Translater

Showing posts with label Black Money. Show all posts
Showing posts with label Black Money. Show all posts

Tuesday, 24 July 2012

आचार्य बालकृष्ण की गिरफ्तारी के पीछे असल उद्देश्य क्या है?

योग बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ आगामी साझा अभियान के ठीक पहले शुक्रवार को रामदेव के खास सहयोगी आचार्य बालकृष्ण को सीबीआई ने पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार से गिरफ्तार कर लिया। बालकृष्ण के खिलाफ फर्जी पासपोर्ट मामले में कोर्ट में हाजिर होने का सम्मन जारी किया गया था। सूत्रों ने कहा कि बालकृष्ण को शुक्रवार को सीबीआई की विशेष अदालत में हाजिर होना था लेकिन वे हाजिर नहीं हुए। इसके बाद उन्हें हरिद्वार में बाबा रामदेव के पतंजलि योग पीठ आश्रम से वहां मौजूद लोगों के विरोध के बीच गिरफ्तार कर लिया गया। फर्जी पासपोर्ट, दोहरी नागरिकता और फर्जी डिग्री मामले में सीबीआई ने पिछले साल 23 जुलाई को एफआईआर दर्ज की थी। इसी महीने 10 जुलाई को बालकृष्ण के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी। अदालत ने उन्हें पेश होने के लिए 20 जुलाई तक का समय दिया था। सीबीआई ने जांच में पाया कि बालकृष्ण ने उत्तर प्रदेश के खुर्जी के संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य से मिलकर फर्जी सर्टिफिकेट लिया जिससे पासपोर्ट बनवाया। दोनों के खिलाफ धोखाधड़ी सहित दूसरी धाराओं में मामले दर्ज किए गए। बालकृष्ण के खिलाफ पासपोर्ट कानून के तहत भी प्रकरण दर्ज किया गया। सम्पूर्णानन्द संस्कृत यूनिवर्सिटी से पूछताछ में पता चला कि बालकृष्ण का नाम उनके रिकार्ड में नहीं है। सीबीआई ने बालकृष्ण के सर्टिफिकेट में दिए गए नामांकन क्रमांक को संस्थान के रिकार्ड से मिलाया जिसमें यह नम्बर किसी अन्य विद्यार्थी का पाया गया। इसी यूनिवर्सिटी की फर्जी डिग्री बालकृष्ण ने बनवाई थी। बालकृष्ण की नागरिकता के बारे में भी नेपाल से जानकारी मांगी गई लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं आया है। आचार्य के समर्थकों ने उनकी गिरफ्तारी का देहरादून और हरिद्वार में जबरदस्त विरोध किया, नारेबाजी की और उनकी कार के आगे लेट गए और पतंजलि योग पीठ के सामने हाइवे जाम कर दिया। पुलिस को स्थिति सम्भालने के लिए बल प्रयोग करना पड़ा। आचार्य बालकृष्ण की गिरफ्तारी की निन्दा करते हुए बाबा रामदेव ने कहा कि सरकार ने नौ अगस्त के आंदोलन को कुचलने के लिए साजिश के तहत आचार्य को सीबीआई के माध्यम से गिरफ्तार करवाया है। उन्होंने कहा कि आंदोलन से घबराई केंद्र सरकार ने आतंकवादियों की तर्ज पर आचार्य बालकृष्ण की गिरफ्तारी की है लेकिन इससे आंदोलन कमजोर नहीं होगा। शुक्रवार की रात सहारा ग्रेस में पत्रकारों से मुखातिब बाबा ने कहा कि पहले सीबीआई के जरिये सरकार ने नेपाल सरकार पर दबाव बनाया कि वह बालकृष्ण को नेपाली नागरिकता संबंधी प्रमाण पत्र दें। लेकिन जब नेपाल सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि आचार्य बालकृष्ण भारत के नागरिक हैं तो फिर फर्जी उपाधि का षड्यंत्र रच कर बालकृष्ण को गिरफ्तार कर लिया। रामदेव का कहना है कि संविधान में अनपढ़ों को भी पासपोर्ट हासिल करने का अधिकार है तो आचार्य को पासपोर्ट हासिल करने के लिए फर्जी उपाधि की क्या आवश्यकता है? बालकृष्ण की गिरफ्तारी का लाभ उठाते हुए पूछताछ में रामदेव की आर्थिक व व्यापारी गतिविधियों के बारे में सीबीआई को मदद मिलेगी। इसमें जहां बदले की कार्रवाई की बू आती है वहीं असल टारगेट बाबा लगते हैं। बालकृष्ण तो महज दबाव बनाने वाले एक मोहरा हैं। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव में बहुत फर्प है। अन्ना हजारे एक फकीर हैं जो बहुत साधारण जीवन व्यतीत करते हैं जबकि बाबा हाई प्रोफाइल उद्योगपति बन गए हैं जिनका करोड़ों का कारोबार है और अरबों का साम्राज्य। असल निशाना तो बाबा रामदेव ही हैं।

Saturday, 18 February 2012

...और अब एक सरकारी डाक्टर दम्पति से मिले 35 करोड़

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18th February  2012
अनिल नरेन्द्र
सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार का बोलबाला चौंकाने वाला है। कुछ सरकारी अधिकारियों ने तो अवैध सम्पत्ति बनाने की होड़ में सारी हदें पार कर ली हैं। ऐसा एक उदाहरण हमें पिछले दिनों मध्य प्रदेश से मिला। मध्य प्रदेश लोकायुक्त टीम ने गत दिनों एक सरकारी डाक्टर दम्पति के उज्जैन व नागदा स्थित घर पर छापा मारा। जिले के स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत डॉ. विनोद एवं डॉ. विद्या लहरी के पास आय से अधिक करोड़ों की सम्पत्ति मिली है। पांच मकान, एक पेट्रोल पम्प, वेयर हाउस, 150 बीघा जमीन, पोहा फैक्टरी का खुलासा हुआ है। एक अनुमान के अनुसार उनकी सम्पत्ति 35 करोड़ रुपये की आंकी जा रही है। लोकायुक्त एसपी अरुण मित्रा ने बताया कि इन्दिरा नगर निवासी डॉ. विनोद लहरी व उनकी पत्नी विद्या लहरी 22 सालों से शासकीय सेवा में दोनों दो वर्ष से निलम्बित होने के कारण ज्वाइंट डायरेक्टर कार्यालय उज्जैन में पदस्थ हैं। इन्हें अब तक की इस सरकारी नौकरी में करीब 80 लाख रुपये वेतन मिला है। डाक्टर दम्पति की इतनी आय होती है कि वे हाथों से नोट नहीं गिन पाते थे। उनके घर में नोट गिनने की मशीन भी मिली। लोकायुक्त का दूसरा दल जब नागदा में डॉ. लहरी के हॉस्पिटल रोड स्थित मकान पर तलाशी के लिए गया तो मकान देखकर चौंक पड़ा क्योंकि वहां मकान नहीं, महल बना हुआ है। काफी समय से बन्द पड़े इस महल के अन्दर आधुनिक नर्सिंग होम और एक स्वीमिंग पूल भी मिला है। दम्पति पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है, सम्पत्ति के मूल्यांकन के बाद उसकी कीमत का सही अनुमान लग सकेगा। इधर सूत्रों के मुताबिक लोकायुक्त सम्पत्ति की कीमत करीब 35 करोड़ से अधिक है। मजेदार बात यह भी है कि दोनों डाक्टर जून 2010 से निलम्बित हैं। नागदा सेवाकाल में शिकायतों के चलते ये निलम्बित हुए थे। सवाल है कि सरकार अब इस डाक्टर दम्पति के खिलाफ क्या कार्रवाई करेगी? इन मामलों में बिहार ने अच्छी पहल की है। हाल ही में पटना की निगरानी अदालत के विशेष न्यायाधीश रमेश चन्द्र मिश्र ने एक फरवरी को बिहार के पूर्व डीजीपी नारायण मिश्र की आय से करीब एक करोड़ 40 लाख रुपये से अधिक की सम्पत्ति जब्त करने के आदेश दिए। बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी अभियान में यह एक महान उपलब्धि है। एक तरह जहां 2जी स्पैक्ट्रम लाइसेंस को रद्द करवाने के लिए लोगों को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ता है वहीं बिहार राज्य सरकार ने एक नया कानून बनवाकर अपने सर्वोच्च पुलिस अधिकारी की सम्पत्ति भी जब्त करवाने में सफलता पा ली है। इससे पहले भी पटना की निगरानी अदालत बिहार कैडर के आईएएस अफसर एसएस वर्मा सहित कई लोक सेवकों की सम्पत्ति जब्त कर चुका है। वर्मा के पटना स्थित निजी आवास में अब सरकारी स्कूल चल रहा है। निगरानी अदालत पटना कोषागार के पूर्व अधिकारी गिरीश कुमार, गया नगर निगम के पूर्व अफसर योगेन्द्र सिंह, कैमूर के वन प्रमंडल अधिकारी भोला प्रसाद जैसे कई अन्य विवादास्पद अफसरों की भी सम्पत्ति जब्त करने के आदेश दे चुकी है। सवाल सिर्प राजनीतिक इच्छाशक्ति का है और बिहार ने रास्ता दिखा दिया है। मध्य प्रदेश को भी बिहार से सीख लेनी चाहिए।
Anil Narendra, Black Money, Corruption, Daily Pratap, Lokayukta, Madhya Pradesh, Vir Arjun

Sunday, 4 September 2011

बाबा रामदेव को घेरने में लगी सरकार


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4th September 2011
अनिल नरेन्द्र
बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन से खार खाई कांग्रेस पार्टी और यूपीए सरकार अब इनसे खुंदक निकाल रही है। जब से यह आंदोलन हुए हैं सरकार इनके पीछे हाथ धोकर पड़ गई है। बाबा रामदेव को सरकार अब खुद बाबा को विदेशी मुद्रा विनियम प्रबंधन अधिनियम (फेमा) में घेरने पर उतारू है।
प्रवर्तन निदेशालय ने बाबा रामदेव और उनके ट्रस्ट के खिलाफ फेमा कानून का उल्लंघन करने का केस दर्ज कर लिया है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बाबा रामदेव की संस्था पर विदेशों से होने वाले धन के लेन-देन में नियमों की अनदेखी करने के आरोप में यह केस दर्ज किया है। इसके अलावा स्काटलैंड में बाबा को दान में मिले कथित `द्वीप' के प्रकरण की भी पड़ताल की जा रही है।
प्रवर्तन निदेशालय और जांच एजेंसियां यह देखने का प्रयास कर रही हैं कि इस द्वीप को प्राप्त करने में बाबा और उनकी संस्था ने कहीं नियमों की अनदेखी तो नहीं की है। ऐसे में जल्द ही इस मामले में बाबा के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण और योग गुरु के वरिष्ठ प्रबंधकों से पूछताछ के आसार हैं।
प्रवर्तन निदेशालय ने भारतीय रिजर्व बैंक और विदेशी जांच एजेंसियों तथा बैंकों के माध्यम से मिली नकारियों के आधार पर मामले दर्ज किए हैं। ईडी सूत्रों के मुताबिक बाबा रामदेव की संस्था पतंजलि योग पीठ, भारत स्वाभिमान ट्रस्ट और योग मंदिर ट्रस्ट के माध्यम से अनियमित वित्तीय लेन-देन की जानकारी मिली है। इन संस्थाओं ने अमेरिका, न्यूजीलैंड और ब्रिटेन समेत कई देशों से विदेशी मुद्रा प्राप्त की है और ऐसा करने में बड़े पैमाने पर नियमों की अनदेखी हुई है। बताते हैं कि ब्रिटेन से ही एक मामला करीब सात करोड़ रुपये के लेन-देन से जुड़ा है। यह मामला बेनामी सौदे से जुड़ा है। इसके अलावा ब्रिटेन के सामान्य व्यापारियों और फुटकर दुकानदारों से मिलकर भी अवैध वित्तीय लेन-देन के सबूत मिले हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से ईडी को मिले दस्तावेजों के अनुसार बाबा रामदेव की कम्पनियों ने निर्यात से हुई लगभग 1.8 करोड़ रुपये (चार लाख डालर) की आमदनी के बारे में केंद्रीय बैंक को कोई जानकारी नहीं दी है। नियम के मुताबिक निर्यात से विदेशी मुद्रा में हुई आमदनी की सूचना छह महीने के भीतर आरबीआई को देना जरूरी है। बाबा रामदेव से जुड़ी कम्पनियों ने छह महीने के बाद भी आरबीआई को कुछ नहीं बताया।
बाबा रामदेव और उनकी कम्पनियों के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा फेमा के तहत मुकदमें से पदाथी स्थित पतंजलि एण्ड हर्बल पार्प में कर्मचारियों में अपने भविष्य को लेकर चिन्ता हो गई है। पदाथी स्थित फूड पार्प में करीब पांच हजार कर्मचारी काम करते हैं। फूड पार्प के आसपास गांवों के लोग भी बड़ी संख्या में कार्य करते हैं। सभी को चिन्ता है कि कहीं ईडी ट्रस्ट के खातों को सीज न कर दे और उनका भविष्य अधर में न पड़ जाए। उधर बाबा रामदेव ने हरिद्वार में कहा कि उन्होंने या उनके ट्रस्ट ने किसी भी तरह के लेन-देन में कोई असंवैधानिक कार्य नहीं किया है। बाबा ने बताया कि अभी तक प्रवर्तन निदेशालय से उन्हें या उनके ट्रस्ट के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की कोई अधिकृत जानकारी नहीं दी गई है। उन्हें इसकी जानकारी मीडिया से मिली है। उन्होंने कहा कि नोटिस मिलने पर माकूल जवाब दिया जाएगा। बाबा रामदेव हरिद्वार के कनखल स्थित दिव्य योग फॉर्मेसी में गुरुवार को पत्रकारों से बात कर रहे थे। उन्होंने साफ कहा कि उन्होंने या उनके ट्रस्ट ने किसी भी तरह का कोई भी असंवैधानिक काम नहीं किया है और न ही कोई गैर-कानूनी लेन-देन किया है।
Baba Ram Dev, Ram Lila Maidan, Anil Narendra, Daily Pratap, Vir Arjun, ED, Black Money, Corruption,

Wednesday, 20 July 2011

काले धन की निगरानी सुप्रीम कोर्ट करे यह सरकार को स्वीकार नहीं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th July 2011
अनिल नरेन्द्र
भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे पर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की चुनौतियों से जूझ रही मनमोहन सरकार को उस समय तग़ड़ा झटका लगा था जब सुप्रीम कोर्ट ने काले धन से जुड़े सारे मामलों की जांच के लिए विशेष जांच दल गठित कर दिया था। इस विशेष जांच दल की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश बीपी जीवन रेड्डी करेंगे और एक अन्य सेवानिवृत्त जज एमबी शाह इसके सदस्य होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि हसन अली और कैलाश नाथ तापड़िया सहित काले धन से जुड़े सभी मामलों की जांच, इनमें आगे की कार्रवाई तथा मुकदमा चलाने की जिम्मेदारी इस विशेष जांच दल की होगी पर केंद्र सरकार को लगता है कि यह मंजूर नहीं है कि काले धन की जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो। तभी तो केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस आदेश की पुनर्समीक्षा याचिका दायर की है। सरकार ने इस फैसले को कार्यकारी अधिकारों का न्यायिक अतिक्रमण मानते हुए कहा है कि कार्यपालिका और न्याय पालिका की अलग-अलग शक्तियां हैं और शीर्ष अदालत का फैसला इन सिद्धांतों के खिलाफ है। याचिका में कहा गया है कि न्यायालय का यह कहना सरासर गलत है कि काला धन वापस लाने के लिए सरकार जोरदार प्रयास नहीं कर रही। ऐसा होता तो सरकार इस मामले में उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन नहीं करती। यह एक ऐतिहासिक केस साबित हो सकता है क्योंकि सरकार की याचिका पर फैसला करते समय जहां अदालत को कुछ अतिमहत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं का ध्यान रखना होगा, वहीं अदालत सरकार से यह सवाल भी कर सकती है कि आखिरकार अदालत को इस तरह का आदेश क्यों पारित करना पड़ा। सरकार ने भले ही समीक्षा याचिका दायर करना जरूरी समझा क्योंकि कैबिनेट में कुछ महत्वपूर्ण कानून वे शामिल है, लेकिन इससे सरकार की कार्यप्रणाली, जांच एजेंसियों के प्रति इसके रवैये और स्वयं जांच एजेंसियों की भूमिका पर बहस छिड़ सकती है।
काले धन का मामला अतिमहत्वपूर्ण है क्योंकि देश का वैध धन अवैध तरीके से विदेशों में जाना तो चिंता का विषय है ही, साथ ही इसके परिणाम राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे से भी जुड़े हैं, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने जो आदेश दिया था उसका अभी तक कुछ ठोस परिणाम नहीं आ सका। दरअसल हो बिल्कुल उल्टा रहा है। अब तक एसआईटी तो हुआ नहीं है, वित्त मंत्रालय की तरफ से गठित समितियां भी काम नहीं कर पा रही हैं और अब सरकार द्वारा अपील दायर करने से मामला और उलझ गया है। अब ये समितियां निर्धारित समय अवधि में अपनी रिपोर्ट भी नहीं दे सकेंगी। जब तक सुप्रीम कोर्ट इस बारे में अपना फैसला नहीं सुनाता, यह काम बाधित रहेगा। यही हाल काले धन पर गठित दूसरी समिति का भी हो गया है। यह समिति सीबीडीटी चेयरमैन की अध्यक्षता में गठित की गई थी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश में इस समिति का भी जिक्र है। इस समिति को काले धन पर रोक लगाने के लिए मौजूदा किन कानूनों में संशोधन करने की जरूरत है, इसके बारे में सुझाव कमेटी को देने को कहा गया था। कमेटी ने अपनी पहली बैठक में पब्लिक से सुझाव मांगे थे और तीन हफ्ते में 4000 सुझाव व प्रतिक्रिया आई थी पर अब यह मामला भी रुकने का डर है। सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को हर हालत में ब्लाक करने पर तुली है, ऐसा लगता है।
Tags: Anil Narendra, Anna Hazare, Black Money, Corruption, Daily Pratap, Hasan Ali Khan, Supreme Court, Vir Arjun

Thursday, 7 July 2011

अवैध काले धन को वापस लाने का सुप्रीम कोर्ट का सराहनीय प्रयास

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th July 2011
अनिल रेन्द्र
अगर हसन अली और काशीनाथ तापुरिया ने सोचा था कि वह इतनी आसानी से सारी कार्रवाई से बच जाएंगे तो उन्होंने गलत सोचा था। सुप्रीम कोर्ट ऐसा नहीं होने देगी। सुप्रीम कोर्ट ने विदेशों में जमा काले धन के केस में इस धन को वापस लाने और उसकी पूरी नए सिरे से जांच करने के लिए एक उच्च स्तरीय विशेष जांच दल का गठन कर दिया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी और एसएस निज्जर की खंडपीठ ने इस केस की सुनवाई करते हुए भारत सरकार को तगड़ी फटकार लगाई। उन्होंने हसन अली खान केस को निशाना बनाते हुए सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यम से प्रश्न किया कि एनफोर्समेंट डायरेक्ट्रेट (ईडी) ने हसन अली मामले में सिर्प 44 करोड़ रुपये की सम्पत्ति को जब्त करके क्या संदेश देना चाहा है? खंडपीठ ने प्रश्न किया कि वह जीरोओं का क्या हुआ? आयकर विभाग ने तो 40,000 करोड़ रुपये की आयकर डिमांड निकाली थी? हसन अली के साथी काशीनाथ तापुरिया के खिलाफ 20,580 करोड़ रुपये का डिमांड नोटिस दिया था। अब आप अदालत को बता रहे हैं कि आपने 44 करोड़ की सम्पत्ति ही जब्त की है, बाकी जीरोओं का क्या हुआ? मतलब साफ था कि आयकर विभाग हसन अली खान को बचा रही है, क्यों? अदलात ने यह भी कहा कि यह पहली बार नहीं जब इस केस में अदालत निराश हुई है, पहले भी इस केस में ईडी की कार्रवाई पर प्रश्नचिन्ह लगता रहा है। अदालत ने प्रश्न किया कि सन् 2007 में ईडी ने सनसनीखेज खुलासा खुद ही किया था कि 2001-2005 के बीच हसन अली खान का लेन-देन 1.6 बिलियन डालर का था। 2007 में जब हसन अली के पुणे स्थित आवास पर छापा मारा गया था तो वहां से 8.04 बिलियन डालर के यूबीएस बैंक, स्विटजरलैंड को लेन-देन के दस्तावेज मिले थे। अदालत ने पूछा कि हसन अली के बोफोर्स दलाल अदनान खाशोगी से संबंधों का क्या हुआ? हसन अली ने खाशोगी का यूबीएस बैंक में खाता खुलवाने में मदद की थी। सरकार के पास अदालत से किसी भी सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं था। यही वजह है कि देश में छिपाए गए काले धन की जांच में सरकार की लेटोलतीफी और गुमराह करने वाली कार्रवाई से ही तंग आकर सुप्रीम कोर्ट ने मामले को अपने हाथ में लेने का फैसला किया। एक विशेष जांच दल के गठन का फैसला इसी उद्देश्य से किया गया है।
एक अनुमान के अनुसार लगभग 1456 अरब डालर यानि 70 लाख करोड़ रुपये विदेशों में जमा हैं। इस हिसाब से देश की सम्पत्ति का 40 प्रतिशत ब्लैक मनी के रूप में विदेशी बैंकों में जमा है। अमेरिका की कानूनी धमकियों के बाद स्विटजरलैंड के यूबीएस बैंक ने न सिर्प खाताधारक अमेरिकी नागरिकों के नाम बताए, 78 करोड़ डालर का हर्जाना भी दिया जबकि भारत ने पिछले 20 वर्षों से काले धन को वापस लाने के लिए कुछ भी नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को साफ कहा कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर गम्भीर नहीं है। इस सन्दर्भ में उसने यह दो टूक टिप्पणी भी की कि सरकार ने जो कदम उठाए हैं, उन पर उसे गम्भीर आपत्ति है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि काले धन की जांच पूरी तरह से रुकी हुई है। आखिर शीर्ष अदालत के ऐसे कठोर रुख के बाद सरकार किस मुंह से यह कह सकती है कि वे काले धन के मुद्दे पर गम्भीर है? देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा से सीधे जुड़े ऐसे संवेदनशील मामले में सरकार की बेरुखी से तंग आकर अदालत को खुद ही इस पर सीधी कार्रवाई करने पर मजबूर होना पड़ा है। छह महीने से कोर्ट लगातार सरकार को चेतावनी दे रहा था कि वह इस मामले को गम्भीरता से ले और उन सभी लोगों की निशानदेही करे जिन्होंने अपनी अकूत अवैध दौलत विदेश के बैंकों में छिपा रखी है। लेकिन सरकार कोरे वायदों या बेमन की कार्रवाइयों से आगे बढ़ने को तैयार नहीं दिख रही थी। सरकारी उदासीनता का आलम यह है कि वह विदेश में छिपाए गए काले धन को महज कर वंचना का मामला बता रही है जबकि खुद देश की शीर्षस्थ अदालत मानती है कि यह पैसा देश के विकास की मद से चुराया गया हो सकता है या हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी के साथ आतंकवादियों की मदद के लिए भी हो सकता है। ताज्जुब तो यह है कि न केवल सुप्रीम कोर्ट बल्कि बाबा रामदेव सहित देश के प्रबुद्ध नागरिकों ने बार-बार इस गम्भीर मामले को उठाया है। बाबा रामदेव की तो यह प्रमुख मांग हो रही है कि इस धन को राष्ट्र सम्पत्ति घोषित किया जाए। इन सबके बावजूद सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। गुप्त अमेरिकी दस्तावेजों को सार्वजनिक कर दुनिया में सनसनी मचाने वाले विकीलीक्स के असांजे ने रहस्य खोला था कि विदेशों में काली कमाई जमा करवाने वाले दोशों में भारत सबसे ऊपर है और जहां अमेरिका, जर्मनी और यूरोपीय देश विदेशों में जमा अपने पैसे की वापसी के लिए आक्रामक तरीके अपना रहे हैं वहीं भारत सरकार ने आश्चर्यजनक चुप्पी साधी हुई है। हमारी सरकार की चुप्पी हसन अली मामले में भी देखी जा सकती है। घोड़े और कबाड़ के व्यापार की आड़ में देश का यह सबसे बड़ा हवाला कारोबारी अरबों की दौलत को नियमित रूप से विदेश भेजता था। आरोप है कि वह देश के प्रभावशाली लोगों की दौलत का हिसाब भी लगाता था, जिनमें राजनेता और नौकरशाह भी शामिल थे। आश्चर्य की बात यह थी कि कारगुजारियों की भनक होने के बावजूद हसन वीआईपी बनकर देश में छुट्टा घूमता था। अगर सुप्रीम कोर्ट ने कड़े तेवर न अपनाए होते तो क्या हसन अली आज सीखचों के पीछे होता? सबसे बड़ी बात तो यह है कि हसन अली जिनकी काली कमाई का हिसाब-किताब रखता था वे लोग कौन हैं? असल चोर तो ये लोग हैं जिन्होंने कुर्सी का अवैध उपयोग कर देश को लूटा और लूट का माल विदेशों में छिपाया। सरकार उनके नाम बताने में विदेशी संधियों की आड़ ले रही है। इसलिए इस बार सुप्रीम कोर्ट ने सीधे निर्देश दिए हैं कि वैसे तमाम लोगों को जिन्हें ऐसे काले धन पर नोटिस दिया गया है उनके नाम अदालत में पेश किए जाएं। कोर्ट ने तो यहां तक टिप्पणी की कि यदि वह सरकार की जगह होती तो ऐसी संधि कदाचित नहीं करती जिससे देश का हित प्रभावित होता है। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह विशेष जांच दल का गठन किया है और उसमें शीर्ष अदालत के दो पूर्व न्यायाधीशों को जगह देने के साथ ही यह कहा है कि यह दल काले धन से जुड़े मामलों से निपटने की एक व्यापक कार्य योजना तैयार करें उससे तो यही स्पष्ट होता है कि उसे इस मनमोहन सरकार से कोई उम्मीद नहीं रह गई है। ऐसी स्पष्टवादिता के लिए सुप्रीम कोर्ट को हमारा सलाम। दिलचस्प यह है कि सुप्रीम कोर्ट की सख्ती से बचने के लिए सरकार ने पिछले दिनों आनन-फानन में आठ नौकरशाहों की कमेटी बना दी थी जिसके अध्यक्ष केंद्र के राजस्व सचिव हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के विशेष जांच दल के साथ इस टीम को जोड़ दिया जाएगा। तब जाकर शायद सही मायनों में विदेशों में छिपा काले धन और उससे जुड़े लोगों की पहचान का काम दिशा और गति पकड़े।
Tags: Anil Narendra, Black Money, Corruption, Daily Pratap, Hasan Ali Khan, Manmohan Singh, Supreme Court, Vir Arjun