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Thursday, 8 October 2026

वोट छीनना संविधान के खिलाफ

पिछले तीन-चार महीने से पूरे देश में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और उनके द्वारा वोट चोरी को लेकर आंदोलन हो रहे हैं। कॉकरोच जनता पार्टी ने जून से इस आंदोलन को नीट पेपर लीक और अन्य परीक्षाओं के लीक होने से शुरू हुआ यह आंदोलन तब जोर पकड़ गया जब इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर चुनाव आयुक्तों में मतभेदों को लेकर छपी तब पूरे देश में आंदोलन छिड़ गया और यह दिन-प्रतिदिन बड़ा होता जा रहा है। इस बीच, पूरे देश की नजरें अब सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हुई हैं जहां दर्जनों याचिकाएं, चुनाव प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के आचरण को लेकर टिकी हुई हैं। इस बीच माननीय सुप्रीम कोर्ट के एक सिटिंग जज के इस पूरे प्रकरण पर विचार आए तो पूरे देश में उम्मीद की नई किरण जगी है। मैं बात कर रहा हूं सुप्रीम कोर्ट के माननीय सिटिंग जज जस्टिस उज्जवल भुईयां की। हैदराबाद के नालसार लॉ यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा है कि भारतीय नागरिक को वोट डालने का अधिकार संविधान की मूल संरचना का अंतिम हिस्सा है। अगर किसी प्रक्रिया के जरिए बड़ी संख्या में नागरिकों को मताधिकार से वंचित किया जाता है तो ऐसी प्रकिया मनमानी होगी। जस्टिस भुईयां ने कहा कि कोई भी बहाना नागरिकों को वोट का अधिकार छीनने को उचित नहीं कहा जा सकता। यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 326 का उल्लंघन होगा। जस्टिस भुईयां ने आगे कहा कि 18 साल की आयु पूरा करने वाले नागरिक संविधान में निर्धारित अयोग्यताओं को छोड़कर चुनाव में वोट देने का हकदार है। इन संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन करने वाला कानून अमान्य होगा। जस्टिस ने कहा कि मताधिकार नागरिकता की आत्मा है। आम नागरिक के लिए देश के शासन में भागीदारी का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम मतदान ही है। हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर चुनाव आयोग के वोटिंग लिस्ट में बदलाव की प्रक्रिया-स्पेशल इंटेंसिव रिविजन  (एसआईआर) का जिक्र नहीं किया। जस्टिस भुईयां मतदाता सूची से नाम हटाने के मामले में प्रक्रियात्मक सुरक्षा का भी सवाल उठाया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के लाल बाबू हुसैन बनाम इलेक्टोरल रजिस्टेशन ऑफिसर मामले के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि मृत मतदाता को छोड़कर किसी भी मतदाता का नाम नोटिस और सुनवाई का उचित अवसर दिए बिना मतदाता सूची से नहीं हटाया जा सकता। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची में शामिल होने का अधिकार नागरिकता से अलग नहीं किया जा सकता। इसे नागरिक से अलग करना ऐसा होगा जैसे शरीर से आत्मा निकाल देना। आम नागरिक के लिए देश के शासन में भागीदारी का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम मतदान ही है। जस्टिस भुईयां ने नालसार के छात्रों से कहा, आपने देश-दुनिया को दिखाया है कि यूनिवर्सिटी और खासकर कानून के छात्र को कैसा होना चाहिए। आप प्रतिभाशाली, निर्भीक और बहादुर हैं। याद रहे कि यही वह यूनिवर्सिटी है जब कुछ छात्रों ने सीजीआई सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में प्रस्तावित मुख्य अतिथि बनाने का विरोध किया था। कांग्रेस ने जस्टिस भुईयां की राय पर कहा कि इससे साबित होता है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने संविधान का उल्लंघन किया है। उनके पास पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है।  

-अनिल नरेन्द्र

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