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Thursday, 21 July 2011

कैश फॉर वोट केस ः अमर सिंह पर कसता शिकंजा


Published on 21th July 2011
अनिल नरेन्द्र
यूपीए-एक सरकार को बचाने के लिए कथित रूप से सांसदों के वोट खरीदने के आरोप की जांच के सिलसिले में दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए संजीव सक्सेना को गिरफ्तार कर लिया था और सोमवार को उसे विशेष न्यायाधीश संगीता ढींगरा सहगल की अदालत में पेश किया गया। अदालत ने पुलिस को पुख्ता जानकारी प्राप्त करने के लिए सक्सेना का तीन दिन का पुलिस रिमांड दे दिया है। गौरतलब है कि यूपीए-एक सरकार के कार्यकाल में जब वामदलों के समर्थन वापस लेने के बाद मनमोहन सिंह ने लोकसभा में अपना बहुमत साबित किया था तभी सांसदों की खरीद-फरोख्त का आरोप लगा था। इसी कड़ी में 22 जुलाई, 2008 को विश्वास मत से एक दिन पहले तीन भाजपा सांसदों को कथित तौर पर एक करोड़ रुपये दिए गए थे। पुलिस ने आरोप लगाया है कि 22 जुलाई को समाजवादी पार्टी के तत्कालीन महासचिव अमर सिंह ने भाजपा सांसद फगन सिंह कुलस्ते और अशोक अर्गल का संजीव से परिचय करवाया था। दावा किया गया है कि संजीव सक्सेना ने संसदीय समिति को भी गलत जानकारी देकर तथ्यों से भटकाने की कोशिश की। आरोप है कि संजीव ने ही भाजपा सांसद को एक करोड़ रुपये दिए थे। इस मामले में भाजपा के पूर्व सांसद महावीर सिंह भगोरा और फगन सिंह के बयान दर्ज किए जा चुके हैं। अशोक अरगल का बयान लिया जाना है। सूत्रों के मुताबिक गिरफ्तारी के बाद शुरुआती पूछताछ में संजीव सक्सेना ने बिना झिझक के अमर सिंह के साथ अपने करीबी रिश्तों की बात कही है। उसने पुलिस को बताया कि वह सिंह के सचिव के रूप में काम करता था। अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि अमर सिंह के ड्राइवर संजय की तलाश जारी है। संजय का बयान इस केस में महत्वपूर्ण बन जाता है, क्योंकि वही इस बात की पुष्टि कर सकता है कि वह और संजीव सक्सेना भाजपा सांसद के आवास पर एक करोड़ रुपये लेकर देने गए थे। अमर सिंह ने दो 20 जुलाई 2008 को संजीव सक्सेना को अपना सचिव बताते हुए भाजपा सांसद अशोक अरगल से मिलाया। सक्सेना ने लोधी एस्टेट स्थित आवास पर अर्गल को एक करोड़ रुपये दिए। फगन सिंह कुलस्ते और महावीर भगोरा ने भी सक्सेना की पहचान कर ली है। दिल्ली पुलिस ने छानबीन करके यह पता लगा लिया है कि यह पैसा किसके यूपी के बैंक से निकाला गया था। दरअसल नोटों की गड्डी पर बैंक का लेवल चिपका रह गया था। अब किस खाते से यह पैसा निकाला गया, यह पता लगाने की कोशिश हो रही है। पैसा (3 करोड़) एकमुश्त नहीं निकाला गया, यह थोड़ा-थोड़ा करके निकाला गया।
श्री अमर सिंह पर पुलिस का शिकंजा कसता जा रहा है। संजीव सक्सेना ने तो सीधा आरोप लगा ही दिया है कि यह पैसा अमर सिंह ने उन्हें दिया था। अगर ड्राइवर संजय भी मिल जाता है और वह भी यह कह देता है कि संजीव सक्सेना ठीक कह रहे हैं और वह संजीव के साथ मौजूद था जब भाजपा के सांसद के पास एक करोड़ लेकर गए थे तो मामला ज्यादा संगीन हो जाएगा। सरकार और प्रशासन ने तो मामले को लटकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी पर गत शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को कुछ न करने पर कड़ी फटकार लगाई थी। तब जाकर दिल्ली पुलिस हरकत में आई और संजीव सक्सेना की गिरफ्तारी हुई। यह मामला बहुत संगीन बन सकता है। इसमें कई बड़ी हस्तियां शामिल हो सकती हैं। अपने कार्यकाल के अंतिम दौर में लड़खड़ाने वाली यूपीए सरकार के लिए एक नया सिरदर्द पैदा हो सकता है। अपने सहयोगी रहे संजीव सक्सेना की गिरफ्तारी से बौखलाए अमर सिंह ने कांग्रेस रणनीतिकारों को चेतावनी दी है कि यदि कानून के हाथ उन तक पहुंचे तो वे सबका भंडाफोड़ कर देंगे। आरोप यह है कि कांग्रेस के कुछ रणनीतिकारों के कहने पर अमर सिंह ने भाजपा सांसदों को रिश्वत दी थी जिन्होंने अपनी पार्टी के व्हिप का उल्लंघन करते हुए यूपीए के पक्ष में वोटिंग की थी। तब जाकर मनमोहन सिंह सरकार बच गई थी। लेकिन उस जांच में 3 साल ढिलाई बरतने के बाद सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद पुलिस हरकत में आई है। सूत्रों के अनुसार अमर सिंह कांग्रेस के रवैये से इन दिनों खासे नाराज चल रहे हैं और उन्हें इस बात का दर्द है कि आड़े वक्त में कांग्रेस जन उनसे काम निकलवा लेते हैं और बाद में भूल जाते हैं। हाल ही में अमर सिंह ने कांग्रेस के ही रणनीतिकारों के कहने पर टीम अन्ना हजारे के सबसे योग्य वकील शांति भूषण और प्रशांत भूषण के कच्चे चिट्ठे खोलने में भी मदद की थी परन्तु इसके बाद भी कानूनी शिकंजा उनकी ओर बढ़ता जा रहा है। अब उन्होंने कांग्रेस नेताओं को स्पष्ट चेतावनी दे दी है कि यदि दिल्ली पुलिस उनके द्वार पर चढ़ी तो फिर वो किसी को भी नहीं छोड़ने वाले हैं। उनके पास जो भी खुफिया जानकारी और सूचनाएं हैं, वे उन्हें सार्वजनिक कर देंगे।
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धोनी को भज्जी के मजाक वाले विज्ञापन में काम नहीं करना चाहिए था


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

Published on 21th July 2011
अनिल नरेन्द्र
देश के दो शराब बनाने वाली कम्पनियों ने टीम इंडिया के दो खिलाड़ियों में बेकार विवाद पैदा करवा दिया है। मैकडोवेल कम्पनी और रॉयल स्टैग। इन दोनों शराब कम्पनियों में बीच बाजार में व्हिस्की ब्रांड्स को लेकर प्रतिद्वंद्विता है। ऑफ स्पिनर हरभजन सिंह ने विजय माल्या के स्वामित्व वाली कम्पनी यूबी प्रिट्स को एक टीवी विज्ञापन को लेकर कानूनी नोटिस भेजा है। इस विज्ञापन में भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी को उनका मजाक उड़ाते हुए दिखाया गया है। यह कानूनी नोटिस हरभजन सिंह की मां अवतार कौर ने अपने वकीलों के जरिये भेजा है। हरभजन के वकीलों ने कानूनी नोटिस में दावा किया है कि यह इस ऑफ स्पिनर, उनके परिवार और सिख समुदाय का व्यासायिक मजाक है। इनमें से एक वकील ने कहा कि क्रिकेटर ही नहीं उनका परिवार भी इस विज्ञापन से परेशान है। इस विज्ञापन के लिए नोटिस भेजते हुए भज्जी की मां अवतार कौर ने कहा कि इस तरह के विज्ञापन से भारतीय टीम में मतभेद पैदा होते हैं तथा इन्हें राष्ट्र विरोधी करार दिया जा सकता है। नोटिस में कम्पनी से हरभजन के परिवार से बड़े समाचार पत्रों तथा टेलीविजन चैनलों में सार्वजनिक तौर पर माफी मांगने और नोटिस मिलने के तीन दिन के अन्दर विज्ञापन हटाने की मांग की गई है। नोटिस में कहा गया है कि मेरा मुवक्किल आपको तुरन्त नोटिस भेजकर अपनी गलती स्वीकार करके उसमें सुधार करने का मौका दे रहा है। इसमें असफल रहने पर हमारे पास उचित कानूनी कार्यवाही करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा जिसमें मानहानि का दावा और इस तरह की दीवानी और आपराधिक कार्रवाई भी शामिल है। इसमें नोटिस की लागत के लिए क्रिकेटर के परिवार ने एक लाख रुपये के मुआवजे की मांग भी की है। हरभजन और धोनी दो अलग-अलग ब्रांड का विज्ञापन करते हैं। भारतीय कप्तान मैकडोवेल नम्बर वन प्लेटिनम के विज्ञापन में कथित तौर पर हरभजन का मजाक उड़ाते हैं। हरभजन रॉयल स्टैग का विज्ञापन करता है। रॉयल स्टैग और मैकडोवेल नम्बर वन दोनों के बीच बाजार में व्हिस्की ब्रांड्स को लेकर प्रतिद्वंद्विता है। यह विज्ञापन हालांकि सोडा ब्रांड का है। हरभजन के रॉयल स्टैग विज्ञापन की मुख्य लाइन है, `हैव आई मेड इट लार्ज।' धोनी ने मैकडोवेल के लिए जो विज्ञापन किया है उसमें हरभजन जैसा दिखने वाला व्यक्ति कहता है, `हैव आई मेड इट लार्ज' जबकि धोनी कहता है कि अगर `जिन्दगी में कुछ करना है तो लार्ज छोड़ो, कुछ अलग करो यार।' धोनी के विज्ञापन में हरभजन की तरह दिखने वाला व्यक्ति बाल बैरिंग फैक्टरी में काम करता है और बड़ी बनाने के प्रयास में वह लोहे की गेंद को बहुत बड़ी बना देता है तो उसके पिता उस पर थप्पड़ मार देते हैं। उल्लेखनीय है कि हरभजन के पिता की बाल बैरिंग बनाने की फैक्टरी हुआ करती थी जहां पर हरभजन भी काम करता था। शराब निर्माताओं ने बिना वजह इन दो खिलाड़ियों में मतभेद करवा दिया है। मेरी राय में महेन्द्र सिंह धोनी को यह विज्ञापन करने से मना कर देना चाहिए था जब उन्होंने देखा होगा कि इसमें भज्जी के कैरेक्टर वाला व्यक्ति है और इसमें हरभजन का मजाक उड़ाने का प्रयास किया गया है। उधर विजय माल्या कहते हैं कि हम विज्ञापन बन्द नहीं करेंगे, न ही कोई संशोधन करेंगे।
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Wednesday, 20 July 2011

काले धन की निगरानी सुप्रीम कोर्ट करे यह सरकार को स्वीकार नहीं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th July 2011
अनिल नरेन्द्र
भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे पर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की चुनौतियों से जूझ रही मनमोहन सरकार को उस समय तग़ड़ा झटका लगा था जब सुप्रीम कोर्ट ने काले धन से जुड़े सारे मामलों की जांच के लिए विशेष जांच दल गठित कर दिया था। इस विशेष जांच दल की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश बीपी जीवन रेड्डी करेंगे और एक अन्य सेवानिवृत्त जज एमबी शाह इसके सदस्य होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि हसन अली और कैलाश नाथ तापड़िया सहित काले धन से जुड़े सभी मामलों की जांच, इनमें आगे की कार्रवाई तथा मुकदमा चलाने की जिम्मेदारी इस विशेष जांच दल की होगी पर केंद्र सरकार को लगता है कि यह मंजूर नहीं है कि काले धन की जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो। तभी तो केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस आदेश की पुनर्समीक्षा याचिका दायर की है। सरकार ने इस फैसले को कार्यकारी अधिकारों का न्यायिक अतिक्रमण मानते हुए कहा है कि कार्यपालिका और न्याय पालिका की अलग-अलग शक्तियां हैं और शीर्ष अदालत का फैसला इन सिद्धांतों के खिलाफ है। याचिका में कहा गया है कि न्यायालय का यह कहना सरासर गलत है कि काला धन वापस लाने के लिए सरकार जोरदार प्रयास नहीं कर रही। ऐसा होता तो सरकार इस मामले में उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन नहीं करती। यह एक ऐतिहासिक केस साबित हो सकता है क्योंकि सरकार की याचिका पर फैसला करते समय जहां अदालत को कुछ अतिमहत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं का ध्यान रखना होगा, वहीं अदालत सरकार से यह सवाल भी कर सकती है कि आखिरकार अदालत को इस तरह का आदेश क्यों पारित करना पड़ा। सरकार ने भले ही समीक्षा याचिका दायर करना जरूरी समझा क्योंकि कैबिनेट में कुछ महत्वपूर्ण कानून वे शामिल है, लेकिन इससे सरकार की कार्यप्रणाली, जांच एजेंसियों के प्रति इसके रवैये और स्वयं जांच एजेंसियों की भूमिका पर बहस छिड़ सकती है।
काले धन का मामला अतिमहत्वपूर्ण है क्योंकि देश का वैध धन अवैध तरीके से विदेशों में जाना तो चिंता का विषय है ही, साथ ही इसके परिणाम राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे से भी जुड़े हैं, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने जो आदेश दिया था उसका अभी तक कुछ ठोस परिणाम नहीं आ सका। दरअसल हो बिल्कुल उल्टा रहा है। अब तक एसआईटी तो हुआ नहीं है, वित्त मंत्रालय की तरफ से गठित समितियां भी काम नहीं कर पा रही हैं और अब सरकार द्वारा अपील दायर करने से मामला और उलझ गया है। अब ये समितियां निर्धारित समय अवधि में अपनी रिपोर्ट भी नहीं दे सकेंगी। जब तक सुप्रीम कोर्ट इस बारे में अपना फैसला नहीं सुनाता, यह काम बाधित रहेगा। यही हाल काले धन पर गठित दूसरी समिति का भी हो गया है। यह समिति सीबीडीटी चेयरमैन की अध्यक्षता में गठित की गई थी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश में इस समिति का भी जिक्र है। इस समिति को काले धन पर रोक लगाने के लिए मौजूदा किन कानूनों में संशोधन करने की जरूरत है, इसके बारे में सुझाव कमेटी को देने को कहा गया था। कमेटी ने अपनी पहली बैठक में पब्लिक से सुझाव मांगे थे और तीन हफ्ते में 4000 सुझाव व प्रतिक्रिया आई थी पर अब यह मामला भी रुकने का डर है। सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को हर हालत में ब्लाक करने पर तुली है, ऐसा लगता है।
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इस देश में असल राज है नौकरशाहों, पत्रकारों और दलालों का

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th July 2011
अनिल नरेन्द्र
2जी स्पेक्ट्रम घोटाले ने एक बात तो साबित कर ही दी है कि इस देश को जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि उर्प सांसद, मंत्री इत्यादि नहीं चला रहे बल्कि उद्योगपति, नौकरशाह और दलाल चला रहे हैं। अगर ऐसा न होता तो नीरा राडिया सरीखे के लोग इतने शक्तिशाली न होते जो अपनी पसंद का मंत्री भी चुनवा लेते हैं और उसे चुनिंदा मंत्रालय भी दिलवा देते हैं। नीरा राडिया आज मशहूर हस्ती हैं, कौन हैं यह नीरा राडिया? 1995 में पहली बार नीरा राडिया भारत में आई और उसने पहली नौकरी सहारा समूह में बतौर लियाजन अफसर की थी। 2001 में नीरा ने वेशन्वी कम्युनिकेशन नामक कंपनी आरंभ की थी और देखते ही देखते टाटा और अंबानी समूह का सारा लियाजन का काम संभालने लगी। अचानक अपनी संदिग्ध गतिविधियों के कारण नीरा प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की नजरों में आ गई। ईडी इस बात की जांच कर रहा था कि अचानक 10 सालों में नौकरी करने वाली नीरा राडिया 300 करोड़ रुपये की सम्पत्ति की मालिक कैसे बन गई? इसी जांच में ईडी ने नीरा राडिया के फोन को टेप करना आरंभ किया। आयकर विभाग ने लगभग 104 टेप अपनी वेबसाइट पर लगाए हैं। इनसे पता चलता है कि कैसे राजनेताओं, उद्योगपतियों, नौकरशाह और पत्रकारों की सांठगांठ से यह सरकार चल रही है। अकेले टाटा समूह और मुकेश अंबानी नीरा राडिया को साल का 30,30 करोड़ रुपये बतौर फीस देती है। आखिर इतने पैसे उद्योगपति (वह भी टाटा और अंबानी जैसे) देते हैं तो कुछ तो नीरा राडिया उन्हें एवज में देती ही होगी। ऐसा नहीं उद्योगपति एक भी पैसा खर्च करते? राडिया की गतिविधियों की सूची लंबी है। 2009 में यूपीए सरकार की सत्ता में वापसी के बाद ए. राजा को फिर से दूरसंचार मंत्री बनवाने के लिए नीरा राडिया ने कनिमोझी सहित कई प्रभावशाली लोगों के साथ लाबिंग की थी। राडिया ने सीबीआई को दिए बयान में स्वीकार किया कि राजा को मंत्री बनवाने के लिए सभी संभावित संगत पर विचार किया गया। उन्होंने यह भी बताया कि राजा को अनिल अंबानी से दूरी बनाकर रहने की सलाह दी गई थी। नीरा ने इस विषय पर भारती एयरटेल के प्रमुख सुनील मित्तल से भी चर्चा की थी। राडिया ने हाल ही में सीबीआई को दिए बयान में यह बातें कबूल की हैं। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया गया कि 2जी स्पेक्ट्रम मामले की जांच में हस्तक्षेप करने को लेकर सहारा समूह के प्रमुख सुब्रत राय और दो पत्रकारों के खिलाफ लगे आरोपों की जांच के सिलसिले में सीबीआई ने कारपोरेट लाबिस्ट नीरा राडिया और टेलीविजन चैनलों के कुछ शीर्ष अधिकारियों से पूछताछ की है। हालांकि सीबीआई ने कहा कि अभी उन टेलीविजन पत्रकारों और प्रवर्तन निदेशालय के जांच अधिकारियों के बीच टेलीफोन पर हुई बातचीत की जांच किया जाना बाकी है जिनसे 2जी मामले की जांच के सिलसिले में कथित तौर पर संपर्प किया गया था। यह बयान वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल ने दिया। उन्होंने सीबीआई द्वारा की गई जांच के निष्कर्षों को पढ़ा। सीबीआई ने बंद लिफाफे में अपनी रिपोर्ट दी है। न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एके गांगुली की पीठ को यह भी सूचित किया गया कि सीबीआई सभी पहलुओं से आरोपों की जांच कर रही है और स्वतंत्र गवाहों तथा दस्तावेजों की तलाश कर रही है। वेणुगोपाल ने कहा नीरा राडिया से पूछताछ की गई है। इन लोगों से एक से अधिक बार पूछताछ की गई है क्योंकि उनके बयान में कुछ विरोधाभास था। शीर्ष अदालत ने गत छह मई को कहा था कि प्रथम दृष्टया सुब्रत राय और सहारा न्यूज नेटवर्प के दो पत्रकारों उपेंद्र राय और सुबोध जैन के खिलाफ 2जी मामले की जांच में हस्तक्षेप करने का मामला बनता है और अदालत ने अवमानना के लिए नोटिस जारी किया था।
उधर सीबीआई ने पटियाला हाउस की एक अदालत को जानकारी दी कि बहुचर्चित 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की अहम कड़ी माने जाने वाली कारपोरेट लाबिस्ट नीरा राडिया की बातचीत वाले टेप मामले से जुड़े सभी आरोपियों को दिए जाएंगे। बता दें कि इन टेपों में कारपोरेट जगत के अलावा मीडिया सहित अन्य क्षेत्रों के लोगों से बातचीत है, जिसके कुछ ही अंश बाहर आ पाए हैं। सीबीआई द्वारा सभी आरोपियों को ये टेप उपलब्ध कराने से कई अन्य लोगों की बातचीत से पर्दा उठ सकता है। देश उम्मीद करता है कि नीरा राडिया के सारे टेपों को सार्वजनिक किया जाए ताकि जनता को यह पता चल सके कि असल में इस देश पर राज कौन करता है? जनता या दलाल?
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Tuesday, 19 July 2011

जब वोट बैंक राजनीति देश की सुरक्षा पर भी भारी पड़े

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th July 2011
अनिल नरेन्द्र
ताजा मुंबई हमलों में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की प्रतिक्रिया ठीक उसी लाइन पर आई जिसकी उनसे उम्मीद रखी जा सकती है बल्कि आश्चर्य तो तब होता जब उन्हें इस ताजा बम कांड में हिन्दू आतंकवादियों का हाथ नजर न आता। तभी आश्चर्य नहीं हुआ जब दिग्विजय ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना साधते हुए शनिवार को कहा कि मुंबई धमाकों में हिन्दू सगठनों की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है, वैसे अभी मुंबई धमाकों में संघ का हाथ होने के सुबूत नहीं मिले हैं परन्तु जांच एजेंसियों को सभी बिन्दुओं से जांच करनी चाहिए। अब दिग्विजय ने कहा कि मैं आरएसएस की आतंकी गतिविधियों के सुबूत दे सकता हूं। उन्होंने कहा कि वह अपनी इस बात से पीछे नहीं हट रहे हैं कि देश में हुई आतंकवादी घटनाओं के पीछे हिन्दू संगठनों का हाथ रहा है। पहले हम समझते थे कि दिग्विजय जो कहते हैं वह उनकी अपनी सोच, रणनीति के तहत हो रहा है, चूंकि उनका 10 साल का राजनीतिक बनवास समाप्त होने जा रहा है इसलिए वह अपनी जड़ें पुन राजनीति में जमाना चाहते हैं इसलिए उन्होंने एंटी हिन्दू लाइन ली है ताकि अल्पसंख्यक वोटों के पैठ बना सकें पर जैसे उनके विवादास्पद बयानों का कांग्रेस आला कमान समर्थन करता है उससे साफ लगता है कि दिग्गी राजा को आला कमान का पूरा समर्थन हासिल है। मुंबई में हुए श्रृंखलाबद्ध धमाकों का दिग्विजय सिंह ने जिस तरह आनन-फानन में सांप्रदायिक रंग देने का प्रयास किया उसमें हमें उम्मीद थी कि शायद पार्टी हाई कमान उन्हें कड़ी फटकार लगाए और अपने आपको इस बयान से अलग करे पर न केवल चुप्पी साधकर शीर्ष नेतृत्व ने इसे अपनी मौन स्वीकृति दी बल्कि यह भी जता दिया कि हिन्दू संगठनों की जोरदार खिलाफत उसकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है जिसके दिग्विजय सिंह मोहरे मात्र हैं। अभी तक दिग्विजय के बयानों पर कांग्रेस टोकाटाकी करती थी पर जिस तरह से प्रवक्ता शकील अहमद ने खुले तौर पर दिग्विजय का समर्थन किया है उससे यह बात सिद्ध हो जाती है कि मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए दिग्विजय सिंह आज तक जो भी बोलते आ रहे थे वह कांग्रेस नेतृत्व की सोची-समझी चरणबद्ध नीति थी और ऐसे बेहूदा और बेतुके बयानों के लिए दिग्विजय सिंह को बाकायदा पुरस्कृत भी किया गया। उन्हें उस प्रदेश का प्रभारी बना दिया गया है जहां कांग्रेस की नजर अल्पसंख्यक वोट बैंक पर टिकी हुई है। इस समय भी दिग्विजय सिंह उत्तर प्रदेश और असम जैसे मुस्लिम आबादी वाले प्रदेशों के प्रभारी महासचिव हैं।
यह बहुत ही शर्म की बात है कि मुंबई विस्फोट जैसे मुद्दे पर भी दिग्विजय सरीखे नेता राजनीति और वोट बैंक पॉलिटिक्स का खेल खेलने से बाज नहीं आते। हमारे देश के नेता संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों के फेर में किस हद तक गिर सकते हैं। वे लाशों पर राजनीति करने के साथ-साथ उन समस्याओं से भी लाभ उठाने की ताक में रहते हैं जो राष्ट्र के लिए शर्मिंदगी का कारण बनती है। मुंबई में बम विस्फोटों के बाद भारत अंतर्राष्ट्रीय चर्चों पर यह कहने की स्थिति में नहीं रह गया है कि वह आतंकवाद से अपने बलबूते पर लड़ सकता है, लेकिन बावजूद इसके केंद्रीय सत्ता का नेतृत्व कर रहे दल के महासचिव इसके लिए बेचैन हो गए कि इस घटना का राजनीतिक लाभ कैसे उठाया जा सके? उन्हें इस बात की भी कतई चिन्ता नहीं कि पाकिस्तान जैसे देश इस बात का कितना फायदा उठा सकते हैं। जहां तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देश के प्रति वफादारी का सवाल है तो कांग्रेस के सबसे कद्दावर नेता पंडित जवाहर लाल नेहरू भी आन रिकार्ड कह चुके हैं कि संघ को आतंकवाद से नहीं जोड़ा जा सकता। चूंकि हो सकता है कि इस तरह के ऊंट-पटांग बयान अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से जुड़े हो, इसलिए भाजपा भी मैदान में कूद पड़ी है। शनिवार को भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन ने दिग्विजय के बहाने सोनिया गांधी और राहुल गांधी को भी लपेट लिया। राहुल से दिग्विजय की नजदीकी का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि राहुल खुद जो नहीं कह पाते, वह दिग्विजय सिंह से कहलवाते हैं। देश आतंकवाद से जूझ रहा है। ऐसे में दिग्विजय का संघ पर आरोप लगाना सिवाय गन्दी, तुच्छ राजनीति के और कुछ नहीं है। भाजपा के दूसरे वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी कहते हैं कि दिग्विजय सिंह को अरब सागर के किनारे ले जाएं और उनके शरीर में मौजूद लादेन की शैतानी रूह को भगाने के लिए कुछ झाड़-पूंक करवाएं। दिग्विजय सिंह जुबानी डायरिया का शिकार हो गए हैं। उनका अपनी भाषा और शब्दों पर कोई कंट्रोल नहीं है। कोई भी आसानी से समझ सकता है कि दिग्विजय सिंह को विष वमन करने की छूट इस आशा से दी गई है ताकि हिन्दू संगठनों को अपमानित और लांछित करने वाले उनके बयानों के जरिये मुस्लिम समाज के वोट आसानी से हासिल किए जा सकें? कांग्रेस की इस सोच से यह साफ है कि उसकी नजर में मुस्लिम समाज तक उसका वोट बैंक बनेगा जब उसे हिन्दू संगठनों से डराया जाएगा।
इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा कि आतंकवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर इस प्रकार की घटिया वोट बैंक राजनीति हो रही है। क्या यह जांच एजेंसियों को गलत दिशा में जांच करने व उन्हें जानबूझ कर भटकाने का काम नहीं है? यह एक तथ्य है कि खुद गृहमंत्री पी. चिदम्बरम कह चुके हैं कि भगवा आतंकवाद देश के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता, मजहब नहीं होता, यह एक विचारधारा है और यह सम्भव है कि कुछ मुट्ठीभर हिन्दू भी इसके शिकार हों पर इसका मतलब यह कतई नहीं कि आप सारे हिन्दू समाज को इसका जिम्मेदार ठहराएं, उन्हें बदनाम करें जैसे कि आप मुट्ठीभर मुस्लिम आतंकियों के कारण पूरे मुस्लिम समाज को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। अगर दिग्विजय सिंह के पास कोई ठोस सुबूत हैं तो जांच एजेंसियों को बताएं ताकि वह इसकी बारीकी से छानबीन कर सके।
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हम राह से भटक गए थे, शुक्रिया और अलविदा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th July 2011
अनिल नरेन्द्र
ब्रिटेन के सनसनीखेज खबरों का पर्याय बन चुका `न्यूज ऑफ द वर्ल्ड' रविवार को इतिहास बन गया। इस इतिहास में कुछ वाकया खबरनवीसों के लिए फिक्र करने वाले हैं तो कुछ शर्म से सिर झुका देने वाले। लेकिन यह अन्त वाकई अफसोसजनक है। आखिरी वक्त में टेबलॉयड ने भी माना कि वह अपनी राह से भटका, जहां से वापस आना नामुमकिन था। सालों तक दुनिया के कई देशों में शासन करने वाले ब्रिटेन में `न्यूज ऑफ द वर्ल्ड' उन चुनिन्दा प्रकाशनों में था, जिसने उपनिवेशवाद की लौ देखी तो इसके बुझने का भी गवाह बना। 168 साल के इतिहास का गवाह रहा यह अखबार आज खुद हमेशा के लिए तारीख का हिस्सा बन गया। इस टेबलॉयड का संचालन करने वाली कम्पनी `न्यूज इंटरनेशनल' के अध्यक्ष जेम्स मकोर्ड ने फोन हैकिंग प्रकरण में फंसने के बाद इसे बन्द करने का फैसला किया। मकोर्ड ने फोन हैकिंग प्रकरण के कारण इस 168 साल पुराने और करीब 75 लाख पाठक संख्या होने के बावजूद इस अखबार को बन्द करना ही बेहतर समझा। टेबलॉयड के अंतिम संस्करण के मुख्य पृष्ठ पर शीर्षक था, शुक्रिया और अलविदा। सम्पादकीय में कहा गया कि पिछले डेढ़ दशक से यह टेबलॉयड ब्रिटेन के लोगों की जरूरत का हिस्सा बन गया था। इस अखबार ने 168 वर्षों में छह राजाओं का दौर देखा। इसमें कहा गया कि हमने इतिहास को जिया है। हमने इतिहास देखा और हमने इतिहास बनाया, पुराने जमाने से लेकर डिजिटल युग तक। अंतिम सम्पादकीय में कहा गया कि हमने महारानी विक्टोरिया के निधन, टाइटैनिक जहाज के डूबने, दो विश्व युद्ध, 1996 विश्व कप जीत, चन्द्रमा पर पहला व्यक्ति, डायना की मौत सहित कई मुद्दों को रिकार्ड किया। इसमें कहा गया कि इस टेबलॉयड ने कई प्रकरण और सैलेब्रिटी के बारे में चौंकाने वाले खुलासे किए। सम्पादकीय में कहा गया कि सीधी बात है, हम राह से भटक गए। मीडिया युगल रुपर्ट मकोर्ड की मशहूर शख्सियत ने 80 साल की उम्र में वाकई चुनौतीपूर्ण फैसला किया है। इतने सफल प्रकाशन के बाद छोटी-छोटी गलतियों के लिए टेबलॉयड को इतना बड़ा फैसला लेना पड़ा। यह फैसला तमाम प्रिंट मीडिया के लिए सबक है कि खोजी पत्रकार की भी सीमा होती है, उन सीमाओं को लांघने के परिणाम घातक भी हो सकते हैं।
Tags: Anil Narendra, Daily Pratap, News Of The World, Rupert Murdoc, Vir Arjun

Monday, 18 July 2011

A zero tolerance policy must for government of India

- Anil Narendra          
Whenever Prime Minister Manmohan Singh and Home Minister P Chidambaram say that the culprits of Mumbai bomb blasts will not be spared, people just don’t care about it, as they have become immune to such statements. Manmohan Singh had uttered these words before the Mumbaikars on 26 November 2008. What has this government done since then? Nothing, but just hollow assurances. People of Mumbai have been frustrated with these empty assurances. They are also fed up with candle marches, peace marches and human chains. People want some action against the culprits. Learn from America. The day al-Qaeda attacked America on 28/11, it had taken a pledge of not resting in peace till Osama bin Laden and al-Qaeda are eliminated. No doubt it took US ten long years to complete this task, but it proved that it is true to its intentions and it has the will to carry out its pledge. It took rest only after penetrating enemy’s den and destroying it. A man learns from experiences and make future amends on the basis of the lessons learnt. That is why Britain, Spain and other Western countries have been able to foil terrorist attempts by maintaining constant alert. They are successful as they follow a zero tolerance policy towards terrorism, which means, they are not going to tolerate even a single terror act, whereas in our country, such attacks continue and we, on our part, also continue to issue empty threats. Hon’ble Home Minister, Mumbai has been the target of 8 bomb blasts during the period from 12 March 1993 to July 2011 and 682 persons have lost their lives in these attacks. Do you know the number of persons killed in terror-related incidents has almost equaled to that of terror killings in Karachi and Kabul. About 394 persons have been killed in terrorist acts in Mumbai alone since 2005, while 500 persons were killed in Karachi and 520 in Kabul during the same period. If we consider total terror deaths in Maharashtra, then this figure comes to 506. Your weak policies have made Mumbai, one of the most dangerous city of the world to live in. Chidambaram had announced the creation of National Investigation Agency-NIA with much fanfare. What has your NIA achieved? If we consider five other attacks, then it appears that the achievements of your NIA have been negative. We are still clueless about the five incidents in various parts of the country after the Mumbai terror attacks of 26/11. It is strange, when we consider that the investigation of three out of these five terror incidences is being carried out by the NIA. The mystery of German Bakery blast of Pune on 13 February, blast in Chinnaswamy Stadium just before the IPL match on 17 April, firing in Jama Masjid area in last September, blast at Delhi High Court and Varanasi bomb blasts has remained unsolved till date. Mr Chidambaram may recall his much-talked about announcement that the NIA was created with the objective of solving terror-related cases all over the country. The agency was entrusted with the solving the mystery behind Jama Masjid and Varanasi blasts, but there has been not even an indication of success in these cases. Similarly, local police is continuing with the investigations in the High Court and German Bakery incidents, but, as usual, there is still no break through. One person has been arrested in this regard, but the ATS has been unable to prove his involvement. The needle of suspicion in this matter points to terror organization, Indian Mujahidin, but the Agency is yet to produce any reliable evidence regarding its involvement. In a few instances, even if the case reaches the Court, it is rejected there for want of credible evidence. The reason is that the investigating agencies collect evidence in such an irresponsible manner that these are not firmly maintainable in the Courts. Advocates connected with the bomb blast cases in the Courts all over the country also confirm the negligent non-professional attitude of investigating agencies towards collecting of evidence, which is one of the reason why the accused are acquitted by the Courts, who, in turn come heavily on the agencies, but the agencies revert back to their non-professional mode of working. There have been instances, where false cases have been initiated on the basis of forcible confessions. The UPA government scrapped TADA in a haste, but it has not been able to replace it with an effective law that may ensure that culprits are brought to book. There is still no special law to deal with the terrorism that has become a serious threat for the security of the nation. There have been 21 minor or major terror-related incidents during the period from October 2005 to 7 December 2010.
Pakistan is involved with these latest Mumbai blasts in some way or the other. The American media has also been saying the same thing. Reacting on these blasts, the American media has said that these blasts have once again raised doubts about the effectiveness of action being taken by Pakistan against terrorist organizations and LeT, is considered to be the mastermind behind these blasts, which had also been responsible for the 2008 Mumbai attacks,. Whatever may be the outcome of the investigations, but one thing is clear that in spite of pressure from the international community on Pakistan, this organization is still operating from its soil, while the government of India, instead of taking any strong steps, is extending hand of friendship towards Pakistan. What to talk of punishment to the culprits, the government of India has even failed to impress upon Pakistan to expedite hearing of the Mumbai accused. We fail to understand the logic behind talks with Pakistan. There has been no improvement in Pakistan’s attitude. They are still pursuing terrorism as state policy. Metro city centres like Mumbai, Delhi and Bangalore are still on the hit list of Pak-supported terror orgnisations. These blasts are not going to stop till we adopt a zero tolerance policy. We shall not tolerate even a single act of terror. Our Prime Minister or Home Minister lack the courage to talk about LeT or Indian Mujahideen being behind these attacks or even indicate their involvement in these attacks. Indian Mujahideen and Lashkar-e-Toiba are hand in gloves with each other. The government has not succeeded in getting permission from Pakistan to interrogate the masterminds of Mumbai attacks, whereas it has kept the lone surviving terrorist Kasab alive and Afzal Guru has also been kept as a showpiece. Why the government is afraid of hanging Afzal Guru, which can, otherwise give a clear message to the terrorists? Today, we remember Julius Reberio and KPS Gill, who had indicated to Punjab terrorists in no uncertain terms that if they kill one person, they will retaliate with killing ten and bullet will be replied by bullet. Punjab was not freed from terrorism by chance. There was a solid strategy working behind it. Will to act by the government was there and security forces had been given a free hand in taking action against the terrorists.
People of the country are fed up by the weak government policies in combating terrorism. It may not be untrue, if we say that the people have reached to the zero tolerance level. For how long the Mumbai residents will have to live under the fear of such terrorism? Why even a single terror act be tolerated? People are fed up of hearing that we are living in a dangerous neighbourhood. They are fed up of assurances of punishment to the culprits. They need guarantee of security, so that they can lead a life, free of fear. No doubt, it is necessary for them to revert back to normal life, but it doesn’t mean that they are ready to accept all types of nonsense. Had any leader been the victim of such a terror attack, would the government had adopted the same attitude? It is the poor, defenceless and innocent people who are always the victims, but the government would have to understand the mood of the public. Public is crying, “enough is enough”.
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