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Saturday, 21 April 2012

अकेली शीला दीक्षित हार की जिम्मेदार नहीं हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21 April 2012
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली नगर निगम चुनाव में कांग्रेस की हार का जिम्मेदार कौन है? वैसे कांग्रेस में पोस्टमार्टम करने की प्रथा नहीं और हार के बाद शायद ही किसी को जिम्मेदार माना जाता है। हमारे सामने उत्तर प्रदेश, पंजाब के विधानसभा परिणाम हैं। इतने दिन बीतने के बाद भी बैठकें हो रही हैं पर हार की जिम्मेदारी तय नहीं हो पा रही है। दिल्ली में अकेले मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को जिम्मेदार मानना सही नहीं है। बेशक दिल्ली नगर निगम को तीन हिस्सों में बांटना शीला जी का आइडिया था और इस हद तक हार के लिए वह जिम्मेदार हो सकती हैं पर दिल्ली से तमाम कांग्रेसी सांसद, दिल्ली सरकार के मंत्री व विधायक भी कम जिम्मेदार नहीं। पहले बात करते हैं सांसदों की। सबसे ज्यादा खराब हालत नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की रही जहां केंद्रीय मंत्री अजय माकन की पसंद से टिकट बांटी गई। इस क्षेत्र में 32 वार्ड हैं और कांग्रेस को सिर्प सात वार्डों पर जीत मिल सकी। यहां से कांग्रेस के तीन बागी जीतने में सफल रहे। बीजेपी ने यहां सबसे ज्यादा 22 सीटों पर परचम फहराया। वेस्ट दिल्ली के सांसद महाबल मिश्र के इलाके में कांग्रेस की टिकटों के लिए घमासान हुआ और नतीजा यह निकला कि 10 सीटें ही कांग्रेस को मिल सकीं। बीजेपी 19 पर जीती। बीएसपी एक और आरएलडी दो सीटों पर काबिज हुई। कई दागी जीत गए। केंद्रीय मंत्री कृष्णा तीरथ को टिकटों के वितरण के दौरान अपने विधायकों का विरोध सहना पड़ा और कांग्रेस ने उनके इलाके में भी खराब प्रदर्शन किया। यहां कांग्रेस 11 सीटें ही जीत पाई। बीएसपी को सबसे ज्यादा छह सीटों पर सफलता मिली। प्रदेशाध्यक्ष और नॉर्थ ईस्ट दिल्ली से सांसद जयप्रकाश अग्रवाल को फ्रीहैंड मिला लेकिन उनकी स्थिति भी काफी विकट रही। वह 12 उम्मीदवारों को ही जिता सके। कांग्रेस के हैवीवेट मंत्री कपिल सिब्बल चांदनी चौक से हल्के ही साबित हुए। यहां कांग्रेस को 14 सीटें मिलीं। बीजेपी को 21 सीटें मिली जबकि शोएब इकबाल आरएलडी टिकट पर तीन सीटें जिता पाए। बीएसपी को एक और एक निर्दलीय को जीत मिली। हालांकि सीएम के बेटे संदीप दीक्षित भी आधे नम्बरों से भी पास नहीं हो सके और 15 सीटें ही जिता सके लेकिन बाकी सांसदों से इनका प्रदर्शन बेहतर रहा। बीजेपी ने ईस्ट दिल्ली से 18 सीटें जीती यानी कांग्रेस से सिर्प तीन ज्यादा पर तीन बागियों ने खेल बिगाड़ दिया। अब बात करते हैं दिल्ली सरकार में कांग्रेसी मंत्रियों की। सभी छह मंत्रियों की परफार्मेंस खराब रही। सबसे बुरा हाल सरकार के वरिष्ठ मंत्री डॉ. एके वालिया का रहा। उनकी विधानसभा लक्ष्मी नगर में चारों वार्डों किशन पुंज, लक्ष्मी नगर, शकरपुर व पांडव नगर में कांग्रेस हार गई। सरकार के दूसरे मंत्री हारुन यूसुफ भी अपनी विधानसभा बल्लीमारान के तीन वार्डों में पार्टी प्रत्याशी को जिता नहीं पाए। उनके वार्ड बल्लीमारान, राम नगर, कसाबपुरा में पार्टी प्रत्याशी हार गए जबकि एकमात्र वार्ड ईदगाह रोड में पार्टी लाज बचा पाई। रमाकान्त गोस्वामी की राजेन्द्र नगर विधानसभा में तीन वार्ड राजेन्द्र नगर, इन्द्रपुरी, नारायणा में पार्टी प्रत्याशी हार गए जबकि पूसा वार्ड में ही कांग्रेस जीती। यही हाल समाज कल्याण मंत्री प्रो. किरण वालिया का रहा है। उनकी विधानसभा मालवीय नगर के तीन वार्ड मालवीय नगर, सफदरजंग एन्क्लेव, हौजखास में कांग्रेस प्रत्याशी को हार मिली जबकि एक सीट विलेज हौजरानी में पार्टी अपनी जीत दर्ज कर सकी। राजकुमार चौहान का बहरहाल रिकॉर्ड बराबरी पर छूटा। उनकी विधानसभा मंगोलपुरी के चार वार्ड में से दो मंगोलपुरी ईस्ट और मंगोलपुरी में पार्टी प्रत्याशी जीते हैं जबकि रोहिणी साउथ व मंगोलपुरी वेस्ट में हार गए। हार-जीत के रिकॉर्ड में मंत्री अरविन्दर सिंह लवली का रिकॉर्ड बेहतर माना जा सकता है। उनके विधानसभा गांधी नगर के चार में से तीन वार्ड, धर्मपुरा, गांधी नगर और रघुबरपुरा में पार्टी प्रत्याशी जीते जबकि आजाद नगर में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है। इसी तरह यमुना पार विकास बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. नरेन्द्र नाथ अपने चारों वार्ड हार गए हैं तो दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष डॉ. योगानन्द शास्त्राr चार में से दो और वरिष्ठ विधायक मुकेश शर्मा के तीन वार्डों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है। दूसरी ओर बीजेपी के वरिष्ठ विधायकों की परफार्मेंस ठीक मानी जा सकती है। प्रतिपक्ष के नेता प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा तीन, जगदीश मुखी दो और डॉ. हर्ष वर्धन के दो वार्डों में बीजेपी प्रत्याशियों ने फतह हासिल की। इसलिए अकेले शीला दीक्षित को जिम्मेदार ठहराना गलत है। इस हमाम में तो सभी नंगे हैं। विधानसभा चुनाव डेढ़ साल बाद होने हैं। अगर कांग्रेसी सांसदों, मंत्रियों और विधायकों का यही हाल रहा तो अंजाम भुगतने के लिए कांग्रेस आला कमान को तैयार रहना होगा।
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Tuesday, 8 November 2011

अब एक नहीं तीन एमसीडी होंगी


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 8th November 2011
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने आखिर अपना लोहा मनवा ही लिया। तमाम विरोधों के बावजूद दिल्ली नगर निगम को तीन भागों में विभाजित करने के लिए दिल्ली सरकार के प्रस्ताव को गृह मंत्रालय ने हरी झंडी देते हुए फाइल दिल्ली सरकार को अधिकृत रूप से भेज दी है। इस विषय पर अब मंगलवार को मुख्यमंत्री मंत्रिमंडल की बैठक बुलाकर चर्चा के बाद विशेष सत्र की तारीख तय करेंगी। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित द्वारा इस मामले में हो रही देरी को पिछले दिनों अपनी प्रतिष्ठा बना लेने व 10 जनपथ में इसकी शिकायत करने के बाद हालातों में गृह मंत्रालय तेजी से हरकत में आया और उसने किन्तु-परन्तु नजरंदाज करते हुए फाइल को संस्तुति के साथ लौटा दिया जिसमें अब निगम विभाजन का संशय ही नहीं समाप्त हो गया अपितु जो बादल बने थे वह भी छंट गए। बहुत जल्द अब दिल्ली में तीन नगर निगम (एमसीडी) होंगे। दिल्ली में अब एनडीएमसी और कैंट बोर्ड को मिलाकर कुल पांच निकाय होंगे। इस फैसले को दिल्ली सरकार की जीत माना जा रहा है, लेकिन केंद्र ने अपनी चलाते हुए निगम कमिश्नरों की नियुक्ति का अधिकार अपने पास रखा है। अभी तक कमिश्नर की नियुक्ति दिल्ली सरकार केंद्र की सलाह पर करती है। तीनों निगमों के लिए लोकल बॉडीज अथारिटी की बजाय स्थानीय निकाय निदेशालय की मंजूरी दी गई है। तीनों में 50 फीसदी महिलाएं होंगी। अलग-अलग मेयर, निगम कमिश्नर और स्थायी समिति अध्यक्ष होंगे। हर विधानसभा सीट में चार वार्ड और कुल वार्ड 272। नोडल एजेंसी दिल्ली सरकार का शहरी विकास विभाग बना रहेगा।
बेशक शीला जी एक राजनीतिक जंग जीत गई हैं पर बहुत से लोग मानते हैं कि इन प्रयासों का एक बड़ा कारण राजनीति ही रही है। सीएम को कभी यह बर्दाश्त नहीं रहा कि दिल्ली सरकार जो चाहे, एमसीडी उससे उलटा चले। आज एमसीडी में भाजपा का शासन है तो उलटी चाल समझ में आती है लेकिन यह उलटबाजी तब भी थी जब एमसीडी पर कांग्रेस का राज था। सीएम ने तभी तय कर लिया था कि एमसीडी को कई हिस्सों में बांटना है। एमसीडी के विभाजन के बाद अभी कई प्रशासनिक मुद्दे उठेंगे और परेशानी आएगी। एमसीडी की आय का एक बड़ा स्रोत प्रॉपर्टी टैक्स है और इसका सबसे बड़ा हिस्सा साउथ दिल्ली से आता है। नॉर्थ में भी रोहिणी और पीतमपुरा जैसे पॉश इलाके अब दूध देने वाली गाय की तरह हैं लेकिन यमुनापार यानि ईस्ट दिल्ली की नगर निगम को राजस्व का टोटा रहेगा। निगम के सैकड़ों ऐसे प्रोजेक्ट अब दिल्ली सरकार को पूरा करने होंगे। खास बात यह है कि एमसीडी स्टाफ की ट्रांसफर-पोस्टिंग की जिम्मेदारी भी अब सरकार के हाथ में होगी। पूरी दिल्ली का करीब 97 फीसदी एरिया दिल्ली नगर निगम के आधीन है। दिल्ली की अधिकांश सड़कें, फुटपाथ, स्ट्रीट लाइटें, छोटे-बड़े सैकड़ों पार्प और प्राइमरी स्कूल एमसीडी के पास हैं। इतना ही नहीं, सफाई की जिम्मेदारी भी उसी के पास है और कई फ्लाइओवर, फुटओवर ब्रिज भी उसके रखरखाव में हैं। एमसीडी के कर्मचारियों की संख्या करीब 1.5 लाख है और इस वित्त वर्ष का उसका बजट करीब 6943 करोड़ रुपये है। इतना कुछ होने के बाद भी आम जनता और सरकार का आरोप है कि एमसीडी ठीक से काम नहीं करती। करोड़ों रुपये का बजट कहां चला जाता है, इसकी किसी को परवाह नहीं है और एमसीडी की अधिकतर सड़कें टूटी क्यों रहती हैं? एमसीडी में भ्रष्टाचार व्याप्त है। क्या दिल्ली सरकार अब एमसीडी को तीन हिस्सों में बांटकर यह सुनिश्चित करेगी कि दिल्ली की जनता को राहत मिलेगी और एमसीडी की कारगुजारी में सुधार होगा। अगर ऐसा होता है तभी इसे एक प्रभावी कदम माना जाएगा नहीं तो इसे एक राजनीतिक चाल ही मानी जाएगी।
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Thursday, 20 October 2011

सत्ता परिवर्तन की आंधी क्या कांगेस थाम सकेगी?



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th October 2011
अनिल नरेन्द्र
हिसार लोकसभा उपचुनाव के कांग्रेस के लिए दूरगामी पभाव हो सकते हैं। दोनों टीम अन्ना और विपक्षी दलों के हौंसले बुलंद हैं। हरियाणा के हिसार संसदीय क्षेत्र सहित जिन पांच राज्यों की विधानसभा सीटों के लिए 13 अक्तूबर को उपचुनाव हुए उनमें से चार के परिणाम कांग्रेस के विरुद्ध गए। यही नहीं हिसार में कांग्रेस उम्मीदवार की तो जमानत भी जब्त हो गई है। इनमें आंध्र पदेश, महाराष्ट्र और बिहार भी शामिल थे। हिसार संसदीय क्षेत्र को कांग्रेस ने अपनी पतिष्ठा बना लिया था। अन्ना की अपील को पंचर करने के लिए कांग्रेस ने अपनी पूरी तरकत लगा दी थी। अपने उम्मीदवार जयपकाश की साख बचाने के लिए पार्टी ने पैसा पानी की तरह बहाया। अगल-बगल के तीन मुख्यमंत्रियों, हरियाणा के सभी मंत्रियों और दिल्ली से स्टार पचारकों को हिसार भेजा गया। राजस्थान से अशोक गहलोत गए। दिल्ली से शीला दीक्षित गईं, स्वयं हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा तो वहीं डेरा डाले रहे। सारी पशासनिक मशीनरी का इस्तेमाल किया, प्लाट बांटे गए, वजीफे वितरित किए गए। मुख्यालय से कई महासचिवों ने हिसार में रणनीति बनाई, स्टार पचारक राज बब्बर ने खुद सभाएं की। सबका नतीजा रहा सिफर। जयपकाश अपनी जमानत भी नहीं बचा सके। महाराष्ट्र की खड़कवासला विधानसभा सीट के लिए कांग्रेस ने संयुक्त पत्याशी उतारा। दिवंगत रमेश वनजाले की विधवा हर्षदा वनजाले को टिकट दिया ताकि उन्हें सहानुभूति लहर का फायदा मिल सके पर भाजपा उम्मीदवार भीमराव ने कांग्रेस और राकांपा के संयुक्त उम्मीदवार को चारों खाने चित्त कर दिया। राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के विधायक रमेश वनजाले के निधन से खाली हुई सीट पर वनजाले की पत्नी हर्षदा को को एनसीपी का उम्मीदवार केंद्रीय मंत्री शरद पवार की खास हिदायत के बाद बनाया गया था और उनके भतीजे व राज्य के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने हर्षदा के पक्ष में चुनाव पचार करने के लिए दिन-रात एक कर दिया था। मनसे द्वारा खड़कवासला सीट पर अपना उम्मीदवार घोषित न किए जाने और कांग्रेस-एनसीपी के उम्मीदवार का समर्थन कर दिए जाने के बाद यह सीट सत्ताधारी गठबंधन के लिए कसौटी बन गया था। शरद पवार और उनके भतीजे अजीत पवार की अपने ही गढ़ में हुई इस हार का महाराष्ट्र की राजनीति पर गहरा असर पड़ सकता है वहीं पहले से बने भाजपा-शिवसेना के भगवा गठबंधन में आरपीआई के भी जुड़ जाने से राज्य की सियासत में खड़कवासला सीट के परिणाम आने वाले दिनों की चुनावी बयार का पहला बड़ा संकेत बनकर सामने आए हैं। अन्ना की कांग्रेस हटाओ अपील से हिसार में बदलाव की आंधी जो उठी है यह वैसी ही है जैसी 1974 में जबलपुर और 1989 में इलाहाबाद उपचुनाव से उठी थी। हिसार का नतीजा भ्रष्टाचारी राज के अंत की कहीं शुरुआत तो नहीं? अब बदलाव का यह सिलसिला अगर उत्तर पदेश में उन चार राज्यों में भी जारी रहता है जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं तो यह कांग्रेस के लिए भारी चिंता का विषय बन जाता है। 1989 में इतिहास ने इलाहाबाद के उपचुनाव में सत्ता परिवर्तन की काल विश्वनाथ पताप सिंह ने बोफोर्स घोटाले के बाद दी थी, विपक्ष वीपी सिंह के पीछे एकजुट था। उपचुनाव में कांग्रेस की जमानत जब्त हुई थी। इस उपचुनाव से उठी कांग्रेस विरोधी हवा को तत्कालीन पधानमंत्री राजीव गांधी थाम नहीं सके। आज तो राजीव जी के मुकाबले एक बहुत कमजोर पधानमंत्री है और रहा सवाल घोटालों का तो पूछिए मत। कांग्रेस खुशफहमी पाल सकती है कि आम चुनाव अभी दूर है, तब तक घर संभाल लिया जाएगा पर साख खो चुकी सरकार को हिसार का जनादेश चारों ओर से घेरेगा। यह जनादेश विपक्षी बिखराव को रोकेगा। हिसार 1974 और 1989 की तरह विपक्षी एकता की धुरी भी बन सकता है। कांग्रेस अगर अब भी नहीं चेती तो उसे भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
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Sunday, 7 August 2011

सोनिया की गैर हाजिरी में पार्टी और सरकार


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th August 2011
अनिल नरेन्द्र
पिछले कुछ वर्षों से जब से श्रीमती सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी सम्भाली है, यह पहला मौका है जब वह इतने समय तक पार्टी गतिविधियों से दूर रहेंगी। सोनिया जी का अमेरिका के स्लोन कैटरिंग कैंसर मैमोरियल में एक ऑपरेशन हुआ है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार ऑपरेशन सफल रहा और वह आईसीयू में हैं। ऐसा लगता है कि सोनिया जी को अस्पताल दो-तीन सप्ताह रहना पड़ सकता है और फिर अगर डाक्टरों ने इजाजत दी तो वह स्वदेश लौट आएंगी पर लौटने के बाद भी उन्हें कम से कम एक महीना आराम करना पड़ सकता है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि आने वाले कुछ दिनों में कांग्रेस पार्टी को सोनिया की सलाह से वंचित रहना पड़ सकता है। जाने से पहले सोनिया ने चार सदस्यीय समिति बनाई है जो पार्टी कामकाज देखेगी। राहुल गांधी, अहमद पटेल, एके एंथनी और जनार्दन द्विवेदी है इस टीम के सदस्य। इस चयन पर भी बहस छिड़ गई है। कुछ नेताओं के मुंह जरूर लटके हुए हैं कि मैडम ने यह जिम्मेदारी उन्हें क्यों नहीं सौंपी। प्रणब मुखर्जी जो पार्टी और सरकार दोनों के संकटमोचक हैं, का नाम न होना आश्चर्य की बात है। वैसे तो पार्टी या सरकार को कोई भी समस्या हो प्रणब दा ही उसे सुलझाते हैं। प्रधानमंत्री भी इसमें शामिल नहीं हैं और न ही पी. चिदम्बरम, दिग्विजय सिंह। इसका एक कारण यह हो सकता है कि सोनिया ने पार्टी और सरकार का कामकाज चलाने में फर्प किया हो। प्रधानमंत्री, चिदम्बरम, कपिल सिब्बल सरकार का काम चला रहे हैं तो अहमद पटेल, जनार्दन द्विवेदी पार्टी चलाएंगे। राहुल गांधी दोनों में ही कॉमन होंगे। यही हाल एके एंटनी का भी है। यह पहली बार है कि जब राहुल गांधी को इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है। कुछ लोग इसे उनकी ताजपोशी की शुरुआत भी मान रहे हैं यानि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का उल्टा काउंटडाउन। देर सबेर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री तो बनना ही है इसलिए सोनिया गांधी चाहेंगी कि अब यह काम जल्द से जल्द हो जाए। आगामी एक-दो महीने भारत की राजनीति में महत्वपूर्ण हैं। सरकार संकट के समय से गुजर रही है। हर रोज कोई न कोई नई समस्या खड़ी हो जाती है। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित समेत कई ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें सोनिया के लौटने तक टालना शायद आसान नहीं होगा। अगर किसी भी बड़ी समस्या पर फैसला लेना पड़े तो अंतिम निर्णय कौन लेगा? राहुल गांधी? हम प्रार्थना करते हैं कि सोनिया जी जल्द बिल्कुल ठीकठाक होकर घर लौटें पर बीमारी-मजारी का कुछ कहा नहीं जा सकता। अभी तो यह भी सार्वजनिक तौर पर पता नहीं कि उन्हें बीमारी क्या है और किस बात का ऑपरेशन हुआ है। सारी अटकलें अस्पताल के नाम से लगाई जा रही हैं पर इतना जरूर है कि बीमारी गम्भीर है, नहीं तो सोनिया इतने दिन बाहर रहने पर कभी राजी नहीं होतीं। जरूर ऐसी कोई मजबूरी रही होगी जो भारत के अस्पतालों, डाक्टरों को नहीं चुना गया और अमेरिका जाना पड़ा। सोनिया जी को लम्बे समय तक आराम की जरूरत होगी। इसलिए पार्टी को भी दूरगामी रणनीति उसी हिसाब से तय करनी चाहिए। पार्टी और सरकार में समन्वय जरूरी है, खासतौर पर इस संकट के समय। देखना यह होगा कि सोनिया की गैर हाजिरी में यह समन्वय कैसा बैठता है? हम सोनिया जी की स्पीडी रिकवरी की आशा करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि भगवान सब ठीकठाक करें।

Wednesday, 13 April 2011

एमसीडी के बंटवारे का सोच-समझकर ही फैसला करें


प्रकाशित: 13 अप्रैल 2011

-अनिल नरेन्द्र

दिल्ली सरकार के मंत्रिमंडल ने भले ही एमसीडी के बंटवारे पर अपनी मुहर लगा दी है, लेकिन इस फैसले का चौतरफा विरोध जारी है। यहां तक कि कांग्रेसी पार्षद भी इसका जमकर विरोध कर रहे हैं। गत शुक्रवार को एमसीडी सदन में प्रतिपक्ष के नेता जयकिशन शर्मा की अगुवाई में पार्षदों ने पार्टी आलाकमान सोनिया गांधी से मुलाकात की। मुलाकात के लिए पहुंचे पार्षदों में जयकिशन शर्मा के अलावा अनीता बब्बर, मुकेश गोयल, सतबीर शर्मा, अनिल माथुर, रेणुका गुप्ता, पन्नालाल खेरवाल, हेमचन्द गोयल, विष्णु अग्रवाल, महमूद जिया और राकेश जोशी शामिल थे। पार्षदों ने सोनिया गांधी को बताया कि एमसीडी के पांच हिस्से होने पर वार्डों की संख्या 272 से बढ़कर 408 हो जाएगी। इससे नगर निगम कमजोर होगा और एक पार्षद की स्थिति आरडब्ल्यूए के पदाधिकारियों जैसी हो जाएगी। पार्षदों की चिन्ता यह भी है कि नई व्यवस्था लागू होने के बाद चुनाव में पार्टी को नुकसान होगा। 2007 में चुनाव से पहले वार्डों की संख्या 134 से बढ़कर 272 किए जाने का परिणाम सामने आ चुका है। इसमें कांग्रेस को सीधा नुकसान हुआ था और पार्षदों की संख्या घट गई थी। कांग्रेस शासित दिल्ली सरकार ने एमसीडी के बंटवारे का फैसला लिया है, लेकिन खुद पार्टी के पार्षद ही इस फैसले का जोरशोर से विरोध जता रहे हैं। इस मतभेद ने भाजपा के विरोध को बल दे दिया है। भाजपा नेताओं और पार्षदों का कहना है कि दिल्ली सरकार के जिस फैसले से खुद कांग्रेसी पार्षद सहमत नहीं हैं उसे जनता के हित में करार देना उचित नहीं है।

बंटवारे पर राजधानी के राजनीतिक गलियारों के अलवा एमसीडी की कार्यप्रणाली से जुड़े कुछ अहम सवाल भी आते हैं। इनका समाधान किए बिना निगम का बंटवारा कितना सफल होगा, इसमें भारी संदेह है? पहला सवाल : कैसे बांटा जाएगा राजस्व? एमसीडी को अपना राजस्व प्रॉपर्टी टैक्स, विज्ञापन, पार्किंग और टोल टैक्स, आदि से मिलता है। पहले यह बजट समान रूप से पूरी दिल्ली पर खर्च किया जाता था। पांच भागों में बंटने पर जहां गांव, अनाधिकृत कॉलोनियां, झुग्गी बस्ती और अनाधिकृत नियमित कॉलोनियां हैं, वहां पर प्रॉपर्टी टैक्स, विज्ञापन, आदि से बहुत कम राजस्व मिलेगा। असंतुलन को मिटाने में खासी दिक्कतें आ सकती हैं। दूसरा सवाल ः प्रॉपर्टी विभाजन कैसे होगा? कुछ इलाकों में एमसीडी की प्रॉपर्टी बहुत ज्यादा है और कुछ में बहुत कम। मध्य दिल्ली में एमसीडी का पुराना मुख्यालय है ही, नया मुख्यालय सिविक सेंटर भी है। यमुना पार में करोड़ों रुपये की लागत से बना बूचड़खाना है तो कई इलाकों में जोनल कार्यालयों में बड़ी-बड़ी इमारतें हैं। एमसीडी के बड़े-बड़े अस्पताल किसकी प्रॉपर्टी कहलाएंगे? सैकड़ों स्कूलों आदि का क्या होगा? सवाल नम्बर तीन : वार्ड बढ़ेंगे तो उनके इलाके छोटे हो जाएंगे। ऐसा होने से विकास कार्यों को लेकर खासा झंझट पैदा हो सकता है। उदाहरण के तौर पर प्रमुख सड़कें, स्ट्रीट लाइटें, नालियां, नालों का निर्माण, आदि कई वार्डों से गुजरेगा तो क्या अलग-अलग टेंडर होंगे, सुपरविजन कौन करेगा? सवाल नम्बर चार : एमसीडी पर करोड़ों रुपये की देनदारी है। एमसीडी की आर्थिक हालत ऐसी नहीं कि नए वार्डों के लिए नई भर्ती की जाए। सवाल नम्बर पांचवा : पांच एमसीडी बनने से दिल्ली के पांच मेयर होंगे। पांच कमिश्नर होंगे तो पांच ही स्थायी समिति के अध्यक्षों के अलावा विभिन्न समितियों के अध्यक्ष होंगे। ऐसे में नेताओं की अपनी हैसियत खासी छोटी नजर आएगी। जब तक इन सारे प्रश्नों पर गम्भीरता से विचार नहीं होता, हमें नहीं लगता कि मामले में इतनी जल्दबाजी करनी चाहिए।