Translater

Showing posts with label delhi Police. Show all posts
Showing posts with label delhi Police. Show all posts

Sunday, 1 July 2012

दिल्ली के नए पुलिस आयुक्त नीरज कुमार का स्वागत है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1 July 2012
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली पुलिस के नए आयुक्त नीरज कुमार एक जुलाई से पद्भार सम्भालेंगे। वर्तमान पुलिस आयुक्त बीके गुप्ता 30 जून को सेवानिवृत्त हो गए, उनकी जगह अब नीरज कुमार नए दिल्ली पुलिस कमिश्नर होंगे। श्री नीरज कुमार का हम बतौर दिल्ली पुलिस कमिश्नर स्वागत करते हैं। दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से 1973 में स्नातक की डिग्री लेने के बाद नीरज 1975 में इंडियन पुलिस सर्विस (आईपीएस) में शामिल हुए थे। मूल रूप से बिहार के रहने वाले नीरज कुमार फिल्म सितारे शत्रुघ्न सिन्हा के दूर के रिश्तेदार भी हैं। नीरज कुमार लगभग 12 हजार कैदियों से भरे तिहाड़ जेल के ऐसे तीसरे मुखिया हैं, जो दिल्ली पुलिस की कमान सम्भाल रहे हैं। इससे पहले बीके गुप्ता और उससे पहले आरएस गुप्ता तिहाड़ जेल से दिल्ली पुलिस के सीपी तक के रास्ते का सफर तय कर चुके हैं। इस हैट्रिक के कारण अब तिहाड़ की पोस्टिंग भी शायद दिल्ली पुलिस के आला अफसरों में हॉट मानी जाने लगी है, क्योंकि तिहाड़ की पोस्टिंग को रोड लाइन पोस्टिंग मानी जाती रही है। जेल के लॉ ऑफिसर सुनील कुमार गुप्ता बताते हैं कि नीरज कुमार ने अपने कार्यकाल में वैसे तो कई महत्वपूर्ण काम किए लेकिन पांच काम के लिए यहां के हजारों कैदी उनको याद करेंगे। उन्होंने सेमी ओपन जेल की शुरुआत करवाई। कैदियों को ज्यादा से ज्यादा नॉर्मल करने के लिए जेल के अन्दर म्यूजिक रूम शुरू करवाए। काम करने वाले कैदियों का मेहनताना लगभग डबल करवा दिया। पढ़ो और पढ़ाओ अभियान से निरक्षर को साक्षर बनाने का कारगर कदम उठाया और इसमें काफी सफलता भी मिली। जेल में जो निरक्षर कैदियों का प्रतिशत 40 प्रतिशत था वह घटकर सीधा छह फीसदी रह गया है। इतना ही नहीं, जॉब प्लेसमेंट अभियान में जोर लगाकर 400 कैदियों को सीधे जेल से नौकरी लगवाने में महत्वपूर्ण योगदान भी याद किया जाएगा। 1984 में हुए दंगों के दौरान पुलिस की भूमिका को लेकर बनाए गए आयोगों के सामने इन्होंने पुलिस की छवि को बरकरार रखा था। ट्रैफिक पुलिस के उपायुक्त के पद पर रहते हुए एयरपोर्ट पर प्रीपैड टैक्सी सर्विस सेवा शुरू की थी। ट्रक ड्राइवरों की आंखों की मुफ्त जांच का कैम्प भी नीरज ने ही शुरू किया था। दक्षिण जिले की कमान सम्भालने के दौरान इन्होंने ताबड़तोड़ वारदात कर रहे सासी गिरोहों का पर्दाफाश किया था। आरक्षण को लेकर हुए आंदोलन को सम्भालने में भी नीरज ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वर्ष 1993 में हुए मुम्बई बम धमाकों की जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन बम धमाकों की जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी। इन्होंने सीबीआई में एसटीएफ शाखा का गठन किया। इस एसटीएफ ने मेनन परिवार के सात लोगों को गिरफ्तार किया था। इसी एसटीएफ ने 1994 में हुए ट्रेन धमाकों को सुलझाया था। हम श्री नीरज कुमार की इस हॉट सीट पर बैठने का स्वागत करते हैं, इनके हाथों दिल्ली सुरक्षित रहेगी इसकी उम्मीद करते हैं।

Tuesday, 5 June 2012

जब विधायक ही असुरक्षित हैं तो आम जनता का क्या होगा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 5 June 2012
अनिल नरेन्द्र
दिल्लीवासियों को अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित होना स्वाभाविक ही है क्योंकि यहां तो विधायक तक अपने आपको असुरक्षित महसूस करते हैं। दिल्ली के विधायक अपनी सुरक्षा की गुहार विधानसभा में बाकायदा लगा रहे हैं। नरेला के विधायक जसवंत सिंह राणा को बेटे की 50 लाख रुपये की फिरौती का फोन आया है तो शोएब इकबाल ने गोली चलने और हमले की शिकायत दे रखी है। अभी इन मामलों में विधानसभा में चर्चा चल ही रही थी कि खबर आई कि नजफगढ़ से इनेलो विधायक भरत सिंह (37) को शनिवार सुबह आधा दर्जन हमलावरों ने उनके दफ्तर में घुसकर गोली मार दी। विधायक को तीन गोलियां लगीं। एक बाजू पर और दो गोलियां पेट पर लगी हैं। हमले में एक गोली भरत सिंह के मामा धर्मपाल (55) को भी लगी है। दोनों की हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है। उधर जसवंत सिंह राणा ने दिल्ली विधानसभा में कहा कि 25 मई को नामजद शिकायत किए जाने के बावजूद अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। शोएब इकबाल ने कहा कि कई अन्य विधायकों के साथ भी वारदात हो चुकी है। विधायकों ने सदन में एक स्वर में कहा कि यूपी, हरियाणा, पंजाब या अन्य राज्यों की तर्ज पर विधायकों को सुरक्षा मिलनी चाहिए। तरविन्दर सिंह मारवाह ने कहा कि जिस तरह से जसवंत सिंह राणा को धमकी दी गई है उससे पूरा परिवार डरा हुआ है। मुख्यमंत्री तो गाड़ियों में काफिले के साथ चलती हैं, हमारा क्या होगा? वहीं शोएब इकबाल ने कहा कि बृहस्पतिवार रात बदमाशों ने उनकी गाड़ी पर गोलियां चलाईं और पथराव किया। अगर सुरक्षा नहीं मिलती है और कुछ हो जाता है तो जिम्मेदारी मुख्यमंत्री, उपराज्यपाल या पुलिस आयुक्त की होगी। पुलिस का कहना है कि विधायक ने मुलाकात करके जानकारी दी है लेकिन लिखित शिकायत नहीं की है। जसवंत राणा ने फोन करके फिरौती मांगने वाले का नाम नीरज अवाना बताया है। बवाना औद्योगिक क्षेत्र में इसका गिरोह वसूली करता है। बवाना के विधायक सुरेन्द्र कुमार का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों की हालत और ज्यादा खराब है। विधानसभा अध्यक्ष के निर्देश पर पुलिस आयुक्त को तलब किया गया है। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा कि राणा मामले में पुलिस आयुक्त से चर्चा की है। बहुत-सी बातें ऐसी हैं जो सदन में नहीं कही जा सकतीं। विधायकों की सुरक्षा प्राथमिकता है। पुलिस कार्रवाई कर रही है, जहां सब कुछ सामने आ जाएगा। विधायकों की सुरक्षा जरूरी है पर हर विधायक को निजी सुरक्षाकर्मी नहीं दिए जा सकते। पहले से ही पुलिस की बहुत ज्यादा फोर्स वीवीआईपी ड्यूटी पर लगी हुई है। पब्लिक सिक्यूरिटी भी तो प्राथमिकता है। यह सही नहीं कि मुट्ठीभर वीवीआईपी की सुरक्षा पब्लिक की कीमत पर की जाए। आवश्यक तो यह है कि दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया जाए। कुछ जनता के प्रतिनिधियों के एंटी सोशल एलीमेंट्स से गहरे रिश्ते हैं और चुनाव के समय यह उनका इस्तेमाल भी करते हैं। पुलिस जांच से पता चलेगा कि विधायकों की शिकायत में कितनी सच्चाई है पर चिन्ता का विषय तो यह है कि जब दिल्ली के चुने प्रतिनिधि अपने आपको सुरक्षित महसूस नहीं करते तो आम जनता कितनी सुरक्षित होगी?

Tuesday, 22 May 2012

तीन जजों पर हमला रोडरेज का मामला नहीं हत्या के प्रयास का है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22 May 2012
अनिल नरेन्द्र
साकेत कोर्ट के तीन जजों पर जानलेवा हमला करने वाले चारों आरोपियों को शनिवार को अदालत ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। आरोपियों के नाम दक्षिणपुरी निवासी अनिल राज, सुनील राज व संगम विहार निवासी रोहित और प्रशांत उर्प हन्नी हैं। अनिल राज और सुनील राज सगे भाई हैं। गिरफ्तार किए गए आरोपी अनिल राज के खिलाफ अम्बेडकर नगर में पहले से ही दो मामले दर्ज हैं। दिल्ली पुलिस के विशेष आयुक्त (लॉ एण्ड ऑर्डर) धर्मेन्द्र कुमार के मुताबिक जजों के कार चालक चमन लाल और बाइक सवार आरोपियों के बीच रोडरेज के कारण कहासुनी हुई थी। पहले तो उन्होंने मामले को रफा-दफा करने की सोची पर जब उसने देखा कि कार पर जज का स्टिकर लगा है, उसने वहां अपने साथियों को भी बुला लिया। विशेष आयुक्त धर्मेन्द्र कुमार के अनुसार अनिल राज से पूछताछ पर जो पता चला वह बेहद ही चौंका देने वाला है। हमले का एक कारण यह भी था कि अनिल राज को एक मामले में इन्हीं जजों ने सजा सुनाई थी। एडिशनल पुलिस कमिशनर दक्षिण-पूर्वी जिला अजय चौधरी के मुताबिक पूछताछ में चारों आरोपी अनिल राज, सुनील राज, रोहित व प्रशांत ने कबूल किया है कि उन्होंने जानबूझ कर जजों पर हमला किया था। शनिवार को चारों की टीआईपी (शिनाख्त परेड) कराई गई, जिसमें इनकी पहचान कर ली गई। ज्ञात रहे साकेत कोर्ट में तैनात अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एमके नागपाल, इन्द्रजीत सिंह मेहता व महानगर दंडाधिकारी अजय गर्ग कार से बृहस्पतिवार की शाम करीब पांच बजे फरीदाबाद स्थित अपने-अपने घर जा रहे थे। कार चालक चमन लाल चला रहा था। सभी मदनगीर की तरफ से जा रहे थे। जैसे ही उनकी कार दक्षिणपुरी जे ब्लॉक, काली बिल्डिंग के पास पहुंची, सामने से गलत दिशा में आ रही मोटर साइकिल कार से टकरा गई। इससे बिना हेलमेट के मोटर साइकिल सवार तीनों युवक नीचे गिर पड़े। जजों द्वारा उन्हें उठाने के बाद दोनों पक्षों में बहस हो गई। मामला शांत होने पर जब जज कार में बैठकर वहां से चलने लगे तभी तीनों ने अपने एक अन्य साथी को भी मौके पर बुला लिया। चमन लाल कार लेकर चला ही था कि चारों ने उनकी कार रुकवाकर जजों व चालक पर हमला बोल दिया। ईंट व पत्थर से कार को क्षतिग्रस्त कर दिया। घटना में जज इंद्रजीत सिंह के हाथ और सिर से तथा जज मनोज कुमार नागपाल के सिर के पिछले हिस्से और हाथ में चोट आई। घटना के तुरन्त बाद एक आरोपी अनिल राज ने खुद ही अपना सिर फोड़कर एम्स ट्रामा सेंटर जा पहुंचा। उसने पुलिस को दिए बयान में जजों पर मारपीट का आरोप लगाया ताकि क्रॉस केस हो जाने पर वह सजा से बच सके किन्तु ट्रामा सेंटर में चालक चमन लाल ने उसकी पहचान कर ली और उसे गिरफ्तार करवा दिया। उसके बयान के बाद देर रात ही अन्य तीनों को भी दबोच लिया गया। लगता है कि मामला रोडरेज का नहीं, जजों की हत्या के प्रयास का था। इन तीनों-चारों को सख्त से सख्त सजा होनी चाहिए ताकि दूसरों के लिए यह सबक व चेतावनी बन सके। जजों पर यूं हमला किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
साकेत कोर्ट के तीन जजों पर जानलेवा हमला करने वाले चारों आरोपियों को शनिवार को अदालत ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। आरोपियों के नाम दक्षिणपुरी निवासी अनिल राज, सुनील राज व संगम विहार निवासी रोहित और प्रशांत उर्प हन्नी हैं। अनिल राज और सुनील राज सगे भाई हैं। गिरफ्तार किए गए आरोपी अनिल राज के खिलाफ अम्बेडकर नगर में पहले से ही दो मामले दर्ज हैं। दिल्ली पुलिस के विशेष आयुक्त (लॉ एण्ड ऑर्डर) धर्मेन्द्र कुमार के मुताबिक जजों के कार चालक चमन लाल और बाइक सवार आरोपियों के बीच रोडरेज के कारण कहासुनी हुई थी। पहले तो उन्होंने मामले को रफा-दफा करने की सोची पर जब उसने देखा कि कार पर जज का स्टिकर लगा है, उसने वहां अपने साथियों को भी बुला लिया। विशेष आयुक्त धर्मेन्द्र कुमार के अनुसार अनिल राज से पूछताछ पर जो पता चला वह बेहद ही चौंका देने वाला है। हमले का एक कारण यह भी था कि अनिल राज को एक मामले में इन्हीं जजों ने सजा सुनाई थी। एडिशनल पुलिस कमिशनर दक्षिण-पूर्वी जिला अजय चौधरी के मुताबिक पूछताछ में चारों आरोपी अनिल राज, सुनील राज, रोहित व प्रशांत ने कबूल किया है कि उन्होंने जानबूझ कर जजों पर हमला किया था। शनिवार को चारों की टीआईपी (शिनाख्त परेड) कराई गई, जिसमें इनकी पहचान कर ली गई। ज्ञात रहे साकेत कोर्ट में तैनात अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एमके नागपाल, इन्द्रजीत सिंह मेहता व महानगर दंडाधिकारी अजय गर्ग कार से बृहस्पतिवार की शाम करीब पांच बजे फरीदाबाद स्थित अपने-अपने घर जा रहे थे। कार चालक चमन लाल चला रहा था। सभी मदनगीर की तरफ से जा रहे थे। जैसे ही उनकी कार दक्षिणपुरी जे ब्लॉक, काली बिल्डिंग के पास पहुंची, सामने से गलत दिशा में आ रही मोटर साइकिल कार से टकरा गई। इससे बिना हेलमेट के मोटर साइकिल सवार तीनों युवक नीचे गिर पड़े। जजों द्वारा उन्हें उठाने के बाद दोनों पक्षों में बहस हो गई। मामला शांत होने पर जब जज कार में बैठकर वहां से चलने लगे तभी तीनों ने अपने एक अन्य साथी को भी मौके पर बुला लिया। चमन लाल कार लेकर चला ही था कि चारों ने उनकी कार रुकवाकर जजों व चालक पर हमला बोल दिया। ईंट व पत्थर से कार को क्षतिग्रस्त कर दिया। घटना में जज इंद्रजीत सिंह के हाथ और सिर से तथा जज मनोज कुमार नागपाल के सिर के पिछले हिस्से और हाथ में चोट आई। घटना के तुरन्त बाद एक आरोपी अनिल राज ने खुद ही अपना सिर फोड़कर एम्स ट्रामा सेंटर जा पहुंचा। उसने पुलिस को दिए बयान में जजों पर मारपीट का आरोप लगाया ताकि क्रॉस केस हो जाने पर वह सजा से बच सके किन्तु ट्रामा सेंटर में चालक चमन लाल ने उसकी पहचान कर ली और उसे गिरफ्तार करवा दिया। उसके बयान के बाद देर रात ही अन्य तीनों को भी दबोच लिया गया। लगता है कि मामला रोडरेज का नहीं, जजों की हत्या के प्रयास का था। इन तीनों-चारों को सख्त से सख्त सजा होनी चाहिए ताकि दूसरों के लिए यह सबक व चेतावनी बन सके। जजों पर यूं हमला किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
Anil Narendra, Daily Pratap, delhi Police, Judiciary, Vir Arjun

Sunday, 20 May 2012

राजधानी की सड़कों पर आम पब्लिक तो क्या जज भी सुरक्षित नहीं


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20 May 2012
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली की सड़कें इतनी असुरक्षित होती जा रही हैं कि अब तो सड़क पर चलने से डर लगने लगा है। आम लोग तो अब दूर की बात है, राजधानी में तो जज तक सुरक्षित नहीं हैं। हाल ही में लाजपत नगर इलाके में रोडरेज की घटना में एक जज के साथ मारपीट हुई थी अब बृहस्पतिवार शाम को एक बार फिर कार सवार तीन जजों पर हमला हो गया। यह वारदात दक्षिणपुरी इलाके में हुई जहां एस्टीम कार में सवार तीन जजों की गाड़ी मामूली रूप से एक बाइक से टच हो गई थी। इस बात को लेकर शुरू हुई कहासुनी के बाद विवाद इतना बढ़ गया कि बाइक सवार युवकों ने जज की गाड़ी पर ईंटें बरसाकर हमला कर दिया। मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट (एमएम) अजय गर्ग और दो एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज (एजीडे) मनोज कुमार नागपाल और इन्द्रजीत सिंह शाम को साकेत कोर्ट से एक ही कार से फरीदाबाद स्थित अपने घर जा रहे थे। दक्षिणपुरी के जे ब्लॉक में उनकी गाड़ी एक प्लेटिना बाइक से टकरा-सी गई। इससे बाइक पर सवार दो युवक भड़क गए और उन्होंने कार चालक चमन लाल को बाहर खींच लिया। युवकों ने पहले तो कार में सवार जजों के साथ बदसलूकी की और फिर उनके साथ हाथापाई की। थोड़ी देर बाद बाइक सवार दो और युवक वहां पहुंच गए और उन्होंने भी मारपीट शुरू कर दी। हमलावरों ने आसपास पड़े ईंट-पत्थरों से कार की तोड़फोड़ शुरू कर दी। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक पीछे की सीट पर बैठे दोनों एडीजे मनोज कुमार नागपाल और इन्द्रजीत सिंह पास स्थित एक मकान की तरफ भागे। दोनों एडीजे को मामूली चोट आई जबकि एमएम अजय गर्ग और ड्राइवर चमन लाल के सिर में चोटें आई हैं। हमलावर चारों युवक अपनी बाइकें घटनास्थल पर ही छोड़कर फरार हो गए। ये दोनों बाइकें दिल्ली नम्बर की हैं। पुलिस ने वारदात के बाद घटना में शामिल अनिल नामक युवक को अम्बेडकर नगर से पकड़ा और उसकी निशानदेही पर दो अन्य युवकों को भी हिरासत में लिया है। इसमें से अनिल ने खुद को पत्तर से घायल कर लिया है। वह अभी अस्पताल में दाखिल है। दिल्ली में रोडरेज की घटनाएं दिन-प्रति-दिन बढ़ती ही जा रही हैं। वर्ष 2011 में कुल हत्याएं 17 फीसदी रोडरेज के चलते हुईं, 2010 में यह तादाद 15 फीसदी थी। वक्त आ गया है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सजग हुआ जाए। सिर्प पुलिस को कोसने से कुछ खास नहीं होगा। बेशक अपराध नियंत्रण का जिम्मा पुलिस का है पर रोडरेज में पुलिस क्या कर सकती है? दिल्ली की सड़कों पर चलने वाले लोगों का आत्म संयम कम होता जा रहा है। मामूली-सी रगड़ लग जाए, साइड न मिले तो अपना आपा खो देते हैं। इन्हें अब इसकी परवाह भी नहीं कि जिस पर हमला कर रहे हैं वह व्यक्ति कौन है। किस उम्र का है? हाल में `एम्स' के एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि दिल्ली के तकरीबन 20 फीसदी से अधिक युवक रक्तचाप यानि ब्लड प्रेशर से ग्रस्त हैं। आधुनिक जीवन की आपाधापी और गलाकाट प्रतिस्पर्धा ने युवाओं को दिमागी तथा शारीरिक स्तर पर प्रभावित किया है अब जाहिर है। यही कारण है कि घर के भीतर-बाहर अपराध बढ़ रहे हैं। राजधानी में मौसम के पारे के साथ-साथ सड़क पर युवाओं का पारा भी बढ़ता जा रहा है। सड़कें तंग होती जा रही हैं, वाहन बढ़ते जा रहे हैं। जजों पर हमला करने वाले युवकों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। इनको तो सड़क पर चलने ही नहीं देना चाहिए। इनके लाइसेंस ही रद्द कर दो। तभी रोडरेज के यह बढ़ते मामले रुकेंगे।

Friday, 27 April 2012

राजधानी के बच्चियों के सौदागरों का धंधा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27 April 2012
अनिल नरेन्द्र
राजधानी दिल्ली में छोटी बच्चियों के सौदागरों ने आफत मचा रखी है। पिछले दिनों ऐसी उठाई गई आठ बच्चियों को छुड़ाया गया। एक एजेंसी ने छापा मारकर जिन आठ बच्चियों को छुड़ाया तो उन्होंने अपनी आपबीती चाइल्ड वैलफेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी) को बताई। इसके बाद सीडब्ल्यूसी ने पुलिस को निर्देश दिया कि इन लड़कियों से मिले सुरागों के आधार पर प्लेसमेंट एजेंसियों और ट्रेफिकिंग रैकेट में शामिल लोगों की पहचान की जाए और उन पर कार्रवाई की जाए। सीडब्ल्यूसी, लाजपत नगर ने पुलिस को निर्देश दिया है कि ट्रेफिकिंग के जाल में फंसी बाकी बच्चियों को भी छुड़ाया जाए। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों सीडब्ल्यूसी के निर्देश पर दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक प्लेसमेंट एजेंसी पर छापा मारकर आठ बच्चियों को आजाद कराया था। इन बच्चियों को पश्चिम बंगाल के अलग-अलग गांवों से ट्रेफिकर्स यहां लाए थे। प्लेसमेंट एजेंसी ने इन्हें नौकरानी के काम पर लगा दिया था। आरोप है कि वहां इनका शोषण हो रहा था। सूत्रों के मुताबिक कम से कम 20 बच्चियां इनके जाल में हैं। वसंत विहार जैसे पॉश इलाके से पिछले दिनों एक आठ साल की बच्ची को एक घर से छुड़ाया गया। यह बच्ची वहां नौकरानी थी। बटरफ्लाई चाइल्ड हेल्पलाइन ने वसंत विहार थाने में इस बारे में शिकायत दर्ज की थी। एडीशनल डीसीपी (साउथ) प्रमोद कुशवाहा ने बताया कि बच्ची बिहार के छपरा की रहने वाली है। जिस घर से बच्ची को छुड़ाया गया है, उसके मालिक का कहना है कि बच्ची उनकी दूर की रिश्तेदार है और 10 दिन पहले ही उसकी दादी उसे वहां छोड़कर आई थी। छुड़ाई गई आठ लड़कियों को सीडब्ल्यूसी के सामने पेश किया गया। दो लड़कियों ने साफ बताया कि उनके साथ बहुत कूरता की गई। उन्होंने कहा कि एम्प्लायर ने उन्हें फिजिकली अब्यूज किया और ये यौन प्रताड़ना की शिकार बनीं। प्लेसमेंट एजेंसी के मालिक के खिलाफ भी शिकायत है कि उसने बच्चियों को कोई मेहनताना भी नहीं दिया। एक लड़की ने बताया कि मालवीय नगर में जहां वह काम करती थी, उसका मालिक उसे छोटी-छोटी बातों पर पीटता था। उसे कभी पैसा नहीं दिया। दूसरी लड़की ने बताया कि उसे बुरी तरह मारा जाता था। उसने दाईं आंख पर चोट के निशान भी दिखाया। उसने बताया कि किस तरह मालिक का बेटा कई बार उसके शरीर को छूता था। जब कोई घर में नहीं होता था तो वह मुझे अपने कमरे में बुलाता था। जब मैंने यह सब करने से मना कर दिया तो उसने बुरा बर्ताव शुरू किया। मैंने डर के मारे किसी को कुछ भी नहीं बताया। एक नाबालिक लड़की जो मेड का काम करती थी, उसको पुलिस और बचपन बचाओ आंदोलन कार्यकर्ताओं ने गीता कॉलोनी से हाल में छुड़ाया। इलाके के घर में नौकरानी का काम करने वाली पर मालिक का डर इतना हावी था कि उसने चार साल पहले अपनी मां को ही पहचानने से इंकार कर दिया। बुधवार को जब वह अपने परिवार से मिली तो उसके आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। राजधानी में मेडों के नाम पर ट्रेफिकिंग का धंधा फलफूल रहा है और इनमें कुछ प्लेसमेंट एजेंसियों का बहुत बड़ा हाथ है। इसे कैसे रोका जाए, यह पुलिस के अलावा मां-बाप और समाज की भी जिम्मेदारी बनती है।
Anil Narendra, Crime, Daily Pratap, Delhi, delhi Police, Trafficking, Vir Arjun

Thursday, 5 April 2012

आम जनता पर भारी पड़ती वीआईपी सिक्यूरिटी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 5 April 2012
अनिल नरेन्द्र
देश में इस समय लगभग पांच लाख पुलिस कर्मियों की कमी है। यह वह आंकड़ा है जो कि सरकारी वेकेंसी के मुताबिक है। यानि इतनी वेकेंसी है पर इससे न तो केंद्र सरकार को और न ही राज्य सरकारों को ज्यादा चिंता है। सभी के लिए जनता से ज्यादा वीवीआईपी सुरक्षा पाथमिक है। इस समय हर वीवीआईपी की निजी सुरक्षा में औसतन तीन पुलिस वाले लगे हैं। इसकी वजह से जनता की रक्षा करने के लिए बहुत कम पुलिस वाले बचते हैं। 761 नागरिकों की सुरक्षा के लिए एक पुलिस वाला ही तैनात है। गृह मंत्रालय के ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट के आंकड़ों के अनुसार 25 राज्य और केंद्रीय शासित क्षेत्रों में 1016, 778 सांसदों, विधायकों, नौकरशाहों, मंत्रियों व जजों की सुरक्षा के लिए 50, 059 पुलिस कर्मी तैनात हैं। यह नंबर सैक्शन हुए वीआईपी सिक्यूरिटी से 21, 761 अधिक हैं। दुख से कहना पड़ता है कि ज्यादातर राज्य सरकारों की पाथमिकता कानून-व्यवस्था नहीं बल्कि वीआईपी सुरक्षा है। 2010 में बिहार में सबसे ज्यादा 30,039 वीआईपी को सुरक्षा दी गई, जबकि पंजाब में 1685 और पश्चिम बंगाल में 1,640 को। दिल्ली में 5,001 और आंध्र पदेश में 3,958 पुलिस कर्मियों को वीआईपी सिक्यूरिटी में तैनात किया गया। गृहमंत्री पी. चिदंबरम की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि वीआईपी की सुरक्षा में तैनात पुलिस कर्मियों की संख्या बढ़ाई गई, लेकिन आवंटितों की संख्या में तुलनात्मक रूप से इजाफा नहीं किया गया। रिपोर्ट में कहा गया कि एक जनवरी 2011 को पति लाख आबादी पर 173.57 जवान की मंजूरी थी। लेकिन तैनाती सिर्प 131.39 जवानों की हुई थी। ज्यादा आबादी वाले राज्यों की हालत सबसे अधिक खराब है। पश्चिम बंगाल में पति एक लाख आबादी पर 81 पुलिस कर्मी हैं, जबकि बिहार में 88, मध्यपदेश में 115 और राजस्थान में 118 पुलिस कर्मी हैं। त्रिपुरा में यह औसत 1,124, मणिपुर में 1,147 और मिजोरम में 1,112 पुलिस कर्मी ही हैं। केंद्रीय वीवीआईपी सूची के अलावा हर राज्य में अपनी भी एक वीआईपी सूची है जिसकी संख्या हजारों में की जाती है। वीआईपी सुरक्षा में तैनात इतने पुलिस कर्मियों की तैनाती के कारण आम जनता की सुरक्षा पर दुष्पभाव पड़ रहा है। दुनिया के किसी मुल्क में इस पकार की वीआईपी सुरक्षा नहीं होती। अगर पधानमंत्री रामलीला मैदान जा रहे हों तो बहादुर शाह जफर मार्ग पर हमें अपने कार्यालय तक कार में जाने से रोक दिया जाता है, ट्रैफिक बिल्कुल बंद कर दिया जाता है। कई ऐसे किस्से हुए हैं जब मरीज को अस्पताल ले जा रही एम्बूलेंस को भी वीआईपी रूट पर ट्रैफिक बंद करने की वजह से काफी देर तक रोक दिया जाता है। इस बात की किसी पर जूं तक नहीं रेंगती कि यह चन्द मिनट उस मरीज की बिगड़ती हालत पर क्या असर करेंगे। ऐसी ठाठ तो पुराने राजा-महाराजाओं के समय पर भी नहीं होती थी जो जान के इन राजे-महाराजों (वीआईपी) के लिए की जाती है और यह सब उस आम जनता की कीमत पर जिसके वोट से यह कुर्सी तक पहुंचे हैं।
देश में इस समय लगभग पांच लाख पुलिस कर्मियों की कमी है। यह वह आंकड़ा है जो कि सरकारी वेकेंसी के मुताबिक है। यानि इतनी वेकेंसी है पर इससे न तो केंद्र सरकार को और न ही राज्य सरकारों को ज्यादा चिंता है। सभी के लिए जनता से ज्यादा वीवीआईपी सुरक्षा पाथमिक है। इस समय हर वीवीआईपी की निजी सुरक्षा में औसतन तीन पुलिस वाले लगे हैं। इसकी वजह से जनता की रक्षा करने के लिए बहुत कम पुलिस वाले बचते हैं। 761 नागरिकों की सुरक्षा के लिए एक पुलिस वाला ही तैनात है। गृह मंत्रालय के ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट के आंकड़ों के अनुसार 25 राज्य और केंद्रीय शासित क्षेत्रों में 1016, 778 सांसदों, विधायकों, नौकरशाहों, मंत्रियों व जजों की सुरक्षा के लिए 50, 059 पुलिस कर्मी तैनात हैं। यह नंबर सैक्शन हुए वीआईपी सिक्यूरिटी से 21, 761 अधिक हैं। दुख से कहना पड़ता है कि ज्यादातर राज्य सरकारों की पाथमिकता कानून-व्यवस्था नहीं बल्कि वीआईपी सुरक्षा है। 2010 में बिहार में सबसे ज्यादा 30,039 वीआईपी को सुरक्षा दी गई, जबकि पंजाब में 1685 और पश्चिम बंगाल में 1,640 को। दिल्ली में 5,001 और आंध्र पदेश में 3,958 पुलिस कर्मियों को वीआईपी सिक्यूरिटी में तैनात किया गया। गृहमंत्री पी. चिदंबरम की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि वीआईपी की सुरक्षा में तैनात पुलिस कर्मियों की संख्या बढ़ाई गई, लेकिन आवंटितों की संख्या में तुलनात्मक रूप से इजाफा नहीं किया गया। रिपोर्ट में कहा गया कि एक जनवरी 2011 को पति लाख आबादी पर 173.57 जवान की मंजूरी थी। लेकिन तैनाती सिर्प 131.39 जवानों की हुई थी। ज्यादा आबादी वाले राज्यों की हालत सबसे अधिक खराब है। पश्चिम बंगाल में पति एक लाख आबादी पर 81 पुलिस कर्मी हैं, जबकि बिहार में 88, मध्यपदेश में 115 और राजस्थान में 118 पुलिस कर्मी हैं। त्रिपुरा में यह औसत 1,124, मणिपुर में 1,147 और मिजोरम में 1,112 पुलिस कर्मी ही हैं। केंद्रीय वीवीआईपी सूची के अलावा हर राज्य में अपनी भी एक वीआईपी सूची है जिसकी संख्या हजारों में की जाती है। वीआईपी सुरक्षा में तैनात इतने पुलिस कर्मियों की तैनाती के कारण आम जनता की सुरक्षा पर दुष्पभाव पड़ रहा है। दुनिया के किसी मुल्क में इस पकार की वीआईपी सुरक्षा नहीं होती। अगर पधानमंत्री रामलीला मैदान जा रहे हों तो बहादुर शाह जफर मार्ग पर हमें अपने कार्यालय तक कार में जाने से रोक दिया जाता है, ट्रैफिक बिल्कुल बंद कर दिया जाता है। कई ऐसे किस्से हुए हैं जब मरीज को अस्पताल ले जा रही एम्बूलेंस को भी वीआईपी रूट पर ट्रैफिक बंद करने की वजह से काफी देर तक रोक दिया जाता है। इस बात की किसी पर जूं तक नहीं रेंगती कि यह चन्द मिनट उस मरीज की बिगड़ती हालत पर क्या असर करेंगे। ऐसी ठाठ तो पुराने राजा-महाराजाओं के समय पर भी नहीं होती थी जो जान के इन राजे-महाराजों (वीआईपी) के लिए की जाती है और यह सब उस आम जनता की कीमत पर जिसके वोट से यह कुर्सी तक पहुंचे हैं।
Anil Narendra, Daily Pratap, delhi Police, VIP Security, Vir Arjun

Thursday, 22 March 2012

क्या सैयद मोहम्मद काजमी पर दिल्ली पुलिस झूठा केस बना रही है?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22 March 2012
अनिल नरेन्द्र
इजरायली दूतावास की कार में विस्फोट के मामले में गिरफ्तार पत्रकार सैयद मोहम्मद काजमी क्या निर्दोष हैं जिन्हें जबरन दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है या यह हमले में शामिल एक महत्वपूर्ण कड़ी है? यह प्रश्न काजमी की गिरफ्तारी के बाद से ही अखबारों में बना हुआ है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि दिल्ली पुलिस ने इजरायल और अमेरिका के कहने पर काजमी को गिरफ्तार किया और उसकी गिरफ्तारी की असल वजह थी कि वह अपनी टीवी रिपोर्टों में मध्य-पूर्व की सही स्थिति पेश करता था जिससे दोनों इजरायल और अमेरिका नाराज थे और उसे रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने यह ड्रॉमा रचा है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य प्रमुख शिया धर्मगुरु मौलाना कल्वे जव्वाद ने लखनऊ में कहा कि दिल्ली के पुलिस आयुक्त इजरायली एजेंट हैं और उनकी सम्पत्ति की जांच होनी चाहिए। मौलना जव्वाद ने मीडिया से कहा कि देश में पिछले करीब 20 वर्षों से बेकसूर मुसलमानों को आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्तता के आरोप में गिरफ्तार करने का सिलसिला जारी है। गत 13 फरवरी को दिल्ली में हुए विस्फोट में वरिष्ठ पत्रकार सैयद मोहम्मद काजमी की गिरफ्तारी इसकी नई कड़ी है। दूसरी ओर दिल्ली पुलिस नए-नए सुबूत पेश कर रही है। मामले की जांच में जुटे सूत्रों ने बताया कि काजमी के ईरान से गहरे रिश्ते होने के पक्के सुबूत मिले हैं। काजमी कई बार ईरान गया था। इस दौरान उसने ब्लास्ट से जुड़े दूसरे ईरानियों से मुलाकात की थी। काजमी ने पुलिस को बताया कि वह 7 जनवरी 2011 को ईरान गया था। इस बार उसकी मुलाकात सैयद अली और अली रजा से हुई थी। सैयद अली ने उसे ईरानी साइंटिस्ट की मौत का बदला लेने की बात कही थी। सैयद ने उसे तेहरान में 3000 डालर और एक मोबाइल फोन भी उपलब्ध कराया। वापस दिल्ली लौटने पर उसकी कई बार सैयद से फोन पर बात हुई। मई 2011 में ईरान से उसे सैयद ने फोन कर इजरायली डिप्लोमेट को निशाना बनाने की बात कही थी। उसे इस हमले के लिए ईरान से आने वाले लोगों के लिए दिल्ली में मदद करने के निर्देश मिले थे। पुलिस का दावा है कि योजना के मुताबिक ईरानी हमलावरों के दिल्ली आने पर काजमी ने उन्हें न सिर्प करोल बाग में फैज रोड स्थित होटल में ठहराया बल्कि इजरायली डिप्लोमेट के आने-जाने का रूट पता करने में भी उनकी मदद की। इसके लिए किराये पर ली गई मोटरसाइकिलों का इस्तेमाल किया गया। ज्ञात रहे कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने जोरबाग के कर्बला इलाके में रहने वाले फ्रीलांस पत्रकार मोहम्मद काजमी को 6 मार्च को गिरफ्तार किया था। पुलिस आयुक्त ने बताया कि सन् 2011 में जब काजमी ईरान गया था तो इसकी मुलाकात सैयद अली, मोहम्मद रजा और ईरानी अफसर से हुई। मलेशिया में बैठे गैंग के मास्टर माइंड मोहम्मद मसूद के दिशानिर्देश पर सैयद अली और मोहम्मद रजा ने दिल्ली में इजरायली डिप्लोमेट पर हमला करवाने में काजमी को पैसों का लालच दिया। इसके लिए 5500 डालर देने की बात कही गई। काजमी तैयार हो गया और फिर ईरानी अफसर के साथ दिल्ली चला गया। 10 फरवरी को सैयद अहमद, मोहम्मद रजा खान और अब्दुल फजी मेंहदियान भी दिल्ली आ गए। तीनों काजमी के यहां रुके हुए थे। अगले दिन काजमी की आल्टो में बैठकर तीनों ने इजरायल दूतावास के साथ-साथ नई दिल्ली रेंज इलाके का भ्रमण कर हमले की रूपरेखा तैयार की। उधर अफसर ईरानी ने करोल बाग के रहने वाले एक युवक के सहयोग से एक स्कूटी खरीदी। इसी स्कूटी का इस्तेमाल कार में स्टिकी बम लगाने के लिए प्रयोग में लाया गया था। अफसर से मलेशिया में बैठा उसका आका मसूद सम्पर्प में था। उधर मसूद की हां पर 14 फरवरी को बैंकाक और जॉर्जिया में हमला किया गया। इस हमले को मोरादी सईद और मोहम्मद काजी ने अंजाम दिया था। मोहम्मद काजी को बैंकाक पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। वहीं मलेशिया पुलिस के हत्थे सभी धमाकों का मास्टर माइंड मसूद भी चढ़ गया। दिल्ली में हुए ब्लास्ट के 24 घंटे में इजरायल की जांच एजेंसी मोसाद की एक टीम दिल्ली पहुंच गई थी और लगातार जांच कर रही है। पुलिस सूत्रों के अनुसार मोसाद के एजेंट जल्द ही रिमांड पर चल रहे काजमी से पूछताछ कर सकते हैं। वहीं दिल्ली पुलिस पूरे मामले से परदा उठाने के लिए मलेशिया में गिरफ्तार मसूद से भी पूछताछ करने के लिए मलेशिया सरकार से सम्पर्प कर रही है। अब दिल्ली पुलिस सही कह रही है या यह सारी कहानी जबरन बनाई गई है, इसका फैसला तो अदालत में हो ही जाएगा। उम्मीद है कि सच्चाई की जीत होगी। वैसे दिल्ली पुलिस को यह केस अदालत में साबित करना होगा। इससे दिल्ली पुलिस की प्रतिष्ठा जुड़ चुकी है। यह मामला अब पूरी तरह इंटरनेशनल हो चुका है।
Anil Narendra, Daily Pratap, Vir Arjun, Mohd. Ahmed Kazmi, delhi Police, Iran, Israil, Bomb Blast, Delhi Bomb Case,

Tuesday, 13 March 2012

इजरायली राजनयिक पर हमले में ईरानी पत्रकार की गिरफ्तारी?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13 March 2012
अनिल नरेन्द्र
13 फरवरी को नई दिल्ली के अति सुरक्षित क्षेत्रों में से एक औरंगजेब रोड पर इजरायली महिला राजनयिक टाल योहाशुआ की इनोवा कार के पिछले हिस्से में एक मोटर साइकिल सवार ने मैग्नेटिक डिवाइस (स्टिकी बम) लगा दिया था। इसके तत्काल बाद हुए विस्फोट से कार में आग लग गई थी। महिला राजनयिक व कार चालक मनोज घायल हो गए थे। तीन अन्य गाड़ियां भी इसकी चपेट में आई थी, दिल्ली पुलिस ने इस धमाके के सिलसिले में एक ईरानी व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। ईरानी व्यक्ति ने स्वयं को एक न्यूज एजेंसी का पत्रकार बताया है। गिरफ्तार व्यक्ति का नाम सैयद मोहम्मद काजमी (50 वर्ष) है और वह ईरानी न्यूज एजेंसी के लिए काम करता था। पुलिस का कहना है कि सैयद मोहम्मद काजमी की गिरफ्तारी के सुराग बैंकाक से मिले थे। याद रहे कि जिस दिन दिल्ली में कार बम लगाया गया था ठीक उसी दिन बैंकाक में भी एक धमाका करने का असफल प्रयास किया गया था। दिल्ली में हुए धमाके के तार न केवल बैंकाक से ही जुड़े हैं बल्कि जार्जिया से भी जुड़े हैं। दिल्ली पुलिस का कहना है कि दूतावास की कार पर हुए बम धमाके की पहली कामयाबी भी इसी का नतीजा है। फिलहाल पुलिस इस हमले के पीछे शामिल संगठन के नाम का खुलासा नहीं कर रही है लेकिन कहीं न कहीं इस हमले के पीछे ईरानी संगठन पूंड्स (क्यूयूडीएस) के हाथ होने की आशंका जरूर जताई जा रही है। दरअसल बैंकाक में हुए विस्फोट के बाद वहां से कुछ संदिग्ध ईरानी फरार हो गए थे, जिनमें एक महिला भी शामिल थी। बैंकाक पुलिस को उस महिला के घर की तलाशी में एक टेलीफोन डायरी मिली थी जिसमें काजमी का मोबाइल नम्बर था। काजमी के खिलाफ कई महत्वपूर्ण सुबूत मिले हैं। आशंका जताई जा रही है कि हमलों के पीछे ईरानी सेना की स्पेशल फोर्स है, जिसे खासतौर से ईरान-इराक युद्ध के समय गठित किया गया था। मोहम्मद अहमद काजमी को सूचनाएं जुटाने के लिए डालर में भुगतान किया गया था। ब्लास्ट में जिस मोटर साइकिल का इस्तेमाल किया गया वह करोल बाग इलाके से किराये पर ली गई थी। हमलावर विदेश से आकर पहाड़गंज के एक होटल में ठहरे थे। बताया जा रहा है कि स्टिकी बम इसी होटल में तैयार किया गया। पूरे मामले का दुःखद पहलू यह है कि विदेशी बाम्बर जिसने औरंगजेब रोड में कार पर बम लगाया था वह गृह मंत्रालय की सुस्ती के कारण उसी दिन इन्दिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से दक्षिण-एशिया के किसी देश की फ्लाइट से भाग गया। 3 बजे के लगभग दोपहर को बम लगाने के 8 घंटे बाद वह निकल गया। गृह मंत्रालय या किसी और सरकारी एजेंसी ने हवाई अड्डे पर इमिग्रेशन को सूचित नहीं किया कि अमूक व्यक्तियों को रोका जाए, पूछताछ की जाए। गृह मंत्रालय की यह चूक इसलिए भी चिन्ता का विषय है कि बम धमाका होने के तुरन्त बाद इजरायल ने कह दिया था कि हमले के पीछे ईरान का हाथ है। इमिग्रेशन में हर ईरानी को रोक कर तसल्ली करनी चाहिए थी जो नहीं की गई और हमलावर भागने में सफल रहा। इस मामले में गिरफ्तार मोहम्मद अहमद काजमी के परिजनों ने दिल्ली के प्रेस क्लब में प्रेस कांफ्रेंस कर कहा है कि पुलिस द्वारा बरामद स्कूटी उनके एक रिश्तेदार की है। करीब दो साल से वह स्कूटी उनके घर पर खड़ी थी। परिवार का कोई सदस्य उस स्कूटी का उपयोग नहीं करता है। मोहम्मद काजमी के दूसरे बेटे शौजब काजमी ने गिरफ्तारी के अरेस्ट मेमो पर हस्ताक्षर के लिए पुलिस का दबाव बनाने का भी आरोप लगाया है। अपने घर पर किसी ईरानी के आकर ठहरने से इंकार किया। परिजनों का यह भी कहना था कि कर्बला मामले में उनके पिता ने सक्रिय भूमिका निभाई है। बीके दत्त कॉलोनी में उनका अकेला मुस्लिम परिवार है। पेशे से पत्रकार मोहम्मद अहमद काजमी मूल रूप से मेरठ निवासी है। वरिष्ठ पत्रकार सैयद नकवी ने मोहम्मद काजमी की गिरफ्तारी को लेकर कठघरे में खड़ा किया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि अमेरिका और इजरायल के इशारे पर पत्रकार को इजरायली दूतावास कार ब्लास्ट में जबरन गिरफ्तार किया गया है। उन्होंने इसका मुख्य कारण भी दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका के इशारे पर अरब मुल्कों में विद्रोह हो रहा है। उसकी सच्चाई को सैयद मोहम्मद अहमद काजमी ने दुनिया के सामने रखा और इसी के कारण अमेरिका और इजरायल के दबाव में दिल्ली पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया। दिल्ली पुलिस को अपना केस मजबूत कर लेना चाहिए क्योंकि इस केस पर न केवल देश के अन्दर ही बल्कि दुनिया भी देख रही है। इस केस में दिल्ली पुलिस की प्रतिष्ठा एक बार फिर दांव पर है।
Anil Narendra, Daily Pratap, Delhi, delhi Police, Iran, Israil, Mohd. Ahmed Kazmi, Terrorist, Vir Arjun

Saturday, 3 March 2012

दरिंदगी की सारी हदें पार करते दिल्लीवासी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 3 March 2012
अनिल नरेन्द्र
पिछले कई दिनों से अखबारों में दिल्लीवासियों की दरिंदगी की खबरों ने चौंका दिया है। बच्चियों से रेप की घटनाओं ने एक बार फिर शर्मसार कर दिया है। इन वारदातों से सवाल उठ रहा है कि आखिर दिल्ली में इतनी दरिंदगी क्यों हो रही है? मुंडका के एक सुरक्षा गार्ड पर एक छह साल की बच्ची से दुष्कर्म का आरोप है। पुलिस ने अजय प्रसाद नामक आरोपी को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार 20 वर्षीय अजय रविवार शाम चार बजे एक फल विकेता की बच्ची को मछली खिलाने के बहाने ले गया। बच्ची के पिता को पहले उस पर शक नहीं हुआ लेकिन जब मामला खुला तो वह दंग रह गया। पुलिस के अनुसार अजय बच्ची को एक खुले मैदान में ले गया और वहां उसके साथ बलात्कार किया। बाद में बच्ची रोती हुई आई और अपनी मां को सारी घटना बताई। उससे एक दिन पहले द्वारका इलाके में एक 16 साल की लड़की के साथ बलात्कार का मामला सामने आया। एक फार्म हाउस के 50 वर्षीय सुरक्षा गार्ड नन्द कुमार ने पास में रहने वाली लड़की को अगवा कर लिया और पास के मैदान में ले जाकर उसकी इज्जत लूटी। उसने लड़की को धमकी दी कि अगर उसने घर पर बताया तो वह उसे जान से मार देगा। पुलिस के अनुसार नन्द कुमार लड़की का परिजन है और उसे काफी समय से जानता है। दिल्ली कैंट में एक सेना के कर्मी पर अपने दोस्त की बीवी के साथ बलात्कार का आरोप है। पुलिस के अनुसार रविन्द्र सेना में सिविल विभाग में कार्यरत है और महिला, उसके पति को पहले से जानता है। घटना सोमवार सुबह करीब 11ः30 बजे की है। रविन्द्र सदर बाजार स्थित अपने एक दोस्त के यहां गया। वहां उसकी बीवी घर में अकेली थी। पुलिस के अनुसार बलात्कार के बाद रविन्द्र गायब हो गया लेकिन पुलिस ने उसे पकड़ लिया। बताया जा रहा है कि महिला का पति सेना में हैड कांस्टेबल है। रविन्द्र महिला के गांव का है और वह अकसर घर आता-जाता था। गुड़गांव में मालिक की होंडासिटी कार में ही ड्राइवर ने नौकरानी के साथ रेप कर दिया। पुलिस ने भोड़सी से चालक को गिरफ्तार कर लिया। उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। सैक्टर-48 निवासी एयरफोर्स से रिटायर्ड अधिकारी मुकेश नाथ की बेटी की शादी रविवार की रात धौलाकुआं के पास हो रही थी। शादी के बाद मुकेश नाथ ने अपने ड्राइवर सोनू के साथ तीन घरेलू नौकरों को गुड़गांव भेजा। इसमें उनकी सास की नौकरानी भी थी। सोनू ने दो नौकर को सोहना रोड पर उतार दिया। आरोप है कि इसके बाद चालक ने उसके साथ रेप किया। दिल्ली की एक अदालत ने पिछले दिनों पार्प में बनी छतरी के नीचे रह रही 50 साल की महिला के अपहरण और रेप के मामले में प्रहलाद (19) को 10 साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। एडिशनल सेशन जज कामिनी लॉ की अदालत ने दोषी पर 17000 रुपये का जुर्माना भी किया है। दुःख से कहना पड़ता है कि दिल्ली में हैवानियत की सारी हदें पार हो रही हैं और अब तो राजधानी को रेप कैपिटल कहा जाए तो गलत नहीं होगा। महिला संबंधित क्राइम तो सारी दुनिया में होते हैं पर छह साल की बच्ची से लेकर 80 साल की वृद्धा के साथ जब रेप हो तो यह चौंका देता है। आखिर हम किस ओर जा रहे हैं। इस तरह तो आदमी और जानवर में कोई फर्प ही नहीं रहेगा।
Anil Narendra, Crime, Criminals, Daily Pratap, Delhi, delhi Police, Vir Arjun

Sunday, 26 February 2012

4 जून की रात रामलीला मैदान में हुआ था जुल्म

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 26th February  2012
अनिल नरेन्द्र
हमें इस बात की खुशी है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने बाबा रामदेव समर्थकों पर 4 जून 2011 को हुए लाठीचार्ज पर सरकार को कड़ी फटकार लगाई है और माना कि उस रात पुलिस कार्रवाई गलत थी। काले धन और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर रामलीला मैदान में सत्याग्रह कर रहे बाबा रामदेव और उनके समर्थकों को 4 जून की रात रामलीला मैदान से बलपूर्वक निकाल बाहर करने की दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को सुप्रीम कोर्ट ने लोकतंत्र पर कुठाराघात बताते हुए इसके लिए दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि रामलीला मैदान में रात को सो रहे सत्याग्रहियों पर दिल्ली पुलिस की बर्बर कार्रवाई जनता और सरकार के बीच कम हो रहे विश्वास का ज्वलंत उदाहरण है। न्यायमूर्ति बलबीर सिंह चौहान और स्वतंत्र कुमार की खंडपीठ ने गुरुवार को अपने फैसले में कहा कि सत्याग्रहियों के खिलाफ बल प्रयोग करके दिल्ली पुलिस ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया। सरकार को दोषी पुलिस अधिकारियों के साथ ही पथराव करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई करने का आदेश दिया है। सरकार को इस कार्रवाई के बारे में तीन महीने के भीतर अदालत में रिपोर्ट देनी है। न्यायाधीशों ने कहा कि 4 जून की रात में हुई घटना को टाला जा सकता था पर पुलिस और प्रशासन ने अपनी ताकत का प्रयोग कर सोते हुए सत्याग्रहियों पर लाठियां बरसाईं जिससे एक महिला की मौत हो गई और कई अन्य जख्मी हुए। अदालत ने सख्त शब्दों में कहा कि पुलिस का काम शांति कायम रखना है लेकिन रामलीला मैदान में उसने शांति भंग करने का ही काम नहीं किया बल्कि सोते हुए सत्याग्रहियों पर लाठियां बरसा कर नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन भी किया। न्यायाधीशों ने कहा कि इसमें कोई दो राय नहीं है कि दिल्ली पुलिस ने सत्याग्रहियों को रामलीला मैदान से निकाल बाहर करने के लिए बेहद हिंसक तरीका अपनाया, लेकिन दूसरी ओर बाबा रामदेव के समर्थकों ने भी पुलिस पर हिंसक तरीके से पथराव किया जिससे स्थिति और बिगड़ गई। अदालत ने जान गंवाने वाली राजबाला के परिजनों को 5 लाख रुपये, गम्भीर रूप से घायलों को 50-50 हजार रुपये और मामूली रूप से घायलों को 25-25 हजार रुपये बतौर मुआवजा अदा करने का आदेश दिया। अदालत ने यह भी कहा कि मुआवजे की इस राशि का 25 फीसदी अंश का भुगतान बाबा रामदेव का ट्रस्ट करेगा।
हम हमेशा से कहते आ रहे हैं कि केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम और कुछ अन्य मंत्रियों के इशारों पर दिल्ली पुलिस ने 4 जून को सोते हुए लोगों पर कहर ढा दिया। सरकार और पुलिस कहती रही कि कोई लाठीचार्ज नहीं हुआ, न कोई जबरन कार्रवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से दूध का दूध पानी का पानी हो गया है पर हमारा मानना है कि दिल्ली पुलिस ने उस रात जो भी किया वह गृह मंत्रालय के आदेशों पर किया। असल कसूरवार तो आदेश देने वाले हैं, दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई का विरोध भी किया था। पुलिस ने कहा था कि हम सुबह होते ही शांति से रामलीला मैदान खाली करवा लेंगे पर मनमोहन सरकार के कुछ मंत्रियों ने तो ठान ली थी कि बाबा रामदेव और उनके समर्थकों को ऐसी मार मारनी है जो वह दोबारा ऐसा करने की जुर्रत न करें।
Anil Narendra, Baba Ram Dev, Daily Pratap, Delhi, delhi Police, Ram Lila Maidan, Supreme Court, Vir Arjun

Thursday, 12 January 2012

कैमरे से गया सवाल और ब्लू टूथ से आया जवाब

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 12th January  2012
अनिल नरेन्द्र
हर अविष्कार के दो पहलू होते हैं, अच्छा और बुरा। उदाहरण के तौर पर जब एटम स्पिल्ट किया गया था तो उसका लाभ ऊर्जा पैदा करने में भी लगा और एटम बम बनाने में भी हुआ। यह निर्भर करता है तकनीक का इस्तेमाल करने राले पर और उसके उद्देश्य पर। मैंने तो कम से कम यह कल्पना भी नहीं की थी कि एक परीक्षा में इसका ऐसे भी इस्तेमाल हो सकता है जैसे राजधानी दिल्ली में एम्स की ऑल इंडिया पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल परीक्षा में हुआ। पुलिस ने रविवार को इस हाइटैक चीटिंग गिरोह का भंडाफोड़ किया। पुलिस ने इस मामले में एक डाक्टर (परीक्षार्थी), दो एमबीबीएस धारक, एक एमबीबीएस (द्वितीय वर्ष) छात्र और एक स्नातक युवक को गिरफ्तार किया है। पुलिस उपायुक्त अशोक चांद के अनुसार मात्र 30 मिनट में परीक्षा का पर्चा लीक हो गया था। गैंग ने हर छात्र से 25 से 30 लाख रुपये लेकर आधा दर्जन छात्रों का पर्चा हल कराया था। चांद के अनुसार देश के सरकारी कॉलेजों में पोस्ट ग्रेजुएट की 50 फीसदी सीटों को भरने के लिए एम्स द्वारा पीजी मेडिकल प्रवेश परीक्षा 2012 का रविवार को आयोजन किया गया था। इसके लिए 15 राज्यों में 156 परीक्षा केंद्र बनाए गए थे। इन केंद्रों में करीब 70 हजार छात्र बैठे थे परीक्षा देने। एमओएस इंस्पैक्टर राजेश कुमार ने गुप्त सूचना पर प्रगति मैदान के पास जाल बिछाकर बुलंदशहर के मोहित चौधरी (23) को गिरफ्तार कर 23 पेज की बुकलेट बरामद कर ली। मोहित ने बताया कि उसके दो साथियों ने नोएडा सैक्टर-28 स्थित परीक्षा केंद्र से पर्चा लीक किया। इसके बाद पुलिस ने जेवर के कपिल कुमार और कृष्ण प्रताप को दबोच लिया। इनसे दो हाइटैक मोबाइल, ब्लू टूथ डिवाइस लगी दो शर्ट और ईयर फोन बरामद हुआ।
एम्स की पीजी प्रवेश परीक्षा का पर्चा लीक करने वाले इस गिरोह का सिस्टम इतना हाइटैक और फुल प्रूफ व तेज था कि पूरे पेज को लीक करने में इन्हें मात्र 23 मिनट लगे थे। एक मिनट में एक पेज स्केन होकर मेल से ऑटोमैटिक इनके पास कंट्रोल रूम में पहुंच जाता था। बुकलेट के एक पेज स्केन और मेल करने में एक सैकेंड का समय लगता था। इस हिसाब से आधा घंटे में पूरा पेपर उनके हाथ में था। प्रवेश परीक्षा दस बजे शुरू हुई और साढ़े दस बजे पेपर इनके पास था। उज्जैन स्थित मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस कर रहा मोहित चौधरी इस गिरोह का मास्टर माइंड था। मोहित ने कपिल कुमार और कृष्ण प्रताप को फर्जी डाक्टर दिखाकर फर्जी कागजात के जरिये परीक्षा का प्रवेश पत्र हासिल किया था। इनके हाथों में कलाई के नीचे हाइटैक मोबाइल कैमरा लगा हुआ था। जब प्रश्न पत्र की बुकलेट इनके पास आई तो इन्होंने इस कैमरे में उसके पेजों को स्केन कर लिया। यह ब्लू टूथ तकनीक से लेस ऐसा फोन था कि जैसे ही पेज स्केन होता था कंट्रोल रूम में बने मेल पर चला जाता था। कंट्रोल रूम में भीष्म सिंह (एक कम्प्यूटर प्रोग्रामर) मेल के प्रिन्ट निकाल लेता था। प्रिन्ट निकालकर भीष्म सिंह कुछ एक्सपर्टों की मदद से प्रश्नों का तुरन्त हल करने में परीक्षार्थी (डाक्टर) के ईयर फोन पर उत्तर बता देते थे। परीक्षार्थियों ने भी शर्ट की कालर में ब्लू टूथ छिपाकर कॉलर सिलवा रखा था। सारा पेपर मात्र 30 मिनट में साल्व हो जाता था। देखिए कहां जाकर इन लोगों ने दिमाग लगाया और इस आधुनिक वायरलेस तकनीक का लाभ उठाया। अपने आप में यह अनूठा प्रयोग है और अब भारत में ही नहीं बल्कि सारी दुनिया में परीक्षा लेने वाले अधिकारियों को इसको ध्यान में रखना होगा और ब्लू टूथ जैसे डिवाइस परीक्षा केंद्र में ले जाने पर बैन लगाना होगा। इसे कहते हैं ईवल जीनियस।
AIIMS, Anil Narendra, Daily Pratap, delhi Police, Vir Arjun

Friday, 16 December 2011

हम संसद के शहीद परिजनों का दुख समझते हैं और उनका समर्थन करते हैं


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 16th December 2011
अनिल नरेन्द्र

संसद पर हमले की दसवीं बरसी पर शहीद हुए जवानों के परिजनों ने कहा कि जब तक हमले के दोषी अफजल को फांसी नहीं दी जाती तब तक वह किसी भी सरकारी कार्यक्रम में भाग नहीं लेंगे। यही नहीं उन्होंने संसद में श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने से भी इंकार कर दिया। इस संबंध में उन्होंने राष्ट्रपति को भी एक ज्ञापन सौंपा। वहीं एआईएटीएफ की ओर से अमर जवान ज्योति पर हुई एक श्रद्धांजलि सभा में शहीदों को याद किया गया। हमले में शहीद हुए दिल्ली पुलिस के हैड कांस्टेबल के पिता सरदार सिंह, शहीद जेपी यादव की पत्नी प्रेम यादव, शहीद हवलदार विजेन्द्र सिंह के ससुर कैप्टन जगमाल सिंह, सीआरपीएफ की शहीद महिला जवान कमलेश यादव के पति अवधेश कुमार सहित अन्य शहीदों के पीड़ित परिजन मौजूद थे। पीड़ित परिजनों ने एक सुर में कहा कि जब तक अफजल को फांसी नहीं दी जाती तब तक वह किसी सरकारी कार्यक्रम में भाग नहीं लेंगे। हम पीड़ित परिवारों से न केवल हमदर्दी रखते हैं पर उनकी मांग का भी समर्थन करते हैं। आखिर आतंकी अफजल को सजा कब मिलेगी? इस सवाल से देश के शासकों को शायद कोई फर्प न पड़ता हो पर आम देशवासी का मस्तिष्क शर्म से झुक जाता है। हम यह नहीं समझ सकते कि आखिर जिस आदामी ने देश की इज्जत पर हमला किया हो, हमारी आन-बान-शान मिट्टी में मिला दी हो उस आदमी को यह संप्रग सरकार बतौर सरकारी मेहमान बनाकर क्यों पाल रही है? क्या सिर्प वोट बैंक का तकाजा ही ऐसे महत्वपूर्ण फैसले के लिए आधार होगा? क्या यह सरकार इतनी-सी बात नहीं समझ पाती कि उसकी निक्रियता का हमारे सुरक्षा बलों के मनोबल पर क्या असर पड़ रहा है। यह निहायत अफसोस की बात है कि पिछले सात सालों में अफजल का मामला फिजूल के बहानों के कारण लटका हुआ है। हमारी राय में यह न केवल आतंकवादियों को प्रोत्साहित करने के समान है बल्कि उनके सामने घुटने टेकने जैसा है। जनता में यह प्रश्न आज खुलेआम पूछा जा रहा है कि इस सरकार में आतंकवाद से लड़ने की इच्छाशक्ति है भी या नहीं। जो सरकार अपने वोट बैंक की राजनीति को उपर रखकर देश की सुरक्षा से समझौता करती है वह देशवासियों की सुरक्षा कितनी कर पाएगी? अफजल की दया याचिका संबंधी फाइल पिछले सात सालों से जिस तरह गृह मंत्रालय, दिल्ली सरकार और राष्ट्रपति भवन के दो-चार किलोमीटर के दायरे में घूम रही है उसे देखते हुए तो ऐसा लगता है कि अफजल की सजा पर क्रियान्वयन में अभी कई वर्ष और लग जाएंगे। सरकार बेशर्मों की तरह जवाब दे देती है कि अफजल गुरू की दया याचिका फाइल राष्ट्रपति के पास है और राष्ट्रपति भवन को ही इस बारे में फैसला करना है। गृह मंत्रालय ने अफजल गुरू का मामला राष्ट्रपति सचिवालय को 27 जुलाई 2011 को भेजा था और सिफारिश की थी कि उसकी दया याचिका को नामंजूर किया जाना चाहिए। अगर केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह का यह कथन सही है तो फिर अफजल की फांसी में अड़चन कहां है? दिल्ली सरकार, गृह मंत्रालय दोनों ने पहले ही अपनी स्वीकृति दे दी है अब तो राष्ट्रपति को बस अपनी मोहर लगानी है दया याचिका को रिजैक्ट करना है, इसमें कितना समय और लगेगा?

Saturday, 3 December 2011

आईएम के खतरनाक मॉड्यूल का पर्दाफाश

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 3rd December 2011
अनिल नरेन्द्र
एंटी टेरेरिस्ट ऑपरेशंस में हमारी सुरक्षा एजेंसियों को एक शानदार सफलता मिली है। पाकिस्तानी आतंकी संगठन हिज्बुल मुजाहिद्दीन का जूनियर कहे जाने वाले इंडियन मुजाहिद्दीन आतंकी संगठन के नापाक इरादों का खुलासा हुआ है। भारतीय खुफिया तंत्रों की सहायता तथा अंतर्राष्ट्रीय पुलिस तालमेल के चलते बिहार, चेन्नई व दिल्ली की स्पेशल सेल और क्राइम ब्रांच ने आधा दर्जन आतंकवादियों को गिरफ्तार किया है। दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने इंडियन मुजाहिद्दीन के विशाल नेटवर्प का भी भंडाफोड़ किया है। पुलिस ने जिन छह आतंकवादियों को पकड़ा है उनमें एक पाकिस्तानी भी है। इन लोगों ने जामा मस्जिद गोली कांड, पुणे में जर्मन बेकरी व बेंगलुरु में चिन्नास्वामी स्टेडियम में ब्लास्ट को अंजाम दिया था, कम से कम ऐसा दिल्ली पुलिस का दावा है। इन आतंकवादियों के पास से दो एके-47 राइफल, 50 से ज्यादा कारतूस, विस्फोटक पदार्थ, डेटोनेटर व दो लाख रुपये के नकली नोट बरामद हुए हैं। गिरफ्तार आतंकवादियों में मोहम्मद आदिल उर्प अजमल, मोहम्मद कतिल सिद्दीकी उर्प सज्जन, मोहम्मद इरशाद खान, गौहर अजीज अहमद जमाली और अब्दुर रहमान शामिल हैं। ये सभी इंडियन मुजाहिद्दीन के नेटवर्प से जुड़े थे। मोहम्मद आदिल पाकिस्तान का रहने वाला है। वह अगस्त 2010 में भारत आया था। दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा के उपायुक्त अशोक चांद की देखरेख में स्पेशल सेल के एसीपी कुमार यादव, निरीक्षक ललित मोहन नेगी, हृदय भूषण एवं उपनिरीक्षक चंदिका प्रसाद व 35 पुलिसकर्मियों की टीम ने इन आतंकियों का भंडाफोड़ किया। पुलिस के मुताबिक इन आतंकियों ने वर्ष 2010 में 13 फरवरी को बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में ब्लास्ट, 17 अप्रैल को पुणे के जर्मन बेकरी ब्लास्ट व 19 सितम्बर को जामा मस्जिद के बाहर विदेशी नागरिकों पर हुई गोली कांड को अंजाम दिया था। दिल्ली पुलिस ने केंद्रीय खुफिया एजेंसियों, पश्चिम बंगाल, बिहार व तमिलनाडु पुलिस की मदद से इन छह आतंकवादियों को पकड़ा। स्पेशल सेल को 22 नवम्बर को सूचना मिली थी कि इंडियन मुजाहिद्दीन का एक मॉड्यूल दिल्ली में सक्रिय है। इस सूचना की जांच के दौरान पुलिस ने आनन्द विहार बस अड्डे के पास से मोहम्मद कतिल उर्प सज्जन को गिरफ्तार किया। दिल्ली में 2008 में सीरियल बम धमाकों के बाद हुए बटला हाउस एनकाउंटर के बाद राजनीतिक आरोपों के चलते ठंडी पड़ी दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल को एक बार फिर वहीं से लीड मिली। दरअसल जिस बटला हाउस के चलते दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा शहीद हो गए और उसके बाद जो आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ, उसने स्पेशल सेल की हिम्मत तोड़ दी। सेल का मनोबल बढ़ाने के लिए एक ज्वाइंट टीम बनाई गई। इस टीम में सेल के बेहतरीन अफसरों के साथ क्राइम ब्रांच और एसीपी संजीव यादव को जोड़ा गया। टीम का नेतृत्व क्राइम ब्रांच के डीसीपी अशोक चांद को सौंपा गया। आईएम के इस मॉड्यूल के भंडाफोड़ में सबसे पहले आनन्द विहार से पकड़े गए मोहम्मद कतिल सिद्दीकी दरअसल बटला हाउस में ही रह रहा था। लेकिन उसे चुपचाप वहां से निकालकर आनन्द विहार ले जाकर गिरप्तार किया गया। जहां हम दिल्ली पुलिस को इस शानदार सफलता की बधाई देना चाहते हैं, वहीं यह कहना भी जरूरी है कि यह विभिन्न राज्य पुलिस की आपस के बेहतर तालमेल का नतीजा है। विभिन्न जांच एजेंसियों और पुलिस में तालमेल का अभाव रहा है। यह प्रसन्नता की बात है कि अब यह दूर हो रहा है। पिछले कुछ दिनों से पुलिस की बात पर सीधा विश्वास करना थोड़ा कठिन-सा हो रहा है। कई केसों में पाया गया है कि वाहवाही लूटने के लिए पुलिस गिरफ्तारी तो बता देती है पर जैसे ही केस अदालत में जाता है, उड़ जाता है। हम उम्मीद करते हैं कि इस केस में पुलिस मुजरिमों का अपराध साबित कर पाएगी और उन्हें सजा दिलवाने में कामयाब रहेगी।
Anil Narendra, Daily Pratap, delhi Police, Indian Mujahideen, Terrorist, Vir Arjun

Sunday, 20 November 2011

नेताओं के दबाव के कारण जांच एजेंसियों की साख पर बट्टा


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th November 2011
अनिल नरेन्द्र
हमारी जांच एजेंसियों द्वारा विभिन्न केसों में की गई जांच अदालतों में ठहर नहीं पा रही है। इससे प्रश्न उठता है कि क्या राजनीतिज्ञ जांच एजेंसियों की केसों की जांच को प्रभावित करते हैं? राजनीतिक दबाव के चलते चाहे वह दिल्ली पुलिस हो, एनआईए हो या फिर सीबीआई ही क्यों न हो पिछले एक पखवाड़े में कम से कम चार ऐसे केस सामने आए हैं जिनमें अदालतों ने इन एजेंसियों को फटकार लगाई है और इनके जांच करने के तरीके और निष्कर्ष दोनों पर सवाल उठाए हैं। पहला केस मालेगांव बम विस्फोट का है। एक अदालत ने वर्ष 2006 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में नौ आरोपियों में से सात को रिहा कर दिया। एनआईए ने कहा कि सलमान फारसी, शब्बीर मोहम्मद जाहिद और फारुगुई अंसारी को मुंबई के आर्थर रोड जेल से रिहा कर दिया गया। औपचारिकता पूरी होने के बाद एक अन्य आरोपी अबरार अहमद को भी वामदुला जेल से रिहा कर दिया। मामले के दो अन्य आरोपियों आसिफ खान और मोहम्मद अली को भी जमानत तो मिल गई पर इन्हें रिहा नहीं किया गया क्योंकि वे 2006 के मुंबई ट्रेन सिलसिलेवार विस्फोटों में भी आरोपी हैं। मामले की जांच कर रही राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने रिहाई का विरोध नहीं किया। एनआईए ने तर्प दिया कि मक्का मस्जिद बम विस्फोट मामले में गिरफ्तार स्वामी असीमानन्द के खुलासे के बाद उसने ताजा साक्ष्यों के अलावा पूर्व की जांच एजेंसी एटीएस और सीबीआई द्वारा जुटाए गए साक्ष्यों की समीक्षा की थी। एनआईए ने कहा, `तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर काफी सोच विचार के बाद सभी नौ आरोपियों के जमानत, आवेदनों का विरोध नहीं करने का फैसला किया गया जिन्हें पूर्व में गिरफ्तार किया गया था और आरोपी बनाया गया था।'
दूसरा केस सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले में गुजरात के पूर्व गृह राज्यमंत्री अमित शाह की कथित भूमिका पर सीबीआई को कड़ी फटकार लगाई है। सीबीआई ने कई अनाम पत्रों को शाह की फिरौती रैकेट में कथित भूमिका से जुड़ी शिकायतों के तौर पर पेश किया। एजेंसी के इस कदम को न्यायालय ने किसी को खुश करने का कदम बताया। न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की पीठ ने कहा, `यह स्पष्टतया किसी को खुश करने के लिए उठाया गया कदम है, जो बिल्कुल गलत है।' सीबीआई ने अमित शाह के खिलाफ ऐसी लगभग 200 शिकायतें पेश की थीं, जिन्हें देखने के बाद पीठे ने कहा, `आपने (सीबीआई) ने हमसे कहा है कि प्रदेश सरकार ने इन शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं की। इन पत्रों पर कोई कार्रवाई की ही नहीं जा सकती। ये शिकायतें पूरी तरह बकवास लग रही हैं।' सीबीआई ने गुजरात उच्च न्यायालय की ओर से शाह को जमानत दिए जाने की चुनौती दी है। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, `आपको हमारा सबसे अच्छा जांचकर्ता माना जाता है। अब आपको इन कमियों का जवाब देना होगा।' सुनवाई के दौरान शाह ने आरोप लगाया कि वह राजनीतिक साजिश का शिकार हुए हैं और सीबीआई ने उन्हें इस मामले में झूठा फंसाया है। शाह के वकील राम जेठमलानी ने कहा कि शाह राजनीतिक साजिश का शिकार हुए हैं और सीबीआई भी उसका एक भाग है।
तीसरा केस भी सीबीआई से संबंधित है। 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले की सुनवाई कर रही विशेष न्यायाधीश ओपी सैनी की अदालत में माननीय जज महोदय ने सीबीआई से साक्ष्यों को नष्ट करने में लग रहे आरोपों पर जानकारी मांगी है। सीबीआई को 23 नवम्बर तक जवाब देना है। सीबीआई पर आरोपियों ने कहा कि आरोप तय करने के आदेश में गलतियां और विरोधाभास हैं। निष्पक्ष सुनवाई के लिए उनमें सुधार की जरूरत है। आरोपी विनोद गोयनका ने सीबीआई पर आरोप लगाया है कि गवाह को अनाधिकृत तौर पर बुलाकर साक्ष्य प्रभावित किए जा रहे हैं। बुधवार को गवाही दे रहे रिलायंस अधिकारी एएन सेथुरमन ने बताया था कि उसके बयान के साथ छेड़छाड़ की गई है। गवाह ने दावा किया कि उसने हरी नायर के हस्ताक्षर की कभी भी पहचान नहीं की। इसके बावजूद सीबीआई ने इसे पेश कर दिया है। गोयनका के वकील माजिद मेनन ने कहा कि गवाह की याददाश्त ताजा करने के नाम पर सीबीआई द्वारा अपनाई गई कार्रवाई मामले को प्रभावित करने की तरह है। उन्होंने कहा कि सीबीआई को आदेश दिया जाए कि याददाश्त ताजा करने के नाम पर गवाह या साक्ष्यों को प्रभावित न करें।
चौथा केस हमारी दिल्ली पुलिस से संबंधित है। दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को साफ कर दिया कि कैश फॉर वोट मामला भ्रष्टाचार का नहीं बल्कि महज एक स्टिंग ऑपरेशन था। अदालत ने कहा कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे साबित हो कि मामले के अभियुक्त तीन सांसदों ने रिश्वत मांगी या ली। इतना ही नहीं, अगर वे रिश्वत लेते तो चुपचाप लेते न कि टीवी चैनल के समक्ष लेकर उसे इस प्रकार संसद में पेश करते। वही हमारी संसद सर्वोच्च है और संसद द्वारा गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) ने भी साक्ष्य न होने पर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। अदालत ने यह टिप्पणी भाजपा के मौजूदा सांसद अशोक अर्गल तथा दो पूर्व सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर सिंह भगोरा सहित सभी छह अभियुक्तों की जमानत स्वीकार करते हुए की। जस्टिस एमएल मेहता ने अपने फैसले में कहा कि दर्ज प्राथमिकी और आरोप पत्र का अध्ययन करने से वह महसूस करते हैं कि सांसदों व अन्य के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं है। इसके अलावा सीएफएसएल की रिपोर्ट से भी साफ है कि टीवी चैनल की ओर से स्टिंग ऑपरेशन की सीडी व ऑडियो में किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की गई। किसी भी सांसद और अन्य ने कथित रिश्वत की राशि से फायदा नहीं उठाया। अदालत ने यह भी कहा कि वही दूसरी ओर अभियोजन पक्ष का केस भी यही है कि उक्त सांसद व अन्य अभियुक्तों का उद्देश्य मात्र कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की मिलीभगत का पर्दाफाश करना था।
उक्त केसों से साफ है कि राजनीतिज्ञों के दबाव के कारण हमारी जांच एजेंसियों की साख पर बट्टा लग रहा है। राजनेता जबरन अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए जांच एजेंसियों पर नाजायज दबाव डलवाकर झूठे केस बनवाते हैं जो अदालतों में जाकर उड़ जाते हैं। दुःखद पहलू यह है कि यह सिलसिला चलता रहेगा और जल्द एक भी एजेंसी ऐसी नहीं रहेगी जिसकी जांच पर जनता विश्वास कर सके।
2G, Amar Singh, Anil Narendra, Cash for Vote Scam, CBI, Daily Pratap, delhi Police, NIA, Vir Arjun

Wednesday, 28 September 2011

बाबा रामदेव समर्थकों पर हुई लाठीचार्ज की शिकार राजबाला चल बसीं



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 28th September 2011
अनिल नरेन्द्र
काले धन के मुद्दे पर बाबा रामदेव के अनशन के दौरान रामलीला मैदान में दिल्ली पुलिस द्वारा 4 जून को की गई कार्रवाई में गम्भीर रूप से घायल उनकी एक समर्थक 57 साल की महिला राजबाला का सोमवार को निधन हो गया। राजबाला की रीढ़ की हड्डी में गम्भीर चोटें थीं और तभी से वह यहां जीबी पंत अस्पताल में इलाज करा रही थीं। डाक्टरों के अनुसार राजबाला की सुबह 10 बजकर 25 मिनट पर मौत हो गई। राजबाला उन अभागिन में से एक थी जो 4 जून को रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के समर्थन में बैठी थीं। पुलिस कार्रवाई में बुरी तरह घायल होने के बाद उन्हें 4 जून को ही अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया था। उनकी शल्यक्रिया भी हुई थी और वे वेंटिलेंटर पर थी। राजबाला के परिवार और बाबा रामदेव का आरोप है कि राजबाला पुलिस लाठीचार्ज के कारण घायल हुई थी। हालांकि पुलिस इन आरोपों का खंडन करते हुए कह चुकी है कि रामलीला मैदान पर कोई लाठीचार्ज नहीं हुआ था और प्रदर्शनकारियों के बीच मची भगदड़ के कारण राजबाला की मौत हुई थी। राजबाला की मौत की सूचना पाते ही पंत अस्पताल पहुंचे बाबा रामदेव ने कहा कि राजबाला का बलिदान बेकार नहीं जाने दिया जाएगा। जिन मुद्दों की लड़ाई में उनका बलिदान हुआ, वह आगे भी जारी रहेगी। बाबा ने कहा कि राजबाला की मौत भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में शहादत है। राजबाला की मौत के लिए गृहमंत्री पी. चिदम्बरम परोक्ष रूप से जिम्मेदार हैं क्योंकि उन्हीं के कहने पर पुलिस ने 4 जून की रात मेरे समर्थकों पर बर्बरतापूर्ण कार्रवाई की। रामदेव के बयान में दावा किया गया है कि वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने इस मुद्दे पर समर्थन जताया है और कहा है कि दिल्ली पुलिस और उसे निर्देश देने वाले गृहमंत्री को इस मामले में जिम्मेदार ठहराते हुए उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाएगा। मौके पर सिविल सोसाइटी के सदस्य मनीष सिसौदिया और राजबाला की पुत्रवधू राकेश कुमारी मलिक ने संवाददाताओं से बातचीत में आरोप लगाया कि राजबाला की मौत पुलिस कार्रवाई के कारण हुई। हर कोई जानता है कि पुलिस ने यह कार्रवाई की थी। हमें हमारी मां वापस चाहिए, क्या वे हमें हमारी मां वापस दे सकते हैं? हमें कोई मुआवजा नहीं चाहिए। आप ऐसी सरकार से क्या उम्मीद रखेंगे, जिसके प्रधानमंत्री या किसी वरिष्ठ मंत्री ने इस मामले में एक शब्द तक नहीं कहा। राकेश कुमारी ने यह भी आरोप लगाया कि राजबाला को जो चोटें आई थीं उनका एमएलसी में जिक्र भी नहीं किया गया। भाजपा के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह ने कहा कि इससे पुलिस के सुप्रीम कोर्ट के समक्ष किए गए इस दावे की पोल खुल गई है कि प्रदर्शनकारियों पर कोई लाठीचार्ज नहीं हुआ था। डाक्टरों ने बताया कि पहले दिन से ही राजबाला की हालत नाजुक बनी हुई थी, उन्हें दवाइयों और लाइफ स्पोर्ट सिस्टम पर ही जीवित रखा जा रहा था। बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर कथित पुलिस कार्रवाई करने के आरोप के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 6 जून को केंद्रीय गृह मंत्रालय, दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस से रिपोर्ट तलब की थी। इस पुलिस कार्रवाई में बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों सहित कई लोग घायल हुए थे। यह मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है और हमें यकीन है कि माननीय न्यायाधीश राजबाला की मौत का नोटिस लेंगे और राजबाला की हत्या के लिए जिम्मेदार लोगों पर जरूर कार्रवाई करेंगे। हम राजबाला के परिवार वालों को बताना चाहेंगे कि दुःख की इस बेला में वे अकेले नहीं।
Anil Narendra, Baba Ram Dev, Daily Pratap, delhi Police, Human Rights Commission, P. Chidambaram, Raj Bala, Ram Lila Maidan, Supreme Court, Vir Arjun

Wednesday, 21 September 2011

बटला हाउस एनकाउंटर की तीसरी बरसी



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21th September 2011
अनिल नरेन्द्र

तीन साल पहले का 19 सितम्बर का वो दिन, जब नई दिल्ली के बटला हाउस के एक मकान में आतंकियों के छिपे होने की खबर के बाद दिल्ली पुलिस के तेज-तर्रार इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा ने अपनी जान की परवाह न करते हुए दुर्दांत आतंकियों से लोहा लिया और वह इस कार्रवाई में शहीद हो गए थे। दूसरी ओर कुछ कट्टरपंथी नेता और कुछ राजनीतिज्ञ इस घटना पर राजनीति से बाज नहीं आते। इसे फर्जी एनकाउंटर कहकर हर साल बटला हाउस एनकाउंटर को याद किया जाता है। बटला हाउस मुठभेड़ की तीसरी बरसी पर सोमवार को नई दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर प्रदर्शन किया गया और मांग की गई कि मुठभेड़ की न्यायिक जांच कराई जाए। इस प्रदर्शन में आजमगढ़ से स्पेशल ट्रेन में आए राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल के सदस्यों ने भाग लिया। काउंसिल ने कहा कि आतंकवाद के नाम पर आजमगढ़ को बदनाम किया गया और किया जा रहा है जो बन्द होना चाहिए। मजेदार बात यह रही कि उलेमाओं ने हजारों समर्थकों के बीच कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह पर खास निशाना साधा। दिग्विजय ने कुछ महीने पहले आजमगढ़ जिले के संजरपुर गांव का दौरा किया था और उसी दौरान उन्होंने बटला हाउस मुटभेड़ पर सवाल खड़े किए थे। उल्लेखनीय है कि 19 सितम्बर 2008 को हुई मुठभेड़ में मारे गए दो संदिग्ध युवकों आतिफ अमीन और मोहम्मद साजिद का ताल्लुक इसी गांव से था। उलेमा काउंसिल के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना आमिर रशादी मदनी ने कहा कि यह कितनी अजीब बात है कि दिग्विजय सिंह संजरपुर जाकर इस मुठभेड़ पर सवाल खड़े करते हैं, लेकिन दिल्ली में उनकी सरकार है, जो इस मामले की उच्चस्तरीय जांच नहीं करवा रही है। उन्होंने कहा कि दिग्विजय ने मुझसे खुद कहा था कि उन्होंने इस मुठभेड़ के फर्जी होने की बात कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कही, लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी। मुझे लगता है कि दिग्विजय सिर्प नौटंकी करते हैं। उन्हें मुसलमानों से कोई हमदर्दी नहीं है। विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों ने सोनिया, मनमोहन सिंह और राहुल गांधी के खिलाफ नारेबाजी की, हालांकि इन लोगों के निशाने पर सबसे ज्यादा दिग्विजय रहे।
जन्तर-मन्तर में उलेमाओं का प्रदर्शन हो रहा था तो दिल्ली के दूसरे कोने में बटला हाउस एनकाउंटर में शहीद हुए दिल्ली पुलिस के मोहन चन्द शर्मा के घर पर उनका परिवार उन्हें अकेला ही याद कर रहा था। उनके परिवार ने किसी से भी बात नहीं की। यहां तक कि उन्होंने मीडिया से दूर ही रहना ठीक समझा। उनके घर पर पुलिसकर्मियों का पहरा था। उनके घर गए एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि उनके माता-पिता के सामने आज भी 2008 का मंजर आता है तो उनकी आंखों में आंसू छलक पड़ते हैं। यह हमारे देश की विडम्बना ही है कि इस मुठभेड़ को महज वोटों की खातिर फर्जी करार दिया जा रहा है और इस पर राजनीति हो रही है। कानूनी दृष्टि से कई अदालतों ने इसे सही कार्रवाई करार दिया है पर इसके बावजूद इस पर राजनीति चलती जा रही है। इन राजनीतिज्ञों व धार्मिक नेताओं को इस बात की परवाह भी नहीं है कि इससे हमारे सुरक्षा बलों पर क्या असर पड़ेगा? इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा की शहादत के बाद जिस प्रकार नेताओं ने कुलषित राजनीति के चलते इस एनकाउंटर पर संदेह किया और आतंकियों के संरक्षण की परिभाषा बोली और जांबाज इंस्पेक्टर की शहादत को संदेह के कटघरे में खड़ा किया गया, उससे निश्चित तौर पर दिल्ली पुलिस के जांबाज जवानों का ही नहीं बल्कि पूरे देश की फोर्सों का मनोबल टूटा होगा। इसका एक विपरीत असर यह जरूर हुआ कि पुलिस व अन्य फोर्सों के जवान अच्छी तरह समझ चुके हैं कि आतंक के खिलाफ चुप बैठना और सांप निकलने के बाद आतंकियों को पकड़ना नहीं बल्कि लकीर पीटना उनका पहला कर्तव्य है। परिणामस्वरूप अब राजधानी दिल्ली में कोई भी बम ब्लास्ट हो उसमें पुलिस के हाथ खाली के खाली हैं और हो भी क्यों न, यदि वे अपनी जांबाजी से आतंकी पकड़ भी लें तो सरकार मुकदमे लड़वाएगी। फांसी की सजा होगी, तो उसे लेट करवाएगी और आतंकियों को सरकारी मेहमान बनाकर उनकी खातिरदारी में जुटी होगी। बहरहाल बटला हाउस कांड की तीसरी बरसी पर दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर चन्द मोहन शर्मा को समस्त देशवासियों की ओर से शत्-शत् नमन्... आज उनकी कब्र पर एक दीया भी नहीं, जिनके चिरागों से चला करते थे अहले वतन, दीये जलते हैं उनकी कब्र पर जो बेचा करते हैं शहीदों को कफन
Anil Narendra, Batla House Encounter, Daily Pratap, Delhi Bomb Case, delhi Police, Digvijay Singh, Manmohan Singh, Terrorist, Vir Arjun

Tuesday, 13 September 2011

No more leniency, put shirkers in jails

 - Anil Narendra
11/7, 26/11, 13/7, 7/9 and God knows how many more terror attacks we shall have to face. Is the count going to stop somewhere or not? Leave aside the country; Delhi itself has been witness to the human miseries as a result of 15 bomb blasts during the period, Jan 9th 1997 to May 25th 2011. The Delhi High Court blast was 16th in the series. Why were the last two blasts targeted at the High Court? This too is an important question. There appears to be a number of reasons behind this. Besides getting publicity for their deeds, the terrorists are also trying to put across a message to the judges and advocates. No doubt their aim is to cause maximum damage, but they have selected the High Court as a target as a number of appeals including that of Batla House have been rejected by the Court. The Delhi High Court had rejected all Batla House appeals in 2009. The hearing for 1993 Mumbai blast case was also due on Wednesday, the day of blast. We can definitely see a pattern in these attacks, if we consider terror attacks in Court premises. Within a span of fifteen minutes between 13.15 to 13.30 hrs, there were cycle bomb blasts on 23 November 2007 in Lucknow, Faizabad and Varanasi, which claimed 15 lives and more than 80 persons were wounded. Then there were blasts in Hubli District Court on 10th May, 2008, where a case against SIMI activists was due for hearing two days later. Another bomb blast near the CJM Court in Guwahati occurred on 30th October 2008. There were six blasts on that day in Guwahati. One of the blasts was triggered in the Court complex.
One terrorist with an explosive belt entered the advocate chambers in Aara District and as he sat down, blasted himself. An advocate was killed and six other persons were wounded in this incident. There was another bomb blast on 25 May 2011 in the Delhi High Court complex and now it was on Wednesday. By blasting bombs in a Court complex, the terrorists also want to make some judges their prey, who might be passing nearby. They had been trying to kill two birds with one stone.
When we talk of judges, it may be recalled that judges have given a clear message to the terrorists that they are not afraid of them. The High Court announced that it will start functioning in the afternoon at 14-00hrs on the same day. Courts were not closed. The judges boldly responded and told the terrorists in no uncertain terms that they are not going to cow down by their threats and the court proceedings would not be stopped. After the bomb blast on Wednesday, the Delhiwallas showed exemplary enthusiasm. The High Court judges also joined hands and advocates and court staff rendered help to the wounded. A judge from Tees Hazari Court, Shri Ajay Pandey along with two or three other judges reached the blood donation centre and voluntary donated blood.
They were driven by the urge that there should be no deficiency in treatment of wounded and there should be no shortage of blood, which may result in death to the wounded. It may be mentioned that ShriPandey was the judge, who had gone to Ramlila Ground to lend support to the Jan Lokpal Bill movement of Anna Hazare. After donating blood, he said that he had come there as a humanitarian gesture and a person must always listen to the voice of his conscience and decide in the larger interest of humanity.
The victims of these bomb blasts are always the poor and common man. There only fault is that they are present at the wrong place and at the wrong time. When the blast occurred on Wednesday at Delhi High Court, people were standing in a queue to get their visitor passes. An eye witness advocate told that the place where the blast occurred is the busiest area of the Court. This is the time, when hundreds of people come here to get their visitor passes to enter the Court premises. Rahul Gupta of Rohini was in a hurry to enter the Court premises; as such he came to the front in the queue. His pass was
almost ready and as he pushed his hand in the window to take it, there was a powerful blast. He staggered and fell down. When he tried to look behind towards his friends in the queue, he could see nothing.
Black smoke had engulfed him. For a minute, he was unable to understand anything. When the smoke thinned, he could see blood splattered all around. Someone's head had been severed from his body.
Another's severed arm was lying. Some persons had lost their legs. There was another unfortunate person from Geeta Colony, Inder Singh. Death has given him a call. He had received a court notice on a case that has been closed nine years back. He along with his son had come to the High Court for the hearing of the case. Inder Singh stood at the senior citizen counter for getting his visitor pass, and his son Harjeet went to another counter where crowd was relatively thinner.
Then the blast occurred. Inder Singh died at the spot, whereas Harjeet, standing at another counter, got minor injuries. Brijesh and his wife Nalini had come to the High Court from Vasant Vihar in connection with a case. His wife went a few steps ahead of him, when there was the massive blast and Nalini lost her life. Brijesh fainted.
When he came around, he realized that his family was ruined. A woman had entered Gate No 5 without getting a visitor pass. She was stopped by the security personnel and was asked to get a pass for entry into the Court premises. When she went towards the counter, there was the blast and she died. An eye witness narrated blood chilling incident.
He told that a body had flown high and got entangled on an iron rod at a nearby construction site. Someone had lost his leg, another, his arm. A person had lost both of his legs and was dragging himself to a safer place to save his life. A woman had lost half of her body. An advocate, Sugreev Dubey told that the case of his client Gurmail Singh was listed for Wednesday. He had advised him not to come to Court, as there would be no progress in the case on that day, but his client did not took his advice seriously and came to the Court. Standing on the counter, there was a blast and Gurmail got serious injuries on his hands and legs. Even three advocates, who had come to help their clients were also got wounded in the blast. There are numerous such pathetic incidents.
Who is responsible for these frequent miseries? Public want answer, only speeches won't do. We need accountability. Which officers are responsible for failing to stop these terror strikes? Who amongst them proved ineffective? Who did such mistake or allowed it to happen? We will have to ask these questions. We shall have to make a clear and simple list, which shall explain that despite involvement of such big names, such influential designations and such a clear mandate, why there was such a big criminal negligence, resulting in such pathetic deaths. Trials for such offenders must be held within 24 hours. There should be Special Courts to hear such cases. No sections with ifs and buts, hearing within a specified time-frame must be ensured. Specified time for appeals, arguments, pointed and tricky questions of advocates should be allowed. Whether it was his or her duty or not? Carried out his/her duty with 100 percent honesty or not? All this can be proved in a day. If found guilty of not performing duty, send him or her to jail. If they have shown dutifulness, then only they may be sent to fight terrorism against. Who are ready to make sacrifices, should only be sent to the war against terror. There is no place for officers seeking career in this war against terrorism. The Opposition demands for resignations only, it is not bold enough to ask for their termination. Appeasement will not be tolerated any more. People want accountability and each officer, who has failed in his/her duties, will have to be answerable to the public. For how long we will tolerate this appeasement?

Thursday, 1 September 2011

चार जून की बाबा रामदेव पर कार्रवाई किसके आदेश पर?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1st September 2011
अनिल नरेन्द्र
चार जून की रात को रामलीला मैदान पर बाबा रामदेव के समर्थकों पर पुलिस की कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने बाबा व स्वाभिमान ट्रस्ट से एक हलफनामा दाखिल करने को कहा है जिसमें दिल्ली पुलिस पर वीडियो फुटेज से छेड़छाड़ करने का आरोप साबित हो सके। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एमाकस क्यूरे और वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि यह बड़ा सवाल है कि पहले चार मंत्री बाबा रामदेव से मिलने जाते हैं। इसके चार दिन बाद अचानक उनके अनशन को तोड़ने और आधी रात को धारा-144 लगाकर पुलिस कार्रवाई करती है? आखिर यह किसके आदेश से किया जाता है? श्री धवन ने अन्ना हजारे को 16 अगस्त की सुबह अचानक गिरफ्तार किए जाने का जिक्र भी किया है। एमाकस क्यूरे ने दिल्ली सरकार और पुलिस के हलफनामों से असंतोष जताते हुए यह राज भी खोला कि चार जून की रात सीआरपीएफ ने आदेश का पालन करने से इंकार कर दिया था। जस्टिस बीएस चौहान की बैंच के समक्ष एमाकस क्यूरे, राजीव धवन ने इस मामले में जिला जज से जांच कराए जाने और इस कार्रवाई के दुप्रभावों पर भी विचार करने की मांग रखी। हालांकि पीठ ने बाबा रामदेव के ट्रस्ट भारत स्वाभिमान से दिल्ली पुलिस पर लगाए गए उस आरोप पर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया जिसमें चार जून को हुई इस कार्रवाई के वीडियो फुटेज और सीडी से छेड़छाड़ करने का आरोप पुलिस पर ट्रस्ट की ओर से लगाया गया था। पीठ ने कहा कि अखबारों में आई फोटो और न्यूज चैनलों के वीडियो क्लिपिंग में थोड़ा विरोधाभास है। चार जून की कार्रवाई पर दिल्ली पुलिस बुरी तरह फंस गई है। `इधर कुआं उधर खाई' की स्थिति में फंसी दिल्ली पुलिस के लिए आगे का रास्ता आसान नहीं। देखें आगे क्या करती है दिल्ली पुलिस?
Anil Narendra, Baba Ram Dev, Daily Pratap, delhi Police, Ram Lila Maidan, Supreme Court, Vir Arjun

Friday, 19 August 2011

Anna Hazare the Second Gandhi

- Anil Narendra
Monday the 16th August will always be remembered. It was no less than a film full of all suspense, drama, emotions. All eyes were riveted on Anna Hazare. People were anxious to know what Anna was going to do today. But Anna was true to his words. Despite all pressures, Anna was firm on his resolve and would remain so. With about 250 police personnel, senior officers of Delhi Police reached Prashant Bhushan’s flat in Supreme enclave in Mayur Vihar Phase-1 on the Monday morning, where Anna was staying. After futile discussions for half an hour, Police took Anna into custody. As Crime Branch officials accompanying Anna came out in an Innova car, a huge crowd surrounded it. People blocked the UP link road. Anna Hazare was brought to the Officers’ Mess at Alipur Road. Later, apprehending breach of peace, Anna’s arrest was announced. Fearing reactions from Anna supporters, the Police made arrangements to send him to an undisclosed location. Police took away Anna in a car. Uncertainty over Anna prevailed for about two hours. Police, too, refused to say anything in this regard. Anna along with the police team reached DCP office in Rajauri Garden at about 12.15 in the afternoon. He was produced before the Court of the Executive Magistrate. After Anna’s refusal to sign an affidavit, he was sent to judicial custody. At about 1515 hrs, the police team started for Tihar Jail along with Anna, but the agitating crowd outside DCP office started protesting. In the ensuing stone-pelting, window pane of Innova, in which Anna was traveling, was also broken. Police reached Tihar Jail with Anna at about 3.45 PM. Tihar authorities decided to lodge Anna in Jail No 4. His other associates – Arvind Kejariwal, Shanti Bhushan, Kiran Bedi were also brought to Tihar Jail after their arrest.
The news of Anna’s arrest spread all over the country like wild fire. The atmosphere was similar to that of JP Movement’s. People were on streets, they were raising slogans and there was demonstration of solidarity among the people that included women, children, elders etc. But there was a great difference between JP and Anna movements. And the difference was that of the presence of electronic media. Television had made a significant difference. Not only in India, but all over the world, the news of Anna’s arrest was being watched/listened with great interest. Public in many cities took to the streets and sit-ins and demonstrations began. Perhaps, the Central government was not expecting of such a massive support to Anna’s movement. The decision to take Anna to Tihar proved that the Manmohan Singh government is loosing its ability to take logical decisions, which according to an adage happens in the face of doomsday. Anna was taken to same Jail, where corrupt persons like A Raja, Kanimojhi, Suresh Kalmadi were lodged. What an irony that a person who, like Gandhiji, is carrying a non-violent crusade against corruption, had been taken to a jail, where great names accused of corruption had gathered. Even the prisoners of Tihar started raising slogans in support of Anna. According to sources, even the security personnel posted there were eager to get a glimpse of Anna. Some of the prisoners said that it can be understood that persons like them are put behind bars, but what is the logic behind the arrest of a person like Anna Hazare?, He is just following Gandhian principles of protest and leading an anti-corruption movement for the relief of common man. What is the fault of such people for which they are being put behind the bars? They wanted to see such people. Sources say that some of the prisoners expressed their desire to be part of this movement after being released from the Jail, while others offered to go on fast for a day. When Anna Hazare was in jail, large number of people had thronged the Tihar and they were exhibiting their support to Anna Hazare and at India Gate, people were taking a candle march at the same time. Chhatrasal Stadium, where agitators were being kept, was resounding with slogans and electronic media was reporting about public coming to streets all over the country. The government was seething with anger over the support Anna was getting and action taken by the Delhi Police was perhaps, unprecedented. It had sent an order to Tihar authorities to release Anna unconditionally. This time the Delhi Police acted a little sensibly. There was no repetition of the use of force that was witnessed on 4 June to oust the supporters of Baba Ramdev from Ramlila Grounds and the Police handled this whole episode with maturity.
Anna movement was at its peak. The issue for which Anna was agitating was different from that of Baba Ramdev. Real issue was corruption and price rise. People have come to the conclusion that corruption is the real cause for the present inflation and this government is neither interested in curbing the corruption nor controlling the inflation. I live in Sunder Nagar. On my return to my home on Tuesday I came across a copy of a circular by the Sunder Nagar Association, which was sent to all the residents. It had an appeal to all the residents to keep their lights off in the evening from 7.00 to 8.00 and lend their support to anti-Corruption movement. With these types of passions running high among common man, you can easily guess how popular the Anna mission has become. Anna is right when he says that the corruption can be mitigated by the Jan Lokpal Bill, but cannot be ruled out completely. Anna’s mission could be considered successful, if at least 65 per cent corruption is reduced.
At present, Anna is firm on his resolve in Tihar. It appears from the news that were coming till the writing of this article that Anna has refused to leave the premises of Tihar until allowed to undertake his protests unconditionally. He is insisting that the terms imposed on his protest fast must be removed. Jail authorities have declared his release, but Anna has refused to step out of the Jail. Tihar Jail spokesman Sunil Gupta says that superior officers have been informed about the terms that have been put forward by Anna for his release. The Manmohan government has failed to feel the pulse of the public. In fact, this government has failed from the beginning to properly gauge the public support, the Anna Movement was gaining. That is why picture of government’s insincerity and anger has emerged and the adage that with approaching doom, a person looses prudence also hold good in the present context. The direction of Gandhian Anna’s movement and massive support to it all over the country proved a serious irritant for the government. The government had to suffer disgrace in the face of efforts to stop Anna’s protest fast. That is why, the Delhi Police which had arrested Anna in the morning, was continuously appealing to him in the evening to step out of the jail. Police withdrew all cases against him, but Anna was adamant to remain in the jail till he is not given written permission to hold protest at JP Park. After his arrest, Anna said that the second movement of independence has begun and that though he has been arrested, but his movement is not going to stop on any account. He said that the real faces of the corrupts have been unveiled. This is a struggle for change. Rule of the people could not be materialized till the change is not brought about. He said that the time has come, when all people should offer arrest and not a single jail in the country should remain vacant. All supporters should take eight days’ leave from their jobs and join the movement. He said the movement would be strengthened, only if people in large numbers join it.

Thursday, 18 August 2011

अन्ना की आंधी है, ये दूसरे गांधी हैं


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18 August 2011
अनिल नरेन्द्र
मंगलवार 16 अगस्त का दिन हमेशा याद रहेगा। यह कोई फिल्म से कम नहीं था। पूरे दिन में सस्पेंस, ड्रामा, एमोशन सभी देखने को मिले। सारे देश की नजरें अन्ना हजारे पर टिकी हुई थीं कि देखें आज अन्ना क्या करते हैं। अन्ना अपने कहने पर खरे उतरे। तमाम तरह के दबावों के बावजूद अन्ना अपने स्टैंड पर कायम रहे और रहेंगे। मंगलवार को सुबह दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अफसर करीब ढाई सौ जवानों को लेकर मयूर विहार फेस-1 स्थित सुपीम एंक्लेव में पशांत भूषण के फ्लैट पहुंचे। करीब आधा घंटे तक मंत्रणा के बाद कोई नतीजा निकलता न देखकर पुलिस ने अन्ना को जो इसी फ्लैट में रुके थे, को हिरासत में ले लिया। अन्ना को जैसे ही इनोवा कार में लेकर काइम ब्रांच के आदमी बाहर निकले गाड़ी को हुजूम ने घेर लिया। लोगों ने यूपी लिंक रोड जाम कर दी। अन्ना हजारे को अलीपुर रोड स्थित ऑफिसर्स मैस लाया गया। बाद में अन्ना को शांति भंग करने की आशंका में गिरफ्तार करने की घोषणा हुई। अन्ना समर्थकों के डर से पुलिस ने उन्हें अज्ञात स्थान पर भेजने की तैयारी की। पुलिस अन्ना को गाड़ी में बिठाकर ले गई। लगभग दो घंटे तक अन्ना को लेकर संशय की स्थिति बनी रही। पुलिस ने भी इस बारे में कुछ कहने से इंकार कर दिया। लगभग सवा बारह बजे अन्ना को लेकर पुलिस टीम राजौरी गार्डन स्थित पुलिस उपायुक्त कार्यालय पहुंची। यहीं विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत में अन्ना हजारे को पेश किया गया। अन्ना के शपथ पत्र देने से इंकार करने पर उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। दिन के लगभग सवा तीन बजे अन्ना हजारे को लेकर पुलिस टीम तिहाड़ जेल के लिए रवाना हुई। लेकिन उपायुक्त कार्यालय के बाहर जमा भीड़ ने विरोध पदर्शन शुरू कर दिया। पथराव में अन्ना हजारे को ले जा रही इनोवा कार का शीशा भी टूट गया। लगभग पौने चार बजे शाम अन्ना हजारे को लेकर पुलिस तिहाड़ जेल पहुंची। तिहाड़ अधिकारियों ने अन्ना को जेल संख्या चार में रखे जाने का निर्णय किया। उनके अन्य सहयोगियों, अरविन्द केजरीवाल, शांति भूषण, किरण बेदी को भी गिरफ्तार कर तिहाड़ लाया गया।
अन्ना की गिरफ्तारी की खबर पूरे देश में आग की तरह फैल गई थी। कुछ-कुछ माहौल वैसा ही था जो एक जमाने में जेपी मूवमेंट के समय बना था। जनता सड़कों पर उतर आई थी, नारे लग रहे थे, औरतें, बच्चे, वृद्ध सभी एकजुट होते नजर आए। जेपी मूवमेंट और अन्ना मूवमेंट में एक बहुत बड़ा फर्प नजर आया। वह था इलैक्ट्रानिक मीडिया का आना। टीवी से जमीन आसमान का फर्प पड़ गया है। अन्ना को पुलिस तिहाड़ जेल ले गई है यह खबर भारत के कोने-कोने में तो पहुंची ही पर विदेशों तक उसी समय पहुंच गई। देश के कई शहरों में लोग सड़कों पर उतर आए, धरने-पदर्शन आरम्भ हो गए। केन्द्र सरकार को शायद यह उम्मीद नहीं रही होगी कि अन्ना को ऐसा जन समर्थन मिलेगा। विनाश काले विपरीत बुद्धि यह कहावत मनमोहन सिंह सरकार पर अन्ना को तिहाड़ ले जाने से साबित होती है। अन्ना को उसी तिहाड़ जेल में ले जाया गया जहां ए. राजा, कनिमोझी, सुरेश कलमाड़ी जैसे भ्रष्ट लोग जमा हुए थे। जो आदमी भ्रष्टाचार के खिलाफ गांधीगिरी से विरोध कर रहा है उसको उसी जेल में ले जाया जाए जहां भ्रष्टाचार के आरोप में यह दिग्गज जमा हैं कितनी विरोधाभास है। तिहाड़ में कैदियों तक में अन्ना के समर्थन में नारे लगने लगे। सूत्रों की माने तो जब अन्ना को शाम को तिहाड़ लाया गया तो यहां के सुरक्षा कर्मियों तक को अन्ना को देखने की लालसा थी। कुछ कैदियों का कहना था कि हमें बंद करें तो बात समझ में आती है मगर अन्ना हजारे जैसे व्यक्ति को गिरफ्तार करना कहां से तर्पसंगत है? यह तो एक आम इंसान की दिक्कत व देश को खोखला करने वालों को सजा दिलवाने के लिए लोकपाल बिल लाने के लिए गांधीगिरी के साथ लेकर अनशन कर रहे हैं। इनका इसमें दोष क्या है, जो इनको बंद या सजा दे रहे हैं? ऐसे लोगों को वह देखना चाहते हैं। सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि कुछ कैदियों ने बाहर निकलकर उनके मिशन का हिस्सा बनने की भी बात की तथा कुछ ने एक दिन अनशन करने की बात कही। जब अन्ना हजारे जेल में बंद थे, उनके हजारों समर्थक जेल के बाहर पदर्शन कर रहे थे, नारे लगा रहे थे उसी समय इंडिया गेट पर कैंडल मार्च हो रहा था। छत्रसाल स्टेडियम में जहां आंदोलनकारियों को रखा गया था जमकर नारे लग रहे थे, पूरे देश से जनता के सड़कों पर आने की रिपोर्टें टीवी पर आ रही थीं। सरकार अन्ना के समर्थन को देखकर बौखला गई और दिल्ली पुलिस ने वह काम किया जो उसने शायद पहले कभी नहीं किया था। उसने तिहाड़ में अन्ना को बिना शर्त छोड़ने का आदेश भेज दिया। इस बार दिल्ली पुलिस ने थोड़ी होशियारी से काम लिया। उसने 4 जून को जिस तरह बाबा रामदेव के समर्थकों को रामलीला मैदान से बल पयोग करके खदेड़ने के लिए लाठी, डंडे का सहारा लिया था इस बार वह नहीं देखने को मिला और पुलिस ने मैचयूरिटी से सारे मामले को हैंडल किया।
अन्ना का आंदोलन अब पूरा रंग ले चुका है। अन्ना मुद्दा, बाबा रामदेव जैसा मुद्दा नहीं। असल मुद्दा है भ्रष्टाचार और महंगाई। जनता का अब मानना है कि भ्रष्टाचार की वजह से ही महंगाई बढी है और यह सरकार न तो भ्रष्टाचार रोकने में या महंगाई कम करने में दिलचस्पी रखती है। मैं सुंदर नगर में रहता हूं। मंगलवार शाम को जब मैं घर लौटा तो हमारी सुंदर नगर एसोसिएशन से एक सर्कुलर पड़ा हुआ था। यह सर्पुलर सारे सुंदर नगर निवासियों को भेजा गया था। इसमें लिखा था कि आज शाम 7 से 8 बजे तक बत्ती बंद रखें और भ्रष्टाचार मुक्त आंदोलन का समर्थन करें। जब जनता में इस पकार का जज्बा हो तो आप खुद ही अन्दाजा लगा सकते हैं कि अन्ना का आंदोलन कितना जनपिय हो चुका है। अन्ना ठीक ही कहते हैं कि जनलोकपाल बिल से भ्रष्टाचार मिट नहीं सकता, कम जरूर हो सकता है। 65 पतिशत तक भ्रष्टाचार कम हो जाए तो अन्ना का मुहिम सफल माना जाएगा।
फिलहाल अन्ना तिहाड़ में ही अपनी बात पर अडिग जमे हुए हैं। इस लेख लिखने तक जो खबरें आ रही हैं उससे पता लगता है कि अन्ना ने तिहाड़ जेल से रिहा होने से मना कर दिया है। उनकी मांग है कि अनशन के लिए लगाई गई शर्तें रद्द की जाएं। जेल पशासन ने उन्हें रिहा करने की घोषणा कर दी है पर अन्ना ने जेल से बाहर निकलने से इंकार कर दिया है, तिहाड़ जेल के पवक्ता सुनील गुप्ता ने बताया कि अन्ना हजारे की शर्तें आला अफसरों तक पहुंचा दी गई हैं। जनता की नवज पहचानने में मनमोहन सरकार नाकाम रही है। यह सरकार शुरू से ही अन्ना आंदोलन को मिलने वाले जन समर्थन को सही से आंकने में फेल रही। इसी वजह से जहां एक तरफ सरकार के खोखलेपन, बौखलाहट की तस्वीर आई वहीं विनाशकाले विपरीत बुद्धि भी फिट बैठी है। गांधीवादी अन्ना हजारे का सत्याग्रह तेवर और उनके समर्थन में मंगलवार को देशभर में उमड़ा जन सैलाब सरकार के लिए भारी साबित हुआ। लोकपाल के मुद्दे पर अन्ना को अनशन से रोकने की कोशिश में सरकार को मुंह की खानी पड़ी। इसीलिए अन्ना को सुबह गिरफ्तार करने वाली दिल्ली पुलिस रात तक उन्हें तिहाड़ जेल से बाहर आने के लिए मिन्नतें करती रही। पुलिस ने उनके खिलाफ सभी मामले वापस ले लिए लेकिन अन्ना जेल में रहने पर अड़ गए। उन्हें बाहर आने के लिए जेपी पार्प में अनशन करने की लिखित अनुमति देने की शर्त अन्ना ने रखी है। गिरफ्तारी के बाद अन्ना ने कहा कि आजादी का दूसरा आंदोलन शुरू हो गया है और मुझे गिरफ्तार कर लिया गया है, लेकिन मेरी गिरफ्तारी से आंदोलन कतई थमने वाला नहीं। भ्रष्टाचारियों का असली चेहरा सामने आ गया है। यह परिवर्तन की लड़ाई है। जब तक परिवर्तन नहीं आएगा तब तक लोकशाही हासिल नहीं होगी, समय आ गया है कि सभी लोग गिरफ्तारी दें और देश में कोई भी जेल खाली न बचे। सभी समर्थक आठ दिनों तक अपने काम से छुट्टी लें और आंदोलन में कूद पड़ें। लोगों के बड़ी संख्या में शामिल होने से ही यह आंदोलन मजबूत होगा।
Anil Ambani, Anna Hazare, Arvind Kejriwal, Daily Pratap, delhi Police, Lokpal Bill, Tihar Jail, Vir Arjun