Saturday, 24 January 2026

मैं ही हूं शंकराचार्य!


पिछले कुछ दिनों से भाजपा प्रशासन और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज में भयंकर विवाद छिड़ा हुआ है। एक तरफ शंकराचार्य जी और अन्य साधु-संत हैं तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनका मेला प्रशासन है। सारा मामला शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के प्रयागराज में गंगा स्नान न करने को लेकर शुरू हुआ। प्रयागराज में चल रहे माघ मेले में मौनी अमावस्या के अवसर पर होने वाले पारंपरिक शाही स्नान को लेकर ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला प्रशासन के बीच स्वामी जी के पालकी पर सवार होकर स्नान को लेकर शुरू हुआ। प्रशासन ने स्वामी जी की पालकी पर स्नान करने से रोका, इस पर प्रशासन और स्वामी जी के समर्थकों में हाथापाई तक हो गई। स्वामी जी का कहना है कि प्रशासन के अधिकारियों ने न केवल स्वामी जी की पालकी को तोड़ने का प्रयास किया बल्कि उनके समर्थक साधु-भक्तों को जटा से पकड़कर मारा-पीटा और जेल में ठूंस दिया। इसके विरोध में शंकराचार्य जी ने धरना शुरू कर दिया जो अब भी जारी है। स्वामी जी का कहना है कि प्रशासन की माफी के बिना वे अपने आश्रम में प्रवेश नहीं करेंगे और मौके पर ही धरने पर बैठ गए। इस बीच मेला प्रशासन ने उन्हें नोटिस जारी करते हुए 24 घंटे में ये साबित करने को कहा है कि वे शंकराचार्य कैसे हैं? मेला प्रशासन ने शंकराचार्य जी से पूछा है कि उन्होंने अपने नाम के साथ शंकराचार्य की उपाधि क्यों जोड़ी? नोटिस में ये भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन एक मामला अभी तक समाप्त नहीं हुआ है, ऐसे में किसी भी धर्माचार्य को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य की मान्यता प्राप्त नहीं है। बावजूद इसके, स्वामी जी ने मेला क्षेत्र में बोर्डों पर अपने नाम के आगे ये शीर्षक लिखवा दिया। बता दें कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उनके गुरू स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद शंकराचार्य बनाया गया था। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का पट्टा अभिषेक भी शंकराचार्य ने किया था। अब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता एके मिश्रा के माध्यम से प्राधिकरण को आठ पन्नों का जवाब भेजा है। अपने जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मेला प्राधिकरण के आरोपों को सिरे से नकार दिया और कहा कि वे शंकराचार्य हैं। स्वामी जी ने 15 बिंदुओं में प्रयागराज मेला प्राधिकरण को जवाब दिया है। उन्होंने लिखा, सोमवार को आपकी (मेला प्राधिकरण) ओर से नोटिस सम्मानित अविमुक्तेश्वरानंद को बदनाम और अपमानित करने के बुरे इरादे से जारी किया गया। जो मनमाना, द्वेषपूर्ण और भेदभावपूर्ण है। शारदा मठ द्वारका के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज की वसीयत का भी जिक्र दिया गया है। त्रिवेणी मार्ग शिविर के बाहर प्रेसवार्ता में मेला प्राधिकरण के नोटिस पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के जिस आदेश का हवाला दिया गया है वो 14 अक्टूबर 2022 का है जबकि 11 सितम्बर 2022 को शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के ब्रह्मलीन होने के अगले दिन 12 सितम्बर को स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के आश्रम में शंकराचार्य के तौर पर उनका पट्टाभिषेक हो चुका था। जिस तरह से मेला प्रशासन ने शंकराचार्य और उनके अनुयायियों के साथ व्यवहार किया। उनकी उपेक्षा नहीं की जाती। धर्म गुरुओं को इस तरीके से अपमानित करना शर्मनाक है और साधुओं को जटाओ से पकड़ कर पीटना उससे भी ज्यादा निंदनीय है। अब तो शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के पक्ष में अन्य शंकराचार्य और संत खड़े हो गए हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जो खुद भी चाहते हैं कि मामले को निपटाने का प्रयास करना चाहिए। मेला प्रशासन शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी से माफी मांगे और उन्हें बाइज्जत गंगा स्नान करवा दे तो विवाद समाप्त हो सकता है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह विवाद बढ़ता जाएगा और तमाम साधु समाज मैदान में उतर आएंगे।
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 22 January 2026

ग्रीनलैंड लेकर रहेंगे: ट्रंप


पिछले कई दिनों से ग्रीनलैंड को लेकर भयंकर रस्साकशी चल रही है।  इस नाटक के तीन प्रमुख किरदार हैं। पहले हैं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जो कह रहे हैं कि अब वक्त आ चुका है, ग्रीनलैंड लेकर हम रहेंगे। ट्रंप झुकने के मूड में नहीं लगते। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को अपनी नाक का सवाल बना लिया है। वो कभी ग्रीनलैंड की सेना का मजाक उड़ाते हैं तो कभी वहां सैन्य हमले की बात करते हैं। ट्रंप ने यूरोपीय देशों को खुलकर धमकी दी है कि जो देश ग्रीनलैंड से जुड़े अमेरिकी इरादों का समर्थन नहीं करेंगे। उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने अब तो 8 यूरोपीय देशों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी भी दे डाली है। ट्रंप किसी भी कीमत पर ग्रीनलैंड हासिल करना चाहते हैं। वह यह भी दावा करते हैं कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर अपना कब्जा नहीं किया तो रूस या चीन इस पर अपना कब्जा कर लेगा। तो पहला किरदार तो डोनाल्ड ट्रंप हैं। दूसरा किरदार यूरोपीय देश हैं। ग्रीनलैंड मुद्दे पर ट्रंप ने यूरोप के 8 देशों पर टैरिफ बढ़ाने की चेतावनी पर यूरोपीय यूनियन ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि अगर अमेरिकी दबाव बनाने के लिए टैरफ लगाएगा तो ईयू भी जवाबी काउंटर टैरिफ लगाएगा। यूरोप का कहना है कि वह अपने हितों और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा। हालांकि ईयू ने अभी जवाबी टैरिफ का प्रतिशत तय नहीं किया है। ईयू में ट्रंप के ग्रीनलैंड बयान और टैरिफ दबाव से ईयू-यूएस ट्रेड एग्रीमेंट भी संकट में पड़ गया है। यूरोप के नेता इस कदम को दबाव की राजनीति बता रहे हैं। इटली की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी ने संकेत दिए कि यूरोप ब्लैकमेल के आगे नहीं झुकेगा। वहीं फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल पों ने कहा कि कोई भी धमकी यूरोप का रास्ता नहीं बदल सकती। वहीं तीसरा किरदार ग्रीनलैंड के लोग हैं और उनके समर्थक। ग्रीनलैंड की राजधानी नुउक में शनिवार को हजारों लोग बर्फ से ढकी सड़कों पर मार्च करते दिखे। यह मार्च ग्रीनलैंड पर कब्जे को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान के खिलाफ था। रणनीतिक और खनिज संपन्न आर्कटक द्वीप ग्रीनलैंड पर अमेरिका ने कंट्रोल की बात दोहराई है। प्रदर्शनकारियों ने ग्रीनलैंड का राष्ट्रीय झंडा लहराया, हाथों में तख्तियां उठाई और नारे लगाएö ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है। अमेरिका द्वारा यह कहना कि ग्रीनलैंड उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है मानना आतार्किक नहीं कहा जा सकता। ऐसा मानने वाले ट्रंप कोई पहले राष्ट्रपति नहीं हैं। उनसे पहले भी कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने ऐसा ही तर्क दिया था। यह दीगर बात है कि वह आगे नहीं बढ़ सके। ट्रंप विशुद्ध व्यापारी सोच वाले व्यक्ति हैं। लेकिन व्यापार आदर्शवाद से नहीं चलता। यह सही है कि व्यापार और अर्थव्यवस्था हमेशा से ही कूटनीतिक औजार रही है पर इस प्रकार से सारे कायदे-कानून, परंपरा ताक पर रख जबरदस्ती किसी अन्य देश पर कब्जा करने की धमकी कहां तक सही है। जिस तरह से अमेरिका और यूरोपीय देश आमने-सामने आ गए हैं उससे एक नया खतरा पैदा हो गया है। ट्रंप एक के बाद एक नया फ्रंट खोले जा रहे हैं। इस बार उनके निशाने पर उनके नाटो के देश हैं। 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 20 January 2026

चाबहार पर भारत के पीछे हटने की अटकलें

ईंरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 प्रातिशत टैरिफ लगाने की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा के बाद से ही यह सवाल बना हुआ था कि भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा? ईंरान से भारत का व्यापार अमेरिकी प्रातिबंधों के कारण बेशक बड़ा नहीं है लेकिन ईंरान रणनीतिक रूप से भारत के लिए काफी अहम है। ईंरान के दक्षिणी तट पर सिस्तानब्लू िचस्तान प्रांत में स्थित चाबहार बंदरगाह इसी रणनीति का अहम हिस्सा है। इसे भारत और ईंरान मिलकर विकसित कर रहे थे ताकि भारत को मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक सीधे पहुंच मिल सके। चाबहार भारत के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि इसके जरिए वह पाकिस्तान को बाइपास करते हुए मध्य एशिया पहुंच सकता है। लेकिन अमेरिका के अतिरिक्त टैरिफ की घोषणा के बाद से भारत के चाबहार पोर्ट से बाहर होने की खबरें जोर पकड़ने लगी हैं। इन खबरों और अटकलों को देखते हुए भारत सरकार ने बीते शुव््रावार को जवाब दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रावक्ता रणधीर जायसवाल ने शुव््रावार को कहा, जैसा कि आप जानते हैं 28 अक्टूबर 2025 को अमेरिकी वित्त विभाग ने एक पत्र जारी किया था जिसमें 26 अप्रौल 2026 तक वैध सशर्त प्रातिबंध छूट के दिशा-निर्देश दिए गए थे। हम इस व्यवस्था को अंतिम रूप देने के लिए अमेरिकी पक्ष के साथ सपर्व में हैं। ईंरान के साथ हमारा संबंध लंबे समय से चला आ रहा है। हम घटनाव््राम पर करीबी नजर रखे हुए हैं और इस साझेदारी को आगे बढ़ाएंगे।

पिछले वर्ष भारत और ईंरान के साथ व्यापार 1.6 अरब डॉलर का था।

ईंरान, भारत के वुल व्यापार का 0.15 प्रातिशत हिस्सा है। दरअसल, चाबहार को लेकर इन अटकलों को हवा मिली इकनॉमिक टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट से। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत ने चाबहार परियोजना से खुद को रणनीतिक रूप से पीछे करना शुरू कर दिया है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने अपने तय निवेश की राशि पहले ही ईंरान को ट्रांसफर कर दी है और इस परियोजना का संचालन करने वाली सरकारी वंपनी इंडिया पोट्र्स ग्लोबल लिमिटेड ने औपचारिक रूप से दूरी बना ली है ताकि भविष्य में किसी भी अमेरिकी प्रातिबंध से बचा जा सके। विपक्षी पार्टियां, वरिष्ठ पत्रकार और यहां तक कि अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार भी अमेरिका को लेकर भारत की नीति पर सवाल उठा रहे हैं। इनका दावा है कि भारत बार-बार अमेरिका को नाराज न करने के दबाव में झुक रहा है और अपने बड़े हितो को नुकसान पहुंचा रहा है। कांग्रोस के प्रावक्ता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया एक्स पर सवाल किया है कि भारत आखिर कब तक अमेरिका के दबाव में पैसला लेता रहेगा? उन्होंने लिखा— असल मुद्दा केवल चाबहार या रूस के तेल का नहीं है। असली सवाल यह है कि मोदी अमेरिका को भारत पर दबाव डालने क्यों दे रहे हैं? सामरिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. ब्रrा चेलानी ने एक्स पर लिखा : 2019 में जब अमेरिका ने ईंरान के तेल पर प्रातिबंध लगाए तो भारत ने अचानक ईंरान से तेल खरीदना बंद कर दिया। इससे भारत और ईंरान के बीच चला आ रहा ऊर्जा संबंध लगभग खत्म हो गया और इसका सीधा फायदा चीन को मिला। चाबहार बंदरगाह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट जिसे चीन चला रहा है उसके मुकाबले भारत का एक रणनीतिक जवाब माना जाता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ईंरान का चाबहार पोर्ट भारत के लिए बेहद अहम ट्रेड हब है। इस पोर्ट को विकसित करने में हमने 47000 करोड़ रुपए का निवेश किया हुआ है।

चाबहार भारत के पाकिस्तान को बाइपास कर अफगानिस्तान और सैंट्रल एशिया पहुंचाने में मदद करता है। ईंरान को लेकर फिलहाल ट्रंप का रवैया कभी हां, कभी ना वाला रहा है। फिलहाल वूटनीतिक पहल कर भारत अमेरिका के साथ इस मुद्दे पर अपनी बात मनवा सकता है, ऐसी आशा हम करते हैं। भारत अपने हितों को ऊपर रखे और किसी भी बाहरी दबाव में न आए।

——अनिल नरेन्द्र 

Saturday, 17 January 2026

जंग की चौखट पर ईरान-अमेरिका


ईरान में हाल के विरोध प्रदर्शनों ने ईरान और अमेरिका को जंग की चौखट पर लाकर खड़ा कर दिया है। विरोध प्रदर्शनों के बाद हालात और सख्त होने के संकेत मिल रहे हैं। ईरान के चीफ जस्टिस गुलाम हुसैन मोहसेनी एजेई ने कहा है कि गिरफ्तार प्रदर्शनकारियों पर तेजी से मुकदमा चल सकता है और उन्हें फांसी की सजा भी दी जा सकती है। यह बयान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी के बावजूद आया है, जिन्होंने कहा था कि अगर ईरान फांसी देता है तो अमेरिका कड़ी कार्रवाई करेगा। लगभग 130 घंटों से ईरान में इंटरनेट और फोन संपर्क ठप है। अमेरिका में ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्टस न्यूज एजेंसी का दावा है कि अब तक कम से कम 2571 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें 2403 प्रदर्शनकारी, 147 सरकार समर्थक, 12 बच्चे और आम नागरिक शामिल हैं। करीब 18,100 लोग गिरफ्तार किए गए हैं। ईरान की राजधानी तेहरान में सुरक्षा बलों और नागरिकों के लिए सामूहिक अंतिम संस्कार भी किया गया, जहां डेन टू अमेरिका जैसे नारे लगे। भारत के दूतावास ने अपने नागरिकों को ईरान छोड़ने और बेहद सतर्क रहने की सलाह दी है। ट्रंप ने दी कड़े एक्शन की चेतावनी। ट्रंप ने एक संदेश में कहा ईरानी देशभक्तों विरोध जारी रखो। अपनी संस्थाओं पर कब्जा करो। मृत्युदंड दिए जाने की स्थिति में बहुत कड़ी कार्रवाई करेंगे। अगर वे ऐसा कुछ करते हैं तो हम कड़ी कार्रवाई करेंगे। जारी विरोध प्रदर्शन के बीच अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की बात कही जा रही है। राष्ट्रपति ट्रंप भी ऐसा कई बार कर चुके हैं। अमेरिका के भीतर ईरान में सत्ता परिवर्तन की बात लंबे समय से उठती रही है। अमेरिका ने ईरान में 1953 में सत्ता परिवर्तन किया भी था लेकिन 1979 की इस्लामिक ाढांति ने अमेरिका समर्थक सरकार को अपदस्थ कर दिया था और आयतुल्ला खुमैनी का राज स्थापित हो गया था। तभी से अमेरिका ईरान के इस मुल्ला राज को खत्म करना चाहता है और तख्ता पलट कर अपनी समर्थक सरकार बनाना चाहता है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता है जिसकी बहुत संभावना है तो ईरान के साथ कौन खड़ा रहेगा? रूस और चीन ईरान के अहम साझेदार हैं और उनसे उम्मीद की जाती है कि ये अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का खुलकर विरोध करेंगे और कर भी रहे हैं। पर क्या यह समर्थन जवाबी जमा खर्च होगा या फिर खुलकर लड़ाई के मैदान में उतरेंगे? यह प्रश्न महत्वपूर्ण है। जहां तक अरब देशों का सवाल है यह खुलकर न तो समर्थन कर रहे हैं न ही विरोध। यह बात सही है कि जनता के गुस्से को ाtढर हिंसा से दबाना उचित नहीं, लेकिन किसी राष्ट्र की संप्रभुता के उल्लंघन का बहाना भी नहीं बनाया जाना चाहिए। अगर ट्रंप वास्तव में मदद करना चाहते हैं तो उन्हें तेहरान के साथ व्यापार पर लगाए गए 25 प्रतिशत एक्स्ट्रा टैरिफ समेत उन तमाम प्रतिबंधों को हटाने पर विचार करना चाहिए, सरकार जिनका असर खासकर आम लोगों पर पड़ा रहा है। ईरान में इस समय जरूरत है टकराव टालकर बातचीत का रास्ता अपनाने की। इसकी शुरुआत भारत की तरफ से होनी चाहिए। वहां की जनता लंबे समय से मुश्किल आंदोलनों हालात का सामना कर रही है। समय-समय पर उसका असंतोष के जरिए बाहर आता रहा है। हम उम्मीद करते हैं कि टकराव टल जाए और युद्ध की स्थिति न ही बने। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 15 January 2026

आर-पार की लड़ाई


पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केंद्र सरकार के बीच अकसर टकराव देखने को मिलता है। पर इस बार पश्चिम बंगाल में विधानसभा का चुनाव है और यह लड़ाई अब आर-पार की बनती दिख रही है। कुलपतियों की नियुक्ति से लेकर राज्यपाल की भूमिका और एसआईआर तक दोनों के भेद कई बार आमने-सामने आ चुके हैं। लेकिन अब जो लड़ाई है वह आर-पार की लगती दिख रही है, इस बार फ्लैश पाइंट पर पहुंचती दिख रही है। ममता बनर्जी लंबे समय से केंद्रीय एजेंसियों- ईडी, सीबीआई और अन्य को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाती रही हैं। टीएमसी का दावा है कि ये एजेंसियां भाजपा सरकार के इशारों पर काम कर रही हैं। खासकर चुनावों से पहले। उदाहरण के लिए हाल ही में ईडी की छापेमारी के दौरान ममता बनर्जी की गतिविधि को लिया जा सकता है। लेकिन पॉलिटिक्ल कसंलिटिंग फर्म आई-पैक और उसके प्रमुख प्रतीक जैन के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय के छापों की वजह से जो टकराव चल रहा है उसने केंद्र और राज्य की एजेंसियों को भी आमने-सामने ला दिया है। ईडी का आरोप है कि ममता ने उसकी कार्रवाई में बाधा डाली और बंगाल पुलिस उनकी सरकार के निर्देश पर मनी लांड्रिंग जांच को विफल करने का प्रयास कर रही है। वहीं ममता का आरोप है कि केंद्र सरकार और उसकी एजेंसियां राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश करने में लगी हुई हैं। ममता का दावा है कि ईडी ने छापा मारकर सबूत नहीं बल्कि उनकी पार्टी की चुनावी रणनीति संबंध दस्तावेज उठाने की कोशिश की। ममता का छापे के दौरान पहुंच कर कुछ फाइलों को जबरदस्ती ईडी अफसरों के हाथ से छीनने का भी आरोप लगा है। ईडी ने इस मामले में मुख्यमंत्री, पुलिस प्रमुख व अन्य के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की है और अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है जहां प्राथमिक सुनवाई भी हो गई है इससे पहले ईडी कोलकाता हाईकोर्ट भी गई। वहीं ममता का कहना है कि वह सीएम की हैसियत से नहीं बल्कि तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख के तौर पर मौके पर पहुंची थीं। हालांकि यह भेद करना मुश्किल है कि वह कब पार्टी प्रमुख हैं और कब सरकार प्रमुख। ममता ने ईडी की छापेमारी को राजनीतिक रंजिश बताते हुए न सिर्फ सड़क पर उतर कर विरोध किया बल्कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर भी गंभीर आरोप लगाए। ममता के भतीजे और टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी कहा कि एजेंसियां हथियारबंद हैं और इसके सहारे भाजपा चुनाव में हेरफेर का प्रयास कर रही है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का समय ज्यो-ज्यों करीब आ रहा है, राजनीतिक उथल-पुथल की स्थिति गंभीर होती जा रही है। अब तो यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या राज्य राष्ट्रपति शासन की दिशा में बढ़ रहा है? यह सवाल इसलिए भी प्रासंगिक है कि हाल के वर्षों में ममता और केंद्रीय एजेंसियां, राज्यपाल और संघीय ढांचे से जुड़े मुद्दों पर बार-बार चुनौतियां खड़ी की हैं। केंद्र और विपक्षी दलों वाले राज्यों के बीच अनबन का पुराना इतिहास है लेकिन बंगाल में अगर यह ज्यादा उग्र दिखता है तो वजह दोनों तरफ से ताकत बढ़ाने और नियंत्रण की कोशिश है। यह किसी से छिपा नहीं कि भाजपा पश्चिम बंगाल में अपना शासन चाहती है और इसके लिए साम, दाम, दंड और भेद सभी हथकंडे अपना रही है। मुश्किल यह भी है कि पश्चिम बंगाल में डबल इंजन की सरकार नहीं है। वहां की नौकरशाही पर ममता का कंट्रोल है इसलिए केंद्र अपनी एजेसियों का इस्तेमाल कर रही है। संवैधानिक संस्थाओं के बीच इस तरह का संघर्ष किसी के हित में नहीं है। पर लगता यह है कि ममता आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं।
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 13 January 2026

हजारों ईरानियों के खून से सने हैं ट्रंप के हाथ


ईरान में महंगाई के खिलाफ 13 दिनों से चल रहे प्रदर्शन के बीच गुरुवार रात को हालात और बेकाबू हो गए। एक न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में 100 से ज्यादा शहरों में प्रदर्शन फैल चुका है। प्रदर्शनकारियों ने सड़के ब्लाक की, आग लगाई। लोग खामेनेई की मौत और इस्लामिक रिपब्लिकन का अंत हुआ, जैसे नारे लगा रहे थे। कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारी क्राउन प्रिंस रजा पहलवी के समर्थन में नारे लगा रहे थे। वह नारा लगा रहे थे यह आखिरी लड़ाई है शाह पहलवी लौटेंगे। अमेरिकन ह्ममून राइट एजेंसी के मुताबिक प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा में अब तक 200 लोग मारे गए हैं। जिसमें 8 बच्चे शामिल हैं। एक पुलिस अधिकारी की भी चाकू मारकर हत्या कर दी गई। जबकि 2270 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है। ईरान में महंगाई के खिलाफ आम लोगों का विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे तेहरान बनाम वाशिंगटन होता जा रहा है। ईरानी मीडिया खुलेआम कह रहा है कि प्रदर्शनकारियों को सीआईए और मोसाद हवा व मदद दे रहा है। प्रदर्शन की आड़ में वाशिंगटन और तेल अवीव सत्ता परिवर्तन करवाना चाहता है। वह खामेनेई को भगाना चाहता है और ईरान के मुल्ला सत्ता को उखाड़ फेंक शाह पहलवी को सत्ता पर बिठाना चाहता है। इसके पीछे ईरान का तेल और अन्य कीमती खनिज पदार्थ ट्रंप अपने हाथ में लेना चाहता है। इसमें कोई शक नहीं कि ईरानी जनता महंगाई, बेरोजगारी से परेशान है और इसलिए सड़कों पर उतरी है। पर इस असंतोष का फायदा ट्रंप उठाना चाहते हैं और इस बहाने वह सत्ता परिवर्तन करना चाहते हैं। पर यह काम इतना आसान नहीं होगा। ईरानी एक बहुत बहादुर और लड़ाकू कौम है। वह अपनी सरकार से नाराज तो हो सकते हैं। पर वह अपने देश की कमान ट्रंप के हाथ में नहीं देना चाहेंगे। प्रदर्शनों के बीच ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई ने शुक्रवार को स्पष्ट और सख्त संदेश दिया कि इस्लामिक गणराज्य किसी भी हालत में पीछे नहीं हटेगा। सरकारी टीवी पर प्रसारित भाषण में 86 वषीय खामेनेई ने प्रदर्शनकारियों को विदेश समर्पित तत्व करार दिया और कहा कि उनका उद्देश्य ईरान को अस्थिर करना है। खामेनेई ने विशेष रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति के हाथ हजारों ईरानियों के खून से सने हैं। दरअसल ईरान की समस्या बहुत हद तक अमेरिकी और पश्चिम देशों ने पैदा की हुई है। वर्षों से ईरान को आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है। इस समय भी परमाणु हथियारों के कार्यक्रम पर रोक नहीं लगाने के आरोप में अमेरिका और यूरोप ने ईरान पर कई तरह के प्रतिबंध लाद रखे हैं। इन पाबंदियों की वजह से ईरान की इकोनॉमी डूबने की कगार पर पहुंच चुकी है। दशकों का इन पाबंदियों की वजह से ईरान को कभी संभलने का मौका नहीं मिला। ताजा विरोध प्रदर्शन देश के अधिकतर हिस्सों में फैल चुका है। इंटरनेट बंद है और आम नागरिकों की सुरक्षा को लेकर पूरी दुनिया में चिंता है। पर यह ईरान का अंदरूनी मामला है और एक संप्रभु देश के मामले में अमेरिका या और किसी देश को कूदने का भी अधिकार नहीं है। अमेरिका और इजरायल आए दिन ईरान पर सैनिक कार्रवाई करने की धमकी दे रहा है। ईरान की जनता को ही अंतिम फैसला करना होगा कि वह क्या चाहते हैं?
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 10 January 2026

मादुरो को अचानक सत्ता से हटाया तो क्या होगा?


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा निकोलस मादुरो को पकड़ने के लिए सैन्य अभियान को अधिकृत करने से ठीक पहले अमेरिका की गुप्तचर सेवा सीआईए ने एक गोपनीय आंकलन पूरा किया जिसमें यह जांच की गई कि अगर मादुरो को अचानक सत्ता से हटा दिया जाता है तो वेनेजुएला की आंतरिक स्थिति कैसी होगी? न्यूयार्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप द्वारा प्रत्यक्ष कार्रवाई के जोखिमों और परिणामों का आकंलन करने के दौरान वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने गुप्त विश्लेषण का अनुरोध किया था। रिपोर्ट में अमेरिका के नेतृत्व में तख्तापलट की संभावना पर कम और मादुरो के लिए व्यावहारिक निकास परिदृष्टियों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया था, जिसमें बातचीत के माध्यम से समझौते, निरन्तर अमेरिकी दबाव और अंतिम उपाय के रूप में बल प्रयोग शामिल थे। खुफिया आंकलन से अवगत लोगों ने बताया कि सीआईए ने मादुरो के पद छोड़ने के लिए एक ही संभावित परिणाम की कल्पना करने के बजाए कई विकल्पों पर विचार किया। इनमें बातचीत के जरिए सत्ता हस्तांतरण शामिल था, जिसमें मादुरो स्वेच्छा से पद छोड़ देते, प्रतिबंधों और संपत्ति जब्ती के माध्यम से दबाव बढ़ाना और अन्य विकल्पों के विफल होने पर जबरन निष्कासन की संभावना शामिल थी। इस विश्लेषण का उद्देश्य ट्रंप द्वारा द्वारा वेनेजुएला के एक अत्याधिक सुरक्षित सैन्य ठिकाने के खिलाफ उच्च जोखिम वाले अभियान की मंजूरी देने पर विचार करते समय उच्चस्तरीय निर्णय लेने में मार्गदर्शन करना था। रिपोर्ट से परिचित अधिकारियों ने कहा कि इसमें राष्ट्रपति के अंतिम निर्णय को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीआईए की नजर में सबसे संभावित उत्तराधिकारी कौन था? इस आकलन के सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों में से एक उत्तराधिकारी पर इनका दृष्टिकोण था, उप राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगज। रोड्रिगज को उस व्यक्ति के रूप में पहचाना जो मादुरो को हटाए जाने की स्थिति में तुरन्त सत्ता संभालने के लिए सबसे उपयुक्त थीं। हालांकि कुछ सांसदों और वेनेजुएला के नागरिकों ने विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो को संभावित वैकल्पिक नेता के रूप में देखा है, लेकिन खुफिया समीक्षाओं ने इस बात पर संदेह जताया है कि क्या उनके पास मादुरो के बाद की स्थिति में जल्दी से सत्ता संभालने के लिए आवश्यक संगठनात्मक ढांचा या राजनीतिक प्रयास है? खुफिया जानकारी से परिचित अधिकारियों के अनुसार सीआईए को संदेह था कि क्या विपक्ष जनसमर्थन को राज्य संस्थाओं, सेना और सुरक्षा सेवाओं पर प्रभावी नियंत्रण में बदल पाएगा? चिंता वैचारिक नहीं बल्कि व्यावहारिक थी, स्पष्ट और व्यवहार्य उत्तराधिकारी के बिना मादुरो को हटाने से अस्थिरता कम होने के बजाए और बढ़ सकती थी। सीआईए का यह आंकलन सही साबित होता दिख रहा है। वेनेजुएला में न तो सत्ता परिवर्तन हुआ और न ही मौजूदा सरकार और देशवासियों में अमेरिका के प्रति समर्थन बढ़ता दिख रहा है। निकोलस मादुरो को तो हटा दिया पर फिलहाल उनके उत्तराधिकारी डेल्सी रोड्रिगज वैसी ही बातें कर रही हैं जैसे मादुरो करते थे। आगे चलकर बदल जाए तो और बात है। अभी तो वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति, डेल्सी रोड्रिगज ने कहा है कि देश पर वेनेजुएला की सरकार शासन कर रही है, न कि कोई विदेशी शक्ति। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के उन दावों को खारिज कर दिया, जिन्होंने कहा था कि उन्हें वेनेजुएला तक पूरी पहुंच चाहिए। रोड्रिगज ने कहा यहां कोई युद्ध नहीं है क्योंकि हम युद्ध में नहीं हैं। हम एक शांतिप्रिय लोग हैं। एक शक्तिशाली देश हैं, जिस पर हमला किया गया और आाढमण किया गया। उनकी यह टिप्पणी तब आई जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि वेनेजुएला के अंतरिम अधिकारी 3 से 5 करोड़ बैरल प्रतिबंधित तेल अमेरिका को हस्तांतरित करेंगे। 
-अनिल नरेन्द्र