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Thursday, 25 April 2024

सपा और बसपा क्या मौका तलाश रही हैं?


पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ ठाकुर बिरादरी के नेताओं का गुस्सा दिख रहा है। पार्टी ने इस बिरादरी के उम्मीदवारों को उम्मीद से कम टिकट दिए हैं। इससे ठाकुरों में नाराजगी की खबरें आ रही हैं। अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस ने इस पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है। अखबार लिखता है कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को इस नाराजगी में अपने लिए मौका नजर आ रहा है और वे ऊंची जातियों के उम्मीदवारों से संपर्क बढ़ाने की कोशिश में लग गई है। खबर के मुताबिक रविवार को गाजियाबाद में मायावती ने एक रैली में भाजपा पर क्षत्रियों (ठाकुर, राजपूत) की अनदेखी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने टिकट बंटवारे में हर समुदाय को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है। अखबार लिखता है कि गाजियाबाद के बीएसपी उम्मीदवार नंद किशोर पुंडीर ठाकुर हैं जबकि बागपत के बीएसपी उम्मीदवार प्रवीण बंसल गुर्जर हैं। मायावती ने कहा यूपी की ऊंची जातियों में क्षत्रिय समुदाय के लोगों की आबादी काफी ज्यादा है और ये देखना निराशाजनक है कि इस बिरादरी को समर्थन देने का दावा करने वाली भाजपा ने उत्तर प्रदेश खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उन्हें काफी कम टिकट दी है। उन्होंने कहा गाजियाबाद में हमने क्षत्रिय उम्मीदवार को टिकट दिया है। पहले हमने पंजाबी कैंडिडेट उतारा था लेकिन फिर हमें लगा कि उनकी संख्या लखीमपुर खीरी में ज्यादा है इसलिए वहां हमने पंजाबी सिख उम्मीदवार को टिकट दिया। मायावती ने कहा कि वो क्षत्रिय समुदाय की उन महापंचायतों का समर्थन करती हैं जो उन पार्टियों का समर्थन करने की बात कर रही हैं जो ठाकुर उम्मीदवार उतार रही हैं। मायावती का ये बयान सपा प्रमुख अखिलेश यादव के उस बयान के बाद आया है जिसमें उन्होंने अपनी रैलियों में ठाकुरों की मौजूदगी पर टिप्पणी की थी। उन्होंने नोएडा की एक रैली में कहा था मैं उनके सिर पर सम्मान की पगड़ी देख रहा हूं जो लोग पारंपरिक रूप से दूसरे दलों के लिए वोटिंग करते थे, वे आज यहां हैं। मैं उनकी राजनीतिक चेतना के प्रति आभारी हूं। इस बार वो साइकिल का समर्थन करने जा रहे हैं। बीएसपी ने गौतमबुद्ध नगर में क्षत्रिय समुदाय के राजेन्द्र सोलंकी पर दांव लगाया है। सोलंकी ने कहा है कि इस सीट पर 4.5 लाख वोटर हैं। बीएसपी उनसे जुड़ने की पूरी कोशिश कर रही है। पिछले शुक्रवार को यूपी की जिन आठ सीटों पर वोटिंग हुई उनमें सिर्फ एक ठाकुर उम्मीदवार कुंवर सर्वेश सिंह को मुरादाबाद सीट पर भाजपा ने टिकट दिया था। मतदान के बाद सर्वेश सिंह का निधन हो गया था। 26 अप्रैल को जिन आठ सीटों पर वोटिंग होगी उनमें भाजपा की तरफ से कोई भी ठाकुर उम्मीदवार नहीं है। इन उम्मीदवारों में दो ब्राह्मण, दो वैश्य, एक गुर्जर और एक जाट बिरादरी के उम्मीदवार हैं। पश्चिमी यूपी में ठाकुर बिरादरी के जिस बड़े नेता का इस बार भाजपा की ओर से टिकट काटा गया। उनमें भारतीय सेना के पूर्व अध्यक्ष जनरल वीके सिंह शामिल हैं। भाजपा के एक बड़े नेता ने बताया कि पार्टी के बीच असंतोष का अहसास हो गया है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता ठाकुरों को मनाने में जुट गए हैं ताकि ठाकुरों की वोटों का नुकसान कम से कम हो।

Saturday, 16 June 2012

राष्ट्रपति चुनाव के दंगल का पहला अध्याय

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 16 June 2012
अनिल नरेन्द्र
यूपीए ने राष्ट्रपति पद के लिए अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं निवर्तमान वित्त मंत्री का नाम तो घोषित कर दिया, उनके राष्ट्रपति चुने जाने में संदेह भी कम है किन्तु एक बात तो स्पष्ट है कि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव की अविश्वसनीयता एक बार फिर जगजाहिर हो गई है। पिछले दो दिनों से ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव की जुगलबंदी ने ऐसा पेंच फंसा दिया था कि कांग्रेस चारों खाने चित हो गई थी। कांग्रेस ने कभी उम्मीद नहीं की होगी कि ममता-मुलायम ऐसा पासा चलेंगे कि जिससे पार्टी के सारे समीकरण ही बदल जाएंगे। देखा जाए तो ममता ने एक तीर से कई निशाने लगाने की कोशिश की थी। यह वही मुलायम सिंह यादव हैं जिन्हें कुछ दिन पहले यूपीए-2 का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड पेश करने के लिए सरकार के प्रमुख मंत्रियों के साथ मंच पर खड़ा किया गया और रिपोर्ट को जारी किया गया था। ममता ने कांग्रेस से बदला लेने की कोशिश की थी। कांग्रेस ने यह चेतावनी देने की कोशिश की थी कि ममता आपके पास लोकसभा के 19 सांसद हैं तो हम समाजवादी पार्टी को गले लगाकर उनके 22 सांसदों का समर्थन पा सकते हैं, आप अपनी औकात में रहो। ममता ने एक झटके में कांग्रेस को उसकी औकात दिखाने की कोशिश की। अपने पैनल में सोमनाथ चटर्जी का नाम शामिल करके ममता ने यह भी जता दिया कि वह बंगालियों के खिलाफ नहीं हैं। प्रणब मुखर्जी का समर्थन इसलिए भी करने को ममता को मजबूर किया जा रहा था क्योंकि प्रणब बंगाली हैं और बंगाली होने के नाते ममता उनका समर्थन करने पर मजबूर होंगी पर ममता ने यहां भी कांग्रेस को मात दे दी और सोमनाथ चटर्जी का नाम लेकर इस आलोचना से भी अपने आपको बचा लिया। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की पसंद को खारिज करके ममता-मुलायम ने जो पासा फेंका था वह भले ही मुलायम सिंह की वजह से असफल हो गया किन्तु वह आने वाले दिनों में नए ध्रुवीकरण को जन्म देगा। अंतिम समय में जिस ढंग से दोनों नेताओं ने गुगली फेंकी थी उससे कांग्रेस की न सिर्प परेशानी ही बढ़ी थी बल्कि राष्ट्रपति चुनाव को बहुत पेचीदा बना दिया था। दरअसल राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम लेना एक सोची-समझी रणनीति का परिचायक है। कांग्रेस के अन्दर भी एक ऐसा धड़ा है जो मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद से हटाना चाहता है। मनमोहन सिंह का नाम सुझाना एक तरह से संप्रग सरकार के इन दोनों समर्थक दलों द्वारा प्रधानमंत्री में अविश्वास प्रकट करने के समान है। मनमोहन सिंह कांग्रेस पार्टी के लिए एक बोझ बन चुके हैं, वह एसेट कम लाइबिलिटी ज्यादा हैं। सभी जानते हैं कि मनमोहन को हटाना इस समय कांग्रेस के लिए सम्भव नहीं है पर ममता-मुलायम ने पंगा जरूर फंसा दिया है। दोनों ने सोनिया गांधी को यह भी स्पष्ट संदेश दे दिया था कि इस मामले में किसी भी निर्णय तक पहुंचने में तृणमूल और सपा की भूमिका को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। ममता और कांग्रेस में तल्खी बढ़ी है। एक कांग्रेसी सांसद अधीर चौधरी ने तो ममता की तुलना मीर जाफर से ही कर दी क्योंकि उन्होंने एक बंगाली (प्रणब मुखर्जी) का विरोध किया है। ममता के इस व्यवहार को सोनिया गांधी भूल नहीं सकतीं, इसलिए दोनों महिलाओं में एक ऐसी दरार पड़ गई है जिसे पाटना आसान नहीं होगा। ममता भी बहुत गुस्से में हैं।
यह तो पहले ही आशंका थी कि मुलायम यूपीए सरकार के सामने सीना तानकर खड़े होने की हैसियत में नहीं हैं लेकिन उन्होंने जिस तरह कांग्रेस को झटका दिया उससे एक बात तो साफ है कि उनके भरोसे कोई पार्टी या गठबंधन अपनी रणनीति तय नहीं कर सकता।
मुलायम तो तब झुके जब उन्हें लगा कि आय से अधिक सम्पत्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ तलवार लटक रही है और जुलाई में ही कांग्रेसी वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी द्वारा दायर मुकदमे की सुनवाई है तो उन्होंने ममता को गच्चा दे दिया। लेकिन इससे इतना तो स्पष्ट हो गया है कि ममता की नाराजगी यूपीए से बनी रहेगी जो किसी हद तक जा सकती है।
बहरहाल कांग्रेस को यूपीए घटक दलों एवं बाहर से समर्थन दे रही पार्टियों का प्रणब मुखर्जी के पक्ष में समर्थन तो हासिल हो गया और अब वह चाहेगी कि उसे एनडीए भी समर्थन दे दे ताकि उसके उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिए जाएं किन्तु लगता है कि अभी राष्ट्रपति चुनाव तक बहुत सारी राजनीतिक उठापटक होनी है। क्योंकि ममता ने कोलकाता पहुंच कर ऐलान कर दिया कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। मतलब यह कि राष्ट्रपति चुनाव के दंगल का पहला अध्याय ही खत्म हुआ है आगे महादंगल बाकी है।
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Tuesday, 12 June 2012

डिम्पल ने न केवल इतिहास रचा बल्कि करोड़ों का खर्च बचाया


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 12 June 2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव (35) ने शनिवार को नया राजनीतिक इतिहास रच डाला। कन्नौज की लोकसभा सीट से शनिवार को जिलाधिकारी सेल्वा कुमारी ने डिम्पल को निर्विरोध सांसद घोषित कर दिया। 23 साल बाद लोकसभा में निर्विरोध कोई सांसद चुना गया। कन्नौज को इतिहास के पन्नों में जगह बनाने को बस अधिकृत घोषणा का इंतजार था जो शनिवार को पूरा हो गया। समाजवादी आंदोलन के महानायक डॉ. राममनोहर लोहिया को लोकसभा में भेजने के साथ ही मुलायम सिंह को जिताने व अखिलेश यादव को सांसद कन्नौज ने ही बनाया था। कन्नौज ने यह भी जता दिया है कि मायावती की पूर्व सरकार के कुशासन के खिलाफ जो जनाक्रोश कन्नौज में पहले था, वह आज भी कायम है। डिम्पल यादव प्रदेश की पहली ऐसी महिला हैं जिनके खिलाफ चुनाव लड़ने को कोई तैयार नहीं हुआ। डिम्पल 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में फिरोजाबाद सीट से चुनाव लड़ी थीं। उस चुनाव में बॉलीवुड अभिनेता और कांग्रेस उम्मीदवार राज बब्बर ने शिकस्त दी थी। कांग्रेस, बीजेपी और बीएसपी पहले ही उम्मीदवार न उतारने का फैसला कर चुकी थी। बाकी बचे निर्दलीय उम्मीदवारों संजू कटियार और दशरथ संखवार ने शुक्रवार को पर्चे वापस ले लिए। आजादी के बाद से अब तक 44 सांसद निर्विरोध चुने जा चुके हैं लेकिन 1989 के बाद यह पहला मौका है जब कोई सांसद निर्विरोध चुनकर लोकसभा पहुंचेगा। डिम्पल के विरोध में किसी प्रत्याशी के नहीं होने से न केवल चुनाव के तामझाम से छुटकारा मिला बल्कि सरकार के करीब 30 करोड़ रुपये भी बच गए। कर्मचारियों को ड्यूटी कटाने के लिए न तो अधिकारियों के आगे गिड़गिड़ाना पड़ा और न ही मतदाताओं को धूप में खड़ा रहना पड़ा। पार्टी कार्यकर्ता भी भागदौड़ से बच गए। साथ ही चुनावी तामझाम नहीं होने से अधिक फायदा राजकोष को हुआ है, अगर चुनाव होता तो मतदान की तैयारियों से लेकर मतगणना तक करीब 30 करोड़ रुपये खर्च हो जाते। सर्वाधिक खर्च तो कर्मचारियों और पैरामिलिट्री फोर्स के भत्ते और उनके रहने पर खर्च होता। अधिकारियों के मुताबिक पांचों विधानसभाओं में 10-15 हजार पुलिस, पीएसी और अन्य पैरामिलिट्री मंगाने की तैयारी थी। साथ ही पूरे चुनाव में 12,500 से अधिक कर्मचारियों को लगाना पड़ता। 200 ऐसे बूथ थे जिनकी हालत खराब थी और उसे ठीक करने में लाखों रुपये का खर्च आता। यह सब बच गया। डिम्पल यादव मुलायम सिंह परिवार की पांचवीं ऐसी सदस्य हैं जो इस समय सांसद हैं। इस दृष्टि से मुलायम सिंह यादव परिवार आज देश का सबसे हाई पॉवर परिवार बन गया है। कुछ मायनों में तो यह नेहरू-गांधी परिवार से भी ज्यादा ताकतवर बन गया है। मुलायम सिंह खुद लोकसभा सांसद हैं। बेटा अखिलेश उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। भाई रामगोपाल यादव राज्यसभा सांसद हैं। भाई शिवपाल यादव यूपी सरकार में मंत्री हैं। बहू डिम्पल यादव लोकसभा सांसद हैं। इसके अलावा संगठन, पंचायतों में यादव परिवार के कई सदस्य विभिन्न पदों पर आसीन हैं। कहने को नेता लोग वंशवाद को बढ़ावा न देने की बात करते हैं पर वंशवाद के बढ़ावे का यह एक उदाहरण है।
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Saturday, 19 May 2012

हाथी मूर्ति घोटाला ः नौ लाख की मूर्ति 90 लाख में

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19 May 2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश में तत्कालीन मायावती सरकार के कार्यकाल में हुए घोटालों की परतें खुलने लगी हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मंगलवार को मीडिया को बताया कि स्मारकों व पार्कों के निर्माण और उनमें हाथियों व अन्य मूर्तियों को लगाने में पांच हजार नहीं बल्कि 40 हजार करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है। लखनऊ के अम्बेडकर पार्प में लगी हाथी की मूर्तियों को बनवाने व उन्हें लगवाने में करोड़ों रुपये के सरकारी धन की बंदरबांट की गई है। आगरा के एक मूर्तिकार की शिकायत पर हजरतगंज पुलिस ने इस मामले में धोखाधड़ी, गबन व धमकी देने की रिपोर्ट दर्ज कर ली है। हाथी की मूर्तियों के भुगतान के मामले में आरोपित लखनऊ मार्बल के मालिक आदित्य अग्रवाल के विभूति खंड स्थित कार्यालय पर रविवार को जांच करने पहुंची पुलिस को कई अहम दस्तावेज हाथ लगे। दावा किया जा रहा है कि मायावती सरकार ने नौ लाख की मूर्ति के लिए 90 लाख का भुगतान किया। जांच से पता चलता है कि हाथी मूर्तियों के निर्माण के लिए राजकीय निर्माण निगम ने किसी भी तरीके की निविदाएं नहीं आमंत्रित किए थे।। इसके लिए न तो कोई टेंडर किया गया, न ही किसी भी समाचार पत्र में विज्ञापन निकालकर प्रचार-प्रसार किया गया। चहेतों को ठेका देने के लिए केवल कोटेशन के आधार पर गुपचुप तरीके से करोड़ों का टेंडर पास कर दिया गया। अब पुलिस इन्हीं तथ्यों के आधार पर इस घोटाले में नामजद अफसरों तथा उनके परिजनों की सम्पत्ति का ब्यौरा खंगालने में जुट गई है। डीआईजी लखनऊ के निर्देश पर पुलिस की तीन टीमें राजकीय निर्माण निगम, तहसील आफिस और पासपोर्ट कार्यालय में जांच करने पहुंची। जांच टीम ने जब राजकीय निर्माण निगम के प्रबंध निदेशक (अरविन्द कुमार गुप्ता) से पूछा कि सरकारी काम के लिए बिना कोई टेंडर प्रक्रिया किए ही आखिर कोटेशन के आधार पर ही करोड़ों का काम कैसे दे दिया गया, इसके लिए किसी भी समाचार पत्र में कोई विज्ञापन प्रकाशित न करवाकर गुपचुप तरीके से यह खेल खेला गया है? इस पर प्रबंध निदेशक कोई जवाब नहीं दे सके। पुलिस की दूसरी टीम तहसील कार्यालय इस बात का पता लगाने गई कि घोटाले में नामजद आठ अधिकारियों व कर्मचारियों तथा उनके परिजनों के पास कितनी सम्पत्ति है। गैरतलब है कि आगरा के फतेहपुर सीकरी, गांव दूरा में रहने वाले मदन लाल ने शनिवार को विभूति खंड थाने में रिपोर्ट लिखाई थी कि लखनऊ मार्बल्स की प्रोपराइटर विद्या अग्रवाल के पति आदित्य अग्रवाल ने उन्हें हाथी की पत्थर की एक मूर्ति बनाने के लिए 48 लाख रुपये देने को कहा था। उन्हें एक लाख रुपये एडवांस देने के बाद छह लाख 56 हजार रुपये और दिए गए। मंगलवार को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने यह भी रहस्योद्घाटन किया कि स्मारकों व पार्कों के निर्माण में, मूर्तियों में तो घोटाला हुआ ही साथ ही इन स्मारकों व पार्कों में लगाए गए खजूर के पेड़ों की खरीद में भी गड़बड़ी की बात पता चली है। बड़े पैमाने पर हुई इन पेड़ों की अनाप-शनाप खरीद का सारा ब्यौरा इकट्ठा करवाया जा रहा है। निर्माण लागत में जमीन की कीमत का आकलन और स्मारकों व पार्कों में बने कई भवनों, महंगे पत्थरों की बाउंड्रीवॉल को कई-कई बार तोड़ा जाना शामिल है। सारा हिसाब-किताब सामने जल्द आ जाएगा। बसपा शासनकाल में हुए घोटालों की परतें अब उधड़ने लगी हैं।

Sunday, 1 April 2012

क्षेत्रीय दलों के अंतर्विरोध यूपीए सरकार के लिए बने संजीवनी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1 April 2012
अनिल नरेन्द्र
यह बजट सत्र है और इस लम्बे सत्र में सरकार को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। अगर एक भी मनी बिल (वित्त विधेयक) पर वोटिंग में सरकार हार जाती है तो उसे त्याग पत्र देना पड़ सकता है। ममता बनर्जी, मुलायम सिंह यादव ने मध्यावधि चुनाव होने की सम्भावना प्रकट की है। सवाल महत्वपूर्ण यह है कि मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार की क्या तैयारी है, इस सम्भावना को खत्म करने की? यह ठीक है कि कोई भी सांसद आज की तारीख में चुनाव नहीं चाहता पर हमने पहले देखा है कि सांसदों की कभी चलती है कभी नहीं। पार्टियों के नेतृत्व फैसले करते हैं और न चाहते हुए भी सांसदों को पार्टी अनुशासन का पालन करना होता है। इसलिए यह कहना कि कोई भी सांसद मध्यावधि चुनाव नहीं चाहता महत्वहीन हो जाता है। खबर है कि मध्यावधि चुनावों के शोर के बीच कांग्रेस के सियासी प्रबंधक `बैक अप प्लान' बनाने में जुट गए हैं। ममता बनर्जी के लगातार तीखे होते तेवरों और मुलायम सिंह की मध्यावधि चुनाव जल्दी होने की सम्भावना के बयान के बाद कांग्रेसी प्रबंधकों की नजरें मायावती की बहुजन समाज पार्टी की ओर घूम गई हैं। उधर बसपा भी नहीं चाहती है कि ममता से मार खा रही कांग्रेस राहत के लिए मुलायम के ज्यादा करीब आए। इसलिए बसपा से कांग्रेस को सकारात्मक संदेश मिल रहे हैं। कांग्रेस ने फिर दोहराया है कि संप्रग सरकार के पास जरूरी बहुमत का आंकड़ा है। कांग्रेस के इस दावे के पीछे दरअसल केंद्र की राजनीति में विभिन्न क्षेत्रीय दलों के राजनीतिक हितों का विरोधाभास है जिसका फायदा उठाकर यूपीए सरकार को बचने की बाजीगरी की जा रही है। प. बंगाल में ममता बनर्जी की लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन घट रही है, उसकी वजह से मध्यावधि चुनावों की सबसे ज्यादा छटपटाहट है। क्योंकि ममता को लगता है कि अगर लोकसभा चुनाव अपने तय समय यानि मई 2014 में हुए तो प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा सांसदों की संख्या घट सकती है जबकि निकट भविष्य में चुनाव हो जाएं तो ममता को पिछले चुनावों से ज्यादा सीटें मिलने की उम्मीद है। उधर केंद्र सरकार पर पूरी तरह हमलावर होने के बावजूद वाम मोर्चा मध्यावधि चुनावों के पक्ष में नहीं है। उसे लगता है कि अपने कैडर और संगठन को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए जरूरी है कि चुनाव दो साल बाद हों। तब तक प. बंगाल और केरल की सरकारों की विफलता और एंटी इंकम्बैंसी फैक्टर का लाभ उसे मिल सकता है। समाजवादी पार्टी को भी लगता है कि अखिलेश यादव की लोकप्रियता का लाभ उठाकर सपा 50 से ज्यादा लोकसभा सीटें जीत सकती है जबकि दो साल बाद प्रदेश में हवा कैसी हो यह निश्चित नहीं। जिस तरह वाम मोर्चा चुनाव के लिए तैयार नहीं है। वैसी ही स्थिति बसपा की भी है। मायावती लखनऊ छोड़कर दिल्ली राज्यसभा में आ गई हैं। वह नहीं चाहती कि अभी लोकसभा चुनाव हों और माहौल के कारण सपा उसका लाभ उठा ले। लेकिन कांग्रेस किसी एक या दो समर्थक दल पर यूपीए सरकार को निर्भर नहीं करना चाहती इसलिए मुलायम से मुलायम रिश्ते बनाने के बावजूद रेल मंत्री को बदल कर ममता को संतुष्ट रखने का प्रयास हुआ है। मायावती नहीं चाहती हैं कि यूपीए और मुलायम के बीच घनिष्ठता बढ़े, इसलिए उन्होंने अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से कह दिया है कि यूपीए सरकार की निर्भरता सिर्प सपा पर नहीं रहनी चाहिए। क्षेत्रीय दलों के यही अंतर्विरोध यूपीए सरकार के लिए संजीवनी का काम कर रहे हैं।

Sunday, 25 March 2012

क्या कहती है यूपी की हार पर कांग्रेस की गोपनीय रिपोर्ट?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25 March 2012
अनिल नरेन्द्र
हाल ही में खत्म हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार पार्टी नेतृत्व पचा नहीं पा रहा है। बावजूद कड़ी मशक्कत के पार्टी को करारी हार का मुंह देखना पड़ा। पार्टी को सबसे ज्यादा चिन्ता सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र और युवराज राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र में हार की है। इस हार के कारणों को जानने के लिए पार्टी ने कई रिपोर्टें तैयार कराई हैं। राहुल गांधी के करिश्मे का फायदा न मिल पाने के लिए जहां कांग्रेस नेतृत्व कमजोर संगठन, गलत टिकटों का बंटवारा बता रहा है वहीं हकीकत कुछ और ही उभरकर आ रही है। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी की अगुवाई में सेंट्रल इलेक्शन कमेटी के लिए बनी एक विशेष रिपोर्ट में कहा गया है कि पार्टी के युवराज राहुल गांधी की मंडली भी हार के लिए जिम्मेदार है। इसमें कहा गया है कि एक-दूसरे से बेहद ईर्ष्या करने वाले लोगों के छोटे लेकिन प्रभावशाली गुट और राजनीतिक दमखम की कमी वाले उम्मीदवारों को टिकट दिए जाने से चुनाव के नतीजे पार्टी के लिए निराश करने वाले रहे। रिपोर्ट में कहा गया है कि जातिवाद और वरिष्ठ नेताओं के अहंकार को भी हार का कारण माना गया है जिसकी वजह से जमीनी कार्यकर्ता चुनाव में पूरी ताकत लगाने के बजाय तटस्थ रहा। कांग्रेस की इस हार की `पोस्टमार्ट्म' की इस पहली रिपोर्ट में सूबे के 33 सीटों पर फोकस किया गया है। इन सभी सीटों पर कांग्रेस का प्रदर्शन खराब रहा है, जहां राहुल के करीबियों ने दखल देकर अपनी मर्जी के उम्मीदवारों को टिकट दिलाए थे। इन सभी सीटों पर कांग्रेस के पर्यवेक्षकों द्वारा चुने गए उम्मीदवारों और स्थानीय कार्यकर्ताओं की अनदेखी की गई। फिरोजाबाद में सिरसागंज सीट का उदाहरण सामने है जहां कांग्रेस उम्मीदवार हरिशंकर यादव महज 4224 वोट लेकर पांचवें स्थान पर रहे। पर्यवेक्षकों और स्थानीय कार्यकर्ताओं की पहली पसंद ठाकुर दलबीर सिंह तोमर थीं। राहुल ने विशेष जोर देकर यादव को टिकट दिलवाया। इसी तरह एटा जिले में अलीगंज सीट पर पार्टी के उम्मीदवार रज्जन पाल सिंह 8160 मतों के साथ पांचवें स्थान पर रहे। इस सीट पर पार्टी के आब्जर्वर ने बिजनेसमैन सुभाष वर्मा को टिकट की वकालत की थी। लोध राजपूत से ताल्लुक रखने वाले वर्मा जिला पंचायत के सदस्य भी हैं। वे इस विधानसभा क्षेत्र में लोध समुदाय के एकमात्र उम्मीदवार थे, जो 27,000 लोध वोटरों के अधिकतर वोट हासिल कर सकते थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं की उपेक्षा से उन्होंने पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ ही काम किया और उसे हरवाने में जुट गए। प्रदेश के एक मुस्लिम सांसद ने कहा कि जो रिपोर्टें अब मिल रही हैं हम लोगों को तो पहले से ही पता था। इस बारे में राहुल गांधी को भी सचेत किया गया था लेकिन उन्होंने इस ओर ध्यान नहीं दिया। मुस्लिम नेता के रूप में केवल सलमान खुर्शीद को आगे बढ़ाया गया जबकि मुस्लिम उन्हें अपना नेता मानते ही नहीं हैं। इसी तरह राहुल गांधी ने समाजवादी पार्टी से आए रशीद मसूद और बेनी प्रसाद वर्मा को अहमियत दी जबकि यह लोग दूसरे दलों से आए थे और इसी वजह से कांग्रेस कार्यकर्ता इस चुनाव में दूर रहा। प्रदेश के कई सांसद और नेता यह चाहते हैं कि हार के जिम्मेदार लोगों को सजा दी जाए जिन लोगों को इस चुनाव में अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यकों वाली सीटों को जीतने के लिए लगाया गया था, उन पर गाज गिरनी चाहिए।
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Friday, 23 March 2012

सपा यूपीए सरकार में शामिल होगी?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23 March 2012
अनिल नरेन्द्र
रविवार को एक पत्रकार ने लखनऊ में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से प्रश्न किया कि क्या समाजवादी पार्टी यूपीए सरकार में शामिल होगी? जवाब में अखिलेश ने कहा कि हम यूपीए सरकार में शामिल होंगे या नहीं, इस पर अंतिम फैसला पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव (नेता जी) ही करेंगे। सपा के केंद्र सरकार में सहयोगी बनने संबंधी दिग्विजय सिंह के बयान पर अखिलेश ने कहा कि नेता जी दिल्ली जा रहे हैं। केंद्र में सपा की भूमिका का फैसला वही करेंगे। मुलायम सिंह यादव (नेता जी) से जब दिल्ली में यही प्रश्न पूछा गया तो उन्होंने कहा कि न तो हमसे किसी ने ऐसा करने का अनुरोध किया है और न ही हमने किसी से अनुरोध किया है। नेता जी की बातों से ऐसा लगा कि वह मनमोहन सिंह सरकार में शामिल होने के लिए ज्यादा उत्साहित नहीं हैं। केंद्र सरकार बेशक ममता से आजिज मुलायम सिंह की तरफ भले ही बड़ी हसरत से देख रही हो, लेकिन सपा की इसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं लगती। यहां तक कि सपा न तो केंद्र सरकार में शामिल होगी और न ही उसे उपसभापति के पद की दरकार है। हालांकि यह भी साफ है कि सपा मनमोहन सिंह सरकार को गिराने का कोई प्रयास नहीं करेगी और समर्थन जारी रखेगी। संप्रग सरकार को लेकर सपा का नजरिया बिल्कुल साफ है। सूत्रों के मुताबिक उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारी-भरकम जीत के बाद सपा अब आगामी लोकसभा चुनाव तक उस पर कोई आंच नहीं आने देना चाहती। खासतौर से उस स्थिति के मद्देनजर जब बीते वर्षों में भ्रष्टाचार एवं घोटालों जैसे कई मोर्चों पर केंद्र सरकार का दामन दागदार रहा है। इतना ही नहीं, पार्टी उत्तर प्रदेश में किसानों की बेहतरी के कई वादों पर भी जीती है जबकि केंद्रीय बजट में आने वाले समय में डीजल के मूल्य वृद्धि के संकेत हैं। पार्टी का मानना है कि ऐसे में केंद्र सरकार में शामिल होकर उन्हें गुनाहों का भागीदार बनना इसके लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। लिहाजा उसे दूर रहने में ही भलाई है। सपा के उच्च पदस्थ सूत्रों ने तो दावा किया कि कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र सरकार में शामिल होने का सवाल ही नहीं। इसके पीछे एक तर्प यह भी है कि बीते वर्षों में सपा ने भले ही कई मोर्चों पर आगे बढ़कर केंद्र सरकार का साथ दिया हो, लेकिन उत्तर प्रदेश के बीते विधानसभा के चुनाव तक कांग्रेस ने भी कभी उसके साथ दोस्ताना रिश्ते का परिचय नहीं दिया। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बसपा एवं मायावती को छोड़कर सपा पर ही सबसे ज्यादा हमलावर रही थी। एक अन्य सपा नेता ने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार में शामिल होने के लिए कांग्रेस की तरफ से कोई ठोस प्रस्ताव वैसे भी अभी तक नहीं आया है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने सोमवार को मुलायम सिंह की जमकर तारीफ की थी। सपा की प्राथमिकता हमें तो साफ लगती है। सपा की प्राथमिकता उत्तर प्रदेश में एक अच्छी सरकार चलाना और उत्तर प्रदेश में पार्टी को और मजबूत करना है, न कि किसी दूसरी पार्टी की गलतियों में शरीक होना।
रविवार को एक पत्रकार ने लखनऊ में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से प्रश्न किया कि क्या समाजवादी पार्टी यूपीए सरकार में शामिल होगी? जवाब में अखिलेश ने कहा कि हम यूपीए सरकार में शामिल होंगे या नहीं, इस पर अंतिम फैसला पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव (नेता जी) ही करेंगे। सपा के केंद्र सरकार में सहयोगी बनने संबंधी दिग्विजय सिंह के बयान पर अखिलेश ने कहा कि नेता जी दिल्ली जा रहे हैं। केंद्र में सपा की भूमिका का फैसला वही करेंगे। मुलायम सिंह यादव (नेता जी) से जब दिल्ली में यही प्रश्न पूछा गया तो उन्होंने कहा कि न तो हमसे किसी ने ऐसा करने का अनुरोध किया है और न ही हमने किसी से अनुरोध किया है। नेता जी की बातों से ऐसा लगा कि वह मनमोहन सिंह सरकार में शामिल होने के लिए ज्यादा उत्साहित नहीं हैं। केंद्र सरकार बेशक ममता से आजिज मुलायम सिंह की तरफ भले ही बड़ी हसरत से देख रही हो, लेकिन सपा की इसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं लगती। यहां तक कि सपा न तो केंद्र सरकार में शामिल होगी और न ही उसे उपसभापति के पद की दरकार है। हालांकि यह भी साफ है कि सपा मनमोहन सिंह सरकार को गिराने का कोई प्रयास नहीं करेगी और समर्थन जारी रखेगी। संप्रग सरकार को लेकर सपा का नजरिया बिल्कुल साफ है। सूत्रों के मुताबिक उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारी-भरकम जीत के बाद सपा अब आगामी लोकसभा चुनाव तक उस पर कोई आंच नहीं आने देना चाहती। खासतौर से उस स्थिति के मद्देनजर जब बीते वर्षों में भ्रष्टाचार एवं घोटालों जैसे कई मोर्चों पर केंद्र सरकार का दामन दागदार रहा है। इतना ही नहीं, पार्टी उत्तर प्रदेश में किसानों की बेहतरी के कई वादों पर भी जीती है जबकि केंद्रीय बजट में आने वाले समय में डीजल के मूल्य वृद्धि के संकेत हैं। पार्टी का मानना है कि ऐसे में केंद्र सरकार में शामिल होकर उन्हें गुनाहों का भागीदार बनना इसके लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। लिहाजा उसे दूर रहने में ही भलाई है। सपा के उच्च पदस्थ सूत्रों ने तो दावा किया कि कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र सरकार में शामिल होने का सवाल ही नहीं। इसके पीछे एक तर्प यह भी है कि बीते वर्षों में सपा ने भले ही कई मोर्चों पर आगे बढ़कर केंद्र सरकार का साथ दिया हो, लेकिन उत्तर प्रदेश के बीते विधानसभा के चुनाव तक कांग्रेस ने भी कभी उसके साथ दोस्ताना रिश्ते का परिचय नहीं दिया। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बसपा एवं मायावती को छोड़कर सपा पर ही सबसे ज्यादा हमलावर रही थी। एक अन्य सपा नेता ने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार में शामिल होने के लिए कांग्रेस की तरफ से कोई ठोस प्रस्ताव वैसे भी अभी तक नहीं आया है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने सोमवार को मुलायम सिंह की जमकर तारीफ की थी। सपा की प्राथमिकता हमें तो साफ लगती है। सपा की प्राथमिकता उत्तर प्रदेश में एक अच्छी सरकार चलाना और उत्तर प्रदेश में पार्टी को और मजबूत करना है, न कि किसी दूसरी पार्टी की गलतियों में शरीक होना।
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Thursday, 15 March 2012

मायावती अब आगे क्या करेंगी?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15 March 2012
अनिल नरेन्द्र
बहुजन समाज पार्टी प्रमुख व उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के भविष्य को लेकर सभी को चिन्ता थी कि अब आगे वह क्या करेंगी? चुनाव में करारी हार के बाद बहन जी के राजनीतिक भविष्य में अनिश्चितता जरूर पैदा हो गई थी। फिलहाल लगता है कि बहन जी केंद्र की राजनीति करेंगी। उन्होंने मंगलवार को राज्यसभा का नामांकन दाखिल कर दिया है। इससे पहले सोमवार को लखनऊ में एक ऐसा सीन हुआ, जिसकी कल्पना करना भी कुछ समय पहले तक असम्भव था। मायावती के सामने जब वह मुख्यमंत्री थीं, मजाल है कि बराबर की कुर्सी में कोई बैठ सकता हो चाहे वह सांसद हो, पार्टी का वरिष्ठ पदाधिकारी हो या विधायक, सभी को जमीन पर बैठना पड़ता था, मायावती अकेली कुर्सी पर बैठती थीं। हार के बाद सोमवार को बसपा विधायकों की बैठक हुई तो राज्यसभा में पार्टी के उम्मीदवारों का चयन होना था। राज्यसभा की 10 सीटों के लिए सोमवार से नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गई है। बसपा के विधायकों की संख्या के हिसाब से दो सीटें बसपा जीत सकती है। एस सीट पर तो खुद बहन जी खड़ी हो रही हैं दूसरी पर वह चाहती थीं कि मायावती सरकार में कैबिनेट सचिव शशांक शेखर नामांकन भरें पर उनके नाम पर बसपा विधायकों ने विरोध कर दिया। चूंकि मायावती सरकार में वह मंत्रियों व विधायकों पर भारी थे। मुख्यमंत्री से मुलाकात से लेकर उनके सिफारिशों पर अमल तभी होता था जब कैबिनेट सचिव उस पर अपनी हामी भरते थे। अपनी उपेक्षा से बसपा विधायकों में नाराजगी थी। सोमवार को जब राज्यसभा उम्मीदवारों पर सहमति बनाने के लिए बसपा मुख्यालय में पार्टी विधायकों की बैठक बुलाई गई तो उन्होंने शशांक शेखर पर विरोध कर दिया। विधायकों ने कहा कि जिस अधिकारी ने गद्दी पर रहते उन लोगों की नहीं सुनी, उसे कैसे राज्यसभा के लिए वोट करा सकते हैं। विधायकों द्वारा बताए गए कार्यों की अनदेखी के चलते ही वह जनता की समस्याओं को दूर नहीं कर सके। नाराज जनता ने पार्टी प्रत्याशियों को विधानसभा चुनाव में हरा दिया। सूत्रों का कहना है कि बसपा प्रमुख मायावती ने नेताओं की इस नाराजगी का संज्ञान लेते हुए दावा किया कि पार्टी किसी धन्ना सेठ और नौकरशाह को राज्यसभा भेजने की पहल नहीं करेगी बल्कि मुस्लिम समाज या ओबीसी के किसी व्यक्ति को राज्यसभा भेजेगी। इस तरह मुनकाद अली का फैसला हुआ। हार से पहले क्या कोई कल्पना कर सकता था कि बहन जी की बात का खुला विद्रोह सम्भव है। मायावती ने केंद्र की राजनीति का फैसला इसलिए भी किया है कि उन्हें लगता है कि लोकसभा के मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं। मायावती 2003 में भी अपनी सरकार के पतन के बाद राज्यसभा की सदस्य बनी थीं। चूंकि राज्य में अब सपा की सरकार का गठन 15 मार्च को हो जाएगा और मायावती ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी निकाय चुनाव में भाग नहीं लेगी, ऐसे में बसपा के लिए राज्य में राजनीतिक गतिविधियों की अब ज्यादा गुंजाइश नहीं बची है। सपा के राज्यसभा सदस्यों की संख्या अभी पांच है जो बढ़कर 10 हो जाएगी। बसपा आगामी अप्रैल में विधान परिषद में होने वाले चुनावों में भी अपने सदस्य खोएगी। विधान परिषद की 100 सीटों की कुल संख्या में बसपा के 65 सदस्य हैं। देखें दिल्ली में मायावती क्या गुल खिलाती हैं।
बहुजन समाज पार्टी प्रमुख व उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के भविष्य को लेकर सभी को चिन्ता थी कि अब आगे वह क्या करेंगी? चुनाव में करारी हार के बाद बहन जी के राजनीतिक भविष्य में अनिश्चितता जरूर पैदा हो गई थी। फिलहाल लगता है कि बहन जी केंद्र की राजनीति करेंगी। उन्होंने मंगलवार को राज्यसभा का नामांकन दाखिल कर दिया है। इससे पहले सोमवार को लखनऊ में एक ऐसा सीन हुआ, जिसकी कल्पना करना भी कुछ समय पहले तक असम्भव था। मायावती के सामने जब वह मुख्यमंत्री थीं, मजाल है कि बराबर की कुर्सी में कोई बैठ सकता हो चाहे वह सांसद हो, पार्टी का वरिष्ठ पदाधिकारी हो या विधायक, सभी को जमीन पर बैठना पड़ता था, मायावती अकेली कुर्सी पर बैठती थीं। हार के बाद सोमवार को बसपा विधायकों की बैठक हुई तो राज्यसभा में पार्टी के उम्मीदवारों का चयन होना था। राज्यसभा की 10 सीटों के लिए सोमवार से नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गई है। बसपा के विधायकों की संख्या के हिसाब से दो सीटें बसपा जीत सकती है। एस सीट पर तो खुद बहन जी खड़ी हो रही हैं दूसरी पर वह चाहती थीं कि मायावती सरकार में कैबिनेट सचिव शशांक शेखर नामांकन भरें पर उनके नाम पर बसपा विधायकों ने विरोध कर दिया। चूंकि मायावती सरकार में वह मंत्रियों व विधायकों पर भारी थे। मुख्यमंत्री से मुलाकात से लेकर उनके सिफारिशों पर अमल तभी होता था जब कैबिनेट सचिव उस पर अपनी हामी भरते थे। अपनी उपेक्षा से बसपा विधायकों में नाराजगी थी। सोमवार को जब राज्यसभा उम्मीदवारों पर सहमति बनाने के लिए बसपा मुख्यालय में पार्टी विधायकों की बैठक बुलाई गई तो उन्होंने शशांक शेखर पर विरोध कर दिया। विधायकों ने कहा कि जिस अधिकारी ने गद्दी पर रहते उन लोगों की नहीं सुनी, उसे कैसे राज्यसभा के लिए वोट करा सकते हैं। विधायकों द्वारा बताए गए कार्यों की अनदेखी के चलते ही वह जनता की समस्याओं को दूर नहीं कर सके। नाराज जनता ने पार्टी प्रत्याशियों को विधानसभा चुनाव में हरा दिया। सूत्रों का कहना है कि बसपा प्रमुख मायावती ने नेताओं की इस नाराजगी का संज्ञान लेते हुए दावा किया कि पार्टी किसी धन्ना सेठ और नौकरशाह को राज्यसभा भेजने की पहल नहीं करेगी बल्कि मुस्लिम समाज या ओबीसी के किसी व्यक्ति को राज्यसभा भेजेगी। इस तरह मुनकाद अली का फैसला हुआ। हार से पहले क्या कोई कल्पना कर सकता था कि बहन जी की बात का खुला विद्रोह सम्भव है। मायावती ने केंद्र की राजनीति का फैसला इसलिए भी किया है कि उन्हें लगता है कि लोकसभा के मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं। मायावती 2003 में भी अपनी सरकार के पतन के बाद राज्यसभा की सदस्य बनी थीं। चूंकि राज्य में अब सपा की सरकार का गठन 15 मार्च को हो जाएगा और मायावती ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी निकाय चुनाव में भाग नहीं लेगी, ऐसे में बसपा के लिए राज्य में राजनीतिक गतिविधियों की अब ज्यादा गुंजाइश नहीं बची है। सपा के राज्यसभा सदस्यों की संख्या अभी पांच है जो बढ़कर 10 हो जाएगी। बसपा आगामी अप्रैल में विधान परिषद में होने वाले चुनावों में भी अपने सदस्य खोएगी। विधान परिषद की 100 सीटों की कुल संख्या में बसपा के 65 सदस्य हैं। देखें दिल्ली में मायावती क्या गुल खिलाती हैं।
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Sunday, 11 March 2012

यूपी के मुस्लिम मतदाताओं ने सोच समझकर होशियारी से वोट दिया

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 11 March 2012
अनिल नरेन्द्र
यूपी के मुसलमानों ने विधानसभा चुनाव में कुछ हद तक टेक्निकल वोटिंग की, यह कहें तो शायद गलत नहीं होगा। मैं समझता हूं कि पहली बार उन्होंने ढंग से मुस्लिम हितों को ऊपर रखकर मैच्योर वोटिंग की है। उन्होंने देखा कि कौन-सी पार्टी से कौन-सा मुस्लिम उम्मीदवार जीत सकता है, उसे ही वोट दो। नतीजों ने मुस्लिम मठाधीशों को धूल चटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उत्तरी राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल से लेकर शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी की सिफारिश के उम्मीदवारों को नकार दिया गया। उलेमा काउंसिल तो प्रदेश में अपना खाता तक नहीं खोल पाई। अपने गढ़ आजमगढ़ की निजामाबाद सीट पर खड़े काउंसिल के महासचिव ताहिर मदनी चौथे स्थान पर रहे। बेहट सीट से इमाम बुखारी के दामाद और सपा उम्मीदवार अमर अली खान चुनाव हार गए। वहीं लखीमपुर खीरी से सपा उम्मीदवार इमरान हार गए। पेशे से बिल्डर इमरान को टीले वाली मस्जिद के इमाम मौलाना शाह फजल-ए-रहमान वाहवी नदवी ने टिकट दिलवाया था। मुस्लिम मतदाताओं का यह फैसला पार्टी नहीं बल्कि उम्मीदवारों के खिलाफ था। समाजवादी पार्टी अधिकांश मुस्लिम बहुल सीटों पर कामयाब रही। इसका नमूना है कि आजमगढ़ की 10 सीटों में से 9 पर सपा उम्मीदवार विजयी रहे। गौरतलब है कि यूपी की चुनावी बिसात में करीब 150 सीटें ऐसी थीं जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में थे। इसके लिए सियासी पार्टियों के बीच रस्साकसी भी खूब चली। चुनावी लाभ के लिए मुसलमानों को आरक्षण देने की होड़ से लेकर साहित्य मेले में सलमान रुशदी की आमद तक मुद्दे उठाए गए। उत्तर प्रदेश की 403 सदस्यों वाली विधानसभा में इस बार 63 मुस्लिम उम्मीदवार चुनकर आए हैं। 2007 में यह आंकड़ा 52 था। सपा के कुल 224 उम्मीदवार जीते हैं, जिनमें मुस्लिम प्रत्याशियों की संख्या 40 है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने 83 तो सपा ने 81 मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे। दोनों पार्टियों ने सभी 403 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। कांग्रेस ने अपने 359 प्रत्याशियों में 58 मुस्लिम को टिकट दिए थे। मुस्लिम बहुल इलाके में भारी मतदान हुआ। इनमें मुस्लिम महिलाओं ने अच्छी भागीदारी निभाई। सहारनपुर और आजमगढ़ के मुस्लिम बहुल क्षेत्र में तो 70 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ। बसपा के 14 मुस्लिम उम्मीदवार जीतकर आए जबकि पिछली बार 29 प्रत्याशी जीते थे। पिछले चुनाव में सपा के मुस्लिम विधायकों की संख्या 17 थी। पीस पार्टी के चार प्रत्याशी जीते जिनमें तीन मुस्लिम हैं। पार्टी के अध्यक्ष डाक्टर अयूब खलीलाबाद सीट से जीते हैं। कौमी एकता दल की ओर से माफिया से राजनीतिज्ञ बने मुख्तार अंसारी मऊ सीट से जीते हैं। सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान रामपुर से तथा वकार अहमद शाह बहराइच से जीते हैं। कांग्रेस के काजी अली खाँ रामपुर की स्बार सीट से जीते हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो यूपी के मुस्लिम मतदाताओं ने सोच-समझकर हिसाब से मतदान किया है।
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Thursday, 8 March 2012

माया के खिलाफ नैगेटिव वोट और अखिलेश की आंधी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 8 March 2012
अनिल नरेन्द्र
पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के डिब्बे खुल चुके हैं। नया इतिहास रचा गया है। कारणों के लम्बे-चौड़े विश्लेषण होने लगे हैं। मोटे तौर पर जो प्रमुख कारण मुझे लगे वह कुछ इस प्रकार हैं। पहले बात हम करते हैं उत्तर प्रदेश की। यह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थे कि साइकिल ने हाथी को रौंद दिया। समाजवादी पार्टी की जीत का सबसे बड़ा कारण था मायावती सरकार के खिलाफ नैगेटिव वोट। यूपी की जनता ने तय कर लिया था कि मायावती की बसपा सरकार को हटाना था और सामने विकल्प के रूप में अखिलेश यादव नजर आए। अखिलेश यादव प्रदेश की जनता की नब्ज को पहचानने में सफल रहे। जीतोड़ मेहनत की और जमीन पर चलने वाले अखिलेश ने एक नई उम्मीद पैदा की। मेहनत तो राहुल गांधी ने भी कम नहीं की। उन्होंने भी दो महीने से यूपी की खाक छानी, 200 से ज्यादा रैलियां की पर जनता ऐसा नेता चाहती थी जिसके पास वह जाकर अपनी नाली, बिजली, पानी की समस्या कह सके। वह हर बार राहुल से आकर दिल्ली में तो कह नहीं सकते थे। राहुल की कड़ी मेहनत पर यूपी की कांग्रेसी इकाई ने सारा पानी फेर दिया। चुनावी माहौल तो राहुल ने बना दिया पर फसल काटने के लिए संगठन तैयार नहीं था। न कोई बूथ कमेटी थी न ही जिला कमेटी। जिन मुसलमानों को खुश करने के लिए कांग्रेस ने हर हथकंडा अपनाया, उन्होंने मुलायम की झोली में जाना बेहतर समझा। मुस्लिम वोट सपा, कांग्रेस और बसपा में बंटा, एकमुश्त किसी को नहीं गया पर बहुमत सपा के साथ गया। मायावती अपनी हार के लिए खुद जिम्मेदार हैं। उनका तानाशाह तरीका जनता को नहीं भाया। महारानियों की तरह उनके व्यवहार से खुद उनकी पार्टी वाले दुःखी थे। मुझे तो नहीं लगता कि दलित वोट भी पूरी तरह से बसपा को मिला। आखिर वह वोट देते भी क्यों? जिन दलितों के उद्धार के लिए मायावती शासन में आईं, उसी दलित को कॉलेज में एक क्लर्प की नौकरी पाने के लिए चार लाख रिश्वत देनी पड़ी थी। लोग भूखों मर रह थे और बहनजी हाथी बनवाने में लगी हुई थीं। पिछले पांच सालों में न तो किसी कॉलेज में चुनाव हुआ और न ही स्थानीय निकायों का चुनाव। सारी चुनावी प्रक्रिया ठप कर दी बहन जी ने। युवाओं में आक्रोश था। किसानों की जमीनें बिल्डरों को औने-पौने भाव में लुटा दीं और पैसा बनाने की फैक्टरी बन गई बसपा। फिर बहुजन समाज पार्टी में मायावती का विकल्प क्या था? उन्होंने कभी दूसरी पंक्ति की लीडरशिप खड़ा करने का प्रयास किया। कोई युवा चेहरा था उनके पास पेश करने को? विकल्प के रूप में युवा चेहरा नजर आया अखिलेश यादव का। नेता जी (मुलायम) शायद अपने बलबूते पर यह चुनाव न जीत पाते। आज भी उनके गुंडे राज को कोई नहीं भूला। 2007 में उनका इसीलिए सफाया किया गया था, क्योंकि हर थाने में, हर गांव में, तहसील में मुलायम खड़ा मिला। दरअसल सपा के वर्पर सत्ता में आने से सभी मुलायम बन जाते हैं और वही गुंडा राज आ जाता है। इसी से दुःखी जनता ने मायावती को चांस दिया था। अखिलेश यादव के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती होगी अपने कार्यकर्ताओं पर लगाम रखना। आते ही दो स्थानों पर तो गोली चल चुकी है, मारपीट हो चुकी है। यूपी की जनता ने यह साबित कर दिया है कि रणनीतियों से ज्यादा वह नीतियों को प्राथमिकता देती है। भाजपा को यही रणनीति चाट गई। इस बार का सारा यूपी का चुनाव राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने लड़ा। संजय जोशी, नितिन गडकरी ने उम्मीदवारों से लेकर रैलियों तक सब कुछ संघ के इशारों पर हुआ। संघ ने कहा कि आडवाणी सहित किसी बड़े नेता को दिल्ली, गुजरात से नहीं बुलाना, नहीं बुलाया गया। उमा भारती को जबरदस्ती लाकर यूपी के नेताओं में घमासान करा दिया। भाजपा इस चुनाव में विभाजित पार्टी की तरह उतरी और नतीजा सामने है। इस चुनाव में भाजपा की इतनी हार नहीं हुई है जितनी संघ की हुई है। भाजपा तो पहले से भी ज्यादा गिर गई। इसी रणनीति, गलत नीतियों की वजह से उत्तराखंड में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा। उत्तराखंड की विडम्बना देखिए कि वह रमेश पोखरियाल निशंक चुनाव जीत गए जिन्हें भ्रष्ट होने के आरोप में हटाया गया और वह भुवनचन्द खंडूरी चुनाव हार गए जिनकी ईमानदार छवि पर भाजपा ने दाव लगा दिया। इससे तो शायद बेहतर होता कि निशंक को ही बनाए रखते और चुनाव से तीन महीने पहले उठाकर पार्टी को नुकसान पहुंचा दिया। इस चुनाव में पर्सनेलिटी का बड़ा योगदान रहा है। पंजाब में प्रकाश सिंह बादल और कैप्टन अमरिन्दर सिंह आमने-सामने थे, जहां बादल अत्यंत मिलनसार, जनता के दुःख-दर्द में साथ देने वाले हैं वहीं कैप्टन का महाराजा स्टाइल बदला नहीं। उन्होंने वही शाही अन्दाज में चुनाव लड़ा। जब जनता को बादल और अमरिन्दर में से एक को चुनने का समय आया, उन्होंने बादल को प्राथमिकता दी। पंजाब में अकालियों के खिलाफ माहौल था पर कांग्रेस उसका फायदा नहीं उठा सकी। 44 साल में यह पहली बार है कि सत्तारूढ़ पार्टी-गठबंधन फिर से चुनाव जीता है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव नतीजे खासकर बहुमत का दावा करने वाली कांग्रेस के लिए बेहद निराशाजनक और चिन्ताजनक है। पार्टी को कहां तो दिग्विजय सिंह जैसे बड़बोले नेता 125 सीटों का दावा करते नहीं थकते थे, कांग्रेस को सिर्प 28 सीटें ही मिल सकीं। अगर लोकसभा चुनाव में 22 सीटें जीतने वाली इस पार्टी का आंकलन था कि इस बिनाह पर उसे 100 सीटें तो मिलनी चाहिए। सहयोगी राष्ट्रीय लोकदल जिसने पश्चिमी उत्तर प्रदश में आंधी का दावा किया कुल नौ सीटें ही जीत सकी जो पिछले जीत से भी कम हैं। चुनाव में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन की हद तो तब हो गई जब उसके गढ़ कहे जाने वाले अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली में कांग्रेस सभी पांचों सीट हार गई जबकि इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक देने वाले महासचिव राहुल गांधी के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र वाले जिले अमेठी में कांग्रेस पांच में से तीन सीटें गंवा बैठी। अमिता सिंह जैसी दिग्गज अमेठी में हार गईं। तमाम ड्रॉमे करने के बावजूद सलमान खुर्शीद अपनी पत्नी लुइस खुर्शीद की जमानत नहीं बचा सके। चुनाव में अपने बड़बोलेपन के लिए सुर्खियों में बने रहे केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के बेटे राकेश वर्मा दरियाबाद चुनावी होड़ में तीसरे पायदान पर रहे। वैसे अगर दिग्गजों की हार की बात करें तो भाजपा का हाल भी कांग्रेस जैसा रहा। सिवाय उमा भारती के चुनावी मैदान में उतरे सभी क्षत्रप चुनाव हार गए। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सूर्यप्रताप शाही, पूर्व अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र, विधानमंडल के नेता ओम प्रकाश सिंह तथा पूर्व प्रदेशाध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी को पराजय का मुंह देखना पड़ा।
Akhilesh Yadav, Anil Narendra, Bahujan Samaj Party, Congress, Daily Pratap, Elections, Mayawati, Mulayam Singh Yadav, Rahul Gandhi, Samajwadi Party, Uttar Pradesh, Vir Arjun

Tuesday, 6 March 2012

कुशवाहा की गिरफ्तारी क्या कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा है?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 6 March 2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश चुनाव के आखिरी चरण के मतदान के अंतिम बटन दबाने के साथ ही सीबीआई ने एनएचआरएम घोटाले में आरोपी पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा को गिरफ्तार करने पर गिरफ्तारी की टाइमिंग को लेकर जरूर हैरानी हुई। सीबीआई और कांग्रेस का यह तर्प शायद ही किसी समझदार के गले उतरे कि यह गिरफ्तारी महज जांच प्रक्रिया का हिस्सा है। कुशवाहा के साथ ही बसपा के विधान परिषद सदस्य राम प्रसाद जायसवाल भी इसी घोटाले में गिरफ्तार कर लिए गए। दोनों को पूछताछ के लिए सीबीआई ने दिल्ली मुख्यालय बुलाया और करीब 4 घंटे तक चली गहन पूछताछ के बाद जब अधिकारियों ने उन्हें गिरफ्तार होने की सूचना दी तो सूत्र बताते हैं कि कुशवाहा के चेहरे पर मायूसी छा गई। कुशवाहा की गिरफ्तारी लगता है कि कांग्रेस के सत्ता संग्राम का नया हिस्सा है। सीधे-सीधे कहें तो मायावती के लिए यह एक बड़ा संकेत है, उन्हें खुश करने की कोशिश भी और नतीजे का गणित गड़बड़ा जाने पर डराने का हथियार भी। गिरफ्तारी के निहितार्थ इसी तरह पढ़े जाने चाहिए और इस तरह भी कि पूरे चुनाव अभियान में कांग्रेस ने जिस तरह भांति-भांति के दांव चले, उसके नेता आरक्षण का झुनझुना दिखाकर मुसलमानों को भरमाते रहे, चुनाव आयोग तक को गरियाते रहे, दो-तिहाई बहुमत के दावों के बीच राष्ट्रपति शासन का भय दिखाते रहे, कुशवाहा की गिरफ्तारी उसी कड़ी का हिस्सा और वैसा ही दांव है। बसपा के लिए साथ आने का परोक्ष न्यौता भी, लेकिन इस चेतावनी के साथ कि उनका मोहरा उन्हीं के खिलाफ चल सकता है। देश की सियासत के सबसे महत्वपूर्ण प्रदेश का ताज हथियाने के लिए कांग्रेस की अधीरता किसी से छिपी नहीं है। वह हर तरह का विकल्प खुला रखना चाहती है, दो नावों में पांव रखकर चलने से भी उसे कोई परहेज नहीं है। सपा को अंगूठा दिखाकर कांग्रेस का दामन थामने वाले दल-बदलू समाजवादियों का ताकतवर तबका किसी कीमत पर मुलायम सिंह यादव के साथ दोस्ती नहीं होने देना चाहता। उन्हें मायावती को साथ लेने में कोई परेशानी नहीं दिखती। कांग्रेस की ओर से सीएम पद के स्वयंभू दावेदार बेनी प्रसाद वर्मा इसकी सार्वजनिक पहल कर चुके हैं। अपने पुराने साथी मुलायम को आड़े हाथों लेने का वह कोई मौका नहीं छोड़ते लेकिन हाल में चौंकाया मायावती की तारीफ करके। साथ ही ऑफ द रिकॉर्ड यह भी कहा कि चुनाव बाद सोनिया मायावती को भी चाय पर बुला सकती हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में सबसे ज्यादा बेसब्री से यूपी के नतीजों का इंतजार है। जहां पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा को लेकर कांग्रेस मुख्यालय आ रही सूचनाओं में बहुत ज्यादा फर्प नहीं दिख रहा, वहीं उत्तर प्रदेश के नतीजों को लेकर कांग्रेस के भीतर भारी मतभेद हैं। सोनिया के सिपहसालार जो उन्हें बता रहे हैं और राहुल गांधी के सिपाही जो दावा कर रहे हैं, दोनों आंकड़ों में खासा फर्प है। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि राहुल गांधी ने यूपी चुनाव में बहुत मेहनत की है। 200 से अधिक रैलियां-रोड शो करना आसान नहीं। यही वजह है कि राहुल कैम्प का मानना है कि कांग्रेस की सीटें बढ़ेंगी, यह बढ़त 50 से लेकर अधिकतम 70 तक हो सकती है। पार्टी के ज्यादातर वरिष्ठ नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों की भी यही राय है। कुछ विक्षुब्ध कांग्रेसी और सांसद तो पार्टी को महज 30 से 35 सीटें ही दे रहे हैं। राहुल कैम्प में ऐसे नेता भी हैं जो कह रहे हैं कि कांग्रेस अपनी सीटें कम से कम 125 तक पहुंचा सकती है। दिग्विजय सिंह तो कांग्रेस की कम से कम 125 सीटें आने की शर्त लगाने को भी तैयार हैं। वह कहते हैं कि इस बार चुनावों में जो 15 से 20 फीसदी अतिरिक्त मतदान हुआ है, उसका कम से कम 80 फीसदी से ज्यादा कांग्रेस को मिला है और यह मतदाता राहुल गांधी के आक्रामक चुनाव अभियान, लोगों के बीच उनकी विश्वसनीयता और विकास के एजेंडे पर हुआ है। दिग्विजय यह भी कहते हैं कि इस बार यूपी का मतदाता खामोश रहा है, क्योंकि उसके इर्द-गिर्द सपा और बसपा के समर्थकों का दबदबा है। इसलिए उसने चुपचाप अपना मतदान किया है, जो नतीजों के रूप में सामने आएगा। खैर! नतीजों के लिए ज्यादा देर इंतजार नहीं करना पड़ेगा, जल्द दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। अंत में हम चुनाव आयोग और मतदाताओं को बधाई देना चाहते हैं कि 5 राज्यों और ढाई महीने लम्बी चुनावी प्रक्रिया के दौरान बिना बूथ कैप्चरिंग, हिंसा या किसी अन्य गड़बड़ से मुक्त चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से सम्पन्न हो गया। सबसे बड़ी बात यह रही कि बिना किसी उत्तेजक या विभाजक माहौल के बावजूद सभी राज्यों में मतदान केंद्रों पर मतदाताओं ने रिकॉर्ड वोटिंग की। लोगों ने पोलिंग बूथों पर जाकर लोकतंत्र के महापर्व के प्रति न सिर्प अपनी आस्था जताई बल्कि चुनाव को बेहद दिलचस्प बना दिया।
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Thursday, 16 February 2012

उत्तर पदेश में चल रहा है एक साइलैंट करंट

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 16th February  2012
अनिल नरेन्द्र
ऐसा कौन सा मुद्दा है जिसे यूपी के नेता समझ नहीं पा रहे और जनता समझ गई है? मंडल-कमंडल के उन्मादी और उत्तेजक माहौल में भी जब उत्तर पदेश में 57 फीसदी से ज्यादा मतदान नहीं हुआ, इस बार पता नहीं कौन सा अंडर करंट चल रहा है कि इतना भारी मतदान हो रहा है। सतह पर बिल्कुल शांति है, न किसी का विरोध और न ही किसी के पक्ष में साफ हवा। मगर फिर भी मतदान 60 फीसदी के लगभग रहा है। उत्तर पदेश में आजादी के बाद पहली मर्तबा यह करिश्मा हो रहा है। इससे भी ज्यादा सुखद है कि पहले दो चरणों के मतदान में आधी आबादी का डिस्टिंगशन से पास होना। पहले चरण में बारिश के बावजूद पुरुषों से ज्यादा मतदान पतिशत महिलाओं का था। ज्यादा मतदान को उत्तर पदेश में सत्ता विरोधी लहर के रूप में ही देखा जाता है। इस बेहद सहज धारणा के लिए पिछले ढाई दशकों के नतीजे ही जिम्मेदार हैं। 1985 के बाद से कोई भी सत्तारूढ़ पार्टी लगातार दूसरी बार सरकार बनाने में असफल रही है। ऐसे में बढ़े मतदान को सपा, भाजपा व कांग्रेस जाहिर तौर पर सत्ता बसपा विरोधी लहर के रूप में पेश कर रहे हैं। कांग्रेस को तो राहुल का करिश्मा दिख रहा है। सपा को बसपा सरकार का भ्रष्टाचार तो भाजपा को केंद्र सरकार के खिलाफ यूपी के लोगों का गुस्सा। मगर ऐसा क्या है कि आजादी के बाद पहली बार मतदाता ऐसे सड़कों पर उतरे। आजादी के बाद से हुए कुल 15 चुनावों में कभी इस तरह जनता सड़कों पर मतदान के लिए नहीं निकली। आपातकाल के बाद 1977 रहा हो या फिर 1991 में राम जन्म भूमि आंदोलन की लहर में भी मतदान पतिशत 55 फीसदी के पास ही रह पाया। भाजपा को रोकने के लिए 1993 में सामाजिक न्याय व दलित राजनीति को कांशीराम और मुलायम ने गठजोड़ कर सामाजिक परिवर्तन का बिगुल पूंका लेकिन मतदान 60 फीसदी के जादूई अंक तक नहीं पहुंच सका। छह मार्च को नतीजे आने से पहले तक राजनीतिक पंडित और दल अपने तर्प और गणित पेश करेंगे लेकिन वास्तविकता है कि हवा के मिजाज को कोई भी भांप नहीं पा रहा है, मगर मतदान में महिलाओं और युवाओं की बढ़ती भागीदारी से हमारे लोकतंत्र के परिपक्व होने का स्पष्ट संकेत है। साफ है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन का असर है तभी तो कुछ मतदाताओं ने राइट टू रिजेक्ट विकल्प का भी इस्तेमाल किया है। पर उत्तर पदेश के पूर्वी इलाके में दो चरणों में हुए मतदान से जो हवा चली है वह पश्चिमी हिस्से तक आते-आते बदल भी सकती है। इस इलाके में फैसले की चाबी मुसलमानों और जाटों के हाथों में है। आमतौर पर वेस्टर्न यूपी में जाटों का दबदबा माना जाता है। जाटों के नेता के रूप में चौधरी अजीत सिंह करीब दो दशकों से स्थापित हैं। कांग्रेस के साथ समझौता करने वाली अजीत सिंह को कुल 59 सीटें मिली हैं। अगर जमीनी स्तर पर यह समझौता सही मायनों में लागू होता है तो दोनों कांग्रेस और रालोद को फायदा होगा। वेस्टर्न यूपी में मुसलमान वोटों का भी खासा महत्व है। हालांकि सत्तारूढ़ होने के नाते पश्चिमी उत्तर पदेश में बीएसपी के पति नाराजगी है। लेकिन यह भी सच है कि इस इलाके की ज्यादातर सीटों पर मुख्य मुकाबला बसपा से ही है। दरअसल बीएसपी के 20 फीसदी दलित वोट उसका बड़ा हथियार है। स्थानीय स्तर पर दलितों के अलावा सभी जातियां अपने बीच का उम्मीदवार ढूंढ रही हैं सिर्प दलित ही बहनजी के इशारे पर वोट करते हैं। क्षेत्र में बसपा से नाराज मुसलमान एसपी और कांग्रेस को वोट दे सकते हैं। ऐसा हुआ तो बसपा ही फायदे में रहेगी। अगर मुसलमान वोट एकजुट हुआ तो बसपा ही सबसे ज्यादा घाटे में रहेगी। पूरे पश्चिमी उत्तर पदेश में हर सीट पर जातीय समीकरण अलग-अलग है। कुछ इलाकों में भाजपा भी मजबूत स्थिति में है। खासतौर पर शहरी इलाकों में उसका पभाव साफ दिख रहा है। पर इस बार का चुनाव बहुत कुछ उम्मीदवारों पर भी निर्भर है। कुल मिलाकर देखना यह है कि जो हवा पहले दो दौर के मतदान में चली वह तीसरे में भी बरकरार रहती है या नहीं?
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Saturday, 11 February 2012

पहले चरण के मतदान से कांग्रेस और सपा ज्यादा उत्साहित

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 11th February  2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश में विधानसभा का पहला राउंड पूरा हो गया है। बारिश के बीच बुधवार को वोटों की भी झमाझम बरसात हुई। विधानसभा चुनाव के पहले चरण में मतदान में बारिश और सर्द हवाएं भी वोटरों का जोश ठंडा नहीं कर सकी। इसे वोटरों की जागरुकता कहें या अन्ना हजारे व चुनाव आयोग की मुहिम का नतीजा, आजादी के बाद प्रदेश में पहली बार 62 फीसदी मतदान हुआ। खास बात यह भी रही कि पहले चरण का मतदान पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा, नहीं तो उत्तर प्रदेश में चुनावी हिंसा मशहूर है पर इस दौर में कहीं से हिंसा तो दूर छोटे-मोटे झगड़े की शिकायत भी नहीं हुई। भारी मतदान के सियासी दल अपने-अपने ढंग से मतलब निकाल रहे हैं। पहली बात तो यह मानी जा रही है कि भारी मतदान कभी भी सत्तारूढ़ दल को नहीं भाती। माना यही जाता है कि वोटर सत्ता के प्रति विरोध जताने के लिए हमेशा उत्साह दिखाता है। इस बार के चुनाव में सबसे बड़ी पहेली है कि प्रदेश के करीब 46 फीसदी युवा वोटर (उम्र 18 से 39 वर्ष) में से लगभग 55 लाख वोटर 18 वर्ष के हैं। एक करोड़ से ऊपर ऐसे वोटर हैं जो पहली बार अपना वोट देंगे। अहम मुद्दा यह भी है कि युवा वर्ग का यह वोटर क्या करेगा? इस वर्ग को राजनीति में कम दिलचस्पी है, कैरियर, भविष्य, नौकरी, रोजगार आदि शायद इनके लिए महत्वपूर्ण हैं। युवा वर्ग चाहे शहरी इलाके का हो या ग्रामीण क्षेत्रों का वह अपने भविष्य को लेकर कहीं ज्यादा उत्सुक एवं अधीर रहता है। यही वजह है कि वह राजनीति में झाड़ू लगाकर कुछ सफाई का काम कर सकता है। भ्रष्टाचार या राजनीति के अपराधीकरण को चुपचाप स्वीकार करने के बजाय इस वर्ग में प्रदेश की खुशहाली, सरकार के स्थायित्व, रोजगार के नए अवसर जैसे मुद्दों को तरजीह देकर बदलाव लाने की क्षमता रखता है। इसलिए शायद हर बड़ी सियासी पार्टी ने चाहे रोजगार हो या मुफ्त लैपटॉप जैसे प्रलोभन खुलकर सामने रखे हैं। इस नए वर्ग के वोटर की वजह से अगर राहुल गांधी कांग्रेस को उत्साहित कर रहे हैं तो अखिलेश यादव सपा के तुरुप के पत्ते बने हुए हैं। बसपा और भाजपा में इस वर्ग के सशक्त नेताओं की कमी साफ खटक रही है। उत्तर प्रदेश में चुनाव का आखिरी राजनीतिक नतीजा जो भी हो, पहले चरण के मतदान ने यह संकेत दे दिया है कि सामान्यता उदासीन रहने वाले वोटरों का जमाना गया। उन उम्मीदवारों के लिए भी आशा क्षीण हो गई है जो महज 20-20 फीसदी वोट लेकर जीतते रहे हैं। आशा यह जताई जा रही है कि बाकी के छह चरणों में मतदान 65 फीसदी को भी पार कर सकता है। बहरहाल राज्य की 55 सीटों पर शांतिपूर्ण मतदान के बावजूद चुनौतियां कम नहीं हैं। पूरे उत्तर प्रदेश में अब तक जिन 15 लाख से ज्यादा संदिग्धों को पकड़ा गया है, उनमें से दो लाख से कुछ ज्यादा इन सीटों वाले क्षेत्रों के हैं। पूरे राज्य में अब तक 33 करोड़ नकदी के साथ-साथ 4345 गैर-कानूनी हथियार, 6636 कारतूस और 2,43,415 लीटर गैर-कानूनी शराब जब्त की गई है।
बुधवार के पहले चरण के मतदान के दौरान कांग्रेस, सपा और बसपा सभी सियासी दलों की सांसें अटकी रहीं। दोपहर पहले बेहद धीमी मतदान की रफ्तार से कांग्रेस खासी चिन्ता में पड़ गई लेकिन शाम को आई अचानक तेजी ने पार्टी में नया उत्साह भर दिया। पहले चरण के मतदान में जिन सीटों पर वोट पड़े उनमें कांग्रेस को अच्छी खासी उम्मीद है। इन 10 जिलों में विधानसभा की 55 सीटें हैं जिनमें से कांग्रेस को 10 से 15 सीटें मिलने की उम्मीद है। इस क्षेत्र में पार्टी को अन्य पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम मतदाताओं से उम्मीद है कि वे कांग्रेस के पक्ष में मतदान करेंगे। पहले चरण के मतदान को कांग्रेस इसलिए भी महत्वपूर्ण मान रही है क्योंकि इससे सूबे का ट्रेंड पता चलेगा। इस चरण में कांग्रेस की तरफ मतदाताओं का रुझान दिखा तो यह बाकी चरणों में भी पुर-असर दिख सकता है। इसके पीछे कोई कर्मकांडी टोटके जैसी वजह नहीं है। जिन 10 जिलों में 55 सीटों के लिए बुधवार को मतदान हुआ, उस क्षेत्र में 2007 के विधानसभा और 2009 के लोकसभा चुनाव के नतीजों का विश्लेषण इसके पीछे कारण है। इस क्षेत्र में मुस्लिम, दलित और अतिपिछड़ों के मत ज्यादा हैं, जिन पर कांग्रेस ने पूरे चुनाव पर जोर दिया है। कांग्रेस मतदान से ठीक पहले यह स्पष्ट संकेत देने में जुटी कि कांग्रेस इस बार अपने ही दम पर सरकार बना लेगी। राहुल गांधी ने कई मीटिंगों में और सोनिया गांधी ने उन्नाव में अपनी आखिरी मीटिंग में कहा कि कांग्रेस किसी के साथ गठबंधन नहीं करेगी, से स्पष्ट संकेत देना था कि कांग्रेस सरकार बनाने की काफी कांफिडेंट है। इसके पीछे उन अवसरवादी वोटरों को भी पटाना था जो अन्त तक देखते रहते हैं कि सरकार किसकी बनेगी। अगर कांग्रेस बहुत उत्साहित है तो उत्साह तो समाजवादी पार्टी का भी चरम पर है। सपा का दावा है कि अगली सरकार उसी की बनेगी। बहुमत में कमी रही तो उसका भी बंदोबस्त हो जाएगा। पार्टी का दावा है कि अखिलेश यादव की चुनावी सभाओं में जिस कदर भीड़ उमड़ रही है, उसके भविष्य के संकेत साफ दिख रहे हैं। पार्टी की एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि अपराधियों से पार्टी को अलग रखने की अखिलेश यादव के फैसले से तमाम उन वर्गों में भी पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ी है जो सपा से अतीत में सदा दूर रहे। उनका दावा है कि इस बार बहुजन समाज पार्टी के तमाम किले ढह जाएंगे। कहना होगा कि यह चुनाव इस नजरिये से भी महत्वपूर्ण होगा कि सभी पार्टियों ने अपने पारम्परिक वोट बैंक के अलावा दूसरों पर खास ध्यान दिया है। इन वोटों में ब्राह्मण, राजपूत जैसी अगड़ी जातियां, यादव को छोड़कर दूसरी पिछड़ी जातियां, कोइरी, राजभर, निषाद-मल्लाह जैसी अतिपिछड़ी जातियां, मुस्लिम वोट शामिल हैं और इन सभी के बीच जबरदस्त मंथन है। कांग्रेस और सपा की तरफ से दलित जातियों में भी जाटव बनाम गैर-जाटव के आधार पर इस मंथन की कोशिश हुई। राहुल गांधी का दलित परिवारों के बीच जाकर उठना-बैठना, इसी नजरिये से देखा जा रहा है। बहरहाल, इन सभी कोशिशों के अंतिम नतीजों को अपने-अपने पक्ष में लेकर जो पार्टियां दावा कर रही हैं, उनमें कांग्रेस सबसे आगे है। इसकी वजह भी है। कांग्रेस के पास इस चुनाव में पाना ही पाना है, खोना कुछ नहीं है। कांग्रेस विश्लेषक इसी आधार पर मान रहे हैं कि इस चरण में अगर कुछ निश्चित कारक उसके हक में काम आए तो यह अगले चरण के चुनाव में भी असर दिखा सकते हैं।

Sunday, 5 February 2012

पहले चरण का मतदान तय करेगा यूपी की दिशा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 5th February  2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश में 16वीं विधानसभा के लिए पहले चरण में 55 सीटों के लिए आठ फरवरी को मतदान होगा। पहले चरण के लिए सभी राजनीतिक दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। सभी दल अपने को दूसरे से बेहतर बताने में लगे हुए हैं। लेकिन यदि पिछले पांच चुनावों के आंकड़ों को देखा जाए तो सरकार बनाने के लिए कम से कम 30 फीसदी वोटों का आंकड़ा पार करना जरूरी होगा। बहरहाल यूपी विधानसभा चुनाव की जंग अपने चरम तक पहुंचती नजर आ रही है। गंगा, यमुना, घाघरा, राप्ती और गोमती के पानी के प्रभाव की तरह राजनीति भी निरन्तर परिवर्तनशील है। राजनीति आगे क्या गुल खिलाएगी और किसका पलड़ा भारी होगा, यह तो मतदाता ही तय करेंगे। सत्तारूढ़ बसपा और विपक्षी दल सपा के अलावा कांग्रेस, भाजपा, पीस पार्टी और रालोद ने सभी ने अपनी ताकत झोंक दी है। सत्तारूढ़ बसपा जहां अपनी सरकार के `काम के दम पर' और जातीय समीकरण के आधार पर वापसी का दावा कर रही है, वहीं समाजवादी पार्टी को भरोसा है कि सूबे में प्रमुख प्रतिपक्षी दल हेने के नाते `बसपा सरकार' की कथित विफलताओं के कारण चल रही सत्ता परिवर्तन की हवा का उसे लाभ होगा और इसके मद्देनजर मतदाताओं की पहली प्राथमिकता सपा होगी। कांग्रेस को उम्मीद है कि 22 साल तक गैर कांग्रेसी सरकारें देख चुकी प्रदेश की जनता युवराज राहुल गांधी के करिश्मे का भरोसा करके इस बार उसे ही प्राथमिकता देने वाली है जबकि भाजपा भ्रष्टाचार के विरोध में गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के आंदोलन को मिले जन समर्थन को अपने अनुकूल मानकर अति-प्रसन्न है। फिर जिस तरह से अल्पसंख्यकों को आरक्षण के मामले में अन्य सभी दलों की किरकिरी हुई है उससे भी भाजपा को लगता है कि हिन्दू वोट विशेषकर सवर्ण जातियों का वोट उसके हिस्से में आएगा। उत्तर प्रदेश में विधानसभा की कुल 403 सीटें हैं। प्रदेश में वर्ष 1991 से लेकर 2007 तक हुए विधानसभा के पांच चुनावों पर नजर डालें तो नम्बर एक की पार्टी बनने और बहुमत पाने अथवा उसके करीब पहुंचने के लिए कम से कम 30 फीसदी वोट का आंकड़ा पार करना जरूरी है। उत्तर प्रदेश के यह चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक होने जा रहे हैं। देश के सबसे बड़े राज्य में इस बार रिकार्ड तादाद में छोटी पार्टियां बड़े दम-खम के साथ उतरी हैं। बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा को इनसे नुकसान होने की सम्भावना है। वे इन्हें केवल वोट काटने वाली या वोट बर्बाद करने वाली पार्टियां बता रही हैं, जैसे पीस पार्टी के बारे में भाजपा को छोड़कर तीन बाकी दलों को यही लग रहा है। जिस भाजपा को इससे लाभ हो रहा है उसके बारे में बाकी पार्टियां कह रही हैं कि पीस पार्टी को आर्थिक मदद तो वहीं से मिती है। राज्य में पीस पार्टी का इस समय वही दर्जा है जो अपनी शुरुआती अवस्था में बीएसपी का हुआ करता था। इस बार राज्य में 150 के करीब पार्टियां चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। जो अलग-अलग जाति समूहों का प्रतिनिधित्व का दावा कर रही हैं। पिछली बार करीब 125 पार्टियों ने चुनाव लड़ा था जिनमें छह राष्ट्रीय दल, 12 राज्य स्तरीय दल और 112 गैर मान्यताप्राप्त पार्टियां थीं। उत्तर प्रदेश में परिसीमन के बाद बनी 113 सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक हो सकते हैं जिन्हें पाने के लिए राजनीतिक दलों ने दिन-रात एक कर दिया है। मुस्लिम मत पाने के लिए भाजपा को छोड़ सभी राजनीतिक दल जोर-आजमाइश में लगे हैं। लेकिन अभी भी कोई दल दावे से कहने की स्थिति में नहीं कि उसे मुस्लिम वोट एक ब्लॉक मिलेगा। आमतौर पर माना जा रहा है कि मुस्लिम टैक्टिकल वोटिंग कर सकते हैं यानि भाजपा को हराने के लिए उन्हें उस सीट पर जो भी उम्मीदवार जीतता दिखेगा उसे वोट दे देंगे। इस तरह हमें लगता है कि मुस्लिम वोट कांग्रेस, सपा, बसपा, पीस पार्टी में बंटेगा। हार-जीत का अन्तर बहुत कम होगा। जो उम्मीदवार 10,000 वोट ले लेगा, वह जीतने की स्थिति में आ सकता है। देखें ऊंट किस करवट बैठता है?

Sunday, 29 January 2012

यूपी चुनाव में 69 उम्मीदवार जेल से ही ठोंकेंगे अपनी ताल

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 29th January  2012
अनिल नरेन्द्र
अन्ना हजारे या चुनाव आयोग भले ही जितना भी जोर लगा दें, प्रतिबंध लगा दें, उत्तर प्रदेश में राजनीति का अपराधीकरण होने से नहीं रोक सकते। धन बल और बाहुबल के बढ़ते उपयोग पर अंकुश लगाने के तमाम प्रयासों के बावजूद यह परवान चढ़ती नहीं दिख रही है। यह पहला मौका है जब उत्तर प्रदेश के किसी चुनाव में तकरीबन 69 उम्मीदवार जेल से चुनाव लड़ रहे हैं। वह भी तब जबकि अपराधियों को टिकट न देने का दावा करते हुए कोई दल थकता नहीं है। बात यहीं तक नहीं रुकती, आपराधिक प्रवृत्ति के 77 उम्मीदवारों को राजनीतिक दलों ने उतारने से परहेज नहीं किया। राजनीति में अपराधियों की यह उपस्थिति सिर्प चार चरण के उम्मीदवारों के आधार पर ही आंकी गई है। पूरे उम्मीदवारों के नाम और उन पर चस्पा आरोपों के मद्देनजर विश्लेषण किया जाए तो यह आंकड़ा काफी बड़ा दिखाई देता है। यह स्थिति तो तब है जब तस्वीर अभी धुंधली है। तस्वीर जब साफ होगी तो सही स्थिति का पता चलेगा। उत्तर प्रदेश के इस 16वीं विधानसभा के लिए हो रहे चुनाव में अपराधियों को चुनावी दंगल में उतारने के मामले में सभी राजनीतिक दल बेनकाब हो गए हैं, हकीकत तो यह है कि इस हमाम में सभी नंगे हैं। शायद ही कोई ऐसा दल हो जिसने जेल में बन्द किसी न किसी को माननीय बनाने की न ठान ली हो। समाजवादी पार्टी ने अमर सिंह को फैजाबाद से उतारा है, जो इन दिनों जेल में बन्द हैं। पीस पार्टी ने यहीं से जितेन्द्र सिंह बबलू को जेल में रहते ही चुनाव लड़ने की हरी झंडी दे दी थी। यही नहीं, पीस पार्टी ने सुल्तानपुर से भी दो दबंगों सोनू सिंह और मोनू सिंह को टिकट थमाए हैं। जो हाल ही में जेल से छूटे हैं। अपना दल ने जेल में बन्द अतीक अहमद और अंतर्राष्ट्रीय माफिया मुन्ना बजरंगी को माननीय बनाने की ठानी है। मुन्ना ने तिहाड़ जेल से नामांकन पत्र दाखिल किया है। मऊ से निर्दलीय मुख्तार अंसारी ने आगरा केंद्रीय जेल से नामांकन पत्र दाखिल किया है। इन्हें बीते लोकसभा चुनाव में बसपा ने वाराणसी से भाजपा के डॉ. मुरली मनोहर जोशी के खिलाफ उतारा था। गुजरात के अहमदाबाद जेल में बन्द बृजेश सिंह चन्दौली जिले की सैयद रजा सीट पर प्रगतिशील मानव समाज पार्टी के टिकट पर मैदान में हैं। कबीना मंत्री नन्द गोपाल नन्दी पर जानलेवा हमले का आरोपी फतेहपुर जेल में बन्द विजय मिश्र सपा की टिकट से मिर्जापुर जिले की ज्ञानपुर सीट से मैदान में हैं। कांग्रेस ने अकेले गाजीपुर की जमनिया सीट से जेल में बन्द कलावती बिन्द को उम्मीदवार बनाया है। इसी जिले से कांग्रेस ने रासुका तथा गैंगस्टर एक्ट के तहत जेल में बन्द शैलेश सिंह को उम्मीदवार बनाने का ऐलान किया है। जेल में बन्द फूलन देवी की हत्या के आरोपी शेर सिंह राणा ने भी गौतमबुद्ध नगर की जेवर सीट से राष्ट्रवादी प्रताप सेना के बैनर तले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। दागी उम्मीदवारों को टिकट देने के मामले में सभी दलों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया है। इसी का नतीजा है कि तकरीबन गम्भीर आपराधिक मामले वाले 15 फीसदी उम्मीदवार मैदान में उतर चुके हैं। भाजपा ने 14, सपा ने 15, कांग्रेस ने 17 फीसदी आपराधिक छवि के उम्मीदवारों को उतारा है। बसपा भी पीछे नहीं, उसने भी 16 फीसदी आपराधिक छवि के उम्मीदवार को उतारा है। छोटे दलों की तो बात ही नहीं करते। इस हमाम में सभी नंगे हैं।
Anil Narendra, Bahujan Samaj Party, BJP, Congress, Criminals, Daily Pratap, Samajwadi Party, Uttar Pradesh, Vir Arjun

Tuesday, 10 January 2012

यूपी में मूर्तियों पर पर्दा डालने से क्या हासिल होगा?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10th January  2012
अनिल नरेन्द्र
चुनाव आयोग ने आदेश दिया है कि उत्तर प्रदेश में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने हेतु लखनऊ और राज्य के अन्य हिस्सों में लगी मुख्यमंत्री मायावती और बहुजन समाज पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की प्रतिमाओं पर चुनाव तक पर्दा डाल दिया जाए। आयोग का यह फरमान इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी और ऐसे अन्य दलों के नेताओं की प्रतिमाओं पर भी लागू होगा, जिनसे मतदाता प्रभावित हो सकते हैं। आयोग ने कहा है कि आदर्श आचार संहिता लागू होने की वजह से इस आदेश पर तत्काल अमल कराया जाए। आयोग के इस फैसले के कारण नोएडा के राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल और लखनऊ में 9 स्थानों पर मायावती और हाथी की प्रतिमाएं प्रभावित होंगी। बसपा में इसका विरोध स्वाभाविक ही था। आयोग के इस विवादास्पद फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बसपा महासचिव सतीश मिश्र ने कहा कि अगर चुनाव चिन्ह ढकने की बात है तो क्या आयोग हर किसी को अपने हाथ के पंजे कटवाने अथवा ढकने का आदेश देगा, क्योंकि यह कांग्रेस का चुनाव चिन्ह है? यही नहीं भाजपा का चुनाव चिन्ह कमल का फूल है तो क्या आयोग हर तालाब से कमल के फूल चुनवा लेगा? उन्होंने कहा कि साइकिल सपा का चुनाव चिन्ह है तो क्या आयोग इसे चलाने पर रोक लगा देगा। मिश्र ने कहा कि केंद्र सरकार की करीब 150 योजनाएं गांधी-नेहरू परिवार के नाम से चलती हैं तो क्या आयोग इन्हें भी बन्द कर देगा। जहां हम यह बात स्वीकार करते हैं कि यह कदम भले ही सभी राजनीतिक दलों को समान धरातल पर लाने के आधार पर उठाया गया है पर हम इसकी टाइमिंग और इसकी उपयोगिता पर जरूर मतभेद रखते हैं। हम समझ सकते थे कि चुनाव आयोग को यदि ऐसा कोई निर्णय लेना ही था तो उसे करीब 15 महीने पहले जब यह मामला सामने आया था कि मायावती सरकार सार्वजनिक कोष के धन से विभिन्न पार्कों में हाथियों की मूर्तियां लगवा रही है तब क्यों नहीं उसे रोका गया? एक क्षण के लिए यह तो समझ में आता है कि मायावती और हाथियों की उन मूर्तियों को ढक दिया जाए जो सड़कों एवं चौराहों पर स्थापित की गई हों पर आखिर चारदीवारी से घिरे पार्कों में स्थापित इन मूर्तियों पर पर्दा डालने से क्या हासिल होगा? पार्कों में जाने वालों को इन मूर्तियों के वहां होने का पता है और ढकी हुई मूर्तियां उल्टा उन्हें अधिक अहसास ही कराएंगी। अगर चुनाव आयोग इतना ही निष्पक्ष है तो उसने पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों को साढ़े चार फीसदी आरक्षण देने के फैसले पर एतराज करने की नहीं सूझी? इतना ही नहीं आयोग ने आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद दलितों और पिछड़ों के रिक्त पदों को भरने के केंद्र सरकार की घोषणा पर भी मौन रहना बेहतर समझा। उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में सफेद संगमरमर के ये हाथी `दलित विजय' के प्रतीक स्मारक के रूप में खड़े किए गए हैं। अब पर्दे में ढके यही हाथी अगर दलितों की अवमानना के रूप में इन चुनावों में प्रचारित किए जाएं तो प्रतिस्पर्धा इसका क्या तोड़ निकालेंगे, यह देखना दिलचस्प होगा। बेशक बसपा इसका विरोध करेगी पर इतना तो है कि राज्य की नौकरशाह बिरादरी को समझ आ जाएगा कि वह थोड़ी निष्पक्षता बरतें, सत्तारूढ़ सरकार के गुलाम बनकर काम न करें पर इससे कहीं बड़ी समस्या है चुनाव में इस्तेमाल होने वाला काला धन। पिछले दो-तीन दिनों से हम देख रहे हैं कि करोड़ों रुपये बरामद हो चुके हैं जिनका इस्तेमाल इन चुनावों में होना था। मुख्य चुनाव आयुक्त कुरैशी ने भी माना है कि उत्तर प्रदेश, पंजाब और गोवा में चुनावों को काले धन के साये से मुक्त रखना बड़ी चुनौती है। याद रहे कि जब अन्ना हजारे ने चुनावों में काले धन की समस्या पर प्रकाश डाला था तो तमाम राजनीतिक दलों ने अन्ना का जमकर विरोध किया था। अन्ना ने बस इतना कहा था कि उनके जैसा फकीर चुनावों में कभी जीत नहीं सकता क्योंकि फैसला तो धन-बल पर होता है। बेशक चुनाव आयोग ने इस बार चुनावों में उम्मीदवारों के खर्च पर पैनी नजर रखने की विशेष व्यवस्था की है और इन्कम टैक्स विभाग को भी इसमें झोंक दिया है। लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि प्रत्याशियों के खर्च की सीमा तो तय है पर वही सियासी दलों पर ऐसी कोई बंदिश नहीं है। एक और समस्या की ओर हम आयोग का ध्यान दिलाना चाहेंगे वह है पेड न्यूज का मामला। विभिन्न अखबारों में हम सियासी दलों के प्रायोजित कार्यक्रम देख रहे हैं। बसपा का विशेष अभियान कई दिनों से चल रहा है। अखबारों और टीवी चैनलों पर आम खबरों के बीच ऐसा छिपा संदेश होता है जो वोटरों को प्रभावित करता है, लेकिन इस पर कोई रोक नहीं। कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि मूर्तियों पर पर्दा डालने से शायद ही कोई फायदा हो?
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Saturday, 7 January 2012

भाजपा क्या ऐसे लाएगी उत्तर प्रदेश में राम राज्य?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th January  2012
अनिल नरेन्द्र
चुनाव के समय हर सियासी दल को अपने पांव पूंक-पूंक कर रखने चाहिए। उनके हर कदम को माइक्रोस्कोप से देखा जाएगा और उनके सियासी विरोधी हर गलती का खूब सियासी प्रचार करने का प्रयास करेंगे। उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन घोटाले में फंसे मायावती के करीबी रहे पूर्व स्वास्थ्य मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा का भाजपा में शामिल होने से हंगामा हो गया है। कुशवाहा भाजपा की गले की हड्डी बन गए हैं। उत्तर प्रदेश चुनाव से ठीक पहले ऐसे विवादास्पद व्यक्ति को पार्टी में लेना जोखिम-भरा फैसला है। एक पखवाड़े पहले संसद में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सबसे ज्यादा मुखर रहने वाली भारतीय जनता पार्टी ने आरोपी बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल करने से भी परहेज नहीं किया। इसके इस आरोप में बेशक दम है कि कुशवाहा के भाजपा में आने के महज 24 घंटे के भीतर ही सीबीआई को उनके ठिकानों पर छापा मारने की सुध कैसे आई? मगर यह भी किसी से छिपा नहीं है कि खुद उसके वरिष्ठ नेता किरीट सोमैया ने मुख्यमंत्री मायावती और उनके परिजनों के साथ ही कुशवाहा के खिलाफ भ्रष्टाचार में लिप्त होने के गम्भीर आरोप लगाए थे। क्या पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी को यह पता नहीं था कि पूर्व परिवार कल्याण मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा पर घोटालों में शामिल होने के साथ ही दो पूर्व सीएमओ और एक पूर्व डिप्टी सीएमओ की हत्या के मामले में संलिप्त होने के आरोप हैं? कुशवाहा को शामिल करने पर पार्टी के अन्दर भी महाभारत छिड़ गया है। जहां भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी और भाजपा के पिछड़े वर्ग के नेता कुशवाहा के बचाव में खड़े हो गए हैं वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी और लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज सहित पार्टी के कई शीर्ष नेता इस फैसले से खुश नहीं हैं। इनके विरोध के चलते ही आखिरकार पार्टी को यह ऐलान करना पड़ा कि कुशवाहा को टिकट नहीं दिया जाएगा। अगर टिकट नहीं देना था तो आप फिर ऐसे दागी आदमी को पार्टी में लाए ही क्यों? जिस तरह दागी कुशवाहा की एंट्री पर हंगामा हुआ है उससे लगता है कि यूपी में थोक के भाव पार्टी में आने की कोशिश करने वालों की लिस्ट की छानबीन होगी और कई दागियों की एंट्री पर अब ब्रेक लग जाएगी। श्री आडवाणी और सुषमा के विरोध के बाद पार्टी के भीतर अब चुनाव के समय होने वाले पार्टी बदल के सिलसिले में पार्टी अलर्ट रहेगी। दागी लोगों से दूर रहना चाहिए। भाजपा को चाहिए कि वह इस बात का प्रचार भी करे कि बीएसपी और कांग्रेस का अंदरूनी गठजोड़ है और इसका पर्दाफाश करे। यह उजागर किया जाना चाहिए कि कैसे बीजेपी में आने के अगले ही दिन व्यक्ति के खिलाफ सीबीआई कार्रवाई कर रही है। यह कार्रवाई दोनों मायावती और कांग्रेस को शूट करती है। बेशक यह सही हो या न हो पर भाजपा के पास इस बात का क्या जवाब है कि 30 दिसम्बर को पार्टी के राष्ट्रीय सचिव किरीट सोमैया कई सौ पेज के कागजात का पुलिंदा कुशवाहा के खिलाफ सीबीआई को देकर आते हैं और उसके चार दिन बाद 3 जनवरी को कुशवाहा को नितिन गडकरी साहब पार्टी में आने की दावत दे देते हैं। दुःखद बात यह है कि कुशवाहा का मामला अकेला नहीं है। अपनी खोई हुई जमीन पुन हासिल करने के लिए भाजपा का नेतृत्व किसी भी हद तक जाने को तैयार है। कुशवाहा से पहले पूर्व मंत्री बादशाह सिंह, अवधेश कुमार वर्मा और ददन मिश्र जैसे पूर्व मंत्रियों को राजनीतिक पनाह दिया गया। मायावती ने जिस विवादास्पद मंत्री या नेता को पार्टी और सरकार से बाहर निकाला, भाजपा ने उसे गले लगा लिया। अपने चाल-चरित्र, चेहरे और स्वस्थ छवि के मामले में दूसरों से सर्वथा अलग और श्रेष्ठ होने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी यूपी में इतना गिर गई है कि उसने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी तक को पीछे छोड़ दिया है। इन दोनों पार्टियों ने भ्रष्टाचार के आरोपों में पार्टी या मंत्रिमंडल से बर्खास्त किए गए मंत्रियों को अपना टिकट देने से साफ इंकार कर दिया था मगर भाजपा ने अपने दिल्ली मुख्यालय में इन दागियों का खुले दिल से स्वागत किया और तब तो हद ही हो गई जब भाजपा के उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि गंदे नाले भी गंगा में मिलने के बाद गंगा हो जाते हैं। हाल तक यही नकवी मायावती और उनके मंत्रियों को अली बाबा और 40 चोर बता रहे थे। जाहिर है कि दागियों को पार्टी में शामिल करने का फैसला भाजपा अध्यक्ष और आला नेताओं की सहमति से ही हुआ होगा। इसलिए यह और भी खतरनाक है, ऐसी प्रवृत्ति रखने वालों को पार्टी में शामिल करके भाजपा उत्तर प्रदेश में कैसा राम राज्य लाना चाहती है।
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Tuesday, 3 January 2012

यूपी में मंत्री और लोकायुक्त में छिड़ा विवाद

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 3rd  January 2012
अनिल नरेन्द्र
नए साल की शुरुआत ही एक सियासी विवाद से हुई है। उत्तर प्रदेश में चुनावी जंग के ठीक पहले यूपी के ऊर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय ने यूपी के लोकायुक्त न्यायमूर्ति एनके महरोत्रा के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी कर नए विवाद को जन्म दे दिया है। मायावती सरकार के कई मंत्रियों के लोकायुक्त जांच के दायरे में होने के चलते मंत्री जी अपना आपा खो बैठे। शुक्रवार शाम हाथरस की एक जनसभा में रामवीर ने कहा कि उन्हें जज (लोकायुक्त) के मुकाबले कानून की ज्यादा समझ है। लोकायुक्त के साथ व्यक्तिगत संबंध नहीं होते तो मैं सुप्रीम कोर्ट की शरण लेकर उन्हें बर्खास्त भी करा सकता था। ऊर्जा मंत्री यहीं नहीं रुके। उन्होंने कहा कि मैं कानून का छात्र रहा हूं और इसे अच्छी तरह समझता हूं। मैं कानून उनसे ज्यादा जानता हूं। उपाध्याय ने उनके खिलाफ भाजपा के महासचिव किरीट सोमैया द्वारा लोकायुक्त को की गई शिकायत के सन्दर्भ में यह बात कही। इस टिप्पणी पर लोकायुक्त ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मायावती ने अब तक जो कुछ भी किया है, रामवीर ने उस पर पानी फेर दिया है। मेहरोत्रा ने कहा कि रामवीर से उनके व्यक्तिगत संबंध नहीं हैं। मंत्री होने के नाते उन्होंने रामवीर को सम्मान दिया, जिसे वह गलत समझ बैठे। उन्हें पता नहीं कि ऐसी टिप्पणी के लिए रामवीर ने अपनी सरकार से अनुमति ली या नहीं, लेकिन उनका यह आचरण हताशा का परिचायक है और पद की गरिमा के अनुरूप नहीं है। हाथरस के व्यापारियों की ओर से शुक्रवार की रात यहां घंटाघर पर जनसभा में उपाध्याय की उक्त टिप्पणी की जब सपा जिलाध्यक्ष देवेन्द्र अग्रवाल को जानकारी मिली तो उन्होंने ऊर्जा मंत्री पर लोकायुक्त की अवमानना का आरोप लगाने के साथ जिला प्रशासन व लोकायुक्त से ऊर्जा मंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और मुख्यमंत्री से उन्हें बर्खास्त करने की मांग कर डाली। हाल ही में लोकायुक्त मेहरोत्रा ने उत्तर प्रदेश के कद्दावर मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के खिलाफ प्राथमिक स्तर पर उनके और उनकी पत्नी विधान परिषद सदस्य हुस्ना सिद्दीकी के खिलाफ दाखिल शिकायतों को मजबूत पाते हुए दोनों के खिलाफ मामला दर्ज कर मुख्यमंत्री मायावती को सूचना दे दी। दरअसल मायावती की पार्टी के कुछ नेता न्यायमूर्ति मेहरोत्रा से सख्त दुःखी हैं। उनकी सिफारिश पर कई मंत्रियों को अपने पद से हाथ धोना पड़ा है। मायावती ने आनन-फानन में कई मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया है। चुनाव सिर पर देखते हुए खबर यह है कि बहन जी बहुत से सिटिंग एमएलए के टिकट भी काट रही हैं। महीनों पहले ही विधानसभा चुनाव के प्रत्याशियों की घोषणा करने वाली बहुजन समाज पार्टी में चुनाव की तारीख आने के बाद उम्मीदवारों में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। बसपा अध्यक्ष ने गत सोमवार को आगरा, बुंदेलखंड और कानपुर क्षेत्र की सीटों पर फिर से विचार किया है। मायावती ने बीते दिनों में अपने कई मंत्रियों और मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर उनके स्थान पर नए प्रत्याशियों को तय किया है। हमारा मानना है कि बहन जी थोड़ी बौखलाहट में अब काम कर रही हैं। ऐसे मौजूदा विधायकों को आखिरी समय पर बदलना पार्टी के लिए घातक भी साबित हो सकता है। इन लोगों ने महीनों से अपने क्षेत्रों में काम किया है, जमीन तैयार की है। आखिरी समय में नए उम्मीदवार के लिए ऐसा कर पाना इतना आसान नहीं होगा। फिर जाहिर-सी बात है कि जिनको अपमानित कर टिकट काटे गए हैं उनमें से कुछ जरूर पार्टी के नए अधिकृत उम्मीदवार को हराने का प्रयास करेंगे।
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Thursday, 29 December 2011

मायावती को राइट ऑफ करना भारी भूल होगी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 29th December 2011
अनिल नरेन्द्र
उत्तर पदेश विधानसभा चुनाव तिथियों की घोषणा से यूपी की तमाम विपक्षी पार्टियों में उत्साह आ गया है। सब अपनी-अपनी हांकने में लग गए हैं। सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी को तो उन्होंने मान लिया है कि वह आगामी चुनाव में मुंह की खाएगी। पर हमें नहीं लगता कि मायावती को एक समाप्त फोर्स मानकर चलना समझदारी होगी। अनुमान भले ही मायावती सरकार के बारे में व्यवस्था विरोधी माहौल के लगाए जा रहे हों पर धरातल पर बसपा उतनी कमजोर नहीं है, जितनी उसे कांग्रेस, सपा और भाजपा मानकर चल रही हैं। मायावती ने अपनी चुनावी तैयारियां एक साल पहले से ही शुरू कर दी थीं। सूबे के सभी 403 सीटों पर बसपा ने अपने उम्मीदवार डेढ़ साल पहले ही तय कर दिए थे। यह अलग बात है कि बहन जी ने इनमें से कुछ को बाद में बदला है। पर कांग्रेस, सपा और भाजपा को तो अपने उम्मीदवार फाइनल करने में भी भारी दिक्कतें आ रही हैं और इनमें विद्रोह की स्थिति बनी हुई है। यह सही है कि बहन जी इस बार मतदाताओं के सामने अपनी किसी विफलता का कोई बहाना नहीं बना पाएंगी। चमत्कार करते हुए मतदाताओं ने 2007 के चुनाव में बसपा को 206 सीटें देकर स्पष्ट बहुमत दिया था। इसी के दम पर मायावती सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया। जबकि उनसे पहले की तीन सरकारें न केवल अपना कार्यकाल ही पूरा कर पाईं बल्कि वे भाजपा के समर्थन पर टिकी थीं। इस बार मायावती को पूरे पांच साल तक काम करने की खुली इजाजत मिली हुई थी। इसलिए वे मतदाताओं से अपने काम के आधार पर ही एक और मौका पाने की अपील करेंगी। जहां तक कांग्रेस का सवाल है बेशक राहुल गांधी अपना मिशन 2012 के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं, यूपी सियासत को समझने वालों का कहना है कि कांग्रेस की ज्यादा स्थिति हवाई है। 2009 के लोकसभा चुनाव में 21 सीटों पर जीत मिल जाने से कांग्रेस यह खुशफहमी पाल बैठी है कि यूपी के मतदाता उसे 1989 से पहले की मजबूत जनाधार वाली स्थिति में पहुंचा देंगे। पर कांग्रेस इस तथ्य को नजरअन्दाज कैसे कर सकती है कि 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद जितनी भी विधानसभा बाई इलेक्शन हुई हैं कांग्रेस एक सीट भी नहीं जीत सकी। कहीं दूसरे नंबर पर रही तो कहीं तीसरे नंबर पर। शायद यह जानते हुए कि पार्टी ने अजीत सिंह के आगे घुटने टेकते हुए उनसे चुनावी तालमेल किया है। यह जानते हुए भी इस गठबंधन से अजीत सिंह की पार्टी को ज्यादा फायदा होगा। कांग्रेस की स्थिति तो वहीं की वहीं रहने की संभावना है। मायावती सुनियोजित रणनीति के तहत लगातार कांग्रेस पर ही वार कर रही हैं। दरअसल वह चाहती हैं कि मतदाता को लगे कि मुकाबला बस बसपा और कांग्रेस के बीच ही है। भाजपा और सपा दोनों की जानबूझकर मायावती अनदेखी कर रही हैं। यह जानते हुए कि असल टक्कर बसपा और सपा के बीच होगी। पिछले चुनाव में बसपा को 206, सपा को 91, भाजपा को 51, कांग्रेस को 22 और रालोद को दस सीटें मिली थीं। मुलायम को कमजोर करने के लिए मायावती इस रणनीति पर चल रही हैं कि मुसलमान वोट एकमुश्त किसी को न मिले। सपा से टूटकर यह या तो उनके साथ आए या फिर कांग्रेस के साथ चला जाए। वैसे इस बार पीस पार्टी भी पूरे जोरों के साथ मैदान में उतर रही है और निश्चित रूप से वह मुसलमान वोट काटेगी। इसलिए यह कहा जा सकता है कि इस बार मुस्लिम वोट एकमुश्त किसी को शायद ही मिले। जहां तक बसपा के पुख्ता वोट बैंक का सवाल है हमें नहीं लगता कि यह कहीं और जाने वाला है। सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का बहन जी का नारा भले ही अगड़ो के छिटकने की आशंका से इस बार उतनी कामयाब न हो पर दलित और अति पिछड़ी जातियां आज भी उनके साथ हैं। चूंकि मुकाबला बहुकोणीय होगा इसलिए जिसको भी एकमुश्त वोट मिलेगा वही जीत पाएगा पर एक-दो क्षेत्र हैं जहां जरूर बसपा कमजोर पड़ रही है। पहला तो उनकी पार्टी में भारी भ्रष्टाचार है, जिसके चलते मायावती को बहुत से मंत्रियों, सिटिंग विधायकों की टिकटें व कुर्सी काटनी पड़ी है। इससे उन्हें नुकसान हो सकता है। बसपा अपनी सरकार के भ्रष्टाचार को मामूली बताकर मुद्दे को हलका करने की कोशिश में है पर अन्ना के आंदोलन का इतना असर जरूर हुआ है कि आज पूरे देश में एक भ्रष्टाचारी विरोध माहौल बन गया है। बाबा रामदेव भी इस बार यूपी में दबकर पचार करेंगे। इसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ सकता है। कुल मिलाकर बहुजन समाज पार्टी बेशक आज की स्थिति को देखते हुए सरकार अपने बूते पर न बना सके पर इसमें हमें तो कोई संदेह नहीं कि बसपा यूपी विधानसभा चुनाव 2012 में सबसे बड़ा दल बनकर उभरेगी।
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Saturday, 17 December 2011

यूपी में राहुल गांधी ने चला अपना मुस्लिम कार्ड


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18th December 2011
अनिल नरेन्द्र
कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी आजकल उत्तर प्रदेश के दौरे पर हैं। जैसा कि मैंने इसी कॉलम में कुछ दिन पहले लिखा था कि जैसे-जैसे यूपी विधानसभा चुनाव करीब आएंगे सियासी पार्टियां अपने तरकश से सभी जमा तीर चलाएंगी। इनमें मुस्लिम कार्ड भी शामिल है। राहुल गांधी ने मुस्लिम कार्ड चल दिया है। बदायूं में एक सभा में राहुल ने अपना कार्ड चला। राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार पर सच्चर समिति की सिफारिशों पर जानबूझ कर अमल नहीं करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि क्या आपको सच्चर समिति की रिपोर्ट का फायदा मिला? हरियाणा, दिल्ली और महाराष्ट्र जाइए, वहां इस रिपोर्ट पर अमल हो रहा है राहुल ने अपने संबोधन में कहा। प्रदेश के तीन लाख बुनकरों के 50,000 तक के कर्ज की माफी, विधानसभा चुनाव से पहले पिछड़ों के कोटे में मुसलमानों को अलग आरक्षण देने की घोषणा, राहुल गांधी के लखनऊ प्रवास के दौरान दिग्विजय सिंह का सार्वजनिक मंच से आरक्षण में धार्मिक आधार पर भेदभाव खत्म करने की पैरवी करने का वादा करना और एक दिन बाद दिल्ली के मदरसा शिक्षकों की मांगों को लेकर दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में यूपी के कांग्रेसियों की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात। कांग्रेस पार्टी द्वारा पिछले दिनों उठाए गए यह कुछ ऐसे कदम हैं जिससे संकेत मिल रहे हैं कि कांग्रेस अपने और मुसलमानों के बीच रिश्तों की बर्प पिघलाना चाहती है। स्वाभाविक तौर से इस पहल का ज्यादा श्रेय राहुल गांधी की झोली में जाता हुआ दिख रहा है। राहुल गांधी ने दोनों मुलायम सिंह यादव और मायावती के गढ़ों में भी हल्ला बोल दिया है। बुधवार को राहुल गांधी ने समाजवादी पार्टी के गढ़ बदायूं जिले में जन सभाओं में कहा कि मुलायम सिंह यादव अंग्रेजी और कम्प्यूटर पढ़ाई को गैर जरूरी बताते हैं जबकि उनके अपने बेटे अखिलेश यादव को इन दोनों ही चीजों की शिक्षा दी गई है। इस मुस्लिम बहुल इलाके में मतदाताओं की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि हमने सच्चर समिति की सिफारिशों को लागू कर दिया है? क्या आपको इसका लाभ मिला? उत्तर प्रदेश की सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। वह कुछ करना ही नहीं चाहती। यहां बीस साल के दौरान सत्ता में आए लोगों ने दूरदर्शिता नहीं दिखाई। इसका नुकसान यूपी की जनता को हुआ है। उत्तर प्रदेश सरकार पर केंद्र द्वारा विभिन्न विकास योजनाओं के लिए भेजे गए धन के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि राजीव गांधी कहते थे कि सरकार के भेजे गए एक रुपये में सिर्प 15 पैसे ही जनता तक पहुंचते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश में तो एक भी पैसा नहीं पहुंचता। राहुल ने कहा कि लखनऊ में बैठा हाथी पैसा खाता है। यह धन न तो उत्तर प्रदेश सरकार का है और न ही केंद्र का। यह धन प्रदेश की प्रगति में आपके योगदान से आया है। हम वह पैसा प्रदेश की जनता के लिए भेजते हैं, लेकिन वह हाथी खा जाता है। राहुल अपनी तरफ से हर मुस्लिम एंगल को कवर कर रहे हैं। मुसलमानों के सबसे बड़े इदारे ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मुखिया मौलाना रावे हसनी नदवी हैं, राहुल ने उनसे भी हाल के दौरे में मुलाकात की। राहुल से मुलाकात के बाद मौलाना ने कहाöअच्छा लगता है जब मुल्क के लीडर मुल्क के लिए फिक्रमंद दिखते हैं। गरीबों के लिए फिक्रमंद होने का जज्बा होना चाहिए। राहुल के लिए यह मौका जैसा था, अपने को मौलाना के सामने पेश करने का। बोलेö`मैं गरीब-अमीर में फर्प नहीं समझता।' मेरे लिए सब इंसान हैं। मेरी कोशिश है कि मैं हिन्दुस्तान के ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिल सपूं। सच्चर कमेटी से लेकर मुस्लिम आरक्षण तक के मुद्दों पर बातचीत हुई। अपने चिर-परिचित अंदाज में राहुल ने शाहजहानपुर में मायावती सरकार पर जबरदस्त धावा बोला। राहुल ने कहा कि अभी मायावती के हाथी का पेट नहीं भरा। आम जनता का पैसा खा रहा है। यह सब आपका ही पैसा है जो बसपा सरकार के मंत्रियों की तिजोरियों में जमा हो रहा है। उन्होंने बसपा को सबसे भ्रष्ट बताते हुए कहा कि यहां कोई भी काम रिश्वत के बिना नहीं होता। केंद्र से यूपी के लिए कोई भी योजना आती है तो उसका लाभ लेने वालों को रिश्वत देनी पड़ती है। इन्दिरा आवास योजना पाने वाले गरीबों से अधिकारी 10-10 हजार रुपये वसूलते हैं। मनरेगा का हाल भी किसी से छिपा नहीं है। राहुल ने आम जनता से अपील की कि इस बार पांच साल के लिए कांग्रेस को मौका दो क्योंकि कांग्रेस जहां सरकार चलाती है, वहां प्रगति होती है। पहले आपने सपा को चुना कुछ नहीं मिला। बसपा पर भरोसा किया, भ्रष्टाचार और घोटाले मिले। जाति और धर्म के जाल में फंसकर यह 22 सालों में यूपी लूट गई। जैसा मैंने कहा राहुल गांधी सभी पत्ते चल रहे हैं। उनका खास निशाना मुस्लिम मतदाता हैं और उन्हें पटाने के लिए वह सब कुछ कर रहे हैं।
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