Translater

Thursday, 23 June 2011

Sleeping with the Enemy

 - Anil Narendra
Political equations are fast changing in Afghanistan. Now, US has started taking steps for its withdrawal from Afghanistan. There have been two recent reports, which reveal the game being played there. According to the first report, all the 15 members of United Nations Security Council including India have approved sanctions, according to which Taliban and al-Qaeda will be viewed differently. The objective of this decision is said to be inclusion of Taliban in Afghan peace process. The Security Council passed two resolutions unanimously last Friday in this regard. These resolutions talk of sanctions for Taliban, different from those for al-Qaeda. In view of this decision, Taliban and al-Qaeda will now be judged on different scales. In another incident, the Afghan President, Hamid Karzai has told that US is holding talks with Taliban. This is, perhaps the first official confirmation about the talks. Addressing a Conference in Kabul, Karzai said that talks with Taliban have started and progressing well. Foreign forces, especially US itself is engaged in these talks. The US-led war in Afghanistan has entered 10th year and demand for political solution of this conflict is gaining momentum.
This revelation by Afghan President, Hamid Karzai has not only dangerous implications for Afghanistan, but is another proof of US’s vested interests and duplicity. Why did US, in the first place, start war against Afghanistan? As far as we understand, the objective of this war was to teach a lesson to al-Qaeda and Taliban, who were responsible for 9/11 attacks on US soil. During these years, the US deposed the Taliban government, but strangely, now these very Taliban have become good Taliban and preparations are afoot to hand over power to them once again. We can very well understand the helplessness of President Barak Obama and the US. They have already announced complete withdrawal of US forces from Afghanistan by 2014 and expressed their eagerness to find an immediate solution to this problem. It is under these circumstances that talks are being held with Taliban, which, however, are in the initial stages at present. As such, the United Nations, considered to be an orgnisation obedient to US, while breaking with the old order, has given the message that if Taliban breaks up with al-Qaeda and contribute to the reconstruction of Afghanistan, then it can be granted amnesty.
We are a bit surprised as to what led India to ratify the UNSC resolution? Does India, too thinks that Taliban have become a noble organization and they do not pose any threat to India? The question is not what Taliban are, but question is that we are talking of negotiations with a terrorist organization that has made public its agenda. What is more disturbing that these negotiations are being held on meaningless terms. The fact is that by starting negotiations with a terror organization, US has once again proved that all of its decisions are based on its vested interests and it does not care about the impact of its actions on countries like India-Pakistan-Iran? Nor it is concerned about the impact on global terrorism. Ironically, the Afghan government has not been made a party to these talks. The Afghans themselves believe that this will be a very damaging step and their country will once again return to pre-2001conditions. If it happens, India will have to bear the brunt of it. It will be a heavy blow for the reconstruction projects in Afghanistan being undertaken by India. This will also adversely affect the image, efficacy and future of Karzai government, but why should America bother about all this? What a great irony, the US which invaded Afghanistan with its slogan of ‘war on terror’ to wipe out al-Qaeda and Taliban, is now considering to hand over Afghanistan to the same terrorists, so that it can easily find a safe passage out of Afghanistan?        

अभी कुछ महीने और तिहाड़ में ही रहेंगी कनिमोझी


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23nd June 2011
अनिल नरेन्द्र
`सॉरी मैडम वी हैव ट्राइड ऑवर बैस्ट।' सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में कनिमोझी के वकीलों ने जब ये शब्द कहे तो दो माह पूर्व तक तमिलनाडु के वीवीआईपी का दर्जा रखने वाली कनि की मां रजती अम्मल फूट-फूट कर रोने लगी। उन्हें बहुत उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट से कनिमोझी को जमानत मिल जाएगी। रुआंसी और आंसू पोंछती रजती ने उन्हें कोई जवाब नहीं दिया। बस हाथ जोड़कर सिर हिलाया और आगे बढ़ गई। थके मुकदमे में बालू भी उनके पीछे चल दिए। बालू ने ढाई घंटे चली पूरी कार्रवाई खड़े होकर ही सुनी थी। रजती पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि की तीसरी पत्नी हैं, कनिमोझी (43) उनकी इकलौती संतान है। पहली पत्नी की मृत्यु के बाद करुणानिधि ने दयालु अम्मा से विवाह किया। दयालु कलैग्नार टीवी में 60 फीसदी शेयर की मालिक है। रजती काफी दिनों तक करुणानिधि के साथ ऐसे ही रहती रही। करुणानिधि ने उनके साथ कभी विधिवत विवाह नहीं किया। उन्हें पत्नी भी 10-12 साल पहले तब माना था जब चुनाव में उन्होंने अपनी आय का शपथ पत्र दायर किया और उसमें अम्मा के नाम कुछ सम्पत्ति दिखाई। लोगों ने जब पूछा कि रजती कौन है तब उन्होंने कहा कि वह उनकी पत्नी है।
2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में अभियुक्त द्रमुक सांसद कनिमोझी को सुप्रीम कोर्ट आना महंगा पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका ही खारिज नहीं की बल्कि भविष्य में जमानत देने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। कनिमोझी अब जमानत के लिए तब ही आवेदन कर पाएगी जब उनके खिलाफ निचली अदालत में आरोप तय हो जाएंगे। आरोप तय होने में तीन माह का समय लग सकता है, लेकिन सुनवाई अदालत सिर्प इस केस के लिए बनी है इसलिए हो सकता है कि यह अवधि कुछ दिन कम हो जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कनि की यह दलील अस्वीकार कर दी कि उन्हें धारा 437 के तहत जमानत दी जाए। कोर्ट ने कहा कि आपमें क्या खास बात है, आपकी तरह सैकड़ों विचाराधीन महिला कैदी जेल में हैं और बच्चों से दूर हैं। कनिमोझी 20 मई से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बन्द है। जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस बीएस चौहान की खंडपीठ ने यह फैसला जमानत का विरोध कर रही सीबीआई और कनिमोझी के वकीलों की डेढ़ घंटा बहस सुनने के बाद दिया। जमानत खारिज करने का दो लाइन का फैसला सुनकर कनि के वकीलों का चेहरा फक रह गया। कनिमोझी के वकीलों ने बहुत कोशिश की कि जमानत किसी भी हालत में हो जाए। उन्होंने यहां तक कह दिया कि वह कोर्ट की कठोर से कठोर शर्तें मानने को तैयार हैं। यदि सीबीआई को डर है कि अपने राजनैतिक रसूख से गवाहों और जांच को प्रभावित कर सकती है तो उन्हें उनके घर में नजरबन्द भी रखा जा सकता है। कनिमोझी के वकीलों का तो यहां तक कहना था कि अमेरिका की तरह यहां पैरों में रेडियो एंकलेट तो नहीं लगाए जाते, लेकिन उनके घर में 24 घंटे पहरेदारी तथा इलैक्ट्रॉनिक निगरानी (कैमरे तथा वायरलेस) रखी जा सकती है पर कोर्ट ने उनकी कोई दलील नहीं मानी। बस इतनी छूट जरूर दी कि अदालत ने कहा कनिमोझी आरोप तय होने के बाद मामले की सुनवाई कर रही कोर्ट से नियमित जमानत मांग सकती हैं। वहां मामले को नए सिरे से सुना जाएगा।
Tags: 2G, A Raja, CBI, DMK, kani Mozhi, Karunanidhi, Supreme Court, Tamil Nadu, Tihar Jail

यूपी में बिगड़ती कानून व्यवस्था : 72 घंटों में 11 वारदातें


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23nd June 2011
अनिल नरेन्द्र
इस साल जब मई के महीने में सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी के दो विधायकों को हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी तो बसपा ने अपनी पीठ थपथपाई थी कि उसने राज्य में क्रिमिनल जस्टिस का रिकार्ड सही कर लिया है पर यह सकारात्मक छवि पिछले 11 दिन में टूट गई है। 72 घंटों में घिनौने अपराधों की 11 वारदातों ने बहन जी सरकार को हिलाकर रख दिया है। उत्तर प्रदेश की लखीमपुर खीरी, बाराबंकी, कन्नौज में लड़कियों के साथ हुए रेप, हत्या और उत्पीड़न के बाद राज्य में रेप की चार और वारदातें हुई हैं। ताजा घटनाक्रम में एटा में जहां एक 35 वर्षीय महिला के साथ गैंगरेप की घटना हुई, वहीं गोंडा, फिरोजाबाद और कानपुर में भी लड़कियों को हवस का निशाना बनाया गया। एटा में दबंगों ने अपनी हवस का शिकार बनी विधवा को जलाकर मार दिया। गोंडा में तीन युवकों ने रेप के बाद नाबालिग को मारकर फेंका। फिरोजाबाद मामलों में नाबालिग लड़की को निशाना बनाया। कानपुर में नशीले पदार्थ खिलाकर युवती से दो दिन तक होटल में दुष्कर्म करता रहा। फर्रूखाबाद में छेड़छाड़ का विरोध करने पर महिला को गोली मारी। अलीगढ़ में पुलिसकर्मी पर आरोप, हिरासत में महिला से दुराचार का मामला सामने आया है। अलीगढ़ में तो अकराबाद क्षेत्र में एक महिला ने एक पुलिस कांस्टेबल और उसके सहयोगी पर बलात्कार का आरोप लगाया है। चोरी के आरोप में हिरासत में ली गई महिला ने बताया कि पूछताछ के बहाने रविवार रात उसे पुलिस चौकी में ले जाकर उससे दुष्कर्म किया गया।
बहन जी ने इन मामलों की नजाकत को समझते हुए अपने दो सबसे विश्वसनीय अधिकारियों को डैमेज कंट्रोल में लगा दिया है। सूचना सचिव प्रशांत त्रिवेदी और स्पेशल डायरेक्टर जनरल पुलिस ब्रज लाल त्रिवेदी ने बताया है कि कन्नौज वारदात के पीछे समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता हैं। उल्लेखनीय है कि कन्नौज अखिलेश यादव के संसदीय क्षेत्र में पड़ता है। एटा रेप केस में ब्रज लाल ने एक आरोपी का नाम मुलायम सिंह यादव बताया है। दोनों पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव और उनके बेटे अखिलेश यादव ने इस पर सख्त एतराज किया है और ब्रज लाल पर जानबूझकर उन्हें बदनाम करने का आरोप लगाया है। ब्रज लाल ने कहा कि मैं क्या करूं, अगर एक आरोपी का नाम भी मुलायम सिंह यादव है। विपक्ष ने कानून व्यवस्था की लगातार गिरती स्थिति पर हंगामा मचा दिया है। चाहे वह सपा हो, चाहे कांग्रेस हो और चाहे भाजपा हो सभी ने बसपा सरकार के नाक में दम कर रखा है। राज्य में हो रही रेप और महिला उत्पीड़न की घटनाओं को लेकर चौतरफा घिरी यूपी की सीएम मायावती ने सख्त रवैया अख्तियार कर लिया है। सूबे में हाल में हुई ऐसी घटनाओं की कड़ी निन्दा करते हुए बहन जी ने मंगलवार को ऐलान किया कि उनकी सरकार ने ऐसी घटनाओं पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए दण्ड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) में संशोधन का फैसला किया है।
कुछ जिलों में महिलाओं और नाबालिग लड़कियों से हुए रेप और हत्या की घटनाओं से दुखी माया सरकार ने भविष्य में ऐसी घटनाओं पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए सीआरपीसी की धारा 437 और 439 में संशोधन करने का फैसला किया है। साथ ही इस संहिता की जमानती धारा 354 को गैर-जमानती बनाने का अध्यादेश भी राज्यपाल को भेज दिया है। कानूनी जानकारों का मानना है कि राज्य सरकार को सीआरपीसी में बदलाव का पूरा अधिकार है, क्योंकि इसमें संशोधन का अधिकार केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकार को भी है। उक्त राज्य से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट भी उसी कानून के तहत सुनवाई करता है। संशोधन में ऐसे प्रावधानों हैं कि आरोपी को तब तक जमानत नहीं मिल पाए जब तक वह निर्दोष साबित नहीं होता। मुख्यमंत्री ने बताया कि महिला अपराधों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के लिए उन्होंने 27 जून को प्रदेश के डीएम, एसपी, कमिश्नर, डीआईजी, आईजी की बैठक बुलाई है। बैठक में वे निर्देश देंगी कि महिलाओं और बच्चियों का उत्पीड़न न हो। इसके लिए हर थाना क्षेत्र में चरित्रहीन व वाहियात लोगों की सूची तैयार कर उन्हें सुधरने का मौका दिया जाएगा। मुख्यमंत्री यह भलीभांति समझ रही हैं कि चुनाव जल्द होने वाले हैं और उन्हें कानून व्यवस्था दुरुस्त करनी होगी। विपक्ष हर मौके का फायदा उठाएगा। छोटे से छोटे मामले को उछालेगा, इसलिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि बहन जी अपना घर दुरुस्त करें। अचानक आई अपराध की बाढ़ को हर हालत में रोकना होगा।
Tags: Anil Narendra, Crime, Daily Pratap, Mayawati, Uttar Pradesh, Vir Arjun

Wednesday, 22 June 2011

क्या डॉ. मनमोहन सिंह का पत्ता कटने वाला है?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22nd June 2011
अनिल नरेन्द्र
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विरोध में अब आवाजें मुखर होती जा रही हैं। जनता में डॉ. मनमोहन सिंह की छवि दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। अब तो कांग्रेस पार्टी में भी प्रधानमंत्री के खिलाफ एक खेमा खुलकर बोलने लगा है। सरकार और कांग्रेस पार्टी में अब दरार पड़ चुकी है और पार्टी के एक तबके को लगने लगा है कि मनमोहन सिंह कांग्रेस पार्टी की लुटिया डुबो देंगे। पिछले दिनों एकीकृत जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने भोपाल में अपने दल के सम्मेलन में प्रधानमंत्री को कुछ इन शब्दों में बयान किया। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ऐसी गाय है जो देखने में सीधी और भली लगती है लेकिन न दूध देती है, न गोबर। उनके सामने एक के बाद एक आजादी के बाद के सबसे बड़े घोटाले होते रहे और वे टुकर-टुकर देखते रहे। उन्होंने गड़बड़ घोटाले करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की कोई पहल नहीं की। कार्रवाई तब शुरू हुई जब कोर्ट ने आदेश दिए। यादव ने कहा कि भ्रष्टाचार के आरोप में अभी कई और लोग जेल जाएंगे, उन्हें कोई नहीं बचा पाएगा। आज देश में हर तरफ ऊपर से नीचे तक लूट मची है। लगता है कि पूरे कुएं में अफीम घुल गई है। कहीं वोट बिक रहे हैं, कहीं ईमान।
अगर मीडिया में छपी खबरों पर यकीन किया जाए तो कांग्रेस में भी मनमोहन सिंह के खिलाफ आवाजें मुखर होती जा रही हैं। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह में दरार पड़ चुकी है। मनमोहन सिंह अब अपना खेमा बना रहे हैं। संचार घोटाले और फिर लोकपाल बिल के आंदोलन के हवाले डॉ. मनमोहन सिंह में यह डर बैठा दिया गया है कि कुछ करना होगा नहीं तो वे भ्रष्टाचार के सीधे आरोपी बनेंगे और बेइज्जत होकर सत्ता छोड़नी पड़ेगी। और जान लें आज इसी डर से मनमोहन सिंह काम कर रहे हैं कि यदि लोकपाल बिल बना और लोकपाल की नियुक्ति हुई तो सबसे पहले मनमोहन सिंह के ही खिलाफ संचार घोटाले की जांच की शिकायत होगी। लोकपाल उनके लिए भस्मासुर साबित होगा। इसलिए नोट करके रख लें कि लोकपाल बिल के दायरे में प्रधानमंत्री पद का आना तब तक मुमकिन नहीं है जब तक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हैं। लगता है श्रीमती सोनिया गांधी भी यह समझ चुकी हैं और वह पार्टी को बचाने के लिए अब मनमोहन सिंह के विकल्पों पर विचार कर रही हैं। यही वजह है कि राहुल गांधी को एक बार फिर प्रधानमंत्री बनाने की मांग जोर पकड़ने लगी है। रामलीला मैदान में लाठीचार्ज का फैसला भी प्रधानमंत्री खेमे ने किया था। सोनिया पूरे मामले की हैंडलिंग से नाराज हैं।
प्रधानमंत्री और उनके पीएमओ को सारे घोटालों की पूरी जानकारी थी। दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के विवादों में घिरी आयोजन समिति की कारगुजारियों के बारे में पीएमओ को पहले से ही जानकारी थी लेकिन उसने इस मामले में कोई कार्रवाई करना मुनासिब नहीं समझा। आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चन्द्र अग्रवाल ने सूचना के अधिकार के तहत जो जानकारी हासिल की है उसके तहत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और खेल मंत्री के बीच राष्ट्रमंडल खेलों के बारे में 52 पन्नों का आदान-प्रदान हुआ था। वर्ष 2007 में तत्कालीन खेल मंत्री मणिशंकर अय्यर ने खेलों के बारे में गैर सरकारी संगठन (हजार्ड्स सेंटर) की एक रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी थी। अय्यर ने साथ ही कहा था कि वह इन खेलों के प्रति समर्पित हैं। लेकिन यह दस्तावेज हमें सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या हम इस रास्ते पर चलें जिससे देश को भारी नुकसान हो सकता है? इस पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने अपनी एक आंतरिक रिपोर्ट में स्वीकार किया कि खेल मंत्रालय और आयोजन समिति के बीच गहरे मतभेद हैं। खेल मंत्रालय जहां पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर दे रहा है वहीं आयोजन समिति इसके लिए कतई तैयार नहीं थी। लेकिन इसके बावजूद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके पीएमओ ने कोई भी कार्रवाई करना मुनासिब नहीं समझा। ऐसे ही 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले का भी केस है। पीएमओ को सब जानकारी थी पर उसने रोकने के लिए कुछ नहीं किया। इन्हीं के चलते आज कांग्रेस पार्टी डॉ. मनमोहन सिंह को एक लाइबिलिटी मानने लगी है और उन्हें हटाने पर गम्भीरता से विचार कर रही है।
Tags:2G, Anil Narendra, Congress, Corruption, Daily Pratap, Lokpal Bill, Mani Shankar Aiyar, Manmohan Singh, Scams, Sharad Yadav, Sonia Gandhi, Vir Arjun

अफगानिस्तान में 10 साल पहले अमेरिका घुसा क्यों था?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22nd June 2011
अनिल नरेन्द्र
अफगानिस्तान में तेजी से राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं। अमेरिका ने अब वहां से भागने के उपायों पर अमल करना आरम्भ कर दिया है। हाल के दिनों में दो ऐसी खबरें आई हैं जिनसे यह साफ होता है कि वहां कुछ खेल चल रहा है। पहली खबर जो आई वह यह थी कि भारत सहित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी 15 सदस्य देशों ने प्रतिबंधों के लिहाज से एक ऐसी सूची को मंजूरी दी है जिसमें तालिबान और अलकायदा को अलग-अलग नजरिये से देखा जाएगा। इसका मकसद तालिबान और अफगानिस्तान में सुलह के प्रयासों में शामिल करने से जुड़ा है। इस संबंध में सुरक्षा परिषद ने गत शुक्रवार रात पूर्ण बहुमत से दो प्रस्ताव पारित किए। इनमें प्रतिबंधों को लेकर तालिबान के लिए अलकायदा से एक अलग सूची की बात की गई है। इस कदम के बाद अब अलकायदा और तालिबान आतंकवादियों को अलग-अलग पैमानों पर तोला जाएगा। दूसरी घटना है अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई का यह कहना कि अमेरिका तालिबान से बातचीत कर रहा है। इस सम्पर्प के बारे में यह सम्भवत पहली आधिकारिक पुष्टि है। करजई ने काबुल में एक सम्मेलन में कहा कि तालिबान के साथ बातचीत शुरू हो गई है। बातचीत अच्छी चल रही है। विदेशी सेनाएं विशेषकर अमेरिका खुद ही बातचीत कर रहा है। अमेरिका के नेतृत्व में अफगानिस्तान में चल रहा युद्ध 10वें साल में प्रवेश कर गया है और वहां पर इस संघर्ष के राजनीतिक समाधान की आवाज तेज होती जा रही है।
अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई ने जो खुलासा किया है वह अफगानिस्तान के लिए जितना खतरनाक है, उतना ही अमेरिका की स्वार्थपरता और दोहरेपन का एक और सबूत भी है। अफगानिस्तान के खिलाफ अमेरिका ने आखिर युद्ध क्यों छेड़ा था? जहां तक हम समझ सके हैं कि 9/11 हमलों के लिए अमेरिका अलकायदा और तालिबान को जिम्मेदार मानते हुए उन्हें सबक सिखाने के लिए यह युद्ध छेड़ा गया था। पिछले 10 सालों में पहले तो अमेरिका ने इसी तालिबान हुकूमत को सत्ता से हटाया और अब वही तालिबान अच्छा हो गया है और उसे दोबारा सत्ता सम्भालने की तैयारी हो रही है। हम राष्ट्रपति बराक ओबामा और अमेरिका की मजबूरी समझ सकते हैं। उन्होंने घोषणा कर रखी है कि 2014 तक अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की पूरी वापसी होनी है इसलिए वह आनन-फानन में समस्या का हल निकालना चाहते हैं। इसी के तहत तालिबान से बातचीत शुरू की है, जो हालांकि अभी शुरुआती दौर में है। अमेरिका के जेबी संगठन संयुक्त राष्ट्र ने तालिबान और अलकायदा पर इसीलिए पुरानी व्यवस्था तोड़ते हुए जो संदेश दिया है उसका लब्बोलुआब यही है कि अगर अलकायदा का साथ छोड़कर तालिबान अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में सहयोगी बनता है तो उसे `माफी' दे दी जाएगी।
हमें थोड़ा आश्चर्य इस बात पर भी है कि आखिर भारत ने क्या सोचकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी? क्या भारत की नजरों में भी तालिबान एक अच्छा संगठन बन गया है जिससे भारत को अब कोई खतरा नहीं है? सवाल यह नहीं कि तालिबान कैसा है, सवाल यह है कि एक आतंकी संगठन जिसने अपना एजेंडा सार्वजनिक किया हो उससे आप समझौते की बात कर रहे हो, वह भी बकवास शर्तों पर? मामला तो यह है कि एक आतंकी संगठन से बातचीत कर अमेरिका ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उसके तमाम फैसलों के पीछे सिर्प उसका अपना स्वार्थ होता है, उसे इस बात की कतई परवाह नहीं कि इस फैसले का भारत-पाकिस्तान-ईरान मुल्कों पर क्या असर पड़ेगा? न ही उसे अब वैश्विक आतंकवाद से कोई लेना-देना है। विद्रुप तो यह है कि इस बातचीत में अफगान सरकार को भी शामिल नहीं किया गया। खुद अफगान मानते हैं कि यह अत्यंत घातक कदम होगा और मुल्क फिर 2001 से पहले की स्थिति में पहुंच जाएगा। अगर ऐसा होता है तो इसका सीधा नुकसान भारत को भी होगा। भारत द्वारा अफगानिस्तान में चल रही विभिन्न पुनर्निर्माण योजनाओं को भारी झटका लगेगा। इससे करजई सरकार की छवि, कार्यक्षमता और भविष्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा पर अमेरिका को इन सबसे क्या लेना-देना है। इससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी कि एक दशक पहले जिस अमेरिका ने `वॉर ऑन टेरर' का नारा देकर अफगानिस्तान में इसलिए प्रवेश किया था कि अलकायदा और तालिबान को समाप्त कर सके, आज वह उसे उन्हीं आतंकियों के हवाले करने के बारे में सोच रहा है ताकि उसे अफगानिस्तान से भागने का रास्ता मिल जाए?
Tag: 9/11, Afghanistan, Al Qaida, America, Anil Narendra, Daily Pratap, India, Iran, Osama Bin Ladin, Pakistan, Security Council, Taliban, UNO, USA, Vir Arjun

Tuesday, 21 June 2011

दिल्ली पुलिस का सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने वाला हलफनामा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21st June 2011
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली पुलिस ने 4 जून की रात को रामलीला मैदान में बाबा रामदेव और उनके समर्थकों को बलपूर्वक हटाने की कार्रवाई को न्यायोचित ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट में दावा किया है कि बाबा रामदेव को योग शिविर की अनुमति दी गई थी, लेकिन वह इसके विपरीत वहां सत्याग्रह कर रहे थे। दिल्ली पुलिस का दावा है कि बाबा रामदेव द्वारा रामलीला मैदान में कार्यक्रम के आयोजन की शर्तों का उल्लंघन किए जाने के कारण उसके पास अनुमति वापस लेने के अलावा कोई अन्य विकल्प ही नहीं बचा था। दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में बाबा रामदेव के समर्थकों पर लाठीचार्ज के आरोपों से इंकार करते हुए कहा है कि भगदड़ में कुछ लोग जख्मी हुए थे। हलफनामे में यह भी कहा गया है कि बाबा रामदेव पर अपने समर्थकों को भड़काने के लिए मंच का इस्तेमाल करने का आरोप लगाते हुए दावा किया गया है कि सत्याग्रहियों द्वारा पथराव किए जाने पर पुलिस ने आंसू गैस के सिर्प आठ गोले दागे थे। यह भी कहा गया है कि बाबा रामदेव को रामलीला मैदान में पांच हजार व्यक्तियों के योग शिविर की अनुमति दी गई थी, लेकिन वहां 20 हजार लोग उपस्थित थे। पुलिस का कहना है कि बाबा रामदेव को योग शिविर के आयोजन की अनुमति वापस लेने के बारे में 4 जून की रात को एक बजे सूचित किया गया और उन्हें रामलीला मैदान खाली करने के लिए डेढ़ घंटे का वक्त दिया गया था।
यह निहायत अफसोस की बात है कि दिल्ली पुलिस सुप्रीम कोर्ट को गुमराह कर रही है। पुलिस अपने काले कारनामों को छिपाने का प्रयास कर रही है। प्रत्यक्षदर्शियों व पीड़ितों का कहना है कि दिल्ली पुलिस के आईपीएस स्तर के अधिकारियों ने लोगों को रामलीला मैदान से घसीट-घसीटकर बाहर करने और लाठीचार्ज करने का आदेश दिया था फिर वह सुप्रीम कोर्ट के समक्ष झूठ क्यों बोल रही है? इन्कम टैक्स के वकील लोकेन्द्र आर्य उस रात रामलीला मैदान में थे। वह आर्यवीर, दिल्ली प्रदेश की ओर से सेवा देने रामलीला मैदान गए थे। लाठीचार्ज में उनके भी चेहरे व पैर में चोटें आईं और उन्हें लोकनायक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। लोकेन्द्र आर्य के अनुसार दिल्ली पुलिस के आईपीएस अमित रॉय ने स्पष्ट शब्दों में लाठीचार्ज का आदेश दिया था। अमित रॉय का बिल्ला उनकी वर्दी में लगा था, जिससे उनका नाम मुझे याद है। कुछ पुलिस वालों ने तो बर्बरतापूर्वक व्यवहार करने से पहले अपना बिल्ला छिपा लिया था। इनमें एक महिला आईपीएस अधिकारी भी थीं। उसने सबसे पहले माइक सिस्टम को उखाड़ दिया था और विरोध करने पर आरएएफ व पुलिस के जवानों को लेकर मंच के पास पहुंच गई थी। भाकपा के राष्ट्रीय सचिव डी. राजा का कहना है कि पुलिस झूठ बोल रही है। जन आंदोलनों को कुचलने के लिए सरकार व पुलिस जब भी ऐसे कदम उठाती है तो इसी तरह का कुतर्प देती है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पुलिस की मंशा लाठीचार्ज करने की थी ही नहीं, तो वह इतनी संख्या में क्यों गई? इसी से दिल्ली पुलिस के झूठ का पता चलता है।
4 जून की काली रात को याद करके आज भी घायल सिहर उठते हैं। जिस तरह से सोए हुए लोगों पर पुलिस ने लाठियां भांजी थीं। उनका सवाल है कि फिर आज पुलिस क्यों मुकर रही है। अगर लाठी नहीं चली तो लोगों के हाथ-पैर कैसे टूट गए। मीडिया में लाठीचार्ज के फोटो कहां से आए? 70 वर्षीय राज योगी का कहना है कि उन पर लाठी मारी गई थी, लेकिन उन्होंने फिर भी तिरंगा अपने हाथ से नहीं छोड़ा था। यहां तक कि अस्पताल के बैड पर भी वह झंडा पकड़े रहे थे। उनके पेट व पीठ में चोटें आई थीं। राम गोबिंद गुप्ता (36) बताते हैं कि पुलिस की लाठियां लगने से उनका तो दाहिना पैर ही टूट गया था। अभी तक भी उनका प्लास्टर नहीं उतर पाया है। वह कभी भी उस काली रात को नहीं भूल पाएंगे। वह कहते हैं कि दिल्ली पुलिस ने जलियांवाला बाग कांड को भी पीछे छोड़ दिया। उस वक्त तो दिन में गोलियां बरसाई थीं, लेकिन यहां तो सोते वक्त लोगों पर लाठियां चलाई गईं। दिल्ली पुलिस द्वारा सुप्रीम कोर्ट में झूठ बोलने पर घायल कहते हैं कि इससे खुद ही पुलिस बेनकाब हो गई है। घायल हुए जगदीश (54) बताते हैं कि अगर लाठी नहीं चली तो मीडिया में लाठीचार्ज के फोटो कहां से आए। दर्जनों लोग इसमें घायल हुए। किसी का हाथ टूटा तो किसी का पैर। फिर उस काली रात की सबसे बड़ी भुगतभोगी तो 13 दिन बाद भी जिन्दगी और मौत के बीच झूल रही राजबाला हैं। गुड़गांव की पूर्व निगम पार्षद राजबाला कोमा से बाहर निकल चुकी है। लेकिन अभी भी वेंटिलेटर पर हैं। डाक्टरों के अनुसार वह इशारों-इशारों में बात को समझ रही है, लेकिन स्थिति अभी भी गम्भीर है। जीबी पंत अस्पताल के न्यूरो सर्जरी विभाग के आईसीयू-17 में भर्ती राजबाला के बारे में डाक्टरों का कहना है कि उसके शरीर और मस्तिष्क के बीच संवाद स्थापित नहीं हो पा रहा है। गर्दन की हड्डी टूटने की वजह से मस्तिष्क की नसों को नुकसान पहुंचा है।
भारतीय जनता पार्टी ने भी इस रिपोर्ट को असत्य व गुमराह करने वाली बताई है। पत्रकारों से बातचीत करते हुए पार्टी के दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता विजय कुमार मल्होत्रा व प्रदेशाध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता ने कहा कि पुलिस अपने को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में भी झूठ बोल रही है। उन्होंने दिल्ली पुलिस, केंद्र सरकार व गृहमंत्रालय से निम्नलिखित सवाल पूछे हैंöपुलिस का कहना है कि जीवन और मौत के बीच जूझ रही महिला राजबाला सहित सैकड़ों लोगों के हाथ-पांव भगदड़ के कारण टूटे थे। सवाल यह है कि यदि पुलिस ने समुचित कार्रवाई की थी तो भगदड़ क्यों मची? सत्याग्रह 4 जून की सुबह प्रारम्भ हुआ था जो शांतिपूर्ण, अहिंसक था। इसमें हजारों की संख्या में बच्चे तथा महिलाएं शामिल थीं। गृहमंत्रालय और दिल्ली पुलिस ने सत्याग्रहियों को 6 जून की मध्य रात्रि तक धरने पर बैठने की स्वयं अनुमति दी थी। क्या कारण है कि समयावधि समाप्त होने से पूर्व ही 4/5 जून की रात बगैर चेतावनी दिए रामलीला मैदान खाली कराने का बगैर सोचे-समझे फैसला किया गया? यदि सिर्प मैदान खाली कराने का आदेश था तो पुलिस ने बन्द पंडाल में आंसू गैस के गोले क्यों दागे? बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं पर अकारण, बगैर चेतावनी दिए बर्बर लाठीचार्ज क्यों किया गया? यदि पुलिस ने जुल्म नहीं किया था तो जिन ठेकेदारों ने मैदान में सीसीटीवी कैमरे लगाए थे, उसके यहां दिल्ली पुलिस ने अचानक छापा मारकर उस दिन के पुलिस अत्याचार को रिकार्ड करने वाली 42 सीडियां क्यों जबरिया छीनकर गायब कर दीं? इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के फुटेज बताते हैं कि 4/5 जून की रात को जो बर्बरता हुई उसने जलियांवाला बाग कांड को भी पीछे छोड़ दिया है। पुलिस को रामलीला मैदान खाली कराने के निर्देश थे तब पुलिस ने वहशियाना लुटेरे जैसे बर्ताव करते हुए सत्याग्रहियों के रुपये, जेवर, आदि क्यों लूटे? क्या कारण हैं कि बाबा रामदेव जैसे विश्व प्रसिद्ध योग गुरु को अपनी जान बचाने के लिए महिलाओं के वस्त्र पहनकर महिलाओं के बीच छिपना पड़ा? यदि दिल्ली पुलिस इतनी ही मासूम है तो वह दिन के समय रामलीला मैदान खाली कराने क्यों नहीं गई? रात में जाने का मतलब ही था लोगों को कुचलना और सबूत मिटाना। भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के स्टेट कार्डिनेटर डॉ. ज्ञान के अनुसार पुलिस ने बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज किया और अब झूठ बोल रही है। पुलिस का यह कहना कि लोग पत्थर बरसा रहे थे और बेसबॉल का डण्डा लेकर आए थे, सरासर झूठ है। रामलीला मैदान में आने वाला हर व्यक्ति पुलिस जांच से गुजर कर वहां तक पहुंचा था, उस वक्त तो पत्थर व डण्डे नहीं मिले?
सबूत मिटाने और गवाहों को सैट करने के लिए खबर है कि पुलिस अब घायलों का बयान लेने के लिए उनके घरों पर दस्तक दे रही है। पुलिस सरकारी मुआवजे का झुनझुना थमाने के नाम पर घायल हुए लोगों का बयान दर्ज कर रही है। दिल्ली पुलिस ने ऐसे 40 लोगों की सूची तैयार की है, जिन्हें चोटें आई थीं। घायलों या उनके परिजनों द्वारा शंका जताने पर यह भी कहा जा रहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट की तरफ से बयान दर्ज करने आए हैं। घायलों द्वारा अपने बयान में किसी पुलिस अधिकारी का नाम लेने पर इन्हें दबी जुबान में धमकी दी जा रही है। पेशे से इन्कम टैक्स वकील लोकेन्द्र आर्य के मुताबिक गुरुवार 16 जून 2011 को दो पुलिस वाले उनके पास आए थे। एक सब-इंस्पेक्टर था और दूसरा हवलदार था। उन्होंने कहा कि आप रामलीला मैदान में घायल हुए थे इसलिए आपका बयान लेना है। सवाल पूछने पर कहा कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट की ओर से बयान दर्ज करने को भेजा हुआ है। उनकी ड्यूटी सुप्रीम कोर्ट के सिक्यूरिटी कंट्रोल रूम में है। यदि आप बयान देंगे तो सरकार आपको मुआवजा देगी। लोकेन्द्र आर्य के मुताबिक मैंने उनसे कहा कि मुझे मुआवजा नहीं चाहिए। जो चोर और भ्रष्टाचारी है। ऐसी सरकार से कुछ नहीं चाहिए।
Tags: Anil Narendra, Baba Ram Dev, Congress, Daily Pratap, delhi Police, Ram Lila Maidan, Vir Arjun

Monday, 20 June 2011

With Economist Manmohan Singh at the helm of affairs, inflation cannot be checked

- Anil Narendra
Unfortunately, no body in this country talks about the problem that directly affects 90 per cent of its people. Neither Anna Hazare, nor Baba Ramdev is concerned about this problem. One is obsessed with Lokpal, while the other insists on bringing the black money back. Both the issues may take years for any effective solutions, but none of the opposition party speaks on the issue which is taking its toll on the common man. This issue is of rising prices, of inflation. Rising prices have cornered the common man. The inflation rate has crossed the nine percent mark due to the rising prices of petrol and other essential commodities. People, however, will have to brace themselves for more inflationary pressure in the times to come. Petrol and diesel prices are likely to increase in the days ahead. Meanwhile, the Reserve Bank of India has increase its repo rate in its monetary review on June 16, which will result in costlier bank loans. Concerned over the losses to petroleum companies, the Union Petroleum Minister, Jaipal Reddy met Prime Minister Manmohan Singh and requested him to decide on price rise about diesel and LPG at the earliest. According to sources, the Petroleum Ministry wants to increase diesel prices by 3-4 rupees and LPG cylinder by 25-35 rupees. It has also recommended partial increase in the kerosene prices. Not a single minister in the Manmohan Singh government is bothered about the common man. On Tuesday, the Deputy Chairman of the Planning Commission, Montek Singh Ahluwalia warned, “if the burden of rising cost of the petroleum is not passed on to the people, the petroleum sector will be practically doomed”. Somewhat similar views were expressed by the
C Rangarajan, Chairman, PM’s Economic Advisory Council. He said, “OMCS Oil marketing companies are running into huge losses. If diesel prices are not increased, the budget will also be affected.” At present, the inflation rate is around nine percent and this has been attributed to the ill-timed increase in petrol prices.
The hard fact is that since Manmohan Singh has taken over as the Prime Minister, his monitory policies have broken the back of the poor. There are such people around him, who boast of high statistics, but do not care for the sufferings of the common man at grass root level. It is this liberalization, which is the root cause for multi-billion scams. Why there is no investigation into the working of these oil companies? Why no body is concerned about their excessive expenditure? Why efforts are not made to reduce government consumption? Manmohan Singh has not only become burden for his party, but he has turned to be number one enemy of the poor. He is unable to stop scams. There have been unprecedented scams during his tenure as Prime Minister. The Congress Party must understand that it can’t win next election with Manmohan Singh as its face. It is, therefore, advisable for the party to nominate a new prime Minister, if it wants to come to the power in the next elections. The policies of Manmohan Singh have ruined the life of common man. During his regime, properties of industrialists have increased manifold and the bureaucracy is reigning supreme. There are other leaders too in the Congress. For example, take the Defence Minister, AK Antony. He is an honest leader and had been the Chief Minister of Kerala. He has been an unblemished leader. During this period, the Manmohan Singh government has been crushed under the weight of scams. The Congress High Command is deeply concerned about 2014 general elections. The High Command strategists have started thinking that with Manmohan Singh, as Prime Ministerial candidate, it may not be able to stake claim for power for the third time in a row, as the opponents have started saying that Manmohan Singh is an honest Prime Minister of the most corrupt government till now. Some of the critics are even more pointed in their attacks. In a recent statement, AK Antony has said that forces opposed to the demand of transparency have rallied around the power center. If certain persons demand virtues in power, then what is wrong in it. Special meanings are being attributed to these comments at this time. It is being considered as the preparation for the next phase. At that time ‘the Manmohan of Congress’ will be AK Antony. He, however, enjoys trust of 10 Janpath. His only drawback is that he is a Christian. But, Congressmen say that Antony has more faith in pure Hindu culture than any other Hindu leader. What do you think? This is much is certain that the bureaucratic tendencies of Manmohan Singh will not lead to the welfare of the common man and the inflation will continue to rise and the rich will continue to become richer and poor much poorer. People are frustrated with the BJP too. Why doesn’t it openly oppose the proposed hike in prices of petrol, diesel etc? Why doesn’t it demonstrate against galloping price rise? To send a protest letter or issue an statement afterwards will not be sufficient. The first agenda of the BJP, therefore, must be to stop the government from taking step in this direction and pressurize it in taking effective measures to curb the inflation.