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Tuesday, 20 December 2011

किसान अपनी फसल खुद नष्ट करें यह है मेरा भारत महान

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th December 2011
अनिल नरेन्द्र
भारत एक कृषि प्रधान देश है और देश की करीब 70 प्रतिशत जनता खेती पर निर्भर है। इस दृष्टि से कृषि और किसान देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण होने चाहिए। हमारे सभी राजनीतिक दल किसानों के लिए आंसू बहाने में कभी पीछे नहीं रहे। इनको वास्तविकता में किसानों में कितनी दिलचस्पी है उसका एक नमूना हमें संसद से मिलता है। बृहस्पतिवार को राज्यसभा में किसानों के संकट पर चर्चा हो रही थी। पाठकों को यह जानकर आश्चर्य व दुःख होगा कि चर्चा के दौरान राज्यसभा के 245 सांसदों में से सिर्प करीब 50 सांसद ही मौजूद थे। यही नहीं, कई सदस्य अपनी बात कहने के बाद सदन छोड़कर चले गए। यह पहला मौका नहीं है जब जन सरोकार के किसी अहम मसले पर चर्चा में इतने कम सदस्य मौजूद रहें। जब इतनी अति उपस्थिति हो तो बहस का स्तर क्या होगा, अनुमान लगाया जा सकता है। चौंकाने वाले तथ्य यह हैं कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक 1994 से लेकर 2011 तक यानि 16 सालों में ढाई लाख से ज्यादा किसान खुदकुशी करने पर मजबूर हुए। पिछले कुछ सालों में आत्महत्या का यह सिलसिला तेजी से बढ़ा है। यह इस बात का प्रमाण है कि किसानों की गत वर्षों में समस्या कम होने की जगह उल्टी बढ़ी ही है। यह दुःख की बात है कि केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के गृह प्रदेश महाराष्ट्र इस मामले में सबसे अव्वल है। आज कृषि की यह हालत है कि किसान अपनी फसलें खुद ही नष्ट करने पर मजबूर हो रहे हैं। आलू उत्पादकों ने गुरुवार को पंजाब के कई शहरों में अपनी आलू की फसल बिखेर दी। हालांकि पुलिस व प्रशासन ने 200 ट्राली फेंकने से रोक लिया फिर भी नाराज आलू उत्पादकों ने 45 ट्राली सड़कों पर बिखेर दिए। इस समय हरियाणा और पंजाब में आलू की इतनी दुर्गति हो रही है कि किसान उन्हें मुफ्त में दे रहे हैं। 50 किलो की एक बोरी की कीमत महज 30 से 40 रुपये रह गई है। किसान बीज के लिए कोल्ड स्टोर में रखे आलू भी नहीं उठा रहे हैं। किसानों द्वारा आलू की फसल को सड़कों पर गिराए जाने के कारण अमृतसर में करीब दो घंटे तक यातायात जाम रहा। जालंधर आलू उत्पादक एसोसिएशन तथा भारतीय किसान यूनियन ने दो दिन पहले सरकार को इस मामले में कार्रवाई करने की मांग करते हुए चेतावनी दी थी कि अगर उनकी सुनवाई नहीं हुई तो वह आलू की फसल को सड़कों पर बिखेर देंगे और अपना रोष प्रकट करेंगे। एसोसिएशन के प्रधान ने बताया कि इस समय करीब 20 लाख क्विंटल आलू कोल्ड स्टोर में पड़ा है। जालंधर के अलावा राजस्थान चंडीगढ़ से सटे पंजाब के मोहाली में भी किसानों ने आलू को सड़कों पर बिखेर कर सरकार के खिलाफ भड़ास निकाली। विडम्बना देखिए कि गुरुवार को जिस आलू का थोक मूल्य 80 पैसे प्रति किलो रहा वहीं केरल की मंडी में वह 18 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिका। राजधानी दिल्ली में 10 से 12 रुपये किलो बिक रहा है। बाजार की और हमारी सरकारी व्यवस्था की पोल खोलने के लिए इससे बेहतर उदाहरण नहीं हो सकता। कटु सत्य तो यह है कि हमारी सारी कोशिशों के बावजूद, हमारी सारी योजनाओं के बावजूद किसान को उसकी उपज के उचित मूल्य नहीं मिल पाते। किसान आत्महत्या करने पर, अपनी फसल को खुद नष्ट करने पर मजबूर हो रहा है और उपभोक्ता बढ़ती कीमतों से परेशान है। किसानों की खुदकुशी के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इससे जाहिर होता है कि हमारी कृषि गहरे संकट के दौर से गुजर रही है। जब किसी वजह से फसल चौपट होती है तब तो किसान मुसीबत में होता ही है, जब पैदावार अच्छी होती है तब भी उपज का वाजिब दाम न मिल पाने के कारण समस्या पैदा हो जाती है और वह खुद अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने पर मजबूर हो जाता है। किसानों की समस्याओं के मद्देनजर स्वामीनाथन आयोग ने कई महत्वपूर्ण सिफारिशें की थीं पर उन्हें आज तक लागू नहीं किया गया। इस मसले पर संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए और सभी दलों को चाहिए कि वह व्हिप जारी करें ताकि बहस के दौरान सारे सांसद मौजूद हों। याद रहे कि देश की असली तरक्की तभी होगी जब हमारे किसानों की तरक्की होगी।
Anil Narendra, Daily Pratap, Farmers Agitation, Farmers Suicide, Vir Arjun

Tuesday, 28 June 2011

बुंदेलखंड में किसानों की आत्महत्या का न थमता सिलसिला

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 28th June 2011
अनिल रेन्द्र
पिछले कई दिनों से उत्तर प्रदेश में बलात्कार, मर्डर व क्रिमिनलों की बात हो रही है। चाहे वह राजनीतिक दल हों, चाहे इलैक्ट्रॉनिक मीडिया हो या प्रिंट मीडिया हो, सभी इन खबरों को प्राथमिकता देते नहीं थकते। जबकि असल गम्भीर मुद्दों पर किसी को ध्यान देने की जरूरत नहीं लगती। आज मानव जीवन की कोई कीमत नहीं। किसान आत्महत्या करते हैं तो यह खबर नहीं बनती, ब्रेकिंग न्यूज नहीं बनती पर छोटे से छोटा क्रिमिनल वारदात को प्रमुखता से छापी जाती है, दिखाई जाती है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में किसानों की इतनी बुरी दशा है कि आदमी को चौंक जाना चाहिए। पत्नी के इलाज में दो बीघा जमीन बेचकर मात्र तीन बीघा में तीन बच्चों के साथ जिन्दगी बसर कर रहे किसान की कर्ज और मर्ज से मौत हो गई। उस पर बैंक और शाहूकारों का लगभग 70 हजार रुपया कर्ज बताया गया है। ग्रामीणों ने अंतिम संस्कार कर दिया। अतर्रा तहसील क्षेत्र के बघेलाबारी गांव के किसान सुरेश यादव (42) पुत्र राम बहोरी की लाश एक पखवाड़ा पहले शनिवार के दिन सुबह घर के नजदीक स्थित उसी के खेत में पड़ी मिली। पत्नी की डेढ़ वर्ष पहले टीबी से मौत हो गई थी। उसके इलाज में सुरेश को दो बीघा जमीन बेचनी पड़ी। सुरेश यादव जैसी सैकड़ों कहानियां हैं। पिछले दिनों बड़ी संख्या में किसानों द्वारा आत्महत्या करने की घटनाओं को गम्भीरता से लेते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से एक माह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। न्यायमूर्ति सुनील अम्बानी और न्यायमूर्ति सभाजीत यादव की खंडपीठ ने किसानों की खुदकुशी मामले में स्वत संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका के तौर पर स्वीकार किया। प्रदेश सरकार को निर्देश दिए गए हैं कि हर किसान की आत्महत्या का ब्यौरा, अस्पतालों, ब्लॉकों और पुलिस थानों से एकत्र कर रिपोर्ट अगली सुनवाई तक पेश की जाए। मुख्य सचिव से सभी बैंकों के द्वारा दिए गए कृषि ऋण का ब्यौरा भी उपलब्ध कराने को कहा गया है। राष्ट्रीय और निजी बैंकों, वित्तीय संस्थाओं, सहकारी बैंकों, खादी ग्राम उद्योग और विकास बोर्डों को किसानों से 15 जुलाई तक ऋण वसूली न करने का न्यायालय ने निर्देश दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक बुंदेलखंड के बांदा, हमीरपुर, झांसी, ललितपुर, महोबा, चित्रकूट और जालौन जिलों में वर्ष 2009 में 568, 2010 में 583 और 2011 के पांच महीनों में 519 किसानों ने सूखे और गरीबी से तंग आकर खुदकुशी की है। बुंदेले हरबोलों की सरजमीन पानी, पलायन, भुखमरी और कर्ज के दबाव में हो रही मौतों से जूझ रही है। बुंदेलखंड में कर्ज के चलते किसानों के जानें देने का यह सिलसिला तब सामने आया जब किसानों को कर्ज से उबारने के लिए शासन-प्रशासन की ओर से तथाकथित राहत का पिटारा खोला गया। पिछले कुछ सालों से बांदा-बुंदेलखंड के बद से बदतर होते हालातों के कारण किसानों ने खेती संवारने और निजी रोजगार शुरू करने के लिए अपने ऊपर अरबों रुपयों का कर्ज चढ़ा लिया। अकेले बांदा जिले में तकरीबन दो लाख किसानों ने बैंकों से लगभग साढ़े चार करोड़ रुपये का कर्ज लिया हुआ है। वैध-अवैध शाहूकारों से कर्ज ली गई रकम भी करोड़ों में बताई जाती है। बांदा के लगभग 13000 किसानों पर किसान केडिट कार्ड से लिए गए करीब 25 करोड़ रुपये की देनदारी रही है। 3000 से ज्यादा किसानों को डिफाल्टर घोषित कर दिया गया है। इससे किसानों पर और दबाव बढ़ गया है। दबाव नहीं झेल पा रहे किसान आत्महत्या कर रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र और राज्य सरकार इस ज्वलंत समस्या पर गम्भीरता से विचार करें और ऐसे कदम उठाएं जिससे किसानों की खुदकुशी का यह सिलसिला थमे। कहने को तो भारत दुनिया की बड़ी आर्थिक शक्तियों में शुमार है पर जमीनी हकीकत है कि आज भी कर्ज, महंगाई, मर्ज के कारण किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हैं।
Tags: Anil Narendra, Bundel Khand, Daily Pratap, Farmers Agitation, Farmers Suicide, Mayawati, Uttar Pradesh, Vir Arjun

Wednesday, 11 May 2011

कहीं यह किसान आंदोलन मायावती को भारी न पड़ जाए?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 11 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
जमीन अधिग्रहण के खिलाफ भट्टा-पारसौल में भड़की आग ग्रेटर नोएडा से आगरा तक फैल गई है। जेवर, अलीगढ़, मथुरा और आगरा तक पूरे यमुना एक्सप्रेस-वे पर किसानों के साथ पुलिस की झड़पें हुई हैं। भट्टा-पारसौल में 17 जनवरी से शुरू हुआ किसानों का आंदोलन मायावती सरकार के लिए चिन्ता का विषय बनता जा रहा है। सरकार के अफसर और सलाहकारों ने सत्ता के अंतिम साल में मायावती को ठीक वहीं पहुंचा दिया है जहां पिछली बार मुलायम सिंह सत्ता के अंतिम साल में पहुंच गए थे। तब अनिल अम्बानी के लिए किसान आंदोलन हुआ तो अब की जेपी समूह के लिए हो रहा है। किसानों पर 2007 से अब तक छह बार लाठी-गोली चल चुकी है और करीब दर्जनभर किसान मारे जा चुके हैं।

नोएडा से आगरा के लिए यमुना एक्सप्रेस-वे का निर्माण किया जा रहा है। इसकी लम्बाई 165 किलोमीटर है। गौतम बुद्धनगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, मथुरा और आगरा के 334 गांवों की जमीन इस रोड के लिए अधिग्रहित की गई है। किसान महीनों से यह मांग करते आए हैं कि उनको मुआवजे की बेहतर दरें दी जाएं और सरकार भूमि अधिग्रहण के कानून में बदलाव करे। दरअसल यमुना एक्सप्रेस-वे प्रोजेक्ट को लेकर किसानों का टकराव एकदम नया नहीं है। पिछले सालों में कई जगह आंदोलन भड़क चुका है। इसमें 11 किसानों की जान जा चुकी है पर ये विदर्भ के किसान नहीं हैं संकट में घिरने पर फांसी पर चढ़ जाएं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज्यादातर किसान पूर्वांचल के मुकाबले बड़ी जोत वाले तो हैं ही साथ ही कद, काठी और लाठी में भी मजबूत हैं। जमीनें बिकीं तो किसानों के एक वर्ग ने गाड़ी, मकान और असलहा पर भी निवेश किया। शनिवार को अब पारसौल में जो मुठभेड़ हुई तो उसमें गोली दोनों तरफ से चली। यह बदली हुई संस्कृति और अपरिपक्व नेतृत्व का भी नतीजा है। इस सबसे तो यह साफ है कि करीब सौ साल पुराने अंग्रेजों के बनाए भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर किसानों की नाराजगी विस्फोटक होती जा रही है। किसानों का तर्प है कि प्रदेश सरकार जमीन की तिजारत में क्यों लगी है? किसानों से आठ-नौ सौ रुपये वर्ग मीटर की जमीन लेकर व्यापारियों और उद्योगपतियों को बीस हजार रुपये वर्ग मीटर के हिसाब बेचने से किसका फायदा होता है।

इस प्रकरण में अब सियासत भी नए रंग भरने लगी है। रविवार को रालोद के प्रमुख चौ. अजीत सिंह अपने काफिले के साथ घटनास्थल पर जाने के लिए निकले थे लेकिन उनके काफिले को नोएडा की सीमा में ही रोक दिया गया। अजीत सिंह का कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार एक खास कम्पनी को मालामाल करने के लिए किसानों का गला काटने पर उतारू है। कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा ने इस खूनी जंग की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री मायावती पर डाल दी है। उनका आरोप है कि मायावती सरकार किसान विरोधी है, इसलिए जायज मुआवजा मांगने वाले किसानों पर गोली बरसा रही है। किसान आंदोलन के नेता महेन्द्र सिंह टिकैत के बेटे राकेश टिकैत का कहना है कि भट्टा-पारसौल की घटनाओं से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के स्वाभिमान को ललकारा गया है, ऐसे में अब किसान जान की बाजी लगाकर भी इंसाफ लेने के लिए आगे आएंगे। समय रहते अगर मुख्यमंत्री मायावती ने स्थिति को नहीं सम्भाला तो किसान आंदोलन सरकार के लिए भारी पड़ सकता है।