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Thursday, 11 June 2026

क्या इजरायल अमेरिका की जासूसी कर रहा है?

ईरान युद्ध को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन  नेतन्याहू के बीच टकराव व बढ़ती रणनीतिक दूरियों ने पेंटागन की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी रक्षा मुख्यालय को इजरायली जासूसी का भय लगने लगा है। उसने चेतावनी दी है कि वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी कड़ी इजरायली निगरानी का निशाना बन सकते हैं? एनबीसी न्यूज की एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के दो मौजूदा व एक पूर्व अधिकारी ने बताया कि पेंटागन की डिफैंस इंटेलिजेंस एजेंसी (डीआईए) ने हाल ही में इजरायल के लिए काउंटर इंटेलिजेंस खतरे के स्तर को क्रिटिकल यानी गंभीर कर दिया है। यह उनका सबसे ऊंचा आंतरिक मूल्यवान स्तर है। एक मौजूदा अधिकारी ने अमेरिकी पत्रकार को बताया कि अमेरिका पहले से ही इजरायल की आधिकारिक यात्राओं के दौरान सुरक्षा उपाय बरतता है क्योंकि इजरायली जासूसी एजेंसियों को जानकारी जुटाने के मामले में बहुत आक्रामक माना जाता रहा है। पेंटागन की नई चिंताओं से पता चलता है कि इजरायल पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के संबंध में अमेरिकी रणनीतिक चर्चाओं व फैसलों की जानकारी हासिल करने की कोशिश कर रहा है। इजरायली जासूसी नेटवर्क खासकर उनकी खुफिया एजेंसी ऐसे कामों के लिए दुनिया में बदनाम है। चौंकाने वाली बात यह है कि मोसाद ने अपने सबसे भरोसेमंद साथी अमेरिका को भी नहीं बक्शा है? 

-अनिल नरेन्द्र

पत्रकार को कहा: बेईमान और बेवकूफ

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्राध्यक्षों से तो बदतमीजी से पेश आते ही हैं पर अपने देश के पत्रकारों खासकर महिला पत्रकारों से कैसे पेश आते हैं ताजा घटना से पता चलता है। ट्रंप ने एनबीसी जैसी बड़ी टीवी नेटवर्क से एक इंटरव्यू के दौरान अचानक बातचीत बीच में ही खत्म कर दी। कार्यक्रम की होस्ट क्रिस्टन वेल्कर बार-बार उनके (ट्रंप के) कई दावों पर सवाल उठा रही थीं। रविवार को प्रसारित हुए कार्यक्रम ‘मीट द प्रेस' में ट्रंप ने दावा किया कि कैलिफोर्निया में चल रहे प्राइमरी चुनाव और साल 2020 का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव दोनों ही धांधली पूर्ण थे। जब वेल्कर ने चुनावों में धांधली के दावे के समर्थन में सुबूत मांगे तो ट्रंप ने कहा, ‘मुझे बस देखना और सुनना भर है।' इस पर वेल्कर ने कहा यह सुबूत नहीं है। इसके बाद ट्रंप ने मीडिया पर बेईमान होने का आरोप लगाया और इंटरव्यू समाप्त करते हुए कहा, माफ कीजिए, अब इसे यहीं खत्म करते हैं। मेरे लिए बहुत हो गया यह इंटरव्यू अब खत्म है। इंटरव्यू शुरू होने के लगभग 50 मिनट बाद इसे छोड़ दिया। वेल्कर के सवालों के जवाब में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए कार्रवाई करनी जरूरी थी और यह अंतहीन युद्ध नहीं होगा। हम वहां कुछ महीनों के लिए रहेंगे और उसके बाद खतरा काफी हद तक समाप्त हो जाएगा। इसके बाद बातचीत उस दंगे पर पहुंची और जब ट्रंप ने साल 2020 के चुनाव में धांधली का अपना पुराना, बिना सुबूत वाला दावा दोहराया तो क्रिस्टन वेल्कर ने उन्हें  चुनौती दी। ट्रंप ने फिर कैलिफोर्निया  के प्राथमिक चुनावों का जिक्र किया, जहां गवर्नर सहित कई पदों के लिए नवम्बर में होने वाले मध्यावधि चुनावों में कौन से दो उम्मीदवार होंगे। यह तय करने के लिए वोटों की गिनती जारी थी। उन्होंने फिर आरोप लगाया, वे चुनाव में धांधली कर रहे हैं, पलटकर वेल्कर ने पूछा: क्या आपके पास इसके समर्थन में कोई सुबूत है? ट्रंप ः मुझे सिर्फ देखना और सुनना है। वेल्कर ने बीच में टोका, लेकिन यह कोई सुबूत नहीं हैं। ट्रंप ने आगे कहा वे बेईमान हैं बिल्कुल आपकी तरह। इस पर वेल्कर ने जवाब दिया निष्पक्षता की बात करें तो मैं बेईमान नहीं हूं। लेकिन बातचीत जारी रखें, इस पर ट्रंप ने उनसे कहा या तो आप बेईमान हैं या फिर बेवकूफ और यह कहते हुए ट्रंप उठ गए  और कहा इसे यहीं खत्म करते हैं। मेरे लिए बहुत हो गया। शुक्रिया डार्लिंग, आपको अपने प्रेस को सुधारना चाहिए क्योंकि एक देश कभी महान नहीं बन सकता अगर उसकी प्रेस बेईमान है। हम इस महान पत्रकार को सलाम करते हैं जिन्होंने अपनी बेइज्जती सही पर डटी रहीं। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 9 June 2026

युद्ध विराम के नाम पर धोखा?

क्या अमेरिका ईरान पर जमीनी हमले की तैयारी कर रहा है और सीजफायर के नाम पर ईरान को बेवकूफ बना रहा है? अमेरिकी वारशिप यूएसएस त्रिपोली की तैनाती के बाद  सवाल फिर यह उठ गया है कि अमेरिका की असल नीयत क्या है? त्रिपोली की तैनाती के बाद यह सवाल उठाना लाजमी है। अमेरिकी सेना ने शनिवार को ईरान की ओर से लांच किए गए ड्रोन को तबाह कर देने का दावा किया। वहीं अब होर्मूज में यूएसएस त्रिपोली की तैनाती की ताजा खबर आई है। सवाल उठता है कि क्या ईरान पर अब जमीनी हमला होने जा रहा है? अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता कहने को तो अभी जारी है। लेकिन जमीन और समुद्र पर जो स्थिति दिख रही है वे कुछ और ही कहानी की ओर इशारा कर रही है। पिछले 72 घंटों में हुई कई सैन्य कार्रवाईयों ने पश्चिम एशिया में नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका सिर्फ  ईरान पर दबाव बना रहा है या फिर होर्मूज जलडमरूमध्य पर निर्णायक बढ़त हासिल करने की तैयारी कर रहा है?  क्योंकि जो तैनाती अमेरिका कर रहा है, उसे देखकर तो ऐसा लगता है कि ट्रंप अब ईरान के आइलैंड पर कब्जा करने जा रहा है?  घटनाओं की शुरुआत उस खबर से हुई जिसमें बताया गया कि ईरानी झंडे वाले चार तेल टैंकर होर्मूज पार करने में सफल रहे। ये जहाज कथित तौर पर करीब 70 लाख बैरल तेल लेकर निकले थे और प्रतिबंधों के बावजूद आगे बढ़ गए। लेकिन इसके कुछ ही घंटों बाद अमेरिकी इंडो-पैसेफिक कमांड ने घोषणा की कि उसने हिंद महासागर में प्रतिबंधित तेल टैंकर एमटी डेविना को रोककर इस पर कब्जा कर लिया है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि कब्जे में लिया गया जहाज उन्हीं चार टैंकरों में से एक था या नहीं। लेकिन टाइमिंग ने कई अटकलों को जन्म दिया है। इसे मसले पर संभल ही रहा था कि उस पर अमेरिका ने हमला कर दिया। शनिवार को ही अमेरिकी सैंट्रल कमांड ने दावा किया कि उसने होर्मूज की ओर बढ़ रहे चार ईरानी हमलावर ड्रोन मार गिराए। इसके तुरंत बाद अमेरिकी सेना ने ईरान के गोसक और केशम द्वीप पर मौजूद तटीय रडार ठिकानों पर हमले किए। पहली बार नहीं है जब केशम को निशाना बनाया गया है। लेकिन मौजूदा हालात में इस द्वीप का नाम बार-बार सामने आना सैन्य विश्लेषकों का ध्यान खींच रहा है। जवाब में ईरान ने भी कुवैत और बहरीन की ओर सात मिसाइलें दागी। इनमें से 6 को अमेरिका ने रोकने का दावा किया। इस बीच अमेरिका ने यूएसएस त्रिपोली की अरब सागर और होर्मूज क्षेत्र में तैनाती की है। यूएसएस त्रिपोली कोई साधारण युद्ध पोत नहीं है। यह एक उभयचर हमलावर जहाज है, जिसका मतलब है कि ये जहाज पानी से तो हमला कर ही सकता है, जरूरत पड़ने पर जमीन के बेहद करीब जाकर सैनिकों को उतार भी सकता है। ऐसे जहाज समुद्र से सीधे सैन्य अभियान चलाए जाने के लिए बनाए जाते हैं। उधर केशम ईरान का सबसे बड़ा द्वीप है और होर्मूज के मुहाने पर मौजूद है। इसे न डूबने वाला एयरक्राफ्ट कैरियर भी कहा जाता है। ईरान ने यहां वर्षों से रडार सिस्टम, ड्रोन बेस, एंटी शिप मिसाइलें, अंडरग्राउंड सुरंगे और नौ सैनिक अड्डे बनाए हुए हैं। अगर अमेरिका इस द्वीप पर कब्जा कर लेता है तो उसे  कई बड़े स्ट्रेटिजिक फायदे मिल सकते हैं। वैसे अमेरिका के लिए केशम पर कब्जा बिल्कुल भी आसान नहीं होने वाला है। इसका मतलब होगा सीधे अंगारों को हाथ में लेना। केशम ईरानी जमीन से बेहद करीब है। अगर अमेरिका अपने सैनिकों को यहां उतारता है तो उसे ईरान की मिसाइलों, ड्रोन, नौ सैनिक हमलों और संभावित गुरिल्ला प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है। यूएसएस त्रिपोली की मौजूदगी, केशम पर लगातार हमले और टैंकरों को रोकने जैसी कार्रवाईयों ने यह बहस तेज कर दी है कि अमेरिका होर्मूज पर रणनीतिक बढ़त लेने की कोशिश कर रहा है। यही वजह है कि शांति वार्ता चलने के बावजूद पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की बजाए और बढ़ता दिखाई दे रहा है। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 6 June 2026

अयातुल्लाह अली खामेनेई को अंतिम विदाई

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के लिए तीन दिन के राजकीय अंतिम संस्कार का ऐलान किया गया है। तीन महीने बाद अयातुल्लाह अली खामेनेई को दी जाएगी अंतिम विदाई, मशहद में होंगे सुपुर्द-ए-खाक। ईरान सरकार ने पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के लिए तीन दिन के राजकीय अंतिम संस्कार का ऐलान किया है। फिलहाल तारीख घोषित नहीं हुई है। अंतिम संस्कार और श्रद्धांजलि कार्यक्रम इस्लामिक कैलेंडर के अखिरी महीने जिलहिज्जा के अंत में हो सकता है। यानी 15 जून के आसपास। अधिकारियों ने बताया कि खामेनेई की इच्छा के अनुसार उन्हें मशहद के इमाम रजा दरगाह में दफनाया जाएगा। तेहरान, कोम और मशहद में अंतिम कार्यक्रम होंगे। इन शहरों में बड़े पैमाने पर शोभा यात्राएं और श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित की जाएंगी। ईरान के सरकारी टीवी चैनल आईआरआईबी से बातचीत में तवाकोली-जादेह ने कहा कि तीनों शहरों में करोड़ों लोगों के शामिल होने की उम्मीद है। तेहरान के डिप्टी मेयर मोहम्मद अमीन तवाकोली-जादेह ने कहा कि ईरान के कई अन्य प्रांत भी श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित करना चाहते हैं। बताया जा रहा है कि तेहरान में होने वाला मुख्य कार्यक्रम कम से कम 24 घंटे चलेगा। सिर्फ तेहरान में ही 1.5 करोड़ से दो करोड़ लोग अपने शहीद सुप्रीम लीडर को अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंच सकते हैं। इतनी बड़ी भीड़ को संभालने के लिए प्रशासन सुरक्षा, यातायात और अन्य जरूरी व्यवस्थाओं की तैयारी कर रहा है। यह फैसला अयातुल्लाह अली खामेनेई की शहादत के 3 महीने बाद लिया गया है। आमतौर पर इस्लामी परम्परा के अनुसार किसी व्यक्ति का अंतिम संस्कार मौत के कुछ दिनों के भीतर कर दिया जाता है, लेकिन ईरानी अधिकारियों ने पहले इस कार्यक्रम को टाल दिया था। पहले क्यों नहीं हुआ अंतिम संस्कार? अयातुल्लाह अली खामेनेई 23 फरवरी को अमेरिकी-इजरायली हमले में मारे गए थे। उनकी शहादत के बाद मार्च में ईरान के अधिकारियों ने बयान दिया था कि भारी भीड़ और व्यवस्थाओं को लेकर आ रही चुनौतियों की वजह से अंतिम संस्कार तुरंत करना संभव नहीं है। ईरान की सरकारी एजेंसी ईरना के मुताबिक राजकीय अंतिम संस्कार जून के मध्य में आयोजित किया जाएगा। हालांकि इसकी सटीक तारीख और समय की अभी अधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। अंतिम संस्कार बहुत बड़े स्तर पर होगा और इसमें ईरान के साथ-साथ कई मुस्लिम देशों से भी बड़ी संख्या में लोग शामिल होंगे। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत, बांग्लादेश से भी बड़ी संख्या में लोगों के मशहद पहुंचने की उम्मीद है। अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में करोड़ों लोग एक साथ इकट्ठे होंगे। यह भी खतरा है कि मौके का फायदा उठाकर कहीं इजरायल कोई उल्टी-सीधी हरकत न कर दे। अमेरिका भी इस मौके का फायदा उठा सकता है। ऊपर वाला ऐसा होने से बचाए। उम्मीद करते हैं कि इस पवित्र मौके का इजरायल-अमेरिका कोई नाजायज फायदा नहीं उठाएगा और अयातुल्लाह अली खामेनेई की अंतिम विदाई में कोई बाधा नहीं डालेगा। खामेनेई 86 साल के थे। वह तीन दशक से ज्यादा समय तक ईरान के सुप्रीम लीडर रहे। आज जो ईरान है उसके पीछे अयातुल्लाह अली खामेनेई की दूरदृष्टि और प्लानिंग ही थी। हम अयातुल्लाह अली खामेनेई को अपनी श्रद्धांजलि देते हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 4 June 2026

अमेरिकी एफ-15 गिराने में चीनी मिसाइल

पिछले महीने दक्षिण-पश्चिमी ईरान के ऊपर मार गिराए अमेरिकी एफ-15 ई स्ट्राईक ईगल को चीन निर्मित मिसाइल से निशाना बनाया गया था। अमेरिका की एनबीसी न्यूज ने सूत्रों के हवाले से बताया कि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि ईरान ने जिस मिसाइल से एफ-15 को गिराया, वह हाल ही में मिली थी या ईरान के पुराने जखीरे में से थी। अमेरिकी अधिकारी अप्रैल में हुई इस घटना की अभी भी जांच कर रहे हैं। दशकों में पहली बार किसी अमेरिकी लड़ाकू विमान को दुश्मन की गोलीबारी से मार गिराया गया। उस समय ट्रंप ने कहा था कि विमान कंधे पर रखकर दागी जाने वाली मिसाइल से हमला किया गया। इन हथियारों को आमतौर पर मैन-पोर्टबल एयर डिफैंस सिस्टम के नाम से जाना जाता है, ये करीब 7 फीट लंबी और इसमें लगभग 40 पाउंड वजन होता है। ईरान के चीन से बने सैन्य उपकरणों के इस्तेमाल से अमेरिका-चीन संबंधों में एक नया आयाम जोड़ दिया है। 

-अनिल नरेन्द्र

कुवैत पर क्यों कोहराम मचा रहा ईरान?

ईरान ने अमेरिका के जवाबी हमले के विरोध में कुवैत को निशाने पर लिया है। कुवैत पर 72 घंटे में दो बड़े हमले किए गए। कुवैत में अमेरिका के कम से कम 7 बड़े बेस हैं। वहीं करीब 13 हजार अमेरिकी जवानों को कुवैत में रखा गया है। यूएई को छोड़कर कुवैत क्यों ईरान के निशाने पर आ गया इसके पीछे भी कारण है। ईरान इस कदर कुवैत से नाराज है कि महज 72 घंटों में उसने कुवैत पर ड्रोनों और मिसाइलों से बड़े हमले किए। ईरान का कहना है कि यह हमले बदला लेने के लिए किए गए हैं। ईरान ने स्पष्ट किया कि यह हमले कुवैत के रिहाइशी इलाकों पर नहीं बल्कि कुवैत स्थित अमेरिकी बेसों पर किए जा रहे हैं। बता दें कि अब तक अमेरिका से बदला लेने के लिए यूएई ईरान के निशाने पर था और ईरान ने यूएई पर सबसे ज्यादा हमले किए। फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक ईरान जंग के दौरान तेहरान से यूएई पर करीब 2400 हमले किए थे। हालांकि वर्तमान में ईरान कुवैत के ठिकानों पर ही हमला कर रहा है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि यूएई को छोड़कर ईरान कुवैत को क्यों निशाने पर ले रहा है? इसके पीछे कई कारण नजर आते हैं। कुवैत फारस की खाड़ी के एक छोर पर स्थित है। यह ईरान के पड़ोस में है, जो अमेरिका का सहयोगी मुल्क है। यहां पर अमेरिका के कई बड़े सैन्य बेस हैं। इनमें कैंप अरिफिजान, कैंप बुहिरिंग और अल सलेम  एयरबेस प्रमुख हैं। द हिल की रिपोर्ट के मुताबिक कुवैत में अमेरिका के 13 हजार जवान तैनात हैं। यूएई के मुकाबले कुवैत कूटनीति तौर पर काफी कमजोर है। मई के मध्य में ईरान ने कुवैत के एक द्वीप पर कब्जा करने का प्रयास किया था। हालांकि तेहरान को असफलता मिली थी। यूएई ईरान पर हमले करने में सक्षम है। अगर अमेरिका के बदले ईरान यूएई पर हमला करता है तो अबू धाबी पलटवार कर सकता है, इससे खाड़ी युद्ध में तेजी आ सकती है। बातचीत के बीच ईरान नो-रिस्क मोड में है। सबसे बड़ा कारण है कि हाल ही में ईरान पर जो हमले हुए वह कुवैत के अमेरिकी बेसों से ही हुए थे। इसीलिए जवाबी कार्रवाई में ईरान ने कुवैत को निशाने पर लिया है। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 2 June 2026

अगर रूबियो इतिहास जानते तो फोटो नहीं खिंचवाते?

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्के रूबियो जब भारत के चार दिवसीय दौरे पर आए थे तो वह भारत के प्रधानमंत्री व शीर्ष राजनयिकों से तो मिले ही थे, साथ ही कई भारतीय मशहूर पर्यटन स्थलों पर भी गए। इन्हीं में से एक आगरा के ताजमहल की यात्रा सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बनी। अमेरिकी विदेश मंत्री ने ताजमहल के सामने अपनी पत्नी के साथ यादगार फोटो सोशल मीडिया पर साझा की। ये फोटो जल्दी ही सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बन गई। इस मामले ने उस समय एक अलग मोड़ लिया जब हैदराबाद में स्थित ईरानी दूतावास ने रूबियो के ताजमहल दौरे पर खुलेतौर पर व्यंग्य किया। ईरानी वाणिज्य दूतावास ने अपने बयान में याद दिलाया कि उनके अनुसार, ताजमहल मुगल बादशाह (शाहजहां) की ईरानी मूल की बेगम मुमताज महल की मोहब्बत की निशानी है और इसके निर्माण में फारसी वास्तुकारों की कुशलता शामिल थी। बयान में अमेरिका की भी आलोचना की गई और अमेरिकी सरकार पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया गया। दूतावास ने लिखा ः अगर मार्के रूबियो को इतिहास और वास्तुकला की समझ होती तो वो यहां तस्वीर खिंचवाने के लिए खड़े नहीं होते। यह स्मारक एक बादशाह की ईरानी पत्नी के प्रेम में बनाया गया था और इसे ईरानी वास्तुकारों की प्रतिभा ने गढ़ा था। आज उनकी सरकार ईरानी सभ्यता को मिटाने की धमकी दे रही है और दूसरी सभ्यताओं का अपमान करती है। ईरानी व्यंग्य के बाद यह मामला सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो गया। कुछ उपयोगकर्ताओं ने रूबियो को व्यंग्य का निशाना बनाते हुए कहा कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझे बिना ऐसे स्थानों पर तस्वीरें खिंचवाना उचित नहीं है। कुछ टिप्पणियां इससे भी आगे बढ़ गई और अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के संदर्भ में देखा जाने लगा। एक उपयोगकर्ता ने कहा कि यह इमारत एक ईरानी मल्लिका के लिए फारसी वास्तुकारों ने बनाई थी और यह एक ऐसी संस्कृति का प्रतीक है जिसे उनकी सरकारें इस समय में खतरे में डाल रही हैं और उनका सम्मान नहीं कर रही हैं। बता दें कि संगमरमर जो राजस्थान के मकराने से आया था। इससे बना ताजमहल दुनिया के अजूबों में से एक है, जिसे मुगल सम्राट शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल की प्रेम स्मृति में 1632 ईसवीं में बनवाना शुरू किया था जो 1653 ईसवीं में ही पूरा हुआ था। इसके निर्माण में हिन्दू, इस्लामिक, मुगल समेत कई भारतीय वास्तुकला का समावेश किया गया है। इस भव्य और शानदार इमारत को करीब 20 हजार मजदूरों ने मुगल शिल्पीकार उस्ताद अहमद लाहौरी के नेतृत्व में बनाया था। इस मकबरे को बनाने में उस समय करीब 20 लाख रुपए खर्च किए गए थे। आज के हिसाब से यह लागत करीब 827 मिलियन डॉलर लगभग 52.8 अरब रुपए है। इस इमारत के निर्माण में करीब 28 अलग-अलग तरह के पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है, जो हमेशा चमकते रहते हैं। इनकी दीवारों पर बेहद खूबसूरत नक्काशी की गई है। ताजमहल को 1983 में यूनेस्को ने विश्व विरासत स्थल घोषित किया था। 

-अनिल नरेन्द्र