Translater

Monday, 20 June 2011

With Economist Manmohan Singh at the helm of affairs, inflation cannot be checked

- Anil Narendra
Unfortunately, no body in this country talks about the problem that directly affects 90 per cent of its people. Neither Anna Hazare, nor Baba Ramdev is concerned about this problem. One is obsessed with Lokpal, while the other insists on bringing the black money back. Both the issues may take years for any effective solutions, but none of the opposition party speaks on the issue which is taking its toll on the common man. This issue is of rising prices, of inflation. Rising prices have cornered the common man. The inflation rate has crossed the nine percent mark due to the rising prices of petrol and other essential commodities. People, however, will have to brace themselves for more inflationary pressure in the times to come. Petrol and diesel prices are likely to increase in the days ahead. Meanwhile, the Reserve Bank of India has increase its repo rate in its monetary review on June 16, which will result in costlier bank loans. Concerned over the losses to petroleum companies, the Union Petroleum Minister, Jaipal Reddy met Prime Minister Manmohan Singh and requested him to decide on price rise about diesel and LPG at the earliest. According to sources, the Petroleum Ministry wants to increase diesel prices by 3-4 rupees and LPG cylinder by 25-35 rupees. It has also recommended partial increase in the kerosene prices. Not a single minister in the Manmohan Singh government is bothered about the common man. On Tuesday, the Deputy Chairman of the Planning Commission, Montek Singh Ahluwalia warned, “if the burden of rising cost of the petroleum is not passed on to the people, the petroleum sector will be practically doomed”. Somewhat similar views were expressed by the
C Rangarajan, Chairman, PM’s Economic Advisory Council. He said, “OMCS Oil marketing companies are running into huge losses. If diesel prices are not increased, the budget will also be affected.” At present, the inflation rate is around nine percent and this has been attributed to the ill-timed increase in petrol prices.
The hard fact is that since Manmohan Singh has taken over as the Prime Minister, his monitory policies have broken the back of the poor. There are such people around him, who boast of high statistics, but do not care for the sufferings of the common man at grass root level. It is this liberalization, which is the root cause for multi-billion scams. Why there is no investigation into the working of these oil companies? Why no body is concerned about their excessive expenditure? Why efforts are not made to reduce government consumption? Manmohan Singh has not only become burden for his party, but he has turned to be number one enemy of the poor. He is unable to stop scams. There have been unprecedented scams during his tenure as Prime Minister. The Congress Party must understand that it can’t win next election with Manmohan Singh as its face. It is, therefore, advisable for the party to nominate a new prime Minister, if it wants to come to the power in the next elections. The policies of Manmohan Singh have ruined the life of common man. During his regime, properties of industrialists have increased manifold and the bureaucracy is reigning supreme. There are other leaders too in the Congress. For example, take the Defence Minister, AK Antony. He is an honest leader and had been the Chief Minister of Kerala. He has been an unblemished leader. During this period, the Manmohan Singh government has been crushed under the weight of scams. The Congress High Command is deeply concerned about 2014 general elections. The High Command strategists have started thinking that with Manmohan Singh, as Prime Ministerial candidate, it may not be able to stake claim for power for the third time in a row, as the opponents have started saying that Manmohan Singh is an honest Prime Minister of the most corrupt government till now. Some of the critics are even more pointed in their attacks. In a recent statement, AK Antony has said that forces opposed to the demand of transparency have rallied around the power center. If certain persons demand virtues in power, then what is wrong in it. Special meanings are being attributed to these comments at this time. It is being considered as the preparation for the next phase. At that time ‘the Manmohan of Congress’ will be AK Antony. He, however, enjoys trust of 10 Janpath. His only drawback is that he is a Christian. But, Congressmen say that Antony has more faith in pure Hindu culture than any other Hindu leader. What do you think? This is much is certain that the bureaucratic tendencies of Manmohan Singh will not lead to the welfare of the common man and the inflation will continue to rise and the rich will continue to become richer and poor much poorer. People are frustrated with the BJP too. Why doesn’t it openly oppose the proposed hike in prices of petrol, diesel etc? Why doesn’t it demonstrate against galloping price rise? To send a protest letter or issue an statement afterwards will not be sufficient. The first agenda of the BJP, therefore, must be to stop the government from taking step in this direction and pressurize it in taking effective measures to curb the inflation.

Sunday, 19 June 2011

अल जवाहिरी के आने से अमेरिका की मुश्किलें बढ़ेंगी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th June 2011
अनिल नरेन्द्र
ओसामा बिन लादेन के मरने का अमेरिका की `वॉर ऑन टेरर' पर पता नहीं क्या असर पड़ेगा? उसकी अफगानिस्तान में, पाकिस्तान में और दुनिया के अन्य भागों में समस्या कम होगी या उसमें एक बार फिर वृद्धि होगी? यह हैं कुछ प्रश्न जो अमेरिकन अधिकारियों को जरूर सता रहे होंगे। अलकायदा संगठित होता जा रहा है। नए अलकायदा प्रमुख की घोषणा हो चुकी है। पेशे से आंखों के डाक्टर, मिस्र के `इस्लामिक जेहाद' नाम के कट्टरपंथी संगठन के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अयमान अल जवाहिरी को अब अलकायदा का प्रमुख बना दिया गया है। ओसामा बिन लादेन का दाहिना हाथ माने जाने वाले जवाहिरी कुछ मायनों में लादेन से ज्यादा खतरनाक साबित हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि 9/11 हमलों में अल जवाहिरी का ही दिमाग था। वर्ष 2001 में जिन 22 संदिग्ध आतंकवादियों की सूची जारी की गई थी उसमें ओसामा बिन लादेन के बाद जवाहिरी का दूसरा नम्बर था। अमेरिका ने जवाहिरी पर 25 मिलियन डालर का ईनाम रखा है। बताया जाता है कि जवाहिरी आखिरी बार अक्तूबर 2001 में अफगानिस्तान के खोस्त शहर में देखा गया था। अफगानिस्तान में तालिबान के खात्मे के बाद से वह भूमिगत हो गया था। हाल के वर्षों में अल जवाहिरी अलकायदा के सबसे मुखर प्रवक्ता के रूप में उभरकर सामने आया है। जवाहिरी पढ़ा-लिखा है और उसने 1974 में काहिरा के मेडिकल कॉलेज से स्नातक की उपाधि और चार साल बाद यहीं से सर्जरी में मास्टर्स की डिग्री हासिल की थी। उसे अरब जगत के सबसे पुराने कट्टरपंथी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ जुड़ने के कारण महज 15 साल की उम्र में पहली बार गिरफ्तार किया गया था।
जवाहिरी की ताजपोशी से परेशान अमेरिका ने उसका भी वही हश्र करने की धमकी दी है जो लादेन के साथ किया। अमेरिका के ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ माइक मुलेन ने कहा कि जैसा कि हमने लादेन को पकड़ने और मारने, दोनों की कोशिश और मारने में सफल भी रहे, हम जवाहिरी के साथ भी निश्चित रूप से ऐसा ही करेंगे। अमेरिका की मुश्किल इसलिए भी बढ़ सकती है, क्योंकि पाकिस्तान में हालात दिन-ब-दिन बदतर होते जा रहे हैं। ओसामा बिन लादेन के ऑपरेशन से पाकिस्तान में हलचल बढ़ती जा रही है। पाक सेना प्रमुख अशफाक कयानी और आईएसआई प्रमुख पाशा पर दबाव बढ़ता जा रहा है। कयानी को अमेरिका के प्रति नरम होने के आरोप में हटाने की मुहिम चल रही है। आईएसआई ने लादेन के ठिकाने के बारे में अमेरिकी अधिकारियों को ठोस जानकारी देने के आरोप में पांच जासूसों को गिरफ्तार कर लिया है। इनमें एक पाकिस्तानी सेना का मेजर भी शामिल है। उधर एक अमेरिकी सीनेटर ने एक बैठक में सीआईए के डिप्टी डायरेक्टर माइकल मोरेल से पूछा कि पाकिस्तान अमेरिका को आतंकवाद से लड़ने के मुद्दे पर कितना समर्थन दे रहा है? तो जवाब में मोरेल ने कहा कि 10 में से 3 अंक। मतलब अमेरिका पाक की गतिविधियों से बिल्कुल नाखुश है। दि न्यूयार्प टाइम्स के अनुसार अमेरिका में इस बात की सख्त नाराजगी है कि पाक सरकार ने उन लोगों पर तो कोई कार्रवाई की नहीं जिन्होंने ओसामा बिन लादेन को छिपाने में मदद की थी, लेकिन जिन लोगों ने लादेन को मारने में मदद की थी, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। आने वाला समय अमेरिका के लिए इस मामले में चुनौतीपूर्ण होगा।
Tags:Afghanistan, Aiman Al Zawahiri, Al Qaida, America, Anil Narendra, CIA, Daily Pratap, Osama Bin Ladin, Pakistan, Terrorist, Vir Arjun

क्या इतने अनुकूल माहौल का भाजपा फायदा उठा पाएगी?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th June 2011
अनिल नरेन्द्र

किसी भी विपक्षी दल के लिए न तो यूपीए सरकार से बेहतर और कोई सत्तारूढ़ सरकार हो सकती थी और न ही इतना खराब राजनीतिक माहौल जितना मनमोहन सिंह सरकार ने कर दिया है। कोई भी विपक्षी दल ऐसे राजनीतिक माहौल का इंतजार करता रहता है जब इतनी विवादास्पद केंद्र सरकार हो जितनी यह सरकार है। इस सरकार ने देश को क्या-क्या नहीं दिया? बढ़ती कीमतें, महंगाई, एक के बाद एक घोटाला, आतंकवाद जैसे ज्वलंत मुद्दे पर ढुलमुल नीति, नक्सलियों से रणनीति व इच्छाशक्ति का अभाव, तानाशाह रवैया इत्यादि इत्यादि। कहने का मतलब है कि भारतीय जनता पार्टी जो प्रमुख विपक्षी दल है वह इससे बेहतर राजनीतिक वातावरण की उम्मीद नहीं कर सकती थी। खुद भाजपा नेता अरुण जेटली कहते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को राजनीतिज्ञ नहीं बल्कि नौकरशाह चला रहे हैं। आजादी के बाद की इतनी भ्रष्ट, निकम्मी और कूर सरकार जनता ने पहले कभी नहीं देखी थी। यह सरकार अपने पांच वर्ष पूरे नहीं करेगी क्यों जनता अब कांग्रेस सरकार को फूटी आंख भी देखना नहीं चाहती है। यह कड़ी टिप्पणी राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता अरुण जेटली ने प्रदेश भाजपा द्वारा आयोजित संघर्ष के एक वर्ष कार्यक्रम में हाल में कही। जेटली ने कहा कि भाजपा को आंदोलन करने का शौक नहीं है पर मनमोहन सिंह सरकार रोज एक के बाद एक ऐसी गम्भीर गलतियां कर रही है कि भाजपा को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। देश को ऐसा प्रधानमंत्री चला रहा है जो अदृश्य है। पर्दे के पीछे सत्ता की बागडोर किन्हीं अन्य हाथों में है, इतिहास में ऐसा कहीं देखने को नहीं मिलता, जहां सो रहे हजारों निहत्थे लोगों पर रात के अंधेरे में पुलिस टूट पड़ती हो, सोते हुए महिलाओं और बच्चों पर लाठियां बरसाई जाएं, आंसू गैस के गोले दागे जाएं। बन्द पंडाल में कहीं भी आंसू गैस के गोले नहीं छोड़े जाते हैं। जेटली ने इस सरकार को हैडलैस चिकन कहा। इसका मतलब है कि इस सरकार का कोई सिर-पैर नहीं, कोई वालीवारिस नहीं है।
मनमोहन सिंह सरकार का जो खाका जेटली साहब ने खींचा है वह बहुत हद तक सही है पर सवाल यह उठता है कि जब मनमोहन सिंह सरकार की इतनी बुरी दशा बन गई है तो इसका राजनीतिक लाभ क्या प्रमुख विपक्षी दल के नाते भारतीय जनता पार्टी उठा पा रही है? हमने देखा कि भाजपा विपक्ष में होते हुए भी विपक्ष की भूमिका सही तरीके से नहीं निभा पाई। मैं यूपीए-1 की बात कर रहा हूं। तब भाजपा नहीं वाम दल प्रमुख विपक्ष की भूमिका बेहतर निभा रहे थे। यूपीए-2 में तो कामरेड मौजूद नहीं और सारा विपक्षी दारोमदार भाजपा पर ही आ जाता है पर ईमानदारी से भाजपा नेताओं को प्रश्न करना होगा कि क्यों नहीं वह स्थितियों का फायदा उठा पा रहे हैं? क्या कारण हैं कि इतना अनुकूल माहौल होने के बावजूद आज जनता में वह इतना विश्वास पैदा नहीं कर पा रहे कि जनता उन्हें केंद्र में सत्ता सौंपने की हिम्मत जुटाए? इसमें कोई शक नहीं कि राज्यों में भाजपा सरकारें अच्छा काम कर रही हैं, उनकी छवि भी अच्छी है और जनता को कहने को वह कह सकते हैं कि हम केंद्र में भी ऐसा शासन दे सकते हैं तावक्ते कि आप हमें मौका दें पर राज्यों में अगर भाजपा सरकारें अच्छा काम कर रही हैं तो उसका मुख्य कारण है मजबूत नेतृत्व। हर राज्य में एक मजबूत मुख्यमंत्री है और उसी मुख्यमंत्री के रहते, उसकी वजह से ही राज्य में अच्छा शासन चल रहा है। गुजरात में नरेन्द्र मोदी, मध्य प्रदेश में शिवराज चौहान, उत्तराखंड में रमेश चन्द्र पोखरियाल निशंक इत्यादि। इनकी व्यक्तिगत छवि और दृष्टि, कारगुजारी ही अच्छे शासन की प्रमुख वजह है न कि केंद्रीय नेतृत्व। केंद्र में तो भाजपा नेतृत्व न के बराबर है। दुःख से कहना पड़ता है कि यह दूसरी पंक्ति के युवा नेता आपस में ही एक-दूसरे की काट करने से नहीं बाज आते। न तो इनकी नजरों में पार्टी का कोई महत्व है और न ही इन्हें इस बात की परवाह है कि कार्यकर्ता क्या सोचता है, जनता की तो बात छोड़ो। इनके अपने-अपने निजी एजेंडे पार्टी एजेंडे से ऊपर हैं। निजी महत्वाकांक्षाएं संगठित ढंग से काम करने में आड़े आ रही है। यही वजह है कि इतना अच्छा माहौल होने के बावजूद आज जनता में यह वह विश्वास पैदा नहीं कर पा रहे जो करना चाहिए था। अटल जी आडवाणी जी के नेतृत्व में भाजपा ने सुनहरा युग देखा। उनके रहते पार्टी, पार्टी लगती थी, उनकी अपनी छवि थी, कार्यकर्ताओं से वह जुड़े थे, जनता की नब्ज को समझते थे पर आज का नेतृत्व अपने एयरकंडीशन कमरों में ही अपना गुणगान कर अंक बढ़ाता रहता है।
दुःख की बात है पर सच यही है कि आज भारत की जनता का सभी राजनीतिक दलों से, नेताओं से विश्वास उठ चुका है। उसकी नजरों में सभी एक समान हैं यानि कि हमाम में सब नंगे हैं। वह भाजपा से जानना चाहती है कि जो समस्याएं आज देश के सामने मुंह फाड़ रही हैं उनसे अगर उन्हें मौका मिले तो वह कैसे निपटेंगे? वह जानना चाहती है कि भाजपा नेतृत्व कौन-कौन से ऐसे कदम उठाएगा जिससे घोटाले रुकें, कीमतों पर नियंत्रण हो, महंगाई कम हो, बेरोजगारी घटे, कानून-व्यवस्था सुधरे, बिजली-पानी जैसी ज्वलंत समस्याओं का समाधान हो? क्यों जनता इन पर ज्यादा विश्वास करे? यह है कि कुछ प्रश्न जिनका मेरी राय में भाजपा नेतृत्व को जवाब देना होगा। जनता को बताना होगा कि अगर आप हमें सत्ता में लाएं तो हम आपकी इन समस्याओं का ऐसे समाधान करेंगे पर इसके लिए सबसे पहले भाजपा को अपना घर साधना होगा। उसे सही नेतृत्व तय करना होगा। अपनी प्राथमिकताएं सही करनी होंगी। अब तो भाजपा यह भी नहीं कह सकती कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उनके कामकाज में दखलंदाजी करता है। संघ जब से मोहन भागवत के हाथ आया है, राजनीति से कुछ हद तक अलग हो गया है, अब संघ रोजमर्रा के मामलों में दखल नहीं देता। हो सकता है कि भाजपा के कुछ नेताओं को मेरे विचार अच्छे न लगें पर उन्हें समझना चाहिए कि मैं जो कुछ कह रहा हूं यह एक तरह से जनता की आवाज है और आज बहुत से लोग यह चाहते हैं कि भाजपा पहले अपना घर ठीक करे ताकि जल्द आने वाले मौके का पूरा-पूरा फायदा उठा सके।
Tags: Anil Narendra, Arun Jaitli, Congress, Corruption, Daily Pratap, L K Advani, Modi, RSS, Vir Arjun

Friday, 17 June 2011

अन्ना के लोकपाल बिल को जोकपाल बिल बनाने का प्रयास

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18th June 2011
अनिल नरेन्द्र
लगता है कि अन्ना हजारे के लोकपाल बिल पर सदी के सबसे बड़े चन्द्र ग्रहण का असर हो गया है, लोकपाल बिल, जोकपाल बिल बनकर रह गया है। देश को बहुत उम्मीद थी कि सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों और सरकार के बीच शायद कोई सहमति बन जाए पर ऐसा नहीं हो सका। अन्ना और उनके साथियों का कहना है कि सरकार हमारी तो दलीलें सुनने को तैयार ही नहीं थी और केवल अपनी बात करती रही। सरकार यह चाहती है कि लोकपाल के नाम पर 11 सदस्यों की एक बॉडी हो, जो ऊंचे लेवल पर कुछ मामलों में भ्रष्टाचार की जांच करे। उसके पास अपनी कोई जांच एजेंसी नहीं होगी जबकि सिविल सोसाइटी चाहती है कि इस बॉडी को सभी लेवल पर भ्रष्टाचार की जांच और सजा तय करने का हक मिले। उसके पास जांच की अपनी मशीनरी हो ताकि वह सरकार से आजाद रहे। प्रधानमंत्री और जजों को जांच के दायरे में लाने पर भी सहमति नहीं बन पाई। दोनों ही पक्षों ने इस बात की पुष्टि की कि 15 जून की इस बैठक में प्रधानमंत्री, उच्च न्यायपालिका और संसद के अन्दर सांसदों के आचरण को प्रस्तावित लोकपाल की जांच के दायरे में लाने के मुद्दे पर कोई बातचीत नहीं हुई। वार्ता के बाद कपिल सिब्बल ने संवाददाताओं से कहा, हमने फैसला किया है कि 20 और 21 जून को होने वाली अगली बैठक में दोनों पक्ष अपना-अपना प्रस्ताव विचार के लिए रखेंगे। फिर भी दोनों प्रस्तावों पर सहमति नहीं बनी, तो मंत्रिमंडल के समक्ष वोटों का एक संयुक्त प्रस्ताव भेजा जाएगा। इसमें सहमति और असहमति के बिन्दु स्पष्ट रूप से रेखांकित होंगे। उन्होंने कहा कि दोनों प्रस्ताव सार्वजनिक किए जाएंगे। इस प्रक्रिया में सरकार राजनीतिक दलों को भी शामिल करना चाहती है। समिति के सदस्य अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि असहमति के बावजूद हम 20 और 21 जून को बैठक में शामिल होंगे और अपना पक्ष पेश करेंगे ताकि जनता देख सके कि कौन-सा मसौदा उचित है। इस महत्वपूर्ण बैठक से निराश अन्ना हजारे ने बृहस्पतिवार को कहा कि लोकपाल मसौदा विधेयक के दो संस्करण कैबिनेट को भेजने के सरकार के निर्णय पर आश्चर्य है। उन्होंने साफ कहा कि सरकार का सख्त लोकपाल कानून बनाने की कोई मंशा नहीं है और अगर कमजोर कानून बना तो वह 16 अगस्त से फिर अनशन करेंगे। उन्होंने कहा कि जब अप्रैल में मैंने अनशन किया था तो सरकार ने हमारे सभी सुझाव मानने का वादा किया था। अब सरकार अपने वादों से मुकर रही है। बाबा रामदेव के आंदोलन को जिस तरह तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश की गई, अगर वैसा ही हमारे साथ हुआ तो हम इसके लिए तैयार हैं। हम गिरफ्तारी देंगे। लाठी खाने और गोलियां खाने को तैयार हैं। हजारे के साथी अरविन्द केजरीवाल ने कहा, `सरकार एक सख्त कानून बनाने और उसका श्रेय लेने का मौका खो रही है। अब सरकार लोकपाल नहीं बल्कि जोकपाल विधेयक लाना चाहती है। क्या समाज के सदस्य सरकार को ब्लैकमेल कर रहे हैं।' इस पर अन्ना हजारे ने कहा कि अगर राष्ट्रहित और समाज हित में कोई बात उठाना `ब्लैकमेल' करना है तो हमें यह आरोप भी स्वीकार है।

यह जितना आपत्तिजनक है उतना ही निराशाजनक कि कांग्रेस पार्टी और केंद्र सरकार बाबा रामदेव के बाद अब अन्ना हजारे के आंदोलन को टांय-टांय फिस्स करने में लगी हुई है। पहले तो कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने फिर स्वयं वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने जिस तरह अन्ना हजारे के रवैये के बहाने उनकी मांगों को खारिज किया उससे इस आशंका की पुष्टि होती है कि सरकार ने भ्रष्टाचार के मुद्दे से देश का ध्यान हटाने के लिए हर हथकंडा अपनाया है। यह हास्यास्पद है कि कांग्रेस अन्ना हजारे को बदनाम करने के लिए कभी तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुखौटा बताने की हिमाकत करती है तो कभी यह कहती है कि मुट्ठीभर सिविल सोसाइटी के लोग क्या जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों से ऊपर हैं? हम सरकार से पूछना चाहते हैं कि अगर अन्ना हजारे यह चाह रहे हैं कि एक मजबूत लोकपाल बनाया जाए तो आखिर इसमें अनुचित-असंवैधानिक क्या है? यदि कांग्रेस की नजर में विपक्ष और विशेष रूप से भाजपा भ्रष्टाचार के मामले में ईमानदार नहीं तो फिर अन्ना, उनके साथियों और समर्थकों को क्या फेल किया जाने का प्रयास हो रहा है? यदि अन्ना के समर्थन में सिर्प मुट्ठीभर लोग हैं तो फिर यह हड़बड़ाहट क्यों? यदि केंद्रीय सत्ता भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए प्रतिबद्ध है तो फिर यह प्रतिबद्धता नजर क्यों नहीं आती?

हम सरकार और कांग्रेस पार्टी से सीधा सवाल करना चाहते हैं कि क्या एक बार निर्वाचित होने से ही किसी सरकार और चुने हुए सांसदों, प्रतिनिधियों को अगले पांच साल के लिए भ्रष्टाचार, हत्या, गबन या बलात्कार की इजाजत मिल जाती है? सरकार की सोच तो साफ है, हम पांच साल के लिए चुने गए हैं, हमें राज करने के लिए बस संसद के अन्दर अपनी अर्थमैटिक्स ठीक रखनी है, अंकगणित मैनेज करना है, जनता चीखती है तो चीखती रहे। आखिर कितने दिन चिल्लाएगी, आंदोलन, अनशन करेंगे? असल में यह सरकार जब प्रेशर बनता है तो बौखला जाती है। इसका एक उदाहरण 4 जून को रामलीला मैदान में मिला। हमने देखा कि घबराहट में पहले तो सरकार सारी बातें मान जाती है और बाद में सबसे धीरे-धीरे मुकर जाती है और आंदोलन करने वाले नेताओं को डराने-धमकाने का काम करने लगती है। हमें आश्चर्य नहीं हुआ जब यह खबर आई कि लोकपाल बिल बनाने की मुहिम की अगुवाई कर रहे अन्ना हजारे के ट्रस्ट के खातों पर आयकर विभाग की नजर टेढ़ी हो गई है। लोकपाल पर मसौदा समिति की बैठक से ऐन पहले इनकम टैक्स विभाग के अफसरों ने अन्ना के दफ्तर पर दस्तक दी। सूत्रों के मुताबिक विभाग के अधिकारियों ने ट्रस्ट के दफ्तर जाकर जांच की और करीब पांच घंटे पूछताछ की। सरकार हर हालत में बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के प्रयासों को असफल करेगी। इसके लिए जरूरत के अनुसार वह साम, दाम, दण्ड, भेद सभी हथकंडों व हथियारों का इस्तेमाल करेगी पर अन्ना और बाबा, दोनों ही डरने वाले नहीं और वह जनता की उम्मीदों पर खरे उतरेंगे। उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि भारत की जनता अब जागृत हो चुकी है और यह जो आंधी शुरू हुई है यह रुकने वाली नहीं। सरकार चाहे जितनी कोशिश करे, लोकपाल बिल को जोकपाल विधेयक बनाने की कोशिश करे, हिसाब तो उसे जनता को देना ही होगा।
Tags: Anil Narendra, Anna Hazare, BJP, Congress, Daily Pratap, Kapil Sibal, Kejriwal, Lokpal Bill, Manmohan Singh, Vir Arjun

स्वामी निगमानन्द की मृत्यु के लिए जिम्मेदार कौन?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17th June 2011
अनिल नरेन्द्र
जिस वक्त देश के तमाम इलैक्ट्रॉनिक चैनलों व प्रिन्ट मीडिया का ध्यान बाबा रामदेव पर लगा हुआ था और बाबा अपना नौ दिन पुराना अनशन तोड़ रहे थे उसी वक्त उसी अस्पताल में एक युवा संन्यासी स्वामी निगमानन्द लगभग चार महीने के अनशन की वजह से अपने आखिरी क्षण गिन रहे थे। स्वामी निगमानन्द की उम्र बस 34 वर्ष की थी और वह गंगा में अवैध खनन के विरोध में 19 फरवरी से भूख हड़ताल पर थे। इधर बाबा रामदेव ने अनशन तोड़ा, उधर स्वामी निगमानन्द ने प्राण त्यागे। यह खबर लोगों तक देर से पहुंची तो इसलिए नहीं कि स्वामी कुछ दिनों से अनशन पर थे या उनके अनशन का मुद्दा कमजोर था। ताज्जुब है कि सूचना के तीव्र बहाव वाले इस दौर में भी एक मौत की खबर महज इसलिए हमसे छूट गई क्योंकि उसके पीछे कोई ड्रामा नहीं था। स्वामी जी गंगा की अविरलता और पवित्रता को अक्षुण्ण रखने को लेकर भूख हड़ताल पर थे। वे चाहते थे कि गंगा क्षेत्र में खनन पर पूरी तरह रोक लगे और हिमालन स्टोन केशर को पुंभ क्षेत्र से हटाया जाए। उनकी यह मांग तकरीबन वैसी ही थी जिस पर सरकार अपने तरीके से चिन्ता जताते हुए करोड़ों रुपये स्वाहा कर देती है और नतीजा सिफर निकलता है। स्वामी ने अपनी मांगों को लेकर 19 फरवरी को अनशन शुरू किया था। अनशन के 68वें दिन 27 अप्रैल को उनकी तबीयत खराब हुई तो प्रशासन ने उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया। 30 अप्रैल को यह खबर उड़ी कि स्वामी को नर्स ने जहर देकर मारने की चेष्टा की है। 2 मई को वह कोमा में चले गए तो उन्हें इलाज के लिए देहरादून के उसी हिमालयन इंस्टीट्यूट जोली ग्रांट अस्पताल में पिछले 2 मई को भर्ती कराया गया, जहां बाबा रामदेव भर्ती थे। पिछले रविवार को महज 34 वर्ष की उम्र में ऊर्जा और निष्ठा से भरे इस युवा संत की मृत्यु हो गई। यह घटना यह बताती है कि किसी सच्चे उद्देश्य से अगर कोई अनशन बिना ढोल-नगाड़े के किया जाए तो सत्तासीन वर्ग, तमाम मीडिया (जिनमें हम भी शामिल हैं) उसके प्रति कितना संवेदनहीन होते हैं। भाजपा ने स्वामी रामदेव के अनशन को लेकर आसमान सिर पर उठा लिया, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज देहरादून जाकर उनके समर्थन में प्रेस कांफ्रेंस भी कर आईं, लेकिन उसी अस्पताल में भर्ती स्वामी निगमानन्द की सुध किसी ने नहीं ली। कांग्रेस ने भी इस पर अपनी राजनीति चमकानी आरम्भ कर दी और उत्तराखंड की भाजपा की सरकार पर ताने मारने आरम्भ कर दिए। दरअसल गंगा की पवित्रता इन राजनीतिक दलों के लिए कोई खास महत्व ही नहीं रखती। गंगा की पवित्रता की कसम खाने वाली तमाम राजनीतिक पार्टियों का रवैया जमीनी स्तर पर एक-सा है। उत्तराखंड में अवैध खनन माफिया को मिलने वाला राजनीतिक संरक्षण हो या फिर पनबिजली परियोजनाओं का गोलमाल, इसमें किसी एक पार्टी को दोष नहीं दिया जा सकता। कोर्टों का भी नजरिया उत्साहवर्द्धक नहीं रहा। गंगा के प्रदूषण के लिए जो तत्व जिम्मेदार हैं, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करना इसलिए भी असम्भव लगता है, क्योंकि उनसे सत्ताधारियों के राजनीतिक और आर्थिक हित जुड़े हुए हैं। लगभग 20 वर्ष बाद और दो हजार करोड़ रुपये खर्च करके यह मालूम हुआ कि योजना की शुरुआत में गंगा जितनी प्रदूषित थी, आज उससे कहीं ज्यादा प्रदूषित हो गई है। अब 7000 करोड़ की एक विशाल परियोजना शुरू की जा रही है। स्वामी जी के देहांत पर बेहद दुःख भी है और शर्मिंदगी भी।

अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह के रहते महंगाई कम होने वाली नहीं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17th June 2011
अनिल नरेन्द्र
यह इस देश का दुर्भाग्य ही समझा जाए कि कोई भी उस समस्या की बात नहीं करता जो भारत की 90 फीसदी जनता को सीधा प्रभावित करती है। न तो अन्ना हजारे इसकी बात करते हैं और न ही बाबा रामदेव। एक लोकपाल पर अड़ा हुआ है दो दूसरा काले धन को वापस लाने पर। दोनों ही मुद्दों पर कोई प्रभावशाली अमल होने पर वर्षों लग जाएंगे पर जो मुद्दा जनता को खा रहा है उस पर कोई विपक्षी दल भी खुलकर नहीं बोलता। यह मुद्दा है महंगाई का। कीमतों की वृद्धि ने जनता की नाक में दम कर रखा है। पेट्रोल और कई जरूरी वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी के चलते मई में महंगाई पर बढ़कर नौ फीसदी से ऊपर हो गई है। लेकिन आम जनता को महंगाई की चौतरफा मार के लिए अभी और कमर कसकर रखनी होगी। आने वाले दिनों में डीजल और रसोई गैस के दामों में भी इजाफा होने के आसार हैं। वहीं रिजर्व बैंक ने भी 16 जून को अपनी मौद्रिक समीक्षा में एक बार फिर से मूल दर में इजाफा कर दिया है, जिससे बैंकों का कर्ज और महंगा हो जाएगा। तेल कम्पनियों को हो रहे घाटे से चिंतित पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी ने मंगलवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात कर डीजल और एलपीजी सिलेंडर के दामों में वृद्धि पर जल्द फैसला करने की गुजारिश की। सूत्रों के मुताबिक तेल मंत्रालय डीजल के दामों में 3-4 रुपये प्रति लीटर और एलपीजी सिलेंडर पर 25-35 रुपये की बढ़ोतरी चाहता है। उसकी केरोसिन की कीमतों में भी आंशिक इजाफा करने की सिफारिश है। मनमोहन सरकार में कोई ऐसा मंत्री नहीं जिसे जनता की भी थोड़ी-सी चिन्ता हो। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने मंगलवार को आगाह किया कि यदि पेट्रोलियम की बढ़ती लागत का बोझ ग्राहकों पर न डाला गया तो इससे `पेट्रोलियम क्षेत्र व्यावहारिक रूप से तबाह हो जाएगा।' कुछ इसी तरह का विचार प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष सी. रंगराजन ने भी व्यक्त किए। रंगराजन ने कहा, `ओएमसीएस तेल विपणन कम्पनियों को भारी नुकसान हो रहा है। अगर डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की गई तो बजट पर भी भार बढ़ेगा।' मुद्रास्फीति फिलहाल करीब नौ प्रतिशत है और इसके लिए मुख्य तौर पर पेट्रोल की असमय कीमतों में बढ़ोतरी को माना जा रहा है।
कटु सत्य यह है कि जब से मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने हैं उनकी आर्थिक नीतियों ने गरीबों की कमर तोड़ कर रख दी है। उनके इर्द-गिर्द भी ऐसे लोग हैं जो आंकड़ों की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं पर जमीन पर आम आदमी पर क्या गुजर रही है, इसकी किसी को परवाह नहीं। इसी उदारीकरण में अरबों के घोटाले हो रहे हैं। इन तेल कम्पनियों की क्यों नहीं जांच की जाती? इनमें कितनी धांधली है, इनके अनाप-शनाप खर्चों पर क्यों नहीं किसी का ध्यान जाता? सरकारी खपत को क्यों कम नहीं करने की कोशिश की जाती? मनमोहन सिंह अब न केवल अपनी पार्टी के लिए ही बोझ बनते जा रहे हैं बल्कि गरीब जनता के दुश्मन नम्बर वन बन गए हैं। यह कोई घोटाला तो रोक नहीं पाते। जितने घोटाले इनके राज में हुए हैं, किसी अन्य प्रधानमंत्री के राज में नहीं हुए। कांग्रेस को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि मनमोहन सिंह उन्हें अगला चुनाव नहीं जिता सकते। इसलिए अगर कांग्रेस अगले चुनाव में फिर से सत्ता में आने की सोच रही है तो बेहतर है प्रधानमंत्री नया चुन लें। मनमोहन सिंह की नीतियों ने आम जनता को तबाह कर दिया है। इनके शासन में उद्योगपतियों की सम्पत्तियां कई गुना बढ़ गई हैं, नौकरशाहों का बोलबाला है। कांग्रेस में और भी तो नेता हैं। उदाहरण के तौर पर रक्षामंत्री एके एंटनी को ही ले लीजिए। वह एक ईमानदार नेता हैं, केरल के मुख्यमंत्री भी रहे हैं। लेकिन उनके दामन पर कभी दाग नहीं लगा। इस दौर में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार तमाम घपलों-घोटालों के फेर में तार-तार हो गई है। कांग्रेस आला कमान को 2014 के लोकसभा चुनाव की चिन्ता हो रही है। आला कमानों के बीरबलों को लगने लगा है कि अब मनमोहन सिंह के चेहरे को लेकर तीसरी बार सत्ता पाने के लिए दाव लगाना ठीक नहीं होगा। क्योंकि विरोधियों ने यह कहना शुरू कर दिया है कि मनमोहन सिंह आज तक के सबसे भ्रष्ट सरकार के ईमानदार प्रधानमंत्री हैं। कुछ आलोचक तो और तीखी मार करने लगे हैं। एके एंटनी ने हाल के बयान में कि सत्ता के आसपास तमाम ताकतों का जमावड़ा हो गया है, जो कामकाज में पारदर्शिता की मांग का विरोध करते हैं। आखिर खास लोग सत्ता सुचिता की उम्मीद करते हैं तो क्या गलत करते हैं। इस मौके पर इस टिप्पणी के खास मायने समझे जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि यह तैयारी अगले दौर के लिए है। उस समय कांग्रेस के `मनमोहन' एके एंटनी ही होंगे। वैसे भी वह दस जनपथ के विश्वासपात्र हैं। उनके खिलाफ इतना ही जाता है कि वे ईसाई हैं। लेकिन कांग्रेस के लोग कहते हैं कि एंटनी किसी हिन्दू नेता के मुकाबले ज्यादा शुद्ध हिन्दू संस्कृति को मानने वाले हैं। आप क्या समझे? इतना तय है कि मनमोहन सिंह जिस नौकरशाह प्रवृत्ति के हैं, उसमें आम जनता का भला हेने वाला नहीं और यह महंगाई यूं ही बढ़ती जाएगी, अमीर और अमीर होता जाएगा, गरीब और गरीब। जनता को भारतीय जनता पार्टी से भी निराशा है। क्यों नहीं वह पेट्रोल, डीजल इत्यादि की प्रस्तावित वृद्धि का खुलकर विरोध करते? क्यों नहीं महंगाई को लेकर धरना-प्रदर्शन करते? सरकार को बाद में एक प्रोटेस्ट लेटर देना या बयान देना काफी नहीं है। उसे ऐसा करने से रोकना, महंगाई कम करने के ठोस कदम उठाने पर मजबूर करना भाजपा का पहला एजेंडा होना चाहिए।

Thursday, 16 June 2011

सुप्रीम कोर्ट का सीधा सवाल ः कहां गया घूस का 200 करोड़?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 16th June 2011
अनिल नरेन्द्र
जो काम राजनेता नहीं कर सके वह काम माननीय सुप्रीम कोर्ट कर रहा है। सरकार चाहे जितना भी मामले को दबाने की कोशिश करे पर जब तक सुप्रीम कोर्ट है इस देश को विश्वास है कि न्याय जरूर होगा। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले मामले में अगर सुप्रीम कोर्ट इतना सख्त न होता तो शायद इतने आरोपी तिहाड़ के अन्दर न होते। यह मैंने इसी कॉलम में कुछ दिन पहले लिखा था कि जेल तो ठीक है पर पैसे का क्या हुआ? कनिमोझी की जमानत याचिका के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह मामला भी उठा दिया है। कोर्ट ने 2जी स्पेक्ट्रम मामले में सीबीआई से यह पता लगाने के लिए कहा है कि ए. राजा के कार्यकाल में टेलीकॉम कम्पनियों को लाइसेंस जारी करने में सरकारी खजाने को कितना नुकसान हुआ था? शीर्ष कोर्ट ने यह सवाल भी पूछा कि रिश्वत की रकम 200 करोड़ का क्या हुआ, उसकी स्थिति क्या है? न्यायमूर्ति बीएस चौहान और न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की पीठ ने कनिमोझी व शरद कुमार की जमानत याचिका पर सीबीआई से यह भी प्रश्न किया कि ए. राजा के कार्यकाल में कम्पनियों को जारी किए गए 2जी लाइसेंस से राजस्व को कितना नुकसान हुआ और निचली अदालत में मामले की क्या स्थिति है। कनिमोझी से अदालत ने साफ कहा कि आपके हक में कुछ खास दलील नहीं है। बस सिर्प यह हो सकती है कि आप एक महिला हैं और दफा 437 के तहत महिला होने के नाते आपको जमानत देने में हमदर्दी दिखाई जाए। कोर्ट ने सीबीआई से सीधा पूछा कि जांच बताती है कि 200 करोड़ रुपये बतौर रिश्वत दिया गया या गलत तरीके से दिया गया, इसलिए इसे एक लीगल ट्रांजेक्शन नहीं माना जा सकता। उस सूरत में यह 200 करोड़ रुपये केस प्रॉपर्टी है और केस प्रॉपर्टी होने के नाते यह कहां है? इसका क्या हुआ? गौरतलब है कि कनिमोझी और कलेंगनर टीवी के एमडी शरद कुमार को 2जी घोटाले में कलेंगनर टीवी को मिली 200 करोड़ रुपये की रिश्वत के मामले में 20 मई को गिरफ्तार किया था। इन दोनों को मामले में दायर की गई दूसरी चार्जशीट में आरोपी बनाया गया था। दोनों ने दिल्ली हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट द्वारा उन्हें जमानत नहीं दिए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है। कलेंगनर टीवी प्राइवेट लिमिटेड में कनिमोझी और शरद कुमार की 20-20 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। कम्पनी को कथित तौर पर शाहिद बलवा की डीबी रियलिटी के जरिये 200 करोड़ रुपये मिले थे। जस्टिस बीएस चौहान और जस्टिस स्वतंत्र कुमार ने सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार मानवाधिकार उल्लंघन का सबसे बुरा चेहरा है।
जहां तक हम समझते हैं कि इस केस में 200 करोड़ रुपये को पैदा करके माननीय अदालत के सामने रखना बहुत जरूरी है। केस प्रॉपर्टी ही नहीं होगी तो केस का क्या होगा? बिना इस राशि को पेश किए कनिमोझी और शरद कुमार के खिलाफ कानूनी पुष्टि से केस कमजोर हो जाता है। देश भी यही चाहता है कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में हुए एक करोड़ 70 लाख रुपये के घोटाले की रकम को रिकवर किया जाए, तभी जनता को संतोष होगा। देखें, सीबीआई क्या जवाब देती है। कनिमोझी के वकील ने तो सीधा कहा है कि शाहिद बलवा की कम्पनी डीबी रियलिटी से 200 करोड़ रुपये का लोन लिया गया था जो बाद में अदा कर दिया गया। अब सीबीआई को न केवल आरोपों को साबित करना है बल्कि केस प्रॉपर्टी रिकवर करनी है।