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Sunday, 22 April 2012

रामसेतु मुद्दे पर फिर सामने आया संप्रग सरकार का हिन्दू विरोधी चेहरा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22 April 2012
अनिल नरेन्द्र
यह बहुत दुख की बात है कि मनमोहन सिंह की संप्रग सरकार ने करोड़ों
हिन्दुओं की आस्था से जुड़ा रामसेतु-सेतु समुद्रम केस में अपना स्टैंड स्पष्ट नहीं किया। केंद्र सरकार ने बृहस्पतिवार को रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने के मसले पर अपना पक्ष रखने से इंकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट से ही इस मामले पर फैसला सुनाने की अपील की। केंद्र की ओर से पक्ष नहीं रखे जाने पर अदालत ने इस मुद्दे पर अगस्त में अंतिम सुनवाई करने का निर्णय लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी के आवेदन पर सरकार से जवाब-तलब किया था, लेकिन सरकार ने जवाब देने से इंकार कर यह साफ कर दिया कि वह हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं से जुड़े इस ज्वलंत मुद्दे से दूर रहना चाहती है। पीठ के समक्ष एडिशनल सालिसिटर जनरल हरेन रावल ने कहा कि गहन विचार-विमर्श के बाद सरकार इस नतीजे पर पहुंची है कि रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने के मसले पर वह कोई पक्ष नहीं रखना चाहती। उन्होंने कहा कि सरकार अपने 2008 में दाखिल किए गए जवाब पर कायम है, जिसमें कहा गया था कि वह सभी धर्मों का सम्मान करती है, लेकिन धार्मिक विश्वास के मसले पर उसे जवाब नहीं देना चाहिए। पीठ जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी की ओर से दायर इस आवेदन पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें पौराणिक धरोहर रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने की मांग की गई थी। शीर्षस्थ अदालत की ओर से इस मसले पर सरकार को 29 मार्च को पहले भी दो सप्ताह का समय दिया जा चुका है। केंद्र ने कहा कि वह कोई पक्ष नहीं पेश करना चाहता। ऐसे में अदालत इस मसले पर निर्णय ले। इस पर पीठ ने कहा कि यदि सरकार हलफनामा नहीं दाखिल करना चाहती तो अदालत दलीलें पेश करने की प्रक्रिया की ओर रुख करेगी।
यह बहुत दुख की बात है कि संप्रग की यह सरकार करोड़ों हिन्दुओं की भावनाओं को दरकिनार करने का साहस दिखा रही है। करोड़ों हिन्दुओं में यह मान्यता है कि यह सेतु हनुमान जी ने भगवान श्रीराम को लंका पहुंचाने के लिए बनाया था। यह सेतु आज भी साफ नजर आता है। दुखद पहलू यह है कि रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने में किसी और धर्म के किसी समुदाय को कोई एतराज नहीं। यहां तक कि देश के करोड़ों मुसलमान, सिख, ईसाई भी इसका समर्थन करते हैं। रामायण सभी का पूज्य ग्रंथ है। हां विरोध कर रही है तो द्रमुक पार्टी कर रही है। रावण वंश के ये लोग इस सेतु को तोड़कर रास्ता बनाना चाहते हैं। इसके पीछे उनकी क्या नीयत है यह किसी से छिपा नहीं। उससे भी ज्यादा दुखद बात यह है कि अपने आपको हिन्दू पार्टी कहने वाली भारतीय जनता पार्टी ने भी वोटों की खातिर डॉ. स्वामी का कभी खुलकर समर्थन नहीं किया। हां विश्व हिन्दू परिषद ने जरूर समर्थन किया है। विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण भाई तोगड़िया ने कहा कि केंद्र सरकार ने सेतु समुद्रम परियोजना को समाप्त करने का हलफनामा न देकर एक बार फिर हिन्दू विरोधी मानस का परिचय दिया है। अपनी-अपनी मान्यता है, श्री हनुमान द्वारा बनाए गए इस सेतु को कोई नहीं तोड़ सकता। जय श्री हनुमान, जय श्री राम।

Saturday, 4 February 2012

सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को सुनाए दूरगामी महत्वपूर्ण फैसले

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4th February  2012
अनिल नरेन्द्र
यकीनन बृहस्पतिवार का दिन सुप्रीम कोर्ट के लिए बहुत महत्वपूर्ण दिन था। अदालत को तीन अहम मुद्दों पर अपना फैसला देना था। तीनों ही बहुत महत्वपूर्ण थे जिनके दूरगामी असर होने हैं। बृहस्पतिवार को सबसे महत्व फैसला 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले का था। इस पर देश और दुनिया की निगाहें टिकी थीं। इस घोटाले में गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की कथित भूमिका की सीबीआई जांच, दूरसंचार कम्पनियों के लाइसेंस निरस्त करने और 2जी मामले की निगरानी के लिए एसआईटी गठित करने की मांग पर फैसला आना था। इन सबको छोड़कर एक और महत्वपूर्ण घटना थी उस जज के रिटायर होने का आखिरी दिन जिन्होंने 15 महीनों में सुप्रीम कोर्ट की उस बैंच की शोभा बढ़ाई जिसने हर उस रसूखदार को जेल की हवा खिलाई जिसके बारे में आम आदमी सोच भी नहीं सकता था। मैं बात कर रहा हूं जस्टिस एके गांगुली की जिनका अपने कार्यकाल का अंतिम दिन था बृहस्पतिवार। जस्टिस गांगुली की बेबाक टिप्पणियां इतिहास में दर्ज हो गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तीनों मुद्दों पर अपना फैसला सुना दिया। पहला, कम्पनियों के 122 लाइसेंस रद्द करना और सात कम्पनियों पर भारी जुर्माना। दूसरा, चिदम्बरम के मामले में फैसला निचली अदालत पर छोड़ना और तीसरा सीबीआई जांच की निगरानी का काम सीवीसी की देखरेख में करना। तीनों फैसलों के दूरगामी असर होना लाजिमी है। शीर्ष अदालत ने तीन कम्पनियों पर पांच-पांच करोड़ रुपये का जुर्माना ठोंका है और चार कम्पनियों पर 50-50 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। अदालत ने यह भी कहा है कि यदि सरकार की नीति जनहित के खिलाफ है तो अदालत कर सकती है अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग। कोर्ट के इस फैसले का मतलब है कि तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा के समय में लाइसेंस हासिल करने वाली कम्पनियां प्रभावित होंगी। कोर्ट ने कहा कि 10 जनवरी 2008 को लाइसेंस मनमाने और असंवैधानिक तरीके से जारी किए गए थे जिन्हें जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती। वहीं शीर्ष अदालत ने पी. चिदम्बरम की कथित भूमिका की जांच की मांग पर निर्णय निचली अदालत पर छोड़ दिया। पटियाला हाउस स्थित विशेष अदालत को दो हफ्ते में फैसला सुनाने को कहा गया है। सम्भव है कि विशेष अदालत अपना फैसला शनिवार, चार फरवरी को ही सुना दे। शीर्ष अदालत ने टेलीकॉम नियामक `ट्राई' को निर्देश दिया है कि वह दो माह में 2जी लाइसेंस आवंटन के लिए नई सिफारिशें दे। जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस एके गांगुली की पीठ ने सरकार से ट्राई की सिफारिशों पर एक माह के अन्दर अमल करने को कहा है। फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए याचिकाकर्ता जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा कि यह सरकार की सामूहिक विफलता है। उसने चेतावनियों की अनदेखी की। भाजपा नेता अरुण जेटली का कहना है कि यह एक व्यक्ति का नहीं बल्कि यूपीए सरकार का निर्णय था। ट्राई के अध्यक्ष जेएस शर्मा ने कहा कि इस फैसले से पांच फीसदी उपभोक्ताओं पर असर पड़ेगा यानि मोबाइल कॉलें अब महंगी हो जाएंगी। यह फैसला ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। निश्चित रूप से विपक्ष इसे भुनाने का प्रयास करेगा और उसे एक ऐसा नया मुद्दा मिल गया है जिससे यूपीए सरकार की फजीहत बढ़ जाएगी। चूंकि यह दूरगामी फैसले हैं, इनके प्रभाव को समझने में भी टाइम लगेगा पर इस फैसले से उद्योग जगत में भूचाल आ गया है। उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी कि इतनी प्रभावशाली औद्योगिक कम्पनियों को यह दिन भी देखना पड़ेगा। इस बीच एक टीवी चैनल के साथ बातचीत में डॉ. स्वामी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर गम्भीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि 2जी मामले में 60 फीसदी रकम सोनिया गांधी ने ली है और इसका सुबूत उनके पास है। अब सबकी नजरें चार फरवरी को पटियाला हाउस स्थित विशेष अदालत पर टिकी हुई हैं जिसने पी. चिदम्बरम के भाग्य का निर्णय सुनाना है। चिदम्बरम की निजी सियासत इस फैसले पर टिकी है। कुछ हद तक यूपीए सरकार का भी भविष्य इस पर टिका है। अगर चिदम्बरम पर केस चलता है तो निश्चित रूप से इसका प्रभाव मनमोहन सरकार पर जरूर पड़ेगा। देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों से सरकार कैसे लड़ती है?
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Friday, 3 February 2012

भ्रष्ट जनसेवकों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता खुला

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 3rd February  2012
अनिल नरेन्द्र
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ कर दिया है कि भ्रष्टाचार के आरोप में घिरे मंत्री, सांसद, विधायक और आला अधिकारी अब कार्रवाई की मंजूरी लम्बित होने की आड़ में ज्यादा दिन तक नहीं बच पाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने दूरगामी असर वाला यह फैसला जनता पार्टी अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी की एक याचिका पर दिया जिसमें बताया गया था कि किस तरह से प्रधानमंत्री कार्यालय ने ए. राजा के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुकदमा महीनों लटकाए रखा और कोई जवाब नहीं दिया। लोक सेवकों पर मुकदमा दर्ज करने के लिए समयसीमा तय करने से संबंधित डॉ. स्वामी की इस याचिका को स्वीकार कर सुप्रीम कोर्ट ने जहां केंद्र सरकार को झटका दिया है वहीं उसके इस रुख का दूरगामी महत्व यह है कि इसमें आम आदमी को किसी भी जनसेवक के खिलाफ प्रधानमंत्री या अदालत के पास जाने का रास्ता खुल गया है। शीर्ष अदालत ने साफ-साफ कहा है कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत किसी जनसेवक के खिलाफ शिकायत दर्ज करना आम आदमी का संवैधानिक अधिकार है। दरअसल प्रधानमंत्री कार्यालय ने सुप्रीम कोर्ट में दायर शपथ पत्र में कहा था कि स्वामी की चिट्ठी सही नहीं थी। चूंकि स्वामी को लम्बे समय बाद प्रधानमंत्री कार्यालय से मिले जवाब पर एतराज था, इसलिए माननीय अदालत ने यह भी कहा है कि अगर चार महीने के भीतर आरोपित व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं मिलती तो मान लिया जाना चाहिए कि संबंधित प्राधिकरण ने अनुमति दे दी है। यह मामला नवम्बर 2008 का है जब 2जी स्पेक्ट्रम मामले में तत्कालीन दूरसंचार मंत्री की भूमिका को देखते हुए डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने प्रधानमंत्री को  पत्र  लिखकर  ए. राजा  के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के बारे में कहा था। उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय से इसका जवाब करीब 16 महीने बाद मार्च 2010 को मिला था जिसमें कहा गया था कि उनकी अर्जी समय पूर्व है यानि तब सरकार मामले की तह में जाने की इच्छुक नहीं थी। सिर्प यही नहीं कि 2जी घोटाले से संबंधित अहम मुकदमों को स्वामी अदालत में ले गए हैं, यह भी स्वामी की पहल के बाद ए. राजा को मंत्री पद छोड़ना पड़ा और उनकी गिरफ्तारी हुई। सुप्रीम कोर्ट की इस फैसले से मंत्रियों व आला अफसरों की एक बड़ी सुरक्षा दीवार जरूर टूट गई है जिसकी आड़ में आमतौर पर भ्रष्ट जनसेवक भ्रष्टाचार का मामला होते हुए भी बच निकलते थे। अब तक होता यह था कि किसी सरकारी अधिकारी या जनसेवक के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज करने से पहले सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी और अकसर ऐसी इजाजत की अर्जियों पर या तो कोई फैसला नहीं होता था या इजाजत नहीं दी जाती थी। अगर इजाजत न देने की कोई ठोस वजह न हो तो आसान तरीका यह था कि कोई फैसला न लेना हो। ताजा फैसले ने दो बड़े मानदंड स्थापित कर दिए हैं। पहला यह कि भ्रष्टाचार का मामला चलाने की अर्जी को सरकार अनिश्चितकाल तक अब नहीं टाल सकती और दूसरा हमारे लोकतंत्र में हर नागरिक को यह हक है कि वह सरकार पर भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई के लिए दबाव डाले। यह एक दूरगामी प्रभाव डालने वाला महत्वपूर्ण फैसला है।
Anil Narendra, Corruption, Daily Pratap, P. Chidambaram, Subramaniam Swamy, Supreme Court, Vir Arjun

Saturday, 17 December 2011

चौतरफा घिरते गृहमंत्री पी. चिदम्बरम


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17th December 2011
अनिल नरेन्द्र
गृहमंत्री पी. चिदम्बरम को घेरने के लिए 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के बाद विपक्ष के हाथ एक और मुद्दा लग गया है। एक टीवी चैनल आईबीएन-7 ने खुलासा किया है कि दिल्ली के एक होटल कारोबारी के खिलाफ तीन एफआईआर वापस लेने के मामले में अपने पद का दुरुपयोग किया है। आरोप है कि यह होटल व्यवसायी चिदम्बरम का मुवक्किल रह चुका है। मीडिया में आई रिपोर्टों के अनुसार एसपी गुप्ता, चेयरमैन सन एयर होटल (नई दिल्ली) पर आरोप है कि उन्होंने वीएलएस फाइनेंस को करोड़ों का चूना लगाया। उन्होंने राजीव गांधी के नाम पर एक चैरिटेबल ट्रस्ट बनाया, जिसकी संरक्षक सोनिया गांधी को बनाया था। कुछ सांसदों के फर्जी लैटरपेड का इस्तेमाल किया गया। गृह मंत्रालय ने 9 मई को यह निर्देश देने का फैसला किया कि गृह सचिव को दी गई गुप्ता की याचिका के आधार पर एफआईआर रद्द की जाए। सन एयर होटल मालिक एसपी गुप्ता के खिलाफ पूर्व के फैसले को वापस लेने का निर्णय उपराज्यपाल तेजेन्द्र खन्ना ने किया। दिल्ली सरकार की विज्ञप्ति के अनुसार, `अभियोजन विभाग के निदेशक की सिफारिशों के आलोक में इस मामले को फिर से उपराज्यपाल के पास भेजा गया जिसमें यह सिफारिश की गई कि मामले को आगे नहीं बढ़ाने के पूर्ण निर्णय पर जोर नहीं डाला जाएगा और सुनवाई मामले के दोष-गुण के आधार पर किया जाएगा।' दिल्ली सरकार के अनुसार उपराज्यपाल ने 15 दिसम्बर 2011 को इस सिफारिश को मंजूरी दे दी। सरकार द्वारा फैसले को निरस्त करने का मतलब साफ है कि आरोप सही है। चिदम्बरम ने एसपी गुप्ता के खिलाफ दर्ज एफआईआर को निरस्त करने के लिए दबाव डाला और इस तरह उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग किया। मामला इसलिए भी ज्यादा गंभीर बन जाता है कि जो फर्जी ट्रस्ट बनाया गया वह स्वर्गीय राजीव गांधी के नाम था और उसके संरक्षक में सोनिया गांधी का नाम दिया गया था। ऐसे आदमी की सिफारिश करने से पहले खुद चिदम्बरम को सोचना चाहिए था कि वह क्या करने जा रहे हैं। पी. चिदम्बरम एक के बाद एक विवाद में फंसते जा रहे हैं। आखिर सरकार और पार्टी कब तक उनका बचाव करेगी। अगर किसी अदालत ने चिदम्बरम के खिलाफ कोई टिप्पणी कर दी तो क्या स्थिति बनेगी? वैसे भी सरकार बहुत कमजोर स्थिति में है, चौतरफा दबाव में है। ऐसे में एक और सिरदर्द? सरकार को चाहिए कि चिदम्बरम को अब अपने आपको खुद को डिफेंड करने दे। सरकार के ऊपर और बहुत प्रेसिंग समस्याएं हैं उन पर ज्यादा ध्यान दें। बहरहाल विपक्ष के हाथ एक नया मुद्दा जरूर लग गया है और ऐसा नहीं लगता कि वह पी. चिदम्बरम को अब आसानी से छोड़ेगी।
2G, Anil Narendra, Daily Pratap, P. Chidambaram, Sonia Gandhi, Subramaniam Swamy, Vir Arjun

Saturday, 10 December 2011

2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में फंसते पी. चिदम्बरम

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10th December 2011
अनिल नरेन्द्र
केंद्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम के सितारे आजकल गर्दिश में चल रहे हैं। उनकी वजह से संप्रग सरकार और कांग्रेस पार्टी की फजीहत बढ़ती ही जा रही है। बृहस्पतिवार को सीबीआई की अदालत ने डॉ.सुब्रह्मण्यम स्वामी की उस याचिका को मंजूर कर लिया जिसमें चिदम्बरम के खिलाफ 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में दो गवाहों से पूछताछ की मांग की गई थी। अदालत ने दोनों गवाहों को पेश करने की इजाजत दे दी, लेकिन यह भी कहा कि पहले डॉ. स्वामी खुद गवाही देंगे और अगर उनकी गवाही में दम हुआ तो आगे की कार्रवाई होगी। स्वामी की संतोषजनक गवाही के बाद ही दोनों गवाहों की पेशी होगी। एक गवाह श्री खुल्लर वित्त मंत्रालय में संयुक्त सचिव हैं और दूसरे गवाह एससी अवस्थी सीबीआई में संयुक्त निदेशक हैं। गौरतलब है कि पी. चिदम्बरम 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के वक्त वित्तमंत्री थे। स्वामी के मुताबिक 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में गड़बड़ियों की पूरी जानकारी चिदम्बरम को थी। वे चाहते तो घोटाला रुक सकता था। दरअसल तत्कालीन वित्त सचिव डी. सुब्बाराव द्वारा 6जुलाई 2008को लिखे एक पत्र के लीक होने के बाद से ही चिदम्बरम पर राजनीतिक हमले तेज हो गए। सुब्बाराव के पत्र से चिदम्बरम और पूर्व दूरसंचार मंत्री ए.राजा की स्पेक्ट्रम आवंटन, स्पेक्ट्रम उपयोग चार्ज, मूल्य निधारण समेत तमाम पहलुओं पर चर्चा की पुष्टि होती है। पत्र में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और तत्कालीन वित्तमंत्री के बीच मुद्दे पर विस्तार से चर्चा का भी जिक्र है। डॉ.स्वामी का दावा है कि चिदम्बरम पर लगाए आरोपों का उनके पास पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं और वह अदालत में इसे साबित कर सकते हैं। तत्कालीन वित्तमंत्री चाहते तो 2जी लाइसेंस पाने वाली कम्पनियों के इक्विटी बेचे जाने को रोक सकते थे पर उन्होंने इसकी सहमति दी। यह बात 5 नवम्बर 2008 को ए. राजा द्वारा लिखे गए नोट से पता चलता है। राजा का यह नोट स्वामी को सौंपे गए 400 दस्तावेजों का हिस्सा है। जाहिर है कि इस नोट के सामने आने से चिदम्बरम की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में चिदम्बरम की भूमिका को लेकर यह दूसरा बड़ा रहस्योद्घाटन है। इससे पहले कैबिनेट सचिवालय को वित्त मंत्रालय की ओर से भेजे गए उस नोट से बवाल मच चुका है, जिसमें कहा गया था कि चिदम्बरम चाहते तो वित्तमंत्री रहते हुए घोटाले को रोक सकते थे। अदालत के आदेश के बाद चिदम्बरम एक बार फिर विपक्ष के निशाने पर आ गए हैं। चिदम्बरम के इस्तीफे की मांग पर भारी हंगामे के चलते बृहस्पतिवार को संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही बाधित रही। विपक्ष का कहना है कि उनके पद पर रहते 2जी स्पेक्ट्रम मामले की जांच प्रभावित होगी। विपक्ष की मांग को दरकिनार करते हुए कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देशों में चिदम्बरम या सरकार के खिलाफ कोई बात नहीं है। संसद की कार्यवाही बाधित करने के लिए विपक्ष को आड़े हाथों लेते हुए खुर्शीद ने कहा कि विपक्ष नहीं चाहता कि सरकार महंगाई के मोर्चे पर सरकार अपनी उपलब्धियों को बताए। खुद पी.चिदम्बरम ने बृहस्पतिवार को किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देने से इंकार कर दिया और पत्रकारों द्वारा बार-बार पूछने पर कोई रिएक्शन नहीं दिया। जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है बेशक पब्लिक में तो पार्टी चिदम्बरम का साथ दे रही है पर अन्दरखाते वह समझ रही है कि चिदम्बरम फंसते जा रहे हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में फंसे होने के अलावा उनके चुनाव को भी चुनौती का मुद्दा अदालत में है। उसका फैसला भी जल्द आ सकता है। अगर 17दिसम्बर को सीबीआई अदालत में जज ओपी सैनी स्वामी की दलीलों से सहमत हो गए तो दोनों गवाहों को पेश होने का आदेश दिया जाएगा। डॉ.स्वामी के पास चिदम्बरम को फंसाने के दस्तावेजों के होने का दावा भी पुख्ता हो सकता है। अगर चिदम्बरम के खिलाफ कोई भी कार्रवाई हुई तो सरकार और पार्टी को उन्हें बचाना मुश्किल हो सकता है। अगले कुछ दिन न केवल पी. चिदम्बरम के लिए ही मुश्किल भरे हैं बल्कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस पार्टी के लिए भी चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं।
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Monday, 1 August 2011

बुरे फंसे डाक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी


Published on 2nd August 2011
अनिल नरेन्द्र
वैसे तो जनता पार्टी अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी हमेशा से विवादों में फंसे रहते हैं पर इस बार उन्होंने एक ऐसी हरकत कर दी है जिसके गम्भीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। हार्वर्ड जैसी संस्था से शिक्षित आर्थिक मामलों के जानकार डॉ. स्वामी ने एक अखबार में एक लेख में सुझाव दिया कि देश के हिन्दुओं को आतंकवादी कृत्यों पर मिलकर प्रतिक्रिया देनी चाहिए। स्वामी ने लिखा था, `हमें समग्र दृष्टिकोण की जरूरत है, क्योंकि हिन्दुओं को इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ खड़ा होना है। अगर कोई मुस्लिम अपनी हिन्दू विरासत को स्वीकार करता है तो हम हिन्दू उसे वृहद हिन्दू समाज के हिस्से के रूप में स्वीकार कर सकते हैं, जो कि हिन्दुस्तान है। अन्य लोग, जो इसे स्वीकार करने से इंकार करते हैं या जो विदेशी पंजीयन के जरिये भारतीय नागरिक बने हैं, वे भारत में तो रह सकते हैं, लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं दिए जाने चाहिए यानि वे निर्वाचित प्रतिनिधि भी नहीं बन सकते।' मुस्लिम और अन्य गैर-हिन्दुओं से वोट देने का अधिकार छीनने की वकालत करने वाले इस लेख को लेकर विरोध हो रहा है। डॉ. स्वामी ने यह लेख मुंबई में सीरियल ब्लास्ट के तीन दिन बाद 16 जुलाई को मुंबई के अखबार डीएनए में लिखा था। इसमें उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित कर देना चाहिए और यहां गैर-हिन्दुओं से वोट देने का अधिकार छीन लेना चाहिए। तभी आतंकवाद से सख्ती से निपटा जा सकता है। उनका कहना था कि मुसलमानों या अन्य गैर-हिन्दू समुदाय के लोगों को वोट देने का हक तभी होना चाहिए, जब वे गर्व से मानें कि उनके पूर्वज हिन्दू थे।
श्री स्वामी के इस लेख पर बवाल हो रहा है। मुस्लिमों के मतदान करने के अधिकार को निरस्त करने का सुझाव देते सुब्रह्मण्यम स्वामी के इस लेख को बेहद ठेस पहुंचाने वाला मानते हुए राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने शुक्रवार को कहा कि वह 2 अगस्त को यह फैसला करेगा कि वह जनता पार्टी के नेता पर क्या कार्रवाई करे। आयोग के अध्यक्ष वजाहत हबीबुल्ला ने बताया कि आयोग ने इस लेख पर गौर किया है और वह इसका परीक्षण करने की प्रक्रिया में है। हबीबुल्ला ने कहा कि इस लेख को सदस्यों को वितरित कर दिया गया है। आयोग ने इसे बेहद ठेस पहुंचाने वाला पाया है। अब इसका परीक्षण किया जा रहा है कि इससे भारतीय दंड संहिता के किस-किस प्रावधान का उल्लंघन हुआ है। महाराष्ट्र अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष अब्राहम मथाई ने मुंबई के पुलिस चीफ अरुप पटनायक को पत्र लिखकर डॉ. स्वामी के खिलाफ केस दर्ज करने और गिरफ्तार करने की मांग की है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में भी स्वामी के खिलाफ आवाज उठने लगी है। वहां के करीब ढाई सौ छात्रों ने यूनिवर्सिटी प्रशासन को पत्र लिखकर स्वामी से सभी संबंध तोड़ने की मांग की है। स्वामी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में इकॉनोमिक्स पढ़ाने जाते हैं। डॉ. स्वामी आए दिन विवादास्पद बयान देते ही रहते हैं पर इस बार उन्होंने कुछ ज्यादा ही कर दिया है। कोई भी सभ्य समाज ऐसी दलीलें स्वीकार नहीं कर सकता। डॉ. स्वामी जैसे विद्वान से इस प्रकार की हरकत की उम्मीद नहीं थी।
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Friday, 24 June 2011

प्रणब मुखर्जी की जासूसी का मामला अत्यंत गंभीर मसला है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24nd June 2011
अनिल नरेन्द्र
यूपीए सरकार पर लगता है ग्रहण का सबसे ज्यादा असर हुआ है। एक के बाद एक घोटाले में यह सरकार फंसती जा रही है। अभी बाबा रामदेव का मामला, अन्ना हजारे से विवाद सुलटा नहीं कि एक और घोटाला सामने आ गया है। यह घोटाला तो नहीं पर हां अत्यंत गम्भीर मुद्दा जरूर है। यह है केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी के कार्यालय में टेपिंग करने का मुद्दा। एक अंग्रेजी पत्र द इंडियन एक्सप्रेस ने एक सनसनीखेज रिपोर्ट छापी है। इसमें बताया गया है कि केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखा था जिसमें कहा गया था कि उनके ऑफिस नॉर्थ ब्लॉक में उनके मेज के नीचे व कम से कम 15 और मेजों के नीचे चूइंगम लगी पाई गई। वित्तमंत्री के कार्यालय में, उनके सलाहकार उमीता पॉल के, निजी सचिव मनोज पन्त, दो कांफ्रेंस कमरों में ऐसी चूइंगम मेजों के नीचे लगी पाई गई हैं। इन चूइंगम के ऊपर ट्रांसमीटर फिट किया जाता है ताकि जो भी बातचीत हो उसे सुना जा सके, उसे टेप किया जा सके। इन चूइंगम पर हालांकि कोई माइक तो नहीं मिला पर निशान जरूर लगे मिले जिससे यह साबित होता है कि प्रणब दा की कोई पूरी जासूसी कर रहा था।
अब देखिए क्या होता है? प्रणब मुखर्जी इसकी शिकायत गृह मंत्रालय से नहीं करते जो आमतौर पर होना चाहिए था, वह सीधे प्रधानमंत्री से करते हैं और उन्हें कहते हैं कि वह मामले की जांच करें। इस घटना से कई बातें उभरकर सामने आती हैं। इससे साफ पता चलता है कि कांग्रेस के अन्दर गड़बड़ है और जबरदस्त खींचतान है। पाठकों को याद होगा कि मैंने इसी कॉलम में दो दिन पहले लिखा था कि कांग्रेस पार्टी में दो खेमे बन चुके हैं। एक खेमा सोनिया गांधी व कांग्रेस पार्टी का है तो दूसरा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व उनके मंत्रियों का है जो सरकार का पक्ष लेते हैं। यानि पार्टी बनाम सरकार। चूंकि गृहमंत्री चिदम्बरम का प्रणब दा से 36 का आंकड़ा है और दोनों अलग-अलग कैम्प में हैं इसलिए प्रणब मुखर्जी ने प्रधानमंत्री से शिकायत की, गृहमंत्री से नहीं। नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक का क्षेत्र अति सुरक्षित क्षेत्र माना जाता है। अगर वित्त मंत्रालय में किसी ने टेपिंग यंत्र लगाए तो यह कौन हो सकता है? पहली बात तो यह है कि बिना अन्दर के सूत्र के कोई बाहरी ताकत, व्यक्ति इन कार्यालयों में पहुंच ही नहीं सकता, क्योंकि यहां सुरक्षा इतनी कड़ी है। क्या कांग्रेस ने खुद अपने वित्तमंत्री की जासूसी करवाई? सुब्रह्मण्यम स्वामी का तो कहना है कि यह जासूसी पी. चिदम्बरम ने करवाई है। क्या यह काम किसी बाहरी देश का है? जो चूइंगम पाई गई वह विदेशी है। इसका मतलब यह भी हो सकता है कि कोई विदेशी सरकार या ताकत ने जासूसी करवाई। यह सम्भावना भी है कि किसी औद्योगिक घराने ने यह जासूसी इसलिए करवाई हो ताकि उन्हें पता लग सके कि वित्त मंत्रालय में क्या चल रहा है?
पूरे प्रकरण से कई सवाल खड़े हो गए हैं। मसलन जब प्रणब मुखर्जी को इसका पता था तो उन्होंने आईबी को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी? क्योंकि आईबी के कार्यक्षेत्र में ही यह काम आता है और सर्वेलांस और एंटी सर्वेलांस में वह महारथ रखती है। प्रणब मुखर्जी ने सीबीडीटी को छानबीन के लिए क्यों कहा, क्योंकि उसका यह काम नहीं और उसे मालूम भी नहीं कि ऐसी स्थितियों से कैसे निपटना है। रिपोर्ट के अनुसार सीबीडीटी ने किसी प्राइवेट खुफिया एजेंसी को बुलाकर जांच करवाई। आईबी को इसलिए नहीं बुलाया गया क्योंकि वह गृह मंत्रालय के आधीन है और प्रणब मुखर्जी गृह मंत्रालय को शामिल नहीं करना चाहते थे। बाद में आईबी को बुलाया गया और आईबी ने क्लीन चिट देते हुए कह दिया कि चूइंगम तो मिली है पर माइक्रोफोन कोई नहीं मिला। आईबी तो कहेगी ही? सरकार यह नहीं चाहेगी कि सच सामने आए और इस मामले को दबाने का हर सम्भव प्रयास करेगी। नॉर्थ ब्लॉक व साउथ ब्लॉक कार्यालयों को रोज रात बन्द करने की जिम्मेदारी एक अलग विभाग की है। बिना चॉभियों के यह कार्यालय कब और कैसे खुले ताकि बगिंग डिवाइस फिट की जा सकें? क्या कोई इस विभाग का आदमी मिला हुआ था?
वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी और उनके सलाहकारों की मंत्रालय के अन्दर जासूसी को लेकर जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने आरोप लगाया है कि सोनिया गांधी के कहने पर प्रणब मुखर्जी की जासूसी कराई गई। डॉ. स्वामी ने कहा कि सोनिया गांधी के कहने पर हसन अली केस मामले में वित्तमंत्री की जासूसी कराई गई। गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने जासूसी कराई। उन्होंने कहा कि उनकी जानकारी के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के दबाव में प्रणब मुखर्जी झुकते नजर आ रहे थे। कई बड़े नामों का खुलासा हो सकता था। इसलिए प्रणब मुखर्जी की जासूसी कराई गई। वहीं स्वामी के आरोप के बाद राजनीतिक गहमागहमी तेज हो गई है। लोकसभा विपक्ष के नेता व तेज-तर्रार भाजपा की सुषमा स्वराज ने इस जासूसी कांड को अमेरिका के वॉटरगेट स्कैंडल का दर्जा दिया है। उन्होंने कहा कि वित्तमंत्री कार्यालय की जासूसी का मामला अत्यंत गम्भीर है। वित्तमंत्री स्वयं इसे खारिज करने की कोशिश कर सकते हैं, वह किन्हीं दबावों में हो सकते हैं। लेकिन देश असलियत जानना चाहता है। विपक्ष के हमलों को देखते हुए सरकारी तंत्र भी सक्रिय हुआ और सरकार की मीडिया संबंधी मंत्रिमंडलीय समूह ने भी इस बारे में विचार किया। इसके बाद कांग्रेस ने सफाई देने के बजाय भाजपा के आरोपों को उसकी पांच राज्यों के चुनाव में हार की हताशा करार दिया। देश जानना चाहता है कि इसमें सच क्या है? यह अत्यंत गम्भीर मामला है। इस मामले से कई तरह के प्रश्न खड़े हो गए हैं। सरकार को इस मामले में लीपापोती करने की बजाय मंत्रियों की जासूसी करने वालों का खुलासा करना चाहिए। यह मामला देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े होने के अलावा देश की सुरक्षा से भी जुड़ा हो सकता है। मामले की पूरी जांच होनी चाहिए और सच्चाई जनता के सामने आनी ही चाहिए। प्रणब मुखर्जी एक बहुत सुलझे हुए, समझदार मंत्री हैं। अगर उन्हें दाल में कुछ काला नहीं दिखा होता तो वह जांच की मांग करते ही नहीं? और फिर गृह मंत्रालय को छोड़कर सीधा प्रधानमंत्री को शिकायत क्यों की?
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