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Sunday, 18 December 2011

मेरे भारत महान की एक तस्वीर यह भी है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18th December 2011
अनिल नरेन्द्र
गुरुवार को इस मौसम का दिल्ली में सबसे ठंडा दिन रहा। न्यूनतम तापमान सामान्य से तीन डिग्री कम 5.9 डिग्री सेल्सियस रहा। मौसम विभाग के मुताबिक अगले तीन-चार दिन तक पारा 5 से 6 डिग्री सेल्सियस के आसपास ही बना रहेगा लेकिन अगले सप्ताह से पारा गिरेगा और कड़ाके की ठंड पड़ेगी। 22 दिसम्बर तक राजधानी में बारिश होने की भी संभावना है। इस कड़ाके की ठंड में मैं जब सोचता हूं कि हजारों लोग आज भी फुटपाथों, सड़कों पर सोने के लिए मजबूर हैं तो मेरा मन यह प्रश्न पूछने पर मजबूर हो जाता है कि किस बात के लिए हम यह कहते नहीं थकते कि मेरा भारत महान है? एक तरफ तो कहा जाता है कि भारत दुनिया की गिनी-चुनी बढ़ती अर्थव्यवस्था का प्रतीक है और दूसरी ओर आज तक हम गरीब, बेसहारा आदमी के लिए ठीक ढंग से रैन बसेरे तक नहीं बना सके? यह संतोष की बात है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों को इन गरीबों की चिन्ता जरूर है। सुप्रीम कोर्ट के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि कड़ाके की इस ठंड में हजारों बेसहारा लोग सड़कों पर रात गुजारने को मजबूर हैं लेकिन सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे ही है। इसे चिन्ताजनक बताते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने उन 84 अस्थायी नाइट शेल्टर को दोबारा शुरू करने का आदेश दिया है जिसे 9 अगस्त के आदेश को दरकिनार कर बन्द कर दिया गया। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने मास्टर प्लान 2021 के हिसाब से भविष्य की जरूरतों को देखने के लिए 184 स्थायी नाइट शेल्टर बनाने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने भी सोमवार को इससे जुड़े मामलों में सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को सभी शहरों में नाइट शेल्टर का पर्याप्त इंतजाम करने को कहा।
दिल्ली हाई कोर्ट की फटकार खाने के बाद दिल्ली सरकार को रैन बसेरों की सुध आई है। सरकार के कर्मचारी बृहस्पतिवार देर शाम तक अस्थायी रैन बसेरों की संख्या 30 तक पहुंचाने में जुट गए। पांच और रैन बसेरे अगले तीन दिनों में बनाए जाएंगे। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मेरे भारत महान की राजधानी दिल्ली में पौने दो लाख लोग बेघर हैं। इनके लिए बड़ी संख्या में रैन बसेरों की जरूरत है। लेकिन दिल्ली सरकार के पास महज 64 रैन बसेरे हैं। अगर हम प्रति रैन बसेरे का हिसाब लगाएं तो लगभग 2735 लोग प्रति रैन बसेरे में रह सकते हैं पर इतनी संख्या होने के बावजूद सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन 64 बसेरों में से भी अधिकतर बन्द पड़े हैं। पिछले साल 84 अस्थायी रैन बसेरे बनाए गए, जिनमें 17 जल गए, 52 अस्थायी रैन बसेरों को यह तर्प देकर बन्द कर दिया गया कि बेघर लोग इसमें रहने के लिए नहीं आ रहे हैं और 15 रैन बसेरे अब भी चालू हैं। यह दुःख की बात है कि दिल्ली सरकार इन बेसहारा लोगों के प्रति इतनी असंवेदनशील है। आखिर उन्हें भी इस कड़ाके की ठंड में सुरक्षित रात बिताने का हक है। यह सरकार का काम है कि उन्हें कम से कम खुले आसमान में रात बिताने से बचाए और पर्याप्त व्यवस्था करे। सरकार को खुद भी सोचना चाहिए और इस बात का इंतजार नहीं करना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट ही फटकार लगाए तब जाकर वह यह काम करे। मेरे भारत महान का एक असली चेहरा यह भी है।
Anil Narendra, Daily Pratap, Delhi Government, Delhi High Court, India, MCD, Night Shelters, Poor, Vir Arjun

Tuesday, 8 November 2011

अब एक नहीं तीन एमसीडी होंगी


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 8th November 2011
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने आखिर अपना लोहा मनवा ही लिया। तमाम विरोधों के बावजूद दिल्ली नगर निगम को तीन भागों में विभाजित करने के लिए दिल्ली सरकार के प्रस्ताव को गृह मंत्रालय ने हरी झंडी देते हुए फाइल दिल्ली सरकार को अधिकृत रूप से भेज दी है। इस विषय पर अब मंगलवार को मुख्यमंत्री मंत्रिमंडल की बैठक बुलाकर चर्चा के बाद विशेष सत्र की तारीख तय करेंगी। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित द्वारा इस मामले में हो रही देरी को पिछले दिनों अपनी प्रतिष्ठा बना लेने व 10 जनपथ में इसकी शिकायत करने के बाद हालातों में गृह मंत्रालय तेजी से हरकत में आया और उसने किन्तु-परन्तु नजरंदाज करते हुए फाइल को संस्तुति के साथ लौटा दिया जिसमें अब निगम विभाजन का संशय ही नहीं समाप्त हो गया अपितु जो बादल बने थे वह भी छंट गए। बहुत जल्द अब दिल्ली में तीन नगर निगम (एमसीडी) होंगे। दिल्ली में अब एनडीएमसी और कैंट बोर्ड को मिलाकर कुल पांच निकाय होंगे। इस फैसले को दिल्ली सरकार की जीत माना जा रहा है, लेकिन केंद्र ने अपनी चलाते हुए निगम कमिश्नरों की नियुक्ति का अधिकार अपने पास रखा है। अभी तक कमिश्नर की नियुक्ति दिल्ली सरकार केंद्र की सलाह पर करती है। तीनों निगमों के लिए लोकल बॉडीज अथारिटी की बजाय स्थानीय निकाय निदेशालय की मंजूरी दी गई है। तीनों में 50 फीसदी महिलाएं होंगी। अलग-अलग मेयर, निगम कमिश्नर और स्थायी समिति अध्यक्ष होंगे। हर विधानसभा सीट में चार वार्ड और कुल वार्ड 272। नोडल एजेंसी दिल्ली सरकार का शहरी विकास विभाग बना रहेगा।
बेशक शीला जी एक राजनीतिक जंग जीत गई हैं पर बहुत से लोग मानते हैं कि इन प्रयासों का एक बड़ा कारण राजनीति ही रही है। सीएम को कभी यह बर्दाश्त नहीं रहा कि दिल्ली सरकार जो चाहे, एमसीडी उससे उलटा चले। आज एमसीडी में भाजपा का शासन है तो उलटी चाल समझ में आती है लेकिन यह उलटबाजी तब भी थी जब एमसीडी पर कांग्रेस का राज था। सीएम ने तभी तय कर लिया था कि एमसीडी को कई हिस्सों में बांटना है। एमसीडी के विभाजन के बाद अभी कई प्रशासनिक मुद्दे उठेंगे और परेशानी आएगी। एमसीडी की आय का एक बड़ा स्रोत प्रॉपर्टी टैक्स है और इसका सबसे बड़ा हिस्सा साउथ दिल्ली से आता है। नॉर्थ में भी रोहिणी और पीतमपुरा जैसे पॉश इलाके अब दूध देने वाली गाय की तरह हैं लेकिन यमुनापार यानि ईस्ट दिल्ली की नगर निगम को राजस्व का टोटा रहेगा। निगम के सैकड़ों ऐसे प्रोजेक्ट अब दिल्ली सरकार को पूरा करने होंगे। खास बात यह है कि एमसीडी स्टाफ की ट्रांसफर-पोस्टिंग की जिम्मेदारी भी अब सरकार के हाथ में होगी। पूरी दिल्ली का करीब 97 फीसदी एरिया दिल्ली नगर निगम के आधीन है। दिल्ली की अधिकांश सड़कें, फुटपाथ, स्ट्रीट लाइटें, छोटे-बड़े सैकड़ों पार्प और प्राइमरी स्कूल एमसीडी के पास हैं। इतना ही नहीं, सफाई की जिम्मेदारी भी उसी के पास है और कई फ्लाइओवर, फुटओवर ब्रिज भी उसके रखरखाव में हैं। एमसीडी के कर्मचारियों की संख्या करीब 1.5 लाख है और इस वित्त वर्ष का उसका बजट करीब 6943 करोड़ रुपये है। इतना कुछ होने के बाद भी आम जनता और सरकार का आरोप है कि एमसीडी ठीक से काम नहीं करती। करोड़ों रुपये का बजट कहां चला जाता है, इसकी किसी को परवाह नहीं है और एमसीडी की अधिकतर सड़कें टूटी क्यों रहती हैं? एमसीडी में भ्रष्टाचार व्याप्त है। क्या दिल्ली सरकार अब एमसीडी को तीन हिस्सों में बांटकर यह सुनिश्चित करेगी कि दिल्ली की जनता को राहत मिलेगी और एमसीडी की कारगुजारी में सुधार होगा। अगर ऐसा होता है तभी इसे एक प्रभावी कदम माना जाएगा नहीं तो इसे एक राजनीतिक चाल ही मानी जाएगी।
Anil Narendra, Daily Pratap, Delhi Government, MCD, Sheila Dikshit, Vir Arjun

Friday, 2 September 2011

15 सितम्बर से दिल्ली में सिटीजन चार्टर लागू होने जा रहा है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 3rd September 2011
अनिल नरेन्द्र
देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करने वाले गांधीवादी अन्ना हजारे काआंदोलन रंग लाने लगा है। दिल्ली की शीला दीक्षित की सरकार ने दिल्ली में सिटीजन चार्टर को 15 सितम्बर से लागू करने की घोषणा कर दी है। इस तरह दिल्ली पहला राज्य होगा जहां सिटीजन चार्टर लागू होगा। अगर यह सिटीजन चार्टर सही से लागू होता है तो दिल्ली वालों को रोजमर्रा आ रही समस्याओं में कमी जरूर आएगी। छोटे-छोटे काम पर महत्वपूर्ण कामों में जो भ्रष्टाचार चलता है उस पर अंकुश जरूर लगेगा। दिल्ली वालों को राशन कार्ड, बर्थ व डेथ सर्टिफिकेट, राजस्व विभाग से जुड़े सर्टिफिकेट तय समय पर मिलेंगे।
संबंधित विभागों को तयशुदा समय पर यह काम करना होगा। ऐसा न किए जाने पर अधिकारी पर जुर्माना हो सकता है। सीएम शीला दीक्षित का कहना है कि 15सितम्बर से इस कानून को कड़ाई से लागू किया जा रहा है। दिल्ली सरकार ने 28 मार्च को दिल्ली नागरिक विधेयक 2011 नोटिफाई किया था। इस विधेयक से जुड़े सारे नियम बना लिए गए हैं। वैसे तो सरकार के विभिन्न विभागों ने कई सर्टिफिकेट, लाइसेंस, आदि देने के लिए समयसीमा तय कर रखी है। यह नियम सरकार के अलावा नई दिल्ली नगर पालिका, दिल्ली नगर निगम पर भी लागू होगा।
लेकिन इनका लाभ लोगों को इसलिए नहीं मिल पा रहा क्योंकि इस काम को करने वाले अधिकारी के खिलाफ कोई एक्शन का प्रावधान नहीं है। नए कानून के बन जाने से संबद्ध विभाग के अधिकारी को तय सीमा में काम करना होगा वरना उस पर जुर्माना होगा।
नए कानून के अनुसार अगर किसी व्यक्ति को रेवेन्यू विभाग, आदि से कोई सर्टिफिकेट लेना है तो वह आवेदन करेगा। अगर समयसीमा के भीतर सर्टिफिकेट नहीं मिला तो अधिकारी से शिकायत करेगा। शिकायत सही पाए जाने पर उस विभाग के सर्टिफिकेट बनाने वाले अधिकारी पर जुर्माना लगाया जाएगा। जुर्माने से बचने के लिए अधिकारी तय समय में सर्टिफिकेट बनाने की कोशिश करेगा। अगर सर्टिफिकेट बनाने में कोई तकनीकी पेंच है तो सक्षम अधिकारी उसकी जांच करेगा। लेकिन सब कुछ सही पाए जाने के बाद सर्टिफिकेट नहीं बना तो संबद्ध
अधिकारी की यह अक्षमता उसकी एसीआर (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) में भी दर्ज करा दी जाएगी, जिससे उसका प्रमोशन और इंक्रीमेंट प्रभावित होगी। विभाग का कहना है कि हम सारा काम ऑनलाइन से भी करने का प्रयास कर रहे हैं। शिकायत भी ऑनलाइन की जा सकेगी और बाद में सर्टिफिकेट भी ऑनलाइन लिया जा सकेगा।
इन सेवाओं में एपीएल, बीपीएल, अंत्योदय के राशन कार्डों को बनवाना व नवीनीकरण, एससी, एसटी व ओबीसी सर्टिफिकेट बनाना, रिहायशी प्रमाण-पत्र बनाना, लर्निंग लाइसेंस बनाना, व्हीकल रजिस्ट्रेशन, जन्म एवं मृत्यु प्रमाण पत्र बनाने के अलावा अन्य सभी आवश्यक व प्रमुख सर्विस शामिल हैं।
अगर तय समयसीमा में काम नहीं होता तो संबंधित दोषी कर्मचारी पर 10 रुपये से 200 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा। हम समझते हैं कि ऐसा सिटीजन चार्टर जहां तक हो सके सभी सेवाओं पर लागू किया जाना चाहिए। लेकिन शिकायत और अपील के सिस्टम पर खास गौर किए जाने की जरूरत है, क्योंकि मामले कहीं भी लटक सकते हैं। 10 रुपये का जुर्माना भी आज के जमाने में काफी कम है।
बेशक अन्ना हजारे की एक मांग पूरी हो गई है पर देखना यह है कि इसकी इंप्लीमेंटेशन कैसा होता है? कानून तो अपनी जगह ठीक है पर अगर उसको सही से इंप्लीमेंट नहीं किया गया तो नतीजा फिर वही सिफर होगा।

Thursday, 14 April 2011

अन्ना के जन लोकपाल विधेयक का विरोध शुरू हो चुका है


प्रकाशित: 14 अप्रैल 2011
अनिल नरेन्द्र

पस्तावित जन लोकपाल बिल का शांत विरोध आरम्भ हो चुका है। राजनेता अब कुछ बातें खुलकर कहने लगे हैं। वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने जन लोकपाल बिल का सीधा विरोध तो नहीं किया पर उन्होंने अपने ब्लॉग में लिखा है कि अन्ना हजारे की भूख हड़ताल ने चार दिन में उससे ज्यादा हासिल किया जो विपक्ष ने दो महीने की मांग के बाद पाया? श्री अडवाणी ने लोकपाल विधेयक को और पभावी बनाने के लिए अभियान चलाने के लिए अन्ना हजारे की पशंसा की लेकिन साथ ही उन लोगों की आलोचना की थी जिन्होंने राजनीति या राजनेताओं के खिलाफ घृणा का माहौल बनाया और कहा कि यह लोकतंत्र के खिलाफ है। उधर पंजाब के मुख्यमंत्री पकाश सिंह बादल ने तो खुलकर कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल या लोकपाल बिल लाने से कुछ नहीं होने वाला। इसके लिए सख्त कानून बनाए जाने की जरूरत है। हमारी पार्टी हो या कोई और पार्टी हो चुनाव में सभी काला धन इस्तेमाल करते हैं। अमेरिका की तरह यहां भी एक निश्चित राशि से अधिक धन रखने वालों पर कानूनी पतिबंध लगा देना चाहिए। अमेरिका में 10 हजार डॉलर से अधिक कैश नहीं रख सकते हैं। देश की जीडीपी के बराबर काला धन मौजूद है और यह केवल तीन पतिशत लोगों के पास है। लोकपाल बिल से कुछ नहीं होने वाला चाहे जिसने भूख हड़ताल रखी हो, उसे ही लोकपाल बना दिया जाए।
केन्द्राrय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने कह दिया कि लोकपाल बिल से आम आदमी की गरीबी, बिजली और शिक्षा जैसे, मूलभूत समस्याएं खत्म नहीं होने वाली क्योंकि इसका सीधा वास्ता भ्रष्टाचार से जुड़े मामले निपटाने का है। सिब्बल के इस बयान पर एतराज जताते हुए अन्ना ने कहा कि अगर केन्द्राrय मंत्री कपिल सिब्बल को लगता है कि लोकपाल विधेयक से कोई फायदा नहीं होगा तो उन्हें मसौदा समिति से इस्तीफा दे देना चाहिए। वह क्यों हमारा और अपना वक्त बर्बाद कर रहे हैं। अन्ना के पलटवार पर सिब्बल भी सकपका गए। उन्होंने तुरंत डैमेज कंट्रोल करते हुए कहा कि वह अन्ना के साथ हैं और उनके साथ मिलकर एक ऐसा विधेयक बनाना चाहते हैं जो भ्रष्टाचार से लड़ने में सक्षम हो। वहीं सलमान खुर्शीद ने भ्रष्टाचार से लड़ने में सक्षम होने के लोकपाल बिल के सवाल पर कहा कि भगवान के मौजूद होने से भी सभी बुराइयां नहीं मरतीं। हमें तब भी अपने बच्चों को अच्छी बातें बतानी पड़ती हैं और मंदिर बनवाकर पूजा करनी पड़ती है। भाजपा पवक्ता तरुण विजय ने ट्विटर पर लिखा ः अन्ना ने पिता और पुत्र की जोड़ी को स्वीकार किया है। माओवाद समर्थक को भी शामिल किया है। उन्होंने लिखा है कि विपक्ष को समिति में जगह नहीं दिया जाना अन्ना के लोकतात्रिक आंदोलन के लिए अच्छा नहीं है। हालांकि विजय बाद में अपनी बात से पलट गए पर उन्होंने अपना विरोध तो जता दिया।
कांग्रेस पार्टी में ऐसे नेताओं की भी कमी नहीं जो अन्ना के सामने झुकने को कतई उचित नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि यह तो सरकार ने एक नया रास्ता खोल दिया है। अब हर कोई सरकार की इसी तरह ब्लैकमेल करने की कोशिश करेगा जैसा कि अन्ना और उनके मुट्ठीभर समर्थकों ने किया है यानि कांग्रेस के भीतर जितने मुंह उतनी बातें। हर कोई दूसरों को दोष दे रहा है तथा अपनी बात सही बता रहा है। अन्ना से मिली हार से न केवल पार्टी का आत्मविश्वास डगमगा गया है बल्कि उसके नेताओं के बीच आपसी तालमेल भी बिगड़ता नजर आ रहा है।

Wednesday, 13 April 2011

एमसीडी के बंटवारे का सोच-समझकर ही फैसला करें


प्रकाशित: 13 अप्रैल 2011

-अनिल नरेन्द्र

दिल्ली सरकार के मंत्रिमंडल ने भले ही एमसीडी के बंटवारे पर अपनी मुहर लगा दी है, लेकिन इस फैसले का चौतरफा विरोध जारी है। यहां तक कि कांग्रेसी पार्षद भी इसका जमकर विरोध कर रहे हैं। गत शुक्रवार को एमसीडी सदन में प्रतिपक्ष के नेता जयकिशन शर्मा की अगुवाई में पार्षदों ने पार्टी आलाकमान सोनिया गांधी से मुलाकात की। मुलाकात के लिए पहुंचे पार्षदों में जयकिशन शर्मा के अलावा अनीता बब्बर, मुकेश गोयल, सतबीर शर्मा, अनिल माथुर, रेणुका गुप्ता, पन्नालाल खेरवाल, हेमचन्द गोयल, विष्णु अग्रवाल, महमूद जिया और राकेश जोशी शामिल थे। पार्षदों ने सोनिया गांधी को बताया कि एमसीडी के पांच हिस्से होने पर वार्डों की संख्या 272 से बढ़कर 408 हो जाएगी। इससे नगर निगम कमजोर होगा और एक पार्षद की स्थिति आरडब्ल्यूए के पदाधिकारियों जैसी हो जाएगी। पार्षदों की चिन्ता यह भी है कि नई व्यवस्था लागू होने के बाद चुनाव में पार्टी को नुकसान होगा। 2007 में चुनाव से पहले वार्डों की संख्या 134 से बढ़कर 272 किए जाने का परिणाम सामने आ चुका है। इसमें कांग्रेस को सीधा नुकसान हुआ था और पार्षदों की संख्या घट गई थी। कांग्रेस शासित दिल्ली सरकार ने एमसीडी के बंटवारे का फैसला लिया है, लेकिन खुद पार्टी के पार्षद ही इस फैसले का जोरशोर से विरोध जता रहे हैं। इस मतभेद ने भाजपा के विरोध को बल दे दिया है। भाजपा नेताओं और पार्षदों का कहना है कि दिल्ली सरकार के जिस फैसले से खुद कांग्रेसी पार्षद सहमत नहीं हैं उसे जनता के हित में करार देना उचित नहीं है।

बंटवारे पर राजधानी के राजनीतिक गलियारों के अलवा एमसीडी की कार्यप्रणाली से जुड़े कुछ अहम सवाल भी आते हैं। इनका समाधान किए बिना निगम का बंटवारा कितना सफल होगा, इसमें भारी संदेह है? पहला सवाल : कैसे बांटा जाएगा राजस्व? एमसीडी को अपना राजस्व प्रॉपर्टी टैक्स, विज्ञापन, पार्किंग और टोल टैक्स, आदि से मिलता है। पहले यह बजट समान रूप से पूरी दिल्ली पर खर्च किया जाता था। पांच भागों में बंटने पर जहां गांव, अनाधिकृत कॉलोनियां, झुग्गी बस्ती और अनाधिकृत नियमित कॉलोनियां हैं, वहां पर प्रॉपर्टी टैक्स, विज्ञापन, आदि से बहुत कम राजस्व मिलेगा। असंतुलन को मिटाने में खासी दिक्कतें आ सकती हैं। दूसरा सवाल ः प्रॉपर्टी विभाजन कैसे होगा? कुछ इलाकों में एमसीडी की प्रॉपर्टी बहुत ज्यादा है और कुछ में बहुत कम। मध्य दिल्ली में एमसीडी का पुराना मुख्यालय है ही, नया मुख्यालय सिविक सेंटर भी है। यमुना पार में करोड़ों रुपये की लागत से बना बूचड़खाना है तो कई इलाकों में जोनल कार्यालयों में बड़ी-बड़ी इमारतें हैं। एमसीडी के बड़े-बड़े अस्पताल किसकी प्रॉपर्टी कहलाएंगे? सैकड़ों स्कूलों आदि का क्या होगा? सवाल नम्बर तीन : वार्ड बढ़ेंगे तो उनके इलाके छोटे हो जाएंगे। ऐसा होने से विकास कार्यों को लेकर खासा झंझट पैदा हो सकता है। उदाहरण के तौर पर प्रमुख सड़कें, स्ट्रीट लाइटें, नालियां, नालों का निर्माण, आदि कई वार्डों से गुजरेगा तो क्या अलग-अलग टेंडर होंगे, सुपरविजन कौन करेगा? सवाल नम्बर चार : एमसीडी पर करोड़ों रुपये की देनदारी है। एमसीडी की आर्थिक हालत ऐसी नहीं कि नए वार्डों के लिए नई भर्ती की जाए। सवाल नम्बर पांचवा : पांच एमसीडी बनने से दिल्ली के पांच मेयर होंगे। पांच कमिश्नर होंगे तो पांच ही स्थायी समिति के अध्यक्षों के अलावा विभिन्न समितियों के अध्यक्ष होंगे। ऐसे में नेताओं की अपनी हैसियत खासी छोटी नजर आएगी। जब तक इन सारे प्रश्नों पर गम्भीरता से विचार नहीं होता, हमें नहीं लगता कि मामले में इतनी जल्दबाजी करनी चाहिए।