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Wednesday, 27 July 2011

चौतरफा दबाव में मायावती


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27th July 2011
अनिल नरेन्द्र
जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं वैसे-वैसे मायावती की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। चार वर्ष तक तो स्थिति बहन जी के नियंत्रण में रही पर पांचवें अंतिम साल में स्थिति उनके काबू से बाहर होती जा रही है। उन पर चौतरफा दबाव बढ़ता जा रहा है। राहुल गांधी जमीन पर उतरकर गांव-गांव घूम रहे हैं, तो दूसरी तरफ अदालतों ने मायावती सरकार को कटघरे में खड़ा करके एक नई समस्या पैदा कर दी है। इन सबकी वजह से केंद्र सरकार ने भी राज्य सरकार की घेराबंदी शुरू कर दी है। सूत्रों के मुताबिक घोटालों और आपराधिक षड्यंत्रों के लिए बदनाम हो चुकी राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएमएम) योजना समेत केंद्र की सभी योजनाओं के लिए पिछले चार वर्षों में भेजे गए धन के उपयोग का हिसाब उत्तर प्रदेश सरकार से मांगे जाने की तैयारी शुरू हो गई है। इसकी शुरुआत राज्य सरकार को एनआरएमएम योजना के तहत दी जाने वाली राशि में 700 करोड़ से ज्यादा की कटौती कर दी गई है। सूत्रों का यह भी कहना है कि मायावती के करीबी माने जाने वाले कुछ उद्योगपतियों और बिल्डरों पर जांच एजेंसियों का घेरा भी कसने लगा है। पिछले दिनों राज्य सरकार के एक ताकतवर मंत्री के खिलाफ हत्या के एक मामले में हाई कोर्ट द्वारा सीबीआई जांच के आदेश पर भी जल्दी ही अमल हो सकता है। गृह मंत्रालय यह भी हिसाब लगा रहा है कि प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई कितनी बैठकों में मायावती अभी तक शामिल हुई हैं? गृह मंत्रालय से मिली जानकारी के मुताबिक मायावती ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा बुलाई गई एक भी बैठक में शिरकत नहीं की है। सरकार के सूत्रों का कहना है कि उत्तर प्रदेश को पिछले छह वर्षों में एनआरएमएम के तहत 8570 करोड़ दिए गए हैं। इसके अलावा इस वर्ष 3137 करोड़ की धनराशि और मिली। अब तक कुल 11708 करोड़ रुपये दिए जा चुके हैं। राज्य सरकार ने इनके खर्च का कोई हिसाब केंद्र को नहीं दिया है। यही हाल मनरेगा, इन्दिरा आवास योजना, राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना जैसी अन्य केंद्रीय योजनाओं का भी है। इनकी मद से भी केंद्र से राज्य को अरबों रुपये की धनराशि आ चुकी लेकिन खर्च का हिसाब राज्य सरकार ने अब तक केंद्र को नहीं दिया। जबकि गुजरात, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, कर्नाटक, झारखंड, उत्तराखंड की गैर-कांग्रेसी सरकारें भी केंद्रीय योजनाओं को किस तरह खर्च करती हैं, उसका हिसाब नियमित रूप से देती हैं। इस सरकार के शीर्ष पर बैठे लोगों ने अरबों का धंधा किया तो राजधानी तक आने वाली केंद्रीय योजनाओं को जमकर लूटा है। जब सरकार के संरक्षण में मंत्री लूटने में जुटे हों तो सांसदों-विधायकों के दमन शोषण को कौन रोकेगा? इसी वजह से कई जगहों पर हत्या और बलात्कार के मामले में मंत्री से लेकर विधायक तक फंसे हैं। राहुल गांधी का भगीरथी प्रयास राज्य में कांग्रेस की वापसी के लिए भी रंग लाने लगा है। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में भूमि अधिग्रहण को लेकर अदालतों के फैसले से भी केंद्र और कांग्रेस दोनों का हौंसला बढ़ा दिया है। कुल मिलाकर मायावती बुरी तरह से फंस गई हैं। देखना यह होगा कि अपने राजनीतिक कैरियर की यह सबसे बड़ी चुनौती से वह कैसे निपटती हैं?
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गुलाम फई की गिरफ्तारी से फिर बेनकाब हुआ पाकिस्तान


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27th July 2011
अनिल नरेन्द्र
सभी जानते थे कि अमेरिका में पाकिस्तान लॉबी बहुत प्रभावशाली है और पिछले कई वर्षों में इसी लॉबी के कारण सब कुछ जानते हुए भी अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान की आर्थिक, सैनिक मदद करता चला आ रहा है पर यह नहीं पता था कि इस लॉबी के पीछे कौन-कौन-सी शक्तियां काम कर रही हैं। गत दिनों अमेरिका ने अपने एक और नागरिक को गिरफ्तार किया है जो दशकों से एक एनजीओ की आड़ में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए काम कर रहा था और कश्मीर पर भारत विरोधी प्रचार के लिए पानी की तरह पैसा बहा रहा था। `कश्मीरी अमेरिकन काउंसिल' नामक इस एनजीओ के डायरेक्टर के रूप में गुलाम नबी फई आईएसआई से हवाला के जरिये करोड़ों रुपये नियमित रूप से पाता था और इसका इस्तेमाल अमेरिकी सांसदों को कश्मीर पर भारत के खिलाफ भड़काने के लिए करता था। गुलाम फई ऐसे दूसरे पाकिस्तानी मूल के अमेरिकन हैं जिन्हें हाल में अमेरिका ने गिरफ्तार किया है। इससे पहले आतंकी डेविड हेडली गिरफ्तार हुए थे। चौंकाने वाली बात यह भी सामने आई है कि फई आईएसआई के इशारों और पैसों से अमेरिका में कश्मीर पर सेमिनार आयोजित करता था और इस आयोजन में बहुत से नामी भारतीय भी हिस्सा लेते रहे हैं। सूत्रों के अनुसार भारत सरकार ने प्रख्यात पत्रकार दिलीप पडगांवकर को जम्मू-कश्मीर मामले में प्रमुख वार्ताकार बनाया है वह भी फई के सेमिनार में हिस्सा ले चुके हैं। आईएसआई के सहयोग से आयोजित होने वाले सेमिनारों में भाग लेने वालों में प्रख्यात पत्रकार कुलदीप नैयर, अलगाववादी नेता मीरवाइज उमर फारुख, राजेन्द्र सच्चर, पत्रकार गौतम नवलखा, हरिन्दर बवेजा, मनोज जोशी, हमीदा नईम, वेद भसीन, जेडी मोहम्मद समेत तमाम भारतीय रहे हैं। सेमिनार में न केवल कश्मीर के मुद्दे पर चर्चा होती थी बल्कि पाकिस्तान का समर्थन करने वाला प्रस्ताव भी पारित होता था। फई दरअसल सेमिनार के बहाने पिछले 25 सालों से दुनिया का कश्मीर पर नजरिया बदलने में लगा हुआ था। उसकी कोशिश इसके माध्यम से कश्मीर मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करना, भारत को कश्मीरवासियों के साथ अन्याय करने का दोषी बनाना तथा दूर तक षड्यंत्र के तार जोड़ने की थी। एफबीआई के मुताबिक फई अमेरिका से चलने वाले कश्मीर अमेरिकन परिषद का कार्यकारी निदेशक हैं। वह इसे आईएसआई के इशारे पर चला रहा है। फई पर आईएसआई के लिए जासूसी करना, उसके इशारे पर पाकिस्तान के कश्मीर पर रुख को समर्थन देने के इरादे से विशेषज्ञों, राजनीतिज्ञों, पत्रकारों तथा समाज के अगुवा लोगों के लिए सेमिनार आयोजित करके लोगों का नजरिया बदलने का आरोप है। एफबीआई के अनुसार उसके इस प्रयास का कई अमेरिकी सीनेटर भी हिस्सा रहे हैं। फई को एफबीआई द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद भारत में इसकी आंच पहुंची और पता चला कि कई भारतीय नामचीन हस्तियां भी उसके बुलावे पर अमेरिका का दौरा करती रही हैं। खुफिया सूत्र बताते हैं कि सेमिनार में भाग लेने के लिए फई के नियंत्रण पर लोगों को काफी फख्र होता था। इसके लिए अमेरिका आने-जाने, सेमिनार में भाग लेने, रहने-खाने के अलावा इसमें भाग लेने के एवज में मोटी धनराशि मिलती थी। सेमिनार के अन्त में एक प्रस्ताव भी पारित होता था और उसमें पाकिस्तान का समर्थन करने वाली राय को बल देने वाला प्रस्ताव भी पारित होता था। दिलीप पडगांवकर ने फई द्वारा आयोजित सेमिनार में उसके बुलावे पर अमेरिका जाने की बात मानी है। उन्होंने कहा कि वह बहुत पहले फई के नियंत्रण पर वहां गए थे, लेकिन उन्हें फई के आईएसआई के साथ जुड़े होने की कोई जानकारी नहीं थी। क्या यह महज संयोग था कि गुलाम फई की गिरफ्तारी ऐन ऐसे मौके पर हुई जब अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत यात्रा पर थीं। अमेरिका को कम से कम छह साल पहले से गुलाम की हकीकत मालूम थी। एक बार तो फई को भारी-भरकम रकम (नकदी) के साथ पकड़ा गया था और उससे गहन पूछताछ भी हुई थी। भारत काफी समय से फई और उनके एनजीओ के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहा था। कमाई का कोई प्रत्यक्ष स्रोत नहीं दिखने के बावजूद गुलाम फई अमेरिका में रईसों की जिन्दगी बसर करता था। आश्चर्य नहीं कि धुर भारत विरोधी के रूप में कुख्यात रिपब्लिकन सांसद डैन बर्टन को गुलाम ने सबसे अधिक चन्दा दिया था। वर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा भी अनजाने में अपने चुनाव अभियान में गुलाम फई से चन्दा ले चुके हैं। पाकिस्तान गुलाम के जरिये अमेरिका को इस बात के लिए राजी करना चाहता था कि वह भारत पर दबाव डाले कि कश्मीर में जनमत संग्रह होना चाहिए। फई की पैठ तो संयुक्त राष्ट्र में भी थी। गुलाम कश्मीरी अलगाववादियों का तो वह सबसे बड़ा एम्बेसेडर था और इसकी गिरफ्तारी से इन भारत विरोधी तत्वों के होश उड़ने स्वाभाविक ही हैं। डॉ. गुलाम फई का मुकदमा शिकागो में हेडली-राणा मुकदमे के बाद अमेरिका में दूसरा हाई-प्रोफाइल मुकदमा होगा। अब सवाल यह है कि क्या अमेरिका आखिरकार पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी पर इस बात का दबाव डालने में सफल होगा कि वह इस प्रकार की गतिविधियों पर अंकुश लगाए, आईएसआई के सारे सम्पर्कों का पता लगाए? हो सकता है कि गुलाम फई के आतंकी संगठनों से भी सीधे संबंध हों। देखें मुकदमे में क्या-क्या उभरकर आता है?
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Tuesday, 26 July 2011

नोट के बदले वोट पर अमर सिंह से लम्बी पूछताछ


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 26th July 2011
अनिल नरेन्द्र
`नोट के बदले वोट' मामले में दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने शुक्रवार को राज्यसभा सांसद अमर सिंह से लगभग साढ़े तीन घंटे पूछताछ की। इस मामले में पहले से ही गिरफ्तार दो आरोपियों संजीव सक्सेना और सुहेल हिन्दुस्तानी से भी आमना-सामना कराया गया। इस तीन घंटे की पूछताछ पर औपचारिक रूप से दिल्ली पुलिस द्वारा कोई ब्रीफिंग अभी तक नहीं हुई है, इसलिए इस दौरान क्या सवाल-जवाब हुए उनके बारे में दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता। हां, समाचार पत्रों में जो रिपोर्ट छपी है उससे थोड़ा अंदाजा हो सकता है कि सवालों की लाइन क्या रही होगी। अमर सिंह शुक्रवार सुबह ही 10ः45 बजे अपनी मर्सीडीज कार में चाणक्यपुरी स्थित अपराध शाखा के इंटर स्टेट सेल पहुंच गए। दोपहर लगभग 12ः50 बजे तक अपराध शाखा के पुलिस अधिकारी अमर सिंह से पूछताछ करते रहे। फिर स्पेशल सेल के अतिरिक्त उपायुक्त एलएन राव भी पहुंच गए। राव पूर्व में भी टेपिंग मामले में अमर सिंह से पूछताछ कर चुके हैं। दोपहर 2ः00 बजे पूछताछ समाप्त होने के बाद वे मीडिया कर्मियों के सवालों का जवाब दिए बिना निकल गए। पुलिस सूत्रों ने बताया कि पूछताछ के दौरान अमर सिंह का व्यवहार सामान्य रहा और वे आत्मविश्वास से भरे थे। अधिकारियों ने पूछताछ के दौरान लगभग 1ः30 बजे सुहेल हिन्दुस्तानी और अमर सिंह का आमना-सामना भी कराया। अमर सिंह ने सुहेल के एक करोड़ रुपये देने के आरोपों समेत सभी आरोपों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि संजीव सक्सेना मेरा निजी सचिव रह चुका है। लेकिन जब यह कांड हुआ तब वह एक बसपा नेता का निजी सचिव था। एक छपी रिपोर्ट के अनुसार अमर सिंह ने सभी सवालों का गोलमोल अंदाज में जवाब दिया। दिल्ली पुलिस अपराध शाखा ने अमर सिंह के लिए 15 सवालों की फेहरिस्त तैयार कर रखी थी। पहला सवाल था कि 22 जुलाई, 2008 को संसद में लाए गए एक करोड़ रुपये के सिलसिले में एक खास टेलीफोन पर बातचीत हुई। उस नम्बर वाले शख्स के बारे में वह कितना जानते हैं। दूसरा सवाल कुछ खातों के बारे में पूछा जिनसे कैश फॉर वोट के लिए एक करोड़ रुपये निकाले गए थे। तीसरा सवाल था, 22 जुलाई को सांसद अशोक अर्गल, महावीर सिंह भगोरा, फग्गन सिंह कुलस्ते उनके निवास पर आए थे या नहीं? चौथा सवाल कि सिंह ने अपने पीए संजीव सक्सेना की मुलाकात इन तीनों से करवाई थी या नहीं। सूत्रों के मुताबिक अमर सिंह का फरार ड्राइवर संजय इन मामलों की अहम कड़ी है। घटना के बाद से ही संजय गायब है। छठा सवाल कि क्या अमर सिंह ने 22 जुलाई की सुबह संजय को संजीव के साथ फिरोजशाह रोड भेजा था? अगला सवाल कि रिश्वत के एक करोड़ रुपये बैग में उनके घर पर भरे गए थे? सूत्रों ने बताया कि सवाल नम्बर आठ था, वह एक करोड़ रुपये किसके थे? अमर सिंह ने इसकी जानकारी से इंकार कर दिया तो अगला सवाल संजीव की पूछताछ में आए तथ्य पर दागा गया। पुलिस ने पूछा कि संजीव ने कहा है कि अमर सिंह का ड्राइवर संजय उसे लेकर गया था तो आपको (अमर सिंह) इसकी जानकारी कैसे नहीं है? यह कैसे हो सकता है? अभी तक पूरी तरह लड़खड़ा चुके अमर सिंह से हल्का सवाल करते हुए पुलिस ने पूछा कि वह संजीव सक्सेना को कब से जानते हैं और उसे घटना से संबंधित क्या काम सौंप रखा था। 13वां सवाल फिर सख्त था। पहले सवाल में पूछे गए फोन नम्बर पर वापस लौटते हुए पुलिस ने सवाल दागा कि 19 और 21 जुलाई, 2008 के बीच उस नम्बर पर उनकी कितनी बातचीत हुई, किससे हुई, क्यों और क्या हुई? कॉल डिटेल के मुताबिक अमर सिंह ने उस नम्बर पर उस बीच कई दफा बातचीत की। 15वां और आखिरी सवाल था कि कुलस्ते ने पुलिस को बयान दिया है कि अमर सिंह ने संजीव को सांसदों से मिलवाया। इसमें कितना सच्चाई है?
उधर श्री अमर सिंह से चाणक्यपुरी थाने में पूछताछ हो रही थी इधर बहुत से नेताओं की सांसें अटकी हुई थीं। उन्हें यह डर सता रहा था कि पता नहीं अमर सिंह क्या कह दें। अमर सिंह उस्तादों के उस्ताद हैं, वे अपने को बचाने के लिए अंगुली किसी तरफ भी कर सकते हैं। खासकर कांग्रेसी नेताओं में काफी हलचल रही। पूछताछ के बाद कांग्रेसी नेता गम्भीर दिखे। कल तक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कह रहे थे कि सुहेल हिन्दुस्तानी के बयान पर कांग्रेस और अमर सिंह जैसी शख्सियत से पूछताछ ठीक नहीं है। सुहेल भाजपा का पिट्ठू और दलाल है। पुलिस दरियाफ्त के बाद ही पार्टी के नेता अहमद पटेल को क्लीन चिट दे दी है। सवाल किया जा रहा है कि पूछताछ से पहले ही पुलिस ने किसी को भी क्लीन चिट किस बिना पर दे दी? कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि इस मामले में कानून अपना काम कर रहा है। चूंकि मामला कोर्ट के विचाराधीन है इसलिए पार्टी की तरफ से प्रतिक्रिया देना उचित नहीं है। एक अन्य कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने कहा कि आज दिल्ली के एक कोर्ट ने नोट के बदले वोट में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की भूमिका को नकार दिया है। इसलिए पुलिस बहुत जल्द सच्चाई तक पहुंच जाएगी। यह पूरा खेल भाजपा की तरफ से प्रायोजित था जिससे कांग्रेस और सरकार बदनाम हो।
दूसरी तरफ भाजपा ने दिल्ली पुलिस द्वारा न्यायालय को यह बताए जाने पर कि मामले में कांग्रेस या सपा के किसी नेता के शामिल होने की बात जांच में सामने नहीं आई है पर कहा कि पुलिस का बयान पूरी बेइमानी को छिपाने वाला और जांच के नाम पर धब्बा है। भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने पुलिस जांच पर प्रश्न खड़ा करते हुए कहा कि जब पूरी जांच नहीं हुई, मामले से संबंधित लोगों के बयान ही नहीं हुए तो फिर पुलिस इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंच सकती है कि पूरे मामले में लाभान्वित होने वाली कांग्रेस या इस पूरे कांड को अंजाम देने वाली सपा का इसमें कोई हाथ नहीं है। भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि अगर जांच इसी तरह होनी है तो जांच एक छलावा है और पुलिस अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर पूरे मामले में लीपापोती करने की कोशिश कर रही है। जावडेकर ने कहा कि पुलिस की जांच में तेजी वैसे ही उच्चतम न्यायालय के दबाव के बाद आई है लेकिन लगता है कि पुलिस पूरी तरह से राजनीतिक दबाव में काम कर रही है। उन्होंने कहा कि यदि पुलिस मामले में ईमानदारी और कायदे से जांच करे तो 15 दिन के अन्दर दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। वैसे भी मामला अदालत में है और अदालत को दिल्ली पुलिस को कनविंस करना होगा कि वह अगर इस निष्कर्ष पर पहुंची है तो किस बिना पर पहुंची है? फिर अदालत के रुख पर निर्भर करेगा कि केस किस दिशा में चलना है। अभी से कुछ भी दावे से कहना शायद गलत होगा।
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Friday, 22 July 2011

कैश फॉर वोट प्रकरण में सुहेल हिन्दुस्तानी की गिरफ्तारी महत्वपूर्ण है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23rd July 2011
अनिल नरेन्द्र
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद नोट के बदले वोट मामले में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने बुधवार को इस केस की अहम कड़ी की भूमिका निभाने वाले सुहेल हिन्दुस्तानी को गिरफ्तार कर लिया। भारतीय जनता युवा मोर्चा के कार्यकर्ता रह चुके सुहेल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने संजीव सक्सेना के साथ मिलकर तीन भाजपा सांसदों को रिश्वत देने में अहम भूमिका निभाई थी। क्राइम ब्रांच ने सुहेल को बुधवार सुबह पूछताछ के लिए बुलाया था। लगभग सात घंटे तक चली पूछताछ के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया। सुहेल के रवैये से पुलिस अधिकारी भी हैरान हो गए। दरअसल उसने पुलिस के हर सवाल का हाजिर जवाबी अन्दाज में जवाब दिया। इस दौरान उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। अपराध शाखा के एक अधिकारी ने बताया कि एक गुलदस्ता लेकर अपराध शाखा के दफ्तर में पहुंचे सुहेल ने अपने पारिवारिक पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए बताया कि वह राजस्थान के टोंक जिले से 15 वर्ष पहले जनपथ होटल आकर रुका था। इसके बाद उसने राशि रत्नों का व्यवसाय शुरू किया। इस दौरान उसका सम्पर्प कई बड़े लोगों व नेताओं से हुआ। इसी के चलते वह कुछ वर्ष पहले भाजपा के युवा मोर्चा में शामिल हो गए। उसके बाद उसने पार्टी में काफी अच्छी पकड़ बना ली। पूछताछ के लिए जाने से पहले सुहेल ने कैश फॉर वोट मामले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी का नाम लेकर उन्हें भी इस मामले में घसीटने की कोशिश की। सुहेल ने संवाददाताओं से कहा, `मुझे अमर सिंह और अहमद पटेल (सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव) के फोन आए थे। प्रधानमंत्री के करीबी लोगों से और 10 जनपथ से भी मुझे फोन आए।' लेकिन सुहेल ने फोन करने वालों के नाम नहीं बताए। पूछताछ में उसने दावा किया कि उसका रोल विश्वास मत के दौरान बीजेपी सांसदों की खरीद-फरोख्त की कोशिश का पर्दाफाश करने तक सीमित था। सुहेल हिन्दुस्तानी का असल नाम सुहेल अहमद है। उसके बारे में कहा जाता है कि वह राजनीति के गलियारों में लोगों से सम्पर्प बनाने के लिए जाना जाता है। पूर्ववर्ती राजस्थान सरकार के कुछ राजनेताओं से भी उसके अच्छे सम्पर्प बताए जाते हैं। इतना ही नहीं, मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में सुहेल की निर्बाध पैठ भी बताई जाती है। सुहेल की गिरफ्तारी के बाद अब इस मामले में समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव अमर सिंह पर गाज गिर सकती है। गृह मंत्रालय ने दिल्ली पुलिस को अमर सिंह समेत दो वर्तमान और दो पूर्व सांसदों की जांच की इजाजत दे दी है। मंत्रालय ने यह निर्णय बुधवार की देर शाम गृहमंत्री पी. चिदम्बरम से पुलिस कमिश्नर बीके गुप्ता की मुलाकात के बाद किया है। पुलिस सूत्रों ने बताया कि अमर सिंह के अलावा समाजवादी पार्टी के सांसद रेवती रमण सिंह और भाजपा के पूर्व सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर भगोरा से भी इस मामले की पूछताछ की जाएगी। सुहेल ने बताया कि अमर सिंह और अहमद पटेल ने सरकार बचाने के लिए उससे सम्पर्प किया था। उन लोगों ने उन भाजपा सांसदों की खरीद-फरोख्त करने में मदद करने को कहा था जो कमजोर या मजबूरी में फंसे हों और जिनके खिलाफ कोई केस चल रहा हो। इसके एवज में उन सांसदों को पांच करोड़ रुपये दिए जाएंगे। सरकार बचाने की प्रक्रिया में उससे किन लोगों ने सम्पर्प किया था, इसका पूरा ब्यौरा मिल जाएगा। इसके लिए उसके फोन कॉल रिकार्ड की जांच की जा सकती है। पुलिस को इस मामले में अमर सिंह के ड्राइवर संजय की भी तलाश है जो अब तक काबू नहीं आ सका।
राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने दिल्ली पुलिस को `कैश फॉर वोट' के मामले में जांच आगे बढ़ाने में संसद सदस्यों में सम्भावित पूछताछ की इजाजत दे दी है। राजनेताओं, सत्ता के गलियारों तथा नामचीन हस्तियों के इर्द-गिर्द घूमकर सेवाएं देने में माहिर सुहेल हिन्दुस्तानी की गिरफ्तारी के बाद अब कई नेताओं की मुसीबतें बढ़ सकती हैं। राजग सरकार के समय प्रधानमंत्री कार्यालय में सेवाएं देने तथा बाद में भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी के करीबी माने जाने वाले सुधीन्द्र कुलकर्णी तक इसकी आंच पहुंच सकती है। हालांकि भाजपा प्रवक्ताओं ने अभी इस पर कोई प्रतिक्रिया अभी तक नहीं दी पर अगर यह मामला आगे बढ़ता है तो संसद के मानसून सत्र में इसका मुद्दा बनना लग रहा है। फिलहाल भाजपा इस मामले की जांच और दोषी को सजा देने के बयान तक ही सीमित है। सुहेल हिन्दुस्तानी द्वारा 12 अगस्त 2008 को तत्कालीन लोकसभाध्यक्ष को लिखे पत्र के मुताबिक उसने सुधीन्द्र कुलकर्णी द्वारा रखे गए प्रस्ताव को मानकर सांसदों की कथित खरीद-फरोख्त उजागर करने में सहयोग दिया था। उसके मुताबिक कांग्रेस के बड़े नेताओं के इशारे पर सरकार बचाने का प्रयास किया जा रहा था। पत्र में बताया गया है कि इसके लिए इंडिया इस्लामिक सेंटर में सुहेल हिन्दुस्तानी ने पहले सपा के तत्कालीन सांसद उदय प्रताप सिंह से सम्पर्प किया। उन्हें अपने पास विपक्ष के बिकाऊ सांसदों की सूची होने की जानकारी दी और उदय ने इसके लिए सपा सांसद पुंवर रेवती रमण सिंह और राज्यसभा में पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव अमर सिंह से सम्पर्प करने की सलाह दी। जाते-जाते उदय सुहेल का नम्बर भी लेते गए। इससे पहले सुहेल हरियाणा कैडर के आईएएस अधिकारी और मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के करीबी एसपी गुप्ता से मिले थे। पत्र के अनुसार गुप्ता को भी सुहेल हिन्दुस्तानी ने विपक्ष के बिकाऊ सांसदों की सूची होने के बारे में बताया। गुप्ता ने भी इसके बाबत उन्हें मुख्यमंत्री हुड्डा तथा कांग्रेसी नेताओं से मिलाने का आश्वासन दिया। समझा जा रहा है कि इस घटनाक्रम को दिल्ली पुलिस और अदालत के सामने रखकर सुहेल हिन्दुस्तानी बड़ा राजनीतिक भूचाल खड़ा कर सकते हैं। सूत्रों के अनुसार राज्यसभा के सभापति और लोकसभाध्यक्ष दोनों ने दिल्ली पुलिस को `कैश फॉर वोट' मामले की जांच आगे बढ़ाने की हरी झंडी दिखा दी है। इससे साफ है कि आने वाले समय में सपा के सांसद रेवती रमण सिंह और पूर्व महासचिव अमर सिंह की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं। इस प्रकरण में अभी भाजपा, वामदल, जद(यू) समेत अन्य दल पुलिस की जांच पर पूरी नजर रखे हुए हैं। संसद के मानसून सत्र में एक बार फिर `कैश फॉर वोट' मामले की गूंज सुनाई देने के आसार हैं। इस पूरे मामले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहले से गिरती छवि और गिरने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता पर सारा दारोमदार दिल्ली पुलिस की जांच और अदालतों के एटीट्यूट पर निर्भर करता है।

गोरखा समस्या का समाधान एक नई दिशा प्रदान कर सकता है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22nd July 2011
अनिल नरेन्द्र
पश्चिम बंगाल सरकार, केंद्र सरकार और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के बीच हुआ समझौता दार्जिलिंग इलाके में शांति बहाली का एक ऐतिहासिक कदम है। वाम मोर्चा ने इस क्षेत्र से कभी न्याय नहीं किया और हमेशा इसे कुचलने का ही प्रयास किया पर ममता बनर्जी ने सत्ता सम्भालते ही पहाड़ी क्षेत्र की इस ज्वलंत समस्या को सुलझा दिया। निश्चित रूप से यह उनकी एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कठिन राजनीतिक चुनौती का फौरी तौर पर हल निकालने के काम को सफलता से हल करके अपनी राजनैतिक काबलियत का एक सुबूत दिया है। गोरखा मूल के लोगों के लिए अलग राज्य की मांग तीन दशकों से बंगाल की राजनीति में उथल-पुथल मचाती रही है पर अलग राज्य के लिए पश्चिम बंगाल का बंटवारा ऐसा संवेदनशील मुद्दा था जिसे छूने की हिम्मत किसी में नहीं थी। 23 साल पहले ऐसा ही एक समझौता तात्कालिक गोरखा मुक्ति मोर्चा के साथ हुआ था जिसमें दार्जिलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद की स्थापना की गई थी और सुभाष घीसिंग को इसका नेता बनाया गया था। हालांकि यह भी स्वायत्तशासी परिषद थी और इसमें दार्जिलिंग, कलिम्पोंग और करस्योंग के इलाके शामिल किए गए थे लेकिन इसके अधिकार सीमित थे। वाम मोर्चे ने इस 42 सदस्यीय परिषद में एक-तिहाई सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार अपने पास रख लिया था जिसे लेकर खींचतान मची रहती थी। ममता बनर्जी ने नई व्यवस्था को गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन का नाम देकर गोरखा भावनाओं को काफी हद तक संतुष्ट किया है। तात्कालिक तौर पर इसमें वही इलाके रखे गए हैं जो सुभाष घीसिंग की पहली परिषद में थे। ताजा तितरापा समझौते के बाद परिषद की पुलिना में जीटीए के पास ज्यादा अधिकार होंगे। परिषद के सदस्यों की संख्या 50 करने का प्रावधान किया गया है और मनोनीत किए जाने वाले सदस्यों की संख्या घटाकर पांच कर दी गई है। स्वायत्तता की पुंजी से किसी क्षेत्रीय या अस्मितामूलक समस्या का समाधान का यह देश में पहला उदाहरण नहीं है। असम में बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद को इससे ज्यादा स्वायत्तता हासिल है। यही बात मेघालय के तीन यानि खासी, ज्यंतिया और गारो परिषद के बारे में भी कही जा सकती है। इन निकायों को प्रशासनिक कामों के अलावा कुछ हद तक न्यायिक अधिकार भी हासिल हैं। लेकिन ममता के फॉर्मूले में भी एक पेंच फंस सकता है। बेशक एक कमेटी का गठन जरूर किया गया है जो तराई और सिलीगुड़ी के गोरखा बाहुल हिस्सों को नई व्यवस्था का अंग बनाने की मांग करेगी, लेकिन पेंच यही फंसता है। इन इलाके के बंगाली, आदिवासी तथा अन्य गैर-गोरखा समुदाय के लोग इस व्यवस्था के साथ जाने को तैयार नहीं हैं। यही वजह है कि जहां नई व्यवस्था को लेकर गोरखा समुदाय के लोग आतिशबाजियां कर रहे थे, उस समय सिलीगुड़ी और तराई क्षेत्र के कई भागों में हड़ताल चल रही थी। चुनाव में मुंह की खाने के बाद वाम मोर्चा राजनीतिक रोटियां सेंकने की फिराक में है और इसे बंगाल का बंटवारा बता रहा है। हालांकि ममता बनर्जी ने गोरखालैंड प्रशासन की घोषणा के वक्त साफ तौर पर कह दिया था कि राज्य का विभाजन किसी भी हालत में नहीं किया जाएगा। गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन ऐसा मध्यमार्गी प्रयोग है जिसे अलग राज्य की मांग उठा रहे तेलंगाना, विदर्भ जैसे आंदोलनों का हल निकल सकता है। वैसे भी देखा जाए तो अलग राज्य बनाने से और राज्यों के बंटवारे करने से तो यह रास्ता कहीं बेहतर है।
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हिलेरी क्लिंटन की सफल (?) भारत यात्रा


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22nd July 2011
अनिल नरेन्द्र
अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की भारत यात्रा अमेरिकी दृष्टि से बहुत सफल रही। हर बार की तरह इस बार भी अमेरिका ने भारत को पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर हमदर्दी के कुछ शब्द कहकर अपना पलड़ा झाड़ लिया है। हिलेरी की यात्रा मुंबई में ताजा बम विस्फोटों के तुरन्त बाद हुई थी। इसलिए भी भारत के पास पाक प्रायोजित आतंकवाद को समाप्त करने पर अमेरिका का खुला समर्थन पाना जरूरी था। समय भी था पर पाकिस्तान अमेरिका की मजबूरी है। आज भी वह पाकिस्तान पर कुछ हद तक निर्भर है। जब तक अमेरिका अफगानिस्तान में मौजूद है तब तक अमेरिका पाकिस्तान से नहीं बिगाड़ेगा। यूं ही लड़ता-झगड़ता रहेगा, दोनों देशों के बीच नौटंकी जारी रहेगी। समय की पुकार थी कि हिलेरी पाकिस्तान को सख्त संदेश देतीं लेकिन आतंकवाद पर कड़कमिजाजी दिखा रहा अमेरिका आतंकी संगठनों के पनाहगार पाक को लेकर सम्भलकर बात करता नजर आया। भारत यात्रा पर आईं हिलेरी क्लिंटन ने मंगलवार को कहा कि पाक पर आतंक के खिलाफ कदम उठाने के लिए जितना सम्भव हो सके, उतना दबाव बनाया जाएगा। लेकिन इसकी भी एक हद होती है। हैदराबाद हाऊस में हिलेरी ने आतंकवाद के खिलाफ जंग में भारत के साथ सहयोग बढ़ाने का आश्वासन तो दिया वहीं यह कहने से भी नहीं चूकीं कि इस लड़ाई में पाक भी अमेरिका का अहम साथी है। अमेरिका भारत पर पाक से शांतिवार्ता जारी रखने का अक्सर दबाव बनाता रहता है। इसकी पुष्टि हिलेरी ने यह कहकर की कि भारत और पाकिस्तान के बीच जारी वार्ता से हम उत्साहित हैं। अमेरिकी दृष्टिकोण में पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में प्रमुख सहयोगी है। आतंकवादियों ने मस्जिदों व सरकारी भवनों पर हमला करके बड़ी संख्या में पाकिस्तानियों को मौत के घाट उतारा है, यह दलील देकर क्लिंटन ने भारत को समझाने का प्रयास किया कि पाकिस्तान खुद आतंकवाद का शिकार है। अमेरिका का दोहरा चेहरा फिर एक बार भारत के सामने आया है। वह दोहरे मापदंड रखता है। उसके लिए उसका अपना हित सर्वोपरि है। अमेरिका ने असैन्य एटमी करार को पूर्णता के साथ लागू करने के आश्वासन के जरिये भारत को भले ही राहत देने की कोशिश की हो पर परमाणु दुर्घटना कानून पर मतभेद के संकेत भी दे दिए हैं। हिलेरी ने मंगलवार को कहा कि भारत के साथ असैन्य करार के पूर्णता से किया जाएगा लेकिन क्रियान्वयन नाभिकीय दुर्घटना से होने वाले नुकसान की भरपायी के मामले में भारत को अपने कानून को अंतर्राष्ट्रीय नियमों के मुताबिक करना होगा। हिलेरी ने कहा कि भारत को अपने मुआवजे कानूनों को अंतर्राष्ट्रीय नियमों के अनुसार करने के लिए यूएन कन्वेंशन की पुष्टि की औपचारिकता पूरी करनी होगी।
गत दिवस ही हिलेरी क्लिंटन ने कहा कि पाकिस्तान से मुंबई हमले के सूत्रधारों के खिलाफ कार्रवाई करने का अनुरोध किया गया है। उन्होंने यह कहने में भी कोई सकोच नहीं किया कि पाकिस्तान के सन्दर्भ में अमेरिका और भारत क्या कर सकते हैं, इसकी एक सीमा है। इसका सीधा मतलब है कि अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान पर इसके लिए दबाव बनाने का कोई इरादा नहीं रखता कि वह अपनी जमीन से आतंकवादी गतिविधियों पर अंकुश लगाए और भारत विरोधी गतिविधियों का परित्याग करे। अगर भारत यह समझता है कि पाक प्रायोजित आतंकवाद की लड़ाई में अमेरिका भारत का साथ देगा तो वह गलतफहमी में है और हिलेरी ने इसे साफ भी कर दिया है। हमें अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ेगी। बेशक पाकिस्तानी सेना अपने पश्चिमी हिस्से में तालिबान से लड़ने की नौटंकी कर रही हो पर पूर्वी हिस्से में तो उसकी मदद से आतंकवादी शिविर चल रहे हैं जहां से भारत पर हमले किए जाते हैं। क्या अमेरिका को इसकी जानकारी नहीं है? सब कुछ जानते हुए भी जब वह अनजान बन जाता है तो इसका मतलब साफ है कि उसके सामने उसके सामरिक हित प्राथमिकता रखते हैं, उसे इस बात की कोई परवाह नहीं कि पाकिस्तान, भारत के खिलाफ क्या करता है? अमेरिका के इस रवैये से बार-बार अवगत होने के बावजूद यही स्टैंड रहा है कि भारत इन आतंकी अड्डों को नष्ट न करे। अगर अमेरिका का दबाव न होता तो शायद अब तक भारत कम से कम कुछ आतंकी शिविरों पर तो सर्जिकल स्ट्राइक कर ही देता। कब तक भारतीय नेता यह उम्मीद पाले रखेंगे कि पाकिस्तान की आतंकवादी नीतियों पर अमेरिका हमारा समर्थन करेगा? इससे प्रश्न उठता है कि भारत की पाकिस्तान के प्रति नीति आखिर है क्या? कभी उसको गाली देता है तो कभी दोस्ती का हाथ बढ़ाता है। क्या यह केवल अपने अमेरिकी आकाओं को खुश करने के लिए होता है। अमेरिका की प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं पर हमें अपनी स्पष्ट करने की सख्त जरूरत है, जितनी जल्दी यह बात भारतीय नेताओं को समझ आ जाए उतना ही देश के लिए अच्छा होगा। कुल मिलाकर हिलेरी की भारत यात्रा अमेरिकी दृष्टिकोण से सफल रही और भारत को एक बार फिर झुनझुना थमा दिया गया है।
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Thursday, 21 July 2011

कैश फॉर वोट केस ः अमर सिंह पर कसता शिकंजा


Published on 21th July 2011
अनिल नरेन्द्र
यूपीए-एक सरकार को बचाने के लिए कथित रूप से सांसदों के वोट खरीदने के आरोप की जांच के सिलसिले में दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए संजीव सक्सेना को गिरफ्तार कर लिया था और सोमवार को उसे विशेष न्यायाधीश संगीता ढींगरा सहगल की अदालत में पेश किया गया। अदालत ने पुलिस को पुख्ता जानकारी प्राप्त करने के लिए सक्सेना का तीन दिन का पुलिस रिमांड दे दिया है। गौरतलब है कि यूपीए-एक सरकार के कार्यकाल में जब वामदलों के समर्थन वापस लेने के बाद मनमोहन सिंह ने लोकसभा में अपना बहुमत साबित किया था तभी सांसदों की खरीद-फरोख्त का आरोप लगा था। इसी कड़ी में 22 जुलाई, 2008 को विश्वास मत से एक दिन पहले तीन भाजपा सांसदों को कथित तौर पर एक करोड़ रुपये दिए गए थे। पुलिस ने आरोप लगाया है कि 22 जुलाई को समाजवादी पार्टी के तत्कालीन महासचिव अमर सिंह ने भाजपा सांसद फगन सिंह कुलस्ते और अशोक अर्गल का संजीव से परिचय करवाया था। दावा किया गया है कि संजीव सक्सेना ने संसदीय समिति को भी गलत जानकारी देकर तथ्यों से भटकाने की कोशिश की। आरोप है कि संजीव ने ही भाजपा सांसद को एक करोड़ रुपये दिए थे। इस मामले में भाजपा के पूर्व सांसद महावीर सिंह भगोरा और फगन सिंह के बयान दर्ज किए जा चुके हैं। अशोक अरगल का बयान लिया जाना है। सूत्रों के मुताबिक गिरफ्तारी के बाद शुरुआती पूछताछ में संजीव सक्सेना ने बिना झिझक के अमर सिंह के साथ अपने करीबी रिश्तों की बात कही है। उसने पुलिस को बताया कि वह सिंह के सचिव के रूप में काम करता था। अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि अमर सिंह के ड्राइवर संजय की तलाश जारी है। संजय का बयान इस केस में महत्वपूर्ण बन जाता है, क्योंकि वही इस बात की पुष्टि कर सकता है कि वह और संजीव सक्सेना भाजपा सांसद के आवास पर एक करोड़ रुपये लेकर देने गए थे। अमर सिंह ने दो 20 जुलाई 2008 को संजीव सक्सेना को अपना सचिव बताते हुए भाजपा सांसद अशोक अरगल से मिलाया। सक्सेना ने लोधी एस्टेट स्थित आवास पर अर्गल को एक करोड़ रुपये दिए। फगन सिंह कुलस्ते और महावीर भगोरा ने भी सक्सेना की पहचान कर ली है। दिल्ली पुलिस ने छानबीन करके यह पता लगा लिया है कि यह पैसा किसके यूपी के बैंक से निकाला गया था। दरअसल नोटों की गड्डी पर बैंक का लेवल चिपका रह गया था। अब किस खाते से यह पैसा निकाला गया, यह पता लगाने की कोशिश हो रही है। पैसा (3 करोड़) एकमुश्त नहीं निकाला गया, यह थोड़ा-थोड़ा करके निकाला गया।
श्री अमर सिंह पर पुलिस का शिकंजा कसता जा रहा है। संजीव सक्सेना ने तो सीधा आरोप लगा ही दिया है कि यह पैसा अमर सिंह ने उन्हें दिया था। अगर ड्राइवर संजय भी मिल जाता है और वह भी यह कह देता है कि संजीव सक्सेना ठीक कह रहे हैं और वह संजीव के साथ मौजूद था जब भाजपा के सांसद के पास एक करोड़ लेकर गए थे तो मामला ज्यादा संगीन हो जाएगा। सरकार और प्रशासन ने तो मामले को लटकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी पर गत शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को कुछ न करने पर कड़ी फटकार लगाई थी। तब जाकर दिल्ली पुलिस हरकत में आई और संजीव सक्सेना की गिरफ्तारी हुई। यह मामला बहुत संगीन बन सकता है। इसमें कई बड़ी हस्तियां शामिल हो सकती हैं। अपने कार्यकाल के अंतिम दौर में लड़खड़ाने वाली यूपीए सरकार के लिए एक नया सिरदर्द पैदा हो सकता है। अपने सहयोगी रहे संजीव सक्सेना की गिरफ्तारी से बौखलाए अमर सिंह ने कांग्रेस रणनीतिकारों को चेतावनी दी है कि यदि कानून के हाथ उन तक पहुंचे तो वे सबका भंडाफोड़ कर देंगे। आरोप यह है कि कांग्रेस के कुछ रणनीतिकारों के कहने पर अमर सिंह ने भाजपा सांसदों को रिश्वत दी थी जिन्होंने अपनी पार्टी के व्हिप का उल्लंघन करते हुए यूपीए के पक्ष में वोटिंग की थी। तब जाकर मनमोहन सिंह सरकार बच गई थी। लेकिन उस जांच में 3 साल ढिलाई बरतने के बाद सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद पुलिस हरकत में आई है। सूत्रों के अनुसार अमर सिंह कांग्रेस के रवैये से इन दिनों खासे नाराज चल रहे हैं और उन्हें इस बात का दर्द है कि आड़े वक्त में कांग्रेस जन उनसे काम निकलवा लेते हैं और बाद में भूल जाते हैं। हाल ही में अमर सिंह ने कांग्रेस के ही रणनीतिकारों के कहने पर टीम अन्ना हजारे के सबसे योग्य वकील शांति भूषण और प्रशांत भूषण के कच्चे चिट्ठे खोलने में भी मदद की थी परन्तु इसके बाद भी कानूनी शिकंजा उनकी ओर बढ़ता जा रहा है। अब उन्होंने कांग्रेस नेताओं को स्पष्ट चेतावनी दे दी है कि यदि दिल्ली पुलिस उनके द्वार पर चढ़ी तो फिर वो किसी को भी नहीं छोड़ने वाले हैं। उनके पास जो भी खुफिया जानकारी और सूचनाएं हैं, वे उन्हें सार्वजनिक कर देंगे।
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