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Thursday, 14 May 2026

नेतन्याहू की खुली चेतावनी, अभी जंग हो सकती है

ईरान और अमेरिका के बीच हालिया युद्ध विराम के बावजूद मध्य-पूर्व में तनाव की लपटें एक बार फिर तेज हो गई हैं। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक अमेरिकी टीवी चैनल में एक विस्फोटक इंटरव्यू देते हुए साफ कर दिया है कि ईरान का परमाणु खतरा टला नहीं है। नेतन्याहू का यह संदेश न केवल ईरान बल्कि ट्रंप प्रशासन और पूरी अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी के लिए एक बड़ी चेतावनी है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने सीबीएस के पत्रकार स्कॉट पेली को दिए 18 मिनट के साक्षात्कार में पहली बार ईरान के परमाणु भंडार की डिटेल दीं। उन्होंने दावा किया कि ईरान के पास अभी भी 440 किलोग्राम से अधिक 60 प्रतिशत तक संवर्धित (एनरिच्ड) यूरेनियम का भंडार है। नेतन्याहू ने सख्त लहजे में कहा: युद्ध विराम अपनी जगह है, लेकिन परमाणु खतरा खत्म नहीं हुआ है। आप वहां जाएंगे और उसे हटा देते है... अभी काम पूरा होना बाकी है। नेतन्याहू ने एक महत्वपूर्ण बयान देते हुए कहा कि इजरायल को अब अमेरिका की सैन्य सहायता (3.8 बिलियन डालर सालाना) पर अपनी निर्भरता कम करनी चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि इजरायल अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होने की योजना बना रहा है, ताकि जरूरत पड़ने पर बिना किसी बाहरी दबाव के कार्रवाई कर सके। इस इंटरव्यू के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए ट्रुथ सोशल पर लिखा ः हम इजरायल के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। बेंजामिन एक महान नेता हैं और हम दोनों एक ही पेज पर हैं। इससे साफ है कि आने वाले दिनों में अमेरिका और इजरायल की ईरानी नीति और भी आक्रामक हो सकती है। ईरान ने पाकिस्तान के जरिए जो शांति प्रस्ताव भेजा था, उसे इजरायल ने भी अस्वीकार्य करार दिया है। इजरायल का एक ही स्टैंड है जब तक सारा एनरिच्ड यूरेनियम देश से बाहर नहीं जाता कोई समझौता नहीं होगा। नेतन्याहू के इस स्टैंड ने साफ कर दिया है कि इजरायल एक तरफा कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा। जहां एक तरफ दुनिया शांति की उम्मीद लगाई बैठी है, वहीं नेतन्याहू का यह बयान यह संकेत दे रहा है कि आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की राजनीति और सुरक्षा के लिए निर्णायक होने वाला हो सकता है। क्या यह केवल एक कूटनीतिक दबाव है या इजरायल सच में किसी बड़े सैन्य ऑपरेशन की तैयारी में है? अमेरिका जहां ईरान के साथ शांति चाहता है, वहीं इजरायल इस दिशा में बड़ा रोड़ा दिख रहा है। अमेरिका बेशक ईरान से युद्ध खत्म करना चाहता हो लेकिन इजरायल है कि उसे यह करने नहीं दे रहा है। अमेरिका एक तरफ चाहता है कि ईरान के साथ उसकी सुलह हो जाए, वहीं इजरायल ऐसा होने नहीं देगा। लड़ाई जारी रखने में बेंजामिन नेतन्याहू का निजी स्वार्थ भी है। उस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हुए हैं और इजरायली अदालतों में उनके खिलाफ यह केस चल रहे हैं। उनसे बचने के लिए नेतन्याहू कहीं न कहीं युद्ध को बढ़ावा देता है और इसकी आड़ में अदालतों से बचता रहता है। इसीलिए अगर ईरान से युद्ध विराम हो तो वह लेबनान में युद्ध शुरू कर देता है। जब ईरान और अमेरिका की सीजफायर की बात हुई तब भी नेतन्याहू ने साफ कहा कि इसमें इजरायल-लेबनान युद्ध शामिल नहीं है। वह मध्य-पूर्व में किसी भी डील को तोड़ने में लगा रहता है। असल युद्ध का कसूरवार नेतन्याहू है। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 12 May 2026

सीजफायर और जंग

एक तरफ तो अमेरिका-ईरान के बीच कहने को तो सीजफायर यानी युद्ध बंदी चल रही है, वहीं दूसरी तरफ जंग भी चल रही है। यह सीजफायर अपनी समझ से तो बाहर है। दावा किया जा रहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच अगले हफ्ते इस्लामाबाद में बातचीत हो सकती है। दोनों देशों के बीच 14 प्वाइंट वाले समझौते पर काम चल रहा है। जिसमें परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज तनाव जैसे मुद्दे शामिल हैं। इस बीच ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई की भूमिका को लेकर भी नई जानकारी सामने आई है। अमेरिकी एजेंसियां उन्हें युद्ध और बातचीत में अहम मान रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों देशों के बीच अगले हफ्ते इस्लामाबाद में जो बातचीत होनी है उसमें एक प्रमुख मुद्दा एक महीने तक चलने वाली बातचीत की रूपरेखा तैयार करना है, ताकि दोनों देशों के बीच तनाव और युद्ध खत्म किया जा सके। रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रस्ताव में ईरान के परमाणु कार्यक्रम और ईरान के पास मौजूद हाई एनीरिच्ड यूरेनियम को किसी दूसरे देश में भेजने जैसे मुद्दे शामिल हैं। हालांकि कई अहम मामलों पर अभी भी सहमति नहीं बनी हैं। सबसे बड़ा विवाद परमाणु कार्यक्रम और अमेरिका की तरफ से ईरान पर लगे प्रतिबंधों से राहत को लेकर है। इस बीच ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई को लेकर नई जानकारी भी सामने आई है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का मानना है कि मोजतबा खामेनेई युद्ध की रणनीति तय करने और अमेरिका से बातचीत को संभालने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। महत्वपूर्ण यह है कि आयतुल्ला मोजतबा खामेनेई ठीक हैं और अब उन्होंने कमान संभाल ली है। एक तरफ तो सीजफायर चल रहा है और डील की बात हो रही है। दूसरी तरफ होर्मुज को लेकर अचानक जंग छिड़ी हुई है। मिडल ईस्ट में शांति की उम्मीदों को एक बार फिर झटका लगा है। गुरुवार और शुक्रवार की दरमियानी रात को अमेरिका और ईरान के बीच हमले फिर शुरू हो गए हैं। इस हमले के बीच 8 अप्रैल 2026 से चला आ रहा नाजुक सीजफायर टूटने की कगार पर पहुंच गया है। ये हमले होर्मूज, केशम और बंदर अब्बास इलाके में हुए हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में हुई इस झड़प के बाद पूरे इलाके में तनाव फिर से चर्म पर पहुंच गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस हमले पर सख्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि ईरान ने अमेरिका के साथ बदतमीजी की है। हालांकि उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि समझौता अब भी मुमकिन है। अमेरिका के सेंट्रल कमांड (सेटकॉम) के अनुसार ईरानी सेना ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तैनात तीन अमेरिकी विध्वंसक जहाजों पर मिसाइलों, ड्रोनों और छोटी नावों से हमला किया। हालांकि, अमेरिका का दावा है कि उनके जहाजों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है और जवाबी कार्रवाई में ईरान के उन सैन्य ठिकानों को तबाह कर दिया गया है जहां से ये हमले शुरू हुए थे। दूसरी ओर, ईरानी मीडिया तेहरान टाइम्स ने दावा किया है कि अमेरिकी हमले के कारण उनके जहाजों को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा है। ईरानी सेना के प्रवक्ता ने वाशिंगटन पर सीजफायर के उल्लघंन का सीधा आरोप लगाया है। सारी दुनिया की नजर प्रस्तावित इस्लामाबाद में शांति वार्ता पर टिकी हुई है। तमाम दुनिया चाह रही है कि यह जंग रुके और क्षेत्र में अमन-चैन फिर से स्थापित हो।
- अनिल नरेन्द्र

Saturday, 9 May 2026

ईरान ने खाड़ी देशों पर हमला क्यों किया?


अमेरिका और इजरायल के साथ जंग के दौरान ईरान की जवाबी कार्रवाई पारंपरिक लक्ष्यों से आगे बढ़ गई, उसने खाड़ी देशों में लगातार हमले किए और यह सिलसिला अभी भी जारी है। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने दावा किया है कि ईरान ने उस पर मिसाइल और ड्रोन से हमला किया है, जिन्हें एयर डिफेंस सिस्टम ने रोका। फुजैटा में एक तेल फैसिलिटी पर बहरहाल एक ड्रोन गिरने से आग लग गई, जिसमें 3 भारतीय घायल हो गए। इससे पहले भी टैंकर पर ड्रोन हमले की घटना सामने आई थी। ईरान-अमेरिका के बीच सीजफायर के बाद यह इस तरह का पहला हमला है। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक यूएई के रक्षा मंत्रालय ने सोमवार शाम बताया कि देश के अलग-अलग हिस्सों में बैलिस्टिक मिसाल, क्रूज मिसाइल और ड्रोन को इंटरसेप्ट किया जा रहा है। ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिका से जुड़े डिजिटल हब, क्लाउड, इन्फ्रास्ट्रकचर और डेटा केंद्रों को निशाना बनाकर जंग के दायरे को और फैला दिया है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने कहा कि उसने यूएई और बहरीन में डेटा हब्स पर ड्रोन हमले किए। यह आज के जंग में एक अभूतपूर्व कारण है, जिसमें सिर्फ साइबर घुसपैठ की बजाए आम लोगों से जुड़ें क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर पर सोची-समझी रणनीति के तहत हमले किए गए हैं? ईरानी सरकारी मीडिया ने कहा कि इसका मकसद इन डेटा सेंटरों की दुश्मन की सैन्य और अन्य गतिविधियों में मदद करने वाली भूमिका को सामने लाना और उसे रोकना है। मौजूदा दौर में क्लाउड इन्फ्रास्ट्रक्चर अब दोहरे इस्तेमाल वाली रणनीतिक ढांचे के तौर पर उभरा है। यह बैंकिंग एविएशन, हेल्थ केयर, कार्पेरेट कामकाज और गवर्नमेंट जैसे क्षेत्रों में आम लोगों को सेवा देता है। इसके अलावा वह सेना और खुफिया एजेंसियों के कामों में भी मदद करता है। जिसमें एआई आधारित विश्लेषण, सैटलाइट तस्वीरों की प्रोसेसिंग लॉजिस्टिक्स की योजना बनाना और कमांड-एंड-कंट्रोल में मदद करना शामिल है। अमेरिका खासतौर पर बड़े पैमाने पर क्लाउड सेवाएं देने वाली कंपनियों पर निर्भर है। इनमें अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी बड़ी टेक कंपनियां शामिल हैं। ईरान का मानना है कि इन केंद्रों को निशाना बनाने से जंग की रणनीतियां पूरी तरह बदल जाएंगी और इससे संघर्ष की दिशा पर गहरा असर पड़ सकता है। यूएई इसलिए भी ईरान के निशाने पर है क्योंकि उसका मानना है कि यह अमेरिका, इजरायल के इशारों पर काम करता है और अपनी जमीन का ईरान अमेरिकी हमलों के लिए इस्तेमाल करने की इजाजत देता है। शोधकर्ता खालिद वलीद ने लंदन से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘अल-कुद्स-अल-अरबी' में एक लेख लिखा यह दिखाता है कि अब रणनीति में बड़ा बदलाव आया है। अब जगहों को नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को निशाना बनाया जा रहा है जो निगरानी का काम करती हैं। उन्होंने कहा, इस नजरिए से देखें तो ये कंपनियां अब स़िर्फ तकनीकी सेवाएं देने तक ही सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि वे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सेना के फ़ैसले लेने की प्रक्रिया की चेन का हिस्सा बन गई हैं।
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 7 May 2026

मिनाब स्कूल पर हमले पर पेंटागन की चुप्पी

पूर्व शीर्ष सैन्य वकील समेत अमेरिका के पांच पूर्व अधिकारियों ने इस साल की शुरुआत में ईरान के एक स्कूल पर हुए घातक हमले में संभावित अमेरिकी भूमिका को स्वीकार न रकने पर पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मंत्रालय) की आलोचना की है। इनमें से कुछ ने कहा कि इतने लंबे समय बाद भी हमले की बुनियादी जानकारी तक जारी न करना बेहद असामान्य है। ईरानी अधिकारियों के मुताबिक 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल युद्ध की शुरुआती कार्रवाई के दौरान मिनाब में एक प्राइमरी स्कूल पर मिसाइल गिरी। जिसमें करीब 110 बच्चे समेत 168 लोगों की मौत हुई। इसके बाद बीते दो महीनों में पेंटागन ने सिर्फ इतना कहा है कि इस घटना की जांच जारी है। मार्च की शुरुआत में अमेरिकी मीडिया ने खबर दी थी कि अमेरिकी सैन्य जांचकर्ताओं का मानना है कि शायद अमेरिकी बल अनजाने में स्कूल पर हमले के लिए जिम्मेदार  थे, लेकिन वे अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंचे थे। बीबीसी ने इस हमले की पारदर्शिता की कमी के आरोपों पर कई सवाल पूछे, जिस पर पेंटागन के एक अधिकारी ने कहा, इस घटना की जांच जारी है। लेफ्टिनेंट कर्नल रेचल ई वेनलैंडिंगम कहती हैं कि अमेरिका की मौजूदा स्थिति सामान्य प्रतिक्रिया से साफ तौर पर अलग है। वैनलैंडिंगम अमेरिकी वायुसेना में जज एडवोकेट जनरल रह चुकी हैं। उन्होंने बताया कि पिछली सरकारों ने कम से कम युद्ध कानून के प्रति निष्ठा और प्रतिबद्धता दिखाई थी। मौजूदा प्रशासन के बयानों में जबावदेही की प्रतिबद्धता गायब है। सबसे अहम यह सुनिश्चित करना भी कि ऐसा दोबारा न हो। राष्ट्रपति ट्रंप ने 7 मार्च को कहा था कि उनके विचार में मिनाब हमले के लिए ईरान जिम्मेदार है, लेकिन उन्होंने कोई सुबूत नहीं दिया। कुछ दिन बाद जब उनसे मिनाब स्कूल के पास सैन्य अड्डे पर अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल गिरने का वीडियो दिखाए जाने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहाः मैंने यह नहीं देखा। साथ ही ट्रंप ने बिना किसी सुबूत दावा किया कि ईरान के पास भी टॉमहॉक मिसाइलें थीं। 11 मार्च को जब उनसे उन खबरों के बारे में पूछा गया जिसमें कहा गया था कि शुरुआती सैन्य जांच में पाया गया कि अमेरिका ने स्कूल पर हमला किया था तो ट्रंप ने कहा मुझे इसके बारे में नहीं पता। अमेरिका के रक्षामंत्री पीटहेगसेथ से 4 मार्च को बीबीसी ने इस हमले पर सवाल किया था तो उन्होंने कहा, मैं सिर्फ  इतना कह सकता हूं कि हम इसकी जांच कर रहे हैं। यही नहीं अमेरिकी रक्षा विभाग ने इस हमले पर कई सवालों के जवाब देने से इंकार कर दिया। पिछले महीने बीबीसी ने स्वतंत्र रूप से हमले की वीडियो की पुष्टि की थी जिसमें स्कूल के पास ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) के अड्डे पर अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल गिरती दिख रही थी। पेंटागन के एक वरिष्ठ पूर्व सलाहकार वेस ब्रायंट ने बीबीसी से कहा कि शुरुआती सैन्य जांच आमतौर पर दो बातें तय करने के लिए होती है। पहली, क्या नागरिक क्षति वास्तव में हुई? दूसरी क्या उस समय अमेरिका उस इलाके में सक्रिय था या नहीं? जब दोनों शर्तें पूरी हो जाती हैं, तभी औपचारिक जांच शुरू की जाती है। प्रक्रिया के लिहाज से यह और भी साफ संकेत देता है कि वे पहले से जानते हैं कि वह अमेरिका की वजह से हुआ नहीं तो वे जांच नहीं कर रहे होते। वे बस इसे स्वीकार नहीं करना चाहते या इस पर बोलना नहीं चाहते। पिछले साल अमेरिका के रक्षा विभाग ने नौकरियों की कटौती की थी, उसमें ब्रायंट भी शामिल थे। अमेरिका स्वीकार करे या न करे उसने मानवता का कत्ल किया है जिसे कभी माफ नहीं किया जा सकता। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 5 May 2026

आप और ट्रंप लगातार झूठ बोल रहे हैं

अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ की ईरान युद्ध पर जनता को झूठ बोलने और गुमराह करने व वरिष्ठ सैन्य अफसरों को हटाने के आरोपों को लेकर प्रतिनिधि सभा की सशस्त्र सेवा समिति में सुनवाई हुई। पहली बार युद्ध शुरू होने के बाद रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ को ईरान युद्ध पर डेमोक्रेटिक सांसदों का सामना करना पड़ा। गत बुधवार को वो हाउस आर्ड सर्विसिज कमेटी के सामने पेश हुए। उनके साथ ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डेन केन और रक्षा मंत्रालय के मुख्य वित्त अधिकारी जूल्स हर्स्ट भी मौजूद थे। बहस की शुरुआत हेगसेथ ने डेमोक्रेट्स और कुछ रिपब्लिकनों के बयान को निराशावादी करार देते हुए कहा कि इस तरह के कमेंट्स अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन हैं। इस दौरान हेगसेथ और डेमोक्रेट्स सांसदों से तीखी बहस हो गई। छह घंटे की सुनवाई में माहौल गरमा गया। संसद के निचले सदन में ट्रंप प्रशासन के 1500 अरब डॉलर के रक्षा बजट पर चर्चा के दौरान यह नोकझोक हुई। पेंटागन द्वारा युद्ध की लागत 25 अरब डॉलर बताने पर डेमोक्रेट्स भड़क गए और उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप की मानसिक सेहत पर ही सवाल उठा दिए। इस पर हेगसेथ ने पलटवार किया कि ट्रंप सबसे तेज और सूझबूझ वाले कमांडर-इन-चीफ हैं। उन्होंने डेमोक्रेट सदस्यों से उल्टा सवाल किया कि क्या उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति जो बिडेन की क्षमता पर कभी सवाल उठाए? डेमोक्रेटिक सांसदों ने अमेरिका द्वारा शुरू किए ईरान युद्ध को वॉर ऑफ चॉइस बताया, जिसे कांग्रेस की मंजूरी के बिना शुरू किया गया। कैलिफोर्निया के डेमोक्रेट सांसद जॉन गरामेंडी ने कहा, आप और राष्ट्रपति शुरू से ही इस युद्ध के बारे में अमेरिकी जनता से झूठ बोल रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि डोनाल्ड ट्रंप मध्य-पूर्व के एक और युद्ध के दलदल में फंस गए हैं। हेगसेथ ने इस बयान को लापरवाह बताया और कहा कि ट्रंप किसी दलदल में नहीं हैं। आगे कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप के प्रति आपकी नफरत आपको अंधा कर रही है। हालांकि कमेटी के कई रिपब्लिकन सदस्यों ने पेंटागन का समर्थन किया। फ्लोरिडा के सांसद कार्लोस जिमेनेज ने कहा कि ईरान से अमेरिका के अस्तित्व को खतरा है। उन्होंने कहा-अगर कोई 47 साल से कह रहा है कि वह हमें मारना चाहता है तो मैं उसकी बात को गंभीरता से लूंगा। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और उसकी वजह से सामानों की कीमतों पर असर पर एक सांसद ने कहा आपको शर्म आनी चाहिए कि आपने मीनाब में हुए इस हमले में 168 लोग मारे गए, जिनमें करीब 110 बच्चे भी शामिल थे। आज हर अमेरिकन बढ़ती महंगाई से परेशान है। तेल की कीमतें बेतहाशा बढ़ रही हैं और इसके जिम्मेदार आप के राष्ट्रपति और आप जैसे सलाहाकार हैं। कमेटी के वरिष्ठ डेमोक्रेट सदस्य एडम स्मिथ ने कहा- हमसे गलती हुई और युद्ध में ऐसा होता है, लेकिन दो महीने तक चुप रहकर हमने दुनिया को यह संदेश दिया कि हमें परवाह नहीं है। कैलिफोर्निया के भारत मूल के सांसद रो खन्ना ने इस हमले की लागत पर सवाल उठाया। इस पर हेगसेथ न कहा कि यह मामला अभी जांच के दायरे में है और वह इसकी लगात पर टिप्पणी नहीं करेंगे। इसके अलावा डेमोक्रेट सांसद सारा जैकब्स ने रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मानसिक सेहत पर सवाल किया। इस सवाल पर पीट हेगसेथ और सारा जैकब्स के बीच तीखी बहस हुई। खबर है कि विपक्षी डेमोक्रेट्स सदस्यों ने हेगसेथ के खिलाफ हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में महाभियोग प्रस्ताव भी लाने का फैसला किया है। इस प्रस्ताव के आने के बाद ईरान जंग में ट्रंप और हेगसेथ की मुसीबतें बढ़ सकती है। हाउस ऑफ डेमोक्रेट्स ने 5 गंभीर आरोप लगाते हुए हेगसेथ के खिलाफ महाभियोग लाने का फैसला किया है। रक्षा मंत्री को कैबिनेट से हटाने के लिए सीनेट और हाउस में 2 तिहाई सांसदों की जरूरत होगी।
- अनिल नरेन्द्र

Saturday, 2 May 2026

खाड़ी देशों में उभरते मतभेद


अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद से खाड़ी देशों में आपसी मतभेद तेजी से बढ़ते नजर आने लगे हैं। होर्मूज स्ट्रेट के बंद होने से स्थिति विस्फोटक होती जा रही है। इस रास्ते के बंद होने से खाड़ी के बड़े देश जिनकी अर्थव्यवस्था तेल के निर्यात पर निर्भर है वह खासे उत्तेजित हैं। इसका एक नतीजा संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का प्रमुख तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक और ओपेक प्लस से बाहर जाने का फैसला। यह फैसला ईरान जंग की वजह से ऐतिहासिक रूप से दुनियाभर में ऊर्जा को लेकर एक बड़ा संकट पैदा हुआ है और जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। यूएई ने कहा है कि यह फैसला उसकी दीर्घकालिक रणनीति इकोनॉमिक विजन और बदलती एनजी प्रोफाइल को दर्शाती है। यूएई के ऊर्जा मंत्री सुहैल मोहम्मद अल मजरूई ने कहा है कि इस समूहों के तहत किसी बाध्यता से मुक्त होने पर देश को ज्यादा लचीलापन मिलेगा। ओपेक को 60 साल बाद छोड़ने का फैसला यूएई ने अचानक नहीं लिया, बल्कि इसके पीछे लंबे समय से पनप रहा असंतोष है। अबू धाबी को लगातार यह खटक रहा था कि सऊदी अरब ओपेक के जरिए तेल उत्पादन को नियंत्रित करता है और यूएई को अपनी क्षमता के हिसाब से ज्यादा तेल निकालने नहीं देता। जब यूएई ज्यादा उत्पादन करना चाहता था, तब सऊदी कम उत्पादन पर जोर देता रहा, जिससे दोनों देशों में तनाव बढ़ता चला गया। इस तनाव को हवा और तब मिली जब पाकिस्तान की भूमिका सामने आई। यूएई को पाकिस्तान का रवैया बिल्कुल पसंद नहीं आया, खासकर तब जब अमेरिका और ईरान के बीच वह मध्यस्थ बनने की कोशिश कर रहा था। एमएसटी फाइनेंशियल में ऊर्जा अनुसंधान के प्रमुख शाऊल कावर्निक ने कहा कि यह गठबंधन के अंत की शुरुआत हो सकती है। यूएई के जाने के साथ ओपेक अपनी क्षमता का लगभग 15 प्रतिशत खो देगा। इस फैसले को ओपेक के साथ-साथ इस गुट के सर्वेसर्वा माने जाने वाले सऊदी अरब के लिए झटका माना जा रहा है। यूएई का बाहर जाना अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक जीत माना जा रहा है जिन्होंने पहले ओपेक पर दुनिया का शोषण करने का आरोप लगाया था। जनवरी में उन्होंने सऊदी अरब और अन्य ओपेक देशों से तेल की कीमत कम करने को कहा था और टैरिफ लगाने की अपनी धमकी को भी दोहराया था। यूएई का ओपेक से अलग होने का निर्णय सिर्फ एक सदस्य देश का प्रस्थान नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक अहम मोड़ है। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव, होर्मूज जलडमरूमध्य पर अनिश्चितता और वैश्विक मुद्रास्फीति पहले से ही तेल बाजार को अस्थिर बनाए हुए है। यूएई ओपेक का तीसरा बड़ा उत्पादक सदस्य देश था और समूह के उत्पादन में करीब 12 फीसदी का योगदान करता था। ऐसे में उसका बाहर निकलना ओपेक की आपूर्ति क्षमता को प्रभावित जरूर करेगा। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। अगर ओपेक की शर्तें से मुक्त यूएई वैश्विक तेल बाजार को अतिरिक्त आपूर्ति करता है तो इससे तेल की कीमतों में कमी आ सकती है। यह स्थिति भारत जैसे उन देशों के लिए विशेष तौर पर फायदेमंद है जो ऊर्जा के आयात पर ही निर्भर है। गौरतलब है कि भारत अपने ऊर्जा सुरक्षा संबंधी तथ्यों से निपटने के लिए लंबे समय से ओपेक देशों से तेल के उत्पादन में बढ़ोतरी करने की मांग करता रहा है। भारत का कुल तेल जरूरतों का लगभग 40 फीसदी हिस्सा ओपेक देशों से आता है। हालांकि यह देखते हुए कि वैश्विक ऊर्जा बाजार कभी स्थिर नहीं रहता, वह निरंतर भू-राजनीतिक, आर्थिक, पर्यावरणीय बदलावों से प्रभावित होता रहता है। सऊदी अरब के लिए अब बाकी ओपेक देशों को एकजुट रखना बड़ी चुनौती बन गया है। यूएई ने शुरुआत कर दी है, अब देखना होगा कि और कौन-कौन से देश इसके नक्शे-कदम पर चलते हैं। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 30 April 2026

पागलों की दुनिया : मुझे मरने का डर नहीं



यह कहना था अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर में एक फायरिंग की घटना के बाद। ट्रंप ने घटना के बाद सीबीएस न्यूज को दिए इंटरव्यू में बताया कि जब फायरिंग हुई तो मैं जमीन पर गिर गया और फर्स्ट लेडी भी। सिक्योरिटी फोर्सेस के तुरन्त एक्टिव होने पर ट्रंप ने कहा कि मैं देखना चाहता था कि आखिर हो क्या रहा है? ट्रंप से पूछा गया कि क्या आपको पता है कि आप शूटर के निशाने पर थे? इसके जवाब में उन्होंने कहा- मुझे नहीं पता। मैंने एक मैनिफेस्टो पढ़ा। वह रेडिकलाइज्ड है। वह एक क्रिश्चियन विश्वासी था और फिर वह एंटी क्रिश्चियन बन गया और उसमें बहुत बदलाव आया। व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर के दौरान हुई फायरिंग में निशाने पर ट्रंप और उनके अधिकारी ही थे। यह बात एक्टिंग यूएस अटार्नी जनरल टॉड ब्लेंच ने कही। संदिग्ध की पहचान 31 साल के कोल टॉमस एलन के रूप में की गई है। उधर गोलीबारी के मामले में गिरफ्तार संदिग्ध कोल एलन ने कथित घोषणा पत्र में कई गंभीर आरोप लगाए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार एलन ने घटना से कुछ मिनट पहले अपने परिवार के एक सदस्य को एक कथित घोषणा पत्र भेजा था। जिसमें उसने अपने इरादों और विचारों का जिक्र किया। इस कथित दस्तावेज में एलन ने दावा किया कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन से जुड़े लोगों को निशाना बनाने की योजना बना रहा था। हालांकि उसने एफबीआई डायरेक्टर श्री पटेल को छोडने की बात भी कही। उसने लिखा कि प्रशासन के अधिकारियों को वह प्राथमिकता के आधार पर तथ्य बनाएगा, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि उसके शब्दों का पूरा अर्थ क्या है? घोषणा पत्र में एलन ने बेहद गंभीर भाषा का इस्तेमाल करते हुए कहा कि वह ऐसे लोगों को स्वीकार नहीं कर सकता जिन्हें वह अपराधी या देशद्रोही मानता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उसने कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग भी किया जिसमें उसने ट्रंप प्रशासन से जुड़े विवादों और आरोपों का जिक्र किया। उसने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी टिप्पणियां कीं और दावा किया कि आयोजन स्थल पर सुरक्षा का ध्यान मुख्य रूप से प्रदर्शनकारियों और सामान्य आगंतुकों पर था, न कि किसी संभावित खतरे पर। इस हादसे से यह तो साफ हो जाता है कि सिक्योरिटी की कमी थी। किसी हथियारबंद व्यक्ति का राष्ट्रपति के कार्यक्रम के इतने करीब पहुंचना भी बेहद गंभीर लापरवाही है। वहां ट्रंप ही नहीं, उनके प्रशासन से जुड़े सभी महत्वपूर्ण लोग मौजूद थे जो निशाना बन सकते थे। कथित हमलावर भी कोई अनपढ़, गंवार, भाड़े का हत्यारा नहीं है वह मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ा सम्मानजनक टीचर था। विडम्बना यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति पद जितना ताकतवर माना जाता है उससे जुड़े खतरे उतने ही बड़े हैं। अब्राहम लिंकन से लेकर जॉन एफ. कैनेडी तक अमेरिका के चार राष्ट्रपतियों की हत्या हो चुकी है। ट्रंप पर यह तीसरा असफल हमला है। संयोग या कुछ और? व्हाइट हाउस की स्पोक्समैन लेविट के बयान के बाद से सोशल मीडिया पर नई बहस छिड़ गई है। लोग हैरान हैं कि आखिर उन्होंने ऐसे शब्दों का इस्तेमाल क्यों किया जो बाद में हकीकत बन गई। हालांकि उनके समर्थकों का कहना है कि लेविट का मतलब ट्रंप की तीखी बयानबाजी से था, न कि असली गोलियों से। सोशल मीडिया में कुछ लोग इसे स्टेज्ड ड्रामा भी बता रहे हैं। उनका कहना है कि चारों तरफ से घिरे डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी जनता की सहानुभूति लेने के लिए यह ड्रामा करवाया है। सम्भव है कि इस घटना के बाद इस बार भी कुछ मोर्चे पर चुनौती झेल रहे ट्रंप प्रशासन को थोड़ी राहत मिल जाए। बाकी सत्य कभी निकलेगा या नहीं यह नहीं कहा जा सकता। ऐसी घटनाओं का सत्य शायद ही सामने आता है।
- अनिल नरेन्द्र