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Thursday, 7 July 2011

अवैध काले धन को वापस लाने का सुप्रीम कोर्ट का सराहनीय प्रयास

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th July 2011
अनिल रेन्द्र
अगर हसन अली और काशीनाथ तापुरिया ने सोचा था कि वह इतनी आसानी से सारी कार्रवाई से बच जाएंगे तो उन्होंने गलत सोचा था। सुप्रीम कोर्ट ऐसा नहीं होने देगी। सुप्रीम कोर्ट ने विदेशों में जमा काले धन के केस में इस धन को वापस लाने और उसकी पूरी नए सिरे से जांच करने के लिए एक उच्च स्तरीय विशेष जांच दल का गठन कर दिया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी और एसएस निज्जर की खंडपीठ ने इस केस की सुनवाई करते हुए भारत सरकार को तगड़ी फटकार लगाई। उन्होंने हसन अली खान केस को निशाना बनाते हुए सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यम से प्रश्न किया कि एनफोर्समेंट डायरेक्ट्रेट (ईडी) ने हसन अली मामले में सिर्प 44 करोड़ रुपये की सम्पत्ति को जब्त करके क्या संदेश देना चाहा है? खंडपीठ ने प्रश्न किया कि वह जीरोओं का क्या हुआ? आयकर विभाग ने तो 40,000 करोड़ रुपये की आयकर डिमांड निकाली थी? हसन अली के साथी काशीनाथ तापुरिया के खिलाफ 20,580 करोड़ रुपये का डिमांड नोटिस दिया था। अब आप अदालत को बता रहे हैं कि आपने 44 करोड़ की सम्पत्ति ही जब्त की है, बाकी जीरोओं का क्या हुआ? मतलब साफ था कि आयकर विभाग हसन अली खान को बचा रही है, क्यों? अदलात ने यह भी कहा कि यह पहली बार नहीं जब इस केस में अदालत निराश हुई है, पहले भी इस केस में ईडी की कार्रवाई पर प्रश्नचिन्ह लगता रहा है। अदालत ने प्रश्न किया कि सन् 2007 में ईडी ने सनसनीखेज खुलासा खुद ही किया था कि 2001-2005 के बीच हसन अली खान का लेन-देन 1.6 बिलियन डालर का था। 2007 में जब हसन अली के पुणे स्थित आवास पर छापा मारा गया था तो वहां से 8.04 बिलियन डालर के यूबीएस बैंक, स्विटजरलैंड को लेन-देन के दस्तावेज मिले थे। अदालत ने पूछा कि हसन अली के बोफोर्स दलाल अदनान खाशोगी से संबंधों का क्या हुआ? हसन अली ने खाशोगी का यूबीएस बैंक में खाता खुलवाने में मदद की थी। सरकार के पास अदालत से किसी भी सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं था। यही वजह है कि देश में छिपाए गए काले धन की जांच में सरकार की लेटोलतीफी और गुमराह करने वाली कार्रवाई से ही तंग आकर सुप्रीम कोर्ट ने मामले को अपने हाथ में लेने का फैसला किया। एक विशेष जांच दल के गठन का फैसला इसी उद्देश्य से किया गया है।
एक अनुमान के अनुसार लगभग 1456 अरब डालर यानि 70 लाख करोड़ रुपये विदेशों में जमा हैं। इस हिसाब से देश की सम्पत्ति का 40 प्रतिशत ब्लैक मनी के रूप में विदेशी बैंकों में जमा है। अमेरिका की कानूनी धमकियों के बाद स्विटजरलैंड के यूबीएस बैंक ने न सिर्प खाताधारक अमेरिकी नागरिकों के नाम बताए, 78 करोड़ डालर का हर्जाना भी दिया जबकि भारत ने पिछले 20 वर्षों से काले धन को वापस लाने के लिए कुछ भी नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को साफ कहा कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर गम्भीर नहीं है। इस सन्दर्भ में उसने यह दो टूक टिप्पणी भी की कि सरकार ने जो कदम उठाए हैं, उन पर उसे गम्भीर आपत्ति है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि काले धन की जांच पूरी तरह से रुकी हुई है। आखिर शीर्ष अदालत के ऐसे कठोर रुख के बाद सरकार किस मुंह से यह कह सकती है कि वे काले धन के मुद्दे पर गम्भीर है? देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा से सीधे जुड़े ऐसे संवेदनशील मामले में सरकार की बेरुखी से तंग आकर अदालत को खुद ही इस पर सीधी कार्रवाई करने पर मजबूर होना पड़ा है। छह महीने से कोर्ट लगातार सरकार को चेतावनी दे रहा था कि वह इस मामले को गम्भीरता से ले और उन सभी लोगों की निशानदेही करे जिन्होंने अपनी अकूत अवैध दौलत विदेश के बैंकों में छिपा रखी है। लेकिन सरकार कोरे वायदों या बेमन की कार्रवाइयों से आगे बढ़ने को तैयार नहीं दिख रही थी। सरकारी उदासीनता का आलम यह है कि वह विदेश में छिपाए गए काले धन को महज कर वंचना का मामला बता रही है जबकि खुद देश की शीर्षस्थ अदालत मानती है कि यह पैसा देश के विकास की मद से चुराया गया हो सकता है या हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी के साथ आतंकवादियों की मदद के लिए भी हो सकता है। ताज्जुब तो यह है कि न केवल सुप्रीम कोर्ट बल्कि बाबा रामदेव सहित देश के प्रबुद्ध नागरिकों ने बार-बार इस गम्भीर मामले को उठाया है। बाबा रामदेव की तो यह प्रमुख मांग हो रही है कि इस धन को राष्ट्र सम्पत्ति घोषित किया जाए। इन सबके बावजूद सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। गुप्त अमेरिकी दस्तावेजों को सार्वजनिक कर दुनिया में सनसनी मचाने वाले विकीलीक्स के असांजे ने रहस्य खोला था कि विदेशों में काली कमाई जमा करवाने वाले दोशों में भारत सबसे ऊपर है और जहां अमेरिका, जर्मनी और यूरोपीय देश विदेशों में जमा अपने पैसे की वापसी के लिए आक्रामक तरीके अपना रहे हैं वहीं भारत सरकार ने आश्चर्यजनक चुप्पी साधी हुई है। हमारी सरकार की चुप्पी हसन अली मामले में भी देखी जा सकती है। घोड़े और कबाड़ के व्यापार की आड़ में देश का यह सबसे बड़ा हवाला कारोबारी अरबों की दौलत को नियमित रूप से विदेश भेजता था। आरोप है कि वह देश के प्रभावशाली लोगों की दौलत का हिसाब भी लगाता था, जिनमें राजनेता और नौकरशाह भी शामिल थे। आश्चर्य की बात यह थी कि कारगुजारियों की भनक होने के बावजूद हसन वीआईपी बनकर देश में छुट्टा घूमता था। अगर सुप्रीम कोर्ट ने कड़े तेवर न अपनाए होते तो क्या हसन अली आज सीखचों के पीछे होता? सबसे बड़ी बात तो यह है कि हसन अली जिनकी काली कमाई का हिसाब-किताब रखता था वे लोग कौन हैं? असल चोर तो ये लोग हैं जिन्होंने कुर्सी का अवैध उपयोग कर देश को लूटा और लूट का माल विदेशों में छिपाया। सरकार उनके नाम बताने में विदेशी संधियों की आड़ ले रही है। इसलिए इस बार सुप्रीम कोर्ट ने सीधे निर्देश दिए हैं कि वैसे तमाम लोगों को जिन्हें ऐसे काले धन पर नोटिस दिया गया है उनके नाम अदालत में पेश किए जाएं। कोर्ट ने तो यहां तक टिप्पणी की कि यदि वह सरकार की जगह होती तो ऐसी संधि कदाचित नहीं करती जिससे देश का हित प्रभावित होता है। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह विशेष जांच दल का गठन किया है और उसमें शीर्ष अदालत के दो पूर्व न्यायाधीशों को जगह देने के साथ ही यह कहा है कि यह दल काले धन से जुड़े मामलों से निपटने की एक व्यापक कार्य योजना तैयार करें उससे तो यही स्पष्ट होता है कि उसे इस मनमोहन सरकार से कोई उम्मीद नहीं रह गई है। ऐसी स्पष्टवादिता के लिए सुप्रीम कोर्ट को हमारा सलाम। दिलचस्प यह है कि सुप्रीम कोर्ट की सख्ती से बचने के लिए सरकार ने पिछले दिनों आनन-फानन में आठ नौकरशाहों की कमेटी बना दी थी जिसके अध्यक्ष केंद्र के राजस्व सचिव हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के विशेष जांच दल के साथ इस टीम को जोड़ दिया जाएगा। तब जाकर शायद सही मायनों में विदेशों में छिपा काले धन और उससे जुड़े लोगों की पहचान का काम दिशा और गति पकड़े।
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Wednesday, 6 July 2011

ऑपरेशन के माध्यम से लड़कियों का लिंग परिवर्तन

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 6th July 2011
अनिल रेन्द्र
मध्य प्रदेश के इंदौर जिले से एक चौंकाने वाली खबर आई है। यहां सर्जरी करके बच्चियों को लड़का बनाए जाने की खबर आई है। मीडिया में आई रिपोर्ट के अनुसार इंदौर में हर साल सैकड़ों की तादाद में पांच साल तक की बच्चियों को जैनिटोप्लास्टी नामक सर्जरी से बेटों में तब्दील किया जा रहा है। एनसीपीसीआर ने इंदौर में किए जा रहे इस कुकृत्य को सरासर बाल अधिकारिकता का हनन माना। आयोग का मानना है कि इससे समाज में लिंगभेद की भावना को बढ़ावा मिलेगा। आयोग ने मध्य प्रदेश से न सिर्प इन सारे मामलों की जांच की रिपोर्ट मांगी है बल्कि इन कामों में शामिल डाक्टरों की लिस्ट के साथ-साथ उनके खिलाफ उठाए जाने वाले कदमों की जानकारी भी मांगी है। इंदौर के चीफ मेडिकल एण्ड हैल्थ ऑफिसर डॉ. शारदा पंडित के हवाले से बच्चों पर लिंग परिवर्तन के लिए किसी भी तरह की सर्जरी किए जाने की बात से हालांकि इंकार किया है। उन्होंने कहा कि शहर में ऐसे 10 अस्पताल हैं जहां पर बच्चों के अविकसित यौन अंगों के इलाज के लिए प्लास्टिक सर्जरी की जा सकती हैं। यहां ऐसा कोई सरकारी अस्पताल नहीं जहां मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम के तहत ऐसी कोई सर्जरी की जा सके। वैसे भी एक स्वस्थ और सामान्य बच्चे या बच्ची का सेक्स चेंज नहीं किया जा सकता। यह मुमकिन नहीं है।
बेटियों के खिलाफ सामाजिक दुराग्रह और चिकित्सा विज्ञान का दुरुपयोग किस तरह हो सकता है, इस रिपोर्ट से पता चलता है। इंदौर के कुछ प्लास्टिक सर्जन हर साल ऐसे सैकड़ों ऑपरेशन करते हैं जिनमें एक से पांच साल की बच्चियों के जननांगों को पुरुष जननांगों में बदला जाता है। जाहिर तौर पर इसमें कोई नैतिक या कानूनी दिक्कत नहीं है। नैतिक इसलिए, क्योंकि जिन बच्चियों का ऑपरेशन किया जाता है, वे कथित रूप से `इंटर सेक्स' होती हैं यानि उनके अंदरुनी जननांग पुरुषों के होते हैं और बाह्य जननांग स्त्रियों के। डाक्टरों का दावा यह है कि वे तो बच्चे को उसकी असली पहचान दे रहे हैं ताकि भविष्य में वह अपने लिंग के बारे में भ्रम और उलझन में न रहें। इसमें कानूनी दिक्कत इसलिए नहीं है, क्योंकि भारत में इसके बारे में कोई कानून नहीं बना है।
हमारी राय में इस तरह के ऑपरेशन अगर धड़ल्ले से वाकई ही हो रहे हैं तो यह न तो सामाजिक दृष्टि से, न नैतिक दृष्टि से और न ही वैधानिक दृष्टि से जायज हैं। फिर यह कुदरत को एक तरह से चुनौती देने वाले भी हैं पर अगर यह हो रहे हैं तो जाहिर-सी बात है कि माता-पिता की स्वीकृति के बाद ही हो रहे हैं। इसलिए उनका भी दोष कम नहीं है। हमारे समाज में बच्चियों को पैदा होते ही कई जगह मार दिया जाता है। दोष समाज का भी है। फिर अब तक तो सिर्प पूर्व लिंग निर्धारण और गर्भपात की ही समस्या सामने आती थी, अब यह चिकित्सा विज्ञान का उतना ही भयावह दुरुपयोग है। इन ऑपरेशनों के लिए अपनी बेटियों को ले जाने वाले मां-बाप बेटा पाने की लालच में अपनी संतानों का जीवन नरक कर रहे हैं और पैसा कमाने के लिए डाक्टरों ने भी सारी हदें पार कर दी हैं। यह जरूरी है कि ऐसे ऑपरेशनों पर अविलम्ब कानूनी पाबंदी लगे और समाज में ऐसे मां-बाप व डाक्टरों, अस्पतालों के खिलाफ माहौल बनाया जाए और बच्चियों को बचाया जाए।
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सर्वदलीय बैठक में सरकार ज्यादा सफल रही


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 6th July 2011
अनिल रेन्द्र
अगर मनमोहन सिंह सरकार की सर्वदलीय बैठक बुलाकर यह मंशा थी कि अन्ना हजारे के आंदोलन की हवा निकालने के लिए विपक्षी दलों का इस्तेमाल किया जाए तो वह इसमें पूर्ण सफल नहीं हो सकी। हां कुछ हद तक सफल जरूर हुई। विभिन्न राजनीतिक दलों ने सिविल सोसाइटी की डिमांडों पर अपने पत्ते नहीं खोले। इस बात पर सहमति बहरहाल जरूर बन गई कि एक मजबूत लोकपाल बिल जरूर होना चाहिए। इस मुद्दे पर आम सहमति बनने की उम्मीद भी नहीं थी। भाजपा का हमेशा से यही स्टैंड रहा है कि पहले सरकार संसद में विधेयक पेश करे फिर उस पर हम चर्चा करेंगे। सुषमा स्वराज का कहना था कि सर्वदलीय बैठक में मसौदे के प्रावधानों पर चर्चा नहीं हुई। हमें ऐसा लोकपाल चाहिए जो पारदर्शी तरीके से चुना जाए और निष्पक्षता के साथ काम करे। हमारे सरकारी मसौदे के प्रावधानों पर अनेक मतभेद हैं। इसमें लोकपाल की चयन प्रक्रिया, अधिकार क्षेत्र शामिल हैं। लगभग सभी दलों की राय आमतौर पर यह भी थी कि सरकार को सिविल सोसाइटी के सामने झुकना नहीं चाहिए। कुछ राजनेता अन्ना की टीम पर भी भड़के। `आपने अन्ना और उनकी सिविल सोसाइटी के बनाए हुए जन लोकपाल विधेयक का मसौदा तो हमें दे दिया, जरा अन्ना की बॉयोग्राफी भी दे दीजिए जिससे हमें उनके बारे में भी पता चल जाए।' अपने अधिकारों पर उठते सवाल से खार खाए कुछ राजनीतिक दलों का गुस्सा इस बैठक में समाजवादी पार्टी की ओर से ऐसे ही अन्दाज में बयां किया गया। `पहले तो आपको हमारी याद आई नहीं अब जब आप पीड़ित हो गए तो हमें बुला लिया। अब आप संसद में पहले स्थापित प्रक्रिया के तहत बिल लाइए, इसके बाद ही हमें जो कुछ कहना होगा कहेंगे।'
इस सर्वदलीय बैठक में आम राय होना तो दूर की बात रही सभी दल इस बात के ज्यादा इच्छुक थे कि अमुक पार्टी का स्टैंड क्या है। केंद्र सरकार इस लिहाज से सफल रही कि सभी दलों ने एक स्वर में यह कह दिया कि वह अपने अधिकारों से कोई समझौता करने को तैयार नहीं हैं और जनता के चुने हुए प्रतिनिधि किसी भी सिविल सोसाइटी से बड़े हैं और उन्हें सिविल सोसाइटी डिक्टेट नहीं कर सकता। सरकार अपने इरादे को छिपा रही थी और उसकी इच्छा भी मामले को सुलझाने की बजाय उलझाने में ज्यादा थी। अगर ऐसा न होता तो वह दोनों मसौदों, एक जो अन्ना ने दिया था और एक जो पांच मंत्रियों ने बनाया था, का समन्वय करके अपनी ओर से एक ऐसा मसौदा पेश करती जिसमें दोनों की प्रमुख शर्तें होती तो शायद कोई आम सहमति बन जाती पर सरकार ने ऐसा नहीं किया। कुल मिलाकर इस सर्वदलीय बैठक का कोई महत्वपूर्ण परिणाम नहीं निकला। टीम अन्ना ने बैठक के बाद कहा कि सर्वदलीय बैठक में तो कोई नतीजा निकलना ही नहीं था। सरकार ने कैबिनेट से पारित कोई मसौदा भी नहीं तैयार किया था। सिविल सोसाइटी कार्यकर्ता मनीष सिसोदिया ने कहा, `16 अगस्त से अन्ना हजारे का अनशन इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार कितना प्रभावी विधेयक मानसून सत्र में संसद में पेश करती है। हमारी आंखें कैबिनेट से पारित मसौदे पर अटकी हैं।' किरण बेदी ने कहा, `रविवार की बैठक में कम से कम राजनीतिक पार्टियों ने लोकपाल बिल की जिम्मेदारी तो ली।' हमें लगता है कि लोकपाल बिल सही दिशा में आगे बढ़ रहा है पर मुझे नहीं मालूम कि किरण जी के विचारों से कितने लोग सहमत होंगे।
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Tuesday, 5 July 2011

दाउद और छोटा राजन की दुश्मनी का शिकार हुए जे डे

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 5th July 2011
अनिल रेन्द्र

मिड डे के वरिष्ठ पत्रकार जे डे की हत्या के मामले में छोटा राजन का नाम आ रहा है। वरिष्ठ पत्रकार ज्योतिर्मय डे की हत्या के मामले में रविवार को माफिया सरगना छोटा राजन के कथित सहयोगी और बुकी को गिरफ्तार किया गया। माना जाता है कि जे डे की हत्या में इस व्यक्ति की भूमिका थी। छोटा राजन के कथित सहयोगी और बुकी विनोद असरानी उर्प विनोद चेंबूर समेत आठ लोगों को अब तक इस हत्या मामले में गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस का कहना है कि जे डे की हत्या के पीछे छोटा राजन का हाथ है। राजन को आशंका थी कि जे डे उसके ठिकाने के बारे में खुलासा कर सकते हैं। इसलिए उसने पत्रकार का सफाया करने का इरादा बनाया। मुंबई पर अंडरवर्ल्ड का राज चलता है। विदेशों में महफूज ठिकानों में बैठे यहां जिन्दगी और मौत का फैसला करते हैं। छोटा राजन कौन है? चलिए इसके बारे में आपको बताएं। राजन सदाशिव निखल्जे उर्प छोटा राजन का जन्म मुंबई की लोअर क्लास बस्ती तिलक नगर में हुआ। 80 के दशक में वह सिनेमाघरों के बाहर ब्लैक में टिकट बेचा करता था। जल्द ही उसकी पहचान राजन नायर उर्प बड़ा राजन से हुई। लड़के का हौसला राजन को भा गया और उसने निखल्जे को अपना दायां हाथ बना लिया। जब बड़ा राजन की हत्या हुई तो निखल्जे ने उसकी जगह ले ली और तब से वह छोटा राजन बन गया।
छोटा राजन दाउद इब्राहिम कासकर की गैंग में शामिल हो गया और दाउद का करीबी बन गया। दाउद तब मुंबई का सबसे बड़ा डॉन था। 1986 में दाउद के दुबई जाने के बाद राजन और छोटा शकील उसके भारतीय कारोबार के नुमाइंदे बन गए। 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढांचा गिरा दिया गया। 1993 की शुरुआत में मुंबई में सीरियल बम ब्लास्ट हुए। उसमें दाउद का हाथ था। उस वाकया ने छोटा राजन को बगावत के लिए मजबूर कर दिया। जाहिर है, डी कम्पनी में कम्यूनल फूट पड़ चुकी थी। दाउद और राजन तब से पक्के दुश्मन हैं और भारत में बिजनेस के लिए लड़ रहे हैं। छोटा राजन का दावा है कि वह भारत से प्यार करता है, इसीलिए दाउद की बेपनाह ताकत को चैलेंज करता है। अपने भारत प्रेम की मिसाल देने के लिए उसने 1998 में नेपाली सांसद मिर्जा दिलशाद बेग को मरवा दिया। कहा जाता है कि मिर्जा दाउद और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का आदमी था। उसके जरिये नेपाल से भारत में ड्रग्स और आतंकवादी एक्सपोर्ट किए जाते थे।
हालांकि कोई इसे कबूल नहीं करेगा, लेकिन आम राय है कि भारतीय खुफिया एजेंसियां छोटा राजन के टच में रहती हैं। वे उसे दाउद के खिलाफ जंग में इस्तेमाल करती हैं और इसलिए राजन के छोटे-मोटे जुर्मों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। कहा जाता है कि हर बड़ी कार्रवाई से पहले भारतीय खुफिया एजेंसियां और पुलिस राजन को इत्तिला कर देती हैं ताकि उसके लोगों पर कहर न टूटे। छोटा राजन ईस्ट एशिया में कहीं छिपा है शायद मलेशिया या फिर इंडोनेशिया में। उसकी तबीयत अब ठीक नहीं रहती पर उसका सिक्का आज भी बदस्तूर चल रहा है। इस साल मई में बाइकर्स ने दाउद के भाई इकबाल कासकर के ड्राइवर को मार डाला। तब लगा कि कुछ बरसों की खामोशी के बाद मुंबई में फिर गैंगवार छिड़ने वाली है। अगले दो महीने में जे डे का मर्डर हो गया, जिसके पीछे राजन और दाउद की आपसी दुश्मनी हो इससे इंकार नहीं किया जा सकता।
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मंदिर में एक लाख करोड़ का खजाना मिला

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 5th July 2011
अनिल रेन्द्र

हमारे मंदिरों की अकूत सम्पत्ति इतिहास में कई विदेशी लुटेरों की हवस का शिकार बने हैं। मंदिरों में इतनी लूटपाट के बाद भी आज भी अरबों की सम्पत्ति है। इस दृष्टि से दक्षिण भारत के मंदिर तब भी विदेशी लुटेरों से बचे रहे। केरल के एक मंदिर श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर में आजकल सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त समिति के सात सदस्य मंदिर के खजाने की सूची बनाने के काम में जुटे हुए हैं। पहले इस मंदिर की देखरेख की जिम्मेदारी त्रावणकोर के शाही परिवार की थी। मंदिर के छह गुप्त कक्षों पर ए, से एफ तक पहचान अंकित किया गया है। हाल ही में टीपी सुन्दर राजन नाम के एक वकील ने मंदिर के कुप्रबंधन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी। उसी के बाद कोर्ट ने इन सभी कमरों को खोलने का आदेश दिया था। इनमें से ए और बी 1874 से बन्द पड़े थे। गत सोमवार को सी, डी और एफ कक्षों को खोला गया था, जिसमें से एक हजार करोड़ रुपये की सम्पत्ति मिली थी। केरल का यह मंदिर देश का सबसे धनी मंदिर हो सकता है। गैर सरकारी आंकलन के अनुसार, इस मंदिर के कक्षों में रखे गए सोने, हीरे और अन्य बहुमूल्य रत्नों की कीमत करीब एक लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है।
गत गुरुवार को एक टीम ने श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के बेसमेंट में बनी तिजोरी ए खोली। मंदिर में ए से एफ तक इस तरह की कुल छह तिजोरियां हैं। तिजोरी ए से हजारों साल पुराने सिक्के, 2.5 किलो वजनी नौ फुट लम्बे नेक्लेस, कान की बालियां के आकार में एक टन सोना, सोने की छड़ें, हीरे-जवाहरातों से भरे बोरे, सोने की रस्सियां, हीरे-पन्ने जड़े प्राचीन गहनें, मुकुट और दूसरी चीजें मिली हैं। शुक्रवार को ईस्ट इंडिया कम्पनी के युग के 17 किलो सोने के सिक्के मिले। इसके अलावा नेपोलियन के समय के 18 सिक्के, रेशम में लिपटे कीमती जवाहरात, सिक्कों और गहनों के रूप में एक हजार किलो सोना, सोने का एक छोटा हाथी मिला है। कुछ चीजों पर 1772 लिखा हुआ था जिससे पता चलता है कि वे राजा कार्तिक तिरुनल रामा वर्मा के समय की हैं।
इन छह तिजोरियों में से ए और बी को 1882 के बाद से नहीं खोला गया है। फिलहाल सिर्फ तिजोरी ए की ही सम्पत्ति की मौजूदा कीमत का अनुमान लगाया गया है। अभी इनकी एंटीक वैल्यू का आंकलन नहीं किया गया है। फिर भी ऐसा माना जा रहा है कि यह मंदिर तिरुपति बालाजी मंदिर को पीछे छोड़कर देश का सबसे धनवान मंदिर बन गया है। प्रशासन ने मंदिर की सुरक्षा बढ़ी दी है। चारों तरफ सिक्यूरिटी कैमरे और अलार्म सेट कर दिए गए हैं। केरल के डीजीपी का कहना है कि मंदिर की सुरक्षा के लिए एक कमांडो फोर्स का गठन किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से पर्यवेक्षक नियुक्त किए गए केरल हाई कोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति सीएस राजन और न्यायमूर्ति एन. कृष्णा ने कहा, `हम सामान की सूची तैयार कर रहे हैं, कीमत का सही अनुमान लगाना काफी मुश्किल है। कक्ष बी और ई का खुलना अभी बाकी है, हमें लगता है कि इसमें एक हफ्ता लग सकता है।'
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Monday, 4 July 2011

मनमोहन सिंह यह प्रेस कांफ्रेंस न ही करते तो बेहतर था

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4th July 2011
अनिल रेन्द्र
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की बहुचर्चित प्रेस कांफ्रेंस पता नहीं क्या सोचकर की गई पर हमारी राय में तो फायदे की जगह इससे प्रधानमंत्री को भारी नुकसान ही हुआ है। वह एक कमजोर, निसहाय, गैर राजनीतिक और टेम्परेरी प्रधानमंत्री साबित हुए हैं जिन्होंने अपना सारा दोष या तो मीडिया पर थोप दिया या फिर अपने साथियों पर। इस बहुचर्चित प्रेस कांफ्रेंस से जब वह पांच (विशेषतौर पर चुने हुए) बाहर आए तो टीवी वालों ने वह सारे सवाल पूछ डाले जो देशवासी प्रधानमंत्री से पूछना चाह रहे थे। यह पांच सम्पादक, इनमें से प्रधानमंत्री के बने प्रवक्ता बेशक कुछ क्षणों के लिए सुपर स्टार बन गए हों पर अन्त में मनमोहन सिंह ने एक बार फिर साबित कर दिया कि प्रेस को फेस करने की अब उनमें हिम्मत नहीं है। यही वजह है कि उन्होंने सारे प्रमुख सम्पादकों, टीवी और प्रिंट मीडिया को न बुलाकर केवल उन भरोसेमंद सम्पादकों को ही बुलाया जो उनकी ओर से सारे मुद्दों पर सफाई दे सकें। यही वजह है कि श्री अलोक मेहता बता रहे थे कि प्रधानमंत्री ने सीडब्ल्यूजी घोटाले पर यह कहा, बाबा रामदेव के समर्थकों की पिटाई पर क्या सफाई दी, अन्ना हजारे की मांगों पर यह कहा, राहुल गांधी के लिए गद्दी छोड़ने पर यह कहा, इत्यादि-इत्यादि। न तो प्रधानमंत्री और न ही उनकी पार्टी के प्रवक्ता एक मोटी-सी बात समझ पाए हैं कि एक राजनेता का काम है कि जनता के सवालों का जवाब दें, बार-बार और प्रमुख समस्याओं पर देश को संतुष्ट करें पर हम प्रधानमंत्री को दोष नहीं दे सकते। उन्होंने खुद इस प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि वह तमाम जिन्दगी एक नौकरशाह रहे हैं। न तो उन्हें राजनीति की हिज्जों की समझ है और न ही वह चुने हुए प्रधानमंत्री हैं। वह तो प्राइम मिनिस्टर-इन-वेटिंग हैं जो पार्टी के उस फैसले की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कब बाबा राहुल गद्दी सम्भालने की हामी भरते हैं।
अब देखिए कि माननीय प्रधानमंत्री देश की ज्वलंत समस्याओं पर क्या जवाब देते हैं ः आज का नम्बर वन मुद्दा देश के सामने भ्रष्टाचार और महाघोटाले हैं। प्रधानमंत्री कहते हैं कि हम भ्रष्टाचार करते नहीं हो जाता है। मैंने भ्रष्टाचार नहीं किया, ए. राजा, कलमाड़ी, कनिमोझी ने कर लिया। ऐसी सफाई के साथ प्रधानमंत्री ने अफसरी अन्दाज वाली यह तकनीकी दलील दे दी कि सरकार जब फैसले लेती है तब अनिश्चितताएं होती हैं। मतलब ऐसा होगा और हो सकता है कि अनिश्चितता में सरकार निर्णय करती है। उस समय लगता है कि यही ठीक है और फैसला होता है। मगर बाद में सरकार की एकाउंटिंग आडिटर जनरल, संसद और मीडिया फैसलों, फाइलों की जो जांच-पड़ताल करती है वह पोस्ट फैक्टो (यानि परिणाम आने के बाद) वाला होता है, यानि निर्णय के नतीजे की कसौटी पर जांच होती है। उसमें घोटाले का हल्ला होता है। मनमोहन सिंह इतने पर ही नहीं रुके, यह भी कहाöबस 10 में से सात निर्णय अगर मेरे सही हैं तो उसे अच्छा परफोर्मेंस माना जाना चाहिए। क्या मतलब है इस दलील का? क्या मतलब यह है कि यदि उनके बाकी तीन फैसलों में संचार घोटाले, मुकेश अम्बानी और गैस-तेल ब्लॉक देने और कॉमनवेल्थ के तीन महाघोटालों के नतीजे निकलते हैं तो जनता और मीडिया को उस आधार पर महाभ्रष्ट का हल्ला नहीं करना चाहिए। उनका लब्बोलुआब है कि सरकार ने 2जी स्पैक्ट्रम बांटने का जो फैसला लिया या मुकेश अम्बानी के तेल ब्लॉक देने की शर्तों पर जो फैसले हुए, वह उस वक्त की अनिश्चित स्थितियों की बदौलत थी। इसलिए कैग यह हिसाब नहीं लगाए कि उसमें नुकसान हुआ या घोटाला। इस दलील से प्रधानमंत्री ने बेशर्मी की सारी हदें पार कर दी हैं।
जाहिर है कि डॉ. मनमोहन सिंह यह दलील दे रहे हैं कि सरकार के फैसलों की समीक्षा करने का न तो मीडिया को कोई हक है और न ही सीएजी को। विडम्बना देखिए, सीएजी ने एक बयान जारी कर कहा है कि उसे परफोर्मेंस आडिट का पूरा अधिकार है। नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक (कैग) विनोद रॉय ने कहा कि शीर्ष आडिटर के पास कार्य निष्पादन की लेखापरीक्षा (परफोर्मेंस आडिट) का पूरा अधिकार है। इस लिहाज से कैग 2जी स्पैक्ट्रम आवंटन और पेट्रोलियम क्षेत्र में मुनाफा भागीदारी जैसे मुद्दों की लेखा परीक्षा का पूरा अधिकार रखता है। प्रधानमंत्री ने मीडिया पर तो पूरी भड़ास निकाल दी पर अदालतों पर अपना गुस्सा निकालने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। हां, उन्होंने यह जरूर जाहिर कर दिया कि वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए गए उद्योगपतियों और उनके अफसरों के खिलाफ कार्रवाई से आहत में हैं। एक मायने में मनमोहन सिंह ने यह संकेत दे दिया कि सुप्रीम कोर्ट की जनहित सक्रियता और भारत की संवैधानिक एकाउंटिंग संस्था कैग के फैसलों से नाराज हैं। इन्हीं की वजह से दरअसल आज भारत के आजादी के बाद इतिहास में यूपीए-2 सरकार सर्वाधिक भ्रष्ट सरकार के मुखिया कहलाए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की बदौलत बलवा, राजा और खरबपतियों के पीछे पुलिस पड़ी है। इस पर मनमोहन सिंह व यह तमाम पहलुओं को मीडिया ने यह सोचते हुए दबाए रखा है कि डॉ. मनमोहन सिंह बेचारे और भले हैं। उन्हें चिन्ता है तो केवल उन्हीं क्रोनी पूंजीपतियों की है। तभी सम्पादकों से बात करते हुए वे खरबपतियों की जांच से पुलिस राज का खतरा देखते हैं। भारत के किसी प्रधानमंत्री ने पहले कभी भ्रष्टाचारी खरबपतियों की चिन्ता में ऐसे तर्प नहीं दिए जैसे बुधवार को मनमोहन सिंह ने दिए। उन्हें जनता की कितनी फिक्र है, वह उनके महंगाई के सवाल पर यह जवाब देने से पता चलता है कि वे क्या कर सकते हैं? अंतर्राष्ट्रीय कमोडिटी के दामों को नियंत्रण करने के लिए उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। जैसे कोर्टों में तारीखें पड़ती हैं उसी अन्दाज में उन्होंने कह दिया कि अगले साल मार्च तक छह फीसदी हो सकती है मुद्रास्फीति।
आज सारे देश का ध्यान लोकपाल बिल पर टिका हुआ है। सुनिए ऐसे ज्वलंत मुद्दे पर प्रधानमंत्री क्या कहते हैं और क्या कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे तो चाहते हैं कि प्रधानमंत्री का पद लोकपाल के दायरे में आए लेकिन मंत्री नहीं चाहते। प्रधानमंत्री चाहे और मंत्री ओवर रूल करें, क्या यह राजनीतिक लीडरशिप की निशानी है? प्रधानमंत्री देश का लीडर होना तो दूर रहा, अपने मंत्रिमंडल का भी लीडर नहीं है। कैसा बचकाना-सा जवाब है। फिर प्रस्तावित सरकारी लोकपाल बिल के प्रावधानों को देखिए। भारत की बहुसंख्यक यानि 90 फीसदी जनता का पुलिस-बाबू राज में घुटना है। जनता में भ्रष्टाचार के खिलाफ यदि गुस्सा है तो वह छोटे-छोटे सरकारी दफ्तरों में रोजमर्रा की लूट है। ड्राइविंग लाइसेंस लेना हो, पुलिस में एफआईआर दर्ज करानी हो, राशन लेना हो, बिजली-पानी कनेक्शन लेना हो, गैस लेनी हो या मकान का नक्शा पास कराना हो या जीवन-मरण सर्टिफिकेट लेना हो, ऐसे तमाम कामों में जनता सरकारी कर्मचारियों की लूट से आजिज आ चुकी है। उसी को बदलने और जनजीवन की लूट की रोकथाम के चक्कर से सख्त लोकपाल की जनता में चाह है। मगर हुआ उलटा। मनमोहन सरकार ने 95 फीसदी अफसरों और बाबुओं को लोकपाल से बाहर रखवा दिया है। मतलब भ्रष्ट नौकरशाह में 95 फीसदी की सरकारी लोकपाल में प्रोटेक्शन है। महाठगी वाली इस सरकारी ड्राफ्ट में बेशर्मी की हद यह है कि यदि कोई नागरिक बाबू-अफसर के खिलाफ शिकायत करेगा तो उसे बदले की सजा के लिए तैयार रहना होगा। किसी की शिकायत की तो वह अफसर विशेष अदालत में जवाबी शिकायत दर्ज करा सकता है और इस काम के लिए उसे सरकारी वकील भी मुफ्त मिलेगा। जनता के इस दमन शोषण के खिलाफ ही अन्ना हजारे ने लोकपाल का डर बनाने का एक नुस्खा दिया। मगर डॉ. मनमोहन सिंह उसे मान नहीं रहे, क्योंकि उन्हें जनता से क्या लेना-देना?
प्रधानमंत्री ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में एक ऐसी बात कर दी जिससे अंतर्राष्ट्रीय विवाद उत्पन्न हो गया है। उन्होंने कहा कि बंगलादेश की कम से कम 25 फीसदी जनसंख्या जमात-ए-इस्लामी से संबंध और हमदर्दी रखती है और यह भारत विरोधी है और वह आईएसआई के शिकंजे में हैं तथा बंगलादेश में किसी भी समय राजनीतिक घटनाचक्र बदल सकता है। बाद में पीएमओ ने सफाई दी कि यह अनौपचारिक रिमार्प था जिसे तूल नहीं देना चाहिए। डॉ. मनमोहन सिंह ने पिछली बार 2014 तक प्रधानमंत्री बने रहने का भरोसा दिया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें 2014 तक का जनादेश मिला हुआ है, तब तक वे रहेंगे। बुधवार को उनका कहना था, जब भी पार्टी इस बारे में अपना मन बनाएगी, मैं खुशी-खुशी कुर्सी छोड़ दूंगा। मतलब राहुल गांधी की अटकल के बीच डॉ. मनमोहन सिंह ने बता दिया है कि अब 2014 तक प्रधानमंत्री बने रहने की गारंटी नहीं है। सो कुल मिलाकर प्रधानमंत्री की यह प्रेस कांफ्रेंस एक डिजास्टर रही।
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Sunday, 3 July 2011

Reasons for BJP’s success in Assembly bye elections

- Anil Narendra
Bhartiya Janata Party (BJP) has won both the seats in the recent Assembly bye-elections. Dashrath Lodhi of BJP defeated Dr Tanya of Congress by a margin of 11,738 votes on Jabera seat in Madhya Pradesh, while in Bihar, the Purnia seat was won by BJP’s Kiran Kesari, defeating Ram Charitra Yadav of Congress by a margin of 23,665 votes. BJP has retained this seat. These impressive victories, once again confirm the deteriorating image and position of the Congress. The strong leadership in these States is another important factor in BJP’s impressive performance in these elections. The most important reason for sound image in BJP-ruled States is the party leader in those States. It is important that the party leader has a clean and sincere image and is sensitive towards the public, has control over bureaucracy and has right priorities. It is also important for a leader to keep his flock together and make them partners in power sharing. A committed hardcore BJP worker once told me a secret. He explained the important basic difference between BJP and the Congress. When Congress comes to power, it shares the comforts, benefits and awards of power with its workers, in other words, the worker, too is benefited, whereas, for BJP leaders, the worker is the saviour, but once the elections are over and it is time to share benefits of the power with him, the leaders become inaccessible, they shut themselves away from workers in their air-conditioned drawing rooms. Workers are not allowed even entry to their houses or offices. They want to enjoy fruits of power and privileges by themselves, they are averse to sharing the benefits of power with their workers. That is why the worker doesn’t come out in their support of his leader in the next elections and says that he is least bothered if netaji wins or looses. On the other hand, the Congress worker puts his best efforts in the next elections, as his interests are also involved in getting his leader elected. The BJP leadership in Madhya Pradesh must understand this simple equation, only then it may come to power there. If BJP has been able to achieve such an impressive success, it is due to the fact that Chief Minister of the State was from the party. Congress worker identifies himself with his leader and realizes that in case of any problem or seeking any favour, he can depend on his leader. The Congress leaders are able to win elections even in adverse conditions, as their workers labour relentlessly for the victory of their leaders.
Today, the central leadership of BJP is fraught with factionalism. Leaders are vying with each other with an eye on the primeministership and they are too busy in their own manipulations to have time for other things. They are engaged only in pulling each others’ legs. I am not the only one, who is saying such things, the senior party leader, Shri Lal Krishna Advani has himself accepted it. The former Deputy Prime Minister and leader of the BJP Parliamentary Party, LK Advani has said that Party’s credibility as regard to the sincerity has suffered a dent. He said that factionalism is fast taking roots within the party and BJP might have to pay a heavy price for it. According to inner party sources, speaking at the inaugural session of a training camp for BJP councilors at Chhatarpur Mandir, Shri Advani said that party’s performance in Corporation has been far from satisfactory and party’s image of integrity has deteriorated. Praising Ahmedabad Municipal Corporation in this regard, he said that the party is working there sincerely. He said that Delhi Pradesh BJP was, earlier plagued with factionalism, but now the factionalism is increasing day by day. He blamed some leaders of the party for this deteriorating image of the party. Probably, Shri Advani’s targets were the leaders of Delhi Pradesh BJP, but he succeeded in aiming a number of other persons also. The need of the hour is that the second level central BJP leadership should give up dreaming for the primeministership, instead BJP should project such a person as the future Prime Minister, who is capable of carrying whole party with him. I find three alternatives in the present leadership, who are experienced, whose image is clean, who can carry party workers with them and who are not too egotists to forget their roots. They are: Shri Lal Krishna Advani, Shri Murli Manohar Joshi and Shri Narendra Modi.