Friday, 30 September 2011

आफेंस इज दी बेस्ट डिफेंस


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30th September 2011
अनिल नरेन्द्र
अंग्रेजी में एक कहावत है "आफेंस इज दी बेस्ट डिफेंस" यानि कि आक्रमण करना सबसे अच्छा बचाव है। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसी तकनीक को अपनाया लगता है। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की आंच से झुलस रही केंद्र की यूपीए सरकार के रणनीतिकार जहां डैमेज कंट्रोल में जुटे हुए हैं वहीं अमेरिका से स्वदेश लौटते ही डॉ. मनमोहन सिंह ने विपक्ष पर जमकर हमला बोल दिया और विपक्ष के मंसूबों और इरादों की हवा निकालने का प्रयास किया है। विपक्ष पर सरकार को अस्थिर करने और जबरदस्ती देश को मध्यावधि चुनाव की ओर धकेलने का आरोप प्रधानमंत्री ने लगाकर पूरे मामले को एक नई दिशा देने की कोशिश की है। प्रधानमंत्री ने यह जवाबी हमला हवा में एयर इंडिया के विमान से ही शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि हम पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे और मध्यावधि चुनाव नहीं होगा। मंत्रिमंडल के सदस्यों में टकराव की बातें मीडिया की कल्पना है। पी. चिदम्बरम पर मुझे पहले भी पूरा भरोसा था और आज भी है। न्यूयार्प में संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने के बाद फ्रैंकफर्ट से नई दिल्ली जाते हुए विमान में पत्रकारों से बात करते हुए मनमोहन सिंह ने माना कि बिगड़ती अर्थव्यवस्था का असर भारत पर भी हुआ है। मुद्रास्फीति हमारी सबसे बड़ी समस्या है लेकिन हम स्थिति को नियंत्रित रखने के लिए हर संभव कदम उठाएंगे। डॉ. सिंह ने स्वीकार किया कि उनकी सरकार की छवि के बारे में जनता के बीच समस्या हो सकती है जिसे सही करना जरूरी है।
सरकार को अस्थिर कर देश को मध्यावधि चुनाव की ओर धकेलने के विपक्ष पर लगाए प्रधानमंत्री के आरोप पर भाजपा ने पलटवार करते हुए कहा कि अगर सरकार गिरेगी तो अपने कुकर्मों से, हमें साजिश करने की जरूरत नहीं है और न ही ऐसा करने के लिए हमारे पास पर्याप्त संख्या बल है। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कहा कि प्रधानमंत्री ने विदेश से लौटते ही आरोप लगाया है कि विपक्ष सरकार को अस्थिर करने में जुटा है। सुषमा ने कहा कि सरकार के अस्थिरता की ओर बढ़ने का ठीकरा विपक्ष के सिर फोड़ने की बजाय बेहतर यह होगा कि प्रधानमंत्री अपने घर को दुरुस्त करने की फिक्र करें। सुषमा ने कहा कि सरकार और उनके मंत्रियों को लेकर जो भ्रष्टाचार के खुलासे हो रहे हैं उन्हें विपक्ष ने नहीं गढ़ा है बल्कि उन कुकर्मों को खुद उनके द्वारा संचालित सरकार की एजेंसियों ने ही उजागर किया है। अरुण जेटली ने कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, राष्ट्रमंडल घोटाला, यह विपक्ष ने नहीं किया। नोट के बदले वोट कांड से विपक्ष लाभान्वित नहीं हुआ। अस्थिरता की ओर बढ़ने का कारण सरकार में नेतृत्व का गंभीर संकट होना है। यह सरकार स्वयं विध्वंसक मोड़ में है। भाजपा के दोनों नेताओं ने दावा किया कि वित्त मंत्रालय के नोट से साबित हो चुका है कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला में जो अपराध तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा ने किया वही अपराध हूबहू चिदम्बरम ने भी किया। उन्होंने कहा कि इस घोटाले में प्रधानमंत्री को कहीं भी अंधेरे में नहीं रखा गया था बल्कि उन्हें राजा और चिदम्बरम ने हर कदम की बाकायदा जानकारी दी। प्रधानमंत्री की यह रणनीति कितनी सार्थक साबित होगी यह तो आने वाले दिन ही बताएंगे पर एक तरह से उन्होंने यह बयान देकर खुद अपनी सरकार के जीवन पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। जब प्रधानमंत्री खुद ही मध्यावधि चुनाव की बात करने लगे तो इसका जनता-जनार्दन में क्या संदेश जाएगा, आप खुद ही समझदार हैं।
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हक्कानी नेटवर्प को लेकर पाक-अमेरिका में बढ़ती तल्खी


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30th September 2011
अनिल नरेन्द्र
अमेरिका के एक शीर्ष कांग्रेसी सांसद टेड पो ने पाकिस्तान को दी जाने वाली सभी तरह की आर्थिक सहायता पर रोक लगाने के लिए अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में एक प्रस्ताव पेश कर दिया है। टेक्सास के इस सांसद की तरफ से पेश किया गया यह प्रस्ताव (एमआर 3013) अगर पारित हो जाता है तो पाकिस्तान को परमाणु हथियारों की सुरक्षा के लिए दी जा रही सहायता राशि के अलावा सभी तरह की सहायता राशि पर रोक लग जाएगा। टेड ने हाल ही में सदन में यह प्रस्ताव पेश करने के बाद कहा कि ऐबटाबाद में ओसामा बिन लादेन के ठिकाने का पता लगने के बाद पाकिस्तान अमेरिका के लिए विश्वासघाती, धोखेबाज और खतरनाक साबित हुआ है। उन्होंने कहा कि यह तथाकथित सहयोगी अरबों डालर की अमेरिकी सहायता ले रहा है और दूसरी तरफ अमेरिकियों पर हमला करने वाले आतंकवादियों को समर्थन दे रहा है, इसलिए उसे दी जा रही सहायता रोकी जाए। अमेरिका 1948 से अब तक एक अनुमान के अनुसार 30 अरब पौंड (करीब 22 खरब 93 अरब रुपये) की सीधी मदद दे चुका है। इसकी आधी राशि (अलग से) पाक को सैन्य मदद के रूप में दी जा चुकी है। 1962 में अमेरिकी मदद की राशि सबसे ज्यादा 2.5 अरब डालर (122.42 अरब रुपये) थी। 1990 के दशक में मदद निम्नतम स्तर पर थी। राष्ट्रपति जार्ज बुश ने पाक के परमाणु कार्यक्रम के चलते मदद करनी बन्द कर दी थी। 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान और बाद में अमेरिका ने कोई मदद नहीं दी। एक समय कहा जाता था कि पाकिस्तान की सुई भी अमेरिका से आती है। अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दी जा रही आर्थिक, सैन्य मदद से साफ है कि अमेरिका के बिना पाकिस्तान कुछ नहीं। अमेरिकी मदद से ही पाकिस्तान में विकास कार्य चलते हैं। यदि यह मदद आनी बन्द हो गई तो पाकिस्तान में हर चीज ठप होने का खतरा बढ़ जाएगा।
कुछ दिनों से अमेरिका और पाकिस्तान के बीच तनाव का मुख्य कारण हक्कानी नेटवर्प को मदद को लेकर है। अमेरिका ने हक्कानी नेटवर्प के खिलाफ पाकिस्तान को सख्त कार्रवाई करने को कहा है। पेंटागन प्रवक्ता ने कहा कि पिछले एक हफ्ते से हम पाक सरकार को यह संदेश दे रहे हैं कि वो अपने क्षेत्र में मौजूद आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करे। पेंटागन प्रवक्ता जार्ज लिटिल ने कहा कि हम पाकिस्तान सरकार से उम्मीद करते हैं कि वह अफगान सीमा से सटे अपने क्षेत्र में मौजूद उन आतंकियों के खिलाफ कदम उठाए जो अफगानिस्तान में दाखिल होकर अमेरिकी तथा अफगानियों पर हमला कर रहे हैं। एक अन्य वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि पाकिस्तान हक्कानी नेटवर्प का सुरक्षित पनाहगाह है और यह गंभीर चिन्ता का विषय है। अमेरिका इस नेटवर्प के खिलाफ ठोस कार्रवाई देखना चाहता है। उल्लेखनीय है कि हक्कानी नेटवर्प मूल रूप से अफगानिस्तान के जलालुद्दीन हक्कानी के नेतृत्व में सक्रिय आतंकी संगठन है। अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमांत क्षेत्र में इसके पास 15000 सक्रिय आतंकियों की फौज है। इसके प्रमुख नेता हैंöजलालुद्दीन हक्कानी, सिराजुद्दीन हक्कानी, बदरुद्दीन हक्कानी  और नसीरुद्दीन हक्कानी। मूल रूप से इसके आत्मघाती हमले करवाना सबसे प्रभावी तरीका है। हत्या, फिरौती और हथियारों की खरीद-फरोख्त के माध्यम से धन उगाने से यह अपना नेटवर्प चलाता है। हक्कानी नेटवर्प का प्रभाव दक्षिण अफगानिस्तान के पाकतिया, पाकतिका, वारदक, लोगर और गजनी क्षेत्रों में जाता है।
पाकिस्तान ने अमेरिका पर जवाबी हमला करते हुए कहा कि अमेरिका ने ही हक्कानी नेटवर्प को खड़ा किया है। पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने दावा किया है कि अमेरिका की सीआईए ने सोवियत संघ के अफगानिस्तान में जबरन कब्जे के खिलाफ यह तालिबानी गुट बनाया था, उन्हीं से इसे प्रशिक्षित किया था। मलिक ने रविवार को इस्लामाबाद में कहा कि हक्कानी समूह का जन्म पाकिस्तान में नहीं हुआ और अमेरिका को अब उन चीजों के बारे में नहीं बोलना चाहिए जो 20 साल पहले हुई थी। मलिक ने कहा कि हक्कानी नेटवर्प अब अफगानिस्तान में सक्रिय है और जो लोग इसके विपरीत दावा कर रहे हैं उन्हें पाकिस्तान में इसकी उपस्थिति के बारे में सबूत देना चाहिए। हक्कानी नेटवर्प और आईएसआई के रिश्तों से अमेरिका और पाकिस्तान के बीच आई तल्खी के बीच अफगान तालिबान ने पहली बार पाक सरकार का पक्ष लेते हुए बयान जारी किया है कि इस मामले की आड़ लेकर अमेरिका पाकिस्तान में अराजकता पैदा कर सरकार को कमजोर करना चाहता है ताकि वह अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर हो। बयान में कहा गया है कि अमेरिका का प्रयास पाकिस्तानी जनता और वहां की सरकार के बीच टकराव पैदा करने का भी है, वह यह दिखाना चाहता है कि पाकिस्तान आतंकवादियों की पनाहगाह है। कुल मिलाकर अमेरिका और पाकिस्तान के बीच तल्खी बढ़ती जा रही है। मैंने एक खबर यह भी पढ़ी है कि अमेरिकी सेना पाकिस्तान के कुछ आतंकी ठिकानों पर बड़ा अटैक करने की योजना बना रही है।
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Thursday, 29 September 2011

सीबीआई ने कहा सरकार जाए भाड़ में



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 29th September 2011
अनिल नरेन्द्र
मैंने इसी कॉलम में दो-तीन दिन पहले संकेत दिया था कि अब सीबीआई सरकार की पिछलग्गू बनने से कतराने लगी है और वह स्वतंत्र रूप से काम करने की इच्छुक है। यह अच्छी बात भी है। दरअसल यह नौकरशाह भी बड़ी अजीबो-गरीब जमात है। जब इन्हें लगने लगे कि यह सरकार निहायत कमजोर है या उन्हें यह लगने लगे कि अब इस सरकार के दिन गिने-चुने रह गए हैं तो उन्हें लगने लगता है कि अब यह सरकार हमारा न तो कुछ भला कर सकती है और न ही बुरा, तो यह जमात मंत्रियों को आंख दिखाने लगते हैं और अपने ढंग से काम करना शुरू कर देते हैं। मुझे तो यही स्थिति सी लगती है। नौकरशाहों को यह महसूस होने लगा है कि अब सरकार हमें कोई पुरस्कार भी नहीं दे सकती, नौकरी की एक्सटेंशन नहीं दे सकती, न ट्रांसफर कर सकती है। इसलिए क्यों न हम वह करें जो हमारी नजरों से सही हो। यही वजह है कि मुझे अत्यंत विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि अब मंत्री अगर कोई मौखिक आदेश दे तो सचिव लोग कहते हैं कि आदेश लिखित रूप से दें, महज संकेतों से हम कोई आर्डर देने को तैयार नहीं हैं। सीबीआई भी अब ऐसा ही करने लगी है।
मंगलवार को 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सामने आई वित्त मंत्रालय की चिट्ठी की जांच की जाए या नहीं, इस मुद्दे पर सीबीआई और केंद्र सरकार आमने-सामने आ गए। केंद्र ने जहां इस चिट्ठी की सीबीआई द्वारा अध्ययन करने की बात कही, वहीं सीबीआई का कहना था कि चिट्ठी का अध्ययन करने का सवाल ही खड़ा नहीं होता। वह एक स्वतंत्र संस्था है और किसी (सरकार) को उसकी ओर से बयान देने की जरूरत नहीं है। सीबीआई ने कहा कि उसे पी. चिदम्बरम की जांच करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। गौरतलब है कि 2जी घोटाले में याचिकाकर्ता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने वित्त मंत्रालय की पीएमओ को लिखी चिट्ठी सुप्रीम कोर्ट में पेश की और उसके आधार पर उन्होंने गृहमंत्री पी. चिदम्बरम के खिलाफ सीबीआई की जांच की मांग की। जब अदालत में इस मुद्दे पर सुनवाई हुई तो केंद्र सरकार ने कहा कि कोर्ट के सामने जो नए दस्तावेज रखे गए हैं सीबीआई उनका अध्ययन करेगी और जरूरत पड़ने पर अपनी अगली स्टेटस रिपोर्ट में उसका उल्लेख करेगी। इसके विरोध में सीबीआई ने वित्त मंत्रालय के नोट पर कहा कि सरकार हमें यह न बताए कि हमें किस मामले की और किस तरह से तहकीकात करनी है। सीबीआई ने कहा कि हमें किसी दिशा-निर्देश की जरूरत नहीं है और सरकार हमें गाइड न करे। हम अपनी जांच के सभी पहलुओं पर नजर रखे हुए हैं। सीबीआई सूत्रों के मुताबिक वित्त मंत्रालय की चिट्ठी में नया कुछ नहीं है। हमें सभी फेरबदल की जानकारी है और किसी कानूनी राय की मांग नहीं की गई है। सीबीआई का कहना है कि हमारा काम सिर्प आपराधिक मामले की तहकीकात करना है, न कि नीतिगत मामलों का। सीबीआई ने यह भी कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट इस मामले को मॉनीटर कर रहा है तो कोई दिक्कत नहीं लेकिन अगर एसआईटी जैसी संस्था बाहर से मॉनीटरिंग करेगी तो हमें जरूर परेशानी होगी। सीबीआई सूत्रों के मुताबिक चिदम्बरम का कोई रोल नहीं है लेकिन उस वक्त के वित्त सचिव की भूमिका को लेकर जांच की जा रही है। इसके अलावा दयानिधि मारन के मामले में जांच पूरी हो चुकी है और अब यह फैसला लेना है कि उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल की जाए या नहीं। सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को भी इसी मुद्दे पर सुनवाई जारी रहेगी। उधर याचिकाकर्ता डाक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी ने मंगलवार की सुनवाई के तुरन्त बाद इंटरनेट पर ट्विट किया कि यह तो गजब हो गया। मेरी याचिका के विरोधी ही आपस में झगड़ा कर रहे हैं। मनमोहन सिंह सरकार का वकील कह रहा है कि मेरे द्वारा दाखिल दस्तावेजों की सीबीआई जांच करे। दूसरी ओर सीबीआई का वकील कह रहा है कि सरकार भाड़ में जाए। डॉ. स्वामी ने कहा कि उनके द्वारा दाखिल कागजात को लेकर सीबीआई शर्मिंदा है कि जो कागज उसे नहीं मिल सके वह मुझे कैसे मिल गए? मनमोहन सरकार की मुश्किलें दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। अगर सीबीआई भी केंद्र सरकार के हाथ से निकल गई तो बहुत कुछ आगे हो सकता है।
असल में सीबीआई ही अकेली ऐसी संस्था नहीं है जो सरकार को आंखें दिखाने का साहस कर रही है। जानकारों की मानें तो आज की तारीख में अफसरशाही इस सरकार की कोई परवाह नहीं करती। स्थिति यह है कि पहले जैसे मंत्री लोग अपने अफसरों से कोई काम मौखिक निर्देश से नहीं करवा सकते। हर अधिकारी अपने मंत्री से लिखित निर्देश और नोटिंग मांग रहा है। मसलन ब्यूरोकेसी को पता है कि सरकार का क्या पता आज है, कल नहीं। भला वे अपनी जान क्यों फंसाएं?
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सुधींद्र कुलकर्णी भी पहुंचे तिहाड़


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 29th September 2011
अनिल नरेन्द्र
नोट के बदले वोट कांड में खुद को व्हिसिल ब्लोअर बताने वाले भाजपा नेता सुधींद्र कुलकर्णी मंगलवार को खुद ही तिहाड़ जेल पहुंच गए। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के आरोप पत्र में इस कांड के मास्टर माइंड बताए गए कुलकर्णी को अदालत ने एक अक्तूबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया। अब उसी दिन उनकी जमानत पर भी फैसला होगा। इस मामले में कोर्ट में पहले दो बार हुई सुनवाई में गैर हाजिर रहे कुलकर्णी मंगलवार को न्यायाधीश संगीता ढींगरा सहगल की अदालत में अग्रिम जमानत की अर्जी लेकर पेश हुए। कुलकर्णी ने दलील दी कि अपनी बेटी के दाखिले के लिए वह अमेरिका गए थे। लिहाजा वह पहले की सुनवाई में नहीं आ सके। उन्होंने कहा कि देशहित में उन्होंने सांसदों को रिश्वत देने के मामले का स्टिंग करवाया था ताकि लोगों को पता चल सके कि सरकार बचाने के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त होती है। लेकिन सरकार और पुलिस ने अपराधी को जेल भेजने के बजाय सच्चाई उजागर करने वालों को ही जेल में डाल रही है। उन्होंने कहा कि नोट के बदले वोट कांड मामले में कांग्रेस नेताओं की भूमिका की जांच होनी चाहिए, तभी पता चलेगा कि दोषी कौन है। कुलकर्णी ने इस बाबत अदालत के समक्ष अपने वकील महिपाल सिंह के जरिये एक अर्जी भी लगाई। दायर किए गए आवेदन में उन्होंने कहा कि मेरी भूमिका सिर्प पोल खोलने वाली की थी और मेरा मकसद तेजी से फैल रहे भ्रष्टाचार को उजागर करने का था। उन्होंने तर्प दिया कि किसी ऐसे व्यक्ति को अंतरिम जमानत दिए जाने से इंकार का कोई कारण नहीं है, जिसकी नियमित जमानत याचिका (अदालत में) लम्बित हो और जिसे जांच के दौरान गिरफ्तार नहीं किया गया हो। उन्होंने उल्लेख किया कि उन्होंने हमेशा जांच एजेंसी का सहयोग किया है। जब-जब भी जांच एजेंसी ने बुलाया, मैं हाजिर रहा। अब मुझे हिरासत में भेजने की क्या जरूरत है? उधर उनकी अंतरिम जमानत याचिका का विरोध करते हुए सरकारी वकील राजीव मोहन ने कहा कि इसका फैसला सिर्प गुण-दोष के आधार पर होना चाहिए। मोहन ने कहा कि उन्होंने (बचाव पक्ष के वकील ने) अंतरिम जमानत देने के लिए कोई प्रयोजन नहीं बताया है। उधर वोट के बदले नोट कांड के आरोपी समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव अमर सिंह की जमानत पर फैसला बुधवार को होगा। हालांकि फैसला मंगलवार को ही आना था लेकिन तीस हजारी की विशेष अदालत ने नियमित अर्जी पर फैसला एक दिन टाल दिया। अमर सिंह फिलहाल एम्स में भर्ती हैं जहां उनका इलाज चल रहा है। नोट के बदले वोट कांड मामले में कुलकर्णी जेल जाने वाले छठे आरोपी हैं। इससे पहले अमर सिंह, भाजपा के दो पूर्व सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते एवं महावीर भगोरा समेत अमर सिंह के पूर्व निजी सहायक संजीव सक्सेना और भाजपा के कथित कार्यकर्ता सुहैल हिन्दुस्तानी को पहले ही तिहाड़ भेजा जा चुका है। भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी के सहयोगी रहे सुधींद्र कुलकर्णी को जेल भेजे जाने पर कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने कहा कि कोर्ट के इस आदेश के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि नोट के बदले वोट का पूरा षड्यंत्र भाजपा का ही था। दूसरी ओर भाजपा ने दिल्ली पुलिस द्वारा अब तक की गई जांच पर सवाल खड़े कर दिए। भाजपा के लीगल सेल के सदस्य सत्यपाल जैन के अनुसार यह पहली बार देखने को मिल रहा है जब पुलिस द्वारा किसी मामले में शिकायतकर्ता को ही गिरफ्तार किया जा रहा है जबकि जिनके विरुद्ध शिकायत की गई है उसके किसी भी सदस्य की गिरफ्तारी तो दूर की बात है उनको बुलाकर पुलिस ने पूछताछ करना भी उचित नहीं समझा। यही नहीं, दिल्ली पुलिस ने उल्टे ही जांच के प्रारम्भिक चरण में ही इस रिश्वत कांड में फायदा लेने वाले लोगों को क्लीन चिट दे दी। मेरा छोटा-सा प्रश्न है कि आखिर इस मामले में जिन लोगों की गिरफ्तारी की गई है वह सभी चाहते तो रिश्वत लेकर सरकार को बचा सकते थे और किसी को कानोंकान खबर तक नहीं लगती। लेकिन उन्होंने सच कहने का साहस दिखाया और रिश्वत दिए जाने की बात सार्वजनिक की तो सरकार और पुलिस ने उन्हें ही जेल पहुंचा दिया।
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Wednesday, 28 September 2011

अब क्या होगा आगे ः नजरें सुप्रीम कोर्ट पर



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 28th September 2011
अनिल नरेन्द्र
देश के लिए कितने दुःख की बात है कि अमेरिका में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से 2जी घोटाले पर प्रश्न पूछे जा रहे हैं। सारी दुनिया में घोटालों की इस सरकार ने पूरे देश की इज्जत मिट्टी में मिला दी है। पता नहीं दुनिया भारत के बारे में क्या सोचती होगी? इधर देश में इस सरकार की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं। 2जी घोटाले में रोज नई परतें खुलती जा रही हैं और जैसे-जैसे नए रहस्योद्घाटन हो रहे हैं, पता चल रहा है कि इस घोटाले की ऊपर से नीचे तक सबको खबर थी पर किसी ने भी इसे रोकने की कोशिश नहीं की। बेशक प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री वर्तमान और भूतपूर्व खुद घोटाले में शामिल न भी रहे हों पर इससे तो अब वह भी इंकार नहीं कर सकते कि सब कुछ उनकी जानकारी और कुछ हद तक स्वीकृति से हुआ। प्रधानमंत्री बेशक तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम को क्लीन चिट दे रहे हों और कह रहे हों कि उन्हें गृहमंत्री पर पूरा भरोसा है पर इससे अब बात बनने वाली नहीं। 2जी घोटाले पर पूरी तरह घिर चुकी सरकार के संकटमोचकों के उपाय अब खत्म होने लग हैं। सरकार के शीर्ष नेतृत्व को अब इस घोटाले के जाल से बचाने के लिए यह सिद्ध करना जरूरी है कि पूर्व संचार मंत्री ए. राजा के फैसले से देश के खजाने को किसी तरह का नुकसान नहीं हुआ। बीते सप्ताह अदालत के सामने पेश टीआरएआई की रिपोर्ट इसी कोशिश का हिस्सा थी जो औंधे मुंह गिर पड़ी। घोटाले की जांच कर रही संयुक्त समिति भी इसी निष्कर्ष की दिशा में कोशिश कर रही है। राजा के फैसलों में सरकार के शीर्ष नेतृत्व की सहमति को साबित करने वाले तमाम दस्तावेजी सुबूत देश व अदालत के सामने हैं। ए. राजा के निर्णयों से राजस्व के नुकसान का पहलू यदि कानूनी तौर पर साबित हो जाता है तो फिर प्रधानमंत्री व तत्कालीन वित्त मंत्री इस हानि की परोक्ष जिम्मेदारी से शायद ही बच सकें। लाइसेंस लेने वाली एक कम्पनी एस टेल की एक चिट्ठी सरकार के लिए मुसीबत बनेगी। प्रधानमंत्री को मालूम था कि कम्पनियां 2जी स्पेक्ट्रम की ऊंची कीमत देने को तैयार हैं। नवम्बर 2007 में सीधी मनमोहन सिंह को लिखी चिट्ठी में एस टेल ने स्पेक्ट्रम के लिए 6000 करोड़ रुपये का राजस्व देने की पेशकश की थी। कम्पनी ने बाद में इसे बढ़ाकर 13752 करोड़ रुपये तक कर दिया। बाजार से इन संकेतों के बावजूद राजा ने स्पेक्ट्रम को कम कीमत पर बेचा और पीएमओ इस फैसले में राजा के साथ खड़ा रहा। स्पेक्ट्रम में कुल कितना घाटा हुआ या घपला हुआ इस नुकसान की गणना में कैग ने एस टेल की चिट्ठी में प्रस्तावित कीमत को ही प्रमुख मुद्दा बनाया है। राजा के फैसले से प्रधानमंत्री और तब के वित्त मंत्री की अनभिज्ञता का तर्प बिखर गया है। राजा के फैसलों से भ्रष्टाचार तो स्पष्ट है अलबत्ता इस फैसले से राजस्व के नुकसान का तर्प अभी विवादों में है। कैग 1,76,000 करोड़ रुपये का नुकसान का निष्कर्ष दे चुकी है जिसे सरकार ने नकार दिया है। सूत्र बताते हैं कि ताजा जानकारी के बाद यह साबित करने की अंतिम कोशिश होगी कि 2001 की कीमतों पर 2008 में स्पेक्ट्रम बेचने से खजाने को कोई नुकसान नहीं हुआ था। यही अंतिम रास्ता है जिससे भ्रष्टाचार का ठीकरा ए. राजा के सिर फूटेगा और सरकार के शीर्ष नेतृत्व देश का नुकसान कराने की तोहमत से बच सकेगा। वैसे सीबीआई ने राजा पर भ्रष्टाचार का जो मामला बनाया है उसमें यह दर्ज है कि संचार मंत्री के फैसलों से देश को करीब 30,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। सीबीआई को पूर्व संचार मंत्री व अन्याय पर अभियोग के लिए यह साबित करना होगा कि राजा के फैसलों से खजाने को भारी चपत लगी है। अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट पर लगी हैं। देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की स्पेक्ट्रम में भूमिका की जांच को लेकर क्या निर्णय लेती है। यूपीए और कांग्रेस एक अभूतपूर्व संकट में फंसी हुई है जिसका फिलहाल तो कोई तोड़ नहीं निकल पा रहा है। कांग्रेस केवल इस बात से चिंतित नहीं है कि चिदम्बरम पर हमला किया जा रहा है बल्कि उसकी असली चिंता भाजपा की प्रधानमंत्री को लपेटने की योजना से है। यदि भाजपा एक बार चिदम्बरम के खिलाफ जांच शुरू करवाने में सफल हो गई तो इस जांच की आंच अपने आप प्रधानमंत्री तक पहुंच जाएगी। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई है। देखें अदालत में क्या होता है?2G, A Raja, Anil Narendra, CAG, Corruption, Daily Pratap, Manmohan Singh, P. Chidambaram, Pranab Mukherjee, Prime Minister, Scams, Supreme Court, Vir Arjun

बाबा रामदेव समर्थकों पर हुई लाठीचार्ज की शिकार राजबाला चल बसीं



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Published on 28th September 2011
अनिल नरेन्द्र
काले धन के मुद्दे पर बाबा रामदेव के अनशन के दौरान रामलीला मैदान में दिल्ली पुलिस द्वारा 4 जून को की गई कार्रवाई में गम्भीर रूप से घायल उनकी एक समर्थक 57 साल की महिला राजबाला का सोमवार को निधन हो गया। राजबाला की रीढ़ की हड्डी में गम्भीर चोटें थीं और तभी से वह यहां जीबी पंत अस्पताल में इलाज करा रही थीं। डाक्टरों के अनुसार राजबाला की सुबह 10 बजकर 25 मिनट पर मौत हो गई। राजबाला उन अभागिन में से एक थी जो 4 जून को रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के समर्थन में बैठी थीं। पुलिस कार्रवाई में बुरी तरह घायल होने के बाद उन्हें 4 जून को ही अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया था। उनकी शल्यक्रिया भी हुई थी और वे वेंटिलेंटर पर थी। राजबाला के परिवार और बाबा रामदेव का आरोप है कि राजबाला पुलिस लाठीचार्ज के कारण घायल हुई थी। हालांकि पुलिस इन आरोपों का खंडन करते हुए कह चुकी है कि रामलीला मैदान पर कोई लाठीचार्ज नहीं हुआ था और प्रदर्शनकारियों के बीच मची भगदड़ के कारण राजबाला की मौत हुई थी। राजबाला की मौत की सूचना पाते ही पंत अस्पताल पहुंचे बाबा रामदेव ने कहा कि राजबाला का बलिदान बेकार नहीं जाने दिया जाएगा। जिन मुद्दों की लड़ाई में उनका बलिदान हुआ, वह आगे भी जारी रहेगी। बाबा ने कहा कि राजबाला की मौत भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में शहादत है। राजबाला की मौत के लिए गृहमंत्री पी. चिदम्बरम परोक्ष रूप से जिम्मेदार हैं क्योंकि उन्हीं के कहने पर पुलिस ने 4 जून की रात मेरे समर्थकों पर बर्बरतापूर्ण कार्रवाई की। रामदेव के बयान में दावा किया गया है कि वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने इस मुद्दे पर समर्थन जताया है और कहा है कि दिल्ली पुलिस और उसे निर्देश देने वाले गृहमंत्री को इस मामले में जिम्मेदार ठहराते हुए उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाएगा। मौके पर सिविल सोसाइटी के सदस्य मनीष सिसौदिया और राजबाला की पुत्रवधू राकेश कुमारी मलिक ने संवाददाताओं से बातचीत में आरोप लगाया कि राजबाला की मौत पुलिस कार्रवाई के कारण हुई। हर कोई जानता है कि पुलिस ने यह कार्रवाई की थी। हमें हमारी मां वापस चाहिए, क्या वे हमें हमारी मां वापस दे सकते हैं? हमें कोई मुआवजा नहीं चाहिए। आप ऐसी सरकार से क्या उम्मीद रखेंगे, जिसके प्रधानमंत्री या किसी वरिष्ठ मंत्री ने इस मामले में एक शब्द तक नहीं कहा। राकेश कुमारी ने यह भी आरोप लगाया कि राजबाला को जो चोटें आई थीं उनका एमएलसी में जिक्र भी नहीं किया गया। भाजपा के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह ने कहा कि इससे पुलिस के सुप्रीम कोर्ट के समक्ष किए गए इस दावे की पोल खुल गई है कि प्रदर्शनकारियों पर कोई लाठीचार्ज नहीं हुआ था। डाक्टरों ने बताया कि पहले दिन से ही राजबाला की हालत नाजुक बनी हुई थी, उन्हें दवाइयों और लाइफ स्पोर्ट सिस्टम पर ही जीवित रखा जा रहा था। बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर कथित पुलिस कार्रवाई करने के आरोप के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 6 जून को केंद्रीय गृह मंत्रालय, दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस से रिपोर्ट तलब की थी। इस पुलिस कार्रवाई में बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों सहित कई लोग घायल हुए थे। यह मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है और हमें यकीन है कि माननीय न्यायाधीश राजबाला की मौत का नोटिस लेंगे और राजबाला की हत्या के लिए जिम्मेदार लोगों पर जरूर कार्रवाई करेंगे। हम राजबाला के परिवार वालों को बताना चाहेंगे कि दुःख की इस बेला में वे अकेले नहीं।
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Tuesday, 27 September 2011

कुरान पर लगाई प्रदर्शनी पर शाही इमाम का टकराव


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27th September 2011
अनिल नरेन्द्र
शुक्रवार को नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में `मुस्लिम धर्मग्रंथ कुरान के महत्व' पर एक प्रदर्शनी हुई। इस प्रदर्शनी को लेकर दो गुटों में टकराव हो गया। आयोजकों को मजबूरन प्रदर्शनी बन्द करनी पड़ी। कांस्टीट्यूशन क्लब के हॉल में यह तीन दिवसीय प्रदर्शनी शुक्रवार को शुरू हुई थी। अहमदिया मुस्लिम जमात के सहसचिव सैयद अजीज अहमद और दिल्ली प्रांत के अध्यक्ष दाउद अहमद ने बताया कि कुरान की महत्ता से लोगों को अवगत कराने के लिए इस प्रदर्शनी की योजना बनी थी। कुरान की शिक्षा और जीवन में उसके महत्व को दिखाने वाली तस्वीरें, बैनर, विभिन्न अखबारों व पत्र-पत्रिकाओं में छपे लेख और विद्वानों के विचारों को यहां प्रदर्शित किया गया था। लेकिन कुछ असामाजिक तत्वों की वजह से प्रदर्शनी बन्द करने पर मजबूर होना पड़ा। जम्मू-कश्मीर से आए एक छात्रा का कहना था कि कुरान तो सभी भाईचारे की सीख देता है, इस पर बवाल बहुत अफसोसनाक है। प्रदर्शनी का विरोध कर रहे लोग शुक्रवार को ही कांस्टीट्यूशन क्लब के बाहर जमा होने लग गए थे, तब उन्हें पुलिस ने समझाबुझा कर लौटा दिया पर शनिवार सुबह वे फिर आ गए और हंगामा करने लगे। शाही इमाम बुखारी के भाई याहिया बुखारी भी कांस्टीट्यूशन क्लब के बाहर मौजूद थे। शनिवार पूर्वान्ह शाही इमाम अहमद बुखारी प्रदर्शनी के विरोध में अपने आवास से 200 समर्थकों के साथ कांस्टीट्यूशन क्लब के लिए निकले। दोपहर 12 बजे दरियागंज थाने के सामने पुलिस ने उन्हें रोक लिया। सभी को हिरासत में लेकर थाने में बिठा लिया गया। पुलिस अधिकारी शांति बनाए रखने के लिए शाही इमाम से प्रदर्शनी स्थल पर नहीं जाने का आग्रह करते रहे। इमाम बुखारी बगैर प्रदर्शनी हटाए वापस जाने को तैयार नहीं थे। अहमद बुखारी को हिरासत में लिए जाने की खबर मिलते ही उनके करीब 400 समर्थक थाने के बाहर इकट्ठा हो गए। आनन-फानन में पुलिस ने प्रदर्शनी खत्म करवाई और सूचना अहमद बुखारी को दी। इसके बाद 3ः50 बजे शाही इमाम व उनके समर्थकों को छोड़ दिया गया। सभी थाने से चले गए। अहमद बुखारी के मुताबिक कादियान जमात को दुनिया के सभी मुस्लिम संगठनों ने समुदाय से बाहर रखा है। शाही इमाम का कहना है कि कादियान जमात ने प्रदर्शनी में कुरान को गलत तरीके से पेश किया। यह मुस्लिम व कुरान का अपमान है। विरोध कर रहे संगठनों में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य कमाल फारुखी और ऑल इंडिया मुस्लिम एण्ड दलित इटलेक्युअल फ्रंट के अध्यक्ष डॉ. मोहम्मद हसन का कहना था कि वे मुसलमान नहीं हैं और लोगों को गुमराह कर रहे हैं। हमारा मानना है कि गैर मुस्लिम कुरान पर क्या बात कर सकते हैं। वे कुछ भी करें पर कुरान का जिक्र नहीं करें, यह हमारी मांग है। दूसरी ओर प्रदर्शनी के आयोजकों ने कहा कि हमने 53 भाषाओं में अनुवादित कुरान रखी थी। कुरान में दी गई शिक्षा को विशेष बैनर के माध्यम से प्रदर्शित किया गया था। अंतर्राष्ट्रीय मुस्लिम जमात अहमदिया (कादियानी) का कहना है कि वे सच्चे मुसलमान हैं। उनका कलमा, कुरान, नमाज व रोजा सब समान है। कुरान को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए यह प्रदर्शनी लगाई गई थी।

पाकिस्तान की अमेरिका को धमकी व चुनौती

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27th September 2011
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान और अमेरिका के बीच तल्खी बढ़ती जा रही है और अब तक चल रहा वाप्युद्ध अब सामरिक रिश्तों में दरार के रूप में सामने आने लगा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में शिरकत करने आई पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी ने अपने भाषण में कहा कि अमेरिका पाकिस्तान या पाकिस्तानी आवाम को अलग-थलग करने का खतरा नहीं उठा सकता। पाक विदेश मंत्री के मुताबिक अगर वह ऐसा करता है तो इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है। रब्बानी का यह बयान अमेरिका के शीर्ष सैन्य अधिकारी एडमिरल माइक मुलेन के उस आरोप के बाद आया जिसमें बीते सप्ताह काबुल में अमेरिकी दूतावास पर हुए हमले के पीछे आईएसआई को जिम्मेदार बताया गया था। मुलेन का कहना है कि हमले के पीछे मौजूद हक्कानी नेटवर्प को आईएसआई की शह हासिल है। वैसे अमेरिका लम्बे समय से मानता रहा है कि अफगानिस्तान में अपनी पैठ मजबूत करने के लिए पाकिस्तान हक्कानी नेटवर्प का सहारा ले रहा है। अफगानिस्तान से 2014 तक सैनिकों की वापसी और वहां एक स्थिर और लोकतांत्रिक सरकार के गठन के अमेरिकी सपने में हक्कानी नेटवर्प सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है। समस्या यह है कि इन विशाल और प्रशिक्षित नेटवर्प के खात्मे में अमेरिका को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में उसे अपने सबसे मजबूत `सहयोगी' पाकिस्तान की तरफ से ही कोई मदद नहीं मिली। हक्कानी नेटवर्प को पाकिस्तान और तालिबान अपनी रणनीतिक सम्पत्ति मानते हैं जो अमेरिका के अफगानिस्तान से हटने के बाद वहां पाकिस्तानी हितों की हिफाजत करेगा। अमेरिका की मुश्किल यह है कि वह तमाम कोशिशों के बावजूद अलकायदा को जिस तरह उसने तहस-नहस किया था वैसे हक्कानी नेटवर्प को नहीं कर सका। अलकायदा सरगना जहां ड्रोन हमलों से अनपी जान बचा रहे हैं, वहीं हक्कानी नेटवर्प एक के बाद एक दुस्साहसी हमलों को अंजाम दे रहा है। ऐसे में आखिरकार अमेरिका अब जलालुद्दीन व सिराजुद्दीन हक्कानी को ओसामा बिन लादेन व अलकायदा जितना ही खतरनाक मानने लगा है। अमेरिका हक्कानी नेटवर्प का हर कीमत पर सफाया चाहता है। दरअसल ओबामा प्रशासन काबुल में अमेरिकी दूतावास पर हुए आतंकवादी हमले से बौखला गया है। 12 सितम्बर को हुए इस हमले में जलालुद्दीन हक्कानी के बेटे सिराजुद्दीन हक्कानी का हाथ था। इस हमले में चार पुलिसकर्मी व चार नागरिक मारे गए थे। 19 घंटे तक चली इस लड़ाई में 11 आतंकवादियों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इससे दो दिन पहले ही हक्कानी के आतंकवादियों ने वरदाक राज्य स्थित नॉटो के ठिकाने पर हमला किया था जिसमें चार अफगानी नागरिक मारे गए थे व 77 अमेरिकी घायल हो गए थे।
आखिरकार अमेरिका को वह सच्चाई समझ में आने लगी है कि पाकिस्तान इस आतंकी संगठनों से न केवल मिला हुआ है बल्कि इनकी हर तरह से मदद करता है, इन्हें संरक्षण देता है। भारत ने यह बात अमेरिका को कई बार समझाने की कोशिश की पर अमेरिका सब कुछ समझते हुए भी अनजान बना रहा था शायद उसने इसमें इसलिए दिलचस्पी नहीं दिखाई, क्योंकि पाक प्रायोजित आतंकवाद का शिकार भारत था। अब जब खुद अमेरिका इसका निशाना बन रहा है, अमेरिका को कुछ-कुछ समझ आने लगा है। हालांकि भारत के साथ-साथ कई अमेरिकी विशेषज्ञ भी बार-बार यह कह रहे थे कि पाकिस्तान ने आतंकवाद को बढ़ावा देने को अपनी राष्ट्र नीति का अंग बना लिया है, लेकिन अमेरिकी शीर्ष नेतृत्व इसे जानबूझ कर ठुकराता रहा है। अमेरिका की मुश्किल और कमजोरी का पाकिस्तान पूरा फायदा उठा रहा है और उठाएगा। उन्हें मालूम है कि अमेरिका 2014 तक अफगानिस्तान से हटना चाहता है। पाकिस्तान चाहता है कि अफगानिस्तान में अमेरिका के हटने के बाद भी उसका वर्चस्व कायम रहे। पाकिस्तान हमेशा अमेरिका को ब्लैकमेल करता रहा है और अब भी कर रहा है। पाकिस्तानी विदेश मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति तक यह प्रकट करने में लगे हैं कि इस्लामाबाद से ज्यादा वाशिंगटन को उनके समर्थन की जरूरत है। इन वक्तव्यों में एक तरह की धमकी भी छिपी हुई है। देखना यह है कि अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान की इस चालबाजी को भांप पाता है या नहीं और उसके सन्दर्भ में अपनी नीति में कोई ठोस बदलाव करता है या नहीं? पाकिस्तान के संदर्भ में अमेरिका की भावी नीति भले ही कुछ हो, ओबामा प्रशासन को यह समझने की जरूरत है कि वह और लम्बे समय तक बिना अपने हितों से समझौता किए पाकिस्तान से सबसे मजबूत सहयोगी मानने वाली नीति पर चल नहीं सकता। अमेरिका को यह भी समझना होगा कि पाकिस्तान की पूरी मदद और समर्थन चीन भी कर रहा है। मामला केवल अमेरिका-पाकिस्तान का नहीं रह जाता। चीन के बीच में आने से सारे समीकरण बदल जाते हैं। हमारा मानना है कि पाकिस्तान से ज्यादा आज अमेरिका संकट में है। देखें आगे क्या होता है।
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Sunday, 25 September 2011

आस्था नहीं संविधान से चलता है देश

Editorial Publish on 26 Sep 2011

2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से सरकार के भीतर और बाहर लगी आग से प्रधानमंत्री पद की छवि चाहे जितनी झुलसी हो किन्तु डॉ. मनमोहन सिंह का यह कहना बेहद आपत्तिजनक है कि उनको अपने मंत्रियों पर पूरा भरोसा है। इसी के साथ यह भी जोड़ना कि न तो वे उनसे त्यागपत्र मांगेंगे और न ही खुद त्यागपत्र देंगे। क्योंकि विपक्ष का तो काम ही है आलोचना करना।

इससे ज्यादा तो प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से उम्मीद की भी नहीं जा सकती। जो प्रधानमंत्री अपने संवैधानिक कर्तव्यों तक को भूल गया हो उससे यह उम्मीद करना कि वह देश में किसी घोटाले से विचलित हो जाएगा, अत्यंत मुश्किल है। संविधान के अनुच्छेद 78 के मुताबिक प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद के सभी निर्णयों की सूचना राष्ट्रपति को देता है। यही नहीं, मंत्रिपरिषद का सामूहिक उत्तरदायित्व ही संसदीय लोकतंत्र में सरकार का मुख्य आधार होता है। भारतीय संविधान ने स्पष्ट उपबंध द्वारा इस सिद्धांत को सुरक्षित किया है। अनुच्छेद 75(3) के अनुसार मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है। सामूहिक उत्तरदायित्व का अर्थ यह है कि मंत्री गण अपने कार्यों के लिए टीम के रूप में लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होते हैं। मंत्री गण एक टीम के रूप में कार्य करते हैं और मंत्रिपरिषद में लिए गए सभी निर्णय उसके सदस्यों के संयुक्त निर्णय होते हैं। मंत्रिमंडल की बैठक में मंत्रियों में किसी विषय पर कितना ही मतभेद क्यों न रहा हो, किन्तु एक बार जब निर्णय ले लिया जाता है तो हर मंत्री को उसे मानना ही पड़ता है। यदि कोई मंत्री प्रधानमंत्री या उसकी नीतियों से असहमत है तो उसके सामने मंत्रिपरिषद से त्यागपत्र देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। यह सिर्प संविधान में प्रधानमंत्री और मंत्रियों के बीच संबंधों का सैद्धांतिक पंक्तियां नहीं हैं। इसी के आधार पर मंत्री या तो खुद मंत्रिपरिषद से त्यागपत्र दे चुके हैं अथवा उन्हें हटाया जा चुका है।

प्रधानमंत्री और उनके सहयोगी तो शुरू से ही इतने निरंकुश और अहंकारी तरीके से काम कर रहे हैं कि उन्हें इस बात की परवाह नहीं है कि उनकी भी कभी सत्ता से विदाई होगी। इसी दुर्भावना से प्रेरित होकर वे संवैधानिक भावनाओं की भी उपेक्षा करने में किसी तरह का संकोच नहीं कर रहे हैं और जो कुछ भी सही-गलत करना है, उसे वे बिना किसी भय एवं संकोच के कर रहे हैं। ऐसी सरकार से यह उम्मीद करना कि वह संवैधानिक उपबंधों के अनुकूल कार्य करेगी, निरर्थक है।

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को तो ए. राजा पर भी हमेशा विश्वास रहा। उन्हें दयानिधि मारन भी प्रिय रहे। उनके प्रति भी उनके दिल में आस्था एवं विश्वास पूरा था। उन्होंने हमेशा ही अपने इन दोनों मंत्रियों को निर्दोष बताया। वे फंसे और जेल गए तो सुप्रीम कोर्ट की वजह से, प्रधानमंत्री की वजह से नहीं।

अब जब तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम घिरे हैं तो फिर प्रधानमंत्री उनके प्रति अपनी आस्था और विश्वास व्यक्त कर रहे हैं। मसलन घोटालेबाज मंत्री हो या घोटाले में शामिल सहघोटालेबाज मंत्री हो, सभी के प्रति जिस प्रधानमंत्री का विश्वास हो उससे क्या उम्मीद की जा सकती है कि वह देश के शासन का संचालन ईमानदारी से कर सकता है? आखिर इसी सवाल का जवाब तो दयानिधि मारन के उस पत्र में मिला है जिसकी वजह से प्रधानमंत्री ने मंत्रिसमूह (जीओएम) की व्यवस्था खत्म कर दी थी। मसलन जो भी निर्णय ए. राजा और दयानिधि मारन के वक्त हुए उनकी सम्पूर्ण जिम्मेदारी प्रधानमंत्री के तौर पर डॉ. मनमोहन सिंह की भी है।

प्रधानमंत्री का पद एक संवैधानिक लोकतंत्र की रस्सी से बंधा है। वे कोई देश के सम्राट नहीं हैं कि देश की बागडोर उनके पूर्वजों ने उन्हें सौंपी है और इस पर उनका राज्य इसलिए कायम है कि उनकी भुजाओं में ताकत है। सच तो यह है कि वे इस देश के शासक इसलिए हैं कि देश की जनता को भारतीय संविधान ने अपना शासक चुनने का अधिकार दिया है। अपने इन्हीं संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करके देश की सवा अरब जनता ने अपने ऐसे शासक का चुनाव किया है जो खुद भी संवैधानिक अधिकारों के माध्यम से देश पर शासन करता है और अपने संवैधानिक कर्तव्यों के माध्यम से देश की जनता की सेवा। सवाल यह नहीं है कि प्रधानमंत्री की अपने किस मंत्री के प्रति विश्वास है। सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री के मंत्री उनके विश्वास के योग्य हैं अथवा अयोग्य एवं अपराधी होने के बावजूद उन पर विश्वास करके प्रधानमंत्री असंवैधानिक कार्य कर रहे हैं?

जहां तक रही प्रधानमंत्री के स्पष्टीकरण में इस पूरक आलोचना का कि विपक्ष का तो काम ही आलोचना करना है, यह आरोप भी प्रधानमंत्री के संवैधानिक अविज्ञता का ही परिणाम है। आखिर विपक्ष के पास है क्या? लोकतंत्र ने विपक्ष को न तो जांच के लिए कोई एजेंसी दिया है और न ही जांच का कोई अधिकार। सिर्प उसे गलत कामों की आलोचना एवं सरकार को सुधारने हेतु दबाव डालने का ही अधिकार दिया है। लेकिन फिर भी आलोचनाओं एवं मंत्रिपरिषद पर दबाव के लिए उसे भी उतना ही भुगतान मिलता है जितना कि सत्तापक्ष के गुनाहों को छिपाने के लिए सत्तारूढ़ पार्टी के सांसदों एवं मंत्रियों को। लेकिन जिस बात के लिए प्रधानमंत्री विपक्ष पर पिले पड़े हैं उसकी पुष्टि तो उनके मंत्रिपरिषद के एक सहयोगी के मंत्रालय से बात सामने आई है।

प्रधानमंत्री संवैधानिक दायित्वों से बच नहीं सकते। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें ए. राजा के मामले में ही लपेट लिया था किन्तु बड़ी मुश्किल से बचे हैं शपथपत्र वगैरह देने के बाद। शासन का भी सामान्य सिद्धांत यही है कि जब कभी किसी जिले में दंगा, हत्या या डकैती जैसी जघन्य अपराधों की घटना होती है तो जरूरी नहीं कि उन अपराधों में डीएम, एसपी और दरोगा शामिल हों किन्तु लापरवाही के आरोप में सभी के खिलाफ कार्रवाई होती है। इसलिए अरबों रुपये के घोटाले में शामिल अपने मंत्रियों के प्रति ऐसी आस्था और विश्वास का मतलब क्या होता है इसकी समझ प्रधानमंत्री को भले ही न हो देश की जनता एवं संवैधानिक संस्थाओं को जरूर है।

राक्षसों को मारने के लिए लक्ष्मण रेखा पार करनी पड़ती है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25th September 2011
अनिल नरेन्द्र
ऐसा लग रहा है कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला मनमोहन सिंह सरकार पर भारी पड़ रहा है। जहां एक ओर सरकार के अन्दर वरिष्ठतम मंत्रियों की खींचतान बढ़ती जा रही है वहीं सरकार और सीबीआई में भी मतभेद उभरकर सामने आ रहे हैं। केंद्र सरकार में नम्बर दो की हैसियत रखने वाले प्रणब मुखर्जी जो इस समय वित्त मंत्री हैं, के तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम जो वर्तमान में गृहमंत्री हैं, के बीच शीत युद्ध अब उजागर हो चुका है। एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के इस घमासान से पार्टी और सरकार में जिस तरह से असहज स्थिति बनी है वह कांग्रेस पार्टी और मनमोहन सरकार के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं। पार्टी इस बार मसले को पहले से कहीं ज्यादा गम्भीर मान रही है क्योंकि 2जी मामला सरकार के गले की फांस बन गया है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट वित्त मंत्रालय के नोट का संज्ञान लेता है तो स्थिति सरकार के लिए अत्यंत गम्भीर बन सकती है। कांग्रेस के एक महासचिव के मुताबिक इस बार सरकार के नम्बर दो मंत्री के महकमे की ओर से विवादित तथ्य सामने आए हैं। लिहाजा यह आसानी से नहीं निपटाया जा सकेगा। पार्टी का मानना है कि प्रणब और चिदम्बरम की आपसी खींचतान से सरकार की पहले से ही खराब छवि और ज्यादा खराब हो रही है।
उधर 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी को लेकर अदालत केंद्र और सीबीआई में मतभेद भी सामने आ गए हैं। केंद्र ने बृहस्पतिवार को सुप्रीम कोर्ट में जांच पर निगरानी जारी रखने का विरोध किया था, वहीं सीबीआई ने दलील दी कि निगरानी जारी रहनी चाहिए। केंद्र सरकार ने यहां तक कह दिया कि वह (सुप्रीम कोर्ट) 2जी घोटाले के मामले में गृहमंत्री पर सुनवाई नहीं कर सकती। उसने कोर्ट से कहा कि वह इस मामले में आदेश पारित कर लक्ष्मण रेखा पार न करे। यह सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के अधिकारों को चुनौती देना था पर सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि आप लक्ष्मण रेखा की बात कर रहे हैं, यदि सीता ने लक्ष्मण रेखा पार नहीं की होती तो रावण मारा नहीं जाता। लक्ष्मण रेखा राक्षसों को मारने के लिए ही पार की जाती है, ऐसा लोग कहते हैं। जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस एके गांगुली की बैंच ने यही नहीं कहा बल्कि सरकार और सीबीआई के मामले में हो रही जांच में टालमटोल करने पर भी फटकार लगाई। इसके बाद सीबीआई के वकील ने कहा कि अदालत जांच का आदेश देती है तो वह उसका पालन करेगी। उसने यहां तक आश्वासन दिया कि वह सुब्रह्मण्यम स्वामी की भूमिका के बारे में अदालत में दाखिल दस्तावेजों की भी जांच को तैयार है। दरअसल अदालत ने परोक्ष रूप से संकेत दिया कि शीर्ष पदों पर बैठे आरोपियों को सजा दिलवाने के लिए वह पुराने फैसलों को नजरअंदाज कर जांच जारी रख सकती है। इससे पहले न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एके गांगुली की पीठ के समक्ष केंद्र की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता पीपी राव ने शीर्ष अदालत के पुराने फैसलों का हवाला देकर निगरानी की तय लक्ष्मण रेखा होने की दलील दी थी। पीठ ने राव से ही पूछ लिया कि आखिर क्यों अदालत की ओर से जांच की निगरानी का चलन शुरू हुआ? विनीत नारायण के मामले तक हमने यह नहीं सुना था। यह चलन इसलिए शुरू हुआ क्योंकि दुर्भावना का स्वरूप बड़ा होता गया और पारम्परिक तरीके कमजोर पड़ गए। जहां एक ओर तो सरकार इस घोटाले में अदालत की निगरानी जारी रखने पर एतराज कर रही है वहीं दूसरी ओर सीबीआई की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल ने कहा कि जांच अदालत की निगरानी में ही जारी रहनी चाहिए। इस पर पीठ ने केंद्र से पूछा कि सॉलिसिटर जनरल ने पहले अदालत की ओर से निगरानी पर सहमति जताई थी, अब यदि सरकार अपना बयान वापस ले रही है तो बताए? जवाब में राव ने कहा कि वह सॉलिसिटर जनरल के बयान को वापस नहीं ले रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में हुई कार्रवाई से जहां सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के मतभेद उभर कर सामने आए हैं वहीं सरकार और सीबीआई के भी मतभेद सामने आ गए हैं।
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और गृहमंत्री पी. चिदम्बरम के बीच युद्ध अब खुलकर सामने आ चुका है। 2जी स्पेक्ट्रम मामले में सीबीआई द्वारा चार्जशीट दायर करने के एक सप्ताह पहले ही वित्त मंत्रालय के उस नोट का बाहर आना जिसमें यह कहा गया हो कि तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम स्पेक्ट्रम के मूल्य को लेकर ए. राजा से सहमत थे, आने वाली घटनाओं की ओर संकेत है और यह भी कि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के दफ्तर में जासूसी प्रकरण के बाद किस तरह से प्रणब और चिदम्बरम के बीच कटु युद्ध छिड़ा हुआ है। सभी की नजरें अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा अमेरिका से लौटने पर टिकी हुई हैं। देखें प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इस नए झंझट से कैसे निपटते हैं?
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पद्मनाभस्वामी मंदिर का अंतिम तहखाना अभी नहीं खुलेगा


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25th September 2011
अनिल नरेन्द्र
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने केरल के पद्मनाभस्वामी मंदिर के छठे और अंतिम तहखाने को खोलने संबंधी फैसला तीन महीनों के लिए टाल दिया है। अपने अंतरिम आदेश में कोर्ट ने कहा कि छठा तहखाना (बी) तब तक नहीं खोला जाएगा, जब तक अन्य तहखानों से निकाले गए खजाने की सुरक्षा का व्यापक बंदोबस्त नहीं हो जाता। जस्टिस आरवी रविन्द्रन और जस्टिस एके पटनायक की बैंच ने कहा कि मंदिर के पांच तहखानों से निकले करीब 1.5 लाख करोड़ के खजाने के दस्तावेजीकरण एवं वर्गीकरण और सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए जाएं। यह काम पूरा होने तक अंतिम तहखाना नहीं खोला जाएगा। बैंच ने मंदिर की सुरक्षा का जिम्मा केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) को सौंपने की सलाह मानने से इंकार कर दिया और राज्य पुलिस के सुरक्षा इंतजामों पर भरोसा जताया। अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि फिलहाल छठे तहखाने को खोलने का उचित समय नहीं है। तीन महीने बाद खजाने की सुरक्षा, दस्तावेजीकरण और वर्गीकरण आदि पहलुओं की समीक्षा के बाद ही अंतिम आदेश दिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय संग्रहालय के महानिदेशक सीवी आनन्द बोस की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित की थी। उसने खजाने की सुरक्षा के व्यापक बंदोबस्त किए जाने तक छठे तहखाने को नहीं खोलने की सलाह दी थी। विशेषज्ञ समिति में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और भारतीय रिजर्व बैंक के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। वर्षों से मंदिर के कस्टोडियन रहे त्रावण कोर शाही परिवार ने भी कोर्ट से पिछली तारीख में आग्रह किया था कि श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के (बी) तहखाने को नहीं खोलना चाहिए। शाही परिवार ने कहा कि इसके पहले मंदिर से बरामद हुए खजाने की वीडियोग्रॉफी या फोटोग्रॉफी इसलिए नहीं हुई, क्योंकि यह मंदिर की परम्पराओं और प्रथाओं के खिलाफ है। शाही परिवार ने पेश किए आवेदन में कहा कि (बी) तहखाने को खोलना मंदिर की आस्था रखने वालों की परम्पराओं और आस्था के खिलाफ है। न्यायालय ने उस समय आश्चर्य जाहिर किया जब उसे बताया गया कि न्यायालय द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समिति ने (बी) तहखाने को खोलने या न खोलने का निर्णय मंदिर के मुख्य पुजारी पर छोड़ दिया था। न्यायालय ने आश्चर्य व्यक्त किया कि जिस समिति को निर्णय लेने का अधिकार दिया गया वह निर्णय के इस अधिकार को दूसरे को कैसे दे सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अपने आदेश में यह भी कहा कि राज्य सरकार ही करे सम्पत्ति की सुरक्षा। केंद्रीय रिजर्व पुलिस की जरूरत नहीं है। त्रिस्तरीय व्यवस्था करे। मंदिर के रिवाजों और परम्पराओं का विशेष ध्यान रखा जाए। मंदिर प्रबंधन सुरक्षा के लिए 25 लाख रुपये प्रति वर्ष राज्य सरकार को दे। शेष खर्च सरकार उठाए। सम्पत्ति के संरक्षण के लिए निविदा आमंत्रित कर निजी कम्पनियों को शामिल नहीं किया जाए। केरल स्टेट इलैक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कारपोरेशन (केलट्रान) से यह काम कराया जाए।
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Saturday, 24 September 2011

Rabbani's killing, a cause of concern to all

Rabbani's killing, a cause of concern to all

- Anil Narendra

It is a big blow to US peace efforts in Afghanistan. The former Afghan President, Burhanuddin Rabbani has been killed in a suicide bomb attack. The attacker had kept explosive concealed in his turban. Four security personnel were also killed in this attack. The killing of Rabbani (71) is a big blow to the peace process in the strife-torn Afghanistan. Following his killing, President Hamid Karzai decided to cut short his US tour and return home. According to the Kabul Police, the attacker had been invited to the Kabul residence of Rabbani on Tuesday evening as he was considered to be a special envoy bringing some special message from Taliban. While embracing Rabbani, the attacker triggered the explosive, kept in his turban.
The gravity of the challenge posed by Taliban after the withdrawal of US-led NATO forces from Afghanistan can be easily gauged from the killing of Rabbani. Rabbani was living in a high security zone area, close to the US Embassy. The Hamid Karzai government had appointed Rabbani as the Chief of its high-level Peace Council and he was continuing on this post for last one year. But now, with his killing, the possibilities of negotiations have weakened. A few months ago, Taliban had executed a plan to kill the half brother of the President Karzai, Wali Karzai,  who was also killed deceitfully by one of his colleagues in the same manner as Rabbani was killed this time. Then, the Taliban gunan had killed the former Governor Jan Mohammed Khan. Taliban have been attacking the Karzai government since its establishment with the help of US and Western Countries. Killings one after the others have made it clear that Taliban are not in favour of negotiations. Long back, Taliban were created in the Pak Madrassas and even today a number of Taliban groups are under the influence of Pakistan Army and its intelligence agency ISI. In case of Taliban rule in Afghanistan, Pakistan could get the much-talked strategic depth, in case of a war with India. That is why Pakistan does not want an India-friendly government in Afghanistan. Rabbani was considered to be a friend of India. Taliban would never like a person, who is friendly to America, India and Western Countries.
It is natural for India to be concerned over the killing of Rabbani and also over the instability in the neighbouring country. New Delhi is more concerned over the efforts to dispose off leaders in Afghanistan, who are trying hard for peace and confidence building measures. Dr. Manmohan Singh has called this incident as a big blow and has assured the people of Afghanistan of India's full support in this hour of crisis. In a letter to Karzai, the Prime Minister has said that the best way to remember Rabbani would be to carry forward the work left unfinished by him. The killing of Rabbani has added to the anxiety of US and NATO forces also. Condoling the death of Rabbani, the US President said that the peace process in Afghanistan would continue. The suicide bomber, killing the former Afghan President Rabbani has been identified as Ismatullah and for quite some time he was waiting for an opportunity to kill Rabbani. One thing is clear from this Taliban suicide attack that US and NATO alliance would have to talk directly to Taliban if they want to withdraw from Afghanistan, but the problem is that there are so many groups among the Taliban. It would be very difficult to decide as whom to talk with and through whom? Then, there is ISI also. It has its own interests. It would favour such a government in Afghanistan that will toe Pakistan's line. The path for Obama is strewn with thorns and US is in tight corner. It has to decide between the devil and the deep sea. 

चिदम्बरम सरकार और पार्टी दोनों के लिए लाइबिलिटी बन गए हैं


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24th September 2011
अनिल नरेन्द्र
पौने दो लाख करोड़ रुपये के 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में एक अहम मोड़ आ गया है। अब इस घोटाले के घेरे में तत्कालीन वित्त मंत्री और वर्तमान गृहमंत्री पी. चिदम्बरम भी आ गए हैं। उन पर आरोप विपक्ष या जांच एजेंसी सीबीआई ने नहीं बल्कि वर्तमान वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की ओर से लगाए गए हैं। मुखर्जी की ओर से 25 मार्च 2011 को प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखी चिट्ठी में कहा गया है कि अगर चिदम्बरम चाहते तो 2जी घोटाला रोक सकते थे। लेकिन उन्होंने 30 जनवरी 2008 को ए. राजा से मीटिंग में उन्हें पुरानी दरों पर स्पेक्ट्रम बेचने की इजाजत दी। उन्होंने कहा, `मैं अब एंट्री फीस या रेवेन्यू रोटिंग की वर्तमान दरों को रीविजिट (समीक्षा) नहीं करना चाहता।' चिट्ठी में कहा गया है कि अगर चिदम्बरम चाहते तो स्पेक्ट्रम की पहले आओ, पहले पाओ की जगह उचित कीमत पर नीलामी की जा सकती थी। 11 पन्नों की यह चिट्ठी आने वाले वक्त में चिदम्बरम के लिए आफत का सबब बन सकती है। यह चिट्ठी आरटीआई के तहत विवेक गर्ग ने हासिल की है। जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने बुधवार को यह पत्र सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस एके गांगुली की बैंच के समक्ष दस्तावेज के तौर पर पेश किया। वित्त मंत्रालय में उपनिदेशक पद पर तैनात डॉ. पीजीएस राव ने प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव विनी महाजन को 25 मार्च 2011 को भेजी इस चिट्ठी से साफ है कि प्रणब मुखर्जी ये संकेत देना चाह रहे हैं कि अगर पी. चिदम्बरम अड़ जात तो शायद टेलीकॉम घोटाले के चलते देश को लाखों करोड़ों रुपये का नुकसान न होता। मंत्रालय पीएमओ को भेजी अपनी चिट्ठी में कहता है कि वित्त मंत्रालय 31 दिसम्बर 2008 तक के लाइसेंस 2001 के भाव पर बेचने के लिए तैयार हो गया।
चिदम्बरम पर सीधा आरोप लगता है कि ए. राजा जो कुछ कर रहे थे उसकी सहमति गृहमंत्री को थी। यही नहीं, 30 जनवरी 2008 को उन्होंने ए. राजा से मीटिंग में उन्हें पुरानी दरों पर स्पेक्ट्रम बेचने की इजाजत दी। ए. राजा भी शुरू से ही कह रहा है कि मैंने जो कुछ भी किया वह पीएमओ और गृह मंत्रालय की स्वीकृति और जानकारी में किया है। अब यह आरोप तो खुद सरकारी दस्तावेज से साबित होता है। पहले आओ, पहले पाओ की जगह ज्यादा कीमत पर स्पेक्ट्रम की नीलामी की जा सकती थी पर चिदम्बरम ने ऐसा कुछ नहीं किया। कम्पनियों को दिए यूएएस लाइसेंस का प्रावधान 5.1 सरकार को लाइसेंस की शर्तों को किसी भी समय बदलने की इजाजत देता है बशर्ते यह जनहित में हो या सुरक्षा के लिए जरूरी हो पर चिदम्बरम ने ऐसा कुछ नहीं किया। वित्त मंत्रालय ने टेलीकॉम सेक्टर में ग्रोथ के अनुपात फीस तय करने की बात की। राजा इससे सहमत नहीं थे। चिदम्बरम ने इसका भी विरोध नहीं किया। वित्त मंत्रालय 4.4 मेगा हर्ट्स से ऊपर के स्पेक्ट्रम को बाजार भाव में बेचना चाहता था। राजा ने यह सीमा 6.2 मेगा हार्ट्स कर दी। चिदम्बरम इसी पर मान गए। लेकिन किसी भी कम्पनी को 6.2 मेगा हर्ट्स से ऊपर स्पेक्ट्रम दिया ही नहीं गया। होना यह चाहिए था कि सरकार 4.4 मेगा हर्ट्स से ऊपर की नीलामी वाले रुख पर कायम रहती और कम्पनियों से नई दरों पर पैसा वसूलती पर यह भी नहीं हुआ।
यूपीए के अन्दर एक तरह से छिड़े गृह युद्ध से प्रधानमंत्री का परेशान होना स्वभाविक ही है। पीएम आजकल अमेरिका में हैं। मनमोहन सिंह ने प्रणब मुखर्जी और चिदम्बरम दोनों से फोन पर बात की है। गुरुवार शाम चिदम्बरम ने एक बयान जारी कर दोनों नेताओं से बातचीत की जानकारी दी। चिदम्बरम ने कहा कि मैंने प्रधानमंत्री को आश्वस्त किया है कि जब तक वह स्वदेश वापस नहीं लौटते हैं मैं इस विषय पर कोई बयान नहीं दूंगा। मनमोहन सिंह 27 सितम्बर को न्यूयार्प से भारत लौटेंगे। उधर वित्त मंत्री ने भी न्यूयार्प में मीडिया से कहा कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। इसलिए मैं कुछ नहीं कहूंगा। वहीं केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि चिदम्बरम पर सवाल नहीं खड़े किए जा सकते हैं। वह सरकार के समर्थन के हकदार हैं। केंद्रीय मंत्री अम्बिका सोनी ने भी सरकार में दरार के दावों को खारिज रकते हुए कहा कि जो भी रिपोर्टें आ रही हैं उनमें सच्चाई कम ही है। Šजी स्पेक्ट्रम केस की जांच करने वाली लोक लेखा समिति के अध्यक्ष और भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि चिदम्बरम तुरन्त इस्तीफा दें या उन्हें बर्खास्त किया जाए। सीपीएम ने चिदम्बरम की भूमिका की सीबीआई जांच की मांग की है। उधर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने कहा है कि चिदम्बरम 2जी केस में शामिल हैं। यह साफ हो गया है। न्यूयार्प से प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें चिदम्बरम पर पूरा भरोसा है। चौतरफा समस्याओं से घिरी यह यूपीए सरकार के लिए समय दिन प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है। चूंकि इस बार सारे आरोप एक सरकारी दस्तावेज के आधार पर लग रहे हैं इसलिए इससे निकलना आसान नहीं होगा इस सरकार के लिए। रहा सवाल पी. चिदम्बरम का तो अब वह सरकार और कांग्रेस पार्टी के लिए एक लाइबिलिटी बनते जा रहे हैं।
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रब्बानी की हत्या ने सभी की चिन्ताएं बढ़ाईं


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24th September 2011
अनिल नरेन्द्र
अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा शांति प्रयासों को भारी धक्का लगा है। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति बुरहानुद्दीन रब्बानी की एक आत्मघाती हमलावर ने हत्या कर दी। इस हमलावर ने अपनी पगड़ी में विस्फोटक रखा था। रब्बानी की हत्या करने वाले हमलावर के इस घटना में रब्बानी के चार सुरक्षाकर्मी भी मारे गए। रब्बानी (71) की हत्या युद्ध जैसे हालात से गुजर रहे अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया के लिए एक बड़ा झटका है। उनकी हत्या के बाद राष्ट्रपति हामिद करजई ने अपनी अमेरिकी यात्रा बीच में ही छोड़कर वतन लौटने का फैसला किया। काबुल पुलिस के मुताबिक हमलावर को रब्बानी के काबुल स्थित निवास में मंगलवार शाम को बुलाया गया था, समझा जा रहा था कि वह विशेष दूत है, जो तालिबान का खास संदेश लेकर आया है। रब्बानी से गले मिलते ही हमलावर ने पगड़ी में रखे विस्फोटक में धमाका कर दिया।
श्री रब्बानी की हत्या से साफ है कि अमेरिका के नेतृत्व वाली नॉटो सेनाओं के अफगानिस्तान से विदा होने के बाद तालिबानी और कितनी बड़ी चुनौती उपस्थित कर सकते हैं। रब्बानी राजधानी काबुल के अति सुरक्षित इलाके में रहते थे जहां अमेरिका का दूतावास भी पास में स्थित है। रब्बानी को हामिद करजई सरकार ने पिछले करीब एक साल से अपनी उच्चस्तरीय शांति परिषद का प्रमुख बनाया था। उन्हें शांति प्रयासों में कोई खास कामयाबी नहीं मिली। अब उनकी हत्या से तो मेल-मिलाप की रही-सही संभावनाएं भी क्षीण होने लगी हैं। जिस तरह तालिबान ने छल कर रब्बानी की हत्या की, उसी तरह कुछ महीने पहले राष्ट्रपति हामिद करजई के सौतेले भाई वली करजई की उनके ही एक सहयोगी से छलपूर्वक हत्या कराई गई थी। इसके बाद तालिबानी बन्दूकधारियों ने एक पूर्व गवर्नर जान मोहम्मद खान की हत्या की थी। जब से अमेरिका और पश्चिमी देशों की मदद से करजई सरकार बनी है। तालिबानी उस पर हमले कर रहे हैं। एक के बाद एक होती हत्याओं से साफ है कि तालिबान मेल-मिलाप के पक्ष में नहीं है। तालिबान का निर्माण कभी पाकिस्तानी मदरसों में हुआ था और आज भी पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई का तालिबान के अनेक गुटों पर नियंत्रण है। अफगानिस्तान में तालिबानी शासन होने से पाकिस्तान को भारत के साथ युद्ध की स्थिति में सामरिक गहराई मिलती है। इसलिए पाकिस्तान नहीं चाहता कि अफगानिस्तान में ऐसी कोई सरकार हो, जो भारत की मित्र हो। रब्बानी को भारत का मित्र माना जाता था। तालिबान को ऐसा भी कोई शख्स पसंद नहीं है जो अमेरिका, भारत और पश्चिमी देशों का मित्र हो।
श्री रब्बानी की हत्या के साथ अस्थिर हालात से गुजर रहे पड़ोसी मुल्क के हालात को लेकर भारत की चिन्ता बढ़नी स्वभाविक ही है। नई दिल्ली की चिन्ता अफगानिस्तान में शांति और विश्वास बहाली का परचम थामने वालों नेताओं को ठिकाने लगाने की कोशिशों को लेकर है। मनमोहन सिंह ने कहा कि इस घटना से गहरा धक्का पहुंचा है और भारत मुश्किल की इस घड़ी में अफगानिस्तान के लोगों के साथ खड़ा है। करजई को लिखे पत्र में पीएम ने कहा कि अफगानिस्तान में विभिन्न गुटों के बीच शांति प्रक्रिया की अगुवाई कर रहे रब्बानी को याद रखने का सबसे अच्छा तरीका यही होगा कि हम उनके काम को आगे बढ़ाएं। रब्बानी की हत्या ने अमेरिका और नॉटो सेना की चिन्ता भी बढ़ा दी है। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने रब्बानी की हत्या पर शोक प्रकट करते हुए कहा कि शांति प्रक्रिया जारी रहेगी। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति रब्बानी की हत्या करने वाले आत्मघाती हमलावर की पहचान एस्मातुल्ला के रूप में की गई है। वह लम्बे समय से रब्बानी की हत्या का मौका तलाश कर रहा था। तालिबान के इस आत्मघाती हमले से एक बात तो साफ है कि अगर अमेरिका व नॉटो गठबंधन को अफगानिस्तान से बाहर निकलना है तो उन्हें तालिबान से सीधी बातचीत करनी ही होगी पर मुश्किल यह भी है कि तालिबान के अन्दर कई गुट हैं। किस से किसके माध्यम से यह बात हो? फिर आईएसआई भी है। उनके अपने हित हैं। वह अफगानिस्तान में ऐसी सरकार चाहेंगे जो पाकिस्तान का पिट्ठू बनने को तैयार हो। ओबामा का आगे का रास्ता कांटों भरा है पर फिर अमेरिका तो बुरी तरह फंसा हुआ है, इधर कुआं तो उधर खाई।
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Friday, 23 September 2011

अगर आप 25 रुपये रोज खर्च करते हैं तो आप गरीब नहीं हैं



Published on 23rd September 2011
अनिल नरेन्द्र

मंगलवार को भारत की योजना आयोग ने एक हलफनामा दायर किया है। मुझे इसको पढ़कर दुःख भी हुआ और गुस्सा भी आया। पता नहीं यह योजना आयोग वाले कौन-सी दुनिया में रह रहे हैं। अगर इनकी सोच इस प्रकार ही है तो ऊपर वाला ही बचाए इस देश को। हलफनामे में योजना आयोग फरमाता है कि गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) का दर्जा पाने के लिए एक मात्र शर्त यह है कि एक परिवार की न्यूनतम आय 125 रुपये रोजाना हो। आमतौर पर एक परिवार में औसतन पांच लोग माने जाते हैं। इस तरह प्रति व्यक्ति रोजाना आय 25 रुपये। गौरतलब है कि अधिकतर सरकारी योजनाओं का लाभ केवल गरीबी रेखा से नीचे के लोग ही उठा सकते हैं। आयोग ने यह हलफनामा अदालत के कई बार कहने के बाद दायर किया है। आयोग के मुताबिक प्रधानमंत्री कार्यालय भी इस हलफनामे पर विचार कर चुका है। हलफनामा सुरेश तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट पर आधारित है। इसमें कहा गया है कि प्रस्तावित गरीबी रेखा भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्च के वास्तविक आकलन पर जीवन-यापन के न्यूनतम संभव स्तर पर आधारित है। योजना आयोग के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्र में 26 रुपये और शहरी क्षेत्र में 32 रुपये कमाने वाला अब गरीब नहीं माना जाएगा और इतने रुपये में सिर्प खाने का खर्च नहीं बल्कि किराया, कपड़ा, स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन इत्यादि सब कुछ शामिल है यानि महीने में शहरों में 965 रुपये और गांवों में 781 रुपये खर्च करने वाला सरकार की नजर में गरीब नहीं है। सरकार उसे अपनी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं देगी। जाहिर है कि गरीबी के नए पैमाने को हास्यास्पद कहा जा रहा है। लेकिन इन सबमें बेफिक्र आम आदमी की इस यूपीए सरकार के योजना आयोग के नए पैमाने पर गरीबी रेखा से ऊपर रहने वाला शहरी, अनाज पर 5 रुपये, सब्जियों पर एक रुपया 80 पैसे, दाल पर एक रुपया और दूध पर 2 रुपये 30 पैसे खर्च करता है। तेल और रसोई गैस मिलाकर महीने में 112 रुपये खर्च करने वाला भी गरीब नहीं है। हकीकत यह है कि दिल्ली में 5 रुपये में आप 136 ग्राम चावल या 166 ग्राम गेहूं ही खरीद सकते हैं। एक रुपया 80 पैसे में 180 ग्राम आलू या 90 ग्राम प्याज, 90 ग्राम टमाटर या फिर 180 ग्राम लौकी खरीद सकते हैं। ऐसे ही एक रुपये में 20 ग्राम दाल ही मिल पाएगी। ढाई रुपये से कम में दूध मिलेगा सिर्प 85 मिलीलीटर और 112 रुपये में आप डेढ़ किलो रसोई गैस से ज्यादा नहीं खरीद सकते। जाहिर है कि इतने राशन में एक वक्त का भरपेट खाना भी नहीं हो सकता।
आम आदमी सरकार के इस आकलन से शायद दुःखी हो पर मुझे बिल्कुल आश्चर्य नहीं हुआ। यह सरकार गरीब आदमी से कितनी कट चुकी है इसी हलफनामे से पता चलता है। अर्थशास्त्राr प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, उनके सिपहसलार मोंटेक सिंह आहलूवालिया, प्रणब मुखर्जी, पी. चिदम्बरम सरीखे लोगों से आप और क्या उम्मीद कर सकते हैं। इनमें से किसी ने भी खुले बाजार में सब्जी, आटा, दाल, चावल, तेल, दूध, दवाई, डाक्टर की फीस, स्कूल की फीस, मेट्रो का या बस के किराये का पता किया है या अनुभव किया हो तो इन्हें जमीनी हकीकत का पता चले। एयर कंडीशन कमरों में बैठ कर अपने कम्प्यूटर में अंग्रेजी भाषा में गूगल पर रिसर्च करके हलफनामा तैयार तो हो जाता है पर जमीनी सच्चाई से यह कोसों दूर होता है। इतना दूर कि आदमी को गुस्सा और दुःख होता है।
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टी-20 की घटती लोकप्रियता को रोकने के लिए सचिन के सुझाव


Published on 23rd September 2011
अनिल नरेन्द्र
मेरा क्रिकेट से थोड़ा मन खट्टा हो गया है। टीम इंडिया के इंग्लैंड दौरे ने कम से कम मेरा तो क्रिकेट के प्रति थोड़ा मोहभंग जरूर किया है। हार-जीत तो खेल का हिस्सा होता है पर जिस तरीके से टीम इंडिया ने इंग्लैंड दौरे में प्रदर्शन किया वह निराशाजनक और शर्मनाक था। एक भी मैच में वह टक्कर देते नजर नहीं आए। यह खिलाड़ी केवल पैसों के लिए खेलते हैं, देश के झंडे या सम्मान के लिए नहीं और पैसा इनको इतना मिल गया है कि इनके पांव जमीन पर ही नहीं टिक रहे। सच बताऊं तो मैं अब हॉकी या फुटबाल का मैच देखना ज्यादा पसंद कर रहा हूं। आजकल चैंपियन लीग 20-20 मुकाबला चल रहा है पर मेरा उसे देखने को भी दिल नहीं करता। विश्व चैंपियन बनने के मात्र पांच महीने बाद टीम इंडिया का ऐसा हश्र होगा, यह किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। इंग्लैंड दौरे में महेन्द्र सिंह धोनी और उनके धुरंधरों का गर्व चकनाचूर हो गया। पहुंची तो इंग्लैंड विश्व की नम्बर वन टेस्ट टीम और विश्व चैंपियन का रुतबा लेकर थी जब दौरा समाप्त हुआ तो भारत टेस्ट रैंकिंग में तीसरे और वन डे रैंकिंग में पांचवें स्थान पर गिर चुकी थी। यह एक ऐसा शर्मनाक प्रदर्शन था जो पिछले एक दशक से अधिक समय में किसी विदेशी दौरे में सुनने में नहीं आया हो। 
बहरहाल भारत के महान क्रिकेट सपूत सचिन तेंदुलकर ने वन डे क्रिकेट की घटती लोकप्रियता को देखते हुए अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) को एक पत्र लिखकर क्रिकेट के इस फार्मेट की लोकप्रियता वापस हासिल करने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। वन डे क्रिकेट के बादशाह सचिन ने इस क्रम में आईसीसी के मुख्य अधिकारी हारुन लोगार्ट को सुझाव दिया है कि 50-50 ओवरों के मैच को 25-25 ओवरों की चार पारियों वाले मैच में परिवर्तित कर दिया जाए। वन डे और टेस्ट क्रिकेट में सर्वाधिक रन बनाने का विश्व रिकार्ड अपने नाम रखने वाले मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर पहले भी वन डे में बदलाव की बात उठाते रहे हैं, लेकिन इस बार उन्होंने हर पारी में ओरों की संख्या घटाने के अलावा कई और परिवर्तन सुझाए हैं। सचिन ने कहा है कि 25 ओवर की चार पारियों से मैच में संतुलन आएगा और पहले टास जीतने वाली टीम का एडवांटेज खत्म हो जाएगा। मैच में पारी में बल्लेबाजी करने वाली टीम की ओर से ही दो पॉवर प्ले होने चाहिए, लेकिन इसके साथ चार गेंदबाजों को 12-12 ओवर फेंकने की अनुमति होनी चाहिए। मौजूदा नियमों में एक गेंदबाज 10 ओवर फेंक सकता है। सचिन का मानना है कि पिच और मौसम की परिस्थितियों में टास की भूमिका मायने रखती है और सिक्के की उछाल से ही मैच का कुछ हद तक फैसला हो जाता है। गौरतलब है कि ब्रिटेन में जिलेट कप में दो बंटी हुई पार्टियों का प्रस्ताव दिया गया था जबकि आस्ट्रेलिया में इंटरस्टेट क्रिकेट टूर्नामेंट में 45 ओवरों के मैचों को 20-20 ओवर और 25-25 ओवरों में बांटा गया था। क्रिकेट आस्ट्रेलिया के अनुसार यह फार्मेट काफी सफल रहा था। भारत में सभी क्रिकेट कामेंटेटर हैं। आप सब का सचिन के सुझावों पर क्या राय है? मेरे ख्याल में सुझावों पर गौर करना चाहिए। हर सुझाव में दो पहलु होते हैं। ऐसे भी क्रिकेट प्रेमी होंगे जो सचिन के सुझाव से सहमत न हों।
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Thursday, 22 September 2011

भगौड़ा स्वामी अग्निवेश कब तक भागेगा?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22nd September 2011
अनिल नरेन्द्र

सोमवार को हांसी (हिसार) की उपमंडल न्यायिक दंडाधिकारी अश्वनी कुमार मेहता की अदालत में स्वामी अग्निवेश को पेश होना था। पिछली सुनवाई में भी स्वामी अग्निवेश हाजिर नहीं हुए थे। पुलिस ने रिपोर्ट में बताया कि स्वामी अग्निवेश त्रिवेंद्रम गए हैं, इसलिए उन्हें पकड़ा नहीं जा सका। डीएसपी जयप्रकाश ने तर्प दिया कि वह नई नियुक्ति पर हांसी आए हैं, इसलिए उन्हें मामले की ज्यादा जानकारी नहीं है। इस पर कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर आपको काम नहीं आता तो क्यों न आपके एसपी को इस बारे में लिखा जाए। इसी बीच डीएसपी ने कहा कि स्वामी अग्निवेश को भगौड़ा घोषित कर दिया जाए। इस पर कोर्ट ने अग्निवेश को भगौड़ा घोषित करने की कार्रवाई शुरू करते हुए 30 सितम्बर की तारीख तय कर दी। केस की अगली सुनवाई 30 सितम्बर को होगी। इसी बीच स्वामी अग्निवेश के वकील सुरेन्द्र राजपाल ने कहा कि वह अग्रिम जमानत के लिए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे। सोमवार को स्वामी अग्निवेश को गिरफ्तार कर यहां उपमंडल कोर्ट में पेश किया जाना था। अमरनाथ यात्रा पर आपत्तिजनक टिप्पणी करके हिन्दुओं की धार्मिक भावना को आहत करने के आरोप में अग्निवेश के खिलाफ हरियाणा में हांसी सिटी थाना में यह मामला दर्ज किया गया था।
स्वामी अग्निवेश के सितारे लगता है कि गर्दिश में चल रहे हैं। अन्ना हजारे के आंदोलन में उन्हें विश्वासघात करने का आरोप खुलेआम लगा, सरकारी एजेंट तक घोषित कर दिया गया। अब एक और मामले में स्वामी संदेह के घेरे में आ गए हैं। छत्तीसगढ़ के धुर नक्सल प्रभावित बस्तर अंचल में स्थापित बहुराष्ट्रीय कम्पनियों समेत अन्य उद्योग समूह संदेह के घेरे में आ चुके हैं। एस्सार कम्पनी द्वारा नक्सलियों को चन्दा देने के मामले के खुलासे के बाद अन्य उद्योगों पर भी कड़ी नजर रखी जा रही है। इस मामले में अग्निवेश पर नक्सलियों की ओर से मध्यस्थ की भूमिका निभाने और उद्योगों से मिलकर राशि के लेन-देन के आरोप भी लग रहे हैं। दरअसल एस्सार कम्पनी प्रबंधन की ओर से नक्सलियों को चन्दा पहुंचाने जाते हुए गिरफ्तार किए गए लिंगाराम कोडोपी के स्वामी अग्निवेश से संबंधों की जानकारी सामने आई है। सूत्रों का दावा है कि स्वामी अग्निवेश ने ही कुछ समय पहले आरोपी लिंगाराम को बस्तर में पुलिस की प्रताड़ना का शिकार बताते हुए दिल्ली की मीडिया के समक्ष पेश कर दिया था। स्वामी ने दावा किया था कि पुलिस बेगुनाह आदिवासियों को नक्सली या उनका समर्थक बताकर प्रताड़ित कर रही है। लिंगाराम कोडीपी भी ऐसे ही आदिवासियों में से एक है। इधर एस्सार प्रबंधन से चन्दे की राशि लेकर नक्सलियों को पहुंचाने जा रहे लिंगाराम पुलिस द्वारा दबोचे हुए हैं। आरोपी लिंगाराम द्वारा नक्सलियों से संबंध कबूलने के बाद सच्चाई भी सामने आ गई है। नक्सलियों से संबंध के तार जुड़ने पर अब स्वामी अग्निवेश  भी कटघरे में खड़े हो गए हैं।
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राम जेठमलानी की कैश फॉर वोट केस में पलटी


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22nd September 2011
अनिल नरेन्द्र
नोट के बदले वोट कांड में अभियुक्त अमर सिंह की पैरवी करते हुए पूर्व कानून मंत्री राम जेठमलानी ने कांग्रेस नेता अहमद पटेल का नाम घसीट कर सनसनी फैला दी है। इससे पहले 12 सितम्बर को अमर सिंह की अंतरिम जमानत पर बहस करते हुए जेठमलानी ने पैसे के स्रोत का ठीकरा भाजपा के सिर फोड़ने का प्रयास किया था। उस समय उन्होंने कहा था कि पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने संसद में स्वीकार किया है कि स्टिंग ऑपरेशन उनकी इजाजत से किया गया, इसका मतलब यही निकलता है कि पैसे उसी पार्टी ने दिए होंगे। कोर्ट में जेठमलानी का कहना था कि नोट के बदले वोट का उद्देश्य तत्कालीन मनमोहन सरकार को बचाना था, ऐसी स्थिति में संकेत मिलते हैं कि सरकार के पक्ष में मत देने के लिए अहमद पटेल ने विपक्षी दलों के सांसदों को कथित रूप से प्रलोभन दिया। जेठमलानी ने कहा कि वह यह नहीं कर रहे हैं कि इस साक्ष्य के आधार पर पटेल को दोषी ठहराया जाए लेकिन जब आप अपनी पार्टी के हित के लिए सांसदों को प्रभावित कर रहे हैं तब घूसप्रदाता ही कहलाएंगे। जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान से पहले राम जेठमलानी ने कांग्रेस नेता अहमद पटेल का नाम लिया, तो दोपहर बाद दूसरे अधिवक्ता एन. हरिहरन ने समाजवादी पार्टी सांसद रेवती रमन सिंह का नाम ले लिया। उन्होंने कहा कि कैश फॉर वोट कांड में अमर सिंह से ज्यादा सबूत रेवती रमन सिंह के खिलाफ मौजूद हैं। बावजूद जांच एजेंसी ने उन्हें न तो आरोपी बनाया है और न ही मामले में गवाहों की सूची में उनके नाम का जिक्र है। आरोप पत्र का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि 22 जुलाई 2008 को रेवती रमन सिंह ने सुहैल को बताया कि अमर सिंह अपने घर पर भाजपा सांसदों की प्रतीक्षा कर हे हैं। इसके बाद सुहैल भाजपा सांसदों अशोक अर्गल और फग्गन सिंह कुलस्ते को लेकर अमर सिंह के घर गया था। जब आरोप पत्र में इन बातों का जिक्र होने के बाद उन्हें न तो आरोपी बनाया गया और न ही गवाह। जिस पर सरकारी अधिवक्ता राजीव मोहन ने अदालत को बताया कि रेवती रमन सिंह को सिर्प अशोक अर्गल के घर जाते देखा गया था। कोई बातचीत की रिकार्डिंग नहीं है। लिहाजा महज उन्हें इस आधार पर आरोपी नहीं बनाया जा सकता। राम जेठमलानी ने विशेष न्यायाधीश संगीता ढींगरा सहगल के समक्ष यह भी कहा कि रिश्वत लेन-देन का स्थान अमर सिंह का आवास नहीं था बल्कि ली मैरीडियन होटल था।
श्री अहमद पटेल का नाम आने पर कांग्रेस में हलचल मचना स्वभाविक ही था पर अहमद पटेल ने जहां जेठमलानी की दलीलों पर इसे बेबुनियाद और धोखा बताया और कहा कि मैंने इस बारे में पहले ही स्पष्टीकरण दे दिया है वहीं कांग्रेस पार्टी की टिप्पणी चौंकाने वाली जरूर थी। कांग्रेस पार्टी ने सारे विवाद को प्रमुख विपक्षी दल भाजपा की ओर धकेलने का प्रयास करते हुए कहा कि बोफोर्स तोप सौदे में स्वर्गीय राजीव गांधी की लुटिया डुबाने में अहम भूमिका निभाने वाले फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन एक बार फिर वही कहानी दोहरा रहे हैं और निशाने पर स्वर्गीय राजीव गांधी की पत्नी व कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी हैं। उन्हीं को बदनाम करने का एक बार फिर षड्यंत्र रचा जा रहा है। कांग्रेस प्रवक्ता रेणुका चौधरी ने इशारों में कहा कि अमिताभ बच्चन अमर सिंह से मिलकर लौटे हैं तभी से उनका (राम जेठमलानी और अमर सिंह) का स्टैंड बदला है। उन्होंने इस संबंध में पूछे गए सवाल का यह कहकर कूटनीतिक जवाब दिया कि प्राण जाए और वचन न जाए। गौरतलब है कि इस समय अमिताभ बच्चन गुजरात के ब्रांड एमबेस्डर हैं और मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के करीबी हैं। दो दिन पहले ही अमिताभ एम्स जाकर अमर सिंह से मिले थे। करीब दो घंटे की बातचीत का कांग्रेस रणनीतिकार यही अर्थ निकाल रहे हैं कि भाजपा के दूत के रूप में उन्होंने काम किया है और उसी मुलाकात के तत्काल बाद अमर सिंह के वकील ने पलटी मारते हुए अहमद पटेल का नाम ले डाला। हालांकि सीधे तौर पर रेणुका ने यही कहा कि अभी इस प्रकरण के और भी पन्ने खुलने बाकी हैं। यह तो सिर्प एक एपीसोड है। आगे देखते जाइए कि क्या होगा। बेचारे अमिताभ बच्चन न तीन में न तेरह में। अगर वह अमर सिंह से मिलने नहीं जाते तो जयाप्रदा खुलेआम ललकारती है और देखने जाते हैं तो कांग्रेस उन्हें सारे षड्यंत्र के पीछे शातिर दिमाग बता देती है जबकि अमर सिंह और अमिताभ की बातचीत में कहीं कैश फॉर वोट केस का जिक्र तक नहीं हुआ होगा।

Wednesday, 21 September 2011

मोदी के सद्भावना मिशन पर `टोपी' पहनाने का प्रयास

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21th September 2011
अनिल नरेन्द्र
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का तीन दिवसीय अनशन सोमवार को खत्म हो गया। गुजरात विश्वविद्यालय के कन्वेंशन हॉल में तीन दिनों से अनशन पर बैठे मोदी ने सोमवार शाम 6ः15 बजे धर्मगुरुओं के हाथों से नींबू पानी पीकर अनशन समाप्त कर दिया। नरेन्द्र मोदी के उपवास को जिस तरह से पार्टी के भीतर से लेकर पूरे देश में समर्थन मिला है, उससे साफ हो गया है कि लाल कृष्ण आडवाणी के बाद वह भाजपा के सबसे कद्दावर नेता बनकर उभरे हैं। हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि मोदी अब भाजपा की ओर से अगले प्रधानमंत्री बनने के सबसे कद्दावर नेता बन गए हैं और श्री मोदी ने अपनी इच्छा भी नहीं छिपाई। प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा खुलकर जाहिर किए बगैर मोदी ने शनिवार को भारतीय जनता पार्टी को एक नया नारा दिया, `सबका साथ, सबका विकास' जो अगले लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रचार का आधार बन सकता है। अपना उपवास तोड़ने के साथ ही नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में चुनाव से एक साल पहले ही अपने अभियान का रथ हांक दिया है। तीन दिन के उपवास के बाद गुजरात के सभी 26 जिलों में बारी-बारी से सारा दिन उपवास पर बैठने के ऐलान के साथ नरेन्द्र मोदी ने अब बड़े मिशन का भी श्रीगणेश कर दिया। नकारात्मक राजनीति के मुकाबले विकास के मोर्चे पर समृद्ध रिपोर्ट कार्ड की बदौलत आगे बढ़ने के एजेंडे को भी मोदी ने देश के सामने रख दिया। इतना ही नहीं, उपवास के  तीन दिनों में प्रधानमंत्री पद पर अपनी दावेदारी की हवा बनाकर गुजरातियों के गौरव के रूप में भी खुद को उभारा। साथ ही सद्भावना मिशन के सहारे एक पांव मुस्लिमों की तरफ तो बढ़ाया, लेकिन कहीं भी अपनी मूल ताकत हिन्दुत्व की जमीन नहीं छूटने दी। अहमदाबाद शहर के पास स्थित पिराना गांव में एक छोटी-सी दरगाह के मौलाना सैयद इमाम शाही सैयद ने रविवार को मोदी के उपवास स्थल पर मंच पर जाकर उनसे मुलाकात की थी। मौलाना ने मोदी को एक टोपी पहनने की पेशकश की, लेकिन मुख्यमंत्री ने विनम्रता से उसे पहनने से मना कर दिया और उसके बजाय शॉल ओढ़ाने को कहा। इमाम ने मोदी को शॉल ओढ़ाया जिसे उन्होंने मंजूर कर लिया। नरेन्द्र मोदी ने बिना किसी पर आरोप लगाए और प्रहार किए खुद पर लगने वाले सांप्रदायिकता के आरोपों का जवाब गुजरात में विकास और शांति के रिकार्ड के साथ दिया। मोदी ने स्पष्ट कहा कि लीडरशिप की कसौटी एक्शन पर निर्भर करती है। आज हमने दुनिया को दिखाया कि यह रास्ता है सबको जोड़कर सबको साथ लेकर चलने का। जब तक वोट बैंक की राजनीति से उठकर विकास की राजनीति नहीं अपनाते तब तक भारत ऊपर नहीं उठ पाएगा। इस कड़ी में गुजरात के मुख्यमंत्री ने ही सच्चर कमेटी के साथ कुछ साल पहले हुए संवाद का जिक्र करते हुए कहा कि मेरी सरकार अल्पसख्यकों या बहुसंख्यकों के लिए भी कुछ नहीं करती है। मेरी सरकार छह करोड़ गुजरातियों के लिए काम करती है। मैं हर चीज को माइनारिटी और मेजोरिटी में नहीं तोलता। मेरे राज्य के नागरिक सभी एक हैं।
मोदी के उपवास खत्म होने के दिन सोमवार को भाजपा ने जबरदस्त शक्ति प्रदर्शन किया अब कांग्रेस की बारी है। मोदी के उपवास के खिलाफ गांधी आश्रम के सामने जवाबी अनशन पर बैठे कांग्रेस नेता शंकर सिंह वाघेला मंगलवार सुबह अपनी भूख हड़ताल समाप्त करेंगे। कांग्रेस के केंद्रीय पदाधिकारी के रूप में गुजरात कांग्रेस के प्रभारी मोहन प्रकाश ने मोदी सरकार पर जमकर हल्ला बोला। गुजरात सरकार पर बरसते हुए मोहन प्रकाश ने कहा कि सौ करोड़ रुपये खर्च कर नरेन्द्र मोदी कौन-सी सद्भावना दिखाना चाहते हैं। मोहन प्रकाश ने कहा कि मोदी सरकार भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई है। कैग की रिपोर्ट में गुजरात सरकार का भ्रष्टाचार पूरी तरह उजागर हुआ है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस मोदी सरकार के भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए जनता की अदालत में जाएगी। वाघेला ने कहा कि अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर उपवास नहीं किया जाता। मोदी का उपवास महज एक दिखावा है और एक सियासी तिकड़म है। वाघेला ने आरोप लगाया कि मोदी ने पहले 72 घंटे के उपवास की घोषणा की थी लेकिन 55 घंटों में ही अनशन तोड़ दिया। कुल मिलाकर देखा जाए तो नरेन्द्र मोदी का यह सियासी अनशन वैसे तो सफल रहा। जहां तक इसके भारतीय राजनीति में प्रभाव का सवाल है वह तो आने वाला वक्त ही देगा।
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बटला हाउस एनकाउंटर की तीसरी बरसी



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21th September 2011
अनिल नरेन्द्र

तीन साल पहले का 19 सितम्बर का वो दिन, जब नई दिल्ली के बटला हाउस के एक मकान में आतंकियों के छिपे होने की खबर के बाद दिल्ली पुलिस के तेज-तर्रार इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा ने अपनी जान की परवाह न करते हुए दुर्दांत आतंकियों से लोहा लिया और वह इस कार्रवाई में शहीद हो गए थे। दूसरी ओर कुछ कट्टरपंथी नेता और कुछ राजनीतिज्ञ इस घटना पर राजनीति से बाज नहीं आते। इसे फर्जी एनकाउंटर कहकर हर साल बटला हाउस एनकाउंटर को याद किया जाता है। बटला हाउस मुठभेड़ की तीसरी बरसी पर सोमवार को नई दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर प्रदर्शन किया गया और मांग की गई कि मुठभेड़ की न्यायिक जांच कराई जाए। इस प्रदर्शन में आजमगढ़ से स्पेशल ट्रेन में आए राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल के सदस्यों ने भाग लिया। काउंसिल ने कहा कि आतंकवाद के नाम पर आजमगढ़ को बदनाम किया गया और किया जा रहा है जो बन्द होना चाहिए। मजेदार बात यह रही कि उलेमाओं ने हजारों समर्थकों के बीच कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह पर खास निशाना साधा। दिग्विजय ने कुछ महीने पहले आजमगढ़ जिले के संजरपुर गांव का दौरा किया था और उसी दौरान उन्होंने बटला हाउस मुटभेड़ पर सवाल खड़े किए थे। उल्लेखनीय है कि 19 सितम्बर 2008 को हुई मुठभेड़ में मारे गए दो संदिग्ध युवकों आतिफ अमीन और मोहम्मद साजिद का ताल्लुक इसी गांव से था। उलेमा काउंसिल के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना आमिर रशादी मदनी ने कहा कि यह कितनी अजीब बात है कि दिग्विजय सिंह संजरपुर जाकर इस मुठभेड़ पर सवाल खड़े करते हैं, लेकिन दिल्ली में उनकी सरकार है, जो इस मामले की उच्चस्तरीय जांच नहीं करवा रही है। उन्होंने कहा कि दिग्विजय ने मुझसे खुद कहा था कि उन्होंने इस मुठभेड़ के फर्जी होने की बात कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कही, लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी। मुझे लगता है कि दिग्विजय सिर्प नौटंकी करते हैं। उन्हें मुसलमानों से कोई हमदर्दी नहीं है। विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों ने सोनिया, मनमोहन सिंह और राहुल गांधी के खिलाफ नारेबाजी की, हालांकि इन लोगों के निशाने पर सबसे ज्यादा दिग्विजय रहे।
जन्तर-मन्तर में उलेमाओं का प्रदर्शन हो रहा था तो दिल्ली के दूसरे कोने में बटला हाउस एनकाउंटर में शहीद हुए दिल्ली पुलिस के मोहन चन्द शर्मा के घर पर उनका परिवार उन्हें अकेला ही याद कर रहा था। उनके परिवार ने किसी से भी बात नहीं की। यहां तक कि उन्होंने मीडिया से दूर ही रहना ठीक समझा। उनके घर पर पुलिसकर्मियों का पहरा था। उनके घर गए एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि उनके माता-पिता के सामने आज भी 2008 का मंजर आता है तो उनकी आंखों में आंसू छलक पड़ते हैं। यह हमारे देश की विडम्बना ही है कि इस मुठभेड़ को महज वोटों की खातिर फर्जी करार दिया जा रहा है और इस पर राजनीति हो रही है। कानूनी दृष्टि से कई अदालतों ने इसे सही कार्रवाई करार दिया है पर इसके बावजूद इस पर राजनीति चलती जा रही है। इन राजनीतिज्ञों व धार्मिक नेताओं को इस बात की परवाह भी नहीं है कि इससे हमारे सुरक्षा बलों पर क्या असर पड़ेगा? इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा की शहादत के बाद जिस प्रकार नेताओं ने कुलषित राजनीति के चलते इस एनकाउंटर पर संदेह किया और आतंकियों के संरक्षण की परिभाषा बोली और जांबाज इंस्पेक्टर की शहादत को संदेह के कटघरे में खड़ा किया गया, उससे निश्चित तौर पर दिल्ली पुलिस के जांबाज जवानों का ही नहीं बल्कि पूरे देश की फोर्सों का मनोबल टूटा होगा। इसका एक विपरीत असर यह जरूर हुआ कि पुलिस व अन्य फोर्सों के जवान अच्छी तरह समझ चुके हैं कि आतंक के खिलाफ चुप बैठना और सांप निकलने के बाद आतंकियों को पकड़ना नहीं बल्कि लकीर पीटना उनका पहला कर्तव्य है। परिणामस्वरूप अब राजधानी दिल्ली में कोई भी बम ब्लास्ट हो उसमें पुलिस के हाथ खाली के खाली हैं और हो भी क्यों न, यदि वे अपनी जांबाजी से आतंकी पकड़ भी लें तो सरकार मुकदमे लड़वाएगी। फांसी की सजा होगी, तो उसे लेट करवाएगी और आतंकियों को सरकारी मेहमान बनाकर उनकी खातिरदारी में जुटी होगी। बहरहाल बटला हाउस कांड की तीसरी बरसी पर दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर चन्द मोहन शर्मा को समस्त देशवासियों की ओर से शत्-शत् नमन्... आज उनकी कब्र पर एक दीया भी नहीं, जिनके चिरागों से चला करते थे अहले वतन, दीये जलते हैं उनकी कब्र पर जो बेचा करते हैं शहीदों को कफन
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Tuesday, 20 September 2011

सलीम शहजाद की हत्या जनरल कयानी के इशारे पर हुई



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th September 2011
अनिल नरेन्द्र

अमेरिका की प्रमुख खोजी पत्रिका `न्यू यार्पर' ने सनसनीखेज खुलासा किया है कि पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कयानी के इशारे पर ही वहां के खोजी पत्रकार सलीम शहजाद की हत्या की गई थी। पत्रिका के नवीन अंक में शहजाद की मौत के बारे में प्रकाशित आलेख में कहा गया है कि जनरल कयानी के स्टाफ के एक बड़े अधिकारी ने अपने आका के इशारे पर इस खोजी पत्रकार की हत्या का आदेश दिया। पत्रिका ने अमेरिका के खुफिया सूत्रों के हवाले से कहा कि पाक सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई शहजाद की रिपोर्टों से खफा थी। पत्रिका के अनुसार सेना और आईएसआई का गुस्सा उस समय सातवें आसमान पर चढ़ गया जब शहजाद ने `एशिया टाइम्स' में अपनी एक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया कि कराची के मेहरान नौसैनिक अड्डे पर गत 22 मई को आतंकवादी हमला नौसेना और अलकायदा के बीच साठगांठ के कारण हुआ। इस हमले में सेना के अत्याधुनिक टोही विमान नष्ट कर दिए गए थे। `न्यू यार्पर' के अनुसार सुरक्षा बलों ने शहजाद का 29 मई को अपहरण किया। शुरुआत में अपहरणकर्ताओं को इस पत्रकार को सबक सिखाने का निर्देश दिया। लेकिन बाद में किसी समय ऊपर से आदेश आया कि शहजाद को मौत के घाट उतार दिया जाए। शहजाद का शव पंजाब सूबे में एक नहर के किनारे पड़ा मिला जिस पर गम्भीर यातनाओं के निशान थे। पत्रिका में यह भी कयास लगाया है कि पाक सेना को यह संदेह था कि शहजाद खोजी पत्रिकारिता के सिलसिले में ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी एमआई सिक्स और भारत की खुफिया एजेंसी रॉ से भी सम्पर्प में था।
पोलिटजर विजेता पत्रकार डेक्सटर फिलविन्स ने अपने लेख में कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए लिखा है कि इलियास कश्मीरी की हत्या शहजाद की हत्या के बाद हुई थी। इसमें आशंका जताई गई है कि आईएसआई  ने शहजाद का टार्चर किया और इलियास का अता-पता बतलाने पर मजबूर किया। शहजाद से मिली जानकारी उसने अमेरिका को दे दी। इस्लामाबाद के इंस्पैक्टर जनरल पुलिस ने रहस्योद्घाटन किया कि शहजाद के फोन से पता चला कि उसने एक महीने के वक्फे में इलियास कश्मीरी से 258 बार बात की थी। लेख में बताया गया है कि शहजाद आईएसआई के राडार पर महीनों से था। आईएसआई ने उस पर इस बात का दबाव भी बनाया था कि वह उनका सम्पर्प तालिबान नेताओं से स्थगित करवाए। शहजाद ने ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया था। लेख में आगे बताया गया कि पिछले साल शहजाद नई दिल्ली में एक कांफ्रेंस अटैंड करने आया था उस समय भारतीय खुफिया एजेंसी ने उसे रॉ में शामिल करने का प्रस्ताव रखा था पर शहजाद इसके लिए तैयार नहीं हुआ था। इस किस्से से पता चलता है कि आज की तारीख में पाकिस्तानी पत्रकार कितने खौफनाक माहौल में अपना काम कर रहे हैं।
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