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Tuesday, 24 April 2012

भाजपा में सत्ता की तीन धुरियां

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24 April 2012
अनिल नरेन्द्र
भारतीय जनता पार्टी में नगर निगम चुनाव जीतने के बाद एक नया उत्साह है। उन्हें लगता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी बाजी मार सकती है पर सबसे बड़ी कमी जो उभर कर आ रही है वह है क्लीयर नेतृत्व का अभाव। यह किसी से छिपा नहीं कि पार्टी के एक बड़े धड़े खासकर सांसदों के मन में एक सवाल बार-बार कौंध रहा था कि आखिर यूपीए-2 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटालों के मुद्दे पर घिरी रही। लेकिन सरकार की विफलता का भाजपा को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। इसके चलते केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल को भुनाने के लिए पार्टी को लोकसभा चुनाव पूर्व अपना पीएम उम्मीदवार घोषित करने की दरकार है। इस समय यह स्थिति है कि भाजपा तीन धुरियों पर चल रही है। सबसे पहले हैं श्री नितिन गडकरी जो पार्टी अध्यक्ष हैं और उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन है। दूसरी तरफ हैं डी-4 नेता। इनमें आडवाणी जी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली प्रमुख हैं। तीसरी धुरी नरेन्द्र मोदी हैं जो अपने आपको पार्टी से ऊपर मानते हैं और प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार मानते हैं। इन तीनों धुरियों में सभी नेता अपनी-अपनी दिशा में चल रहे हैं। नितिन गडकरी के एक तरफ नरेन्द्र मोदी से मतभेद हैं वहीं दूसरी ओर 5-4 से अकसर खींचतान होती रहती है। ताजा उदाहरण सुरेन्द्र सिंह आहलूवालिया का पहले राज्यसभा से टिकट काटना और फिर जब डी-4 ने जोरदार विरोध किया तो उन्हें फिर से उम्मीदवार घोषित करना। कई माह से गडकरी और नरेन्द्र मोदी के बीच बातचीत तक नहीं हो रही है। संवादहीनता की इस स्थिति को गडकरी ने खुद स्वीकारा है। सवाल यह भी किया जा रहा है कि गडकरी ने मोदी से संवादहीनता की बात सार्वजनिक रूप से क्यों कही? यह बात किसी से छिपी नहीं कि नरेन्द्र मोदी भाजपा के पूर्व संगठन महासचिव संजय जोशी को पुन भाजपा में सक्रिय किए जाने के फैसले से नाराज हैं। गडकरी ने संजय जोशी को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में खासा महत्व दिया। इसी के बाद दोनों में `कुट्टी' हो गई। रहा सवाल भाजपा की ओर से कौन होगा पीएम उम्मीदवार तो भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू ने गुरुवार को हैदराबाद में कहा कि अगले आम चुनाव से पहले पार्टी अपना प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित कर देगी। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले हम अपना उम्मीदवार घोषित करेंगे, अभी हम अपना उम्मीदवार बताने की स्थिति में नहीं हैं। उधर नरेन्द्र मोदी ने केंद्रीय राजनीति में आने के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं। पिछले दिनों प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र के विरोध में सारे मुख्यमंत्री दिल्ली में एकत्र हुए थे। मोदी ने विशेष रूप से तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और बीजू जनता दल प्रमुख और उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के साथ बैठक की। हालांकि ऊपरी स्तर पर तो यह बैठक केंद्र सरकार के प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र को लेकर थी पर अन्दर खाते 2014 लोकसभा चुनावों पर भी चर्चा हुई होगी। मोदी ने अपने आपको पीएम उम्मीदवार दर्शाने की चालें चलनी शुरू कर दी हैं। आने वाले दिनों में यह अंतर्पलह और तेज होना स्वाभाविक है।
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Sunday, 22 April 2012

रामसेतु मुद्दे पर फिर सामने आया संप्रग सरकार का हिन्दू विरोधी चेहरा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22 April 2012
अनिल नरेन्द्र
यह बहुत दुख की बात है कि मनमोहन सिंह की संप्रग सरकार ने करोड़ों
हिन्दुओं की आस्था से जुड़ा रामसेतु-सेतु समुद्रम केस में अपना स्टैंड स्पष्ट नहीं किया। केंद्र सरकार ने बृहस्पतिवार को रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने के मसले पर अपना पक्ष रखने से इंकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट से ही इस मामले पर फैसला सुनाने की अपील की। केंद्र की ओर से पक्ष नहीं रखे जाने पर अदालत ने इस मुद्दे पर अगस्त में अंतिम सुनवाई करने का निर्णय लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी के आवेदन पर सरकार से जवाब-तलब किया था, लेकिन सरकार ने जवाब देने से इंकार कर यह साफ कर दिया कि वह हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं से जुड़े इस ज्वलंत मुद्दे से दूर रहना चाहती है। पीठ के समक्ष एडिशनल सालिसिटर जनरल हरेन रावल ने कहा कि गहन विचार-विमर्श के बाद सरकार इस नतीजे पर पहुंची है कि रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने के मसले पर वह कोई पक्ष नहीं रखना चाहती। उन्होंने कहा कि सरकार अपने 2008 में दाखिल किए गए जवाब पर कायम है, जिसमें कहा गया था कि वह सभी धर्मों का सम्मान करती है, लेकिन धार्मिक विश्वास के मसले पर उसे जवाब नहीं देना चाहिए। पीठ जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी की ओर से दायर इस आवेदन पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें पौराणिक धरोहर रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने की मांग की गई थी। शीर्षस्थ अदालत की ओर से इस मसले पर सरकार को 29 मार्च को पहले भी दो सप्ताह का समय दिया जा चुका है। केंद्र ने कहा कि वह कोई पक्ष नहीं पेश करना चाहता। ऐसे में अदालत इस मसले पर निर्णय ले। इस पर पीठ ने कहा कि यदि सरकार हलफनामा नहीं दाखिल करना चाहती तो अदालत दलीलें पेश करने की प्रक्रिया की ओर रुख करेगी।
यह बहुत दुख की बात है कि संप्रग की यह सरकार करोड़ों हिन्दुओं की भावनाओं को दरकिनार करने का साहस दिखा रही है। करोड़ों हिन्दुओं में यह मान्यता है कि यह सेतु हनुमान जी ने भगवान श्रीराम को लंका पहुंचाने के लिए बनाया था। यह सेतु आज भी साफ नजर आता है। दुखद पहलू यह है कि रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने में किसी और धर्म के किसी समुदाय को कोई एतराज नहीं। यहां तक कि देश के करोड़ों मुसलमान, सिख, ईसाई भी इसका समर्थन करते हैं। रामायण सभी का पूज्य ग्रंथ है। हां विरोध कर रही है तो द्रमुक पार्टी कर रही है। रावण वंश के ये लोग इस सेतु को तोड़कर रास्ता बनाना चाहते हैं। इसके पीछे उनकी क्या नीयत है यह किसी से छिपा नहीं। उससे भी ज्यादा दुखद बात यह है कि अपने आपको हिन्दू पार्टी कहने वाली भारतीय जनता पार्टी ने भी वोटों की खातिर डॉ. स्वामी का कभी खुलकर समर्थन नहीं किया। हां विश्व हिन्दू परिषद ने जरूर समर्थन किया है। विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण भाई तोगड़िया ने कहा कि केंद्र सरकार ने सेतु समुद्रम परियोजना को समाप्त करने का हलफनामा न देकर एक बार फिर हिन्दू विरोधी मानस का परिचय दिया है। अपनी-अपनी मान्यता है, श्री हनुमान द्वारा बनाए गए इस सेतु को कोई नहीं तोड़ सकता। जय श्री हनुमान, जय श्री राम।

Thursday, 9 February 2012

शशिकला ने रची जयललिता का तख्ता पलट की साजिश

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9th February  2012
अनिल नरेन्द्र
सत्ता का नशा बड़ी बुरी चीज है। एक बार इसका चस्का लग जाए तो न तो रिश्तेदारी आड़े आती है और न ही दोस्ती। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और शशिकला की दोस्ती की कहानी पिछले 25 सालों से सियासत के गलियारों में सुनाई जाती रही है लेकिन अचानक खबर आई कि जयललिता ने न सिर्प शशिकला बल्कि उसके सारे रिश्तेदारों को अपने घर से निकाल दिया है। आखिर दोनों सहेलियों के बीच ऐसा क्या हुआ कि कभी शशिकला के पुत्र की शादी पर करोड़ों खर्च करने वाली जयललिता ने ऐसा सख्त कदम उठाया? `तहलका' मैगजीन ने दावा किया है कि शशिकला ने न सिर्प जयललिता के चारों ओर अपने आदमी बिठा रखे थे और सरकार के हर फैसले में दखल दे रही थी बल्कि जयललिता को धीमा जहर देकर तमिलनाडु का ताज पाने की साजिश रची थी। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा की कर्नाटक सरकार ने जयललिता को समय रहते आगाह कर उन्हें बचा लिया। जयललिता को जहर देने का काम शशिकला अपनी खास नर्स की मदद से अंजाम दे रही थी। मोदी के बताने पर ही जयललिता ने शशिकला और उनके रिश्तेदारों की निगरानी कराई और अन्त में 17 दिसम्बर को शशिकला व उनके रिश्तेदारों समेत 12 लोगों को पार्टी से निकाल दिया। तहलका के अनुसार मोदी द्वारा आगाह किए जाने के बाद जयललिता ने `मन्नरगुडी माफिया' की हरकतों पर गौर करना शुरू किया। मन्नरगुडी तिरुवरुर जिले का एक कस्बा है और शशिकला यहीं की है। तमिलनाडु में शशिकला और उनके परिजनों को `मन्नरगुडी माफिया' के नाम से जाना जाता है। मन्नरगुडी माफिया जयललिता का तख्ता पलट करने की साजिश रच रहा था। वह जयललिता की बेंगलुरु में चल रहे आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में पेशियों से उपजे हालात का लाभ उठाना चाहता था। मोदी ने जयललिता को बताया कि शशिकला और उनके परिवार की नाजायज मांगों की वजह से बड़े निवेशक तमिलनाडु में निवेश करने से हिचक रहे हैं। एक एनआरआई तमिलनाडु में निवेश करने आया था, लेकिन जब उससे मन्नरगुडी माफिया ने 75 फीसदी हिस्सा मांगा तो उसने गुजरात का रुख कर लिया। मोदी ने यह बात तत्काल जया को बताई। ऐसे ही एक दो और किस्से भी सामने आए। तहलका के मुताबिक जयललिता को यह खुफिया जानकारी भी मिली कि सालों से जो दवाइयां ले रही थी उनमें धीमा जहर मिला हुआ था। शक घहराने के बाद अचानक जयललिता बिना शशिकला को कुछ बताए शहर के एक नामी डाक्टर से मिलने चली गई। साथ में उन दवाइयों को भी ले गई जिन्हें वह रोज खाती थी। इस डाक्टर ने जयललिता और उन्हें दी जा रही दवाइयों की जांच की तो पता चला कि दवाइयों में धीमा जहर मिला हुआ है। मुख्यमंत्री की देखभाल के लिए चुनी गई नर्स शशिकला ने ही चुनी थी। अब चर्चा तो यहां तक है कि जयललिता की देखभाल गुजरात से भेजी गई नर्स करती है। इसके बाद जयललिता ने शशिकला और उनके सभी रिश्तेदारों को निकाल बाहर किया। 40 से ज्यादा उन नौकरों की फौज को भी हटा दिया जिन्हें शशिकला 1989 में अपने गांव मन्नरगुडी से विशेष तौर पर लेकर आई थी। जयललिता का यह कदम इसलिए भी चौंकाने वाला था क्योंकि पिछले 25 सालों से शशिकला की मर्जी के बिना जयललिता कोई कदम नहीं उठाती थी पर सत्ता के मोह के सामने 25 साल की दोस्ती व अहसान सब पीछे रह गए और शशिकला ने जयललिता की पीठ पर छुरा घोंपने और यहां तक कि उन्हें मारने तक की साजिश रच डाली।
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Thursday, 23 June 2011

अभी कुछ महीने और तिहाड़ में ही रहेंगी कनिमोझी


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23nd June 2011
अनिल नरेन्द्र
`सॉरी मैडम वी हैव ट्राइड ऑवर बैस्ट।' सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में कनिमोझी के वकीलों ने जब ये शब्द कहे तो दो माह पूर्व तक तमिलनाडु के वीवीआईपी का दर्जा रखने वाली कनि की मां रजती अम्मल फूट-फूट कर रोने लगी। उन्हें बहुत उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट से कनिमोझी को जमानत मिल जाएगी। रुआंसी और आंसू पोंछती रजती ने उन्हें कोई जवाब नहीं दिया। बस हाथ जोड़कर सिर हिलाया और आगे बढ़ गई। थके मुकदमे में बालू भी उनके पीछे चल दिए। बालू ने ढाई घंटे चली पूरी कार्रवाई खड़े होकर ही सुनी थी। रजती पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि की तीसरी पत्नी हैं, कनिमोझी (43) उनकी इकलौती संतान है। पहली पत्नी की मृत्यु के बाद करुणानिधि ने दयालु अम्मा से विवाह किया। दयालु कलैग्नार टीवी में 60 फीसदी शेयर की मालिक है। रजती काफी दिनों तक करुणानिधि के साथ ऐसे ही रहती रही। करुणानिधि ने उनके साथ कभी विधिवत विवाह नहीं किया। उन्हें पत्नी भी 10-12 साल पहले तब माना था जब चुनाव में उन्होंने अपनी आय का शपथ पत्र दायर किया और उसमें अम्मा के नाम कुछ सम्पत्ति दिखाई। लोगों ने जब पूछा कि रजती कौन है तब उन्होंने कहा कि वह उनकी पत्नी है।
2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में अभियुक्त द्रमुक सांसद कनिमोझी को सुप्रीम कोर्ट आना महंगा पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका ही खारिज नहीं की बल्कि भविष्य में जमानत देने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। कनिमोझी अब जमानत के लिए तब ही आवेदन कर पाएगी जब उनके खिलाफ निचली अदालत में आरोप तय हो जाएंगे। आरोप तय होने में तीन माह का समय लग सकता है, लेकिन सुनवाई अदालत सिर्प इस केस के लिए बनी है इसलिए हो सकता है कि यह अवधि कुछ दिन कम हो जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कनि की यह दलील अस्वीकार कर दी कि उन्हें धारा 437 के तहत जमानत दी जाए। कोर्ट ने कहा कि आपमें क्या खास बात है, आपकी तरह सैकड़ों विचाराधीन महिला कैदी जेल में हैं और बच्चों से दूर हैं। कनिमोझी 20 मई से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बन्द है। जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस बीएस चौहान की खंडपीठ ने यह फैसला जमानत का विरोध कर रही सीबीआई और कनिमोझी के वकीलों की डेढ़ घंटा बहस सुनने के बाद दिया। जमानत खारिज करने का दो लाइन का फैसला सुनकर कनि के वकीलों का चेहरा फक रह गया। कनिमोझी के वकीलों ने बहुत कोशिश की कि जमानत किसी भी हालत में हो जाए। उन्होंने यहां तक कह दिया कि वह कोर्ट की कठोर से कठोर शर्तें मानने को तैयार हैं। यदि सीबीआई को डर है कि अपने राजनैतिक रसूख से गवाहों और जांच को प्रभावित कर सकती है तो उन्हें उनके घर में नजरबन्द भी रखा जा सकता है। कनिमोझी के वकीलों का तो यहां तक कहना था कि अमेरिका की तरह यहां पैरों में रेडियो एंकलेट तो नहीं लगाए जाते, लेकिन उनके घर में 24 घंटे पहरेदारी तथा इलैक्ट्रॉनिक निगरानी (कैमरे तथा वायरलेस) रखी जा सकती है पर कोर्ट ने उनकी कोई दलील नहीं मानी। बस इतनी छूट जरूर दी कि अदालत ने कहा कनिमोझी आरोप तय होने के बाद मामले की सुनवाई कर रही कोर्ट से नियमित जमानत मांग सकती हैं। वहां मामले को नए सिरे से सुना जाएगा।
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Tuesday, 7 June 2011

जयललिता का मारन बंधुओं व करुणानिधि को पहला तोहफा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th June 2011
अनिल नरेन्द्र

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने सत्ता संभालते ही एम. करुणानिधि और उनके कुनबे को तोहफा दे दिया है। जया सरकार ने शुकवार को अपने पतिद्वंद्वी करुणानिधि के जन्मदिन पर उनकी सरकार द्वारा शुरू की गई कई महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को बंद कर दिया। ये परियोजनाएं आवास एवं बीमा क्षेत्रों से जुड़ी थी। इसके साथ ही सरकार ने यहां बन रहे विधानसभा और मंत्रालय काम्पलैक्स के निर्माण के घोटालों के आरोप लगाते हुए उसकी जांच कराने की घोषणा की है। बात यहीं खत्म नहीं हुई। द्रमुक से जुड़े मारन बंधुओं पर निशाना साधते हुए जया सरकार ने राज्य के करोड़ों रुपए के केबल व्यवसाय का राष्ट्रीयकरण करने की घोषणा कर दी है। विधानसभा के नए सत्र को संबोधित करते हुए राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला ने ये घोषणाएं शुकवार को की।
मारन साम्राज्य का सूरज कभी डूब नहीं सकता' कुछ इस पकार की बातें कारोबारी जगत के आला अधिकारी, कलानिधि मारन और उनके छोटे भाई मौजूदा कपड़ा मंत्री दयानिधि मारन के स्वामित्व वाले सन ग्रुप के बारे में कहते रहे हैं। लेकिन बीते तीन दिनों के घटनाकम इस बात के संकेत कर रहे हैं कि मारन बंधुओं के लिए संध्याकाल का समय करीब-करीब आ चुका है। अमेरिकी बिजनेस मैगजीन ने हाल ही में मारन बंधुओं की सम्पत्ति 4 अरब डॉलर करीब 179 अरब रुपए आंकी थी। जिन लोगों ने `सन ग्रुप' का विस्तार देखा है वे इसके विकास को आश्चर्यजनक मानते हैं। लेखक व राजनीतिक विश्लेषक जो रामास्वामी कहते हैं कि मारन बंधुओं की यह तरक्की उनके राजनीतिक संरक्षण और पभाव के कारण ही रही है। उनके लिए राजनीति ने कारोबारी दुनिया में पवेश के लिए लांच पैड का काम किया। दरअसल करुणानिधि एंड परिवार ने जितना आर्थिक लाभ राजनीति से उठाया है उतने परिवार कम ही देखने को मिलेंगे।
तमिलनाडु में केबल टीवी नेटवर्प का बाजार 1400 से 1500 करोड़ रुपए का है। इसमें मारन बंधुओं के स्वामित्व वाले `सुमंगली केबल विजन' की 65 फीसदी हिस्सेदारी 950 से 1000 करोड़ रुपए के बीच है। दयानिधि ने संचार मंत्री रहते अपने पभाव का इस्तेमाल दक्षिण भारतीय भाषा वाले केबल टीवी चैनल ऑपरेटरों को लाइसेंस देने में देरी की। वे नहीं चाहते थे कि `सन टीवी' का कोई पतिस्पर्धा खड़ा हो, इसलिए तमिलनाडु के कई टीवी चैनलों के लाइसेंस कई सालों तक लटकाए रखे। दयानिधि और कलानिधि मारन, पूर्व केन्द्राrय मंत्री व डीएमके के कद्दावर नेता रहे दिवंगत मुरासोली मारन के बेटे हैं और करुणानिधि के भांजे थे मुरासोली मारन। उनके छोटे भाई सेवलम का विवाह सेल्वी से हुआ है जो करुणानिधि-दयालु अम्माल की पुत्री हैं। 1990 में कलानिधि ने वीडियो मैगजीन `पुललाई' शुरू की थी। 1993 में दक्षिण भारत का पहला सैटलाइट चैनल सन टीवी शुरू किया। 1995 में उनकी कुल सम्पत्ति बढ़कर 45 करोड़ रुपए हो गई। सन गुप देश का सबसे बड़ा सैटलाइट टीवी नेटवर्प है। इसके तमिल, मलयालम, कनड़ और तेलगु भाषाओं में 20 चैनल हैं। वे तमिलनाडु के दूसरे बड़े अखबार `दिनाकरण' के अलावा एक दर्जन मैगजीन भी निकालते हैं।
उनके पास 45 रेडियो चैनल भी हैं। सन पिक्चर्स दक्षिण भारत का सबसे बड़ा मूवी पोडक्शन हाउस है। अब आप बताएं कि 1990 से लेकर 2011 तक यह 180 अरब रुपए के मालिक कैसे बन गए?
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Friday, 27 May 2011

आंख की पुतली का हाल देख तिलमिला उठे करुणानिधि

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27th May 2011
अनिल नरेन्द्र
तमिल भाषा में कनिमोझी का मतलब होता है आंख की पुतली। डीएमके सुप्रीमो एम. करुणानिधि ने अपनी इस बेटी का नाम बड़े प्यार से रखा था, क्योंकि काली पुतली वाली यह बच्ची उन्हें बहुत भाती थी। तभी तो वह जब तिहाड़ में अपनी आंख की इस पुतली बेटी से मिलने गए तो गले से कनि को लगाकर उनकी आंखें भर आईं। कनि उनके गले से लगकर रोने लगी। कनिमोझी को सहारा देने के लिए पिता करुणानिधि पूरे लाव-लश्कर के साथ तिहाड़ जेल गए। उनके साथ उनकी पत्नी, दामाद और पोता भी था। पार्टी के आठ सांसद भी जेल परिसर तक आए थे। लेकिन उन्हें जेलर के कमरे तक जाने की इजाजत नहीं मिली। अन्दर माता-पिता, बेटी, दामाद के आंसू निकल रहे थे तो बाहर कुछ और ही नजारा था। तिहाड़ की सुरक्षा में तमिलनाडु पुलिस की ड्यूटी रहती है, जो कुछ सिपाही अपने `देश' के सांसदों के साथ खड़े बतिया रहे थे। चार सिपाही और आठ सांसद रोने की मुद्रा में अलर्ट खड़े थे, जैसे ही सामने से करुणानिधि का काफिला आया, ये सांसद फूट-फूट कर रोने लगे। दो तमिल सिपाही भी अपने आंसू नहीं रोक पाए। पास के खड़े एक नेता जी बोले, ये गम के नहीं बल्कि वफादारी के आंसू हैं। ऐसे वफादारी के आंसू कभी आपने भी देखे हैं? करुणानिधि बिना सोनिया से मिले वापस चले गए।
कांग्रेस और द्रमुक के रिश्ते टूटने के कगार पर हैं। तनातनी के इस माहौल में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने और आग लगा दी है। जयललिता ने स्वर्गीय राजीव गांधी की हत्या में द्रमुक का हाथ होने का आरोप लगा दिया है। मंगलवार को चुनाव जीतने के बाद अपनी पहली ही प्रेस कांफ्रेंस में जयललिता ने एक सवाल के जवाब में कहा कि 1991 से मैं भी एलटीटीई के डर के साये में जी रही हूं। हम हमेशा से कहते रहे हैं कि राजीव गांधी की हत्या में द्रमुक परोक्ष रूप से शामिल था। जयललिता से पूछा गया था कि क्या लिट्टे के पूर्व नेता सी. पद्मानाभन उर्प केपी ने वाकई यह कहा था कि यदि मौका मिला तो तमिल लड़ाके जयललिता की हत्या कर देंगे। जयललिता ने कहा कि 2जी घोटाले में हो रही कानूनी कार्रवाई से लोगों का न्यायपालिका में विश्वास बहाल हुआ है। कनिमोझी की ओर से महिला होने का हवाला देकर अदालत से जमानत मांगने पर उन्होंने कहा, `यह तर्प बिल्कुल गलत है, राजनीति और अपराध के मामलों में महिला होने के कारण छूट नहीं मांगी जा सकती है।'
द्रमुक कांग्रेस को सबक सिखाने के लिए बेताब है पर उसे समझ नहीं आ रहा कि वह करे तो क्या करे? अपने प्रिय सहयोगी ए. राजा और अब बेटी कनिमोझी के जेल में चले जाने से करुणानिधि एकदम तमतमाए बैठे हैं। जेल में बेटी से मिलने के बाद हर बार की तरह वह सोनिया गांधी से मिलने नहीं गए। खबर यह है कि होटल ताज मान सिंह में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व महासचिव दिग्विजय सिंह से भी उन्होंने मिलने से मना कर दिया। कांग्रेस के साथ सात वर्षों की पुरानी दोस्ती में यह पहली बार हुआ है कि करुणानिधि दिल्ली आए और कांग्रेस के किसी भी नेता से मिले बिना वापस चले गए। करुणानिधि यह अच्छी तरह जानते हैं कि इस समय उनके 18 सांसद कांग्रेस का कुछ नहीं बिगाड़ सकते लिहाजा वे सही अवसर की तलाश में हैं। वैसे भी चुनाव हारने के बाद वह कितने मोर्चों पर एक साथ लड़ेंगे?
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Thursday, 26 May 2011

विधानसभा चुनावों में मुस्लिम पार्टियों को शानदार सफलता मिली

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 26th May 2011
अनिल नरेन्द्र
भारत के मुसलमानों का मैं समझता हूं कि यह दुर्भाग्य रहा है कि राजनीति के क्षेत्र में उन्हें अपने समुदाय का कभी सही नेतृत्व नहीं मिला और प्रमुख राजनीतिक दलों ने हमेशा इनका शोषण किया और वोट बैंक की तरह व्यवहार किया। अब यह बात हमारे मुसलमान भाइयों को समझ में आ रही है और वह राजनीतिक रूप से संगठित होने का प्रयास कर रहे हैं, यह अच्छी डेवलपमेंट है। यूं तो आजादी के बाद से ही भारतीय राजनीति में छोटे-मोटे मुस्लिम राजनीतिक दल हमेशा बने रहे हैं लेकिन अब उन्हें शानदार सफलताएं मिलने लगी हैं। हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि मुसलमान राष्ट्रीय राजनीतिक दलों से निराश हैं। वे क्षेत्रीय मुस्लिम राजनीतिक दलों के आसपास गोलबंद हो रहे हैं। केरल में मुस्लिम लीग और असम में ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोकेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) को मिली सफलता और तमिलनाडु में नई बनी मुस्लिम राजनीतिक पार्टी एमएनएमके को भी दो सीटें मिलना इस तरफ इशारा करता है। इसका असर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों पर पड़ना लाजिमी है। खासकर उत्तर प्रदेश में मुस्लिम राजनीतिक दलों में मुस्लिम वोटों के लिए जबरदस्त जोर-आजमाइश होगी। यूं तो केरल में मुस्लिम लीग हमेशा से ही ताकतवर रही है लेकिन इस बार उसने सफलता के सभी पुराने रिकार्ड तोड़ दिए हैं। उसके 24 में से 20 उम्मीदवार जीते हैं। वहीं असम में एआईयूडीएफ की सीटें 10 से बढ़कर 19 हो गई हैं। यह इस बात का सबूत है कि इन राज्यों के मुसलमानों ने एकजुट होकर इन क्षेत्रीय मुस्लिम पार्टियों को वोट दिया। केरल में मुस्लिम लीग यूडीएफ का हिस्सा थी तो एआईयूडीएफ ने असम में अकेले चुनाव लड़कर अपनी ताकत बढ़ाई। तमिलनाडु में एमएनएमके जयललिता के गठबंधन का हिस्सा थी। लेकिन चुनाव के तुरन्त बाद उसका मन जयललिता से खट्टा हो गया क्योंकि उन्होंने अपने शपथ ग्रहण समारोह में नरेन्द्र मोदी को बुलाया था। प. बंगाल में ममता बनर्जी की सफलता में मुस्लिम वोटों की अहम भूमिका रही। परम्परागत तौर पर माकपा का जनाधार रहे मुसलमानों ने इस बार ममता के प्रति ममता दिखाई। मुस्लिम मतदाताओं के रुख को ममता की तरफ मोड़ने में मुस्लिम संगठन जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द की महत्वपूर्ण भूमिका रही। आंध्र प्रदेश में भी एक मुस्लिम राजनीतिक दल मजलिस-ए-मुशावरत को हैदराबाद और उसके आसपास के इलाकों में अच्छी सफलता मिली है। उसके नेता ओबेसी लोकसभा सदस्य हैं।
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटों की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। वहां 6-7 मुस्लिम राजनीतिक दल राज्य के 18 फीसद मुस्लिम वोटों को हथियाने के लिए मैदान में होंगे। यूपी में सबसे ताकतवर मुस्लिम पार्टी है पीस पार्टी। इसने पिछले उपचुनावों में अच्छे-खासे वोट हासिल कर राजनीतिक हल्कों में खलबली मचा दी है। लेकिन इसका प्रभाव पूरे सूबे में नहीं हो पाया और ज्यादातर गोरखपुर और उसके आसपास के इलाकों तक ही फिलहाल सीमित लगता है। हाल में जमाते इस्लामी ने भी पार्टी बनाई हैöवेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया। एआईयूडीएफ ने भी यूपी के चुनाव में उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है। हैरानी की बात यह है कि देश के मुस्लिम सांसदों में से एक भी शिया नहीं है। इसलिए कई शिया संगठनों ने यह महसूस किया है कि उन्हें भी संगठित होकर अपनी पार्टी बनानी चाहिए ताकि शियाओं को सही प्रतिनिधित्व मिल सके। यह पार्टियां कितनी सफल होती हैं यह तो चुनाव के बाद पता चलेगा पर इतना जरूर है कि कुछ सैक्युलर दलों की नींद हराम हो रही है।
Tags: Anil Narendra, Assam, Kerala, Muslim, State Elections, Tamil Nadu, Uttar Pradesh, West Bengal

Wednesday, 18 May 2011

5 राज्यों के क्वार्टर फाइनल के बाद सेमीफाइनल यूपी की बारी है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18 May 2011
-अनिल नरेन्द्र
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव केंद्र में सत्ता के खेल का एक तरह से क्वार्टर फाइनल मैच था। अब बारी है सेमीफाइनल की। सेमीफाइनल 10 महीने बाद उत्तर प्रदेश में होगा। अगर बहन जी ने चाहा तो यह उससे पहले भी हो सकता है। रोचक बात यह होगी कि यूपी के सेमीफाइनल में वह दो टीमें खासतौर पर खेलेंगी जो क्वार्टर फाइनल में सिर्प `सहायक' की भूमिका में नजर आई हैं। यह पुरानी कहावत है कि दिल्ली की गद्दी का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। इस दृष्टि से यूपी विधानसभा चुनाव और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। कांग्रेस और भाजपा के लिए न केवल सूबे की राजनीति इस पर निर्भर करती है बल्कि केंद्रीय राजनीति में भी यूपी का अपना महत्व है। सबकी आंखें सुश्री मायावती पर टिकी हुई हैं। शुक्रवार को पांच राज्यों के परिणाम आए, संयोग ही है कि उसी दिन यूपी में मायावती सरकार ने भी शुक्रवार को ही चार साल पूरे किए। अब उसका काउंट-डाउन शुरू हो रहा है। अगले 12 महीने यूपी के लिए राजनीतिक रूप से बेहद गहमागहमी भरे रहेंगे। यूपी में ए और बी टीम तो बसपा और सपा की ही है। मुख्य लड़ाई भी इन्हीं दोनों में होनी है। स्पष्ट बहुमत पाकर पहली बार `स्थायी' सरकार बचाने में सफल हुई मायावती के लिए यह साल बेहद अहम है। अपना गढ़ बचाए रखने की वह हर सम्भव कोशिश करेंगी। उधर मुलायम सिंह अपनी खोई ताकत वापस पाने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं। सपा अपने दम पर चुनाव लड़ेगी और पार्टी ने 403 में से 270 प्रत्याशी तो घोषित भी कर दिए हैं। मुलायम ने पूरा जोर अपने पारम्परिक यादव और मुस्लिम वोट पर लगा रखा है।
बंगाल से लेकर तमिलनाडु तक सत्ता विरोधी रुझान बहन जी के लिए चिन्ता का विषय होना चाहिए। अगर बंगाल में नंदीग्राम और सिंगूर ने सत्तारूढ़ दल के खिलाफ माहौल बनाया तो उत्तर प्रदेश में घोड़ी बछेड़ा, टप्पल और भट्टा पारसौल का किसान आंदोलन मायावती सरकार के खिलाफ माहौल बना रहा है। हालांकि कानून व्यवस्था स्थिति में सुधार हुआ है पर कुछ बसपा विधायकों के कारण वसूली, फिरौती, लूट, बलात्कार व हत्या, आदि की वारदातों ने माहौल दूषित जरूर किया है। शुक्रवार को जब कई राज्यों के चुनाव परिणाम आ रहे थे तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में पिपटाइम विधानसभा सीट का भी नतीजा आया था। इस सीट पर बसपा कहने को तो खुद चुनाव नहीं लड़ रही थी पर एक शराब व्यापारी को पूरा समर्थन दिए हुई थी। यह उम्मीदवार बुरी तरह से हारा। इस चुनाव ने उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए दो सन्देश दिए हैं। सत्तारूढ़ दल से अगर विपक्ष एकजुट होकर लड़ा तो बसपा की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। दूसरा अब फिरकापरस्त ताकतों के लिए भी जीत आसान नहीं है। इस चुनाव में पूर्वांचल में हिन्दुत्व के सबसे बड़े नेता योगी आदित्यनाथ की भी हार हुई जो इस चुनाव को प्रतिष्ठा का सवाल बनाए हुए थे। मायावती के जन्मदिन के सिलसिले में चल रही वसूली के बाद एक इंजीनियर की हत्या से जो माहौल खराब हुआ वह एक के बाद एक घटनाओं से बसपा के कई मंत्रियों और विधायकों को बेनकाब कर गया। इनकी हरकतों से मायावती की छवि कि वह सख्त प्रशासक हैं, को भी धक्का लगा है। लोग मायावती के उस नारे को याद दिलाते हैं `चढ़ गुंडों की छाती पर, मुहर लगाओ हाथी पर।' इन सब कमियों के बावजूद मायावती का आज भी पलड़ा भारी है। राज्य में उन्होंने काफी काम किया है पर आने वाले कुछ महीने सभी के लिए महत्वपूर्ण हैं।
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Tuesday, 17 May 2011

Those who abuse the Lord will always suffer.

Anil Narendra
Karunanidhi’s Dravida Munnetra Kazhgam suffered a total washout in the recent elections to the Tamil Nadu Assembly. Of the 234 seats in the Assembly, his party could get just 31 seats while Jayalalitha’s AIADMK got huge 200 seats. With his defeat, I am particularly happy because this is the fate that should befall those abusing Lord Rama. He is the same person who had said at a Press Conference that Lord Rama was an imaginary figure and also that the Ramayana had no basis. And from which engineering college did Lord Rama get his degree? These very remarks the Ravana of this era were made on the Setu controversy. Some of the stanzas of the Ramayana come to my mind on this issue.
`राम विमुख अस हाल तुम्हारा। रहा कोई न कुल रोबन हारा'
Meaning that “Not giving due respect to Lord Rama has brought you to this pass. And due to this you have reached a stage where even in your family there is no one left even to cry for you.”
The people have done what is written in one part of the Ramayana.
“जाको प्रिय न राम वैदेही। तजिये ताहि कोटि काति वैरी सम।। यद्यपि परम स्नेही”
Meaning that“Anyone who does not respect Rama Sita, he should be totally ignored, however dear he might be to you.”
When Karunanidhi and his stooge T R Baalu suggested that Ram Setu should be destroyed, their downfall started that very moment.
“जो अपराध भगत कर करहीं, राम रोष पावक सो जरहीं”
Meaning that, “Anyone who demeans devotees, he gets burnt in the fire of anger of Lord Rama, that he invited because of his utterances. Lord Rama does not spare anyone who insults his devotees.”
Ram Setu was built not by Rama, but by his ardent devotee Lord Hanuman and his army of followers. And the idea of destroying the Setu given by Karunanidhi was an insult to the devotees of Lord Rama. Devotee of Lord Rama, Lord Ram the Protector of Devotees could never tolerate all this. That is why in Ramcharitramanas, Saint Tulsidas said:
“जाको प्रभु दारुण दुख दीन्हा, ताकि मति पहिले हर लीन्हा”
Meaning that “anyone who troubles the Almighty will have to pay for it by inviting misery upon himself. And whomsoever the Lord wishes to punish, he takes control of his mind first.”
And that is what has happened to Karunanidhi who is so unwell that one cannot say how he will be affected by the defeat at the hustings. His daughter Kanimozhi might go to jail any time. A Raja is already in jail. One of his wives, Dayalu Ammal might also get into trouble. T R Baalu is out and it is difficult to say whether he will get power again. In all, the whole family is scattered.
After the humiliating defeat of Karunanidhi, what his attitude will be towards the Manmohan Singh government could cause concern for the Central Government, because he can withdraw his ministers from the government, but the Congress Party should not be too worried by this. The shortfall in case of DMK MPs pulling out of the government can be met and the Congress Party should not be bothered by this.
In the 2G spectrum scam, the government should be open about investigating Karunanidhi and company without any fear or pressure.The supporter of Rajiv Gandhi’s assassin, the LTTE, Karunanidhi, deserved this fate.
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परिणाम कांग्रेस के लिए ज्यादा खुशी-कम गम लेकर आए हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

Publish on 17 May 2011
अनिल नरेन्द्र
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए थोड़ी खुशी थोड़ा गम लेकर आए हैं। खुशी इसलिए कि तमिलनाडु और उसके पड़ोसी केंद्र शासित क्षेत्र पुडुचेरी को छोड़कर कांग्रेस और उसके गठबंधन का परचम हर जगह लहराया है। वहीं केंद्र में मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी का इन पांच राज्यों में तकरीबन सूपड़ा साफ हो गया है। पार्टी के लिए सबसे ज्यादा राहत असम से है जहां उसने न केवल तीसरी बार सत्ता में वापसी की है बल्कि पिछली बार से भी ज्यादा सीटें हासिल की हैं। केरल में उसके नेतृत्व वाला यूडीएफ सत्ता में जरूर पहुंचा है लेकिन मामूली बढ़त के साथ जहां उसकी नैया कभी भी डूब सकती है। बंगाल में पूरी जीत ममता बनर्जी की है जबकि तमिलनाडु जहां 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला बड़ा मुद्दा था वहां उसका तथा द्रमुक का सूपड़ा साफ हो गया है। पुडुचेरी भी कांग्रेस के हाथ से निकल गया और सबसे खतरनाक समाचार कांग्रेस के लिए आंध्र प्रदेश से आया है जहां अपने सबसे बड़े गढ़ में हुए उपचुनाव में उसके बड़े नेता बुरी तरह हारे हैं बल्कि उसके बागी नेता जगन मोहन रेड्डी तथा उनकी मां को भारी जीत मिली है।
अगर केंद्रीय भावी राजनीति को देखें तो पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का अकेला बहुमत पा जाना कांग्रेस और यूपीए नेतृत्व के लिए दिक्कत खड़ी कर सकती है। ममता का अब यूपीए सरकार में न केवल दबदबा बढ़ जाएगा बल्कि उसकी बार्गेनिंग पॉवर भी ज्यादा हो जाएगी। यही हाल जयललिता का भी होगा। जयललिता की बार्गेनिंग शक्ति के बारे में तो कांग्रेस को अच्छा अनुभव है। ममता ने कांग्रेस को पश्चिम बंगाल सरकार में शामिल होने को कहा है। अब सरकार में शामिल होने का फैसला कांग्रेस को करना है। वैसे देखा जाए तो उसके पास हां कहने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं है। अगर केंद्र सरकार में यदि दोनों पार्टियां शामिल हैं तो पश्चिम बंगाल में क्यों नहीं? कांग्रेस के कुछ नेताओं की मानें तो ममता की भारी जीत ने कांग्रेस की रणनीति कुछ समय के लिए पंचर कर दी है। कुल मिलाकर राज्य और केंद्र, दोनों की राजनीति के हिसाब से तृणमूल का ग्रॉफ इस समय काफी ऊंचा है।
इन पांच राज्यों के नतीजों को कांग्रेस नेतृत्व ने लीग मैच मानते हुए अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड के क्वार्टर फाइनल की तैयारी शुरू कर दी है। नतीजों की समीक्षा और आगे की रणनीति बनाने के लिए बैठकों के दौर आरम्भ हो चुके हैं। सूत्रों के मुताबिक सरकार में जहां बंगाल के नतीजे प्रणब मुखर्जी की ताकत में इजाफा कर सकते हैं वहीं तमिलनाडु में कांग्रेस की दूरदर्शी पी. चिदम्बरम के महत्व पर सवाल खड़े कर सकती है। ममता के मुख्यमंत्री बनने से खाली होने वाले रेल मंत्रालय की कमान किसी को सौंपने के साथ-साथ कई वरिष्ठ मंत्रियों के विभागों में फेरबदल करके सरकार और संगठन को अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड और आखिर में गुजरात और हिमाचल चुनावों के लिए तैयार करना कांग्रेस नेतृत्व की अब प्राथमिकता होनी चाहिए। कुल मिलाकर यही निष्कर्ष निकलता है कि इन पांच राज्यों के परिणाम कांग्रेस के लिए ज्यादा खुशी और कम गम लेकर आए हैं।

Saturday, 16 April 2011

तमिलनाडु, केरल और असम में विधानसभा चुनाव


-अनिल नरेन्द्र

तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों में जमकर वोटिंग हुई है। तमिलनाडु में 75.21 प्रतिशत, केरल में 74.04 और पुडुचेरी में 85.21 प्रतिशत। चुनाव आयोग मतदान के प्रतिशत बढ़ने से इस बात से खुश है कि लोग अपने वोट की कीमत समझने लगे हैं, वहीं विभिन्न राजनीतिक पार्टियां अधिक मतदान को अपने लिए फायदेमंद मान रही हैं। अगर हम तीनों राज्यों में मतदान का प्रतिशत लगाएं तो यह तकरीबन 78 फीसदी रहता है और आमतौर पर यह शांत मतदान रहा। लोग शाम तक मतदान करने के लिए कतारों में खड़े थे। कांग्रेस केरल सहित अन्य राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान बड़ी संख्या में मतदान का रुझान पढ़ने में अलग-अलग थ्यौरी गढ़ रही है। पार्टी ने केरल में बड़ी तादाद में मतदाताओं के घर से निकलने को सत्ता विरोधी रुझान बताया है जबकि असम और तमिलनाडु के बारे में यही सवाल आने पर पार्टी बगलें झांकने लगती है। वहीं कांग्रेस ने भारी मतदान को संकेत में ही सही अन्ना के आंदोलन से जोड़कर भी पढ़ने की कोशिश की है। कांग्रेस ने कहा कि इन राज्यों में जो मतदान हुआ है उस पर जन सैलाब का यह मतलब है कि जनता का विश्वास लोकतंत्र में है। तीनों राज्यों में मतदान प्रतिशत बढ़ने से कांग्रेस कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद हैं। नेताओं को भ्रष्ट बताने व समाजसेवी अन्ना हजारे के बयान के संदर्भ में उनका नाम लिए बिना कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि इस लोकतांत्रिक प्रणाली के जो असली कर्णधार है वह राजनीतिक दल ही हैं जो न केवल चुनाव में बल्कि उसके बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करते हैं। तिवारी ने कहा कि हर पांच साल में राजनीतिक दलों का जो मूल्यांकन होता है उससे दुनिया के बाकी मुल्कों में भारत की साख बनी हुई है। इसलिए जरूरी है कि जो भी कदम उठाए जाएं उसका मकसद व्यवस्था को मजबूत करना होना चाहिए।
पार्टी सूत्रों का मानना है कि तमिलनाडु में द्रमुक और कांग्रेस के गठबंधन और जयललिता की अगुवाई वाले अन्नाद्रमुक के बीच कांटे का मुकाबला है। हालांकि जमीनी रिपोर्ट से कांग्रेस आलाकमान बहुत आश्वस्त नहीं है। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी की जीत का दावा करने वाले द्रमुक प्रमुख एम. करुणानिधि ने राज्य में संभावित गठबंधन सरकार के गठन के संकेत दिए हैं। अपने मताधिकार का प्रयोग करने के बाद उन्होंने कहा कि उगते सूर्य (द्रमुक का चुनाव चिन्ह) की तरह जीत को लेकर भी हमारी संभावनाएं उज्जवल हैं। सरकार बनाने के लिए हमें जितनी सीटों की जरूरत है, हम उतनी जीतेंगे। सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस और द्रमुक के बीच चले दावपेंच को देखते हुए कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने इसके माध्यम से सत्ता में अपनी भागीदारी को लेकर मजबूत आधार तैयार कर लिया है। कांग्रेस 1967 के बाद से तमिलनाडु में सत्ता में नहीं आई है।
केरल में 74.4 प्रतिशत मतदान हुआ है। भाजपा को भी उम्मीद है कि इस बार केरल में भी कमल खिल जाए। मुख्य मुकाबला वाम मोर्चा और कांग्रेस गठबंधन के बीच है। टिकट बंटवारे में तरह-तरह के आरोप  लगाए गए। देश के सबसे साक्षर और प्रगतिशील राज्य केरल में विधानसभा चुनाव की टिकटें राजनीतिक दलों के दफ्तरों की बजाय चर्चों और मदरसों में बंटी है। चाहे सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोकेटिक फ्रंट हो या विपक्षी यूनाइटेड डेमोकेटिक फ्रंट दोनों ने चर्चों, मदरसों, मौलवियों और पादरियों के कहने पर टिकटें  बांटी हैं। जिन धर्मगुरुओं को मनमाफिक टिकट मिली है वे खुश हैं और जिनकी लिस्ट की अनदेखी हुई है वह नाराज हैं। केरल में राजनीति से इतर धार्मिक आधार पर टिकटों का बंटवारा चोरी-छिपे नहीं बल्कि खुलेआम हुआ है। मुस्लिम धर्मगुरुओं का कहना है कि कांग्रेस ने उन्हें कम टिकट दिए हैं, जबकि सीपीएम ने उनके कहे अनुसार टिकट बांटे हैं। कांग्रेस की मुश्किल यह है कि उसके गठबंधन में शामिल मुस्लिम लीग ने 22 में से 21 उम्मीदवार मुस्लिम उतारे हैं। कम से कम 14 विधानसभा क्षेत्रों में ईसाई जीत-हार का फैसला करने की स्थिति में हैं। भाकपा महासचिव एबी वर्धन ने चुनाव से पहले एर्नाकुलम प्रेस क्लब में कहा कि प. बंगाल में वाम मोर्चा और कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला होगा जबकि केरल में भाकपा नीत वाम लोकतांत्रिक मोर्चा कांग्रेस नीत संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे से बेहतर स्थिति में है। उन्होंने कहा कि केरल में मुकाबला बेशक दिलचस्प है लेकिन एलडीएफ बेहतर स्थिति में है और वाम मोर्चा बहुमत हासिल कर लेगा। वर्धन ने कहा, एलडीएफ तथा यूडीएफ की बारी-बारी से सरकार बनने का केरल का तथाकथित रुझान वाम मोर्चे के अच्छे प्रदर्शन के बाद इस बार कायम नहीं रहेगा।
असम में पहले चरण में लगभग 72 प्रतिशत मतदान हुआ है। छिटपुट हिंसक घटनाओं को छोड़कर इस प्रदेश में 126 निर्वाचन क्षेत्रों में शांतिपूर्ण मतदान प्रजातांत्रिक व्यवस्था के लिए गौरवपूर्ण वरदान है। उल्फा के एक गुट तथा नेशनल डेमोकेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड ने चुनाव के दौरान गड़बड़ी फैलाने की चेतावनी दी हुई थी। लेकिन जनता ने उनकी परवाह नहीं की। समाजसेवी अन्ना हजारे भले ही यह मानते हों कि गरीब मतदाता शराब और धन के मोह में उलझकर वोट डालते हैं और उनके जैसा ईमानदार व्यक्ति चुनाव में कभी सफल नहीं हो सकता, लेकिन असम, बिहार, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के गरीब और आदिवासी करोड़ों मतदाता अपने गांव, कस्बे, परिवार और समाज के भले के लिए वोट डालते हैं। संभव है कि भोलेपन, डर और थोड़े लालच में गलत उम्मीदवारों की तरफ झुक जाते हों लेकिन उन्हें वोट की ताकत का अहसास है। यही वजह है कि कांग्रेस पार्टी बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट समर्थित निर्दलियों के बल पर और भारतीय जनता पार्टी जरूरत पड़ने पर असम गण परिषद के सहयोग से नई सरकार बनाने की तैयारियां कर रही हैं। पांच प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका कम नहीं है। भाजपा तो खुलकर बंगलादेश की सीमा से आए मुस्लिम मतदाताओं को लेकर गहरा आक्रोश व्यक्त करती रही है जबकि कांग्रेस बहुसंख्यक हिन्दू मतदाताओं के साथ मुस्लिमों और क्षेत्रीय भावना वाले आदिवासियों को अपनी ओर खींचने का हर संभव प्रयास करती रही है। अन्त में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्यसभा में चुने जाने और प्रधानमंत्री पद पर बने रहने के लिए असम के कामरूप जिले के दिसपुर निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता के रूप में अपना नाम तो दर्ज करवा रखा है लेकिन इस विधानसभा चुनाव में वह  स्वयं और पत्नी गुरशरण कौर का वोट डालने नहीं गए। यही नहीं, उन्होंने डाक से मतदान करने का आग्रह भी निर्वाचन आयोग से नहीं किया। एक तरफ हम वोट के अधिकार का उपयोग करने का प्रचार करते नहीं थकते वहीं दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में प्रधानमंत्री ही मतदान नहीं करता।