों नहीं दिखा? क्या आरक्षण से मुस्लिम समुदाय की समस्याएं खत्म हो जाएंगी? हमारे मुसलमान भाइयों की एक बड़ी समस्या यह भी रही है कि इतने सालों के बाद भी उन्हें सही नेतृत्व नहीं मिल सका और जो नेता खुद को इनका हितैषी बताते हैं उनकी दिलचस्पी सिर्प उनके वोट लेने में है। यह एक सच्चाई है कि मुस्लिम समुदाय पिछड़ेपन से ग्रस्त है, लेकिन इस आधार पर उसे मुख्यधारा से बाहर करार देना उसे जानबूझ कर संकुचित दायरे में सीमित करना है। तालीम की एक बहुत बड़ी समस्या है। पिछले दिनों एक सम्मेलन हुआ था उसमें बताया गया कि दिल्ली के मदरसों में सैकड़ों पद खाली पड़े हुए हैं, इन्हें भरने की किसी ने कोई कोशिश नहीं की। सच्चर कमेटी की सिफारिशें भी मुस्लिम समुदाय का स्तर बढ़ा सकती हैं पर अफसोस से कहा जाएगा कि उस पर कोई अमल नहीं हुआ। जब तक मुस्लिम समाज में तालीम नहीं बढ़ाई जाती, हमें तो उसका उद्धार होता मुश्किल लग रहा है। आवश्यकता तो आज इस बात की है कि ऐसी कोई व्यवस्था बनाएं जिसमें भारतीय समाज के जो भी वंचित निर्धन हैं उन सभी का उत्थान हो भले ही वह किसी भी जाति, समुदाय, क्षेत्र अथवा मजहब के हों।
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Saturday, 17 December 2011

यूपी में राहुल गांधी ने चला अपना मुस्लिम कार्ड


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18th December 2011
अनिल नरेन्द्र
कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी आजकल उत्तर प्रदेश के दौरे पर हैं। जैसा कि मैंने इसी कॉलम में कुछ दिन पहले लिखा था कि जैसे-जैसे यूपी विधानसभा चुनाव करीब आएंगे सियासी पार्टियां अपने तरकश से सभी जमा तीर चलाएंगी। इनमें मुस्लिम कार्ड भी शामिल है। राहुल गांधी ने मुस्लिम कार्ड चल दिया है। बदायूं में एक सभा में राहुल ने अपना कार्ड चला। राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार पर सच्चर समिति की सिफारिशों पर जानबूझ कर अमल नहीं करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि क्या आपको सच्चर समिति की रिपोर्ट का फायदा मिला? हरियाणा, दिल्ली और महाराष्ट्र जाइए, वहां इस रिपोर्ट पर अमल हो रहा है राहुल ने अपने संबोधन में कहा। प्रदेश के तीन लाख बुनकरों के 50,000 तक के कर्ज की माफी, विधानसभा चुनाव से पहले पिछड़ों के कोटे में मुसलमानों को अलग आरक्षण देने की घोषणा, राहुल गांधी के लखनऊ प्रवास के दौरान दिग्विजय सिंह का सार्वजनिक मंच से आरक्षण में धार्मिक आधार पर भेदभाव खत्म करने की पैरवी करने का वादा करना और एक दिन बाद दिल्ली के मदरसा शिक्षकों की मांगों को लेकर दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में यूपी के कांग्रेसियों की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात। कांग्रेस पार्टी द्वारा पिछले दिनों उठाए गए यह कुछ ऐसे कदम हैं जिससे संकेत मिल रहे हैं कि कांग्रेस अपने और मुसलमानों के बीच रिश्तों की बर्प पिघलाना चाहती है। स्वाभाविक तौर से इस पहल का ज्यादा श्रेय राहुल गांधी की झोली में जाता हुआ दिख रहा है। राहुल गांधी ने दोनों मुलायम सिंह यादव और मायावती के गढ़ों में भी हल्ला बोल दिया है। बुधवार को राहुल गांधी ने समाजवादी पार्टी के गढ़ बदायूं जिले में जन सभाओं में कहा कि मुलायम सिंह यादव अंग्रेजी और कम्प्यूटर पढ़ाई को गैर जरूरी बताते हैं जबकि उनके अपने बेटे अखिलेश यादव को इन दोनों ही चीजों की शिक्षा दी गई है। इस मुस्लिम बहुल इलाके में मतदाताओं की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि हमने सच्चर समिति की सिफारिशों को लागू कर दिया है? क्या आपको इसका लाभ मिला? उत्तर प्रदेश की सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। वह कुछ करना ही नहीं चाहती। यहां बीस साल के दौरान सत्ता में आए लोगों ने दूरदर्शिता नहीं दिखाई। इसका नुकसान यूपी की जनता को हुआ है। उत्तर प्रदेश सरकार पर केंद्र द्वारा विभिन्न विकास योजनाओं के लिए भेजे गए धन के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि राजीव गांधी कहते थे कि सरकार के भेजे गए एक रुपये में सिर्प 15 पैसे ही जनता तक पहुंचते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश में तो एक भी पैसा नहीं पहुंचता। राहुल ने कहा कि लखनऊ में बैठा हाथी पैसा खाता है। यह धन न तो उत्तर प्रदेश सरकार का है और न ही केंद्र का। यह धन प्रदेश की प्रगति में आपके योगदान से आया है। हम वह पैसा प्रदेश की जनता के लिए भेजते हैं, लेकिन वह हाथी खा जाता है। राहुल अपनी तरफ से हर मुस्लिम एंगल को कवर कर रहे हैं। मुसलमानों के सबसे बड़े इदारे ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मुखिया मौलाना रावे हसनी नदवी हैं, राहुल ने उनसे भी हाल के दौरे में मुलाकात की। राहुल से मुलाकात के बाद मौलाना ने कहाöअच्छा लगता है जब मुल्क के लीडर मुल्क के लिए फिक्रमंद दिखते हैं। गरीबों के लिए फिक्रमंद होने का जज्बा होना चाहिए। राहुल के लिए यह मौका जैसा था, अपने को मौलाना के सामने पेश करने का। बोलेö`मैं गरीब-अमीर में फर्प नहीं समझता।' मेरे लिए सब इंसान हैं। मेरी कोशिश है कि मैं हिन्दुस्तान के ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिल सपूं। सच्चर कमेटी से लेकर मुस्लिम आरक्षण तक के मुद्दों पर बातचीत हुई। अपने चिर-परिचित अंदाज में राहुल ने शाहजहानपुर में मायावती सरकार पर जबरदस्त धावा बोला। राहुल ने कहा कि अभी मायावती के हाथी का पेट नहीं भरा। आम जनता का पैसा खा रहा है। यह सब आपका ही पैसा है जो बसपा सरकार के मंत्रियों की तिजोरियों में जमा हो रहा है। उन्होंने बसपा को सबसे भ्रष्ट बताते हुए कहा कि यहां कोई भी काम रिश्वत के बिना नहीं होता। केंद्र से यूपी के लिए कोई भी योजना आती है तो उसका लाभ लेने वालों को रिश्वत देनी पड़ती है। इन्दिरा आवास योजना पाने वाले गरीबों से अधिकारी 10-10 हजार रुपये वसूलते हैं। मनरेगा का हाल भी किसी से छिपा नहीं है। राहुल ने आम जनता से अपील की कि इस बार पांच साल के लिए कांग्रेस को मौका दो क्योंकि कांग्रेस जहां सरकार चलाती है, वहां प्रगति होती है। पहले आपने सपा को चुना कुछ नहीं मिला। बसपा पर भरोसा किया, भ्रष्टाचार और घोटाले मिले। जाति और धर्म के जाल में फंसकर यह 22 सालों में यूपी लूट गई। जैसा मैंने कहा राहुल गांधी सभी पत्ते चल रहे हैं। उनका खास निशाना मुस्लिम मतदाता हैं और उन्हें पटाने के लिए वह सब कुछ कर रहे हैं।
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Tuesday, 6 December 2011

मुस्लिम आरक्षण पर शह-मात का खेल शुरू

उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड आदि राज्यों के विधानसभा चुनाव निकट आते ही प्रमुख राजनीतिक दल अपना मुस्लिम कार्ड खेलने की तैयारी कर रहे हैं। केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि सरकार अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए निर्धारित 27 फीसदी आरक्षण के अन्दर ही पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण देने पर विचार कर रही है और इस संबंध में शीघ्र ही निर्णय लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा दो साल से सरकार के एजेंडे में था और इस पर फैसला लम्बित था, जो शीघ्र किया जाएगा। उत्तर प्रदेश के दृष्टिकोण से मुस्लिम आरक्षण एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कितना फायदा होगा, वह तो नतीजे बताएंगे लेकिन उसके बहाने देश के मुस्लिम समुदाय को बहरहाल कुछ फायदा जरूर हो सकता है। सरकार और कांग्रेस के रणनीतिकार मान रहे हैं कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भी आगामी फरवरी में उत्तराखंड एवं पंजाब राज्यों के साथ हो सकते हैं। ऐसे में मुस्लिम आरक्षण के मामले में अब देरी नहीं होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश चुनाव के दृष्टिगत मुसलमानों को आरक्षण अब चुनावी मुद्दा बन गया है। बहुजन समाज पार्टी भी इस मुद्दे को पूरी शिद्दत के साथ भुनाना चाहती है। इसी के दृष्टिगत मुख्यमंत्री मायावती ने 14 सितम्बर को प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा था। इसमें कहा गया था कि मुसलमानों को आबादी के अनुपात में अवसर उपलब्ध कराने के लिए आरक्षण की व्यवस्था बहुत जरूरी है। यदि आवश्यकता पड़े तो इसके लिए संविधान में संशोधन किया जाए और बसपा लोकसभा में इसका समर्थन करेगी। बसपा यह मानकर चल रही थी कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के लिए यह मुमकिन नहीं होगा। ऐसे में वह मुसलमानों से कह सकेगी कि हम तो संविधान में संशोधन तक के लिए तैयार हैं। हम तो अपना समर्थन पत्र भी प्रधानमंत्री को दे चुके हैं पर कांग्रेस बहन जी को इसका केडिट कैसे लेने देती। उत्तर प्रदेश सरकार के तमाम पत्रों पर कतई चुप्पी साध लेने वाले प्रधानमंत्री मुस्लिम आरक्षण वाली मायावती की चिट्ठी का जवाब देना नहीं भूले। चिट्ठी का जवाब भी दिया नेहले पर देहला जैसा। प्रधानमंत्री ने लिखा कि कानून के तहत और स्वप्रेरणा से आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल की सरकारों ने मुसलमानों को काफी समय से सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया है। वह उम्मीद करेंगे कि मुख्यमंत्री इन राज्यों के उदाहरणों पर गौर करेंगी और अपने राज्य में उसी तरह कदम उठाने पर विचार करेंगी। एक तरह से उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री को बगैर कहे प्रधानमंत्री का जवाब था कि अगर आप मुसलमानों की इतनी ही हितैषी हैं तो आंध्र, कर्नाटक और केरल की तरह उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को आरक्षण दे सकती हैं, संविधान में संशोधन की प्रतीक्षा करे बगैर। दरअसल बसपा 18 दिसम्बर को लखनऊ में मुसलमानों का बड़ा सम्मेलन कर रही है। उसकी तैयारी यहां मुसलमानों को आरक्षण न मिल पाने का ठीकरा कांग्रेस पर फोड़ने की है। मुसलमानों के बीच कांग्रेस को लेकर कोई भ्रम पैदा हो, इससे पहले ही पीएमओ आक्रामक तेवर में आ गया।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि मुसलमानों में ऐसे लोग हैं जो आर्थिक दृष्टि से बहुत पिछड़े हुए हैं और इन्हें हर सम्भव मदद की जरूरत है पर क्या चुनाव के समय आरक्षण ही इसका एकमात्र समाधान है? मुस्लिम समुदाय के पिछड़ेपन के कई कारण हैं। एक बहुत बड़ी वजह इनमें शिक्षा की कमी है। पिछले दिनों नई दिल्ली के विश्व उर्दू दिवस पर दिल्ली विश्वविद्यालय में एक सम्मेलन हुआ था। मुस्लिम समुदाय के शिक्षाविदों ने इस सिलसिले में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया और कहा है कि सरकारी स्कूलों में पिछले 17 साल से उर्दू शिक्षक नहीं नियुक्त हुए। इस सम्मेलन में दिल्ली के विभिन्न कोनों से 500 से अधिक लोगों ने शिरकत की। समारोह के संयोजक डॉ. एएस खान ने बताया कि स्कूलों में उर्दू के करीब 750 पद खाली पड़े हैं। इसे भरने की बार-बार मांग की गई है लेकिन इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। जब राजधानी दिल्ली में मुसलमानों की शिक्षा क्षेत्र में इतनी दयनीय स्थिति है तो पूरे देश का क्या हाल होगा। शिक्षा एक ऐसा हथियार है जिससे मुसलमानों में हर तरह की तरक्की होगी। एक और बड़ा कारण है मुसलमानों के पास सही व सक्षम नेतृत्व न होना और जो नेता खुद को इसका प्रतिनिधि अथवा हितैषी बताते हैं उनकी दिलचस्पी सिर्प इस समुदाय के वोटों में है। यह एक सच्चाई है कि मुस्लिम समुदाय पिछड़ेपन से ग्रस्त है। लेकिन इसके आधार पर उसे मुख्य धारा से बाहर करार देना उसे जानबूझ कर एक समुचित दायरे में सीमित करना है। मुस्लिम समाज के हित के लिए यह आवश्यक है कि उन्हें किसी खांचे-दायरे में न बांधा जाए। जो लोग आज आरक्षण की बात कर रहे हैं उनके पास इस सवाल का जवाब शायद ही कोई हो कि उन्हें अभी तक इस समुदाय का पिछड़ापन क्यों नहीं दिखा? क्यों चुनाव आते ही उन्हें मुसलमानों की दुर्दशा की याद आ जाती है? जो लोग आज मुसलमानों की तरक्की की दुहाई दे रहे हैं उन्हें इस पर विचार करना चाहिए कि जिस समुदाय के लोग लम्बे अरसे तक देश के शासक रहे वे पिछड़ेपन से आज ग्रस्त क्यों हैं? एक सर्वे में पता चला है कि देश के करीब एक-तिहाई मुसलमान 550 रुपये प्रतिमाह से भी कम आमदनी पर जीवन काटने को मजबूर हैं। नेशनल काउंसिल फॉर एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएआईआर) के अनुसार वर्ष 2004-05 में हर 10 में से तीन मुसलमान गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं। गरीब मुसलमानों में भी जो शहरों में रहते हैं, उनकी स्थिति गांवों में रहने वाले मुसलमानों से कुछ बेहतर है। गांवों में रहने वालों की आमदनी महज 338 रुपये प्रतिमाह की थी। यह सर्वे ऐसे समय पर आया है, जब सुप्रीम कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश में आंध्र प्रदेश के पिछड़े मुसलमानों को रोजगार व शिक्षा संस्थानों में चार फीसदी आरक्षण देने को जायज ठहराया है। बहरहाल इस बात का वक्त आ चुका है कि सभी धर्मों के उन लोगों को जो पिछड़े, दलित तथा आदिवासी व मुस्लिम समुदाय से आते हैं, को कानूनी रूप से मान्य सभी सुविधाएं बेशक यह आरक्षण ही क्यों न हो पर इसे वोट बैंक से जोड़ने पर हमें सख्त एतराज है।