Translater

Showing posts with label Prashant Bhushan. Show all posts
Showing posts with label Prashant Bhushan. Show all posts

Saturday, 2 June 2012

भावुक जवाब देकर मनमोहन सिंह अपनी जिम्मेदारी टाल नहीं सकते

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 2 June 2012
अनिल नरेन्द्र
टीम अन्ना के आरोपों पर पधानमंत्री मनमोहन सिंह का जवाब शायद ही किसी को संतोषजनक लगे। पधानमंत्री का यह भावुक कथन कि अगर उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप कोई साबित कर सकता है तो वह राजनीति से संन्यास ले लेंगे हमारे गले तो उतरा नहीं। हमें तो पधानमंत्री का जवाब मुख्य मुद्दे से ध्यान हटकर अपने सारे दागी सहयोगियों को बचाने का लगता है। टीम अन्ना ने पधानमंत्री और उनके 15 मंत्रियों की सूची जारी की है। उसमे उन्होंने बस यही तो कहा है कि कोयला खदान आवंटन को लेकर कैग की एक रिपोर्ट में कुछ भ्रष्टाचार दर्शा रहा है और चूंकि यह मंत्रालय पधानमंत्री के आधीन है इस लिहाज से वह जिम्मेदार हैं। अगर पधानमंत्री निर्दोष हैं तो जांच क्यों नहीं करवा लेते? डा. मनमोहन सिंह इस देश के पधानमंत्री भी हैं। इसका मतलब यह है कि साझा जिम्मेदारी (ज्वाइंट रिस्पांसिबिलिटी) के आधार पर मुखिया होने के नाते वह अपने मंत्रिमंडल साथियों के आचरण के लिए भी जिम्मेदार हैं। टीम अन्ना ने उनके मंत्रिमंडल के 15 सदस्यों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। अगर सरकार का मुखिया अपनी टीम का जिम्मेदार नहीं तो और कौन जिम्मेदार है। यह समय भावुकता भरे बयान देने और खुद को टीम अन्ना से आहत दिखाने का नहीं बल्कि देश के समक्ष यह स्पष्ट करने का है कि आप पिछले 8 सालों से पधानमंत्री हैं और इस दौरान आप घोटालों पर रोक लगाने में असफल क्यों हैं? घपलों, घोटालों का सिलसिला थम नहीं रहा। राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों के नाम पर अनगिनत घपलों के साथ ही 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आया। इसके बाद तो एक के बाद एक घपलों की लाइन सी लग गई। कभी सोलह आना ईमानदार जाने वाले मनमोहन सिंह किसी सौदेबाजी में शामिल होंगे, यह आज भी कोई यकीन करने वाला नहीं है। लेकिन वे सब कुछ जानकर भी आंख बंद किए हुए हैं या गठबंधन की मजबूरी या फिर सिर्प राज करने के लोभ में चुप हैं, इस बात पर शक जरूर होने लगा है। आखिर मुखिया होने के नाते मनमोहन सिंह जी ने कोई भी घोटाला रोकने की कोशिश क्यों नहीं की और यह जानते हुए कि घोटाला दर घोटाला हो रहा है वह चुपचाप तमाशा देखते रहे का मतलब साफ है कि उन्हें न तो इनकी परवाह है और न ही वह इसे रोकने के इच्छुक हैं। वह तो बस पधानमंत्री बने रहना चाहते हैं। वह जानते हैं कि अब अगर वह पीएम कुर्सी से हट गए तो सिवाय रिटायर होने के और कोई दूसरा रास्ता उनके लिए नहीं बचेगा। जब तक सम्भव हो चिपके रहो इस कुर्सी से। आज स्थिति यह आ गई है कि अपने भ्रष्ट साथियों को बचाते-बचाते खुद को शिखंडी का खिताब देने वाले पशांत भूषण को भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं। उल्टा भावुकता से सारे मामले को दबाना चाह रहे हैं। टीम अन्ना के पमुख सलाहकार अरविंद केजरीवाल ने कहा कि पधानमंत्री किसी जांच के बिना अपने आपको पाक-साफ कैसे घोषित कर रहे हैं? वह यह क्यों नहीं कहते कि मामले की जांच करवा लो। पर पधानमंत्री की व्यक्तिगत जिम्मेदारी से कहीं बड़ा पश्न है इस यूपीए-2 सरकार की जवाबदेही जो बिल्कुल नजर नहीं आती और न ही वह ऐसे कदम उठाने को ही तैयार हैं जिससे दूध का दूध, पानी का पानी हो जाए।
Anil Narendra, Anna Hazare, Arvind Kejriwal, Coalgate, Daily Pratap, Manmohan Singh, Prashant Bhushan, Prime Minister, Vir Arjun

Thursday, 20 October 2011

अन्ना और उनकी टीम पर चौतरफा हमले


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th October 2011
अनिल नरेन्द्र
अन्ना हजारे और उनकी टीम पिछले कुछ दिनों से चारों तरफ से समस्याओं से घिरती जा रही है। एक-एक करके कई समस्याएं खड़ी हो गई हैं। अन्ना ने खुद मौन व्रत धारण कर लिया है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का कहना है कि सवालों से परेशान अन्ना ने जवाब न देने के लिए मौन धारण किया है। मंगलवार को उनके सिपहसलार अरविंद केजरीवाल पर लखनऊ में एक व्यक्ति ने चप्पल फेंकी। उत्तर पदेश में अन्ना का संदेश लेकर दौरा कर रहे केजरीवाल राजधानी में गोमती नदी के किनारे झूलेलाल पार्प में आयोजित एक कार्यकम में भाग लेने के लिए कार से उतरकर मंच की तरफ बढ़ ही थे कि 40 वर्षीय जितेन्द्र पाठक नाम के एक व्यक्ति ने उन पर चप्पल फेंककर हमला कर दिया। हमलावर का आरोप है कि केजरीवाल लोगों को बरगला रहे हैं इसलिए उन पर हमला किया है। उसने यह भी कहा है कि वह किसी संगठन अथवा राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ नहीं है। फिलहाल जितेन्द्र पाठक पुलिस हिरासत में है। टीम अन्ना के दो पमुख सदस्य पीवी राजगोपाल और राजेन्द्र सिंह ने आंदोलन के राजनीतिक रूप लेने पर आपत्ति व्यक्त करते हुए मंगलवार को कोर कमेटी से इस्तीफा दे दिया है। उनका दावा है कि यह भ्रम का शिकार हो गई है। उधर मंगलवार को ही कांग्रेस से सुलह करने के पयासों पर तब पानी फिर गया जब अन्ना हजारे के गांव के सरपंच और उनके साथी विशेष रूप से दिल्ली आए ताकि राहुल गांधी से मुलाकात हो सके, के हाथों निराशा लगी जब समय देकर भी राहुल गांधी अन्ना के गांव से आए पतिनिधिमंडल से नहीं मिले। सोमवार को योग गुरु बाबा रामदेव ने टीम अन्ना पर ही पहार कर दिया। उन्होंने कहा कि पशांत भूषण के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। बाबा रामदेव ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश को तोड़ने वाली बयानबाजी घातक है। उन्होंने कहा कि सामाजिक आंदोलन में शामिल लोग भी देश को तोड़ने वाले बयान देते हैं जो देश व आंदोलनों के लिए बहुत घातक हैं। उन्होंने अन्ना हजारे को पशांत भूषण के बयान पर अपना रुख स्पष्ट करने की सलाह भी दी। एक सवाल के जवाब में रामदेव ने कहा कि पशांत भूषण के खिलाफ केस दर्ज होना चाहिए। अंत में टीम अन्ना के खिलाफ एक और झटका तब लगा जब सुपीम कोर्ट ने अन्ना हजारे के हिंद स्वराज ट्रस्ट को मिलने वाले सरकारी धन के गलत इस्तेमाल मामले की सीबीआई जांच की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई को मंजूरी दे दी। जस्टिस आफताब आलम और जस्टिस रंजना देसाई की बैंच ने अधिवक्ता मनोहर लाल शर्मा की ओर से दायर याचिका पर सरकार से जवाब तलब किया। शर्मा ने आरोप लगाया कि साल 1995 में हजारे का ट्रस्ट बना था लेकिन इसे अनियमितता बरतते हुए एक वित्त वर्ष पहले की आर्थिक सहायता दी गई थी। याचिका में कहा गया है कि यह स्पष्ट है कि यह धोखाधड़ी, सरकारी कोष के दुरुपयोग का मामला है जो पतिवादी नंबर चार (हजारे) की ओर से किया गया है। सावंत आयोग की 2005 में आई रिपोर्ट में इसका खुलासा किया गया है कि उनके कुछ सहयोगियों या समूह राजनीतिक मित्रों ने ऐसा किया। याचिका में कहा गया है कि ट्रस्ट ने गैरकानूनी तरीके से एक करोड़ रुपए से भी ज्यादा की रकम काउंसिल फॉर एडवांसमेंट ऑफ पीपुल्स एक्शन एंड रूरल टेक्नोलॉजी (कपार्ट) से हासिल की। रिपोर्ट में यह भी खुलासा किया गया है कि 1995 में अन्ना ने कपार्ट से और 75 लाख रुपए लिए। याचिकाकर्ता ने कहा कि 2001 में कपार्ट ने पांच करोड़ रुपए ग्रामीण स्वास्थ्य के नाम पर जारी किए। कुल कितना सरकारी धन ट्रस्ट को अनियमित तरीके से दिया गया, इसकी जांच सीबीआई से समुचित तरीके से कराई जानी चाहिए। सुपीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करने पर अपनी हामी भर दी है, केंद्र और महाराष्ट्र सरकार को जवाब देने का नोटिस जारी कर दिया है। टीम अन्ना पर चारों ओर से हमले होने लगे हैं। अन्ना खुद तो बेदाग हैं पर उनके साथी निश्चित रूप से अन्ना की मूवमेंट को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
Anil Narendra, Anna Hazare, Arvind Kejriwal, Baba Ram Dev, CBI, Daily Pratap, Digvijay Singh, Lokpal Bill, Prashant Bhushan, Supreme Court, Vir Arjun

Saturday, 15 October 2011

प्रशांत भूषण की उनके चैम्बर में जमकर पिटाई


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15th October 2011
अनिल नरेन्द्र
सुप्रीम कोर्ट के वकील और टीम अन्ना के सदस्य प्रशांत भूषण पर बुधवार को तीन युवकों ने उनके सुप्रीम कोर्ट चैम्बर में घुसकर जमकर पिटाई कर दी। हमलावरों ने प्रशांत भूषण को कुर्सी से उठाकर जमीन पर गिराया और लात-घूसों से पीटने लगे। वहां मौजूद लोगों ने एक हमलावर इन्दर वर्मा को पकड़ लिया और पुलिस को सौंप दिया। बाकी दो फरार हो गए। प्रशांत भूषण के चेहरे व गर्दन पर चोट आई हैं। राम मनोहर लोहिया अस्पताल में इलाज के बाद उन्हें छुट्टी दे दी गई। रात में तिलक मार्ग थाने में तीनों हमलावरों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई। जिस समय यह तीन हमलावरों ने प्रशांत भूषण के चैम्बर के अन्दर घुसकर उन पर हमला किया उस समय वह एक न्यूज चैनल को इंटरव्यू दे रहे थे। लिहाजा यह हमला कैमरे में कैद हो गया और शाम तक हर चैनल में दिखाया जाने लगा। हमलावरों ने बाद में पर्चे भी फेंके और कहा कि कुछ दिनों पहले कश्मीर पर दिए गए प्रशांत भूषण के बयान से वह नाराज थे और इसका विरोध करने के लिए उन्होंने यह हमला किया। दरअसल वह प्रशांत भूषण द्वारा 26 सितम्बर को वाराणसी में दिए उस बयान से नाराज थे जिसमें उन्होंने कहा था कि सेना के दम पर कश्मीरियों को बहुत दिनों तक दबाव में नहीं रखा जा सकता। कश्मीर का भविष्य तय करने के लिए जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह कराया जाना चाहिए। गिरफ्तार इन्दर वर्मा ने खुद को श्रीराम सेना का प्रदेश अध्यक्ष बताया और हमले के बाद जो पर्चे बांटे उस पर लिखा था ः कश्मीर हमारा था, हमारा है और हमारा रहेगा। तुम कश्मीर तोड़ोगे तो हम तुम्हारा सिर तोड़ देंगे। वन्दे मातरम्। हमला करने वाले युवकों को बृहस्पतिवार को पटियाला हाउस अदालत में पेश किया गया। तेजिन्द्र पाल सिंह बग्गा सहित दो अन्य को अदालत ने एक दिन के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया। बग्गा ने कहा कि उसे अपने किए पर कोई शर्मिंदगी नहीं है और चेतावनी दी कि वह प्रशांत पर फिर हमला कर सकते हैं। भूषण के हमलावरों की अदालत में पेशी के दौरान कुछ लोगों ने अन्ना समर्थकों पर हमला कर दिया। बताया जा रहा है कि हमलावरों में भगत सिंह क्रांति सेना और श्रीराम सेना के कार्यकर्ता शामिल थे। जब पुलिस वहां पहुंची तो हमलावर भाग खड़े हुए। इस झड़प के दौरान दो लोग घायल भी हो गए। तेजिन्द्र पाल सिंह बग्गा ने फेसबुक पर अपनी प्रोफाइल में एक तस्वीर लगाई है जिसमें वह श्री श्री रविशंकर के साथ खड़ा है। भगत सिंह क्रांति सेना के निशाने पर छह और लोग हैं। इनमें अरुंधति रॉय, स्वामी अग्निवेश के अलावा कश्मीरी अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी, मीरवाइज उमर फारुख और यासीन मलिक शामिल हैं। भगत सिंह क्रांति सेना एक साल पहले बनाई गई थी। इससे पहले वह भाजपा में ही शामिल थी।
समाजसेवी अन्ना हजारे के प्रशांत भूषण के कश्मीर पर दिए गए बयानों की निन्दा की मांग करते हुए अखिल भारतीय आतंकवाद निरोधक मोर्चा के अध्यक्ष मनिंदर सिंह बिट्टा ने कहा कि भूषण ने अपने बयान से कश्मीर के लिए प्राण देने वाले हजारों शहीदों का अपमान किया है। उन्होंने कहा कि मैं इस हमले की निन्दा करता हूं, यह गलत है पर भूषण का बयान निन्दनीय है। बिट्टा ने कहा कि इस तरह के बयान से कस्मीर में लड़ने वाले और अपनी जान देने वाले शहीदों का अपमान करना है। अपने ही घर से निर्वासित कर दिए गए उन कश्मीरी पंडितों और अन्य लोगों का भी अपमान है, जो आज भी शिविरों में रह रहे हैं। प्रशांत भूषण ने कहा था, सरकार को कश्मीर से सेना वापस बुला लेना चाहिए। सरकार इस बात के लिए वोटिंग करवाए कि कश्मीरी भारत के साथ रहना चाहते हैं अथवा नहीं। उन्होंने कहा कि मैं पहले भी कह चुका हूं कि अन्ना सही काम कर रहे हैं लेकिन उनके साथ जो लोग हैं वह सही नहीं है। स्वामी अग्निवेश का सच सबके सामने है। प्रशांत के बयानों के लिए अन्ना को उनकी निन्दा करनी चाहिए। बिट्टा ने कहा कि ऐसे बयान देश तोड़ने वाले हैं। देश की जनता इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी। बेहतर हो कि प्रशांत भूषण ऐसे बयानों से बचें।
Anil Narendra, Anna Hazare, Attack on Prashant Bhushan, Civil Society, Daily Pratap, Jammu Kashmir, Lokpal Bill, Prashant Bhushan, Vir Arjun

शिवानी की हत्या किसने और क्यों करवाई, इन सवालों का क्या जवाब है?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15th October 2011
अनिल नरेन्द्र
इंडियन एक्सप्रेस की युवा पत्रकार शिवानी भटनागर की 23 जनवरी 1999 को उसके पटपड़गंज स्थित घर में हत्या कर दी गई थी। यह हत्या किसने करवाई, क्यों करवाई और क्या यह किसी साजिश के तहत किया गया मर्डर था, यह आज भी सवाल बने हुए हैं। यह तो साबित होता है कि हत्या करने वाला प्रदीप शर्मा था पर हत्या का मकसद क्या था? क्या उसने अकेले अपने दम पर हत्या को अंजाम दिया? यह सवाल हत्याकांड के 11 साल बाद फिर जिन्दा हो गए हैं। इन सवालों को उठाने के साथ दिल्ली हाई कोर्ट ने पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आरके शर्मा, श्री भगवान और सत्य प्रकाश को बरी कर दिया है। वैधानिक साक्ष्यों के आधार पर प्रदीप शर्मा को हत्यारे होने की पुष्टि कर दी है और उसे उम्र कैद की सजा को हाई कोर्ट ने बरकरार रखा है। चारों ने सेशन कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की हुई थी। जस्टिस बीडी अहमद और जस्टिस मनमोहन सिंह की डिवीजन बैंच ने कहा है कि साक्ष्यों से साबित होता है कि प्रदीप ने शिवानी के फ्लैट में दाखिल होकर हत्याकांड को अंजाम दिया पर हत्या का मकसद साफ नहीं है। उसने हत्याकांड को अकेले अंजाम दिया, हत्या कराने के पीछे आरके शर्मा की साजिश थी या नहीं या किसी दूसरे की, ऐसे कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब कोर्ट को नहीं मिले हैं। प्रदीप को हत्या के बदले तीन लाख रुपये की सुपारी की बात भी साबित नहीं हो सकी। डिवीजन बैंच ने कहा कि आरके शर्मा, श्री भगवान और सत्य प्रकाश का षड्यंत्र साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य नहीं हैं। न ही उनके आपसी संबंध साबित होते हैं। साक्ष्य के तौर पर दाखिल अभियुक्तों के कॉल रिकार्ड्स रहस्यमय प्रतीत होते हैं। उनके साथ छेड़छाड़ की आशंका के अलावा कई समस्याएं हैं। इनके चलते उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इन टिप्पणियों से दिल्ली पुलिस की जांच पर सवालिया निशान लग गए हैं। दिल्ली पुलिस ने कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे। पुलिस के स्थायी अधिवक्ता पवन शर्मा ने कहा कि हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे और उनका मानना है कि प्रदीप के हत्यारे होने की पुष्टि पुलिस के लिए महत्वपूर्ण आधार है।
शिवानी भटनागर की हत्या 23 जनवरी 1999 को आईपी एक्सटेंशन के नवपुंज अपार्टमेंट्स स्थित फ्लैट में की गई थी। केस की गुत्थी लम्बे समय तक उलझी रही। आखिरकार पुलिस ने हरियाणा कैडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी आरके शर्मा, सत्य प्रकाश और श्री भगवान, वेद प्रकाश और वेद प्रकाश उर्प कालू को गिरफ्तार करके गुत्थी सुलझाने का दावा किया। अभियोजन पक्ष के अनुसार शिवानी की हत्या आरके शर्मा के षड्यंत्र पर हुई थी। हत्याकांड को अंजाम प्रदीप शर्मा ने दिया। वह नवपुंज अपार्टमेंट के एंट्री रजिस्टर से गलत पता और अपना फर्जी नाम लिखकर दाखिल हुआ था और शादी की मिठाई देने के बहाने घर में घुसा। शिवानी चाय बनाने रसोई में गई तो तवे का वॉर व रसोई में चाकुओं से हमला कर दिया। बाद में बेसुध हालत में बिजली के तार से गला घोंटकर हत्या कर दी। शिवानी को अभी भी इंसाफ का इंतजार है। शिवानी भटनागर की तरह राजधानी में और भी चर्चित हत्याकांड हुए हैं जिनमें इंसाफ मिलना बाकी है। मॉडल जेसिका लाल की 29 अप्रैल 1999 की रात वीना रमानी के टेमरीन्ड कोर्ट नामक कुतुब रोड स्थित रेस्टोरेंट में एक हाई-प्रोफाइल पार्टी के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। तफ्तीश में कांग्रेस के प्रभावशाली नेता विनोद शर्मा के बेटे सिद्धार्थ शर्मा उर्प मनु शर्मा समेत तीन युवकों का नाम सामने आया। मनु शर्मा दिसम्बर 2006 से तिहाड़ जेल में सजायाफ्ता कैदी के तौर पर सजा काट रहे हैं। फैशन डिजाइनर पुंजुम बुद्धिराजा की 20 मार्च 1999 को दाऊद इब्राहिम के कथित गुर्गे रोमेश शर्मा के दक्षिण दिल्ली स्थित जय माता फार्म हाउस पर हत्या कर दी गई। हाई कोर्ट ने 15 दिसम्बर 2009 को रोमेश शर्मा को पुंजुम की हत्या के आरोप में बरी कर दिया। ताजा स्थिति ः पुंजुम की हत्या के चारों दोषी सुरेन्द्र, हेमचन्द, संतराम और रमेश जेल में उम्र कैद की सजा काट रहे हैं जबकि इन चारों की अपील सुप्रीम कोर्ट में लम्बित है। दिल्ली विश्वविद्यालय में एलएलबी तृतीय वर्ष की छात्रा प्रियदर्शनी मट्टू, 23 जनवरी 1996 को अपने वसंत पुंज स्थित घर में मृत पाई गई। दिल्ली हाई कोर्ट ने 30 अक्तूबर 2006 को संतोष को कॉलेज छात्रा के साथ बलात्कार व उसकी निर्मम हत्या के जुर्म में फांसी की सजा सुनाई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 6 अक्तूबर 2010 को पलटते हुए उम्र कैद में तब्दील कर दिया था। संतोष कुमार शर्मा अक्तूबर 2006 से ही तिहाड़ जेल में बन्द हैं। नैना साहनी युवा कांग्रेस नेता सुशील शर्मा की पत्नी थी। 2 जुलाई 1995 को सुशील ने नैना की गोली मारकर हत्या कर दी थी और शव को तंदूर में डाल दिया। इस मामले में 7 नवम्बर 2003 को अदालत ने सुशील को फांसी की सजा सुनाई थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने सुशील की सजा को बरकरार रखा था। पिछले एक दशक से ज्यादा समय से सुशील शर्मा तिहाड़ में बन्द है और उसकी सजा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील लम्बित है।
Anil Narendra, Anna Hazare, Attack on Prashant Bhushan, Civil Society, Daily Pratap, Jammu Kashmir, Lokpal Bill, Prashant Bhushan, Vir Arjun

Sunday, 4 September 2011

राजनीतिक आकाओं के कहने पर भेजा नोटिस ः अरविन्द केजरीवाल


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4th September 2011
अनिल नरेन्द्र
अन्ना हजारे के आंदोलन से गुस्से से भरी मनमोहन सिंह सरकार ने अब उन लोगों को चिन्हित कर निशाने पर लेना शुरू कर दिया है जिन्होंने उसकी मिट्टी पलीत करने में सक्रिय भूमिका निभाई। मीडिया पर लगाम लगाने के लिए विशेष ग्रुप बनाने की खबर है। अन्ना के मंच से सरकार को छूट करने वाले फिल्म अभिनेता ओम पुरी और किरण बेदी पर पहले ही मानहानि का केस लग चुका है। सांसदों के खिलाफ विवादास्पद टिप्पणी को लेकर संसद में विशेषाधिकार हनन के मामले का सामना कर रहीं किरण बेदी का टीम अन्ना अब खुलकर साथ दे रही है। अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि पूरी टीम एकजुट होकर किरण बेदी के साथ है। इस तरह के कदम से जनता के बीच यह धारणा जाएगी कि सांसद उनसे बदला लेना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि जब नोटिस मिलेगा तो वह उस पर जवाब देगी।
टीम अन्ना के एक और महत्वपूर्ण सदस्य पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री शांति भूषण सीडी प्रकरण में फंसते नजर आ रहे हैं। दिल्ली पुलिस ने सीडी मामले में कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी है। इसमें जानकारी दी गई है कि
सीडी में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और शांति भूषण की बातचीत का टेप असली है। इसमें किसी तरह के जोड़तोड़ के प्रमाण नहीं हैं। यदि यह सीडी असली है तो यह सीधे-सीधे उच्चतम न्यायालय में बड़े भ्रष्टाचार का मामला बनता है। दिल्ली पुलिस के सूत्रों के अनुसार इस मामले में उनके पास एक प्रत्यक्षदर्शी गवाह भी है। वह गवाह है चर्चित सांसद अमर सिंह। उन्होंने पुलिस को पूछताछ में जानकारी दी है कि उन्होंने अपने घर के लैंडलाइन फोन से खुद शांति भूषण से मुलायम सिंह की बात कराई थी।
मनमोहन सिंह सरकार को सबसे ज्यादा खुंदक अरविन्द केजरीवाल से है। टीम अन्ना में केजरीवाल को वह सबसे बड़ा रोड़ा मानती है। अब केजरीवाल को भी कटघरे में खड़ा करने के प्रयास हो रहे हैं। अरविन्द केजरीवाल के भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) से वर्ष 2006 में दिए गए इस्तीफे को केंद्र सरकार ने अब तक मंजूरी नहीं दी है। सेवा शर्तों के मुताबिक केंद्र सरकार ने समय से पहले नौकरी छोड़ने के लिए उनसे तीन लाख रुपये की मांग की थी। अब यह रकम नौ लाख हो गई है। केजरीवाल ने इससे छूट के लिए आवेदन किया था जिस पर
अब तक कोई फैसला नहीं हुआ है। सरकार से सीधे टकराव के बाद केंद्र सरकार का कार्मिक विभाग (डीओपीटी) केजरीवाल के इस्तीफे का मामला फिर से खोल सकता है। राजस्व सेवा के अधिकारी के तौर पर केजरीवाल ने वर्ष 2000 में दो साल का स्टडी लीव (अध्ययन अवकाश) ली थी। इस दौरान केंद्र सरकार के नियमों के मुताबिक उन्हें वेतन दिया गया था। इस अवधि के बाद उन्होंने दो साल का बिना वेतन का अध्ययन अवकाश भी लिया। सेवा शर्तों के मुताबिक छुट्टी से लौटने के बाद कम से कम तीन साल नौकरी करनी पड़ती है। लेकिन केजरीवाल ने इससे पहले ही 2006 में इस्तीफा दे दिया। ऐसे में डीओपीटी ने उनसे तीन लाख रुपये की मांग की। इसके जवाब में केजरीवाल ने आवेदन किया कि उनके पास इतनी रकम नहीं है, इसलिए उन्हें इससे छूट दी जाए। मगर अब तक डीओपीटी ने इस पर अंतिम फैसला नहीं किया है। हालांकि इस्तीफे के तुरन्त बाद केजरीवाल को इससे बड़ी रकम मैगसेसे पुरस्कार के तौर पर मिली थी।
शुक्रवार को अरविन्द केजरीवाल ने आरोप लगाया कि उन्हें नौ लाख रुपये का भुगतान करने का नोटिस `राजनीतिक आकाओं' के कहने पर भेजा गया है। जन लोकपाल के मुद्दे पर अन्ना हजारे द्वारा अनशन करने से 10 दिन पहले आयकर विभाग ने पांच अगस्त को केजरीवाल को एक नोटिस भेजा। नोटिस में केजरीवाल से उनके आयकर आयुक्त रहते हुए अध्ययन अवकाश पर जाने की अवधि की तनख्वाह, उस पर लगे ब्याज तथा कर्ज के पुनर्भुगतान की ब्याज सहित बकाया राशि को मिलाकर कुल 9.27 लाख रुपये का भुगतान करने को कहा गया। केजरीवाल ने कहा कि आयकर विभाग ने मेरे दो वर्ष अवकाश पर रहने के दौरान प्रभावी रहे बांड की गलत व्याख्या की है। मैंने बांड का कोई उल्लंघन नहीं किया है। आयकर विभाग ने यह नोटिस राजनीतिक आकाओं के दबाव में भेजा है। हजारे के एक अन्य साथी कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार ने सबक नहीं लिया है और वह कुत्सित तरीके पर उतर आई है। उल्लेखनीय है कि आयकर विभाग द्वारा केजरीवाल को भेजे गए नोटिस में उनसे दो वर्ष की तनख्वाह के रूप में 3.54 लाख, उस पर ब्याज के रूप में 4.16 लाख, कम्प्यूटर के कर्ज की बकाया राशि के रूप में 51,000 रुपये और उस पर ब्याज के रूप में 1.04 लाख रुपये का भुगतान करने को कहा है। इस तरह उन्हें नौ लाख से अधिक रुपये की राशि देने को कहा गया है।
Anil Narendra, Daily Pratap, Vir Arjun, Anna Hazare, Arvind Kejriwal, Kiran Bedi, Prashant Bhushan, Lokpal Bill,

Friday, 22 April 2011

क्या शांति भूषण अन्ना हजारे के लिए बोझ बनते जा रहे हैं?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 22 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र

भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करने वाले अन्ना हजारे के सिपहसालार प्रशांत भूषण व उनके पिता शांति भूषण एक के बाद एक नए विवाद में फंसते जा रहे हैं। जन लोकपाल विधेयक बनाने के लिए गठित संयुक्त समिति में पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण और उनके पुत्र प्रशांत भूषण को शामिल करना अन्ना को बहुत भारी पड़ रहा है। अभी सीडी विवाद चल ही रहा है कि शांति भूषण और उनके वकील पुत्र प्रशांत भूषण के खिलाफ एक याचिका अदालत में दर्ज की गई है। याचिका इलाहाबाद में कम कीमत पर आवासीय परिसर की रजिस्ट्री के बारे में है। याचिका में दावा किया गया है कि शांति भूषण और इलाहाबाद के परिसर के मालिक ने कम कीमत पर सम्पत्ति की रजिस्ट्री कराकर शासन को डेढ़ करोड़ रुपये का चूना लगाया है। याचिका में विवादास्पद सीडी के सभी तथ्यों की जांच की भी मांग की गई है। यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील मनोहर लाल शर्मा ने सोमवार को दायर की है। इससे पहले शर्मा ने देश के पूर्व प्रधान न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में शांति भूषण और प्रशांत भूषण पर न्यायपालिका पर ओछे आरोप लगाकर उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने और अपने हितों की खातिर अदालत का इस्तेमाल करने के आरोपों में दोनों के खिलाफ जांच की मांग की गई है। याचिका में दावा किया गया है कि ये पिता-पुत्र न्यायपालिका के प्रति जनता की आस्था को ठेस पहुंचाने के इरादे से सुनियोजित तरीके से समय-समय पर बयानबाजी करते आ रहे हैं। यही नहीं, पिता-पुत्र ने समूची न्याय व्यवस्था और पूर्व न्यायाधीशों पर भी भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगाए। याचिका में अन्ना को आमरण अनशन करने की गलत सलाह देने का भी आरोप लगाया गया है।
अंग्रेजी के एक दैनिक में एक खबर छपी है जिसके अनुसार शांति भूषण और उनके बेटे प्रशांत भूषण को उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2009 में 10 हजार वर्ग मीटर क्षेत्र वाले भूखंड आवंटित किए थे। प्रत्येक भूखंड का मूल्य साढ़े तीन करोड़ रुपये है। अखबार के अनुसार शांति भूषण और उनके बेटे ने स्वयं माना है कि योजना में पारदर्शिता नहीं थी और बिना किसी स्पष्ट मानदंड के यह आवंटन हुआ है। इन प्लाटों की कीमत सात करोड़ रुपये बताई जा रही है। ये प्लाट ग्रेटर नोएडा में दिए गए हैं। इस आवंटन को सुप्रीम कोर्ट के एक वकील विकास सिंह सेकानूनी चुनौती भी दे दी है। विकास सिंह का कहना है कि इसी स्कीम में उन्हें भी फार्म हाउस का प्लाट दिया गया है। लेकिन इस योजना में कोई पारदर्शिता नहीं बरती गई। उन्होंने आरोप लगाया है कि आवंटन के लिए बड़ी रकम का लेन-देन भी हुआ है। हालांकि उन्होंने माना कि रिश्वत के पैसे उन्होंने नहीं दिए, फिर भी प्लाट मिल गया।
शांति भूषण के कारनामों की खबरें छपने से टीम हजारे में फिर बेचैनी फैलना स्वाभाविक ही है। अभी तक बहुचर्चित सीडी प्रकरण सुलटा नहीं कि एक नया विवाद आ खड़ा हो गया है। जयंत भूषण, शांति भूषण के दूसरे पुत्र हैं। ये भी सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं। उन्होंने ही मुख्यमंत्री मायावती के ड्रीम प्रोजैक्ट नोएडा पार्प के मामले में याचिका दायर की थी। इस याचिका के चलते नोएडा पार्प का काम रुक गया था। क्या यह प्लाट जयंत को खुश करने के लिए मायावती सरकार की मेहरबानी तो नहीं थी?

Thursday, 21 April 2011

ताकि अन्ना हजारे के आंदोलन की हवा निकल जाए

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 21 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र

पाठकों को याद होगा कि मैंने इसी कॉलम में यह आशंका प्रकट की थी कि अन्ना हजारे के लिए इस देश से भ्रष्टाचार दूर करने का संकल्प इतना आसान नहीं होगा। इस देश में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि उन्हें हिलाना मुश्किल है और अन्ना के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा यह राजनेता और नौकरशाह गठबंधन होगा। कभी-कभी पहला कदम ही सबसे कठिन हो जाता है। हम देख रहे हैं कि जन लोकपाल विधेयक के मुद्दे को लेकर बड़ी राजनीतिक साजिश शुरू हो गई है। अब तक दबी जुबान से एक दूसरे पर निशाना साध रहे समाजसेवी अन्ना हजारे और केंद्र में सत्ताधारी कांग्रेस के कुछ नेता खुलकर एक-दूसरे के सामने आ गए हैं। कभी फर्जी सीडी जारी करके तो कभी अन्ना व उनके सहयोगियों को बदनाम करने का अभियान शुरू हो चुका है। अन्ना इतने परेशान हो गए कि उन्होंने गेंद दस जनपथ के पाले में डालने की कोशिश की है। उन्होंने सीधे-सीधे सोनिया गांधी से पूछ लिया है, बोलो आपकी मर्जी क्या है? क्या दिग्विजय सिंह आपकी सहमति से  बोल रहे हैं? अन्ना ने अपनी दो पेज की चिट्ठी में सोनिया को लिखा है कि ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य और सरकार के कुछ वरिष्ठ मंत्री (कपिल सिब्बल और दिग्विजय) जिस तरह से संयुक्त समिति के लोगों के बारे में भ्रम फैला रहे हैं, उससे कहीं न कहीं बदनीयती की झलक मिलती है। पार्टी के एक महासचिव तो लगातार सिविल सोसाइटी के लोगों के खिलाफ अनर्गल टिप्पणियां करने में जुटे हैं। पिछले कई दिनों से आपके  लोग इस तरह की शरारतें कर रहे हैं, फिर भी इनके खिलाफ पार्टी की तरफ से कोई पहल नहीं दिखाई गई। ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार विरोधी उनके आंदोलन को कमजोर करने के लिए इस तरह की गतिविधियां  बढ़ाई गई हैं। इसको देखते हुए वे जानना चाहते हैं कि पार्टी के इन नेताओं की ऐसी शरारतों के प्रति उनका खुद का नजरिया क्या है? पार्टी आखिर चुपचाप यह सब क्यों देख रही है। सोनिया गांधी को लिखा गया अन्ना हजारे का पत्र काफी तीखे तेवर वाला है। अन्ना ने सीधे-सीधे कांग्रेस और यूपीए सरकार की नीयत को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की है।
कांग्रेसी नेताओं की शिकायत जब श्री अन्ना हजारे ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी से की तो कांग्रेस ने भी साफ कह दिया कि उसके नेता कोई अपराध नहीं कर रहे हैं। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी का कहना है कि जैसे श्री हजारे लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात कह रहे हैं वैसे ही उसके महासचिव दिग्विजय सिंह और दूसरे नेता कह रहे हैं। जनतंत्र में सबको अपनी बात कहने का अधिकार है तो फिर कांग्रेस के नेताओं पर वही बात लागू क्यों नहीं होती? मनीष तिवारी ने कहा कि जहां तक अन्ना की सोनिया गांधी को लिखी खुली चिट्ठी का सवाल है तो इसका जवाब तत्काल नहीं दिया जाएगा। सही समय पर इस पत्र का उत्तर पार्टी अध्यक्ष की ओर से दिया जाएगा।
लगता है कि अन्ना सोनिया के जवाब का इंतजार करेंगे और फिर आगे की रणनीति तय करेंगे। यदि उन्हें कांग्रेस और सरकार की नीयत में खोट लगी तो सम्भव है कि वह नए सिरे से आंदोलन की घोषणा कर दें। क्योंकि देश की जनता अब भ्रष्टाचार के खिलाफ हीला-हवाली बर्दाश्त करने के मूड में नहीं दिखती। यदि सरकार को सद्बुद्धि आ जाए तो अच्छी बात है वरना गुस्साये लोगों का आक्रोश फिर सड़कों पर नजर आ जाएगा और इसकी जिम्मेदारी कांग्रेस पार्टी और मनमोहन सरकार की होगी।

Wednesday, 20 April 2011

अन्ना की मूवमेंट पर सीडी विवाद का साया

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 20 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र

पिछले दो-तीन दिनों से उस सीडी को लेकर घमासान मचा हुआ जो आजकल चर्चा में है। उल्लेखनीय है कि इस चर्चित सीडी में अमर सिंह, शांति भूषण का हवाला देकर मुलायम सिंह से कह रहे हैं कि चार करोड़ रुपये में प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट के फ्लां जज को मैनेज करा देंगे। यह सीडी ऐसे समय जारी हुई है जबकि टीम अन्ना ने लोकपाल कानून के मुद्दे पर सरकार पर भारी दबाव बना लिया है। शांति भूषण और उनके बेटे प्रशांत भूषण ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य हैं। लोकपाल विधेयक के मुद्दे पर जो देशव्यापी बहस शुरू हुई उसे सीडी प्रकरण ने नया मोड़ दे दिया है। अब इस घमासान में कई बड़े नेता व सिपहसालार कूद गए हैं। शांति भूषण के वकील पुन प्रशांत भूषण जहां सीडी को फर्जी, छेड़छाड़ युक्त और विभिन्न सन्दर्भों की बातचीत को तैयार किया गया प्रपंच बता रहे हैं, वहीं लोकपाल विधेयक लाने के लिए आंदोलन की अगुवाई करने वाले अन्ना हजारे ने कहा कि यदि सीडी प्रकरण में शांति भूषण दोषी पाए जाते हैं तो उनके विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए और उन्हें संयुक्त समिति से इस्तीफा दे देना चाहिए। हालांकि हजारे ने शांति भूषण पर लगाए गए आरोपों का खंडन किया। उन्होंने कहा कि ये आरोप सही नहीं हैं। अन्ना के मुताबिक प्रयोगशाला में सीडी की जांच कराई गई और पता चला कि यह फर्जी है। इस मामले में एक नया मोड़ और आ गया है। स्वामी अग्निवेश भी इसमें कूद पड़े हैं। एक निजी चैनल में स्वामी ने अमर सिंह पर संदेह जताया। अग्निवेश ने अपने सहयोगियों से अनौपचारिक बात में यह आशंका जताई कि अमर सिंह अपनी खाल बचाने के लिए इस सीडी का इस्तेमाल कर सकते हैं। शांति भूषण के बेटे प्रशांत भूषण ने सीडी में अपने पिता की आवाज होने की बात मानी है लेकिन इसे छेड़छाड़ युक्त और फर्जी सीडी बताया है। इस बारे में एक बड़े अंग्रेजी अखबार ने फोरेंसिक विशेषज्ञों के हवाले से बताया है कि सीडी से कोई छेड़छाड़ नहीं हुई है। इस सीडी में हुई बातचीत निरन्तर और लगातार एक क्रम में हैं। हालांकि अखबार के मुताबिक फोरेंसिक विशेषज्ञों ने आवाज की सत्यता के संबंध में कुछ नहीं कहा जबकि वरिष्ठ पत्रकार विनीत नारायण समेत एक बड़ा वर्ग सीडी में हुई बातचीत को आधार बनाकर संयुक्त समिति से शांति भूषण के इस्तीफे की मांग पर उतर आए हैं।
शांति भूषण ने इस मामले में सोमवार को समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव अमर सिंह के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की वहीं अमर सिंह ने भी मानहानि व अवमानना का मामला दर्ज करने की चेतावनी दी। अमर सिंह ने शांति भूषण और प्रशांत भूषण के खिलाफ पुलिस में शिकायत की। इस बीच केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने कहा है कि सरकार विवादित सीडी से जुड़े शांति भूषण के खिलाफ आरोपों की स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं पूरी जांच कराएगी। इस मामले में एक नया आयाम इन्कम टैक्स के पूर्व कमिशनर विश्व बंधु गुप्ता ने यह कहकर जोड़ दिया कि शांति भूषण वाली सीडी सही है। इसलिए शांति भूषण के बारे में सिविल सोसाइटी को नए सिरे से फैसला करना चाहिए। उन्होंने ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य अरविन्द केजरीवाल की छवि को लेकर भी कुछ तीखी टिप्पणियां की हैं। कुल मिलाकर अन्ना हजारे की ओर से उनकी टीम पर चौतरफा कीचड़ उछलना आरम्भ हो गया है। इन सब आरोपों में सच्चाई कितनी है, झूठ कितना यह तो समय ही बताएगा।

Thursday, 14 April 2011

अन्ना के जन लोकपाल विधेयक का विरोध शुरू हो चुका है


प्रकाशित: 14 अप्रैल 2011
अनिल नरेन्द्र

पस्तावित जन लोकपाल बिल का शांत विरोध आरम्भ हो चुका है। राजनेता अब कुछ बातें खुलकर कहने लगे हैं। वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने जन लोकपाल बिल का सीधा विरोध तो नहीं किया पर उन्होंने अपने ब्लॉग में लिखा है कि अन्ना हजारे की भूख हड़ताल ने चार दिन में उससे ज्यादा हासिल किया जो विपक्ष ने दो महीने की मांग के बाद पाया? श्री अडवाणी ने लोकपाल विधेयक को और पभावी बनाने के लिए अभियान चलाने के लिए अन्ना हजारे की पशंसा की लेकिन साथ ही उन लोगों की आलोचना की थी जिन्होंने राजनीति या राजनेताओं के खिलाफ घृणा का माहौल बनाया और कहा कि यह लोकतंत्र के खिलाफ है। उधर पंजाब के मुख्यमंत्री पकाश सिंह बादल ने तो खुलकर कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल या लोकपाल बिल लाने से कुछ नहीं होने वाला। इसके लिए सख्त कानून बनाए जाने की जरूरत है। हमारी पार्टी हो या कोई और पार्टी हो चुनाव में सभी काला धन इस्तेमाल करते हैं। अमेरिका की तरह यहां भी एक निश्चित राशि से अधिक धन रखने वालों पर कानूनी पतिबंध लगा देना चाहिए। अमेरिका में 10 हजार डॉलर से अधिक कैश नहीं रख सकते हैं। देश की जीडीपी के बराबर काला धन मौजूद है और यह केवल तीन पतिशत लोगों के पास है। लोकपाल बिल से कुछ नहीं होने वाला चाहे जिसने भूख हड़ताल रखी हो, उसे ही लोकपाल बना दिया जाए।
केन्द्राrय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने कह दिया कि लोकपाल बिल से आम आदमी की गरीबी, बिजली और शिक्षा जैसे, मूलभूत समस्याएं खत्म नहीं होने वाली क्योंकि इसका सीधा वास्ता भ्रष्टाचार से जुड़े मामले निपटाने का है। सिब्बल के इस बयान पर एतराज जताते हुए अन्ना ने कहा कि अगर केन्द्राrय मंत्री कपिल सिब्बल को लगता है कि लोकपाल विधेयक से कोई फायदा नहीं होगा तो उन्हें मसौदा समिति से इस्तीफा दे देना चाहिए। वह क्यों हमारा और अपना वक्त बर्बाद कर रहे हैं। अन्ना के पलटवार पर सिब्बल भी सकपका गए। उन्होंने तुरंत डैमेज कंट्रोल करते हुए कहा कि वह अन्ना के साथ हैं और उनके साथ मिलकर एक ऐसा विधेयक बनाना चाहते हैं जो भ्रष्टाचार से लड़ने में सक्षम हो। वहीं सलमान खुर्शीद ने भ्रष्टाचार से लड़ने में सक्षम होने के लोकपाल बिल के सवाल पर कहा कि भगवान के मौजूद होने से भी सभी बुराइयां नहीं मरतीं। हमें तब भी अपने बच्चों को अच्छी बातें बतानी पड़ती हैं और मंदिर बनवाकर पूजा करनी पड़ती है। भाजपा पवक्ता तरुण विजय ने ट्विटर पर लिखा ः अन्ना ने पिता और पुत्र की जोड़ी को स्वीकार किया है। माओवाद समर्थक को भी शामिल किया है। उन्होंने लिखा है कि विपक्ष को समिति में जगह नहीं दिया जाना अन्ना के लोकतात्रिक आंदोलन के लिए अच्छा नहीं है। हालांकि विजय बाद में अपनी बात से पलट गए पर उन्होंने अपना विरोध तो जता दिया।
कांग्रेस पार्टी में ऐसे नेताओं की भी कमी नहीं जो अन्ना के सामने झुकने को कतई उचित नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि यह तो सरकार ने एक नया रास्ता खोल दिया है। अब हर कोई सरकार की इसी तरह ब्लैकमेल करने की कोशिश करेगा जैसा कि अन्ना और उनके मुट्ठीभर समर्थकों ने किया है यानि कांग्रेस के भीतर जितने मुंह उतनी बातें। हर कोई दूसरों को दोष दे रहा है तथा अपनी बात सही बता रहा है। अन्ना से मिली हार से न केवल पार्टी का आत्मविश्वास डगमगा गया है बल्कि उसके नेताओं के बीच आपसी तालमेल भी बिगड़ता नजर आ रहा है।

Wednesday, 13 April 2011

कुछ राजनेता बेशक भ्रष्ट हों पर यह नौकरशाह इनकी तो पूछो नहीं

प्रकाशित: 13 अप्रैल 2011

-अनिल नरेन्द्र

रविवार को अन्ना हजारे ने नई दिल्ली के प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि जन प्रतिनिधियों को वापस बुलाने के लिए आंदोलन करेंगे। उन्होंने `राइट टू रिकॉल' यानि तय समय के बाद जन प्रतिनिधियों को वापस बुलाने के लिए आंदोलन चलाने का संकल्प दोहराया। सांसदों, विधायकों और पंचायतों तक के जन प्रतिनिधियों को अन्ना से अब अपनी कुर्सी हिलने का खतरा पैदा हो गया है। दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कुछ नेताओं ने स्वीकार किया कि अन्ना ने यदि प्रतिनिधियों को वापसी का आंदोलन चलाया तो उस पर जनता का लोकपाल विधेयक से अधिक समर्थन मिल सकता है। दूसरी बात जो अन्ना ने कही कि जन लोकपाल बिल में वह नौकरशाहों पर शिकंजा कसने पर ध्यान देंगे। हम राजनेताओं को तो आए दिन कोसते रहते हैं पर इन नौकरशाहों को कुछ नहीं कहते। जितनी लूट-खसोट इन नौकरशाहों ने मचाई है उतनी किसी अन्य वर्ग ने नहीं।

हमारा मानना है कि भारत का भ्रष्ट अफसरी तंत्र बहुत खतरनाक है। उसमें भ्रष्टाचार का खौफ पैदा करना जरूरी है। अफसर यदि बधेंगे तो अपने आप भ्रष्टाचार बहुत घटेगा। भारत के प्रधानमंत्री और चीफ जस्टिस के बेइमान होने का औसत बहुत कम है। अन्ना हजारे और उनकी समाजसेवी टीम को सौ फीसदी फोकस सचिवों, नौकरशाहों को सख्ती के साथ लोकपाल के दायरे में लाने पर रखना चाहिए। अफसरों के खिलाफ लोकपाल खुद व खुद अपने बूते जांच, कार्रवाई, बर्खास्तगी और सम्पत्ति जब्त के अधिकार से लैश हो तो यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी। ऐसा नहीं होने देने के लिए ही 42 सालों से अफसर बिरादरी लोकपाल कानून को इस दलील पर लटकवाती रही है कि इससे राजकाज ठप होगा। प्रधानमंत्री के नाम की आड़ में अफसर अपने को बचाने की साजिश रचते रहे हैं। अफसर कितना शक्तिशाली और बदमाश है इसका ताजा प्रमाण मंत्री समूह के अफसरों के खिलाफ सीबीआई की पूर्व अनुमति की जरूरत बनाए रखने की राय की है। प्रधानमंत्री कार्यालय और कैबिनेट सचिवालय के अफसरों की टॉप प्राथमिकता अफसरशाही को लोकपाल से बाहर रखवाने की है। यह दलील देंगे कि अगर ऐसा किया गया तो सरकार ठप हो जाएगी, गवर्नेंस ठप हो जाएगी। इसके जवाब में अकेला यह तथ्य आंख खोलने वाला है कि दुनिया के सबसे विकसित, आदर्श, ईमानदार, पारदर्शी नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्प, फिनलैंड देशों में लोकपाल की व्यवस्था दशकों से काम कर रही है, वहां तो कोई राजकाज या गवर्नेंस ठप नहीं हुआ।

इसमें कोई संदेह नहीं कि आज देश के अधिकतर राजनीतिज्ञ भ्रष्ट हैं पर यह कहना भी शायद ठीक नहीं कि तमाम राजनेता भ्रष्ट हैं। ईमानदार राजनेता भी हैं, उदाहरण के तौर पर जय प्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय, लाल बहादुर शास्त्राr इत्यादि। हमारी सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी नौकरशाह प्रवृत्ति के हैं, गैर राजनीतिज्ञ हैं और पूरी तरह अपने अफसरों पर निर्भर हैं। लगभग यही हाल सोनिया गांधी का भी है। मनमोहन तो इन पर इतना निर्भर हैं कि राजनीतिज्ञों से ज्यादा वह अपने अफसरों पर विश्वास करते हैं। हर स्कैंडल में अगर बारीकी से जाएं तो पाएंगे कि इन नौकरशाहों ने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और यह किसी को जवाबदेही नहीं। यह कभी किसी ने नहीं पूछा कि इन नौकरशाहों की संतानें विदेशों में प़ढ़ रही हैं उन पर महीने का कितने लाखों खर्च हो रहा है। इनको भी अपनी सम्पत्ति और परिवारों की पूरी डिटेल्स सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि जनता को इनकी असलियत पता चले।

Tuesday, 12 April 2011

विपक्षी दलों का दावा:अन्ना ने हमारी लगाई फसल काटी है

प्रकाशित: 12 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र
लोकपाल विधेयक के मुद्दे पर गांधीवादी विचारक अन्ना हजारे के पांच दिन तक चले अनशन से फजीहत की स्थिति में कई पार्टियां व व्यक्ति अब डैमेज कंट्रोल में लग गए हैं। अन्ना के आंदोलन का सबसे ज्यादा नुकसान विपक्षी दलों और बाबा रामदेव सरीखे के लोगों को हुआ है। बाबा रामदेव पिछले कई महीनों से भ्रष्टाचार के खिलाफ जगह-जगह सभाएं कर रहे थे और इन सभाओं में उन्हें जबरदस्त समर्थन भी मिल रहा था पर अन्ना हजारे मुंबई से उड़कर जन्तर-मन्तर आए और पूरी मूवमेंट को हाइजैक कर गए। आंदोलन के बाद जो जन लोकपाल के गठन के लिए समिति बनी है उसमें बाबा का नामोंनिशान नहीं। समिति के सदस्यों को लेकर बाबा रामदेव ने शांति भूषण और उनके पुत्र सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण दोनों को समिति में लेने पर एतराज किया है। रामदेव ने हरिद्वार में कहा कि समिति में भाई-भतीजावाद क्यों?  देश में और भी कई कानूनविद् हैं जिन्हें समिति में लिया जा सकता है। अन्ना हजारे ने जो समिति बनाई है उसमें चार सदस्य सरकार की ओर से मंत्री हैं और चार सदस्य अन्ना हजारे के। सवाल यह उठता है कि भाजपा सहित अन्य विपक्षी दल कहां गए? क्या अब इनका भविष्य में रोल खत्म हो गया है? सत्तापक्ष और जनता ही सब फैसले करेगी? अन्ना के आंदोलन से यह बात तो साफ हो ही गई है कि जनता की नजरों में राजनेताओं की स्थिति कितनी गिर चुकी है। जनता इन्हें न तो देखना पसंद कर रही है और न ही अब इन्हें अपना नुमाइंदा मानने को ही तैयार है।

यूपीए के भ्रष्टाचार के खिलाफ विपक्ष का अभियान अन्ना हजारे के आंदोलन से पूरी तरह हाइजैक हो जाने के बाद अब भाजपा व उसके सहयोगी यह दावा करने में जुटे हैं कि दरअसल समाजसेवी तबका उन्हीं की बोई मेहनत की फसल काट रहा है। विपक्षी नेता यह कबूल करने को तैयार नहीं कि नागरिक समूह  का इस कदर सड़कों पर उतरना राजनीतिक दलों के लिए खतरे की घंटी है। इन नेताओं की दलील है कि बिल का मसौदा तैयार करने के लिए जितने भी एनजीओ के प्रतिनिधि घुस जाएं, मगर यह बिल तो पारित संसद में ही होना है। एनडीए संयोजक शरद यादव का दावा है कि विपक्ष ने भ्रष्टाचार से जुड़े तथ्यों को लेकर जिस मुस्तैदी से पूरे देश में अलख जगाई उसी का नतीजा है कि आज जनता प्रभावी कानून के लिए सड़कों पर उतर आई।

शनिवार को भाजपा नेताओं ने अन्ना के आंदोलन के आगे सरकार के घुटने टेकने की अलग-अलग अंदाज में व्याख्या की। मगर सभी नेताओं की दलील यही थी कि सिविल सोसाइटी ने विपक्ष के ही आंदोलन को आगे बढ़ाया है। भाजपा ने कहा कि विपक्ष महीनों से यूपीए-दो के भ्रष्टाचार की परतें जनता के सामने लाने में जुटा है। संसद के शीतकालीन सत्र और बजट सत्र में उसकी आक्रामकता सबके सामने है। इसके अलावा भाजपा व दूसरे विपक्षी दलों ने देशभर में घूमकर भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता में आक्रोश बनाया। भाजपा नेता ने इस बात से तो इंकार किया कि यह राजनीतिक दलों के किनारे किए जाने का संकेत है मगर उन्होंने माना कि अब राजनेताओं पर आसानी से भरोसा करने में जनता कतराती है और हर पार्टी को इस पर आत्मनिरीक्षण करने की जरूरत है।