Translater

Thursday, 29 October 2026

मार्को रुबियो सीधा जामनगर क्यों गए

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो हाल ही में भारत आए। पर वह हालांकि औपचारिक यात्रा पर आए थे पर वह प्रोटोकॉल के अनुसार राजधानी नई दिल्ली नहीं आए और न ही जैसे आमतौर पर होता है, न तो प्रधानमंत्री से मिले और न ही विदेश मंत्री एस. जयशंकर से। वह सीधे मुंबई गए और वहां वह उद्योगपति मुकेश अंबानी से मिले और उनके साथ जामनगर अंबानी की ऑयल रिफाइनरी देखने चले गए। जामनगर जाना अमेरिका के प्लान का बड़ा हिस्सा है। अमेरिका रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) के इस विशाल रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स की क्षमता को बहुत अच्छे से समझता है। वेनेजुएला के क्रूड को दुनिया में पहुंचाने के लिए यह कॉम्प्लेक्स बहुत बड़ा किरदार निभा सकता है। ऐसे में मार्को रुबियो का जामनगर का दौरा यूं ही नहीं है। रुबियो का यह दौरान ऐसे समय में हुआ जब अमेरिका वेनेजुएला के कच्चे तेल (व्रूड) के लिए नए बाजार तलाश रहा है। अमेरिका भारत से जोर देने में लगा है कि वह रूस से ऊर्जा आयात को कम करके अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाए। मार्को ने जामनगर में मुकेश अंबानी और मुंबई में टाटा और अडानी समूह से भी मुलाकात की। हमें लगता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में पूंजीपति अब अहम हिस्सा बन रहे हैं। जामनगर भारत की ऊर्जा से जुड़ी पेचिदा सियासत की एक खिड़की है। इसी सियासत ने हाल में अमेरिका, रूस और ईरान के साथ भारत के रिश्तों को आकार दिया है। बहस से कहीं आगे जामनगर भारत की ऊर्जा से जुड़ी पेचीदा सियासत की एक खिड़की है। रुबियो की अंबानी, टाटा और अडानी से वार्ता करना यह जरूर दिखाता है कि भारतीय पूंजी और देश की विदेश नीति के बीच रिश्ता गहरा होता जा रहा है। भारतीय कंपनियों का आर्थिक वजन बढ़ रहा है। उनकी पहुंच दुनिया भर में फैल रही है। ऐसे में वह भारत की कूटनीति के तरकश का एक अहम तीर बनती जा रही है। अमेरिकी कारोबार और विदेश नीति के रिश्ते को एक पुरानी कहावत बखूबी बयान करती है। जो जनरल मोटर्स के लिए अच्छा है वो अमेरिका के लिए भी अच्छा है। यानी जो भी अमेरिकी कंपनी अच्छी है वह अमेरिका के लिए भी अच्छी है। दुनिया के नेताओं के साथ मुकेश अंबानी को देखना भारतीय लोगों को शायद अजीब लगता हो। पर ये एक लम्बे बदलाव का नतीजा है। कुछ साल पहले भारत आने वाले विदेशी नेता अक्सर बेंगलूरू में इन्फोसिस कैंपस जाते थे। पर अब सीन शिफ्ट हो गया है। अब लगता है कि विदेशी मेहमानों का ज्यादा फोकस जामनगर व गुजरात पर है। जामनगर में हाईड्रोकार्बन की पुरानी अर्थव्यवस्था है। हाईड्रोकार्बन यानी तेल और गैस जैसे ईंधन। यह दुनिया का सबसे बड़ा रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स है। यहां अलग-अलग किस्म के कच्चे तेल को साफ किया जा सकता है और तैयार इं&धन दुनिया भर के बाजारों में भेजा जा सकता है। 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद जामनगर की अहमियत बढ़ी है। होर्मूज स्ट्रेट से होने वाली तेल सप्लाई में रुकावट ने भी इसकी अहमियत बढ़ाई है। अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था सिर्फ देश ने नहीं बनाई। पूंजी और तकनीक लम्बे समय से सरकारों के पास मौजूद विकल्पों पर असर डालती आई है। समझदार देश अपने यहां पूंजी को कुछ हाथों में जरूरत से ज्यादा सिमटने नहीं देते और दुनिया में इसकी भूमिका की शर्तें खुद तय करते हैं। भारतीय कंपनियां अब सरहदों के पार काम करने और भू-राजनीतिक उथल-पुथल से निपटने का पैमाना हासिल कर रही हैं। ऐसे में वो भारत के विदेशी रिश्तों में ज्यादा अहम खिल़ाड़ी बनेंगी। रुबियो का जामनगर दौरा याद दिलाता है कि आज की भारतीय विदेश नीति को समझने के लिए पूंजीवाद और आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय रिश्तों के उलझे हुए और कभी न टूटने वाले रिश्तों को बेहतर समझना होगा और इसका मतलब है कि दिल्ली की उलझी हुई विदेश नीति वाली बहसों में मुंबई का कारोबारी तर्क और बेंगलूरू की तकनीकी जरूरत भी घोली जाए। अमेरिका की विदेश नीति साफ है, सवाल यह है कि हमारी विदेश नीति क्या साफ है।   

-अनिल नरेन्द्र

No comments:

Post a Comment