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Thursday, 15 October 2026

नाराजगी क्या सिर्फ चुनाव आयोग से है या?

10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शनों को लेकर सरकार की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों को जिस बर्बरता से रोकने की कोशिश हुई उस पर सवाल उठ रहे हैं। 2026 में युवाओं से जुड़े विरोध प्रदर्शनों का दायरा अब सिर्फ रोजगार या परीक्षा तक सीमित नहीं रहा है। परीक्षा और रोजगार के सवालों से शुरू हुआ जेन-जी आंदोलन के बाद अब मतदाता सूची और चुनाव आयोग को लेकर भी जेन-जी और विपक्षी दलों के प्रदर्शन हो रहे हैं। आज का सवाल यह है कि युवा किन मुद्दों पर सड़कों पर आ रहे हैं और क्यों? क्या रोजगार की चिंता धीरे-धीरे संस्थाओं पर भरोसे की चिंता में बदल रही है? क्या परीक्षा में निष्पक्षता का सवाल और चुनाव में निष्पक्षता का सवाल, दोनों के पीछे व्यवस्था से न्याय मिलने के भरोसे का सवाल है? यह कुछ प्रश्न थे जिसको लेकर 10 अक्टूबर को राजधानी में ऐसा प्रदर्शन हुआ जो पहले कभी नहीं देखा गया था। जिस तरीके से प्रशासन-सरकार ने इससे निपटने के लिए हथकंडे अपनाए उससे सारी दुनिया में भारत की छवि खराब हुई। विदेशी मीडिया ने इस घटना को बड़ी कवरेज दी। और तो और पाकिस्तानी अखबार द डॉन ने अपनी रिपोर्ट में इस प्रदर्शन को भारत के पीएम मोदी के खिलाफ युवाओं का विद्रोह करार दिया। अखबार लिखता है कि यह पहली बार है जब कोई वायरल ऑनलाइन यूथ मूवमेंट सोशल मीडिया से निकलकर सीधे सड़कें पर आ गया है। द डॉन ने सीजेपी संस्थापक अभिजीत दीपके के 2.2 करोड़ इंस्टाग्राम फॉलोअर्स और युवाओं के बीच बढ़ती लोकप्रियता को भी हाइलाइट किया है। अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि एक तरफ दिल्ली की सड़कें  पर अफरा-तफरी का माहौल था, तो दूसरी तरफ संसद में मुस्कुराते हुए मिस्टर मोदी शांति की छवि पेश करने की कोशिश कर रहे थे और उन्होंने प्रदर्शनकारियों की मांगों को संबोधित नहीं किया। अखबार ने लिखा है कि सत्ताधारी बीजेपी ने भारत के युवाओं के भारी गुस्से को कमतर आंकने की गलती की है। साथ ही रिपोर्ट में कहा गया है कि पीएम मोदी की एक स्ट्रांगमैन वाली छवि में भी अब दरारें दिख रही हैं। न्यूयार्क टाइम्स ने सरकार समर्थक टीवी चैनलों पर भी तंज कसा कि जिन्होंने पहले इस प्रदर्शन को नजरअंदाज किया, वे बाद में संसद के आसपास दहशत का माहौल दिखाते नजर आए। बीबीसी ने अपनी रिपोर्ट में जंतर-मंतर पर तिरंगा और तख्तियां लिए प्रदर्शनकारियों और संसद की ओर जाने वाले रास्तों पर सुरक्षा बलों की भारी घेराबंदी के बीच टकराव को दिखाया है। रिपोर्ट में जिक्र है कि पुलिस के पीछे धकेलने पर कई प्रदर्शनकारी सिर से खून बहते हुए या लंगड़ाते हुए जंतर-मंतर की तरफ लौटे। बीबीसी के मुताबिक यह आंदोलन पीएम मोदी के खिलाफ हाल के वर्षें में असंतोष का सबसे बड़ा चेहरा बन गया है। फाईनेंशल टाइम्स के मुताबिक पुलिस ने भीड़ पर आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठियां बरसाईं। अखबार का मानना है कि यह प्रदर्शन मोदी सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती बन सकता है। रिपोर्ट में प्रदर्शनकारियों के उस नारे का विशेष जिक्र है, जिसमें वे चिल्ला रहे थे ः जब भी मोदी डरता है, पुलिस को आगे करता है। बिजनेस न्यूज ब्लूमबर्ग के अनुसार प्रदर्शनकारियों ने पीछे हटने से इंकार कर दिया है, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ गया है। ब्लूमबर्ग ने चेताया है कि यह बढ़ता असंतोष अगले साल मई तक होने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में बीजेपी के लिए यह एक बड़ा टेस्ट साबित होगा। वहीं वॉल स्ट्रीट जर्नल ने भी इसे पीएम मोदी के सामने सालों की सबसे बड़ी चुनौती करार दिया है। ब्रिटिश अखबार द गार्डियन ने अपनी हैडलाइन में लिखा हजारों सीजेपी प्रदर्शनकारियें ने पुलिस को चुनौती देते हुए दिल्ली में मार्च किया। इस भीड़ में मुख्य रूप से छात्र और जेन-जी युवा शामिल थे, जो मोदी सरकार से इस बात को लेकर बेहद नाराज हैं कि सरकार ने युवाओं को निराश किया है। द गार्डियन ने नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों में युवाओं द्वारा सरकारें गिराए जाने का हवाला देते हुए लिखा कि भारत में उस स्तर का विरोध प्रदर्शन हाल के वर्षें में एक असमान्य घटना है। सुरक्षा बलों की बर्बरता व सख्ती से विरोध के स्वर बेशक कुछ समय तक शांत किए जा सकते हैं, लेकिन अब यह आंदोलन रुकने वाला नहीं लगता। समस्या का हल तो संवाद से ही संभव है, जिसकी पहल की संभावना फिलहाल सरकार की ओर से नजर नहीं आ रही है। 

-अनिल नरेन्द्र

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