Translater

Showing posts with label Trinamool congress. Show all posts
Showing posts with label Trinamool congress. Show all posts

Thursday, 30 March 2023

सदस्यता जाने के बाद कांग्रोस की पहली परीक्षा

कांग्रोस नेता राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द होने के साथ ही 2024 के चुनावों में विपक्षी एकता का खाका खींचना शुरू हो गया है।पहला राजनीतिक मोर्चा अगले माह होने वाला कर्नाटक का विधानसभा चुनाव होगा। इस घटना के बाद बदलने वाले राजनीतिक समीकरण और आने वाले नतीजों का असर भविष्य की सियासी रणनीति पर भी पड़ेगा।कर्नाटक में भाजपा और कांग्रोस के बीच चुनाव-प्राचार का एक अहम मुद्दा होगा राहुल की संसद से बर्खास्तगी। कांग्रोस ने कर्नाटक में अभी तक विधानसभा की 124 सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। बची हुईं सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा पाटा जल्द करेगी। कोशिश यह है कि जेडीएस के साथ भले ही अनौपचारिक समझौता हो, लेकिन इसकी पहल होनी चाहिए। इस बातचीत की कमान खुद राहुल गांधी और प््िरायंका गांधी ने संभाली हुईं है। मल्लिकार्जुन खड़गे और सोनिया गांधी इस काम में उनकी मदद कर रहे हैं। यह भी माना जा रहा है कि चुनाव आयोग जल्द ही केरल में वायनाड लोकसभा क्षेत्र में चुनाव की घोषणा कर देगा।यह सीट राहुल गांधी की सदस्यता रद्द होने से खाली हुईं है। पाटा में इस बात पर भी दबाव है कि वायनाड से प््िरायंका गांधी को उम्मीदवार बनाया जाए। हालांकि इस पर कोईं पैसला नहीं हुआ है। यह निर्णय अधिसूचना आने के बाद ही होगा। कांग्रोस के रणनीतिकारों का कहना है कि विपक्षी एकता हमेशा परिस्थितिजन्य होती है। अब इसकी पूरी भूमिका बन चुकी है। कांग्रोस के लिए जो पार्टियां समस्या हैं, उनमें तेलंगाना की बीआरएस, अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पाटा और ममता बनजा की तृणमूल कांग्रोस प्रामुख हैं। लेकिन पिछले दो दिनों में बीआरएस ने अपने रुख में काफी बदलाव दिखाया है, क्योंकि बीआरएस नेता और सीएम के. चंद्रशेखर राव की बेटी के. कविता को भी दिल्ली शराब घोटाले में ईंडी ने पूछताछ के लिए बुलाया था। आम आदमी पाटा के नेता मनीष सिसोदिया और सत्येन्द्र जैन भी सीबीआईं और ईंडी के पंदे में पंसे हुए हैं। आम आदमी पाटा के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने राहुल गांधी की सदस्यता रद्द करने पर भाजपा और प्राधानमंत्री के खिलाफ जितना आव््रामक बयान दिया, उससे कांग्रोस में काफी उत्साह है। इसी तरह तृणमूल कांग्रोस नेता ममता बनजा के भतीजे अभिषेक और उनकी पत्नी भी ईंडी के दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं। इन तीनों दलों के अलावा आरजेडी के लालू प्रासाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव और मीसा भारती, एनसीपी की सुप््िराया सुले, शिवसेना के संजय राउत जैसे तमाम नेताओं पर अलग-अलग एजेंसियों ने केस दर्ज कर रखे हैं। कांग्रोस का मानना है कि भाजपा इन मामलों का इस्तेमाल विपक्ष की एकता तोड़ने के लिए कर सकती है।लेकिन ज्यादातर नेताओं ने भरोसा दिलाया है कि इस एकता को अब तोड़ना मुश्किल है। कर्नाटक का चुनाव कईं दृष्टि से अहम है। राहुल गांधी की सदस्यता रद्द होने के बाद कांग्रोस की यह पहली परीक्षा होगी।

Tuesday, 19 June 2012

उपचुनाव के स्पष्ट संकेत ः हवा कांग्रेस के खिलाफ चल रही है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19 June 2012
अनिल नरेन्द्र
आमतौर पर उपचुनावों का दूरगामी असर नहीं होता पर ताजा उपचुनावों के नतीजे कांग्रेस पार्टी के लिए गहरी चिन्ता का विषय होना चाहिए। यूं तो उपचुनाव कई राज्यों में कई जगह हुए हैं पर आंध्र प्रदेश के उपचुनाव का सबसे ज्यादा महत्व है। आंध्र प्रदेश की 18 विधानसभा और एक लोकसभा सीट पर हुए चुनाव इस बात का स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि इस कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले राज्य में कांग्रेस की हवा खराब हो चुकी है। इस तरह के नतीजों की शायद ही कांग्रेस ने कल्पना की हो। विद्रोह कर वाईएसआर कांग्रेस का गठन करने वाले वाईएस जगनमोहन रेड्डी को धूल चटाने की मंशा से कांग्रेस ने सत्ता का पूरा फायदा लेते हुए जेल की सींखचों में बन्द कर दिया। व्यापार में अनैतिक साधनों के इस्तेमाल के आरोप में सीबीआई ने उन्हें 27 मई को ही गिरफ्तार कर लिया था। यकीनन 12 जून के चुनाव को ध्यान में रखकर ही ऐसा किया गया था। जगन को गिरफ्तार करने का उलटा असर हुआ, उनसे जनता की सहानुभूति हो गई और उसने 18 में से 15 विधानसभा सीटें जगन की झोली में डाल दीं। इसके अलावा एक लोकसभा सीट पर भी जगन की पार्टी को भारी सफलता मिली। एक तरह से कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया है। लोकसभा की सीट तो जगन के उम्मीदवार ने दो लाख वीटों के अन्तर से जीती। कांग्रेस को एक करारा झटका मध्य प्रदेश में भी लगा है। आरक्षित महेश्वर सीट सत्तारूढ़ भाजपा ने उससे छीन ली। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के 2008 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद जितनी भी सीटों पर उपचुनाव हुआ, सभी जगह कांग्रेस बुरी तरह हारी। कांग्रेस अपना गढ़ भी बचा नहीं सकी। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने अपनी लोकप्रियता बरकरार रखी है। यहां बांकुरा और जसपुर की दो सीटों के लिए उपचुनाव हुए थे। दोनों में पिछले विधायकों की मृत्य के कारण उपचुनाव हुए थे। तृणमूल कांग्रेस ने दोनों सीटों पर जीत हासिल की। कांग्रेस के लिए बुरी खबर झारखंड से भी आई है। वहां ऑल झारखंड छात्र संघ के नवीन जायसवाल के मुकाबले हटिया से कांग्रेस के केंद्रीय मंत्री सुबोध कान्त सहाय के भाई और कांग्रेस के उम्मीदवार सुनील सहाय की तो जमानत जब्त हो गई। उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले की मांट सीट के उपचुनाव ने भी सीधे न सही परोक्ष रूप से कांग्रेस को झटका जरूर दिया है। यहां कांग्रेस समर्थित रालोद उम्मीदवार को ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार श्याम सुन्दर शर्मा ने करीब पांच हजार वोट से हरा दिया। इस सीट पर उपचुनाव केंद्रीय मंत्री और रालोद के मुखिया अजीत सिंह के बेटे जयंत चौधरी के इस्तीफे के कारण हुआ था। मार्च में हुए चुनाव में इन्हीं जयंत चौधरी ने श्याम सुन्दर शर्मा को हराया था पर बाद में उन्होंने लोकसभा के सदस्य बने रहने के फेर में इस सीट से इस्तीफा दे दिया था। कन्नौज लोकसभा सीट से तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव के सामने किसी भी दल ने अपना उम्मीदवार ही नहीं उतारा और वह 22 साल बाद निर्विरोध लोकसभा पहुंच गईं। महाराष्ट्र की इकलौती केन सीट राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बचाने में सफल रही। यहां उसके उम्मीदवार पृथ्वीराज साठे ने भाजपा की संगीता को हराया। त्रिपुरा में नल्चर सीट पर माकपा ने अपना कब्जा बरकरार रखा। तमिलनाडु में भी पुडुकोहई सीट सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक ने जीत ली जबकि केरल में सत्तारूढ़ कांग्रेस गठबंधन को नेयातिकार सीट पर जीत जरूर मिली और कांग्रेस गठबंधन ने वाम मोर्चे को झटका दिया। इस सीट पर पिछली बार माकपा उम्मीदवार जीता था। कुल मिलाकर बेशक उपचुनावों का असर राष्ट्रीय राजनीति पर न पड़ता हो पर फिर भी देशभर में कांग्रेस के खिलाफ चल रही हवा का पता चलता है।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Mid Term Poll, Trinamool congress, Vir Arjun

Sunday, 17 June 2012

राष्ट्रपति चुनाव दंगल का दूसरा अध्याय

अगर बृहस्पतिवार का दिन ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव के नाम रहा तो शुक्रवार का दिन निश्चित रूप से सोनिया गांधी के नाम रहा। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ममता की चुनौती स्वीकार रकते हुए प्रणब मुखर्जी को यूपीए का राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित कर दिया। यही नहीं, शाम होते-होते मुलायम सिंह यादव अपनी आदत के अनुसार पलटी खा गए और उन्होंने प्रणब के समर्थन की घोषणा कर दी। बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी यूपीए उम्मीदवार के समर्थन की औपचारिक घोषणा कर दी। अंक गणित के हिसाब से प्रणब मुखर्जी का पलड़ा भारी है। राष्ट्रपति चुनाव के लिए कुल मत हैं 10,98,882। बहुमत के लिए 5,49,442 वोट चाहिए। संप्रग के पास अब संप्रग+सपा+बसपा+राजद अगर जोड़े जाएं तो 5,71,644 वोट बन जाते हैं जबकि राजग के पास कुल 3,04,785 वोट ही रह जाते हैं। इसलिए आंकड़ों के अनुसार और घोषित समर्थन पोजीशन के बाद श्री प्रणब मुखर्जी का राष्ट्रपति बनना तय है। हालांकि ममता बनर्जी अभी भी कह रही हैं कि खेल अभी बाकी है, आगे देखिए होता है क्या? कांग्रेस पार्टी की अब कोशिश है कि प्रणब दा का चयन सर्वसम्मति से हो जाए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने प्रणब के नाम की घोषणा होने के बाद लोकसभा में प्रतिपक्ष नेता सुषमा स्वराज को फोन करके भाजपा का समर्थन मांगा, सोनिया गांधी ने भी घोषणा स्पीच में सभी सांसदों, विधायकों से सर्वसम्मति से राष्ट्रपति चुनने की अपील की। वैसे कहीं बेहतर होता कि कांग्रेस प्रणब दा के नाम की घोषणा से पहले तमाम विपक्ष को विश्वास में लेती। सर्वसम्मति का मतलब होता है कि मिलकर उम्मीदवार का चयन करें न कि आप पहले चयन कर लें और बाद में सर्वसम्मति की बात करें। कांग्रेस ने पूरे मामले में मिसहैंडलिंग की है। उसने राष्ट्रपति पद का मजाक बना दिया है। आज सारा देश दुनिया भारत में सर्वोच्च पद के लिए हो रहे दंगल को देख रहा है। किसी भी शासन प्रणाली में नीतिगत मर्यादा का पालन किया जाना आवश्यक है। इसकी जिम्मेदारी सर्वाधिक सत्तापक्ष की होती है। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में राजनीतिक मर्यादाओं की निर्धारण संविधान में ही कर दिया जाता है। दुर्भाग्य तो यह है कि ऐसी संवैधानिक मर्यादाओं का व्यवस्था को चलाने वाले खुद ही उसका उल्लंघन कर रहे हैं। देश की आजादी के बाद पहली बार राष्ट्रपति पद को लेकर इस तरह का दंगल देखने को मिल रहा है। जैसे कि भानुमति के कुनबे में भूकम्प आ गया हो। देश के महामहिम जैसे सर्वोच्च पद के लिए इतनी उठापटक राष्ट्र की राजनीति के लिए शुभ संकेत नहीं मानी जा सकती। जब से राजनीति में क्षेत्रीय दलों की सहभागिता बढ़ी है तब से देश की जनता की भावनाओं का बलात्कार व स्वार्थ सिद्धि के लिए ब्लैकमेलिंग का सिस्टम चल पड़ा है। आज जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि व पार्टियां अपने-अपने राज्यों के लिए `पैकेज' सिस्टम मिलने पर समर्थन देने की कवायद में जुटे हैं, नेताओं की निजी महत्वाकांक्षाएं स्वस्थ लोकतांत्रिक परम्पराओं पर भारी पड़ती नजर आ रही हैं। संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति देश की विधायिका और कार्यपालिका का प्रधान होता है। बिना उसके हस्ताक्षर के कोई भी विधेयक कानून का रूप नहीं ले सकता। उसी के नाम पर केंद्र सरकार के सारे कामकाज निपटाए जाते हैं पर यह सिर्प अलंकारित सत्य है। सब कुछ तो राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के कहने पर करता है। कायदेनुसार राष्ट्रपति को दलगत राजनीति से ऊपर होना चाहिए। सभी दलों का कर्तव्य होता है कि उसे सबसे ऊपर राष्ट्र के संवैधानिक मुखिया के तौर पर देखें और सम्मान दें। मर्यादा यह कहती है कि राष्ट्रपति वह व्यक्ति हो जो सभी दलों को मान्य हो, जिसकी निष्पक्षता पद की गरिमा व मर्यादा सभी मानें। तात्विक रूप से देखा जाए तो किसी एक नाम पर सहमति होने में किसी भी पार्टी का कोई नफा-नुकसान नहीं है पर सियासत के खेल में राजनीतिक अहंकार व निजी स्वार्थ सिर चढ़कर बोल रहा है। कुल मिलाकर देखा जाए तो श्री प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति पद के लिए सही व्यक्ति हैं। उनका लम्बा अनुभव, काबलियत खुद मुंह से बोलती है। कांग्रेस के संकटमोचक कहे जाने वाले प्रणब दा की सरकार और कांग्रेस पार्टी को कमी जरूर खलेगी। अभी 2014 का चुनाव दूर है। प्रणब दा को ऊपर धकेलने के पीछे भी कारण है। प्रधानमंत्री उन्हें वित्त मंत्रालय से हटाना चाहते थे पर उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि कैसे हटाएं? यह किसी से छिपा नहीं कि प्रणब दा और सोनिया गांधी में भी रिश्ते मधुर नहीं। सोनिया उन पर विश्वास नहीं करतीं। फिर कुछ विदेशी ताकतें भी प्रणब से नाराज रहती थीं, उद्योगपति भी खुश नहीं थे। इसीलिए एक तीर से कई शिकार करने की कांग्रेस ने कोशिश की है। प्रणब का चयन इसलिए भी किया गया, क्योंकि कांग्रेस का आंकलन था कि हामिद अंसारी, एपीजे अब्दुल कलाम से जीत नहीं सकते। दूसरा अध्याय निश्चित रूप से सोनिया गांधी और कांग्रेस के नाम रहा। दंगल जारी है। 30 जून तक कई और करवटें ले सकती है भारत की राजनीति।
Anil Narendra, APJ Abdulkalam, Congress, Daily Pratap, Elections, Hamid Ansari, Pranab Mukherjee, President of India, Trinamool congress, Vir Arjun

Saturday, 9 June 2012

ममता अब एकला चलो नीति पर अमल करना चाहती हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9 June 2012
अनिल नरेन्द्र
तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी का आत्मविश्वास चरम सीमा पर है। पश्चिम बंगाल में छह में से चार नगर निगम चुनाव जीतने के बाद से उसकी ऐसी अधीरता अब छलकने लगी है। इन परिणामों से कई संदेश निकले हैं। पहला, विधानसभा चुनावों के बाद वाम मोर्चे के सामने एक बार फिर यह सवाल मुंह बाए खड़ा है कि जनता उस पर भरोसा क्यों नहीं कर पा रही है। दूसरे, यूपीए सरकार का हिस्सा होने के बावजूद कई मुद्दों पर प्रत्यक्ष रूप से असहमति जताकर केंद्र के लिए असुविधाजनक स्थिति पैदा करने के बाद तृणमूल कांग्रेस अब कांग्रेस को कह सकती है कि अगर उसके महत्व को कम करके आंका गया तो वह राज्य में अकेले चलने से नहीं हिचकिचाएगी। तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी के विश्वासपात्र और केंद्रीय रेल मंत्री मुकुल रॉय ने नतीजों के तुरन्त बाद घोषणा कर दी कि उनकी पार्टी बंगाल में अकेले शासन चलाने में सक्षम है। ममता के एक अन्य विश्वास पात्र और केंद्र सरकार में पर्यटन मंत्री सुल्तान अहमद तो इससे भी एक कदम आगे निकल गए। उन्होंने भारतीय पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष पद पर गुजरात के कांग्रेसी नेता शंकर सिंह बघेला की नियुक्ति का विरोध करते हुए सवाल उठा दिया कि इसमें उन्हें क्यों विश्वास में नहीं लिया गया। अहमद यह शिकायत करने में भी नहीं चूके कि बकौल राज्यमंत्री उनके पास काम का कोई दायित्व ही नहीं है। पिछले माह हुए विधानसभा चुनावों के बाद यह पहला मौका था जब तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ा। इस तरह मुकाबला इस बार तिकोना था पर आम धारणा रही कि पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वाम मोर्चे की पराजय की एक बड़ी वजह कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का गठजोड़ था। लेकिन ममता बनर्जी यह संदेश देने में कुछ हद तक कामयाब रहीं कि वे अकेले भी वाम मोर्चे से पार पा सकती हैं। चुनाव नतीजे आने के बाद तृणमूल नेताओं ने यह कहने में कोई संकोच भी नहीं किया कि उनकी पार्टी राज्य में अपने दम-खम पर राज करने की ताकत रखती है और वह भविष्य में होने वाले चुनाव अकेले लड़ेगी। अभी यह साफ नहीं कि तृणमूल ने अंतिम फैसला कर लिया है या फिर उसकी चेतावनी सिर्प नगर निगम चुनावों के दौरान दोनों पार्टियों के बीच हुई खटास का नतीजा है। बंगाल में कांग्रेस इकाई ने तृणमूल की धमकी का कड़ा जवाब दिया, यह कह कर कि वह चाहे तो गठबंधन तोड़ ले पर चारों तरफ से समस्याओं से घिरी केंद्र में मनमोहन सरकार ममता से पंगा लेने को तैयार नहीं है। बृहस्पतिवार को ही ममता का प्रभाव नजर आ गया। उस दिन सरकार के आर्थिक एजेंडे से जुड़े बहुचर्चित पेंशन बिल को कैबिनेट की मंजूरी के लिए लाना था पर ममता के एतराज को देखते हुए केंद्र सरकार को इसे टालना पड़ा और ममता बनर्जी के दबाव में केंद्र सरकार को कदम पीछे लेने पड़े। केंद्र सरकार के लिए ममता का समर्थन बहुत मायने रखता है, इसलिए उसकी कोशिश तृणमूल से अपना गठबंधन हर हाल में जारी रखने की ही होगी। मगर तृणमूल ने कोयला आवंटन में सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों की अनदेखी किए जाने के मुद्दे उठाकर कांग्रेस की दुखती रग छेड़ दी है। नगर निकायों के चुनावों को आमतौर पर स्थानीय या अधिक से अधिक राज्य के भीतर के समीकरणों के हिसाब से देखा जाता है मगर प. बंगाल में नगर पालिका चुनाव ने जहां सत्तारूढ़ गठबंधन में दरार के संकेत दिए हैं वहीं केंद्र सरकार और कांग्रेस पार्टी की मुसीबत बढ़ा दी है।
Anil Narendra, Communist, Cpi, CPM, Daily Pratap, Mamta Banerjee, Trinamool congress, UPA, Vir Arjun, West Bengal

Saturday, 26 May 2012

पेट्रोल कीमतें ः समझें इस सरकार के बहाने, छलावे और चालाकी...(1)

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 26 May 2012
अनिल नरेन्द्र
मैंने अनेक बार इसी कॉलम में लिखा है कि देश इस सरकार और मुट्ठीभर तेल कम्पनियों की धांधलियों को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। सरकार हर बार पेट्रोल के दाम बढ़ाकर अपना पल्ला यह कहकर नहीं झाड़ सकती कि हम क्या करें, यह फैसला तो तेल कम्पनियों का है। देश चाहता है कि इन तेल कम्पनियों की झूठी दलीलों और सरकार की बदनीयती का पर्दाफाश हो पर इससे पहले कि मैं तेल कम्पनियों की बकवास दलीलों की बात करूं, मैं चाहता हूं कि हम इस सरकार का सोचने के ढंग को समझें। अर्थशास्त्रियों और वकीलों से भरी पड़ी कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार पेट्रोल को अमीरों का ईंधन मान बैठी है। हकीकत यह है कि देश के 60 फीसदी से ज्यादा दुपहिया, तिपहिया वाहनों की बिक्री छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में होती है। महानगरों में निम्न मध्य वर्ग ही पेट्रोल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। किसी भी पेट्रोल कीमत की वृद्धि का सीधा असर इन वर्गों पर पड़ता है। इनकी आमदनी तो इतनी बढ़ी नहीं और खर्चे बेशुमार बढ़ते जा रहे हैं। यह अपना घर-बार कैसे चलाएं, क्या काम पर जाना छोड़ दें? क्या करें? जहां तक इन तेल कम्पनियों की बात है तो भारत की यह विडम्बना है कि 90 फीसदी तेल कारोबार पर सरकारी कम्पनियों का नियंत्रण है और सरकार की मानें तो ये कम्पनियां जनता को सस्ता तेल बेचने के कारण भारी घाटे में हैं। दूसरी ओर प्रतिष्ठित फार्च्यून पत्रिका के अनुसार दुनिया की आला 500 कम्पनियों में भारत की तीनों सरकारी कम्पनियांöइंडियन ऑयल (98), भारत पेट्रोलियम (271) और हिन्दुस्तान पेट्रोलियम (335) शामिल हैं। तेल और गैस उत्खनन से जुड़ी दूसरी सरकारी कम्पनी ओएनजीसी भी फार्च्यून 500 में 360वीं रैंक पर है। फिर हर साल यह प्रधानमंत्री को मोटे-मोटे शुद्ध लाभ के चेक भी भेंट करते हैं। आखिर यह कैसे सम्भव है कि सरकार घाटे का दावा कर रही है लेकिन तेल कम्पनियों की बैलेंसशीट खासी दुरुस्त है? 2011 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक इंडियन ऑयल को 7445 एचपीसीएल को 1539 और बीपीसीएल को 1547 करोड़ रुपये का फायदा हुआ है, वह भी टैक्स चुकाने के बाद। इस सच्चाई के बाद भी सरकार लगातार इन कम्पनियों के घाटे की झूठी दलीलें देने से बाज नहीं आ रही। हमें इस सरकार के बहानों, छलावे और चालाकी को समझना होगा। डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत की दलील दी जा रही है। तेल कम्पनियों का कहना है कि 80 प्रतिशत तेल विदेश से मंगाना पड़ता है और भुगतान डॉलर में करना पड़ता है। चूंकि एक डॉलर 56 रुपये का हो चुका है इसलिए ज्यादा कीमत देनी पड़ रही है। सच यह है कि 15 मई 2011 को जब पेट्रोल 5 रुपये महंगा हुआ था, तब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कूड ऑयल यानि कच्चा तेल 114 डॉलर प्रति बैरल था जबकि डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत थी 46 रुपये। इस हिसाब से हमें एक बैरल तेल के लिए 5244 रुपये चुकाने पड़ते थे। आज कूड 91.47 डॉलर प्रति बैरल है और एक डॉलर 56 रुपये का है। साफ है कि आज के भाव से एक बैरल तेल 5056 रुपया का है यानि कच्चा तेल 148 रुपये बैरल तब से सस्ता है। अब बात करते हैं कूड के नाम पर छलावे की। क्योंकि तेल कम्पनियों ने 26 जून 2010 (जब पेट्रोल नियंत्रण मुक्त हुआ था) को कहा था कि कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों को ध्यान में रखकर देश में पेट्रोल के दाम तय होंगे। सरकार और कम्पनियों ने मिलकर पिछले 2 साल में 14 बार महंगे कूड के नाम पर पेट्रोल के दाम बढ़ाए हैं। सच यह है कि पहले जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कूड का दाम 114 डॉलर प्रति बैरल था, तब भी तेल कम्पनियां घाटा बता रही थीं, आज कूड का भाव 91.47 डॉलर है तो भी घाटा हो रहा है। रुपये की गिरती कीमतें भी छलावा है। क्योंकि 15 मई 2011 से अब तक डॉलर 10 रुपये महंगा हुआ है और कच्चा तेल 22 डॉलर सस्ता हो चुका है। लेकिन इस दौरान पेट्रोल की कीमतों में सिर्प तीन बार मामूली कमी की गई। घाटे के नाम पर चालाकी ः क्योंकि सरकारी तेल कम्पनियों का कहना है कि पेट्रोल के अलावा सरकार के नियंत्रण में होने की वजह से डीजल, गैस और केरोसिन की कीमतें नहीं बढ़ने से भी उनका घाटा बढ़ा है। डीजल की कीमत आखिरी बार 26 जून 2011 को बढ़ी थी। तीनों कम्पनियों का दावा है कि उन्हें इस साल 1.86 लाख करोड़ रुपये का घाटा होगा। सच क्या है? सच यह है कि तेल कम्पनियां भारी मुनाफा कमा रही हैं। 2011 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक आईओसी को 7445 करोड़, एचपीसीएल को 1539 करोड़ और बीपीसीएल को 1547 करोड़ रुपया मुनाफा हुआ। वह भी टैक्स देने के बाद। डीजल, गैस और केरोसिन पर घाटे की बात भी झूठी है, क्योंकि सरकार इस पर सब्सिडी दे रही है। (क्रमश)
Anil Narendra, BJP, Congress, Daily Pratap, Petrol Price, Trinamool congress, UPA, Vir Arjun

Wednesday, 2 May 2012

इस बार राष्ट्रपति चुनाव बहुत पेचीदा बन गया है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 2 May 2012
अनिल नरेन्द्र
देश का अगला राष्ट्रपति कौन होगा, यह चर्चा आजकल राजनीतिक गलियारों में तेज हो गई है। इसका कारण है कि फैसला करने का समय आ चुका है। राष्ट्रपति का चुनाव अगले महीने जून में होना है और अभी तक न तो यूपीए ने न एनडीए ने और न ही क्षेत्रीय दलों ने अपना कोई उम्मीदवार घोषित किया है। फैसला मुख्यत तो कांग्रेस पार्टी को करना है पर मुश्किल यह हो गई है कि अकेले अपने दम-खम पर इस बार कांग्रेस अपना उम्मीदवार जीताने की स्थिति में नहीं है। पिछली बार जैसे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अचानक श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का नाम घोषित कर सबको चौंका दिया था, इस बार ऐसा नहीं हो सकता। एक बहुत बड़ा फर्प तब और अब में क्षेत्रीय दलों की बढ़ती ताकत है। राष्ट्रपति के होने वाले चुनाव में क्षेत्रीय दलों की दबंगई साफ नजर आने लगी है। पूरी कोशिश इस बात की हो रही है कि इस बार राष्ट्रपति भवन में क्षेत्रीय दलों का उम्मीदवार पहुंचे। इसके लिए जोड़-तोड़ शुरू हो चुकी है। राष्ट्रपति चुनाव को लेकर क्षेत्रीय दलों की सक्रियता आने वाले दिनों में दोनों कांग्रेस और भाजपा के लिए एक नई चिन्ता का सबब बन सकती है। क्षेत्रीय दल अपनी ताकत को पहचान रहे हैं कि इस बार उनके समर्थन के बिनाह न तो कांग्रेस और न ही भाजपा अपनी मनमानी कर सकती है और उनके सहयोग के बिना रायसीना हिल्स पर कौन विराजमान होगा, इसका फैसला नहीं हो सकता। दरअसल राष्ट्रपति चुनाव के बहाने क्षेत्रीय दल आगामी लोकसभा चुनाव के राजनीतिक समीकरणों की इबादत भी लिखने को तैयार हैं। सबसे ज्यादा सक्रिय समाजवादी पार्टी दिख रही है। इसके पीछे उसके अपने राजनीतिक निहितार्थ हैं। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद सपा देश की राष्ट्रीय राजनीति में बड़े बदलाव देख रही है। दोनों बड़ी पार्टियां कांग्रेस और भाजपा की पकड़ कमजोर होती जा रही है और क्षेत्रीय दलों की ताकत में लगातार इजाफा हो रहा है। सपा की कोशिश है कि अगला प्रधानमंत्री गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा का बने। इसके लिए वह अभी से जुट गई है। क्षेत्रीय दलों को इकट्ठा करके वह पहले राष्ट्रपति चुनाव में अपनी संयुक्त ताकत को आजमाना चाहती है। मगर वह इसमें सफल रहती है तो निश्चित रूप से लोकसभा चुनाव में नए-नए समीकरण नजर आएंगे। राष्ट्रपति चुनाव में इस बार सपा के अलावा तृणमूल कांग्रेस, राकांपा, अन्नाद्रमुक, बसपा और बीजद भी प्रमुख भूमिका निभाएगी। किसी तटस्थ उम्मीदवार के उतरने पर राजग में शामिल जद (यू) और शिरोमणि अकाली दल का समर्थन भी उन दलों को मिल सकता है। क्षेत्रीय दलों का गठबंधन यदि किसी एक नाम पर आमराय बना लेता है तो दोनों बड़े दलों कांग्रेस और भाजपा को उसे सिरे से नकारना मुश्किल हो सकता है। संख्या बल देखें तो यूपीए के सभी घटक यदि एक साथ रहें तो उनके पास 40 फीसद मत हैं जबकि अकेले कांग्रेस के पास 71 फीसद मत हैं। यही हाल राजग का है, उसके पास कुल मिलाकर 31 फीसद मत हैं जबकि अकेले भाजपा के पास 24 फीसद मत हैं। हां कांग्रेस और भाजपा मिलकर कोई उम्मीदवार तय करें तो वह उम्मीदवार जीत सकता है।
Anil Narendra, BJP, Congress, Daily Pratap, President of India, Samajwadi Party, Trinamool congress, Vir Arjun

Tuesday, 17 April 2012

इस रेट से तो ममता की छवि और लोकप्रियता तेजी से घटेगी

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जिद और अक्कड़पन से अब सब परिचित हो चुके हैं। लगता है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद तो उनमें अहंकार और तानाशाह प्रवृत्ति में इजाफा हो गया है। अब तो वह अपने खिलाफ बना कार्टून को भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कार्टून लगाने के आरोप में जादवपुर विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर को शुक्रवार को गिरफ्तार कर लिया गया। यह कार्टून दिनेश त्रिवेदी को रेल मंत्री पद से हटाकर उनकी जगह मुकुल रॉय को नया रेल मंत्री बनाने के संदर्भ में यह कार्टून बनाया गया था। रसायन शास्त्र के प्रोफेसर अम्बिकेश महापात्रा की गिरफ्तारी से आक्रोश फैल गया और माकपा एवं शैक्षणिक समुदाय ने कहा कि पुलिस कार्रवाई बिल्कुल दमनात्मक है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के न्यूनतम लोकतांत्रिक अधिकार पर स्पष्ट हमला है। बाद में अलीपुर की अदालत ने प्रोफेसर को जमानत पर रिहा कर दिया। प्रोफेसर महापात्रा ने आरोप लगाया कि कार्टून डालने के कारण गुरुवार रात तृणमूल कांग्रेस के 15 समर्थकों ने उनके साथ बदसलूकी भी की। प्रोफेसर ने कहा कि वे अपनी सुरक्षा को लेकर खतरा महसूस कर रहे हैं। वहीं विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल माकपा ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार अखबारों पर अंकुश लगाकर लोकतंत्र और आजीविका के अधिकार पर हमला कर रही है। वहीं पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने कार्टून विवाद पर कहा कि कार्टून लोकतंत्र का हिस्सा है। उन्होंने कहा, मेरा मानना है कि कार्टून स्वस्थ लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है। कार्टून आपकी छवि को खराब नहीं कर सकते हैं। माकपा के वरिष्ठ नेता अब्दुर रज्जाक मोल्ला ने शनिवार को आरोप लगाया कि राज्य सरकार अखबारों पर अंकुश लगाकर लोकतंत्र और आजीविका के अधिकार पर हमला कर रही है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने फरमान जारी किया कि सरकारी पुस्तकालयों में सिर्प चुनिंदा अखबार ही रखे जाएं। सरकार विरोधी अखबारों के लिए पुस्तकालय में कोई जगह नहीं है। मोल्ला ने स्टूडेंट्स हॉल में माकपा (माले) लिबरेशन की ओर से आयोजित सम्मेलन में कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वहीं सम्मेलन में मौजूद कवि नवारुण भट्टाचार्य ने कार्टून बनाने वाले के खिलाफ कार्रवाई को राज्य सरकार की मनमानी और अराजकता कहा। शिक्षाविद् सुनन्दा सान्याल ने प्रोफेसर की गिरफ्तारी की निंदा करते हुए कहा कि ममता बनर्जी ने राज्य में सत्ता परिवर्तन का नारा उछाल कर सत्ता हथियाने में कामयाबी हासिल की। सच तो यह है कि राज्य में कहीं भी परिवर्तन की झलक नहीं दिख रही है। यह दुःखद, दुर्भाग्यपूर्ण व निंदनीय है। ममता धीरे-धीरे फासिस्ट होती जा रही हैं। हमारा मानना है कि ममता बनर्जी में अपने खिलाफ किसी प्रकार की आलोचना या व्यंग्य बर्दाश्त करने की क्षमता कम होती जा रही है। लोकतंत्र में कार्टून बनाना कोई अपराध नहीं है और ऐसा रोकना प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला करना है। जिस तरह से ममता चल रही हैं उससे तो यही लगता है कि वह बहुत तेजी से अलोकप्रिय हो जाएंगी और उनकी बनी छवि धूमिल हो जाएगी। वाम नेताओं से उनको इतनी नफरत है कि वह अब यह भी ठीक से फैसला नहीं कर पा रही कि क्या ठीक है क्या गलत?
Anil Narendra, Daily Pratap, Kolkata, Mamta Banerjee, Trinamool congress, Vir Arjun, West Bengal

Thursday, 2 February 2012

... और अब ममता ने मनमोहन सिंह पर सीधा हमला किया

यूपीए के घटक दलों के बढ़ते दबाव से कांग्रेस का राजनीतिक संकट बढ़ता जा रहा है। ममता बनर्जी व शरद पवार दोनों ने कांग्रेस की नाक में दम कर रखा है। सोमवार को ममता ने सारी हदें पार कर लीं। उन्होंने सीधा पधानमंत्री मनमोहन सिंह पर हमला बोल दिया। सोमवार को ममता ने मनमोहन सिंह पर सीधा हमला करते हुए आरोप लगाया कि पधानमंत्री ने सिंगूर में भूमि अधिग्रहण विरोधी उनके आंदोलन के दौरान उनसे बात नहीं की थी। ऐसा उन्होंने माकपा के डर से किया था। वह माकपा को नाराज नहीं करना चाहते थे। ममता ने आश्चर्यजनक ढंग से एनसीपी नेता और कृषि मंत्री शरद पवार की लाइन लेते हुए खाद्य सुरक्षा अधिनियम को लागू करने पर सवालिया निशान लगाया। हैरानी जताते हुए उन्होंने पूछा, आखिर सरकार इसके लिए धन कहां से लाएगी? बांग्लाभाषी तीन चैनलों पर पसारित इंटरव्यू में ममता ने अपनी पार्टी को यूपीए गठबंधन का एक जिम्मेदार घटक दल बताया। गठबंधन बरकरार रखने की हमारी जिम्मेदारी है लेकिन हमारी उन लोगों के पति भी जिम्मेदारी है जिन्होंने हमें चुना है, ममता ने कहा। इसलिए जन विरोधी नीतियों का हम हमेशा विरोध करेंगे। उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस ने अपनी गतिविधियों को नीतियों के आधार पर बढ़ाया है। इसी वजह से हमने लोगों को सीधे तौर पर पभावित करने वाले खुदरा व्यापार में पत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोत्तरी का विरोध किया। लेकिन कांग्रेस के कुछ नेता माकपा की तरह काम कर रहे थे। एक सवाल के जवाब में तृणमूल नेता ने केन्द्र पर राज्य के लिए पैकेज देने में आनाकानी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि राज्य में चुनाव से पहले पधानमंत्री ने राज्य की मदद का वादा किया था। इस सिलसिले में पिछले आठ महीने में मैं वित्तमंत्री पणब मुखर्जी से पांच बार मिल चुकी हूं। उन्होंने कहा कि मैं भीख मांगने नहीं जाऊंगी कुछ भी हो जाए, हम सम्मान से सिर उठाकर चलेंगे। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में दरार चौड़ी होती जा रही है। कांग्रेस महसूस करने लगी है कि तृणमूल की योजना है कांग्रेस के गढ़ वाले इलाके में पैठ बनाना। निशाने पर हैं ममता के धुर विरोधी माने-जाने वाले कांग्रेस के नेता दीपादास मुंशी, अधीर चौधरी और मौसम बेनजीर नूर के पभाव वाले जिले हैं। पिछले दिनों कांग्रेस और तृणमूल गठबंधन में चल रही खींचतान नेताओं के बीच वाद-विवाद से आगे निकलकर जनता की अदालत में चली गई। तृणमूल के नेताओं ने जनसभा कर कांग्रेसियों को गठबंधन छोड़ने की चुनौती दे डाली। तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने एक सुर में कहा कि यह कांग्रेस को तय करना है कि उन्हें पिछले दरवाजे से बाहर निकलना है या मुख्य द्वार से। जिस रफ्तार से दोनों पार्टियों में दरार चौड़ी होती जा रही है उससे तो लगता है कि वह दिन ज्यादा दूर नहीं जब दोनों अलग-अलग रास्ते अपना लें। बहुत कुछ निर्भर करता है इन पांच विधानसभा चुनावों के परिणामों पर अगर इनमें कांग्रेस का पदर्शन संतोषजनक नहीं रहा तो कुछ भी हो सकता है।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Kolkata, Mamta Banerjee, Manmohan Singh, Trinamool congress, Vir Arjun, West Bengal

Saturday, 7 January 2012

कांग्रेस और तृणमूल गठबंधन टूटने की कगार पर

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th January  2012
अनिल नरेन्द्र
तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच गठबंधन टूटने की सम्भावनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। दोनों के बीच तल्खी का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ममता बनर्जी ने कहा कि कांग्रेस उनके कट्टर दुश्मन सीपीएम के साथ मिलकर उनकी पार्टी पर हमला कर रही है। ममता ने यह भी चेतावनी दी कि लोकपाल बिल पर आखिरी फैसला लेने से पहले सभी राजनीतिक दलों की राय लेनी चाहिए। उन्होंने साफ कर दिया कि राज्यों में लोकायुक्त के गठन को लेकर वह अपने रुख पर अब भी कायम हैं कि यह राज्यों पर छोड़ देना चाहिए कि वह किस तरह का लोकायुक्त का गठन करना चाहते हैं। वहीं कांग्रेस को ममता के खिलाफ शिकायतों की लिस्ट लम्बी होती जा रही है। कांग्रेस के लिए नया सिरदर्द तृणमूल कांग्रेस के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवारों को उतारने की सुगबुगाहट से पैदा हो गया है। सूत्रों ने बताया कि ममता बनर्जी यूपी चुनाव में 40 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने पर गम्भीरता से विचार कर रही हैं। इतना ही नहीं, मणिपुर और गोवा में भी अपने उम्मीदवारों को चुनावी दंगल में झोंकने के लिए कमर कस रही हैं। ममता की यह पूरी कवायद राष्ट्रीय राजनीति में अपना सितारा बुलंद करने की है और इसी बहाने वह कांग्रेस को परेशान करना चाहती हैं। दरअसल ममता कांग्रेस के लिए रोज एक नई परेशानी पैदा कर रही हैं। पहले खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के सरकार के फैसले और लोकपाल व लोकायुक्त की नियुक्ति मामले पर तृणमूल कांग्रेस की आपत्ति से सरकार की खूब किरकिरी हुई। फिर कोलकाता स्थित इन्दिरा भवन का नाम नजरुल इस्लाम भवन करने के चलते भी कांग्रेस और तृणमूल के रिश्तों में खटास पड़ी। कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने कहा कि काजी नजरुल इस्लाम एक बड़ी शख्सियत थे और किसी भवन का नाम उनके नाम पर रखना उचित होगा लेकिन इसके लिए इन्दिरा भवन का नाम बदलना ठीक नहीं है। तृणमूल कांग्रेस की तरफ से कांग्रेस को रोज-रोज मिल रहे तनाव को देखते हुए कांग्रेस ने अब लगता है कि ममता को उन्हीं के अन्दाज में जवाब देने की रणनीति बना ली है। जिस तरह केंद्र में सहयोगी दल होने के नाते ममता बनर्जी आए दिन सरकार के हर फैसले में अपना वीटो लगा देती हैं उसी तरह अब कांग्रेस पश्चिम बंगाल सरकार के हर उस फैसले का विरोध करेगी जो उसकी नीतियों के खिलाफ होगी। इसी रणनीति के तहत इन्दिरा भवन का नाम बदलने पर मंगलवार को युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने ममता का विरोध किया और बुधवार को धान की बिक्री के लिए किसानों के हक में कांग्रेस खड़ी हुई। सहयोगी दलों के लगातार तल्ख हो रहे तेवरों के कारण कमजोर पड़ रही केंद्र की कांग्रेस सरकार को अब उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों से थोड़ी उम्मीद है। पार्टी को भरोसा है कि अगर इन चुनावों में उसने उम्दा प्रदर्शन किया तो इससे प्रदेश के साथ-साथ केंद्र में भी उसे मजबूती मिलेगी। यही वजह है कि यूपी चुनावों में हर तरह का हथकंडा पार्टी अपना रही है। तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी मनमोहन सरकार के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरी हैं। कांग्रेस को यह डर भी सता रहा है कि आगे भी ममता उसके लिए सिरदर्द बनी रहेगी। इसलिए वह केंद्र में एक मजबूत सहयोगी चाहती है। सूत्रों के मुताबिक आम बजट और रेल बजट में भी ममता अपनी मनमानी करेंगी। अगर यूपी चुनाव में कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन नहीं करती तो बजट सत्र कांग्रेस के लिए बुरी खबर लेकर आ सकते हैं जिसकी झलक सरकार हाल ही में राज्यसभा में देख चुकी है।
तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच गठबंधन टूटने की सम्भावनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। दोनों के बीच तल्खी का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ममता बनर्जी ने कहा कि कांग्रेस उनके कट्टर दुश्मन सीपीएम के साथ मिलकर उनकी पार्टी पर हमला कर रही है। ममता ने यह भी चेतावनी दी कि लोकपाल बिल पर आखिरी फैसला लेने से पहले सभी राजनीतिक दलों की राय लेनी चाहिए। उन्होंने साफ कर दिया कि राज्यों में लोकायुक्त के गठन को लेकर वह अपने रुख पर अब भी कायम हैं कि यह राज्यों पर छोड़ देना चाहिए कि वह किस तरह का लोकायुक्त का गठन करना चाहते हैं। वहीं कांग्रेस को ममता के खिलाफ शिकायतों की लिस्ट लम्बी होती जा रही है। कांग्रेस के लिए नया सिरदर्द तृणमूल कांग्रेस के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवारों को उतारने की सुगबुगाहट से पैदा हो गया है। सूत्रों ने बताया कि ममता बनर्जी यूपी चुनाव में 40 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने पर गम्भीरता से विचार कर रही हैं। इतना ही नहीं, मणिपुर और गोवा में भी अपने उम्मीदवारों को चुनावी दंगल में झोंकने के लिए कमर कस रही हैं। ममता की यह पूरी कवायद राष्ट्रीय राजनीति में अपना सितारा बुलंद करने की है और इसी बहाने वह कांग्रेस को परेशान करना चाहती हैं। दरअसल ममता कांग्रेस के लिए रोज एक नई परेशानी पैदा कर रही हैं। पहले खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के सरकार के फैसले और लोकपाल व लोकायुक्त की नियुक्ति मामले पर तृणमूल कांग्रेस की आपत्ति से सरकार की खूब किरकिरी हुई। फिर कोलकाता स्थित इन्दिरा भवन का नाम नजरुल इस्लाम भवन करने के चलते भी कांग्रेस और तृणमूल के रिश्तों में खटास पड़ी। कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने कहा कि काजी नजरुल इस्लाम एक बड़ी शख्सियत थे और किसी भवन का नाम उनके नाम पर रखना उचित होगा लेकिन इसके लिए इन्दिरा भवन का नाम बदलना ठीक नहीं है। तृणमूल कांग्रेस की तरफ से कांग्रेस को रोज-रोज मिल रहे तनाव को देखते हुए कांग्रेस ने अब लगता है कि ममता को उन्हीं के अन्दाज में जवाब देने की रणनीति बना ली है। जिस तरह केंद्र में सहयोगी दल होने के नाते ममता बनर्जी आए दिन सरकार के हर फैसले में अपना वीटो लगा देती हैं उसी तरह अब कांग्रेस पश्चिम बंगाल सरकार के हर उस फैसले का विरोध करेगी जो उसकी नीतियों के खिलाफ होगी। इसी रणनीति के तहत इन्दिरा भवन का नाम बदलने पर मंगलवार को युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने ममता का विरोध किया और बुधवार को धान की बिक्री के लिए किसानों के हक में कांग्रेस खड़ी हुई। सहयोगी दलों के लगातार तल्ख हो रहे तेवरों के कारण कमजोर पड़ रही केंद्र की कांग्रेस सरकार को अब उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों से थोड़ी उम्मीद है। पार्टी को भरोसा है कि अगर इन चुनावों में उसने उम्दा प्रदर्शन किया तो इससे प्रदेश के साथ-साथ केंद्र में भी उसे मजबूती मिलेगी। यही वजह है कि यूपी चुनावों में हर तरह का हथकंडा पार्टी अपना रही है। तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी मनमोहन सरकार के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरी हैं। कांग्रेस को यह डर भी सता रहा है कि आगे भी ममता उसके लिए सिरदर्द बनी रहेगी। इसलिए वह केंद्र में एक मजबूत सहयोगी चाहती है। सूत्रों के मुताबिक आम बजट और रेल बजट में भी ममता अपनी मनमानी करेंगी। अगर यूपी चुनाव में कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन नहीं करती तो बजट सत्र कांग्रेस के लिए बुरी खबर लेकर आ सकते हैं जिसकी झलक सरकार हाल ही में राज्यसभा में देख चुकी है।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Mamta Banerjee, Trinamool congress, Vir Arjun

Sunday, 4 December 2011

मनमोहन ने अपनी सरकार, पार्टी व देश को दाव पर लगा दिया है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4th December 2011
अनिल नरेन्द्र
क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस पार्टी देश और संसद का ध्यान ज्वलंत मुद्दों, भ्रष्टाचार, महंगाई, ब्लैक मनी से हटाने के लिए यह खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) का मुद्दा लाए हैं? माकपा नेता सीताराम येचुरी तो कम से कम यह मानते हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि सरकार संसद की कार्यवाही में बाधा को जानबूझ कर जारी रख रही है। यह लोकपाल, भ्रष्टाचार, महंगाई आदि मुद्दों पर चर्चा और बहस से बचने की राजनीति का एक हिस्सा है। यह दिन-ब-दिन साफ होता जा रहा है कि सरकार इस सत्र में कामकाज नहीं होने देना चाहती। येचुरी की इस दलील में कुछ दम है। यह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की रणनीति का एक हिस्सा हो सकता है पर जहां तक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का इस रणनीति में शामिल होने का सवाल है, हमें नहीं लगता कि वह ऐसा करने को अपनी हामी दे सकती हैं। अंदरुनी खबर तो यह है कि सोनिया गांधी व राहुल गांधी मनमोहन सिंह की इस हठधर्मिता से सख्त नाराज हैं। एफडीआई मुद्दे पर फंसी मनमोहन सिंह सरकार को सोनिया गांधी ने उसके हाल पर छोड़ दिया है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक दो दिन पहले हुई कांग्रेस कोर कमेटी की बैठक में सोनिया गांधी उस समय झल्ला गईं जब प्रधानमंत्री ने पूरा मामला सोनिया पर छोड़ना चाहा। डॉ. मनमोहन सिंह ने तो दो टूक कहा कि सरकार संसद में मतदान का सामना करे या फिर एफडीआई पर फैसला ले। इस पर पहले से ही नाराज चल रहीं सोनिया गांधी ने कहा कि जब केंद्र को एफडीआई पर निर्णय लेना था तो उनसे क्यों नहीं पूछा गया था और जब स्वयं अपने विवेक पर उन्होंने (प्रधानमंत्री ने) यह फैसला लिया है तो फिर उनको (प्रधानमंत्री) ही इस संकट से निपटना चाहिए। डॉ. मनमोहन सिंह पता नहीं क्यों अपना और अपनी सरकार व पार्टी का सब कुछ इस मुद्दे को लेकर दाव पर लगाने पर तुले हुए हैं। बार-बार वह यह दोहराते नहीं थकते कि अगर उन्होंने एफडीआई को वापस लिया या रोल बैक किया तो उनकी सरकार की साख घटेगी। उन्होंने सरकार के सहयोगी दलों तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक के नेताओं से मुलाकात कर कहा कि इस पर वह अपनी जिद्द छोड़ दें, क्योंकि कोई भी फैसला वापस लेने से सरकार की विश्वसनीयता कम होती है। हम डॉ. मनमोहन सिंह से पूछना चाहते हैं कि आपकी और सरकार की विश्वसनीयता है कहां जो कम होगी? आप इतनी-सी बात नहीं समझ रहे कि आज पूरा देश आपके इस निर्णय के खिलाफ है और सड़कों पर उतर आया है। 22 नवम्बर से शुरू हुए संसद के शीतकालीन सत्र में एक दिन भी कामकाज नहीं हुआ है। अगर हम विभिन्न राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, उड़ीसा, प. बंगाल, केरल, पंजाब, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, झारखंड और उत्तराखंड एफडीआई के विरोध में हैं। सिर्प दिल्ली, आंध्र, अरुणाचल, राजस्थान, हरियाणा, मिजोरम, मणिपुर असम, गोवा और महाराष्ट्र (कांग्रेस शासित) राज्य ही इसके हक में हैं। अगर हम लोकसभा में सांसदों की बात करें तो कुल 543 में से 278 सांसद विरोध में हैं। इनमें भाजपा (115), अकाली दल (4), सपा (22), बसपा (21), जद (यू) (20), तृणमूल (18), लेफ्ट (24), द्रमुक (18), बीजद (14), अन्ना द्रमुक (9), शिवसेना (11) और तेदेपा (6) सांसद। सरकार के साथ कांग्रेस के 207 और एनसीपी के 9 सांसद हैं। अगर कल को वोटिंग की नौबत आई तो कुछ भी हो सकता है। सरकार गिर भी सकती है। प्रधानमंत्री पता नहीं यह क्यों नहीं समझ रहे कि उनके साथ तो उनके गठबंधन सहयोगी भी नहीं हैं। प्रधानमंत्री की तमाम कोशिशों के बावजूद तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने दो टूक कह दिया है कि उनकी पार्टी इस फैसले का समर्थन नहीं कर सकती। हालांकि ममता ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी संप्रग सरकार को गिराने के पक्ष में नहीं है। तृणमूल कांग्रेस ही क्यों, हमें नहीं लगता कि कोई भी विपक्षी दल इस समय संप्रग सरकार को गिराने में दिलचस्पी रखता है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। कोई भी दल देश को मध्यावधि चुनाव में घसीटना नहीं चाहेगा। हां, पर सरदार मनमोहन सिंह ने अपनी जिद्द को पूरा करने के लिए पूरे देश को, अपनी सरकार व अपनी पार्टी को दाव पर जरूर लगा दिया है। यह कहावत है न `सनम हम तो डूबेंगे तुम्हें साथ ले डूबेंगे' फिट बैठती है। जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है वह दिन-रात लोकसभा में आंकड़े पूरे करने में लग गई है। कल को अगर वोटिंग की नौबत आए तो सरकार को बचाने के लिए उसके पास पर्याप्त सांसद संख्या होनी चाहिए और यह नौबत केवल एक आदमी की हठधर्मिता के कारण आएगी।
Anil Narendra, Bhanwri Devi, CBI, Daily Pratap, Mhipal Maderna, Rajasthan High Court, Sex, Sex Scandal, Vir Arjun

Saturday, 19 November 2011

पेट्रोल कीमतों पर सरकारी दलीलों का पर्दाफाश



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th November 2011
अनिल नरेन्द्र
महज एक पखवाड़े में पेट्रोल की बढ़ी कीमतें वापस होना अगर चमत्कार नहीं तो आश्चर्यजनक जरूर है। पिछले 33 महीनों में यह सिर्प दूसरा मौका है जब पेट्रोल की खुदरा कीमतों में कटौती की गई है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कटौती क्यों की गई है? और कि पेट्रो पदार्थों पर आखिर नियंत्रण किसका है? कांग्रेस पार्टी इसका पूरा श्रेय लेने के चक्कर में है। क्या उत्तर प्रदेश में चुनावी अभियान की शुरुआत कर चुके कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को केंद्र सरकार हर तरह का समर्थन कर रही है? यही वजह है कि राहुल के अभियान शुरू करने के एक दिन बाद ही सरकारी तेल कम्पनियों ने राहत देते हुए पेट्रोल की खुदरा कीमत में सवा दो रुपये तक की कटौती का ऐलान किया। संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने जा रहा है। शायद सरकार ने सोचा हो कि दबाव कम किया जाए। फिर पब्लिक का विरोध भी सरकार को भारी पड़ रहा था। पब्लिक के साथ सरकार के सहयोगी दल खासकर तृणमूल कांग्रेस का दबाव भी एक कारण जरूर रहा। अब सवाल यह है कि आखिर पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों पर नियंत्रण किसका है? यूपीए सरकार से जब कीमत बढ़ाने की सफाई मांगी गई थी तो उसके प्रतिनिधि के रूप में वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि पिछले साल जून में हुए डिरेग्यूलेशन के बाद पेट्रोल की कीमतें तय करने का अधिकार पूरी तरह से ऑयल मार्केटिंग कम्पनियों के पास चला गया है। खुद प्रधानमंत्री ने विदेश से इस बारे में टिप्पणी की थी कि पेट्रोल तो पेट्रोल, धीरे-धीरे सारी ही चीजों की कीमतें तय करने का काम पूरी तरह बाजार पर छोड़ना उनकी सरकार की मुख्य प्राथमिकता है। यही नहीं, डॉ. मनमोहन सिंह ने यहां तक कहा था कि बढ़ी हुई पेट्रोल की कीमतें कम नहीं होंगी? ऐसे में यह चमत्कार आखिर कैसे हुआ कि ऑयल मार्केटिंग कम्पनियां (ओएमसी) पेट्रोल के दाम हाल की बढ़त के पहले वाले स्तर से भी थोड़ी नीचे लाने को तैयार हो गई? इन कम्पनियों के आला अफसरों का कहना है कि ऐसा उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और डालर के मुकाबले रुपये के रुझान को दखते हुए किया है। इन दोनों रुझानों को गौर से देखें तो लगेगा कि इस फैसले के पक्ष में इससे ज्यादा लचर दलील और कोई हो ही नहीं सकती। डालर के मुकाबले रुपया फिलहाल पिछले 33 महीनों के सबसे निचले स्तर पर चल रहा है। लिहाजा ओएमसी मैनेजरों के लिए इस मोर्चे पर कुछ कहने की जगह ही नहीं बनती। कच्चे तेल की कीमतों में कुछ न कुछ घट-बढ़ रोज रहता है, लेकिन इस बाजार के विश्लेषकों का कहना है कि पिछले एक पखवाड़े में भारत के लिए इसकी औसत कीमत 108 से बढ़कर 110 डालर प्रति बैरल हो गई। जाहिर है कि पेट्रोल की कीमतें बाजार के किसी रुझान के तहत नहीं बल्कि राजनीतिक दबावों के चलते नीचे आई है और सरकार ने ऐसा करके अपने आपको एक्सपोज ही किया है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट की दलील बेतुकी लगती है। जून 2010 में पेट्रोल मूल्य नियंत्रण मुक्त किए जाने के बाद से कीमतों में लगभग 23 रुपये का इजाफा हुआ है इसलिए यह कमी `ऊंट के मुंह में जीरा' के समान ही है। वैसे देखा जाए तो पिछले डेढ़ साल में पेट्रोल की कीमतों में 13 बार वृद्धि की गई है जबकि कमी पिछले 33 महीनों में पहली बार की गई है। हकीकत तो यह है कि चौतरफा दबाव को देखते हुए यूपीए सरकार बौखला गई। इस दबाव को देखकर कांग्रेस आला कमान और सरकार ने देरी से ही सही आत्ममंथन तो किया कि महंगाई के मुद्दे पर पहले ही पार्टी की काफी किरकिरी हो चुकी है। ऐसे में पेट्रोल मूल्यों में वृद्धि उसे विधानसभा चुनावों में कहीं नुकसान न पहुंचा दे। इन हालात को देखते हुए केंद्र सरकार हरकत में आई और उसने पेट्रोल कम्पनियों पर कीमत कम करने का दबाव बनाया। वैसे यह सब नाटक था क्योंकि इंडियन ऑयल के चेयरमैन पहले ही कह चुके थे कि अगर सरकार कहे तो हम कीमतें घटाने को तैयार हैं। कुल मिलाकर सरकार की इस दलील की एक झटके में हवा निकल गई कि सरकार का पेट्रो पदार्थों की कीमतों पर कोई नियंत्रण नहीं और साथ-साथ यह भी साबित हो गया कि सरकार ने पेट्रोल की कीमतों में यह कमी सिर्प मतदाताओं को खुश करने की खातिर की है और चुनाव प्रक्रिया खत्म होते ही तेल कम्पनियों को खुश करने के लिए कीमतों में दोगुनी वृद्धि की जा सकती है।
Anil Narendra, Daily Pratap, Petrol Price, Prime Minister, Trinamool congress, UPA, Vir Arjun

Thursday, 10 November 2011

ममता बनर्जी से ऐसी नौटंकी की उम्मीद नहीं थी



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10th November 2011
अनिल नरेन्द्र
यह बहुत दुःख की बात है कि तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री अब दबाव और ब्लैकमेलिंग की राजनीति पर उतर आई है। पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी पर ममता की समर्थन वापस लेने की धमकी दरअसल समर्थन देने का मोल था। यह स्टाइल ममता का पुराना है और पेट्रोल के दामों से पैदा हुई राजनीतिक आग को ठंडा करने की कीमत 19 हजार करोड़ रुपये लगाई गई है। 4 नवम्बर को ममता ने कहा था कि हमारे समर्थन वापस लेने से सरकार गिर सकती है। लेकिन प्रधानमंत्री बाहर हैं, हम उनसे बातचीत करना चाहते हैं। उनसे मिलने के लिए समय मांगा है। दरअसल ममता का मकसद प्रधानमंत्री से सौदेबाजी करने का था। उन्हें पेट्रोल की बढ़ी कीमतों से कोई दिलचस्पी नहीं थी, यह तो महज एक दबाव बनाने का हथियार था। मंगलवार को तृणमूल कांग्रेस के सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की। प्रधानमंत्री ने इस प्रतिनिधिमंडल को पेट्रोल की कीमत में 1.80 पैसे की बढ़ोतरी वापस लेने पर कोई आश्वासन नहीं दिया। या यूं कहें कि प्रधानमंत्री ने एक तरह से प्रतिनिधिमंडल को मना कर दिया। करीब 45 मिनट चली बातचीत महज एक ड्रामा था और इस नाटकबाजी के बाद प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि हम सरकार से अभी नहीं हटेंगे पर हम बढ़ोतरी के सख्त खिलाफ हैं। मीडिया में एलपीजी और डीजल के डी कंट्रोल को लेकर आ रही खबरों पर भी डेलीगेशन ने पीएम से सवाल करके विरोध जताया पर पीएम ने इस मसले पर कोई जानकारी होने से मना कर दिया। उधर कोलकाता में ममता ने प्रणब मुखर्जी ने मुलाकात की। उन्होंने कहा कि अगर पेट्रो पदार्थों के दाम फिर बढ़ाए गए तो मेरी पार्टी यूपीए सरकार में नहीं रहेगी। बढ़ोतरी वापस लेने का आश्वासन देने के बजाय पीएम ने तृणमूल सांसदों को इस फैसले की बारीकियां समझाईं। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि स्थिति को देखते हुए सरकार डीजल से सरकारी नियंत्रण हटाएगी। डीजल को डी कंट्रोल करना यूपीए के आर्थिक एजेंडे में है। सांसदों ने जब उनसे पेट्रोल के दाम बढ़ाने के फैसले पर तृणमूल को अनजान रखने की बात की तो पीएम ने कहा कि कम्पनियां अपना निर्णय बेशक सरकार को बताती हैं, मगर यह औपचारिकता होती है। वे फैसला लेने को आजाद हैं। हालांकि जब भी कम्पनियां दाम बढ़ाने को लेकर हमसे बात करेंगी हम सहयोगियों को जानकारी देंगे। पेट्रोल की बढ़ी कीमतें तो वापस नहीं होंगी पर हां इस चक्कर में पश्चिम बंगाल की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए ममता दीदी को केंद्र से 19 हजार करोड़ रुपये का पैकेज जल्द मिलने की सम्भावना है। कोलकाता में सीएम ममता बनर्जी ने वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी से बैठक के बाद कहा कि पश्चिम बंगाल की आर्थिक स्थिति काफी बदहाल है। इसे पटरी पर लाने के लिए राज्य को केंद्र सरकार से वित्तीय सहायता की जल्द जरूरत है। फिलहाल उन्होंने केंद्र सरकार से 19 हजार करोड़ रुपये की सहायता मांगी है। जब केंद्र सरकार खुद पेट्रोल के मूल्यों को लेकर राजनीति करेगी तो वह अपने घटक दलों को ऐसा न करने की नसीहत नहीं दे सकती। यदि ममता बनर्जी पेट्रोल के मूल्यों में वृद्धि पर अपनी नाराजगी के जरिये केंद्र सरकार से आर्थिक पैकेज हासिल करना चाहती हैं तो इसके लिए एक हद तक खुद केंद्र जिम्मेदार है। ममता बनर्जी को अपने राज्य की समस्याओं से मुक्ति के लिए केंद्रीय पैकेज की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन उसे हासिल करने के लिए उनकी ओर से जो तरीका अपनाया जा रहा है वह सौदेबाजी की राजनीति के अलावा कुछ नहीं।
Anil Narendra, Daily Pratap, Mamta Banerjee, Manmohan Singh, Petrol Price, Trinamool congress, Vir Arjun, West Bengal

Tuesday, 24 May 2011

34 साल बाद ईश्वर लौटे राइटर्स बिल्डिंग में

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

 Published on 24th May 2011
अनिल नरेन्द्र
पश्चिम बंगाल में शुक्रवार को पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेकर ममता बनर्जी ने एक नए युग की शुरुआत की। 34 साल बाद भगवान पश्चिम बंगाल में लौटे। ममता ने शुक्रवार को दोपहर ठीक 1ः01 बजे ईश्वर के नाम पर शपथ ली। इससे पहले वाम मोर्चा के मंत्रियों ने 34 साल के शासन में भगवान का नाम नहीं लिया और शपथ हमेशा संविधान के नाम पर ही ली जाती रही। आखिर इस समय
1 बजकर 1 मिनट के पीछे क्या खास बात है? ज्योतिषियों का कहना है कि यह समय ममता बनर्जी के लिए शुभ है जो उन्हें पांच साल की पारी पूरी कराएगा, थोड़ा सतर्प रहते हुए। अपने शपथ ग्रहण समारोह के बाद जनभावनाओं का ध्यान रखते हुए परम्परा तोड़कर ममता बनर्जी राजभवन से राइटर्स बिल्डिंग (मुख्यमंत्री) तक जुलूस के साथ पैदल गईं। उनके समर्थकों की भीड़ देखते हुए राइटर्स बिल्डिंग के सभी गेट खोल दिए गए। राजभवन में दोपहर ठीक एक बजकर एक मिनट पर राज्यपाल एमके नारायणन ने ममता को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। अपनी ट्रेड मार्प साड़ी, रबड़ की चप्पल और सफेद सूती शाल पहनें ममता ने बंगला में ईश्वर के नाम पर शपथ ली। वाम मोर्चा राज में राजनीतिक हिंसा के शिकार हुए परिवारों के लोगों को खासतौर पर बुलाया गया था। ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास से राजभवन तक एक किलोमीटर के रास्ते में दोनों ओर जमा भीड़ उनके समर्थन में नारे लगा रही थी। समर्थक शंखध्वनि कर रहे थे और फूल बरसा रहे थे। भीड़ की वजह से ममता बनर्जी को राजभवन पहुंचने में आधा घंटा लगा। समारोह के दौरान राजभवन के बाहर खड़ी भीड़ ममता के समर्थन में नारे लगाती रही।
ममता ने अपनी 43 सदस्यीय मंत्रिपरिषद में अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और महिलाओं यानि समाज के सभी वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया है। यों कहने को तो किताबी सिद्धांतों के अनुसार वाम मोर्चा के रूप में पश्चिम बंगाल में सर्वहारा वर्ग का शासन था लेकिन ममता बनर्जी का शपथ ग्रहण समारोह देखकर कहा जा सकता है कि व्यवहारिक रूप से सर्वहारा शासन अब स्थापित हुआ है। 1977 में पहली बार वाम मोर्चा सरकार बनने पर उसके मुख्यमंत्री ज्योति बसु से अपमान का बदला 18 वर्ष बाद ममता ने लिया। ममता ने तब कसम खाई थी कि वे अब राज्य की मुख्यमंत्री के रूप में ही राइटर्स बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़ेंगीं। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन के जरिये जनता में अपनी पैठ बनाने वाली ममता का सपना पूरा हुआ। वे राज्य में 11वीं मुख्यमंत्री बनीं। लगभग ढाई दशक तक पश्चिम बंगाल में जिस वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ ममता ने निरन्तर संघर्ष किया, उस मोर्चे के शीर्ष नेताओं को शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित कर ममता ने राजनीतिक भद्रता के साथ यह भी संकेत दिया कि वे टकराव के नहीं मेल-मिलाप और संवाद के रास्ते पर चलेंगी। ममता ने अपने शपथ ग्रहण में नंदीग्राम, नेताई और सिंगूर के आंदोलन में मारे गए लोगों के परिजनों के अलावा विशिष्ठ अतिथियों के रूप में सोनागाछी की सेक्स वकर्स और रिक्शा चालकों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित कर आश्वस्त किया कि वे अब वाकई एक नए बंगाल बनाने के लिए काम करेंगी। ममता के सामने चुनौतियों का अम्बार है। हिंसा और वित्तीय मोर्चे पर हालात काबू से बाहर बताए जा रहे हैं। राजकोष खाली है। पूरी गाड़ी ही पटरी से उतरी हुई है। गाड़ी को वापस पटरी पर लाना आसान काम नहीं होगा। ममता बनर्जी की शानदार सफलता पर हमारी बधाई और उम्मीद है कि शायद अब उनके नेतृत्व में प. बंगाल की किस्मत संवरे।
Tags: Anil Narendra, Cpi, CPM, Daily Pratap, Mamta Banerjee, Trinamool congress, Vir Arjun, West Bengal

Tuesday, 17 May 2011

परिणाम कांग्रेस के लिए ज्यादा खुशी-कम गम लेकर आए हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

Publish on 17 May 2011
अनिल नरेन्द्र
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए थोड़ी खुशी थोड़ा गम लेकर आए हैं। खुशी इसलिए कि तमिलनाडु और उसके पड़ोसी केंद्र शासित क्षेत्र पुडुचेरी को छोड़कर कांग्रेस और उसके गठबंधन का परचम हर जगह लहराया है। वहीं केंद्र में मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी का इन पांच राज्यों में तकरीबन सूपड़ा साफ हो गया है। पार्टी के लिए सबसे ज्यादा राहत असम से है जहां उसने न केवल तीसरी बार सत्ता में वापसी की है बल्कि पिछली बार से भी ज्यादा सीटें हासिल की हैं। केरल में उसके नेतृत्व वाला यूडीएफ सत्ता में जरूर पहुंचा है लेकिन मामूली बढ़त के साथ जहां उसकी नैया कभी भी डूब सकती है। बंगाल में पूरी जीत ममता बनर्जी की है जबकि तमिलनाडु जहां 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला बड़ा मुद्दा था वहां उसका तथा द्रमुक का सूपड़ा साफ हो गया है। पुडुचेरी भी कांग्रेस के हाथ से निकल गया और सबसे खतरनाक समाचार कांग्रेस के लिए आंध्र प्रदेश से आया है जहां अपने सबसे बड़े गढ़ में हुए उपचुनाव में उसके बड़े नेता बुरी तरह हारे हैं बल्कि उसके बागी नेता जगन मोहन रेड्डी तथा उनकी मां को भारी जीत मिली है।
अगर केंद्रीय भावी राजनीति को देखें तो पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का अकेला बहुमत पा जाना कांग्रेस और यूपीए नेतृत्व के लिए दिक्कत खड़ी कर सकती है। ममता का अब यूपीए सरकार में न केवल दबदबा बढ़ जाएगा बल्कि उसकी बार्गेनिंग पॉवर भी ज्यादा हो जाएगी। यही हाल जयललिता का भी होगा। जयललिता की बार्गेनिंग शक्ति के बारे में तो कांग्रेस को अच्छा अनुभव है। ममता ने कांग्रेस को पश्चिम बंगाल सरकार में शामिल होने को कहा है। अब सरकार में शामिल होने का फैसला कांग्रेस को करना है। वैसे देखा जाए तो उसके पास हां कहने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं है। अगर केंद्र सरकार में यदि दोनों पार्टियां शामिल हैं तो पश्चिम बंगाल में क्यों नहीं? कांग्रेस के कुछ नेताओं की मानें तो ममता की भारी जीत ने कांग्रेस की रणनीति कुछ समय के लिए पंचर कर दी है। कुल मिलाकर राज्य और केंद्र, दोनों की राजनीति के हिसाब से तृणमूल का ग्रॉफ इस समय काफी ऊंचा है।
इन पांच राज्यों के नतीजों को कांग्रेस नेतृत्व ने लीग मैच मानते हुए अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड के क्वार्टर फाइनल की तैयारी शुरू कर दी है। नतीजों की समीक्षा और आगे की रणनीति बनाने के लिए बैठकों के दौर आरम्भ हो चुके हैं। सूत्रों के मुताबिक सरकार में जहां बंगाल के नतीजे प्रणब मुखर्जी की ताकत में इजाफा कर सकते हैं वहीं तमिलनाडु में कांग्रेस की दूरदर्शी पी. चिदम्बरम के महत्व पर सवाल खड़े कर सकती है। ममता के मुख्यमंत्री बनने से खाली होने वाले रेल मंत्रालय की कमान किसी को सौंपने के साथ-साथ कई वरिष्ठ मंत्रियों के विभागों में फेरबदल करके सरकार और संगठन को अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड और आखिर में गुजरात और हिमाचल चुनावों के लिए तैयार करना कांग्रेस नेतृत्व की अब प्राथमिकता होनी चाहिए। कुल मिलाकर यही निष्कर्ष निकलता है कि इन पांच राज्यों के परिणाम कांग्रेस के लिए ज्यादा खुशी और कम गम लेकर आए हैं।

Sunday, 15 May 2011

ममता की 18 साल पहले ली शपथ पूरी हुई

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

प्रकाशित: 15 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
18 साल पहले जब बलात्कार की शिकार एक गरीब युवती को लेकर ममता बनर्जी ज्योति बसु (तत्कालीन मुख्यमंत्री) से न्याय मांगने गईं तो पुलिस ने उनका उत्पीड़न किया। उसी रात ममता ने शपथ ली कि जब तक वाम मोर्चा सरकार को उखाड़ नहीं फेंकती हैं तब तक अपने केश नहीं बांधेंगी। अब ममता अपने केश बांध सकती हैं, उनकी शपथ पूरी हुई। प. बंगाल में वाम मोर्चा साफ हो गया है। परिवर्तन के रथ पर सवार ममता ने वाम मोर्चा के 34 साल पुराने लाल दुर्ग को ध्वस्त कर दिया है और ऐसा करके इतिहास रच दिया है। प्रदेश की जनता को इसी ऐतिहासिक पल का इंतजार था लेकिन इस पल का सबसे अधिक इंतजार ममता को था। 15वीं पश्चिम बंगाल विधानसभा भारी बहुमत के साथ ममता बनर्जी के नेतृत्व में गठित होगी और तीन दशक से अधिक समय तक सत्ता में रहने वाले वाम मोर्चा को विपक्ष में बैठना पड़ेगा। 294 सदस्यीय विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस को 184 पर जीत के साथ अपने बलबूते पर स्पष्ट बहुमत हासिल हुआ है। तृणमूल की सहयोगी कांग्रेस को 42 सीटों पर जीत हासिल हुई है। वाम मोर्चा में सबसे ज्यादा नुकसान माकपा को हुआ है जिसको मुश्किल से 40 सीटें ही मिलीं जबकि सहयोगी फारवर्ड ब्लॉक को 11, आरएसपी को सात, भाकपा को 2 सीटें ही मिल सकीं। निर्दलियों और अन्य ने सात सीटों पर जीत हासिल की। अन्य में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा भी शामिल है, जिसे दार्जीलिंग जिले में तीन सीटों पर जीत हासिल हुई। समाजवादी पार्टी को भी एक सीट मिली जबकि भाजपा का खाता नहीं खुल सका।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) का तबसे पतन शुरू हुआ जब से सचिव प्रकाश करात ने कमान सम्भाली है। बड़े-बड़े नेताओं को बेइज्जत करना अब पार्टी में आम बात हो गई है। केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री अच्युतानन्द रहे हों या लोकसभा के पूर्व स्पीकर सोमनाथ चटर्जी, इनकी अपनी ही पार्टी ने बेइज्जत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बंगाल में कुशासन, सत्तासीन वाम पार्टियों में निचले स्तर पर फैला भ्रष्टाचार और जन समस्याओं की अनदेखी इसके पतन के कारण रहे। जनता ने निर्णायक जनादेश दिया है। उसने ममता को इतना बहुमत दिया है कि वे अपने दम-खम पर अकेले सरकार बना सकेंगी। ममता बनर्जी और जयललिता के अपने-अपने राज्यों में मुख्यमंत्री बनने से यह पहला मौका होगा जब दश के चार प्रदेशों में महिला मुख्यमंत्री होंगी। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पिछले 12 साल से इस शीर्ष पद पर आसीन हैं और वह सबसे अधिक समय से पद पर बनी रहने वाली महिला मुख्यमंत्री हैं। उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं अगर मायावती दोबारा चुनाव जीत लेती हैं तो वह भी लगातार 10 साल राज करेंगी। स्वतंत्र भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी थीं जिन्होंने 1960 के दशक में उत्तर प्रदेश की बागडोर सम्भाली थी। ममता की जीत से केंद्र सरकार में भी फेरबदल होगा, क्योंकि ममता सहित तृणमूल के मंत्री शायद अब अपने राज्य में चले जाएं। नया रेलमंत्री तो जरूर होगा, क्योंकि ममता ने हमेशा से राइटर्स बिल्डिंग का चार्ज चाहा है। उनका यह सपना पूरा हो गया है। प. बंगाल में कॉमरेडों की हार से दुनिया में वाम विचारधारा वाली सरकारों का लगभग सफाया हो गया है। बंगाल ही सबसे बड़ा गढ़ बचा था। चीन जैसे इक्का-दुक्का देशों को छोड़ दें तो दुनिया में वाम विचारधारा का अन्त हो गया है।

Friday, 13 May 2011

34 साल के बाद वाम मोर्चा का सफाया लगभग तय लगता है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

प्रकाशित: 13 मई 2011
अनिल नरेन्द्र

आमतौर पर चुनाव परिणामों के बारे में दावे से तो कुछ नहीं कहा जा सकता पर मतदान होने के बाद राजनीतिज्ञ, चुनाव विश्लेषकों व विशेषज्ञों को इतना अहसास हो जाता है कि हवा किस रुख चली है। वैसे आजकल तो चुनाव बाद सर्वेक्षण भी आ जाते हैं। हालांकि यह कभी-कभी बहुत गलत साबित होते हैं पर आमतौर पर 70-80 प्रतिशत सटीक बैठते हैं। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव बाद और मतगणना पूर्व सर्वेक्षणों के मुताबिक पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की आंधी से तीन दशक से भी पुराने वाम मोर्चा शासन का किला ढहने के संकेत हैं। प. बंगाल विधानसभा चुनाव के छठे और अंतिम चरण में मंगलवार को 85 प्रतिशत मतदान हुआ 13 मई को नतीजे घोषित होंगे। एक्जिट पोल के मुताबिक तृणमूल और कांग्रेस गठबंधन को राज्य में 210 से 220 सीटें मिलने की संभावना है। वहीं 34 साल से लगातार सत्ता में रहने वाला वाम मोर्चा सिर्प 62 से 65 सीटों तक सिमट सकता है। ममता बनर्जी के जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य पूरा होने जा रहा है। वह पश्चिम बंगाल की अगली मुख्यमंत्री बनने जा रही हैं। कांग्रेस के लिए केरल से भी अच्छी खबर है। यहां कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ की सरकार बन सकती है। वहीं तमिलनाडु और असम के बारे में टीवी चैनलों की राय बंटी हुई है। हालांकि असम में विपक्ष के बिखराव की वजह से कांग्रेस की मजबूत स्थिति मानी जा रही है। वहीं स्टार न्यूज ने तमिलनाडु में डीएमके-कांग्रेस गठबंधन को सत्ता के करीब बताया है जबकि सीएनएन-आईबीएन ने एआईडीएमके को ज्यादा सीटों की भविष्यवाणी की है। तमिलनाडु में कांटे की टक्कर है। ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है। प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी की इन राज्यों में न के बराबर मौजूदगी है।
कांग्रेस सावधानी से चल रही है। दरअसल कांग्रेस चुनाव परिणामों को लेकर ज्यादा उत्साहित नजर नहीं आ रही। इसीलिए उसने कहना शुरू कर दिया है कि हम इन चुनाव को केंद्र सरकार के लिए जनादेश नहीं मानते। यह चुनाव स्थानीय आधार पर लड़े गए हैं। दरअसल कांग्रेस को चुनाव परिणामों से मिलीजुली तस्वीर उभरने के आसार लग रहे हैं। अगर प. बंगाल में ममता की भारी जीत होती है और तमिलनाडु में द्रमुक की हार तो इसका सीधा असर मनमोहन सरकार पर पड़ सकता है। ममता की भारी जीत भी कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बजाती है क्योंकि यदि ममता राइटर्स बिल्डिंग में बिना कांग्रेस मदद के पहुंच गई तो वे अपनी आदत के मुताबिक केंद्र सरकार को पग-पग पर ब्लैकमेल करेंगी। जैसा कि उसने पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को लेकर होने वाली वृद्धि को लेकर किया है। वहीं यदि तमिलनाडु में यदि संभावना के मुताबिक द्रमुक की हार हो जाती है तो वह बौखला कर केंद्र सरकार से हट सकती है। क्योंकि अपने नेताओं पर सीबीआई के लगातार कस रहे शिकंजे से वह पहले ही काफी क्षुब्ध है। ऐसे में यदि चुनावी नतीजों ने उन्हें झटका दे दिया तो वे केंद्र को भी झटका दे सकती है। वहीं दूसरी ओर केरल और असम में जहां कांग्रेस अपने लिए काफी संभावनाएं लेकर चल रही है वहां भी कांटे की टक्कर की भविष्यवाणी ने पार्टी के माथे पर बल डाल दिया है। पुडुचेरी में कांग्रेस पहले से ही हार मान चुकी है। वैसे भी इसका कोई खास महत्व नहीं है। देखें 13 मई को मतपेटियों में क्या भरा है?

Wednesday, 20 April 2011

34 साल के शासन को दीदी की चुनौती से लेफ्ट हलकान

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

प्रकाशित: 20 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र

सोमवार को पश्चिम बंगाल के छह उत्तरी जिलों की 54 विधानसभा सीटों पर पहले चरण का मतदान हो गया। पहले चरण के इस मतदान में 74.27 फीसदी मतदान हुआ। इस दौरान कहीं से भी किसी बड़ी अप्रिय घटना का समाचार नहीं है। यह विधानसभा चुनाव वाम मोर्चा के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे ने 21 जून 1977 को सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ली थी और सत्ता में लगातार बने रहते हुए 34 साल पूरे होने को आ गए हैं। इस उपलब्धि के साथ ही प. बंगाल में लेफ्ट फ्रंट की सरकार ने लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता में बनी रहने वाली सबसे लम्बी कम्युनिस्ट सरकार का रिकार्ड बना लिया है। लेकिन इन विधानसभा चुनावों में इसी बात को इस मोर्चे की सबसे बड़ी कमजोरी भी बताया जा रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो पूरे राज्य में एक सत्ता विरोधी लहर दौड़ रही है जो सत्ताधारी सीपीएम की गले की फांस बन गई है। हालांकि मार्क्सवादी नेताओं ने 2009 में जारी एक पार्टी दस्तावेज में इन मुद्दों को उठाया और पार्टी नेतृत्व ने इस बात को स्वीकार किया है कि उनके परम्परागत वोटर अब उनकी नीतियों से विमुख हो रहे हैं। सत्ताधारी पार्टी के समक्ष मुस्लिम मतदाताओं को अपने खेमे में बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। पिछले चुनावी नतीजों और अल्पसंख्यकों के इलाकों का आकलन करने के बाद पता चलता है कि कुल 214 सीटों में से 75-77 सीटें ऐसी हैं जहां उन्हीं की जीत की सम्भावना है जहां मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन मिलेगा। इन चुनावों में ऐसा ही कहा जा रहा है कि एक लम्बे समय तक लेफ्ट का समर्थन करते रहने के बाद अब ज्यादातर मुस्लिम मतदाताओं ने अपना समर्थन बन्द कर दिया है। साथ ही लेफ्ट पार्टी के अपने धड़ों में और खासतौर से एसएफआई जैसे छात्र संगठनों में अब मनमुटाव खुलकर सामने आने लगे हैं। पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिवेश में सत्ताधारी वाम नेताओं के जनता को नजरंदाज करने वाले रवैये की भी इन चुनावों में एक महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी ने अपने करिश्में से वाम मोर्चा की नींद उड़ा रखी है। एकजुट विपक्ष की एक मात्र नेता बनकर उभरी ममता बनर्जी को लेकर गांवों और शहरों में काम करने वालों में बराबर का उत्साह है। ममता की पार्टी के खिलाफ माओवादियों के एक गुट द्वारा दिए गए फरमान भी उन इलाकों में वोट काट सकते हैं जो झारखंड राज्य से सटे हुए हैं पर इन सबके बावजूद लेफ्ट फ्रंट का चुनाव जीतना बहुत मुश्किल लग रहा है। अगर बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में वाम मोर्चा चुनाव जीत गया तो प. बंगाल के चुनावी इतिहास में यह सबसे महत्वपूर्ण घटना होगी। चुनाव पूर्व दो सर्वेक्षणों की मानें तो तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिल रहा है। ओआरजी द्वारा हेडलाइंस टुडे समाचार चैनल के लिए किए ए सर्वेक्षण के मुताबिक तृणमूल-कांग्रेस गठबंधन को 182 सीटें मिलेंगी जो कि बहुमत के लिए जरूरी 148 सीटों से काफी अधिक है जबकि वाम मोर्चा को 101 सीटें मिलेंगी जो 2006 के चुनाव की तुलना में 126 कम है। बाकी तो मतपेटियां खुलने के बाद ही पता लगेगा।