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Thursday, 21 June 2012

अक्सर फिसलती दिग्विजय सिंह की जुबां

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21 June 2012
अनिल नरेन्द्र
मुझे आज तक यह समझ नहीं आया कि कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह किस हैसियत से आए दिन बयानबाजी करते रहते हैं। बातें भी वह ऐसी करते हैं जिनका गंभीर राजनीतिक अर्थ निकलता है। अगर वह कांग्रेस के पवक्ता नहीं तो किस आधार पर किसकी शह पर यह बयानबाजी करते हैं? उनको किसी न किसी की तो शह मिली होगी? नहीं तो वह नीतिगत बयान कैसे दे देते हैं। ताजा उदाहरण दिग्विजय की ममता बनर्जी के खिलाफ एक निजी टीवी चैनल पर बयानबाजी का है। दिग्विजय ने एक टीवी इंटरव्यू में तृणमूल कांग्रेस की पमुख ममता बनर्जी को अपरिपक्व और अस्थिर बताया और कहा कि पार्टी के धैर्य की एक सीमा होती है। सिंह ने यह भी कहा था कि ममता को मनाने के लिए पार्टी एक सीमा से आगे नहीं जाएगी। सवाल यह उठता है कि दिग्विजय ने ऐसा बयान क्यों दिया? क्या यह कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा है कि तुम बयान दे दो बाद में हम उसका खंडन कर देंगे। ममता को संकेत भी मिल जाएगा और फिर हम पार्टी को आपके बयान से अलग कर लेंगे। यह पहली बार नहीं है जब दिग्विजय ने इस पकार के विवादास्पद बयान दिए हैं। हाल ही में दिग्विजय ने उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के बारे में भी टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा कि अंसारी को दोबारा उपराष्ट्रपति बनाना चाहिए। पार्टी सूत्रों का तर्प है कि जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को इस संबंध में अधिकृत कर दिया गया है तो पार्टी के जिम्मेदार नेताओं खासकर पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों को इस बारे में बोलने पर परहेज करना चाहिए। दिग्विजय ने पार्टी अध्यक्ष को भी नहीं बक्शा। उन्होंने एक टीवी इंटरव्यू में कहा था कि कांग्रेस अध्यक्ष के नेता सदन बनने में कोई बाधा नहीं है। वे नेता सदन बन सकती हैं, साथ ही कोई डिप्टी लीडर हो सकता है। यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद उनकी चुनाव के दौरान की गई टिप्पड़ियां पार्टी की हार का एक कारण बनी। दिग्विजय ने वटला हाउस मुठभेड़ को फर्जी करार देकर भी पार्टी और सरकार को फंसा दिया था। गृहमंत्री पी चिदम्बरम की नक्सल विरोधी नीति पर भी उन्होंने विवादास्पद टिप्पणी की थी। अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान भी आए दिन दिग्विजय आलतू-फालतू टिप्पणी करते रहे। आखिरकार कांग्रेस नेतृत्व को दिग्विजय सिंह के बड़बोलेपन के खिलाफ कदम उठाना ही पड़ा। पार्टी ने दिग्विजय सिंह के बयानों से अपने को जहां अलग किया वहीं यह सार्वजनिक तौर पर साफ किया कि वे मीडिया से बात करने के लिए आधिकारिक रूप से अधिकृत नहीं हैं। यह पहला मौका है जब कांग्रेस की तरफ से यह कहा गया है कि दिग्विजय की बातों का पार्टी के विचार न माने जाएं। यानी एक तरफ कांग्रेस ने साफ करने का पयास किया है कि मीडिया उनकी बातों को कांग्रेस का मत मान कर न चले वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह को भी परोक्ष तोर पर चेतावनी दी है कि वह मीडिया में बयान देने से बाज आएं। दिग्विजय के विवादित बयानों से नाराज पार्टी ने उन्हें विभिन्न सियासी मुद्दों पर पार्टी की ओर से बोलने पर रोक दिया है। कांग्रेस मीडिया विभाग के चेयरमैन कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने यह बयान जारी किया है। इसका मतलब यह है कि यह बयान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के निर्देश पर जनार्दन ने दिया है। देखें क्या दिग्विजय पर इसका कोई असर होता है या नहीं?
Anil Narendra, Batla House Encounter, Congress, Daily Pratap, Digvijay Singh, P. Chidambaram, Vir Arjun

Thursday, 10 May 2012

बटला हाउस फरार आतंकियों ने मुलायम से मांगी मदद

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10 May 2012
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली की बहुचर्चित बटला हाउस मुठभेड़ 19 सितम्बर 2008 को हुई थी। इस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हुए थे। इस मुठभेड़ में शामिल कुछ आतंकवादी तब से फरार हैं। इनमें इंडियन मुजाहिदीन के कथित आतंकवादी आरिज खान उर्प जुनैद भी शामिल हैं। खबर आई है कि जुनैद अब आत्मसमर्पण करना चाहता है और इस काम के लिए उसने सपा पमुख मुलायम सिंह यादव की मदद मांगी है। जुनैद और इंडियन मुजाहिदीन के अन्य कथित आतंकवादी असदुल्लाह अख्तर के परिवार वालों ने इस बाबत मध्यस्थों के जरिए मुलायम सिंह और समाजवादी पार्टी के अन्य पदाधिकारियों और पशासन से संपर्प किया है। परिजनों ने दिल्ली की अदालत में कथित आतंकियों ने सुरक्षित समर्पण के लिए मदद मांगी है। जुनैद और असदुल्लाह दोनों आजमगढ़ के रहने वाले हैं। जुनैद और वह साढ़े तीन साल से पुलिस से बचकर छिपे हुए हैं। माना जा रहा है कि ये दोनों आतंकी उत्तर पदेश में ही कहीं छिपे हैं। ये दोनों उन बारह इंडियन मुजाहिदीन आतंकवादियों में हैं जिन पर दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा ने इनाम घोषित कर रखा है। जुनैद पर पांच लाख का इनाम है जबकि असदुल्लाह पर एक लाख का इनाम है। दिल्ली पुलिस को जिन बारह कथित आतंकवादियों की तलाश है उनमें से नौ आजमगढ़ के हैं। तीन आतंकी शहजाद उर्प पप्पू, हाकिम और सलमान को यूपी एटीएस ने गिरफ्तार कर दिल्ली पुलिस के हवाले कर दिया था। शरिज उर्प जुनैद की तलाश जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली में हुए विस्फोट के सिलसिले में भी है। कुछ गिरफ्तार आतंकियों से पूछताछ में पता चला है कि जुनैद 23 नवंबर को उत्तर पदेश की अदालतों और सात मार्च 2006 में वाराणसी के संकट मोचन मंदिर में 50 धमाकों में भी शामिल रहा है। असदुल्लाह सिर्प दिल्ली बमकांड में शामिल बताया जाता है। जुनैद आजमगढ़ के बाजबहादुर मौहल्ले का रहने वाला है। जबकि असदुल्लाह गुलाम का पुरवा का वासी है। बताते हैं कि इन कथित आतंकियों के परिजनों ने उत्तर पदेश सरकार और पशासन में अपने सम्पर्प सूत्रों को बताया कि जुनैद और असदुल्लाह अदालत में समर्पण करना चाहते हैं। उन्हें इस बात का डर है कि अगर पुलिस के हाथ पड़ गए तो उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाएगा। परिजनों ने इस बात का आश्वासन मांगा है कि इन दोनों को उत्तर पदेश पुलिस, आतंकवादी विरोधी दस्ता, दिल्ली पुलिस के हवाले नहीं करेगा। असदुल्लाह के वालिद और आजमगढ़ के मशहूर चिकित्सक डा. जावेद अख्तर ने बताया कि हम लोगों ने मुलायम सिंह यादव को खत लिखकर दोनों के महफूज समर्पण के लिए मदद मांगी है। अख्तर के अनुसार पत्र में लिखा गया है कि दिल्ली पुलिस ने बटला हाउस मुठभेड़ में आजमगढ़ के युवाओं को बेवजह फंसाया है। हमने मुलायम सिंह यादव से कहा है कि वे इंसाफ दिलाने के लिए इस मामले में दखल दें क्योंकि उनकी पार्टी केंद्र सरकार को समर्थन कर रही है। अख्तर ने बताया कि गोपालपुर के समाजवादी पार्टी विधायक और मंत्री वसीम अहमद सरकार के साथ उनकी बातचीत में मदद कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें अपने बेटे के ठिकाने के बारे में कुछ नहीं पता। पिछले चार साल से उनका उससे कोई सम्पर्प नहीं है।
दिल्ली की बहुचर्चित बटला हाउस मुठभेड़ 19 सितम्बर 2008 को हुई थी। इस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हुए थे। इस मुठभेड़ में शामिल कुछ आतंकवादी तब से फरार हैं। इनमें इंडियन मुजाहिदीन के कथित आतंकवादी आरिज खान उर्प जुनैद भी शामिल हैं। खबर आई है कि जुनैद अब आत्मसमर्पण करना चाहता है और इस काम के लिए उसने सपा पमुख मुलायम सिंह यादव की मदद मांगी है। जुनैद और इंडियन मुजाहिदीन के अन्य कथित आतंकवादी असदुल्लाह अख्तर के परिवार वालों ने इस बाबत मध्यस्थों के जरिए मुलायम सिंह और समाजवादी पार्टी के अन्य पदाधिकारियों और पशासन से संपर्प किया है। परिजनों ने दिल्ली की अदालत में कथित आतंकियों ने सुरक्षित समर्पण के लिए मदद मांगी है। जुनैद और असदुल्लाह दोनों आजमगढ़ के रहने वाले हैं। जुनैद और वह साढ़े तीन साल से पुलिस से बचकर छिपे हुए हैं। माना जा रहा है कि ये दोनों आतंकी उत्तर पदेश में ही कहीं छिपे हैं। ये दोनों उन बारह इंडियन मुजाहिदीन आतंकवादियों में हैं जिन पर दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा ने इनाम घोषित कर रखा है। जुनैद पर पांच लाख का इनाम है जबकि असदुल्लाह पर एक लाख का इनाम है। दिल्ली पुलिस को जिन बारह कथित आतंकवादियों की तलाश है उनमें से नौ आजमगढ़ के हैं। तीन आतंकी शहजाद उर्प पप्पू, हाकिम और सलमान को यूपी एटीएस ने गिरफ्तार कर दिल्ली पुलिस के हवाले कर दिया था। शरिज उर्प जुनैद की तलाश जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली में हुए विस्फोट के सिलसिले में भी है। कुछ गिरफ्तार आतंकियों से पूछताछ में पता चला है कि जुनैद 23 नवंबर को उत्तर पदेश की अदालतों और सात मार्च 2006 में वाराणसी के संकट मोचन मंदिर में 50 धमाकों में भी शामिल रहा है। असदुल्लाह सिर्प दिल्ली बमकांड में शामिल बताया जाता है। जुनैद आजमगढ़ के बाजबहादुर मौहल्ले का रहने वाला है। जबकि असदुल्लाह गुलाम का पुरवा का वासी है। बताते हैं कि इन कथित आतंकियों के परिजनों ने उत्तर पदेश सरकार और पशासन में अपने सम्पर्प सूत्रों को बताया कि जुनैद और असदुल्लाह अदालत में समर्पण करना चाहते हैं। उन्हें इस बात का डर है कि अगर पुलिस के हाथ पड़ गए तो उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाएगा। परिजनों ने इस बात का आश्वासन मांगा है कि इन दोनों को उत्तर पदेश पुलिस, आतंकवादी विरोधी दस्ता, दिल्ली पुलिस के हवाले नहीं करेगा। असदुल्लाह के वालिद और आजमगढ़ के मशहूर चिकित्सक डा. जावेद अख्तर ने बताया कि हम लोगों ने मुलायम सिंह यादव को खत लिखकर दोनों के महफूज समर्पण के लिए मदद मांगी है। अख्तर के अनुसार पत्र में लिखा गया है कि दिल्ली पुलिस ने बटला हाउस मुठभेड़ में आजमगढ़ के युवाओं को बेवजह फंसाया है। हमने मुलायम सिंह यादव से कहा है कि वे इंसाफ दिलाने के लिए इस मामले में दखल दें क्योंकि उनकी पार्टी केंद्र सरकार को समर्थन कर रही है। अख्तर ने बताया कि गोपालपुर के समाजवादी पार्टी विधायक और मंत्री वसीम अहमद सरकार के साथ उनकी बातचीत में मदद कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें अपने बेटे के ठिकाने के बारे में कुछ नहीं पता। पिछले चार साल से उनका उससे कोई सम्पर्प नहीं है।
Anil Narendra, Batla House Encounter, Daily Pratap, Mulayam Singh Yadav, Samajwadi Party, Vir Arjun

Saturday, 14 January 2012

दिग्विजय जैसे दोस्त हों तो कांग्रेस को दुश्मनों की जरूरत नहीं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 14th January  2012
अनिल नरेन्द्र
अपने विवादास्पद बयानों के लिए मशहूर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर ऐसा बयान दे दिया है जिससे उनकी अपनी पार्टी और सरकार ही कटघरे में खड़ी हो गई है। उत्तर प्रदेश चुनाव में मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की कांग्रेसी जद्दोजहद में आखिरकार नई दिल्ली का बटला हाउस एनकाउंटर का जिन्न बोतल से बाहर निकल ही आया। दिग्विजय सिंह का प्रोजेक्ट आजमगढ़ बुधवार को उस समय फ्लाप हो गया, जब मुस्लिम युवकों के जबरदस्त विरोध के बाद उन्हें बिना रैली किए वहां से भागना पड़ा। इस घटनाक्रम से असहज दिग्विजय सिंह ने कहा कि बटला हाउस एनकाउंटर फर्जी था लेकिन प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का मानना है कि एनकाउंटर जायज था। इस वजह से हमने इस बात को आगे नहीं बढ़ाया। दिग्विजय ने यह बयान उसी आजमगढ़ में दिया जो इस एनकाउंटर के बाद आतंक की नर्सरी के रूप में प्रचारित किया जाने लगा था। इसी यात्रा में मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही कांग्रेस के स्टार प्रचारक राहुल गांधी को आमजगढ़ के शिब्ली कॉलेज से बिना रैली किए वापस जाना पड़ा। उलेमा काउंसिल कार्यकर्ताओं ने वर्ष 2008 में दिल्ली में हुए बटला हाउस मुठभेड़ कांड की जांच की मांग करते हुए शिब्ली कॉलेज के द्वार पर नारेबाजी की और राहुल गांधी का पुतला तक जलाया। राहुल शिब्ली कॉलेज के अतिगृह में ही ठहरे थे। काउंसिल के अध्यक्ष ने इस बारे में बताया कि उन्होंने राहुल को पहले ही आगाह किया था कि अगर राहुल बटला हाउस की वांछित जांच हुए बगैर आजमगढ़ आए तो उन्हें शहर में दाखिल नहीं होने दिया जाएगा। दिग्विजय ने फिर दोहराया कि मैं मानता हूं कि बटला मुठभेड़ फर्जी थी, लेकिन प्रधानमंत्री व गृहमंत्री इसे जायज मानते हैं, इसलिए हमें अपनी जांच की मांग को छोड़ना पड़ा। सीधे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को कठघरे में खड़ा करके उत्तर प्रदेश में भले ही दिग्विजय ने अपने समीकरण साधे हों, लेकिन केंद्र में कांग्रेस इससे असहज जरूर होगी। वहीं केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने अल्पसंख्यक आरक्षण को दोगुना करने की घोषणा कर खुद को और सरकार दोनों को परेशानी में डाल दिया है। आजमगढ़ में मुसलमानों ने दिग्विजय सिंह की इस सफाई को कितना सच माना यह तो नहीं पता लेकिन उन्होंने अपनी ही सरकार के दोनों शीर्ष सरदारों को जरूर कठघरे में खड़ा कर दिया। यूपी चुनाव के चलते मुसलमानों को खुश करने के लिए दिग्विजय सिंह ने मनमोहन सिंह और पी. चिदम्बरम को क्यों निशाना बनाया? इस पर कांग्रेस ने कुछ भी बोलने से मना कर दिया है। पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि कांग्रेस पहले ही इस मुठभेड़ पर अपनी राय दे चुकी है। नए प्रकरण पर उसे कुछ नहीं कहना। दरअसल कांग्रेस पार्टी दिग्विजय के इस बयान से बुरी तरह फंस गई है। इधर कुआं तो उधर खाई। न तो वह दिग्विजय सिंह की खिलाफत कर सकती है, क्योंकि उनके सिर पर राहुल गांधी का हाथ है और न ही अपने मनमोहन, चिदम्बरम जैसे सरीखे नेताओं के विरोध में जा सकती है। इसी तरह मुसलमानों को खुश करने के लिए कानून मंत्री सलमान खुर्शीद का बयान भी विवादों में आ गया है। उन्हें चुनाव आयोग का नोटिस भी मिल गया है। लेकिन राजनैतिक नुकसान यही है कि पिछड़ों पर दांव लगा रही कांग्रेस के खिलाफ यह बात जा सकती है, क्योंकि यदि अल्पसंख्यकों का कोटा दोगुना होता है तो इससे पिछड़े वर्ग का हक मारा जाएगा। लिहाजा पार्टी के लिए उनका बयान भी गले की फांस बन गया है।
Anil Narendra, Batla House Encounter, Daily Pratap, Digvijay Singh, State Elections, Uttar Pradesh, Vir Arjun

Thursday, 24 November 2011

इशरत जहां मुठभेड़ फर्जी थी


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24th November 2011
अनिल नरेन्द्र
गुजरात की नरेन्द्र मोदी सरकार को गुजरात हाई कोर्ट ने एक तगड़ा झटका लगाया है। 2004 के इशरत जहां मामले की जांच कर रही स्पेशल इनवेस्टीगेटिंग टीम (एसआईटी) ने कहा है कि इशरत को फर्जी मुठभेड़ में मारा गया था। अपनी रिपोर्ट में एसआईटी ने कहा है कि इशरत और तीन अन्य को मुठभेड़ की तारीख 15 जून 2004 से पहले मारा गया। ये तीन लोग जावेद शेख उर्प प्रंगेश, पिल्लई, अमजद अली राणा और जीशान जोहर थे। गौरतलब है कि अहमदाबाद क्राइम ब्रांच ने 15 जून 2005 को एक इंडिका कार पकड़ने का दावा किया था, बाद में उसने चार लोगों को मुठभेड़ में मार गिराया। इस मुठभेड़ को अंजाम देने वाली टीम की अगुवाई आईपीएस डीजी बंजारा कर रहे थे। जिन्होंने मारे गए लोगों को पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तोयबा से जुड़े होने का दावा किया था। उन्होंने यह भी कहा था कि ये सभी नरेन्द्र मोदी को मारने के मिशन पर थे। एसआईटी ने गुजरात हाई कोर्ट में बीते 18 नवम्बर को अपनी रिपोर्ट पेश की थी। जस्टिस जयंत पटेल और अभिलाषा कुमारी ने मुठभेड़ में शामिल पुलिसकर्मियों के खिलाफ सैक्शन 302 (हत्या) के तहत नई एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है। हाई कोर्ट के निर्देश के साथ अब कई आईपीएस अधिकारियों समेत 24 से ज्यादा पुलिसकर्मियों के खिलाफ इस मामले में एफआईआर दर्ज होगी। विशेष जांच दल का यह निष्कर्ष खासतौर पर चौंकाने वाला है कि इन लोगों को पहले ही कहीं अन्यत्र जगह मार डाला गया था। चूंकि इस मुठभेड़ के बाद अहमदाबाद अपराध शाखा ने यह दावा किया था कि मारे गए आतंकी नरेन्द्र मोदी की हत्या करने के लिए आए थे इसलिए यदि कुछ लोग इस नतीजे पर पहुंच रहे हैं कि पुलिस ने शासन से वाहवाही पाने या मैडल लेने की खातिर चार लोगों को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया तो यह अस्वीकार्य स्थिति है। गुजरात पुलिस पहले से ही दंगों में व्यवहार विवादों के घेरे में आ चुका है। इस मामले में राज्य सरकार भी कठघरे में खड़ी है क्योंकि यह पहली बार नहीं जब उस पर फर्जी मुठभेड़ कराने का आरोप लगा हो। 2005 में हुई इस मुठभेड़ में गुजरात पुलिस ने कुख्यात अपराधी सोहराबुद्दीन को मार गिराने का दावा किया था। यह महज दुर्योग नहीं हो सकता कि यह दावा भी झूठा निकला। इस फर्जी मुठभेड़ के सिलसिले में तो खुद गुजरात के पूर्व गृहमंत्री सन्देह के कठघरे में खड़े हैं। उक्त मुठभेड़ों के अलावा वर्ष 2003 की भी एक मुठभेड़ सन्देहास्पद है। एसआईटी की रिपोर्ट के हवाले से पीठ ने कहा है कि एनकाउंटर 15 जून के दिन नहीं हुआ था। मामले में दायर पहली एफआईआर में एनकाउंटर की जो तारीख दर्शाई गई है, उस तारीख को एनकाउंटर नहीं हुआ था। इसके अलावा एनकाउंटर-मृत्युस्थल के समय में भी विरोधाभास है जिससे मुठभेड़ फर्जी लगती है। उल्लेखनीय है कि तमांग ने अपनी रिपोर्ट में एनकाउंटर की तारीख 14 जून 2004 बताई थी। साथ ही कहा है कि जावेद को इस दिन रात आठ से नौ बजे की अवधि में मारा गया। शेष तीन को 11 से 12 की अवधि में ठिकाने लगाया गया। अगेल दिन 15 जून को पुलिस इंडिका कार चलाकर अथवा टोइंग कर वारदात के प्रचारित स्थल पर प्लांट कर दिया। बेशक इशरत जहां के बारे में कहा जाता है कि वह लश्कर की कार्यकर्ता थी और नरेन्द्र मोदी की हत्या करने के इरादे से अहमदाबाद आई थी पर फिर भी जिस ढंग से गुजरात पुलिस ने उसको मारा वह किसी भी न्यायसंगत देश में स्वीकार्य नहीं है। इन केसों से पुलिस जांच और कार्रवाई पर भी प्रश्नचिन्ह लगता है। भले ही फिलहाल गुजरात पुलिस फर्जी मुठभेड़ों को लेकर कठघरे में खड़ी हो लेकिन हकीकत तो यह है कि इस तरह की मुठभेड़ें देश के अन्य हिस्सों में भी रह-रहकर होती रहती हैं। यह समस्या कितनी गम्भीर है, इसके प्रमाण पुलिस अत्याचार संबंधी उन आंकड़ों से मिलते हैं जिनमें अच्छी-खासी संख्या में फर्जी मुठभेड़ों का जिक्र होता है। आम धारणा तो अब यह बन गई है कि ज्यादातर मुठभेड़ फर्जी होती हैं और चूंकि इनकी जांच खुद पुलिस करती है इसलिए सच्चाई सामने नहीं आती। फर्जी मुठभेड़ें अधिकारों के दुरुपयोग का निकृष्टतम उदाहरण हैं और सभ्य समाज में इस तरह के आचरण का कोई स्थान नहीं हो सकता। वैसे पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लई ने गुजरात सरकार के उस दावे की पुष्टि की है कि इशरत और अन्य लोग संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त थे और लश्कर-ए-तोयबा की वेबसाइट ने इशरत को शहीद का दर्जा दिया था।
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Wednesday, 21 September 2011

बटला हाउस एनकाउंटर की तीसरी बरसी



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21th September 2011
अनिल नरेन्द्र

तीन साल पहले का 19 सितम्बर का वो दिन, जब नई दिल्ली के बटला हाउस के एक मकान में आतंकियों के छिपे होने की खबर के बाद दिल्ली पुलिस के तेज-तर्रार इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा ने अपनी जान की परवाह न करते हुए दुर्दांत आतंकियों से लोहा लिया और वह इस कार्रवाई में शहीद हो गए थे। दूसरी ओर कुछ कट्टरपंथी नेता और कुछ राजनीतिज्ञ इस घटना पर राजनीति से बाज नहीं आते। इसे फर्जी एनकाउंटर कहकर हर साल बटला हाउस एनकाउंटर को याद किया जाता है। बटला हाउस मुठभेड़ की तीसरी बरसी पर सोमवार को नई दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर प्रदर्शन किया गया और मांग की गई कि मुठभेड़ की न्यायिक जांच कराई जाए। इस प्रदर्शन में आजमगढ़ से स्पेशल ट्रेन में आए राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल के सदस्यों ने भाग लिया। काउंसिल ने कहा कि आतंकवाद के नाम पर आजमगढ़ को बदनाम किया गया और किया जा रहा है जो बन्द होना चाहिए। मजेदार बात यह रही कि उलेमाओं ने हजारों समर्थकों के बीच कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह पर खास निशाना साधा। दिग्विजय ने कुछ महीने पहले आजमगढ़ जिले के संजरपुर गांव का दौरा किया था और उसी दौरान उन्होंने बटला हाउस मुटभेड़ पर सवाल खड़े किए थे। उल्लेखनीय है कि 19 सितम्बर 2008 को हुई मुठभेड़ में मारे गए दो संदिग्ध युवकों आतिफ अमीन और मोहम्मद साजिद का ताल्लुक इसी गांव से था। उलेमा काउंसिल के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना आमिर रशादी मदनी ने कहा कि यह कितनी अजीब बात है कि दिग्विजय सिंह संजरपुर जाकर इस मुठभेड़ पर सवाल खड़े करते हैं, लेकिन दिल्ली में उनकी सरकार है, जो इस मामले की उच्चस्तरीय जांच नहीं करवा रही है। उन्होंने कहा कि दिग्विजय ने मुझसे खुद कहा था कि उन्होंने इस मुठभेड़ के फर्जी होने की बात कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कही, लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी। मुझे लगता है कि दिग्विजय सिर्प नौटंकी करते हैं। उन्हें मुसलमानों से कोई हमदर्दी नहीं है। विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों ने सोनिया, मनमोहन सिंह और राहुल गांधी के खिलाफ नारेबाजी की, हालांकि इन लोगों के निशाने पर सबसे ज्यादा दिग्विजय रहे।
जन्तर-मन्तर में उलेमाओं का प्रदर्शन हो रहा था तो दिल्ली के दूसरे कोने में बटला हाउस एनकाउंटर में शहीद हुए दिल्ली पुलिस के मोहन चन्द शर्मा के घर पर उनका परिवार उन्हें अकेला ही याद कर रहा था। उनके परिवार ने किसी से भी बात नहीं की। यहां तक कि उन्होंने मीडिया से दूर ही रहना ठीक समझा। उनके घर पर पुलिसकर्मियों का पहरा था। उनके घर गए एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि उनके माता-पिता के सामने आज भी 2008 का मंजर आता है तो उनकी आंखों में आंसू छलक पड़ते हैं। यह हमारे देश की विडम्बना ही है कि इस मुठभेड़ को महज वोटों की खातिर फर्जी करार दिया जा रहा है और इस पर राजनीति हो रही है। कानूनी दृष्टि से कई अदालतों ने इसे सही कार्रवाई करार दिया है पर इसके बावजूद इस पर राजनीति चलती जा रही है। इन राजनीतिज्ञों व धार्मिक नेताओं को इस बात की परवाह भी नहीं है कि इससे हमारे सुरक्षा बलों पर क्या असर पड़ेगा? इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा की शहादत के बाद जिस प्रकार नेताओं ने कुलषित राजनीति के चलते इस एनकाउंटर पर संदेह किया और आतंकियों के संरक्षण की परिभाषा बोली और जांबाज इंस्पेक्टर की शहादत को संदेह के कटघरे में खड़ा किया गया, उससे निश्चित तौर पर दिल्ली पुलिस के जांबाज जवानों का ही नहीं बल्कि पूरे देश की फोर्सों का मनोबल टूटा होगा। इसका एक विपरीत असर यह जरूर हुआ कि पुलिस व अन्य फोर्सों के जवान अच्छी तरह समझ चुके हैं कि आतंक के खिलाफ चुप बैठना और सांप निकलने के बाद आतंकियों को पकड़ना नहीं बल्कि लकीर पीटना उनका पहला कर्तव्य है। परिणामस्वरूप अब राजधानी दिल्ली में कोई भी बम ब्लास्ट हो उसमें पुलिस के हाथ खाली के खाली हैं और हो भी क्यों न, यदि वे अपनी जांबाजी से आतंकी पकड़ भी लें तो सरकार मुकदमे लड़वाएगी। फांसी की सजा होगी, तो उसे लेट करवाएगी और आतंकियों को सरकारी मेहमान बनाकर उनकी खातिरदारी में जुटी होगी। बहरहाल बटला हाउस कांड की तीसरी बरसी पर दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर चन्द मोहन शर्मा को समस्त देशवासियों की ओर से शत्-शत् नमन्... आज उनकी कब्र पर एक दीया भी नहीं, जिनके चिरागों से चला करते थे अहले वतन, दीये जलते हैं उनकी कब्र पर जो बेचा करते हैं शहीदों को कफन
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