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Saturday, 20 June 2026

बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

करीब 4 महीने तक चले अमेरिका-ईरान के युद्ध के बाद समझौते पर सहमति बनी है। इस चार महीने चले संघर्ष में कौन जीता, कौन हारा? हमें तो लगता है कि इस युद्ध में ईरान की भव्य जीत हुई है। यह हम इसलिए कह रहे हैं कि जिन उद्देश्यों को लेकर अमेरिका-इजरायल ने मिलकर 28 फरवरी को युद्ध शुरू किया था उसमें से कोई भी उद्देश्य वह पूरा नहीं कर सका और अंत में तेरे कूचे से हम बे-आबरू होकर निकले। अमेरिका-इजरायल ने अपने पहले ही हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को शहीद कर दिया। उसी दिन ट्रंप ने कहा- ईरान के महान लोगों, आपकी आजादी का समय आ गया है... जब हम अपना काम पूरा कर लेंगे तो आप अपनी सरकार पर कब्जा कर लीजिए यानी हम रेजीम चेंज कर देंगे। ताकि ईरान में वह रेजीम बदल सके? एक उद्देश्य था ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल कार्यक्रम को समाप्त करना। इसमें ईरान के एनरिच्ड यूरेनियम पर भी कब्जा करना था या उसे खत्म करना था। न तो ईरान में रेजीम चेंज हो सकी, न परमाणु कार्यक्रम बंद हुआ और न ही मिसाइल कार्यक्रम पर पाबंदी ही लगा सके। अब बात करते हैं हेर्मुज स्ट्रेट को खोलने की। पहली बात तो 28 फरवरी से पहले होर्मुज खुला हुआ था कभी भी बंद नहीं था। उल्टा आपने ईरान को एक ऐसा हथियार दे दिया जिसके बारे में उसने पहले कभी भी नहीं सोचा होगा। अब ईरान और ओमान मिलकर होर्मुज स्ट्रेट को अपनी मिल्कियत मान रहे हैं और हर गुजरते जहाज से सर्विस चार्ज ले रहे हैं। यह थे प्रमुख उद्देश्य जिनको लेकर अमेरिका-इजरायल ने 28 फरवरी से हमले शुरू किए थे।  अब ट्रंप खुद देख सकते हैं कि इनकी प्रवृत्ति में इन्हें कितनी सफलता मिली। ईरान की मुकम्मल जीत हुई। अब बात करते हैं अमेरिका को इस अभियान की कितनी भारी कीमत उठानी पड़ी। उनके गल्फ राष्ट्रों में 14 बेस तबाह हो गए। 40 से ज्यादा लड़ाकू विमान नष्ट या डेमैज हो गए, राडार और एयर डिफेंस सिस्टम तबाह हो गए। अमेरिका ने ईरान जंग में अब तक 113 बिलियन डॉलर यानी 10 लाख करोड़ रुपए स्वाह कर दिए। ऐसा नहीं कि ईरान को इसकी कीमत चुकानी नहीं पड़ी। ईरान सरकार के मुताबिक हमलों के पहले 40 दिनों में उन्हें 270 बिलियन डॉलर यानी करीब 25 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। 1 लाख 22 हजार इमारतें तबाह हुई हैं। 3 अप्रैल 2026 तक ईरान के 307 अस्पताल बर्बाद हुए। दवाओं की कीमतें 50 प्रतिशत तक बढ़ गई, जिससे 60 लाख से ज्यादा मरीज प्रभावित हुए। मिनाब के बच्चों के स्कूल पर सीधा हमला हुआ जिसमें 160 से ज्यादा लोग मारे गए जिनमें 130 से ज्यादा छोटी बच्चियां शहीद हुईं। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत दर्जनों टाप के लीडरशिप शहीद हो गई। इस लड़ाई में गल्फ के अन्य देश भी इसकी चपेट में आ गए। यूएई, कतर, सउदी, बहरीन, इराक इत्यादि बीच में फंस गए। इस  जंग में निर्दोष लोगों को भी भारी कीमत चुकानी पड़ी। अनुमान है कि जंग में 7000 से ज्यादा निर्दोष सैनिक मारे गए और 40 हजार से ज्यादा लोग घायल हुए। ईरान ने साबित कर दिया कि वे अमेरिका-इजरायल के सामने झुकने वाला नहीं है। ट्रंप बड़े गर्व से कह रहे हैं कि अब ईरान परमाणु बम कभी नहीं बन सकेगा। उन्हें हम याद करवाना चाहते हैं कि ईरान ने कभी परमाणु बम बना ही नहीं था। शहीद अयातुल्लाह अली खामेनेई ने बकायदा एक फतवा जारी किया था कि इस्लाम में ऐसा हथियार बनाना मना है जिसमें निर्दोष लोग मारे जाएं। ट्रंप अब अपनी जीत दिखाने के चलते ही कुछ भी कहें पर सारी दुनिया जानती है कि आप की हार हुई है। आपने अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाया है और आप बड़े बे-आबरू होकर ईरान के कूचे से निकले हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 18 June 2026

कागजों पर दस्तखत: जमीन पर धुआं

दुनिया ने राहत की सांस ली जब यह घोषणा हुई कि अमेरिका-ईरान युद्ध में युद्ध बंदी हो गई है। पर मैं इसे सिर्फ युद्ध विराम ही कहता हूं, यह जंग की समाप्ति नहीं मानी जा सकती क्योंकि अभी सही मायनों में तो दोनों तरफों की शर्तें माननी बची हैं। फिलहाल तो इससे सिर्फ  अमेरिका और ईरान के बीच बमबारी रुकी है। जंग रोकने के लिए अभी बहुत से पेंच फंसे हैं। मैं सबसे पहले अयातुल्लाह मोजतबा खामेनेई, राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, विदेश मंत्री अब्बास अरागची और स्पीकर बागेर गालिबफ को बधाई देना चाहता हूं कि युद्ध में भारी पड़ने के बावजूद उन्होंने इस युद्ध विराम (सीजफायर) को रोकने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। मैं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इसके लिए बधाई नहीं देना चाहता क्योंकि उन्होंने ही यह जंग शुरू की थी। जिसे बिना वजह जंग को शुरू किया था उसमें युद्ध विराम करके उन्होंने अपनी जान ही छुड़ाई है, किसी पर एहसान नहीं किया। उनके समर्थक उपराष्ट्रपति जेडी वेन्स कह रहे हैं कि ट्रंप अब नोबल पुरस्कार के हकदार हैं? क्यों भाई ! कैसे हुए हकदार? पहले शुरू करो, फिर पिटो और अब बिना शर्तों के बमबारी रोकने की घोषणा करो? यह जो एमओयू पर हस्ताक्षर होने जा रहे हैं वह कितने कारगर सिद्ध होते हैं यह देखना बाकी है क्योंकि सबसे बड़ा पेंच तो नेतन्याहू बने हुए हैं। इजरायल ने साफ घोषणा कर दी है कि वह इस समझौते को नहीं मानता और न ही वह लेबनान पर लड़ाई बंद करेगा। जबकि ईरान की शर्तों पर यह शामिल है। ट्रंप की धमकियों के बावजूद, गाली-गलौच की परवाह न करते हुए इजरायल अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है और इस पूरी कोशिश में लगा हुआ है कि यह समझौता न हों। ईरान ने 14 बिंदुओं की मांग रखी है। ट्रंप ने भी दो बड़ी शर्तें रखी हैं। ईरान ने मांग की है कि शांति समझौते से पहले 24 अरब डालर की जब्त संपत्ति अमेरिका ईरान को दे। इस राशि का आधा हिस्सा यानी 12 अरब डालर बातचीत शुरू होने से पहले ही ईरान को दी जाए। वहीं अमेरिका ने इस दावे पर अलग रुख अपनाया है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ईरान को किसी प्रकार की वित्तीय राहत तभी मिलेगी जब वह समझौते के तहत अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य पर भी विवाद है। बेशक ईरान ने होर्मुज को खोल दिया है पर अभी सिर्फ तय रास्तों से ही समुद्री जहाजों का आना शुरू हुआ है। होर्मुज को पूरी तरह से खोलने में समय लगेगा क्योंकि ईरान ने होर्मुज में बारुदी सुरंगें बिछा रखी हैं। जिन्हें हटाने में समय लग सकता है। ईरान हर जहाज से टोल भी वसूल कर रहा है। जिसे कर सर्विस चार्ज कह रहा है। अमेरिका ऐसा करने पर ऐतराज कर रहा है। खैर, होर्मुज के खुलने से पूरी दुनिया ने राहत की सांस जरूर ली है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम और एनज्डि यूरोनियम के मुद्दे पर भी अभी सहमति बननी बाकी है। ईरान द्वारा उसके मिसाइल कार्यक्रम पर भी अमेरिका और इजरायल को आपत्ति है। इस मुद्दे पर दोनों पक्ष 60 दिनों की बातचीत में कोई निर्णय करेंगे। ईरान के उपविदेश मंत्री काजेम धरीबाबादी ने तस्लीन न्यूज एजेंसी से कहा कि अंतिम समझौते को लेकर अगले 6ˆ दिनों के भीतर बातचीत जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका अपने वादों पर किस हद तक टिका रहता है और पूरा करता है? ई&रान की प्रमुख मार्गों में सैन्य गतिविधियों को रोकना यानी की हर जंग को पूरी तरह रोकना, आर्थिक नाकाबंदी समाप्त करना और विदेशों में जमे हुए ईरानी फंडस को जारी करना शामिल है। समझौते में लेबनान में युद्ध विराम का भी प्रावधान शामिल है। वित्तीय मुद्दों पर मतभेदों के बावजूद व्यापक समझौते को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली हैं। ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, फ्रांस और भारत ने इसका स्वागत किया है। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य मध्य-पूर्व में स्थायी शांति स्थापित करना है। ऐसे में अगर समझौता सफल रहता है तो वैश्विक बाजारों को भी बड़ी राहत मिल सकती है। बस यह टिका रहे? अंत में इजरायल-मोसाद कुछ भी कर सकता है। ईरानी लीडरशिप की हत्या भी करवा सकता है ताकि यह युद्ध विराम टूट जाए। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 16 June 2026

अब फुटबाल का जादू

ऐसे वक्त पर जब पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान में भंयकर युद्ध छिड़ा हुआ है और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की समस्या बनी हुई है। जब सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल हो रही है उसी समय खेल प्रेमियों के लिए जबरदस्त राहत का आयोजन हो रहा है। मैं विश्व कप फुटबाल 2026 की बात कर रहा हूं। अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको की संयुक्त मेजबानी में आयोजित अब तक का सबसे बड़ा फुटबाल विश्व कप चल रहा है। फीफा विश्व कप 2026 के पहले उद्घाटन समारोह ने बृहस्पतिवार को एस्टाडियो एज्टेका स्टेडियम में 85000 दर्शकों के सामने अनूठा रंग बरपा दिया। इस बार तीन उद्घाटन समारोह हुए हैं जिनमें दो समारोह शुक्रवार को कनाडा के टोरंटो और अमेरिका के लॉस एंजिल्स में आयोजित हुए। 39 दिन तक चलने वाले इस सबसे लंबे प्रख्यात महाकुंभ में रिकार्ड मैचों के साथ रिकार्ड दर्शकों के आने से फुटबाल की शीर्ष संस्था को वित्तीय रूप से भारी मुनाफा होने वाला है। फीफा की कमाई कई तरीकों से होगी जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा प्रसारण अधिकारों का होगा। इसके अलावा प्रायोजन, टिकटों की बिक्री, आतिथ्य सत्कार, पर्यटन आदि से भारी कमाई होगी। इस बार 48 टीमों के टूर्नामेंट में हिस्सा लेने से भी कमाई उम्मीद से ज्यादा हो सकती है और यह आंकड़ा 76 हजार करोड़ रुपए (8.9 अरब डॉलर) से भी ज्यादा पहुंच सकता है। असल में 104 मुकाबले तीन देशों के 16 शहरों में होने से कमाई में कई तरह की बढ़ोतरी होगी। बता दें कि तीन बार विश्व कप की मेजबानी करने वाला मैक्सिको दुनिया का पहला देश है। मैक्सिको ने अपने यहां हुए उद्घाटन में अपनी देसी संस्कृति की झलक दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ा। फीफा ने इस समारोह के लिए दुनिया भर से कलाकार बुलाए थे, लेकिन असली समां शकीरा के दाई-दाई गाने से बांधा, जिस पर दर्शक झूम उठे। सवाल यह भी है कि क्या यह खेल की उस शक्ति को साबित कर पाएगा, जो मतभेदों के बीच संवाद व तनावों के बीच उम्मीद की गुजांइश पेश करती है? फुटबाल विश्व कप का इतिहास देखें तो उम्मीद की जा सकती है। बता दें कि इटली के डिक्टेटर मुसोलिनी के शासन के दौरान 1934 में इटली में हुआ विश्वकप हो या फिर 1938 की प्रतिस्पर्धा, जब  जर्मनी, आस्ट्रिया पर कब्जा कर चुका था, इस खेल ने दर्द से कराहते देशों को जरूर कुछ राहत तो दी थी। हिटलर ने भी विश्वकप हाकी का आयोजन किया था जिसमें भारत के मेजर ध्यानचंद सबसे बड़े सितारे के रूप में उभरे थे। दिलचस्प यह है कि ईरान की टीम को भी मेजबान अमेरिका में खेलने का मौका मिलेगा। हालांकि ईरान को वीजा देने में भी विवाद हुआ। उल्लेखनीय है कि ईरानी खिलाड़ी जब मैक्सिको पहुंचे तो उन्होंने वह प्रतीक चिह्न पहना था जो मिनाब के बच्चियों के स्कूल पर अमेरिका ने मिसाइल मारा था और 138 छोटी बच्चियां शहीद हो गई थीं। अपेक्षा की जाती है कि इस आयोजन से देशों में प्रेम व एक-दूसरे का सम्मान बढ़ेगा, भाई चारा बढ़ेगा और दुनिया में अशांति के माहौल में कमी आएगी। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 13 June 2026

क्यूबा है ट्रंप का अगला टारगेट?

भारत में एक कहावत है विनाश काले विपरीत बुद्धि यानी जब आप पर विपत्ति आती है तो आपकी सबसे पहले बुद्धि भ्रष्ट होती है। यही हाल है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उसके रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ का। पीट हेगसेथ ने ताजा बयान दिया है जिससे लगता है कि ट्रंप का अगला निशाना क्यूबा है। पीट हेगसेथ ने हाल ही में गुआंतानामो बे का दौरा किया और क्यूबा को कई शब्दों में चेतावनी दी। हेगसेथ ने क्यूबा को स्पष्ट किया कि अमेरिका के खिलाफ किसी भी तरह की धमकी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने साफ किया कि ईरान के बाद या साथ-साथ क्यूबा भी ट्रंप के निशाने पर है। लगता है कि ट्रंप अपने पड़ोसी देश क्यूबा के खिलाफ जंग छेड़ने के मूड में है। जबकि ईरान युद्ध में बुरी तरह फंसे हुए हैं और बाहर निकलने के लिए बेताब हैं और अब क्यूबा को कब्जाने की धमकी दे रहे हैं। उन्होंने क्यूबा की एनजी सप्लाई काटने के बाद अब एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस निमित्ज को पूरे कैरियर ग्रुप के साथ तैनात कर दिया है। यह तैनाती ठीक उसी तरह की है जिस तरह उन्होंने वेनेजुअला पर हमला करने से पहले वहां के राष्ट्रपति निकोलास मादुरो को हटाने के लिए चारों और तैनात किया था। क्यूबा पर हमले की तैनाती में अमेरिका ने क्यूबा के 94 वषीय पूर्व राष्ट्रपति राउल कास्त्राs पर हत्या का आरोप भी लगाया है। इसके बाद अटकलें तेज हो गई हैं कि अमेरिका की तख्ता पलट सूची में अगला नाम क्यूबा का हो सकता है। अमेरिका की मैक्सिमम प्रैशर की वजह से क्यूबा में दशकों का सबसे बड़ा ईंधन और बिजली संकट पैदा हो गया है। इसी बीच ट्रंप और उनके अधिकारी लगातार यह कह रहे हैं कि 66 साल से सत्ता में मौजूद कम्युनिस्ट सरकार का अंत होना चाहिए। व्हाइट हाउस ने यह भी चेतावनी दी है कि वह अमेरिका के तट से सिर्फ 144 किलोमीटर किसी दागी राष्ट्र को बर्दाश्त नहीं करेगा। अब ये चर्चा है कि राउल कास्त्राs को कोई सैन्य अभियान चलाकर मादुरो की तरह गिरफ्तार करके अमेरिका लाया जा सकता है। उन्हें अमेरिका लाकर उन पर मुकदमा चला सकता है। इस साल की शुरुआत में एक कार्यकारी आदेश में ट्रंप ने दावा किया था कि क्यूबा में रूस का सबसे बड़ा विदेशी जासूसी केंद्र मौजूद है। बिडेन प्रशासन ने चीन पर भी आरोप लगाया था कि उसने अमेरिका के तटों से सिर्फ 90 मील दूर स्थित इन कम्युनिस्ट द्वीप पर जासूसी केंद्र खोल रखा है। यही नहीं ट्रंप प्रशासन ने करीब 30 साल पुराने एक मामले को अचानक जिंदा करके क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति राउल कास्त्राs पर गंभीर आरोप लगा दिया। असल में 1996 में समुद्र में फंसे लोगों और क्यूबा से भागकर अमेरिका आने वाले शरणार्थियों की मदद करने वाला एक संगठन छोटे नागरिक विमानों के जरिए रेस्क्यू मिशन चला रहा था। उसके दो नागरिक विमानों को क्यूबा के सैन्य विमानों ने मार गिरया। इसमें चार अमेरिकी नागरिकों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद दोनों देशों के रिश्तों में और ज्यादा तनाव बढ़ गया था। अब तीन दशक बाद अमेरिकी अधिकारियों ने पूर्व क्यूबाई राष्ट्रपति राउल कास्त्राs पर हत्या, साजिश रचने और विमान गिराने से जुड़े आरोप लगाए हैं। राउल कास्त्राs क्यूबा की राजनीति के सबसे ताकतवर चेहरों में से एक हैं। उन्होंने अपने भाई फिदल कास्त्राs के बाद देश की राजनीति संभाली थी। अब सवाल है कि आखिर 30 साल बाद अमेरिका इस मामले को क्यों उठाना चाहता है? 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 11 June 2026

क्या इजरायल अमेरिका की जासूसी कर रहा है?

ईरान युद्ध को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन  नेतन्याहू के बीच टकराव व बढ़ती रणनीतिक दूरियों ने पेंटागन की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी रक्षा मुख्यालय को इजरायली जासूसी का भय लगने लगा है। उसने चेतावनी दी है कि वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी कड़ी इजरायली निगरानी का निशाना बन सकते हैं? एनबीसी न्यूज की एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के दो मौजूदा व एक पूर्व अधिकारी ने बताया कि पेंटागन की डिफैंस इंटेलिजेंस एजेंसी (डीआईए) ने हाल ही में इजरायल के लिए काउंटर इंटेलिजेंस खतरे के स्तर को क्रिटिकल यानी गंभीर कर दिया है। यह उनका सबसे ऊंचा आंतरिक मूल्यवान स्तर है। एक मौजूदा अधिकारी ने अमेरिकी पत्रकार को बताया कि अमेरिका पहले से ही इजरायल की आधिकारिक यात्राओं के दौरान सुरक्षा उपाय बरतता है क्योंकि इजरायली जासूसी एजेंसियों को जानकारी जुटाने के मामले में बहुत आक्रामक माना जाता रहा है। पेंटागन की नई चिंताओं से पता चलता है कि इजरायल पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के संबंध में अमेरिकी रणनीतिक चर्चाओं व फैसलों की जानकारी हासिल करने की कोशिश कर रहा है। इजरायली जासूसी नेटवर्क खासकर उनकी खुफिया एजेंसी ऐसे कामों के लिए दुनिया में बदनाम है। चौंकाने वाली बात यह है कि मोसाद ने अपने सबसे भरोसेमंद साथी अमेरिका को भी नहीं बक्शा है? 

-अनिल नरेन्द्र

पत्रकार को कहा: बेईमान और बेवकूफ

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्राध्यक्षों से तो बदतमीजी से पेश आते ही हैं पर अपने देश के पत्रकारों खासकर महिला पत्रकारों से कैसे पेश आते हैं ताजा घटना से पता चलता है। ट्रंप ने एनबीसी जैसी बड़ी टीवी नेटवर्क से एक इंटरव्यू के दौरान अचानक बातचीत बीच में ही खत्म कर दी। कार्यक्रम की होस्ट क्रिस्टन वेल्कर बार-बार उनके (ट्रंप के) कई दावों पर सवाल उठा रही थीं। रविवार को प्रसारित हुए कार्यक्रम ‘मीट द प्रेस' में ट्रंप ने दावा किया कि कैलिफोर्निया में चल रहे प्राइमरी चुनाव और साल 2020 का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव दोनों ही धांधली पूर्ण थे। जब वेल्कर ने चुनावों में धांधली के दावे के समर्थन में सुबूत मांगे तो ट्रंप ने कहा, ‘मुझे बस देखना और सुनना भर है।' इस पर वेल्कर ने कहा यह सुबूत नहीं है। इसके बाद ट्रंप ने मीडिया पर बेईमान होने का आरोप लगाया और इंटरव्यू समाप्त करते हुए कहा, माफ कीजिए, अब इसे यहीं खत्म करते हैं। मेरे लिए बहुत हो गया यह इंटरव्यू अब खत्म है। इंटरव्यू शुरू होने के लगभग 50 मिनट बाद इसे छोड़ दिया। वेल्कर के सवालों के जवाब में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए कार्रवाई करनी जरूरी थी और यह अंतहीन युद्ध नहीं होगा। हम वहां कुछ महीनों के लिए रहेंगे और उसके बाद खतरा काफी हद तक समाप्त हो जाएगा। इसके बाद बातचीत उस दंगे पर पहुंची और जब ट्रंप ने साल 2020 के चुनाव में धांधली का अपना पुराना, बिना सुबूत वाला दावा दोहराया तो क्रिस्टन वेल्कर ने उन्हें  चुनौती दी। ट्रंप ने फिर कैलिफोर्निया  के प्राथमिक चुनावों का जिक्र किया, जहां गवर्नर सहित कई पदों के लिए नवम्बर में होने वाले मध्यावधि चुनावों में कौन से दो उम्मीदवार होंगे। यह तय करने के लिए वोटों की गिनती जारी थी। उन्होंने फिर आरोप लगाया, वे चुनाव में धांधली कर रहे हैं, पलटकर वेल्कर ने पूछा: क्या आपके पास इसके समर्थन में कोई सुबूत है? ट्रंप ः मुझे सिर्फ देखना और सुनना है। वेल्कर ने बीच में टोका, लेकिन यह कोई सुबूत नहीं हैं। ट्रंप ने आगे कहा वे बेईमान हैं बिल्कुल आपकी तरह। इस पर वेल्कर ने जवाब दिया निष्पक्षता की बात करें तो मैं बेईमान नहीं हूं। लेकिन बातचीत जारी रखें, इस पर ट्रंप ने उनसे कहा या तो आप बेईमान हैं या फिर बेवकूफ और यह कहते हुए ट्रंप उठ गए  और कहा इसे यहीं खत्म करते हैं। मेरे लिए बहुत हो गया। शुक्रिया डार्लिंग, आपको अपने प्रेस को सुधारना चाहिए क्योंकि एक देश कभी महान नहीं बन सकता अगर उसकी प्रेस बेईमान है। हम इस महान पत्रकार को सलाम करते हैं जिन्होंने अपनी बेइज्जती सही पर डटी रहीं। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 9 June 2026

युद्ध विराम के नाम पर धोखा?

क्या अमेरिका ईरान पर जमीनी हमले की तैयारी कर रहा है और सीजफायर के नाम पर ईरान को बेवकूफ बना रहा है? अमेरिकी वारशिप यूएसएस त्रिपोली की तैनाती के बाद  सवाल फिर यह उठ गया है कि अमेरिका की असल नीयत क्या है? त्रिपोली की तैनाती के बाद यह सवाल उठाना लाजमी है। अमेरिकी सेना ने शनिवार को ईरान की ओर से लांच किए गए ड्रोन को तबाह कर देने का दावा किया। वहीं अब होर्मूज में यूएसएस त्रिपोली की तैनाती की ताजा खबर आई है। सवाल उठता है कि क्या ईरान पर अब जमीनी हमला होने जा रहा है? अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता कहने को तो अभी जारी है। लेकिन जमीन और समुद्र पर जो स्थिति दिख रही है वे कुछ और ही कहानी की ओर इशारा कर रही है। पिछले 72 घंटों में हुई कई सैन्य कार्रवाईयों ने पश्चिम एशिया में नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका सिर्फ  ईरान पर दबाव बना रहा है या फिर होर्मूज जलडमरूमध्य पर निर्णायक बढ़त हासिल करने की तैयारी कर रहा है?  क्योंकि जो तैनाती अमेरिका कर रहा है, उसे देखकर तो ऐसा लगता है कि ट्रंप अब ईरान के आइलैंड पर कब्जा करने जा रहा है?  घटनाओं की शुरुआत उस खबर से हुई जिसमें बताया गया कि ईरानी झंडे वाले चार तेल टैंकर होर्मूज पार करने में सफल रहे। ये जहाज कथित तौर पर करीब 70 लाख बैरल तेल लेकर निकले थे और प्रतिबंधों के बावजूद आगे बढ़ गए। लेकिन इसके कुछ ही घंटों बाद अमेरिकी इंडो-पैसेफिक कमांड ने घोषणा की कि उसने हिंद महासागर में प्रतिबंधित तेल टैंकर एमटी डेविना को रोककर इस पर कब्जा कर लिया है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि कब्जे में लिया गया जहाज उन्हीं चार टैंकरों में से एक था या नहीं। लेकिन टाइमिंग ने कई अटकलों को जन्म दिया है। इसे मसले पर संभल ही रहा था कि उस पर अमेरिका ने हमला कर दिया। शनिवार को ही अमेरिकी सैंट्रल कमांड ने दावा किया कि उसने होर्मूज की ओर बढ़ रहे चार ईरानी हमलावर ड्रोन मार गिराए। इसके तुरंत बाद अमेरिकी सेना ने ईरान के गोसक और केशम द्वीप पर मौजूद तटीय रडार ठिकानों पर हमले किए। पहली बार नहीं है जब केशम को निशाना बनाया गया है। लेकिन मौजूदा हालात में इस द्वीप का नाम बार-बार सामने आना सैन्य विश्लेषकों का ध्यान खींच रहा है। जवाब में ईरान ने भी कुवैत और बहरीन की ओर सात मिसाइलें दागी। इनमें से 6 को अमेरिका ने रोकने का दावा किया। इस बीच अमेरिका ने यूएसएस त्रिपोली की अरब सागर और होर्मूज क्षेत्र में तैनाती की है। यूएसएस त्रिपोली कोई साधारण युद्ध पोत नहीं है। यह एक उभयचर हमलावर जहाज है, जिसका मतलब है कि ये जहाज पानी से तो हमला कर ही सकता है, जरूरत पड़ने पर जमीन के बेहद करीब जाकर सैनिकों को उतार भी सकता है। ऐसे जहाज समुद्र से सीधे सैन्य अभियान चलाए जाने के लिए बनाए जाते हैं। उधर केशम ईरान का सबसे बड़ा द्वीप है और होर्मूज के मुहाने पर मौजूद है। इसे न डूबने वाला एयरक्राफ्ट कैरियर भी कहा जाता है। ईरान ने यहां वर्षों से रडार सिस्टम, ड्रोन बेस, एंटी शिप मिसाइलें, अंडरग्राउंड सुरंगे और नौ सैनिक अड्डे बनाए हुए हैं। अगर अमेरिका इस द्वीप पर कब्जा कर लेता है तो उसे  कई बड़े स्ट्रेटिजिक फायदे मिल सकते हैं। वैसे अमेरिका के लिए केशम पर कब्जा बिल्कुल भी आसान नहीं होने वाला है। इसका मतलब होगा सीधे अंगारों को हाथ में लेना। केशम ईरानी जमीन से बेहद करीब है। अगर अमेरिका अपने सैनिकों को यहां उतारता है तो उसे ईरान की मिसाइलों, ड्रोन, नौ सैनिक हमलों और संभावित गुरिल्ला प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है। यूएसएस त्रिपोली की मौजूदगी, केशम पर लगातार हमले और टैंकरों को रोकने जैसी कार्रवाईयों ने यह बहस तेज कर दी है कि अमेरिका होर्मूज पर रणनीतिक बढ़त लेने की कोशिश कर रहा है। यही वजह है कि शांति वार्ता चलने के बावजूद पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की बजाए और बढ़ता दिखाई दे रहा है। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 6 June 2026

अयातुल्लाह अली खामेनेई को अंतिम विदाई

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के लिए तीन दिन के राजकीय अंतिम संस्कार का ऐलान किया गया है। तीन महीने बाद अयातुल्लाह अली खामेनेई को दी जाएगी अंतिम विदाई, मशहद में होंगे सुपुर्द-ए-खाक। ईरान सरकार ने पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के लिए तीन दिन के राजकीय अंतिम संस्कार का ऐलान किया है। फिलहाल तारीख घोषित नहीं हुई है। अंतिम संस्कार और श्रद्धांजलि कार्यक्रम इस्लामिक कैलेंडर के अखिरी महीने जिलहिज्जा के अंत में हो सकता है। यानी 15 जून के आसपास। अधिकारियों ने बताया कि खामेनेई की इच्छा के अनुसार उन्हें मशहद के इमाम रजा दरगाह में दफनाया जाएगा। तेहरान, कोम और मशहद में अंतिम कार्यक्रम होंगे। इन शहरों में बड़े पैमाने पर शोभा यात्राएं और श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित की जाएंगी। ईरान के सरकारी टीवी चैनल आईआरआईबी से बातचीत में तवाकोली-जादेह ने कहा कि तीनों शहरों में करोड़ों लोगों के शामिल होने की उम्मीद है। तेहरान के डिप्टी मेयर मोहम्मद अमीन तवाकोली-जादेह ने कहा कि ईरान के कई अन्य प्रांत भी श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित करना चाहते हैं। बताया जा रहा है कि तेहरान में होने वाला मुख्य कार्यक्रम कम से कम 24 घंटे चलेगा। सिर्फ तेहरान में ही 1.5 करोड़ से दो करोड़ लोग अपने शहीद सुप्रीम लीडर को अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंच सकते हैं। इतनी बड़ी भीड़ को संभालने के लिए प्रशासन सुरक्षा, यातायात और अन्य जरूरी व्यवस्थाओं की तैयारी कर रहा है। यह फैसला अयातुल्लाह अली खामेनेई की शहादत के 3 महीने बाद लिया गया है। आमतौर पर इस्लामी परम्परा के अनुसार किसी व्यक्ति का अंतिम संस्कार मौत के कुछ दिनों के भीतर कर दिया जाता है, लेकिन ईरानी अधिकारियों ने पहले इस कार्यक्रम को टाल दिया था। पहले क्यों नहीं हुआ अंतिम संस्कार? अयातुल्लाह अली खामेनेई 23 फरवरी को अमेरिकी-इजरायली हमले में मारे गए थे। उनकी शहादत के बाद मार्च में ईरान के अधिकारियों ने बयान दिया था कि भारी भीड़ और व्यवस्थाओं को लेकर आ रही चुनौतियों की वजह से अंतिम संस्कार तुरंत करना संभव नहीं है। ईरान की सरकारी एजेंसी ईरना के मुताबिक राजकीय अंतिम संस्कार जून के मध्य में आयोजित किया जाएगा। हालांकि इसकी सटीक तारीख और समय की अभी अधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। अंतिम संस्कार बहुत बड़े स्तर पर होगा और इसमें ईरान के साथ-साथ कई मुस्लिम देशों से भी बड़ी संख्या में लोग शामिल होंगे। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत, बांग्लादेश से भी बड़ी संख्या में लोगों के मशहद पहुंचने की उम्मीद है। अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में करोड़ों लोग एक साथ इकट्ठे होंगे। यह भी खतरा है कि मौके का फायदा उठाकर कहीं इजरायल कोई उल्टी-सीधी हरकत न कर दे। अमेरिका भी इस मौके का फायदा उठा सकता है। ऊपर वाला ऐसा होने से बचाए। उम्मीद करते हैं कि इस पवित्र मौके का इजरायल-अमेरिका कोई नाजायज फायदा नहीं उठाएगा और अयातुल्लाह अली खामेनेई की अंतिम विदाई में कोई बाधा नहीं डालेगा। खामेनेई 86 साल के थे। वह तीन दशक से ज्यादा समय तक ईरान के सुप्रीम लीडर रहे। आज जो ईरान है उसके पीछे अयातुल्लाह अली खामेनेई की दूरदृष्टि और प्लानिंग ही थी। हम अयातुल्लाह अली खामेनेई को अपनी श्रद्धांजलि देते हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 4 June 2026

अमेरिकी एफ-15 गिराने में चीनी मिसाइल

पिछले महीने दक्षिण-पश्चिमी ईरान के ऊपर मार गिराए अमेरिकी एफ-15 ई स्ट्राईक ईगल को चीन निर्मित मिसाइल से निशाना बनाया गया था। अमेरिका की एनबीसी न्यूज ने सूत्रों के हवाले से बताया कि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि ईरान ने जिस मिसाइल से एफ-15 को गिराया, वह हाल ही में मिली थी या ईरान के पुराने जखीरे में से थी। अमेरिकी अधिकारी अप्रैल में हुई इस घटना की अभी भी जांच कर रहे हैं। दशकों में पहली बार किसी अमेरिकी लड़ाकू विमान को दुश्मन की गोलीबारी से मार गिराया गया। उस समय ट्रंप ने कहा था कि विमान कंधे पर रखकर दागी जाने वाली मिसाइल से हमला किया गया। इन हथियारों को आमतौर पर मैन-पोर्टबल एयर डिफैंस सिस्टम के नाम से जाना जाता है, ये करीब 7 फीट लंबी और इसमें लगभग 40 पाउंड वजन होता है। ईरान के चीन से बने सैन्य उपकरणों के इस्तेमाल से अमेरिका-चीन संबंधों में एक नया आयाम जोड़ दिया है। 

-अनिल नरेन्द्र

कुवैत पर क्यों कोहराम मचा रहा ईरान?

ईरान ने अमेरिका के जवाबी हमले के विरोध में कुवैत को निशाने पर लिया है। कुवैत पर 72 घंटे में दो बड़े हमले किए गए। कुवैत में अमेरिका के कम से कम 7 बड़े बेस हैं। वहीं करीब 13 हजार अमेरिकी जवानों को कुवैत में रखा गया है। यूएई को छोड़कर कुवैत क्यों ईरान के निशाने पर आ गया इसके पीछे भी कारण है। ईरान इस कदर कुवैत से नाराज है कि महज 72 घंटों में उसने कुवैत पर ड्रोनों और मिसाइलों से बड़े हमले किए। ईरान का कहना है कि यह हमले बदला लेने के लिए किए गए हैं। ईरान ने स्पष्ट किया कि यह हमले कुवैत के रिहाइशी इलाकों पर नहीं बल्कि कुवैत स्थित अमेरिकी बेसों पर किए जा रहे हैं। बता दें कि अब तक अमेरिका से बदला लेने के लिए यूएई ईरान के निशाने पर था और ईरान ने यूएई पर सबसे ज्यादा हमले किए। फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक ईरान जंग के दौरान तेहरान से यूएई पर करीब 2400 हमले किए थे। हालांकि वर्तमान में ईरान कुवैत के ठिकानों पर ही हमला कर रहा है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि यूएई को छोड़कर ईरान कुवैत को क्यों निशाने पर ले रहा है? इसके पीछे कई कारण नजर आते हैं। कुवैत फारस की खाड़ी के एक छोर पर स्थित है। यह ईरान के पड़ोस में है, जो अमेरिका का सहयोगी मुल्क है। यहां पर अमेरिका के कई बड़े सैन्य बेस हैं। इनमें कैंप अरिफिजान, कैंप बुहिरिंग और अल सलेम  एयरबेस प्रमुख हैं। द हिल की रिपोर्ट के मुताबिक कुवैत में अमेरिका के 13 हजार जवान तैनात हैं। यूएई के मुकाबले कुवैत कूटनीति तौर पर काफी कमजोर है। मई के मध्य में ईरान ने कुवैत के एक द्वीप पर कब्जा करने का प्रयास किया था। हालांकि तेहरान को असफलता मिली थी। यूएई ईरान पर हमले करने में सक्षम है। अगर अमेरिका के बदले ईरान यूएई पर हमला करता है तो अबू धाबी पलटवार कर सकता है, इससे खाड़ी युद्ध में तेजी आ सकती है। बातचीत के बीच ईरान नो-रिस्क मोड में है। सबसे बड़ा कारण है कि हाल ही में ईरान पर जो हमले हुए वह कुवैत के अमेरिकी बेसों से ही हुए थे। इसीलिए जवाबी कार्रवाई में ईरान ने कुवैत को निशाने पर लिया है। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 2 June 2026

अगर रूबियो इतिहास जानते तो फोटो नहीं खिंचवाते?

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्के रूबियो जब भारत के चार दिवसीय दौरे पर आए थे तो वह भारत के प्रधानमंत्री व शीर्ष राजनयिकों से तो मिले ही थे, साथ ही कई भारतीय मशहूर पर्यटन स्थलों पर भी गए। इन्हीं में से एक आगरा के ताजमहल की यात्रा सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बनी। अमेरिकी विदेश मंत्री ने ताजमहल के सामने अपनी पत्नी के साथ यादगार फोटो सोशल मीडिया पर साझा की। ये फोटो जल्दी ही सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बन गई। इस मामले ने उस समय एक अलग मोड़ लिया जब हैदराबाद में स्थित ईरानी दूतावास ने रूबियो के ताजमहल दौरे पर खुलेतौर पर व्यंग्य किया। ईरानी वाणिज्य दूतावास ने अपने बयान में याद दिलाया कि उनके अनुसार, ताजमहल मुगल बादशाह (शाहजहां) की ईरानी मूल की बेगम मुमताज महल की मोहब्बत की निशानी है और इसके निर्माण में फारसी वास्तुकारों की कुशलता शामिल थी। बयान में अमेरिका की भी आलोचना की गई और अमेरिकी सरकार पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया गया। दूतावास ने लिखा ः अगर मार्के रूबियो को इतिहास और वास्तुकला की समझ होती तो वो यहां तस्वीर खिंचवाने के लिए खड़े नहीं होते। यह स्मारक एक बादशाह की ईरानी पत्नी के प्रेम में बनाया गया था और इसे ईरानी वास्तुकारों की प्रतिभा ने गढ़ा था। आज उनकी सरकार ईरानी सभ्यता को मिटाने की धमकी दे रही है और दूसरी सभ्यताओं का अपमान करती है। ईरानी व्यंग्य के बाद यह मामला सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो गया। कुछ उपयोगकर्ताओं ने रूबियो को व्यंग्य का निशाना बनाते हुए कहा कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझे बिना ऐसे स्थानों पर तस्वीरें खिंचवाना उचित नहीं है। कुछ टिप्पणियां इससे भी आगे बढ़ गई और अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के संदर्भ में देखा जाने लगा। एक उपयोगकर्ता ने कहा कि यह इमारत एक ईरानी मल्लिका के लिए फारसी वास्तुकारों ने बनाई थी और यह एक ऐसी संस्कृति का प्रतीक है जिसे उनकी सरकारें इस समय में खतरे में डाल रही हैं और उनका सम्मान नहीं कर रही हैं। बता दें कि संगमरमर जो राजस्थान के मकराने से आया था। इससे बना ताजमहल दुनिया के अजूबों में से एक है, जिसे मुगल सम्राट शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल की प्रेम स्मृति में 1632 ईसवीं में बनवाना शुरू किया था जो 1653 ईसवीं में ही पूरा हुआ था। इसके निर्माण में हिन्दू, इस्लामिक, मुगल समेत कई भारतीय वास्तुकला का समावेश किया गया है। इस भव्य और शानदार इमारत को करीब 20 हजार मजदूरों ने मुगल शिल्पीकार उस्ताद अहमद लाहौरी के नेतृत्व में बनाया था। इस मकबरे को बनाने में उस समय करीब 20 लाख रुपए खर्च किए गए थे। आज के हिसाब से यह लागत करीब 827 मिलियन डॉलर लगभग 52.8 अरब रुपए है। इस इमारत के निर्माण में करीब 28 अलग-अलग तरह के पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है, जो हमेशा चमकते रहते हैं। इनकी दीवारों पर बेहद खूबसूरत नक्काशी की गई है। ताजमहल को 1983 में यूनेस्को ने विश्व विरासत स्थल घोषित किया था। 

-अनिल नरेन्द्र

Monday, 1 June 2026

📣 Thrilled to Announce My Latest Publication!

I am incredibly honored to share that my latest article has been officially published in Echo of Islam, a prestigious, internationally circulated magazine based in Tehran.

Since the early 1980s, Echo of Islam has served as a vital global platform for geopolitics, philosophy, and strategic discourse. Because it is distributed worldwide to international libraries, academic institutions, and embassies, it holds a unique and highly influential space in global media.

Being selected for a publication of this caliber is an absolute privilege.

Why this article matters right now:🎯 The Core Focus: It analyzes the highly critical question of succession in Iran, examining the strategic case for stability and political continuity.

🌐 Global Relevance: Understanding the future leadership of the Islamic Republic is vital for navigating regional stability and shifting Middle Eastern geopolitics.

💡 The Main Takeaway: It offers a detailed perspective on why Ayatollah Sayyid Mojtaba Hosseini Khamenei represents the logical choice for Supreme Leader.This piece represents deep analysis and dedication to a subject that carries immense weight in global current affairs today.

📖 Read the full piece in Issue No. 295 (2026).

Thank you to everyone who follows my work and supports these deep-dive analyses. I would love to hear your thoughts on the piece—let's discuss in the comments below! 👇#AcademicPublication #GlobalPolitics #Iran #Tehran #InternationalRelations #EchoOfIslam #Research #AuthorLife #CurrentAffairs #MiddleEastPolitics