Wednesday, 31 October 2012

बढ़ती जा रही है लापता बच्चों की संख्या ः मासूमों की फिक्र किसे?


 Published on 31 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र
            देश में बच्चे गुम हो जाने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। यह सभी के लिए चिन्ता का विषय होना चाहिए। एक वैलफेयर स्टेट और सभ्य समाज के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक बात और क्या हो सकती है कि देशभर में हर साल 90 हजार बच्चे गायब हो जाते हैं। राजधानी में ही इस साल 10 महीने के भीतर सौ पच्चास नहीं बल्कि 1040 बच्चे लापता हो चुके हैं। आखिर यह बच्चे कहां गए? यह इसलिए गायब हो रहे हैं क्योंकि यह गरीब घरानों से हैं। उनके मां-बाप उनके लिए अच्छा खाना, कपड़ा और शिक्षा का पर्याप्त इंतजाम नहीं कर सकते। उनमें से अधिकतर बच्चे कस्बों से होते हैं। उन्हें फुसलाकर, सब्ज-बाग दिखाकर, नौकरी के बहाने महानगरों में लाया जाता है। ऐसे बहुत से बच्चों को भीख मांगने या किसी खतरनाक काम में लगा दिया जाता है या फिर वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है। कुछ खुशकिस्मत इस नरक से निकाल लिए जाते हैं, बाकी तमाम उम्र इसी नरकीय जीवन व्यतीत करने पर मजबूर हो जाते हैं। राजधानी दिल्ली के कई इलाकों में मासूमों का अपहरण कर यौन शोषण करने के बाद उनकी हत्या कर देने की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। यह वारदातें जहां एक ओर आवारा घूमने वाले नशेड़ियों की धरपकड़ के प्रति प्रशासन की लापरवाही को रेखांकित करती हैं वहीं ये बच्चों की सुरक्षा के प्रति पुलिस-प्रशासन के लापरवाह रवैये को भी उजागर करता है। बृहस्पतिवार को दिल्ली में पुलिस ने बच्चों को अगवा कर यौन शोषण के बाद उनकी हत्या कर देने की घटनाओं को अंजाम देने वाले गैंग का एक बच्चे की मदद से भंडाफोड़ करते हुए दो आरोपियों को गिरफ्तार किया। दोनों आरोपियों की गिरफ्तारी से खजूरी क्षेत्र के भाई-बहन की हत्या व भजनपुरा इलाके में तीन वर्षीया बच्ची को यौन शोषण के बाद कूड़ेदान में फेंकने की वारदात का खुलासा हुआ है। गिरफ्तार किए गए आरोपी स्मैक के आदी हैं। नशा करने के बाद वे हैवान बन जाते हैं और बच्चों को कुछ लालच देकर अगवा कर लेते हैं। गौरतलब है कि 1974 में संसद ने बच्चों के लिए एक राष्ट्रीय नीति पर मुहर लगाई थी जिसमें उन्हें देश की अमूल्य धरोहर घोषित किया गया था। भारतीय दंड संहिता की धारा 372 में नाबालिग बच्चों की खरीद-फरोख्त पर 10 साल की सजा का प्रावधान है लेकिन इस मामले में सजा दिए जाने की दर बेहद कम है। सरकारी तंत्र के ढीलेपन को देखते हुए ही कुछ महीने पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर केंद्र और राज्य सरकारों से जवाब-तलब किया था। आज अपराधियों के कई गिरोह बच्चों को गायब करने में लगे हुए हैं। खुद सरकार ने 900 ऐसे संगठित गिरोहों की पहचान की है। इनका जाल कई राज्यों में फैला हुआ है। बच्चों की सुरक्षा खासकर दिल्ली में पुलिस-प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। बच्चों के गायब होने, अपहरण या हत्या कर दिए जाने की घटनाएं आए दिन रिपोर्ट होती हैं। इस वर्ष अब तक राजधानी में 1000 बच्चों के गायब होने के मामले दर्शाते हैं कि दिल्ली किस हद तक बच्चों के लिए असुरक्षित होती जा रही है। ऐसे मामलों में सख्ती से निपटना होगा। इसके लिए विभिन्न राज्यों की पुलिस के बीच बेहतर तालमेल करना होगा। बच्चों की सुरक्षा को लेकर अभिभावकों को और जागरूक करने हेतु विशेष जागरुकता अभियान चलाना ठीक रहेगा।

अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव अंतिम चरणों में और उधर हरीकेन सैंडी


 Published on 31 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र
ऐसे वक्त जब अमेरिका सियासी तूफान से गुजर रहा है, कोई मौसमी तूफान आ खड़ा हो तो चिंतित होना लाजिमी है। अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव को मुश्किल से सात-आठ दिन बचे हैं। व्हाइट हाउस की दौड़ के लिए छह नवम्बर को मतदान होना है। इस समय दोनों राष्ट्रपति उम्मीदवारों के बीच कांटे की टक्कर चल रही है और अंतिम सप्ताह में सारे देश का ध्यान सियासत के इस अत्यंत महत्वपूर्ण आखिरी दौर से हटकर समुद्री तूफान हरीकेन सैंडी से बचाव में लग गया है। एक तरफ रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी सर्वेक्षणों में राष्ट्रीय स्तर पर मामूली बढ़त बनाए हुए हैं तो वहीं राष्ट्रपति और डेमोकेटिक पार्टी उम्मीदवार बराक ओबामा इलैक्ट्रोल वोट में मामूली बढ़त बनाए हुए हैं। ऐसे में सर्वेक्षण पर नजर रखने वाले कोई भी भविष्यवाणी करने से कतरा रहे हैं। अलकायदा को कमजोर करने, स्वास्थ्य सुधार और अर्थव्यवस्था में छाई मायूसी को दूर करने की दिशा में ओबामा के प्रयासों की प्रशंसा करते हुए एक बड़े अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्प टाइम्स ने उनके समर्थन की घोषणा की है। अखबार ने अपने सम्पादकीय में यह बात कही है। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की टक्कर इतने कांटे की है कि कोई भी पार्टी दावे से नहीं कह रही कि वह जीत रहे हैं। उल्लेखनीय है कि अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में स्विंग स्टेट हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते आए हैं। अब तक इन राज्यों में ज्यादा इलैक्ट्रोल वोट हासिल करने वाला ही चुनाव जीतता आया है। अमेरिका के कुल 50 प्रांतों में से 13 स्विंग स्टेट माने जाते हैं। स्विंग स्टेट उन प्रांतों को कहा जाता है जहां मतदाता किसके पक्ष में वोट करेगा, यह तय नहीं होता। न्यूयॉर्प टाइम्स के अनुसार इस तरह के राज्यों में तकरीबन 95 इलैक्ट्रोल वोट्स हैं। इन राज्यों पर उम्मीदवार दूसरे राज्यों से ज्यादा ध्यान देते हैं। रोमनी और ओबामा दोनों ने भी इन राज्यों में ज्यादा प्रचार किया है। असल में डेमोकेट्स और रिपब्लिकंस में जारी जंग के इतर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका को एक भीषण तूफान से जूझना पड़ रहा है, जिसका नाम हरीकेन सैंडी है। कैरेबियाई द्वीप में 66 जान लेने वाला सैंडी करीब 75 मील प्रति घंटे की रफ्तार से अमेरिका में सबसे सघन आबादी वाले पूर्वी तटीय राज्यों में बड़ी तबाही की आशंका लेकर तेजी से बढ़ रहा है। अमेरिका में बीते दशकों में आए तूफानों के मुकाबले हरीकेन सैंडी सबसे ज्यादा विनाशकारी माना जा रहा है। नेशनल हरीकेन सेंटर के मुताबिक, हरीकेन सैंडी करीब 75 मील प्रति घंटे की रफ्तार से आगे बढ़ रहा है। डर है कि तूफानी हवाएं बिजली की तारों को गिरा सकती है। साथ ही समुद्र का बढ़ता जल स्तर जनरेटरों और दूसरे उपकरणों को नुकसान पहुंचा सकता है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तूफान तेज हवाएं और बारिश के अलावा बर्पबारी ला सकता है। हरीकेन सैंडी की वजह से 11 फुट ऊंची लहरें उठेंगी। ये न्यूयार्प, बोस्टन और न्यूजर्सी में काफी तबाही मचाएगा। इससे 18 अरब डॉलर (लगभग 10 खरब रुपए) की सम्पत्ति का नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है। इस बीच पता नहीं राष्ट्रपति चुनाव का क्या होगा? हम भगवान से प्रार्थना और उम्मीद करते हैं कि अमेरिका को इस प्राकृतिक कहर से जितना जल्दी सम्भव हो सके बचाए और जानमाल का नुकसान कम से कम हो।

Tuesday, 30 October 2012

रॉबर्ट वाड्रा को क्लीन चिट पर उठे सवाल


 Published on 30 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र
         संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा को हरियाणा सरकार की ओर से जल्दबाजी में दी गई क्लीन चिट पर सवाल खड़े होने स्वाभाविक ही हैं। इस मामले में खुलासा करने वाले राजनीतिक कार्यकर्ता अरविन्द केजरीवाल ही नहीं भाजपा और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने भी इसे राज्य सरकार की ओर से वाड्रा को बचाने की कोशिश करार दिया है। केजरीवाल ने शुक्रवार को कहा, क्या लोगों को बताया जाएगा कि कौन से कानून की किस धारा के तहत जांच की गई और किसने यह जांच की? सारे देश में उनका भ्रष्टाचार साफ नजर आया लेकिन हरियाणा सरकार ने उन्हें क्लीन चिट दे दी। केजरीवाल ने कहा कि सरकार से उनको यही उम्मीद थी। मामला सामने आने के कुछ घंटों के अन्दर ही सरकार के सभी मंत्रियों ने उन्हें सही बता दिया था, ऐसे में निष्पक्ष जांच हो ही नहीं सकती थी। ऐसे प्रभावशाली लोगों की जांच के लिए देश में कोई एजेंसी ही नहीं है। इसलिए निष्पक्ष लोकपाल बनाना जरूरी है। भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावेडकर ने इसे `स्व प्रमाणन' बताते हुए कहा कि हरियाणा सरकार की जांच पर भरोसा नहीं किया जा सकता। उन्होंने वाड्रा के उस दावे की जांच की मांग की जिसमें उन्होंने कारपोरेशन बैंक से 7.94 करोड़ रुपए का ओवर ड्राफ्ट लेने की बात कही है जबकि कारपोरेशन बैंक ने इसका खंडन किया है। वरिष्ठ भाजपा नेता राजनाथ सिंह ने इस मामले की सुप्रीम कोर्ट से जांच कराने की मांग की। उन्होंने कहा कि जब इन्हीं उपायुक्तों ने जमीन अलॉट की थी तो वह क्यों कहेंगे गलत हुआ? इसलिए सच्चाई तभी सामने आएगी जब वाड्रा के भूमि सौदों की निष्पक्ष जांच हो। श्री ओमप्रकाश चौटाला ने इस मामले की सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज से जांच करवाने की मांग की। उन्होंने कहा कि सरकार ही बेइमानी करे और वही जांच करे, इसके मायने क्या रह जाते हैं। बहरहाल कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता संदीप दीक्षित ने कहा कि सरकार तथ्यों के आधार पर काम करती है।आप बताइए कि किन नियमों का उल्लंघन हुआ है? बिना जांच के कोई अधिकारी बयान नहीं देता। उधर दैनिक अमर उजाला में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि फरीदाबाद, गुड़गांव, मेवात और पलवल के उपायुक्तों ने सरकार के पास अधूरी रिपोर्ट भेजकर वाड्रा को क्लीन चिट दी है। रिपोर्ट में वाड्रा या उनकी कम्पनियों ने कितनी जमीन किस नाम से खरीदी यह जानकारी तो दे दी गई है, लेकिन वाड्रा या उनकी कम्पनियों ने जमीन बेची या नहीं, यह जानकारी नहीं है। अतिरिक्त मुख्य सचिव राजस्व को मेवात के उपायुक्त ने 23 अक्तूबर, पलवल और फरीदाबाद के उपायुक्तों ने यह 25 अक्तूबर को रिपोर्ट भेजकर कहा है कि स्टाम्प ड्यूटी या रजिस्ट्रेशन फीस में सरकार को कोई नुकसान नहीं हुआ। गुड़गांव के उपायुक्त ने रिपोर्ट ही नहीं भेजी है। उन्होंने 16 अक्तूबर को ही जानकारी दी थी कि वाड्रा ने डीएलएफ को जो 3.5 एकड़ जमीन बेची थी, उसमें स्टाम्प ड्यूटी का कोई नुकसान नहीं हुआ था। रजिस्ट्री भी ठीक थी और इंतकाल भी सही था। एक और बात यह है कि रॉबर्ट वाड्रा को बचाने के लिए हरियाणा की हुड्डा सरकार ने अपना कानून ही ताक पर रख दिया। सीलिंग एक्ट के मुताबिक जहां एक व्यक्ति, कम्पनी, परिवार, एसोसिएशन या अन्य कोई संस्था हरियाणा में अधिकतम दो फसल देने वाली सिंचाई योग्य जमीन 18 एकड़ और गैर-सिंचाई योग्य जमीन अधिकतम 54.5 एकड़ रख सकती है, वहीं वाड्रा और उनकी कम्पनियों के नाम दिसम्बर, 2010 तक करीब 148 एकड़ जमीन हरियाणा में थी। बावजूद इसके किसी जिले के उपायुक्त ने न तो उनकी जमीन सरप्लस घोषित की और न ही लैंड सीलिंग एक्ट के तहत कोई कार्रवाई की। सीलिंग एक्ट के मुताबिक वाड्रा ने खरीद में इस कानून का उल्लंघन किया है और फरीदाबाद, गुड़गांव, मेवात और पलवल के उपायुक्तों ने न केवल अधूरी जानकारी ही दी बल्कि राज्य के कानूनों का उल्लंघन भी किया। देखना अब यह है कि केंद्र और हरियाणा की कांग्रेसी सरकारें रॉबर्ट वाड्रा की डील्स को दबाने में सफल रहती हैं या फिर मामलों की सही और निष्पक्ष जांच होगी?

एफ-वन इंडियन ग्रां प्री के कुछ यादगार लम्हे


 Published on 30 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र
रविवार को मैंने अपने जीवन की पहली फार्मूला वन ग्रां प्री मोटर रेस देखी। ग्रेटर नोएडा में विशेष रूप से बने बुद्ध इंटरनेशनल सर्पिट को भी देखने का अवसर मिला। मैं पूरे इलाके में हुई उन्नति को देखकर चौकन्ना रह गया। बुद्ध इंटरनेशनल सर्पिट बनाकर जयप्रकाश एसोसिएट्स ने एक ऐसा काम किया है जिससे हर भारतीय खेलप्रेमी का सिर गर्व से उठ गया है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर के इस सर्पिट को बनाना, भारत में एफ-वन ग्रां प्री करवाना साधारण काम नहीं था। खेल जगत में यह सबसे बड़ा इवेंट करके एक बार फिर भारत ने साबित कर दिया कि वह दुनिया में किसी से कम नहीं है। पहले रेस के बारे में थोड़ा बता दूं। इंडियन ग्रां प्री के आयोजन स्थल बुद्ध इंटरनेशनल का ट्रैक (चक्कर) कुल 5.14 किलोमीटर लम्बा है जबकि इंडियन ग्रां प्री कुल 60 लैप वाली रेस है। लैप का मतलब है 5.14 किलोमीटर का एक घेरा या चक्कर यानि ड्राइवरों को 5.14 किलोमीटर ट्रैक के कुल 60 चक्कर लगाने होते हैं। सबसे आगे रहने वाला ड्राइवर यानि जिसने सबसे कम समय में 60 लैप पूरे किए हों, रेस का विजेता होता है। शीर्ष 10 ड्राइवरों को और टीमों को अंक हासिल होते हैं। बीआईसी भारत में एफ-वन रेस का आयोजन करता है। इसका मालिकाना हक जेपी ग्रुप के पास है जबकि दुनिया में सारी एफ-वन रेसों को आयोजित कराने का अधिकार इंटरनेशनल ऑटोमोबाइल फेडरेशन (एफआईए) का है। यह एफ-वन की सर्वोच्च संस्था है जिसके सर्वेसर्वा बर्नी एक्सलेस्टीन हैं। रविवार को रेस देखने के लिए कई फिल्मी सितारे व महान हस्तियां मौजूद थीं। इनमें अजय देवगन, सोनाक्षी सिन्हा, युवराज सिंह, सानिया मिर्जा पति शोएब मलिक प्रमुख थे। एफ-वन कारों की इतनी आवाज होती है कि दर्शकों को विशेष कानों के पलग दिए जाते हैं और आप अगर अपने कानों को बचाना चाहते हैं तो इन्हें लगाना जरूरी होता है। एफ-वन कारों की आवाज का अनुभव अनूठा होता है। मैंने कभी कहीं और इतनी आवाज इस तरह की नहीं सुनी। गाड़ियां इतनी तेजी से जाती हैं कि मैंने फोटो-वीडियो खींचनी चाही जब तक मैं अपना मोबाइल उस स्पॉट पर ले जाता तब तक गाड़ियां जा चुकी होतीं। गाड़ियां 250 किलोमीटर प्रति घंटा से ज्यादा तेज जाती हैं। 200 किलोमीटर पर तो यह टर्न लेती हैं। मेरे साथ मेरे मित्र डाक्टर मुकुल श्रीवास्तव थे। उन्होंने बताया कि हर रेस में हर ड्राइवर का कम से कम चार-पांच किलो वजन कम हो जाता है। उनके हेलमेट में पानी की पाइप भी लगी होती है क्योंकि पानी गिरता रहता है और यह कितना पानी शरीर से ग्रेविटी की वजह से निकलता होगा जिसका वजन चार-पांच किलो हो जाता है तो आप खुद ही अन्दाजा लगा लें कि कितना पानी निकलता होगा। इंडियन ग्रां प्री रेस में भाग लेने वाली प्रमुख टीमें हैं रेड बुल। रेड बुल के नाम से एनर्जी ड्रिंक बनाने वाली आस्ट्रियन कम्पनी की टीम के पास दो बार विश्व चैंपियन सेबेस्टियन वेटल और मार्प वेबर के रूप में दो बेहतरीन ड्राइवर हैं। पिछली तीन रेस में वेटल ने ट्रेक पर तहलका मचाते हुए रेड बुल टीम को खिताबी दौड़ में काफी आगे रखा है। जर्मनी के सेबेस्टियन वेटल ने इस बार भी ग्रां प्री जीती है। दूसरी टीम फरारी एफ-वन सर्पिट की सबसे पुरानी टीमों में से एक है। 290 अंकों सहित टीम चैंपियनशिप में दूसरे स्थान पर चल रही है। 1950 की उद्घाटन रेस से लेकर अब तक लगभग हर रेस में फरारी की टीम ने भाग लिया है। इनके ड्राइवर हैं फर्नांडो अलोंसो (स्पेन) और फेलिप मासा (ब्राजील)। मैक्लारेन मर्सीडीज फार्मूला वन में सबसे ज्यादा बार विश्व खिताब जीतने वाली टीम है। फरारी के बाद एफ-वन की दूसरी सबसे पुरानी टीम है। इनके ड्राइवर है लुइस हैमिल्टन (ग्रेट ब्रिटेन) और जेनसन बटन (ग्रेट ब्रिटेन)। चौथी टीम लोटस की है। रेनाल्ट की पूर्व टीम लोटस ने 15 साल बाद मलेशियन कम्पनी की मदद से वर्ष 2010 में एफ-वन सर्पिट में वापसी की। किमी राइकोनेन (फिनलैंड) और रोमेन ग्रोस जेन (फ्रांस) इनके ड्राइवर हैं। एक टीम मर्सीडीज पेट्रोनाज की है। टीम के पास एफ-वन रेस के सबसे सफलतम सात बार के विश्व चैंपियन माइकल शूमाकर (जर्मनी) के हैं। दूसरे ड्राइवर हैं जर्मनी के निको रोजबर्ग। सात बार के विश्व चैंपियन माइकल शूमाकर का निराशाजनक दौर इंडियन ग्रां प्री में भी जारी रहा। वह 55वें लैप में पिट पर गया तो फिर ट्रैक पर वापस नहीं उतरा। वह रेस पूरी भी नहीं कर सका। भारत के एकमात्र फार्मूला वन रेसर नारायण कार्तिकेयन सबसे अंतिम 21वें स्थान पर रहे पर हमें खुशी यह है कि कम से कम एक भारतीय ड्राइवर एफ-वन रेस के काबिल तो निकला। रविवार की रेस में रेड बुल के सेबेस्टियन वेटल अव्वल नम्बर पर रहे। उन्होंने शुरू से ही लीड ले ली और अंत तक इस लीड को बरकरार रखा। उन्होंने 5.125 किलोमीटर के बुद्ध इंटरनेशनल सर्पिट के 60 चक्कर लगाने में 307.249 किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए एक घंटा 31 मिनट 10.744 सैकेंड का समय लिया। इस दौरान उनकी औसत गति 202.183 किलोमीटर प्रति घंटा रही और बैस्ट लैप समय एक मिनट 28.723 सैकेंड रहा।

Sunday, 28 October 2012

बढ़ती महंगाई के कारण गरीब को दो वक्त की रोटी के लाले


 Published on 28 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र
डीजल के दामों की वृद्धि का असर अब महंगाई पर साफ दिखने लगा है और बुरी खबर यह है कि महंगाई की मार से पस्त हो चुके आम लोगों को निकट भविष्य में भी इससे निजात मिलने की खास सम्भावना नहीं है। उलटे आशंका है कि डीजल, पेट्रोल के दाम और बढ़ाने की तैयारी हो रही है और खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतें अभी और बढ़ेंगी। बीते एक महीने में रसोई का अधिकांश जरूरी सामान तेजी से महंगा हुआ है। दाल, चावल, गेहूं, बेसन, अण्डा, मीट, मछली, आटा सब आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जा रहा है। कीमतों में हुई इस वृद्धि के बाद सितम्बर में थोक मूल्यों पर आधारित महंगाई दर 7.81 फीसदी पर पहुंच गई है। अगस्त में यह 7.55 फीसदी थी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक महीने में खाद्य उत्पादों के वर्ग में कॉफी, रागी, अण्डा, मीट, मछली, गेहूं, चावल, उड़द, मसूर, अरहर, चाय, दूध, मूंग की कीमतों में एक से आठ प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। मैन्यूफेक्चरिंग सामान में आटा, बेसन, चीनी, तेल, मैदा, सूजी के थोक मूल्यों में एक से 19 फीसदी तक की तेजी आई है। भारतीय उद्योग एवं वाणिज्य मंडल (एसोचैम) का मानना है कि भंडार सीमित होने के कारण इस त्यौहारी सीजन में चीनी, खाद्य तेल और अन्य किराना वस्तुओं के दाम और ऊपर जा सकते हैं। एसोचैम के मुताबिक आठ महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थों, जिनमें दाल, गेहूं, चीनी, खाद्य तेल और दूध शामिल हैं, के दाम सितम्बर 2011 से सितम्बर 2012 के मध्य तक 18 फीसदी बढ़े हैं जबकि इसकी तुलना में लोगों की औसत आय बमुश्किल 10 फीसदी बढ़ी है। हालांकि  एसोचैम के इस आंकलन में ऐसी कोई नई बात नहीं है जिससे आम लोग नाबाकिफ हों। लेकिन उसने महंगाई को लेकर कायम आम चिन्ता को आंकड़ों के आधार जरूर प्रदान किया है। उद्योग मंडल द्वारा अपने अध्ययन में यह रेखांकित करना महत्वपूर्ण है कि आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति पक्ष की कमजोरी महंगाई की भयावहता को बढ़ा रही है। इसकी एक बड़ी वजह कमजोर मानसून को भी बताया गया है। समस्या यह है कि महंगाई बढ़ने के इन कारणों को बीते तीन-चार वर्षों में बार-बार सरकार द्वारा भी गिनाया तो गया लेकिन इनके निदान हेतु यदि कदम उठाए भी गए तो उनका नतीजा महंगाई पर कहीं नजर नहीं आया। हमारा मानना है कि इस संप्रग सरकार की प्राथमिकताएं सही नहीं हैं। इसका एक उदाहरण मौजूदा आर्थिक विकास मॉडल में कृषि क्षेत्र की हो रही लगातार अनदेखी है। आलम यह है कि आजादी के 65 सालों के बाद भी हमारा तकरीबन 40 फीसद कृषि क्षेत्र ही सिंचित है। इसी का परिणाम है कि आज भी हमारे अधिसंख्यक किसान मानसून के मोहताज बने हुए हैं। ऐसा नहीं है कि सिंचित रकबा बढ़ाने के लिए योजनाएं नहीं बनीं, धन खर्च नहीं हुआ बल्कि सच्चाई यह है कि ज्यादातर योजनाएं कागजों तक ही सीमित रहीं और पैसा नेताओं और अफसरों की जेबों में गया। महाराष्ट्र का उदाहरण सामने है जहां कहा जा रहा है कि 70 हजार करोड़ खर्च के जाने के बावजूद सिंचित रकबे में महज 0.1 फीसदी इजाफा हुआ है। दुखद पहलू यह है कि गरीब आदमी, आम आदमी को दो-दो वक्त की रोटी के लाले पड़ रहे हैं और इन नेताओं की तोंदें बढ़ती जा रही हैं।

नवीन जिंदल बनाम जी न्यूजöसाख तो मीडिया को बचानी होगी


 Published on 28 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र

आरोपों-प्रत्यारोपों के चले दौर में एक नया सनसनीखेज मामला सामने आया है। यह मामला अपने आप में अद्भुत है और शायद पहली बार इस तरह का किस्सा सामने आया है। कांग्रेस सांसद और उद्योगपति नवीन जिंदल ने समाचार चैनल जी न्यूज पर ब्लैकमेल करने का खुला आरोप लगाया है। कम्पनी द्वारा कराए गए स्टिंग ऑपरेशन का खुलासा करते हुए जिंदल ने कहा कि कोल ब्लॉक आवंटन से जुड़ी खबर नहीं दिखाने के एवज में चैनल ने 100 करोड़ रुपए मांगे थे। जवाब में जी न्यूज ने कहा कि कोयला घोटाले की खबर रुकवाने के लिए नवीन जिंदल इस तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। कैग की रिपोर्ट में 1.86 लाख करोड़ के कोल घोटाले में जिंदल स्टील एण्ड पॉवर लि. (जेएसपीएल) का भी  नाम है। नवीन जिंदल ने गुरुवार को प्रेस कांफ्रेंस में जी न्यूज के मैनेजिंग एडिटर सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के सम्पादक समीर आहलूवालिया को जिंदल के अधिकारियों से बातचीत करते दिखाया गया है। जिंदल के बयान जारी करने के फौरन बाद सुधीर चौधरी और समीर आहलूवालिया ने सफाई दी। उन्होंने कहा कि वे जेएसपीएल की नीयत का खुलासा करना चाहते हैं। कम्पनी से डमी कांट्रेक्ट करने की कोशिश हो रही थी। सबूत के तौर पर उन्होंने एक दस्तावेज भी दिखाया और कहा कि नवीन जिंदल खबर रुकवाने के लिए 100 करोड़ रुपए का करार साइन करने को तैयार थे। ये पैसे विज्ञापन के मद से दिए जाने थे। अब वे तस्वीर का रुख बदलने की कोशिश कर रहे हैं। घोटाले उजागर करने में मीडिया की उल्लेखनीय भूमिका रही है। यही वजह है कि बौखलाए नेता अब सीधा मीडिया पर हमले कर रहे हैं। पहले कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने इंडिया टुडे ग्रुप पर नाम लेकर हमला किया। अब नवीन जिंदल ने नाम लेकर जी समूह पर हमला किया है। सवाल यहां यह महत्वपूर्ण है कि सच कौन बोल रहा है और यह कैसे साबित हो? आरोप लगाने वाले या आरोपी? बड़ा प्रश्न यह भी खड़ा हो गया है कि राजनेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं के द्वारा के जाने वाले भ्रष्टाचार के नित खुलासों के इस दौर में जब मीडिया पर ही भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगें तो आम आदमी किस पर भरोसा करे? आज पैसे का युग है। अच्छे-बुरे किसी भी रास्ते से धन का प्रवाह अपनी ओर करने की जुगत में हर वह शख्स लगा हुआ है जिसे इसकी लत लग गई है। नैतिक और अनैतिक माध्यमों से धन कमाने जैसी बातें अब पिछड़ेपन का पर्याय बन गई हैं। हम इस बात को नहीं मानते कि बुरे माध्यम से कमाए गए धन से कोई सामाजिक भलाई का काम सफलतापूर्वक हो सकता है। अत यही माना जाए कि ऐसे धन के उपयोग से केवल व्यक्तिगत जीवन को ही एश्वर्यवान बनाया जा सकता है। लोकतंत्र के चारों स्तम्भों विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया से जुड़े अधिकांश शख्स जब अपने-अपने क्षेत्र के शीर्ष पर पहुंचने के लिए हर उचित-अनुचित तरीका अपनाते हुए संघर्ष कर रहे हों तो ऐसे माहौल में यदि मीडिया पर खबर रुकवाने या चलवाने के लिए धन के आरोप लगें तो यही निष्कर्ष निकलना चाहिए कि आजादी के 65 वर्ष बाद हम किस दिशा पर चल रहे हैं। राजनेताओं की साख तो आज मिट्टी में मिली ही हुई है पर अब मीडिया की साख भी दांव पर है, खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया की। प्रिंट मीडिया अभी भी बचा हुआ है। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि अपनी टीआरपी रेटिंग बढ़ाने के लिए  कुछ चैनल सनसनीखेज खबरों, ब्रेकिंग न्यूज का सहारा लेते हैं जो कभी-कभी सही साबित नहीं होतीं। इंडिया टुडे समूह और जी समूह दोनों ही प्रतिष्ठित व विश्वसनीय समूह माने जाते हैं। अब अपने आपको सही साबित करने की जिम्मेदारी इन पर बनिस्पत राजनेताओं से ज्यादा है। इन्हें अपने आपको सही साबित करना होगा। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आज मीडिया की साख व विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाने की कोशिश हो रही है। नवीन जिंदल तो ऐसे कामों के लिए पहले से ही  बदनाम हैं। उन्हें शायद इससे फर्प न पड़े उलटा  एक तरह से फायदा भी हो जाए अगर चैनलों ने उनके भ्रष्टाचार की खबरें प्रसारित करने पर रोक लगा दी।

Saturday, 27 October 2012

इस जानलेवा डेंगू मच्छर से कैसे निपटें?


 Published on 27 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र 
करोड़ों-अरबों के मालिक फिल्म निर्माता स्वर्गीय यश चोपड़ा ने शायद ही कभी कल्पना की हो कि एक छोटा सा मच्छर उनकी जीवन लीला समाप्त कर सकता है पर इस मच्छर ने एक डंक मारकर बॉलीवुड की एक महान हस्ती को हमेशा के लिए सुला दिया। वैसे मुंबई महानगर पालिका (मनपा) पशासन की ओर से लीलावती अस्पताल को एक नोटिस भेजा गया है जिसमें यश चोपड़ा की मौत के कारणों की रिपोर्ट मांगी गई है। अस्पताल ने 24 घंटे के अंदर यश चोपड़ा की डेंगू से हुई मौत की जानकारी पशासन को नहीं दी जो उसे देनी थी। डेंगू का पकोप इतना बढ़ गया है कि राजधानी में डेंगू के मरीजों की संख्या 730 तक पहुंच गई है और तेजी से यह जानलेवा बीमारी फैल रही है। ऐसे में डेंगू बुखार और इसके बचाव को हल्के से लेना आपकी जान आफत में डाल सकती है। कोई भी व्यक्ति कहीं पर भी इस मच्छर का शिकार हो सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि डेंगू से डरें नहीं बल्कि इसके बचाव पर अमल करें। अगर यह बुखार किसी को होता है तो बिना घबराए डॉक्टर को दिखाएं। ख्याल रखें कि डॉक्टर के पास जाने में देरी न हो। डेंगू बुखार का पहले दिन से पता चल जाता है। अगर बुखार है तो प्लेटलेट्स की जांच कराते हैं और जब तक प्लेटलेट्स 25 हजार से नीचे न जाए तब तक अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं और न ही प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत है। दिल्ली नगर निगम तो अपने स्तर पर मच्छरों को रोकने के लिए पयास कर रहा है पर सभी को इस ओर विशेष ध्यान देना होगा। कुछ सुझाए गए कदम हैं, कूलर के पानी को रोज साफ करना, साथ ही गमलों आदि बर्तन में पानी न जमा होने देना। कूलर में जमा पानी से ही डेंगू के  एडिस मच्छरों की उत्पत्ति सबसे ज्यादा होती है। अपने घरों के आस-पास गड्ढों में पानी जमा न होने दें। सोते समय मच्छरदानी अथवा ऑल आउट का क्वाइल जरूर जलाएं। बुखार होते ही डाक्टर को दिखाएं, बीच-बीच में पानी के साथ लिक्विड पदार्थ भी लेते रहें। डायबिटीज और मोटापा होने, बच्चों व ज्यादा उम्र के मरीजों, पेग्नेंट और गुर्दों के मरीजों को डेंगू का खास ध्यान रखना चाहिए। राजधानी में ऊंची इमारतों में डेंगू मच्छर के पजनन की दर अधिक पाई गई है। राजधानी में जगह-जगह हो रहे निर्माण के कारण भी मच्छरों के पजनन में इजाफा हुआ है। कॉमनवेल्थ गेम्स परियोजनाओं और लगातार हो रहे विकास कार्यों के कारण राजधानी में हमेशा निर्माण हो रहा है। इसलिए निर्माण स्थलों और सड़कों के किनारे मच्छरों का पजनन बढ़ा है। दूसरा बड़ा कारण कई मंजिला इमारतों में लगी पानी की टंकी हैं। डोमेस्टिक ब्रीडिंग चेकर्स तथा दिल्ली का स्वास्थ्य विभाग अब भवनों की छतों  तक पहुंचकर पानी की टंकियों की पड़ताल करेंगे। हृदय रोग विशेषज्ञ डा. केके अग्रवाल का कहना है कि हर डेंगू बुखार खतरनाक नहीं होता और न ही हर किसी में प्लेटलेट्स की जरूरत पड़ती है। डेंगू में अगर ब्लीडिंग शुरू हो गई तो तुरंत इसकी जरूरत है। खून की नलियों में थक्का न बन पाने से ऐसा होने लगता है। ब्लीडिंग नहीं हो रही है तो ऐसा करना जरूरी नहीं है। गौरतलब है कि डेंगू होते ही मरीजों के परिजन प्लेटलेट्स के लिए परेशान हो जाते हैं और अस्पतालों में परिजनों की मांग पर तुरन्त 25 से 40 हजार रुपए खर्च कर प्लेटलेट्स चढ़ाए जा रहे हैं। डेंगू का मच्छर तो कैंसर से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है।

वाड्रा डील को बहाल करना टेड़ी खीर साबित हो रही है


 Published on 27 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र
रॉबर्ट वाड्रा डीएलएफ डील के तहत गुड़गांव के शिकोहपुर गांव की 3.5 एकड़ जमीन का इंतकाल रद्द करके तत्कालीन महानिदेशक चकबंदी डा. अशोक खेमका ने हरियाणा सरकार को बुरी तरह फंसा दिया है। इंतकाल रद्द करने की बजाय गुड़गांव के उपायुक्त पीसी मीणा ने रजिस्ट्री को सही बताते हुए हरियाणा सरकार को पत्र लिखकर इस बारे में निर्देश मांगे हैं। गुड़गांव के डीसी ने मुख्य सचिव और अतिरिक्त मुख्य सचिव को लिखे पत्र में कहा है कि चूंकि पदेशभर में सहायक चकबंदी अधिकारी ही इंतकाल कर रहे हैं और ऐसे हजारों इंतकाल हो रखे हैं। इसलिए वाड्रा द्वारा डीएलएफ को बेची जमीन का 20 सितंबर को किया इंतकाल भी सही है। अकेले शिकोहपुर गांव में इसी तरह के 150 इंतकाल सहायक चकबंदी अधिकारी ने किए हैं। उन्हें यह अधिकार भी सरकार ने दिया हुआ है। इसलिए उनका मार्गदर्शन करें। उपायुक्त मीणा ने कहा कि महानिदेशक चकबंदी द्वारा 15 अक्तूबर को जारी इंतकाल रद्द करने के आदेश मिल गए हैं लेकिन उसका पालन नहीं किया गया है। चूंकि पदेश में इसी तरह के इंतकाल सभी सहायक चकबंदी अधिकारी कर रहे हैं इसलिए डीएलएफ का इंतकाल अगर रद्द कर दिया तो हजारों कानूनी विवाद खड़े हो जाएंगे। दरअसल वाड्रा-डीएलएफ डील की जमीन का इंतकाल रद्द करने के आदेश के बाद चर्चा में आए हरियाणा कैडर के सीनियर आईएएस डा. अशोक खेमका अपने तबादले से एक दिन पहले रजिस्ट्री के ऐसे नए नियम बना गए हैं जो अब राज्य सरकार के लिए गले की फांस बन गए हैं। 10 अक्तूबर को बनाए गए इन नियमों पर अमल से न सिर्प रीयल एस्टेट का कारोबार करने वाली कंपनियों की संपत्ति का पता लग सकेगा बल्कि काले धन से या बेनामी सम्पत्ति खरीदने वालों पर भी नकेल कसी जा सकेगी। ये रूल्स उन्होंने सभी जिला उपायुक्तों को भेज दिए हैं और आम जनता को बताने के लिए इन्हें हरियाणा सरकार को अधिसूचित करने के लिए भेज दिया है। इंस्पेक्टर जनरल ऑफ रजिस्ट्रेशन की हैसियत से डा. अशोक खेमका ने रजिस्ट्रेशन एक्ट 1908 की धारा 69 (1) के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए पहली बार हरियाणा में द हरियाणा रजिस्ट्रेशन रूल्स 2012 बनाए हैं। अशोक खेमका ने स्वीकार किया है कि उन्होंने यह रजिस्ट्रेशन रूल्स अधिसूचित कर दिए हैं। अफसरों को इनका पालन करने के लिए मेरी अधिसूचना काफी है, जबकि आम जनता के लिए सरकार द्वारा सरकारी गजट से अधिसूचना जारी करनी होती है। अशोक खेमका ने अब यह कहकर हरियाणा के साथ-साथ केंद्र सरकार की परेशानी बढ़ा दी है कि उनके आदेशों को लेकर गठित कमेटी का मकसद भ्रष्टाचार को छिपाना और वाड्रा को बचाना है। अशोक खेमका के मुताबिक चकबंदी महानिदेशक के आदेशों के खिलाफ सिर्प हाई कोर्ट में सुनवाई हो सकती है, लेकिन ऐसा कुछ करने के बजाय एक कमेटी गठित कर दी गई है। एफटीवी चैनल से बात करते हुए खेमका ने कहा कि मुझे इस कमेटी के कार्यक्षेत्र के बारे में कुछ पता नहीं है, लेकिन इतना जानता हूं कि यह कमेटी हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का अतिकमण कर रही है। अशोक खेमका ने जाते-जाते ऐसा पेंच फंसा दिया है जो हरियाणा सरकार के लिए खोलना खतरे से खाली नहीं है।

Friday, 26 October 2012

Justice Iftikhar Chowdhry intends to change the course of Pak politics

Anil Narendra
Seldom does a person emerge, who exhibits his power to change the course of any country’s politics. He resolutely takes such bold steps that turn the direction of the politics. The Justice Iftikhar Chowdhary, Chief Justice of the Pakistan’s Supreme Court is, in fact, such a person. He not only restored the lost status of the Supreme Court of Pakistan, but also took cognizance of a number of such matters, that nobody dared to touch before him. No doubt, some of such matters were disputed. The latest matter is about the interference of the Pakistan Army and its intelligence agency, ISI in the politics of the country. A Bench chaired by the Chief Justice Iftikhar Chowdhary directed the Government to take legal action against former Army Chief General Mirza Aslam Beg and former ISI Chief Assad Durrani for distribution of lakhs of rupees to the politicians for rigging the1990 elections. The three-member Division Bench also said that the Army should desist from interfering in country’s politics. A retired Air Marshal of Pakistan Air Force had filed a petition in this regard. Justice Chowdhary said that such institutions should not have any role in the politics and political activities, such as forming of the government or destabilizing the governments. He said that Army and Intelligence Agencies must not display any inclination towards any particular political party or political leaders. It is, however, not clear, whether this order would limit the powers of Army or not, but it has definitely led to the apprehension of confrontation between the Army and the judiciary. The Division Bench also ordered legal action against former Army Chief Mirza Aslam Baig and former ISI Chief Assad Durrani. The Bench said both these persons have violated the Constitution and the Law by distribution of crores of rupees during the 1990General Elections with the objective of rigging the elections. Their deeds have tarnished the image of the country and the Army. This decision has the potential to change the course of country’s politics. According to Dawn newspaper, ‘this decision can put an end to the political activities in President’s Office.’ The News has reported that this decision of the Court has made it impossible for Zardari to remain as the co-Chairman of the Pakistan People’s Party or continue his political activities. In its decision, the Bench has also said that any political unit of ISI, Military Intelligence or Intelligence Bureau working in the President Palace be closed immediately, because any such a unit is un-constitutional. The Bench has said that notification for the constitution of any such Unit would be invalid. It is to be seen, whether the Pak Army would implement this decision or not?


बाबा रामदेव का केंद्र और राज्य सरकार से बढ़ता टकराव


 Published on 26 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र
 बाबा रामदेव की सम्पत्तियों और उनके गुरू शंकर देव के गायब होने की जांच सीबीआई से कराने की संस्तुति को लेकर बाबा और सरकार से टकराव बढ़ गया है। बाबा के निशाने पर अब दोनों केंद्र और उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी का रोबोट बताने, रॉबर्ट वाड्रा को सरकारी दामाद बताने और केंद्र सरकार पर एफडीआई आदि के मामले में सीधे वार किए जाने से केंद्र सरकार बाबा से बुरी तरह चिढ़ी हुई है। रामदेव के गुरू स्वामी शंकर देव को अब सीबीआई ढूंढ़ेगी। सीबीआई उनके गुरू को ढूंढ़ने के बहाने रामदेव की भी जांच करेगी। फर्जी पासपोर्ट और फर्जी मार्पशीट को लेकर उनके साथी आचार्य बालकृष्ण पर पहले ही मुकदमा दर्ज कर रखा है, जिसकी जांच चल रही है। याद रहे कि आचार्य को जेल में भी भेजा गया था। बाद में उनकी नैनीताल हाई कोर्ट से जमानत हुई थी। स्वामी रामदेव के गुरू शंकर देव पांच साल पहले 14 जुलाई 2007 को अचानक अपने कनखल के आश्रम दिव्य योग मंदिर कृपालु बाग से गायब हो गए थे। दो दिन बाद 16 जून, 2007 को आचार्य बालकृष्ण ने अपने गुरू की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। तब बाबा रामदेव विदेश में थे। विदेश से लौटने के बाद गुरू की गुमशुदगी को लेकर प्रेस कांफ्रेंस भी की। मगर पुलिस उनके गुरू को तलाशने में असमर्थ रही और इस साल अप्रैल 2012 को गुमशुदगी की फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी। इसके बाद बाबा रामदेव के विरोधी संत समिति के सदस्य आचार्य प्रमोद कृष्णन ने सीबीआई से रामदेव की सम्पत्तियों और उनके गुरू  के गायब होने की जांच कराने की मांग को लेकर उत्तराखंड के राज्यपाल को ज्ञापन दिया था। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने दिल्ली में केंद्र सरकार के कई नेताओं से विचार करने के बाद बाबा रामदेव की सम्पत्तियों और उनके गुरू की गुमशुदगी मामले की जांच कराने की सीबीआई से सिफारिश कर दी। यहीं से बाबा की मुश्किलें बढ़ गईं। आयकर विभाग के बाद सेवाकर विभाग ने भी बाबा रामदेव के ट्रस्ट को छूट के दायरे में मानने से इंकार कर दिया है। बीते पांच सालों में ट्रस्ट को सदस्यता शुल्क के रूप में मिली राशि पर करीब पौने आठ करोड़ का सेवाकर मांगा गया है। इससे पहले बाबा द्वारा देशभर में लगाए जाने वाले योग शिविरों पर करोड़ों का सेवाकर का नोटिस भेजा गया था। बाबा रामदेव के ट्रस्ट पतंजलि योग पीठ की स्थायी और अस्थायी सदस्यता लेने पर तमाम प्रकार की सुविधाएं मिली हैं। सदस्यों को संस्था के हरिद्वार स्थित भव्य परिसर में रहने, खाने के अलावा एक्सक्लूसिव योग कैम्प में हिस्सा लेने का अवसर मिलता है। सुविधाएं सदस्यता शुल्क के हिसाब से उपलब्ध कराई जाती हैं। अधिकतम 11 लाख रुपए में आजीवन सदस्यता दी जाती है। इसके अलावा पतंजलि आयुर्वेद धर्म की तमाम भूमि-सम्पत्ति को बाबा की ही कम्पनियों को किराया दिया जाता है। इसके अलावा दिव्य फार्मेसी को भी गोदाम, कार्यालय आदि के लिए किराये पर दिया गया है। बाबा द्वारा देशभर में आयोजित किए गए योग शिविरों से हुई आय पर 4.9 करोड़ की सेवाकर डिमांड निकाली गई है। स्वामी रामदेव ने केंद्र और राज्य सरकार पर बदले की भावना से उनके खिलाफ कार्रवाई करने का आरोप लगाया है और कहाöवे दबने वाले नहीं हैं, उनकी लड़ाई जारी रहेगी।

विवादों के चलते गडकरी को पद छोड़ पार्टी बचानी चाहिए


 Published on 26 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र
भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। गडकरी पर महाराष्ट्र में पीडब्ल्यूडी मंत्री रहते हुए खुद की कम्पनियों को आर्थिक फायदा पहुंचाने का नया आरोप सामने आया है। वह महाराष्ट्र की शिवसेना-भाजपा की तत्कालीन सरकार में 1995 से 1999 तक मंत्री थे। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार गडकरी की कम्पनी पूर्ति पॉवर एण्ड शुगर लिमिटेड ने कई घपले किए। इनमें गलत तरीके से पैसा जमा करने से लेकर कम्पनी के बारे में दी गई जानकारी फर्जी होना शामिल है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पूर्ति पावर के अधिकतर निवेश और कर्ज आईआरबी समूह की ओर से दिए गए। जब गडकरी महाराष्ट्र सरकार में पीडब्ल्यूडी मंत्री थे तब आईआरबी समूह को कई ठेके दिए गए थे। पूर्ति की शेयरधारक कम्पनियों के पते भी फर्जी हैं। इनमें से पांच कम्पनियों के पते दरअसल मुंबई की झुग्गी बस्तियों के हैं। नितिन गडकरी ने अपनी सफाई में कहा कि महाराष्ट्र सरकार में लोक निर्माण मंत्री रहते हुए निजी कम्पनियों को फायदा पहुंचाने की बात बेबुनियाद है। मैं खुद पर लगे इन आरोपों की किसी भी जांच के लिए तैयार हूं। केंद्रीय कारपोरेट मामलों के मंत्री वीरप्पा मोइली ने कहा है कि इस मामले की जांच कराई जाएगी। खुलासे के बाद भाजपा के सांसद राम जेठमलानी ने गडकरी से इस्तीफे की मांग की है। लेकिन राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली गडकरी के बचाव में हैं। उन्होंने कहा कि सरकार चाहे तो जांच करवा ले। सामने आए नए तथ्यों के बाद यह संदेह गहराना मैं समझता हूं स्वाभाविक ही है कि कहीं कुछ तो गड़बड़ है। यह सहज सामान्य नहीं जान पड़ता कि किसी कम्पनी के निवेशक झुग्गी बस्तियों में रह रहे हों? नितिन गडकरी का यह कहना कि जिस पूर्ति समूह के निवेशकों के पते फर्जी पाए गए हैं वह उसे 14 माह पहले छोड़ चुके हैं उनकी सफाई का पर्याप्त जवाब नहीं कहा जा सकता। इसलिए और भी नहीं, क्योंकि अब उन फैसलों पर भी सवाल उठ रहे हैं जो गडकरी ने महाराष्ट्र के लोकनिर्माण मंत्री रहते समय लिए थे। कोई भी यह कैसे मान सकता है कि उन्होंने बतौर लोक निर्माण मंत्री जिस कम्पनी को तमाम ठेके दिए उसी ने उन्हें बाद में करोड़ों का कर्ज दिया? यह अच्छी बात है कि खुद गडकरी अपने पर लगे आरोपों की जांच की मांग कर रहे हैं लेकिन यदि ऐसा होता है तो क्या उन्हें  अपने पद पर बना रहना चाहिए? आखिर यही तो मांग भाजपा कांग्रेसी नेताओं पर लगे आरोपों के लिए कर रही है। अब भाजपा अध्यक्ष पर भी उसी ढंग के आरोप लगे हैं जैसे कांग्रेसी नेताओं, मंत्रियों पर लगे हैं। भाजपा इसकी भी अनदेखी नहीं कर सकती कि राजनीति में उतर चुकी टीम केजरीवाल तो यही साबित करने पर उतारू है कि सियासी हमाम में सभी नंगे हैं, कांग्रेस -भाजपा दोनों चट्टे-बट्टे हैं। बेशक भाजपा का शीर्ष नेतृत्व गडकरी के बचाव में उतर आया है पर हमें इसमें संदेह है कि वह आम जनता को यह समझाने में सफल होंगे कि गडकरी पर लगे आरोपों के पीछे कांग्रेस है और यह भाजपा को बदनाम करने के लिए एक सियासी चाल है। जनता अब जागरुक हो चुकी है। वह बड़े गौर से देख रही है कि राजनीतिक दल किस तरह भ्रष्टाचार से लड़ने का दिखावा कर रहे हैं। राजनीतिक दलों के इस व्यवहार से जनता में सियासी दलों के प्रति मोहभंग हो रहा है। नितिन गडकरी के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूरी तरह खड़ा हुआ है। दुख से कहना पड़ता है कि संघ अपने आदर्शों को भूल चुका है और अब उसके लिए भी व्यवसायी स्वार्थ ज्यादा महत्वपूर्ण हो चुका है। बतौर अध्यक्ष नितिन गडकरी को कभी भी भाजपा में स्वीकार नहीं किया गया और अब तो रही-सही कसर भी पूरी हो चुकी है। आखिर कब तक संघ द्वारा लादे गए इस बोझ को भाजपा उठाती फिरेगी। स्वयं नितिन गडकरी को चाहिए कि वह अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दें और यह कहें कि वह किसी भी स्वतंत्र जांच के लिए तैयार हैं और जब तक जांच पूरी नहीं होती तब तक वह अध्यक्ष पद पर नहीं रहेंगे। इससे कांग्रेस पर भी दबाव पड़ेगा और तब भाजपा कह सकती है कि देखो हमने तो यह कर दिखाया अब आपकी बारी है। तभी भाजपा पार्टी विद ए डिफरेंस साबित होगी।


Thursday, 25 October 2012

अबू जिंदाल के बाद फसीह की गिरफ्तारी दूसरी महत्वपूर्ण सफलता


 Published on 25 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र

आतंकवादी फसीह मोहम्मद का सऊदी अरब से प्रत्यार्पण आतंकवाद विरोधी लड़ाई में एक महत्वपूर्ण विजय है। इंडियन मुजाहिद्दीन के संदिग्ध इस आतंकी की गिरफ्तारी को केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह ने बेहद महत्वपूर्ण बताया। फसीह मुहम्मद के दिल्ली बम विस्फोट और बेंगुलरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में बम विस्फोट में आतंकवादी वारदात के लिए तलाशा जा रहा था। फसीह की गिरफ्तारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से मुमकिन हो सकी। फसीह के प्रत्यार्पण में विदेश मंत्रालय को सऊदी अरब से काफी मशक्कत करनी पड़ी। लम्बी जद्दोजहद के बाद यह सम्भव हो पाया है और इस प्रत्यार्पण से जहां भारत और सऊदी अरब के बीच द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूती मिली है वहीं पाकिस्तान को इससे एक स्पष्ट संकेत भी मिला है। फसीह मोहम्मद की गिरफ्तारी भारत के लिए आतंक के खिलाफ लड़ाई में दूसरी कूटनीतिक जीत है। सरकार का कहना है कि अबू जिंदाल के बाद फसीह को सौंप कर सऊदी अरब ने खासतौर पर पाकिस्तान को यह संदेश दिया है कि आतंकियों को संरक्षण देने से इस्लामी देशों की सुरक्षा को खतरा है। सऊदी अरब में पहली बार फसीह के खिलाफ सबूत को अपर्याप्त बताकर कुछ और दस्तावेजी सबूत मांगे थे। लेकिन सरकार का दावा है कि सऊदी हुक्मरानों ने इंडियन मुजाहिद्दीन के इस सरगना को नहीं सौंपने का संकेत कभी नहीं दिया। शीर्ष सूत्रों के मुताबिक सऊदी अरब ने सबूतों की दूसरी खेप सौंपने के कुछ हफ्तों में ही जरूरी औपचारिकताएं पूरी कर दीं। इससे पहले मुंबई हमलों में अहम सम्पर्प सूत्र की भूमिका निभाने वाले अबू जिंदाल को सऊदी अरब से भारत लाने में अमेरिका के प्रभाव की काफी चर्चा थी। सूत्र मान रहे हैं कि जिंदाल मामले में अमेरिका ने जो रुचि दिखाई उसका असर फसीह मामले में भी रहा। 28 वर्षीय फसीह को दिल्ली पहुंचने पर हवाई अड्डे से गिरफ्तार कर लिया गया। वह सऊदी अरब में पांच माह से हिरासत में था। आतंकी फसीह की गिरफ्तारी से पुलिस को सबसे बड़ी मदद इंडियन मुजाहिद्दीन (आईएम) के उस नेटवर्प को तोड़ने में मदद मिलेगी जिसका ताना-बाना फसीह ने करीब चार साल पूर्व खुद बुना था। पेशे से इंजीनियर फसीह इंडियन मुजाहिद्दीन का संस्थापक रहा है और उसी के प्रयासों से आईएम संगठन से बड़ी संख्या में डाक्टर, एमबीए, इंजीनियर और अन्य पेशेवर को जोड़ा गया। बेंगलुरु में पिछले दिनों पुलिस गिरफ्तार किए लोगों से भी इस बात की पुष्टि हो चुकी है। लेकिन आईएम से जुड़े पेशेवरों के इस नेटवर्प के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी खुफिया एजेंसियों को नहीं है। कुछ महीने पहले मुंबई के 26/11 आतंकी हमलों के प्रमुख अपराधी अबू जिंदाल को भी सऊदी अरब से प्रत्यर्पित करवाने में भारत को कामयाबी मिली थी। यह सिलसिला जारी रहा तो पश्चिम एशिया के अरब देश आतंकवादियों के सुरक्षित ठिकाने नहीं रह पाएंगे। सऊदी अरब अब धीरे-धीरे आतंकवाद विरोधी लड़ाई में जो सहयोग कर रहा है, उसके पीछे कई वजहें हैं। सऊदी अरब के हुक्मरानों को यह लग रहा है कि अपने देश को आतंकवादियों की पनाहगाह बनने देने से कई खतरे हैं। एक तो इससे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में छवि खराब होती है। दूसरे ऐसे खतरनाक अपराधियों का देश में बना रहना उसकी सुरक्षा के लिए खतरा है। भले ही वह अमेरिका विरोधी किसी वारदात में शामिल हों या न हों। पश्चिम एशिया के कई देशों में जन विद्रोहों में कट्टरवादी या आतंकी समूहों की हिस्सेदारी बहुत अहम रही है। इसलिए भी सऊदी अरब उग्र विचार और आतंकवादी रुझाने वाले लोगों को अपन देश में रखने का खतरा मोल नहीं लेना चाहता। यह खुशी की बात है कि आतंकवाद के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आपसी सहयोग बढ़ रहा है और एक माहौल तैयार हो रहा है। मैकेनिकल इंजीनियर फसीह मोहम्मद के बारे में सुरक्षा एजेंसियां जितना अनुमान लगा रही थी, उससे कहीं ज्यादा पूछताछ में खुलासे हो रहे हैं। अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम ने तकरीबन एक साल पहले फसीह की खुलकर तारीफ की थी। दाऊद ने पाकिस्तान में लश्कर चीफ और आईएसआई से कहा था फसीह काम का बन्दा है। फसीह की तारीफ की सबसे बड़ी वजह कम्प्यूटर और इंटरनेट में फसीह का तेज-तर्रार होना माना गया है। अबू जिंदाल के बाद फसीह मोहम्मद की गिरफ्तारी भारत के आतंक विरोधी अभियान में दूसरी उपलब्धि है।

दिग्विजय ने केजरीवाल को और आक्रमक होने का मौका दिया


 Published on 25 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र

अपनी-अपनी राय हो सकती है। मेरी राय में कांग्रेस महासचिव दिग्विजिय सिंह ने इंडिया अगेंस्ट करप्शन के अरविन्द केजरीवाल से सीधा सवाल पूछकर ठीक नहीं किया। बेशक उन्होंने जवाबी हमला किया पर इससे उल्टा संप्रग सरकार और कांग्रेस नेतृत्व को ही नुकसान हो सकता है। शायद यही वजह है कि कांग्रेस पार्टी ने दिग्विजय के इस अभियान से अपने आपको अलग कर लिया है। पार्टी महासचिव व मीडिया विभाग के अध्यक्ष जनार्दन द्विवेदी का कहना है कि ये सवाल श्री सिंह ने अपने स्तर पर पूछे हैं और इससे पार्टी का कोई लेना-देना नहीं है। वहीं पार्टी के दूसरे नेता भी इन सवालों को महत्व नहीं दे रहे हैं। उनका कहना है कि इससे केजरीवाल घिरने की बजाय ज्यादा आक्रमक हो जाएंगे क्योंकि यह सवाल इतने कमजोर हैं कि इससे जनता में यह संदेश ही जाएगा कि कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली सरकार के लाख खोजने के बाद केजरीवाल के खिलाफ कुछ नहीं निकाल। क्योंकि अगर कांग्रेस के पास कुछ मजबूत तथ्य केजरीवाल के खिलाफ होते तो दिग्विजय सिंह को ऐसे सवालों का सहारा नहीं लना पड़ता। मिसाल के तौर पर दिग्विजय ने एक सवाल में पूछा है कि अपनी सरकारी नौकरी के दौरान केजरीवाल 20 साल तक दिल्ली में ही क्यों टिके रहे? उनका तबादला कहीं और क्यों नहीं हुआ? अब ये बात तो कोई गांव का देहाती आदमी  भी बता देगा कि तबादला करना तो सरकार के हाथ में है और पिछले 15 सालों से दिल्ली की सत्ता कांग्रेस के पास है और केंद्र में भी वह 8 साल से राज कर रहे हैं। तो सवाल तो उलटा सरकार से पूछा जाना चाहिए कि उसने केजरीवाल का ट्रांसफर क्यों नहीं किया? दिग्विजय के केजरीवाल से सवाल पूछना का एक नतीजा यह जरूर हुआ कि केजरीवाल ने सभी को लपेट लिया। भ्रष्टाचार को बेनकाब करने की मुहिम में जुट केजरीवाल से पंगा लेकर दिग्विजय न खुद और अपनी पार्टी के लिए मुसीबत मोल ले ली है। 27 सवालों का तीर दागने वाले दिग्गी राजा के पत्र पर रविवार को आक्रामक रुख अख्तियार करते हुए केजरीवाल ने एक चतुर खिलाड़ी की तरह गेंद कांग्रेस पाले में डाल दी। चिट्ठी का जवाब देने के बजाय केजरीवाल ने मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, रॉबर्ट वाड्रा सभी को लपेट लिया। केजरीवाल ने कहा कि हमने भी रॉबर्ट वाड्रा और प्रधानमंत्री से कुछ सवाल पूछे हैं। पहले उन्हें हमारे सवालों का जवाब देना चाहिए। उसके बाद हम दिग्विजय के सभी प्रश्नों का उत्तर दे देंगे। पत्रकारों से बातचीत करते हुए केजरीवाल ने कहा मैं दिग्विजय से अनुरोध करता हूं कि वह वाड्रा प्रकरण पर खुली बहस के लिए मनमोहन सिंह, सोनिया या राहुल गांधी को प्रेरित करें। उनका कहना था कि भ्रष्टाचार के आरोपों से कांग्रेस आलाकमान और रॉबर्ट वाड्रा जब खुद को बेदाग साबित कर देंगे तभी इंडिया अगेंस्ट करप्शन भी अपने खिलाफ उठाए गए सवालों का जवाब देगी। केजरीवाल ने सवालिया अन्दाज में पूछा क्या दिग्विजय इस बात के लिए तैयार हैं कि हम एक-दूसरे से खुले सवाल पूछें और जनता भी हम दोनों पक्षों (कांग्रेस और आईएसी) से निजी और सार्वजनिक मसलों पर सवाल पूछने के लिए आजाद हो?

Wednesday, 24 October 2012

जस्टिस इफ्तिखार चौधरी पाकिस्तान की सियासी दिशा बदलना चाहते हैं


 Published on 24 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र
किसी भी देश में कभी-कभार कोई ऐसा व्यक्ति पैदा होता है जो देश की सियासत को बदलने की ताकत का प्रदर्शन करता है। दृढ़ संकल्प से वह ऐसे साहसी कदम उठाता है जिससे देश की सियासत को नई दिशा मिलती है। पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस इफ्तिखार चौधरी ऐसी श्रेणी में आते हैं। उन्होंने न केवल पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट को उसकी खोई पोजीशन ही बहाल की है  बल्कि कई ऐसे मामलों में हस्तक्षेप किया है जिन्हें पहले किसी ने छूने का साहस नहीं किया। बेशक इनमें से कुछ विवादास्पद भी हो सकते हैं। ताजा मामला पाकिस्तानी सेना व उसकी गुप्तचर शाखा आईएसआई का देश की राजनीति में हस्तक्षेप का है, चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी की अध्यक्षता वाली पीठ ने गत शुक्रवार को सरकार को पूर्व सेना प्रमुख जनरल मिर्जा असलम बेग और पूर्व आईएसआई प्रमुख असद दुर्रानी के खिलाफ 1990 में हुए चुनावों में धांधली के लिए राजनीतिज्ञों को लाखों रुपए के भुगतान में भूमिका के लिए कानूनी कार्रवाई करने का आदेश दिया। प्रधान न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी के नेतृत्व वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने साथ ही यह भी कहा कि सेना को पाकिस्तान की राजनीति में दखल देने की आदत से बाज आना चाहिए। 1996 में एक याचिका वायुसेना के एक सेवानिवृत एयर मार्शल ने दायर की थी। न्यायमूर्ति चौधरी ने कहा कि इस तरह की संस्थाओं की राजनीति या राजनीतिक गतिविधियों, सरकार के गठन या सरकारों की अस्थिरता में कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सेना और खुफिया एजेंसियों को किसी भी सूरत में किसी खास राजनीतिक दल अथवा राजनेताओं की तरफ झुकाव नहीं दिखाना चाहिए। हालांकि अभी यह साफ तो नहीं हुआ है कि इस व्यवस्था से सेना की शक्तियां सीमित होंगी अथवा नहीं, लेकिन इससे सेना और अदालत के बीच टकराव की आशंका जरूर बढ़ गई है। इस मामले में चीफ जस्टिस के नेतृत्व वाली तीन सदस्यीय पीठ ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल मिर्जा असलम बेग और आईएसआई के पूर्व प्रमुख असद दुर्रानी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के आदेश भी दिए। पीठ ने कहा कि 1990 के आम चुनाव में धांधली के मकसद से दोनों ने करोड़ों रुपए बांटकर संविधान और कानून का उल्लंघन किया है। उनके कदमों से देश और सशस्त्र बलों की छवि प्रभावित हुई है। यह फैसला देश के राजनीतिक इतिहास की दिशा बदल सकता है। डॉन अखबार के अनुसार यह फैसला राष्ट्रपति कार्यालय में राजनीतिक गतिविधियों का हमेशा के लिए अंत भी कर सकता है। `द न्यूज' ने खबर दी है कि सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था ने जरदारी के लिए पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सह अध्यक्ष पद पर बने रहने या अपनी राजनीतिक गतिविधियों को जारी रखना असम्भव बना दिया है। अपने फैसले में पीठ ने साथ ही यह भी कहा कि राष्ट्रपति भवन, आईएसआई, सैन्य गुप्तचर या गुप्तचर ब्यूरो में कार्यरत किसी भी राजनीतिक इकाई को तत्काल बन्द किया जाए क्योंकि ऐसी कोई भी संस्था असंवैधानिक है। पीठ ने कहा कि ऐसी किसी इकाई के गठन के लिए जारी कोई भी अधिसूचना अमान्य होगी। अब देखना यह है कि पाक सेना क्या इस फैसले पर अमल करेगी?



नौकरशाह अब नेताओं के दबाव में नहीं आएंगे


 Published on 24 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र
 हरियाणा के नौकरशाह वरिष्ठ आईएएस अशोक खेमका को जिस तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है उससे नौकरशाह नाराज हैं। ब्यूरोकेसी इस देश में अति प्रभावशाली है और इसको नजरअंदाज करना राजनीतिक दलों और सरकारों को कभी-कभी भारी पड़ सकता है। राजनेता अकसर अपने उलटे-सीधे काम इन्हीं ब्यूरोकेटों के माध्यम से करते हैं और किसी भी नेता या मंत्री की सारी पोल पट्टी उनके सचिवों को रहती है। पिछले कई दिनों से जो घोटालों का पर्दाफाश हो रहा है उसमें घोटालों की बारीकियां, तथ्य तो यह नौकरशाह ही लीक कर रहे हैं। अशोक खेमका ने दिखा दिया कि अगर नौकरशाही राजनेताओं से कोआपरेट न करे तो सरकारें कितनी मुश्किल में आ सकती हैं और जब किसी भी घोटाले का पर्दाफाश हो जाता है तो यह नेता लोग सिर्प और सिर्प अपना  बचाव करते हैं,  नौकरशाह को उसके हाल पर छोड़ देते हैं। हमने 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में देखा, कामनवेल्थ गेम्स में भी देखा कि किस तरह राजनेताओं की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए नौकरशाहों को महीनों तिहाड़ जेल की हवा खानी पड़ी। नौकरशाह बिरादरी को सबसे पहले सत्ता परिवर्तन होने के संकेत पता चल जाते हैं। चुनाव से पहले इन्हें पता चल जाता है कि फलानी सरकार दोबारा सत्ता में नहीं आ रही तो यह सरकार के हर आदेश को मानने से कतराने लगते हैं और अपने विवेक से काम करना आरम्भ कर देते हैं। केंद्र में संप्रग सरकार के बारे में भी देश की नौकरशाह बिरादरी को अब सरकार के जाने का आभास होने लगा है। तभी तो तमाम आईएएस, आईपीएस और आईएफएस के संघों ने फैसला किया है कि वह अब नेताओं के दबाव में नहीं आएंगे। चाहे बात सत्ता पक्ष और विपक्ष के ही नेता की क्यों न हो। यह निर्णय अखिल भारतीय सेवा के अफसरों के तीनों संघों ने लिया है। तीनों संघों की को-आर्डिनेशन कमेटी की शनिवार को भोपाल में हुई इस महत्वपूर्ण बैठक में प्रस्ताव पारित किया गया कि राजनीतिक मंसूबों में इस्तेमाल होने से वह बचेंगे। बैठक में आईएएस एसोसिएशन ने कहा कि देश में तेजी से बदल रहे राजनीतिक घटनाक्रम से लगता है कि जन प्रतिनिधियों का दखल प्रशासनिक काम में और बढ़ेगा। आईएएस अफसर किसी एक पार्टी के बनकर पहले भी काम नहीं करते थे, लेकिन अब इस तरफ ज्यादा ध्यान देना होगा। यदि सत्ता पक्ष से जुड़े नेता भी अफसरों के साथ सही व्यवहार नहीं करते तो तीनों संगठन मिलकर उसका विरोध करेंगे। इस प्रस्ताव पर आईएएस, आईएफएस और आईपीएस तीनों एसोसिएशनों ने सहमति दे दी। आईएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष अरुण शर्मा ने इतना जरूर कहा कि सर्विस मामलों पर चर्चा हुई। यह फैसला दिया गया कि हर तीन माह में इसी तरह की को-आर्डिनेशन मीटिंग होगी। कुछ एजेंडा है जिसे अभी नहीं बता सकते।


Tuesday, 23 October 2012

और अब केजरीवाल और टीम ही कठघरे में खड़ी


 Published on 23 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र
 दूसरों को कठघरे में खड़ा करने वाले अरविन्द केजरीवाल ने जब अपना घोटालेबाजों का पर्दाफाश करने का अभियान शुरू किया था तो पता नहीं कि उन्होंने यह कल्पना भी कभी की थी कि उन पर भी जवाबी हमले हो सकते हैं और वह भी कठघरे में खड़े हो सकते हैं। आरोप-प्रत्यारोप के इस दौर में अब केजरीवाल की टीम भी निशाने पर आ गई है। घोटालों की पोल खोलने वालों में केजरीवाल के साथ उनकी टीम की बहुत बड़ी भूमिका है। घोटालों की पोल खोल का अभियान खासतौर पर इंडिया अगेंस्ट करप्शन के सिपहसलार चला रहे हैं। कांग्रेस, एनसीपी, भाजपा सभी पर टीम ने हमला किया है। अब टीम केजरीवाल के इस अभियान को पुंद करने के लिए राजनीतिक दल भी जवाबी कार्रवाई करने लगे हैं। कांग्रेस के महासचिव और बड़बोले नेता दिग्विजय सिंह ने शनिवार को खुद अरविन्द केजरीवाल पर ही हमला बोल दिया। दिग्विजय ने केजरीवाल पर 27 सवाल दाग दिए। ये सवाल केजरीवाल की नौकरी, एनजीओ और आंदोलन से जुड़े हैं। उन्होंने कुछ निजी सवाल भी पूछे हैं। हालांकि अरविन्द केजरीवाल ने दिग्विजय सिंह की इस प्रश्नावली का जवाब तो नहीं दिया पर हम यह कह सकते हैं कि कांग्रेस ने केजरीवाल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। टीम केजरीवाल की एक चर्चित कार्यकर्ता हैं अंजलि दमानिया। उन्होंने केजरीवाल के साथ भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी पर तमाम आरोप लगाए। अंजलि दमानिया पर खुद आरोप लग गए हैं और यह आरोप गम्भीर प्रतीत होते हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने 2007 में किसान की हैसियत से विदर्भ इलाके में 7 एकड़ जमीन खरीदी थी जिसका बाद में लैंड यूज बदलाकर उन्होंने भारी कमाई की। उन्होंने अपने आपको किसान होने का गलत दावा किया जबकि दमानिया ने ही एनसीपी नेता अजीत पवार और गडकरी को तमाम आरोपों के कठघरे में खड़ा किया है। टीम केजरीवाल के दूसरे सदस्य प्रशांत भूषण जो पेशे से वकील हैं पर आरोप है कि वह अपनी पत्नी के नाम पर जो ट्रस्ट चला रहे हैं उसने हिमाचल में नियमों के खिलाफ जमीन ली है। उनके पिता शांति भूषण पर यूपी सरकार से नोएडा में सस्ती दरों पर फार्म हाउस और इलाहाबाद में कम स्टाम्प ड्यूटी देकर एक घर खरीदने का भी आरोप है। एक अन्य केजरीवाल टीम के सदस्य मयंक गांधी इंडिया अगेंस्ट करप्शन की मुंबई शाखा के प्रमुख हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने अपने चाचा की कंस्ट्रक्शन कम्पनी को दक्षिण मुंबई में जमीन दिलाने में मदद की। महाराष्ट्र सरकार अनियमितता के आरोप में जमीन के इस सौदे को रद्द कर चुकी है। इन आरोपों के चलते खुद टीम केजरीवाल की साख पर सवालिया निशान लग गया है। फिलहाल बचाव के लिए केजरीवाल ने प्रशांत, मयंक और अंजलि पर लगे आरोपों पर जांच बैठाने का ऐलान किया है। इन पर लगे आरोपों की जांच पड़ताल हाई कोर्ट के तीन रिटायर जज जस्टिस एपी शाह, जस्टिस बीएच मर्ल्लापल्ले और जस्टिस जसपाल सिंह करेंगे। ये तीनों जज केजरीवाल की नई पार्टी के मामलों के लिए लोकपाल की भूमिका भी निभाएंगे। अब देखना यह है कि अरविन्द केजरीवाल अपने और अपनी टीम पर लगे आरोपों की कालिख कितनी जल्दी हटा पाएंगे? फिर केजरीवाल पर हमले तो अब शुरू हुए हैं, इनकी रफ्तार और धार और तेजी से बढ़ेगी।

सुभाष पार्क में अवैध निर्माण पर हाई कोर्ट का साहसी, सराहनीय फैसला


 Published on 23 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र
 दिल्ली हाई कोर्ट की स्पेशल बेंच जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस एमएल मेहता और जस्टिस राजीव शंकधर ने शुक्रवार को एक साहसी फैसला किया। मामला था दिल्ली के सुभाष पार्क में अवैध मस्जिद बनाने का। उल्लेखनीय है कि मेट्रो लाइन निर्माण के दौरान सुभाष पार्क में एक दीवार मिली थी, जिसे एक समुदाय ने कथित रूप से अकबरावादी मस्जिद का अवशेष बताते हुए वहां रातों-रात निर्माण कर दिया। इस मुद्दे को लेकर कुछ संगठन दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचे व इस अवैध निर्माण को हटाने की मांग की। हाई कोर्ट ने 30 जुलाई को पुलिस को यह अवैध निर्माण हटाने के लिए एमसीडी को फोर्स उपलब्ध करवाने का निर्देश दिया था। एमसीडी ने 31 जुलाई को पुलिस को पत्र लिखकर फोर्स देने का आग्रह किया ताकि अदालत के आदेश का पालन हो सके। पुलिस ने आवेदन दाखिल कर तर्क रखा कि रमजान, स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों के तहत पुलिस फोर्स व्यस्त है अत ऐसे में फोर्स देना सम्भव नहीं है। पीठ ने कहा कि उनकी नजर में पुलिस की ड्यूटी है कि वह शांति व कानून व्यवस्था बनाए व कोई भी कानून न टूटे। इतना ही नहीं पुलिस ने अपनी अर्जी में यह भी कहा था कि अवैध मस्जिद गिराने के लिए विधायक शोएब इकबाल को निर्देश जारी किया जाए। अदालत ने पुलिस की अर्जी खारिज करते हुए कहा कि पुलिस मामले में जरूरी फोर्स नगर निगम को मुहैया कराए और यह कार्रवाई जल्दी की जाए। उधर विधायक शोएब इकबाल ने याचिका दायर कर एएसआई के कार्यों का निरीक्षण करने के लिए एक एक्सपर्ट कमेटी बनाने की बात कही। इस पर अदालत ने कहा कि याचिका के माध्यम से विधायक ने एक बार फिर मामले को लम्बा खींचने का प्रयास किया है। अदालत अपने 30 जुलाई के आदेश में इन मामलों पर पहले ही विचार कर चुकी है। एएसआई पूरे मामले को देख रही है। यह एक तकनीकी कार्य है और इस पर न तो संदेह किया जा सकता है और न ही सवाल उठाए जा सकते हैं। शोएब इकबाल की याचिका खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि इस मामले में एक्सपर्ट कमेटी या लोकल कमिश्नर नियुक्त किए जाने की कोई जरूरत नहीं है। इस मामले में याचिकाकर्ता स्वामी साई बाबा ओम जी द्वारा उन पर हमले को लेकर की गई सुरक्षा व्यवस्था की मांग के मामले का निपटारा करते हुए पीठ ने कहा कि दिल्ली पुलिस याचिकाकर्ता की मांग पर विचार करते हुए इस पर उचित कार्रवाई करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि एएसआई द्वारा उक्त स्थल के संबंध में 17 जुलाई को जारी नोटिस के तहत कार्रवाई की जाए। एएसआई ने अपने नोटिस में स्पष्ट रूप से कहा था कि लाल किला व सुनहरी मस्जिद संरक्षित क्षेत्र है और उसके आसपास किसी भी प्रकार का निर्माण, मरम्मत इत्यादि प्रतिबंधित है। सुभाष पार्क में हुआ निर्माण इसी क्षेत्र में आता है और इसे 15 दिन में हटाया जाए। इतना ही नहीं निर्माण करने वालों के खिलाफ मामला दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की जाए। अंत में पीठ ने यह भी कहा कि पूरा विवादित स्थल सीलबंद है और वहां काम में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि उक्त स्थल पर सर्वे में मस्जिद होने की पुष्टि होती है तो भी यह संरक्षित इमारत होगी और ऐसे में वहां नमाज अता करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। ऐसे में नमाज अता करने की इजाजत देने का सवाल ही नहीं है। हम हाई कोर्ट की पीठ का स्वागत करते हैं और इस साहसी फैसले की सराहना करते हैं। सवाल एक अवैध निर्माण का ही नहीं बल्कि कानून की धज्जियां उड़ाने का है। ऐसे में रातों-रात कई पूजा स्थल खड़े हो जाएंगे। अब देखना यह है कि जो साहस हाई कोर्ट पीठ ने दिखाया है क्या दिल्ली पुलिस भी वैसा ही साहस दिखाएगी?

Sunday, 21 October 2012

डीएलएफ भुगतान के लिए वाड्रा के पास 7.94 करोड़ आए कहां से?


 Published on 21 October, 2012
  अनिल नरेन्द्र
रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ की विवादित सौदेबाजी दिन प्रति दिन नए सवाल खड़े कर रही है। हैरानगी की बात यह है कि इस जमीन के सौदे पर न तो रॉबर्ट वाड्रा और न ही डीएलएफ की तरफ से कोई सही संतोषजनक जवाब दिया गया है। नया खुलासा कारपोरेशन बैंक की ओर से आया है। ज्ञात हो कि रॉबर्ट वाड्रा की कम्पनी स्काई लाइट ने कम्पनी रजिस्ट्रार के समक्ष दाखिल वित्तीय वर्ष 2007-08 की लेखा रिपोर्ट में दावा किया है कि कारपोरेशन बैंक की दिल्ली स्थित न्यू फ्रैंड्स कॉलोनी शाखा ने कम्पनी को ओवर ड्राफ्ट सुविधा प्रदान की है। लेखा रिपोर्ट में रॉबर्ट वाड्रा और उनकी मां एम. वाड्रा के हस्ताक्षर हैं यानि कि कारपोरेशन बैंक के ओवर ड्राफ्ट एकाउंट से स्काई लाइट कम्पनी ने 7.94 करोड़ निकाले और इससे डीएलएफ को भुगतान किया गया। शुक्रवार को कारपोरेशन बैंक के अध्यक्ष सह प्रबंध निदेशक अजय कुमार ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि उनके बैंक ने वाड्रा की कम्पनी को कोई लोन या ओवर ड्राफ्ट सुविधा प्रदान नहीं की है। अजय कुमार के बयान के बाद यह सवाल और गहरा जाता है कि आखिर रॉबर्ट वाड्रा के पास 7.94 करोड़ की वह रकम कहां से आई जो उन्होंने अपनी कम्पनी की बैलेंस शीट में ओवर ड्राफ्ट के जरिए मिली दिखाई है? अजय कुमार ने अहमदाबाद के प्रह्लाद नगर में बैंक की शाखा के उद्घाटन के बाद पत्रकारों से बातचीत में कहा कि वाड्रा और डीएलएफ सौदेबाजी से उनके बैंक का कोई लेना-देना नहीं है। वाड्रा को 7.94 करोड़ के ओवर ड्राफ्ट की सुविधा के बारे में कुमार ने कहा कि कई बार बताया जा चुका है कि बैंक ने वाड्रा के स्वामित्व वाली कम्पनी स्काई लाइट हॉस्पिटेलिटी को कोई लोन अथवा ओवर ड्राफ्ट नहीं दिया है। इस बारे में मीडिया में जो कुछ भी छप रहा है, उसे ध्यान से देखें तो पता चल जाएगा कि यह सिर्प कम्पनी का लेखा अभ्यास है। वैसे यह एक अजीब इत्तिफाक है कि रॉबर्ट वाड्रा, सलमान खुर्शीद और नितिन गडकरी के नाक में दम करने वाले अरविन्द केजरीवाल और हरियाणा के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका दोनों ही आईआईटी खड़गपुर के विद्यार्थी रहे हैं। अरविन्द केजरीवाल मूल रूप से हरियाणा के हिसार के रहने वाले हैं जबकि अशोक खेमका रहने वाले भले ही पश्चिम बंगाल के हैं लेकिन वह हरियाणा कैडर के ही आईएएस अधिकारी हैं। दोनों ने आईआईटी खड़गपुर से बीटेक किया है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुहिम चला रहे केजरीवाल और खेमका की पढ़ाई में एक साल का अन्तर था। खेमका उनके सीनियर हैं। 30 अप्रैल 1965 को बंगाल में जन्मे खेमका ने 1988 में आईआईटी खड़गपुर से बीटेक किया। इसके अलावा वे एमबीए और कम्प्यूटर साइंस में भी पीएचडी हैं। केजरीवाल ने खड़गपुर से 1989 में बीटेक किया दोनों के मुद्दे और मुहिम एक जैसी होने का ही नतीजा है कि अरविन्द केजरीवाल ने खेमका के तबादले पर राज्य सरकार से पूछा कि वह अपनी स्थानांतरण नीति स्पष्ट करे। क्या वाड्रा के खिलाफ जांच का आदेश देने पर खेमका का तबादला किया गया?

और अब शरद पवार और मनमोहन सिंह की बारी


 Published on 21 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र
 चारों तरफ से हमलों से घिरती संप्रग सरकार और कांग्रेस पार्टी को कोई उम्मीद की किरण फिलहाल तो नजर नहीं आ रही। ताजा हमला कांग्रेस नीत सरकार को समर्थन दे रही राकांपा प्रमुख शरद पवार पर हुआ है। एक पूर्व आईपीएस अधिकारी व अरविन्द केजरीवाल के सहयोगी रहे वाईपी सिंह ने लगाया है। उन्होंने गुरुवार को आरोप लगाया कि महाराष्ट्र के लवासा प्रोजेक्ट में गड़बड़ी करने में केंद्रीय मंत्री शरद पवार का पूरा परिवार शामिल है। सिंह महाराष्ट्र कैडर के 1985 बैच के अधिकारी रहे हैं। वे फिलहाल वकालत कर रहे हैं, सिंह का दावा है कि 2002 में 348 एकड़ जमीन लेक सिटी कारपोरेशन को 30 साल के लिए लीज पर दी गई। यह कम्पनी हिन्दुस्तान कंस्ट्रक्शन की सहायक कम्पनी है। जमीन आवंटित करने का काम शरद पवार के भतीजे और महाराष्ट्र के तत्कालीन सिंचाई मंत्री अजीत पवार ने किया। पूरी जमीन लवासा को 23000 रुपए प्रति माह प्रति एकड़ पर 30 साल के लिए लीज पर दी गई। जब जमीन ट्रांसफर की गई तो पवार की बेटी सुप्रिया व उनके पति सदानन्द को लवासा लेक सिटी को 10.4, 10.4 फीसदी शेयर मिले। 2006 में सुप्रिया और सदानन्द ने अपने 20.8 फीसदी शेयर बेच दिए। इस हिसाब से सुप्रिया को अपने हिस्से के 10.4 प्रतिशत शेयर बेचने के लिए उनको 500 करोड़ रुपए मिले। शरद पवार ने इन आरोपों का खंडन किया है और सिरे से खारिज कर दिया है। मामला कोर्ट में चल रहा है, उम्मीद है कि कोर्ट में दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। दूसरा मामला खुद प्रधानमंत्री को लेकर है। यह मामला घोटाले का तो नहीं पर आरोप अत्यंत गम्भीर है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पूर्व कैबिनेट सचिव केएम चन्द्रशेखर ने 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के सामने पेश होकर मनमोहन सिंह को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा कि पीएम को उन्होंने बाजार मूल्य 35 हजार करोड़ रुपए पर स्पेक्ट्रम नीलामी की सलाह दी थी। प्रधानमंत्री ने इस सलाह की अनदेखी कर दी। चन्द्रशेखर ने खुलासा किया कि उन्होंने पीएम को पत्र लिखकर स्पेक्ट्रम के आवंटन को एंट्री फीस बाजार दर पर करने की सिफारिश की थी। यह सलाह मानी गई होती तो देश के खजाने को कई हजार करोड़ रुपए का मुनाफा होता। पूर्व कैबिनेट सचिव द्वारा सुझाई गई कीमत आवंटन की कीमत से करीब 21 गुना ज्यादा है। यही नहीं चन्द्रशेखर ने जेपीसी में यह भी कहा कि 2008 में स्पेक्ट्रम की नीलामी सुनिश्चित करने में विफलता के लिए पी. चिदम्बरम भी जिम्मेदार ठहराने वाले मार्च 2011 के विवादित नोट के पीछे तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की भूमिका थी। पीएमओ को वित्त मंत्रालय द्वारा भेजे गए नोट में कहा गया था कि आवंटन के वक्त वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम `पहले आओ पहले पाओ' की नीति की बजाय नीलामी की प्रक्रिया अपनाने पर जोर दे सकते थे। चन्द्रशेखर की लिखित सलाह को नजरअंदाज करने से देश को बहुत भारी नुकसान हुआ है। उनकी सलाह न मानने से सरकार के खजाने को 1.76,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। क्या प्रधानमंत्री और उस समय के वित्त मंत्री इसके लिए सीधे जिम्मेदार नहीं? कैबिनेट सचिव देश के नौकरशाहों में से सबसे वरिष्ठ माना जाता है। अगर वह ऐसा संगीन आरोप लगाए तो उसका देश जवाब चाहता है। केवल खंडन करने, सफाई देने से बात नहीं बनेगी। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को देश के सामने यह साबित करना होगा कि जो आरोप चन्द्रशेखर लगा रहे हैं वह गलत है और उलट है तो क्यों है। अपनी दलीलों को साबित करने के लिए उन्हें दस्तावेजी सबूत पेश करने होंगे। वैसे तो यह मामला अदालत में भी चल रहा है और अदालत श्री चन्द्रशेखर के बयान को गम्भीरता से लेगी और उचित कार्रवाई करेगी। इससे यह भी साबित हो जाता है कि जो आरोप विपक्ष प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री पर लगाता आया है वह सही हैं।

Saturday, 20 October 2012

राम सेतु राष्ट्रीय स्मारक बनाओ ः जयललिता


 Published on 20 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र
सुप्रीम कोर्ट ने विवादास्पद सेतु समुद्रम परियोजना पर दृष्टिकोण स्पष्ट करने के लिए सोमवार को केंद्र सरकार को छह सप्ताह का वक्त दिया है। इस परियोजना का उद्देश्य राम सेतु को काटते हुए भारत के दक्षिण छोर पर नौवाहन का एक नया मार्ग तैयार करना है। यह स्कीम डीएमके पार्टी व सरकार ने तैयार की थी जबकि सदियों से यह माना जा रहा है कि यह सेतु रामायण काल में राम की वानर सेना ने रावण की राजधानी लंका तक पहुंचने के लिए तैयार किया था। इस परियोजना के तहत समुद्र क्षेत्र में 167 किलोमीटर लम्बा, 30 मीटर चौड़ा और 12 मीटर गहरा नौवाहन रास्ता तैयार करना है। राम सेतु करोड़ों-अरबों लोगों की आस्था से जुड़ा है। दर्जनों याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि सेतु समुद्रम परियोजना पर यदि मौजूदा योजना के तहत अमल किया गया तो समुद्र में खुदाई के दौरान पौराणिक महत्व का राम सेतु नष्ट हो सकता है जो करोड़ों-अरबों रामभक्तों को कभी भी स्वीकार नहीं होगा। राम सेतु को किसी तरह का नुकसान पहुंचाए बगैर ही किसी अन्य वैकल्पिक मार्ग को अपनाकर परियोजना पूरी करने की सम्भावना तलाशने के शीर्ष अदालत के आग्रह पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उच्च स्तरीय समिति गठित की थी। प्रमुख पर्यावरणविद् आरके पचौरी की अध्यक्षता में गठित इस समिति ने विभिन्न मौसमों के दौरान तमाम पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अपनी रिपोर्ट में वैकल्पिक मार्ग की व्यावहारिकता पर सवाल उठाए थे। न्यायमूर्ति एमएल दत्तू और न्यायमूर्ति चन्द्रमौली कुमार प्रसाद की खंडपीठ ने सोमवार को केंद्र सरकार को अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने के लिए तीन दिसम्बर तक का समय दिया है। डीएमके सरकार का हिन्दू धर्म के प्रति दृष्टिकोण किसी से छिपा नहीं। पैसे की खातिर वह करोड़ों-अरबों लोगों की आस्था से भी खिलवाड़ करने को तैयार है पर खुशी की बात यह है कि मौजूदा अन्नाद्रमुक सरकार ने पिछली सरकार के उलट कहा है कि वह सेतु समुद्रम परियोजना को पूरी तरह निरस्त कर राम सेतु को राष्ट्रीय स्मारक बनाना चाहती है। राज्य की जयललिता सरकार ने अधिवक्ता गुरु कुमार के जरिए दाखिल शपथ पत्र में शीर्ष अदालत से आग्रह किया है कि अदालत इस पर जल्द फैसला ले। राज्य सरकार के इस रुख से केंद्र सरकार की परेशानी बढ़ गई है। यही वजह है कि उसने इसे फिलहाल टाल दिया है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा कि इन मामले में विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर फैसला नहीं लिया जा सका है। इसके लिए उसे और वक्त चाहिए। इस पर जस्टिस दत्तू की खंडपीठ ने सरकार को इस मामले में दिसम्बर तक का वक्त दे दिया। सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक विश्वास और आस्थाओं को देखते हुए 22 जुलाई 2008 को 2400 करोड़ रुपए की इस परियोजना पर स्टे लगा दिया था। सेतु समुद्रम का विरोध कर रहे याचिकाकर्ताओं ने समुद्री नहर के लिए एक वैकल्पिक रास्ता अलाइनेंट नम्बर 4ए सुझाया था जिस पर कोर्ट ने सरकार से कहा था कि वह इसकी उपयोगिता का अध्ययन करे। हम जयललिता के स्टैंड का तहे दिल से स्वागत करते हैं। राम सेतु राष्ट्रीय स्मारक बनाया जाए। जय श्रीराम।

अब चौटाला ने लगाए राहुल गांधी पर स्टाम्प ड्यूटी चोरी के आरोप


 Published on 20 October, 2012
अनिल नरेन्द्र
आरोपों-प्रत्यारोपों का ऐसा दौर चल पड़ा है कि हर रोज कोई न कोई नया आरोप-घोटाले का पर्दाफाश कर रहा है। सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा का डीएलएफ जमीनों की खरीद-फरोख्त का मामला अभी  थमा नहीं कि हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री व इंडियन नेशनल लोक दल प्रमुख ओम प्रकाश चौटाला ने बुधवार को कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को भी लपेट लिया। इनेलो प्रमुख ने आरोप लगाया है कि हरियाणा के पलवल जिले के हसनपुर में राहुल से जमीन की रजिस्ट्री में राज्य सरकार ने काफी कम राजस्व लिया, वहीं उन्होंने खरीद-फरोख्त में ब्लैक मनी इस्तेमाल की। चौटाला ने जालंधर में राहुल गांधी के नाम पर खरीदी गई जमीन की रजिस्ट्री के कागजात दिखाते हुए कहा कि उनके नाम पर 51 कनाल 13 मरला जमीन गांव मौजा हसनपुर, तहसील होडल, जिला फरीदाबाद (अब पलवल) में खरीदी गई है। जमीन को एचएल पाहवा पुत्र शेर सिंह पाहवा, निवासी डीएलएफ गुड़गांव ने बेचा है। तीन मार्च 2008 को पाहवा ने राहुल को जिस समय जमीन बेची उस समय उसका कलेक्टर रेट 8 लाख रुपए प्रति एकड़ था, लेकिन स्टाम्प ड्यूटी डेढ़ लाख रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से जमा की गई। जमीन की रजिस्ट्री में गवाही ललित नागर ने डाली थी, जिसको कांग्रेस ने विधानसभा का टिकट दिया। इनेलो प्रमुख ने आरोप लगाया कि एक ही दिन रॉबर्ट वाड्रा और राहुल की जमीनों की रजिस्ट्रियां की गईं और दोनों में डेढ़ लाख रुपए प्रति एकड़ राजस्व लिया गया। श्री ओम प्रकाश चौटाला ने रॉबर्ट वाड्रा पर भी कई आरोप लगाए हैं। रॉबर्ट वाड्रा को गुड़गांव, मानेसर, फरीदाबाद, मेवात, पलवल में कौड़ियों के भाव जमीन दी गई जिसमें अरबों का घोटाला हुआ है। 7.50 करोड़ में खरीदी जमीन वाड्रा की कम्पनी मैसर्स रियल अर्थ एस्टेट ने 58 करोड़ में डीएलएफ को बेची, 50 करोड़ एडवांस लिए। रॉबर्ट की कम्पनी ने मई 2009 में मेवात जिले के गांव शकरपुरी में छह अलग-अलग रजिस्ट्रियां करवाकर 29 एकड़ जमीन खरीदी, बाजार में भाव 14 करोड़ और कलेक्टर रेट साढ़े चार करोड़ रुपए से अधिक था। यह रजिस्ट्रियां 71 लाख रुपए के हिसाब से करवाई गईं। उस समय शकरपुरी में कलेक्टर रेट 16 लाख रुपए प्रति एकड़ और बाजार का भाव 40-50 लाख रुपए प्रति एकड़ था। यह रजिस्ट्रियां ढाई लाख रुपए प्रति एकड़ से भी कम रेट पर करवाई गईं। यह रजिस्ट्रियां रॉबर्ट वाड्रा के नाम पर आफताब अहमद के परिवार द्वारा कराई  गईं जो नूंह विधानसभा सीट से कांग्रेस के विधायक हैं। सरकार द्वारा पुनर्वास योजना के तहत अलाट की गई दलितों की जमीनों की रजिस्ट्रियां भी वाड्रा की कम्पनी के नाम पर की गईं। यह गैर-कानूनी है। अलाट जमीन बिक नहीं सकती। कांग्रेस ने चौटाला के आरोपों का खंडन किया है। कांग्रेस के प्रवक्ता राशिद अल्वी ने कहा कि राहुल गांधी के खिलाफ चौटाला द्वारा लगाए गए आरोप पूरी तरह से आधारहीन हैं। चौटाला को अन्य लोगों के खिलाफ आरोप लगाने से पहले स्वयं और अपने बेटों के बारे में विचार करना चाहिए, खुद राहुल गांधी ने आरोपों को निराधार व अपमानजनक बताया। उन्होंने कहा कि पलवल में खरीदी जमीन की स्टाम्प ड्यूटी का भुगतान किया गया और चौटाला के आरोप गलत हैं। 

Friday, 19 October 2012

बौखलाए सलमान खुर्शीद ने सारी हदें लांघीं


 Published on 19 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र

यकीन नहीं हो रहा कि केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद इतने बौखला गए हैं कि वह सारी मर्यादाएं, सीमाएं भूल गए हैं। विकलांगों के नाम पर मिली सरकारी रकम की धांधली के आरोप में फंसे सलमान खुर्शीद झल्लाहट में राजनीतिक मर्यादा भी भूल गए। फर्रुखाबाद में सलमान के खिलाफ प्रदर्शन का ऐलान कर चुके अरविन्द केजरीवाल को उन्होंने वहां से लौटकर न आ पाने की धमकी तक दे डाली। खुर्शीद ने मंगलवार की रात एक निजी समारोह में यह बयान कैमरे के सामने दिया इसलिए अब वह यह भी नहीं कह सकते कि मेरा बयान मीडिया ने तोड़मरोड़ कर पेश किया है। इस समारोह की फुटेज कुछ खबरिया चैनलों ने प्रसारित की। इसमें उन्होंने दो कदम आगे बढ़कर कहा कि मुझे कानून मंत्री बनाया गया है और कलम के साथ काम करने को कहा गया है। मैं कलम से काम करूंगा। लेकिन लहू से भी काम करूंगा। केजरीवाल ने एक नवम्बर से फर्रुखाबाद में धरना देने की चेतावनी दी है। उनकी इस घोषणा का जिक्र करते हुए सलमान खुर्शीद ने कहा कि वे फर्रुखाबाद जाएं। लेकिन वे फर्रुखाबाद से लौटकर भी आएं। खुर्शीद ने जब यह धमकी दी तो उस समय कार्यक्रम में उनकी पत्नी लुईस भी मौजूद थीं। कानून मंत्री ने कहा कि वे (केजरीवाल) सवाल पूछेंगे और आपको जवाब देने होंगे। हम कहते हैं कि आप जवाब सुनें सवाल पूछने के बारे में भूल जाएं। केजरीवाल ने मंत्री के इस बयान को अपने लिए जान का खतरा बताया है। केजरीवाल ने कहा कि सलमान खुर्शीद ने मुझे धमकी दी है। उन्होंने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया है वह देश के कानून मंत्री को शोभा नहीं देता। उन्होंने कहा कि मुझे मारने से कुछ नहीं होगा क्योंकि देश जाग गया है। अगर एक अरविन्द मारा जाता है तो 100 अरविन्द और खड़े होंगे। इस तरह से धमकाने के बजाय बेहतर होगा कि कांग्रेस लोगों के गुस्से को महसूस करे और भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ और कदम उठाए। श्री सलमान खुर्शीद ने चूंकि कैमरे के सामने यह धमकी दी है तो यह एक अपराध है और इसमें उनके खिलाफ धमकी देने का मुकदमा दर्ज हो सकता है। अगर कोई व्यक्ति अदालत का दरवाजा खटखटाता है तो निश्चित रूप से सलमान बच नहीं सकते और चूंकि वह एक केंद्रीय मंत्री हैं इसलिए यह अपराध और भी संगीन हो जाता है। खुर्शीद जितना बचने का प्रयास कर रहे हैं उससे कहीं ज्यादा अपने इस दल-दल में फंसते जा रहे हैं। दरअसल अब वे कांग्रेस पार्टी और मनमोहन सिंह सरकार के लिए एक बोझ बन गए हैं, एक लाइबिलिटी बन गए हैं। बेहतर है कि जब तक मामले की जांच पूरी नहीं होती  तब तक सलमान खुर्शीद को मंत्री पद से त्याग पत्र दे देना चाहिए और अगर वह ऐसा करते हैं तो पार्टी और सरकार दोनों का भला ही करेंगे।

केजरीवाल ने नितिन गडकरी को खड़ा किया कठघरे में


 Published on 19 October, 2012
 अनिल नरेन्द्र
 सत्तारूढ़ कांग्रेस के मंत्रियों और सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा को निशाना बनाने के बाद मुख्य विपक्षी दल भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी पर हमला करते हुए बुधवार को अरविन्द केजरीवाल ने मुख्य रूप से गडकरी पर तीन-चार आरोप लगाए। गडकरी ने किसानों की 100 एकड़ से अधिक जमीन निजी फायदे के लिए हथिया ली। गडकरी के पास पांच पॉवर प्लांट, तीन शुगर मिल सहित कोल, खाद, सुपर बाजार से जुड़े कई व्यापार हैं। अपने व्यापारिक हितों के लिए वह  भाजपा का इस्तेमाल कर रहे हैं। गडकरी ने ठेकेदारों की गलत तरीके से मदद के लिए अजीत पवार से लेकर केंद्रीय मंत्री पवन कुमार बंसल तक से सिफारिश करवाई। अजीत पवार से साठगांठ करके 100 एकड़ जमीन अपने ट्रस्ट के नाम करवा ली। बेशक श्री नितिन गडकरी ने केजरीवाल के आरोपों का प्वाइंट-दर-प्वाइंट जवाब दिया और बाद में सुषमा स्वराज और अरुण जेटली ने केजरीवाल के आरोपों को हवा में उड़ाने का प्रयास किया पर इससे गडकरी पाक-साफ साबित नहीं होते। यह तो गडकरी भी मानते हैं कि उन्हें 100 एकड़ जमीन अजीत पवार ने दी। यह जमीन कैसी है, कितने वर्षों के लिए लीज पर है, इसमें क्या उग रहा है, उसका क्या हो रहा है वह सब अपनी जगह ठीक है पर इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि एनसीपी नेता अजीत पवार ने सारे कानूनों को ताक पर रखकर गडकरी के संगठन को जमीन दी। केजरीवाल ने दरअसल भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ कांग्रेस को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। क्योंकि जो आरोप गडकरी पर फायदा लेने के हैं वही आरोप कांग्रेस और उसके सहयोगी राकांपा पर फायदा पहुंचाने के लिए स्वत आ जाते हैं। हालांकि कांग्रेस का कहना है कि अजीत पवार इस मामले में पहले ही अपना इस्तीफा दे चुके हैं और अब बारी नितिन गडकरी की होनी चाहिए। कल तक जिस केजरीवाल के सहारे भाजपा कांग्रेस को भ्रष्टाचार के नाम पर नंगा कर रही थी आज उसी केजरीवाल ने भाजपा को कठघरे में खड़ा कर दिया है। केजरीवाल द्वारा गडकरी पर लगाए गए आरोपों से जनता में यह संदेश जाता है कि दोनों राष्ट्रीय पार्टियां भ्रष्टाचार के दल-दल में खड़ीं होकर ही एक-दूसरे पर लांछन लगा रही हैं। केजरीवाल ने दोनों पार्टियों को जिस प्रकार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता की अदालत में खड़ा किया है उससे यह बात तो साफ हो गई है कि कहीं न कहीं दोनों राष्ट्रीय पार्टियों में भ्रष्टाचार को लेकर गठजोड़ साफ दिखाई पड़ता है। यदि अब जांच गडकरी की होगी तो कांग्रेस और उसकी सहयोगी राकांपा भी इसके दायरे से अछूती नहीं रहेंगी। एक और बात केजरीवाल कुछ हद तक साबित करने में सफल रहे वह यह है कि नितिन गडकरी अगर एक उद्योगपति की श्रेणी में नहीं भी आते तो एक बड़े बिजनेसमैन जरूर हैं जिनकी अपनी शुगर मिले हैं। पॉवर प्लांट हैं और कई धंधे हैं और एक बिजनेसमैन का निजी स्वार्थ कभी-कभी पार्टी के हितों से समझौता करने पर मजबूर कर देता है। अरविन्द केजरीवाल के आरोप पूरी तरह सही हैं यह कहना मुश्किल है लेकिन गडकरी पर लगाए गए आरोप जिस तरीके से पेश किए गए उससे आम जनता के मन में संदेह गहराना स्वाभाविक है कि कुछ तो गड़बड़ है। आम जनता को कुछ ऐसा ही संदेह रॉबर्ट वाड्रा और सलमान खुर्शीद के मामलों को लेकर भी है। सवाल यह है कि इस संदेह का निवारण कैसे हो? जांच से? मुश्किल यह है कि आरोपों के घेरे में खड़े लोग केवल सफाई पेश कर और कुछ तथाकथित प्रमाण पेश कर खुद को पाक-साफ करार दे रहे हैं। आरोपों को सिरे से नकारने अथवा आरोप लगाने वालों की नीयत पर सवाल उठाने या फिर सलमान खुर्शीद की तरह उन्हें धमकाने से तो चोर की दाढ़ी में तिनके वाली कहावत ही चरितार्थ हो रही है। भाजपा नेता बेशक हर सम्भव सफाई दें पर इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि अध्यक्ष नितिन गडकरी की छवि को धक्का लगा है। भाजपा जब कांग्रेसी नेताओं पर इस प्रकार के आरोप लगाकर उनके इस्तीफे की मांग करती है तो आज अगर कांग्रेस गडकरी के इस्तीफे की मांग करती है तो उसमें गलत क्या होगा? एक और बात केजरीवाल के आरोपों से भाजपा के अन्दर चल रही अस्तित्व की लड़ाई को भी हवा मिलेगी। वैसे तो नितिन गडकरी को भाजपा अध्यक्ष का दूसरा कार्यकाल मिलना लगभग तय है लेकिन एक वर्ग ऐसा भी है जो नहीं चाहता कि गडकरी दोबारा अध्यक्ष बनें। केजरीवाल के आरोपों के खिलाफ भले ही पूरी पार्टी गडकरी के पक्ष में खड़ी नजर आ रही हो पर अन्दरखाते भाजपा का एक वर्ग खुश है। भाजपा संघ के आगे मजबूर है पर अब सम्भव है कि भाजपा के अन्दर गडकरी का दोबारा टर्म मिलने पर खुलकर विरोध हो।