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Thursday, 14 July 2011

सरकार सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने में असफल, बाबा रामदेव की जीत


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 14th July 2011
अनिल नरेन्द्र
अगर केंद्रीय गृह मंत्रालय, श्री कपिल सिब्बल और दिल्ली पुलिस ने यह समझा था कि रामलीला मैदान में आधी रात को सोते लोगों पर की गई लाठीचार्ज इत्यादि को सुप्रीम कोर्ट के जजों से छिपा लेंगे तो वह बहुत बड़ी गलतफहमी में थे। बाबा रामदेव और उनके समर्थकों से उस रात पुलिस ने क्या बर्ताव किया, इसके बारे में माननीय जजों को पहले से ही मालूम था। माननीय न्यायाधीश डॉ. बलबीर सिंह चौहान व न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार पहले से ही तैयार आए थे, उन्होंने अपना होमवर्प अच्छे से कर रखा था। उनके तीखे सवाल इस बात की गवाही देते हैं। भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे पर सत्याग्रह करने पर रामलीला मैदान से बलपूर्वक बेदखल किए गए बाबा रामदेव ने रात के अंधेरे में हुई कार्रवाई का ठीकरा सुप्रीम कोर्ट में गृहमंत्री पी. चिदम्बरम के सिर पर फोड़ने का जहां प्रयास किया वहीं इस कार्रवाई में दिल्ली पुलिस के जवाब पर असंतोष व्यक्त करते हुए माननीय न्यायाधीशों ने नया हलफनामा दाखिल करने को कहा। दोनों जजों ने सोमवार को दिल्ली पुलिस से कुछ सहज सवाल पूछे। न्यायाधीश एक से तीन जून के बीच के घटनाक्रम के साथ ही उन परिस्थितियों के बारे में जानना चाहते हैं जिनकी वजह से पुलिस ने रात के अंधेरे में बाबा और उनके समर्थकों को बलपूर्वक निकाल बाहर करना पड़ा। याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट ने रामलीला मैदान में सत्याग्रह कर रहे बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर चार जून की रात में पुलिस की बर्बर कार्रवाई का स्वत ही संज्ञान लेते हुए इस मामले में छह जून को मनमोहन सिंह सरकार और दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार के आला अफसरों से जवाब-तलब किया था। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस आयुक्त बीके गुप्ता से भी व्यक्तिगत रूप से जवाब-तलब किया है। इससे पहले बाबा रामदेव की ओर से उनके वकील राम जेठमलानी ने गृहमंत्री पी. चिदम्बरम को निशाना बनाते हुए कहा कि वे रामलीला मैदान में निहत्थे सत्याग्रहियों के खिलाफ हुए बल प्रयोग की जड़ हैं। उन्होंने दावा किया कि चूंकि बाबा रामदेव को दिल्ली से बेदखल करने का कोई आदेश ही नहीं था। इसलिए न्यायालय को गृहमंत्री से व्यक्तिगत रूप से जवाब-तलब करके पता लगाना चाहिए कि इस बारे में कब और किन परिस्थितियों में निर्णय लिया गया था। जेठमलानी ने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण तरीके से सत्याग्रह कर रहे व्यक्तियों ने इन ज्यादतियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने का प्रयास किया लेकिन पुलिस ने ऐसा करने से इंकार कर दिया।
दोनों जज न्यायाधीश बीएस चौहान और न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार पूरी तैयारी से आए थे, उन्होंने केस के सारे पहलुओं पर गहन अध्ययन किया हुआ था। माननीय जजों ने दिल्ली पुलिस से सवाल किया कि अधिकारियों द्वारा की गई ज्यादतियों के खिलाफ योगगुरु के समर्थकों की शिकायत पर पुलिस ने प्राथमिकी क्यों दर्ज नहीं की थी? शीर्ष न्यायालय ने कहा कि पिछले वाले हलफनामे में यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि एक जून से तीन जून के बीच क्या हुआ? उसने कहा कि डीवीडी, चित्रों और दस्तावेजों से स्पष्ट तौर पर पता चलता है कि उस स्थल पर योगाभ्यास करवाया जा रहा था। न्यायालय ने अधिकारियों से इस बात की सफाई देने के लिए कहा कि किन परिस्थितियों के तहत उन्हें रामदेव का यह कार्यक्रम रोकना पड़ा था, पीठ ने इस बात पर भी सवाल उठाए कि पुलिस ने तम्बुओं से घेरे गए उस स्थल से लोगों को बाहर निकालने के लिए आंसू गैस के गोलों और पानी की धार का इस्तेमाल किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यह उम्मीद नहीं की जाती कि किसी घिरे गए हिस्से में आंसू गैस और पानी की धार का प्रयोग किया जाएöक्या ऐसा नहीं था कि रात साढ़े 11 बजे जब लोग सो रहे थे, आपने लाठियां बरसाईं? चित्रों से पता चलता है कि पुलिस आयुक्त किसी से बातचीत कर रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को चार जून की पुलिसियाई कार्रवाई को तार-तार कर सरकार को बेनकाब कर दिया। पुलिस का झूठा हलफनामा अदालत को गुमराह नहीं कर सका। पुलिस अपने इस दावे को साबित नहीं कर सकी कि उसने आंसू गैस इसलिए छोड़ी क्योंकि बाबा रामदेव के समर्थक हिंसा पर उतर आए थे और उन्होंने पुलिस पर पथराव किया। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 25 जुलाई की तारीख निर्धारित की है। बाबा रामदेव को चाहिए कि वह दिल्ली पुलिस को राज बाला की यह हालत करने पर सुप्रीम कोर्ट में आवाज उठाएं। राज बाला जीवन-मरण के बीच लटकी हुई है। बाबा को चाहिए कि वह अगली सुनवाई में महिलाओं समर्थकों से बलात्कार के प्रयास का भी जिक्र करें, जैसा उन्होंने आरोप लगाया है। हम माननीय जजों का धन्यवाद करना चाहते हैं कि वह किसी भी प्रकार के दबाव में नहीं आए और उन्होंने उस काली रात केस में दूध का दूध, पानी का पानी कर दिया है।
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मनमोहन सिंह की स्थिति पर दया भी आती है, मायूसी भी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 14th July 2011
अनिल नरेन्द्र
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और लोकतंत्र में प्रधानमंत्री सबसे बड़ा होता है। कम से कम होना तो चाहिए पर जब हम अपने प्रधानमंत्री की दशा देखते हैं तो हमें दुख भी होता है और मायूसी भी। डॉ. मनमोहन सिंह न तो जनता के चुने प्रधानमंत्री हैं और न ही राजनीतिज्ञ हैं। नॉन-पॉलिटिकल हैं, यह वह खुद भी मान चुके हैं। अब तो उनके अत्यंत करीबी रहे लोग भी यह कहने लगे हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पूर्व सहयोगी व प्रेस सलाहकार रहे संजय बारू जो कि प्रधानमंत्री के अतिविश्वस्त रहे हैं और वह प्रधानमंत्री की कार्यशैली से अच्छी तरह परिचित हैं, ने एक टीवी साक्षात्कार में कहा है कि मनमोहन सिंह के पास कोई राजनीतिक ताकत नहीं है। संजय बारू की टिप्पणी से न केवल प्रधानमंत्री बल्कि कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी के लिए परेशानी होगी जिनके हाथ में सत्ता की डोर है और जो रिमोट से सरकार को संचालित कर रही हैं। संजय बारू मनमोहन सिंह के विश्वासपात्र थे और उन्हें प्रेस सचिव के तौर पर वापस लाना चाहते हैं परन्तु 10 जनपथ ने अपनी टांग अड़ा दी और अपने विश्वस्त हरीश खरे की नियुक्ति प्रधानमंत्री के प्रेस सचिव के तौर पर करवा दी। संजय बारू ने न्यूज चैनल एनडीटीवी को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि प्रधानमंत्री के पास राजनीतिक सत्ता नहीं और उन्हें अपनी ताकत का इस्तेमाल करना चाहिए जो कि राजनीतिक व्यवस्था की प्रकृति के कारण ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। प्रधानमंत्री केवल पार्टी के राजनीतिक नेता ही नहीं बल्कि देश के नेता भी हैं और उनके पास निश्चित ताकत होनी चाहिए ताकि वह कुछ मुश्किल निर्णय सरकार की ताकत से कर सकें। संजय बारू के नियमित सम्पर्प में रहे कुछ वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार संजय बारू मनमोहन सिंह से नियमित मिलते रहे हैं, ने उन्हें सलाह दी कि अपनी स्थिति में सुधार करें, क्योंकि वे पहले ही जनता का विश्वास खो चुके हैं। संजय बारू ने प्रधानमंत्री से यह भी कहा है कि यदि उनकी स्थिति गिरती है तो ऐसे में सोनिया गांधी क्या कर सकती हैं।
डॉ. मनमोहन सिंह की हुकूमत अपने मंत्रियों तक में नहीं चलती। इसका ताजा उदाहरण तब मिला जब उनके मंत्रिमंडल के एक राज्यमंत्री ने उनके आदेशों को अनदेखा कर दिया। असम में एक ट्रेन के पटरी से उतर जाने के एक दिन बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सोमवार को रेल राज्यमंत्री मुकुल रॉय से दुर्घटनास्थल पर जाने को कहा था पर रॉय ने उनकी बात नहीं मानी और वहां नहीं गए। तृणमूल कांग्रेस नेता ने उनके निर्देश पर ध्यान देने से इंकार करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री के पास इस मंत्रालय का प्रभार है, न ही उनके पास। रॉय ने कहा कि मैं रेलमंत्री नहीं हूं। प्रधानमंत्री रेलमंत्री हैं। रॉय ने कोलकाता में संवाददाताओं से कहा, `मैं तो बस तीन राज्यमंत्रियों में से एक हूं। प्रधानमंत्री ही रेलमंत्री हैं।' रॉय यहीं नहीं रुके, उन्होंने यहां तक कह डाला कि पटरी ठीक कर दी गई है और मुआयना करने के लिए वहां कुछ भी नहीं है। रॉय ने अपनी पार्टी अध्यक्ष ममता बनर्जी के साथ जाना ज्यादा जरूरी समझा, बनिस्पत प्रधानमंत्री के आदेश के? ऐसे में मनमोहन सिंह की स्थिति पर दया भी आती है, मायूसी भी होती है।
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Wednesday, 13 July 2011

डोपिंग प्रकरण ने हमारी ओलंपिक उम्मीदों पर पानी फेरा


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13th July 2011
अनिल नरेन्द्र
कॉमनवेल्थ खेलों में जब भारतीय खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन कर मेडलों की झड़ी लगा दी थी तो सभी को लगने लगा कि इस बार जब ओलंपिक्स आएगा तो उसमें भी भारत शानदार प्रदर्शन कर सकेगा पर पिछले एक पखवाड़े में जो हुआ उससे हर खेल प्रेमी को भारी झटका लगा है। एक पखवाड़े के अन्दर चोटी के आठ एथलीटों के डोपिंग में पकड़े जाने से पूरे भारतीय खेल जगत को हिलाकर रख दिया और इसका असर अब दिल्ली से लेकर एनआईएस पटियाला तक दिखाई दे रहा है। देश की प्रतिष्ठा दाव पर है, क्योंकि दागी खिलाड़ियों के मेडल छीनने से भारत की मेडल सूची छोटी हो सकती है। डोपिंग के लिए केवल विदेशी कोच को जिम्मेदार ठहराना समस्या का समाधान नहीं है। आखिर जब खेल मंत्री इस प्रकरण के लिए अधिकारी, खिलाड़ी और कोच को भी जिम्मेदार मान रहे हैं तो कार्रवाई सब पर क्यों नहीं? केवल कोच पर ही क्यों? क्या इसलिए कि वे विदेशी है जिससे आसानी से छुटकारा पाया जा सकता है और ज्यादा सवाल जवाब भी न हो। निसंदेह इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि इस मामले की जांच के लिए एक समिति का गठन किया गया है। इसमें संदेह है कि इस तरह की जांच समिति से शायद ही कुछ हासिल हो। संदेह इसलिए भी है कि 2009 में जब अनेक भारोत्तोलक डोपिंग में पकड़े गए थे तब भारोत्तोलक महासंघ के अधिकारियों से त्यागपत्र लेकर मामले को रफा-दफा कर दिया गया था। यदि उसी समय इस समस्या की जड़ तक पहुंचने की कोशिश की जाती तो शायद देश को आज जो शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है उससे बच जाते।
डोपिंग स्कैंडल से देश के ओलंपिक पदक के सपनों पर पानी फिर गया है। अश्विनी अपुंजी, मनदीप कौर, सिनी जोस और मंजीत की जिस रिले चौकड़ी से ओलंपिक में कम से कम एक पदक की उम्मीद थी, टूट चुकी है। डोप के जाल में आठ एथलीट फंसे हैं। इनमें से तीन सिनी, जौना और रियाना के बी नमूने भी शुक्रवार को पॉजिटिव घोषित किए गए हैं। इन तीनों पर दो-दो साल का प्रतिबंध लग सकता है। डोपिंग के इस दंश का असर अन्य एथलीट्स के मनोबल पर पड़ सकता है। आशंका जताई जा रही है कि 2012 ओलंपिक से पहले खेलों की तैयारियां कहीं पटरी से न उतर जाएं। करीब एक दशक की मशक्कत के बाद तैयार रिले टीम के साथ कोच, विशेषज्ञ और डाक्टर जुड़े हुए थे, जो भविष्य में मध्यम दूरी के अन्य एथलीट्स के लिए भी उपयोगी साबित होते। अब वह कड़ी साफ हो चुकी है। खेल कैम्पों में उत्साह का माहौल गायब हो चुका है। खिलाड़ी इस आशंका से ग्रस्त हैं कि इंटरनेशनल खेल से पहले उन्हें डोपिंग की निगेटिव इमेज से गुजरना पड़ेगा।
खिलाड़ी शायद ही जानते हों कि किस दवा का क्या असर होता है। कई विशेषज्ञ और नामी खिलाड़ी अरसे से इसके लिए फैडरेशन और डाक्टरों के अलावा मुख्य रूप से कोच को ही जिम्मेदार बताते रहे हैं। खिलाड़ियों को स्टेरॉयड लेने के लिए प्रेरित करने के मामले में अक्सर कोच ही जिम्मेदार पाए गए हैं। खासतौर पर विदेशी कोच जो खुद को सिर्प रिजल्ट तक सीमित रखते हैं और जिन्हें देश की बदनामी से कोई मतलब नहीं होता। डोपिंग का ताजा मामला यह बताता है कि अभी ऐसी व्यवस्था नहीं बन सकी है कि खिलाड़ी प्रतिबंधित पदार्थों का सेवन न कर सकें। जिस तरह डोपिंग के मामले रह-रहकर सामने आ रहे हैं उन्हें देखते हुए यह दावा करना हास्यास्पद ही होगा कि भारत एक खेल शक्ति के रूप में दुनिया में उभर रहा है?
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राहुल की पदयात्रा रंग ला रही है, बसपा में बौखलाहट

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13th July 2011
अनिल नरेन्द्र
राहुल गांधी की किसान संदेश यात्रा हर लिहाज से सफल रही। विपक्षी दलों में भी इस यात्रा के प्रभाव से उत्पन्न हुई स्थिति पर विचार करने पर मजबूर होना पड़ा है। राहुल ने पदयात्रा करके सभी दल के नेताओं को दिखा दिया कि वह जनता के बीच जाकर उनका दुःख-दर्द बांटने का साहस रखते हैं। क्या कारण है कि किसी और दल के किसी भी नेता ने हाल में ऐसी पदयात्रा नहीं की? अपने घरों में एयरकंडीशन कमरों में बैठकर सियासत करने वाले नेताओं को इस युवा महासचिव ने यह दिखा दिया कि अगर आप जनता के पास जाओगे तो वह सिर-आंखों पर आपको बिठा लेगी। कांग्रेस पार्टी को इस पदयात्रा का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जो कार्यकर्ता पिछले दो दशक से घर बैठ गया था वह अब बाहर सड़कों पर आने पर मजबूर हो गया। पिछले दो दशक से ज्यादा, जब से पहली बार कांग्रेस ने मुलायम सिंह यादव से गठबंधन किया था तब से कांग्रेस कार्यकर्ता निराश होकर घर बैठ गया था। अब इतने सालों बाद उसे थोड़ी उम्मीद की किरण जरूर नजर आई है और वह बाहर सड़कों पर आ गया है। अगर राहुल ने ऐसी ही पदयात्रा पूर्वी उत्तर प्रदेश व अन्य भागों में भी कर ली तो कांग्रेस को इसका लाभ हो सकता है। उत्तर प्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल राहुल की पदयात्रा का राजनीतिक फालआउट का आंकलन करने में जुट गए हैं। चाहे बसपा हो या सपा या फिर भाजपा सभी दल पुन अपनी रणनीति बनाने पर कुछ हद तक मजबूर हुए हैं। कांग्रेस का मुख्य मुकाबला बसपा से होगा।
बहन जी ने बसपा संगठन की चूलें कसते हुए रणनीति में फेरबदल किया है। पार्टी की रणनीति में सबसे अधिक सीट जीतने की रेस में सपा को मात देने के साथ कांग्रेस के उभार को राकने पर भी खास जोर दिया जाएगा। मायावती ने पार्टी संगठन व पदाधिकारियों की लगातार बैठकों के क्रम में रविवार को दल के जोनल कोआर्डिनेटर की बैठक में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए। पार्टी संगठन को राज्य सरकार की बेशुमार उपलब्धियों के बखान व प्रचार की जिम्मेदारी दी गई है। पार्टी अलग-अलग जातियों के बीच नए सिरे से पैठ बनाने की नई कोशिश करेगी। सर्वसमाज के लोगों को और ज्यादा जोड़ने व जनाधार को बढ़ाने के लिए पार्टी के सभी जिम्मेदार लोगों को निर्देश भी दिए गए हैं। अब बसपा के एजेंडे में प्रदेश के पिछड़े इलाकों पूर्वी उत्तर प्रदेश व बुंदेलखंड ऊपर आ गया है। माना जा रहा है कि राहुल गांधी की पदयात्रा व किसान पंचायत रणनीति के अगले हिस्से में यही दोनों इलाके हैं। लिहाजा बसपा इन क्षेत्रों में अपने सर्वसमाज समीकरण को पहले से ही दुरुस्त कर लेना चाहती है। रविवार को मायावती ने जो निर्देश दिए उससे साफ निष्कर्ष यह निकला कि उत्तर प्रदेश में जल्द चुनाव हो सकते हैं। बहन जी ने सभी एकत्र पदाधिकारियों को साफ कह दिया कि तैयार रहें, चुनाव कभी भी हो सकते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि कांग्रेस को निशाने पर रखें। भ्रष्टाचार, महंगाई के मुद्दे को लेकर उसे घेरें। भरोसेमंद सूत्रों की मानें तो तीन घंटे तक चली बैठक में मायावती ने यह स्वीकार किया कि पार्टी की छवि खराब हुई है। हालांकि इसके लिए उन्होंने बाहर से पार्टी में आए लोगों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने पदाधिकारियों से कहा कि वह जनता के बीच जाकर यह प्रचार करें कि जो लोग सरकार की छवि खराब कर रहे हैं वे मूलत बसपाई नहीं हैं। राहुल गांधी की पदयात्रा ने बसपा को सोचने पर मजबूर कर दिया है। कांग्रेस की रणनीति यह है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में मुकाबला बसपा और कांग्रेस के बीच हो और कांग्रेस को अजीत सिंह का समर्थन तो मिल ही जाएगा। मुलायम सिंह यादव से भी कोई न कोई सैटिंग हो ही जाएगी।
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Tuesday, 12 July 2011

कराची में शूट एट साइट का आर्डर


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 12th July 2011
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान के कराची शहर में स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई है। पाकिस्तान की वाणिज्यिक माने जाने वाली राजधानी में पिछले पांच-छह दिनों से जारी हिंसा में हजारों परिवार फंस गए हैं। कई स्थानों पर फंसे लोगों को अर्द्धसैनिक बलों की मदद से बाहर निकाला गया है। हालात इतने खराब हो गए हैं कि शुक्रवार को सरकार ने शूट ऑन साइट का हुक्म जारी कर दिया यानि दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश। बावजूद इसके हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही। अब तक मरने वालों की संख्या 100 के पार पहुंच चुकी है। हिंसाग्रस्त इलाकों में हजारों लोग अपने घरों में बन्द हैं और वे सुरक्षित स्थानों के लिए बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। उपद्रवियों द्वारा रॉकेट दागने और गोलाबारी से देश की वाणिज्यिक राजधानी पांच दिनों से ठप है। कई स्थानों पर फंसे हुए लोगों ने स्थानीय टेलीविजन चैनलों को बताया कि उन्होंने चार दिनों से कुछ नहीं खाया है और सड़कें बन्द होने से, लगातार गोलीबारी होने से वे सुरक्षित स्थानों की ओर नहीं जा पा रहे हैं। पुलिस ने कहा कि एमक्यूएम (मुहाजिर कौमी मूवमेंट) ने हिंसा के विरोध में एक दिन का शोक दिवस की घोषणा की थी। इसके बावजूद अधिकतर दुकानें बन्द रहीं और लोग घरों से नहीं निकले। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की हाल की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस वर्ष जून तक कराची में 1138 लोग मारे गए हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने हिंसा को नियंत्रित कर पाने में विफल रहने के लिए पाक सरकार की निन्दा की है।
कराची में ताजा हिंसा के कई कारण हैं। एमक्यूएम द्वारा सत्तारूढ़ गठबंधन छोड़ने के बाद सत्ताऱूढ़ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के साथ तनाव बढ़ गया है। इसके बाद सत्ता में शामिल पश्तोभाषी एएनपी समर्थकों और उर्दूभाषी एमक्यूएम समर्थकों में जातीय संघर्ष शुरू हो गया। 1947 में भारत से शरणार्थी के रूप में पाकिस्तान गए उर्दूभाषी मुसलमानों को पाक में मुहाजिर कहा जाता है। इतने वर्ष होने के बावजूद आज भी उन्हें मुहाजिर ही कहा जाता है। मुहाजिरों का नेतृत्व एमक्यूएम करता है। मुहाजिर अपने साथ दोहरे बर्ताव के कारण शुरू से ही पख्तूनों और पंजाबियों के साथ संघर्ष कर रहे हैं। उधर पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने पिछले पांच दिनों से कराची को दहला देने वाली हिंसा की घटनाओं के लिए तालिबान को जिम्मेदार ठहराया है। इन घटनाओं में कम से कम 108 लोग मारे जा चुके हैं। मलिक ने खुफिया सूचनाओं के आधार पर कहा कि लोगों को दहशत और तनाव में पहुंचाने वाली हिंसा के लिए कम से कम तालिबान जिम्मेदार है। उन्होंने कहा, `तालिबान ने अपने खिलाफ सुरक्षा बलों के अभियान के दौरान कुछ स्थानों को खाली करा दिया लेकिन पुलिस और कानून प्रवर्तन एजेंसियां उनकी तलाश कर रही हैं।' मलिक ने दावा किया कि कराची के उत्तरी हिस्से में तालिबान का नेटवर्प सक्रिय है। वह देश के सबसे बड़े शहर में आतंकवाद की गतिविधियों में शामिल है। आज अगर कराची जल रहा है तो इसके लिए पाक सरकार और उसकी नीतियां हैं। हिंसा के चलते पाकिस्तान के सबसे बड़े कारोबारी शहर कराची को जबरदस्त आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। जियो न्यूज ने खबर दी है कि कराची में व्यावसायिक प्रतिष्ठान बन्द रहने से हर दिन 10 अरब रुपये का घाटा हो रहा है। जैसे बीज बोओगे वैसी ही फसल काटोगे। अगर कराची का हाल बद से बदतर होता जा रहा है तो इसके लिए खुद पाकिस्तान जिम्मेदार है।
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सलवा जुडूम-कोया कमांडो भंग करने का आदेश


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 12th July 2011
अनिल नरेन्द्र
शायद छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम और कोया कमांडो को भंग करने के सुप्रीम कोर्ट के हाल ही में दिए गए आदेश के पीछे भावना यही रही होगी कि माओवादी हों या कोई अन्य उग्रवादी संगठन, उससे लड़ने के लिए सरकार कानून का रास्ता नहीं छोड़ सकती। कोया कमांडो के तहत ऐसे आदिवासी नौजवानों को भर्ती किया गया, जो न पर्याप्त पढ़े-लिखे थे और न ही उन्हें किसी नियमित सरकारी बल की तरह प्रशिक्षण दिया गया और सिर्प तीन हजार रुपये महीने का भत्ता देकर उन्हें माओवादियों से लड़ने में झोंक दिया गया। इससे एक तरफ यह नौजवान और उनके परिजन माओवादियों के निशाने पर आ गए, दूसरी तरफ वैध तौर-तरीकों एवं कानून के प्रति उत्तरदायित्व से उनके अवगत न रहने के कारण उनकी कार्रवाइयों से मानवाधिकार हनन संबंधी प्रश्न अक्सर खड़े होते थे। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का सीधा अर्थ यह है कि सरकार माओवादियों से ऐसे नहीं लड़ सकती है पर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के दूसरा पहलू भी है। सबसे बड़ी चिन्ता तो छत्तीसगढ़ में विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) जिनकी संख्या लगभग पांच हजार हैं, की सुरक्षा को लेकर हो गई है। छत्तीसगढ़ प्रशासन व पुलिस अधिकारियों ने बताया कि लगभग 48 सौ विशेष पुलिस अधिकारी अब नक्सलियों से मुकाबला कैसे करेंगे, वह निहत्थे हो जाएंगे और नक्सलियों के लिए सॉफ्ट टारगेट साबित हो सकते हैं। राजधानी स्थित पुलिस मुख्यालय में राज्य के सबसे अधिक नक्सल प्रभावित बस्तर क्षेत्र के पुलिस अधिकारियों की बैठक में जिसमें बस्तर क्षेत्र के सभी जिलों के पुलिस अधीक्षक, पुलिस महानिरीक्षक तथा राज्य के आला पुलिस अधिकारी शामिल थे, इसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पालन को लेकर चर्चा की गई। सभी का कहना था कि जब एसपीओ की नियुक्ति की गई तब उन्हें प्रशिक्षण दिया गया तथा उन्हें हथियार भी दिए गए। राज्य में नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में एसपीओ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कई स्थानों में एसपीओ की बदौलत ही पुलिस को कम नुकसान हुआ तथा कुछ जगहों पर पुलिस ने कामयाबी भी हासिल की। वहीं एसपीओ के स्थानीय होने के कारण वे सुरक्षा बलों के लिए अभी तक मददगार साबित हुए हैं। एसपीओ वहां की स्थानीय बोली जानते हैं, वहां के भूगोल से परिचित हैं और सबसे अहम बात यह है कि ये यह भी जानते हैं कि कौन नक्सलियों से मिले हुए हैं और कौन नहीं। यही नहीं, क्षेत्र के कोया कमांडो का गठन होने के बाद नक्सलियों के लिए यह सबसे बड़े सिरदर्द साबित हुए हैं और नक्सली इन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं। ऐसे में यदि इनसे हथियार ले लिए जाएं तो उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
छत्तीसगढ़ के अलावा झारखंड, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश जैसे कई और राज्य भी नक्सली हिंसा से बुरी तरह प्रभावित हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ को छोड़कर सलवा जुडूम जैसा प्रयोग और कहीं नहीं हुआ। आंध्र प्रदेश में विशेष बलों की तैनाती सबसे कारगर साबित हुई। इस तरह की पहल पर किसी अदालत को आपत्ति नहीं है। सलवा जुडूम को अगर सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया है तो इसका आधार संवैधानिक है। जो काम पुलिस या सुरक्षा बलों का है, उसमें नागरिकों को नहीं लगाया जा सकता। माओवादी या नक्सली समस्या से निपटने के लिए भारत सरकार की कोई ठोस नीति नहीं है। इस ढुलमुल नीति की वजह से सुरक्षा बलों को भी यह समझ नहींआता कि वह इस समस्या से कैसे निपटें। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश निश्चित रूप से उन मानवाधिकार संगठनों की जीत है जो सलवा जुडूम को निरस्त करवाने पर बहुत दिनों से जुटे हुए थे। जहां इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सरकार को सुरक्षा के वैध व संवैधानिक माध्यमों से ही माओवादियों से निपटना बेहतर होगा और यह समस्या से निपटने के लिए निजी मिलिशिया (सेना) बनाना हल नहीं है वहीं यह भी जरूरी है कि सरकार कोई दूरगामी व कारगर माओवादी-नक्सली हिंसा से निपटने की ठोस रणनीति बनाए।
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Monday, 11 July 2011

Aamir, what led you to make Delhi Belly?

- Anil Narendra
Aamir Khan’s film Delhi Belly is the latest topic of discussion these days. Controversies surround the dialogues, scenes and songs of the film. Finally, I mustered courage to see and understand the film. I saw the movie, but it pained me very much. I never expected such an indecent film from Aamir Khan. It was a punishment to sit through the film. It neither has a story line nor any logic. It is neither a comedy nor a gangster film, nor a family drama. It may be argued that it has been given A certificate, so that adolescents and children could not view the film, but everybody know that to what extent this law is enforced in theatres across the country? Are adolescents stopped entry to the cinema halls in cities like Kanpur, Patna, Rewari or Patiala? Its being an adult film is no excuse. Some of the scenes of this film border pornography. Dialogues are full of abuses, which make the viewers feel ashamed of. May be the youth of today appreciate all this, but the question pops up that where are we leading the young generation of today? It is also being said that producers and distributors are concerned with the film’s box office. But, I have never seen a film, simply for the reason that it is super hit at box office. The young generation are liking this film very much. Had Aamir Khan made this totally a porn film, perhaps, it would have been a better super hit and would have been appreciated more. He must be asked that why the producer of classic films like Lagaan, Rang de basanti has made this trash? Aamir Khanji, what values do you want to inculcate among your children?
Student-life plays a decisive role in one’s life, but today, environment, cinema, TV have their specific impacts on students. This is the phase, which carries full potential of strength, energy, ability and society and the nation along with the parents are also alert to this youth capability. During this decisive phase, noble ethics, noble acts and noble values along with the education serve as multiplying effect, but it is somewhat difficult to find conducive environment for this. Cinema has a lasting impact on the youth. What values we want to pass on to our new generation through films like Delhi Belly? These values are life-long useful for the youth. Should we not consider this? Or, you are concerned just with the super hit status of your film? If we consider the box office factor only, DK Bose song and abuses used in the film Delhi Belly and allegations of spreading indecency would appear absurd. In his press conference in New Delhi, when Aamir Khan said that his film has done 26 crores business during last three days, he must have this in his mind. I want to question the Censor Board of India, why this film was passed? The song, DK Bose bhag…is not going to stop even though it has indecent and ugly wordings. The Ministry of Information and Broadcasting has also asked the Censor Board, as to how this song was passed, when it is full filthy abuses. The Ministry should also ask the Censor Board, as to on what basis and what prompted it to award certificate to this film. Perhaps, the Board may reply that due to such reasons we have awarded it A certificate, but how many adults are viewing the film? Pankaj Sharma, member of the Censor Board, journalist and Secretary of the All India Congress Committee is also displeased with the film and Aamir Khan. He even regrets being the member of the Board, which is the height of it. He says that there are number of evils in the society, but it does not mean that we should also publicise these through films. He has told that he has put up his written objections on this film to the Chairman of the Censor Board. I demand that the Censor Board and the Ministry of Information and Broadcasting should reconsider this film. This comes under the jurisdiction of the Ministry of Information and Broadcasting.
Films have direct impact on the youth. Leave aside films, TV serials are also impacting the lives of the youth. Recently, encouraged by the CID serial, a Delhi woman plotted a bloody conspiracy to kill her lover that baffled the Police. The woman has been identified as Krishna (43). Krishna gave 1.5 lac rupees supari for his lover and took him with her to Mumbai. The Supari killer arranged for a room for her and her lover. The woman took her lover to the room and gave him drugs in his drinks and fled after killing him. She had witnessed the complete episode of CID serial and acted according to it. Along with the release of Delhi Belly, an Amitabh Bachchan film “Budha hoga tera baap” was also released. It is a very clean film. It is a good attempt to portray his old angry young man image in a new form. Just step out of the confine of stardom and we will see that a new thought from a new angle has been presented in this film. Generally, stories of films try to touch reality through exaggeration and this is their beauty too, but it often highlights such an aspect of our life, which we fail to view through normal means. In the film, Budha hoga tera baap, an elderly man deals with criminals and tries to save the society from the anti-social elements. This film depicts the spirit of self-confidence and accountability of an elderly people. But, what accountability of Aamir Khan does Delhi Belly film show? After hearing a petition demanding ban on this film in view of double meaning dialogues, hot scenes and song full of abuses, the Madhya Pradesh High Court issued notice to Aamir Khan. The Court has directed Aamir Khan to file reply to the notice by 12th July. The petitioner, Dr Ajay Seth says that people, especially the youth regard Aamir Khan as the god of the world of acting and he has produced a number of inspirational films too. But, Delhi Belly, produced by him, is an indecent film and abuses have been used in it, which is against Indian culture. The petition also says that despite blue film scenes in the film, the Censor Board has cleared it. Earlier, due to strong opposition, this film was banned in Nepal. I beg pardon of the young generation, perhaps they may not agree with my conservative viewpoint.
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