Sunday, 30 September 2012

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सरकार को राहत पर दायित्व से मुक्ति नहीं


 Published on 30 September, 2012
 अनिल नरेन्द्र
 सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को बड़ी राहत दी है। निश्चित रूप से राष्ट्रपति की ओर से भेजे गए सन्दर्भ-पत्र पर सुप्रीम कोर्ट की राय से सरकार ने राहत की सांस ली होगी। कोर्ट ने कहा है कि सभी प्राकृतिक सम्पदाओं के बंटवारे के लिए नीलामी जरूरी नहीं है। कोर्ट का आदेश सिर्प 2जी स्पेक्ट्रम तक सीमित रहेगा। इसके साथ ही अदालत ने माना कि प्राकृतिक संसाधनों का बंटवारा नीतिगत मामला है और कोर्ट को इसमें दखल से तब तक बचना चाहिए जब तक इसमें लूट या घपले की आशंका नहीं हो। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में 2जी स्पेक्ट्रम  के 122 लाइसेंस रद्द करने के मामले पर प्रेसिडेंशियल रेफरेंस (पीआर) दाखिल की थी। अदालत के फैसले से एक दुविधा तो जरूर होगी कि प्राकृतिक संसाधनों को निजी हितों के हवाले करने का रूप क्या हो, जनहित में इसे तय करने का अधिकार सिर्प कार्यपालिका को है। आर्थिक उदारीकरण को गति देने वाले प्रस्तावित फैसलों के सन्दर्भ में भी इसका महत्व है। हालांकि राष्ट्रपति के रेफरेंस पर संविधान पीठ के व्यक्त विचार अदालती फैसलों में बाध्यकारी नहीं हैं लेकिन किसी मामले पर गौर करते वक्त वह इससे नजरिया तो ले ही सकती है। दरअसल सुप्रीम कोर्ट के ही एक फैसले के कारण पिछले कुछ महीनों से ऐसा माना जाने लगा था कि अदालत या सीएजी या कोई भी संवैधानिक संस्था सरकार के कामकाज को ही नहीं, उसकी नीतियों को भी कठघरे में खड़ा कर सकती है। बीती फरवरी में 2जी स्पेक्ट्रम मामले में सुनाए गए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने `पहले आओ, पहले पाओ' के आधार पर जारी किए 122 टेलीकॉम लाइसेंस रद्द कर दिए थे। लेकिन ऐसा करते हुए उसने यह भी कहा था कि सरकार द्वारा किसी भी प्राकृतिक संसाधन को निजी हाथों में बेचने का एकमात्र कानूनी और संवैधानिक तरीका पारदर्शी तरीके से उसकी नीलामी का ही हो सकता है। इसके कुछ दिन बाद सीएजी ने कोयला खदानों के आवंटन को लेकर जारी अपनी रिपोर्ट में यह टिप्पणी की थी कि इनकी नीलामी न किए जाने से सरकारी खजाने को एक लाख 86 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। अब केंद्र के कई मंत्री उच्चतम न्यायालय के ताजा फैसले का हवाला देकर कैग को नसीहत देने में जुट गए हैं। मानो नीलामी का तरीका नहीं अपनाया गया तो बाकी जो कुछ हुआ वह सब ठीक था और उस पर अंगुली नहीं उठाई जा सकती जबकि सुप्रीम कोर्ट ने सिर्प संवैधानिक स्थिति स्पष्ट की है। अदालत ने साफ कहा है कि आवंटन हर हाल में पारदर्शी होना चाहिए। अगर आवंटन का तरीका मनमाना, स्वेच्छाचारी और गलत है तो अदालत उसकी समीक्षा कर सकती है। इसलिए सरकार को जवाबदेही से सर्वथा मुक्ति नहीं मिली है। उसे अपने फैसलों की युक्तिसंगतता साबित करने के लिए हमेशा तैयार रहना होगा। कभी भी उन्हें चुनौती दी जा सकती है और न्यायिक विवेचना के दायरे में लाया जा सकता है। साथ-साथ यह जरूर है कि पारदर्शिता न बरते जाने की हर शिकायत की अदालत में समीक्षा हो सके, यह व्यावहारिक नहीं जान पड़ता। उच्चतम न्यायालय के ताजा फैसले ने मनमानी के  लिए एक गली छोड़ दी है। बेहतर होता कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे आवंटनों के लिए एक व्यापक नीति बनाने और विधायिका से उसकी मंजूरी लेने की हिदायत दी होती।

खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश से हमारा छोटा किसान तबाह हो जाएगा


 Published on 30 September, 2012
 अनिल नरेन्द्र
मनमोहन सिंह सरकार ने खुदरा व्यापार में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी व्यापार के लाभों के पीछे एक बड़ा कारण यह बताया कि इससे हमारे किसानों को लाभ होगा। मैंने श्री इंडिया एफडीआई वाम के निदेशक श्री धर्मेन्द्र कुमार का इस विषय पर एक लेख पड़ा। उन्होंने बताया कि दुनिया के कुछ देशों में जहां यह एफडीआई लागू की जा चुकी है उनके किसानों का क्या अनुभव रहा है। दावा किया जा रहा है कि इससे उपभोक्ताओं को ही नहीं, किसानों को भी फायदा होगा जबकि ऐसे कई अध्ययन मौजूद हैं जिससे यह साबित होता है कि खेती के निगमीकरण से किसानों को नुकसान ही हुआ है। अध्ययन बताते हैं कि निगमीकृत आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बनकर किसानों को उचित मूल्य हासिल करने के लिए जूझना ही पड़ता है, उन्हें जीवन-यापन की परेशानी भी झेलनी पड़ती है। मैक्सिको  में वाइल्स, ब्रेहम, इन्नोको, कैंडिल जैसे अध्ययनकर्ताओं ने पाया कि खाद्य आपूर्ति श्रृंखला के बदलाव से छोटे किसानों को आमतौर पर कोई फायदा नहीं हुआ। अपने देश में भी रिटेल सेक्टर में पहले से मौजूद औद्योगिक घराने सिर्प बड़े किसानों से ही माल खरीदते हैं। छोटे किसान इनकी खरीद व्यवस्था से बाहर ही हैं। हमारे देश में 78 प्रतिशत किसान छोटी जोत के हैं, जिनके पास दो हेक्टेयर से भी कम जमीन है। देश की कुल खेतिहर जमीन का 33 फीसद हिस्सा ही इन छोटे किसानों के पास है जबकि देश का 90 फीसद से ज्यादा खाद्य उत्पादन यही लोग करते हैं। कृषि का निगमीकरण छोटे किसानों के लिए हानिकारक हो सकता है। एक कटु सत्य यह भी है कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों की हिस्सेदारी में लगातार गिरावट आ रही है। पिछले पांच वर्षों में यह आंकड़ा घटकर 14 फीसदी रह गया है। भारत को कौन खिलाता है? इसका जवाब भारत के छोटे किसानों के पास ही हो सकता है पर लगता है कि इन किसानों की किस्मत का फैसला सरकार ने वॉलमार्ट जैसी कम्पनियों के सुपुर्द कर दिया है। रिटेल में एफडीआई से खेतिहर मजदूरों के हालात में भी सुधार की गुंजाइश नहीं है। एक अध्ययन के मुताबिक वॉलमार्ट की वजह से मैक्सिको में खेतिहर मजदूरों की संख्या में गिरावट हुई है। जिन इलाकों में कारपोरेट रिटेल संचालित होते हैं, वहां रोजगार और मजदूरी पर दुप्रभाव से गरीबी बढ़ी है। अमेरिका में जहां-जहां वॉलमार्ट है, वहां गरीबी बढ़ी है। एक सच्चाई यह भी है कि सुपर मार्केट आपसी प्रतिस्पर्धा से बचते हैं। इसका खामियाजा किसानों को ही भुगतना पड़ता है, क्योंकि सुपर मार्केट उन्हें कम कीमत पर माल बेचने के लिए विवश करता है। घाना के कोकोआ उत्पादक किसानों को रिटेल मूल्य का चार फीसदी से भी कम मूल्य मिलता है। वहां रिटेल मार्जिन 34 फीसदी से ऊपर है। बेशक हमारे देश में किसानों को मिलने वाले मूल्य एवं रिटेल मूल्य के अन्तर को कम किया जाना चाहिए लेकिन इसका उपाय खुदरा में विदेशी निवेश नहीं है। दूध में अमूल जैसा सफल सहकारी प्रयोग हो सकता है, तो खाद्य उत्पादों में क्यों नहीं? कारपोरेट रिटेल के बजाय मार्केटिंग को-ऑपरेटिव को भी दुरुस्त किया जा सकता है। सरकार का एक तर्प यह है कि खाद्य आपूर्ति श्रृंखला के निगमीकरण से बिचौलिए समाप्त हो जाएंगे जबकि सच्चाई यह है कि लाखों छोटे बिचौलियों की जगह  बड़ी-बड़ी कम्पनियां ले लेंगी। खाद्य प्रसंस्करण, खाद्य सुरक्षा, खाद्य मानक, पैकेजिंग, लेबलिंग, वितरण करने वाली बड़ी कम्पनियां बतौर सलाहकार नए बिचौलिए बनकर उभरेंगी, जिसके पास मोल-भाव की जबरदस्त ताकत होगी। भारत तमाम तरह के मुक्त व्यापार समझौते कर रहा है, जिससे प्रसंस्कृत और अप्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के आयात पर लगने वाले शुल्क खत्म हो जाएंगे। अमेरिका और यूरोप की रियायती खाद्य सामग्री हमारे बाजारों में भी आएगी। इससे किसानों से उनका बाजार छिन जाएगा। जाहिर है, खुदरा क्षेत्र में एफडीआई जैसे फैसले को छोटे किसानों के पक्ष में मोड़ने के लिए तमाम तरह के नियम-कायदों की जरूरत होगी, क्योंकि बेलगाम कम्पनियां खेती और खुदरा बाजार में तबाही मचा सकती हैं।

Saturday, 29 September 2012

राजधानी में भी पैदा हुई नक्सली समस्या


 Published on 29 September, 2012
 अनिल नरेन्द्र
राजधानी में अवैध बांग्लादेशियों की बाढ़ पहले से ही नाक में दम किए हुई है और अब नक्सली संगठनों की सक्रियता किसी अशुभ संकेत से कम नहीं है। पुलिस की मानें तो उपचार कराने व छिपने के मकसद से नक्सली राजधानी का रुख तो कर ही रहे हैं बल्कि अपनी गतिविधियों के लिए धन व अन्य संसाधन जुटाने, आम सभाएं करने हेतु भी यहां सक्रिय हो रहे हैं। यह बेहद चिन्ताजनक है। हाल ही में गृह मंत्रालय ने माना था कि राजधानी के सात जिलों, नई दिल्ली जिला, मध्य जिला, दक्षिण जिला, दक्षिण-पश्चिमी, उत्तरी, उत्तर-पूर्व और उत्तर-पश्चिम जिलों में नक्सली गतिविधियों में वृद्धि हुई है। नक्सलियों की धरपकड़ में एक बड़ी समस्या उनकी पहचान को लेकर है। कई ऐसे इलाके हैं, जहां पर पूर्वोत्तर के लोग बड़ी तादाद में रहते हैं। इनके बीच प्रतिबंधित संगठनों का कौन-सा सदस्य मौजूद है, पता लगाना बेहद मुश्किल है। एक अधिकारी तो यहां तक कहते हैं कि स्थिति काफी विस्फोटक है। देश के तमाम राज्यों में सक्रिय नक्सली संगठन राजधानी को सुरक्षित ठिकाने के तौर पर प्रयोग में ला रहे हैं। बड़े पैमाने पर नक्सली यहां मौजूद हैं। जहां तक गिरफ्तारी की बात है तो अधिकतर वही लोग पकड़े जाते हैं जिनके बारे में संबंधित राज्यों की पुलिस या खुफिया एजेंसियों से सूचना मिलती है। हर नक्सली के विषय में संबंधित एजेंसियों को जानकारी हो, यह भी सम्भव नहीं है। गत वर्ष राजधानी में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के विदेश मामलों के प्रमुख एन. दिलीप सिंह उर्प बाम्बा की गिरफ्तारी से तमाम चौंकाने वाले खुलासे हुए थे। यह नक्सली संगठन न सिर्प देश के तमाम नक्सली संगठनों को एक मंच पर लाने की मुहिम में जुटा था बल्कि भारत सरकार के साथ मुकाबला करने के लिए जम्मू-कश्मीर के आतंकी संगठनों से हाथ मिलाने के मंसूबे भी पाल रहा था। खुलासा हुआ कि झारखंड में सीपीआई माओइस्ट के सदस्यों को इस ग्रुप ने हथियारों की ट्रेनिंग भी दी थी। एन. दिलीप सिंह के तार म्यांमार तक फैले थे। स्पेशल सेल ने नौ नक्सलियों को पकड़ा था। इनमें कांगलेईपारु कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों का इरादा राजधानी में ड्रग्स की खेप मणिपुर ले जाकर उसे म्यांमार के रास्ते हांगकांग व चीन भेजकर सरकार विरोधी गतिविधियों के लिए धन जुटाना था। इनके कब्जे से पुलिस ने करीब 1200 किलोग्राम एफेड्रिन नामक ड्रग्स की बरामदगी की थी। कटवारिया सराय से छत्तीसगढ़ की नक्सली महिला सोनी की गिरफ्तारी से सामने आया था कि किस प्रकार पुलिस का दबाव बढ़ने पर नक्सली छिपने के लिए राजधानी आ रहे हैं। दिल्ली पुलिस इस समस्या से जागरूक है। खुफिया एजेंसियों के साथ निरन्तर नक्सलियों से संबंधित सूचनाओं का आदान-प्रदान हो रहा है। स्पेशल सेल भी इस दिशा में सजग है। ऐसे सभी इलाकों पर पुलिस की पैनी नजर है जहां नक्सलियों के शरण लेने का शक है। दिल्ली पुलिस को अभी तक अवैध बांग्लादेशियों की गतिविधियों पर पैनी नजर रखनी पड़ती थी अब यह नक्सली नई समस्या खड़ी होती जा रही है और यह नक्सली तो खालिस हिंसा में विश्वास करते हैं इसलिए यह और भी ज्यादा खतरनाक हैं।

सरकार ने बाबा रामदेव पर चौतरफा हमला बोल दिया है


 Published on 29 September, 2012
अनिल नरेन्द्र
योग गुरू बाबा रामदेव को सरकार हर तरफ से घेरने में जुट गई है। सरकार ने बाबा के खिलाफ एक साथ कई मोर्चे खोल दिए हैं। आचार्य बालकृष्ण पर पासपोर्ट केस में गलतबयानी करने का केस तो चल ही रहा है। इसके बाद बाबा की विदेशी सम्पत्ति का मामला उठाया गया। बाबा को विदेशी मुद्रा प्रबंधन कानून (फेमा) के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 24 अगस्त को दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट  में 26 लाख रुपए की विदेशी मुद्रा के अवैध लेन-देन के आरोप में कारण बताओ नोटिस जारी किया। दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट के खिलाफ 26 लाख के अलावा पतंजलि आयुर्वेद लि. के खिलाफ 34 लाख रुपए के फेमा उल्लंघन का नोटिस भी जारी किया गया है। उत्तराखंड सरकार ने भी बाबा पर शिकंजा कसते हुए पतंजलि आयुर्वेद में रामदेव के निकट सहयोगी बालकृष्ण (ट्रस्टी) को झारखंड मेगा फूड में लगभग साढ़े चार करोड़ रुपए के फेमा उल्लंघन के मामले में भी कारण बताओ नोटिस जारी कर रखा है। पिछले कुछ दिनों से खाद्य विभाग भी बाबा के खिलाफ सक्रिय हो गया है। 16 अगस्त को दादू बाग कनखल स्थित दिव्य योग मंदिर में खाद्य विभाग की टीम पहुंची। नगर निगम क्षेत्र के फूड सेफ्टी अफसर के नेतृत्व में टीम ने आरोग्य सरसों के तेल, बेसन, नमक, काली मिर्च, जैम और शहद के चार-चार सैम्पल भरे। सील किए गए नमूनों को जांच के लिए रुद्रपुर स्थित विभाग की लैब में भेजा। लैब से आई रिपोर्ट में कहा गया है कि बाबा रामदेव की कम्पनी द्वारा निर्मित प्रॉडक्टों में जनता के साथ सीधा धोखा किया जा रहा है। सैम्पल फेल हो गए हैं। बाबा सामान कहीं और बनवा रहे हैं और अपना लेवल लगाकर शुद्धता की गारंटी देते हुए बेच रहे हैं। जिलाधिकारी हरिद्वार सचिन कुर्बे के मुताबिक बाबा की फैक्ट्री को नोटिस जारी कर दिया गया है। अगर बाबा की कम्पनी चाहेगी तो सेंट्रल लैब जो पुणे में है से भी परीक्षण कराया जाएगा। पुणे से भी अगर राज्य लैब की रिपोर्ट की पुष्टि होती है तो बाबा की कम्पनी के विरुद्ध धारा 53 के तहत मुकदमा दर्ज किया जाएगा। खबर तो यह भी आ रही है कि बाबा रामदेव के किराना उत्पादों में मिस-ब्रांडिंग व मिस-लीडिंग के लपेटे में उनका उत्पाद करने वाली मूल कम्पनियां आ गई हैं। बाबा के तीन प्रतिष्ठानों सहित कुल 15 कम्पनियों को नोटिस जारी किए जाएंगे। उधर चौतरफा हमले झेल रहे बाबा रामदेव ने खाद्य विभाग की पतंजलि आयुर्वेद लि. के छह उत्पादों पर आई जांच रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने विभाग पर बिना तथ्य और प्रमाण के पतंजलि उत्पादों और खुद की साख को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाते हुए कानूनी नोटिस भेजने की बात कही। बाबा ने आरोप लगाया कि यह काम दिल्ली स्थित कांग्रेस के मुख्यालय के इशारे पर किया गया। ऐसा दो अक्तूबर से एफडीआई के विरोध में देशभर में शुरू होने जा रहे स्वदेशी आंदोलन को रोकने की नीयत से किया गया। वर्ष 2011 के जिस एक्ट के तहत खाद्य विभाग ने पतंजलि उत्पादों की मिस-ब्रांडिंग और मिस-लीडिंग का आरोप लगाया है, उसी एक्ट में फरवरी 2013 तक कम्पनियों को अपने उत्पादों की नए एक्ट के तहत लेवलिंग करने का मौका दिया गया है। ऐसे में समय से पहले पतंजलि के उत्पादों पर इस तरह का आरोप लगाना कानूनन गलत है। बाबा रामदेव बुधवार शाम पतंजलि योग पीठ में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि बिना तथ्य और प्रमाण के इस तरह झूठे और बेबुनियाद आरोप लगा हमें और हमारे संस्थानों को बदनाम करने की साजिश की जा रही है। बाबा के अनुसार उनके ट्रस्ट द्वारा उत्पादित सभी उत्पाद शुद्ध एवं मिलावटहीन हैं। जिन वस्तुओं के नमूने फेल हुए उनमें आरोग्य बेसन, आरोग्य कच्ची घानी सरसों का तेल, नमक, काली मिर्च, लीची शुद्ध हनी, पाइन एपल जैम में खामी पाई गई है। यह सभी उत्पाद पतंजलि द्वारा बेचे जा रहे हैं। लेकिन इनका उत्पाद पतंजलि द्वारा न करके इसमें से सरसों के तेल का उत्पाद आर एण्ड जे ऑयल एण्ड डेट प्राइवेट लिमिटेड झोरवाड़ा जयपुर राजस्थान से तैयार कराया गया। इस पर आरोग्य लिखकर पतंजलि द्वारा अपना-अपना पतंजलि फूड पार्प का लेवल लगाकर बेचा जा रहा है। काली मिर्च के पैकेट में तो न्यूट्रिगनल वेल्यू का भी विवरण दर्ज नहीं है। नमक जिसको पतंजलि द्वारा मार्केट किया जा रहा है वह कच्छ गुजरात की एक अंकुर नामक कम्पनी द्वारा बेचा जा रहा है। शुद्ध शहद के नाम पर लीची के शहद को बेचा जा रहा है जिसमें शहद मात्र 5 प्रतिशत बताया जा रहा है। सरकार ने बाबा रामदेव पर चौतरफा हमला कर दिया है, अब देखना यह है कि इन आरोपों में कोई सच्चाई भी है या यह खालिस बदले की कार्रवाई है?



Friday, 28 September 2012

भतीजे अजीत ने चाचा शरद के साथ-साथ कांग्रेस की मुसीबतें बढ़ा दी हैं



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published From Delhi

   Published on 28 September, 2012   

 अनिल नरेन्द्र

 केंद्र में `ऑल इज वेल' के अन्दाज में दिखने का प्रयास कर रही कांग्रेस को महाराष्ट्र के सियासी घटनाक्रम ने फिर झकझोर दिया है। कांग्रेस-राकांपा की साझी सरकार में एक बड़ी दरार पड़ गई है। राकांपा के वरिष्ठ नेता और सूबे के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। अजीत पवार एनसीपी सुप्रीमो और केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के भतीजे हैं। अजीत पवार के इस्तीफे के दबाव के चलते चाचा शरद पवार को भी अपने गृह राज्य में कड़ी चुनौती मिलने लगी है। अजीत के इस्तीफा देने के महज 15 मिनट बाद उनके समर्थन में पार्टी के 20 अन्य मंत्रियों ने भी इस्तीफे की पेशकश कर दी। आखिरकार मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को सफाई देने के लिए आना पड़ा। उन्होंने कहा कि अजीत का इस्तीफा मिला है। लेकिन फैसला आलाकमान से बातचीत के बाद किया जाएगा। अजीत पवार पर करीब 60 हजार करोड़ रुपए के सिंचाई घोटाले में शामिल होने का आरोप है। वे 1999 से 2009 तक महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री रहे। अजीत ने जनवरी से अगस्त 2009 के बीच 38 सिंचाई परियोजनाओं को मंजूरी दी। 17,700 करोड़ रुपए के 32 प्रोजेक्ट तीन माह में पास किए गए। जल संसाधन विभाग के मुख्य इंजीनियर विजय पांढरे ने महाराष्ट्र के राज्यपाल को एक पत्र लिखा था। इसमें सिंचाई परियोजनाओं में करीब 60 हजार करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप लगाया गया था। अधूरी सिंचाई परियोजनाओं के बारे में मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने सवाल उठाया था। उन्होंने कहा कि 20 वर्षों में महाराष्ट्र की विभिन्न सिंचाई परियोजनाओं पर करीब 70 हजार करोड़ रुपए खर्च किए गए। लेकिन सिंचाई क्षमता में 0.1 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। अजीत पवार ने इन आरोपों का खंडन किया है। महाराष्ट्र विधानसभा में कुल 288 सीटें हैं। इनमें 82 विधायक कांग्रेस के हैं और 62 विधायक एनसीपी के हैं। भाजपा-शिवसेना के 47 और 45 विधायक हैं और मनसे के 12 व 10 अन्य हैं। पिछले कई दिनों से महाराष्ट्र में कांग्रेस और गठबंधन पार्टनर एनसीपी में तनाव चल रहा है। दूसरी तरफ भतीजे अजीत अपनी पार्टी के प्रमुख चाचा शरद पवार के रवैये से भी खुश नहीं हैं। वे चाहते हैं कि शरद पवार की राजनीतिक विरासत उन्हें मिले। लेकिन शरद पवार अपनी सांसद बेटी सुप्रिया सुले को लगातार प्रमोट कर रहे हैं। सुप्रिया इन दिनों महाराष्ट्र में एक राजनीतिक अभियान भी चला रही हैं। यह बात भी अजीत पवार को हजम नहीं हो रही। एनसीपी सूत्रों के अनुसार इस मौके पर भतीजे ने एक तीर से कई शिकार करने का प्रयास किया है। वे कांग्रेस पर दबाव बनाने के साथ राकांपा में अपना वर्चस्व दिखाना चाहते हैं। उनका दावा है कि उनके साथ करीब 40 विधायक हैं। साथ-साथ यह शरद पवार को सीधी चुनौती के रूप में भी देखा जा रहा है। लिहाजा पवार को स्थिति सम्भालने के लिए खुद मैदान में उतरना पड़ रहा है। अजीत पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को हटाना चाहते हैं। कांग्रेस की कोशिश यह है कि राकांपा में असंतोष का फायदा उठाकर कांग्रेस में मुख्यमंत्री विरोधी धड़ा सिर न उठाए। गौरतलब है कि राकांपा के नेताओं के साथ कांग्रेस की भी एक लॉबी लगातार मुख्यमंत्री को बदलने का दबाव बना रही है। इनका कहना है कि मुख्यमंत्री न तो उनकी सुनते हैं और न ही उनके इलाकों में कोई कामकाज हो पा रहा है। जूनियर पवार का नया दांव कांग्रेस पर दबाव बनाकर मुख्यमंत्री बदलवाने का प्रयास भी करना है। मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण से उनका शुरू से ही छत्तीस का आंकड़ा है। अजीत पवार का यह भी मानना है कि ताजा सिंचाई घोटाले को उजागर करने में भी मुख्यमंत्री का हाथ है और वह लगातार राकांपा के घोटालों को उखाड़ने में लगे हैं। यदि एनसीपी का यही रवैया रहा तो महाराष्ट्र में कांग्रेस गठबंधन की सरकार मुश्किल में फंस जाएगी। हालांकि शरद पवार ने कांग्रेस नेतृत्व को भरोसा दिया है कि घटनाक्रम से महाराष्ट्र या यूपीए सरकार पर कोई असर नहीं होगा। देखें ऊंट किस करवट बैठता है।

हिना-बिलावल इश्क की कहानी हकीकत या फसाना?



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published From Delhi

   Published on 28 September, 2012  

अनिल नरेन्द्र


 पाकिस्तान में कोई न कोई हंगामा होता ही रहता है पर इस बार के हंगामे में थोड़ा फर्प है। बांग्लादेश के गॉसिप वीकली टेब्लॉइड बिल्ट्स वीकली ने दावा किया है कि पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार और पाकिस्तान के मोस्ट वांटेड बैचलर राष्ट्रपति आसिफ जरदारी के बेटे बिलावल भुट्टो में जबरदस्त इश्क चल रहा है। पाकिस्तानी अवाम अपनी परेशानियां भूलकर इसी खबर की चर्चा में लगी हुई है। खबर यह है कि खूबसूरत पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार और बिलावल भुट्टो के बीच कुछ खिचड़ी पक रही है। 34 साल की हिना रब्बानी खार करोड़पति बिजनेसमैन फिरोज गुलजार की बीवी हैं और इस शादी से उनकी दो बेटियांöअनाया और  दीना हैं। पता चला है कि अपने से 11 साल छोटे बिलावल से शादी करने के लिए हिना अपने पति से तलाक लेने की तैयारी कर रही हैं। फिर बिलावल से शादी के बाद इनका स्विटजरलैंड में बसने का इरादा है। अखबार ने विदेशी मीडिया के कुछ सूत्रों की मदद से भी खबर दी है कि इस संबंध का तब पता चला जब जरदारी के सरकारी निवास पर हिना और बिलावल एक-दूसरे के साथ इंटिमेट पोज में देखे गए। जरदारी ने इस घटना के बाद अपने इकलौते बेटे की फोन कॉलों की डिटेल चैक की तो शायद उनकी बातों का भी उन्हें पता चला यानि दोनों ही एक-दूसरे को फोन करते रहते थे। पता चला है कि इस संबंध से जरदारी काफी खफा हैं। यह भी पता चला है कि पिछले साल 21 सितम्बर को बिलावल के जन्म दिन पर हिना ने अपने हाथ से लिखा एक कार्ड बिलावल को भिजवाया था। उसमें लिखा गया था कि हमारे संबंधों की नींव आत्मिक है। हम जल्द ही एक हो जाएंगे। यह भी पता चला है कि इस बार की ईद पर भी हिना ने हाथ से  लिखा एक कार्ड बिलावल को भेजा जिसमें लिखा था कि हमने काफी इंतजार कर लिया है अब समय आ गया है कि हम अपना इंतजार खत्म करेंöईद मुबारक। अखबार के अनुसार जब डैडी (जरदारी) को यह पता चला तो उन्होंने हिना को बुलाकर काफी डांट लगाई पर हिना ने कह दिया कि आप अपनी पोस्ट को हमारे व्यक्तिगत मामलों में न लाएं। उन्होंने जरदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और विदेश मंत्री का पद छोड़ने की भी धमकी दी। इस खबर के बाद हिना के प्रति गुलजार ने भी हिना की फोन कॉल डिटेल्स निकलवानी शुरू कर दी हैं। लेकिन गुलजार साहब इस मामले में थोड़ा-सा दब भी इसलिए रहे हैं कि दो साल पहले उनके अपने संबंध अपने स्टॉफ की एक लड़की के साथ उजागर हुए थे। तब निराशा में हिना ने नींद की गोलियां खाकर जान देने की भी कोशिश की थी। वैसे बिलावल को कुछ डर इसलिए भी नहीं लग रहा है क्योंकि अपनी मां बेनजीर भुट्टो की स्विटजरलैंड स्थित हजारों करोड़ रुपए की सम्पत्ति के वह इकलौते मालिक हैं। दोनों इस साल के अन्त में या अगले साल के शुरू में शादी करके यहां से स्विट्जरलैंड जाने का कार्यक्रम बना रहे हैं। बहरहाल यह एक लव स्टोरी हो या महज अफवाह, यह भी उतना ही सच है कि पुरुषवादी समाज में अपने बूते पर ऊंचा मुकाम हासिल कर चुकी महिला को नीचा दिखाने का सबसे आसान तरीका यही होता है और पाकिस्तान तो ऐसी हरकतों के लिए मशहूर है। वैसे यह जाति मामला है और किसी को दखल देने का अख्तियार नहीं पर इस बात का दुख पाकिस्तानी लड़कियों को जरूर होगा कि पाकिस्तान के मोस्ट एलीजिबल बैचलर ने चुनी तो एक शादीशुदा-दो बच्चों की मां जो उनसे 11 साल बड़ी हैं। पाकिस्तान में एक से एक खूबसूरत लड़कियां हैं पर इश्क अंधा होता है।





Thursday, 27 September 2012

फसीह के आतंकी होने का सबूत चाहिए सऊदी सरकार को


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published From Delhi

  Published on 27 September, 2012  

 अनिल नरेन्द्र




भारत में बेंगलुरु और दिल्ली में बम विस्फोटों की साजिश में शामिल रहने का आरोपी फसीह मुहम्मद को भारत लाने में सऊदी अरब अड़ंगा लगा रहा है। सऊदी अरब के अधिकारियों ने जहां उसकी हिरासत की बात कबूली है वहीं उन्होंने यह भी कहा है कि वे वहां उसकी भूमिका और ठहरने के बारे में सावधानी से जांच कर रहे हैं। जियाउद्दीन अंसारी उर्प अबू जिंदाल के सऊदी अरब से निर्वासन की खबरें सामने आने के कुछ ही दिन के भीतर राजनयिक माध्यमों और सुरक्षा एजेंसियों की मुलाकातों के जरिये भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने फसीह के निर्वासन की मांग की थी। सऊदी अधिकारियों ने भारतीय एजेंसियों को साफ कहा है कि हम फसीह को तब तक आपके हवाले नहीं करेंगे जब तक आप हमें फसीह की आतंकी कारगुजारियों के बारे में सबूत मुहैया नहीं कराते। रियाद की जेल में बन्द इस आतंकवादी के प्रत्यर्पण का मामला लटक गया है। सऊदी अधिकारी जानना चाहते हैं कि बेंगलुरु और दिल्ली समेत अन्य आतंकवादी वारदातों में फसीह की भूमिका क्या रही है? आधिकारिक सूत्रों ने हाल ही में यह जानकारी दी है। सूत्रों के अनुसार भारतीय अधिकारियों को हाल में सऊदी सुरक्षा एजेंसियों की ओर से एक पत्र मिला है। इसमें यह बताने के लिए कहा गया है कि भारत में किन-किन आतंकवादी वारदातों खासकर बेंगलुरु और दिल्ली की घटनाओं में फसीह का हाथ रहा है। वह इन घटनाओं को अंजाम देने में किस रूप से शामिल रहा है। यह भी स्पष्ट करने को कहा गया है कि बिहार निवासी इस आतंकी का इंडियन मुजाहिद्दीन जैसे प्रतिबंधित संगठनों से किस तरह का जुड़ाव रहा है। सऊदी एजेंसियों ने बेंगलुरु धमाके और दिल्ली में गोलीबारी की घटना से संबंधित दर्ज केस का ब्यौरा मांगा है। साथ ही इन घटनाओं के सिलसिले में गिरफ्तार आरोपियों के बयान की प्रतियां भी उपलब्ध कराने को कहा गया है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का आरोप है कि पेशे से इंजीनियर फसीह का बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में धमाके और 2010 में दिल्ली में जामा मस्जिद के निकट हुई गोलीबारी की घटना में हाथ रहा है। इस सिलसिले में दिल्ली और कर्नाटक पुलिस को भी इस दहशतगर्द की तलाश है। आतंकी वारदातों में फसीह का नाम इंडियन मुजाहिद्दीन के गिरफ्तार आतंकियों से पूछताछ के दौरान सामने आया। भारत ने फसीह को प्रत्यर्पित करने की मांग सऊदी अरब से कर रखी है। इस सिलसिले में इंटरपोल के जरिये रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी किया गया है। फसीह को 13 मई को सऊदी अरब में गिरफ्तार किया गया था। उसकी पत्नी निखत परवीन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए आरोप लगाया है कि उसका पति फसीह मुहम्मद भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के कब्जे में है। उसे भारतीय और सऊदी अरब की सुरक्षा एजेंसियों ने साझा ऑपरेशन के तहत गिरफ्तार किया है। सरकार ने इन आरोपों से इंकार किया है। सूत्रों का कहना है कि भारत प्रत्यर्पित किए गए आतंकवादी जियाउद्दीन अंसारी उर्प अबू जिंदाल को जिस तरह से मीडिया कवरेज मिला उससे सऊदी सरकार नाराज है लिहाजा फसीह के मामले में वह पूंक-पूंक कर कदम उठा रही है।

धरती, आकाश के बाद अब समुद्र में भी घोटाला




   Published on 27 September, 2012  

 अनिल नरेन्द्र


मनमोहन सिंह सरकार के घोटालों का पर्दाफाश होने का सिलसिला थम ही नहीं रहा है। धरती, आकाश के बाद अब समुद्र में भी घोटाले का पता चला है। आकाश (2जी स्पेक्ट्रम) धरती (कोयला आवंटन घोटाला) के बाद अब समुद्र में भी घोटाले से अछूती नहीं रही यह सरकार। बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में खनिज सम्पदा की खोज के लिए ब्लॉकों के आवंटन में घोटाले की सीबीआई ने जांच शुरू कर दी है। समुद्र में खनिज की खोज के लिए कुल 63 ब्लॉकों में से 28 ब्लॉक प्रवर्तन निदेशालय के एक पूर्व अधिकारी के परिवार से जुड़ी चार कम्पनियों को आवंटित किए जाने का आरोप है। सीबीआई सूत्रों के अनुसार प्रारम्भिक जांच के केस में नागपुर स्थित केंद्रीय खनन ब्यूरो और केंद्रीय खान मंत्रालय के अज्ञात अधिकारियों के साथ-साथ चारों निजी कम्पनियों और उनके निदेशकों को भी आरोपी बनाया गया है। जिन चार कम्पनियों को लगभग आधे खनिज ब्लॉक आवंटित किए गए हैं वे ईडी के पूर्व अधिकारी अशोक अग्रवाल ईडी के पहले खान मंत्रालय में भी काम कर चुके हैं। ईडी में काम करते हुए अग्रवाल रक्षा दलाल अभिषेक वर्मा के साथ संबंधों में भी सुर्खियों में रहे थे। समुद्र के भीतर प्रचुर मात्रा में मौजूद खनिज सम्पदा को निकालने के लिए खान मंत्रालय ने पहली बार 2010 में 63 ब्लॉकों के लिए टेंडर जारी किए। कुल 377 कम्पनियों ने आवेदन किया। मार्च 2011 में खान मंत्रालय ने आवंटित ब्लॉकों की सूची जारी की।  इनमें से 28 ब्लॉक एक ही परिवार से जुड़ी चार कम्पनियों को दिए जाने का विरोध करते हुए कुछ कम्पनियों ने मुंबई और हैदराबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाई कोर्ट ने आवंटन प्रक्रिया पर रोक लगाते हुए सीबीआई को पूरे मामले की जांच का आदेश दिया। हाई कोर्ट के इसी आदेश के तहत सीबीआई ने प्रारम्भिक जांच कर केस दर्ज किया है। जांच से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि जल्द इस संबंध में खान मंत्रालय और केंद्रीय खनन ब्यूरो के अधिकारियों को पूछताछ के लिए बुलाया जाएगा। साथ ही खान मंत्रालय को आवंटन से जुड़े सभी दस्तावेज जांच एजेंसी को सौंपने के लिए कहा जाएगा। बड़े दुख की बात है कि मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल के दौरान घोटाले दर घोटाले का पर्दाफाश हो रहा है। इस सरकार ने तो किसी क्षेत्र को नहीं छोड़ा। देश को पता नहीं कितने अरबों का नुकसान हुआ है। पता नहीं कभी भी इसका सही आंकलन होगा भी या नहीं कि देश को कितना लूटा गया है? धरती, आकाश और अब समुद्र कहीं भी तो नहीं छोड़ा गया और यह सब कुछ ईमानदार प्रधानमंत्री की आंखों के नीचे हुआ। फिर भी वह मिस्टर क्लीन हैं। मिस्टर क्लीन ने तो देश को लूटने का जैसे लाइसेंस ही दे दिया हो, जहां अवसर मिले लूट लो। पता नहीं अभी और कितने घोटालों का पर्दाफाश होना बाकी है?

Wednesday, 26 September 2012

प्रफुल्ल पटेल पर कसता शिकंजा


 Published on 26 September, 2012
 अनिल नरेन्द्र
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एयर इंडिया की विमान खरीद में कथित अनियमितताओं की विशेष जांच दल (एसआईटी) से जांच कराने संबंधी याचिका पर केंद्र सरकार और विमानन कम्पनी से जवाब तलब किया। यह कथित अनियमितताएं नागरिक उड्डयन मंत्री के रूप में प्रफुल्ल पटेल के कार्यकाल के दौरान हुई बताई गई हैं। न्यायमूर्ति एमएल दत्तू और न्यायमूर्ति सीके प्रसाद की पीठ ने गैर सरकारी संगठन सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्टलिटीगेशन की ओर से दायर जनहित याचिका पर केंद्र सरकार, एयर इंडिया और सीबीआई से जवाब मांगा है। इस याचिका में आरोप लगाया है कि प्रफुल्ल पटेल के कार्यकाल में लिए गए विभिन्न निर्णयों का उद्देश्य निजी एयरलाइंस कम्पनियों को लाभ पहुंचाना था, जिससे एयर इंडिया को नुकसान हुआ। सीपीआईएल के वकील ने दलील दी कि श्री प्रफुल्ल पटेल ने नागरिक विमानन मंत्री के रूप में अनेक ऐसे फैसले लिए जिससे निजी विमानन कम्पनियों को फायदा हुआ और राष्ट्रीय राजस्व को करोड़ों का चूना लगा। याचिकाकर्ता के अनुसार श्री पटेल ने अपने कार्यकाल में न केवल एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस का विलय किया बल्कि लाभ कमाने वाले वायु मार्गों को निजी विमानन कम्पनियों के हवाले भी कर दिया। इतना ही नहीं, इन मार्गों पर एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस के विमानों का उड़ान समय भी बदला गया जिससे निजी विमानन कम्पनियों को फायदा हुआ। खंडपीठ ने इन दलीलों को सुनने के बाद नोटिस जारी किया। सीपीआईएल ने पहले दिल्ली हाई कोर्ट में यह जनहित याचिका दायर की थी, लेकिन हाई कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि यह मामला संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) के समक्ष लम्बित है। इसके बाद सीपीआईएल ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ता का दावा है कि एयर इंडिया ने 67 हजार करोड़ रुपए की लागत से 111 उन्नत विमान खरीदे थे, जिसमें भारी अनियमितताओं की शिकायत मिली है। यह दावा किया गया कि पटेल के कई निर्णय हैं जिनसे राजस्व का भारी नुकसान हुआ है। इनमें कई फैसलों का जिक्र भी किया गया है। उदाहरण के तौर पर सार्वजनिक क्षेत्र की एयरलाइंस कम्पनी के लिए 70 हजार करोड़ खर्च करके 111 विमानों की ब़ड़े पैमाने में खरीद, विमानों को लीज पर लेना, लाभ वाले उड़ान मार्गों और समय निजी कम्पनियों को देना तथा एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस के विलय शामिल हैं। आरोप लगाया गया कि तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल की कार्रवाई और उनके फैसलों ने राष्ट्रीय एयरलाइंस को बर्बाद कर दिया, हजारों करोड़ रुपए का बोझ पड़ा है। गत 10 सितम्बर को उच्चतम न्यायालय की दो सदस्यीय खंडपीठ के एक सदस्य ने इस याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था, जिसके बाद यह मामला नई खंडपीठ के समक्ष गुरुवार को रखा गया। एयर इंडिया एक जमाने में दुनिया की जानी-मानी कम्पनियों में से एक हुआ करती थी पर मिसमैनेजमेंट, भ्रष्टाचार और दूसरी निजी कम्पनियों को खड़ा करने में कई मंत्रियों का हाथ है। इन कारणों से आज एयर इंडिया की प्रतिष्ठा धरातल पर है। इन एयरलाइंस के मामलों में बारीकी से जांच होनी चाहिए। एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस के विलय के पीछे क्या-क्या असल कारण थे इसकी भी जांच होनी चाहिए। एयर इंडिया की प्रतिष्ठा सीधी देश से जुड़ती है क्योंकि यह राष्ट्रीय एयरलाइंस है।



पाक के मंत्री ने फिल्म निर्माता की हत्या के लिए इनाम की घोषणा की


 Published on 26 September, 2012
 अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान में अमेरिका में बनी एक फिल्म पर जिस तरह बवाल मचा हुआ है उसकी वजह से पहले से ही अस्थिर देश की स्थिति और ज्यादा गम्भीर हो गई है। हालत यहां तक पहुंच गई कि इस्लामाबाद में विदेशी दूतावास जिस इलाके में हैं, उसकी रक्षा के लिए सेना को बुलाना पड़ा। दुखद पहलू यह है कि तमाम सियासी जमातों ने मौके का सियासी फायदा उठाने में कसर नहीं छोड़ी। हद तो तब हो गई जब पाकिस्तान के एक संघीय मंत्री ने इस इस्लाम विरोधी फिल्म बनाने वाले निर्माता की हत्या करने वाले को एक लाख डॉलर देने की घोषणा कर दी। रेल मंत्री गुलाम अहमद बिलौर ने शनिवार को कहा कि यह इनाम फिल्म निर्माता की हत्या करने वाले को दिया जाएगा। उन्होंने दलील दी कि विरोध प्रदर्शित करने और ईशनिन्दा करने वालों में भय पैदा करने के लिए फिल्मकार की हत्या के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। उन्होंने इसके साथ ही यह कहते हुए प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों तालिबान और अलकायदा से भी अपना समर्थन करने का आह्वान किया कि यदि वह ईशनिन्दा फिल्म के निर्माता को मार दें तो उन्हें भी पुरस्कृत किया जाएगा। बिलौर ने यह घोषणा पेशावर में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में की। इस बयान ने पहले से जलती स्थिति में घी का काम किया। पाकिस्तान सरकार ने रेल मंत्री के इस बयान से खुद को अलग करने का प्रयास किया है। सरकार के प्रवक्ता ने कहा कि मंत्री की टिप्पणी से हम खुद को अलग करते हैं। प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ के कार्यालय (पीएमओ) की ओर से कहा गया है कि बिलौर के बयान से सरकार का कोई लेना-देना नहीं है। उधर अमेरिकी विदेशी विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि राष्ट्रपति और विदेश मंत्री दोनों का मानना है कि यह वीडियो अपमानजनक, घृणित और निन्दनीय है, लेकिन इससे हिंसा को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता है। यह जरूरी है कि जिम्मेदार नेता हिंसा के खिलाफ खड़े हों और बोलें। बयान में इस अधिकारी ने कहा कि हमने इस बात पर भी ध्यान दिया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने बिलौर की इस घोषणा से खुद को अलग कर लिया है। मुस्लिम विरोधी इस फिल्म के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान आतंकवाद, लूटपाट और हत्या के प्रयास के मामले में पाक पुलिस ने 6000 से भी अधिक अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। लाहौर पुलिस के प्रवक्ता ने बताया कि 36 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। ऐसा लगता है कि कहीं न कहीं जरदारी सरकार ने विरोध प्रदर्शन को हवा दी ताकि लोगों का ध्यान और ज्वलंत मुद्दों और सरकार की नाकामी से हटाया जा सके। अगले आम चुनाव ज्यादा दूर नहीं हैं और जरदारी सरकार की अलोकप्रियता चरम पर है। सरकार धार्मिक कार्ड खेल कर कुछ लोकप्रियता भी हासिल करना चाहती है, भले ही इस कोशिश में स्थिति ज्यादा बिगड़े। जब सरकार, विपक्ष, सेना सभी पक्ष धार्मिक मुद्दों को हवा देंगे तो जाहिर है कि हिंसक भीड़ को प्रोत्साहन मिलेगा। अगर अमेरिका विरोधी लहर और तेज होती है तो यह सरकार के लिए एक बड़ी समस्या बन जाएगी। तमाम उग्रवादी संगठन पाकिस्तान सरकार पर अमेरिका का साथ देने का दबाव बना रहे हैं। पाकिस्तान में इस इस्लाम विरोधी फिल्म `इनोसेंस ऑफ मुस्लिम्स' को लेकर शुक्रवार को हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद बहस छिड़ गई है। इस फिल्म के खिलाफ पाक सरकार ने प्रदर्शनों को मंजूरी दी थी। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के नेतृत्व वाली सरकार ने शुक्रवार को पैगम्बर प्रेम दिवस का आयोजन किया था ताकि धार्मिक और कट्टरपंथी संगठनों के हिंसक विरोधी प्रदर्शनों को रोका जा सके। जानकारों का कहना है कि सरकार पूरी स्थिति का आंकलन करने में नाकाम रही। समाचार पत्र `द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' के सम्पादक उमर आर कुरैशी ने सम्पादकीय में लिखा कि सरकार ने सोचा था कि वह धार्मिक संगठनों को अलग-थलग कर लेगी, लेकिन आखिर में उसने इन संगठनों को प्रोत्साहित करने का काम किया। कुरैशी की तरह पाकिस्तान के कई अन्य टिप्पणीकारों का मानना है कि सरकार ने एक संवेदनशील मुद्दे पर कट्टरपंथी संगठनों को आगे बढ़ने का मौका दिया।

Tuesday, 25 September 2012

अगर वॉलमार्ट इतना ही अच्छा है तो न्यूयार्प में इसका विरोध क्यों?


 Published on 25 September, 2012
 अनिल नरेन्द्र
दुनिया की दिग्गज रिटेल कम्पनी वॉलमार्ट का रास्ता साफ करने के लिए भारत में तमाम फायदे गिनाए जा रहे हैं। अमेरिका की यह दिग्गज कम्पनी का 16 देशों में 404 अरब डॉलर का कारोबार है। हालांकि और भी कई दिग्गज रिटेल कम्पनियां हैं जैसे फ्रांस की केयरफोर (34 देशों में 2009 में 112 अरब डॉलर का कारोबार)। जर्मनी में मेट्रो एजी जिसका 33 देशों में 2009 में 91 अरब डॉलर का कारोबार था, ब्रिटेन की टैस्को जिसका साम्राज्य 13 देशों में फैला हुआ है और जिसका 2009 में राजस्व 90.43 अरब डॉलर का था पर सबसे बड़ी कम्पनी वॉलमार्ट है। वॉलमार्ट (एशियन) के प्रेजीडेंट व सीईओ स्कॉट प्राइस ने कहा है कि भारत में पहला वॉलमार्ट रिटेल स्टोर 12 से 18 महीने के अन्दर खुल सकता है। उनका कहना है कि अभी हम उन राज्यों में इजाजत मांगेंगे जो विदेशी रिटेल शॉप अपने यहां खोलने की इच्छा जता चुके हैं। हालांकि अभी यह तय नहीं है कि भारत में हम कहां-कहां कितने रिटेल स्टोर खोलेंगे। इस समय भारत के साथ 17 कैश एण्ड कैरी स्टोर्स में वॉलमार्ट की हिस्सेदारी है। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि बेशक प्रधानमंत्री सिंह जितनी भी वॉलमार्ट के फायदे गिनाएं पर यह कम्पनी खुद अपने देश में ही तगड़े झटके से दो-चार हो रही है। चाहे मामला अमेरिका के सबसे बड़े शहर व वित्तीय राजधानी न्यूयार्प का ही क्यों न हो। कम्पनी ने यहां अपना पहला मेगा स्टोर खोलने की योजना बनाई थी, लेकिन स्थानीय छोटे व्यापारियों के भारी विरोध के चलते कम्पनी को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। वैसे न्यूयार्प में पहले से ही छह छोटे स्टोर मौजूद हैं। अमेरिकी अखबार न्यूयार्प टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक वॉलमार्ट ने पूर्वी न्यूयार्प के ब्रुकलिन में नया शॉपिंग सेंटर बनाया है। इसी में वह मेगा स्टोर खोलने की तैयारी कर रही थी। मगर स्थानीय यूनियन, सिटी काउंसिल के कई सदस्यों और सामुदायिक समूहों ने इस पर कड़ा एतराज जताया। इसके बाद कम्पनी ने पिछले हफ्ते इस योजना को रद्द कर दिया। अमेरिका के लगभग हर छोटे-बड़े शहर में कम्पनी के चार हजार से ज्यादा स्टोर हैं। मगर सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि मेगा स्टोर खोलने के लिए कम्पनी को हर जगह चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है। न्यूयार्प से पहले कई और बड़े शहरों में कम्पनी के मेगा स्टार का विरोध हो चुका है। न्यूयार्प में मेगा स्टोर खोलने के लिए कम्पनी 2007 से प्रयासरत है, लेकिन अभी तक उसे सफलता नहीं मिली है। न्यूयार्प को वॉलमार्ट से मुक्त कराने के लिए बाकायदा एक संगठन बनाया गया है। वॉलमार्ट फ्री न्यूयार्प सिटी ग्रुप के प्रवक्ता स्टेफनी यागजी के मुताबिक कम्पनी के पीछे हटने से यह साबित हो गया है कि न्यूयार्प के लोगों को भी वॉलमार्ट का कारोबारी तरीका नहीं सुहा रहा है। विरोध करने वाले अमेरिकियों का कहना है कि यह कम्पनी अपने कर्मचारियों को कम वेतन तो देती ही है, साथ ही इन्हें जो सुविधाएं मिलनी चाहिए वह भी बदतर होती हैं। यह दाम कम रखकर अपने आसपास के छोटे दुकानदारों के मुनाफे पर चोट पहुंचाती है ताकि इन्हें इलाके से खदेड़ा जा सके। मनमोहन सिंह एक तर्प यह दे रहे हैं कि इससे किसानों और उपभोक्ताओं को फायदा होगा। मगर कुछ जानकार इसे सिरे से खारिज करते हैं। कृषि विशेषज्ञ देविन्दर शर्मा कहते हैं कि अमेरिका सहित पश्चिमी देशों के संगठित रिटेल कारोबार में भले ही तेजी आई हो लेकिन इसका फायदा किसानों को कम ही हुआ है। अगर ऐसा होता तो इन देशों का कृषि क्षेत्र अभी भी भारी सरकारी सब्सिडी पर नहीं पल रहा होता। मनमोहन सिंह भले ही वॉलमार्ट सरीखे को भारत लाने में जो भी मर्जी आए दलीलें दें पर हकीकत तो कुछ और ही दर्शाती है।

गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले मुलायम सिंह यादव


 Published on 25 September, 2012
 अनिल नरेन्द्र
 तृणमूल कांग्रेस के समर्थन वापसी के फैसले से लड़खड़ाई मनमोहन सिंह सरकार को उस समय बड़ा सहारा मिल गया जब समाजवादी पार्टी ने सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता से दूर रखने की खातिर सरकार को समर्थन जारी रखने का संकल्प जाहिर किया। इस तरह मुलायम डबल गेम खेल रहे हैं। एक तरफ उनके हाथ में विरोध का झंडा है तो दूसरे हाथ में सरकार को बचाने का एजेंडा। यह दूसरी बारी है जब मुलायम ने इस सरकार को संजीवनी दी है। 2008 में भी जब अमेरिका से परमाणु करार के मुद्दे पर वाम दलों ने समर्थन वापस लिया था तो सपा ने मनमोहन सिंह सरकार की बाकी ढाई साल के लिए नैया पार लगा दी थी। मुलायम सिंह यादव दरअसल अपने दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहते हैं। वह कांग्रेस के दुश्मन भी दिखना चाहते हैं और परदे के पीछे दोस्ती का दरवाजा भी खुला रखना चाहते हैं। वह केंद्र सरकार से फायदा भी लेना चाहते हैं और साथ में यह भी चाहते हैं कि सरकार जल्द से जल्द विदा भी हो जाए ताकि यूपी में उन्हें लाभ मिल सके। वह मुस्लिम वोटों की नाराजगी के भय से सरकार गिराने का अपयश भी नहीं लेना चाहते। मुलायम के मन में तीसरे मोर्चे का सपना और केंद्र में सरकार संचालन के सूत्रधार बनने की कल्पना तो है लेकिन वह यह भी नहीं चाहते कि सपा की किसी चाल से बसपा-कांग्रेस में दोस्ती गहरी हो जाए। दाव-पेंच में माहिर मुलायम सिंह यादव सियासत में दो नावों की सवारी की कहावत को चरितार्थ करते दिख रहे हैं। इस बार भी हर बार की तरह मनमोहन सरकार का समर्थन जारी रखने के पीछे सांप्रदायिक शक्तियों को आगे आने से रोक दिया गया है। मनमोहन सरकार को आंखें दिखा रहे मुलायम सिंह यादव 72 घंटे से भी कम वक्त में `लाइन' पर आ गए। ठीक 24 घंटे पहले सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए गिरफ्तारी देने वाले मुलायम को एक बार फिर सांप्रदायिक ताकतों की याद आ गई। अब वे कांग्रेस को समर्थन देना जारी रखेंगे, क्योंकि सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता में आने से रोकना है। पिछले तीन दिनों में मुलायम सिंह ने कई रंग बदले हैं। गिरगिट की तरह रंग बदलने में माहिर मुलायम सिंह ने 19 सितम्बर को कहा कि एफडीआई को मंजूरी और डीजल के दामों में बढ़ोतरी का फैसला केंद्र सरकार को वापस लेना होगा। हम इसका विरोध करते हैं। यह जन विरोधी है। उन्होंने यह भी कहा था कि सरकार से समर्थन वापस लेने का फैसला वह पार्टी के संसदीय बोर्ड की बैठक में राय-मशविरा करके लेंगे। यह बैठक 20 सितम्बर को होनी थी। 20 सितम्बर को मुलायम केंद्र सरकार के खिलाफ जन्तर-मन्तर पर थे। उन्होंने चन्द्रबाबू नायडू, प्रकाश करात, सीताराम येचुरी व एबी वर्धन की मौजूदगी में सरकार की खिलाफत की। मुलायम के साथ सात छोटे दलों के नेताओं की मौजूदगी ने तीसरे मोर्चे की अटकलों को बल दे दिया। खुद मुलायम यह बोले कि प्रधानमंत्री तीसरे मोर्चे का होगा। पूरे दिन चर्चा का केंद्र रहे मुलायम ने समर्थन वापसी पर कोई बात नहीं की। न ही उनकी पार्टी के संसदीय बोर्ड की बैठक हुई। उनके छोटे भाई व प्रवक्ता रामगोपाल यादव ने तो यहां तक कह दिया कि ऐसी कोई बैठक होनी ही नहीं थी। शुक्रवार को मुलायम के स्वर पूरी तरह बदले हुए थे। तृणमूल कांग्रेस के   मंत्री जब प्रधानमंत्री को अपने इस्तीफे सौंपने जा रहे थे तब मुलायम मीडिया को देश पर छा रहे सांप्रदायिक खतरे के बारे में बता रहे थे। सांप्रदायिक शक्तियों से उनका मतलब भाजपा से है। सपा भाजपा को चाहे जिस तरह परिभाषित करे, इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि वर्तमान में वह कई राज्यों में सत्तारूढ़ है। इसका अर्थ है कि देश की जनता के एक बड़े वर्ग को सपा की इस दलील में कोई दम नजर नहीं आता कि सांप्रदायिक शक्तियों को दूर रखने के लिए वह संप्रग सरकार को समर्थन देने के लिए विवश हैं। सपा जिसे अपनी मजबूरी बता रही है वह उसकी एक बड़ी कमजोरी के रूप में रेखांकित हो रही है। देश की जनता को यही संदेश जा रहा है कि सपा किन्हीं अन्य राजनीतिक कारणों से संप्रग सरकार को बेल आउट कर रही है। कुछ ऐसी ही स्थिति बसपा की भी है। ये दोनों दल जिस तरह दो नावों की सवारी कर रहे हैं उससे उन्हें ही घाटा उठाना पड़ेगा। मुलायम भले ही कांग्रेस को समर्थन की वजह सांप्रदायिक शक्तियों को मजबूत न होने देने की बता रहे हों लेकिन यही अकेली वजह नहीं है। इसके पीछे मुलायम का अपना गणित है। वह केंद्र सरकार पर दबाव बनाकर उसे अपनी अंगुली पर नचाना चाहते हैं और साथ ही उत्तर प्रदेश के लिए केंद्र से ज्यादा से ज्यादा आर्थिक लाभ उठाना चाहते हैं और इस दौरान अपने आपको ज्यादा मजबूत करना चाहते हैं।

Sunday, 23 September 2012

साइना नेहवाल ने साइन किया 40 करोड़ का करार


 Published on 23 September, 2012
 अनिल नरेन्द्र
खेल की दुनिया में अब भारत का नाम भी आ रहा है और यह हर भारतीय के लिए गर्व की बात है। भारत में हुनर यानी टेलेंट की कमी नहीं है, कमी है तो खिलाड़ियों को सुविधाएं और प्रोत्साहन की। आज क्रिकेट जगत में टीम इंडिया विश्व की चोटी की टीमों में से एक है। इसके पीछे मेरी राय में बीसीसीआई का बहुत बड़ा योगदान है। क्रिकेट खिलाड़ियों को प्रोत्साहन के रूप में इतना पैसा मिल रहा है कि वह और भी बेहतर प्रदर्शन करने के इच्छुक हैं। हम हॉकी में इसलिए पिछड़े कि हॉकी में वह जरूरी कदम नहीं उठाए गए जिनके बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते थे। लंदन ओलंपिक्स में एक खेल जिसमें भारत का नाम पहली बार इस स्तर पर आया वह है बैडमिंटन का खेल। बेशक हमने शूटिंग, रेसलिंग, बाक्सिंग व एथलैटिक्स में भी अच्छा प्रदर्शन किया पर मैं समझता हूं कि साइना नेहवाल ने जो कमाल किया वह अभूतपूर्व है। मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं कि बैटमिंटन एक ऐसा खेल है जिसमें वर्षों से चीन का डोमिनेशन रहा है, वर्चस्व रहा है। साइना ने इस डोमिनेशन को पहली बार तोड़ा है। इसलिए जब मैंने यह खबर पढ़ी कि एक स्पोर्ट्स मैनेजमेंट कम्पनी ने साइना के साथ तीन साल के लिए एक एग्रीमेंट किया है जिसके तहत उनको पूरे 40 करोड़ रुपए मिलेंगे तो मुझे बहुत खुशी हुई। दरअसल साइना एक ब्रांड के तौर पर उसी वक्त से उभरना शुरू हो गई थीं जब उन्होंने लंदन ओलंपिक्स में चीन की वान शिन को हराकर ओलंपिक्स मैडल अपने नाम कर लिया। क्रिकेट को छोड़कर किसी अन्य खेल में देश की सबसे ज्यादा पैसा कमाने वाली खिलाड़ी अब साइना बन गई है। साइना ने रिती स्पोर्ट्स से यह करार किया है। साइना ने कहा कि मैं रिती स्पोर्ट्स से जुड़कर काफी खुश हूं। रिती की पृष्ठभूमि और विश्वसनीयता को देखते हुए पता चलता है कि वे किस तरह से चीजों के साथ सामंजस्य बिठाते हैं और यह उनका सबसे सकारात्मक पहलू है। रिती स्पोर्ट्स के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक अरुण पांडे ने कहाöहम साइना से जुड़कर काफी खुश हैं, जिन्होंने अपने प्रदर्शन से देश को गौरवान्वित किया है। साइना इस तरह रिती स्पोर्ट्स से जुड़ने वाली विभिन्न हाई प्रोफाइल हस्तियों की सूची में शामिल हो गई हैं जिसमें भारतीय क्रिकेट कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी मौजूद हैं। लंदन ओलंपिक्स से लौटने के बाद सचिन तेंदुलकर ने उन्हें एक बीएमडब्ल्यू कार भेंट की थी। क्रिकेटर के अलावा किसी भारतीय खिलाड़ी के साथ ऐसी डील अपने आप में खासी उत्साहजनक है। पिछले वर्ष  के मुकाबले साइना के ब्रांड वैल्यू में भी इधर जबरदस्त इजाफा हुआ है। मौजूदा समय में वह 10 मल्टी नेशनल कम्पनियों के एड में नजर आ रही हैं। बिग बी के साथ भी उन्हें एक सौंदर्य प्रसाधन कम्पनी के एड में काम करने का मौका मिला है। यह भी खुशी की बात है कि सिल्वर मैडल जीतने वाले पहलवान सुशील कुमार भी एक विज्ञापन में नजर आ रहे हैं। इस बदलाव का हम स्वागत करते हैं और उम्मीद करते हैं कि बाक्सिंग, वेट लिफ्टिंग, शूटिंग, हॉकी, फुटबाल और तीरंदाजी के भी कुछ खिलाड़ी इसी तरह पर्दे पर नजर आएंगे और भारतीय खिलाड़ियों को वह सम्मान, पैसा मिलेगा जिसके वह पूरी तरह हकदार हैं।

राजधानी में बढ़ता सेंसलेस किलिंग का यह दौर चिंता का विषय है


 Published on 23 September, 2012
 अनिल नरेन्द्र
राजधानी में एक बार फिर हत्याओं के दौर ने चिंता पैदा कर दी है। एक तरफा प्रेम, अवैध संबंध व सनक के चलते बढ़ती और कभी-कभी बिल्कुल बेतुकी हत्याओं व आत्महत्या का दौर कम ही देखा गया है। 3 सितम्बर को एक सिरफिरे आशिक रवि ने बिंदापुर और गाजियाबाद में एक के बाद एक 5 हत्याओं को अंजाम दिया और इसके बाद खुद को गोली मार ली। 7 सितम्बर को स्वरूप नगर में दो दोस्तों मनीष व राजबीर ने प्यार की नाकामी व पारिवारिक कलह से परेशान होकर 5 लोगों को गोली मारने के बाद खुद को गोली से उड़ा लिया। दो दिन पहले दिल्ली पुलिस के एक कांस्टेबल विजय कुमार (24) को जब लगा कि उसकी बहन की नौ साल पहले दहेज हत्या में उसे अदालत से इंसाफ नहीं मिलता दिख रहा तो उसने अपनी सरकारी पिस्टल से बाहरी दिल्ली के अलीपुर फार्म हाउस इलाके में अपने बहनोई मनोज कुमार (36) व उसकी मां प्रकाश देवी (62) पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दोनों की हत्या कर दी। बाहरी दिल्ली के रोहिणी सेक्टर-17 इलाके में एक बदमाश ने घर में घुसकर कारोबारी, उसकी पत्नी व बेटी की धारदार हथियार से गला रेत कर हत्या कर दी। तीनों को उसी दिन वैष्णो देवी तीर्थ यात्रा पर जाना था पर सबसे दुखद हादसा सर गंगा राम अस्पताल के डाक्टर संजीव धवन की हत्या का है। न्यू राजेन्द्र नगर में नौकरानी के प्रेम में पागल पूर्व फौजी ने वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. संजीव धवन (57) की गोली मारकर हत्या कर दी। डॉ. धवन अस्पताल के डिपार्टमेंट ऑफ कार्डियोलाजी के वाइस चेयरमैन थे। डॉ. धवन ने अपने 20 साल के केरियर में करीब पांच सौ लोगों की जिंदगी बचाई थी। इनमें 15 जिंदगियां तो ऐसे डाक्टरों की हैं जो आज सैकड़ों लोगों को बचा रहे हैं। डॉ. संजीव तो अपनी मौत के बाद भी लोगों को जीवन देना चाहते थे। उनकी इच्छा थी अंग दान की लेकिन दिल में गोली लगने से उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी। ऐसे काबिल व्यक्ति जिसने सैकड़ों जानें बचाई हों और भविष्य में बचानी हों उसे मारना कितना बड़ा पाप है। डॉ. भगवान का रूप होता है। उसे ही पागल प्रेमी ने अपनी जलन का शिकार बना दिया? इस हत्या पर स्तब्ध होना स्वाभाविक ही है। सितम्बर में ही इस तरह से करीब 10 मामले सामने आ चुके हैं। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि राजधानी में सहिष्णुता की कितनी कमी आ चुकी है। रिश्तों के बिगड़े ताने-बाने से किस तरह समाज में बिखराव की स्थिति पैदा हो गई है। तुनकमिजाजी एकतरफा प्रेम व नाकामी के चलते खुद से नफरत करने लगते हैं। इस तरह की स्थिति पूरे समाज के ढांचे को प्रभावित कर रही है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार पारिवारिक दूरियां, अधिक तनाव, काउंसलिंग की कमी व एकाकीपन इसका प्रमुख कारण बन रहा है। इन सब का एक परिणाम यह हो रहा है कि हमारी सहनशीलता, नैतिक मूल्यों में लगातार गिरावट आ रही है। एकल परिवारों का चलन, उपभोक्तावाद, जल्दी से सब कुछ पाने की ललक एवं तेज भागती जिंदगी में बढ़ती हताशा इस सेंसलेस हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं। फिर आसानी से हथियारों का मिलना, फिल्मों में बढ़ती हिंसा भी युवकों को अपराध की गर्त में ले जा रहे हैं। अपराध का यह स्वरूप पूरे समाज के लिए चुनौती है, महज पुलिस और बिगड़ती कानून व्यवस्था के लिए नहीं।

Saturday, 22 September 2012

राजा परवेज अशरफ की शातिर चाल


 Published on 22 September, 2012
 अनिल नरेन्द्र
अपने पुराने रुख से यू-टर्न लेते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ मंगलवार को राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में मुकदमा चलाने के लिए स्विस अधिकारियों को पत्र लिखने को राजी हो गए। परवेज अशरफ के इस यू-टर्न पर कई सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने अदालत को बताया कि इसके लिए कानून मंत्रालय को निर्देश दिए जा चुके हैं। पाकिस्तान सरकार इस मामले में लम्बे समय से स्विस अधिकारियों को पत्र लिखने से इंकार करती रही है। कुछ लोग अशरफ के इस स्टैंड को एक स्मार्ट मूव मान रहे हैं। सरकार के पास अब कुल चार महीनों का कार्यकाल बचा है और इस स्टेज पर सुप्रीम कोर्ट की शर्त मानने से सदर जरदारी को कोई नुकसान होने वाला नहीं है। पत्र लिखने में कई दिन निकल जाएंगे। फिर स्विस अधिकारी भी किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष के खिलाफ इतनी फुर्ती से तो काम करने से रहे। इस सरकार का कार्यकाल 2013 में समाप्त होने वाला है और अगर यह सरकार तब तक चल जाती है तो यह भी एक चमत्कार ही होगा कि एक चुनी हुई सरकार पाकिस्तान में अपना कार्यकाल पूरा कर ले। प्रधानमंत्री अशरफ ने अपनी सरकार को इतना टाइम दिला दिया है कि बुरी तरह से पीछे पड़े सुप्रीम कोर्ट के पास अब इस सरकार को घेरने का कोई बहाना नहीं बचता। इस कदम से पाकिस्तानी ज्यूडिश्यिरी और चुनी हुई सरकार के बीच अरसे से श्रेष्ठता की लड़ाई में भी कुछ दिनों के ठहराव की गुंजाइश बनी है। कोर्ट ने अशरफ को पत्र का मसौदा तैयार करने के लिए 25 सितम्बर और अदालत की रजामंदी मिलने के बाद उसे स्विस अधिकारियों तक पहुंचाने के लिए दो अक्तूबर तक का समय दिया है। प्रधानमंत्री के इस रुख के बाद उनके खिलाफ अदालत की अवमानना को लेकर चल रहे मुकदमे की सुनवाई पत्र का मजमून जमा करने की तारीख तक के लिए टाल दी गई है। पिछले तीन सालों से पाकिस्तान का सुप्रीम कोर्ट जरदारी के खिलाफ स्विटजरलैंड में जांच करवाने के लिए हाथ धो कर पीछे पड़ा हुआ है। सरकार का स्टैंड यह था कि देश के शीर्ष कार्यकारी अधिकारी के रूप में उन्हें किसी भी जांच से मुक्त रहने का संवैधानिक विशेषाधिकार प्राप्त है। बीते जून में सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को अदालत की अवमानना का दोषी ठहराते हुए पद के अयोग्य घोषित कर दिया था। उनकी जगह लेने वाले राजा परवेज अशरफ भी हाल तक गिलानी के रास्ते पर ही बढ़ते नजर आ रहे थे। लेकिन अब शायद अपनी सरकार का कार्यकाल पूरा होते देखकर सत्तारूढ़ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और उसके सहयोगी दलों ने अदालत से एक और टकराव न मोल लेने का फैसला किया है। पाकिस्तान में आज तक किसी भी निर्वाचित केंद्र सरकार को पांच साल का निर्धारित कार्यकाल पूरा करने का मौका नहीं मिला है। इस लिहाज से जरदारी सरकार अगर अपना कार्यकाल पूरा कर लेती है तो यह न केवल एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी बल्कि आगामी चुनाव में भी पीपीपी और उनके सहयोगी दलों को इसका फायदा मिलेगा और पाकिस्तान में कार्यपालिका और न्यायपालिका का टकराव भी टलेगा। कुल मिलाकर अशरफ की यह मूव शातिर चाल मानी जाएगी।

क्या मनमोहन सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो गई है?


 Published on 22 September, 2012
 अनिल नरेन्द्र
श्री प्रणब मुखर्जी को यूं ही नहीं कहा जाता था कि वह कांग्रेस पार्टी और यूपीए सरकार के संकट मोचन हैं। उन्हें राष्ट्रपति बने अभी दो महीने का भी समय नहीं हुआ यानी कांग्रेस का संकट मोचन हटे दो महीने नहीं हुए और यह सरकार डांवाडोल हो गई है। प्रणब दा की अनुपस्थिति में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने खुद पार्टी और सरकार की बागडोर सम्भाली। यह कितनी सफल नेता हैं दो महीने में पता चल गया। इस दौरान सरकार का और विपक्ष का सिर्प टकराव ही हुआ है। रही बात टाइमिंग की तो पता नहीं मनमोहन सिंह ने क्या सोच कर एक और डीजल और एलपीजी मूल्यों में वृद्धि की और अभी जनता इससे सम्भली ही नहीं थी कि एफडीआई की नई समस्या खड़ी कर दी। क्या एफडीआई और डीजल, एलपीजी मूल्यों के साथ-साथ लाना जरूरी था। नतीजा यह हुआ कि तमाम विपक्ष एकजुट हो गया। भारत बन्द ने यह तो साबित कर ही दिया कि लोकसभा के बहुमत सांसद सरकार के खिलाफ है। चाहे वह भाजपा हो, सपा हो या फिर वाम मोर्चा हो सभी आज सरकार के खिलाफ खड़े हैं। ममता लगता है अब मानने वाली नहीं। उनकी अपनी मजबूरियां हैं। प. बंगाल में उनका मुकाबला वाम मोर्चा से है। ममता एक मिनट के लिए डीजल कीमतों पर सौदेबाजी कर सकती थी पर एफडीआई पर वह किसी कीमत पर यह समझौता नहीं कर सकतीं। अगर वह करती हैं तो प. बंगाल में वाम मोर्चा इसका फायदा उठाकर ममता के खिलाफ चुनावी मुद्दा बना सकता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर खुले आरोप लग रहे हैं कि वह आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के सिद्धांत से प्रेरित होकर फैसले ले रहे हैं, उन्हें अमेरिका की ज्यादा चिन्ता है बनिस्पत भारत के। यूपीए सरकार में कांग्रेस सबसे बड़ा घटक दल है, इसलिए उसे सभी दलों को विश्वास में लेकर चलना चाहिए। ऐसा लगता है कि 2004 में गठबंधन सरकार चलाने के बावजूद कांग्रेस आठ साल बाद भी गठबंधन की राजनीति को लेकर सहज नहीं हो पाई है और जब-तब अहंकार उसके आड़े आ जाता है। वह यह भूल जाती है कि 1991 की नरसिंह राव की अगुवाई वाली अल्पमत सरकार बनाने के बाद से उसकी स्वीकार्यता उस स्तर को नहीं छू सकी है जिसके जरिये वह अपने दम पर सरकार बना लेती थी या चला सकती है। पिछली बार भी उसे 205 सीटें ही मिली थीं और वह घटक दलों के समर्थन से ही चल रही है पर इसके बावजूद कांग्रेस में आज अहंकार इतना हावी हो गया है कि वह जरूरी से जरूरी फैसलों पर भी महत्वपूर्ण घटक दलों से सलाह मशविरा नहीं करती और एकतरफा फैसला लेकर उम्मीद करती है कि घटक दल उसकी मदद करने पर मजबूर होंगे। आज अगर सीबीआई का हौवा नहीं होता तो दोनों मुलायम और मायावती कांग्रेस को उनकी सही औकात दिखा देते। वैसे भी सपा और बसपा विश्वसनीय सहयोगी नहीं कहे जा सकते और फिलहाल तो ये दोनों भी कठोर रवैया अपनाए हुए हैं और सरकार को अहंकारी और जन विरोधी बता रहे हैं। संप्रग के एक अन्य घटक दल द्रमुक ने जिस तरह भारत बन्द में शामिल होकर कांग्रेस को एक झटका दिया है, द्रमुक के इस फैसले से यह स्पष्ट है कि वर्तमान में कोई भी दल सरकार के साथ खड़ा दिखने को तैयार नहीं है। बेहतर हो कि कांग्रेस के नीति-नियंता इस बारे में विचार करें कि ऐसी स्थिति क्यों बनी? कांग्रेस यह कह कर आम जनता और सहयोगी दलों को प्रभावित नहीं कर सकती कि वह आर्थिक सुधारों के प्रति प्रतिबद्ध है और उनसे पीछे हटने वाली नहीं। कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्रीय सत्ता ने हाल ही में जो फैसले लिए हैं उन्हें पूरी तौर पर आर्थिक सुधार की संज्ञा देना कठिन है। डीजल के दामों में वृद्धि और रिटेल कारोबार में विदेशी पूंजी को अनुमति देने के फैसले को वास्तविक आर्थिक सुधार मानना कठिन है। तेल कम्पनियां डीजल मूल्य के मामले में अभी भी सरकार की मोहताज हैं इसी तरह रिटेल कारोबार में विदेश पूंजी को अनुमति देने का फैसला तब तक आधा-अधूरा ही है जब तक उस पर राजनीतिक सहमति नहीं बन जाती। हमारी नजर में भारत बन्द सफल रहा। भाजपा ने इसकी सफलता के लिए बहुत मेहनत की। बन्द को सफल बनाने के लिए पार्टी ने अपने 50 नेताओं को अलग-अलग शहरों में भेजा। भारत बन्द में गिरफ्तारी देते समय सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने कहा कि फिलहाल उनका समर्थन यूपीए के साथ है लेकिन यह कब तक रहेगा कह नहीं सकते। इसका मतलब है कि वो बसपा के फैसले का इंतजार करेंगे। मायावती आगामी 10 अक्तूबर को आगे का रास्ता तय करेगा। चूंकि मुलायम सिंह राजनीति में मंझे हुए खिलाड़ी हैं इसलिए वो नहीं चाहेंगे कि वह माया से पहले अपने पत्ते खोलें। इतना तय है कि मनमोहन सिंह सरकार के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह जरूर लग गया है। कुछ लोगों का तो यहां तक मानना है कि यूपीए सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो गई है।


Friday, 21 September 2012

देश में बढ़ते बलात्कार और वारदातें ः 2012 में 29.27 फीसद वृद्धि


 Published on 21 September, 2012
 अनिल नरेन्द्र
देश में और खासकर राजधानी दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा के लिए भले ही सरकार द्वारा कितने ही इंतजामात किए गए हों लेकिन इन दावों की हवा राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों ने खोखली साबित कर दी है। ब्यूरो के रिकार्ड चौंकाने वाले हैं। इसके मुताबिक बलात्कार जैसा जघन्य अपराध साल 2012 में 29.27 फीसदी दर के साथ आगे बढ़ रहा है। रिकार्ड के मुताबिक रोज लगभग 50 महिलाओं के साथ बलात्कार होता है अर्थात् एक घंटे में दो महिलाओं की इज्जत लुटती है। गौर करने वाली बात यह है कि यह आंकड़े सरकारी रिपोर्ट के आधार पर निर्भर हैं लेकिन बहुत से ऐसे मामले हैं जिनको दबा दिया जाता है। जो बदनामी के डर की वजह से रिपोर्ट ही नहीं होते। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2011 में बलात्कार के कुल 7112 मामले सामने आए, इससे पहले वर्ष 2010 में 5484 मामले दर्ज किए गए थे। बलात्कार के आंकड़ों पर गौर करें तो बलात्कार के मामलों में 29.27 फीसदी इजाफा हुआ है। बलात्कार के मामलों में मध्य प्रदेश राज्य प्रथम स्थान पर रहा जहां एक साल में 1262 मामले दर्ज हुए। दूसरे स्थान पर 1088 मामलों में उत्तर प्रदेश है जबकि 818 मामलों के साथ महाराष्ट्र तीसरे स्थान पर है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक शहरों में दिल्ली बलात्कार के मामले में अव्वल है। पिछले कुछ दिनों में ही यहां पर बलात्कार के कई मामले दर्ज किए गए हैं। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई दूसरे जबकि भोपाल तीसरे स्थान पर है। इस मामले में पुणे चौथे स्थान पर है जबकि गुलाबी नगरी जयपुर पांचवें स्थान पर काबिज है। आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में वर्ष 2011 में बलात्कार के 568 मामले, मुंबई में 218 मामले दर्ज हुए। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्ययन के मुताबिक, भारत में हर 54वें मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार किया जाता है। इस बीच राजधानी दिल्ली में साल 2011 के मुकाबले वर्ष 2012 में आपराधिक मामलों में भी काफी इजाफा हुआ है। हत्या, हत्या के प्रयास, फिरौती मांगने वाले अपराधों में भी वृद्धि दर्ज की गई है। रोड पर हो रहीं वारदातों को भी नहीं रोका जा सका। पुलिस का कहना है कि हर घर की सुरक्षा नहीं की जा सकती, लेकिन हाल में हुई वारदातों को तो अपराधियों ने सड़कों पर ही अंजाम दिया। दिन-दहाड़े सड़कों पर हो रहीं वारदातों को क्यों नहीं रोका जा सकता? गौरतलब है कि अपराधी अपराध करने के बाद भागने में क्यों सफल हो जाते हैं? क्यों नहीं उन्हें कहीं भी रोका जा सका? उदाहरण के तौर पर राजधानी दिल्ली के बिन्दापुर में एक सनकी आशिक ने पहले दो लोगों की हत्या की उसके बाद वो मोटर साइकिल पर सवार होकर बेखौफ गाजियाबाद की तरफ भागा, इस दौरान उसे कहीं भी रोकने की कोशिश नहीं की गई। दिल्ली पुलिस के जवान सड़कों पर बैरिकेटिंग कर वाहनों की जांच करते हैं, लेकिन सनकी रवि बेखौफ दिल्ली से गाजियाबाद गया और वहां भी दो लोगों की हत्या कर दी। इसी सिलसिले में राजधानी के स्वरूप नगर इलाके में सात सितम्बर 2012 को कुछ देर तक गोलियों की आवाज गूंजी और फिर मौत का सन्नाटा पसर गया। दो सनकी आशिकों ने अपनी ही प्रेमिकाओं को अपने हाथों से गोली मार दी। इन वारदातों से साफ है कि दिल्ली में सड़कों पर बदमाश आसानी से वारदात करते हैं और फिर भाग जाते हैं।

मंजिल एक पर रास्ते अलग-अलग ः अन्ना हजारे


 Published on 21 September, 2012
 अनिल नरेन्द्र
अन्ना हजारे ने साफ कर दिया है कि वह राजनीतिक दल का गठन करने के अपने सहयोगी अरविन्द केजरीवाल के प्रस्ताव से सहमत नहीं हैं। अपने गांव रालेगण सिद्धि में अन्ना ने अपने संगठन भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन को सक्रिय करने का जो फैसला किया है उसके बाद इस आंदोलन की दो अलग-अलग दिशाएं तय हो गई हैं। एक ओर अब अरविन्द केजरीवाल हैं जो दो अक्तूबर को एक राजनीतिक पार्टी शुरू करने का ऐलान कर चुके हैं, दूसरी ओर अन्ना ने अपने पुराने गैर राजनीतिक संगठन को फिर से सक्रिय करके राजनीति से दूर रहने का साफ संकेत दे दिया है। भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन अन्ना हजारे का पुराना संगठन है, जिसके तहत उन्होंने महाराष्ट्र में कई आंदोलन किए थे। अन्ना ने मंगलवार को कहा कि केजरीवाल के पार्टी बनाने का मतलब होगा भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाने का एक समान लक्ष्य पाने के लिए अलग-अलग रास्ता अपनाना। अन्ना हजारे ने कहा कि मैंने तय किया है कि मैं किसी राजनीतिक दल का गठन नहीं करूंगा और चुनाव भी नहीं लड़ूंगा। अन्ना से पूछा गया था कि क्या केजरीवाल के नई राजनतीकि पार्टी का गठन करने में उन दोनों के बीच दरार आ जाएगी। अभी तक ऐसा नहीं लग रहा था कि अन्ना हजारे राजनीतिक पार्टी के विचार के खिलाफ हैं या वह राजनीति में लिप्त नहीं होना चाहते, लेकिन अब शायद उन्हें लगा हो कि राजनीति की कीचड़ से उनकी छवि को दाग लग सकते हैं। वह अब कह रहे हैं कि वह राजनीति से दूर रहेंगे, पर चुनावों में ईमानदार और स्वतंत्र उम्मीदवारों को समर्थन दे सकते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चे में सिर्प यही दरार नहीं है। अरविन्द केजरीवाल और किरण बेदी के बीच भी मतभेद सामने आ गए हैं। इसके अलावा अन्ना की टीम के प्रमुख सदस्य भी अपनी-अपनी राह पकड़ सकते हैं क्योंकि भ्रष्टाचार विरोध के अलावा अन्य मुद्दों पर उनकी राय अलग-अलग नजर आ रही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि अन्ना हजारे एक नेक नीयत, ईमानदार और मेहनती व्यक्ति हैं, लेकिन तमाम राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर उनका कोई व्यापक नजरिया नहीं है। दूसरी ओर अरविन्द केजरीवाल एक बहुत ज्यादा महत्वाकांक्षी व्यक्ति हैं जो आमतौर पर लेफ्ट की भाषा बोलते हैं। हाल ही में उन्होंने एक सर्वेक्षण कराया। इंडिया अगेंस्ट करप्शन द्वारा किए गए सर्वे में निष्कर्ष निकला कि 7,37,041 लोगों में से 5,61,701 ने एक राजनीतिक पार्टी बनाने का समर्थन किया। सर्वे में 76 फीसदी ने पार्टी बनाने और 24 फीसदी ने विरोध में राय दी है। पुणे में सामाजिक कार्यकर्ताओं से बैठक के बाद अन्ना शाम को नई दिल्ली पहुंचे। उन्होंने कहा कि जो लोग चुनाव नहीं लड़ना चाहते उन्हें एक बड़ा आंदोलन खड़ा करना होगा। पिछले साल अगस्त के रामलीला मैदान आंदोलन से भी बड़ा। अन्ना ने आंदोलन के बदलते रंग को देखते हुए जेपी आंदोलन का भी जिक्र किया। यह भी कहा कि जय प्रकाश नारायण को क्या पता था कि उनके आंदोलन से लालू प्रसाद जैसे नेता निकलेंगे। इस बात की क्या गारंटी है कि हमारे पास ऐसे लोग नहीं होंगे। उन्होंने कहा, `मेरी अपील तो यह है कि चुनाव मत लड़ो। जो भी लड़ना चाहता है लड़े। आखिर हमारी मंजिल तो एक ही है बेशक रास्ते अलग-अलग।'


Thursday, 20 September 2012

देश में सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने के पीछे साजिश है


 Published on 20 September, 2012
 अनिल नरेन्द्र
जिस तरीके से उत्तर प्रदेश के कुछ शहरों में दंगा-फसाद हो रहा है उससे तो यही लगता है कि कुछ ताकतें देश में अराजकता, सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने में लगी हुई हैं। शुक्रवार को गाजियाबाद के मसूरी थाना क्षेत्र  के आध्यात्मिक नगर स्टेशन के पास एक धार्मिक पुस्तक के पन्ने पर अपशब्द लिखे होने की अफवाह फैली जिसकी शिकायत मसूरी पुलिस से की गई थी। शाम को मसूरी में मामला दर्ज किया जा रहा था कि इसी बीच भारी संख्या में एक समुदाय के लोग थाने पहुंचे और उपद्रव शुरू कर दिया। हिंसक भीड़ ने एनएच-24 को जाम कर थाने में तोड़फोड़ और आगजनी की। पुलिस ने हालात पर काबू पाने के लिए बल प्रयोग किया तो भीड़ की ओर से गोलीबारी व पथराव होने लगा। तब पुलिस ने भी फायरिंग की। दोनों तरफ से फायरिंग और पथराव में छह लोग मारे गए तथा दर्जनों घायल हुए। मरने वालों में नाहल निवासी आसिफ, पिपलैड़ा निवासी वाहिद, दियरा का निवासी लुकमान, कबीर नगर निवासी आमिर, डासना निवासी वसीम तथा मसूरी निवासी हयात के रूप में हुई। वसीम बीटेक का छात्र था। उपद्रव के दौरान एसपी देहात जगदीश शर्मा, दरोगा रमेश चन्द, हैड कांस्टेबल रूप चन्द, कांस्टेबल जनरेवर सैनी समेत दूसरे पक्ष के भी कई लोग घायल हो गए। फिलहाल हालात प्रशासन के नियंत्रण में है। लेकिन इस घटना से जो सवाल खड़े हुए हैं वे जरूर बड़े हैं और महत्वपूर्ण भी। पहले असम हिंसा, फिर मुंबई में उपद्रव और इस क्रम में पूर्वोत्तर के लोगों के पलायन के बाद इस बात के पुष्ट संकेत थे कि देश की आबोहवा में जहर घोलने की साजिश चल रही है। बाद में देश के कई अन्य हिस्सों, खासकर उत्तर प्रदेश में ऐसी घटनाएं घटीं जिनसे अन्देशा हुआ कि कुछ शक्तियां देश के अन्दर और बाहर ऐसी हैं जो हमारे सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने में तुली हुई हैं। यहां तक कि एक पखवाड़ा पहले उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 में भी मामूली विवाद के बाद व्यापक हिंसा और आगजनी हुई थी। अब गाजियाबाद में यह हुआ। प्रश्न जरूर उठता है, क्या वजह है कि तमाम पुख्ता अन्देशों के बाद आखिर  एक छोटी-सी चिंगारी को जानलेवा आग में बदलने से नहीं रोका जा सका? सवाल हमारी गुप्तचर एजेंसियों पर भी उठता है कि क्या वजह है कि उन्हें समय रहते इन साजिशों का आभास नहीं होता? साथ ही स्थानीय प्रशासन क्या सो रहा था, उसे इस माहौल का पता नहीं चला? सपा की अखिलेश यादव की सरकार राज्य में कानून व्यवस्था सुरक्षित रखने में नाकाम साबित हो रही है। इन तत्वों का पता लगाना अत्यंत जरूरी है जो देश में सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने का पूरा प्रयास कर रहे हैं, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि आज जनता में भारी असंतोष है और कोई भी मौका मिले वह सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर कर उपद्रव और आगजनी करने से नहीं चूकते। कुछ हद तक पुलिस का खौफ भी कम होता जा रहा है। पुलिस को भी हम दोष नहीं दे सकते क्योंकि राजनेता उन्हें स्पष्ट आदेश देने से कतराते हैं। इस वोट बैंक पालिटिक्स ने देश को तबाह कर दिया है। लगता है कि हम एक ज्वालामुखी पर बैठे हैं जो कभी भी फट सकता है।

इस बार टी-20 वर्ल्ड कप किसी की भी झोली में जा सकता है


 Published on 20 September, 2012
अनिल नरेन्द्र
आखिर खत्म हो गया क्रिकेट प्रेमियों का इंतजार। पूरी दुनिया एक बार फिर फटाफट क्रिकेट का आनन्द उठाने को तैयार है। टी-20 वर्ल्ड कप 2012 का आगाज हो चुका है। इस बार आयोजन श्रीलंका में हो रहा है। श्रीलंका में अगले 20 दिनों तक 12 टीमों के बीच रोमांच की नई कहानी लिखी जाएगी। एक विकेट से मैच का रुख बदलेगा तो एक रन से जीत का फैसला तय होगा। कुछ मैच सुपर ओवर तक भी जा सकते हैं। गेंद और बल्ले की जंग में ग्लैमर का तड़का भी लगेगा, मतलब मनोरंजन की होगी पूरी गारंटी। कई नए रिकार्ड बनेंगे, कई पुराने टूटेंगे। उपमहाद्वीप की पिचें हमेशा से रोमांचक क्रिकेट के लिए मशहूर रही हैं। लिहाजा इस बार का टी-20 वर्ल्ड कप भी रोमांचक होगा, इसमें कोई शक नहीं है। टी-20 वर्ल्ड कप की विजेता टीम को 10 लाख डॉलर मिलेंगे। उपविजेता को पांच लाख डॉलर। सेमीफाइनल में पहुंचने वाली टीम को 2,50,000 डॉलर मिलेंगे। इस बार का टी-20 वर्ल्ड कप शायद सबसे खुला टूर्नामेंट है। इस बार टी-20 विश्व कप का खिताब कौन जीतेगा या फिर कौन-सी दो टीमें फाइनल में पहुंचेंगी, अनुमान लगाना थोड़ा मुश्किल है। वैसे भी टी-20 खेल में किसी प्रकार की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। क्योंकि खेल में कई रोचक उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं। मैच के दिन कौन-सी टीम अच्छा प्रदर्शन करती है, इस पर उस दिन हार-जीत निर्भर करती है। कागजों में बेशक आप बहुत मजबूत दिखो पर उस दिन आप अच्छा नहीं खेलोगे तो हार जाओगे। पहले सत्र की चैंपियन टीम इंडिया श्रीलंका की धीमी पिचों में जरूर एक बार फिर खिताब अपने नाम करने की पूरी कोशिश करेगी पर पाकिस्तान के साथ खेल अभ्यास मैच में एक बॉलर की कमी महसूस हुई। सात बल्लेबाजों को खिलाने का कोई तुक नहीं। एक बल्लेबाज को कम कर एक स्पिनर को लेना बेहतर होगा। पाकिस्तानी टीम अप्रत्याशित प्रदर्शन में माहिर है। मोहम्मद हफीज की टीम इस बार बेहद संतुलित दिखती है। आस्ट्रेलिया को हराकर यहां पहुंची इस टीम का मनोबल ऊंचा है। भारत को अभ्यास मैच में हराकर भी पाकिस्तान का आत्मविश्वास बढ़ा होगा। मेजबान श्रीलंका भी एक संतुलित टीम है। अच्छे धुआंधार बल्लेबाजों के साथ मलिंगा जैसा टी-20 बॉलर भी उनके पास है। वेस्टइंडीज में क्रिस गेल अगर चल गए तो उस दिन उनके सामने कोई बॉलर, टीम नहीं टिक सकती। आस्ट्रेलिया भी अच्छी टीम है। जार्ज बैली की कप्तानी वाली आस्ट्रेलियाई टीम अभी तक टी-20 प्रारूप में अपना लोहा नहीं मनवा सकी है। चैंपियन इंग्लैंड को पिछले मैन ऑफ द टूर्नामेंट केविन पीटरसन की कमी खलेगी। विवादों से घिरे रहने वाला यह बिग हिटर टी-20 और वन डे क्रिकेट से संन्यास ले चुका है। इंग्लैंड क्रिकेट ने टी-20 क्रिकेट खेलते रहने की उसकी गुजारिश ठुकरा दी थी। एबी डिविलियर्स की दक्षिण अफ्रीकी टीम ने अभी तक एक भी आईसीसी ट्रॉफी नहीं जीती है। दबाव के आगे घुटने टेकने के लिए बदनाम दक्षिण अफ्रीका इस बार चोकर्स का दाग धोना चाहेगी। वेस्टइंडीज और न्यूजीलैंड छुपे रुस्तम साबित हो सकते हैं। कैरेबियाई टीम जरूर चाहेगी कि क्रिस गेल आईपीएल फार्म में रहें जिसके दम पर उन्होंने राष्ट्रीय टीम में वापसी की। कैरेबियाई टीम संघर्षरत थी, लेकिन जब से गेल ने वापसी की है टीम ने पिछले कुछ महीनों में अच्छे नतीजे दिए हैं। न्यूजीलैंड के पास डेनियल विटोरी जैसे स्पिनर हैं जिसे पिच से मदद मिलेगी। अफगानिस्तान, आयरलैंड के अलावा जिम्बाब्वे भी अच्छा प्रदर्शन देंगे। अब बात करते हैं टीम इंडिया की। भारतीय टीम 2007 में उद्घाटन टूर्नामेंट जीतने के बाद से उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी है। बेशक उनके पास अच्छे बल्लेबाज हैं जो एक अच्छा स्कोर बोर्ड पर टांग सकते हैं पर हमारी बालिंग में भी तो इतना दम हो कि हम विरोधी टीम को रन चेस में थाम सकें। अभ्यास मैच में जिस तरीके से पाकिस्तानी बल्लेबाजों ने रन चेस किया और हम उन्हें अतिरिक्त रन देने से रोक नहीं सके जो दो टीमों के बीच हार-जीत का अन्तर पैदा करती है। युवराज सिंह का टीम में लौटना भारतीय क्रिकेट के लिए शुभ संकेत है। युवी वही खिलाड़ी हैं जिन्होंने इंग्लैंड के स्टुअर्ट ब्राड की छह गेंदों में छह छक्के लगाकर मैच का रुख पलट दिया। ब्राड अब इंग्लैंड टीम के कप्तान हैं। भारत को ग्रुप `ए' स्टेज में ही इंग्लैंड से भिड़ना है और यहां देखना रोचक होगा कि इस बार ब्राड के पास मुस्कराने का मौका होगा या फिर युवराज उनकी गेंदों पर छक्के उड़ाएंगे? इस बार टूर्नामेंट में मुकाबला बराबरी का है। कोई भी दावेदार नहीं है और किसी खास दिन किए गए टीम का प्रदर्शन ही महत्व रखता है नाकि उनकी प्रतिष्ठा या पेपर पर दावेदारी।

Wednesday, 19 September 2012

डूसू में एनएसयूआई की धमाकेदार जीत


 Published on 19 September, 2012
 अनिल नरेन्द्र
दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन (डूसू) चुनाव में कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई को शानदार सफलता मिली है और भाजपा की इकाई एबीवीपी का सूपड़ा साफ हो गया है। एनएसयूआई चारों सीटों में जीत गई है। 2007 के बाद डीयू की राजनीति में लगातार कमजोर हो रही एनएसयूआई को संजीवनी मिल गई है। एनएसयूआई अच्छे खासे अन्तर से प्रेजिडेंट, वाइस प्रेजिडेंट व सैकेटरी की पोस्ट पर कब्जा करने में सफल रही। डूसू की हिस्ट्री में पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी पोस्ट पर मुकाबला टाई रहा। ज्वाइंट सैकेटरी के लिए हुए चुनाव में दोनों संगठनों को बराबर-बराबर वोट मिले। चुनाव परिणाम ने भारतीय जनता पार्टी को पूरी तरह सकते में ला दिया है और वह समझ नहीं पा रही है कि आखिर छात्रों ने यह कैसा जनादेश दिया है कि तमाम विपरीत मुद्दों की भरमार के बाद भी उनकी समर्थित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की करारी हार ही नहीं हुई अपितु छात्र संघ में उसका सूपड़ा ही साफ हो गया जो वर्तमान हालातों में पार्टी के लिए पचाना आसान नहीं होगा। दूसरी तरफ एनएसयूआई की इस जीत ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में एक नई संजीवनी का संचार कर दिया है और उन्हें यह कहने का मौका मिल गया है कि दिल्ली के युवाओं ने साफ संदेश दे दिया है कि वह कांग्रेस पार्टी और उसकी नीतियों के साथ हैं। राजधानी में अन्ना हजारे के द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए आंदोलन में भारी तादाद में उस समय युवाओं ने भागीदारी दर्ज की थी। स्कूल और कॉलेज सभी के छात्र अन्ना की टोपी पहने नजर आते थे जिसे लेकर भाजपा कहीं ज्यादा उत्साहित थी और उसे लग रहा था कि कांग्रेस विरोधी युवाओं में जो लहर है उसका लाभ उन्हें ही मिलेगा और इस बात को वह पक्का मानकर चल रही थी कि डूसू चुनाव में तो उनका परचम फहराना तय है। एबीवीपी को लगा कि जिस तरह से देश में भ्रष्टाचार, महंगाई से लोग परेशान हैं उसके चलते डूसू चुनाव में लोग एनएसयूआई को वोट नहीं देंगे। वोटिंग के कुछ घंटे पहले जब डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी हुई तो यह कांफिडेंस और भी बढ़ गया पर एनएसयूआई ने बेहतर रणनीति से चुनाव लड़ा और राष्ट्रीय मुद्दों को इस चुनाव में आने ही नहीं दिया। बीजेपी की ओर से भी एबीवीपी को कोई खास सपोर्ट नहीं मिली जबकि कई सीनियर कांग्रेस लीडर चुनाव में कूद पड़े और हर स्तर पर अपनी छात्र इकाई की मदद की। पैसा भी पानी की तरह बहाया। कोड ऑफ कंडक्ट के मुताबिक कोई उम्मीदवार पांच हजार से ज्यादा खर्च नहीं कर सकता पर पार्टी ने यह कमी पूरी कर दी। बताया जाता रहा है कि इस बार कांग्रेस ने चुनाव के लिए करोड़ों का बजट रखा और उम्मीदवारों को पैसे की कमी नहीं होने दी जबकि एबीवीपी के एक सीनियर छात्र नेता का कहना है कि उन्हें बीजेपी से कोई मदद नहीं मिली। कांग्रेस ने इस चुनाव को बहुत गम्भीरता से लिया और अपनी पूरी ताकत झोंक दी। एमएलए, पार्षदों, मुख्यमंत्री सभी ने मोर्चा सम्भाल रखा था। डीयू में रिजर्व कैटेगरी की खाली सीटों का मुद्दा काफी गरमाया और इन सीटों को इस बार जनरल कैटेगरी में तब्दील नहीं होने दिया। एचआरडी मंत्रालय के आदेश पर कॉलेजों को ज्यादा दाखिले करने पड़े। इसका असर देखने को मिला। वोटिंग पर्सेंटेज 29 से बढ़कर 40 तक पहुंच गया। माना जा रहा है कि बम्पर एडमिशन का फायदा एनएसयूआई को हुआ है। एनएसयूआई के प्रवक्ता का कहना है कि एबीवीपी ने डूसू चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दों को उछाला और छात्रों के हितों वाले मसले पीछे रह गए जबकि स्टूडेंट्स ने राष्ट्रीय मुद्दों को महत्व नहीं दिया। खास बात यह है कि डूसू चुनाव में फर्स्ट ईयर के स्टूडेंट्स ही ज्यादा वोट करते हैं और उन्हें अपने पक्ष में लाने में एबीवीपी नाकाम रही। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने हाथोंहाथ इस जीत को भुना भी लिया। उन्होंने व उनके समर्थकों ने इसको मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के स्वच्छ प्रशासन का परिणाम बताते हुए छात्रों का जनादेश बताया है। उनका कहना है कि भाजपा ने इस चुनाव में भी घटिया हथकंडे अपनाए और झूठ के सहारे चुनाव जीतने का सपना देखा था जिसे छात्रों ने चकनाचूर कर दिया, अब उसे बहानों का सहारा नहीं लेना चाहिए। इस जीत से मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कद बढ़ा है। खुद मुख्यमंत्री की पीठ पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने थपथपाई है, क्योंकि कांग्रेस विरोधी माहौल में इसे रोशनी की किरण मान रहे हैं।



मुलायम, ममता का ड्रामा, यह बादल गरजते हैं, बरसते नहीं


 Published on 19 September, 2012  
  अनिल नरेन्द्र
भ्रष्टाचार, महंगाई, एफडीआई रिटेल के मुद्दे और मनमोहन सरकार का नकारा सिद्ध होने पर भारतीय जनता पार्टी की नजरें मध्यावधि चुनाव पर टिकी हुई हैं। भाजपा उम्मीद पाले हुए है कि संप्रग के घटक दल देर-सवेर इस सरकार से समर्थन वापस ले लेंगे और यह सरकार गिर जाएगी पर हमें नहीं लगता कि ऐसा होगा। ममता बनर्जी, मुलायम सिंह यादव, मायावती और करुणानिधि सभी एक साथ झटके में समर्थन वापस ले लें तो ही सरकार को सही मायने में खतरा हो सकता है। लेकिन तब भी सरकार तुरन्त ही गिर जाने के आसार नहीं हैं। सरकार एक मिनट के लिए गिर भी जाए तो किसी और की सरकार बनने के आसार नहीं हैं। इन सबके मद्देनजर ही कांग्रेस और डॉ. मनमोहन सिंह ने सोची-समझी रणनीति के तहत जोखिम उठाया है। कटु सत्य तो यह है कि संप्रग का कोई घटक दल सरकार गिराने के पक्ष में नहीं है। फिर भी समर्थन वापसी का मन बना लिया जाता है तो सरकार का शक्ति-परीक्षण संसद में ही हो सकता है। संसद का विंटर सेशन अभी करीब तीन महीने दूर है। पहले सत्र अगर बुलाना है तो ममता, मुलायम, माया और करुणानिधि आदि नेताओं के दलों को मिलकर राष्ट्रपति से गुहार करनी पड़ेगी। क्या लेफ्ट पार्टियां और समाजवादी पार्टी सांप्रदायिक बीजेपी के साथ खड़े होंगे, क्या ममता लेफ्ट का साथ देंगी, क्या बसपा-सपा एक खेमे में होंगे, इतने सारे सवाल सरकार को गिराने से बचा सकते हैं। कटु सत्य तो यह है कि न तो ममता समर्थन वापस लेने वाली हैं और न ही सपा। हां, एनडीए जरूर यह उम्मीद पाले है कि सरकार गिर सकती है। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव हमेशा कहते कुछ हैं, करते कुछ और हैं। याद है कि एटमी डील और राष्ट्रपति चुनाव का किस्सा। दोनों बार पहले धमकी दी और बाद में यूपीए के साथ खड़े नजर आए। लोकपाल पर भी सरकार को संकट से निकाल ले गए थे। दरअसल असल खेल तो 2014 की कुर्सी का है। मुलायम सरकार गिराने के बजाय 2014 का इंतजार करना चाहेंगे। इस बीच यूपी और थर्ड फ्रंट के बीच अपनी ताकत बढ़ाते रहेंगे। तब तक मनमोहन सरकार से पैसों की सौदेबाजी करके ज्यादा से ज्यादा पैसे लेते रहेंगे। यही उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के दौरान किया था। पहले धमकी देना फिर नरम हो जाना ममता बनर्जी की पुरानी आदत है। फिलहाल ऐसे कई कारण नजर आ रहे हैं जिनके चलते वह मनमोहन सरकार को गिराने में दिलचस्पी नहीं रखतीं। उनके अपने ही उनके साथ नहीं हैं। तृणमूल के 19 सांसद हैं। लेकिन कबीर सुमन और दिनेश त्रिवेदी हमेशा अलग दिशा में चले हैं। त्रिवेदी को इसी के चलते रेल मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। फिर ममता को मुलायम पर अब भरोसा नहीं रहा। राष्ट्रपति चुनाव में मुलायम पहले तो ममता से कहते रहे कि प्रणब के नाम का विरोध करो, लेकिन बाद में खुद ही प्रणब के लिए राजी हो गए। ममता की एक मुसीबत यह भी है कि वह थर्ड फ्रंट में नहीं जा सकतीं। ममता किसी भी कीमत पर लेफ्ट के साथ खड़ी नहीं हो सकतीं और भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए में जाकर ममता मुस्लिम वोट बैंक को खोना नहीं चाहतीं। ममता की पहली प्राथमिकता बंगाल है। अपनी बंगाल की सरकार चलाने के लिए पैसों की जरूरत दिल्ली से ही पूरी हो सकती है। ऐसे में यूपीए ही एकमात्र गठबंधन बचता है। इसी साल दिसम्बर में बंगाल में पंचायत चुनाव हैं। इनमें वह अकेले चुनाव लड़ने वाली हैं। जीत की सम्भावनाएं प्रबल हैं। वे लेफ्ट को मजबूत होने का मौका नहीं देना चाहती। अब बात करते हैं बहन जी की। मायावती की पहली प्राथमिकता उनका अपना वोट बैंक है। मायावती ने कहा है कि वह अपने रुख के बारे में अक्तूबर में तय करेंगी बस, यही चौंकाने वाली बात थी। क्योंकि माया खुद और फौरन फैसला करती हैं। किसी से पूछ कर नहीं। एटमी डील और लोकपाल पर सरकार को बचाना इसके उदाहरण हैं। वे पहले यह देखना चाहती हैं कि मुलायम क्या फैसला लेते हैं। एफडीआई कभी भी मायावती का मुद्दा नहीं रहा। एफडीआई से उनका आकलन है कि इससे नए रोजगार का बड़ा हिस्सा कमजोर वर्ग को ही मिलेगा। माया अपने मूल जनाधार के हितों के खिलाफ कोई भी कदम उठाने से रहीं। अब आगे होगा क्या? सौदेबाजी जोरों पर है। सरकार कुछ कंसेशन दे सकती है। छह एलपीजी गैस सिलेंडरों की जगह आठ सिलेंडर कर सकती है। डीजल में भी एक-दो रुपए घटा सकती है। मुलायम और ममता दोनों को नए पैकेज मिल सकते हैं। यह बादल यूं ही गरजते रहेंगे, बरसेंगे नहीं।