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Friday, 18 May 2012

मध्य प्रदेश के यह भ्रष्ट अफसर

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18 May 2012
अनिल नरेन्द्र
इस देश में लगता है कि बाबुओं ने भ्रष्टाचार के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। मध्य प्रदेश में भ्रष्ट अफसरों और कारोबारियों की तिजोरियों से अकूत सम्पदा निकल रही है। पिछले एक साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो 1200 करोड़ रुपये से अधिक की सम्पत्ति उजागर हो चुकी है यानि हर माह सौ करोड़ रुपये भ्रष्टों की जेब से निकले हैं। आयकर, लोकायुक्त सहित अन्य एजेंसियां द्वारा डाले गए छापों में यह रकम उजागर हुई है। आयकर व लोकायुक्त अधिकारियों ने कहा कि यदि उन्हें और अधिकार दे दिए जाएं तो वे उस चल-अचल सम्पत्ति को और भी पकड़ सकते हैं जो भ्रष्ट तरीके से अर्जित की गई है अथवा जिसमें कालेधन का इस्तेमाल किया गया है। वर्ष 2011-12 में विभिन्न एजेंसियों की छापामार कार्रवाई में इंदौर, भोपाल, जबलपुर व ग्वालियर में की गई 17 छापामार कार्रवाइयों में इन्वेस्टीगेशन विंग ने 482 करोड़ रुपये सरेंडर कराए हैं। सुरेश चन्द बंसल ग्रुप, सागर ग्रुप, सिगनेट ग्रुप, मोखा बिल्डरöडॉ. जामदार, अम्बिका साल्वेक्स आदि समूहों पर कार्रवाई हुई। नकद व अचल सम्पत्तियां 45 करोड़ की जब्त की गई। मध्य प्रदेश में 182 सर्वे किए गए। भोपाल में 87 व इंदौर में 95 सर्वे में क्रमश 56 करोड़ व 723 करोड़ रुपये सरेंडर हुए। ये सर्वे व्यापारियों, संस्थाओं और बिजनेस समूहों पर किए गए। यही इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि जो पैसे विकास योजनाओं पर लगना चाहिए था वह इन भ्रष्ट अफसरों की जेबों में चला जाता है। जितने पैसे इन अफसरों ने लूटे उसमें तो प्रदेश में गांवों व कस्बों तक 7 मीटर चौड़ाई की 3000 किलोमीटर सड़क बनाई जा सकती थी या फुटपाथों पर रहने वाले अथवा गरीबों के लिए 1.20 लाख घर बन सकते हैं। प्राइमरी शिक्षा के लिए आठ हजार स्कूल भवन बनाए जा सकते थे। सर्व सुविधायुक्त व अत्याधुनिक 5 हॉस्पिटल बन सकते थे। प्रदेश में कम से कम एक अच्छा अस्पताल बन सकता था।
इस देश में लगता है कि बाबुओं ने भ्रष्टाचार के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। मध्य प्रदेश में भ्रष्ट अफसरों और कारोबारियों की तिजोरियों से अकूत सम्पदा निकल रही है। पिछले एक साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो 1200 करोड़ रुपये से अधिक की सम्पत्ति उजागर हो चुकी है यानि हर माह सौ करोड़ रुपये भ्रष्टों की जेब से निकले हैं। आयकर, लोकायुक्त सहित अन्य एजेंसियां द्वारा डाले गए छापों में यह रकम उजागर हुई है। आयकर व लोकायुक्त अधिकारियों ने कहा कि यदि उन्हें और अधिकार दे दिए जाएं तो वे उस चल-अचल सम्पत्ति को और भी पकड़ सकते हैं जो भ्रष्ट तरीके से अर्जित की गई है अथवा जिसमें कालेधन का इस्तेमाल किया गया है। वर्ष 2011-12 में विभिन्न एजेंसियों की छापामार कार्रवाई में इंदौर, भोपाल, जबलपुर व ग्वालियर में की गई 17 छापामार कार्रवाइयों में इन्वेस्टीगेशन विंग ने 482 करोड़ रुपये सरेंडर कराए हैं। सुरेश चन्द बंसल ग्रुप, सागर ग्रुप, सिगनेट ग्रुप, मोखा बिल्डरöडॉ. जामदार, अम्बिका साल्वेक्स आदि समूहों पर कार्रवाई हुई। नकद व अचल सम्पत्तियां 45 करोड़ की जब्त की गई। मध्य प्रदेश में 182 सर्वे किए गए। भोपाल में 87 व इंदौर में 95 सर्वे में क्रमश 56 करोड़ व 723 करोड़ रुपये सरेंडर हुए। ये सर्वे व्यापारियों, संस्थाओं और बिजनेस समूहों पर किए गए। यही इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि जो पैसे विकास योजनाओं पर लगना चाहिए था वह इन भ्रष्ट अफसरों की जेबों में चला जाता है। जितने पैसे इन अफसरों ने लूटे उसमें तो प्रदेश में गांवों व कस्बों तक 7 मीटर चौड़ाई की 3000 किलोमीटर सड़क बनाई जा सकती थी या फुटपाथों पर रहने वाले अथवा गरीबों के लिए 1.20 लाख घर बन सकते हैं। प्राइमरी शिक्षा के लिए आठ हजार स्कूल भवन बनाए जा सकते थे। सर्व सुविधायुक्त व अत्याधुनिक 5 हॉस्पिटल बन सकते थे। प्रदेश में कम से कम एक अच्छा अस्पताल बन सकता था।

Sunday, 13 May 2012

क्या गुटखा अब चंद महीनों का मेहमान रह गया है?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13 May 2012
अनिल नरेन्द्र
गुटखा खाने वालों के लिए खबर अच्छी नहीं है। मध्य प्रदेश ने गुटखे पर प्रतिबंध लगा दिया है। अब अन्य राज्यों ने भी मध्य प्रदेश के नक्शे कदम पर चलने की तैयारी शुरू कर दी है। इनमें गुटखा का जन्मदाता राज्य उत्तर प्रदेश भी शामिल है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का भी अब मानना है कि वह दिन दूर नहीं जब सभी राज्यों में गुटखे पर प्रतिबंध लग जाए। वैसे केंद्र सरकार ने बहुत पहले ही गुटखा पर प्रतिबंध लगाने की अधिसूचना जारी कर दी थी। अब लाइसेंस रद्द कर इस प्रतिबंध को लागू करने का काम राज्य सरकारों का है। मध्य प्रेदश ने इस दिशा में पहल कर पूरे देश में गुटखा पर प्रतिबंध का रास्ता खोल दिया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने विभिन्न राज्यों से इस बारे में मिल रहे `इनपुट' के आधार पर दावा किया कि गुटखा के अब गिनती के चंद महीने रह गए हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में तंबाकू नियंत्रण के निदेशक अमल पुष्प ने कहा कि केंद्र सरकार ने तो पहले ही गुटखा पर प्रतिबंध की अधिसूचना जारी कर दी है पर उसे लागू तो राज्य सरकारों को ही करना है। मध्य प्रदेश में गुटखा पर प्रतिबंध की वजह से दूसरे राज्यों पर भी यह कदम उठाने का नैतिक दबाव काफी बढ़ गया है। इसका असर भी दिखने लगा है। गुटखा की लत से देश के युवकों एवं बच्चों की सेहत पर भारी खतरा पैदा हो गया है। अमल पुष्प ने कहा कि राजस्थान, झारखंड, केरल सहित कई राज्यों के कानून विभाग ने गुटखा पर प्रतिबंध की प्रक्रिया शुरू भी कर दी है। इस दिशा में सबसे सकारात्मक बात यह हुई है कि गुटखा के जन्मदाता राज्य उत्तर प्रदेश में गुटखा प्रतिबंध को लेकर सरकार ने विचार शुरू कर दिया है। मध्य प्रदेश की तरह केरल में भी जल्द ही प्रतिबंध की घोषणा होने वाली है। उन्होंने बताया कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश के सभी राज्यों के पास मध्य प्रदेश के इस कदम की अधिसूचना भेज दी है, साथ ही सभी राज्य तंबाकू नियंत्रण सेलों में केंद्रीय प्रतिनिधि को यह निर्देश दिया गया है कि वे अपने-अपने राज्यों में प्रतिबंध को लेकर दबाव बढ़ाएं। अमल पुष्प ने कहा कि केंद्र सरकार ने फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथारिटी ऑफ इंडिया की अधिसूचना के जरिए बहुत पहले यह तय कर दिया है कि गुटखा एक खाद्य पदार्थ है इसलिए इसमें तंबाकू और निकोटिन नहीं मिलाए जा सकते। सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया है कि गुटखा एक खाद्य पदार्थ है। अमल पुष्प ने कहा कि फिल्मों में सिगरेट पीने के दृश्यों को लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की अधिसूचना की अड़चनें भी जल्द खत्म हो जाएंगी। दूसरी ओर गुटखा खाने वालों का कहना है कि गुटखा खाना या न खाना अपनी-अपनी पसंद है और इसमें सरकार को कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। सरकार ज्यादा से ज्यादा यह कर सकती है कि गुटखे के सेवन से उत्पन्न होने वाले खराब प्रभाव को प्रसारित करे पर अंतिम फैसला उपभोक्ता पर ही छोड़ा जाना चाहिए।
Anil Narendra, Daily Pratap, Gutkha, Madhya Pradesh, Vir Arjun

Tuesday, 13 March 2012

एक और ईमानदार अफसर खनन माफिया का शिकार हुआ

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13 March 2012
अनिल नरेन्द्र
मुरैना जिले में एक युवा आईपीएस अफसर नरेन्द्र कुमार की निर्मम हत्या से एक बार फिर स्पष्ट हो गया है कि अवैध खनन माफिया से टकराना कितना भारी जोखिम का काम है। खनन माफिया से टकराने की कीमत नरेन्द्र कुमार जैसे ईमानदार अफसर को अपनी जान गंवा कर चुकानी पड़ी है। मध्य प्रदेश के बानमोर में जांबाज पुलिस अधिकारी नरेन्द्र कुमार सिंह की हत्या से जुड़ी यह घटना बताती है कि भ्रष्ट और आपराधिक तत्वों की व्यवस्था के भीतर कितनी गहरी पैठ है कि वे अपना हित साधने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इस युवा अफसर का कुसूर सिर्प इतना था कि उसने इस इलाके में हो रहे अंधाधुंध अवैध खनन पर ऐतराज किया था, मगर बलुआ पत्थर से लदी एक ट्रैक्टर-ट्रॉली के ड्राइवर को यह नागवार गुजरा और उन्हें रौंद दिया गया, वह भी पुलिस चौकी से महज 500 मीटर दूर। 2009 बैच के आईपीएस अधिकारी नरेन्द्र कुमार सिंह की पोस्टिंग 16 जनवरी को मुरैना के बानमोर में एसडीओपी के रूप में हुई थी। उन्होंने एक महीने में अवैध खनन के 20 से ज्यादा मामले दर्ज किए थे। वे खनन माफिया की आंखों की किरकिरी बने हुए थे। इसी वजह से हत्या की साजिश की अटकलें भी लगाई जा रही हैं। नरेन्द्र कुमार गुरुवार को आधिकारिक जीप में पेट्रोलिंग पर निकले थे। उन्होंने बोल्डरों से भरा एक ट्रैक्टर एबी रोड पर देखा, उसका पीछा किया। उनके कहने पर ड्राइवर मनोज गुर्जर ने ट्रैक्टर रोका। जैसे ही नरेन्द्र ट्रैक्टर के पास पहुंचे मनोज ने ट्रैक्टर स्टार्ट कर आगे दौड़ा दिया। नरेन्द्र ने किसी तरह ट्रैक्टर का स्टीयरिंग थाम लिया। मनोज ने वाहन कच्चे रास्ते पर उतार दिया। नरेन्द्र गिरे और एक पहिये की चपेट में आ गए। कुछ दूर जाकर ट्रॉली भी पलट गई। गम्भीर रूप से घायल नरेन्द्र को ग्वालियर अस्पताल लाया गया जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। नरेन्द्र का नाम उस फेहरिस्त में जुड़ा एक और नाम है, जिन्होंने अपने फर्ज को तो निष्ठा तथा निर्भीकता से अंजाम दिया पर व्यवस्था-माफिया गठजोड़ के आगे वह शहीद हो गए। दुर्भाग्य से पिछले महीनों में ऐसे दर्जनों मामले सामने आए हैं, जिनमें वरिष्ठ से कनिष्ठ सरकारी कर्मचारी के यहां आयकर छापे में करोड़ों की अवैध सम्पत्ति का पर्दाफाश हुआ है वहीं ईमानदार सरकारी कर्मियों की रहस्यमय मौतें हो रही हैं। इसकी सबसे जघन्य उदाहरण तो उत्तर प्रदेश का एनएचआरएम घोटाला है, जिसमें अब तक नौ अधिकारी-कर्मचारियों की जानें जा चुकी हैं। 2003 को बिहार में इंजीनियर सत्येन्द्र दूबे की हत्या से शुरू हुआ, इस सिलसिले में नया नाम आईपीएस नरेन्द्र कुमार का जुड़ गया है। इसी दौरान भ्रष्ट तंत्र की पोल खोलने वाले कई आरटीआई कार्यकर्ताओं की भी हत्याएं हुई हैं। साफ है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लोहा लेना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। शिवराज सिंह चौहान सरकार भले ही किसी साजिश से इंकार कर रही है, मगर जैसा कि दिवंगत अधिकारी के पिता ने आरोप लगाया है, उन्हें स्थानीय स्तर पर पुलिस और अन्य विभागों का सहयोग नहीं मिल रहा था। हाल ही में नरेन्द्र सिंह की गर्भवती आईएएस पत्नी का तबादला भी राजनीतिक दबाव में किया गया था। यह इसलिए भी चिन्ता की बात है, क्योंकि खनन माफिया ने जिस तरह अपना जाल बिछाया है, उसे भेद पाना किसी भी अधिकारी के लिए बहुत मुश्किल है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि यह राजनीतिक संरक्षण के बिना सम्भव नहीं है। मध्य प्रदेश सरकार आज कठघरे में खड़ी है। न्यायिक जांच तो ठीक है पर ईमानदार अफसरों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है। कितने और नरेन्द्र सिंहों की कुर्बानी देनी पड़ेगी?
Anil Narendra, Corruption, Daily Pratap, IPS Officer Killing, Madhya Pradesh, Vir Arjun

Saturday, 18 February 2012

...और अब एक सरकारी डाक्टर दम्पति से मिले 35 करोड़

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18th February  2012
अनिल नरेन्द्र
सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार का बोलबाला चौंकाने वाला है। कुछ सरकारी अधिकारियों ने तो अवैध सम्पत्ति बनाने की होड़ में सारी हदें पार कर ली हैं। ऐसा एक उदाहरण हमें पिछले दिनों मध्य प्रदेश से मिला। मध्य प्रदेश लोकायुक्त टीम ने गत दिनों एक सरकारी डाक्टर दम्पति के उज्जैन व नागदा स्थित घर पर छापा मारा। जिले के स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत डॉ. विनोद एवं डॉ. विद्या लहरी के पास आय से अधिक करोड़ों की सम्पत्ति मिली है। पांच मकान, एक पेट्रोल पम्प, वेयर हाउस, 150 बीघा जमीन, पोहा फैक्टरी का खुलासा हुआ है। एक अनुमान के अनुसार उनकी सम्पत्ति 35 करोड़ रुपये की आंकी जा रही है। लोकायुक्त एसपी अरुण मित्रा ने बताया कि इन्दिरा नगर निवासी डॉ. विनोद लहरी व उनकी पत्नी विद्या लहरी 22 सालों से शासकीय सेवा में दोनों दो वर्ष से निलम्बित होने के कारण ज्वाइंट डायरेक्टर कार्यालय उज्जैन में पदस्थ हैं। इन्हें अब तक की इस सरकारी नौकरी में करीब 80 लाख रुपये वेतन मिला है। डाक्टर दम्पति की इतनी आय होती है कि वे हाथों से नोट नहीं गिन पाते थे। उनके घर में नोट गिनने की मशीन भी मिली। लोकायुक्त का दूसरा दल जब नागदा में डॉ. लहरी के हॉस्पिटल रोड स्थित मकान पर तलाशी के लिए गया तो मकान देखकर चौंक पड़ा क्योंकि वहां मकान नहीं, महल बना हुआ है। काफी समय से बन्द पड़े इस महल के अन्दर आधुनिक नर्सिंग होम और एक स्वीमिंग पूल भी मिला है। दम्पति पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है, सम्पत्ति के मूल्यांकन के बाद उसकी कीमत का सही अनुमान लग सकेगा। इधर सूत्रों के मुताबिक लोकायुक्त सम्पत्ति की कीमत करीब 35 करोड़ से अधिक है। मजेदार बात यह भी है कि दोनों डाक्टर जून 2010 से निलम्बित हैं। नागदा सेवाकाल में शिकायतों के चलते ये निलम्बित हुए थे। सवाल है कि सरकार अब इस डाक्टर दम्पति के खिलाफ क्या कार्रवाई करेगी? इन मामलों में बिहार ने अच्छी पहल की है। हाल ही में पटना की निगरानी अदालत के विशेष न्यायाधीश रमेश चन्द्र मिश्र ने एक फरवरी को बिहार के पूर्व डीजीपी नारायण मिश्र की आय से करीब एक करोड़ 40 लाख रुपये से अधिक की सम्पत्ति जब्त करने के आदेश दिए। बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी अभियान में यह एक महान उपलब्धि है। एक तरह जहां 2जी स्पैक्ट्रम लाइसेंस को रद्द करवाने के लिए लोगों को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ता है वहीं बिहार राज्य सरकार ने एक नया कानून बनवाकर अपने सर्वोच्च पुलिस अधिकारी की सम्पत्ति भी जब्त करवाने में सफलता पा ली है। इससे पहले भी पटना की निगरानी अदालत बिहार कैडर के आईएएस अफसर एसएस वर्मा सहित कई लोक सेवकों की सम्पत्ति जब्त कर चुका है। वर्मा के पटना स्थित निजी आवास में अब सरकारी स्कूल चल रहा है। निगरानी अदालत पटना कोषागार के पूर्व अधिकारी गिरीश कुमार, गया नगर निगम के पूर्व अफसर योगेन्द्र सिंह, कैमूर के वन प्रमंडल अधिकारी भोला प्रसाद जैसे कई अन्य विवादास्पद अफसरों की भी सम्पत्ति जब्त करने के आदेश दे चुकी है। सवाल सिर्प राजनीतिक इच्छाशक्ति का है और बिहार ने रास्ता दिखा दिया है। मध्य प्रदेश को भी बिहार से सीख लेनी चाहिए।
Anil Narendra, Black Money, Corruption, Daily Pratap, Lokayukta, Madhya Pradesh, Vir Arjun

Friday, 20 January 2012

36 सालों की नौकरी, 22 लाख वेतन और 29 करोड़ की सम्पत्ति?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th January  2012
अनिल नरेन्द्र
कुछ लोगों का कहना है कि हमारे देश में राजनीतिज्ञ तो ब्लैकमनी के लिए जरूरत से ज्यादा बदनाम हैं, असल तो अवैध कमाई नौकरशाहों के पास है। मध्य पदेश में पिछले कुछ समय से नौकरशाह बिरादरी पर छापे पड़ रहे हैं। इन छापों के परिणामों से तो यही लगता है कि लोग जो सोचते हैं सही ही लगता है। लोअर ब्यूरोकेसी ने इतनी लूट-खसोट मचा रखी है जिनका अनुमान लगाना मुश्किल है। मंगलवार को उज्जैन में लोकायुक्त टीम ने पीएचआई (लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग) के एक सहायक इंजीनियर के घर छापा मारा। तलाशी में सहायक इंजीनियर रमेश कुमार पिता पुंदन लाल द्विवेदी के घर से तलाशी में कृषि, भूमि, मकान, सोने-चांदी के जेवरात व लग्जरी वाहन सहित करीब 20 करोड़ की सम्पत्ति के पमाण मिले। लोकायुक्त एसपी अरुण मिश्रा ने बताया कि द्विवेदी की 1976 में उपयंत्री पद पर नौकरी लगी थी। उसे 2010 तक कुल 22 लाख रुपए वेतन मिला है। कोर्ट के एक फैसले के कारण उसने डेढ़ वर्ष से वेतन नहीं लिया है। द्विवेदी के घर तलाशी लेने गई टीम को जब तबेले में से घर में जाना पड़ा तो वह चौंक गए। लगा कि वह गलत घर में तो नहीं आ गए हैं। बाद में 20 करोड़ की सम्पत्ति का जब ब्यौरा मिला और तबेले की छानबीन हुई तब जाकर उन्हें लगा कि वह सही जगह आए हैं। लोकायुक्त की तलाशी में द्विवेदी के घर पर एक कार चालक व दो नौकर रखे होने का भी रिकार्ड मिला है। इन तीन कर्मचारियों को द्विवेदी करीब 15 हजार रुपए माह वेतन देता था जबकि उसे स्वयं को 24 हजार रुपए वेतन पतिमाह मिलता है। छापे में क्या-क्या मिला इस पर गौर फरमाएं ः 86 बीघा जमीन कीमत 17 करोड़ रुपए, 9 मकान (इंदौर-उज्जैन) 1.50 करोड़ रुपए, 3 लग्जरी कार (21 लाख रुपए), 2 डम्पर, टैक्ट्रर-25 लाख रुपए, 2 बाइक-1लाख रुपए, 13 तोला सोना -3.64 लाख, और 2.5 किलो चांदी कीमत 85 हजार रुपए। पत्नी साधना, पुत्र पियंक, पीयूष व बहू मेधा के नाम से बैंकों में 16 खातों में 4 लाख रुपए। द्विवेदी के 9 लाख की बीमा पॉलिसी भी मिली।
अभी कुछ समय पहले ही इंदौर में मध्य पदेश की अपराध जांच ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने परिवहन विभाग के क्लर्प की 40 करोड़ रुपए से ज्यादा की बेहिसाब सम्पत्ति का खुलासा किया था। क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) में क्लर्प के रूप में पदस्थ रमेश उर्फ रमण के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार से बेहिसाब दौलत बनाने की शिकायत मिली थी। इस शिकायत पर उसके तीन स्थानीय ठिकानों पर एक साथ छापे मारे गए। सूत्रों ने बताया कि क्लर्प की बेहिसाब सम्पत्ति में अलग-अलग जगहों पर कुछ 49 बीघा जमीन, चार भूखण्ड, आलीशान बंगला, एक होटल और एक मकान शामिल है। छापों के दौरान उसके ठिकाने पर जेवरात की शक्ल में लगभग एक किलो सोना और तकरीबन साढ़े चार किलो चांदी मिली। इसके अलावा पांच बैंक खातों और बीमा योजनाओं में निवेश के दस्तावेज भी बरामद किए गए। चार महंगे वाहन और दो दुपहिए भी क्लर्प की बेहिसाब मिल्कीयत की सूची में है। रमेश वर्ष 1996 में सरकारी सेवा में आया था और फिलहाल उसका वेतन करीब 16 हजार रुपए पतिमाह है। 16 हजार रुपए वेतन पाने वाले ने 40 करोड़ की सम्पत्ति कैसे बना ली? इसी के साथ सवाल यह भी उठता है कि पकड़ी गई ऐसी संपत्ति का क्या किया जाए? एक हल तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दिखाया है। एक भ्रष्ट कर्मचारी गिरीश कुमार के पटना के आलीशान बंगले में अब नीतीश सरकार ने किशोरियों का आवासीय स्कूल खोल दिया है। पिछले कई दिनों से यह बंगला बंद था। पार्प रोड स्थित इस 28 कमरों वाले बंगले को पिछड़ी जाति की छात्राओं के प्लस-टू के आवासीय स्कूल को हस्तांतरित किया गया है। यहां वर्ग 6 से 10 तक की 140 छात्राएं रहेंगी और सभी कक्षाएं इसी भवन में होंगी। गिरीश का मकान आय से अधिक सम्पत्ति मामले में सरकार ने जब्त किया था। गिरीश कुमार ने वर्ष 1992 से 2004 के बीच आय से 96 लाख रुपए की अधिक सम्पत्ति अर्जित की थी। कोर्ट ने 15 नवंबर को जिलाधिकारी को गिरीश की संपत्ति जब्त करने का आदेश लिया था। डेढ़ कट्टा जमीन जो उसकी पत्नी के नाम थी, को जब्त कर लिया गया और इस स्कूल की पहली घंटी नए साल (2012) में 2 जनवरी को बजी। पिछड़े तबके की छात्राएं जब नए स्कूल के कमरों में पहुंची तो चौंक गई। 10वीं की छात्रा सोनी ने कहा, `कितनी बड़ी आलमारी है?' शिक्षिका नीरा आर्य ने टोका ः यह आलमारी नहीं वार्डरोब है। पहली बार यह शब्द सुन रही सोनी ने उलट सवाल दागा ये वार्डरोब क्या होता है?
Anil Narendra, Corruption, Daily Pratap, Lokayukta, Madhya Pradesh, Vir Arjun

Friday, 1 July 2011

भाजपा के विधानसभा उपचुनाव में सफलता के कारण

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1st July 2011
अनिल रेन्द्र
दो राज्यों में हुए विधानसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पाटा ने दोनों सीटों पर सफलता अर्जित की है। मध्य प्रादेश की जबेरा सीट पर भाजपा के दशरथ लोधी ने कांग्रोस की डॉ. तान्या सालोमन को 11,738 वोटों के अन्तर से हराया।
भाजपा ने यह सीट कांग्रोस से छीनी है। उधर बिहार में पूर्णिया सदर सीट पर भाजपा की किरण केसरी ने कांग्रोस के रामचरित्र यादव को 23,665 वोटों से पराजित किया। इस सीट पर भाजपा का कब्जा बरकरार है। इन शानदार सफलताओं से एक बार फिर साबित होता है कि कांग्रोस की छवि और स्थिति कितनी खराब हो गईं है। इसका एक और महत्वपूर्ण कारण है इन राज्यों में सशक्त नेतृत्व। भाजपा शासित राज्यों में अच्छी छवि का सबसे बड़ा कारण है वहां पाटा का नेता। पाटा के नेता की छवि स्वच्छ, ईंमानदार, जनता के प्राति संवेदनशील, नौकरशाह पर वंट्रोल और सही प्राथमिकताओं को रखना अति आवश्यक है। नेता कार्यंकर्ता को अपने पास रखे और सत्ता में उनसे भागीदारी करे। मुझे बीजेपी के कर्मठ और हार्ड कोर कायकर्ता ने एक पते की बात बताईं। उन्होंने कहा कि भाजपा और कांग्रोस में एक बड़ा बुनियादी फर्व क्या है? कांग्रोस जब सत्ता में आती है, तो सत्ता का सुख, लाभ, पुरस्कार अपने कार्यंकर्ताओं से बांटते हैं यानि कार्यंकर्ता को सत्ता का लाभ मिलता है। दूसरी ओर भाजपा नेता चुनाव से पहले तो कार्यंकर्ता को माईं-बाप बना लेते हैं और चुनाव जीतने के बाद जब सत्ता सुख बांटने की बारी आती है तो वह अपने एयरवंडीशन ड्राइंग रूम में बन्द होकर रह जाते हैं, कार्यंकर्ता उनके घर, कार्यांलय में घुस भी नहीं सकता। वह सत्ता सुख, सत्ता के लाभ, प्रासाद खुद ही भोगना चाहते हैं, कार्यंकर्ताओं से बांटने को तैयार नहीं होते। यही वजह है कि अगले चुनाव में वह कार्यंकर्ता घर बैठ जाता है और कहता है कि हमारी बला से यह जीते या हारे, हमें क्या लेना-देना है? दूसरी ओर कांग्रोस का कार्यंकर्ता अगले चुनाव में पूरा दमखम लगा देता है। इसलिए क्योंकि अपने नेता को जिताने में उसका भी स्वार्थ जुड़ा होता है। जब तक भाजपा वेंद्रीय नेतृत्व को यह साधारणसी बात समझ नहीं आती वह शायद ही सत्ता में आ सवें। अगर मध्य प्रादेश, बिहार या गुजरात में भाजपा को इतनी सफलता मिल रही है तो उसका एक बड़ा कारण है वहां पाटा का मुख्यमंत्री। आम कार्यंकर्ता अपने आपको अपने नेता से आइडेंटीफाईं करता है और उसे मालूम है कि उसे कोईं भी समस्या होगी या उसका कोईं काम होगा तो वह अपने नेता पर भरोसा कर सकता है।
कांग्रोस में वुछ नेता चाहे जितनी भी विपरीत हवा हो, चुनाव जीत जाते हैं क्योंकि उनके कार्यंकर्ता उन्हें जिताने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं।
आज भारतीय जनता पाटा के वेंद्रीय नेतृत्व में इतनी गुटबाजी है, प्राधानमंत्री बनने की होड़ लगी हुईं कि उन्हें सिवाय अपना जोड़तोड़ करने की किसी को पुर्सत नहीं है। एक-दूसरे की टांग खींचना, नम्बर घटाने के खेल में यह दिन-रात जुटे हुए हैं। यह बात मैं अकेला नहीं कह रहा, खुद पाटा के दिग्गज नेता श्री लाल वृष्ण आडवाणी ने हाल ही में कही है। पूर्व उपप्राधानमंत्री और भारतीय जनता पाटा संसदीय दल के अध्यक्ष लाल वृष्ण आडवाणी ने कहा है कि ईंमानदारी के मामले में पाटा की साख गिरी है। उन्होंने कहा कि पाटा में गुटबाजी अब तेजी से बढ़ रही है। इससे भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है। भाजपा के अंदरुनी सूत्रों के अनुसार आडवाणी ने दिल्ली नगर निगम के भाजपा पार्षदों के लिए दिल्ली के छतरपुर मंदिर में आयोजित प्राशिक्षण शिविर के उद्घाटन सत्र में कहा कि पाटा का निगम के कामों में तो प्रादर्शन अच्छा नहीं रहा है, ईंमानदारी के मामले में पाटा की साख गिरी है। इस मामले में उन्होंने अहमदाबाद नगर निगम की तारीफ करते हुए कहा कि वहां ईंमानदारी से काम हो रहा है। उन्होंने कहा कि दिल्ली प्रादेश भाजपा में पहले भी गुटबाजी थी, अब यह गुटबाजी और बढ़ रही है। उन्होंने साफ कहा कि पाटा की साख गिराने के लिए खुद पाटा के वुछ नेता जिम्मेदार हैं। आडवाणी जी ने बेशक यह बातें दिल्ली प्रादेश भाजपा नेताओं के लिए कही हों पर इशारे- इशारे में वे एक तीर से कईं शिकार कर गए हैं। आज की आवश्यकता यह है कि भाजपा के वेंद्रीय नेतृत्व के दूसरी पंक्ति के नेता प्राधानमंत्री बनने का सपना छोड़े और भाजपा ऐसे व्यक्ति को पीएम के तौर पर प्राोजेक्ट करे जो पूरी पाटा को साथ लेकर चल सके। वर्तमान नेतृत्व में मुझे तो ऐसे तीन ही विकल्प नजर आते हैं जिन्हें अनुभव है, जो ईंमानदार छवि के हैं, जो पाटा कार्यंकर्ताओं को साथ लेकर चला सकते हैं, जिनमें अहंकार इतना नहीं आया कि वह अपनी जमीन ही भूल जाएं—ये हैं श्री लाल वृष्ण आडवाणी, श्री मुरली मनोहर जोशी और श्री नरेन्द्र मोदी।
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