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Friday, 16 September 2011

तिहाड़ जेल में कैसे गुजार रहे अपना समय ये वीआईपी कैदी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 16th September 2011
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली की तिहाड़ जेल का नाम वीआईपी जेल कर देना चाहिए। पिछले कुछ महीनों से यहां एक से एक बड़ा नेता मेहमान बन रहा है। सलाखों के पीछे अमर सिंह, ए. राजा, कलमाड़ी, कनिमोझी जैसे नेता अपने दिन कैसे गुजारते हैं, सुनिए।
पहले बात करते हैं अमर सिंह की। अमर सिंह के लि जेल के नियम-कानून और परम्परा ताक पर रख दी गई। स्वास्थ्य का हवाला देकर अमर सिंह को सोमवार देर शाम अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भेज दिया गया, लेकिन नियमानुसार अमर सिंह को पहले दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल भेजा जाना चाहिए था। सम्भवत यह पहला मौका है जब किसी कैदी को इलाज के लिए सीधे एम्स भेजा गया हो। बताया जा रहा है कि अमर सिंह को जेल में सुविधाएं देने को लेकर हो रहे लगातार बढ़ते राजनीतिक दबाव से आजिज आकर जेल महानिदेशक छुट्टी पर चले गए हैं। जेल कर्मी भी अमर सिंह के नखरों से परेशान हो गए हैं। डीआईजी (जेल) आरएन शर्मा ने बताया कि तिहाड़ में कोई वीआईपी नहीं है। सभी कैदियों को बराबर अधिकार और सुविधाएं हैं। दरअसल कलमाड़ी को साथ अपने दफ्तर में चाय-पिलाने के चलते जेल सुपरिंटेंडेंट भारद्वाज को कालापानी (पोर्ट ब्लेयर) भेज दिया गया था। यह सख्ती उसी का असर है। एक वार्डन मुस्कुरा कर कहता है कि ये वही अमर सिंह हैं जिन्हें कुछ दिन पहले तक अमिताभ बच्चन खुद ड्राइव कर एयरपोर्ट से अपने घर ले जाते थे, जिन्होंने अपने घर में करोड़ों की फर्निशिंग करवाई थी वही अमर सिंह आज 10 बाय 15 के एक सेल में जमीन पर सो रहे हैं जिसमें एक छोटा टीवी सेट और पंखा है।
उन्हें जेल के चार कम्बल, दो बैड शीट, एक थाली, कटोरी, चम्मच, गिलास और एक मटका मिला है। बड़ी पार्टियों के बीच अरबों-खरबों की डील कराने वाले अमर सिंह की जेब में 1500 रुपए, वह भी जेल कूपन के रूप में।
सुबह 6 बजे रोल कॉल का समय। एक के बाद एक नाम पुकारे जाते हैं। अमर सिंह का नाम आता है, संतरी पुकारता है अमर सिंह....जी। सुरेश कलमाड़ी, ए. राजा, कनिमोझी इत्यादि-इत्यादि। कई बार खुद बिना नाम पुकारे रजिस्टर पर सही का निशान लगा देते हैं। फिर प्रार्थना ः ऐ मालिक तेरे बन्दे हम। पिछले 20 साल से तिहाड़ में रोज सुबह लता मंगेशकर की आवाज में यही प्रार्थना बजती है और सभी कैदी उसे दोहराते हैं। फिर चाय। अखबार। कुछ देर टीवी। कुछ का टहलना। कुछ का काम सांप-सीढ़ी, लूडो, कैरम और बैडमिंटन खेलना। फिर खाना-पीना और सोना। राजा की पत्नी परमेश्वरी गुरुवार को उनसे मिलने पहुंचीं। लेकिन कनिमोझी इतनी खुशकिस्मत नहीं थीं। उनसे मिलने के लिए एक तमिल कवि ने एक सांसद के मार्पत अर्जी दी थी जिसे जेल अधिकारियों ने खारिज कर दिया। इसी तरह जेल नम्बर 3 के गेट पर सफेद कुर्ता-पायजामा पहने दर्जनभर से ज्यादा लोग जमा थे। सुबह 11 से देर शाम तक। कुछ विधायक अन्य खुद को बड़ा नेता बता रहे थे। सांसद कुलस्ते और भगोरा से मिलने मध्य प्रदेश और राजस्थान से आए थे। जेल प्रशासन ने मंजूरी नहीं दी। जेल के प्रवक्ता सुनील गुप्ता बताते हैं कि 12ः30 बजे कैदियों में केवल दो के लिए घर से खाना आता है। राजा और कनिमोझी। कोर्ट ने इसकी खास अनुमति दी है। महिला जेल में कनिमोझी घुलमिल गई हैं और महिला संतरी उन्हें दीदी कहकर बुलाती हैं। नियमानुसार हफ्ते में दो मुलाकात हो सकती हैं वह भी परिवार वालों से, वही कपड़े लेकर आते हैं। हफ्तेभर के लिए 1500 रुपये दे जाते हैं। इनमें कैंटीन से कुछ पकवान-मिठाई खरीदी जा सकती है। राजा तमिल चैनल और फिल्में देखकर समय काट रहे हैं। शाहिद बलवा ने आई पैड, कूलर, नरम तकिया और गद्दे की मांग की है। वे हिन्दी फिल्म देकर समय काट रहे हैं।
हां जेल में सैलून, कपड़ों पर प्रेस और ड्राई व वैट कैंटीन की सुविधा है। कूपन के जरिये जो चाहे खरीद लो। कलमाड़ी ने झांसी की रानी सीरियल देखने के लिए टीवी मांगा था। संतरी कहता है कि कलमाड़ी घंटों रजिस्टर में कुछ लिखते रहते हैं, क्या लिखते हैं, कोई नहीं जानता। क्या वह किस-किसको क्या दिया गया इसका हिसाब-किताब लिख रहे हैं, क्योंकि उनकी याददाश्त तो आती-जाती रहती है? अधिकतर वीआईपी-दो पूर्व केंद्रीय मंत्री, एक पूर्व मुख्यमंत्री, छह पूर्व सांसद, दो पूर्व नौकरशाह, 15 उद्योगपति-विचाराधीन कैदी हैं। इनसे जेल का काम नहीं करवाया जाता जिस जेल में रहते हैं? उसकी सफाई कर्मचारी करते हैं। अमर सिंह के साथ तीन कैदी इसलिए रखे गए हैं ताकि वह पूरा दिन फिनायल से फर्श साफ करते रहें ताकि अमर सिंह को कोई इंफैक्शन न हो। जेल कर्मचारी भी मानते हैं कि एमपी तो आखिर एमपी है। बाहर चाहे जितनी बातें बनाई जाएं, लेकिन एमपी का लिहाज करना ही पड़ता है। सो इस तरह गुजर रही है इन वीआईपी की तिहाड़ जेल में जिन्दगी।

Saturday, 20 August 2011

यह आंदोलन भारत के लिए ही नहीं, सारी दुनिया के लिए उदाहरण है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20 August 2011
अनिल नरेन्द्र
कांग्रेस ने अन्ना हजारे के समर्थन में बड़ी तादाद में लोगों के आगे आने पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि इस आंदोलन के पीछे अमेरिका का हाथ है। कांग्रेस का तर्प है कि अमेरिका ने कभी किसी आंदोलन के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की, मगर अन्ना के आंदोलन को लेकर अमेरिका की वकालत संदेह पैदा करती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी अन्ना हजारे की गिरफ्तारी को लेकर संसद में दिए अपने बयान में विदेशी ताकतों का जिक्र किया है। मैं नहीं जानता कि इस आंदोलन के पीछे अमेरिका का हाथ है या नहीं। हां, अमेरिका जब भी किसी देश में सरकार दमनकारी कदमों पर लोकतांत्रिक तरीके से जनता आंदोलन करने को समाप्त करने पर उतर आए तो अमेरिका उस पर चेतावनीनुमा सुझाव जरूर देता है। उसने चीन, मध्य-पूर्वी देशों को भी ऐसी चेतावनी दी है और देता है। यह कहना इसलिए भी गलत लगता है कि जितनी अमेरिकापरस्त यह मनमोहन सिंह सरकार है उतनी तो स्वतंत्र भारत के इतिहास में इससे पहले कभी नहीं होगी। सारा कांग्रेस नेतृत्व अमेरिकी हमदर्द है और यह बात कई बार साबित भी हो चुकी है। सो यह कहना अपनी समझ में तो आया नहीं। अगर कांग्रेस यह कहती कि कुछ ताकतें देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाना चाहती हैं इसलिए अंदरुनी हालात अस्थिर कर रहे हैं तो भी बात समझ में आती। अन्ना के आंदोलन ने तो सारे पुराने रिकार्ड तोड़ दिए हैं। टीम अन्ना ने कमाल कर दिया है। जिस तरीके से पिछले 3-4 दिनों से जनता सड़कों पर शांतिप्रिय तरीके से आंदोलन कर रही है वह अभूतपूर्व है। इतनी संख्या में लोग सड़कों पर हों और एक भी जगह लाठीचार्ज न हो, एक भी जगह राष्ट्रीय सम्पत्ति को नुकसान न पहुंचा हो यह भारत में क्या सारी दुनिया में एक उदाहरण है। लोगों का जज्बा देखने को मिलता है। बस, एक आवाज और इंडिया गेट पर एक लाख लोग। न कोई सियासी नेता न कोई रैली। इस तरह उमड़ते लोगों को दिल्ली क्या दुनिया ने भी कम देखा होगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ दिल्ली और पूरे देश में तनी मुट्ठियां यह बता रही हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अब बात दूर तलक जाएगी। संसद से जुड़े राजपथ पर मुट्ठी बांधे, मशालें लिए और मोमबत्तियां जलाए हजारों लोग ठीक उस समय प्रदर्शन कर जनशक्ति दिखा रहे थे जब लोकसभा में भ्रष्टाचार रोकने की सियासत पर बहस चल रही थी और राज्यसभा भ्रष्टाचार के आरोपी एक जज के महाभियोग की सुनवाई कर रही थी। दिल्ली में ही क्यों बुधवार को पूरे देश में लोग इसी तरह उमड़ आए। मुंबई के आजाद मैदान से लेकर सुदुर लेह तक और चेन्नई से गुवाहाटी तक एक विराट आंदोलन लहरें लेता दिखने लगा है। तिहाड़ से अन्ना ने खासकर यह संदेश भिजवाया कि समर्थकगण अहिंसा के रास्ते को बनाए रखें, क्योंकि सरकार के कुछ लोग आंदोलनकारियों को उकसाने के लिए कुछ अफवाहों का सहारा ले सकते हैं। इससे सावधान रहने की जरूरत है।
कौन कहता है कि देश की युवा पीढ़ी देशभक्त नहीं? कई लोगों को लगता है कि हमारी युवा पीढ़ी के लिए न तो 15 अगस्त या 26 जनवरी कोई महत्व रखता है और वह देश की राजनीति, देश में क्या हो रहा है इसकी परवाह नहीं करते और न ही दिलचस्पी रखते हैं पर पिछले तीन दिनों ने इस धारणा को पूरी तरह गलत साबित कर दिया है। पूरे देश में अन्ना के समर्थन में देश की युवा पीढ़ी सड़कों पर उतर आई है, जनलोकपाल बिल के समर्थन में और तिहाड़ में बन्द अन्ना हजारे की रिहाई की मांग को लेकर बुधवार को तिहाड़ जेल के बाहर दिल्ली के कोने-कोने से स्कूली छात्र पहुंचे। विशेष बात यह रही कि ये छात्र अपने स्कूलों से हॉफ-डे की विशेष अनुमति लेकर यहां पहुंचे थे। कुछ बच्चों ने तो यहां पहुंचने के लिए बाकायदा स्कूल से एक दिन की छुट्टी ली थी। दिल्ली विश्वविद्यालय ने छात्रों पर अन्ना का समर्थन करने पर पाबंदी लगा दी थी पर छात्रों ने इसकी परवाह नहीं की और किरोड़ीमल, मिरांडा हाउस, भीमराव अम्बेडकर जैसे कई कॉलेजों के छात्रों ने क्लास रूम से बाहर सड़क पर आकर प्रदर्शन किया, रैलियां निकालीं। छत्रसाल स्टेडियम पहुंची छात्राओं ने बताया कि मिरांडा हाउस में शिक्षक तो आए हैं पर क्लासें खाली हैं। सेन्ट स्टीफंस कॉलेज एल्यूमिनई एसोसिएशन की ओर से भी बहुत सारे पुराने छात्र अन्ना के समर्थन में आगे आए। जब 73 वर्ष का एक बुजुर्ग जेल जाने के बाद भी अपना अनशन न तोड़ें और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी मुहिम जारी रखें तो भला उसका साथ हम छात्र कैसे न दें? उनकी अटूट इच्छाशक्ति देखकर हमारी आत्मा खुश हो जाती है, यह थी छात्रों की भावना। लोगों का जज्बा ऐसा अद्वितीय था कि तिहाड़ जेल के बाहर और छत्रसाल स्टेडियम में जनता वहां बैठे आंदोलनकारियों के लिए घंटों से खाने के पैकेट और पानी बांट रहे थे। ऐसे दृश्य इससे पहले कभी नहीं देखे गए। स्वेच्छा से, बिना कोई लीडर, बिना पार्टी, बिना पैसे जनता यूं सड़कों पर उतर आए, यह सारी दुनिया के लिए एक उदाहरण है। आप कहीं भी चले जाएं डिस्कशन का मुद्दा एक ही था। अन्ना हजारे। अन्ना की क्रांति बसों से लेकर चाय की दुकानों तक सभी जगह फैल गई है। अन्ना की आंधी सड़कों के साथ बसों में भी सवार है। मजे की बात यह है कि युवा, बुजुर्ग, महिलाएं, हर आयु वर्ग के लोग इस आंधी में शामिल हैं। सुबह पार्कों में घूमने वाले बुजुर्गों की टोली भी अन्ना के बहाने देश में कैंसर की तरह फैल रहे भ्रष्टाचार की समस्या पर चर्चा करते नजर आए। अन्ना के समर्थन में बुधवार को वकीलों का सैलाब सड़कों पर उतर आया। राजधानी की सभी छह जिला अदालतों में पूरी तरह हड़ताल रही। अन्ना की आंधी ने लोगों को प्रेम, सेवा और अनुशासन की डोर में बांध दिया है। तिहाड़ जेल के बाहर मंगलवार शाम से जुटे अन्ना समर्थकों के लिए स्थानीय लोग चाय-पानी और नाश्ता लेकर पहुंच गए। रातभर से थके-मांदे समर्थकों के लिए चादर, दरी लेकर दौड़े चले आए। अनुशासन इतना कि खाने की प्लेट, प्लास्टिक के गिलास और केले के छिलके भी उन्होंने साफ किए। समर्थकों की भीड़ की वजह से सड़क पर आने-जाने वाले लोगों को कोई परेशानी न हो, इसके लिए उन्होंने खुद ही यातायात व्यवस्था की कमान सम्भाल ली। तिहाड़ जेल के विभिन्न गेटों के बाहर अन्ना के समर्थकों की वजह से जेल में राशन का जब टोटा पड़ा तो किरण बेदी ने जेल गेट नम्बर चार पर बैठे समर्थकों को गेट खाली करने की अपील की, जिसके बाद समर्थकों ने राशन लाने-जाने के लिए गेट खाली कर दिया। अन्ना का समर्थन कर रहे आंदोलनकारियों की तबीयत की देखभाल करने के लिए बाकायदा डाक्टरों ने अपनी एक टीम बना ली जिसने जरूरतमंद लोगों को सम्भाला। मजेदार बात तो यह थी कि विदेशी भी इस आंदोलन में साथ आ गए। फ्रांस की एक महिला कहती हैं कि आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत हथियार है। फ्रांसीसी अखबार में काम करने वाली जैनी का कहना है कि मैं इस आंदोलन के बारे में ज्यादा नहीं जानती लेकिन लोगों को अपने देश के लिए इस कदर आवाज उठाते देख अच्छा लगा। दो व्यक्ति तो इलाहाबाद से साइकिल से दिल्ली इसलिए आए ताकि वह अन्ना का समर्थन कर सकें। ऐसी जनभावना सालों के बाद दिखी है। राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान के लिए पूरा देश एकजुट हो गया है। उस युवा पीढ़ी ने दिखा दिया है कि जरूरत पड़ने पर वह किसी से पीछे नहीं। इतने दिन से आंदोलन हो रहा है, हजारों लोग सड़कों पर हैं पर न तो कोई राष्ट्रीय सम्पत्ति को हानि पहुची है, न कोई बस जलाई गई, न ही कहीं आंसू गैस चली, लाठीचार्ज हुआ और गिरफ्तारी हुई पर हमें चौकस रहना होगा। अन्ना की टीम ने बड़े ही ढंग से अब तक आंदोलन को चलाया है पर कुछ तत्व इसे हिंसात्मक बनाने का प्रयास कर सकते हैं। वह तरह-तरह की अफवाहें फैला सकते हैं। ध्यान रहे कि एक भी चिंगारी काफी होगी। दुनिया को अन्ना हजारे ने दिखा दिया कि अहिंसा का रास्ता कितना प्रभावी आज भी है।
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Friday, 19 August 2011

Anna Hazare the Second Gandhi

- Anil Narendra
Monday the 16th August will always be remembered. It was no less than a film full of all suspense, drama, emotions. All eyes were riveted on Anna Hazare. People were anxious to know what Anna was going to do today. But Anna was true to his words. Despite all pressures, Anna was firm on his resolve and would remain so. With about 250 police personnel, senior officers of Delhi Police reached Prashant Bhushan’s flat in Supreme enclave in Mayur Vihar Phase-1 on the Monday morning, where Anna was staying. After futile discussions for half an hour, Police took Anna into custody. As Crime Branch officials accompanying Anna came out in an Innova car, a huge crowd surrounded it. People blocked the UP link road. Anna Hazare was brought to the Officers’ Mess at Alipur Road. Later, apprehending breach of peace, Anna’s arrest was announced. Fearing reactions from Anna supporters, the Police made arrangements to send him to an undisclosed location. Police took away Anna in a car. Uncertainty over Anna prevailed for about two hours. Police, too, refused to say anything in this regard. Anna along with the police team reached DCP office in Rajauri Garden at about 12.15 in the afternoon. He was produced before the Court of the Executive Magistrate. After Anna’s refusal to sign an affidavit, he was sent to judicial custody. At about 1515 hrs, the police team started for Tihar Jail along with Anna, but the agitating crowd outside DCP office started protesting. In the ensuing stone-pelting, window pane of Innova, in which Anna was traveling, was also broken. Police reached Tihar Jail with Anna at about 3.45 PM. Tihar authorities decided to lodge Anna in Jail No 4. His other associates – Arvind Kejariwal, Shanti Bhushan, Kiran Bedi were also brought to Tihar Jail after their arrest.
The news of Anna’s arrest spread all over the country like wild fire. The atmosphere was similar to that of JP Movement’s. People were on streets, they were raising slogans and there was demonstration of solidarity among the people that included women, children, elders etc. But there was a great difference between JP and Anna movements. And the difference was that of the presence of electronic media. Television had made a significant difference. Not only in India, but all over the world, the news of Anna’s arrest was being watched/listened with great interest. Public in many cities took to the streets and sit-ins and demonstrations began. Perhaps, the Central government was not expecting of such a massive support to Anna’s movement. The decision to take Anna to Tihar proved that the Manmohan Singh government is loosing its ability to take logical decisions, which according to an adage happens in the face of doomsday. Anna was taken to same Jail, where corrupt persons like A Raja, Kanimojhi, Suresh Kalmadi were lodged. What an irony that a person who, like Gandhiji, is carrying a non-violent crusade against corruption, had been taken to a jail, where great names accused of corruption had gathered. Even the prisoners of Tihar started raising slogans in support of Anna. According to sources, even the security personnel posted there were eager to get a glimpse of Anna. Some of the prisoners said that it can be understood that persons like them are put behind bars, but what is the logic behind the arrest of a person like Anna Hazare?, He is just following Gandhian principles of protest and leading an anti-corruption movement for the relief of common man. What is the fault of such people for which they are being put behind the bars? They wanted to see such people. Sources say that some of the prisoners expressed their desire to be part of this movement after being released from the Jail, while others offered to go on fast for a day. When Anna Hazare was in jail, large number of people had thronged the Tihar and they were exhibiting their support to Anna Hazare and at India Gate, people were taking a candle march at the same time. Chhatrasal Stadium, where agitators were being kept, was resounding with slogans and electronic media was reporting about public coming to streets all over the country. The government was seething with anger over the support Anna was getting and action taken by the Delhi Police was perhaps, unprecedented. It had sent an order to Tihar authorities to release Anna unconditionally. This time the Delhi Police acted a little sensibly. There was no repetition of the use of force that was witnessed on 4 June to oust the supporters of Baba Ramdev from Ramlila Grounds and the Police handled this whole episode with maturity.
Anna movement was at its peak. The issue for which Anna was agitating was different from that of Baba Ramdev. Real issue was corruption and price rise. People have come to the conclusion that corruption is the real cause for the present inflation and this government is neither interested in curbing the corruption nor controlling the inflation. I live in Sunder Nagar. On my return to my home on Tuesday I came across a copy of a circular by the Sunder Nagar Association, which was sent to all the residents. It had an appeal to all the residents to keep their lights off in the evening from 7.00 to 8.00 and lend their support to anti-Corruption movement. With these types of passions running high among common man, you can easily guess how popular the Anna mission has become. Anna is right when he says that the corruption can be mitigated by the Jan Lokpal Bill, but cannot be ruled out completely. Anna’s mission could be considered successful, if at least 65 per cent corruption is reduced.
At present, Anna is firm on his resolve in Tihar. It appears from the news that were coming till the writing of this article that Anna has refused to leave the premises of Tihar until allowed to undertake his protests unconditionally. He is insisting that the terms imposed on his protest fast must be removed. Jail authorities have declared his release, but Anna has refused to step out of the Jail. Tihar Jail spokesman Sunil Gupta says that superior officers have been informed about the terms that have been put forward by Anna for his release. The Manmohan government has failed to feel the pulse of the public. In fact, this government has failed from the beginning to properly gauge the public support, the Anna Movement was gaining. That is why picture of government’s insincerity and anger has emerged and the adage that with approaching doom, a person looses prudence also hold good in the present context. The direction of Gandhian Anna’s movement and massive support to it all over the country proved a serious irritant for the government. The government had to suffer disgrace in the face of efforts to stop Anna’s protest fast. That is why, the Delhi Police which had arrested Anna in the morning, was continuously appealing to him in the evening to step out of the jail. Police withdrew all cases against him, but Anna was adamant to remain in the jail till he is not given written permission to hold protest at JP Park. After his arrest, Anna said that the second movement of independence has begun and that though he has been arrested, but his movement is not going to stop on any account. He said that the real faces of the corrupts have been unveiled. This is a struggle for change. Rule of the people could not be materialized till the change is not brought about. He said that the time has come, when all people should offer arrest and not a single jail in the country should remain vacant. All supporters should take eight days’ leave from their jobs and join the movement. He said the movement would be strengthened, only if people in large numbers join it.

Thursday, 18 August 2011

अन्ना की आंधी है, ये दूसरे गांधी हैं


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18 August 2011
अनिल नरेन्द्र
मंगलवार 16 अगस्त का दिन हमेशा याद रहेगा। यह कोई फिल्म से कम नहीं था। पूरे दिन में सस्पेंस, ड्रामा, एमोशन सभी देखने को मिले। सारे देश की नजरें अन्ना हजारे पर टिकी हुई थीं कि देखें आज अन्ना क्या करते हैं। अन्ना अपने कहने पर खरे उतरे। तमाम तरह के दबावों के बावजूद अन्ना अपने स्टैंड पर कायम रहे और रहेंगे। मंगलवार को सुबह दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अफसर करीब ढाई सौ जवानों को लेकर मयूर विहार फेस-1 स्थित सुपीम एंक्लेव में पशांत भूषण के फ्लैट पहुंचे। करीब आधा घंटे तक मंत्रणा के बाद कोई नतीजा निकलता न देखकर पुलिस ने अन्ना को जो इसी फ्लैट में रुके थे, को हिरासत में ले लिया। अन्ना को जैसे ही इनोवा कार में लेकर काइम ब्रांच के आदमी बाहर निकले गाड़ी को हुजूम ने घेर लिया। लोगों ने यूपी लिंक रोड जाम कर दी। अन्ना हजारे को अलीपुर रोड स्थित ऑफिसर्स मैस लाया गया। बाद में अन्ना को शांति भंग करने की आशंका में गिरफ्तार करने की घोषणा हुई। अन्ना समर्थकों के डर से पुलिस ने उन्हें अज्ञात स्थान पर भेजने की तैयारी की। पुलिस अन्ना को गाड़ी में बिठाकर ले गई। लगभग दो घंटे तक अन्ना को लेकर संशय की स्थिति बनी रही। पुलिस ने भी इस बारे में कुछ कहने से इंकार कर दिया। लगभग सवा बारह बजे अन्ना को लेकर पुलिस टीम राजौरी गार्डन स्थित पुलिस उपायुक्त कार्यालय पहुंची। यहीं विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत में अन्ना हजारे को पेश किया गया। अन्ना के शपथ पत्र देने से इंकार करने पर उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। दिन के लगभग सवा तीन बजे अन्ना हजारे को लेकर पुलिस टीम तिहाड़ जेल के लिए रवाना हुई। लेकिन उपायुक्त कार्यालय के बाहर जमा भीड़ ने विरोध पदर्शन शुरू कर दिया। पथराव में अन्ना हजारे को ले जा रही इनोवा कार का शीशा भी टूट गया। लगभग पौने चार बजे शाम अन्ना हजारे को लेकर पुलिस तिहाड़ जेल पहुंची। तिहाड़ अधिकारियों ने अन्ना को जेल संख्या चार में रखे जाने का निर्णय किया। उनके अन्य सहयोगियों, अरविन्द केजरीवाल, शांति भूषण, किरण बेदी को भी गिरफ्तार कर तिहाड़ लाया गया।
अन्ना की गिरफ्तारी की खबर पूरे देश में आग की तरह फैल गई थी। कुछ-कुछ माहौल वैसा ही था जो एक जमाने में जेपी मूवमेंट के समय बना था। जनता सड़कों पर उतर आई थी, नारे लग रहे थे, औरतें, बच्चे, वृद्ध सभी एकजुट होते नजर आए। जेपी मूवमेंट और अन्ना मूवमेंट में एक बहुत बड़ा फर्प नजर आया। वह था इलैक्ट्रानिक मीडिया का आना। टीवी से जमीन आसमान का फर्प पड़ गया है। अन्ना को पुलिस तिहाड़ जेल ले गई है यह खबर भारत के कोने-कोने में तो पहुंची ही पर विदेशों तक उसी समय पहुंच गई। देश के कई शहरों में लोग सड़कों पर उतर आए, धरने-पदर्शन आरम्भ हो गए। केन्द्र सरकार को शायद यह उम्मीद नहीं रही होगी कि अन्ना को ऐसा जन समर्थन मिलेगा। विनाश काले विपरीत बुद्धि यह कहावत मनमोहन सिंह सरकार पर अन्ना को तिहाड़ ले जाने से साबित होती है। अन्ना को उसी तिहाड़ जेल में ले जाया गया जहां ए. राजा, कनिमोझी, सुरेश कलमाड़ी जैसे भ्रष्ट लोग जमा हुए थे। जो आदमी भ्रष्टाचार के खिलाफ गांधीगिरी से विरोध कर रहा है उसको उसी जेल में ले जाया जाए जहां भ्रष्टाचार के आरोप में यह दिग्गज जमा हैं कितनी विरोधाभास है। तिहाड़ में कैदियों तक में अन्ना के समर्थन में नारे लगने लगे। सूत्रों की माने तो जब अन्ना को शाम को तिहाड़ लाया गया तो यहां के सुरक्षा कर्मियों तक को अन्ना को देखने की लालसा थी। कुछ कैदियों का कहना था कि हमें बंद करें तो बात समझ में आती है मगर अन्ना हजारे जैसे व्यक्ति को गिरफ्तार करना कहां से तर्पसंगत है? यह तो एक आम इंसान की दिक्कत व देश को खोखला करने वालों को सजा दिलवाने के लिए लोकपाल बिल लाने के लिए गांधीगिरी के साथ लेकर अनशन कर रहे हैं। इनका इसमें दोष क्या है, जो इनको बंद या सजा दे रहे हैं? ऐसे लोगों को वह देखना चाहते हैं। सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि कुछ कैदियों ने बाहर निकलकर उनके मिशन का हिस्सा बनने की भी बात की तथा कुछ ने एक दिन अनशन करने की बात कही। जब अन्ना हजारे जेल में बंद थे, उनके हजारों समर्थक जेल के बाहर पदर्शन कर रहे थे, नारे लगा रहे थे उसी समय इंडिया गेट पर कैंडल मार्च हो रहा था। छत्रसाल स्टेडियम में जहां आंदोलनकारियों को रखा गया था जमकर नारे लग रहे थे, पूरे देश से जनता के सड़कों पर आने की रिपोर्टें टीवी पर आ रही थीं। सरकार अन्ना के समर्थन को देखकर बौखला गई और दिल्ली पुलिस ने वह काम किया जो उसने शायद पहले कभी नहीं किया था। उसने तिहाड़ में अन्ना को बिना शर्त छोड़ने का आदेश भेज दिया। इस बार दिल्ली पुलिस ने थोड़ी होशियारी से काम लिया। उसने 4 जून को जिस तरह बाबा रामदेव के समर्थकों को रामलीला मैदान से बल पयोग करके खदेड़ने के लिए लाठी, डंडे का सहारा लिया था इस बार वह नहीं देखने को मिला और पुलिस ने मैचयूरिटी से सारे मामले को हैंडल किया।
अन्ना का आंदोलन अब पूरा रंग ले चुका है। अन्ना मुद्दा, बाबा रामदेव जैसा मुद्दा नहीं। असल मुद्दा है भ्रष्टाचार और महंगाई। जनता का अब मानना है कि भ्रष्टाचार की वजह से ही महंगाई बढी है और यह सरकार न तो भ्रष्टाचार रोकने में या महंगाई कम करने में दिलचस्पी रखती है। मैं सुंदर नगर में रहता हूं। मंगलवार शाम को जब मैं घर लौटा तो हमारी सुंदर नगर एसोसिएशन से एक सर्कुलर पड़ा हुआ था। यह सर्पुलर सारे सुंदर नगर निवासियों को भेजा गया था। इसमें लिखा था कि आज शाम 7 से 8 बजे तक बत्ती बंद रखें और भ्रष्टाचार मुक्त आंदोलन का समर्थन करें। जब जनता में इस पकार का जज्बा हो तो आप खुद ही अन्दाजा लगा सकते हैं कि अन्ना का आंदोलन कितना जनपिय हो चुका है। अन्ना ठीक ही कहते हैं कि जनलोकपाल बिल से भ्रष्टाचार मिट नहीं सकता, कम जरूर हो सकता है। 65 पतिशत तक भ्रष्टाचार कम हो जाए तो अन्ना का मुहिम सफल माना जाएगा।
फिलहाल अन्ना तिहाड़ में ही अपनी बात पर अडिग जमे हुए हैं। इस लेख लिखने तक जो खबरें आ रही हैं उससे पता लगता है कि अन्ना ने तिहाड़ जेल से रिहा होने से मना कर दिया है। उनकी मांग है कि अनशन के लिए लगाई गई शर्तें रद्द की जाएं। जेल पशासन ने उन्हें रिहा करने की घोषणा कर दी है पर अन्ना ने जेल से बाहर निकलने से इंकार कर दिया है, तिहाड़ जेल के पवक्ता सुनील गुप्ता ने बताया कि अन्ना हजारे की शर्तें आला अफसरों तक पहुंचा दी गई हैं। जनता की नवज पहचानने में मनमोहन सरकार नाकाम रही है। यह सरकार शुरू से ही अन्ना आंदोलन को मिलने वाले जन समर्थन को सही से आंकने में फेल रही। इसी वजह से जहां एक तरफ सरकार के खोखलेपन, बौखलाहट की तस्वीर आई वहीं विनाशकाले विपरीत बुद्धि भी फिट बैठी है। गांधीवादी अन्ना हजारे का सत्याग्रह तेवर और उनके समर्थन में मंगलवार को देशभर में उमड़ा जन सैलाब सरकार के लिए भारी साबित हुआ। लोकपाल के मुद्दे पर अन्ना को अनशन से रोकने की कोशिश में सरकार को मुंह की खानी पड़ी। इसीलिए अन्ना को सुबह गिरफ्तार करने वाली दिल्ली पुलिस रात तक उन्हें तिहाड़ जेल से बाहर आने के लिए मिन्नतें करती रही। पुलिस ने उनके खिलाफ सभी मामले वापस ले लिए लेकिन अन्ना जेल में रहने पर अड़ गए। उन्हें बाहर आने के लिए जेपी पार्प में अनशन करने की लिखित अनुमति देने की शर्त अन्ना ने रखी है। गिरफ्तारी के बाद अन्ना ने कहा कि आजादी का दूसरा आंदोलन शुरू हो गया है और मुझे गिरफ्तार कर लिया गया है, लेकिन मेरी गिरफ्तारी से आंदोलन कतई थमने वाला नहीं। भ्रष्टाचारियों का असली चेहरा सामने आ गया है। यह परिवर्तन की लड़ाई है। जब तक परिवर्तन नहीं आएगा तब तक लोकशाही हासिल नहीं होगी, समय आ गया है कि सभी लोग गिरफ्तारी दें और देश में कोई भी जेल खाली न बचे। सभी समर्थक आठ दिनों तक अपने काम से छुट्टी लें और आंदोलन में कूद पड़ें। लोगों के बड़ी संख्या में शामिल होने से ही यह आंदोलन मजबूत होगा।
Anil Ambani, Anna Hazare, Arvind Kejriwal, Daily Pratap, delhi Police, Lokpal Bill, Tihar Jail, Vir Arjun

Wednesday, 17 August 2011

अगस्त क्रांति ः सरकार और अन्ना की आरपार की लड़ाई


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17 August 2011
अनिल नरेन्द्र
आजादी की वर्षगांठ पर ही एक बड़े संघर्ष की घोषणा हो गई है। आजादी की 64वीं वर्षगांठ पर एक तरफ प्रधानमंत्री और उनकी सरकार है तो दूसरी तरफ अन्ना हजारे और उनकी सिविल सोसाइटी। एक तरफ सर्वशक्तिमान सरकार है जो हर हालत में अन्ना के आंदोलन को दबाना चाहती है तो दूसरी तरफ आम जनता का समर्थन पा रहे भ्रष्टाचार समाप्त करने की लड़ाई लड़ने पर आमादा अन्ना हजारे। अपने वायदेनुसार अन्ना ने मंगलवार सुबह अपना आमरण अनशन शुरू करने का प्रयास किया पर उन्हें रास्ते में ही गिरफ्तार कर लिया गया। उनके साथ अन्ना के खास समर्थक शांतिभूषण, अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी को भी हिरासत में ले लिया गया। इससे पहले 15 अगस्त का दिन गहगमा का रहा। सुबह स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री ने देश को प्राचीन लाल किले परिसर से संबोधित किया। अपने संबोधन में डॉ. मनमोहन सिंह ने अन्ना को सीधी चुनौती दे डाली। उन्होंने कहा कि अनशन से नहीं मिटेगा भ्रष्टाचार। भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिल लाने की लड़ाई लाल किले से और तीखी हो गई। प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार के दामन पर दाग को स्वीकारते हुए इस बीमारी से लड़ने में अपने संकल्पों की सफाई तो दी, लेकिन भ्रष्टाचार मिटाने के लिए अनशन को गलत करार दिया। राष्ट्रमंडल खेलों से लेकर 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में गड़बड़ियां बेनकाब होने के बाद पहली बार लाल किले परिसर पर झंडा फहरा रहे पीएम ने सरकारी खरीद में घोटालों, ठेकों में बेइमानी, विवेकाधीन अधिकारों के दुरुपयोग समेत केंद्र सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के छींटों को बेबाकी से स्वीकारा। मनमोहन सिंह ने कहा कि शीर्ष पदों पर भ्रष्टाचार को रोकने के लिए मजबूत लोकपाल विधेयक संसद में पेश किया है। इसके कुछ मुद्दों पर मतभेद हैं, जो लोग इससे सहमत नहीं हैं, वे अपना नजरिया संसद को बता सकते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि इसके लिए भूख हड़ताल का सहारा नहीं लेना चाहिए।
दूसरी ओर अन्ना हजारे ने नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशनल क्लब में एक प्रेस कांफ्रेंस कर प्रधानमंत्री, कपिल सिब्बल इत्यादि के प्रश्नों का खुलकर जवाब दिया। अन्ना ने किसी कीमत पर नहीं झुकने के अपने इरादे तो किए ही, प्रधानमंत्री की ओर से लाल किले की प्राचीर से खुद को दी गई सलाह का जवाब भी दे दिया। इसी तरह उन्होंने दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल की ओर से `जन लोकपाल' के खिलाफ दिए तर्कों को भी छलनी कर दिया। प्रधानमंत्री के तर्कों को पूरी तरह नकारते हुए अन्ना ने कहा, `मैं न तो संसद के खिलाफ हूं, न ही संसदीय प्रक्रिया के। लेकिन प्रधानमंत्री जी, आप संसद के सामने सही बिल तो रखिए।' प्रधानमंत्री पर सीधा हमला करते हुए अन्ना ने कहा, `मैं कई बार कहता था कि प्रधानमंत्री अच्छे आदमी हैं, लेकिन ये तो कपिल सिब्बल की ही भाषा बोल रहे हैं।' अपने इरादों को जाहिर करते हुए अन्ना ने कहा, `मैं मंगलवार सुबह 10 बजे जेपी पार्प पहुंच जाऊंगा। अगर पुलिस गिरफ्तार करती है तो जेल में अनशन करूंगा, छोड़ी देती है तो फिर जेपी पार्प कूच करूंगा।' अब यह आंदोलन रुकने वाला नहीं है। केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के तर्कों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, `मैं 100 फीसदी तो गारंटी नहीं दे सकता, लेकिन जन लोकपाल को लागू करने से देश में 60 से 65 फीसदी भ्रष्टाचार दूर हो जाएगा। इस बात की मैं लिखित गारंटी देने को तैयार हूं। अगर ऐसा नहीं हुआ तो मैं जिन्दगीभर के लिए सिब्बल के यहां पानी भरने को तैयार हूं।' इससे एक दिन पहले कपिल सिब्बल ने कहा था कि अन्ना हजारे लिखित गारंटी दें कि जन लोकपाल बिल लाने से देश में भ्रष्टाचार दूर हो जाएगा, तो सरकार उनका मसौदा मानने को तैयार है। अन्ना ने यह भी साफ किया कि उनका मकसद सरकार को गिराना नहीं है। क्योंकि जो दूसरे मौजूदा विकल्प हैं, वे भी कम भ्रष्ट नहीं हैं। साथ ही यह भी साफ किया कि अगर सरकार जनता की भावना को नहीं समझ सकती तो गिर भी जाए तो गम नहीं है।
अन्ना के साथ जन समर्थन है इसका हमें एक उदाहरण सोमवार सुबह राजघाट में मिला। बिना पूर्व सूचना जब अन्ना हजारे राजघाट पहुंचे तो उनके साथ करीब 100 लोग होंगे, लेकिन धीरे-धीरे भारी बारिश के बावजूद भीड़ जुटनी शुरू हो गई और देखते ही देखते यह संख्या हजारों में पहुंच गई, जिसे जहां जगह मिली वहीं खड़ा हो अन्ना के समर्थन में नारे लगाने लगे। अन्ना हजारे नहीं आंधी है, आज के गांधी हैं, के नारे खुलेआम राजघाट में लगने लगे। राजघाट पर जिस तरह अन्ना के समर्थन में लोग सोमवार को उमड़ पड़े, उससे साफ जाहिर है कि केंद्र सरकार अन्ना पर चाहे जितने आरोप लगाए, जनता को वह डिगा नहीं सकते। 80 वर्षीय परवेज जो लाठी के सहारे चल रहे थे, कहते हैं कि हम तो अब जाने वाले हैं, समाज और देश को सही मुकाम तभी मिल सकता है, जब सरकारी तंत्र भ्रष्टाचारमुक्त होगा। उनके साथ उनका पोता भी था, जिसकी तरफ उनका इशारा था कि इसका भविष्य...। अन्ना की साफ-सुथरी छवि से लोगों को जिस तरह लगाव है, उसे इस बात से बल मिलता है कि लोग राजघाट पर अन्ना के पास पहुंचने के लिए इस तरह उतावले थे कि फरीदाबाद और गाजियाबाद से भी चल पड़े। जब अन्ना राजघाट से कांस्टीट्यूशनल क्लब गए तो सैकड़ों लोग पैदल उनके पीछे-पीछे हो लिए।
आगे क्या होगा? अन्ना ने सारे देश का फोकस भ्रष्टाचार पर तो कर ही दिया है। सरकार अन्ना को फेल करने पर तुली हुई है पर इससे अन्ना का जन समर्थन बढ़ता जा रहा है और सरकार ज्यादा बदनाम हो रही है। जिस ढंग से सरकार और उसके मंत्री अन्ना पर कीचड़ उछाल रहे हैं वह सार्वजनिक जीवन में सक्रिय और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को शोभा नहीं देता। पहले कांग्रेस प्रवक्ता और फिर केंद्र सरकार के मंत्रियों ने अन्ना हजारे को भ्रष्ट और खलनायक साबित करने के लिए जिस तरह गढ़े मुर्दे उखाड़ने का सहारा लिया उससे तो यही सिद्ध होता है कि केंद्रीय सत्ता भिन्न विचार रखने वालों को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। अन्ना को अनशन करने की अनुमति न देना और फिर उन्हें गिरफ्तार करना न केवल देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है बल्कि साथ-साथ इस सरकार की बौखलाहट को भी दर्शाता है। यह अफसोस की बात है कि सरकार अन्ना को फेल करने के लिए हर तरह का हथकंडा तो अपना रही है पर उस मर्ज का इलाज करने को तैयार नहीं जो इस देश की सबसे बड़ी बीमारी बन गई है। भ्रष्टाचार का कैंसर बुरी तरह से फैल रहा है और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए अपेक्षित कदम उठाने से भाग रही है। सवाल यह है कि ऐसा करके मनमोहन सिंह सरकार जनता को क्या संदेश देना चाह रही है कि वह भ्रष्टाचार को रोकने में कोई दिलचस्पी नहीं रखती? संसद के अन्दर अंक-गणित सही रखकर जनता के अरमानों को कुचल देगी? अन्ना के आंदोलन को भारत के विभिन्न राजनीतिक दल ऊपरी तौर पर तो समर्थन कर रहे हैं पर अन्दरखाते कोई भी पार्टी उनके जन लोकपाल बिल का खुला समर्थन करने को तैयार नहीं। अन्ना ने जो आंधी की शुरुआत की है, लगता नहीं कि अब यह थमने वाली है। सरकार ने ऐसी पोजीशन ले ली है कि अब उसका पीछे हटना मुश्किल है। इसलिए आजादी की 64वीं वर्षगांठ में एक नई लड़ाई व संघर्ष की शुरुआत हो चुकी है। आने वाले दिनों में यह पता चलेगा कि यह आंधी क्या रूप-रंग लेती है। अन्ना का आंदोलन चले या न चले, भ्रष्टाचार से जनता आजिज आ चुकी है और अब समय आ गया है कि इस पर काबू पाने के लिए कोई ठोस रणनीति अपनाई जाए। दमनचक्र से आप रोक सकते हो, दबा नहीं सकते।
Anil Narendra, Anna Hazare, Arvind Kejriwal, Civil Society, Daily Pratap, Kiran Bedi, Lokpal Bill, Shanti Bhushan, Tihar Jail, Vir Arjun

Thursday, 23 June 2011

अभी कुछ महीने और तिहाड़ में ही रहेंगी कनिमोझी


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23nd June 2011
अनिल नरेन्द्र
`सॉरी मैडम वी हैव ट्राइड ऑवर बैस्ट।' सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में कनिमोझी के वकीलों ने जब ये शब्द कहे तो दो माह पूर्व तक तमिलनाडु के वीवीआईपी का दर्जा रखने वाली कनि की मां रजती अम्मल फूट-फूट कर रोने लगी। उन्हें बहुत उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट से कनिमोझी को जमानत मिल जाएगी। रुआंसी और आंसू पोंछती रजती ने उन्हें कोई जवाब नहीं दिया। बस हाथ जोड़कर सिर हिलाया और आगे बढ़ गई। थके मुकदमे में बालू भी उनके पीछे चल दिए। बालू ने ढाई घंटे चली पूरी कार्रवाई खड़े होकर ही सुनी थी। रजती पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि की तीसरी पत्नी हैं, कनिमोझी (43) उनकी इकलौती संतान है। पहली पत्नी की मृत्यु के बाद करुणानिधि ने दयालु अम्मा से विवाह किया। दयालु कलैग्नार टीवी में 60 फीसदी शेयर की मालिक है। रजती काफी दिनों तक करुणानिधि के साथ ऐसे ही रहती रही। करुणानिधि ने उनके साथ कभी विधिवत विवाह नहीं किया। उन्हें पत्नी भी 10-12 साल पहले तब माना था जब चुनाव में उन्होंने अपनी आय का शपथ पत्र दायर किया और उसमें अम्मा के नाम कुछ सम्पत्ति दिखाई। लोगों ने जब पूछा कि रजती कौन है तब उन्होंने कहा कि वह उनकी पत्नी है।
2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में अभियुक्त द्रमुक सांसद कनिमोझी को सुप्रीम कोर्ट आना महंगा पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका ही खारिज नहीं की बल्कि भविष्य में जमानत देने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। कनिमोझी अब जमानत के लिए तब ही आवेदन कर पाएगी जब उनके खिलाफ निचली अदालत में आरोप तय हो जाएंगे। आरोप तय होने में तीन माह का समय लग सकता है, लेकिन सुनवाई अदालत सिर्प इस केस के लिए बनी है इसलिए हो सकता है कि यह अवधि कुछ दिन कम हो जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कनि की यह दलील अस्वीकार कर दी कि उन्हें धारा 437 के तहत जमानत दी जाए। कोर्ट ने कहा कि आपमें क्या खास बात है, आपकी तरह सैकड़ों विचाराधीन महिला कैदी जेल में हैं और बच्चों से दूर हैं। कनिमोझी 20 मई से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बन्द है। जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस बीएस चौहान की खंडपीठ ने यह फैसला जमानत का विरोध कर रही सीबीआई और कनिमोझी के वकीलों की डेढ़ घंटा बहस सुनने के बाद दिया। जमानत खारिज करने का दो लाइन का फैसला सुनकर कनि के वकीलों का चेहरा फक रह गया। कनिमोझी के वकीलों ने बहुत कोशिश की कि जमानत किसी भी हालत में हो जाए। उन्होंने यहां तक कह दिया कि वह कोर्ट की कठोर से कठोर शर्तें मानने को तैयार हैं। यदि सीबीआई को डर है कि अपने राजनैतिक रसूख से गवाहों और जांच को प्रभावित कर सकती है तो उन्हें उनके घर में नजरबन्द भी रखा जा सकता है। कनिमोझी के वकीलों का तो यहां तक कहना था कि अमेरिका की तरह यहां पैरों में रेडियो एंकलेट तो नहीं लगाए जाते, लेकिन उनके घर में 24 घंटे पहरेदारी तथा इलैक्ट्रॉनिक निगरानी (कैमरे तथा वायरलेस) रखी जा सकती है पर कोर्ट ने उनकी कोई दलील नहीं मानी। बस इतनी छूट जरूर दी कि अदालत ने कहा कनिमोझी आरोप तय होने के बाद मामले की सुनवाई कर रही कोर्ट से नियमित जमानत मांग सकती हैं। वहां मामले को नए सिरे से सुना जाएगा।
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Sunday, 1 May 2011

बड़ी मछलियों को सीबीआई क्यों बचा रही है?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 01 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र

भारत में अकसर यह कहा जाता है कि बड़ी मछलियां तो फंसती नहीं और छोटी मछलियों से सरकारी एजेंसियां खानापूर्ति कर लेती हैं। बात 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की कर रहा हूं। हालांकि ईडी अपना काम तेजी और पारदर्शिता से कह रहा है और कई दिग्गजों को तिहाड़ पहुंचा चुका है पर सवाल यह भी उठ रहा है कि सीबीआई ने जो चार्जशीट दाखिल की है उसमें रिलायंस टेलीकॉम के अध्यक्ष अनिल अम्बानी, एस्सार के सीईओ प्रशांत रुइया और टाटा टेलीसर्विसेज जैसी बड़ी मछलियों के नाम गायब हैं? सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में एक एनजीओ सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन ने आरोप लगाया है कि यह कम्पनियां ही 2जी मामले में वास्तविक लाभार्थी हैं। संगठन की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि शाहिद उस्मान बलवा की स्वान टेलीकॉम रिलायंस कम्युनिकेशन की फ्रंट कम्पनी थी जबकि लूप टेलीकॉम एस्सार ग्रुप की फ्रंट कम्पनी थी। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु स्थित एनजीओ को धन देने पर टाटा टेलीसर्विसेज को फायदा पहुंचाया गया। द्रमुक सांसद कनीमोझी इस एनजीओ की निदेशक थीं। उन्होंने कहा कि चार्जशीट में अनिल अम्बानी का नाम नहीं है। सीबीआई ने उन्हें बचाने की कोशिश की है और चार्जशीट में केवल अफसरों को आरोपी बनाया गया है। कोर्ट ने कहा कि उनकी इस दलील पर 3 मई को होने वाली सुनवाई में इस पर विचार किया जाएगा।
उधर उद्योगपति रतन टाटा तथा कारपोरेट जगत के लिए लॉबिंग करने वाली नीरा राडिया की भी 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में भूमिका की जांच करने के लिए पटियाला हाउस में विशेष रूप से बनी विशेष अदालत में भी यह अर्जी दाखिल की गई है। अदालत ने इस पर विस्तृत रूप से सुनवाई के लिए 2 मई की तारीख तय की है। उत्तर प्रदेश के रहने वाले धर्मेन्द्र पांडे के वकील एसके सिंह द्वारा दायर अर्जी में आरोप लगाया गया है कि सीबीआई ने इस घोटाले में टाटा और राडिया की भूमिका की जांच नहीं की और उनकी अनदेखी की गई है। अर्जी में कहा गया है कि सीबीआई ने टाटा टेलीसर्विसेज को नीतियों और प्रतिक्रियाओं का उल्लंघन कर लाइसेंस दिया गया लेकिन इस तथ्य की पूरी तरह अनदेखी की। अर्जी में आरोप लगाया गया है कि टाटा टेलीसर्विसेज को लाइसेंस दिलाने में नीरा राडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कहा गया है कि सीबीआई को आरोप पत्र दाखिल करने से पहले जांच के दौरान टाटा टेलीसर्विसेज को लाइसेंस दिए जाने में नीतियों, प्रक्रियाओं के उल्लंघन की जानकारी थी पर जानबूझकर इसमें चूक की वजह पर ध्यान नहीं दिया। अर्जी में न्यायमूर्ति शिवराज पाटिल समिति की रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया है जिसमें कहा गया है कि टाटा ने आखिरी तारीख यानि एक अक्तूबर 2007 तक यूएएस लाइसेंस के लिए आवेदन नहीं किया था। अर्जी में आरोप लगाया गया है कि उसके बाद ही नीरा राडिया ने अपने प्रयास से लाइसेंस दिलवाया।
सबकी नजरें अब 2 और 3 मई को पटियाला हाउस और सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही पर टिकी हैं। देश देखना यह चाहता है कि क्या बड़ी मछलियों पर हाथ डालने का साहस इस सरकार और उनकी एजेंसियों में है या नहीं?

Tuesday, 26 April 2011

कारपोरेट कैदियों को तिहाड़ का लंगर पसंद नहीं आया

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 26 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र

लाखों रुपये की सालाना सेलरी लेने वाले कारपोरेट जाइंट्स की आजकल तिहाड़ में जिंदगी कैसी गुजर रही होगी? प्राप्त समाचारों के अनुसार तिहाड़ में उनका हाल खस्ता है। 26 अप्रैल तक ये बड़े लोग जेल नंबर तीन के वार्ड नंबर चार में बारह फीट लम्बी और दस फीट चौड़ी कोठरी में ही दिन और रात बिताएंगे। इसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट उनकी जमानत याचिकाओं पर अपना फैसला देगी। जेल के पहले दिन बुधवार रात को इन लोगों को चार कंबल मिले। एक दरी, कुछ चादरें भी दी गईं। लेकिन जेल में कोई बन्द नहीं था लिहाजा उन्हें जमीन पर ही सोना पड़ रहा है। खाना भी उन्हें जेल में बना खाना पड़ रहा है। हां जेल में उनके लिए राहत की बात है कि कोठरी से लगा शौचालय में एक पंखा लगा हुआ है। लेकिन वार्ड में एक ही खिड़की है जहां से थोड़ी रोशनी उनके हिस्से  में आ सकती है। इनको अपना वार्ड छोड़ने की इजाजत नहीं है। दरअसल यूनिटेक के प्रबंधक निदेशक संजय चंद्रा, स्वान  टेलीकॉम के निदेशक विनोद गोयनका और धीरु भाई अंबानी समूह के तीन आला अधिकारी गौतम दोशी, हरि नायर और सुरेन्द्र पीपारा जेल में इससे ज्यादा जगह की उम्मीद भी नहीं कर सकते। तिहाड़ पहले से ही जरूरत से ज्यादा भरी है। गुरुवार को तिहाड़ परिसर की नौ जेलों में 11,696 कैदी बन्द थे।
तिहाड़ जेल में बन्द इन कारपोरेट हस्तियों को जेल के लंगर का खाना पसंद नहीं आया। अब वे कैंटीन से खाना खरीद कर खाते हैं। इनमें से कोई भी जेल में सुबह-सुबह होने वाली प्रार्थना में भी शरीक नहीं हुआ। सूत्रों ने यह जानकारी देते हुए बताया कि अब तक किसी ने भी उन पांच-पांच लोगों के नाम भी जेल प्रशासन को नहीं दिए हैं जिनसे इन्हें मुलाकात करनी है जबकि तिहाड़ जेल प्रशासन ने कुछ समय पहले यह नियम बनाया था कि जेल में जो भी विचाराधीन कैदी आएगा उसी वक्त उससे उन पांच लोगों के नाम, पता और टेलीफोन नंबर ले लिए जाएंगे जिनसे कैदियों को मुलाकात और बाद में जेल में ही उपलब्ध सुविधा के तहत फोन पर बात करनी होगी। सुबह 5.30 बजे जेल खुल जाती है और 6 बजे सभी जेलों में प्रार्थना होती है। इसमें सभी विचाराधीन और सजायाफ्ता कैदियों को शरीक होना पड़ता है। लेकिन शुक्रवार को इनमें से कोई भी प्रार्थना में नहीं गया। सभी ने दोपहर में वार्ड में ही चहलकदमी की पर किसी से बात नहीं की। शुक्रवार को उन्होंने अखबारों की मांग की। अपने-अपने सेल में अधिकतर वक्त वे टीवी पर न्यूज देखते रहे। जेल आने के वक्त ही ये अपने साथ दो-दो जोड़ी कपड़े लाए थे। इनमें से एक भी तनाव में नहीं दिख रहा है।
कड़ी सुरक्षा वाले कैदियों के लिए विशेष यही है कि दुर्दांत अपराधियों से उन्हें बचाने के बंदोबस्त किए गए हैं। तिहाड़ जेल के एक अधिकारी ने बताया कि वसूली के लिए इन बड़े लोगों पर हमला हो सकता है। बहरहाल में पांच बड़े लोग भले ही जेल में एक साथ न रह पाएं, राजा की तरह कुछ नियमों से वे प्रोत्साहित हो सकते हैं। फरवरी में जब ए. राजा तिहाड़ पहुंचे थे तो उन्हें भी खाली संकरे स्थान में रखा गया जहां छत पर लोहे की एक झिरी से रोशनी आती थी। जाली वाले दरवाजे के कारण उनके लिए कोई एकांत नहीं था। लेकिन एक हफ्ते बाद ही राजा ने इस बन्द जगह को अपना घर बनाना शुरू कर दिया। जेल कैंटीन में डोसा, इडली, सांभर स्वादिष्ट मिलती है और यह उसी को खा रहे हैं।