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Thursday, 22 March 2012

क्या सैयद मोहम्मद काजमी पर दिल्ली पुलिस झूठा केस बना रही है?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22 March 2012
अनिल नरेन्द्र
इजरायली दूतावास की कार में विस्फोट के मामले में गिरफ्तार पत्रकार सैयद मोहम्मद काजमी क्या निर्दोष हैं जिन्हें जबरन दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है या यह हमले में शामिल एक महत्वपूर्ण कड़ी है? यह प्रश्न काजमी की गिरफ्तारी के बाद से ही अखबारों में बना हुआ है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि दिल्ली पुलिस ने इजरायल और अमेरिका के कहने पर काजमी को गिरफ्तार किया और उसकी गिरफ्तारी की असल वजह थी कि वह अपनी टीवी रिपोर्टों में मध्य-पूर्व की सही स्थिति पेश करता था जिससे दोनों इजरायल और अमेरिका नाराज थे और उसे रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने यह ड्रॉमा रचा है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य प्रमुख शिया धर्मगुरु मौलाना कल्वे जव्वाद ने लखनऊ में कहा कि दिल्ली के पुलिस आयुक्त इजरायली एजेंट हैं और उनकी सम्पत्ति की जांच होनी चाहिए। मौलना जव्वाद ने मीडिया से कहा कि देश में पिछले करीब 20 वर्षों से बेकसूर मुसलमानों को आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्तता के आरोप में गिरफ्तार करने का सिलसिला जारी है। गत 13 फरवरी को दिल्ली में हुए विस्फोट में वरिष्ठ पत्रकार सैयद मोहम्मद काजमी की गिरफ्तारी इसकी नई कड़ी है। दूसरी ओर दिल्ली पुलिस नए-नए सुबूत पेश कर रही है। मामले की जांच में जुटे सूत्रों ने बताया कि काजमी के ईरान से गहरे रिश्ते होने के पक्के सुबूत मिले हैं। काजमी कई बार ईरान गया था। इस दौरान उसने ब्लास्ट से जुड़े दूसरे ईरानियों से मुलाकात की थी। काजमी ने पुलिस को बताया कि वह 7 जनवरी 2011 को ईरान गया था। इस बार उसकी मुलाकात सैयद अली और अली रजा से हुई थी। सैयद अली ने उसे ईरानी साइंटिस्ट की मौत का बदला लेने की बात कही थी। सैयद ने उसे तेहरान में 3000 डालर और एक मोबाइल फोन भी उपलब्ध कराया। वापस दिल्ली लौटने पर उसकी कई बार सैयद से फोन पर बात हुई। मई 2011 में ईरान से उसे सैयद ने फोन कर इजरायली डिप्लोमेट को निशाना बनाने की बात कही थी। उसे इस हमले के लिए ईरान से आने वाले लोगों के लिए दिल्ली में मदद करने के निर्देश मिले थे। पुलिस का दावा है कि योजना के मुताबिक ईरानी हमलावरों के दिल्ली आने पर काजमी ने उन्हें न सिर्प करोल बाग में फैज रोड स्थित होटल में ठहराया बल्कि इजरायली डिप्लोमेट के आने-जाने का रूट पता करने में भी उनकी मदद की। इसके लिए किराये पर ली गई मोटरसाइकिलों का इस्तेमाल किया गया। ज्ञात रहे कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने जोरबाग के कर्बला इलाके में रहने वाले फ्रीलांस पत्रकार मोहम्मद काजमी को 6 मार्च को गिरफ्तार किया था। पुलिस आयुक्त ने बताया कि सन् 2011 में जब काजमी ईरान गया था तो इसकी मुलाकात सैयद अली, मोहम्मद रजा और ईरानी अफसर से हुई। मलेशिया में बैठे गैंग के मास्टर माइंड मोहम्मद मसूद के दिशानिर्देश पर सैयद अली और मोहम्मद रजा ने दिल्ली में इजरायली डिप्लोमेट पर हमला करवाने में काजमी को पैसों का लालच दिया। इसके लिए 5500 डालर देने की बात कही गई। काजमी तैयार हो गया और फिर ईरानी अफसर के साथ दिल्ली चला गया। 10 फरवरी को सैयद अहमद, मोहम्मद रजा खान और अब्दुल फजी मेंहदियान भी दिल्ली आ गए। तीनों काजमी के यहां रुके हुए थे। अगले दिन काजमी की आल्टो में बैठकर तीनों ने इजरायल दूतावास के साथ-साथ नई दिल्ली रेंज इलाके का भ्रमण कर हमले की रूपरेखा तैयार की। उधर अफसर ईरानी ने करोल बाग के रहने वाले एक युवक के सहयोग से एक स्कूटी खरीदी। इसी स्कूटी का इस्तेमाल कार में स्टिकी बम लगाने के लिए प्रयोग में लाया गया था। अफसर से मलेशिया में बैठा उसका आका मसूद सम्पर्प में था। उधर मसूद की हां पर 14 फरवरी को बैंकाक और जॉर्जिया में हमला किया गया। इस हमले को मोरादी सईद और मोहम्मद काजी ने अंजाम दिया था। मोहम्मद काजी को बैंकाक पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। वहीं मलेशिया पुलिस के हत्थे सभी धमाकों का मास्टर माइंड मसूद भी चढ़ गया। दिल्ली में हुए ब्लास्ट के 24 घंटे में इजरायल की जांच एजेंसी मोसाद की एक टीम दिल्ली पहुंच गई थी और लगातार जांच कर रही है। पुलिस सूत्रों के अनुसार मोसाद के एजेंट जल्द ही रिमांड पर चल रहे काजमी से पूछताछ कर सकते हैं। वहीं दिल्ली पुलिस पूरे मामले से परदा उठाने के लिए मलेशिया में गिरफ्तार मसूद से भी पूछताछ करने के लिए मलेशिया सरकार से सम्पर्प कर रही है। अब दिल्ली पुलिस सही कह रही है या यह सारी कहानी जबरन बनाई गई है, इसका फैसला तो अदालत में हो ही जाएगा। उम्मीद है कि सच्चाई की जीत होगी। वैसे दिल्ली पुलिस को यह केस अदालत में साबित करना होगा। इससे दिल्ली पुलिस की प्रतिष्ठा जुड़ चुकी है। यह मामला अब पूरी तरह इंटरनेशनल हो चुका है।
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Saturday, 3 March 2012

लश्कर-ए-तोयबा की रणनीति में परिवर्तन

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 3 March 2012
अनिल नरेन्द्र
नब्बे के दशक में लश्कर-ए-तोयबा आतंकवादियों को पाकिस्तान के जेहादी अड्डों से भारत धकेलता रहा। मकसद था कश्मीर में तोड़फोड़ करना। इसके बाद पाक सरकार ने आतंकवाद को बाकायदा एक स्टेट पॉलिसी बनाकर आतंकवादियों को भारत के शेष भागों में हमले करवाने की नीति बनाई। इसी के तहत सन 2000 में लाल किले पर हमला हुआ और 2001 में भारतीय संसद पर और 2008 में मुंबई हमले हुए। इन हमलों में आईएसआई ने लश्कर के माध्यम से भारत स्टेट के खिलाफ हमले करवाए। इन हमलों में कुछ आतंकी पाकिस्तान से विशेष रूप से आए तो कुछ यहीं भारत से शामिल हुए पर अब लगता है कि लश्कर ने अपनी रणनीति में थोड़ी तब्दीली की है। 26/11 हमलों के बाद उसने 10 आतंकियों को मुंबई में हमला करने भेजा था पर अब वह पाकिस्तान से आतंकी न भेजकर यहीं भारत से ही जेहादियों से हमले करवा रहा है। वह भारत से हमदर्द जेहादियों को उठाता है और उन्हें पाकिस्तान ले जाकर पूरी ट्रेनिंग देकर वापस भेजकर हमला करवा रहा है। बुधवार को दिल्ली पुलिस ने जिन दो आतंकवादियों को गिरफ्तार किया है, उससे आईएसआई और लश्कर की नई नीति के संकेत मिलते हैं। राजधानी दिल्ली में एक प्रसिद्ध बाजार सहित 18 जगह धमाके की साजिश थी। लेकिन जम्मू-कश्मीर, झारखंड और दिल्ली पुलिस के साझा अभियान ने समय रहते बड़े धमाके होने से राजधानी को बचा लिया। साजिश को अंजाम देने की तैयारी में जुटे लश्कर-ए-तोयबा के दो आतंकियों को दबोच लिया गया। मूल रूप से जम्मू-कश्मीर के निवासी बताए जा रहे दोनों बम बनाने में माहिर हैं। इनके पास से बरामद मैमोरी कार्ड में कुछ ऐसी तस्वीरें कैद हैं, जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए सुबूत के तौर पर काम आएंगी। मसलन पाकिस्तान में संचालित आतंकी प्रशिक्षण केंद्र, आईईडी (इप्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) बनाते हुए। उनके कब्जे से एके 47 राइफल, विस्फोटक पदार्थ, आपत्तिजनक दस्तावेज सहित बहुत कुछ सामान बरामद हुआ है। इनका इरादा दिल्ली की चांदनी चौक मार्केट में विस्फोट करना था। सूत्रों के अनुसार उनमें एक जम्मू-कश्मीर निवासी एहतेशाम है और दूसरा हजारी बाग निवासी शफाकत है। यह दोनों पाकिस्तान में लश्कर के कैम्पों में ट्रेनिंग ले चुके हैं। जानकारी मिली है कि हजारी बाग के जिस शख्स को हिरासत में लिया गया है, वह एहतेशाम का नजदीकी रिश्तेदार है और कई सालों से झारखंड में आ बसा था। झारखंड पुलिस ने इस शख्स से लम्बी पूछताछ की है। पूछताछ के दौरान इस शख्स ने बताया कि लश्कर के आका दिल्ली सहित कई बड़े शहरों में भयानक विस्फोट कराने की तैयारी में जुटे हुए हैं। एहतेशाम हजारी बाग में रहने वाले शफाकत और कुछ अन्य लोगों की मदद से वहीं पर खतरनाक बम तैयार करता था, जिन्हें देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजा जाना था। बुधवार को जिन आतंकियों को पकड़ा गया है वे दिल्ली के तुगलकाबाद में किराये के मकान में रहते थे। जब इन्हें सीमापार से निर्देश मिला था कि वे दिल्ली के किसी भीड़भाड़ वाले इलाके में बम विस्फोट करें तो इसके लिए इन लोगों ने चांदनी चौक की क्लॉथ मार्पिट का चुनाव किया। यहां शाम के वक्त हजारों लोगों की भीड़ रहती है। पूछताछ के दौरान पकड़े गए आतंकियों ने जानकारी दी है कि यदि वे लोग पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ते तो बुधवार की शाम चांदनी चौक विस्फोटों से दहल जाता। प्लान था 18 जगहों पर विस्फोट करने का। वे केवल भीड़भाड़ वाले स्थान पर विस्फोट करके दहशत फैलाना चाहते थे। आतंकी मंसूबों को नाकाम करने के लिए दिल्ली, झारखंड, जम्मू-कश्मीर की पुलिस तथा केंद्र की सुरक्षा एजेंसियों को बधाई। बेहतर समन्वय से यह सम्भव हो सका।
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Thursday, 16 February 2012

दिल्ली, तिबलिस और बैंकाक धमाकों का कोई आपसी रिश्ता है?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17th February  2012
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली के अति सुरक्षित माने जाने वाले क्षेत्र में इजराइली दूतावास की कार को निशाना बनाने और जार्जिया की राजधानी में असफल बम विस्फोट के प्रयास के 24 घंटे बाद थाइलैंड की राजधानी बैंकाक में लगातर तीन धमाके साबित करते हैं कि यह दहशतगर्द जब चाहे, जहां चाहे हमले कर सकते हैं। यह भी एक बार फिर साबित होता है कि पूरी दुनिया आज आतंकवाद की जकड़ में फंस चुकी है। मंगलवार को बैंकाक में महज 100 मीटर के दायरे में तीन धमाके हुए। घटना में हमलावर समेत पांच लोग घायल हुए हैं। मौके से मिले पहचान पत्र से हमलावर के ईरानी होने की आशंका है। हमलावर की शिनाख्त मोरादी के रूप में हुई है। उसने राजधानी बैंकाक के भीड़भाड़ वाले इलाके में बम फेंके। तीसरा बम पेड़ से टकराने के कारण मोरादी के ही पैर के पास फटा, जिससे वह खुद भी घायल हो गया। उसके एक और ईरानी मददगार मोहम्मद इजाई को भी गिरफ्तार किया गया है। जांच एजेंसियों ने हमले की दिल्ली और जार्जिया की घटना से तार जुड़ने की आशंका जताई है। इस घटना में हमलावर सहित तीन थाई पुरुष और एक महिला भी घायल हुईं। थाई प्रधानमंत्री चिंगलक शिनवात्रा ने पुलिस और देश के राष्ट्रीय गुप्तचर एजेंसी को तिहरे विस्फोट के जांच के आदेश दिए हैं। थाई विदेश मंत्री को ईरान से बात करने को कहा है। थाई प्रधानमंत्री शिनवात्रा गणतंत्र दिवस पर नई दिल्ली विशेष अतिथि के रूप में आई थीं। क्या उनकी यात्रा का, दिल्ली में पहले धमाके फिर बैंकाक में धमाके, इनमें कोई आपसी कनैक्शन है? थाई पुलिस के जनरल पांसिटी प्रापावात ने बताया कि सुरक्षा बलों ने राजधानी स्थित हमलावर के किराये के मकान से भी विस्फोटक बरामद किए। स्थानीय मीडिया के मुताबिक ईरानी मूल के नागरिक ने टैक्सी रोककर चालक से कहीं चलने को कहा लेकिन चालक के मना करने से वह नाराज हो गया और उसने टैक्सी पर बम से हमला कर दिया। वहां खड़े पुलिसकर्मियों ने जब वह वाकया देखा तो वे टैक्सी के पास पहुंचे। हमलावर ने पुलिसकर्मियों पर भी बमों से दूसरा हमला कर दिया लेकिन सुरक्षाकर्मियों की किस्मत अच्छी थी और यह बम एक पेड़ से टकरा गया और खुद हमलावर पर आ गिरा। विस्फोट से हमलावर का पैर उड़ गया तथा हमलावर को पकड़ लिया गया। घटनास्थल से एक पासपोर्ट बरामद हुआ जिससे पता चला कि हमलावर का नाम सामरेब मोरादी है और वह ईरान का रहने वाला है। इससे पहले मध्य बैंकाक के इकामाई क्षेत्र में एक घर में विस्फोट हुआ। हमलावर सहित दो और ईरानी इसी घर में किरायेदार के रूप में रहते थे। सरकारी प्रवक्ता थीतिया चासेंग ने कहा कि पुलिस ने रिपोर्ट दी है कि मकान का प्रयोग बम बनाने के लिए किया जाता था। यहां से विस्फोटक पदार्थ और रिमोट कंट्रोल डिटोनेशन डिवाइसिस मिले हैं। फिलहाल बैंकाक की घटना और नई दिल्ली एवं जार्जिया की घटना का कोई संबंध नहीं स्थापित हो सका लेकिन इजराइल के विदेश विभाग के प्रवक्ता चिगाल पालमोर ने यरुशलम में कहा कि हम किसी भी सम्भावना से इंकार नहीं कर रहे हैं। इन हमलों से ईरान सारी दुनिया की नजरों में आ गया है। पहले से ही अपने विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम की वजह से पश्चिमी देशों की आंखों की किरकिरी बने ईरान के लिए अब यह नई समस्या खड़ी हो गई है। निश्चित रूप से अमेरिका अब ईरान पर और दबाव डालेगा।
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अधिकतर आतंकी हमले 13 तारीख को क्यों?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 16th February  2012
अनिल नरेन्द्र
क्या यह महज एक संयोग है कि भारत में अधिकतर आतंकी बम धमाकों की घटना 13 तारीख को ही होती है या फिर इस 13 का कुछ खास महत्व है? ताजा बम कांड 13 फरवरी को हुआ है। तकरीबन हर धमाका 13 तारीख को ही हुआ है। सितम्बर 2008 को भी राजधानी में 13 तारीख को ही बम ब्लास्ट हुआ था। मुंबई में पिछले साल जुलाई की 13 तारीख को ही सीरियल ब्लास्ट हुए थे। पुणे में जर्मन बेकरी धमाका भी 13 को ही हुआ था। 2001 में संसद भवन परिसर में भी 13 तारीख (दिसम्बर) को ही आतंकी हमला हुआ था। हमारे विशेषज्ञ अब इस बात की जांच में लगे हुए हैं कि 13 तारीख का इन आतंकियों के लिए क्या विशेष महत्व है। पधानमंत्री निवास में जो हमला हुआ वह ठीक उसी पकार का था, जो इसी साल 11 जनवरी को ईरान की राजधानी तेहरान में हुआ था जिसमें ईरान के एक परमाणु वैज्ञानिक मुस्तफा अहमदी रोशन की हत्या की गई थी। उस हमले में भी दो मोटर साइकिल पर सवार दो हत्यारों ने रोशन की पीजो कार पर इसी तरह का स्टिकी बम लगा दिया था। धमाका इतना तेज था कि वैज्ञानिक की मौके पर ही मौत हो गई। नई दिल्ली की घटना में इनोवा सवार सभी यात्री खुशकिस्मत थे कि जल्दी में युवक सही स्थान पर बम नहीं लगा सका। जांच करने वाले अधिकारियों की माने तो अगर यही बम कार के पीछे की बजाए किसी दरवाजे पर लगाया गया होता तो इसमें कहीं अधिक नुकसान होता। बताया जा रहा है कि हमलावर बम को दरवाजे पर लगाने में सफल नहीं होने के कारण पीछे लगा गए। विस्फोट का सारा असर इनोवा कार की पिछली सीट पर पड़ा। हमला इतना जोरदार था कि कार के टुकड़े और बम के स्पिंटर इस्राइली राजनयिक ताल येहोशुवा की पीठ में लगे। अगर यही बम कार के दरवाजे या फ्यूल टैंक के करीब लगाया गया होता तो उनका बचना नामुमकिन था। दाद देनी होगी इनोवा ड्राइवर मनोज शर्मा की। खुद घायल होने के बावजूद मनोज शर्मा ने हौंसला नहीं छोड़ा और गाड़ी से महिला राजनयिक को उतारा, एक ऑटो को रोककर सबसे पहले वह उसे सुरक्षित ठिकाने पर ले गया। इस्राइली दूतावास में पहुंचाने के बाद ताल येहोशुवा को पास के एक पाइवेट अस्पताल में एडमिट कराया गया जहां डाक्टरों ने उसकी पीठ में घुसे लोहे के टुकड़ों को ऑपरेशन से निकाला। राजधानी में औरंगजेब रोड पर इनोवा गाड़ी में स्टिकी बम से धमाके का मामला भले ही देश में पहला मामला हो, हॉलीवुड की फिल्मों में यह आम है। एक निश्चित टारगेट को उड़ाने के लिए इसका इस्तेमाल किया दिखाया जाता है। हॉलीवुड से पभावित होकर बॉलीवुड में भी अब यह पयोग में आने लगा है। स्टिकी बम का इस्तेमाल जेम्स बांड सीरिज फिल्मों के अलावा जासूसी फिल्मों में दिखाया जाता है। सिल्विसटर स्टैलोन की फिल्म स्पेशलिस्ट में स्टिकी बम का इस्तेमाल दिखाया गया है। इस बम की खासियत है लक्ष्य ही को नुकसान पहुंचाना, आसपास इसका कम असर होता है। साइज में यह छोटा होता है और इसे छिपाने व लक्ष्य पर लगाना आसान रहता है। बॉलीवुड में इस बम का इस्तेमाल सन्नी देओल की फिल्म जो बोले सो निहाल में, हाल ही में शाहरुख खान की फिल्म डॉन-2 में किया गया। पुलिस के आला अफसर भी मान रहे हैं कि विदेशी राजनयिकों की गाड़ी को उड़ाने का फॉर्मूला फिल्मों से लिया गया हो सकता है। हालांकि नक्सली इस पकार का बम इस्तेमाल करते हैं पर आतंकवादी जंग में यह भारत में पहली बार इस्तेमाल किया गया है।
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Tuesday, 13 September 2011

No more leniency, put shirkers in jails

 - Anil Narendra
11/7, 26/11, 13/7, 7/9 and God knows how many more terror attacks we shall have to face. Is the count going to stop somewhere or not? Leave aside the country; Delhi itself has been witness to the human miseries as a result of 15 bomb blasts during the period, Jan 9th 1997 to May 25th 2011. The Delhi High Court blast was 16th in the series. Why were the last two blasts targeted at the High Court? This too is an important question. There appears to be a number of reasons behind this. Besides getting publicity for their deeds, the terrorists are also trying to put across a message to the judges and advocates. No doubt their aim is to cause maximum damage, but they have selected the High Court as a target as a number of appeals including that of Batla House have been rejected by the Court. The Delhi High Court had rejected all Batla House appeals in 2009. The hearing for 1993 Mumbai blast case was also due on Wednesday, the day of blast. We can definitely see a pattern in these attacks, if we consider terror attacks in Court premises. Within a span of fifteen minutes between 13.15 to 13.30 hrs, there were cycle bomb blasts on 23 November 2007 in Lucknow, Faizabad and Varanasi, which claimed 15 lives and more than 80 persons were wounded. Then there were blasts in Hubli District Court on 10th May, 2008, where a case against SIMI activists was due for hearing two days later. Another bomb blast near the CJM Court in Guwahati occurred on 30th October 2008. There were six blasts on that day in Guwahati. One of the blasts was triggered in the Court complex.
One terrorist with an explosive belt entered the advocate chambers in Aara District and as he sat down, blasted himself. An advocate was killed and six other persons were wounded in this incident. There was another bomb blast on 25 May 2011 in the Delhi High Court complex and now it was on Wednesday. By blasting bombs in a Court complex, the terrorists also want to make some judges their prey, who might be passing nearby. They had been trying to kill two birds with one stone.
When we talk of judges, it may be recalled that judges have given a clear message to the terrorists that they are not afraid of them. The High Court announced that it will start functioning in the afternoon at 14-00hrs on the same day. Courts were not closed. The judges boldly responded and told the terrorists in no uncertain terms that they are not going to cow down by their threats and the court proceedings would not be stopped. After the bomb blast on Wednesday, the Delhiwallas showed exemplary enthusiasm. The High Court judges also joined hands and advocates and court staff rendered help to the wounded. A judge from Tees Hazari Court, Shri Ajay Pandey along with two or three other judges reached the blood donation centre and voluntary donated blood.
They were driven by the urge that there should be no deficiency in treatment of wounded and there should be no shortage of blood, which may result in death to the wounded. It may be mentioned that ShriPandey was the judge, who had gone to Ramlila Ground to lend support to the Jan Lokpal Bill movement of Anna Hazare. After donating blood, he said that he had come there as a humanitarian gesture and a person must always listen to the voice of his conscience and decide in the larger interest of humanity.
The victims of these bomb blasts are always the poor and common man. There only fault is that they are present at the wrong place and at the wrong time. When the blast occurred on Wednesday at Delhi High Court, people were standing in a queue to get their visitor passes. An eye witness advocate told that the place where the blast occurred is the busiest area of the Court. This is the time, when hundreds of people come here to get their visitor passes to enter the Court premises. Rahul Gupta of Rohini was in a hurry to enter the Court premises; as such he came to the front in the queue. His pass was
almost ready and as he pushed his hand in the window to take it, there was a powerful blast. He staggered and fell down. When he tried to look behind towards his friends in the queue, he could see nothing.
Black smoke had engulfed him. For a minute, he was unable to understand anything. When the smoke thinned, he could see blood splattered all around. Someone's head had been severed from his body.
Another's severed arm was lying. Some persons had lost their legs. There was another unfortunate person from Geeta Colony, Inder Singh. Death has given him a call. He had received a court notice on a case that has been closed nine years back. He along with his son had come to the High Court for the hearing of the case. Inder Singh stood at the senior citizen counter for getting his visitor pass, and his son Harjeet went to another counter where crowd was relatively thinner.
Then the blast occurred. Inder Singh died at the spot, whereas Harjeet, standing at another counter, got minor injuries. Brijesh and his wife Nalini had come to the High Court from Vasant Vihar in connection with a case. His wife went a few steps ahead of him, when there was the massive blast and Nalini lost her life. Brijesh fainted.
When he came around, he realized that his family was ruined. A woman had entered Gate No 5 without getting a visitor pass. She was stopped by the security personnel and was asked to get a pass for entry into the Court premises. When she went towards the counter, there was the blast and she died. An eye witness narrated blood chilling incident.
He told that a body had flown high and got entangled on an iron rod at a nearby construction site. Someone had lost his leg, another, his arm. A person had lost both of his legs and was dragging himself to a safer place to save his life. A woman had lost half of her body. An advocate, Sugreev Dubey told that the case of his client Gurmail Singh was listed for Wednesday. He had advised him not to come to Court, as there would be no progress in the case on that day, but his client did not took his advice seriously and came to the Court. Standing on the counter, there was a blast and Gurmail got serious injuries on his hands and legs. Even three advocates, who had come to help their clients were also got wounded in the blast. There are numerous such pathetic incidents.
Who is responsible for these frequent miseries? Public want answer, only speeches won't do. We need accountability. Which officers are responsible for failing to stop these terror strikes? Who amongst them proved ineffective? Who did such mistake or allowed it to happen? We will have to ask these questions. We shall have to make a clear and simple list, which shall explain that despite involvement of such big names, such influential designations and such a clear mandate, why there was such a big criminal negligence, resulting in such pathetic deaths. Trials for such offenders must be held within 24 hours. There should be Special Courts to hear such cases. No sections with ifs and buts, hearing within a specified time-frame must be ensured. Specified time for appeals, arguments, pointed and tricky questions of advocates should be allowed. Whether it was his or her duty or not? Carried out his/her duty with 100 percent honesty or not? All this can be proved in a day. If found guilty of not performing duty, send him or her to jail. If they have shown dutifulness, then only they may be sent to fight terrorism against. Who are ready to make sacrifices, should only be sent to the war against terror. There is no place for officers seeking career in this war against terrorism. The Opposition demands for resignations only, it is not bold enough to ask for their termination. Appeasement will not be tolerated any more. People want accountability and each officer, who has failed in his/her duties, will have to be answerable to the public. For how long we will tolerate this appeasement?

Tuesday, 19 July 2011

जब वोट बैंक राजनीति देश की सुरक्षा पर भी भारी पड़े

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th July 2011
अनिल नरेन्द्र
ताजा मुंबई हमलों में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की प्रतिक्रिया ठीक उसी लाइन पर आई जिसकी उनसे उम्मीद रखी जा सकती है बल्कि आश्चर्य तो तब होता जब उन्हें इस ताजा बम कांड में हिन्दू आतंकवादियों का हाथ नजर न आता। तभी आश्चर्य नहीं हुआ जब दिग्विजय ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना साधते हुए शनिवार को कहा कि मुंबई धमाकों में हिन्दू सगठनों की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है, वैसे अभी मुंबई धमाकों में संघ का हाथ होने के सुबूत नहीं मिले हैं परन्तु जांच एजेंसियों को सभी बिन्दुओं से जांच करनी चाहिए। अब दिग्विजय ने कहा कि मैं आरएसएस की आतंकी गतिविधियों के सुबूत दे सकता हूं। उन्होंने कहा कि वह अपनी इस बात से पीछे नहीं हट रहे हैं कि देश में हुई आतंकवादी घटनाओं के पीछे हिन्दू संगठनों का हाथ रहा है। पहले हम समझते थे कि दिग्विजय जो कहते हैं वह उनकी अपनी सोच, रणनीति के तहत हो रहा है, चूंकि उनका 10 साल का राजनीतिक बनवास समाप्त होने जा रहा है इसलिए वह अपनी जड़ें पुन राजनीति में जमाना चाहते हैं इसलिए उन्होंने एंटी हिन्दू लाइन ली है ताकि अल्पसंख्यक वोटों के पैठ बना सकें पर जैसे उनके विवादास्पद बयानों का कांग्रेस आला कमान समर्थन करता है उससे साफ लगता है कि दिग्गी राजा को आला कमान का पूरा समर्थन हासिल है। मुंबई में हुए श्रृंखलाबद्ध धमाकों का दिग्विजय सिंह ने जिस तरह आनन-फानन में सांप्रदायिक रंग देने का प्रयास किया उसमें हमें उम्मीद थी कि शायद पार्टी हाई कमान उन्हें कड़ी फटकार लगाए और अपने आपको इस बयान से अलग करे पर न केवल चुप्पी साधकर शीर्ष नेतृत्व ने इसे अपनी मौन स्वीकृति दी बल्कि यह भी जता दिया कि हिन्दू संगठनों की जोरदार खिलाफत उसकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है जिसके दिग्विजय सिंह मोहरे मात्र हैं। अभी तक दिग्विजय के बयानों पर कांग्रेस टोकाटाकी करती थी पर जिस तरह से प्रवक्ता शकील अहमद ने खुले तौर पर दिग्विजय का समर्थन किया है उससे यह बात सिद्ध हो जाती है कि मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए दिग्विजय सिंह आज तक जो भी बोलते आ रहे थे वह कांग्रेस नेतृत्व की सोची-समझी चरणबद्ध नीति थी और ऐसे बेहूदा और बेतुके बयानों के लिए दिग्विजय सिंह को बाकायदा पुरस्कृत भी किया गया। उन्हें उस प्रदेश का प्रभारी बना दिया गया है जहां कांग्रेस की नजर अल्पसंख्यक वोट बैंक पर टिकी हुई है। इस समय भी दिग्विजय सिंह उत्तर प्रदेश और असम जैसे मुस्लिम आबादी वाले प्रदेशों के प्रभारी महासचिव हैं।
यह बहुत ही शर्म की बात है कि मुंबई विस्फोट जैसे मुद्दे पर भी दिग्विजय सरीखे नेता राजनीति और वोट बैंक पॉलिटिक्स का खेल खेलने से बाज नहीं आते। हमारे देश के नेता संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों के फेर में किस हद तक गिर सकते हैं। वे लाशों पर राजनीति करने के साथ-साथ उन समस्याओं से भी लाभ उठाने की ताक में रहते हैं जो राष्ट्र के लिए शर्मिंदगी का कारण बनती है। मुंबई में बम विस्फोटों के बाद भारत अंतर्राष्ट्रीय चर्चों पर यह कहने की स्थिति में नहीं रह गया है कि वह आतंकवाद से अपने बलबूते पर लड़ सकता है, लेकिन बावजूद इसके केंद्रीय सत्ता का नेतृत्व कर रहे दल के महासचिव इसके लिए बेचैन हो गए कि इस घटना का राजनीतिक लाभ कैसे उठाया जा सके? उन्हें इस बात की भी कतई चिन्ता नहीं कि पाकिस्तान जैसे देश इस बात का कितना फायदा उठा सकते हैं। जहां तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देश के प्रति वफादारी का सवाल है तो कांग्रेस के सबसे कद्दावर नेता पंडित जवाहर लाल नेहरू भी आन रिकार्ड कह चुके हैं कि संघ को आतंकवाद से नहीं जोड़ा जा सकता। चूंकि हो सकता है कि इस तरह के ऊंट-पटांग बयान अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से जुड़े हो, इसलिए भाजपा भी मैदान में कूद पड़ी है। शनिवार को भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन ने दिग्विजय के बहाने सोनिया गांधी और राहुल गांधी को भी लपेट लिया। राहुल से दिग्विजय की नजदीकी का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि राहुल खुद जो नहीं कह पाते, वह दिग्विजय सिंह से कहलवाते हैं। देश आतंकवाद से जूझ रहा है। ऐसे में दिग्विजय का संघ पर आरोप लगाना सिवाय गन्दी, तुच्छ राजनीति के और कुछ नहीं है। भाजपा के दूसरे वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी कहते हैं कि दिग्विजय सिंह को अरब सागर के किनारे ले जाएं और उनके शरीर में मौजूद लादेन की शैतानी रूह को भगाने के लिए कुछ झाड़-पूंक करवाएं। दिग्विजय सिंह जुबानी डायरिया का शिकार हो गए हैं। उनका अपनी भाषा और शब्दों पर कोई कंट्रोल नहीं है। कोई भी आसानी से समझ सकता है कि दिग्विजय सिंह को विष वमन करने की छूट इस आशा से दी गई है ताकि हिन्दू संगठनों को अपमानित और लांछित करने वाले उनके बयानों के जरिये मुस्लिम समाज के वोट आसानी से हासिल किए जा सकें? कांग्रेस की इस सोच से यह साफ है कि उसकी नजर में मुस्लिम समाज तक उसका वोट बैंक बनेगा जब उसे हिन्दू संगठनों से डराया जाएगा।
इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा कि आतंकवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर इस प्रकार की घटिया वोट बैंक राजनीति हो रही है। क्या यह जांच एजेंसियों को गलत दिशा में जांच करने व उन्हें जानबूझ कर भटकाने का काम नहीं है? यह एक तथ्य है कि खुद गृहमंत्री पी. चिदम्बरम कह चुके हैं कि भगवा आतंकवाद देश के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता, मजहब नहीं होता, यह एक विचारधारा है और यह सम्भव है कि कुछ मुट्ठीभर हिन्दू भी इसके शिकार हों पर इसका मतलब यह कतई नहीं कि आप सारे हिन्दू समाज को इसका जिम्मेदार ठहराएं, उन्हें बदनाम करें जैसे कि आप मुट्ठीभर मुस्लिम आतंकियों के कारण पूरे मुस्लिम समाज को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। अगर दिग्विजय सिंह के पास कोई ठोस सुबूत हैं तो जांच एजेंसियों को बताएं ताकि वह इसकी बारीकी से छानबीन कर सके।
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Monday, 18 July 2011

A zero tolerance policy must for government of India

- Anil Narendra          
Whenever Prime Minister Manmohan Singh and Home Minister P Chidambaram say that the culprits of Mumbai bomb blasts will not be spared, people just don’t care about it, as they have become immune to such statements. Manmohan Singh had uttered these words before the Mumbaikars on 26 November 2008. What has this government done since then? Nothing, but just hollow assurances. People of Mumbai have been frustrated with these empty assurances. They are also fed up with candle marches, peace marches and human chains. People want some action against the culprits. Learn from America. The day al-Qaeda attacked America on 28/11, it had taken a pledge of not resting in peace till Osama bin Laden and al-Qaeda are eliminated. No doubt it took US ten long years to complete this task, but it proved that it is true to its intentions and it has the will to carry out its pledge. It took rest only after penetrating enemy’s den and destroying it. A man learns from experiences and make future amends on the basis of the lessons learnt. That is why Britain, Spain and other Western countries have been able to foil terrorist attempts by maintaining constant alert. They are successful as they follow a zero tolerance policy towards terrorism, which means, they are not going to tolerate even a single terror act, whereas in our country, such attacks continue and we, on our part, also continue to issue empty threats. Hon’ble Home Minister, Mumbai has been the target of 8 bomb blasts during the period from 12 March 1993 to July 2011 and 682 persons have lost their lives in these attacks. Do you know the number of persons killed in terror-related incidents has almost equaled to that of terror killings in Karachi and Kabul. About 394 persons have been killed in terrorist acts in Mumbai alone since 2005, while 500 persons were killed in Karachi and 520 in Kabul during the same period. If we consider total terror deaths in Maharashtra, then this figure comes to 506. Your weak policies have made Mumbai, one of the most dangerous city of the world to live in. Chidambaram had announced the creation of National Investigation Agency-NIA with much fanfare. What has your NIA achieved? If we consider five other attacks, then it appears that the achievements of your NIA have been negative. We are still clueless about the five incidents in various parts of the country after the Mumbai terror attacks of 26/11. It is strange, when we consider that the investigation of three out of these five terror incidences is being carried out by the NIA. The mystery of German Bakery blast of Pune on 13 February, blast in Chinnaswamy Stadium just before the IPL match on 17 April, firing in Jama Masjid area in last September, blast at Delhi High Court and Varanasi bomb blasts has remained unsolved till date. Mr Chidambaram may recall his much-talked about announcement that the NIA was created with the objective of solving terror-related cases all over the country. The agency was entrusted with the solving the mystery behind Jama Masjid and Varanasi blasts, but there has been not even an indication of success in these cases. Similarly, local police is continuing with the investigations in the High Court and German Bakery incidents, but, as usual, there is still no break through. One person has been arrested in this regard, but the ATS has been unable to prove his involvement. The needle of suspicion in this matter points to terror organization, Indian Mujahidin, but the Agency is yet to produce any reliable evidence regarding its involvement. In a few instances, even if the case reaches the Court, it is rejected there for want of credible evidence. The reason is that the investigating agencies collect evidence in such an irresponsible manner that these are not firmly maintainable in the Courts. Advocates connected with the bomb blast cases in the Courts all over the country also confirm the negligent non-professional attitude of investigating agencies towards collecting of evidence, which is one of the reason why the accused are acquitted by the Courts, who, in turn come heavily on the agencies, but the agencies revert back to their non-professional mode of working. There have been instances, where false cases have been initiated on the basis of forcible confessions. The UPA government scrapped TADA in a haste, but it has not been able to replace it with an effective law that may ensure that culprits are brought to book. There is still no special law to deal with the terrorism that has become a serious threat for the security of the nation. There have been 21 minor or major terror-related incidents during the period from October 2005 to 7 December 2010.
Pakistan is involved with these latest Mumbai blasts in some way or the other. The American media has also been saying the same thing. Reacting on these blasts, the American media has said that these blasts have once again raised doubts about the effectiveness of action being taken by Pakistan against terrorist organizations and LeT, is considered to be the mastermind behind these blasts, which had also been responsible for the 2008 Mumbai attacks,. Whatever may be the outcome of the investigations, but one thing is clear that in spite of pressure from the international community on Pakistan, this organization is still operating from its soil, while the government of India, instead of taking any strong steps, is extending hand of friendship towards Pakistan. What to talk of punishment to the culprits, the government of India has even failed to impress upon Pakistan to expedite hearing of the Mumbai accused. We fail to understand the logic behind talks with Pakistan. There has been no improvement in Pakistan’s attitude. They are still pursuing terrorism as state policy. Metro city centres like Mumbai, Delhi and Bangalore are still on the hit list of Pak-supported terror orgnisations. These blasts are not going to stop till we adopt a zero tolerance policy. We shall not tolerate even a single act of terror. Our Prime Minister or Home Minister lack the courage to talk about LeT or Indian Mujahideen being behind these attacks or even indicate their involvement in these attacks. Indian Mujahideen and Lashkar-e-Toiba are hand in gloves with each other. The government has not succeeded in getting permission from Pakistan to interrogate the masterminds of Mumbai attacks, whereas it has kept the lone surviving terrorist Kasab alive and Afzal Guru has also been kept as a showpiece. Why the government is afraid of hanging Afzal Guru, which can, otherwise give a clear message to the terrorists? Today, we remember Julius Reberio and KPS Gill, who had indicated to Punjab terrorists in no uncertain terms that if they kill one person, they will retaliate with killing ten and bullet will be replied by bullet. Punjab was not freed from terrorism by chance. There was a solid strategy working behind it. Will to act by the government was there and security forces had been given a free hand in taking action against the terrorists.
People of the country are fed up by the weak government policies in combating terrorism. It may not be untrue, if we say that the people have reached to the zero tolerance level. For how long the Mumbai residents will have to live under the fear of such terrorism? Why even a single terror act be tolerated? People are fed up of hearing that we are living in a dangerous neighbourhood. They are fed up of assurances of punishment to the culprits. They need guarantee of security, so that they can lead a life, free of fear. No doubt, it is necessary for them to revert back to normal life, but it doesn’t mean that they are ready to accept all types of nonsense. Had any leader been the victim of such a terror attack, would the government had adopted the same attitude? It is the poor, defenceless and innocent people who are always the victims, but the government would have to understand the mood of the public. Public is crying, “enough is enough”.
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Sunday, 17 July 2011

भारत सरकार को आतंकवाद पर जीरो टालरेंस नीति अपनानी होगी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17th July 2011
अनिल नरेन्द्र
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी. चिदम्बरम जब यह कहते हैं कि मुंबई बम धमाकों के कसूरवारों को बख्शा नहीं जाएगा तो जनता को अब बुरा-सा लगने लगा है और ऐसे कोरे आश्वासन सुनकर अब जनता उखड़ने लगी है। मनमोहन सिंह ने यही शब्द 26 नवम्बर 2008 को भी मुंबई वालों को कहे थे। तब से लेकर इस सरकार ने किया क्या? कुछ नहीं। केवल कोरे आश्वासन। मुंबईवासी अब इन कोरे आश्वासनों से ऊब चुके हैं। वह कैंडिल मार्चों, शांति पीस मार्चों से ह्यूमन चेन बना-बनाकर आजिज आ चुके हैं। जनता कहती है कि कुछ कर के दिखाओ। अमेरिका से कुछ तो सबक लो। जब अलकायदा ने 28/11 को अमेरिका पर हमला किया था उसी समय अमेरिका ने घोषित कर दिया था कि वह तब तक दम नहीं लेगा जब तक वह ओसामा बिन लादेन व अलकायदा को खत्म नहीं कर देगा। बेशक इस काम में अमेरिका को 10 साल लगे पर उसने यह दिखा दिया कि वह अपने इरादे का पक्का है और जो कहता है उसे पूरा करने की इच्छाशक्ति भी रखता है। उसने अपने दुश्मन के घर में घुसकर दुश्मन को तहस-नहस करके ही दम लिया। आदमी अनुभव से सीखता है और भविष्य में उस सबक से सुधार करता है। यही वजह है कि ब्रिटेन, स्पेन और दूसरे पश्चिमी देश हर दम चौकन्ने रहकर आतंकवादियों के मंसूबे को फेल करते आ रहे हैं। यह इसलिए कामयाब हो रहे हैं क्योंकि उन्होंने `जीरो टालरेंस' की नीति अपना रखी है यानि एक भी हमला हम बर्दाश्त नहीं करेंगे और हमारे यहां हमले पर हमले होते जाते हैं और हम कोरी धमकियां देने से बाज नहीं आते। माननीय गृहमंत्री जी 12 मार्च 1993 से जुलाई 2011 के बीच अकेले मुंबई में 8 बम धमाके हो चुके हैं जिनमें 682 जानें जा चुकी हैं। क्या आपको यह मालूम है कि मुंबई में आतंकी घटनाओं में मरने वालों की संख्या अब कराची और काबुल में मरने वालों की संख्या के लगभग बराबर पहुंच चुकी है। अकेले मुंबई में लगभग 394 लोग 2005 से मारे जा चुके हैं जबकि इसी वक्फे में कराची में 500 और काबुल में 520 लोग मरे। अगर पूरे महाराष्ट्र की संख्या जोड़ी जाए तो यह संख्या 506 बन जाती है। मुंबई को अब दुनिया में सबसे खतरनाक शहरों में आपकी लचर नीति ने बना दिया है। चिदम्बरम ने बड़े जोरशोर से एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) की घोषणा की थी। क्या किया आपकी एनआईए ने? अगर 26/11 के बाद में हुए पांच अन्य हमलों की बात करें तो लगता है कि आपकी एनआईए कुछ नहीं कर पाई। 26/11 को मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई पांच घटनाओं का सुराग अभी तक तलाशा ही जा रहा है। हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से तीन मामलों की जांच एनआईए के हाथों में है। 13 फरवरी को पुणे की जर्मन बेकरी, 17 अप्रैल को चेन्नई के चिन्नास्वामी स्टेडियम में आईपीएल मैच से ठीक पहले धमाका, पिछले साल सितम्बर के अन्त में जामा मस्जिद में गोलीबारी, दिल्ली हाई कोर्ट में धमाका और वाराणसी में हुए बम धमाकों का रहस्य अभी भी बरकरार है। याद कराना चाहेंगे कि चिदम्बरम साहब आपने बड़े जोरशोर से घोषणा की थी कि एनआईए का गठन गृह मंत्रालय ने इसलिए किया है ताकि देशभर में आतंकवाद से संबंधित मामले सुलझाए जा सकें। इस एजेंसी ने जामा मस्जिद, वाराणसी और चिन्नास्वामी स्टेडियम में हुई घटनाओं की गुत्थी सुलझाने का बीड़ा उठाया था, लेकिन अभी तक कामयाबी दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। वहीं हाई कोर्ट और जर्मन बेकरी धमाकों को लेकर स्थानीय पुलिस द्वारा छानबीन की जा रही है, मगर स्थिति वही ढाक के तीन पात ही है। इस मामले में एक व्यक्ति की गिरफ्तारी हुई है, लेकिन एटीएस, घटना में उसकी संलिप्तता मजबूती से साबित नहीं कर पाई। इन मामलों में जांच में शक की सुई आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन पर घूमती रही है, लेकिन एजेंसी को उसकी संलिप्तता के पुख्ता सबूत अभी तक हाथ नहीं लग सके। इक्का-दुक्का मामले में अगर कोई केस अदालत जाता है तो वह भी सबूतों के अभाव में ठप हो जाता है। बम धमाकों के मुजरिम अक्सर कई मामलों में बरी हो जाते हैं। वजह यह कि जांच एजेंसियां लचर तरीके से सबूत जुटाती हैं और ऐसे सबूत अदालत में पुख्ता तौर पर ठहर नहीं पाते। देश में बम धमाकों के मुकदमों से जुड़े वकील भी तस्दीक करते हैं कि जांच एजेंसियां सबूत जुटाने के मामले में अक्सर ढीलाढाला, गैर-पेशेवर रवैया अख्तियार करती हैं जिसमें अभियुक्त छूट जाते हैं और जांच एजेंसियां कोर्ट की लताड़ झेल पहले की तरह गैर-पेशेवर ढर्रे पर चलने लगती हैं। ऐसे भी मामले सामने आए हैं जब जबरिया कबूलनामे के आधार पर झूठा केस बना दिया गया हो। यूपीए सरकार ने टाडा हटाने में बहुत जल्दी की पर आज तक उसकी जगह ऐसा कोई प्रभावी कानून नहीं बनाया जिससे आतंकियों को सजा मिल सके। देश की सुरक्षा के लिए खतरा बने आतंकवाद से निपटने के लिए आज भी कोई विशेष कानून देश में मौजूद नहीं है। अक्तूबर 2005 से लेकर 7 दिसम्बर 2010 तक छोटे-बड़े मिलाकर कुल 21 आतंकी मामले हो चुके हैं।
मुंबई में ताजा बम धमाकों के पीछे पाकिस्तान का हाथ कहीं न कहीं जरूर है। अमेरिकी मीडिया भी यही कह रहा है। अमेरिकी मीडिया ने इन धमाकों पर कहा है कि इन धमाकों ने पाकिस्तान द्वारा आतंकियों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई की प्रभावशीलता पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं और इसके पीछे लश्कर का हाथ होने का सन्देह है। जिसने 2008 में भी मुंबई में आतंकी हमला करवाया था। जांच से चाहे जो भी पता चले लेकिन एक चीज साफ है कि पाकिस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के भारी दबाव के बावजूद यह समूह अभी भी वहां से अपनी गतिविधियों का संचालन कर रहे हैं और भारत सरकार कोई सख्त कदम उठाने की जगह दोस्ती का हाथ बढ़ा रही है। भारत सरकार अब तक मुंबई में पिछले हमलों में पाकिस्तान में चल रहे मुकदमे को आगे नहीं बढ़वा सकी व कसूरवारों को सजा दिलवाना तो दूर रहा। पाकिस्तान से बातचीत की क्या तुक है, यह अपनी समझ से बाहर है। पाकिस्तान के चाल-चलन में कोई फर्प नहीं आया। आज भी टेरर स्टेट पॉलिसी है। पाक समर्थक आतंकी संगठनों के निशाने पर आज भी मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे बड़े शहर हैं। हम जब तक जीरो टालरेंस की नीति पर नहीं चलते तब तक इन धमाकों का सिलसिला रुकने वाला नहीं यानि एक भी हमला हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। हमारे प्रधानमंत्री या गृहमंत्री में इतनी हिम्मत नहीं कि लश्कर या इंडियन मुजाहिद्दीनों का इस हमले के पीछे होने की बात कह सकें या इशारा तक कर सकें? इंडियन मुजाहिद्दीन और पाकिस्तान के लश्कर-ए-तोयबा के बीच रिश्ते रहे हैं। सरकार आज तक पाकिस्तान से मुंबई हमलों के सूत्रधारों से पूछताछ करने की अनुमति नहीं ले सकी है जबकि एक मात्र जीवित बचे आतंकवादी कसाब को सीने से चिपकाए हुए हैं और अफजल गुरु को शो पीस बनाकर रखा हुआ है। क्यों नहीं अब अफजल गुरु को फांसी पर लटका देती ताकि इन आतंकियों को एक स्पष्ट संकेत जाए? आज उन जुलियस रिबेरो, केपीएस गिल की याद आती है जब उन्होंने पंजाब में आतंकवादियों को यह संदेश दिया था कि तुम एक मारोगे तो हम 10 मारेंगे। गोली का जवाब गोली से दिया जाएगा। यूं ही पंजाब में आतंकवाद समाप्त नहीं हुआ था। उसके पीछे ठोस रणनीति थी, सरकार की इच्छाशक्ति थी और सुरक्षाबलों को अपने हिसाब से कार्रवाई करने की खुली छूट थी।
देश की जनता इस सरकार की आतंकवाद से निपटने की ढुलमुल नीति से तंग आ चुकी है। अगर यह कहें कि जनता जीरो टालरेंस पर आ चुकी है तो शायद गलत न होगा। मुंबई वासियों को आखिर कब तक इसी तरह आतंक के साये में जीना पड़ेगा? एक भी आतंकी हमला आखिर क्यों बर्दाश्त किया जाए? लोग यह सुनते-सुनते आजिज आ चुके हैं कि हम एक खतरनाक पड़ोस में रहते हैं। उनके कान यह सुनकर पक चुके हैं कि हम कसूरवारों को नहीं बख्शेंगे। जनता को सुरक्षा की गारंटी चाहिए ताकि वह निरापद जीवन जी सके। बेशक उनको रुटीन पर लौटना कुछ हद तक जरूरी है पर इसका मतलब सरकार को यह नहीं निकालना चाहिए कि वह सब तरह की कोरी बकवास और हजम करने को तैयार है। अगर कोई नेता आतंकी हमले का शिकार होता तो भी क्या सरकार का यही रुख होता? यह तो बेचारी, निहत्थी, भोली-भाली साधारण पब्लिक है जो मारी जाती है पर सरकार को जनता के मूड को समझना होगा। जनता चीख-चीखकर पुकार रही हैö`बस अब और नहीं।'
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Saturday, 16 July 2011

Blood bath in Mumbai and the Union Home Ministry

 - Anil Narendra
Serial blasts in Mumbai have exposed the claims of alertness and security by the Union Ministry of Home Affairs, the Intelligence Bureau and the National Investigation Agency-NIC created with much hype to investigate terror related matters. The Home Ministry and P Chidambaram as the Home Minister had earned a fair amount of goodwill. People had started reposing trust in him and they had begun thinking that here is a Minister who has succeeded in stopping the bomb blasts to some extent. There had been no major blast after the 26/11 Mumbai attacks. Though minor bomb blast continued, but there was no attack on the scale of the Parliament attack or attack on Akshardham Temple or Mumbai carnage. These Wednesday blasts have caused embarrassment to the Union Ministry of Home Affairs, as these happened at time when the NIS team, specially formed for tackling the terror attacks was present in the town, and the Union Home Secretary was also on Mumbai tour on Monday. Although, his was a private visit, but it is strange that he and the NIC team could not foresee the impending threat, especially when it was on alert for last few days. But terrorists had the audacity to blot the image of Chidambaram, who in spite of all the odds was able to retain his portfolio in the heat of recent Cabinet reshuffle. According to Home Ministry sources, terrorists succeeded in triggering three blasts in Mumbai on Wednesday within an interval of eleven minutes, in spite of about half a dozen warnings by Intelligence agencies. It may also be mentioned that a few hours before, the US intelligence agency CIA had warned of possible terror attacks on some Indian cities including Mumbai. Not only this, it was also the 24th birthday of Aamir Ajmal Kasab, the main accused in Mumbai terror attacks of 26 November 2008, on Wednesday. Despite all this, alertness by security-intelligence agencies proved futile. The continued indifference of the Ministry towards terror attacks can be gauged from the fact that while presenting its monthly report in the first week of July, the Ministry had patted itself for no terror attack during last six months. Perhaps, the Ministry could not anticipate this possible threat. It is for the first time after P Chidambaram taking over as the Minister of Home Affairs that the terrorist organizations have directly challenged the country by causing three blasts within a span of few minutes. The Ministry is still groping in the dark for the culprits of German bakery blast of Pune and Varanasi Ghat blast. It is interesting to note that the Ministry had claimed to almost solve the German bakery blast case, but later, it was declared unsolved.
Though the Mumbaikars have, as usual faced the Wednesday blasts with courage and calmness, yet the Mumbai has changed over the years. Mumbai has faced about half a dozen terror attacks since 1993, including the 2008 attacks. At least 700 persons have lost their lives in these attacks. But, it appears that the violence is still far from being curbed. It is often said about attacks on Mumbai that an attack on Mumbai, the financial capital of India and the hub of entertainment industry, could prove a great set back for the country. Moreover, terrorist groups can draw attention of the world towards them by executing such attacks. But, now, it appears to be only one aspect of the story. Many Mumbai residents may tell you that following demolition of Babri Masjid in 1993, the city continued to reel under the communal riots for two weeks and since then the city has started crumbling down. Two months after the riots, the underworld caused serial bomb blasts as avenge the Babri Masjid demolition, claiming lives of more than 250 persons. The victims included a number of Muslims also. Many people believe that lawlessness started raising its head from that very day. Every government ignored the report in two volumes on communal riots and no action was taken against politicians and police personnel allegedly involved in the riots. But, at the same time, the administration took necessary action against those involved in the blasts. For this, the government was branded as anti-Muslim. The trust between two larger communities of the city started deteriorating. The author of a much appreciated book on Mumbai City, “Mumbai Fables” says that till now, Mumbai was considered to be a law-abiding, liberal city, but this image has now receded to the imagination only. Now the city is agog with conspiracies of politicians, builders, criminals, Hindu extremists, Muslim extremists since mid-1990s. There appears to be no change in the situation. The city is cracking under these conspiracies, which has made it an easy target for terror attacks. It has become a tired city full of bitterness under the facade of glittering nights, vast bungalows of film stars, the costliest building of the richest person of India. A large chunk of its population still lives in slums. Thousands, still sleep on pavements under the open sky. How can this city remain lively? Talking of Mumbai spirit after each blast or calamity has lost its meaning and has become tiring.       

खून से लथपथ मुंबई और केंद्रीय गृह मंत्रालय


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 16th July 2011
अनिल नरेन्द्र
मुंबई में हुए श्रृंखलाबद्ध धमाकों ने केंद्रीय गृह मंत्रालय, आईबी और आतंकी मामलों की बड़ी धूमधाम से बनाया गया एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) के चौकसी और सतर्प रहने के सारे दावों की पोल खोलकर रख दी है। गृह मंत्रालय और गृहमंत्री पी. चिदम्बरम का बतौर गृहमंत्री अच्छा रिकार्ड चल रहा था। जनता को उनमें विश्वास होने लगा था कि अंतत एक ऐसा मंत्री आया है जिसने धमाकों का सिलसिला थोड़ा थामा है। 26 नवम्बर 2008 के मुंबई हमलों के बाद से कोई बड़ा धमाका नहीं हुआ था। छोटे-मोटे बम विस्फोट का सिलसिला तो चलता ही रहा पर जिस तरह से संसद भवन या अक्षरधाम मंदिर या मुंबई में बड़े हमले हुए थे वैसा कोई नहीं हुआ था। केंद्रीय गृह मंत्रालय के लिए यह धमाके इसलिए भी बड़ी शर्मिंदगी बनते दिख रहे हैं क्योंकि यह ठीक उस समय हुए हैं जब आतंकी हमलों के लिए विशेषतौर पर गठित एनआईए की टीम पहले से ही मुंबई में जमी थी और सोमवार को केंद्रीय गृह सचिव भी मुंबई दौरे पर थे। हालांकि यह दौरा निजी था लेकिन वह और एनआईए की टीम सम्भावित खतरे को कैसे नहीं भांप पाई, खासतौर पर जब पिछले कुछ दिनों से अलर्ट पर थी। तमाम सवालों के बावजूद केंद्रीय मंत्रिमंडल में हुए फेरबदल की आंच से अपनी कुर्सी बचाने में सफल रहे केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की शान पट्टी में आतंकियों ने गुस्ताखी कर दी। केंद्रीय गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक जनवरी से अब तक करीब आधा दर्जन बार खुफिया चेतावनियों के बाद भी आतंकवादी बुधवार को मुंबई में 11 मिनट के अंतराल पर तीन विस्फोट कराने में सफल रहे जबकि इस सिलसिलेवार विस्फोटों से कुछ घंटे पहले ही अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए ने भारत को मुंबई समेत कुछ शहरों में सम्भावित आतंकी हमले की चेतावनी दी थी। इतना ही नहीं, मुंबई में 26 नवम्बर 2008 को हुए आतंकी हमले के मुख्य अभियुक्त आमिर अजमल कसाब का 24वां जन्मदिन भी बुधवार को ही था। इन सबके बावजूद सुरक्षा-खुफिया एजेंसियों की सतर्पता धरी की धरी रह गई। मंत्रालय आतंकी हमलों की आशंका को लेकर किस कदर लापरवाह बना हुआ बस इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जुलाई के पहले सप्ताह में मंत्रालय ने जब अपनी मासिक रिपोर्ट पेश की थी उस समय इस बात को लेकर अपनी पीठ थपथपाई थी कि पिछले छह महीने में कोई आतंकी हमला नहीं हुआ है। शायद मंत्रालय इस सम्भावित खतरे को भांप नहीं पाया था। केंद्रीय गृहमंत्री के तौर पर पी. चिदम्बरम के मंत्रालय का पद्भार सम्भालने के बाद यह पहली बार है जब आतंकी संगठनों ने एक साथ तीन धमाके कर सीधी चुनौती दी है। इससे पहले हुए पुणे के जर्मन बेकरी धमाके और बनारस घाट पर हुए धमाके में भी मंत्रालय के हाथ अभी तक खाली ही हैं। रोचक तथ्य यह है कि जर्मन बेकरी धमाके में मंत्रालय एक बार मामले को लगभग खोलने का दावा कर चुका था, लेकिन बाद में इस मामले को अनसुलझा करार दिया।
बेशक बुधवार के मुंबई धमाकों में मुंबई की जनता ने हमेशा की तरह वारदात का मुकाबला साहस, धैर्य से किया पर कटु सत्य यह है कि मुंबई अब वैसा नहीं रहा जैसा था। मुंबई पर 1993 से अब तक आधे दर्जन से ज्यादा आतंकी हमले हुए हैं जिनमें 2008 का हमला भी शामिल है। इन सभी हमलों में कम से कम 700 लोग मारे गए हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि अब भी हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही है। आमतौर पर मुंबई पर हुए हमलों के पीछे दलील होती है कि अगर भारत की वित्तीय राजधानी और मनोरंजन की गतिविधियों के प्रमुख केंद्र पर हमला होता है तो वह देश के लिए जबरदस्त धक्का हो सकता है। साथ ही इन हमलों से दहशतगर्द गुट दुनिया की नजर अपनी तरफ खींच सकते हैं। लेकिन अब लगता है कि यह कहानी का केवल एक सिरा है। मुंबई में रहने वाले कई लोग आपको बताएंगे कि शहर 1993 से ढलान पर लुढ़कने लगा था जब बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद पूरा शहर दो सप्ताह तक सांप्रदायिक दंगों में झुलसता रहा। दंगों के दो महीनों के बाद अंडरवर्ल्ड ने बदला लेने की कार्रवाई के तहत सिलसिलेवार बम धमाके किए जिनमें 250 से अधिक लोगों की जान गई। उनमें कई मुसलमान भी थे। कई लोग मानते हैं कि कानून का साया उस दिन से उठने लगा। 1998 में दो खंडों में सांप्रदायिक दंगों पर आई रिपोर्ट को हर सरकार ने नजरअंदाज किया और दंगों में कथित रूप से शामिल नेताओं और पुलिस कर्मियों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। लेकिन उसी समय प्रशासन ने उनके खिलाफ जरूरी कार्रवाई की जो बम धमाकों में शामिल थे। इसमें सरकार पर आरोप लगा कि वो मुसलमान विरोधी है। मुंबई शहर में रह रहे दो बड़े समुदायों के बीच भरोसा खत्म होने लगा। मुंबई शहर पर काफी सराही गई किताब `मुंबई फेबल्स' के लेखक का कहना है कि मुंबई को अब तक एक कानून पसंद, खुले दिमाग वाला शहर के रूप में जाना जाता रहा है। लेकिन यह छवि अब एक काल्पनिक तस्वीर बन चुकी है। 1990 के मध्य से ही राजनेताओं, बिल्डर्स, अपराधी, हिन्दू चरमपंथी, मुस्लिम चरमपंथियों की साजिश अब शहर की रगों में दौड़ती है। अब भी तस्वीर कुछ बदली दिखाई नहीं देती। शहर इन साजिशों से चरमरा गया है और इसीलिए उस पर हमला करना मुश्किल नहीं लगता। इसकी रातों की चमक, फिल्मी सितारों के ब़ड़े-बड़े बंगले, भारत के सबसे धनी व्यक्ति की सबसे महंगी इमारत, इन सब परतों के नीचे मुंबई शहर एक थका हुआ कड़वाहट से भरा हुआ शहर बनकर रह गया है। इसकी बड़ी आबादी झोपड़-पट्टियों में रहती है। हजारों लोग आज भी सड़कों पर रात गुजारते हैं। इन सबके चलते यह शहर खुशनुमां नहीं हो सकता, हर धमाके या विपदा के बाद मुंबई स्पिरिट का हवाला अब उबाऊ हो गया है।
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Friday, 15 July 2011

एक बार फिर मुंबई बनी आतंकियों का निशाना

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15th July 2011
अनिल नरेन्द्र
पिछले काफी समय से भारत पर कोई आतंकी हमला नहीं हुआ था। हमले तो होते रहे पर कोई सीरियल टाइप के ब्लास्ट नहीं हुए थे। यूं तो तीन दिन पहले असम के कामरूप (ग्रामीण) जिले के रांगिया के पास एक विस्फोट के बाद गुवाहाटी-पुरी एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी पर उसके पीछे स्थानीय विद्रोहियों का हाथ था। इस दुर्घटना में 50 से ज्यादा यात्री घायल हुए थे पर बुधवार को मुंबई में जैसा आतंकी हमला हुआ, ऐसा हमला काफी दिनों के बाद हुआ है। हम भूल गए थे कि ऐसे हमले हो सकते हैं। शायद यही वजह थी कि हमारी खुफिया एजेंसियों को इस सिलसिलेवार धमाकों के बारे में कोई भनक न लग सकी। गृह मंत्रालय ने माना है कि मुंबई में हुए सिलसिलेवार धमाकों के बारे में केंद्र या राज्य सरकार के खुफिया तंत्र को जरा भी भनक नहीं लग सकी। बुधवार शाम मुंबई की भीड़ भरी जगहों पर हुए इन तीन धमाकों ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि पिछले छह महीने के दौरान देश में कोई आतंकी वारदात नहीं होने के बाद सुरक्षा-खुफिया तंत्र काफी हद तक शिथिल हो गया था। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में बुधवार की शाम भीड़भाड़ वाले तीन स्थानों पर 10 मिनट के अन्दर तीन धमाके हुए जिसमें 21 लोग मारे गए और 100 से अधिक घायल हुए। सांताकूज में एक जिन्दा बम भी मिला जो फटा नहीं था। पिछले 18 साल में बुधवार को 14वीं बार मुंबई आतंकी हमले का शिकार हुई। शाम करीब 6ः15 बजे झावेरी बाजार स्थित चांदी के आभूषणों के व्यापारी दीपक सेन ने अपने नौकर से भेल मंगवाई। वह भेल की पुड़िया खोल ही रहा था कि एक जोरदार धमाके ने उनकी दुकान की ट्यूबलाइटें एवं शोकेस के कांच को झनझना कर तोड़ दिया। सेन ने आग का एक बड़ा-सा गोला ऊपर की ओर जाते देखा, सामने की खान-पान की दुकानें आग पकड़ चुकी थीं। सामने सड़क पर खड़े पापड़ बेच रहे खोमचे वाले के परखच्चे उड़ गए थे। तीन दर्जन से ज्यादा लोग बुरी तरह झुलसकर जमीन पर गिर पड़े थे। लोक इधर-उधर भाग रहे थे। लेकिन कुछ ही पलों में लोग फिर सजग हो गए और जमीन पर पड़े घायलों को लेकर उपलब्ध साधनों से ही निकट के जीटी अस्पताल की ओर ले जाने लगे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार झावेरी बाजार में सिर्प कुछ पलों के अन्तर से दो धमाके हुए। बताया जाता है कि ये दोनों धमाके एक मोटरसाइकिल एवं एक स्कूटर में रखे विस्फोट से हुए। लगभग यही दृश्य कुछ मिनटों के अन्दर पहले ऑपेरा हाउस पर फिर दादर रेलवे स्टेशन के पास दोहराया गया। ऑपेरा हाउस हीरों के कारोबार का न सिर्प भारत में बल्कि पूरी दुनिया में प्रमुख केंद्र है। यहां हुआ विस्फोट पंचरत्न बिल्डिंग एवं प्रसाद चैम्बर के बीच टाटा रोड के खाऊ गली में हुआ जबकि दादर का विस्फोट बेस्ट के एक बस स्टॉप की छत पर विस्फोट रखकर किया गया। झावेरी बाजार को पिछले 18 वर्षों में तीसरी बार आतंकी हमले का शिकार होना पड़ा है जबकि दादर और ऑपेरा हाउस में पहली बार विस्फोट किया गया है। बुधवार के विस्फोट में झावेरी बाजार में हुए विस्फोट में सबसे ज्यादा लोग मारे गए एवं घायल हुए हैं। ऐसे मौकों पर जब एक शहर में धमाके हों तो दूसरे बड़े शहरों में दहशत फैल जाती है। मेरे पास कई एसएमएस आए कि दिल्ली के साकेत और डिफेंस कॉलोनी में भी बम मिले हैं। यह सब एक अफवाह थी और दिल्ली में उपर वाले की कृपा से कहीं भी कोई बम नहीं मिला।
अब सवाल आता है कि यह विस्फोट किसने करवाए और क्यों करवाए? जहां तक किसने करवाए इसकी सही जानकारी तो बाद में मिले या शायद कभी भी निश्चित रूप से न मिल सके पर मकसद का थोड़ा अन्दाजा जरूर हो सकता है। जिस तरह से बार-बार झावेरी बाजार को टारगेट बनाया जा रहा है उससे तो लगता है कि बिजनेस को प्रभावित करने का उद्देश्य है। ऑपेरा हाउस भी एक ऐसा ही बिजनेस सेंटर है। दोनों ही जगहों पर भीड़ होती है। विस्फोटों से ज्यादा से ज्यादा लोगों को नुकसान पहुंचाने का इरादा साफ झलकता है। मुंबई में सीरियल ब्लास्ट में जैसी तबाही पहले मचती रही है, वैसी इस बार नहीं हो सकी। इसकी वजह विस्फोटों का उतना शक्तिशाली न होना है। इसमें खराब प्लानिंग भी हो सकती है पर चूंकि इन विस्फोटों में आईईडी तकनीक का इस्तेमाल हुआ इसलिए यह कहा जा सकता है कि इसके पीछे किसी बड़े आतंकी संगठन का हाथ है। यह स्थानीय अंडरवर्ल्ड का खेल नहीं है। हो सकता है कि इसके पीछे आईएसआई, लश्कर-ए-तोयबा व दाऊद इब्राहिम गिरोह का हाथ हो? यह किसी ऐसे संगठन ने भी करवाया हो जो भारत-पाक वार्ता में बाधा डालना चाहता हो। पाक से रिश्ते सुधारने के लिए बातचीत का दौर लम्बे वक्त के बाद शुरू हो चुका है, यह हमला उसे तोड़ने की साजिश भी हो सकती है।
अखबारों में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार इसके पीछे दाऊद इब्राहिम का हाथ हो सकता है। आईएसआई के इशारे पर हुए इस विस्फोट में अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद ने इस काम को अंजाम देने का बीड़ा उठाया। इसमें हिजबुल मुजाहिद्दीन और इंडियन मुजाहिद्दीन ने साथ दिया। सूत्रों के अनुसार बुधवार को मुंबई में हुए आतंकी हमले ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद भारत में कुछ करने के लिए आईएसआई ने दाऊद से कहा। आईएसआई की पहल पर ही दाऊद अपने गुर्गों के साथ चार माह पहले ही लश्कर-ए-तोयबा में सम्मिलित हो गया था। सूत्रों के अनुसार आईएसआई ने दाऊद के कई लोगों को लाहौर के बहावलपुर में हथियार चलाने और कमांडो प्रशिक्षण भी दिलवाया है और प्रशिक्षण अभी भी जारी है। जिस प्रकार मुंबई में विस्फोट हुआ है उसमें कम और मध्यम क्षमता वाले बम का प्रयोग किया गया। इसमें आईईडी का भी इस्तेमाल हुआ है। इस तरह के बम का प्रयोग इंडियन मुजाहिद्दीन करते हैं। हिजबुल की आदत है कि वह बम विस्फोट में किसी हिन्दू धार्मिक स्थल पर मध्यम क्षमता के बम का प्रयोग करता है। मुंबई में झावेरी बाजार में मुंबा बेबी के पास बम फटा है। इसके अलावा हिजबुल प्राय बम विस्फोट में गाड़ी का इस्तेमाल करता है जो मुंबई में हुआ। इंडियन मुजाहिद्दीन एक प्रकार से लश्कर के स्लीपर सेल की तरह काम करता है। आने वाले दिनों में शायद इस पर और जानकारी मिले। भारत की खुफिया और सुरक्षा तंत्र को चुस्त-दुरुस्त करना होगा। ऐसे हमले और भी हो सकते हैं। हमें पूरी तरह से तैयार रहना होगा।
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Saturday, 28 May 2011

दिल्ली में बम धमाका : चुनौती या चेतावनी?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 28th May 2011
अनिल नरेन्द्र
नई दिल्ली के अतिसंवेदनशील इलाके में बुधवार को हाई कोर्ट परिसर में बम धमाके ने हड़कम्प मचा दिया है। हड़कम्प इसलिए नहीं मचा कि बम बहुत शक्तिशाली था और परिणामस्वरूप बहुत ज्यादा जानमाल का नुकसान हुआ पर इसलिए ज्यादा मचा कि वह ऐसी जगह फटा जो नई दिल्ली में सबसे ज्यादा संवेदनशील इलाका माना जाता है। दिल्ली हाई कोर्ट की कैंटीन में फटा हो या पार्किंग में यह क्षेत्र अतिसुरक्षित माना जाता है। इसके दो-चार किलोमीटर के दायरे में राष्ट्रपति भवन, नॉर्थ-साउथ ब्लॉक, संसद सभी महत्वपूर्ण ठिकाने आते हैं। जहां बम फटा वह मुश्किल से नेशनल डिफेंस कॉलेज से एक किलोमीटर दूर है। याद रहे कि शिकागो में चल रहे डेविड हेडली के मुकदमे में उसने यह बताया कि दिल्ली डिफेंस कॉलेज आतंकियों के निशाने पर है। दुःखद पहलू यह भी है कि आईबी ने वार्निंग दी थी कि ओासमा बिन लादेन के मारे जाने से आतंकी बौखला गए हैं और वह बदला ले सकते हैं। चार दिन पहले नई दिल्ली रेलवे स्टेशन इंचार्ज को डाक के माध्यम से एक पत्र भी मिला था जिसमें लश्कर-ए-तोयबा के नाम से किसी अज्ञात संगठन ने यह लिखा था कि वह ओसामा बिन लादेन की मौत का बदला लेने के लिए भारत में बम धमाके करेगा। पत्र में 25 मई की शाम 5 बजे का समय भी दिया गया था और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन, चिड़ियाघर, लाल किला और एयरपोर्ट को निशाना बनाने की धमकी भी दी थी। इस पत्र में कानपुर, लखनऊ, अहमदाबाद, जयपुर, नागपुर, गाजियाबाद, हरियाणा और महाराष्ट्र में भी हमले की बात लिखी गई है। पत्र में करीम अंसारी नाम लिखा है जो अपने आपको जम्मू-कश्मीर में लश्कर का कमांडर बता रहा है।
मेरा मानना है कि ऐसे मामलों में पुलिस कुछ ज्यादा नहीं कर सकती। कोसने को तो हम दिल्ली पुलिस को कोस सकते हैं पर सवाल यह है कि दिल्ली जैसे शहर में जहां लाखों आदमियों का रोज का आना-जाना है ऐसे कूड बम हादसे को रोकना लगभग असम्भव है। हां कोई संसद हमले, मुंबई हमले जैसी वारदात को रोका जा सकता है पर ऐसे छोटे-मोटे बम विस्फोटों को रोक पाना अति कठिन है। सवाल उठता है कि आखिर इस विस्फोट का मकसद क्या था? क्या यह आतंकी अपनी ताकत दिखाना चाहते थे या फिर यह किसी बड़े हमले का ड्रेस रिहर्सल था? करीब सवा दो साल की चुप्पी के बाद जिस तरह हाई कोर्ट के बाहर कम तीव्रता का विस्फोट रखा गया उससे इतना तो साफ है कि उनका मकसद किसी को हताहत करने का नहीं था। वे पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं तक संदेश पहुंचाना चाहते थे कि हम अब भी उतना ही सक्रिय हैं। बेशक बम कम विस्फोट क्षमता का था पर अगर इसे भीड़ वाली जगह पर रखा गया होता तो काफी नुकसान हो सकता था। आजकल पटियाला हाउस व पास ही पटियाला हाउस कोर्ट में राजा, शाहिद बलवा, कनिमोझी जैसी बड़ी हस्तियां विभिन्न मामलों में सुनवाई के लिए आ रही हैं। इसलिए सुरक्षा एक बड़ा सवाल है। इसलिए ज्यादा सतर्पता की जरूरत है। आतंकी संगठन बौखलाए हुए हैं और वह कोई बड़ी वारदात करने की तैयारी में हैं। यह तो रिहर्सल थी, असल हमला अभी आगे आ सकता है।
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