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Friday, 20 July 2012

क्या दिग्विजय सिंह की छुट्टी संगठन में फेरबदल की शुरुआत है?

अब जब राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव का मामला निपट गया है, लगता है कांग्रेस और संप्रग सरकार में फेरबदल का समय आ गया है। प्राप्त संकेतों से लगता है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अब संगठन में फेरबदल करने के मूड में आ चुकी हैं। खबर है कि कांग्रेस संगठन में कई दिग्गजों को हटाया जाएगा और कुछ के पर कतर दिए जाएंगे। कुछ को केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाकर संगठन में लगाया जा सकता है। संगठनात्मक फेरबदल के लिए सोनिया गांधी का वरिष्ठ सलाहकारों से सलाह मशविरा लगभग हो चुका है। यूपी और पंजाब के चुनाव में करारी हार को पार्टी पचा नहीं पा रही है। इस साल और 2013 में कई राज्यों में विधानसभा और आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भी यह जरूरी है कि कांग्रेस अपना संगठन दुरुस्त करे। क्या श्री दिग्विजय सिंह के पर कतरने से यह फेरबदल आरम्भ माना जाए? कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को लेकर मंगलवार को अफवाहों का बाजार गर्म रहा। कहा गया कि उत्तर प्रदेश की हार की वजह से सिंह से उत्तर प्रदेश और असम का प्रभार छीन लिया गया है। एक वजह यह भी सुनने को मिली कि दिग्विजय सिंह से इन राज्यों का प्रभार उनके विवादास्पद बयानों के चलते लिया गया तो दूसरी ओर यह भी सुनने में आया कि अपनी पत्नी की बीमारी की वजह से वह स्वयं ही अपनी इस जिम्मेदारी से मुक्त हो गए हैं। बात बढ़ती देख कांग्रेस महासचिव और मीडिया विभाग के अध्यक्ष जनार्दन द्विवेदी को इन सभी बातों का खंडन करने के लिए आगे आना पड़ा। बताया गया कि दिग्विजय सिंह राष्ट्रपति चुनाव को लेकर किसी और काम में व्यस्त हैं पर उन्हें लेकर उलझन तब शुरू हुई जब सोनिया गांधी से मिलने उत्तर प्रदेश के सांसदों के साथ कांग्रेस महासचिव बीके हरिप्रसाद दस जनपथ पहुंचे जबकि राज्य के प्रभारी दिग्विजय सिंह हैं। उससे पहले इलेक्ट्रानिक मीडिया के हाथ कांग्रेस संसदीय दल का वह पत्र लग गया जिसमें सांसदों के साथ सोनिया गांधी की मुलाकात का कार्यक्रम बनाया गया था। इस पत्र और हरिप्रसाद को उत्तर प्रदेश के सांसदों के साथ जाता देखकर इस बात की ऊहापोह बढ़ गई कि क्या सचमुच दिग्विजय से उत्तर प्रदेश और असम का प्रभार ले लिया गया है। सोनिया गांधी इन दिनों कांग्रेस सांसदों से मिल रही हैं। मंगलवार को वह यूपी के सांसदों से मिलीं। खबर है कि कुछ मंत्रियों ने जिनमें ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश और स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद के नाम प्रमुख हैं, ने केंद्र सरकार में मंत्री पद से इस्तीफा देकर पार्टी की सेवा करने की इच्छा जताई है। कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव के तुरन्त बाद दोनों केंद्रीय मंत्रिमंडल और कांग्रेस संगठन में बड़ा फेरबदल होगा। केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल के लिए कांग्रेस के सहयोगियों का भी दबाव है। श्री प्रणब मुखर्जी के जाने के बाद से वित्त मंत्री का पद भी भरना जरूरी है। लगता है कि दोनों सरकार और संगठन में फेरबदल होगा पर देखें क्या होता है?

Thursday, 21 June 2012

अक्सर फिसलती दिग्विजय सिंह की जुबां

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21 June 2012
अनिल नरेन्द्र
मुझे आज तक यह समझ नहीं आया कि कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह किस हैसियत से आए दिन बयानबाजी करते रहते हैं। बातें भी वह ऐसी करते हैं जिनका गंभीर राजनीतिक अर्थ निकलता है। अगर वह कांग्रेस के पवक्ता नहीं तो किस आधार पर किसकी शह पर यह बयानबाजी करते हैं? उनको किसी न किसी की तो शह मिली होगी? नहीं तो वह नीतिगत बयान कैसे दे देते हैं। ताजा उदाहरण दिग्विजय की ममता बनर्जी के खिलाफ एक निजी टीवी चैनल पर बयानबाजी का है। दिग्विजय ने एक टीवी इंटरव्यू में तृणमूल कांग्रेस की पमुख ममता बनर्जी को अपरिपक्व और अस्थिर बताया और कहा कि पार्टी के धैर्य की एक सीमा होती है। सिंह ने यह भी कहा था कि ममता को मनाने के लिए पार्टी एक सीमा से आगे नहीं जाएगी। सवाल यह उठता है कि दिग्विजय ने ऐसा बयान क्यों दिया? क्या यह कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा है कि तुम बयान दे दो बाद में हम उसका खंडन कर देंगे। ममता को संकेत भी मिल जाएगा और फिर हम पार्टी को आपके बयान से अलग कर लेंगे। यह पहली बार नहीं है जब दिग्विजय ने इस पकार के विवादास्पद बयान दिए हैं। हाल ही में दिग्विजय ने उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के बारे में भी टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा कि अंसारी को दोबारा उपराष्ट्रपति बनाना चाहिए। पार्टी सूत्रों का तर्प है कि जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को इस संबंध में अधिकृत कर दिया गया है तो पार्टी के जिम्मेदार नेताओं खासकर पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों को इस बारे में बोलने पर परहेज करना चाहिए। दिग्विजय ने पार्टी अध्यक्ष को भी नहीं बक्शा। उन्होंने एक टीवी इंटरव्यू में कहा था कि कांग्रेस अध्यक्ष के नेता सदन बनने में कोई बाधा नहीं है। वे नेता सदन बन सकती हैं, साथ ही कोई डिप्टी लीडर हो सकता है। यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद उनकी चुनाव के दौरान की गई टिप्पड़ियां पार्टी की हार का एक कारण बनी। दिग्विजय ने वटला हाउस मुठभेड़ को फर्जी करार देकर भी पार्टी और सरकार को फंसा दिया था। गृहमंत्री पी चिदम्बरम की नक्सल विरोधी नीति पर भी उन्होंने विवादास्पद टिप्पणी की थी। अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान भी आए दिन दिग्विजय आलतू-फालतू टिप्पणी करते रहे। आखिरकार कांग्रेस नेतृत्व को दिग्विजय सिंह के बड़बोलेपन के खिलाफ कदम उठाना ही पड़ा। पार्टी ने दिग्विजय सिंह के बयानों से अपने को जहां अलग किया वहीं यह सार्वजनिक तौर पर साफ किया कि वे मीडिया से बात करने के लिए आधिकारिक रूप से अधिकृत नहीं हैं। यह पहला मौका है जब कांग्रेस की तरफ से यह कहा गया है कि दिग्विजय की बातों का पार्टी के विचार न माने जाएं। यानी एक तरफ कांग्रेस ने साफ करने का पयास किया है कि मीडिया उनकी बातों को कांग्रेस का मत मान कर न चले वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह को भी परोक्ष तोर पर चेतावनी दी है कि वह मीडिया में बयान देने से बाज आएं। दिग्विजय के विवादित बयानों से नाराज पार्टी ने उन्हें विभिन्न सियासी मुद्दों पर पार्टी की ओर से बोलने पर रोक दिया है। कांग्रेस मीडिया विभाग के चेयरमैन कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने यह बयान जारी किया है। इसका मतलब यह है कि यह बयान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के निर्देश पर जनार्दन ने दिया है। देखें क्या दिग्विजय पर इसका कोई असर होता है या नहीं?
Anil Narendra, Batla House Encounter, Congress, Daily Pratap, Digvijay Singh, P. Chidambaram, Vir Arjun

Saturday, 14 January 2012

दिग्विजय जैसे दोस्त हों तो कांग्रेस को दुश्मनों की जरूरत नहीं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 14th January  2012
अनिल नरेन्द्र
अपने विवादास्पद बयानों के लिए मशहूर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर ऐसा बयान दे दिया है जिससे उनकी अपनी पार्टी और सरकार ही कटघरे में खड़ी हो गई है। उत्तर प्रदेश चुनाव में मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की कांग्रेसी जद्दोजहद में आखिरकार नई दिल्ली का बटला हाउस एनकाउंटर का जिन्न बोतल से बाहर निकल ही आया। दिग्विजय सिंह का प्रोजेक्ट आजमगढ़ बुधवार को उस समय फ्लाप हो गया, जब मुस्लिम युवकों के जबरदस्त विरोध के बाद उन्हें बिना रैली किए वहां से भागना पड़ा। इस घटनाक्रम से असहज दिग्विजय सिंह ने कहा कि बटला हाउस एनकाउंटर फर्जी था लेकिन प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का मानना है कि एनकाउंटर जायज था। इस वजह से हमने इस बात को आगे नहीं बढ़ाया। दिग्विजय ने यह बयान उसी आजमगढ़ में दिया जो इस एनकाउंटर के बाद आतंक की नर्सरी के रूप में प्रचारित किया जाने लगा था। इसी यात्रा में मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही कांग्रेस के स्टार प्रचारक राहुल गांधी को आमजगढ़ के शिब्ली कॉलेज से बिना रैली किए वापस जाना पड़ा। उलेमा काउंसिल कार्यकर्ताओं ने वर्ष 2008 में दिल्ली में हुए बटला हाउस मुठभेड़ कांड की जांच की मांग करते हुए शिब्ली कॉलेज के द्वार पर नारेबाजी की और राहुल गांधी का पुतला तक जलाया। राहुल शिब्ली कॉलेज के अतिगृह में ही ठहरे थे। काउंसिल के अध्यक्ष ने इस बारे में बताया कि उन्होंने राहुल को पहले ही आगाह किया था कि अगर राहुल बटला हाउस की वांछित जांच हुए बगैर आजमगढ़ आए तो उन्हें शहर में दाखिल नहीं होने दिया जाएगा। दिग्विजय ने फिर दोहराया कि मैं मानता हूं कि बटला मुठभेड़ फर्जी थी, लेकिन प्रधानमंत्री व गृहमंत्री इसे जायज मानते हैं, इसलिए हमें अपनी जांच की मांग को छोड़ना पड़ा। सीधे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को कठघरे में खड़ा करके उत्तर प्रदेश में भले ही दिग्विजय ने अपने समीकरण साधे हों, लेकिन केंद्र में कांग्रेस इससे असहज जरूर होगी। वहीं केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने अल्पसंख्यक आरक्षण को दोगुना करने की घोषणा कर खुद को और सरकार दोनों को परेशानी में डाल दिया है। आजमगढ़ में मुसलमानों ने दिग्विजय सिंह की इस सफाई को कितना सच माना यह तो नहीं पता लेकिन उन्होंने अपनी ही सरकार के दोनों शीर्ष सरदारों को जरूर कठघरे में खड़ा कर दिया। यूपी चुनाव के चलते मुसलमानों को खुश करने के लिए दिग्विजय सिंह ने मनमोहन सिंह और पी. चिदम्बरम को क्यों निशाना बनाया? इस पर कांग्रेस ने कुछ भी बोलने से मना कर दिया है। पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि कांग्रेस पहले ही इस मुठभेड़ पर अपनी राय दे चुकी है। नए प्रकरण पर उसे कुछ नहीं कहना। दरअसल कांग्रेस पार्टी दिग्विजय के इस बयान से बुरी तरह फंस गई है। इधर कुआं तो उधर खाई। न तो वह दिग्विजय सिंह की खिलाफत कर सकती है, क्योंकि उनके सिर पर राहुल गांधी का हाथ है और न ही अपने मनमोहन, चिदम्बरम जैसे सरीखे नेताओं के विरोध में जा सकती है। इसी तरह मुसलमानों को खुश करने के लिए कानून मंत्री सलमान खुर्शीद का बयान भी विवादों में आ गया है। उन्हें चुनाव आयोग का नोटिस भी मिल गया है। लेकिन राजनैतिक नुकसान यही है कि पिछड़ों पर दांव लगा रही कांग्रेस के खिलाफ यह बात जा सकती है, क्योंकि यदि अल्पसंख्यकों का कोटा दोगुना होता है तो इससे पिछड़े वर्ग का हक मारा जाएगा। लिहाजा पार्टी के लिए उनका बयान भी गले की फांस बन गया है।
Anil Narendra, Batla House Encounter, Daily Pratap, Digvijay Singh, State Elections, Uttar Pradesh, Vir Arjun

Thursday, 3 November 2011

मनमोहन सिंह की आखिरी सियासी पारी?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 3rd November 2011
अनिल नरेन्द्र
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पिछले काफी समय से चौतरफा हमले झेल रहे हैं। हमें लगता है कि अब मनमोहन सिंह को इन हमलों की परवाह भी नहीं है। वह इनसे विचलित नहीं होते और उन्होंने तय कर रखा है कि वह जितने दिन और सम्भव हुआ प्रधानमंत्री की कुर्सी से चिपके रहेंगे। क्योंकि उन्हें मालूम है कि यह उनकी बतौर पीएम आखिरी पारी है, इसके बाद तो उन्हें चांस मिलना लगभग तय नहीं है, तभी तो वह किसी भी आलोचना को अनसुना कर देते हैं। ताजा हमला देश के एक सम्मानित, निष्पक्ष उद्योगपति ने किया है। आईटी क्षेत्र के प्रमुख कम्पनी विप्रो के चेयरमैन अजीम प्रेमजी ने कहा है कि इस समय सरकार में निर्णय क्षमता का पूर्ण अभाव है और सही कदम नहीं उठाए गए तो आर्थिक वृद्धि की रफ्तार प्रभावित हो सकती है। जब प्रेमजी से पत्रकारों ने यह पूछा कि उनके हिसाब से इस समय देश के लिए सबसे बड़ी चिन्ता की बात क्या है तो उन्होंने कहा, `सबसे बड़ी चिन्ता राजकाज के संचालन से जुड़े मामलों को लेकर है। सरकार के नेताओं में निर्णय लेने की क्षमता का पूर्णतया अभाव है।' गौरतलब है कि प्रेमजी सहित कई दिग्गज उद्यमियों जैसे महिन्द्रा समूह के केशव महिन्द्रा और एचडीएफसी के दीपक पारिख ने इसी महीने राष्ट्रीय नेताओं को लिखे पत्र में घोटालों की श्रृंखला पर चिन्ता जताते हुए कहा था कि इससे सरकारी कामकाज के संचालन में समस्या पैदा हो रही है। पत्र में कहा गया है कि भ्रष्टाचार जैसी चुनौतियों से शहरी आंदोलन या पोस्टरबाजी से नहीं निपटा जा सकता।
उधर जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर राहुल गांधी को देश की बागडोर सौंपने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर इस्तीफे का दबाव बनाने का आरोप लगाया है। स्वामी ने सोमवार को बलिया में कहा कि कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर इस्तीफा देने का दबाव बना रही हैं। वह जल्द से जल्द राहुल को प्रधानमंत्री बनाना चाहती हैं। लेकिन राहुल का इस पद पर बैठना देशहित में नहीं होगा। उन्होंने कहा कि राहुल के प्रधानमंत्री बनने से देश और बर्बादी की तरफ बढ़ेगा। मनमोहन को पद से हटाने के लिए अभियान सोनिया और राहुल के चापलूस कर हे हैं। स्वामी ने कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को भी आड़े हाथों लिया। मैं किसी भी व्यक्ति को कुछ भी कह डालने वाले कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को चुनौती देता हूं कि वे मेरे खिलाफ बयान दें। जिस दिन उन्होंने मेरे खिलाफ मुंह खोला, उन पर कई मुकदमें दर्ज हो जाएंगे, क्योंकि मेरे पास उनके खिलाफ कई सुबूत हैं। उन्होंने नसीहत देते हुए कहा, `दिग्विजय सिंह प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखना बन्द कर दें, क्योंकि नौकर कभी मालिक नहीं बन सकता।' स्वामी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने दिग्विजय को प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब दिखा दिया है। लेकिन उन्हें यह जान लेना चाहिए कि नेहरू-गांधी परिवार अपने ही परिवार में से एक को प्रधानमंत्री बनाएगा।
राहुल गांधी के काफी नजदीकी सूत्रों के हवाले से खबर मिल रही है कि सरकार और कांग्रेस पार्टी में जल्दी ही बड़ा बदलाव सम्भावित है। प्रधानमंत्री के स्वर पर भी 2012 में बदलाव होगा और इसके फलस्वरूप मनमोहन सिंह को गद्दी छोड़नी पड़ सकती है। राजीव गांधी के नजदीकी दोस्त और राजीव गांधी फाउंडेशन के सदस्य सुमन दूबे के पुत्र अमिताभ दूबे के आंकलन के आधार पर अग्रणी आर्थिक दैनिक में यह खबर छपी है। अमिताभ दूबे को राहुल के करीबी दोस्त के तौर पर जाना जाता है और कुछ समय पूर्व राहुल गांधी केरल में भी उनकी शादी में शिरकत करने गए थे। अमिताभ दूबे वित्तीय विशेषज्ञ हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमिताभ मानते हैं कि भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण मनमोहन सिंह की सत्ता पकड़ कम हो चुकी है। मुख्य समस्या यह है कि मनमोहन सिंह अब प्रभावी नेतृत्व नहीं दे पा रहे हैं। इसमें इसका विश्लेषण किया गया है कि भारतीय राजनीति का रूप कैसे होने वाला है। मध्यावधि चुनाव की सम्भावना कम है लेकिन राजनीतिक अस्थिरता और नेतृत्व का पंगु होने से सरकार ठहर-सी गई है। मनमोहन सिंह की अपने सहयोगियों पर लगाम कसने की क्षमता कमजोर हो चुकी है। इसकी एक वजह तो मनमोहन सिंह की भी रुचता है तो इसके पीछे दूसरा कारण अस्वस्थता के कारण सोनिया गांधी की गैर मौजूदगी भी है। चूंकि मनमोहन सिंह जन नेता नहीं हैं इस वजह से उनमें राजनीतिक दृढ़ता की कमी है। रिपोर्ट में बताया गया है कि कांग्रेस पार्टी के पास नेतृत्व का संकट हल करने के लिए तीन विकल्प हैं। पार्टी वर्तमान स्थिति को यथावत भी रख सकती है, लेकिन यह बेहतरीन करने को प्रयासरत है। पार्टी चाहती है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन कमजोर पड़ना चाहिए और मुद्रास्फीति तो कम होनी चाहिए। पार्टी के किसी दूसरे व्यक्ति को बिठाना दूसरा विकल्प हो सकता है। इनमें से एक व्यक्ति रक्षामंत्री एके एंटनी हो सकते हैं, जिन्हें व्यापक तौर पर ईमानदार माना जाता है। लेकिन रक्षा क्षेत्रों में एंटनी को धीमा निर्णायक माना जाता है। एक विकल्प लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार हो सकती हैं, लेकिन उनकी प्रशासनिक क्षमताओं की परख अभी बाकी है। प्रणब मुखर्जी और पी. चिदम्बरम मजबूत प्रत्याशी हो सकते हैं, लेकिन उनके हालिया व्यवहार ने उनकी सम्भावनाओं को कमजोर कर दिया है। राहुल गांधी तीसरा विकल्प हो सकते हैं, लेकिन वह हस्तक्षेप को तैयार नहीं होंगे क्योंकि वह पार्टी की युवा विंग को मजबूत करने और उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण चुनावों में व्यस्त हैं। इससे भी बढ़कर वह भी अभी तक परखे नहीं गए हैं और उन्होंने अभी कोई मंत्रालय भी नहीं सम्भाला है। अमिताभ दूबे द्वारा भेजी गई रिपोर्ट बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि वह राहुल गांधी के बहुत करीबी हैं और उनके दिमाग को जानते हैं। इसलिए इसे भारत की राजनीतिक स्थिति का महत्वपूर्ण आंकलन माना जा रहा है।
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Thursday, 20 October 2011

अन्ना और उनकी टीम पर चौतरफा हमले


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th October 2011
अनिल नरेन्द्र
अन्ना हजारे और उनकी टीम पिछले कुछ दिनों से चारों तरफ से समस्याओं से घिरती जा रही है। एक-एक करके कई समस्याएं खड़ी हो गई हैं। अन्ना ने खुद मौन व्रत धारण कर लिया है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का कहना है कि सवालों से परेशान अन्ना ने जवाब न देने के लिए मौन धारण किया है। मंगलवार को उनके सिपहसलार अरविंद केजरीवाल पर लखनऊ में एक व्यक्ति ने चप्पल फेंकी। उत्तर पदेश में अन्ना का संदेश लेकर दौरा कर रहे केजरीवाल राजधानी में गोमती नदी के किनारे झूलेलाल पार्प में आयोजित एक कार्यकम में भाग लेने के लिए कार से उतरकर मंच की तरफ बढ़ ही थे कि 40 वर्षीय जितेन्द्र पाठक नाम के एक व्यक्ति ने उन पर चप्पल फेंककर हमला कर दिया। हमलावर का आरोप है कि केजरीवाल लोगों को बरगला रहे हैं इसलिए उन पर हमला किया है। उसने यह भी कहा है कि वह किसी संगठन अथवा राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ नहीं है। फिलहाल जितेन्द्र पाठक पुलिस हिरासत में है। टीम अन्ना के दो पमुख सदस्य पीवी राजगोपाल और राजेन्द्र सिंह ने आंदोलन के राजनीतिक रूप लेने पर आपत्ति व्यक्त करते हुए मंगलवार को कोर कमेटी से इस्तीफा दे दिया है। उनका दावा है कि यह भ्रम का शिकार हो गई है। उधर मंगलवार को ही कांग्रेस से सुलह करने के पयासों पर तब पानी फिर गया जब अन्ना हजारे के गांव के सरपंच और उनके साथी विशेष रूप से दिल्ली आए ताकि राहुल गांधी से मुलाकात हो सके, के हाथों निराशा लगी जब समय देकर भी राहुल गांधी अन्ना के गांव से आए पतिनिधिमंडल से नहीं मिले। सोमवार को योग गुरु बाबा रामदेव ने टीम अन्ना पर ही पहार कर दिया। उन्होंने कहा कि पशांत भूषण के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। बाबा रामदेव ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश को तोड़ने वाली बयानबाजी घातक है। उन्होंने कहा कि सामाजिक आंदोलन में शामिल लोग भी देश को तोड़ने वाले बयान देते हैं जो देश व आंदोलनों के लिए बहुत घातक हैं। उन्होंने अन्ना हजारे को पशांत भूषण के बयान पर अपना रुख स्पष्ट करने की सलाह भी दी। एक सवाल के जवाब में रामदेव ने कहा कि पशांत भूषण के खिलाफ केस दर्ज होना चाहिए। अंत में टीम अन्ना के खिलाफ एक और झटका तब लगा जब सुपीम कोर्ट ने अन्ना हजारे के हिंद स्वराज ट्रस्ट को मिलने वाले सरकारी धन के गलत इस्तेमाल मामले की सीबीआई जांच की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई को मंजूरी दे दी। जस्टिस आफताब आलम और जस्टिस रंजना देसाई की बैंच ने अधिवक्ता मनोहर लाल शर्मा की ओर से दायर याचिका पर सरकार से जवाब तलब किया। शर्मा ने आरोप लगाया कि साल 1995 में हजारे का ट्रस्ट बना था लेकिन इसे अनियमितता बरतते हुए एक वित्त वर्ष पहले की आर्थिक सहायता दी गई थी। याचिका में कहा गया है कि यह स्पष्ट है कि यह धोखाधड़ी, सरकारी कोष के दुरुपयोग का मामला है जो पतिवादी नंबर चार (हजारे) की ओर से किया गया है। सावंत आयोग की 2005 में आई रिपोर्ट में इसका खुलासा किया गया है कि उनके कुछ सहयोगियों या समूह राजनीतिक मित्रों ने ऐसा किया। याचिका में कहा गया है कि ट्रस्ट ने गैरकानूनी तरीके से एक करोड़ रुपए से भी ज्यादा की रकम काउंसिल फॉर एडवांसमेंट ऑफ पीपुल्स एक्शन एंड रूरल टेक्नोलॉजी (कपार्ट) से हासिल की। रिपोर्ट में यह भी खुलासा किया गया है कि 1995 में अन्ना ने कपार्ट से और 75 लाख रुपए लिए। याचिकाकर्ता ने कहा कि 2001 में कपार्ट ने पांच करोड़ रुपए ग्रामीण स्वास्थ्य के नाम पर जारी किए। कुल कितना सरकारी धन ट्रस्ट को अनियमित तरीके से दिया गया, इसकी जांच सीबीआई से समुचित तरीके से कराई जानी चाहिए। सुपीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करने पर अपनी हामी भर दी है, केंद्र और महाराष्ट्र सरकार को जवाब देने का नोटिस जारी कर दिया है। टीम अन्ना पर चारों ओर से हमले होने लगे हैं। अन्ना खुद तो बेदाग हैं पर उनके साथी निश्चित रूप से अन्ना की मूवमेंट को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
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Wednesday, 21 September 2011

बटला हाउस एनकाउंटर की तीसरी बरसी



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21th September 2011
अनिल नरेन्द्र

तीन साल पहले का 19 सितम्बर का वो दिन, जब नई दिल्ली के बटला हाउस के एक मकान में आतंकियों के छिपे होने की खबर के बाद दिल्ली पुलिस के तेज-तर्रार इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा ने अपनी जान की परवाह न करते हुए दुर्दांत आतंकियों से लोहा लिया और वह इस कार्रवाई में शहीद हो गए थे। दूसरी ओर कुछ कट्टरपंथी नेता और कुछ राजनीतिज्ञ इस घटना पर राजनीति से बाज नहीं आते। इसे फर्जी एनकाउंटर कहकर हर साल बटला हाउस एनकाउंटर को याद किया जाता है। बटला हाउस मुठभेड़ की तीसरी बरसी पर सोमवार को नई दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर प्रदर्शन किया गया और मांग की गई कि मुठभेड़ की न्यायिक जांच कराई जाए। इस प्रदर्शन में आजमगढ़ से स्पेशल ट्रेन में आए राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल के सदस्यों ने भाग लिया। काउंसिल ने कहा कि आतंकवाद के नाम पर आजमगढ़ को बदनाम किया गया और किया जा रहा है जो बन्द होना चाहिए। मजेदार बात यह रही कि उलेमाओं ने हजारों समर्थकों के बीच कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह पर खास निशाना साधा। दिग्विजय ने कुछ महीने पहले आजमगढ़ जिले के संजरपुर गांव का दौरा किया था और उसी दौरान उन्होंने बटला हाउस मुटभेड़ पर सवाल खड़े किए थे। उल्लेखनीय है कि 19 सितम्बर 2008 को हुई मुठभेड़ में मारे गए दो संदिग्ध युवकों आतिफ अमीन और मोहम्मद साजिद का ताल्लुक इसी गांव से था। उलेमा काउंसिल के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना आमिर रशादी मदनी ने कहा कि यह कितनी अजीब बात है कि दिग्विजय सिंह संजरपुर जाकर इस मुठभेड़ पर सवाल खड़े करते हैं, लेकिन दिल्ली में उनकी सरकार है, जो इस मामले की उच्चस्तरीय जांच नहीं करवा रही है। उन्होंने कहा कि दिग्विजय ने मुझसे खुद कहा था कि उन्होंने इस मुठभेड़ के फर्जी होने की बात कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कही, लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी। मुझे लगता है कि दिग्विजय सिर्प नौटंकी करते हैं। उन्हें मुसलमानों से कोई हमदर्दी नहीं है। विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों ने सोनिया, मनमोहन सिंह और राहुल गांधी के खिलाफ नारेबाजी की, हालांकि इन लोगों के निशाने पर सबसे ज्यादा दिग्विजय रहे।
जन्तर-मन्तर में उलेमाओं का प्रदर्शन हो रहा था तो दिल्ली के दूसरे कोने में बटला हाउस एनकाउंटर में शहीद हुए दिल्ली पुलिस के मोहन चन्द शर्मा के घर पर उनका परिवार उन्हें अकेला ही याद कर रहा था। उनके परिवार ने किसी से भी बात नहीं की। यहां तक कि उन्होंने मीडिया से दूर ही रहना ठीक समझा। उनके घर पर पुलिसकर्मियों का पहरा था। उनके घर गए एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि उनके माता-पिता के सामने आज भी 2008 का मंजर आता है तो उनकी आंखों में आंसू छलक पड़ते हैं। यह हमारे देश की विडम्बना ही है कि इस मुठभेड़ को महज वोटों की खातिर फर्जी करार दिया जा रहा है और इस पर राजनीति हो रही है। कानूनी दृष्टि से कई अदालतों ने इसे सही कार्रवाई करार दिया है पर इसके बावजूद इस पर राजनीति चलती जा रही है। इन राजनीतिज्ञों व धार्मिक नेताओं को इस बात की परवाह भी नहीं है कि इससे हमारे सुरक्षा बलों पर क्या असर पड़ेगा? इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा की शहादत के बाद जिस प्रकार नेताओं ने कुलषित राजनीति के चलते इस एनकाउंटर पर संदेह किया और आतंकियों के संरक्षण की परिभाषा बोली और जांबाज इंस्पेक्टर की शहादत को संदेह के कटघरे में खड़ा किया गया, उससे निश्चित तौर पर दिल्ली पुलिस के जांबाज जवानों का ही नहीं बल्कि पूरे देश की फोर्सों का मनोबल टूटा होगा। इसका एक विपरीत असर यह जरूर हुआ कि पुलिस व अन्य फोर्सों के जवान अच्छी तरह समझ चुके हैं कि आतंक के खिलाफ चुप बैठना और सांप निकलने के बाद आतंकियों को पकड़ना नहीं बल्कि लकीर पीटना उनका पहला कर्तव्य है। परिणामस्वरूप अब राजधानी दिल्ली में कोई भी बम ब्लास्ट हो उसमें पुलिस के हाथ खाली के खाली हैं और हो भी क्यों न, यदि वे अपनी जांबाजी से आतंकी पकड़ भी लें तो सरकार मुकदमे लड़वाएगी। फांसी की सजा होगी, तो उसे लेट करवाएगी और आतंकियों को सरकारी मेहमान बनाकर उनकी खातिरदारी में जुटी होगी। बहरहाल बटला हाउस कांड की तीसरी बरसी पर दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर चन्द मोहन शर्मा को समस्त देशवासियों की ओर से शत्-शत् नमन्... आज उनकी कब्र पर एक दीया भी नहीं, जिनके चिरागों से चला करते थे अहले वतन, दीये जलते हैं उनकी कब्र पर जो बेचा करते हैं शहीदों को कफन
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Tuesday, 13 September 2011

अन्ना के जन लोकपाल का विरोध किसके इशारे पर?

 
Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13th September 2011
अनिल नरेन्द्र
रामलीला मैदान में सफल आंदोलन करने के बाद भ्रष्टाचार पर लड़ाई की आगे की रणनीति तय करने के लिए अन्ना हजारे के गांव रालेगण सिद्धि में टीम अन्ना की कोर कमेटी की बैठक हुई। दो दिन चलने वाले इस बैठक में अन्ना के अलावा अरविन्द केजरीवाल, प्रशांत भूषण, संतोष हेगड़े, किरण बेदी और मेधा पाटकर समेत कोर ग्रुप के शीर्ष सदस्यों ने भाग लिया। बैठक समाप्त होने के बाद संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए केजरीवाल ने कहा, `आंदोलन की तरफ से अन्ना हजारे प्रधानमंत्री को पत्र लिखेंगे और उनमें सांसदों के प्रदर्शन का वार्षिक लेखाजोखा कराने, खारिज करने का अधिकार, वापस बुलाने का अधिकार और भूमि अधिग्रहण विधेयक पर अपने विचार जाहिर करेंगे।' इसके साथ ही हजारे ने लोगों से उन सभी पार्टियों पर नजर रखने को कहा है जो जन लोकपाल विधेयक का विरोध कर रही हैं। उन्होंने इस विधेयक का विरोध कर रहे सांसदों के घेराव का आह्वान भी किया। अन्ना ने बैठक में जाने से पहले मीडिया से कहा कि हमें इस विधेयक के खिलाफ जाने वाली सभी राजनीतिक पार्टियों और लोगों पर ध्यान देना चाहिए। जन लोकपाल विधेयक का विरोध कर रहे सांसदों और उनकी टीम के सदस्यों को निशाना बनाने वाले लोगों को लेकर दुःख जताते हुए उन्होंने कहा कि इस विधेयक का विरोध कर रहे सभी सांसदों के घरों को हमें घेरना चाहिए। अन्ना ने कहा कि हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि जब तक यह विधेयक संसद में पारित नहीं हो जाता तब तक हम यह आंदोलन खत्म नहीं करने दें। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि केंद्र सरकार विधेयक को पारित करने में विलम्ब करने का प्रयास करेगी तो जन्तर-मन्तर पर एक और आंदोलन छेड़ा जाएगा।
इस दौरान केंद्र सरकार ने अन्ना के खिलाफ कई मोर्चे खोल दिए हैं। एक तरफ सरकार टीम अन्ना के सदस्यों को आयकर विभाग के नोटिस थमा रही है तो दूसरी तरफ रामलीला मैदान में बयानबाजी को आधार बनाकर टीम अन्ना को कई सांसदों द्वारा विशेषाधिकार हनन की नोटिस दी गई है। कल तक अन्ना का समर्थन कर रहे कांग्रेस सांसद प्रवीण सिंह ऐरन ने एक नया शोशा छोड़ दिया है। लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को लिखे अपने पत्र में ऐरन ने कहा कि टीम अन्ना की चुनौती का उचित जवाब जनता में जाकर देंगे। क्योंकि उनके इरादे ठीक नहीं हैं। टीम अन्ना बहुराष्ट्रीय कम्पनियों एवं किसी दल के लिए राजनीतिक हित साधने का काम कर रही है जबकि ये लोग जनता के बीच जाने की बात कर रहे हैं।
ऐरन ने पत्र में लिखा है कि टीम अन्ना के सदस्य किरण बेदी, अरविन्द केजरीवाल और प्रशांत भूषण का इरादा और एजेंडा नेक न होकर ओछी राजनीति से प्रेरित है। ये लोग कांग्रेस और सरकार को बदनाम करने में जुटे हैं।
उन्होंने कहा कि जनता की आवाज उठाने के नाम पर ये लोग अपने या किसी और राजनीतिक, औद्योगिक या मल्टी नेशनल कम्पनी के नाजायज हित साधने के अभियान पर हैं। ये लोग समाज और प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता की मनस्थिति का अनुचित और अनैतिक लाभ उठा रहे हैं।
उधर दलित संगठनों ने भी अन्ना के जन लोकपाल बिल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। दलित संगठन इसे निरंकुश, संविधान-संसद विरोधी बताकर राज्यस्तरीय अभियान छेड़ने की तैयारी में हैं। इस अभियान के पीछे लेखक मुद्राराक्षस और दलित टुडे के सम्पादक एसके पंजय हैं। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के सिघौली तहसील मुख्यालय पर बामसेफ, डॉ. अम्बेडकर विचार मंच, इंसाफ, दलित एक्शन फोरम, अर्जक संघ, शोषित समाज दल, यादव महासभा, आदि संगठनों ने एक सम्मेलन कर जन लोकपाल के खिलाफ हुंकार भरी। मुद्राराक्षस ने इस सन्दर्भ में बातचीत करते हुए कहा कि जन लोकपाल भारतीय स्वर्ण मध्य वर्ग का एजेंडा है जो अति आधुनिक रूप में भी संघ की सांप्रदायिकता को अपने में समेटे है।
दलित एशिया के सम्पादक एमके पंजय ने बताया कि जन लोकपाल स्वर्ण हिन्दू पुनरुत्थान का नया पैंतरा है। जन लोकपाल भारतीय संविधान, संसद पर सवर्ण प्रभुत्व वाद का हमला है। उन्होंने कहा कि लोकपाल चाहे सरकारी हो या सिविल सोसाइटी का, दोनों ने मंदिरों, ट्रस्टों में व्याप्त भ्रष्टाचार को अपने दायरे में लाने का प्रयास क्यों नहीं किया? कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह तो पहले से ही टीम अन्ना को निशाना बना रहे हैं। केजरीवाल को आयकर विभाग का नोटिस मिलने पर दिग्विजय सिंह ने कहा कि नोटिस तो उन्हें 2005 में ही जारी किया गया था। बकौल दिग्विजय उन पर न सिर्प सरकारी सेवा के नियम तोड़ने का आरोप है बल्कि राजनीति में शामिल होने और एनजीओ के जरिये करोड़ों रुपये कमाने का भी आरोप है। केजरीवाल ने जवाब देते हुए कहा कि अगर दिग्विजय को लगता है कि मैंने करोड़ों का घपला किया है तो उनकी पार्टी की सरकार एफआईआर क्यों नहीं दर्ज कराती। कुल मिलाकर कांग्रेस और सरकार टीम अन्ना के आगे के रास्ते में रोड़े अटकाने से बाज नहीं आ रही। देखना यह है कि टीम अन्ना आगे का रास्ता कैसे तय करती है।
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Tuesday, 19 July 2011

जब वोट बैंक राजनीति देश की सुरक्षा पर भी भारी पड़े

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th July 2011
अनिल नरेन्द्र
ताजा मुंबई हमलों में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की प्रतिक्रिया ठीक उसी लाइन पर आई जिसकी उनसे उम्मीद रखी जा सकती है बल्कि आश्चर्य तो तब होता जब उन्हें इस ताजा बम कांड में हिन्दू आतंकवादियों का हाथ नजर न आता। तभी आश्चर्य नहीं हुआ जब दिग्विजय ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना साधते हुए शनिवार को कहा कि मुंबई धमाकों में हिन्दू सगठनों की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है, वैसे अभी मुंबई धमाकों में संघ का हाथ होने के सुबूत नहीं मिले हैं परन्तु जांच एजेंसियों को सभी बिन्दुओं से जांच करनी चाहिए। अब दिग्विजय ने कहा कि मैं आरएसएस की आतंकी गतिविधियों के सुबूत दे सकता हूं। उन्होंने कहा कि वह अपनी इस बात से पीछे नहीं हट रहे हैं कि देश में हुई आतंकवादी घटनाओं के पीछे हिन्दू संगठनों का हाथ रहा है। पहले हम समझते थे कि दिग्विजय जो कहते हैं वह उनकी अपनी सोच, रणनीति के तहत हो रहा है, चूंकि उनका 10 साल का राजनीतिक बनवास समाप्त होने जा रहा है इसलिए वह अपनी जड़ें पुन राजनीति में जमाना चाहते हैं इसलिए उन्होंने एंटी हिन्दू लाइन ली है ताकि अल्पसंख्यक वोटों के पैठ बना सकें पर जैसे उनके विवादास्पद बयानों का कांग्रेस आला कमान समर्थन करता है उससे साफ लगता है कि दिग्गी राजा को आला कमान का पूरा समर्थन हासिल है। मुंबई में हुए श्रृंखलाबद्ध धमाकों का दिग्विजय सिंह ने जिस तरह आनन-फानन में सांप्रदायिक रंग देने का प्रयास किया उसमें हमें उम्मीद थी कि शायद पार्टी हाई कमान उन्हें कड़ी फटकार लगाए और अपने आपको इस बयान से अलग करे पर न केवल चुप्पी साधकर शीर्ष नेतृत्व ने इसे अपनी मौन स्वीकृति दी बल्कि यह भी जता दिया कि हिन्दू संगठनों की जोरदार खिलाफत उसकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है जिसके दिग्विजय सिंह मोहरे मात्र हैं। अभी तक दिग्विजय के बयानों पर कांग्रेस टोकाटाकी करती थी पर जिस तरह से प्रवक्ता शकील अहमद ने खुले तौर पर दिग्विजय का समर्थन किया है उससे यह बात सिद्ध हो जाती है कि मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए दिग्विजय सिंह आज तक जो भी बोलते आ रहे थे वह कांग्रेस नेतृत्व की सोची-समझी चरणबद्ध नीति थी और ऐसे बेहूदा और बेतुके बयानों के लिए दिग्विजय सिंह को बाकायदा पुरस्कृत भी किया गया। उन्हें उस प्रदेश का प्रभारी बना दिया गया है जहां कांग्रेस की नजर अल्पसंख्यक वोट बैंक पर टिकी हुई है। इस समय भी दिग्विजय सिंह उत्तर प्रदेश और असम जैसे मुस्लिम आबादी वाले प्रदेशों के प्रभारी महासचिव हैं।
यह बहुत ही शर्म की बात है कि मुंबई विस्फोट जैसे मुद्दे पर भी दिग्विजय सरीखे नेता राजनीति और वोट बैंक पॉलिटिक्स का खेल खेलने से बाज नहीं आते। हमारे देश के नेता संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों के फेर में किस हद तक गिर सकते हैं। वे लाशों पर राजनीति करने के साथ-साथ उन समस्याओं से भी लाभ उठाने की ताक में रहते हैं जो राष्ट्र के लिए शर्मिंदगी का कारण बनती है। मुंबई में बम विस्फोटों के बाद भारत अंतर्राष्ट्रीय चर्चों पर यह कहने की स्थिति में नहीं रह गया है कि वह आतंकवाद से अपने बलबूते पर लड़ सकता है, लेकिन बावजूद इसके केंद्रीय सत्ता का नेतृत्व कर रहे दल के महासचिव इसके लिए बेचैन हो गए कि इस घटना का राजनीतिक लाभ कैसे उठाया जा सके? उन्हें इस बात की भी कतई चिन्ता नहीं कि पाकिस्तान जैसे देश इस बात का कितना फायदा उठा सकते हैं। जहां तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देश के प्रति वफादारी का सवाल है तो कांग्रेस के सबसे कद्दावर नेता पंडित जवाहर लाल नेहरू भी आन रिकार्ड कह चुके हैं कि संघ को आतंकवाद से नहीं जोड़ा जा सकता। चूंकि हो सकता है कि इस तरह के ऊंट-पटांग बयान अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से जुड़े हो, इसलिए भाजपा भी मैदान में कूद पड़ी है। शनिवार को भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन ने दिग्विजय के बहाने सोनिया गांधी और राहुल गांधी को भी लपेट लिया। राहुल से दिग्विजय की नजदीकी का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि राहुल खुद जो नहीं कह पाते, वह दिग्विजय सिंह से कहलवाते हैं। देश आतंकवाद से जूझ रहा है। ऐसे में दिग्विजय का संघ पर आरोप लगाना सिवाय गन्दी, तुच्छ राजनीति के और कुछ नहीं है। भाजपा के दूसरे वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी कहते हैं कि दिग्विजय सिंह को अरब सागर के किनारे ले जाएं और उनके शरीर में मौजूद लादेन की शैतानी रूह को भगाने के लिए कुछ झाड़-पूंक करवाएं। दिग्विजय सिंह जुबानी डायरिया का शिकार हो गए हैं। उनका अपनी भाषा और शब्दों पर कोई कंट्रोल नहीं है। कोई भी आसानी से समझ सकता है कि दिग्विजय सिंह को विष वमन करने की छूट इस आशा से दी गई है ताकि हिन्दू संगठनों को अपमानित और लांछित करने वाले उनके बयानों के जरिये मुस्लिम समाज के वोट आसानी से हासिल किए जा सकें? कांग्रेस की इस सोच से यह साफ है कि उसकी नजर में मुस्लिम समाज तक उसका वोट बैंक बनेगा जब उसे हिन्दू संगठनों से डराया जाएगा।
इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा कि आतंकवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर इस प्रकार की घटिया वोट बैंक राजनीति हो रही है। क्या यह जांच एजेंसियों को गलत दिशा में जांच करने व उन्हें जानबूझ कर भटकाने का काम नहीं है? यह एक तथ्य है कि खुद गृहमंत्री पी. चिदम्बरम कह चुके हैं कि भगवा आतंकवाद देश के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता, मजहब नहीं होता, यह एक विचारधारा है और यह सम्भव है कि कुछ मुट्ठीभर हिन्दू भी इसके शिकार हों पर इसका मतलब यह कतई नहीं कि आप सारे हिन्दू समाज को इसका जिम्मेदार ठहराएं, उन्हें बदनाम करें जैसे कि आप मुट्ठीभर मुस्लिम आतंकियों के कारण पूरे मुस्लिम समाज को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। अगर दिग्विजय सिंह के पास कोई ठोस सुबूत हैं तो जांच एजेंसियों को बताएं ताकि वह इसकी बारीकी से छानबीन कर सके।
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Sunday, 26 June 2011

राहुल की ताजपोशी की जल्दी के पीछे क्या कारण हैं?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 26th June 2011
अनिल रेन्द्र
कांग्रेस के भीतर घमासान छिड़ा हुआ है। पार्टी का एक वर्ग जो काफी बड़ा है, का मत है कि राहुल गांधी को जल्द से जल्द प्रधानमंत्री बनाया जाए। अगर राहुल इसके लिए तैयार न हों तो उन्हें पार्टी की खातिर, देश की खातिर मनाया जाए। सोनिया गांधी के दबाव में भले ही दिग्विजय सिंह को राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बन सकने वाले अपने बयान से पीछे हटना पड़ा हो लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पार्टी अब डॉ. मनमोहन सिंह को हटाना नहीं चाहती। कांग्रेस प्रवक्ता जयंती नटराजन को भी यह सफाई देनी पड़ी है कि राहुल भविष्य के नेता हैं और मनमोहन सिंह हमारे प्रधानमंत्री हैं और राहुल कब प्रधानमंत्री बनेंगे, यह फैसला पार्टी और खुद राहुल को करना है। लेकिन सोनिया-राहुल के वफादार कांग्रेसी नेताओं के बीच राहुल की ताजपोशी के समय को लेकर मंथन जारी है। कुछ लोग कहते हैं कि उत्तर प्रदेश के चुनावों के नतीजे के बाद इस पर फैसला लिया जाए जबकि कुछ का कहना है कि उत्तर प्रदेश के नतीजे पार्टी के हक में नहीं आए तो राहुल की ताजपोशी मुश्किल हो जाएगी और फिर 2014 का चुनाव भी मनमोहन सिंह की मौजूदा सरकार की अगुवाई में ही लड़ना होगा। अभी जिस प्रकार के हालात हैं उनमें 2014 का चुनावी संग्राम जीतना बहुत मुश्किल होगा और तब राहुल के लिए दिल्ली दूर अस्त वाला जुमला सही साबित हो जाएगा। इसलिए अगर राहुल को लाना है तो जल्दी ही लाना होगा।
दरअसल कांग्रेस आलाकमान के हाथ-पैर सन् 2009-2011 के बीच लगभग 20,00,000 करोड़ रुपये के कथित महाघोटालों से फूल गए हैं। अधिकांश सर्वेक्षणों में कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार को सर्वाधिक भ्रष्ट माना गया है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने भी भ्रष्ट देशों की सूची में भारत का स्थान आगे आने का चौंकाने वाला रहस्योद्घाटन किया है। परिणामस्वरूप कांग्रेस की लोकप्रियता का ग्रॉफ दो वर्षों में सांप-सीढ़ी के पासों की तरह आसमान से जमीन पर आ गया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि आज भी इतना कुछ होने के बावजूद डॉ. मनमोहन सिंह की व्यक्तिगत छवि साफ है परन्तु डॉ. सिंह भ्रष्टाचार के आरोपों से तार-तार सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। विगत एक वर्ष में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने तीन अवसरों पर दो टूक शब्दों में कहा है कि वे सेवानिवृत्त (रिटायर) नहीं हो रहे हैं, वे त्यागपत्र नहीं देंगे। उन्होंने यह भी कहा है कि उन्हें अभी अधूरे काम पूरे करने हैं। राजनीतिक रूप से इस पेचीदा हालात में प्रधानमंत्री डॉ. सिंह को हटाने पर पार्टी में महाभारत को टाला नहीं जा सकता है।
राहुल को सरकार की कमान सौंपने के पीछे एक तर्प यह भी दिया जा रहा है कि अगर राहुल प्रधानमंत्री बनते हैं तो उनके नेतृत्व में लोकपाल कानून बनवाकर उसकी जांच के दायरे में कुछ शर्तों के साथ प्रधानमंत्री को भी शामिल किया जा सकता है। डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते प्रधानमंत्री को लोकपाल बिल में शामिल करना जोखिम भरा हो सकता है, क्योंकि कई घोटालों में सीधा-सीधा पीएमओ जांच के दायरे में आ रहा है। इसके साथ ही राहुल के नेतृत्व में भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक पारित कराकर किसानों की सहानुभूति उसी तरह और सरकार के साथ की जा सकती है जैसे किसानों के कर्ज माफ करके यूपीए के दौरान जुटाई गई थी। राहुल लाओ अभियान के समर्थकों का दूसरा मजबूत तर्प है कि राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने का सबसे बड़ा फायदा उत्तर प्रदेश में होगा, जहां न सिर्प कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जान आ जाएगी बल्कि उत्तर प्रदेश में पार्टी की जीत के आसार बहुत बढ़ जाएंगे। साथ ही उत्तराखंड और पंजाब विधानसभा चुनावों में भी पार्टी का बेहतर प्रदर्शन राहुल की ताजपोशी के खाते में चला जाएगा। इससे न सिर्प कांग्रेस के खिलाफ चलने वाले अभियान की धार पुंद होगी बल्कि उसके बाद गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावों और 2013 में होने वाले दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों और 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए भी पार्टी को ताकत मिलेगी। इसके अलावा सोनिया-राहुल के वफादार कांग्रेसी नेता इसलिए भी राहुल की ताजपोशी जल्दी चाहते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि जिस तरह पिछले एक साल से यूपीए सरकार और कांग्रेस के खिलाफ प्रचार अभियान चल रहा है, उसके निशाने पर सबसे ज्यादा सोनिया-राहुल ही हैं। इसके खिलाफ आम जनता में राहुल को इस समय प्रधानमंत्री बनाने पर असहमति नजर आती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार 71 फीसदी लोगों ने साफ कहा कि राहुल के लिए केवल इसलिए प्रधानमंत्री की मुहिम चल रही है क्योंकि वह नेहरू-गांधी खानदान के वंशज हैं। उनमें वह काबलियत, अनुभव नहीं है जो इस समय देश के प्रधानमंत्री को होना चाहिए। मोटे शब्दों में उनकी राय में राहुल गांधी प्राइम मिनिस्टर मैटीरियल के नहीं हैं। केवल 27 फीसदी लोग मानते हैं कि राहुल युवा शक्ति, उम्मीद के प्रतीक हैं और देश को ऐसे नेतृत्व की सख्त जरूरत है। फेसबुक पर भी 65 प्रतिशत लोगों का मानना है कि राहुल पीएम बनने के लिए अभी तैयार नहीं हैं, न वह खुद बनना चाहते हैं और न ही उनमें इतनी क्षमता है।
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Friday, 27 May 2011

आंख की पुतली का हाल देख तिलमिला उठे करुणानिधि

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27th May 2011
अनिल नरेन्द्र
तमिल भाषा में कनिमोझी का मतलब होता है आंख की पुतली। डीएमके सुप्रीमो एम. करुणानिधि ने अपनी इस बेटी का नाम बड़े प्यार से रखा था, क्योंकि काली पुतली वाली यह बच्ची उन्हें बहुत भाती थी। तभी तो वह जब तिहाड़ में अपनी आंख की इस पुतली बेटी से मिलने गए तो गले से कनि को लगाकर उनकी आंखें भर आईं। कनि उनके गले से लगकर रोने लगी। कनिमोझी को सहारा देने के लिए पिता करुणानिधि पूरे लाव-लश्कर के साथ तिहाड़ जेल गए। उनके साथ उनकी पत्नी, दामाद और पोता भी था। पार्टी के आठ सांसद भी जेल परिसर तक आए थे। लेकिन उन्हें जेलर के कमरे तक जाने की इजाजत नहीं मिली। अन्दर माता-पिता, बेटी, दामाद के आंसू निकल रहे थे तो बाहर कुछ और ही नजारा था। तिहाड़ की सुरक्षा में तमिलनाडु पुलिस की ड्यूटी रहती है, जो कुछ सिपाही अपने `देश' के सांसदों के साथ खड़े बतिया रहे थे। चार सिपाही और आठ सांसद रोने की मुद्रा में अलर्ट खड़े थे, जैसे ही सामने से करुणानिधि का काफिला आया, ये सांसद फूट-फूट कर रोने लगे। दो तमिल सिपाही भी अपने आंसू नहीं रोक पाए। पास के खड़े एक नेता जी बोले, ये गम के नहीं बल्कि वफादारी के आंसू हैं। ऐसे वफादारी के आंसू कभी आपने भी देखे हैं? करुणानिधि बिना सोनिया से मिले वापस चले गए।
कांग्रेस और द्रमुक के रिश्ते टूटने के कगार पर हैं। तनातनी के इस माहौल में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने और आग लगा दी है। जयललिता ने स्वर्गीय राजीव गांधी की हत्या में द्रमुक का हाथ होने का आरोप लगा दिया है। मंगलवार को चुनाव जीतने के बाद अपनी पहली ही प्रेस कांफ्रेंस में जयललिता ने एक सवाल के जवाब में कहा कि 1991 से मैं भी एलटीटीई के डर के साये में जी रही हूं। हम हमेशा से कहते रहे हैं कि राजीव गांधी की हत्या में द्रमुक परोक्ष रूप से शामिल था। जयललिता से पूछा गया था कि क्या लिट्टे के पूर्व नेता सी. पद्मानाभन उर्प केपी ने वाकई यह कहा था कि यदि मौका मिला तो तमिल लड़ाके जयललिता की हत्या कर देंगे। जयललिता ने कहा कि 2जी घोटाले में हो रही कानूनी कार्रवाई से लोगों का न्यायपालिका में विश्वास बहाल हुआ है। कनिमोझी की ओर से महिला होने का हवाला देकर अदालत से जमानत मांगने पर उन्होंने कहा, `यह तर्प बिल्कुल गलत है, राजनीति और अपराध के मामलों में महिला होने के कारण छूट नहीं मांगी जा सकती है।'
द्रमुक कांग्रेस को सबक सिखाने के लिए बेताब है पर उसे समझ नहीं आ रहा कि वह करे तो क्या करे? अपने प्रिय सहयोगी ए. राजा और अब बेटी कनिमोझी के जेल में चले जाने से करुणानिधि एकदम तमतमाए बैठे हैं। जेल में बेटी से मिलने के बाद हर बार की तरह वह सोनिया गांधी से मिलने नहीं गए। खबर यह है कि होटल ताज मान सिंह में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व महासचिव दिग्विजय सिंह से भी उन्होंने मिलने से मना कर दिया। कांग्रेस के साथ सात वर्षों की पुरानी दोस्ती में यह पहली बार हुआ है कि करुणानिधि दिल्ली आए और कांग्रेस के किसी भी नेता से मिले बिना वापस चले गए। करुणानिधि यह अच्छी तरह जानते हैं कि इस समय उनके 18 सांसद कांग्रेस का कुछ नहीं बिगाड़ सकते लिहाजा वे सही अवसर की तलाश में हैं। वैसे भी चुनाव हारने के बाद वह कितने मोर्चों पर एक साथ लड़ेंगे?
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Saturday, 7 May 2011

दिग्गी राजा का ओसामा बिन लादेन प्रेम!

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

प्रकाशित: 07 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
वैसे तो श्री दिग्विजय सिंह एक सुलझे हुए नेता हैं। वह कांग्रेस महासचिव होने से पहले दस साल तक मध्य प्रदेश जैसे राज्य के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। उन्हें राजनीति की अच्छी जानकारी है पर पिछले कुछ दिनों से पता नहीं उन पर सैक्यूलरवाद खासकर अल्पसंख्यकवाद का ऐसा रंग चढ़ा है कि न जाने क्या-क्या बोलने लगे हैं। ताजा उदाहरण लखनऊ की एक प्रेस कांफ्रेंस का है जहां आपने दुर्दांत आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को `ओसामा जी' कहकर संबोधित कर दिया। दिग्विजय बोले, `ओसामा जी कई वर्षों से पाक में रह रहे थे। पाक आर्मी ने क्यों कुछ नहीं किया? अमेरिका ने मारने के बाद समुद्र में उन्हें फेंक कर अच्छा नहीं किया, अपने देश में भी मुंबई हमलों में मारे गए लोगों को उनके धर्म के अनुसार दफन किया गया।' दिग्विजय का ओसामा प्रेम अपनी समझ से बाहर है। ओसामा की तारीफ करना, उसकी विचारधारा की तारीफ करना है और इससे किसी भी प्रकार की हमदर्दी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करती है। पूरी दुनिया ओसामा को कोस रही है। तमाम मुस्लिम देश भी उसकी कारगुजारियों की लानत-मनानत कर रहे हैं। लेकिन दिग्गी राजा की चिन्ता कुछ और ही है। वह समझते हैं कि ओसामा को ओसामा जी कहने से भारत के मुसलमान खुश हो जाएंगे और उनकी वाह-वाह करेंगे।
पिछले कुछ महीनों में कभी `हिन्दू आतंकवादी' तो कभी `संघी आतंकवादी' का नाम लेकर हलचल मचाने में दिग्गी राजा ने कोई कसर नहीं छोड़ी। दिल्ली के बटला हाउस एनकाउंटर को उन्होंने फर्जी एनकाउंटर कहा। यही नहीं, वह आजमगढ़ गए और मरने वाले लड़कों के घरों में जाकर उनसे हमदर्दी जताई। यह सब तब हुआ जब दिल्ली पुलिस का एक जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा इस मुठभेड़ में आतंकवादियों के हाथों मारा गया और दिल्ली की विभिन्न अदालतों ने भी इस एनकाउंटर को सही ठहराया। मुंबई हमलों में मारे गए हेमंत करकरे की हत्या पर भी दिग्गी राजा ने प्रश्न उठाए। पिछले दिनों एक समारोह में दिग्विजय सिंह ने गुजरात का नाम लेते हुए कहा कि आखिर प्रज्ञा ठाकुर और असीमानन्द जैसे लोगों को वहां शरण क्यों मिली है? जो बम बनाते हैं, वह गुजरात में जाकर संरक्षण पा लेते हैं। ऐसे तत्वों को भाजपा सरकारें संरक्षण दे रही हैं। मध्य प्रदेश में भी संघी आतंकियों को शरण दी जाती है। बटला हाउस मुठभेड़ पर फिर से सवाल उठाते हुए उन्होंने लाल कृष्ण आडवाणी से पूछा कि आखिर पकड़ा गया हर आतंकी संघ का क्यों है? लाल कृष्ण आडवाणी को भी घेरते हुए उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक तनाव उनकी रथ यात्रा के बाद से ही पनपा है।
अपने सांप्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा कि कश्मीर में तिरंगे की दुहाई देने वालों का हमेशा से विभाजन ही मुख्य उद्देश्य रहा है। देश के बंटवारे के लिए मोहम्मद अली जिन्ना नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता वीर सावरकर ही मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। हिन्दू संगठनों को कोसना आजकल दिग्विजय का स्टाइल हो गया है पर आतंकवादियों को महिमामंडित करना अलग बात है। आप ऐसे व्यक्ति, विचारधारा के गुणगान कर रहे हैं जिसने बाकी विश्व के साथ-साथ भारत को भी तबाह करने की धमकी दी थी। आपको देशहित की भी परवाह नहीं, आपको तो केवल परवाह है वोट बैंक की पर इन सबके बावजूद कितना कंसालिडेट हुआ है आपका वोट बैंक यह अलग प्रश्न है।