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Tuesday, 6 February 2024

तेजस्वी ने कहा खेला अभी बाकी है


राष्ट्रीय जनता दल नेता और बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार के एक बार फिर बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से कुछ मिनट पहले राज्य के बदले सियासी घटनाक्रम पर पहली प्रतिक्रिया दी और कहा, अभी खेला शुरू हुआ है, खेला अभी बाकी है। बिहार में बीते कई दिन से सियासी हलचल जारी थी। नीतीश कुमार के पाला बदलने की अटकलें लगाई जा रही थीं लेकिन इस बीच न तो लालू कुछ बोले और न ही तेजस्वी ने अपनी चुप्पी तोड़ी। दोनों सार्वजनिक बयान देने से बच रहे हैं। एक टीवी एंकर ने तेजस्वी से इंटरव्यू के लिए समय मांगा तो तेजस्वी ने कहा कि विश्वास मत होने के बाद वह उनसे बात करेंगे। नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के ठीक पहले बहरहाल तेजस्वी यादव ने कहा कि गठबंधन से बाहर निकली नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइडेट को लेकर एक बड़ा दावा किया है। तेजस्वी यादव ने कहा, कि मैं जो कहता हूं वो करता हूं। आप लिख के ले लीजिए, जनता दल यूनाइटेड जो पार्टी है 2024 में ही खत्म हो जाएगी। तेजस्वी यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल बिहार विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी है। 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में राष्ट्रीय जनता दल के 79 विधायक हैं। कांग्रेस के 19 और कम्युनिस्ट पार्टियों के 16 विधायकों का भी समर्थन उनके साथ है। बिहार में बहुमत के लिए 122 विधायकों के समर्थन की दरकार है। नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के 45 और बीजेपी के 78 विधायक हैं। हिंदुस्तानी आवामी मोर्चा (सेक्युलर) के चार विधायकों का समर्थन भी उनके साथ है यानि बहुमत की लकीर बहुत करीब है। इस बार नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की पार्टी साल 2022 में एक साथ आईं थीं। ये साथ करीब 17 महीने चला। तेजस्वी यादव ने कहा कि अब 17 साल (नीतीश जब से सीएम हैं) बनाम 17 महीने की तुलना होगी। तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार को थका हुआ मुख्यमंत्री बताया। नीतीश कुमार के नेतृत्व में हाल ही में बनी सरकार में खींचतान आरंभ हो गई है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और हिन्दुस्तानी आवामी मोर्चा (हम) के नेता जतिन राम मांझी ने अपनी पार्टी के लिए अधिक हिस्सेदारी की मांग उठा दी है। मांझी ने शुक्रवार को कहा कि वह स्वर्ण जाति के उम्मीदवार के लिए एक और मंत्री पद चाहते हैं। उनके बेटे संतोष सुमन ने रविवार को राज्य में बनी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार में मंत्रीपद की शपथ ली थी। पूर्व मुख्यमंत्री ने संवाददाताओं से कहा राज्य में राजग की सरकार बनने से पहले मैंने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय से कहा था कि हम दो मंत्री पद चाहते हैं। अनुसूचित जाति से हमारा एक मंत्री है। अब हम चाहते हैं कि हमारी पार्टी से एक सवर्ण जाति के विधायक को मंत्रिमंडल में समायोजित किया जाए। बिहार में नीतीश कुमार को विश्वास मत हासिल करने में समस्या आ सकती है। खुद उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड के कुछ विधायक उनका बीजेपी के साथ जाने से खुश नहीं हैं। एक-दो ने तो खुलकर बयान भी दिया है। विश्लेषक कहते हैं कि जनता दल यूनाइटेड में कुछ विधायक पाला बदल सकते हैं। इसलिए शायद तेजस्वी यादव कहते हैं कि खेला तो अभी शुरू हुआ है, असल खेला तो अभी बाकी है।

- अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 30 January 2024

बिहार में मंडल भारी या कमंडल?

बिहार  में अयोध्या का असर रहेगा या फिर मंडल भारी पड़ेगा? 1990 के दशक में जब अयोध्या में राम मंदिर बनने को लेकर आंदोलन शुरू हुआ था, उस वक्त बिहार मंडल की राजनीति चल रही थी। राम मंदिर आंदोलन में बीजेपी के सबसे बड़े नेता लालवृष्ण आडवाणी को बिहार में ही 23 अक्तूबर 1990 को गिरफ्तार किया गया था। तब बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रासाद यादव थे। लालू यादव अब भी आडवाणी की गिरफ्तारी का श्रेय लेते हैं और कहते हैं कि उन्होंने बिहार को साम्प्रादायिक तनाव से बचा लिया था। सोमवार को अयोध्या में जब राम मंदिर की प्राण प्रातिष्ठा हो रही थी तब बिहार की सड़कों पर भी इसका असर दिख रहा था। हालांकि बिहार उन राज्यों में शामिल रहा, जिसे अयोध्या में राम लला की प्राण प्रातिष्ठा के अवसर पर किसी तरह की छुट्टी की घोषणा नहीं की थी। इधर पूरा बिहार अयोध्या में 500 वर्षो बाद रामलला के लौटने की खुशी मना रहा था।

उधर बिहार को डबल खुशी का अवसर मिल गया। बिहार के बड़े नेता कर्पूरी ठावुर की जयंती के 100 साल पूरा होने के ठीक एक दिन पहले प्राधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाईं में केन्द्र सरकार ने उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न देकर चौंका दिया। इस एक पैसले से आम चुनाव से पहले दिल्ली से लेकर पटना तक राजनीतिक माहौल तेज हो गया। भारत रत्न के ऐलान के बाद प्राधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक्स पर कहा, मुझे इस बात की बहुत प्रासन्नता हो रही है कि भारत सरकार ने सामाजिक न्याय के पुरोधा महान कलात्मक कर्पूरी ठावुर जी को भारत रत्न से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। दरअसल, पिछले वुछ दिनों से बिहार में पिछड़े की राजनाि़त जोरों पर है। बीजेपी के हिन्दुत्व और राम मंदिर पैक्टर से मुकाबला के लिए नीतीश वुमार ने बिहार में जाति जनगणना का कार्ड खेला, महागठबंधन सरकार ने न सिर्प जाति जनगणना के आंकड़े जारी किए बल्कि इसके बाद पिछड़ों के लिए आरक्षण की सीमा बढ़ाईं। वहीं बुधवार को जेडीयू की रैली में कर्पूरी ठावुर को भारत रत्न दिए जाने की मांग भी एजेंडे में भी। बीजेपी को पता था कि आरजेडी के मुस्लिम और यादव वोट समीकरण और साथ में नीतीश वुमार को पिछड़े वोट के सियासी गणित को हटाना इतना आसान नहीं है। ऐसे में कर्पूरी ठावुर को भारत रत्न देने के साथ ही बीजेपी ने पिछड़ों की राजनीति और नीतीश के वोट में सेंध लगाने की कोशिश की है। कर्पूरी ठावुर को भारत रत्न देकर सामाजिक न्याय को बड़ी मान्यता दी है।

कर्पूरी ठावुर के बहाने बीजेपी बिहार के अलावा उत्तर प्रादेश और सारे राज्यों में भी बड़ा अभियान शुरू कर सकती है, पहले भी नरेन्द्र मोदी की अगुवाईं में बीजेपी ने विपक्ष के प्रातीकों को अपने पाले में करने की सफल राजनीति की है, ऐसे में बीजेपी ने एक पैसले से दो शिकार किए हैं और मंडल-कमंडल दोनों कार्ड को अपने पाले में करने की कोशिश की है। 2024 का लोकसभा चुनाव करीब है, देखना यह है कि बीजेपी की यह चाल दोनों मंडल और कमंडल साथ लेने की रणनीति कितनी कामयाब रहती है।

——अनिल नरेन्द्र

Sunday, 3 June 2012

ब्रह्मेश्वर की हत्या से कहीं फिर से हिंसा का दौर आरंभ न हो जाए

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 3 June 2012
अनिल नरेन्द्र
जब से बिहार में श्री नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली है तब से राज्य में कोई बड़ी हिंसा की घटना नहीं हुई है। इससे लगने लगा कि कभी हिंसा के लिए बदनाम बिहार में यह हिंसा का दौर खत्म हो गया है। पर शुकवार को एक नया तूफान उठ गया। कुख्यात जातीय गुट रणवीर सेना के संस्थापक ब्रह्मेश्वर सिंह उर्प मुखिया की बड़ी सनसनीखेज ढंग से हत्या कर दी गई। वे आरा में अपने निवास से सुबह की सैर पर निकले ही थे कि मोटरसाइकिल से आए अज्ञात हमलावरों ने उन पर गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। करीब चालीस गोलियों से ब्रह्मेश्वर को छलनी कर दिया। 1990 के दौर में जब नक्सलियों का आतंक था तो इससे निपटने के लिए भूस्वामियों ने जिनमें सारी सवर्ण जातीयां शामिल थी, ने रणवीर सेना का गठन ब्रह्मेश्वर सिंह ने गठन किया था। इस निजी सेना पर कई नरसंहारों के आरोप हैं। इनमें लक्ष्मणपुर बाथे, सिंचापुर और बकसीटोला के चर्चित नरसंहार शामिल हैं। सन् 1994 से लेकर 2002 के बीच करीब 250 लोगों की हत्या के 26 मामलों में मुख्य आरोपी ब्रह्मेश्वर मुखिया को सबूतों के अभाव के चलते जुलाई 2011 में अदालत ने जमानत दी थी। ब्रह्मेश्वर सिंह एक दौर में आतंक का पर्याय बन गए थे। उन्हें हत्याओं के 16 मामलों में बरी किया गया था और छह मामलों में जमानत पर थे। नौ साल तक जेल में रहने के बाद पिछले महीने ही वे बाहर आए थे। उनकी तैयारी चुनावी राजनीति में पूंदने की थी। उनकी हत्या के बाद उनके समर्थकों में गुस्सा फूट गया। इन लोगों ने पहले बीडीओ कार्यालय को निशाना बनाया, वहां जमकर तोड़फोड़ के बाद आग लगा दी। इसके बाद करीब एक हजार लोगों के हुजूम ने सर्पिट हाउस पर धावा बोल दिया, जाते-जाते इसमें भी आग लगा दी। पूरे राज्य में हाईअलर्ट जारी कर दिया गया है। भागलपुर जिले में सेवा यात्रा में व्यस्त मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कहना है कि हत्यारों को पकड़ा जाएगा और उन्हें सजा मिल कर रहेगी। डर यह है कि कहीं फिर से बिहार में जातिवादी हिंसा न भड़क पड़े। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं में इस हत्या का राजनीतिक लाभ लेने की होड़ शुरू हो गई है। बिहार की बुनियादी समस्या जमीन की मिलकियत से जुड़ी हुई है। लंबे वक्त तक भूमि सुधार न होने की वजह से विभिन्न जातियों के बीच विरोध और टकराव तेज होता गया। न बिहार में उस हद तक औद्योगीकरण हुआ, न ही हरित कांति जैसा बदलाव हुआ, जो आर्थिक और जातिगत संबंधों को बदलता। ऐसे ठहराव के दौर में गरीब और भूमिहीन दलितों के बीच नक्सलियों का पभाव बढ़ता गया जिन्होंने आर्थिक और सामाजिक बेहतरी की उनकी आकांक्षाओं को उग्र और हिंसक रूप दिया। इसकी पतिकिया में सभी जातियों ने अपनी हिंसक सेनाएं बना डाली। मंडलवाद के दौर में बदली गई राजनीति से भी जमीन से जुड़े आर्थिक संबंधों को व्यवस्थित रूप से ठीक करने की कोशिश नहीं की, इसके बदलाव अराजक हिंसक तरीके से हुआ। ब्रह्मेश्वर सिंह जैसे नेता ऐसे में सभी जातियों के नायक बन गए। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। पतिकिया स्वरूप फिर से बिहार में जातीय संघर्ष को हर हालत में रोकना होगा।
Anil Narendra, Bihar, Daily Pratap, Nitish Kumar, Ranvir Sena, Vir Arjun

Sunday, 4 March 2012

चार्जशीट दाखिल करने में 17 वर्ष तो फैसला आने में कितने वर्ष

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4 March 2012
अनिल नरेन्द्र
बहुचर्चित चारा घोटाले में सीबीआई ने गुरुवार को अंतत अदालत में एक आरोप पत्र दाखिल किया है। इसमें पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र आरोपी हैं। यह आरोप पत्र 1994 और 1996 के बीच 46 लाख रुपये के घोटाले को लेकर है। एक मौजूदा सांसद और एक पूर्व सांसद भी इसमें आरोपी हैं। यह आरोप पत्र बताता है कि ताकतवर लोगों के भ्रष्टाचार की जांच की गति कितनी धीमी की जा सकती है। इस आरोप पत्र को दाखिल करने में ही लगभग 17-18 वर्ष लग गए तो मुकदमा चलने और फैसला आने में कितना वक्त लगेगा, आप खुद ही तय कर लें और फिर जब फैसला आएगा तो उस पर ऊंची अदालतों में चैलेंज होगा और अंतिम पैसला आते-आते युग बीत जाएंगे। भ्रष्टाचार के मामलों में इसलिए आरोपियों को सजा से डर नहीं लगता, क्योंकि वह जानते हैं कि अंतिम फैसला आते-आते उम्र ही बीत जाएगी। पशुपालन विभाग में पैसे की गड़बड़ी की पहली आशंका सीएजी ने सन् 1985 में व्यक्त की थी। शुरू में यह घोटाला बड़ा नहीं था और इसमें ज्यादा बड़े लोग शामिल नहीं थे। अगर शुरू में ही इस पर रोक लग जाती तो इसका इतना विस्तार नहीं होता। इस घोटाले को लेकर चेतावनियां आती रहीं लेकिन उन्हें नजरअंदाज किया जाता रहा। बिहार में एक के बाद दूसरे मुख्यमंत्री आते रहे और घोटाला बड़ा होता गया। यह माना गया है कि 1995-96 तक इस घोटाले में लगभग 10 अरब की हेराफेरी हो चुकी थी। इसके बाद भी जांच को रोकने की पूरी-पूरी कोशिश की गई, लेकिन पटना हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दखल से यह मामला सीबीआई को सौंपा गया और रुक-रुक कर ही सही, इसकी जांच होती रही, जो काफी हद तक राजनीतिक परिवर्तन से जुड़ी रही। आजाद भारत में भ्रष्टाचार को रोकने में क्या-क्या रुकावट आती है, उसका एक ज्वलंत उदाहरण बन गया है यह चारा कांड। चारा घोटाले के दौरान मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को घपले की जानकारियां मिल रही थीं। बावजूद इसके उन्होंने समय रहते इसे रोकने का कोई कारगर कदम नहीं उठाया। यहां तक कि दूसरों को भी नहीं उठाने दिया। उनके कार्यकाल में एक ही दिन में 57 लाख रुपये से अधिक की अवैध निकासी घोटालेबाजों ने की जबकि वैध निकासी एक लाख रुपये तक की करने की अनुमति थी। अवैध निकासी के करोड़ों रुपये से बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों एवं अफसरों की हवाई सुविधा, होटल खर्च समेत अन्य खर्चों को उठाया जाता था। घोटाले से जुड़ी कैग रिपोर्ट दिसम्बर 1993 में मिलने के बावजूद किसी प्रकार की कोई कार्रवाई नहीं की गई। झारखंड कैडर के आईएएस अमित खरे ने पशुपालन विभाग में की गई आर्थिक गड़बड़ियों को पकड़ा था। उस समय वह चाइबासा के डीसी थे। उन्होंने इस मामले में उच्च स्तरीय जांच की सिफारिश सरकार से की थी। इस मामले में व्यापक स्तर पर फर्जीवाड़ा किया गया। सरकार के पशुपालन विभाग ने गाय-भैंस ढोने या चारा लाने वाले जिन वाहनों का नम्बर दर्ज किया, जांच में वो स्कूटर व मोटर साइकिल निकले। साथ ही बड़े पैमाने पर फर्जी आपूर्ति दिखाई गई। करीब 900 करोड़ के इस घोटाले में सीबीआई अब तक 350 करोड़ रुपये की सम्पत्ति जब्त कर चुकी है। ज्यादातर रिकवरी आभूषण और अचल सम्पत्ति के माध्यम से की गई है। सीबीआई को उम्मीद है कि यह रिकवरी करीब 500 करोड़ रुपये तक जा सकती है। सीबीआई का मानना है कि करीब 350-400 करोड़ रुपये ऐशो-आराम में पूंके जा चुके हैं।
लिहाजा इसकी रिकवरी तार्पिक रूप से सम्भव नहीं है। हालांकि लालू जी इस कांड के पांच मामलों में 244 दिन जेल में रह चुके हैं पर उनकी मुसीबतें खत्म नहीं हुई हैं। लालू प्रसाद यादव से जुड़े एक और अन्य मामले में दो महीने के अन्दर रांची की एक अदालत में फैसला आना है। अदालत में लालू समेत सभी आरोपियों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। अब सिर्प बहस बाकी है। जगन्नाथ मिश्र अब राजनीति से बाहर हो चुके हैं और लालू प्रसाद यादव का युग बीत चुका है। न तो वह बिहार में और न ही केंद्र में अब उनका ज्यादा महत्व बचा है और इस बात की संभावना कम ही लगती है कि भविष्य में उनका राजनीतिक कद इतना ऊंचा हो पाएगा, जितना वह पहले था। इसी वजह से लालू की राजनीति लगातार अप्रासंगिक होती गई और वह बदले जमाने की आहट को नहीं पहचान पाए। शायद लालू प्रसाद यादव के खिलाफ मामले के निपटारे में अब तेजी आए, क्योंकि उनका राजनीतिक रसूख घटा है। लेकिन जरूरत तो इस बात की ज्यादा है कि देश में भ्रष्टाचार को रोकने के प्रभावी कदम उठाए जाएं।
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Friday, 21 October 2011

क्या नरेन्द्र मोदी पार्टी से ऊपर हो चुके हैं?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21st October 2011
अनिल नरेन्द्र
पिछले कुछ समय से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी भाजपा के बीच समीकरण ठीक नहीं लग रहा। भाजपा में मोदी को लेकर दोनों रोष और अलगाव की भावना पैदा हो रही है। भाजपा के नेतृत्व का मानना है कि नरेन्द्र मोदी को अब अहंकार हो गया है और वह अपने आपको पार्टी से ऊपर मानने लगे हैं। पार्टी ने मोदी को उनकी हैसियत का अहसास करवाना शुरू कर दिया है। लाल कृष्ण आडवाणी की जनचेतना यात्रा पर आंखें दिखाने वाले नरेन्द्र मोदी को इस यात्रा में बिल्कुल अनदेखा कर दिया है। वह कहीं भी नजर नहीं आ रहे और अब अखबारों में उनकी सुर्खियां भी कम देखने को मिल रही हैं। आडवाणी जी ने अपनी यात्रा में भाजपा के और तमाम मुख्यमंत्रियों के कामकाज, उपलब्धियों का जिक्र किया है पर उन्होंने अभी तक एक भी बड़ी सभा में नरेन्द्र मोदी का नाम नहीं लिया। यही आडवाणी पहले नरेन्द्र मोदी को एक आदर्श मुख्यमंत्री पेश करते थकते नहीं थे। भाजपा नेतृत्व का मानना है कि मोदी का राजनीतिक कद काफी बड़ा हो चुका है। उन्हें यह अहसास कराने की जरूरत है कि पार्टी उनकी वजह से नहीं बल्कि वे पार्टी की वजह से हैं। इसके तहत इस मुद्दे पर अब विचार किया जा रहा है कि अगले साल में शुरू होने वाले उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों में विधानसभा चुनावों में मोदी को प्रचार के लिए न बुलाया जाए। पार्टी को लगता है कि अपनी कट्टरवादी हिन्दुत्व की छवि के कारण अगर मोदी प्रचार करते हैं तो तमाम मुसलमान बिखर जाएंगे और भाजपा का मोदी की वजह से विरोध करना शुरू कर देंगे। भाजपा को यह मालूम है कि एक भी मुसलमान वोट उसे मिलने वाला नहीं पर वह यह भी नहीं चाहती कि बिना वजह मुसलमान पार्टी के खिलाफ आक्रामक रुख अपना लें। पार्टी उत्तर प्रदेश में पिछड़े व अतिपिछड़े वर्ग को अपने साथ जोड़ने के लिए नीतीश कुमार की मदद लेना बेहतर विकल्प समझने लगी है। नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी के कट्टर विरोधी माने जाते हैं। यह महज इत्तेफाक नहीं कि श्री आडवाणी ने अपनी जनचेतना यात्रा को बिहार से शुरू किया और इस यात्रा को हरी झंडी नीतीश ने दिखाई। बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भी उन्होंने मोदी को प्रदेश में न भेजने की चेतावनी दी थी, भाजपा ने इस पर अमल किया और नतीजे सबके सामने हैं। आज नीतीश कुमार एनडीए के सबसे सशक्त उम्मीदवार बनकर उभरे हैं। भाजपा को भी सूट करता है कि वह एनडीए को आगे बढ़ाए और इस रास्ते से वह सत्ता तक पहुंचे। मोदी का कद छोटा करने के लिए भाजाप नेतृत्व और संघ ने मिलकर जानबूझ कर संजय जोशी को जिम्मेदारी सौंपी है। नरेन्द्र मोदी संजय जोशी को बेहद नापसंद करते हैं। उन्हें संगठन मंत्री पद से हटवाने में उनकी बहुत अहम भूमिका रही। वैसे तो लाल कृष्ण आडवाणी भी संजय जोशी को पसंद नहीं करते क्योंकि जिन्ना प्रकरण में संजय जोशी ने ही आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने को कहा था। आमतौर पर अध्यक्ष अपना इस्तीफा उपाध्यक्ष को देता है पर आडवाणी ने अपना इस्तीफा संजय जोशी को भेजा था।
श्री नरेन्द्र मोदी की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। वह अपने घर में ही घिरते जा रहे हैं। गुजरात दंगों के मामले में नरेन्द्र मोदी को फंसाने के लिए झूठे साक्ष्य गढ़ने वाले निलम्बित और फिर गिरफ्तार किए गए आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को सोमवार एक स्थानीय अदालत ने तमाम विरोध के बावजूद जमानत दे दी। अदालत ने उस प्रकरण पर तार्किक संदेह व्यक्त किया जिसके तहत भट्ट को गिरफ्तार किया गया था। रिहा होते ही भट्ट ने मोदी पर हमला बोल दिया। भट्ट ने मोदी को अपराधी बताते हुए कहा कि मेरे लिए मोदी सिर्प एक अपराधी हैं जो मुख्यमंत्री बन गए हैं। मोदी और उनके लोग खुद को बचाने के लिए मेरी हत्या तक करवा सकते हैं। जैसा कि हरेन पांड्या का कराया गया। यह निश्चित है कि कांग्रेस जो संजीव भट्ट को उकसा रही है इनका जमानत पर छूटने और बाहर आने का पूरा-पूरा लाभ उठाएगी। हैरानगी तो इस बात की भी है कि गुजरात के तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने संजीव भट्ट का खुला समर्थन कर दिया है। 30 सितम्बर को भट्ट की गिरफ्तारी के बाद यह पहली बार है जब अधिकारी भट्ट परिवार से मिलने उसके घर गया और संजीव की पत्नी श्वेता भट्ट से मुलाकात की। यह मुलाकात करीब दो घंटे चली। श्वेता ने बताया कि तीनों अधिकारियों ने संजीव के साथ हो रहे घटनाक्रम पर खेद व्यक्त किया और मदद का आश्वासन दिया। आने वाले दिनों में लगता है कि नरेन्द्र मोदी की समस्याएं बढ़ने ही वाली हैं, घटने वाली नहीं।
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Wednesday, 7 September 2011

नीतीश कुमार ने दिखाया भ्रष्ट अफसरों से निपटने का तरीका


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th September 2011
अनिल नरेन्द्र
भ्रष्टाचार के खिलाफ राष्ट्रव्यापी गूंज के बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश ने रविवार को एक मिसाल कायम की है। अनैतिक तरीके से सम्पत्ति अर्जित करने वाले एफआईएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) के वरिष्ठ अधिकारी
शिवशंकर वर्मा का रुकनपुरा स्थित बंगला जब्त कर लिया गया है। सरकार ने घोषणा कर दी कि वह अब बंगला सरकारी सम्पत्ति है। देश के लिए यह पहला मौका है जब किसी राज्य सरकार ने किसी अफसर की सम्पत्ति जब्त की हो। बिहार की राजग सरकार ने भ्रष्ट तरीके से अर्जित सम्पत्ति को जब्त करने का कानून (बिहार विशेष न्यायालय विधेयक 2009) बनाया हुआ है। देश के अन्य किसी सूबे में ऐसा कानून नहीं है। पटना के दंडाधिकारी के आदेश पर रविवार को एसएस वर्मा के आवास पर जब्ती की कार्रवाई शाम छह बजे तक चली। मूल रूप से लखनऊ में मोहन लाल गंज तहसील के नगराम थाना क्षेत्र में गरहा गांव के मूल निवासी वर्मा के खिलाफ स्पेशल विजिलेंस यूनिट ने आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने (डीए) का मुकदमा दर्ज किया हुआ है। छह जुलाई 2007 को एजेंसी ने उनके ठिकानों पर छापा मारा था। सिर्प उनके लॉकर से ही 9 किलो सोना बरामद हुआ। स्पेशल विजिलेंस यूनिट ने एसएस वर्मा पर 1.43 करोड़ का मुकदमा किया हुआ है। जांच एजेंसी को वर्मा के खिलाफ 3 जुलाई 2007 से आय से 68 लाख, 70 हजार रुपये अधिक सम्पत्ति रखने की जानकारी मिली थी। जांच के दौरान 19 लाख, 7 हजार, 910 रुपये नकद, 24854 अमेरिकी डालर, 22 लाख, 14 हजार, 893 रुपये का घरेलू सामान, तीन लाख 55 हजार 227 रुपये के आभूषण, 80 लाख, 78 हजार 596 रुपये का सोना, 27 हजार रुपये का वेवली स्कॉट रिवाल्वर, पटना-रायबरेली में एक लाख, 68 हजार रुपये की भूमि की जानकारी मिली।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि यह भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी जंग का सार्थक चरण है। हमने ऐसी व्यवस्था की हुई है कि कोई सपने में भी गड़बड़ी करने का न सोचे। इसी मामले में साबित हो गया कि कोई गलत तरीके से सम्पत्ति को अर्जित करता है तो उसे छिपा नहीं सकता। ऐसी सम्पत्तियों को जब्त करके हम स्कूल खोलेंगे। उसका सार्वजनिक उपयोग होगा। आखिर पैसा तो जनता का ही है। अभी ढेर सारे लोग पाइप लाइन में हैं। देखते जाइए। निगरानी की विशेष अदालत से आरोप सिद्ध होने के बाद एसएस वर्मा ने हाई कोर्ट में राहत के लिए याचिका दायर की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। 11 मई 2011 को निगरानी के विशेष न्यायाधीश आरसी मिश्रा ने राज्य सरकार के बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम 2009 के एक्ट 13(ई) के तहत सम्पत्ति जब्त का फैसला
सुनाया था। 19 अगस्त 2011 को पटना हाई कोर्ट ने इस पर अपनी मोहर लगाई और अंतत रविवार को पटना के जिला दंडाधिकारी संजय कुमार सिंह ने वर्मा के सौभाग्य शर्मा पथ रुकनपुरा स्थित बंगले को जब्त करने का आदेश पारित किया और जब्ती हो गई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी राजग सरकार इस ठोस पहल के लिए बधाई की पात्र है। उन्होंने सारे देश को रास्ता दिखा दिया कि भ्रष्टाचार से निपटने का एक तरीका यह भी है।
Anil Narendra, Bihar, Corruption, Daily Pratap, Nitish Kumar, Vir Arjun

Friday, 1 July 2011

भाजपा के विधानसभा उपचुनाव में सफलता के कारण

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1st July 2011
अनिल रेन्द्र
दो राज्यों में हुए विधानसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पाटा ने दोनों सीटों पर सफलता अर्जित की है। मध्य प्रादेश की जबेरा सीट पर भाजपा के दशरथ लोधी ने कांग्रोस की डॉ. तान्या सालोमन को 11,738 वोटों के अन्तर से हराया।
भाजपा ने यह सीट कांग्रोस से छीनी है। उधर बिहार में पूर्णिया सदर सीट पर भाजपा की किरण केसरी ने कांग्रोस के रामचरित्र यादव को 23,665 वोटों से पराजित किया। इस सीट पर भाजपा का कब्जा बरकरार है। इन शानदार सफलताओं से एक बार फिर साबित होता है कि कांग्रोस की छवि और स्थिति कितनी खराब हो गईं है। इसका एक और महत्वपूर्ण कारण है इन राज्यों में सशक्त नेतृत्व। भाजपा शासित राज्यों में अच्छी छवि का सबसे बड़ा कारण है वहां पाटा का नेता। पाटा के नेता की छवि स्वच्छ, ईंमानदार, जनता के प्राति संवेदनशील, नौकरशाह पर वंट्रोल और सही प्राथमिकताओं को रखना अति आवश्यक है। नेता कार्यंकर्ता को अपने पास रखे और सत्ता में उनसे भागीदारी करे। मुझे बीजेपी के कर्मठ और हार्ड कोर कायकर्ता ने एक पते की बात बताईं। उन्होंने कहा कि भाजपा और कांग्रोस में एक बड़ा बुनियादी फर्व क्या है? कांग्रोस जब सत्ता में आती है, तो सत्ता का सुख, लाभ, पुरस्कार अपने कार्यंकर्ताओं से बांटते हैं यानि कार्यंकर्ता को सत्ता का लाभ मिलता है। दूसरी ओर भाजपा नेता चुनाव से पहले तो कार्यंकर्ता को माईं-बाप बना लेते हैं और चुनाव जीतने के बाद जब सत्ता सुख बांटने की बारी आती है तो वह अपने एयरवंडीशन ड्राइंग रूम में बन्द होकर रह जाते हैं, कार्यंकर्ता उनके घर, कार्यांलय में घुस भी नहीं सकता। वह सत्ता सुख, सत्ता के लाभ, प्रासाद खुद ही भोगना चाहते हैं, कार्यंकर्ताओं से बांटने को तैयार नहीं होते। यही वजह है कि अगले चुनाव में वह कार्यंकर्ता घर बैठ जाता है और कहता है कि हमारी बला से यह जीते या हारे, हमें क्या लेना-देना है? दूसरी ओर कांग्रोस का कार्यंकर्ता अगले चुनाव में पूरा दमखम लगा देता है। इसलिए क्योंकि अपने नेता को जिताने में उसका भी स्वार्थ जुड़ा होता है। जब तक भाजपा वेंद्रीय नेतृत्व को यह साधारणसी बात समझ नहीं आती वह शायद ही सत्ता में आ सवें। अगर मध्य प्रादेश, बिहार या गुजरात में भाजपा को इतनी सफलता मिल रही है तो उसका एक बड़ा कारण है वहां पाटा का मुख्यमंत्री। आम कार्यंकर्ता अपने आपको अपने नेता से आइडेंटीफाईं करता है और उसे मालूम है कि उसे कोईं भी समस्या होगी या उसका कोईं काम होगा तो वह अपने नेता पर भरोसा कर सकता है।
कांग्रोस में वुछ नेता चाहे जितनी भी विपरीत हवा हो, चुनाव जीत जाते हैं क्योंकि उनके कार्यंकर्ता उन्हें जिताने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं।
आज भारतीय जनता पाटा के वेंद्रीय नेतृत्व में इतनी गुटबाजी है, प्राधानमंत्री बनने की होड़ लगी हुईं कि उन्हें सिवाय अपना जोड़तोड़ करने की किसी को पुर्सत नहीं है। एक-दूसरे की टांग खींचना, नम्बर घटाने के खेल में यह दिन-रात जुटे हुए हैं। यह बात मैं अकेला नहीं कह रहा, खुद पाटा के दिग्गज नेता श्री लाल वृष्ण आडवाणी ने हाल ही में कही है। पूर्व उपप्राधानमंत्री और भारतीय जनता पाटा संसदीय दल के अध्यक्ष लाल वृष्ण आडवाणी ने कहा है कि ईंमानदारी के मामले में पाटा की साख गिरी है। उन्होंने कहा कि पाटा में गुटबाजी अब तेजी से बढ़ रही है। इससे भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है। भाजपा के अंदरुनी सूत्रों के अनुसार आडवाणी ने दिल्ली नगर निगम के भाजपा पार्षदों के लिए दिल्ली के छतरपुर मंदिर में आयोजित प्राशिक्षण शिविर के उद्घाटन सत्र में कहा कि पाटा का निगम के कामों में तो प्रादर्शन अच्छा नहीं रहा है, ईंमानदारी के मामले में पाटा की साख गिरी है। इस मामले में उन्होंने अहमदाबाद नगर निगम की तारीफ करते हुए कहा कि वहां ईंमानदारी से काम हो रहा है। उन्होंने कहा कि दिल्ली प्रादेश भाजपा में पहले भी गुटबाजी थी, अब यह गुटबाजी और बढ़ रही है। उन्होंने साफ कहा कि पाटा की साख गिराने के लिए खुद पाटा के वुछ नेता जिम्मेदार हैं। आडवाणी जी ने बेशक यह बातें दिल्ली प्रादेश भाजपा नेताओं के लिए कही हों पर इशारे- इशारे में वे एक तीर से कईं शिकार कर गए हैं। आज की आवश्यकता यह है कि भाजपा के वेंद्रीय नेतृत्व के दूसरी पंक्ति के नेता प्राधानमंत्री बनने का सपना छोड़े और भाजपा ऐसे व्यक्ति को पीएम के तौर पर प्राोजेक्ट करे जो पूरी पाटा को साथ लेकर चल सके। वर्तमान नेतृत्व में मुझे तो ऐसे तीन ही विकल्प नजर आते हैं जिन्हें अनुभव है, जो ईंमानदार छवि के हैं, जो पाटा कार्यंकर्ताओं को साथ लेकर चला सकते हैं, जिनमें अहंकार इतना नहीं आया कि वह अपनी जमीन ही भूल जाएं—ये हैं श्री लाल वृष्ण आडवाणी, श्री मुरली मनोहर जोशी और श्री नरेन्द्र मोदी।
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