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Wednesday, 16 May 2012

एयर इंडिया का भट्ठा बिठाने में प्रफुल्ल पटेल का कितना हाथ?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 16 May 2012
अनिल नरेन्द्र
एयर इंडिया वर्षों से देश व सरकार के लिए सिरदर्द बनी हुई है। आए दिन स्टाफ की हड़ताल से यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। पायलट और स्टाफ अलग परेशान, यात्री अलग परेशान और सरकार अलग परेशान। आखिर कसूरवार कौन है? हल क्या है इस सिरदर्द का, घाटे का। अरबों रुपये का नुकसान हो चुका है और इस अंधेरी सुरंग में कोई लाइट दिखने की उम्मीद नजर नहीं आ रही। सबसे ज्यादा कसूरवार यूपीए की सरकार है। उसके मंत्रियों ने इसे पैसे बनाने की एक मुर्गी बना रखा है। गठबंधन मजबूरियों की दुहाई देकर यूपीए सरकार अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती। अब नागरिक उड्डयन मंत्री अजीत सिंह ने माना है कि एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस के विलय की प्रक्रिया में कहीं कुछ गम्भीर खामी है। इससे जिस तरह के परिणाम की उम्मीद की गई थी वह नहीं मिल सकी है। सिंह ने रविवार को एक टीवी चैनल में इंटरव्यू में कहाöमेरा काम यह देखना है कि मौजूदा स्थिति क्या है? अतीत की गलतियों से सीखते हुए एयर इंडिया सफल हो, इसके प्रयास करने हैं। फिलहाल हमें यह तय करना है कि धर्माधिकार समिति की रिपोर्ट कैसे लागू की जाए। इसमें दोनों कम्पनियों के मानव संसाधन को समन्वित करने जैसी तमाम दिक्कतों पर ध्यान दिया गया है। उधर एयर इंडिया पायलटों से उपजा संकट और गहरा गया है। पायलट अपनी बात पर अड़े हैं और सरकार अपनी बात पर। हमें लगता है कि नागर विमानन मंत्री अजीत सिंह को शायद एयर इंडिया के हड़ताली पायलटों के पीछे पूर्व मंत्री प्रफुल्ल पटेल का खेल समझ आ गया है। हड़ताली पायलटों से निपटने और एयर इंडिया को संकट से उबारने के लिए बुलाई गई पूर्व विमानन मंत्रियों की बैठक से प्रफुल्ल पटेल को बाहर रखा गया। सरकार समझ चुकी है कि अपने कार्यकाल में निजी विमानन कम्पनियों के हित में एयर इंडिया को घाटे में धकेलने वाले पूर्व नागर विमानन मंत्री प्रफुल्ल पटेल अब भी पायलटों की संस्था इंडियन पायलट गिल्ड (आईपीजी) के जरिये खेल कर रहे हैं। गिल्ड का अध्यक्ष और कोई नहीं बल्कि प्रफुल्ल पटेल की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के विधायक जितेन्द्र अहवाड हैं जो पायलटों के काम पर लौटेन की राह में सबसे बड़ी बाधा हैं। बैठक में यह निष्कर्ष निकला कि सरकार पायलटों के समक्ष किसी भी हाल में नहीं झुकेगी। एयर इंडिया से जुड़े आधिकारिक सूत्रों के अनुसार एयर इंडिया के हड़ताली पायलटों से निपटने और एयर इंडिया को संकट से उबारने के लिए वर्तमान विमानन मंत्री चौधरी अजीत सिंह ने शनिवार शाम अपने घर बैठक बुलाई थी। 12 तुगलक रोड स्थित उनके आवास पर शाम करीब चार बजे आयोजित बैठक में पूर्व विमानन मंत्री राजीव प्रताप रूढ़ी, शाहनवाज हुसैन और शरद यादव शामिल हुए थे, लेकिन अजीत सिंह से ठीक पहले और इसी यूपीए सरकार में विमानन मंत्री रहे प्रफुल्ल पटेल इस बैठक में शामिल नहीं थे। उन्हें बुलाया ही नहीं गया। उन्हें यह संकट से उबारने से ज्यादा दिलचस्पी हड़ताल जारी रखने में है। इस सरकार की मजबूरी यह है कि गठबंधन धर्म के चलते यह प्रफुल्ल पटेल सरीखे के गठबंधन साथी से कुछ कहने की स्थिति में ही नहीं।
एयर इंडिया वर्षों से देश व सरकार के लिए सिरदर्द बनी हुई है। आए दिन स्टाफ की हड़ताल से यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। पायलट और स्टाफ अलग परेशान, यात्री अलग परेशान और सरकार अलग परेशान। आखिर कसूरवार कौन है? हल क्या है इस सिरदर्द का, घाटे का। अरबों रुपये का नुकसान हो चुका है और इस अंधेरी सुरंग में कोई लाइट दिखने की उम्मीद नजर नहीं आ रही। सबसे ज्यादा कसूरवार यूपीए की सरकार है। उसके मंत्रियों ने इसे पैसे बनाने की एक मुर्गी बना रखा है। गठबंधन मजबूरियों की दुहाई देकर यूपीए सरकार अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती। अब नागरिक उड्डयन मंत्री अजीत सिंह ने माना है कि एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस के विलय की प्रक्रिया में कहीं कुछ गम्भीर खामी है। इससे जिस तरह के परिणाम की उम्मीद की गई थी वह नहीं मिल सकी है। सिंह ने रविवार को एक टीवी चैनल में इंटरव्यू में कहाöमेरा काम यह देखना है कि मौजूदा स्थिति क्या है? अतीत की गलतियों से सीखते हुए एयर इंडिया सफल हो, इसके प्रयास करने हैं। फिलहाल हमें यह तय करना है कि धर्माधिकार समिति की रिपोर्ट कैसे लागू की जाए। इसमें दोनों कम्पनियों के मानव संसाधन को समन्वित करने जैसी तमाम दिक्कतों पर ध्यान दिया गया है। उधर एयर इंडिया पायलटों से उपजा संकट और गहरा गया है। पायलट अपनी बात पर अड़े हैं और सरकार अपनी बात पर। हमें लगता है कि नागर विमानन मंत्री अजीत सिंह को शायद एयर इंडिया के हड़ताली पायलटों के पीछे पूर्व मंत्री प्रफुल्ल पटेल का खेल समझ आ गया है। हड़ताली पायलटों से निपटने और एयर इंडिया को संकट से उबारने के लिए बुलाई गई पूर्व विमानन मंत्रियों की बैठक से प्रफुल्ल पटेल को बाहर रखा गया। सरकार समझ चुकी है कि अपने कार्यकाल में निजी विमानन कम्पनियों के हित में एयर इंडिया को घाटे में धकेलने वाले पूर्व नागर विमानन मंत्री प्रफुल्ल पटेल अब भी पायलटों की संस्था इंडियन पायलट गिल्ड (आईपीजी) के जरिये खेल कर रहे हैं। गिल्ड का अध्यक्ष और कोई नहीं बल्कि प्रफुल्ल पटेल की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के विधायक जितेन्द्र अहवाड हैं जो पायलटों के काम पर लौटेन की राह में सबसे बड़ी बाधा हैं। बैठक में यह निष्कर्ष निकला कि सरकार पायलटों के समक्ष किसी भी हाल में नहीं झुकेगी। एयर इंडिया से जुड़े आधिकारिक सूत्रों के अनुसार एयर इंडिया के हड़ताली पायलटों से निपटने और एयर इंडिया को संकट से उबारने के लिए वर्तमान विमानन मंत्री चौधरी अजीत सिंह ने शनिवार शाम अपने घर बैठक बुलाई थी। 12 तुगलक रोड स्थित उनके आवास पर शाम करीब चार बजे आयोजित बैठक में पूर्व विमानन मंत्री राजीव प्रताप रूढ़ी, शाहनवाज हुसैन और शरद यादव शामिल हुए थे, लेकिन अजीत सिंह से ठीक पहले और इसी यूपीए सरकार में विमानन मंत्री रहे प्रफुल्ल पटेल इस बैठक में शामिल नहीं थे। उन्हें बुलाया ही नहीं गया। उन्हें यह संकट से उबारने से ज्यादा दिलचस्पी हड़ताल जारी रखने में है। इस सरकार की मजबूरी यह है कि गठबंधन धर्म के चलते यह प्रफुल्ल पटेल सरीखे के गठबंधन साथी से कुछ कहने की स्थिति में ही नहीं।
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Sunday, 25 March 2012

क्या कहती है यूपी की हार पर कांग्रेस की गोपनीय रिपोर्ट?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25 March 2012
अनिल नरेन्द्र
हाल ही में खत्म हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार पार्टी नेतृत्व पचा नहीं पा रहा है। बावजूद कड़ी मशक्कत के पार्टी को करारी हार का मुंह देखना पड़ा। पार्टी को सबसे ज्यादा चिन्ता सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र और युवराज राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र में हार की है। इस हार के कारणों को जानने के लिए पार्टी ने कई रिपोर्टें तैयार कराई हैं। राहुल गांधी के करिश्मे का फायदा न मिल पाने के लिए जहां कांग्रेस नेतृत्व कमजोर संगठन, गलत टिकटों का बंटवारा बता रहा है वहीं हकीकत कुछ और ही उभरकर आ रही है। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी की अगुवाई में सेंट्रल इलेक्शन कमेटी के लिए बनी एक विशेष रिपोर्ट में कहा गया है कि पार्टी के युवराज राहुल गांधी की मंडली भी हार के लिए जिम्मेदार है। इसमें कहा गया है कि एक-दूसरे से बेहद ईर्ष्या करने वाले लोगों के छोटे लेकिन प्रभावशाली गुट और राजनीतिक दमखम की कमी वाले उम्मीदवारों को टिकट दिए जाने से चुनाव के नतीजे पार्टी के लिए निराश करने वाले रहे। रिपोर्ट में कहा गया है कि जातिवाद और वरिष्ठ नेताओं के अहंकार को भी हार का कारण माना गया है जिसकी वजह से जमीनी कार्यकर्ता चुनाव में पूरी ताकत लगाने के बजाय तटस्थ रहा। कांग्रेस की इस हार की `पोस्टमार्ट्म' की इस पहली रिपोर्ट में सूबे के 33 सीटों पर फोकस किया गया है। इन सभी सीटों पर कांग्रेस का प्रदर्शन खराब रहा है, जहां राहुल के करीबियों ने दखल देकर अपनी मर्जी के उम्मीदवारों को टिकट दिलाए थे। इन सभी सीटों पर कांग्रेस के पर्यवेक्षकों द्वारा चुने गए उम्मीदवारों और स्थानीय कार्यकर्ताओं की अनदेखी की गई। फिरोजाबाद में सिरसागंज सीट का उदाहरण सामने है जहां कांग्रेस उम्मीदवार हरिशंकर यादव महज 4224 वोट लेकर पांचवें स्थान पर रहे। पर्यवेक्षकों और स्थानीय कार्यकर्ताओं की पहली पसंद ठाकुर दलबीर सिंह तोमर थीं। राहुल ने विशेष जोर देकर यादव को टिकट दिलवाया। इसी तरह एटा जिले में अलीगंज सीट पर पार्टी के उम्मीदवार रज्जन पाल सिंह 8160 मतों के साथ पांचवें स्थान पर रहे। इस सीट पर पार्टी के आब्जर्वर ने बिजनेसमैन सुभाष वर्मा को टिकट की वकालत की थी। लोध राजपूत से ताल्लुक रखने वाले वर्मा जिला पंचायत के सदस्य भी हैं। वे इस विधानसभा क्षेत्र में लोध समुदाय के एकमात्र उम्मीदवार थे, जो 27,000 लोध वोटरों के अधिकतर वोट हासिल कर सकते थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं की उपेक्षा से उन्होंने पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ ही काम किया और उसे हरवाने में जुट गए। प्रदेश के एक मुस्लिम सांसद ने कहा कि जो रिपोर्टें अब मिल रही हैं हम लोगों को तो पहले से ही पता था। इस बारे में राहुल गांधी को भी सचेत किया गया था लेकिन उन्होंने इस ओर ध्यान नहीं दिया। मुस्लिम नेता के रूप में केवल सलमान खुर्शीद को आगे बढ़ाया गया जबकि मुस्लिम उन्हें अपना नेता मानते ही नहीं हैं। इसी तरह राहुल गांधी ने समाजवादी पार्टी से आए रशीद मसूद और बेनी प्रसाद वर्मा को अहमियत दी जबकि यह लोग दूसरे दलों से आए थे और इसी वजह से कांग्रेस कार्यकर्ता इस चुनाव में दूर रहा। प्रदेश के कई सांसद और नेता यह चाहते हैं कि हार के जिम्मेदार लोगों को सजा दी जाए जिन लोगों को इस चुनाव में अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यकों वाली सीटों को जीतने के लिए लगाया गया था, उन पर गाज गिरनी चाहिए।
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Thursday, 29 December 2011

मायावती को राइट ऑफ करना भारी भूल होगी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 29th December 2011
अनिल नरेन्द्र
उत्तर पदेश विधानसभा चुनाव तिथियों की घोषणा से यूपी की तमाम विपक्षी पार्टियों में उत्साह आ गया है। सब अपनी-अपनी हांकने में लग गए हैं। सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी को तो उन्होंने मान लिया है कि वह आगामी चुनाव में मुंह की खाएगी। पर हमें नहीं लगता कि मायावती को एक समाप्त फोर्स मानकर चलना समझदारी होगी। अनुमान भले ही मायावती सरकार के बारे में व्यवस्था विरोधी माहौल के लगाए जा रहे हों पर धरातल पर बसपा उतनी कमजोर नहीं है, जितनी उसे कांग्रेस, सपा और भाजपा मानकर चल रही हैं। मायावती ने अपनी चुनावी तैयारियां एक साल पहले से ही शुरू कर दी थीं। सूबे के सभी 403 सीटों पर बसपा ने अपने उम्मीदवार डेढ़ साल पहले ही तय कर दिए थे। यह अलग बात है कि बहन जी ने इनमें से कुछ को बाद में बदला है। पर कांग्रेस, सपा और भाजपा को तो अपने उम्मीदवार फाइनल करने में भी भारी दिक्कतें आ रही हैं और इनमें विद्रोह की स्थिति बनी हुई है। यह सही है कि बहन जी इस बार मतदाताओं के सामने अपनी किसी विफलता का कोई बहाना नहीं बना पाएंगी। चमत्कार करते हुए मतदाताओं ने 2007 के चुनाव में बसपा को 206 सीटें देकर स्पष्ट बहुमत दिया था। इसी के दम पर मायावती सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया। जबकि उनसे पहले की तीन सरकारें न केवल अपना कार्यकाल ही पूरा कर पाईं बल्कि वे भाजपा के समर्थन पर टिकी थीं। इस बार मायावती को पूरे पांच साल तक काम करने की खुली इजाजत मिली हुई थी। इसलिए वे मतदाताओं से अपने काम के आधार पर ही एक और मौका पाने की अपील करेंगी। जहां तक कांग्रेस का सवाल है बेशक राहुल गांधी अपना मिशन 2012 के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं, यूपी सियासत को समझने वालों का कहना है कि कांग्रेस की ज्यादा स्थिति हवाई है। 2009 के लोकसभा चुनाव में 21 सीटों पर जीत मिल जाने से कांग्रेस यह खुशफहमी पाल बैठी है कि यूपी के मतदाता उसे 1989 से पहले की मजबूत जनाधार वाली स्थिति में पहुंचा देंगे। पर कांग्रेस इस तथ्य को नजरअन्दाज कैसे कर सकती है कि 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद जितनी भी विधानसभा बाई इलेक्शन हुई हैं कांग्रेस एक सीट भी नहीं जीत सकी। कहीं दूसरे नंबर पर रही तो कहीं तीसरे नंबर पर। शायद यह जानते हुए कि पार्टी ने अजीत सिंह के आगे घुटने टेकते हुए उनसे चुनावी तालमेल किया है। यह जानते हुए भी इस गठबंधन से अजीत सिंह की पार्टी को ज्यादा फायदा होगा। कांग्रेस की स्थिति तो वहीं की वहीं रहने की संभावना है। मायावती सुनियोजित रणनीति के तहत लगातार कांग्रेस पर ही वार कर रही हैं। दरअसल वह चाहती हैं कि मतदाता को लगे कि मुकाबला बस बसपा और कांग्रेस के बीच ही है। भाजपा और सपा दोनों की जानबूझकर मायावती अनदेखी कर रही हैं। यह जानते हुए कि असल टक्कर बसपा और सपा के बीच होगी। पिछले चुनाव में बसपा को 206, सपा को 91, भाजपा को 51, कांग्रेस को 22 और रालोद को दस सीटें मिली थीं। मुलायम को कमजोर करने के लिए मायावती इस रणनीति पर चल रही हैं कि मुसलमान वोट एकमुश्त किसी को न मिले। सपा से टूटकर यह या तो उनके साथ आए या फिर कांग्रेस के साथ चला जाए। वैसे इस बार पीस पार्टी भी पूरे जोरों के साथ मैदान में उतर रही है और निश्चित रूप से वह मुसलमान वोट काटेगी। इसलिए यह कहा जा सकता है कि इस बार मुस्लिम वोट एकमुश्त किसी को शायद ही मिले। जहां तक बसपा के पुख्ता वोट बैंक का सवाल है हमें नहीं लगता कि यह कहीं और जाने वाला है। सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का बहन जी का नारा भले ही अगड़ो के छिटकने की आशंका से इस बार उतनी कामयाब न हो पर दलित और अति पिछड़ी जातियां आज भी उनके साथ हैं। चूंकि मुकाबला बहुकोणीय होगा इसलिए जिसको भी एकमुश्त वोट मिलेगा वही जीत पाएगा पर एक-दो क्षेत्र हैं जहां जरूर बसपा कमजोर पड़ रही है। पहला तो उनकी पार्टी में भारी भ्रष्टाचार है, जिसके चलते मायावती को बहुत से मंत्रियों, सिटिंग विधायकों की टिकटें व कुर्सी काटनी पड़ी है। इससे उन्हें नुकसान हो सकता है। बसपा अपनी सरकार के भ्रष्टाचार को मामूली बताकर मुद्दे को हलका करने की कोशिश में है पर अन्ना के आंदोलन का इतना असर जरूर हुआ है कि आज पूरे देश में एक भ्रष्टाचारी विरोध माहौल बन गया है। बाबा रामदेव भी इस बार यूपी में दबकर पचार करेंगे। इसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ सकता है। कुल मिलाकर बहुजन समाज पार्टी बेशक आज की स्थिति को देखते हुए सरकार अपने बूते पर न बना सके पर इसमें हमें तो कोई संदेह नहीं कि बसपा यूपी विधानसभा चुनाव 2012 में सबसे बड़ा दल बनकर उभरेगी।
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Wednesday, 21 December 2011

अजीत सिंह यूपी में कांग्रेस की ताकत बढ़ाएंगे


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21st December 2011
अनिल नरेन्द्र
राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजीत िसह ने इस बार भी रविवार को ही केंद्रीय मंत्री के रूप में शपथ ली। संयोग है कि वे चौथी बार केंद्र में मंत्री बने हैं और हर बार उनकी शपथ रविवार को ही हुई। राष्ट्रपति भवन में एक संक्षिप्त और सादे समारोह में राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। अजीत सिंह के लोकसभा में पांच सदस्य हैं। मनमोहन सिंह सरकार का यह तीसरा मंत्रिमंडल फेरबदल था। 73 वर्षीय अजीत सिंह केंद्रीय मंत्रिमंडल के 33वें कैबिनेट मंत्री हैं। इस अवसर पर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की मौजूदगी महत्वपूर्ण थी। क्योंकि उनकी पहल पर ही रालोद और कांग्रेस के बीच अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव को मिलकर लड़ने का समझौता परवान चढ़ा है। अजीत िसह के यूपीए में आने से यूपीए की संख्या लोकसभा में 272 से बढ़कर 277 हो गई है। अजीत िसह को यूपीए में शामिल करके राहुल गांधी खासे आत्मविश्वास से भर गए हैं। मंत्रिमंडल के इस संक्षिप्त विस्तार के बाद कांग्रेस उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों की करीब 140 विधानसभा सीटों पर खुद को ज्यादा मजबूत मान रही है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के अपने दूसरे सम्पर्प अभियान से लौटे राहुल गांधी समारोह में अजीत के बेटे जयंत से काफी देर बतियाते रहे। राहुल और जयंत एक साथ ही बैठे। बाद में चाय-पान के दौरान भी राहुल ने अजीत सिंह का हाथ पकड़कर उन्हें बधाई दी। पत्रकारों द्वारा राहुल से उत्तर प्रदेश के दौरे के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि उनका दौरा सफल रहा और खासकर कानपुर में उनकी रैली में सबसे ज्यादा भीड़ जुटी, जहां मायावती का वोट बैंक अति पिछड़े वर्ग के लोग भारी संख्या में आए। लेकिन जब राहुल से फर्रुखाबाद की जनसभा में खुदरा व्यापार में एफडीआई लाने की उनकी घोषणा के बारे में पूछा गया तो वह यह कहते हुए चले गए कि अभी इस मुद्दे पर वह ज्यादा बात नहीं करेंगे। अजीत सिंह भी मानते हैं कि रालोद-कांग्रेस गठबंधन से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की तस्वीर बदल जाएगी। कांग्रेस का यूपी चुनावों को लेकर उत्साह का एक कारण और भी है। स्टार न्यूज और एसी नीलसन ने हाल ही में एक चुनाव सर्वेक्षण किया है। यह सर्वेक्षण चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश के लोगों का मन भांपने के लिए नवम्बर-दिसम्बर के महीने में किया गया था। सर्वेक्षण के मुताबिक सत्तारूढ़ बसपा की हालत पतली है। उन्हें 120 सीटें ही मिल सकती हैं जबकि पिछली बार बसपा को 206 सीटें मिली थीं। सबसे ज्यादा फायदा समाजवादी पार्टी को होता दिख रहा है। सपा की सीटें 97 से बढ़कर 135 तक पहुंच सकती हैं। चुनाव में सबसे ज्यादा वोट प्रतिशत कांग्रेस के बढ़ने का अनुमान है। कांग्रेस को 17 फीसदी वोट और 68 सीटें मिल सकती हैं। वर्ष 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 8.6 प्रतिशत वोट सहित 22 सीटें ही मिली थीं। कांग्रेस-रालोद गठबंधन के बाद तो यह आंकड़ा (कांग्रेस 70 और रालोद 15) सीटों तक पहुंच सकता है। भाजपा की सीट और वोट प्रतिशत में भी इजाफा होने की संभावना है। भाजपा को 5 प्रतिशत वोट की बढ़ोतरी के साथ 65 सीटें मिल सकती हैं। अभी चुनाव में समय है और यूपी की सियासत चरमसीमा पर है। दावे से अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है। चुनाव आते-आते तस्वीर बदल भी सकती है पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि राहुल गांधी की कड़ी मेहनत से कांग्रेस को प्रदेश में फायदा जरूर हो रहा है।
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Tuesday, 13 December 2011

कांग्रेस-रालोद गठबंधन उत्तर प्रदेश में गुल खिला सकता है

 
Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13th December 2011
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश के 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में अकेले दम पर लड़कर अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन खिसका चुके कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल आखिरकार इस बार 2012 के विधानसभा चुनाव में एक साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे। शनिवार को रालोद अध्यक्ष की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात करने से अब इस गठबंधन की पुष्टि हो गई है। दोनों दलों के गठबंधन पर औपचारिक मोहर लग गई। राज्य में अपना खोया जनाधार वापस लौटाने में जुटी कांग्रेस, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जाट बैल्ट में अजीत सिंह का साथ मिलने के बाद उन्हें केंद्र में मंत्री बनाने को तैयार हो गई है। सूत्रों के अनुसार गठबंधन में रालोद 48 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। पहले रालोद 80 सीटों की मांग कर रहा था। समझौते के तहत पिछले चुनाव में जिन सीटों पर जिस दल के उम्मीदवार जीते थे वह सीट उसके कोटे में रहेगी। कांग्रेस-रालोद के चुनावी गठबंधन होने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरण बदलना तय माना जा रहा है। दिग्गज नेताओं के साथ कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की मौजूदगी में यह खबर पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए उत्साह बढ़ाने वाली थी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह गठबंधन नया गुल खिला सकता है। समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता रशीद मसूद का पाला बदल कांग्रेस की तरफ आना इस गठबंधन को और ताकत दे सकता है। रालोद का दावा है कि पार्टी का असर आगरा, अलीगढ़, मेरठ, सहारनपुर और मुरादाबाद मंडल की 136 सीटों पर है इसलिए यह गठबंधन आगामी विधानसभा चुनाव में कारगर साबित होगा। रालोद के प्रवक्ता ने तो यहां तक कह दिया कि कांग्रेस-रालोद गठबंधन उत्तर प्रदेश में सरकार बनाएगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो प्रवक्ता का कहना था कि सपा और बसपा दोनों साफ हो जाएंगे। कहा जा रहा है कि जाट वोट जल्दी से किसी अन्य दल को ट्रांसफर नहीं होता। लेकिन रालोद के समर्थन से कांग्रेस को जाट बैल्ट में काफी फायदा हो सकता है। मुस्लिम आरक्षण के बाद इसमें और इजाफा होगा। अगर मुस्लिम और जाट दोनों ही कांग्रेस को वोट देते हैं या यूं कहें कि बसपा, सपा के खिलाफ वोट डालते हैं तो निश्चित रूप से यह कांग्रेस को फायदा पहुंचाएगा। उत्तर प्रदेश की दो छोर वाली राजनीति को कांग्रेस ने इस गठबंधन का नया मोड़ दिया है। पिछले लोकसभा चुनाव में वह इस वर्चस्व को पहले ही तोड़ चुकी है जिसमें बसपा हाफ हो गई थी। इसलिए कांग्रेस को नई रणनीति के आधार पर कमजोर अब नहीं माना जा सकता। अभी मुसलमानों के आरक्षण का ब्रह्मास्त्र कांग्रेस के पास बचा है जो जल्द सामने आ सकता है। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं सांसद राहुल गांधी ने शनिवार को लखनऊ में कहा कि प्रदेश के कार्यकर्ता क्षमतावाद और ऊर्जावान हैं। अगर 2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी पूरे दम-खम से जुट जाए तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को सरकार बनाने से कोई नहीं रोक सकता। दो दिवसीय दौरे पर राजधानी लखनऊ पहुंचने पर शनिवार को यहां प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में राहुल ने प्रदेश कांग्रेस के सदस्यों, जिला एवं शहर अध्यक्षों को सम्बोधित करते हुए कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनाने की भरपूर क्षमता है, जरूरत सिर्प इस बात की है कि कार्यकर्ता पूरे मनोयोग से आने वाले विधानसभा चुनाव में जुट जाएं। उन्होंने कहा कि 1991 से 2009 तक कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में पूरे मनोयोग से चुनाव नहीं लड़ा। इसलिए लगभग दो दशकों तक गैर कांग्रेसी सरकारें सत्ता पर काबिज रहीं। सही मायने में कांग्रेस पार्टी 2012 में चुनाव लड़ने जा रही है। पिछले दो दशकों में उत्तर प्रदेश की सत्ता पर सपा, बसपा और भाजपा की गैर कांग्रेसी सरकारें सत्ता पर काबिज रहीं। इनके कार्यकाल में उत्तर प्रदेश बुरी तरह पिछड़ गया। राहुल ने कहा कि गैर कांग्रेसी सरकारों से प्रदेश की जनता बुरी तरह ऊब चुकी है और अब प्रदेश में बदलाव का माहौल भी तैयार है। लोग चाहते हैं कि कांग्रेस की सरकार सत्ता में आए।
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