Translater

Showing posts with label MCD. Show all posts
Showing posts with label MCD. Show all posts

Saturday, 21 April 2012

अकेली शीला दीक्षित हार की जिम्मेदार नहीं हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21 April 2012
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली नगर निगम चुनाव में कांग्रेस की हार का जिम्मेदार कौन है? वैसे कांग्रेस में पोस्टमार्टम करने की प्रथा नहीं और हार के बाद शायद ही किसी को जिम्मेदार माना जाता है। हमारे सामने उत्तर प्रदेश, पंजाब के विधानसभा परिणाम हैं। इतने दिन बीतने के बाद भी बैठकें हो रही हैं पर हार की जिम्मेदारी तय नहीं हो पा रही है। दिल्ली में अकेले मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को जिम्मेदार मानना सही नहीं है। बेशक दिल्ली नगर निगम को तीन हिस्सों में बांटना शीला जी का आइडिया था और इस हद तक हार के लिए वह जिम्मेदार हो सकती हैं पर दिल्ली से तमाम कांग्रेसी सांसद, दिल्ली सरकार के मंत्री व विधायक भी कम जिम्मेदार नहीं। पहले बात करते हैं सांसदों की। सबसे ज्यादा खराब हालत नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की रही जहां केंद्रीय मंत्री अजय माकन की पसंद से टिकट बांटी गई। इस क्षेत्र में 32 वार्ड हैं और कांग्रेस को सिर्प सात वार्डों पर जीत मिल सकी। यहां से कांग्रेस के तीन बागी जीतने में सफल रहे। बीजेपी ने यहां सबसे ज्यादा 22 सीटों पर परचम फहराया। वेस्ट दिल्ली के सांसद महाबल मिश्र के इलाके में कांग्रेस की टिकटों के लिए घमासान हुआ और नतीजा यह निकला कि 10 सीटें ही कांग्रेस को मिल सकीं। बीजेपी 19 पर जीती। बीएसपी एक और आरएलडी दो सीटों पर काबिज हुई। कई दागी जीत गए। केंद्रीय मंत्री कृष्णा तीरथ को टिकटों के वितरण के दौरान अपने विधायकों का विरोध सहना पड़ा और कांग्रेस ने उनके इलाके में भी खराब प्रदर्शन किया। यहां कांग्रेस 11 सीटें ही जीत पाई। बीएसपी को सबसे ज्यादा छह सीटों पर सफलता मिली। प्रदेशाध्यक्ष और नॉर्थ ईस्ट दिल्ली से सांसद जयप्रकाश अग्रवाल को फ्रीहैंड मिला लेकिन उनकी स्थिति भी काफी विकट रही। वह 12 उम्मीदवारों को ही जिता सके। कांग्रेस के हैवीवेट मंत्री कपिल सिब्बल चांदनी चौक से हल्के ही साबित हुए। यहां कांग्रेस को 14 सीटें मिलीं। बीजेपी को 21 सीटें मिली जबकि शोएब इकबाल आरएलडी टिकट पर तीन सीटें जिता पाए। बीएसपी को एक और एक निर्दलीय को जीत मिली। हालांकि सीएम के बेटे संदीप दीक्षित भी आधे नम्बरों से भी पास नहीं हो सके और 15 सीटें ही जिता सके लेकिन बाकी सांसदों से इनका प्रदर्शन बेहतर रहा। बीजेपी ने ईस्ट दिल्ली से 18 सीटें जीती यानी कांग्रेस से सिर्प तीन ज्यादा पर तीन बागियों ने खेल बिगाड़ दिया। अब बात करते हैं दिल्ली सरकार में कांग्रेसी मंत्रियों की। सभी छह मंत्रियों की परफार्मेंस खराब रही। सबसे बुरा हाल सरकार के वरिष्ठ मंत्री डॉ. एके वालिया का रहा। उनकी विधानसभा लक्ष्मी नगर में चारों वार्डों किशन पुंज, लक्ष्मी नगर, शकरपुर व पांडव नगर में कांग्रेस हार गई। सरकार के दूसरे मंत्री हारुन यूसुफ भी अपनी विधानसभा बल्लीमारान के तीन वार्डों में पार्टी प्रत्याशी को जिता नहीं पाए। उनके वार्ड बल्लीमारान, राम नगर, कसाबपुरा में पार्टी प्रत्याशी हार गए जबकि एकमात्र वार्ड ईदगाह रोड में पार्टी लाज बचा पाई। रमाकान्त गोस्वामी की राजेन्द्र नगर विधानसभा में तीन वार्ड राजेन्द्र नगर, इन्द्रपुरी, नारायणा में पार्टी प्रत्याशी हार गए जबकि पूसा वार्ड में ही कांग्रेस जीती। यही हाल समाज कल्याण मंत्री प्रो. किरण वालिया का रहा है। उनकी विधानसभा मालवीय नगर के तीन वार्ड मालवीय नगर, सफदरजंग एन्क्लेव, हौजखास में कांग्रेस प्रत्याशी को हार मिली जबकि एक सीट विलेज हौजरानी में पार्टी अपनी जीत दर्ज कर सकी। राजकुमार चौहान का बहरहाल रिकॉर्ड बराबरी पर छूटा। उनकी विधानसभा मंगोलपुरी के चार वार्ड में से दो मंगोलपुरी ईस्ट और मंगोलपुरी में पार्टी प्रत्याशी जीते हैं जबकि रोहिणी साउथ व मंगोलपुरी वेस्ट में हार गए। हार-जीत के रिकॉर्ड में मंत्री अरविन्दर सिंह लवली का रिकॉर्ड बेहतर माना जा सकता है। उनके विधानसभा गांधी नगर के चार में से तीन वार्ड, धर्मपुरा, गांधी नगर और रघुबरपुरा में पार्टी प्रत्याशी जीते जबकि आजाद नगर में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है। इसी तरह यमुना पार विकास बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. नरेन्द्र नाथ अपने चारों वार्ड हार गए हैं तो दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष डॉ. योगानन्द शास्त्राr चार में से दो और वरिष्ठ विधायक मुकेश शर्मा के तीन वार्डों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है। दूसरी ओर बीजेपी के वरिष्ठ विधायकों की परफार्मेंस ठीक मानी जा सकती है। प्रतिपक्ष के नेता प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा तीन, जगदीश मुखी दो और डॉ. हर्ष वर्धन के दो वार्डों में बीजेपी प्रत्याशियों ने फतह हासिल की। इसलिए अकेले शीला दीक्षित को जिम्मेदार ठहराना गलत है। इस हमाम में तो सभी नंगे हैं। विधानसभा चुनाव डेढ़ साल बाद होने हैं। अगर कांग्रेसी सांसदों, मंत्रियों और विधायकों का यही हाल रहा तो अंजाम भुगतने के लिए कांग्रेस आला कमान को तैयार रहना होगा।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Elections, MCD, Sheila Dikshit, Vir Arjun

Friday, 20 April 2012

एमसीडी चुनाव की झलकियां

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20 April 2012
अनिल नरेन्द्र
इस बार के नगर निगम चुनाव में कई दिलचस्प किस्से सामने आए हैं। दिल्ली के इस एमसीडी चुनाव में लोगों ने युवाओं और बुजुर्गों सभी को चौंका दिया है। बात विश्वास की है, लोगों को जिस पर विश्वास हुआ उसी के सिर पर सेहरा बांध दिया। सबसे बुजुर्ग नेताओं में गिने जाने वाले कांग्रेस के रमेश दत्ता को एक बार फिर जीत का सेहरा पहनाया गया वहीं दूसरी तरफ केवल 21 साल की उम्र वाले दो युवा नेताओं को भी अपना लीडर चुना गया। तुर्पमान गेट से चुनकर आए आले मोहम्मद इकबाल केवल 21 साल और एक महीने की उम्र में सबसे यंग पार्षदों में से एक हैं। इकबाल राष्ट्रीय लोकदल के उम्मीदवार थे। वहीं 21 साल की बसपा प्रत्याशी पूनम परेरा भी सबसे यंग महिला प्रत्याशी हैं। वह मंगोलपुरी वेस्ट वार्ड से विजयी रही। पिछले कई वर्षों से दिल्ली की राजनीति में सक्रिय रमेश दत्ता बेहद बुजुर्ग हैं और इस बार चुनाव में उन्हें हार्ट अटैक भी आया था पर घर से परिचित रमेश दत्ता का इतने सालों से लोगों के प्यार में कोई कमी नहीं आई। बात अगर मुस्लिम पार्षदों की अब करें तो नगर निगम चुनाव में राजनीतिक दलों का मुस्लिम उम्मीदवारों पर लगाया दांव कामयाब रहा। इस बार सबसे ज्यादा मुस्लिम पार्षद कांग्रेस से चुने गए हैं। इसके अलावा रालोद से तीन एवं भाजपा, बसपा और सपा से भी एक-एक पार्षद चुना गया है। इस बार चुनाव में खास बात यह रही कि मुस्लिम आबादी वाले इलाके कसाबपुरा की सीट भाजपा के खाते में गई, वहीं ओखला से सपा ने भी खाता खोलकर दिल्ली नगर निगम में अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। तीनों नगर निगमों में सबसे ज्यादा सात मुस्लिम प्रत्याशी पूर्वी दिल्ली से जीते हैं। इसके बाद उत्तरी दिल्ली से छह और दक्षिण दिल्ली नगर निगम में सबसे कम तीन मुस्लिम उम्मीदवारों के सिर पर जीत का सेहरा बंधा। कुल मिलाकर 16 मुस्लिम उम्मीदवारों के सिर बंधा जीत का सेहरा। एक महत्वपूर्ण पहलू इस चुनाव में यह भी रहा कि निर्दलीय उम्मीदवार काफी तादाद में जीते। 24 निर्दलीय उम्मीदवारों ने धमाकेदार जीत दर्ज कराई है। निर्दलीय उम्मीदवारों में से अधिकतर कांग्रेस और भाजपा के बागी उम्मीदवार हैं, जिन्हें पार्टी की टिकट नहीं मिली और वे निर्दलीय खड़े हो गए। लेकिन इन्होंने अपनी जीत दर्ज कराकर अपने को साबित जरूर कर दिया। माना जा रहा है कि इसमें से कुछ उम्मीदवार फिर से पार्टी में एंट्री ले सकते हैं। इस चुनाव में बागियों ने पार्टी प्रत्याशियों को हरवाने में अहम भूमिका निभाई है। दक्षिण दिल्ली की बात करें तो यहां की मुनिरका सीट से कांग्रेस की बागी प्रत्याशी प्रमिला टोकस चुनाव जीत गई। गीता कॉलोनी से बागी हुए बंसी लाल ने सीट निकाल ली। नेहरू विहार से भाजपा के शिव कुमार शर्मा इसलिए हार गए क्योंकि उनके खिलाफ पांच बागी खड़े हो गए। बगावत के चलते खजूरी सीट भी भाजपा के हाथ से चली गई। इस सीट से भाजपा के चौ. रामवीर सिंह पार्षद थे। इस बार उनका टिकट काटकर डॉ. अनिल गुप्ता को दिया गया था। नतीजा यह हुआ कि चौ. रामवीर दूसरी पार्टी से चुनाव लड़ गए और भाजपा का वोट बंट गया। पश्चिमी दिल्ली से निर्दलीय पूनम भारद्वाज जीत गईं। विवेक विहार से निर्दलीय प्रीति जीत गईं। महिपालपुर से भाजपा के बागी कृष्ण सहरावत ने बाजी मारी तो मारी तो नवादा सीट से कांग्रेस के बागी नरेश बाल्यान चुनाव जीत गए। उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी को हरा दिया। भाजपा पार्षद रहे विजय पंडित के कहने के बावजूद टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने अपनी पत्नी सीमा पंडित को रालोद के टिकट से चुनाव लड़ाया और वह चुनाव जीत गईं। भाजपा के पूर्व पार्षद रहे प्रवीण राजपूत बागी होकर चुनाव जीत गए। बिन्दापुर सीट से कांग्रेस के बागी देशराज राघव चुनाव जीत गए। बाहरी दिल्ली में भाजपा की बागी पुष्पा विजय विहार सीट से जीत गईं। उन्होंने पार्टी की प्रत्याशी सरिता को हराया। दिल्ली नगर निगम चुनाव में कांग्रेस की हार की एक वजह बसपा, एनसीपी सहित सपा का भी हाथ रहा। दिल्ली नगर निगम के पिछले चुनाव में बसपा ने 17 सीटें जीतकर जोरदार शुरुआत की और दर्जनों अन्य सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशियों की हार सुनिश्चित की। इस बार बसपा ने 15 सीटें जीती हैं तो घड़ी चुनाव चिन्ह निशान वाली एनसीपी ने बदरपुर सीट पर कब्जा कर लिया। एनसीपी के पूर्व विधायक रामवीर सिंह बिधूड़ी का गढ़ कहे जाने वाले इस इलाके में उनकी पार्टी ने छह सीटें जीती हैं। इनमें बदरपुर की जैतपुर, मीठापुर, मोलडबंद व बदरपुर की सीटें शामिल हैं। यहां से बसपा के राम सिंह नेताजी विधायक हैं। एनसीपी ने हरकेश नगर तथा महरौली की सीटों पर भी कब्जा कर लिया। हद तो यह है कि इस इलाके में कांग्रेस का प्रत्याशी तीसरे से पांचवें स्थान पर पहुंच गया। क्या दिल्ली में तीसरा मोर्चा तैयार हो रहा है? चुनाव परिणाम तो इसी ओर इशारा कर रहे हैं। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि छोटे दलों के प्रत्याशी चुनाव जीत गए हैं जिन्हें राष्ट्रीय पार्टियों ने नजरंदाज कर दिया था। गौर करने वाली बात यह है कि भाजपा की इस चुनाव में 36 सीटें कम आई हैं। 2007 के चुनाव में भाजपा ने 174 सीटें जीती थीं। यह अधिक महत्वपूर्ण है कि हारने वाली कई सीटें वे सीटें हैं जो पूर्वांचल के लोगों ने जीती हैं। चाहे वे निर्दलीय हों या किसी छोटे दलों के टिकट पर चुनाव लड़े हों। ऐसे लोगों में शामिल हैं पूर्वांचलवासियों के बाहुल्य वाले इलाके संगम विहार वेस्ट से निर्दलीय प्रत्याशी कल्पना झा। दक्षिण दिल्ली से एनसीपी की शिखा शाह जीत गईं। सकारावती सीट से पूर्वांचल पृष्ठभूमि के सत्येन्द्र राणा निर्दलीय चुनाव जीत गए। यहां यह भी गौर करने वाली बात है कि दिलशाद कॉलोनी से पूर्वांचली प्रत्याशी राम नारयण दूबे ने कांग्रेस के उन चौधरी अजीत सिंह को हराया है जो शीला दीक्षित के करीबी कहे जाते हैं। कांग्रेस ने इस सीट को जीतने के लिए सभी तरीके अपनाए, पूरी ताकत झोंक दी थी। इसी तरह नई सीमापुरी सीट पर भाजपा कार्यकर्ता सुनील झा ने सीट निकाल ली जबकि मतदान से पहले तक इस सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी वेद प्रकाश बेदी को मजबूत बताया जा रहा था। भाजपा के उच्चपदस्थ सूत्रों का कहना है कि जो भी निर्दलीय व छोटे दलों के पूर्वांचली जीते हैं, वे कुछ समय पहले तक भाजपा से जुड़े रहे हैं। मगर पार्टी की उपेक्षा के चलते उन्होंने दूसरी ओर रुख किया है। भाजपा न ही उन्हें अब सम्मान दे रही है और न ही पूर्वांचल के बड़े नेताओं को पार्टी में उचित महत्व मिल रहा है।

Thursday, 19 April 2012

भाजपा की जीत नहीं वोट तो महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटालों के खिलाफ है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19 April 2012
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने जिस एमसीडी को तीन टुकड़ों में बांटने का जो दांव चला था, वह उल्टा पड़ गया। भाजपा ने तीनों ही हिस्सों में कांग्रेस को पछाड़ दिया। नॉर्थ और ईस्ट में बीजेपी बहुमत में आ गई और दक्षिण में वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। अगर मुझसे पूछा जाए तो मैं यही कहूंगा कि यह कांग्रेस के खिलाफ एक नेगेटिव वोट है। इसमें भाजपा की उपलब्धियों के कारण वोट नहीं पड़ा यह तो लोगों का कांग्रेस से गुस्से का परिचायक वोट है। जनता महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटालों से तंग आ चुकी है और चूंकि दिल्ली सरकार भी कांग्रेस की है और केंद्र सरकार भी कांग्रेस की है, इसलिए जनता ने कांग्रेस को उखाड़ फेंकने के लिए पार्टी के खिलाफ वोट दिया। यह वोट शीला दीक्षित की दिल्ली सरकार के खिलाफ भी है और केंद्र में मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ भी है। शीला जी ने तो सोचा था कि एमसीडी को तीन हिस्सों में बांटकर बीजेपी को हमेशा के लिए कमजोर कर देंगी पर दांव उल्टा पड़ा। शीला जी की स्थिति खराब हुई है। कुछ लोग इसे शीला के खिलाफ वोट भी मान रहे हैं। कांग्रेस कह सकती है कि हमारे अन्दर बहुत फूट थी, बागियों ने हमें हरवा दिया पर फूट तो बीजेपी में आपसे ज्यादा थी और बागी तो वहां भी खड़े थे। आपके तो कई दिग्गज धूल चाट गए। लीडर विपक्ष जय किशन शर्मा नजफगढ़ से हार गए। पिछले तीन बार से लगातार पार्षद रहे कांग्रेस के सीनियर नेता चौधरी अजीत दिलशाद कॉलोनी से हार गए। तीन बार पार्षद रही कांग्रेस की अनीता बब्बर तिलक नगर से बीजेपी की रितु वोहरा से हार गई। दिलचस्प बात यह रही कि दोनों कांग्रेस और बीजेपी के बागी अधिकतर हारे पर उन्होंने वोट काटने का काम किया। पूर्वी दिल्ली का चुनाव कांग्रेस के लिए विशेष महत्व और प्रतिष्ठा रखता था। शीला दीक्षित, संदीप दीक्षित, जय प्रकाश अग्रवाल, अशोक वालिया, अरविन्दर सिंह लवली सभी की प्रतिष्ठा दांव पर थी। शीला दीक्षित ने खुद तो हार पर कुछ नहीं कहा, लेकिन उनके बेटे और पूर्वी दिल्ली के सांसद संदीप दीक्षित ने महंगाई और 2जी स्पेक्ट्रम जैसे घोटालों को हार का कारण स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि सीएजी की रिपोर्ट और अन्ना के आंदोलन से ऐसा माहौल बना कि लोगों को लगा कि कांग्रेस की सारी गलतियों का केंद्र में है। उन्होंने कहा कि हमने लोकल मुद्दों को रखा जबकि पूरे देश और दिल्ली में ऐसा माहौल था कि बीजेपी ने महंगाई और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को फोकस किया। कांग्रेस के मंत्री राजकुमार चौहान बयान देते हैं कि अगर महंगाई बढ़ी है तो वेतन भी तो बढ़े हैं। यह बयान जनता को पसंद नहीं आया। पूरे प्रचार में बीजेपी ने कहीं भी एमसीडी में पिछले पांच साल के अपने रिकॉर्ड पर वोट नहीं मांगा, उसने केंद्र सरकार और शीला सरकार को निशाने पर रखा। इससे भी यही साबित होता है कि अगर बीजेपी जीती है तो वह अपने कारनामों से नहीं बल्कि केंद्र और दिल्ली में कांग्रेस सरकारों के खिलाफ नेगेटिव वोट से जीती है। चूंकि इन चुनावों में स्थानीय दिग्गज भी असर रखते हैं, इसलिए जनता ने कई स्थानों पर दोनों प्रमुख दलों को नकारते हुए उम्मीदवार को व्यक्तिगत शख्सियत को वोट दिए तभी तो 37 निर्दलीय जीतकर आए। दिल्ली नगर निगम में बीजेपी की जीत का सेहरा प्रदेशाध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता के सिर पर बंधता है। उन्होंने जीतोड़ मेहनत की। इस जीत से अति-प्रसन्न पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा कि ये परिणाम कांग्रेस विरोधी जन भावना का पक्का सुबूत है और उनका दल आगामी दिल्ली विधानसभा तथा लोकसभा चुनावों में भी विजयी होगी। दिल्ली विधानसभा का चुनाव लगभग डेढ़ साल में होने हैं और 2014 में लोकसभा चुनाव होने हैं। सवाल यह उठता है कि क्या केंद्र सरकार अब भी चेतेगी? यह चुनाव एक तरह से केंद्र सरकार की नीतियों, कारगुजारियों, घोटालों पर था। इस सरकार को जनता की भावनाओं की कोई परवाह नहीं है और अपनी जन विरोधी नीतियों पर चलती जा रही है। जनता के पास अपना विरोध करने का एकमात्र हथियार अपना वोट है और उसने कांग्रेस के खिलाफ वोट देकर अपना रोष और बदलने की भावना को साफ रूप से प्रकट कर दिया है। बाकी इन चुनाव परिणामों का विश्लेषण तो कई दिनों तक चलता रहेगा।
Anil Narendra, BJP, Congress, Daily Pratap, Elections, MCD, Vir Arjun

Tuesday, 10 April 2012

तीन निगम और ढेर सारी चुनौतियां

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10 April 2012
अनिल नरेन्द्र
विश्व की सबसे बड़ी एमसीडी इस चुनाव के बाद तीन टुकड़ों में बंटी दिखेगी। नई एमसीडी तैयार हो जाने के बाद स्थानीय स्तर पर एमसीडी की अपनी अलग चुनौती होगी। यही वजह है कि नेताओं के चुनावी वादे भी बदल गए हैं। नए एमसीडी के लिए 15 अप्रैल को चुनाव होने हैं। इन चुनावों के परिणाम बाद दिल्ली के तीन नगर निगम होंगे। इन निगमों में उत्तरी दिल्ली, पूर्वी दिल्ली और दक्षिण दिल्ली निगम शामिल हैं। एमसीडी में पिछले पांच साल से भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों सहित कुल मिलाकर 20 पार्टियों के 2400 उम्मीदवार मैदान में हैं। मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस में है। एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि इस बार निगम चुनावों में महिला और पुरुष मिलाकर एक दर्जन से ज्यादा डाक्टर मैदान में हैं। खास बात यह है कि छह महिला डाक्टर तो ऐसी दिख रही हैं जो किसी न किसी बड़े अस्पताल में मेडिकल प्रैक्टिस कर चुकी हैं या कर रही हैं। नगर निगम के इस चुनाव में एक नई बात यह है कि तीनों निगमों में 50 फीसदी वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। इसके अलावा कई ऐसे वरिष्ठ पार्षद हैं, जो 1997 से निगम के प्रतिनिधि रहे हैं, लेकिन इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे। ऐसे पार्षदों में प्रमुख रूप से भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता, आरती मेहरा और पूर्व महापौर एवं महरौली से पार्षद सतवीर सिंह हैं। एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि उम्मीदवारों से ज्यादा परेशान उन्हें टिकट दिलाने वाले नेता हैं। दमदार नेताओं ने इस बार अपने चहेतों को टिकट तो दिला दिया है पर अब चाहे-अनचाहे उन पर ही उन्हें जिताने की जिम्मेदारी आ गई है। मौजूदा नगर निगम चुनाव में एक तो मौसम की गरमाहट से प्रचार का समय सीमित हो गया है और दूसरी ओर चुनाव आयोग की सख्ती के कारण ढोल-नगाड़े और तामझाम से भी प्रचार अभियान दूर हो गया है। पैसे वाले उम्मीदवार भले ही फिल्म अभिनेताओं आदि से रोड शो करवा रहे हैं, लेकिन बाकी उम्मीदवार चुनाव-प्रचार गली-गली पदयात्रा कर, घर-घर जाकर और मोहल्लों में छोटी-छोटी बैठकों के जरिये कर रहे हैं। पारा चढ़ते ही बिजली ने भी अपने नखरे दिखाने शुरू कर दिए हैं। चुनाव सिर पर हैं और कई घंटों बत्ती गुल होने लगी है। जब उम्मीदवार इलाके में चुनाव प्रचार करने जाते हैं तो लोग सबसे पहला प्रश्न यह करते हैं कि बिजली की सप्लाई के बारे में आपका क्या कहना है? आने वाले दिनों में यह समस्या और गम्भीर होने वाली है। कहीं एमसीडी चुनाव पर बिजली न गिर जाए। इस बार नेताओं को अपने प्रचार के लिए ज्यादा समय मिलेगा। दिल्ली स्टेट इलेक्शन कमीशन ने पहली बार शाम की बजाय प्रचार थमने का समय सुबह साढ़े पांच बजे तक किया है। अभी तक वोटिंग से 36 घंटे पहले चुनाव प्रचार बन्द हो जाता था। लेकिन इस बार 24 घंटे पहले चुनाव प्रचार बन्द होगा। दोनों प्रमुख पार्टियां बागियों से परेशान हैं। भाजपा ने सात लोगों को छह-छह वर्ष के लिए पार्टी से निष्कासित किया है तो कांग्रेस ने भी चार लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया है। दिल्ली नगर निगम चुनाव में इस बार पप्पू पिछले 15 साल का रिकॉर्ड त़ोड़ सकता है। पिछले 15 वर्षों में राजधानी में तीन बार निगम चुनाव हुए हैं लेकिन सिर्प एक ही बार मतदान का प्रतिशत 52 फीसदी का आंकड़ा छू पाया है। बाकी दो बार यह 42 फीसदी ही रहा। कांग्रेस की बागडोर शीला दीक्षित, जय प्रकाश अग्रवाल और कपिल सिब्बल ने सम्भाली है तो भाजपा की कमान विजय कुमार मल्होत्रा और विजेन्द्र गुप्ता के हाथ है।
Anil Narendra, Daily Pratap, Elections, MCD, Vir Arjun

Thursday, 29 March 2012

नगर निगम चुनाव ः कहीं यह विभीषण न डुबा दे कांग्रेस-भाजपा को

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 29 March 2012
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली में नगर निगम के चुनाव को लेकर एक बार फिर राजनीति में गर्मी आ गई है। टिकटों की मारामारी से जहां कांग्रेस बुरी तरह उलझी रही वहीं भारतीय जनता पार्टी ने इतनी मारामारी शायद पहले कभी नहीं देखी होगी। आशा के अनुरूप दिल्ली नगर निगम चुनाव के लिए नामांकन के अंतिम दिन विभिन्न दलों और निर्दलीय मिलाकर रिकॉर्ड 1785 पत्याशियों ने दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में बनाए गए 68 केंद्रों पर नामांकन किया। एक दिन में इतने अधिक पत्याशियों द्वारा नामांकन का यह रिकॉर्ड है। नगर निगम के उम्मीदवारों के चयन में भाजपा के सभी नियम-कानून तार-तार हो गए। पार्टी ने जहां कई दिग्गजों को बाहर कर दिया ठीक वहीं पदेश अध्यक्ष ने विरोधियों को निपटाने का कोई मौका नहीं छोड़ा। खास बात यह रही कि करीब 55 पार्षदों को पार्टी ने दोबारा मैदान पर नहीं उतारा है। पार्टी ने इस बार 17 पार्षदों को दूसरे वार्डों से चुनाव मैदान में उतारा है। पार्टी की ओर से जारी उम्मीदवारों की सूची में करीब आधा दर्जन महत्वपूर्ण कमेटियों के अध्यक्षों के नाम गायब हैं। नगर निगम चुनाव में पत्याशियों के चयन में कांग्रेस की एक्सपर्ट कमेटी ने केवल 24 पार्षदों को जीतने योग्य माना और उन पर विश्वास कर उन्हें चुनाव मैदान में उतारा है। 2007 निगम चुनाव में कांग्रेस के 67 पार्षद जीतने में सफल रहे थे, कांग्रेस चयन समिति ने उन 67 में से 43 पार्षदों को टिकट नहीं दिया है। इनमें कई ऐसे वार्ड हैं जहां वार्डों में बदलाव हुआ है और वह आरक्षित हो गया है। 248 नए चेहरे मैदान में उतारे हैं। हालांकि कांग्रेस पदेशाध्यक्ष का दावा था कि किसी ऐसे व्यक्ति के परिजन को टिकट नहीं दिया जाएगा जिसका वार्ड आरक्षित हो। वहीं ऐसा भी व्यक्ति टिकट पाने का हकदार नहीं होगा जो वर्ष 2007 के निगम चुनाव में 1000 से अधिक मतों से पराजित हुआ हो। पत्याशी चयन में जो पैमाने पदेश कांग्रेस कमेटी ने बनाए थे, वह सभी ध्वस्त हुए हैं। कांग्रेस की इसी नीति के चलते बड़े पैमाने पर कांग्रेस से बगावत कर लोगों ने दलबल सहित नामांकन पत्र दाखिल किए हैं। दोनों, भाजपा और कांग्रेस में पुराने नेता और कार्यकर्ताओं की वफादारी पर बड़े नेताओं के चहेतों के साथ रिश्तेदार भारी पड़े। बड़े-बड़े नेताओं ने जमीन के धंधे से जुड़े लोगों के साथ ही अपने रिश्तेदारों में टिकट बांट दी। भाजपा में टिकट बांटने वालों ने अपनी चलाने के लिए मौजूदा 117 पार्षदों के टिकट काट दिए। इनमें से 22 पार्षद अपनी पत्नी या बहू को टिकट दिलाने में कामयाब रहे। भाजपा के कुल मिलाकर पदों पर जमे 62 नेता अपनी-अपनी पत्नी और बहू को टिकट दिलाने में सफल रहे। ये सब उन महिला कार्यकर्ताओंs पर भारी पड़ी हैं जो लंबे अरसे से पार्टी का झंडा उठा रही थीं। दिल्ली की दोनों पतिद्वंद्वी पार्टियों कांग्रेस-भाजपा ने इतनी बड़ी संख्या में राजनीतिक विभीषण तैयार कर दिए हैं, जो उम्मीदवारों की लंका उजाड़ने का काम करेंगे। कांग्रेस में उम्मीदवारों की सूची हमेशा अंतिम समय पर ही जारी होती थी, लेकिन बगावत के चलते एक उम्मीदवार को टिकट देकर फिर दूसरा उम्मीदवार बदलना पार्टी के लिए नई मुसीबत खड़ी कर रहा है। उधर भाजपा पार्टी विद फैमिली दिखाई दे रही है। यहां पार्टी कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर अपने परिवार को महत्व दिया गया है। बगावत दोनों ही पार्टियों के लिए एक नई सिरदर्द बनकर आई है। कहीं यह विभीषण दोनों पार्टियों की लंका को न जला दे।
Anil Narendra, BJP, Congress, Daily Pratap, Delhi, Elections, MCD, Vir Arjun

Tuesday, 27 March 2012

यूपी की फतह के बाद अब मुलायम की नजरें दिल्ली तख्त पर

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27 March 2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश की सत्ता हासिल करने के बाद समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की नजर अब दिल्ली के तख्त पर लग गई है। अब मुलायम ने मध्यावधि चुनाव कभी भी सम्भव की बात कही है। इससे पहले तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने भी मध्यावधि चुनाव के लिए तैयार रहने की बात कही थी। ममता, मुलायम के सुर में सुर मिलाते हुए भाजपा की सुषमा स्वराज ने भी देश में मध्यावधि चुनाव की सम्भावना जताई है। देवास (मध्य प्रदेश) में जिला निगरानी एवं सतर्पता समिति की बैठक में भाग लेने आई सुषमा ने मीडिया कर्मियों से कहा कि देश की राजनीति हर दिन बदल रही है और वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए मध्यावधि चुनाव की सम्भावना है। सुषमा ने कहा कि केंद्र के लिए 272 का जादुई आंकड़ा नहीं रह गया है तथा वह मात्र 227 सांसदों पर टिकी हुई है। उन्होंने कहा कि केंद्र में सरकार की अल्पमत की स्थिति को देखते हुए भाजपा मध्यावधि चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार है। मुलायम का निशाना प्रधानमंत्री बनने का है। उन्होंने शुक्रवार को समाजवादी चिन्तक डॉ. राम मनोहर लोहिया की 102वीं जयंती पर लखनऊ में अपने कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि अब लोकसभा के मध्यावधि चुनाव के लिए कमर कस लें क्योंकि लोकसभा चुनाव कभी भी हो सकते हैं। इस साल या फिर अगले साल, इसलिए सारे कार्यकता पूरी ताकत अभी से लगा दें। उन्होंने कार्यकर्ताओं के सामने यूपी की विराट विजय के बाद प्रदेश की सभी 80 लोकसभा सीटें जीतने का भी लक्ष्य दिया है। दरअसल श्री मुलायम सिंह यादव ने एक तीर से कई शिकार करने की कोशिश की है। ऐसे समय जब समाजवादी पार्टी का रुख कांग्रेस के प्रति मुलायम होता दिख रहा था और ममता बनर्जी की भरपायी के लिए सपा को केंद्र में जगह मिलने की अटकलें तेज हो रही थीं तभी मुलायम ने मध्यावधि चुनाव की बात कहकर कांग्रेस की हवा निकाल दी। एक ओर उन्होंने कांग्रेस के प्रति मुलायम होने का अपने रुख का अप्रत्यक्ष रूप से खंडन कर दिया वहीं दूसरी ओर अपने कार्यकर्ताओं को कांग्रेस के खिलाफ धार तेज करने का सन्देश दे दिया। यही नहीं, उन्होंने अपने बेटे और मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह को यह बता दिया कि उनकी सरकार के कामकाज पर ही लोकसभा चुनाव लड़े जाएंगे। भले ही मुख्यमंत्री का कार्यकाल पांच साल का हो पर उनके कसौटी पर होने वाले कामकाज की अग्निपरीक्षा एक साल के भीतर ही हो जाएगी। मुलायम को मध्यावधि चुनाव इसलिए भी सूट करता है क्योंकि अभी उन्होंने न केवल अपने `भाई' (मुस्लिम-यादव) समीकरण को ठीक से बांध रखा है बल्कि समावेशी राजनीति की ओर कदम बढ़ाते हुए सभी जातियों के वोट बैंक हथियाने का करिश्मा दिखाया है। जिस तरह अखिलेश ने अपनी पहली ही बैठक में लैपटॉप, टैबलेट और बेरोजगारी भत्ता सरीखे की घोषणा पत्र की प्रमुख मांगों को हरी झंडी दिखा दी, उससे यह अटकलें भी खारिज हो गईं कि आखिर सपा की इन महत्वाकांक्षी योजनाओं के लिए धनराशि कहां से आएगी। मध्यावधि चुनाव की स्थिति में मुलायम सिंह को यह फायदा होने की उम्मीद होनी चाहिए कि सालभर तक लोग कम से कम मायावती राज की यादें ताजा ही रखेंगे। मायावती के प्रति नाराजगी का फायदा भी सपा को लोकसभा में जरूर मिलेगा। उत्तर प्रदेश के नजरिये से देखा जाए तो मध्यावधि चुनाव बसपा सुप्रीमो मायावती के लिए भी कम मुफीद नहीं कहा जा सकता। चुनाव में पराजय के बाद अपनी पहली प्रेसवार्ता में बहन जी ने उम्मीद जताई थी कि सपा के लोगों की अराजकता उन्हें फिर अगले चुनाव में जीतने का मौका देगी। हालांकि मायावती के लिए सपा कार्यकाल में जितने दिनों बाद चुनाव हो, वह मुफीद रहेगा क्योंकि उन्होंने उम्मीद पाल रखी है कि सपा की गलतियों से उनकी पार्टी को फायदा होगा। वैसे उनकी यह उम्मीद बेमानी नहीं है क्योंकि पहली बार अगर मुलायम सिंह यादव बसपा के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ते तो उत्तर प्रदेश में पांव पसारने का मौका बसपा को इतनी जल्दी नहीं मिलता। यही नहीं, गेस्ट हाउस कांड नहीं हुआ होता तो भी भाजपा मायावती को मुख्यमंत्री बनाने की गलती नहीं करती। मुलायम सरकार के तीसरे कार्यकाल में सपा कार्यकर्ताओं के उत्पात ने ही मायावती को 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का अवसर दिया। ऐसे में मायावती की खुशफहमी वाजिब है लेकिन जिस तरह सपा सरकार चल रही है उसके मद्देनजर जरूर इसे बेमानी कहा जाएगा। बसपा के संस्थापक कांशीराम अपने भाषणों में साफ तौर पर कहा करते थे कि कमजोर सरकार और बार-बार चुनाव उनकी पार्टी के लिए फायदेमंद हैं।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Delhi, MCD, Samajwadi Party, Uttar Pradesh, Vir Arjun

Wednesday, 7 March 2012

और अब सबकी नजरें दिल्ली नगर निगम चुनावों पर टिकीं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7 March 2012
अनिल नरेन्द्र
हालांकि दिल्ली नगर निगम के चुनाव पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव जितना महत्व तो नहीं रखते पर फिर भी राजधानी होने के नाते नगर निगम चुनाव महत्व रखते हैं। पांच राज्यों के चुनावों के बाद अब सबकी निगाहें दिल्ली नगर निगम चुनाव पर आ टिकी हैं। राजधानी में सोमवार से आचार संहिता लागू हो गई है। आचार संहिता लागू होते ही नई परियोजनाओं की घोषणा अथवा उद्घाटनों पर विराम लग जाएगा। हालांकि चुनाव की आचार संहिता 19 मार्च से लागू होगी क्योंकि नामांकन प्रक्रिया 19 मार्च से शुरू होगी। यह संहिता आगामी 17 अप्रैल तक लागू रहेगी। ज्ञात हो कि 17 अप्रैल को एमसीडी चुनाव में मतगणना होगी। इस आचार संहिता के कारण दिल्ली में अगले डेढ़ महीने तक सरकारी एजेंसियां लोक-लुभावनी परियोजनाओं को मंजूरी नहीं दे सकती हैं। आचार संहिता के तहत राज्य चुनाव आयोग धन-बल और शराब माफिया के दुरुपयोग के अलावा राजधानी की सम्पत्तियों पर पोस्टर-बैनर चिपकाने पर भी नजर रखेगा। दिल्ली में भी नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़ाई से पेश आया जाएगा। दूसरी ओर चुनाव तिथि घोषित होते ही राजधानी में घोषणाओं की झड़ी लग गई। महज तीन दिनों के अन्दर सैकड़ों करोड़ रुपये की परियोजनाओं को हरी झंडी दे दी गई। महज शुक्रवार और शनिवार को ही एमसीडी स्थायी समिति ने 200 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं को मंजूरी दी। चुनाव के ऐन मौके पर 11500 सिलाई मशीनें वितरित करने की परियोजना को हरी झंडी दी गई। इसके अलावा शनिवार को स्थायी समिति की बैठक में 60 से अधिक परियोजनाएं पास की गईं। साथ ही रविवार को महापौर प्रो. रजनी अब्बी की ओर से सभी अखबारों में एमसीडी की सफलताओं को लेकर बड़े पैमाने पर विज्ञापन जारी किया। जहां भाजपा के लिए यह चुनौती होगी कि वह नगर निगमों पर पुन कमल खिलाए वहीं दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की प्रतिष्ठा भी इस चुनाव से सीधी जुड़ी है। दिल्ली नगर निगम चुनाव को लेकर राजनीतिक पार्टियां चाहे जो रणनीति बना लें पर चुनाव में मुख्य मुद्दा दिल्ली सरकार ही रहेगी। कांग्रेस जहां अपनी सरकार के 13 साल की कामयाबी को भुनाने पर जोर देगी, वहीं भाजपा सरकार की नाकामी और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाएगी। दोनों दलों के नेता मानते हैं कि चुनाव में मुद्दा दिल्ली सरकार ही रहेगी। दिल्ली सरकार की आज की तारीख में सबसे बड़ी उपलब्धि दिल्ली नगर निगम का तीन भागों में बंटवारा तथा महिलाओं का आरक्षण बढ़ाकर 33 से 50 फीसदी करने को बताती है। वहीं कांग्रेस सरकार द्वारा प्रदान की गई सुविधाओं को भी भुनाने का प्रयास होगा। वहीं भाजपा लगातार मुख्यमंत्री पर घोटालों को लेकर आक्रामक रही है। साथ ही कानून व्यवस्था का मुद्दा भी भाजपा जरूर उछालेगी। पिछले दिनों भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता द्वारा किया गया जनसम्पर्प अभियान खासा सफल रहा है। उनके निशाने पर दिल्ली सरकार व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, दोनों ही रहे। अपने 15 दिन की यात्रा में उन्होंने दिल्ली सरकार की नाकामियों को पानी पी-पीकर गिनाईं। वैसे भाजपा नेता भी मानते हैं कि पार्टी चाहे जितना भी शीला दीक्षित की बुराई कर ले पर एमसीडी बंटवारे की चाल पार्टी पर भारी पड़ सकती है। पांच राज्यों के चुनाव परिणाम भी जरूर थोड़ा बहुत असर नगर निगम चुनाव पर डालेंगे। भाजपा उत्साहित है, कांग्रेस का मनोबल थोड़ा प्रभावित जरूर होगा। देखें नगर निगम चुनाव में प्रचार के दौरान क्या-क्या मुद्दे उठते हैं?
Anil Narendra, Daily Pratap, Delhi, Elections, MCD, Vir Arjun

Sunday, 18 December 2011

मेरे भारत महान की एक तस्वीर यह भी है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18th December 2011
अनिल नरेन्द्र
गुरुवार को इस मौसम का दिल्ली में सबसे ठंडा दिन रहा। न्यूनतम तापमान सामान्य से तीन डिग्री कम 5.9 डिग्री सेल्सियस रहा। मौसम विभाग के मुताबिक अगले तीन-चार दिन तक पारा 5 से 6 डिग्री सेल्सियस के आसपास ही बना रहेगा लेकिन अगले सप्ताह से पारा गिरेगा और कड़ाके की ठंड पड़ेगी। 22 दिसम्बर तक राजधानी में बारिश होने की भी संभावना है। इस कड़ाके की ठंड में मैं जब सोचता हूं कि हजारों लोग आज भी फुटपाथों, सड़कों पर सोने के लिए मजबूर हैं तो मेरा मन यह प्रश्न पूछने पर मजबूर हो जाता है कि किस बात के लिए हम यह कहते नहीं थकते कि मेरा भारत महान है? एक तरफ तो कहा जाता है कि भारत दुनिया की गिनी-चुनी बढ़ती अर्थव्यवस्था का प्रतीक है और दूसरी ओर आज तक हम गरीब, बेसहारा आदमी के लिए ठीक ढंग से रैन बसेरे तक नहीं बना सके? यह संतोष की बात है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों को इन गरीबों की चिन्ता जरूर है। सुप्रीम कोर्ट के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि कड़ाके की इस ठंड में हजारों बेसहारा लोग सड़कों पर रात गुजारने को मजबूर हैं लेकिन सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे ही है। इसे चिन्ताजनक बताते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने उन 84 अस्थायी नाइट शेल्टर को दोबारा शुरू करने का आदेश दिया है जिसे 9 अगस्त के आदेश को दरकिनार कर बन्द कर दिया गया। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने मास्टर प्लान 2021 के हिसाब से भविष्य की जरूरतों को देखने के लिए 184 स्थायी नाइट शेल्टर बनाने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने भी सोमवार को इससे जुड़े मामलों में सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को सभी शहरों में नाइट शेल्टर का पर्याप्त इंतजाम करने को कहा।
दिल्ली हाई कोर्ट की फटकार खाने के बाद दिल्ली सरकार को रैन बसेरों की सुध आई है। सरकार के कर्मचारी बृहस्पतिवार देर शाम तक अस्थायी रैन बसेरों की संख्या 30 तक पहुंचाने में जुट गए। पांच और रैन बसेरे अगले तीन दिनों में बनाए जाएंगे। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मेरे भारत महान की राजधानी दिल्ली में पौने दो लाख लोग बेघर हैं। इनके लिए बड़ी संख्या में रैन बसेरों की जरूरत है। लेकिन दिल्ली सरकार के पास महज 64 रैन बसेरे हैं। अगर हम प्रति रैन बसेरे का हिसाब लगाएं तो लगभग 2735 लोग प्रति रैन बसेरे में रह सकते हैं पर इतनी संख्या होने के बावजूद सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन 64 बसेरों में से भी अधिकतर बन्द पड़े हैं। पिछले साल 84 अस्थायी रैन बसेरे बनाए गए, जिनमें 17 जल गए, 52 अस्थायी रैन बसेरों को यह तर्प देकर बन्द कर दिया गया कि बेघर लोग इसमें रहने के लिए नहीं आ रहे हैं और 15 रैन बसेरे अब भी चालू हैं। यह दुःख की बात है कि दिल्ली सरकार इन बेसहारा लोगों के प्रति इतनी असंवेदनशील है। आखिर उन्हें भी इस कड़ाके की ठंड में सुरक्षित रात बिताने का हक है। यह सरकार का काम है कि उन्हें कम से कम खुले आसमान में रात बिताने से बचाए और पर्याप्त व्यवस्था करे। सरकार को खुद भी सोचना चाहिए और इस बात का इंतजार नहीं करना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट ही फटकार लगाए तब जाकर वह यह काम करे। मेरे भारत महान का एक असली चेहरा यह भी है।
Anil Narendra, Daily Pratap, Delhi Government, Delhi High Court, India, MCD, Night Shelters, Poor, Vir Arjun

Tuesday, 8 November 2011

अब एक नहीं तीन एमसीडी होंगी


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 8th November 2011
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने आखिर अपना लोहा मनवा ही लिया। तमाम विरोधों के बावजूद दिल्ली नगर निगम को तीन भागों में विभाजित करने के लिए दिल्ली सरकार के प्रस्ताव को गृह मंत्रालय ने हरी झंडी देते हुए फाइल दिल्ली सरकार को अधिकृत रूप से भेज दी है। इस विषय पर अब मंगलवार को मुख्यमंत्री मंत्रिमंडल की बैठक बुलाकर चर्चा के बाद विशेष सत्र की तारीख तय करेंगी। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित द्वारा इस मामले में हो रही देरी को पिछले दिनों अपनी प्रतिष्ठा बना लेने व 10 जनपथ में इसकी शिकायत करने के बाद हालातों में गृह मंत्रालय तेजी से हरकत में आया और उसने किन्तु-परन्तु नजरंदाज करते हुए फाइल को संस्तुति के साथ लौटा दिया जिसमें अब निगम विभाजन का संशय ही नहीं समाप्त हो गया अपितु जो बादल बने थे वह भी छंट गए। बहुत जल्द अब दिल्ली में तीन नगर निगम (एमसीडी) होंगे। दिल्ली में अब एनडीएमसी और कैंट बोर्ड को मिलाकर कुल पांच निकाय होंगे। इस फैसले को दिल्ली सरकार की जीत माना जा रहा है, लेकिन केंद्र ने अपनी चलाते हुए निगम कमिश्नरों की नियुक्ति का अधिकार अपने पास रखा है। अभी तक कमिश्नर की नियुक्ति दिल्ली सरकार केंद्र की सलाह पर करती है। तीनों निगमों के लिए लोकल बॉडीज अथारिटी की बजाय स्थानीय निकाय निदेशालय की मंजूरी दी गई है। तीनों में 50 फीसदी महिलाएं होंगी। अलग-अलग मेयर, निगम कमिश्नर और स्थायी समिति अध्यक्ष होंगे। हर विधानसभा सीट में चार वार्ड और कुल वार्ड 272। नोडल एजेंसी दिल्ली सरकार का शहरी विकास विभाग बना रहेगा।
बेशक शीला जी एक राजनीतिक जंग जीत गई हैं पर बहुत से लोग मानते हैं कि इन प्रयासों का एक बड़ा कारण राजनीति ही रही है। सीएम को कभी यह बर्दाश्त नहीं रहा कि दिल्ली सरकार जो चाहे, एमसीडी उससे उलटा चले। आज एमसीडी में भाजपा का शासन है तो उलटी चाल समझ में आती है लेकिन यह उलटबाजी तब भी थी जब एमसीडी पर कांग्रेस का राज था। सीएम ने तभी तय कर लिया था कि एमसीडी को कई हिस्सों में बांटना है। एमसीडी के विभाजन के बाद अभी कई प्रशासनिक मुद्दे उठेंगे और परेशानी आएगी। एमसीडी की आय का एक बड़ा स्रोत प्रॉपर्टी टैक्स है और इसका सबसे बड़ा हिस्सा साउथ दिल्ली से आता है। नॉर्थ में भी रोहिणी और पीतमपुरा जैसे पॉश इलाके अब दूध देने वाली गाय की तरह हैं लेकिन यमुनापार यानि ईस्ट दिल्ली की नगर निगम को राजस्व का टोटा रहेगा। निगम के सैकड़ों ऐसे प्रोजेक्ट अब दिल्ली सरकार को पूरा करने होंगे। खास बात यह है कि एमसीडी स्टाफ की ट्रांसफर-पोस्टिंग की जिम्मेदारी भी अब सरकार के हाथ में होगी। पूरी दिल्ली का करीब 97 फीसदी एरिया दिल्ली नगर निगम के आधीन है। दिल्ली की अधिकांश सड़कें, फुटपाथ, स्ट्रीट लाइटें, छोटे-बड़े सैकड़ों पार्प और प्राइमरी स्कूल एमसीडी के पास हैं। इतना ही नहीं, सफाई की जिम्मेदारी भी उसी के पास है और कई फ्लाइओवर, फुटओवर ब्रिज भी उसके रखरखाव में हैं। एमसीडी के कर्मचारियों की संख्या करीब 1.5 लाख है और इस वित्त वर्ष का उसका बजट करीब 6943 करोड़ रुपये है। इतना कुछ होने के बाद भी आम जनता और सरकार का आरोप है कि एमसीडी ठीक से काम नहीं करती। करोड़ों रुपये का बजट कहां चला जाता है, इसकी किसी को परवाह नहीं है और एमसीडी की अधिकतर सड़कें टूटी क्यों रहती हैं? एमसीडी में भ्रष्टाचार व्याप्त है। क्या दिल्ली सरकार अब एमसीडी को तीन हिस्सों में बांटकर यह सुनिश्चित करेगी कि दिल्ली की जनता को राहत मिलेगी और एमसीडी की कारगुजारी में सुधार होगा। अगर ऐसा होता है तभी इसे एक प्रभावी कदम माना जाएगा नहीं तो इसे एक राजनीतिक चाल ही मानी जाएगी।
Anil Narendra, Daily Pratap, Delhi Government, MCD, Sheila Dikshit, Vir Arjun

Wednesday, 13 April 2011

एमसीडी के बंटवारे का सोच-समझकर ही फैसला करें


प्रकाशित: 13 अप्रैल 2011

-अनिल नरेन्द्र

दिल्ली सरकार के मंत्रिमंडल ने भले ही एमसीडी के बंटवारे पर अपनी मुहर लगा दी है, लेकिन इस फैसले का चौतरफा विरोध जारी है। यहां तक कि कांग्रेसी पार्षद भी इसका जमकर विरोध कर रहे हैं। गत शुक्रवार को एमसीडी सदन में प्रतिपक्ष के नेता जयकिशन शर्मा की अगुवाई में पार्षदों ने पार्टी आलाकमान सोनिया गांधी से मुलाकात की। मुलाकात के लिए पहुंचे पार्षदों में जयकिशन शर्मा के अलावा अनीता बब्बर, मुकेश गोयल, सतबीर शर्मा, अनिल माथुर, रेणुका गुप्ता, पन्नालाल खेरवाल, हेमचन्द गोयल, विष्णु अग्रवाल, महमूद जिया और राकेश जोशी शामिल थे। पार्षदों ने सोनिया गांधी को बताया कि एमसीडी के पांच हिस्से होने पर वार्डों की संख्या 272 से बढ़कर 408 हो जाएगी। इससे नगर निगम कमजोर होगा और एक पार्षद की स्थिति आरडब्ल्यूए के पदाधिकारियों जैसी हो जाएगी। पार्षदों की चिन्ता यह भी है कि नई व्यवस्था लागू होने के बाद चुनाव में पार्टी को नुकसान होगा। 2007 में चुनाव से पहले वार्डों की संख्या 134 से बढ़कर 272 किए जाने का परिणाम सामने आ चुका है। इसमें कांग्रेस को सीधा नुकसान हुआ था और पार्षदों की संख्या घट गई थी। कांग्रेस शासित दिल्ली सरकार ने एमसीडी के बंटवारे का फैसला लिया है, लेकिन खुद पार्टी के पार्षद ही इस फैसले का जोरशोर से विरोध जता रहे हैं। इस मतभेद ने भाजपा के विरोध को बल दे दिया है। भाजपा नेताओं और पार्षदों का कहना है कि दिल्ली सरकार के जिस फैसले से खुद कांग्रेसी पार्षद सहमत नहीं हैं उसे जनता के हित में करार देना उचित नहीं है।

बंटवारे पर राजधानी के राजनीतिक गलियारों के अलवा एमसीडी की कार्यप्रणाली से जुड़े कुछ अहम सवाल भी आते हैं। इनका समाधान किए बिना निगम का बंटवारा कितना सफल होगा, इसमें भारी संदेह है? पहला सवाल : कैसे बांटा जाएगा राजस्व? एमसीडी को अपना राजस्व प्रॉपर्टी टैक्स, विज्ञापन, पार्किंग और टोल टैक्स, आदि से मिलता है। पहले यह बजट समान रूप से पूरी दिल्ली पर खर्च किया जाता था। पांच भागों में बंटने पर जहां गांव, अनाधिकृत कॉलोनियां, झुग्गी बस्ती और अनाधिकृत नियमित कॉलोनियां हैं, वहां पर प्रॉपर्टी टैक्स, विज्ञापन, आदि से बहुत कम राजस्व मिलेगा। असंतुलन को मिटाने में खासी दिक्कतें आ सकती हैं। दूसरा सवाल ः प्रॉपर्टी विभाजन कैसे होगा? कुछ इलाकों में एमसीडी की प्रॉपर्टी बहुत ज्यादा है और कुछ में बहुत कम। मध्य दिल्ली में एमसीडी का पुराना मुख्यालय है ही, नया मुख्यालय सिविक सेंटर भी है। यमुना पार में करोड़ों रुपये की लागत से बना बूचड़खाना है तो कई इलाकों में जोनल कार्यालयों में बड़ी-बड़ी इमारतें हैं। एमसीडी के बड़े-बड़े अस्पताल किसकी प्रॉपर्टी कहलाएंगे? सैकड़ों स्कूलों आदि का क्या होगा? सवाल नम्बर तीन : वार्ड बढ़ेंगे तो उनके इलाके छोटे हो जाएंगे। ऐसा होने से विकास कार्यों को लेकर खासा झंझट पैदा हो सकता है। उदाहरण के तौर पर प्रमुख सड़कें, स्ट्रीट लाइटें, नालियां, नालों का निर्माण, आदि कई वार्डों से गुजरेगा तो क्या अलग-अलग टेंडर होंगे, सुपरविजन कौन करेगा? सवाल नम्बर चार : एमसीडी पर करोड़ों रुपये की देनदारी है। एमसीडी की आर्थिक हालत ऐसी नहीं कि नए वार्डों के लिए नई भर्ती की जाए। सवाल नम्बर पांचवा : पांच एमसीडी बनने से दिल्ली के पांच मेयर होंगे। पांच कमिश्नर होंगे तो पांच ही स्थायी समिति के अध्यक्षों के अलावा विभिन्न समितियों के अध्यक्ष होंगे। ऐसे में नेताओं की अपनी हैसियत खासी छोटी नजर आएगी। जब तक इन सारे प्रश्नों पर गम्भीरता से विचार नहीं होता, हमें नहीं लगता कि मामले में इतनी जल्दबाजी करनी चाहिए।