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Wednesday, 1 February 2012

नोएडा में बैंकों, नर्सिंग होम व डाक्टरों की क्लीनिकों पर गाज

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1st February  2012
अनिल नरेन्द्र
रिहायशी सैक्टर में चल रहे व्यावसायिक गतिविधियों को बन्द करने का सुप्रीम कोर्ट के आदेश का असर गणतंत्र दिवस से नोएडा में दिखने लगा। कुछ सैक्टरों में लोगों ने ध्वजारोहण के बाद न्यायालय के फैसले का पालन करते हुए सामूहिक रूप से अपनी दुकानें बन्द करनी शुरू कर दी हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ कार्रवाई की शुरुआत बैंकों से होगी। नोएडा के रिहायशी सैक्टरों में चल रहे 104 बैंक शाखाएं सीलिंग की जद में आएंगी। पहले चरण में सैक्टर-19 में चल रहे 21 बैंकों को सील किया जाएगा। प्राधिकरण ने आवासीय गतिविधियां चला रहे लोगों को नोटिस भी भेजना शुरू कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने 5 दिसम्बर 2011 को बैंकों के भवन मालिकों की ओर से दायर याचिका की सुनवाई करते हुए नोएडा क्षेत्र में मास्टर प्लान के विपरीत चल रही सभी कमर्शियल गतिविधियों को दो माह में बन्द करने के आदेश दिए थे। अदालत के इस आदेश से आवासीय क्षेत्रों में चल रहे बैंकों, नर्सिंग होमों व दुकानों पर तलवार लटक गई। इस फैसले से रियायत की मांग करते हुए बैंक, बैंकों के भवन मालिकों व नोएडा चिकित्सक संघ 9 जनवरी को अदालत पहुंची। अदालत ने प्राधिकरण को 23 जनवरी को तलब किया। अदालत ने प्राधिकरण द्वारा की जा रही कार्रवाई पर असंतोष दिखाते हुए और तेजी से कार्रवाई करने का आदेश दिया। हालांकि रिहायशी क्षेत्रों के 104 बैंकों को रियायत देते हुए उनके लिए भूखंडों की स्कीम पेश कर अलॉट करने के आदेश दिए। नर्सिंग होमों को भी भूखंडों को उपलब्ध कराने के आदेश अदालत ने दिए। ऐसे ही क्लीनिकों को एफएआर के 25 फीसद उपयोग क्लीनिक के तौर पर करने का आदेश दिया।
पूरे मामले का एक प्रैक्टिकल और मानवीय एंगल भी देखना जरूरी है। बैंक, नर्सिंग होम, डाक्टरों की क्लीनिक सभी जनता की सेवा के लिए हैं। बेशक यह धंधा भी है पर है तो पब्लिक के लिए। नर्सिंग होम का फायदा कॉलोनी में रहने वाले और आसपास के लोगों को होता है। सरकार इतने अस्पताल तो बना नहीं सकी कि बढ़ती पब्लिक की देखभाल कर सके। इन छोटी-छोटी क्लीनिकों को बन्द करने से आप मरीजों को बड़े महंगे निजी अस्पतालों में भेजना चाहते हैं। इन बड़े अस्पतालों में जाना छोटे और मध्य वर्ग के लोगों के बस की बात नहीं। वह इस सूरत में क्या करें? बैंकों का जहां तक सवाल है इनके सीलिंग से अरबों रुपयों के ट्रांजेक्शन का सिलसिला थम जाएगा। इस खबर की भनक मिलने के बाद से बैंक तो परेशान हैं ही साथ-साथ उपभोक्ता भी घबरा गए हैं। हालांकि प्राधिकरण ने बैंकों को शिफ्ट करने हेतु 74 भूखंडों की स्कीम निकाली है मगर जब तक बैंकों को दूसरी जगहों पर शिफ्ट किया जाएगा तब तक तो उपभोक्ताओं की फजीहत होती रहेगी। बैंक ब्रांच ही नहीं बल्कि आदेश की परिधि में एटीएम भी आ रहे हैं। ज्यादातर ब्रांचों में एटीएम बैंकों के अन्दर ही लगे हैं। इनकी तादाद 100 से ज्यादा है। ऐसे में साधारण नौकरी पेशे व्यक्तियों का इमरजैंसी का सहारा (एटीएम) भी बन्द हो जाएगा। मामले साधारण नहीं। बेशक रिहायशी इलाकों में बैंक बेशक न चलें पर नर्सिंग होम और डाक्टरों की क्लीनिकें तो आम जनता की जरूरत हैं।
Anil Narendra, Daily Pratap, Greater Noida, Supreme Court, Uttar Pradesh, Vir Arjun

Tuesday, 1 November 2011

फॉर्मूला वन दुनिया में अब भारत भी शामिल

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1st November 2011
अनिल नरेन्द्र
ग्रेटर नोएडा में रविवार का दिन खेलों की दुनिया में अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक रहा। यहां बुद्ध इंटरनेशनल सर्पिट पर पहली भारतीय इंडियन ग्रां प्री का फाइनल मुकाबला हुआ। इसी के साथ ही देश का नाम ग्रां प्री इतिहास के उन गौरवमय पन्नों पर दर्ज हो गया। फॉर्मूला वन के इतिहास की जड़ें 1947 से भी पहले यूरोपियन ग्रां प्री मोटर रेसिंग से जुड़ी हैं। 1920 और 1930 में मोटर दौड़ आयोजित की गई थी। हालांकि फॉर्मूला वन की शुरुआत 1946 में फैडरेशन इंटरनेशनल ऑटो मोबाइल के नियमों के मुताबिक हुई। 1950 में वर्ल्ड ड्राइवर्स चैंपियनशिप का आयोजन किया गया था। ब्रिटेन में 1960 और 1970 में इस रेस का आयोजन किया गया और दक्षिण अफ्रीका में 1983 में ऐसी रेस का आयोजन किया गया। फिर बढ़ती लोकप्रियता के चलते मोनैक्को, आबूधाबी और सिंगापुर फॉर्मूला वन रेसिंग शहर के तौर पर सामने आए। दरअसल यह खेल मोटर स्पोर्ट्स का हिस्सा है। फॉर्मूला वन मोटर स्पोर्ट्स का सबसे ऊपरी चरण है। यह रेस आदमी और मशीन मिलकर खेलते हैं। दोनों में तालमेल से ही जीत-हार का फैसला होता है। यह तकनीक, गति और हुनर का अनूठा मेल है।
रविवार की पहली इंडियन ग्रां प्री रेस में पिछले साल के विश्व चैंपियन और इस साल खिताब पहले ही अपने नाम कर चुके रेड बुल रेसिंग टीम के वेटेल ने बुद्ध इंटरनेशनल सर्पिट में किसी को मौका तक नहीं दिया और बीआईसीसी के 60 लैप उन्होंने एक घंटा 30 मिनट 30.002 सैकेंड में पूरा करके जीते दर्ज की। दो बार ड्राइवर्स चैंपियनशिप जीतने वाले वेटेल ने यह कारनामा सबसे कम उम्र में करने का नया रिकार्ड बना दिया है। रेस में भाग लेने वाले ड्राइवर्स ने रेस के बाद कहा कि बुद्ध इंटरनेशनल सर्पिट दुनिया के बेहतरीन सर्पिटों में से एक है। रविवार के दिन भारतीय ही नहीं पूरी दुनिया ने फॉर्मूला वन रेसिंग में ग्लैमर, चमक-दमक, जश्न और रफ्तार का रोमांच महसूस किया। रेसिंग ट्रैक जेपी स्पोर्ट्स इंटरनेशनल कम्पनी ने चार करोड़ डालर की लागत से तैयार किया। फॉर्मूला वन रेस महज रफ्तार का रोमांच ही नहीं बल्कि यह भारत की रफ्तार है। भारत का वैभव, शान और भारत का गौरव है। राष्ट्रमंडल खेलों में घोटालों से बदनाम हुए भारत को इस माइंड ब्लोइंग रेस के सफल आयोजन से अंतर्राष्ट्रीय शोहरत हासिल हुई है। भारतीय फिल्म उद्योग द्वारा किए जाने वाले भव्य आयोजनों की ही तरह रविवार को फिल्मी सितारों, खिलाड़ियों का ग्लैमर का जबरदस्त तड़का लगा। भारत एक बहुत बड़ा बाजार है और दुनिया की सभी प्रमुख मल्टी नेशनल कम्पनियां भारत में अपना पैर जमाना चाहती हैं। इस रेस से भारत की छवि को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया के तौर पर ख्याति मिलेगी। कई अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों ने आशंका जाहिर की थी कि समय पर यह ट्रैक तैयार नहीं होगा, इसमें कई कमियां गिनाई गईं पर भारत ने दिखा दिया कि अगर वे चाहें तो वह कुछ भी हासिल कर सकते हैं।
Anil Narendra, Buddha Circuit, Daily Pratap, F1, Greater Noida, India, JP Group, Vir Arjun

Friday, 21 October 2011

भारत की पहली एफ वन ग्रां प्री रेस


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21st October 2011
अनिल नरेन्द्र
देश में रफ्तार के रोमांच का इतिहास रचने के लिए ग्रेटर नोएडा स्थित बुद्ध इंटरनेशनल सर्पिट का `ट्रैक' लांच हो चुका है। मीडिया के समक्ष यहां रेड बुल की कार दौड़ाकर इसके रोमांच से रूबरू कराया गया। लगभग 400 मिलियन डालर (लगभग 2000 करोड़ रुपये) से तैयार हुआ यह ट्रैक दुनिया के आलीशान ट्रैकों में से एक है। इसका ट्रैक 5.4 किलोमीटर लम्बा और 10 से 14 मीटर चौड़ा है जो 875 एकड़ में फैला हुआ है। इसमें 16 मोड़ हैं और इसमें दर्शकों के बैठने की क्षमता लगभग एक लाख 10 हजार है। इसमें अधिकतम रफ्तार 320 किलोमीटर प्रति घंटा है, जिसे एफ-1 कार नॉर्थ से ईस्ट के बीच 1.4 किलोमीटर के सीधे हिस्से में हासिल कर सकती है। बुद्ध इंटरनेशनल फॉर्मूला वन सर्पिट 24 दूल्हों का स्वागत करने के लिए तैयार है। यह दावा पहली इंडिया ग्रां प्री एफ-1 रेस के आयोजकों जेपी ग्रुप ने किया लेकिन मेजबानी की असली प्रतीक्षा 28 अक्तूबर को अभ्यास व क्वालीफाइंग रेसों और फिर 30 अक्तूबर को मुख्य रेस के दौरान होगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि सर्पिट का निर्माण करने वाली कम्पनी जेपी ग्रुप ने भारत को दुनिया के एफ-1 नक्शे में लाकर खड़ा कर दिया है। तीन साल पहले किसी ने शायद ही कल्पना की हो कि इतना सुन्दर ट्रैक भारत में भी बन सकता है। जब तीन साल पहले जेपी ग्रुप को देश में फॉर्मूला वन सर्पिट बनाने का लक्ष्य मिला तो यह एक बड़ी चुनौती मानी जा रही थी, लेकिन उसने इस चुनौती को स्वीकार किया और समय से पहले ट्रैक खड़ा कर दिया। जैसा कि जेपी ग्रुप के मनोज गौड़ बताते हैं कि जब उनके पिता व समूह के संस्थापक ने इसकी इच्छा रखी तब यह काम बहुती चुनौती भरा था, क्योंकि इसके संसाधन जुटाना आसान नहीं था। यह सर्पिट उन लोगों की कड़ी मेहनत का नतीजा है, जो पिछले ढाई सालों से अपना योगदान दिया जिनमें 300 इंजीनियर थे। ट्रैक का जायजा लेने पचास मसर्डीज पर सवार होकर भारतीय व विदेशी मीडिया ने ट्रैक का जायजा लिया।
जहां हम उम्मीद करते हैं कि एफ-1 रेस की तमाम बाधाएं रेस आने तक दूर हो जाएगी जिसमें किसानों का विरोध, टिकटों की बिक्री व सुप्रीम कोर्ट का टैक्स फ्री होने का नोटिस शामिल है। वहीं पाठकों को यह बताना चाहेंगे कि यह रेस या खेल दुनिया के खतरनाक खेलों में शामिल है। अमेरिका के लॉस वेगास मोटर स्पीड वे नामक एक रेस रविवार को हो हुई। इंडिकार 300 नामक इस रेस के 13वें लैप में 15 कार आपस में टकरा गई। जिस समय यह कारें भिड़ीं उस समय इनकी रफ्तार लगभग 362 किलोमीटर प्रति घंटा थी। इनमें एक ड्राइवर की कार हवा में उछली और आग का गोला बन गई और उनकी इस हादसे में मौत हो गई। इसलिए रोमांच के साथ-साथ यह खेल खतरों से भरा हुआ है। इनके ड्राइवर बहुत काबिल और बहुत अच्छा प्रशिक्षण पाए हुए होते हैं। बुद्ध इंटरनेशनल सर्पिट पर एफ वन रेस देखने के लिए तीन दिनों तक मोटी धन राशि खर्च न कर रेस देखने की आस लगाए लोगों के लिए खुशखबरी है। कुछ स्टैंड के तीन दिन के टिकटों को एक दिन के लिए उपलब्ध करवा दिया गया है। आखिरी दिन यानि 30 अक्तूबर को 35 हजार रुपये का मेन ग्रैड स्टैंड का टिकट 15 हजार से मिल सकता है। इसी तरह क्लासिक स्टैंड का टिकट 6500 रुपये के स्थान पर चार हजार रुपये और पिकनिक स्टैंड का टिकट छह हजार की जगह तीन हजार में उपलब्ध होगा। जेपीएसआई के सीईओ-एमडी समीर गौड़ ने बताया कि हिन्दुस्तान में यह रेस पहली बार हो रही है, इसलिए हर कोई इसे देखना चाहता है। विदेशों से भी बहुत से लोग रेस देखने आ रहे हैं। आयोजक, निर्माणकर्ता, भाग लेने वाले सभी को हमारी शुभकामनाएं और उम्मीद करते हैं कि सब कुछ ठीक-ठाक रहेगा और दुनिया टीवी पर देखेगी भारत ग्रां प्री की पहली रेस।
Budh Circuit, Car Race, F1, Greater Noida, JP Group, Supreme Court, Uttar Pradesh

Wednesday, 13 July 2011

राहुल की पदयात्रा रंग ला रही है, बसपा में बौखलाहट

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13th July 2011
अनिल नरेन्द्र
राहुल गांधी की किसान संदेश यात्रा हर लिहाज से सफल रही। विपक्षी दलों में भी इस यात्रा के प्रभाव से उत्पन्न हुई स्थिति पर विचार करने पर मजबूर होना पड़ा है। राहुल ने पदयात्रा करके सभी दल के नेताओं को दिखा दिया कि वह जनता के बीच जाकर उनका दुःख-दर्द बांटने का साहस रखते हैं। क्या कारण है कि किसी और दल के किसी भी नेता ने हाल में ऐसी पदयात्रा नहीं की? अपने घरों में एयरकंडीशन कमरों में बैठकर सियासत करने वाले नेताओं को इस युवा महासचिव ने यह दिखा दिया कि अगर आप जनता के पास जाओगे तो वह सिर-आंखों पर आपको बिठा लेगी। कांग्रेस पार्टी को इस पदयात्रा का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जो कार्यकर्ता पिछले दो दशक से घर बैठ गया था वह अब बाहर सड़कों पर आने पर मजबूर हो गया। पिछले दो दशक से ज्यादा, जब से पहली बार कांग्रेस ने मुलायम सिंह यादव से गठबंधन किया था तब से कांग्रेस कार्यकर्ता निराश होकर घर बैठ गया था। अब इतने सालों बाद उसे थोड़ी उम्मीद की किरण जरूर नजर आई है और वह बाहर सड़कों पर आ गया है। अगर राहुल ने ऐसी ही पदयात्रा पूर्वी उत्तर प्रदेश व अन्य भागों में भी कर ली तो कांग्रेस को इसका लाभ हो सकता है। उत्तर प्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल राहुल की पदयात्रा का राजनीतिक फालआउट का आंकलन करने में जुट गए हैं। चाहे बसपा हो या सपा या फिर भाजपा सभी दल पुन अपनी रणनीति बनाने पर कुछ हद तक मजबूर हुए हैं। कांग्रेस का मुख्य मुकाबला बसपा से होगा।
बहन जी ने बसपा संगठन की चूलें कसते हुए रणनीति में फेरबदल किया है। पार्टी की रणनीति में सबसे अधिक सीट जीतने की रेस में सपा को मात देने के साथ कांग्रेस के उभार को राकने पर भी खास जोर दिया जाएगा। मायावती ने पार्टी संगठन व पदाधिकारियों की लगातार बैठकों के क्रम में रविवार को दल के जोनल कोआर्डिनेटर की बैठक में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए। पार्टी संगठन को राज्य सरकार की बेशुमार उपलब्धियों के बखान व प्रचार की जिम्मेदारी दी गई है। पार्टी अलग-अलग जातियों के बीच नए सिरे से पैठ बनाने की नई कोशिश करेगी। सर्वसमाज के लोगों को और ज्यादा जोड़ने व जनाधार को बढ़ाने के लिए पार्टी के सभी जिम्मेदार लोगों को निर्देश भी दिए गए हैं। अब बसपा के एजेंडे में प्रदेश के पिछड़े इलाकों पूर्वी उत्तर प्रदेश व बुंदेलखंड ऊपर आ गया है। माना जा रहा है कि राहुल गांधी की पदयात्रा व किसान पंचायत रणनीति के अगले हिस्से में यही दोनों इलाके हैं। लिहाजा बसपा इन क्षेत्रों में अपने सर्वसमाज समीकरण को पहले से ही दुरुस्त कर लेना चाहती है। रविवार को मायावती ने जो निर्देश दिए उससे साफ निष्कर्ष यह निकला कि उत्तर प्रदेश में जल्द चुनाव हो सकते हैं। बहन जी ने सभी एकत्र पदाधिकारियों को साफ कह दिया कि तैयार रहें, चुनाव कभी भी हो सकते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि कांग्रेस को निशाने पर रखें। भ्रष्टाचार, महंगाई के मुद्दे को लेकर उसे घेरें। भरोसेमंद सूत्रों की मानें तो तीन घंटे तक चली बैठक में मायावती ने यह स्वीकार किया कि पार्टी की छवि खराब हुई है। हालांकि इसके लिए उन्होंने बाहर से पार्टी में आए लोगों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने पदाधिकारियों से कहा कि वह जनता के बीच जाकर यह प्रचार करें कि जो लोग सरकार की छवि खराब कर रहे हैं वे मूलत बसपाई नहीं हैं। राहुल गांधी की पदयात्रा ने बसपा को सोचने पर मजबूर कर दिया है। कांग्रेस की रणनीति यह है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में मुकाबला बसपा और कांग्रेस के बीच हो और कांग्रेस को अजीत सिंह का समर्थन तो मिल ही जाएगा। मुलायम सिंह यादव से भी कोई न कोई सैटिंग हो ही जाएगी।
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Saturday, 9 July 2011

क्या राहुल की पदयात्रा से कांग्रेस को यूपी में फायदा होगा?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9th July 2011
अनिल नरेन्द्र
मानना पड़ेगा कि राहुल गांधी अपनी यूपी 2012 मिशन पर पूरी तरह उतर चुके हैं। वे दिन-रात एक करने में जुट गए हैं। भट्टा-पारसौल से राहुल गांधी की किसान संदेश यात्रा रंग लाने लगी है। वह गांव-गांव पैदल यात्रा कर रहे हैं। यूपी की बिगड़ती कानून व्यवस्था और विकास के मुद्दे के मुकाबले माया सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति पर जबरदस्त चोट कर कांग्रेस ने यूपी में हल्ला बोल दिया है। राहुल गांधी ने दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा के भट्टा-पारसौल गांव से अपनी किसान संदेश यात्रा शुरू की है जो अलीगढ़ तक जा रही है। राहुल के मुताबिक इस पदयात्रा का मकसद भट्टा से आगरा और अलीगढ़ तक हो रहे भूमि अधिग्रहण और उससे पैदा हो रही समस्याओं को समझना तथा प्रस्तावित लोगों के विचार जानना है। भट्टा-पारसौल वही गांव है जहां कुछ दिन पूर्व अपनी जमीन के अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसानों की उग्र भीड़ पर पुलिस ने गोली चलाई थी जिसमें चार लोगों की मौत हो गई थी। उसी घटना के बाद राहुल गांधी भी वहां जाकर धरने पर बैठे थे और उन्होंने गिरफ्तारी भी दी थी। भारत में बहुत दिनों बाद किसी नेता ने पदयात्रा की है। आजकल तो नेता लोग हेलीकाप्टरों में या कारों के काफिले के साथ महज रस्म अदायगी ज्यादा करते हैं ऐसे में राहुल का पदयात्रा करते हुए गांवों में जाना और किसानों के साथ दाल-रोटी खाना, रात खटिया पर ही सोना, उनकी समस्याओं को सुनना न केवल उत्तर प्रदेश के लिए ही एक नई राजनीतिक घटना है बल्कि पूरे देश में इसका एक संदेश जा रहा है। यूं तो पदयात्रा की परम्परा नई नहीं है। सबसे पहले इसकी नींव महात्मा गांधी ने रखी थी, उनके बाद विनोबा भावे, बाबा आम्टे, पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर और अभिनेता से नेता बने सुनील दत्त की लम्बी पदयात्राएं भी काफी चर्चित रही हैं। अब दशकों बाद राहुल गांधी के रूप में कोई राजनेता किसानों के सवालों को लेकर पदयात्रा पर निकला है। कांग्रेस के युवराज धूल, धूप, बारिश, मिट्टी और गर्मी के बीच गांव की गलियों की खाक छान रहे हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेसी उन्हें मिल रहे अपार जन समर्थन के बलबूते सत्ता वापसी का सपना देखने लगे हैं। यहां तक कि 9 जुलाई को अलीगढ़ में प्रस्तावित किसान महापंचायत के लिए तैयारियां युवराज के करिश्में के भरोसे ही छोड़ दी गई हैं। कांग्रेसियों को लगने लगा है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी सत्ताधारी बहुजन समाज पार्टी को सीधे टक्कर देने की स्थिति में आ गई है। उनका मानना है कि जनता से यह सीधा संवाद रंग लाएगा और 21 साल बाद यूपी की सत्ता में वापसी सम्भव हो सकेगी। यहां तक कि अलीगढ़ में राहुल की गिरफ्तारी की सम्भावना से भी कांग्रेसी काफी खुश हैं। पार्टी नेताओं का मानना है कि यदि मायावती राहुल को गिरफ्तार करती हैं या प्रयत्न करती हैं तो उनके शासन के लिए ताबूत की अंतिम कील साबित होगी। हालांकि प्रशासन की तरफ से आ रही खबरों के मुताबिक धारा 144 लागू होने के बावजूद राहुल को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।
किसानों को न्याय दिलाने के मकसद से राहुल की पदयात्रा से मुख्यमंत्री मायावती बेचैन जरूर होंगी। इधर अदालती फैसलों ने बहन जी की सरकार की नाक में दम कर रखा है, उधर राहुल को मिल रहा जन समर्थन बहन जी के लिए चिन्ता का विषय जरूर बन गया है। बेशक बहन जी और उनके रणनीतिकार यह दलील दें कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश हमेशा से अजीत सिंह का गढ़ रहा है, जाट बैल्ट है जो बसपा के साथ नहीं है। अगर राहुल गांधी की पदयात्रा से जाट वोट कांग्रेस को जाता है तो बसपा को कोई ज्यादा नुकसान नहीं होता। यह वोट तो उसके खिलाफ पड़ता ही था पर बहन जी को यह समझना चाहिए कि राहुल की पदयात्रा का असर केवल ग्रेटर नोएडा से लेकर अलीगढ़ बैल्ट तक ही सीमित नहीं रहेगा। इसका प्रभाव पूरे प्रदेश पर पड़ेगा। अगर मैं यह कहूं कि पूरे देश में किसान बैल्टों पर पड़ेगा तो शायद गलत न हो। किसान भोले-भाले सीधे लोग होते हैं। एक बार उनके साथ हुक्का-पानी ले लो और बड़े-बुजुर्ग सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दे दें तो वह इतनी आसानी से पलटते नहीं। राहुल की मेहनत जरूर रंग लाएगी। राहुल ने आज के दूसरे राजनेताओं को भी एक तरह से बेनकाब कर दिया है जो जनता के हितों की, किसानों के हितों की बातें तो लम्बी-चौड़ी करते हैं पर करते कुछ नहीं। राहुल ने करके दिखा दिया है।
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Sunday, 5 June 2011

बहन जी ने एक ही छटके में विपक्ष की हवा निकाल दी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 5th June 2011
अनिल नरेन्द्र
किसानों के साथ खड़े होकर कांग्रेस उत्तर पदेश में अपनी राह आसान करने का जो पयास कर रही थी उसको मायावती ने एक छटके में ही चूर कर दिया है। इतना ही नहीं, भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास की लोक लुभावनी नई नीति घोषित करके बहन जी ने केन्द्र सरकार के सामने एक चुनौती भी खड़ी कर दी है।
महा-पारसौल कांड के बाद केन्द्र सरकार संसद के मानसून सत्र में भूमि अधिग्रहण के बाबत नए कानून का विधेयक लाने जा रही है। उत्तर पदेश में फिर से खुद को खड़ा करने में जुटे युवराज राहुल गांधी बहुत जोर लगा रहे हैं।
आंदोलन में शामिल होकर गिरफ्तारी तक दी, पधानमंत्री से पतिनिधिमंडल को मिलवा कर उनसे आश्वासन तक दिलाया पर बहन जी ने सब पर पानी फेर दिया।
मुख्यमंत्री मायावती ने किसानों की एक पंचायत बुलाकर उनसे बातचीत करने के बाद नई भूमि अधिग्रहण नीति की घोषणा की, जिसमें अब निजी कंपनियां परियोजनाओं के लिए किसानों से सीधी बातचीत करके भूमि खरीदेंगी। इससे अब शासन व पशासन की भूमिका सिर्प मध्यस्थ फैसिलिटेटर, की ही होगी। नई अधिग्रहण नीति तत्काल पभाव से लागू होगी। बहन जी ने केन्द्र सरकार से राज्य सरकार की तर्ज पर भूमि अधिग्रहण की नीति पूरे देश में लागू करने की मांग भी की है। पिछले दिनों सुपीम कोर्ट ने भी इस ज्वलंत पश्न पर सवाल पूछा था कि आखिर देश में भूमि अधिग्रहण की केन्द्र सरकार की नीति क्या है?
मायावती ने किसानों से बातचीत के बाद नई जमीन अधिग्रहण नीति से न केवल पश्चिमी उत्तर पदेश में अशांत महौल को शांत करने में मदद मिलेगी वहीं बहुत हद तक इससे विपक्ष को राजनीतिक लाभ उठाने से बहन जी ने अपनी सरकार व पार्टी को बचा लिया है। ये अधिग्रहण राज्य सरकार ने अपने आपात अधिकारों का इस्तेमाल करके किए। किसानों को शिकायत यह थी कि भूमि औद्योगिक विकास के नाम पर अधिग्रहण करके उसे निजी बिल्डरों को दे दिया गया। नई नीति से ये शिकायतें काफी हद तक दूर हो जाएंगी। इस नीति के तहत सरकार सिर्प सार्वजनिक उपकमों या औद्योगिक विकास के लिए ही जमीन लेगी। इसके अलावा 2010 की जमीन अधिग्रहण नीति के फायदे भी किसानों को मिलेंगे।
मुख्यमंत्री मायावती ने महा-पारसौल गांव का विशेष जिक करते हुए कहा कि वहां घटना के दौरान गांव के लोगों की सम्पत्ति को जो नुक्सान पहुंचा है, उसकी भरपाई राज्य सरकार करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस नीति को उनकी पार्टी संसद के मानसून सत्र में राष्ट्रीय स्तर पर लागू कराने के लिए केन्द्र सरकार पर दबाव बनाएगी। ऐसा न होने पर वह संसद का घेराव करने से भी पीछे नहीं हटेंगी। राज्य सरकार की यह नीति केन्द्र सरकार की पस्तावित नीति से कई गुना ज्यादा बेहतर ओर किसान हितैषी साबित होगी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी द्वारा हरियाणा सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति की पशंसा राजनीति से पेरित है। मुख्यमंत्री ने विपक्षी दलों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि विरोधी दल भूमि अधिग्रहण कानून तैयार करने के लिए केन्द्र सरकार पर दबाव न डाल कर उत्तर पदेश में राजनीति चमकाने में लगे हैं।
हमारी राय में बहन जी ने रास्ता दिखा दिया जिस पर केन्द्र और राज्य सरकारों को गंभीरता से विचार कर, ऐसी नीति की घोषणा करनी चाहिए जिससे किसान संतुष्ट हों और आंदोलन न हो।
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Friday, 20 May 2011

राहुल गांधी का सनसनीखेज आरोप

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Publish on 20 May 2011
अनिल नरेन्द्र
ग्रेटर नोएडा में भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से मिलकर अत्यंत गम्भीर आरोप लगाए हैं। प्रधानमंत्री के साथ करीब आधे घंटे की बैठक के बाद राहुल ने कहा कि प्रधानमंत्री ने किसानों के आठ सदस्यीय दल की बातों को ध्यान से सुना। उत्तर प्रदेश की स्थिति पर चर्चा के लिए राहुल गांधी के नेतृत्व में इस शिष्टमंडल ने मुलाकात में मनमोहन सिंह को बताया कि गांवों में चारों ओर जलने के निशान मौजूद हैं जहां किसान यूपी की मायावती सरकार से अपनी जमीन के मुआवजे की मांग कर रहे थे। राहुल ने प्रधानमंत्री को कथित जले हुए शव और किसानों एवं उनके परिवार के लोगों के खिलाफ हिंसा के चित्र भी दिखाए। कांग्रेस महासचिव ने संवाददाताओं से कहा, `गंभीर अत्याचार हो रहा है। वहां कम से कम 74 शवों की राख बिखरी पड़ी है। गांव के सभी लोगों को इसके बारे में जानकारी है। हम आपको इसकी तस्वीरें दिखा सकते हैं। महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहे हैं। लोगों को पीटा जा रहा है।'
राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश पुलिस और प्रशासन पर बहुत गम्भीर आरोप लगाए हैं। बसपा प्रवक्ता ने कहा कि राहुल गांधी निराधार आरोप लगा रहे हैं। वे घटना की आड़ में झूठ व अफवाह फैलाने की घटिया राजनीति कर रहे हैं। बसपा प्रवक्ता ने कहा कि कांग्रेस व अन्य विरोधी दल जनता को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि राजनीतिक षड्यंत्र के तहत कुछ राजनीतिक दलों ने अराजक तत्वों को अवैध हथियार देकर उन्हें उकसाया और घटना को अंजाम दिया। वहीं राज्य सरकार के प्रवक्ता ने अलग बयान जारी कर दावा किया कि उत्तर प्रदेश में भूमि अधिग्रहण पर केंद्र सरकार से अधिक मुआवजा दिया जा रहा है। राहुल गांधी के इस सनसनीखेज बयान से प्रदेश सरकार में हड़कम्प मचना स्वाभाविक ही था। मंगलवार को मेरठ मंडल के कमिशनर व आईजी से प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि भट्टा में 74 लोगों के मारे जाने की बात झूठी है। वहां महिलाओं के साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं हुआ। पुलिस व ग्रामीणों में संघर्ष में चार मौतें हुईं। दो पुलिसकर्मी थे जबकि दो असामाजिक तत्व थे। आईजी ने बताया कि बिटोरों से राख के नमूने लेकर आगरा की फोरेंसिक लैब में भेजे गए हैं। विपक्ष का कहना है कि राहुल गांधी ने जिस तरह भट्टा पारसौल में बड़े पैमाने पर किसानों की हत्या का आरोप लगाया है, अगर वह सही है तो उत्तर प्रदेश की सरकार को बर्खास्त कर देना चाहिए और अगर यह राजनीतिक बयान है तो कांग्रेस का दोहरा चरित्र एक बार फिर सामने आ रहा है।
राहुल गांधी के इतने गम्भीर आरोप पर बहस होना स्वाभाविक ही है। ज्यादातर लोगों का मानना है कि बिना पुख्ता सबूत के वे इतने गम्भीर आरोप नहीं लगा सकते हैं। उधर राहुल अपनी बात पर पूरी तरह से डटे हुए हैं। बुधवार को वाराणसी में राज्य कांग्रेस समिति के अधिवेशन में राहुल ने कहा कि मैं खुद मायावती सरकार के खिलाफ जनता में संघर्ष का नेतृत्व करूंगा। मैं राज्य के हर कोने में जाऊंगा, न तो मेरे पास टाइम की कमी है और न ही यूपी में मुद्दों की। उत्तर प्रदेश की राजनीति में निश्चित रूप से कांग्रेस-बसपा की लड़ाई गम्भीर रूप लेती जा रही है। देखें कि बहन जी इस ताजे हमले का क्या जवाब देती हैं?

Saturday, 14 May 2011

राहुल की भट्टा-पारसौल सनसनीखेज यात्रा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
 प्रकाशित: 14 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने सनसनीखेज तरीके से उत्तर प्रदेश सरकार के सारे प्रतिबंधों को धत्ता दिखाते हुए एक मोटर साइकिल के पीछे बैठकर बुधवार को तड़के ग्रेटर नोएडा पुलिस और किसानों के हिंसक संघर्ष, स्थल भट्टा-पारसौल गांव पहुंचकर सभी को चौंका दिया। भट्टा-पारसौल में राहुल की सादगी को देखकर हर कोई उनका कायल हो गया। साधारण से कपड़े और चप्पल पहनकर यह कद्दावर नेता बाइक पर सवार होकर बगैर किसी शोरशराबे के, तामझाम के गांव वालों के बीच पहुंच गया। जेड प्लस सुरक्षा होने के बावजूद राहुल आम गांव वालों के साथ ऐसे घुलमिल कर बातें करता रहा जैसे कि वह उन्हीं में एक हो। बुधवार तड़के भी और दिनों की तरह भट्टा और पारसौल गांव के बाहर पुलिस और पीएसी तैनात थी। किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि ऐसे समय में कोई नेता उनके बीच पहुंच सकता है। भट्टा-पारसौल गांव में किसानों की मांगों को लेकर 19 घंटे के धरने के बाद राहुल को यूपी पुलिस ने बुधवार रात हिरासत में ले लिया और उन्हें ग्रेटर नोएडा के कासना थाने में लगभग तीन घंटे बाद निजी मुचलके पर रिहा कर दिया। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह जो सारे समय राहुल के साथ थे, ने कहा कि राहुल ने जमानत नहीं ली और पुलिस ने खुद ही उन्हें रिहा कर दिया।
राहुल गांधी की इस सनसनीखेज यात्रा से कांग्रेसियों में भारी उत्साह और नई ऊर्जा आ गई है। कांग्रेस प्रवक्ता जयंती नटराजन का कहना है कि जब दूसरे दलों के बड़े-बड़े नेता पीड़ित किसानों के आसपास भी नहीं पहुंच पाए हों, राहुल का यूं पहुंचना उनकी किसानों के प्रति प्रतिबद्धता दर्शाता है। उल्लेखनीय है कि अभी तक उत्तर प्रदेश में अपने लिए जमीन तलाश रही कांग्रेस के लिए यह यात्रा एक संजीवनी की तरह है। राहुल के क्षेत्र में पहुंचने, घर-घर जाकर पीड़ित परिवारों से मिलने व किसी ठोस नतीजे तक धरने पर बैठने से न केवल केंद्रीय बल्कि स्थानीय कांग्रेसियों में जबरदस्त उत्साह भर गया है। जेवर क्षेत्र के युवा कांग्रेस सचिव गौरव शर्मा का कहना है कि अब राहुल जी के नेतृत्व में यहां पार्टी किसानों के हितों के लिए अपनी जीजान लगा देगी। उन्होंने कहा कि यदि राहुल गांधी का धरना जारी रहता तो फिर न केवल पश्चिम उत्तर प्रदेश में बल्कि समूचे राज्य में कांग्रेस बसपा सरकार का सबसे बड़ा विकल्प बनकर उभरने में मदद मिलती।
उत्तर प्रदेश राहुल गांधी का गृह राज्य है। वे अपनी सर्वोच्च राजनीतिक प्राथमिकता भी यूपी में कांग्रेस शासन की वापसी बताते हैं। मगर राज्य के नेताओं का जनता से दूर रहना और कार्यकर्ताओं में निराशा घर कर जाने के कारण राहुल का संघर्ष अकसर एकांकी पड़ जाता है। राहुल 2007 के विधानसभा चुनावों के बाद से ही यूपी के गांव-गांव घूम रहे हैं। गांव जाकर वे किसानों और भूमिहीन दलितों से मिलते हैं। रात को किसी गरीब के आमतौर दलित के घर खाना खाते हैं और वहीं रात बिता भी देते हैं। पिछले चार साल में राहुल ने यूपी में मायावती सरकार के दलित, गरीब विरोधी होने के कई मुद्दे उठाए हैं। मायावती कई बार गुस्से में राहुल पर व्यक्तिगत आरोप तक लगा चुकी हैं। राहुल अपनी यूपी मिशन 2012 पर डटे हुए हैं। इतना जरूर कहा जा सकता है कि यूपी में कांग्रेस समर्थकों की कमी नहीं पर फसल काटने के लिए भी तो मशीनरी चाहिए।

Wednesday, 11 May 2011

कहीं यह किसान आंदोलन मायावती को भारी न पड़ जाए?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 11 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
जमीन अधिग्रहण के खिलाफ भट्टा-पारसौल में भड़की आग ग्रेटर नोएडा से आगरा तक फैल गई है। जेवर, अलीगढ़, मथुरा और आगरा तक पूरे यमुना एक्सप्रेस-वे पर किसानों के साथ पुलिस की झड़पें हुई हैं। भट्टा-पारसौल में 17 जनवरी से शुरू हुआ किसानों का आंदोलन मायावती सरकार के लिए चिन्ता का विषय बनता जा रहा है। सरकार के अफसर और सलाहकारों ने सत्ता के अंतिम साल में मायावती को ठीक वहीं पहुंचा दिया है जहां पिछली बार मुलायम सिंह सत्ता के अंतिम साल में पहुंच गए थे। तब अनिल अम्बानी के लिए किसान आंदोलन हुआ तो अब की जेपी समूह के लिए हो रहा है। किसानों पर 2007 से अब तक छह बार लाठी-गोली चल चुकी है और करीब दर्जनभर किसान मारे जा चुके हैं।

नोएडा से आगरा के लिए यमुना एक्सप्रेस-वे का निर्माण किया जा रहा है। इसकी लम्बाई 165 किलोमीटर है। गौतम बुद्धनगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, मथुरा और आगरा के 334 गांवों की जमीन इस रोड के लिए अधिग्रहित की गई है। किसान महीनों से यह मांग करते आए हैं कि उनको मुआवजे की बेहतर दरें दी जाएं और सरकार भूमि अधिग्रहण के कानून में बदलाव करे। दरअसल यमुना एक्सप्रेस-वे प्रोजेक्ट को लेकर किसानों का टकराव एकदम नया नहीं है। पिछले सालों में कई जगह आंदोलन भड़क चुका है। इसमें 11 किसानों की जान जा चुकी है पर ये विदर्भ के किसान नहीं हैं संकट में घिरने पर फांसी पर चढ़ जाएं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज्यादातर किसान पूर्वांचल के मुकाबले बड़ी जोत वाले तो हैं ही साथ ही कद, काठी और लाठी में भी मजबूत हैं। जमीनें बिकीं तो किसानों के एक वर्ग ने गाड़ी, मकान और असलहा पर भी निवेश किया। शनिवार को अब पारसौल में जो मुठभेड़ हुई तो उसमें गोली दोनों तरफ से चली। यह बदली हुई संस्कृति और अपरिपक्व नेतृत्व का भी नतीजा है। इस सबसे तो यह साफ है कि करीब सौ साल पुराने अंग्रेजों के बनाए भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर किसानों की नाराजगी विस्फोटक होती जा रही है। किसानों का तर्प है कि प्रदेश सरकार जमीन की तिजारत में क्यों लगी है? किसानों से आठ-नौ सौ रुपये वर्ग मीटर की जमीन लेकर व्यापारियों और उद्योगपतियों को बीस हजार रुपये वर्ग मीटर के हिसाब बेचने से किसका फायदा होता है।

इस प्रकरण में अब सियासत भी नए रंग भरने लगी है। रविवार को रालोद के प्रमुख चौ. अजीत सिंह अपने काफिले के साथ घटनास्थल पर जाने के लिए निकले थे लेकिन उनके काफिले को नोएडा की सीमा में ही रोक दिया गया। अजीत सिंह का कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार एक खास कम्पनी को मालामाल करने के लिए किसानों का गला काटने पर उतारू है। कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा ने इस खूनी जंग की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री मायावती पर डाल दी है। उनका आरोप है कि मायावती सरकार किसान विरोधी है, इसलिए जायज मुआवजा मांगने वाले किसानों पर गोली बरसा रही है। किसान आंदोलन के नेता महेन्द्र सिंह टिकैत के बेटे राकेश टिकैत का कहना है कि भट्टा-पारसौल की घटनाओं से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के स्वाभिमान को ललकारा गया है, ऐसे में अब किसान जान की बाजी लगाकर भी इंसाफ लेने के लिए आगे आएंगे। समय रहते अगर मुख्यमंत्री मायावती ने स्थिति को नहीं सम्भाला तो किसान आंदोलन सरकार के लिए भारी पड़ सकता है।