पेट्रोल कीमतों का खेल जिस तरह से हो रहा है उसका रंग पूरा फिल्मी है। कैसे सरकार दाम बढ़ाती है और फिर कैसे कम करती है। 1984 में राजेश खन्ना की एक फिल्म `आज का एमएलए राम अवतार' आई थी। इस फिल्म में भी कुछ ऐसा ही प्रसंग था। जब एक कम्पनी के लोग एमएलए के पास पहुंचते हैं और कहते हैं कि वह अपने प्रोडक्ट के दाम दो रुपये बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन डर है कि जनता भड़क जाएगी। तब एमएलए कहता है कि दो रुपये नहीं पांच रुपये बढ़ाओ। जब जनता नाराज होगी तो दो रुपये कम कर देना। तीन में से दो रुपये तुम्हारा घाटा पूरा कर देंगे और बचा हुआ एक रुपया हमारा। ठीक यही हाल इस सरकार का है। आम आदमी के जबरदस्त आक्रोश और राजनीतिक दलों के चौतरफा दबाव में भले ही सरकारी तेल कम्पनियों ने पेट्रोल मूल्य में दो रुपये कटौती कर दी हो लेकिन यह राहत काफी नहीं है। पहले 7.50 रुपये प्रति लीटर बढ़ा फिर आंसू पोछने के लिए इसमें से दो रुपये घटा दो। अब तो खुद कांग्रेसी मंत्री भी मूल्य वृद्धि को गलत बता रहे हैं। पेट्रोल मूल्य वृद्धि का विरोध करने वाले केंद्रीय मंत्री एके एंटनी के साथ शनिवार को एक और कैबिनेट मंत्री का नाम जुड़ गया। प्रवासी भारतीय मामलों के मंत्री व्यालार रवि ने पेट्रोल वृद्धि को अनुचित बताते हुए तेल कम्पनियों के घाटे के दावे को झूठा बताया। उन्होंने तेल मंत्री जयपाल रेड्डी से कहा है कि भविष्य में और किसी वृद्धि का निर्णय लेने से पहले उस पर गौर करें। रेड्डी को लिखे पत्र में तेल कम्पनियों द्वारा भारी घाटा होने के दावे पर सवाल उठाया है व रेड्डी को उनके इस दावे की विस्तार से छानबीन करने को भी कहा है। इससे पहले रक्षा मंत्री एके एंटनी ने बुधवार को पेट्रोल मूल्यों की आलोचना की थी। रवि ने पत्र में लिखा है कि तेल कम्पनियां एक ओर तो घाटे में चलने की बात करती हैं वहीं दूसरी ओर सच्चाई तो यह है कि तेल कम्पनियों का खर्च व उनका वेतन भारत के सर्वाधिक खर्च वाली कम्पनियों में शामिल है। ऐसा समझा जाता है कि तेल कम्पनियां पैसा बर्बाद कर रही हैं। दरअसल स्थिति यह है कि कांग्रेस संगठन और कार्यकर्ताओं में पेट्रोल की बेतहाशा बढ़ती कीमतों से बहुत गुस्सा है और इनके निशाने पर हैं पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी। कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा कहता है कि इन्दिरा गांधी और राजीव गांधी के प्रबल विरोधी रहे जयपाल रेड्डी को कांग्रेस के राजनीतिक भविष्य की परवाह नहीं है। इन कांग्रेसी नेताओं का आरोप है कि जयपाल का कांग्रेस से कोई लगाव नहीं है, क्योंकि वह पार्टी छोड़कर कांग्रेस विरोधी खेमों की पतवार थामकर ही राजनीति में यहां तक पहुंचे हैं। कुछ कांग्रेसी दबी जुबान से यह भी कहते हैं कि जयपाल रेड्डी इन दिनों ज्यादा वक्त उपराष्ट्रपति पद के लिए सियासी लॉबिंग में बिताते हैं। जयपाल की कोशिश है कि उनके गैर-कांग्रेसी दलों के मित्र आम सहमति बनाकर उन्हें उपराष्ट्रपति पद तक पहुंचा दें। नाराज कांग्रेसियों का कहना है कि पेट्रोल की कीमतें बढ़ने पर जयपाल अपनी लाचारी जताकर सारा ठीकरा तेल कम्पनियों पर फोड़ देते हैं, लेकिन तेल कम्पनियों के प्रबंधन और देश को तेल जरूरतों को पूरा करने के लिए बतौर पेट्रोलियम मंत्री उन्होंने खुद क्या किया? कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि जब तेल कम्पनियों के शीर्ष प्रबंधन में नियुक्तियां पेट्रोलियम मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा की जाती हैं तो कैसे सरकार तेल कम्पनियों के कामकाज और फैसलों से पल्ला झाड़ सकती है। रेड्डी यह कहकर कैसे अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं कि कीमतें बढ़ाने का फैसला तेल कम्पनियों का है और वह उसमें कुछ नहीं कर सकते? नाराज कांग्रेसी कार्यकर्ता कहते हैं कि रेड्डी के बयान से जनता का गुस्सा और बढ़ जाता है जिसकी कीमत कांग्रेस को आने वाले चुनावों में चुकानी प़ड़ सकती है। कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं के इस वर्ग का मानना है कि जयपाल रेड्डी को न सरकार की छवि की चिन्ता है और न ही कांग्रेस के राजनीतिक भविष्य की फिक्र। उन्हें चिन्ता सिर्प अपने हितों की है। इसलिए जब वे शहरी विकास मंत्री थे तब कॉमनवेल्थ खेलों के लिए होने वाले निर्माण कार्यों में अरबों रुपये के घोटालों से आंखें मूंदे रहे और अब पेट्रोलियम मंत्री हैं तो पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती कीमतें जनता की कमर तोड़ रही हैं और कांग्रेस का ग्रॉफ तेजी से गिर रहा है। एक प्रमुख कांग्रेसी नेता का कहना है कि 1980 में जब इन्दिरा जी रायबरेली और मेढक दो जगह से लोकसभा चुनाव लड़ी थीं तब जयपाल रेड्डी उनके खिलाफ चुनाव लड़े थे। उस दौरान के अगर उनके भाषण निकाले जाएं तो जयपाल कांग्रेस के कितने भक्त हैं, पता चल जाएगा। विश्वनाथ प्रताप सिंह की अगुवाई वाले जनता दल में शामिल हुए इन्हीं जयपाल रेड्डी ने बोफोर्स मामले में राजीव और सोनिया गांधी के खिलाफ क्या कुछ नहीं बोला? कांग्रेस को अपने सच्चे वफादारों को पहचानना चाहिए और अपने राजनीतिक भविष्य की चिन्ता करनी चाहिए।
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Tuesday, 5 June 2012
Sunday, 27 May 2012
पेट्रोल कीमतें ः समझें इस सरकार के बहाने, छलावे और चालाकी...(2)
इस मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार की चालबाजियों, छल और इसके ही स्वामित्व की इन तेल कम्पनियों ने आज भारत में पेट्रोल दुनिया में सबसे महंगा पेट्रोल बना दिया है। आज की तारीख में दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 73.18 रुपये प्रति लीटर है। अन्य महानगरों में यह इससे भी ज्यादा है। अमेरिका जैसे देश में जहां आम आदमी की आमदनी हमसे बहुत ज्यादा है, में पेट्रोल 44.88 रुपये प्रति लीटर है। कराची में यह भाव 48.64 रुपये है। बीजिंग में 48.05 रुपये है, ढाका में 52.42 है, कोलम्बो में 61.38 है और नेपाल जैसे छोटे मुल्क में भी यह 65.26 रुपये प्रति लीटर है। पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि से और सारी वस्तुओं के दामों पर भी सीधा असर होता है। तेज रफ्तार शहरों की जीवन शैली और महंगी होगी। बाइक, कार, तिपहिये, टैक्सियां महंगी होंगी। टैक्सी वालों ने तो हड़ताल करने का नोटिस भी दे दिया है। जाहिर-सी बात है कि परिवहन सेवाएं प्रभावित होंगी। खुदरा मूल्य में उन वस्तुओं और सेवाओं के दाम बढ़ेंगे जिनमें पेट्रोल का इस्तेमाल होता है और इसका सीधा प्रभाव उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा। मुद्रास्फीति वृद्धि चौतरफा महंगाई का सूचकांक है। महंगाई सुरसा की तरह मुंह फैला रही है। अब इसमें और भी वृद्धि होगी। सही बात तो यह है कि हमारे देश में केंद्र और राज्य सरकारों ने तेल विपणन को भी खजाना भरने का जरिया बना लिया है। पेट्रोल पर तो करों का बोझ इतना है कि ग्राहकों से इसकी दोगुनी कीमत वसूली जाती है। ताजा बढ़ोतरी के बाद दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 73.18 रुपये है और जबकि तेल विपणन कम्पनियों के सारे खर्चों को जोड़कर पेट्रोल की प्रति लीटर लागत 30 रुपये के आसपास ठहरती है। केंद्र सरकार जहां कस्टम ड्यूटी के रूप में साढ़े सात फीसदी लेती है वहीं एडिशनल कस्टम ड्यूटी के मद में दो रुपये प्रति लीटर, काउंटरवेलिंग ड्यूटी के रूप में साढ़े छह रुपये प्रति लीटर, स्पेशल एडिशनल ड्यूटी के मद में छह रुपये प्रति लीटर, सेनवेट के मद में 6.35 रुपये प्रति लीटर, एडिशनल एक्साइज ड्यूटी दो रुपये प्रति लीटर और स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी के मद में छह रुपये प्रति लीटर लेती है। राज्य सरकारें भी वैट, सरचार्ज, सेस और एंट्री टैक्स के मार्पत तेल में तड़का लगाती है। दिल्ली में पेट्रोल पर 20 फीसदी वैट है जबकि मध्य प्रदेश में 28.75 फीसदी, राजस्थान में 28 फीसदी और छत्तीसगढ़ में 22 फीसदी है। मध्य प्रदेश सरकार एक फीसदी एंट्री टैक्स लेती है और राजस्थान में वैट के अलावा 50 पैसे प्रति लीटर सेस लिया जाता है। भारत दुनिया का अकेला देश है जहां सरकार की भ्रामक नीतियों के कारण विमान में इस्तेमाल होने वाले टरबाइन फ्यूल यानि एटीएफ पेट्रोल से सस्ता है। दिल्ली में पेट्रोल और एटीएफ की कीमतों में तीन रुपये का फर्प है और नागपुर जैसे शहर में तो एटीएफ पेट्रोल से सस्ता है। आर्थिक मामलों में किस तरह राजनीति है, इसका ताजा प्रमाण है पेट्रोल के मूल्य में साढ़े सात रुपये की भारी वृद्धि। केवल पेट्रोल महंगा करने का निर्णय इसकी गवाही देता है कि सरकार वोट बैंक प्रधान नीति के चलते शहरी उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है। ऐसा करके एक तरह से शहरी आबादी से वह भारी-भरकम सब्सिडी भी वसूल कर रही है जो डीजल, केरोसिन आदि पर दी जा रही है और जिसके बारे में यह पता है कि इसका बड़े पैमाने पर दुरुपयोग होता है। दरअसल इसी कारण वक्त की मांग के बावजूद डीजल, केरोसिन और रसोई गैस के दामों को बढ़ाने से सरकार कतराती है क्योंकि यह विपक्ष को छोड़ो उसके सहयोगी दलों को भी स्वीकार्य नहीं है और इसमें किसी भी प्रकार की वृद्धि से कांग्रेस पार्टी का वोट बैंक प्रभावित होगा। (समाप्त)
Anil Narendra, Daily Pratap, Manmohan Singh, Petrol Price, Vir Arjun
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Saturday, 26 May 2012
पेट्रोल कीमतें ः समझें इस सरकार के बहाने, छलावे और चालाकी...(1)
मैंने अनेक बार इसी कॉलम में लिखा है कि देश इस सरकार और मुट्ठीभर तेल कम्पनियों की धांधलियों को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। सरकार हर बार पेट्रोल के दाम बढ़ाकर अपना पल्ला यह कहकर नहीं झाड़ सकती कि हम क्या करें, यह फैसला तो तेल कम्पनियों का है। देश चाहता है कि इन तेल कम्पनियों की झूठी दलीलों और सरकार की बदनीयती का पर्दाफाश हो पर इससे पहले कि मैं तेल कम्पनियों की बकवास दलीलों की बात करूं, मैं चाहता हूं कि हम इस सरकार का सोचने के ढंग को समझें। अर्थशास्त्रियों और वकीलों से भरी पड़ी कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार पेट्रोल को अमीरों का ईंधन मान बैठी है। हकीकत यह है कि देश के 60 फीसदी से ज्यादा दुपहिया, तिपहिया वाहनों की बिक्री छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में होती है। महानगरों में निम्न मध्य वर्ग ही पेट्रोल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। किसी भी पेट्रोल कीमत की वृद्धि का सीधा असर इन वर्गों पर पड़ता है। इनकी आमदनी तो इतनी बढ़ी नहीं और खर्चे बेशुमार बढ़ते जा रहे हैं। यह अपना घर-बार कैसे चलाएं, क्या काम पर जाना छोड़ दें? क्या करें? जहां तक इन तेल कम्पनियों की बात है तो भारत की यह विडम्बना है कि 90 फीसदी तेल कारोबार पर सरकारी कम्पनियों का नियंत्रण है और सरकार की मानें तो ये कम्पनियां जनता को सस्ता तेल बेचने के कारण भारी घाटे में हैं। दूसरी ओर प्रतिष्ठित फार्च्यून पत्रिका के अनुसार दुनिया की आला 500 कम्पनियों में भारत की तीनों सरकारी कम्पनियांöइंडियन ऑयल (98), भारत पेट्रोलियम (271) और हिन्दुस्तान पेट्रोलियम (335) शामिल हैं। तेल और गैस उत्खनन से जुड़ी दूसरी सरकारी कम्पनी ओएनजीसी भी फार्च्यून 500 में 360वीं रैंक पर है। फिर हर साल यह प्रधानमंत्री को मोटे-मोटे शुद्ध लाभ के चेक भी भेंट करते हैं। आखिर यह कैसे सम्भव है कि सरकार घाटे का दावा कर रही है लेकिन तेल कम्पनियों की बैलेंसशीट खासी दुरुस्त है? 2011 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक इंडियन ऑयल को 7445 एचपीसीएल को 1539 और बीपीसीएल को 1547 करोड़ रुपये का फायदा हुआ है, वह भी टैक्स चुकाने के बाद। इस सच्चाई के बाद भी सरकार लगातार इन कम्पनियों के घाटे की झूठी दलीलें देने से बाज नहीं आ रही। हमें इस सरकार के बहानों, छलावे और चालाकी को समझना होगा। डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत की दलील दी जा रही है। तेल कम्पनियों का कहना है कि 80 प्रतिशत तेल विदेश से मंगाना पड़ता है और भुगतान डॉलर में करना पड़ता है। चूंकि एक डॉलर 56 रुपये का हो चुका है इसलिए ज्यादा कीमत देनी पड़ रही है। सच यह है कि 15 मई 2011 को जब पेट्रोल 5 रुपये महंगा हुआ था, तब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कूड ऑयल यानि कच्चा तेल 114 डॉलर प्रति बैरल था जबकि डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत थी 46 रुपये। इस हिसाब से हमें एक बैरल तेल के लिए 5244 रुपये चुकाने पड़ते थे। आज कूड 91.47 डॉलर प्रति बैरल है और एक डॉलर 56 रुपये का है। साफ है कि आज के भाव से एक बैरल तेल 5056 रुपया का है यानि कच्चा तेल 148 रुपये बैरल तब से सस्ता है। अब बात करते हैं कूड के नाम पर छलावे की। क्योंकि तेल कम्पनियों ने 26 जून 2010 (जब पेट्रोल नियंत्रण मुक्त हुआ था) को कहा था कि कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों को ध्यान में रखकर देश में पेट्रोल के दाम तय होंगे। सरकार और कम्पनियों ने मिलकर पिछले 2 साल में 14 बार महंगे कूड के नाम पर पेट्रोल के दाम बढ़ाए हैं। सच यह है कि पहले जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कूड का दाम 114 डॉलर प्रति बैरल था, तब भी तेल कम्पनियां घाटा बता रही थीं, आज कूड का भाव 91.47 डॉलर है तो भी घाटा हो रहा है। रुपये की गिरती कीमतें भी छलावा है। क्योंकि 15 मई 2011 से अब तक डॉलर 10 रुपये महंगा हुआ है और कच्चा तेल 22 डॉलर सस्ता हो चुका है। लेकिन इस दौरान पेट्रोल की कीमतों में सिर्प तीन बार मामूली कमी की गई। घाटे के नाम पर चालाकी ः क्योंकि सरकारी तेल कम्पनियों का कहना है कि पेट्रोल के अलावा सरकार के नियंत्रण में होने की वजह से डीजल, गैस और केरोसिन की कीमतें नहीं बढ़ने से भी उनका घाटा बढ़ा है। डीजल की कीमत आखिरी बार 26 जून 2011 को बढ़ी थी। तीनों कम्पनियों का दावा है कि उन्हें इस साल 1.86 लाख करोड़ रुपये का घाटा होगा। सच क्या है? सच यह है कि तेल कम्पनियां भारी मुनाफा कमा रही हैं। 2011 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक आईओसी को 7445 करोड़, एचपीसीएल को 1539 करोड़ और बीपीसीएल को 1547 करोड़ रुपया मुनाफा हुआ। वह भी टैक्स देने के बाद। डीजल, गैस और केरोसिन पर घाटे की बात भी झूठी है, क्योंकि सरकार इस पर सब्सिडी दे रही है। (क्रमश)
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Friday, 27 April 2012
और अब डीजल भी लगा सकता है आग
देश की जनता को अब डीजल की कीमतों में वृद्धि के लिए तैयार हो जाना चाहिए। सरकार ने पेट्रोल की तरह डीजल की कीमतें भी सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने की तैयारी कर ली है यानि अब आम आदमी खासकर किसानों को महंगा डीजल मिलेगा। सरकार ने ऐलान किया है कि डीजल को नियंत्रण से मुक्त किया जाएगा। इस फैसले को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी गई है, लेकिन इसे लागू करने की तारीख का संकेत नहीं दिया गया है। वित्त राज्यमंत्री नमो नारायण मीणा ने राज्य सरकार को यह जानकारी दी। मीणा ने एनके सिंह द्वारा पूछे गए सवाल के लिखित उत्तर में सदन को बताया कि सरकार ने डीजल की कीमतों को बाजार द्वारा निर्धारित करने पर सिद्धांत अपनी सहमति दे दी है। हालांकि अभी इसे अमल में नहीं लाया गया है। लेकिन रसोई गैस की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किए जाने का अभी कोई प्रस्ताव नहीं है। हालांकि मीणा ने इस सन्दर्भ में सरकार की प्रतिबद्धता भी बताई। उन्होंने कहा कि सरकार अंतर्राष्ट्रीय तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और घरेलू महंगाई की स्थिति में आम आदमी को बचाने के लिए डीजल की खुदरा कीमतों को ठीक करने का प्रयास जारी रखेगी। जैसे ही मीणा ने यह जवाब दिया इसकी प्रतिक्रिया हो गई। विपक्षी दलों के साथ ही सहयोगी दलों की भृकुटियां तन गईं। सबसे पहले भाजपा ने इसकी आलोचना की। पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने कहाöऐसा लगता है कि सरकार बहुत जल्द ही डीजल की कीमत बढ़ाने जा रही है। सरकार के इस तरह के किसी कदम का भाजपा पूरा विरोध करेगी। इससे न सिर्प यात्रा खर्च बढ़ेगा बल्कि दूसरी चीजों में भी तेजी आएगी। भाजपा के बाद संप्रग की सहयोगी तृणमूल कांग्रेस ने भी साफ कर दिया कि वह पेट्रो मूल्य वृद्धि पर अपने अड़ियल रुख में कोई बदलाव नहीं करने जा रही है। पार्टी सांसद राय ने कहा कि डीजल की कीमत तय करने का अधिकार तेल कम्पनियों को देने का विरोध किया जाएगा। दरअसल डीजल मूल्य विनियंत्रण का सैद्धांतिक फैसला पिछले वर्ष जून में ही हो गया था, लेकिन विरोध के चलते इस पर कभी अमल नहीं हुआ। डीजल की कीमत अभी भी सरकार ही तय करती है। यही वजह है कि सरकारी तेल कम्पनियां डीजल को 12 रुपये प्रति लीटर के घाटे में बेच रही हैं। घाटे से आजिज आकर तेल कम्पनियों ने धमकी दी है कि या तो कीमत बढ़ाने की इजाजत दी जाए वरना आगे ईंधन की आपूर्ति करना सम्भव नहीं होगा। राजनीतिक वजहों, खासकर पांच राज्यों के बीते विधानसभा चुनावों के कारण संप्रग सरकार दिसम्बर 2011 के बाद से पेट्रोलियम पदार्थों में कोई मूल्यवृद्धि नहीं कर पाई है। अब सरकार बजट सत्र की समाप्ति के बाद पेट्रोलियम उत्पादों की खुदरा कीमत बढ़ाने की इजाजत तेल कम्पनियों को देना चाहती है। लेकिन लगता नहीं कि उसके लिए अब भी ऐसा करना आसान होगा। डीजल सारे जनमानस को प्रभावित करेगा। किसान से लेकर पब्लिक ट्रांसपोर्ट, रेलवे इत्यादि सभी सीधे प्रभावित होंगे। सरकार को कोई भी फैसला करने से पहले सारे पहलुओं पर गम्भीरता से विचार करना बेहतर होगा। एक बार डीजल को सरकारी नियंत्रण से हटा लिया तो स्थिति बिल्कुल बेकाबू हो सकती है।
Anil Narendra, Daily Pratap, Diesel, Inflation, Petrol Price, Vir Arjun
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Wednesday, 4 April 2012
महंगाई मुंह फाड़े जात है...
पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी पर फैसला बेशक कुछ दिनों के लिए टल जाने से भले ही लोगों के लिए थोड़ी राहत मिल गई हो लेकिन नए कारोबारी साल की शुरुआत तकरीबन सभी चीजों के दाम बढ़ने से हो रही है। बजट में बढ़े एक्साइज ड्यूटी और सर्विस टैक्स बढ़ने से खाना-पीना, घूमना-फिरना सब कुछ महंगा हेने जा रहा है। आम आदमी को डस रही महंगाई डायन का डंक और तेज हो गया है। सरकार के बजट में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने उत्पाद शुल्क में वृद्धि और सेवा कर की दर व दायरा, दोनों बढ़ाकर आम जनता की पीठ पर 45 हजार करोड़ रुपये के टैक्स का बोझ लाद दिया है। उत्पाद शुल्क और सेवा कर की वृद्धि रविवार से लागू हो गई है। उत्पाद शुल्क की दर को 10 से 12 फीसदी करने का असर बाजार में उपलब्ध तमाम उत्पादों पर होगा। सीमेंट, ब्रांडेड रेडीमेड गार्मेंट से लेकर सोना और रत्नाभूषण, सभी चीजों की कीमतों में वृद्धि होगी। उत्पाद शुल्क के साथ सेवा कर भी उपभोक्ताओं पर भारी पड़ रहा है। अब इसके दायरे में उन क्षेत्रों की सरकारी सेवाएं भी जुड़ रही हैं, जहां वो निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा में हैं। इसके तहत ट्रेनों में एसी-1 और एसी-2 टायर में यात्रा करने वाले यात्रियों को रविवार से ज्यादा किराया देना पड़ेगा। प्लेटफार्म टिकटों के लिए भी 3 रुपये की बजाय 5 रुपये देने होंगे। बिजली, जमीन, फ्लैट व मोटरसाइकिल-कार के लिए चुकाने होंगे अधिक पैसे। सोना प्लेटिनम खरीदना महंगा हो जाएगा। शराब महंगी होगी। चेक-ड्राफ्ट व पे-आर्डर की वैधता 6 महीने से घटकर 3 महीने रह जाएगी। पोस्ट ऑफिस डिपॉजिट, पीपीएफ, एनएमसी में ज्यादा ब्याज मिलेगा। लाइफ इंश्योरेंस के साथ मोटर इंश्योरेंस में भी वृद्धि होगी। महंगाई की मार झेल रहे आम आदमी को अब मोटर बीमा की बढ़ी हुई दरों का बोझ भी उठाना होगा। भारतीय बीमा विनियम विकास प्राधिकरण ने विभिन्न श्रेणियों में थर्ड पार्टी मोटर प्रीमियम चार्ज 5 से 20 फीसदी तक बढ़ाया है। थर्ड पार्टी प्रीमियम की बढ़ी हुई दरों के प्रीमियम के साथ उपभोक्ताओं को 2 फीसदी बढ़ा हुआ सेवा कर भी चुकाना होगा। नई दरें शुक्रवार से प्रभावी हो गई हैं। महिलाएं भी इससे अछूती नहीं हैं। उनके सौंदर्य प्रसाधन के उत्पाद सहित ब्यूटी पार्लर का खर्च भी महंगा हुआ है। देश के नामचीन संगठन एसोचेम ने भी महंगाई के बारे में सर्वेक्षण कराया है। इससे ज्यादातर महिलाओं ने कहा कि घरेलू बजट को काबू में रखने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। बढ़ते खर्च पर लगाम लगाना मुश्किल हो रहा है। 70 फीसदी महिलाओं का मानना है कि ज्यादा सेवा कर के कारण फोन सुविधा समेत सभी आवश्यक वस्तुएं महंगी होंगी। इतना ही नहीं, उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी से आम आदमी की रोजमर्रा की जिन्दगी प्रभावित होगी। आमदनी इस अनुपात में नहीं बढ़ेगी जिस अनुपात में खर्च बढ़ जाएगा। महंगाई आने वाले दिनों में और बढ़ेगी। अगर पेट्रोल, रसोई गैस इत्यादि के दाम बढ़ते हैं तो उनका सीधा प्रभाव आम आदमी पर पड़ेगा। पहले से ही महंगाई की मार से त्रस्त आम आदमी की कमर टूट जाएगी पर इस सरकार को आम आदमी की चिन्ता कहां? डॉ. मनमोहन सिंह जो माने हुए अर्थशास्त्राr हैं, की नीतियों ने गरीब आदमी का तो बेड़ा गर्प कर दिया है। दूसरी ओर घोटाले पर घोटाले रुकने का नाम ही नहीं ले रहे। यह पैसा कहां से आ रहा है? गरीब जनता की जेब में डाके से ही तो आ रहा है।
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Saturday, 19 November 2011
पेट्रोल कीमतों पर सरकारी दलीलों का पर्दाफाश
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 19th November 2011
अनिल नरेन्द्र
महज एक पखवाड़े में पेट्रोल की बढ़ी कीमतें वापस होना अगर चमत्कार नहीं तो आश्चर्यजनक जरूर है। पिछले 33 महीनों में यह सिर्प दूसरा मौका है जब पेट्रोल की खुदरा कीमतों में कटौती की गई है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कटौती क्यों की गई है? और कि पेट्रो पदार्थों पर आखिर नियंत्रण किसका है? कांग्रेस पार्टी इसका पूरा श्रेय लेने के चक्कर में है। क्या उत्तर प्रदेश में चुनावी अभियान की शुरुआत कर चुके कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को केंद्र सरकार हर तरह का समर्थन कर रही है? यही वजह है कि राहुल के अभियान शुरू करने के एक दिन बाद ही सरकारी तेल कम्पनियों ने राहत देते हुए पेट्रोल की खुदरा कीमत में सवा दो रुपये तक की कटौती का ऐलान किया। संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने जा रहा है। शायद सरकार ने सोचा हो कि दबाव कम किया जाए। फिर पब्लिक का विरोध भी सरकार को भारी पड़ रहा था। पब्लिक के साथ सरकार के सहयोगी दल खासकर तृणमूल कांग्रेस का दबाव भी एक कारण जरूर रहा। अब सवाल यह है कि आखिर पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों पर नियंत्रण किसका है? यूपीए सरकार से जब कीमत बढ़ाने की सफाई मांगी गई थी तो उसके प्रतिनिधि के रूप में वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि पिछले साल जून में हुए डिरेग्यूलेशन के बाद पेट्रोल की कीमतें तय करने का अधिकार पूरी तरह से ऑयल मार्केटिंग कम्पनियों के पास चला गया है। खुद प्रधानमंत्री ने विदेश से इस बारे में टिप्पणी की थी कि पेट्रोल तो पेट्रोल, धीरे-धीरे सारी ही चीजों की कीमतें तय करने का काम पूरी तरह बाजार पर छोड़ना उनकी सरकार की मुख्य प्राथमिकता है। यही नहीं, डॉ. मनमोहन सिंह ने यहां तक कहा था कि बढ़ी हुई पेट्रोल की कीमतें कम नहीं होंगी? ऐसे में यह चमत्कार आखिर कैसे हुआ कि ऑयल मार्केटिंग कम्पनियां (ओएमसी) पेट्रोल के दाम हाल की बढ़त के पहले वाले स्तर से भी थोड़ी नीचे लाने को तैयार हो गई? इन कम्पनियों के आला अफसरों का कहना है कि ऐसा उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और डालर के मुकाबले रुपये के रुझान को दखते हुए किया है। इन दोनों रुझानों को गौर से देखें तो लगेगा कि इस फैसले के पक्ष में इससे ज्यादा लचर दलील और कोई हो ही नहीं सकती। डालर के मुकाबले रुपया फिलहाल पिछले 33 महीनों के सबसे निचले स्तर पर चल रहा है। लिहाजा ओएमसी मैनेजरों के लिए इस मोर्चे पर कुछ कहने की जगह ही नहीं बनती। कच्चे तेल की कीमतों में कुछ न कुछ घट-बढ़ रोज रहता है, लेकिन इस बाजार के विश्लेषकों का कहना है कि पिछले एक पखवाड़े में भारत के लिए इसकी औसत कीमत 108 से बढ़कर 110 डालर प्रति बैरल हो गई। जाहिर है कि पेट्रोल की कीमतें बाजार के किसी रुझान के तहत नहीं बल्कि राजनीतिक दबावों के चलते नीचे आई है और सरकार ने ऐसा करके अपने आपको एक्सपोज ही किया है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट की दलील बेतुकी लगती है। जून 2010 में पेट्रोल मूल्य नियंत्रण मुक्त किए जाने के बाद से कीमतों में लगभग 23 रुपये का इजाफा हुआ है इसलिए यह कमी `ऊंट के मुंह में जीरा' के समान ही है। वैसे देखा जाए तो पिछले डेढ़ साल में पेट्रोल की कीमतों में 13 बार वृद्धि की गई है जबकि कमी पिछले 33 महीनों में पहली बार की गई है। हकीकत तो यह है कि चौतरफा दबाव को देखते हुए यूपीए सरकार बौखला गई। इस दबाव को देखकर कांग्रेस आला कमान और सरकार ने देरी से ही सही आत्ममंथन तो किया कि महंगाई के मुद्दे पर पहले ही पार्टी की काफी किरकिरी हो चुकी है। ऐसे में पेट्रोल मूल्यों में वृद्धि उसे विधानसभा चुनावों में कहीं नुकसान न पहुंचा दे। इन हालात को देखते हुए केंद्र सरकार हरकत में आई और उसने पेट्रोल कम्पनियों पर कीमत कम करने का दबाव बनाया। वैसे यह सब नाटक था क्योंकि इंडियन ऑयल के चेयरमैन पहले ही कह चुके थे कि अगर सरकार कहे तो हम कीमतें घटाने को तैयार हैं। कुल मिलाकर सरकार की इस दलील की एक झटके में हवा निकल गई कि सरकार का पेट्रो पदार्थों की कीमतों पर कोई नियंत्रण नहीं और साथ-साथ यह भी साबित हो गया कि सरकार ने पेट्रोल की कीमतों में यह कमी सिर्प मतदाताओं को खुश करने की खातिर की है और चुनाव प्रक्रिया खत्म होते ही तेल कम्पनियों को खुश करने के लिए कीमतों में दोगुनी वृद्धि की जा सकती है।Anil Narendra, Daily Pratap, Petrol Price, Prime Minister, Trinamool congress, UPA, Vir Arjun
Thursday, 10 November 2011
ममता बनर्जी से ऐसी नौटंकी की उम्मीद नहीं थी
यह बहुत दुःख की बात है कि तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री अब दबाव और ब्लैकमेलिंग की राजनीति पर उतर आई है। पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी पर ममता की समर्थन वापस लेने की धमकी दरअसल समर्थन देने का मोल था। यह स्टाइल ममता का पुराना है और पेट्रोल के दामों से पैदा हुई राजनीतिक आग को ठंडा करने की कीमत 19 हजार करोड़ रुपये लगाई गई है। 4 नवम्बर को ममता ने कहा था कि हमारे समर्थन वापस लेने से सरकार गिर सकती है। लेकिन प्रधानमंत्री बाहर हैं, हम उनसे बातचीत करना चाहते हैं। उनसे मिलने के लिए समय मांगा है। दरअसल ममता का मकसद प्रधानमंत्री से सौदेबाजी करने का था। उन्हें पेट्रोल की बढ़ी कीमतों से कोई दिलचस्पी नहीं थी, यह तो महज एक दबाव बनाने का हथियार था। मंगलवार को तृणमूल कांग्रेस के सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की। प्रधानमंत्री ने इस प्रतिनिधिमंडल को पेट्रोल की कीमत में 1.80 पैसे की बढ़ोतरी वापस लेने पर कोई आश्वासन नहीं दिया। या यूं कहें कि प्रधानमंत्री ने एक तरह से प्रतिनिधिमंडल को मना कर दिया। करीब 45 मिनट चली बातचीत महज एक ड्रामा था और इस नाटकबाजी के बाद प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि हम सरकार से अभी नहीं हटेंगे पर हम बढ़ोतरी के सख्त खिलाफ हैं। मीडिया में एलपीजी और डीजल के डी कंट्रोल को लेकर आ रही खबरों पर भी डेलीगेशन ने पीएम से सवाल करके विरोध जताया पर पीएम ने इस मसले पर कोई जानकारी होने से मना कर दिया। उधर कोलकाता में ममता ने प्रणब मुखर्जी ने मुलाकात की। उन्होंने कहा कि अगर पेट्रो पदार्थों के दाम फिर बढ़ाए गए तो मेरी पार्टी यूपीए सरकार में नहीं रहेगी। बढ़ोतरी वापस लेने का आश्वासन देने के बजाय पीएम ने तृणमूल सांसदों को इस फैसले की बारीकियां समझाईं। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि स्थिति को देखते हुए सरकार डीजल से सरकारी नियंत्रण हटाएगी। डीजल को डी कंट्रोल करना यूपीए के आर्थिक एजेंडे में है। सांसदों ने जब उनसे पेट्रोल के दाम बढ़ाने के फैसले पर तृणमूल को अनजान रखने की बात की तो पीएम ने कहा कि कम्पनियां अपना निर्णय बेशक सरकार को बताती हैं, मगर यह औपचारिकता होती है। वे फैसला लेने को आजाद हैं। हालांकि जब भी कम्पनियां दाम बढ़ाने को लेकर हमसे बात करेंगी हम सहयोगियों को जानकारी देंगे। पेट्रोल की बढ़ी कीमतें तो वापस नहीं होंगी पर हां इस चक्कर में पश्चिम बंगाल की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए ममता दीदी को केंद्र से 19 हजार करोड़ रुपये का पैकेज जल्द मिलने की सम्भावना है। कोलकाता में सीएम ममता बनर्जी ने वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी से बैठक के बाद कहा कि पश्चिम बंगाल की आर्थिक स्थिति काफी बदहाल है। इसे पटरी पर लाने के लिए राज्य को केंद्र सरकार से वित्तीय सहायता की जल्द जरूरत है। फिलहाल उन्होंने केंद्र सरकार से 19 हजार करोड़ रुपये की सहायता मांगी है। जब केंद्र सरकार खुद पेट्रोल के मूल्यों को लेकर राजनीति करेगी तो वह अपने घटक दलों को ऐसा न करने की नसीहत नहीं दे सकती। यदि ममता बनर्जी पेट्रोल के मूल्यों में वृद्धि पर अपनी नाराजगी के जरिये केंद्र सरकार से आर्थिक पैकेज हासिल करना चाहती हैं तो इसके लिए एक हद तक खुद केंद्र जिम्मेदार है। ममता बनर्जी को अपने राज्य की समस्याओं से मुक्ति के लिए केंद्रीय पैकेज की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन उसे हासिल करने के लिए उनकी ओर से जो तरीका अपनाया जा रहा है वह सौदेबाजी की राजनीति के अलावा कुछ नहीं।
Anil Narendra, Daily Pratap, Mamta Banerjee, Manmohan Singh, Petrol Price, Trinamool congress, Vir Arjun, West Bengal
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Wednesday, 9 November 2011
अदालतों को पूरा अधिकार है कि वह तेल कीमतों में वृद्धि पर हस्तक्षेप करें
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 9th November 2011
अनिल नरेन्द्र
तेल कम्पनियां कहती हैं कि हमें घाटा हो रहा है। इसी वजह से वह बार-बार पेट्रोल उत्पादों की कीमतें बढ़ाती हैं। सरकार कहती है कि हमने तो पेट्रोल डी कंट्रोल कर दिया है अब तेल कम्पनियां तय करेंगी कीमतें। यह दलीलें न तो जनता को हजम हो रही हैं, न विशेषज्ञों को और न ही अब अदालतों को। सवाल उठता है कि कम्पनियां यदि इतना घाटे में हैं तो फिर पूरे देश में नए पेट्रोल पम्प खोलने की योजना के लिए पैसे कहां से आएंगे? पेट्रोल और डीजल पर टैक्स यदि कम कर दिया जाए तो इनके दाम घट जाएंगे। मगर अफसोस जताने के बावजूद सरकार का रवैया हैरान करने वाला है। इंडियन ऑयल, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम दुनिया की सबसे ज्यादा लाभ कमाने वाली फार्चून 500 कम्पनियों में से हैं। इन्होंने अगले दो वर्षों में देशभर में 1100 नए पेट्रोल पम्प खोलने की योजना बनाई है। इस पर 5500 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च आएगा। यह पैसा कहां से आएगा? जवाब सीधा है जनता का गाढ़ी कमाई से और कहां से? तेल केंद्र और राज्य सरकारों की भी आदमनी का एक बहुत बड़ा स्रोत बन गया है। एनडीए शासन में जब पेट्रोल को डिरेगुलेट किया गया था, उस वक्त तय किया गया था कि अगर कच्चे तेल की कीमत बढ़ेगी तो सरकार टैक्स को एडजस्ट करेगी ताकि इस बढ़ोतरी का जनता पर बोझ न डालना पड़े। ऐसे में मौजूदा सरकार क्यों नहीं टैक्स कम करके जनता को पेट्रोल की बढ़ती कीमतों से निजात दिलाती? इस वक्त पेट्रोल की कीमत से एक बड़ा हिस्सा टैक्स का है। दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 68.65 रुपये प्रति लीटर है जबकि वास्तव में तेल की कीमत 23.37 रुपये है यानि बाकी 45.28 रुपये टैक्स हैं। बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा का कहना है कि 1998 में जब एनडीए सरकार शासन में आई थी, तब कच्चा तेल 10 डालर प्रति बैरल था और जब उनकी सरकार गई तो यह 40 डालर प्रति बैरल तक पहुंच गया था लेकिन इसके बावजूद उस वक्त तेल की कीमतों में ज्यादा वृद्धि इसलिए नहीं हुई क्योंकि उस सरकार ने इसे टैक्सों में एडजस्ट कर लिया था। 2004 में पेट्रोल के रेट 23.71 रुपये लीटर थे और उसके बाद से लगातार बढ़ोतरी हो रही है यानि यूपीए ने अपने शासन में 24 बार पेट्रोल के दम बढ़ाए और इस तरह यूपीए ने अपने कार्यकाल में पेट्रोल की दर में 35 रुपये लीटर की बढ़ोतरी तो कर ली है। अभी भी इस सरकार का कार्यकाल बचा है, पता नहीं और कितना बढ़ाएंगे?
पेट्रोल की बार-बार बढ़ोतरी पर अब अदालतों ने भी गौर करना आरम्भ कर दिया है। हाल ही में केरल हाई कोर्ट ने इस दिशा में पहल की। हाई कोर्ट ने साफ कहा कि महंगाई धीमी मौत की तरह है और सरकारें हाथ नहीं खड़ा कर सकतीं। यही नहीं अदालत ने इंडियन ऑयल कारपोरेशन और रिलायंस पेट्रोलियम को अपनी बैलेंसशीट और तिमाही रिपोर्ट तीन सप्ताह में पेश करने का निर्देश भी दिया है। केरल हाई कोर्ट के फैसले के बाद इस बात पर भी विवाद खड़ा करने की कोशिश की जा रही है कि क्या अदालतें अपने अधिकार सीमा तो नहीं लांघ रहीं? क्या अदालतों को ऐसे मुद्दों पर दखल देना चाहिए इत्यादि-इत्यादि। राजस्थान हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एवं विधि आयोग के सदस्य जस्टिस शिव कुमार कहते हैं कि जनहित को प्रभावित करने वाली हर चीज पर कोर्ट सुनवाई कर सकती है। संविधान हमें सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार देता है। कोर्ट को लगता है कि बेतहाशा बढ़ती कीमतों से यह अधिकार प्रभावित हो रहा है तो वह उस पर सुनवाई कर सकता है। कोर्ट इस बात की जांच भी कर सकता है कि कीमतें सिर्प व्यापारियों की मुनाफाखोरी के कारण तो नहीं बढ़ रही है। सुप्रीम कोर्ट के वकील डीके गर्ग भी जस्टिस कुमार से सहमत हैं। वे 1998 में प्याज की कीमत पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश एवं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एमएन वेंकैटचलैया के मीडिया में आए बयान का उदाहरण देते हुए बताया कि चलैया ने कहा था कि बढ़ती महंगाई लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन है। यह एक तरह से जनता की गाढ़ी कमाई को लूटना है। गर्ग कहते हैं कि जब बात मौलिक अधिकारों के हनन की हो तो कोर्ट सुनवाई कर सकता है। सीधे तो नहीं लेकिन परोक्ष रूप से ऐसा कई बार हुआ है। गरीबों को मुफ्त अनाज बांटने और गरीबों के आंकड़ों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां इसी के तहत आती हैं। हालांकि सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने कभी महंगाई या बढ़ी कीमतों की सुनवाई नहीं की बल्कि ऐसी याचिकाएं खारिज की हैं। वह विनय चन्द्र जोशी के मामले का उदाहरण देते हैं। उसमें कहा गया था कि सत्ताधारी दल ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में महंगाई कम करने का दावा किया था जबकि उसके सत्ता में आने के बाद महंगाई बेतहाशा बढ़ी है। यह वायदा खिलाफी और जनता के साथ धोखा है। देश के जाने-माने वकील राजीव धवन भी मानते हैं कि कोर्ट ने महंगाई पर सीधे कभी सुनवाई नहीं की। लेकिन फिर भी सरकार को बताना पड़ेगा कि पेट्रोल की कीमतें क्यों बढ़ीं? अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने के कारण या पेट्रोलियम पदार्थों पर सब्सिडी घटाने या फिर तेल कम्पनियों को ज्यादा मुनाफा देने से। अगर कीमत सरकार ने नहीं बल्कि तेल कम्पनियों ने बढ़ाई है तो मामला प्रतिस्पर्धा कानून के तहत आएगा। तब यह देखा जाएगा कि कहीं इसके पीछे तेल कम्पनियों की साजिश तो नहीं?
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पेट्रोल की बार-बार बढ़ोतरी पर अब अदालतों ने भी गौर करना आरम्भ कर दिया है। हाल ही में केरल हाई कोर्ट ने इस दिशा में पहल की। हाई कोर्ट ने साफ कहा कि महंगाई धीमी मौत की तरह है और सरकारें हाथ नहीं खड़ा कर सकतीं। यही नहीं अदालत ने इंडियन ऑयल कारपोरेशन और रिलायंस पेट्रोलियम को अपनी बैलेंसशीट और तिमाही रिपोर्ट तीन सप्ताह में पेश करने का निर्देश भी दिया है। केरल हाई कोर्ट के फैसले के बाद इस बात पर भी विवाद खड़ा करने की कोशिश की जा रही है कि क्या अदालतें अपने अधिकार सीमा तो नहीं लांघ रहीं? क्या अदालतों को ऐसे मुद्दों पर दखल देना चाहिए इत्यादि-इत्यादि। राजस्थान हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एवं विधि आयोग के सदस्य जस्टिस शिव कुमार कहते हैं कि जनहित को प्रभावित करने वाली हर चीज पर कोर्ट सुनवाई कर सकती है। संविधान हमें सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार देता है। कोर्ट को लगता है कि बेतहाशा बढ़ती कीमतों से यह अधिकार प्रभावित हो रहा है तो वह उस पर सुनवाई कर सकता है। कोर्ट इस बात की जांच भी कर सकता है कि कीमतें सिर्प व्यापारियों की मुनाफाखोरी के कारण तो नहीं बढ़ रही है। सुप्रीम कोर्ट के वकील डीके गर्ग भी जस्टिस कुमार से सहमत हैं। वे 1998 में प्याज की कीमत पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश एवं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एमएन वेंकैटचलैया के मीडिया में आए बयान का उदाहरण देते हुए बताया कि चलैया ने कहा था कि बढ़ती महंगाई लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन है। यह एक तरह से जनता की गाढ़ी कमाई को लूटना है। गर्ग कहते हैं कि जब बात मौलिक अधिकारों के हनन की हो तो कोर्ट सुनवाई कर सकता है। सीधे तो नहीं लेकिन परोक्ष रूप से ऐसा कई बार हुआ है। गरीबों को मुफ्त अनाज बांटने और गरीबों के आंकड़ों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां इसी के तहत आती हैं। हालांकि सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने कभी महंगाई या बढ़ी कीमतों की सुनवाई नहीं की बल्कि ऐसी याचिकाएं खारिज की हैं। वह विनय चन्द्र जोशी के मामले का उदाहरण देते हैं। उसमें कहा गया था कि सत्ताधारी दल ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में महंगाई कम करने का दावा किया था जबकि उसके सत्ता में आने के बाद महंगाई बेतहाशा बढ़ी है। यह वायदा खिलाफी और जनता के साथ धोखा है। देश के जाने-माने वकील राजीव धवन भी मानते हैं कि कोर्ट ने महंगाई पर सीधे कभी सुनवाई नहीं की। लेकिन फिर भी सरकार को बताना पड़ेगा कि पेट्रोल की कीमतें क्यों बढ़ीं? अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने के कारण या पेट्रोलियम पदार्थों पर सब्सिडी घटाने या फिर तेल कम्पनियों को ज्यादा मुनाफा देने से। अगर कीमत सरकार ने नहीं बल्कि तेल कम्पनियों ने बढ़ाई है तो मामला प्रतिस्पर्धा कानून के तहत आएगा। तब यह देखा जाएगा कि कहीं इसके पीछे तेल कम्पनियों की साजिश तो नहीं?
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Sunday, 6 November 2011
महंगाई धीमी मौत की तरह है, सरकारें हाथ नहीं झाड़ सकतीं
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 6th November 2011
अनिल नरेन्द्र
ताजा पेट्रोल कीमतों में वृद्धि का चौतरफा विरोध होना स्वाभाविक ही है। जनता का गुस्सा खुले विद्रोह का रूप ले सकता है। भाजपा ने तो जनता से खुला विद्रोह करने की अपील तक कर दी है। भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने कहा कि देश की जनता पहले से ही 12.21 फीसदी की मुद्रास्फीति का सामना कर रही है, ऐसे में पेट्रोल के दामों का बढ़ना जनता पर दोहरी मार की तरह है। अब वक्त आ गया है कि जनता इस भ्रष्ट और असंवेदनशील सरकार को उखाड़ फेंके। मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ इस देश की जनता से आह्वान करता हूं कि वह सरकार के इस मनमानेपन के खिलाफ विद्रोह करे। विद्रोह कई तरह का होता है जैसे असहयोग करना, जनता अगर कर देना बन्द कर दे तो भी वह एक तरह का विद्रोह होगा। सरकार के इस फैसले से यूपीए गठबंधन के घटक भी नाराज हैं। यूपीए में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने तो संकेतों में समर्थन वापसी की धमकी तक दे दी है। शुक्रवार को तृणमूल संसदीय दल की कोलकाता में इमरजेंसी मीटिंग हुई। ममता बनर्जी ने कहा कि हमारे नेता केंद्र सरकार से समर्थन वापस लेने के हक में हैं। लेकिन कोई भी फैसला प्रधानमंत्री के विदेश से लौटने के बाद ही लिया जाएगा। उधर खबर है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक तरह से पेट्रोल कीमतों में बढ़ोतरी को उचित ठहरा दिया है। फ्रांस में उन्होंने कहा कि बाजार को अपने हिसाब से चलने दिया जाना चाहिए। तेल की कीमतों को और नियंत्रण मुक्त किए जाने की जरूरत है। डीएमके, एनसीपी और नेशनल कांफ्रेंस ने भी पेट्रोल के दाम का विरोध किया है। उधर इंडियन ऑयल कारपोरेशन के चेयरमैन ने कहा कि अगर सरकार निर्देश दे तो हम बढ़ोतरी को वापस लेने पर राजी हैं।पेट्रो पदार्थों की कीमतों पर मनमोहन सरकार का हमेशा एक ही जवाब रहा है कि हम इसमें कुछ नहीं कर सकते और यह फैसला तेल कम्पनियों को करना है। यह कहकर सरकार अपना पलड़ा झाड़ लेती है पर पेट्रोल की कीमतों में बार-बार बढ़ोतरी पर केरल हाई कोर्ट ने शुक्रवार को सख्त रुख अपनाया। उसने कहा कि सरकारें इस मामले पर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती हैं। इसके विरोध के लिए राजनीतिक दलों का इंतजार करने के बजाय देश के लोगों को खुद सामने आना चाहिए। अदालत ने इंडियन ऑयल कारपोरेशन और रिलायंस पेट्रोलियम को अपनी बैलेंसशीट और तिमाही रिपोर्ट तीन सप्ताह में पेश करने का निर्देश दिया। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए एक्टिंग चीफ जस्टिस सीएन रामचन्द्रन और जस्टिस पीएस गोपीनाथ ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि पिछले एक साल में तेल के दाम 40 फीसदी से ज्यादा बढ़ गए हैं। इससे आम आदमी को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। महंगाई धीमी मौत की तरह है। राजनीतिक दल विरोध कर रहे हैं। उपभोक्ता विरोध नहीं कर पा रहे हैं। बार-बार की बढ़ोतरी में उन्हें एडजस्ट करना पड़ रहा है। अदालत ने कहा कि इस बढ़ोतरी से टू-व्हीलर और छोटी कार चलाने वाले व्यक्ति प्रभावित होते हैं, अमीर लोग नहीं क्योंकि वे डीजल की महंगी कारों में चलते हैं। राज्य सरकार के वकील ने तर्प दिया कि यह याचिका राजनीति से प्रेरित है। इस पर कोर्ट ने यह कहते हुए कि राजनीति में भी जनहित जुड़ा होता है, याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली। हालांकि अदालत का कहना था कि तेल उत्पादों के दाम तय करने का अधिकार केंद्र सरकार का पॉलिसी मैटर है। पेट्रोल की मौजूदा बढ़ोतरी पर हम दखल नहीं दे सकते। पेट्रोल के दाम में बढ़ोतरी राष्ट्रीय मुद्दा है। हम इस पर स्टे नहीं लगा सकते।
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Saturday, 5 November 2011
पहले से ही महंगाई से दबी जनता पर अब पेट्रोल वृद्धि की मार
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Published on 5th November 2011
अनिल नरेन्द्र
देश में बीते कई दिनों से पेट्रोल की कीमतें फिर से बढ़ाए जाने के कयास लगाए जा रहे थे और आज सभी सवालों पर पूर्णविराम लग गया। सरकारी तेल कम्पनी इंडियन ऑयल ने पेट्रोल की कीमत में एक रुपये 82 पैसे की बढ़ोतरी कर दी है। इंडियन ऑयल की बढ़ोतरी के बाद ही सभी तेल कम्पनियों ने इजाफे का फैसला किया है। बढ़ी हुई कीमत के बाद मुंबई में एक लीटर पेट्रोल 73.74 रुपये, दिल्ली में 68.66 रुपये, कोलकाता में 73.10 रुपये तो चेन्नई में 72 रुपये 64 पैसे में मिलेगा। मालूम हो कि पेट्रोल की कीमत में पिछला इजाफा सितम्बर के महीने में ही हुआ था। जानकारों की मानें तो अभी पेट्रोल के दाम में और आग लगेगी। तेल कम्पनियां जून 2010 के बाद से अभी तक 10 बार पेट्रोल महंगा कर चुकी हैं। पिछले दो महीने में दो बार कीमतें बढ़ाई जा चुकी हैं। कच्चे तेल की कीमत हमें ही नहीं बल्कि सभी देशों को प्रभावित करती है पर अन्य देशों में आज भी पेट्रोल हमारे देश से काफी सस्ता उपलब्ध है। विभिन्न देशों में पेट्रोल की खुदरा कीमतों को भारतीय मुद्रा में कन्वर्ट करके देखें तो पाएंगे कि यहां पेट्रोल के दाम दुनिया के ज्यादातर देशों के मुकाबले ज्यादा हैं। भारत में पेट्रोल की औसत कीमत 70 रुपये प्रति लीटर है जबकि चीन में 48 रुपये, पाकिस्तान में 50 रुपये, बंगलादेश में 49 रुपये, श्रीलंका में 54 रुपये प्रति लीटर है। यहां तक कि अमेरिका, हांगकांग, मलेशिया, आस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे आर्थिक सम्पन्न देशों में भी पेट्रोल भारत के मुकाबले सस्ता है। जिन देशों में पेट्रोल पर टैक्स ज्यादा है जैसे सिंगापुर, न्यूजीलैंड, थाइलैंड, ब्राजील उनमें भी भारत सबसे ऊपर है। दुनिया में सबसे सस्ता तेल कूड उत्पादक और निर्यातक देशों में है। इनमें सउदी अरब, ईरान, वेनेजुएला, कुवैत जैसे देश शामिल हैं। जानकारों का कहना है कि भारत में पेट्रोल महंगा होने के पीछे कई कारण हैं। भारत अपनी कुल खपत का करीब तीन-चौथाई कच्चा तेल बाहर से आयात करता है। इसके अलावा भारत में पेट्रोलियम उत्पादों पर कड़ा टैक्स है। एक्साइज ड्यूटी, इम्पोर्ट ड्यूटी और वैट को मिलाकर देखें तो तेल की कीमतों में आधा से ज्यादा बढ़ोतरी सिर्प टैक्स के चलते हो जाती है। अगर पेट्रोलियम मंत्री की मानें तो एलपीजी सिलेंडर, डीजल और मिट्टी के तेल का बोझ भी पड़ने वाला है। मंत्री महोदय कहते हैं कि सरकार इस मामले में कुछ नहीं कर सकती। पूरा देश चन्द तेल कम्पनियों के रहमोंकरम पर टिका हुआ है। महंगाई से पहले से ही परेशान जनता आजिज आ चुकी है। यह सरकार आम आदमी का दम निकालने पर तुली हुई है। सरकार न तो अपनी खपत पर ही कोई नियंत्रण लगाती है और न ही इन चन्द मुट्ठीभर तेल कम्पनियों के अनाप-शनाप खर्चों पर ही नियंत्रण लगाने की कोशिश करती है। हम मांग करते हैं कि तेल कम्पनियों को सीएजी से अपने खाते चैक कराने चाहिए। यह कोई निजी मामला नहीं। इनके फैसलों से पूरा देश सीधा प्रभावित होता है। अपने एशो-आराम के लिए यह कम्पनियां गरीब-आम आदमी की कमर तोड़ रही है और यह निकम्मी सरकार कहती है कि हमारे हाथ में कुछ नहीं है। आम आदमी जाए तो कहां जाए? पता नहीं कोई आदमी अदालत में पीआईएल क्यों नहीं लगाता जिससे देश को पता चले कि इन तेल कम्पनियों की असलियत क्या है।Anil Narendra, Daily Pratap, Inflation, Petrol Price, Vir Arjun
Sunday, 5 June 2011
Alleviate poverty, Eliminate Poor
- Anil Narendra
We think that the Manmohan Singh government has adopted the policy of elimination of the poor in order to alleviate the poverty. Had it not been the case, the government would have at least tried to make efforts to control the inflation. But, there are preparations afoot to increase petrol prices once again and also to increase the prices of diesel and kerosene. This is the state of affairs, when per barrel crude prices have gone down in the international market. Union Minister of Petroleum, Jaipal Reddy said at Dehradun on Tuesday that in comparison to the international prices, the petrol prices are still lower in the domestic market. According to Mr Reddy, oil marketing companies are incurring a loss of Rs 4 per litre on petrol. The Indian Oil Chairman, RS Butala said in a press conference the same day that the net profit of the Company has gone down in 2009-10 due to selling the products at lower prices. The Company earned a profit of Rs 10,221 Crore during 2009-10, which came down to Rs 3905.16 Crore in the last quarter of the previous financial year. This means that the Chairman is talking of net profit, whereas the Minister is talking of loss to the Company.
Due to the consolidation of dollar in the global market vis-à-vis other currencies, the price of crude oil came down to 99 $ per barrel. It may be mentioned that per barrel price of crude had touched the 115 $ mark, highest in last 34 months. It may be astonishing for the readers to know that petrol price in Pakistan is just Rs 17 per litre, and it is still lower in Indonesia.
These oil companies have made lives of the poor, middle class, employees miserable. We demand probe into their financial affairs. Where these companies are spending their revenue? Why should the common man suffer for their luxuries? In fact, these navratna companies are plundering the country. The government has never explained that how much petrol and diesel is consumed by the private commercial sector. According to our estimates, share of oil consumption by public and these navratna companies, Railways, Air Lines in the total oil consumption ranges between 70 to 80 %. Why does not the government reduce its quota of consumption by 10%? The government should desist from adding fuel to the inflation by increasing oil prices quite often. The government must officially inform the public about the share of government taxes in the price of the petrol, which is being sold at Rs 63-37 in Delhi at present. What is the cost to the government?
People had high expectations from Economist Prime Minister Dr. Manmohan Singh, but he has disappointed them. In fact, our Supreme Court is more sensitive than Manmohan Singh, who, in its recent ruling has said that a free market is not the solution to the problems. Strongly criticising the strategic pillars of the modern economy – liberalizaton, privatization and globalization, the Supreme Court has underlined the need to review the free market system. Justice Sudershan Reddy’s Bench clearly said that in the name of free market, the government cannot escape from its constitutional responsibility, under which it must work for the welfare of the people. Free market system without regulations, will lead us to the broader disappointment.
Thursday, 2 June 2011
गरीब को ही मार दो, गरीबी अपने आप मिट जाएगी
इन तेल कंपनियों ने देश के गरीब, मध्य वर्ग, कर्मचारी वर्ग के नाक में दम कर रखा है। हम मांग करते हैं कि इन बड़ी-बड़ी तेल कंपनियों की वित्तीय जांच कराई जाए? आखिर इनके खर्चों का हिसाब क्या है? इनकी अय्याशी की वजह से जनता क्यों पिसे? दरअसल यह नवरत्न ही देश को लूट रही हैं। आज तक सरकार ने यह कभी नहीं बताया कि निजी कमर्शियल क्षेत्र में पेट्रोल की डीजल की कितनी खपत होती है। हमारा अनुमान है कि तेल की कुल खपत में सरकारी व इन नवरत्न कंपनियां, रेलवे, एयर लाइंस इनमें 70 से 80 पतिशत खपत होती है। सरकार अपने कोटे में दस पतिशत कमी क्यों नहीं करती। बार-बार कीमतें बढ़ाकर महंगाई को बढ़ाने से बाज आए। जनता को यह भी अधिकारिक रूप से बताया कि आजकल बिक रहे दिल्ली में 63.37 पैसे पति लीटर पेट्रोल में सरकारी कर कितने हैं? सरकार को कोस्ट क्या आती है जिसे वह 63 रुपए पर बेचती है?
अर्थशास्त्री डा. मनमोहन सिंह से देश को बहुत उम्मीदें थीं पर उन्होंने सब पर पानी फेर दिया। मनमोहन सिंह से तो जयादा संवेदनशील हमारा सुपीम कोर्ट है जिसने हाल ही में एक फैसले में कहा कि मुक्त बाजार समस्याओं का हल नहीं है। सुपीम कोर्ट ने आधुनिक अर्थव्यवस्था के नीतिगत स्तम्भों, उदारीकरण, निजीकरण और वैश्विकरण की जबर्दस्त आलोचना करते हुए कहा कि मुक्त बाजारों की कार्यपणाली पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। न्यायाधीश सुदर्शन रेड्डी की पीठ ने साफ कहा कि सरकार मुक्त बाजार के नाम पर अपने उस संवैधानिक दायित्व से नहीं बच सकती जिसके तहत उसे जन कल्याण के लिए काम करना जरूरी है। `बिना नियमन वाली मुक्त व्यवस्था में बाजार व्यापक तौर पर विफलता की ओर जाएंगे।
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Published on 2nd June 2011
अनिल नरेन्द्र
हमें लगता है कि यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार ने यह नीति बनाई है कि गरीब को ही मार दो, महंगाई अपने आप दूर हो जाएगी। यदि ऐसा न होता तो कमरतोड़ महंगाई पर कुछ तो नियंत्रण लगाने का पयास यह सरकार करती? उलटा अब फिर पेट्रोल के दाम, डीजल व केरोसिन तेल के दाम बढ़ाने की तैयारी चल रही है। यह हाल तब है जबकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत पति बैरल घटी है। पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी ने मंगलवार को देहरादून में कहा कि विदेशी कच्चे तेल के मुकाबले घरेलू बाजार में पेट्रोल की कीमतें अभी भी कम हैं और तेल बेचने वाली कम्पनियों को अभी नुकसान हो रहा है। तेल बेचने वाली कंपनियों को पेट्रोल के हर लीटर पर चार रुपए से ऊपर का नुकसान बता रहे हैं जयपाल रेड्डी। उसी दिन इंडियन आयल कंपनी के अध्यक्ष आरएस बुटाला ने पेस कांपेंस की और बताया कि कम कीमत पर उत्पादन बेचने की वजह से कम्पनी का शुद्ध लाभ 2009-10 की तुलना में घटा है। कंपनी को 2009-10 में 10,221 करोड़ रुपए का लाभ हुआ था जो घटकर समाप्त वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में 3905 करोड़ 16 लाख रुपए रहा। यानि की यह शुद्ध लाभ की बात कर रहे हैं जबकि मंत्री जी कंपनी में घाटे की बात कर रहे हैं। वैश्विक बाजार में अन्य मुद्राओं की तुलना में डॉलर की मजबूती की वजह से कच्चे तेल के दाम 99 डॉलर पति लीटर आ गए। उल्लेखनीय है कि पिछले माह के शुरुआत में कच्चे तेल की कीमतें 34 माह की सर्वाधिक ऊंचाई 115 डॉलर पति बैरल पहुंच गई थी। पाठकों को यह जानकर हैरानी होगी कि पाकिस्तान में इस समय पेट्रोल के दाम कुल 17 रुपए पति लीटर है जबकि इंडोनेशिया जैसे देशों में पेट्रोल की कीमत इससे भी कम है।इन तेल कंपनियों ने देश के गरीब, मध्य वर्ग, कर्मचारी वर्ग के नाक में दम कर रखा है। हम मांग करते हैं कि इन बड़ी-बड़ी तेल कंपनियों की वित्तीय जांच कराई जाए? आखिर इनके खर्चों का हिसाब क्या है? इनकी अय्याशी की वजह से जनता क्यों पिसे? दरअसल यह नवरत्न ही देश को लूट रही हैं। आज तक सरकार ने यह कभी नहीं बताया कि निजी कमर्शियल क्षेत्र में पेट्रोल की डीजल की कितनी खपत होती है। हमारा अनुमान है कि तेल की कुल खपत में सरकारी व इन नवरत्न कंपनियां, रेलवे, एयर लाइंस इनमें 70 से 80 पतिशत खपत होती है। सरकार अपने कोटे में दस पतिशत कमी क्यों नहीं करती। बार-बार कीमतें बढ़ाकर महंगाई को बढ़ाने से बाज आए। जनता को यह भी अधिकारिक रूप से बताया कि आजकल बिक रहे दिल्ली में 63.37 पैसे पति लीटर पेट्रोल में सरकारी कर कितने हैं? सरकार को कोस्ट क्या आती है जिसे वह 63 रुपए पर बेचती है?
अर्थशास्त्री डा. मनमोहन सिंह से देश को बहुत उम्मीदें थीं पर उन्होंने सब पर पानी फेर दिया। मनमोहन सिंह से तो जयादा संवेदनशील हमारा सुपीम कोर्ट है जिसने हाल ही में एक फैसले में कहा कि मुक्त बाजार समस्याओं का हल नहीं है। सुपीम कोर्ट ने आधुनिक अर्थव्यवस्था के नीतिगत स्तम्भों, उदारीकरण, निजीकरण और वैश्विकरण की जबर्दस्त आलोचना करते हुए कहा कि मुक्त बाजारों की कार्यपणाली पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। न्यायाधीश सुदर्शन रेड्डी की पीठ ने साफ कहा कि सरकार मुक्त बाजार के नाम पर अपने उस संवैधानिक दायित्व से नहीं बच सकती जिसके तहत उसे जन कल्याण के लिए काम करना जरूरी है। `बिना नियमन वाली मुक्त व्यवस्था में बाजार व्यापक तौर पर विफलता की ओर जाएंगे।
Tags: Anil Narendra, Daily Pratap, India, Manmohan Singh, Petrol Price, Poor, Poverty, Vir Arjun
Wednesday, 18 May 2011
राहुल जी अब आप पेट्रोल पम्प पर जाकर धरना क्यों नहीं देते?
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 18 May 2011
-अनिल नरेन्द्र
-अनिल नरेन्द्र
पेट्रोल की कीमत में पांच रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी का विरोध सड़कों से लेकर इंटरनेट पर फेसबुक में भी जोर-शोर से हो रहा है। लोगों ने जमकर फेसबुक में सरकार पर तानें मारे हैं। एक जोरदार टिप्पणी तो यह है कि पेट्रोल की कीमत बढ़ने पर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को उसी तरह धरने पर बैठ जाना चाहिए जैसे वह ग्रेटर नोएडा के एक गांव में जा बैठे थे। फेसबुक पर दिलचस्प टिप्पणी करने वाले मशहूर मन अमन छिन्ना ने लिखा है, राहुल जी को तुरन्त बाइक लेकर निकट के पेट्रोल पम्प का दौरा करना चाहिए। वहां धरना देना चाहिए और गिरफ्तारी देनी चाहिए पर कांग्रेस के पास शायद इसका भी जवाब हाजिर है `कांग्रेस का हाथ गरीब के साथ है और बेचारा गरीब तो पेट्रोल खरीदता ही नहीं,' सड़कों के साथ-साथ फेसबुक पर पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी के खिलाफ आंदोलन-सा छिड़ा हुआ है।
रही बात गरीब की तो गरीब तो पहले से ही बुरी तरह पिसा हुआ है। पेट्रोल के दाम बढ़ने के बाद वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने रविवार को कहा कि अगले हफ्ते डीजल और एलपीजी के दाम बढ़ाने का फैसला हो सकता है। इनके दाम बढ़े तो इसका सीधा असर रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं पर सीधा पड़ेगा। जनता के कई अहम खर्चे पहले ही बढ़ चुके हैं। महंगाई और बढ़ती कीमतों ने आपकी जेब में धीरे-धीरे हुए सुराख को बढ़ावा दिया है और घर के बजट को बुरी तरह बिगाड़ कर रख दिया है। शनिवार से पेट्रोल की कीमत 63.37 रुपये हो गई है। अगर आप अपनी गाड़ी से ऑफिस आने-जाने में रोज दो लीटर पेट्रोल खर्च करते हैं तो पिछले 12 महीनों में आपका खर्च करीब 1000 प्रतिमाह बढ़ चुका है और निकट भविष्य में पेट्रोल के दाम घटने की बजाय और भी बढ़ सकते हैं। अब बात करते हैं दूध की। मुमकिन है कि आपके घर में कुल राशन जितने रुपये का आता है, अकेले दूध का खर्च उससे काफी पीछे नहीं होगा। एक साल पहले फुलक्रीम मिल्क 28 रुपये प्रति लीटर था, अब इसकी कीमत 36 रुपये तक हो चुकी है। अगर आपके घर रोज दो लीटर दूध आता है तो पिछले एक साल में दूध का खर्च करीब 500 रुपये प्रतिमाह बढ़ गया है। गर्मी के सीजन में यह दाम और भी बढ़ सकते हैं। अब जरा स्कूल की फीस पर नजर डालें ः हम बात सिर्प ट्यूशन फीस की कर रहे हैं, जिसमें बढ़ोतरी साफ नजर आती है। दिल्ली में एक औसत दर्जे के स्कूल में ट्यूशन फीस 10 फीसदी तक बढ़ी है। एनसीआर में यह बढ़ोतरी 40 फीसदी तक रही। स्कूलों की फीस, बाकी खर्चों में बेहिसाब इजाफा हुआ है। ट्रांसपोर्टेशन, डेवलपमेंट चार्ज, इंवेट्स और स्पोर्ट्स और अन्य मद में खर्चे काफी बढ़ाए गए हैं। ईएमआई ः कहने को तो पिछले एक साल में कर्ज की ब्याज दर करीब 2.5 फीसदी ही बढ़ी है, लेकिन आज की तारीख में यह आपकी जेब का दुश्मन नम्बर वन है। घर की खातिर अगर आपने 20 साल के लिए 10 लाख रुपये भी लोन ले रखा है तो पिछले एक साल के दौरान किश्त में 1700 रुपये प्रतिमाह जुड़ चुके हैं। कार और पर्सनल लोन की ईएमआई में बढ़ोतरी अलग है। दवाएं ः सरकार के नियंत्रण वाली ढेरों जेनरिक दवाएं बाजार में नहीं मिल रहीं जबकि ये सस्ती हैं। हालांकि साल में दाम सिर्प 10 फीसदी बढ़ाने की इजाजत है लेकिन कम्पनियां अपनी मनमानी करती हैं। औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण ने ही हाल में 62 दवाओं के दाम बढ़ाए हैं, जिनमें अधिकतर इंसुलिन है, जिसकी कीमत 5 से 18 फीसदी बढ़ी है। फिर यह नहीं पता कि जो दवा आप ले रहे हैं वह असली है या नकली?
रही बात गरीब की तो गरीब तो पहले से ही बुरी तरह पिसा हुआ है। पेट्रोल के दाम बढ़ने के बाद वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने रविवार को कहा कि अगले हफ्ते डीजल और एलपीजी के दाम बढ़ाने का फैसला हो सकता है। इनके दाम बढ़े तो इसका सीधा असर रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं पर सीधा पड़ेगा। जनता के कई अहम खर्चे पहले ही बढ़ चुके हैं। महंगाई और बढ़ती कीमतों ने आपकी जेब में धीरे-धीरे हुए सुराख को बढ़ावा दिया है और घर के बजट को बुरी तरह बिगाड़ कर रख दिया है। शनिवार से पेट्रोल की कीमत 63.37 रुपये हो गई है। अगर आप अपनी गाड़ी से ऑफिस आने-जाने में रोज दो लीटर पेट्रोल खर्च करते हैं तो पिछले 12 महीनों में आपका खर्च करीब 1000 प्रतिमाह बढ़ चुका है और निकट भविष्य में पेट्रोल के दाम घटने की बजाय और भी बढ़ सकते हैं। अब बात करते हैं दूध की। मुमकिन है कि आपके घर में कुल राशन जितने रुपये का आता है, अकेले दूध का खर्च उससे काफी पीछे नहीं होगा। एक साल पहले फुलक्रीम मिल्क 28 रुपये प्रति लीटर था, अब इसकी कीमत 36 रुपये तक हो चुकी है। अगर आपके घर रोज दो लीटर दूध आता है तो पिछले एक साल में दूध का खर्च करीब 500 रुपये प्रतिमाह बढ़ गया है। गर्मी के सीजन में यह दाम और भी बढ़ सकते हैं। अब जरा स्कूल की फीस पर नजर डालें ः हम बात सिर्प ट्यूशन फीस की कर रहे हैं, जिसमें बढ़ोतरी साफ नजर आती है। दिल्ली में एक औसत दर्जे के स्कूल में ट्यूशन फीस 10 फीसदी तक बढ़ी है। एनसीआर में यह बढ़ोतरी 40 फीसदी तक रही। स्कूलों की फीस, बाकी खर्चों में बेहिसाब इजाफा हुआ है। ट्रांसपोर्टेशन, डेवलपमेंट चार्ज, इंवेट्स और स्पोर्ट्स और अन्य मद में खर्चे काफी बढ़ाए गए हैं। ईएमआई ः कहने को तो पिछले एक साल में कर्ज की ब्याज दर करीब 2.5 फीसदी ही बढ़ी है, लेकिन आज की तारीख में यह आपकी जेब का दुश्मन नम्बर वन है। घर की खातिर अगर आपने 20 साल के लिए 10 लाख रुपये भी लोन ले रखा है तो पिछले एक साल के दौरान किश्त में 1700 रुपये प्रतिमाह जुड़ चुके हैं। कार और पर्सनल लोन की ईएमआई में बढ़ोतरी अलग है। दवाएं ः सरकार के नियंत्रण वाली ढेरों जेनरिक दवाएं बाजार में नहीं मिल रहीं जबकि ये सस्ती हैं। हालांकि साल में दाम सिर्प 10 फीसदी बढ़ाने की इजाजत है लेकिन कम्पनियां अपनी मनमानी करती हैं। औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण ने ही हाल में 62 दवाओं के दाम बढ़ाए हैं, जिनमें अधिकतर इंसुलिन है, जिसकी कीमत 5 से 18 फीसदी बढ़ी है। फिर यह नहीं पता कि जो दवा आप ले रहे हैं वह असली है या नकली?
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