Translater

Showing posts with label Kejriwal. Show all posts
Showing posts with label Kejriwal. Show all posts

Thursday, 28 March 2024

जेल से ही चलाएंगे सरकार केजरीवाल


अभी सियासी हलको में यह चर्चा हो रही थी कि मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के गिरफ्तार होने के बाद दिल्ली की सरकार का क्या होगा? क्या वह इस्तीफा देंगे और कोई दूसरे विधायक को दिल्ली सौपेंगे? या फिर वह तिहाड़ जेल से ही सरकार चलाएंगे। सीएम आवास के बाहर एकत्रित आप नेताओं और कार्यकर्ताओं का साफ कहना था कि केजरीवाल इस्तीफा नहीं देंगे और गिरफ्तारी के बाद भी वे जेल से ही सरकार चलाएंगे। उनका यह कहना ही था कि केजरीवाल जी का पहला आदेश तिहाड़ से आ गया। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की हिरासत में रहकर सरकार चलाने के दौरान अपना पहला निर्देश देते हुए जल मंत्री आतिशी को शहर के कुछ इलाकों में पानी एवं सीवर से संबंधित समस्याओं को हल करने के लिए कहा। मंत्री आतिशी ने उनके आदेश को मीडिया के सामने पढ़ा। मुख्यमंत्री केजरीवाल ने अपने आदेश में कहा कि मुझे पता चला है कि दिल्ली के कुछ इलाकों में पानी और सीवर की काफी समस्याएं हो रही हैं। इसे लेकर मैं चिंतित हूं। चूंकि मैं जेल में हूं इस वजह से लोगों को जरा भी तकलीफ नहीं होनी चाहिए। गर्मियां आ रही हैं, जहां पानी की कमी है। वहां उचित संख्या में टैंकरों का इंतजाम कीजिए। मुख्य सचिव समेत अन्य अधिकारियों को उचित आदेश दीजिए ताकि जनता को किसी तरह की परेशानी न हो। जनता की समस्याओं का तुरन्त और समुचित समाधान होना चाहिए। जरूरत पड़ने पर उपराज्यपाल महोदय का भी सहयोग लें। वे भी आपकी जरूर मदद करेंगे। कानून क्या कहता है? जानकार कहते हैं कि गिरफ्तारी पर इस्तीफा देने की कोई बाध्यता नहीं है, क्योंकि गिरफ्तारी होने को दोष सिद्धी नहीं माना जा सकता। ऐसे में किसी सीएम की गिरफ्तारी होने से तुरन्त उनका पद नहीं जा सकता, दूसरी ओर विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि देखना होगा कि जेल से सरकार चलाना कितना प्रेक्टिकल होगा, लोकतंत्र की परंपराओं के कितने अनुरूप होगा। इसके लिए जेल नियमों से लेकर तमाम तरह के पहलुओं पर काफी कुछ निर्भर करेगा। लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य का कहना है कि वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए भी कैबिनेट मीटिंग होती है, लेकिन जहां तक जेल से कैबिनेट मीटिंग या मंत्रियों के साथ मीटिंग का सवाल है तो इसके लिए जेल प्रशासन की मंजूरी जरूरी होगी। अगले जेल प्रशासन से मंजूरी नहीं मिलती तो कैबिनेट की बैठक संभव नहीं हो सकती है। अगर केजरीवाल इस्तीफा नहीं देते हैं तो जेल अथॉरिटी पर काफी कुछ निर्भर करता है। अगर मुख्यमंत्री जेल से सरकार चलाना चाहेंगे और जेल अथॉरिटी इसके लिए इजाजत देगी तो ऐसा किया जा सकता है। एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय बताते हैं कि पिछले साल उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में उनकी एक अर्जी थी कि जो मंत्री जेल जाता है उसे पद से वंचित किया जाना चाहिए। तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो मंत्री को पद से इस्तीफा देना अनिवार्य करता है। उपराज्यपाल के पास किसी भी इमारत को जेल में बदलने की शक्ति है और अगर केजरीवाल उन्हें नजरबंद करने के लिए मना सकते हैं तो इससे उन्हें दिल्ली सरकार के दिन-प्रतिदिन के कामकाज का हिस्सा बनने में मदद मिलेगी। भाजपा उधर दिल्ली में राष्ट्रपति शासन की मांग कर रही है।

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 26 April 2012

...और फिर पड़ी फूट टीम अन्ना में

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 26 April 2012
अनिल नरेन्द्र
टीम अन्ना में फूट पड़ चुकी है। टीम अन्ना की कोर कमेटी की बैठक में रविवार को जमकर हंगामा हुआ। रविवार को नोएडा के सेक्टर-43 में टीम की कोर कमेटी की बैठक हुई। बैठक का एजेंडा था आंदोलन की रणनीति तैयार करना। इसमें बाबा रामदेव के साथ साझा आंदोलन पर भी चर्चा होनी थी। टीम अन्ना की कोर कमेटी की इस अहम बैठक में अरविन्द केजरीवाल, प्रशांत भूषण, किरण बेदी, एकमात्र मुस्लिम चेहरा मौलाना शमून कासमी, गोपाल राय, मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास मौजूद थे। रामदेव के साथ आंदोलन के सवाल पर किरण बेदी कहाöजब बुरे लोग साथ आ सकते हैं तो अच्छे लोग क्यों नहीं? इस पर कासमी ने कहा कि महत्व कम होने की आशंका केजरीवाल को है। इसलिए आपत्ति उन्हें ही ज्यादा है। बहस चल ही रही थी कि कोर कमेटी के सदस्य गोपाल राय की नजर शमून कासमी पर गई। वे मोबाइल पर बातें कर रहे थे, राय ने कासमी से मोबाइल मांगा, अलग कमरे में जाकर चैक करने पर बैठक की उपलिकिंग मिली। प्रशांत भूषण ने कासमी से पूछा कि आखिर आपने ये रिकार्डिंग क्यों की? इस पर कासमी चुप रहे। भूषण ने उन्हें टीम से हटने और बैठक से बाहर जाने को कहा। कासमी बिना किसी प्रकार की सफाई दिए शाम 4 बजे बैठक से उठकर चले गए। कुमार विश्वास ने बाद में कहा कि कासमी बैठक का ऑडियो रिकार्ड करते रंगे हाथों पकड़े गए हैं। प्रशांत भूषण ने कहा कि सभी रिकार्ड करने की कोई खास वजह नहीं बता पाए। अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि अग्निवेश की तरह रंगे हाथों पकड़े गए कासमी। शाजिया इल्मी ने कहा कि विश्वासघात करने पर टीम से हटा दिया गया है। उधर मौलाना शमून कासमी ने कहा कि मैं शुरुआत से ही आंदोलन से जुड़ा रहा हूं। केजरीवाल अन्ना का इस्तेमाल कर रहे हैं। आंदोलन मुस्लिम विरोधी हो रहा है। एक मुस्लिम को ये देखना नहीं चाहते। अन्ना हजारे भी कसम खाने लगे हैं अब। कोर कमेटी की बैठक में जो हुआ, वह पहले से ही तय था। उन्होंने कहा कि अन्ना का आंदोलन राजनीति और सांप्रदायिकता का शिकार हो गया है। वे खुद ही कोर कमेटी छोड़ रहे हैं। कासमी ने टीम अन्ना के कई सदस्यों पर सनसनीखेज आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि कोर कमेटी की बैठक में अरविन्द केजरीवाल और कुमार विश्वास के बीच जोरदार झड़प हुई। विश्वास पर राज्य सरकार की दलाली का आरोप लगाया गया। खुद अन्ना ने केजरीवाल के हिमाचल दौरे पर सवाल उठाए। उन्होंने यह भी कहा कि प्रशांत भूषण और कुछ अन्य सदस्य चुनाव लड़ना चाहते हैं। हालांकि केजरीवाल ने इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया देने से इंकार करते हुए कहा कि निकाले जाने की वजह से कासमी इस तरह की अनर्गल बात कर रहे हैं। अन्ना के आंदोलन में भीतरघात का यह दूसरा मौका है। इससे पहले पिछले साल जब जन लोकपाल आंदोलन चरम पर था, उसी दौरान स्वामी अग्निवेश पर भी सरकार के लिए जासूसी करने का आरोप लगा था। कासमी और अग्निवेश के अलावा पीवी राजगोपाल और जल पुरुष राजेन्द्र सिंह भी टीम अन्ना से अलग हो चुके हैं। दुःख से कहना पड़ता है कि अन्ना हजारे की चमक दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है, वह बात नहीं रही।
Anil Narendra, Anna Hazare, Arvind Kejriwal, Daily Pratap, Kejriwal, Kiran Bedi, Lokpal Bill, Shamoon Qasmi, Vir Arjun

Friday, 17 June 2011

अन्ना के लोकपाल बिल को जोकपाल बिल बनाने का प्रयास

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18th June 2011
अनिल नरेन्द्र
लगता है कि अन्ना हजारे के लोकपाल बिल पर सदी के सबसे बड़े चन्द्र ग्रहण का असर हो गया है, लोकपाल बिल, जोकपाल बिल बनकर रह गया है। देश को बहुत उम्मीद थी कि सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों और सरकार के बीच शायद कोई सहमति बन जाए पर ऐसा नहीं हो सका। अन्ना और उनके साथियों का कहना है कि सरकार हमारी तो दलीलें सुनने को तैयार ही नहीं थी और केवल अपनी बात करती रही। सरकार यह चाहती है कि लोकपाल के नाम पर 11 सदस्यों की एक बॉडी हो, जो ऊंचे लेवल पर कुछ मामलों में भ्रष्टाचार की जांच करे। उसके पास अपनी कोई जांच एजेंसी नहीं होगी जबकि सिविल सोसाइटी चाहती है कि इस बॉडी को सभी लेवल पर भ्रष्टाचार की जांच और सजा तय करने का हक मिले। उसके पास जांच की अपनी मशीनरी हो ताकि वह सरकार से आजाद रहे। प्रधानमंत्री और जजों को जांच के दायरे में लाने पर भी सहमति नहीं बन पाई। दोनों ही पक्षों ने इस बात की पुष्टि की कि 15 जून की इस बैठक में प्रधानमंत्री, उच्च न्यायपालिका और संसद के अन्दर सांसदों के आचरण को प्रस्तावित लोकपाल की जांच के दायरे में लाने के मुद्दे पर कोई बातचीत नहीं हुई। वार्ता के बाद कपिल सिब्बल ने संवाददाताओं से कहा, हमने फैसला किया है कि 20 और 21 जून को होने वाली अगली बैठक में दोनों पक्ष अपना-अपना प्रस्ताव विचार के लिए रखेंगे। फिर भी दोनों प्रस्तावों पर सहमति नहीं बनी, तो मंत्रिमंडल के समक्ष वोटों का एक संयुक्त प्रस्ताव भेजा जाएगा। इसमें सहमति और असहमति के बिन्दु स्पष्ट रूप से रेखांकित होंगे। उन्होंने कहा कि दोनों प्रस्ताव सार्वजनिक किए जाएंगे। इस प्रक्रिया में सरकार राजनीतिक दलों को भी शामिल करना चाहती है। समिति के सदस्य अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि असहमति के बावजूद हम 20 और 21 जून को बैठक में शामिल होंगे और अपना पक्ष पेश करेंगे ताकि जनता देख सके कि कौन-सा मसौदा उचित है। इस महत्वपूर्ण बैठक से निराश अन्ना हजारे ने बृहस्पतिवार को कहा कि लोकपाल मसौदा विधेयक के दो संस्करण कैबिनेट को भेजने के सरकार के निर्णय पर आश्चर्य है। उन्होंने साफ कहा कि सरकार का सख्त लोकपाल कानून बनाने की कोई मंशा नहीं है और अगर कमजोर कानून बना तो वह 16 अगस्त से फिर अनशन करेंगे। उन्होंने कहा कि जब अप्रैल में मैंने अनशन किया था तो सरकार ने हमारे सभी सुझाव मानने का वादा किया था। अब सरकार अपने वादों से मुकर रही है। बाबा रामदेव के आंदोलन को जिस तरह तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश की गई, अगर वैसा ही हमारे साथ हुआ तो हम इसके लिए तैयार हैं। हम गिरफ्तारी देंगे। लाठी खाने और गोलियां खाने को तैयार हैं। हजारे के साथी अरविन्द केजरीवाल ने कहा, `सरकार एक सख्त कानून बनाने और उसका श्रेय लेने का मौका खो रही है। अब सरकार लोकपाल नहीं बल्कि जोकपाल विधेयक लाना चाहती है। क्या समाज के सदस्य सरकार को ब्लैकमेल कर रहे हैं।' इस पर अन्ना हजारे ने कहा कि अगर राष्ट्रहित और समाज हित में कोई बात उठाना `ब्लैकमेल' करना है तो हमें यह आरोप भी स्वीकार है।

यह जितना आपत्तिजनक है उतना ही निराशाजनक कि कांग्रेस पार्टी और केंद्र सरकार बाबा रामदेव के बाद अब अन्ना हजारे के आंदोलन को टांय-टांय फिस्स करने में लगी हुई है। पहले तो कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने फिर स्वयं वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने जिस तरह अन्ना हजारे के रवैये के बहाने उनकी मांगों को खारिज किया उससे इस आशंका की पुष्टि होती है कि सरकार ने भ्रष्टाचार के मुद्दे से देश का ध्यान हटाने के लिए हर हथकंडा अपनाया है। यह हास्यास्पद है कि कांग्रेस अन्ना हजारे को बदनाम करने के लिए कभी तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुखौटा बताने की हिमाकत करती है तो कभी यह कहती है कि मुट्ठीभर सिविल सोसाइटी के लोग क्या जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों से ऊपर हैं? हम सरकार से पूछना चाहते हैं कि अगर अन्ना हजारे यह चाह रहे हैं कि एक मजबूत लोकपाल बनाया जाए तो आखिर इसमें अनुचित-असंवैधानिक क्या है? यदि कांग्रेस की नजर में विपक्ष और विशेष रूप से भाजपा भ्रष्टाचार के मामले में ईमानदार नहीं तो फिर अन्ना, उनके साथियों और समर्थकों को क्या फेल किया जाने का प्रयास हो रहा है? यदि अन्ना के समर्थन में सिर्प मुट्ठीभर लोग हैं तो फिर यह हड़बड़ाहट क्यों? यदि केंद्रीय सत्ता भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए प्रतिबद्ध है तो फिर यह प्रतिबद्धता नजर क्यों नहीं आती?

हम सरकार और कांग्रेस पार्टी से सीधा सवाल करना चाहते हैं कि क्या एक बार निर्वाचित होने से ही किसी सरकार और चुने हुए सांसदों, प्रतिनिधियों को अगले पांच साल के लिए भ्रष्टाचार, हत्या, गबन या बलात्कार की इजाजत मिल जाती है? सरकार की सोच तो साफ है, हम पांच साल के लिए चुने गए हैं, हमें राज करने के लिए बस संसद के अन्दर अपनी अर्थमैटिक्स ठीक रखनी है, अंकगणित मैनेज करना है, जनता चीखती है तो चीखती रहे। आखिर कितने दिन चिल्लाएगी, आंदोलन, अनशन करेंगे? असल में यह सरकार जब प्रेशर बनता है तो बौखला जाती है। इसका एक उदाहरण 4 जून को रामलीला मैदान में मिला। हमने देखा कि घबराहट में पहले तो सरकार सारी बातें मान जाती है और बाद में सबसे धीरे-धीरे मुकर जाती है और आंदोलन करने वाले नेताओं को डराने-धमकाने का काम करने लगती है। हमें आश्चर्य नहीं हुआ जब यह खबर आई कि लोकपाल बिल बनाने की मुहिम की अगुवाई कर रहे अन्ना हजारे के ट्रस्ट के खातों पर आयकर विभाग की नजर टेढ़ी हो गई है। लोकपाल पर मसौदा समिति की बैठक से ऐन पहले इनकम टैक्स विभाग के अफसरों ने अन्ना के दफ्तर पर दस्तक दी। सूत्रों के मुताबिक विभाग के अधिकारियों ने ट्रस्ट के दफ्तर जाकर जांच की और करीब पांच घंटे पूछताछ की। सरकार हर हालत में बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के प्रयासों को असफल करेगी। इसके लिए जरूरत के अनुसार वह साम, दाम, दण्ड, भेद सभी हथकंडों व हथियारों का इस्तेमाल करेगी पर अन्ना और बाबा, दोनों ही डरने वाले नहीं और वह जनता की उम्मीदों पर खरे उतरेंगे। उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि भारत की जनता अब जागृत हो चुकी है और यह जो आंधी शुरू हुई है यह रुकने वाली नहीं। सरकार चाहे जितनी कोशिश करे, लोकपाल बिल को जोकपाल विधेयक बनाने की कोशिश करे, हिसाब तो उसे जनता को देना ही होगा।
Tags: Anil Narendra, Anna Hazare, BJP, Congress, Daily Pratap, Kapil Sibal, Kejriwal, Lokpal Bill, Manmohan Singh, Vir Arjun