Friday, 31 May 2013

किडनैपिंग केस और धोखाधड़ी केस में फंसीं दो अभिनेत्रियां


 Published on 31 May, 2013 
 अनिल नरेन्द्र 
पिछले कुछ दिनों से फिल्मी अभिनेत्रियां अपने-अपने कारणों से सुर्खियों में हैं। सना खान किडनैपिंग केस में तो लीना ठगी केस में। पहले बात करते हैं सना खान की। बिग बॉस रिएलिटी शो से मशहूर हुई सना खान सलमान खान की एक फिल्म `मेंटल' की हीरोइन भी है। सना पर अपने चचेरे भाई नावेद के लिए एक नाबालिग लड़का का अपहरण करने और उसे धमकाने का आरोप पुलिस ने लगाया है। वह हाल ही में दुबई से फिल्म `मेंटल' का पहला शूटिंग शेड्यूल पूरा करके लौटी थी। केस दर्ज होने के बाद से ही वह फरार है। पुलिस थाने में दर्ज रिपोर्ट के अनुसार 15 वर्षीय लड़की से उसका चचेरा भाई नावेद मुहब्बत करता था। सना को गिरफ्तारी का डर सता रहा है और खबर है कि उसने एंटीसिपेटरी बेल के लिए अर्जी दी है। आगामी दिनों में केस की बारीकियों का पता चलेगा। दूसरा केस अभिनेत्री लीना मारिया पाल (25) का है। हिन्दी व तमिल फिल्मों की अभिनेत्री लीना मारिया पाल को करोड़ों रुपए की ठगी के मामले में दिल्ली के बसंत पुंज के एक मॉल से गिरफ्तार किया गया है। उसके साथ चार बाउंसर भी दबोचे गए हैं। अभिनेत्री पर उसके दोस्त बालाजी उर्प शेखर रेड्डी के साथ चेन्नई में इन ठगी को अंजाम देने का आरोप है। वह दक्षिण दिल्ली स्थित फार्म हाउस में आरोपी दोस्त के साथ लिव इन रिलेशन में छिपकर रह रही थी। हालांकि बालाजी फरार होने में कामयाब हो गया। लीना के बाउंसरों के पास से चार हथियार, नौ लग्जरी कारें और 81 महंगी  घड़ियां बरामद की गई हैं। बालाजी पर निवेश के नाम पर केनरा बैंक के साथ 19 करोड़ और लीना पर 76 लाख की ठगी का केस दर्ज है। डीसीपी जायसवाल ने बताया कि 25 मई को चेन्नई पुलिस ने दिल्ली पुलिस से सम्पर्प कर अभिनेत्री और उसके साथी को दक्षिण दिल्ली के एक फार्म हाउस में छिपे होने की सूचना दी थी। दोनों ने लुभावनी योजनाओं की आड़ में भोले-भाले लोगों से यह ठगी की थी। पुलिस ने चेन्नई पुलिस द्वारा बताए गाड़ियों के नम्बरों के आधार पर उनकी गाड़ियों का पीछा किया और सोमवार को बसंत पुंज के एबियंस मॉल में अभिनेत्री और उसके चार बाउंसरों को ट्रेस कर लिया। पुलिस की मौजूदगी की भनक बालाजी को लग गई और वह अपनी लैंड कूजर कार से फरार होने में कामयाब हो गया। पुलिस पूछताछ में लीना मारिया पाल ने बताया कि उन्होंने असोला निवासी मोहिन्द्र सिंह से चार लाख प्रति माह के किराए पर फार्म हाउस पिछले माह ही लिया था। उन्होंने अपना पुलिस वेरिफिकेशन भी करवाया था। लेकिन तब पुलिस को इनके ठगी के मामले में फरार होने की सूचना नहीं थी। लीना ने पुलिस को बताया कि वह बीडीएस ग्रेजुएट है। स्कूली शिक्षा दुबई में हुई। लीना के माता-पिता दुबई में रहते हैं। करीब दो साल पहले वह मॉडलिंग से फिल्म इंडस्ट्री में आई थी। लीना मद्रास कैफे, काउजेड्स इन गोवा, कोबरा और रेड चिलीज नामक फिल्मों में भी काम कर चुकी है। फार्म हाउस से जो गाड़ियां बरामद हुई हैं उनमें लैंड कूजर, लैंड रोबर, बीएमडब्ल्यू और बेटेंले शामिल हैं। लीना के चार बाउंसरों जिनको गिरफ्तार किया गया है उनमें तीन सेना के जवान रहे हैं।

मनमोहन सिंह की जापान यात्रा से बौखलाया चीन


 Published on 31 May, 2013 
 अनिल नरेन्द्र 
  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक नाजुक पर महत्वपूर्ण मौके पर जापान गए हैं। जापान का भारत के लिए कई मायनों में महत्व बढ़ रहा है। भारत-जापान सहयोग के कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट भारत में दोनों देशों के बढ़ते सहयोग का सबूत हैं। चाहे हम बात करें दिल्ली की चमचमाती मेट्रो रेल सेवा की चाहे बात करें सड़कों पर दनदनाती मारुति गाड़ियों की और देश के इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरतों की हर क्षेत्र में जापान ने हमेशा भारत का सहयोग किया है। यात्रा के 20 दिन पहले इतना तो लगने लगा था कि यह कोई सामान्य दौरा नहीं होने जा रहा है। लद्दाख में भारत-चीन तनाव के दौरान चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग की भारत यात्रा से ठीक पहले मनमोहन सिंह ने अपने जापान दौरे की अवधि एक से बढ़ाकर दो दिन करने की बात कही थी। उस वक्त राजनयिक शिष्टाचारवश भारत ने अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के साथ सम्भावित चौतरफा नौसैनिक युद्धाभ्यास से खुद को बाहर रखने की घोषणा जरूर की थी, लेकिन अभी समुद्र और जमीन दोनों जगहों से उड़ान भर सकने वाला एफिबियन एयरक्राफ्ट खरीदने का समझौता जापान से करके पहली बार दोनों देशों के सामरिक रश्तों की गुंजाइश भी उन्होंने बना दी है। पिछले 15 वर्षों से यानी पोखरण-2 के बाद से परमाणु अप्रसार के मुद्दे को लेकर जापान के साथ रिश्तों में गर्मजोशी थोड़ी कम जरूर हुई थी, लेकिन नए जापानी प्रधानमंत्री शिंजो अबे अपने देश की स्थापित धारणा के विपरीत जाते हुए भारत को परमाणु ईंधन सप्लाई करने तक का मन बना रहे हैं। एटामिक बिजली के क्षेत्र में जापान दुनिया का जाना-माना खिलाड़ी है। मनमोहन सिंह की यात्रा के एक हफ्ते पहले जापान ने ऐसी भूमिका तैयार करते हुए घोषणा की थी कि वह भारत के साथ एटोमिक सहयोग को आगे  बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। हालांकि वह यह कहने से भी नहीं चूका कि फुकुशिमा परमाणु दुर्घटना के बावजूद भारत का उसकी परमाणु तकनीक पर विश्वास जाहिर कर दोनों देशों के सहयोग को और ऊंचाई देने वाली है। जापान के साथ वर्तमान रिश्ते को प्रगाढ़ बनाने में चीन की अप्रसन्नता सामने आने लगी है। चीन जिस प्रकार हमारे इलाकों पर अपना दावा ठोंक कर रिश्तों को तल्ख बनाने में जुटा है, कमोबेश वही हालात उसने जापान के साथ भी बना रखे हैं। पूर्वी चीन सागर में जापान के महत्वपूर्ण द्वीपों पर चीन की कुदृष्टि दोनों देशों के बीच खतरनाक ढंग से तनाव बढ़ा रही है। दोनों के रिश्ते कितने बिगड़ चुके हैं इसका अंदाजा जापानी उपप्रधानमंत्री तारो एशो के उस बयान से लगाया जा सकता है जो हाल में उन्होंने भारत यात्रा के दौरान दिया था। चीन पर खुला हमला बोलते हुए एशो ने कहा था कि डेढ़ हजार वर्षों के इतिहास में जापान और भारत के साथ चीन का रवैया कभी दोस्ताना नहीं रहा। भारत और जापान के बीच बढ़ती नजदीकियों से बौखलाए चीन के एक सरकारी अखबार ने मंगलवार को कहा कि नई दिल्ली की बुद्धिमानी बीजिंग के साथ अपने विवादों को घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय उकसावे से प्रभावित हुए बिना शांतिपूर्ण ढंग से निपटाने में है। अखबार ने कहा कि चीन-भारत संबंधों में कई मतभेद और विरोधाभास हैं। कुछ देश इन मतभेदों को फूट बढ़ाने के अवसर के रूप में देखते हैं। अखबार ने जापानी पीएम शिंजो अबे के उस आह्वान का भी जिक्र किया जिसमें उन्होंने जापान-भारत, आस्ट्रेलिया और अमेरिका का संयुक्त मोर्चा बनाए जाने पर जोर दिया है। कुल मिलाकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जापान यात्रा दोनों देशों को और करीब लाने में सफल रही, इस यात्रा से आपसी सहयोग के नए अवसर व रास्ते खुलेंगे।

Thursday, 30 May 2013

पूरे परिवार को मार डालने वाला राहुल फिल्मों से प्रभावित


 Published on 30 May, 2013 
 अनिल नरेन्द्र 
 फिल्मों और टीवी सीरियलों का बच्चों व युवाओं पर कभी-कभी कितना गहरा असर पड़ता है उसका ताजा उदाहरण गाजियाबाद की नई बस्ती हत्याकांड के आरोपी राहुल की जांच से पता चलता है। उल्लेखनीय है कि गाजियाबाद की नई बस्ती में बिजनेसमैन सतीश गोयल समेत उनके परिवार के 7 लोगों की हत्या कर दी गई थी। पुलिस ने उनके ड्राइवर राहुल को इस सिलसिले में गिरफ्तार किया है। राहुल को गत बुधवार देर रात रेलवे रोड से गिरफ्तार किया गया था। उसके कब्जे से  लूटी गई नकदी, ज्यूलरी समेत खून से सनी उसकी शर्ट और मुंह पर बंधा अंगोछा बरामद किया गया है। आईजी जोन भावेश कुमार ने बताया कि चालक ने परिवार के सातों सदस्यों की हत्या करने का जुर्म स्वीकार किया है। सभी की हत्या चाकू से की गई थी। उनके साथ एसएसपी नितिन तिवारी भी थे। आरोपी चालक को पत्रकारों के सामने पेश भी किया गया। पुलिस ने बताया कि चालक राहुल 21 वर्ष का है और कुछ दिन पूर्व ही उसको सचिन गोयल ने नौकरी से निकाला था। सचिन गोयल के पिता सतीश गोयल का गुर्दा बदला जाना था, जिसके लिए करीब सात लाख रुपए घर में रखे थे। उनमें से राहुल ने करीब 4 लाख रुपए चोरी कर लिए। इसके चलते राहुल को नौकरी से निकाल दिया। राहुल इस बात से खफा था। 21 तारीख की रात करीब आठ बजे राहुल चाकू लेकर पीछे वाली गली से सतीश गोयल के मकान की ऊपरी मंजिल पर पहुंचा। यहां सतीश गोयल की पुत्र वधू  रेखा गोयल व पौत्री मेधा कमरे में लेटी थीं। इसी दौरान राहुल ने मुंह पर बंधा कपड़ा हटा लिया या हट गया जिससे मेधा व रेखा ने उसकी पहचान कर ली। राहुल ने चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दोनों की हत्या कर दी। चीख-पुकार सुनकर नीचे के तल से सचिन गोयल ऊपर आने के लिए सीढ़ी चढ़ने वाले ही थे कि राहुल ने सचिन पर चाकू से वार करके उनकी भी हत्या कर दी। इसके बाद कमरे में मौजूद सतीश गोयल की पत्नी की हत्या कर दी। सचिन की बेटी हनी व बेटा अमन बालकनी में भागे तो उन दोनों को भी राहुल ने चाकू से वार कर मार डाला। इस वीभत्स हत्याकांड को अंजाम देने के बाद राहुल ने फ्रिज से पानी की बोतल निकाली और हाथ धोकर पानी पीया। इसके बाद सचिन गोयल के हाथ से सोने की अंगूठी, अन्य जेवरात व कुछ नकदी लेकर फरार हो गया। राहुल जब छत से गोयल के मकान में कूदा था तो उसके पैर में चोट आई थी जिस पर 22 मई की सुबह उसने हीरा लाल अस्पताल में प्लास्टर करवाया था। राहुल गाजियाबाद से फरार होने ही वाला था कि पुलिस ने उसे बजरिया से धर दबोचा। वह बजरिया में ही रहता है। सात हत्याएं करने वाले आरोपी राहुल के फेसबुक एकाउंट से कई और खुलासे हुए हैं। वह हॉलीवुड की खूनखराबे वाली फिल्मों का शौकीन है। फारेस्ट राइडर और जेम्स बांड-007 सीटीज की फिल्में उसकी पसंदीदा हैं। राहुल की मानसिकता का अंदाजा उसके फेसबुक ग्रुप से भी लगाया जा सकता है। वह `फालतू' बदमाश कम्पनी और बैड ब्वाइज एंड वैंड गर्ल्स का मेम्बर है। उसकी फालोअर लिस्ट में लड़के के मुकाबले लड़कियां ज्यादा हैं। फिल्मों का हमारे युवाओं पर कितना नकारात्मक असर पड़ता है राहुल के केस से पता चलता है।

विवादों के बावजूद आईपीएल-6 सफल व लोकप्रिय टूर्नामेंट रहा


 Published on 30 May, 2013 
 अनिल नरेन्द्र 
अपनी-अपनी राय हो सकती है। आईपीएल खत्म हो गया है और मुंबई इंडियंस आईपीएल-6 का विजेता रहा। दिलचस्प फाइनल में सचिन के जांबाजों ने धोनी के धुरंधरों को धूल चटा दी। बेशक इस बार आईपीएल विवादों में समाप्त हुआ पर निश्चित रूप से इस बार शानदार क्रिकेट देखने को मिली। कुछ नए स्टार उभर कर सामने आए। कुछ पुराने दिग्गजों ने खुद को फिर स्थापित किया। एक बार फिर साबित हो गया कि क्रिकेट में विकेट लेकर ही मैच जीते जा सकते हैं। लसिथ मलिंगा ने आईपीएल-6 में अपनी छाप छोड़ने के लिए एकदम सही मंच चुना। फाइनल मैच का परिणाम तो लगभग तभी तय हो गया था जब मलिंगा ने हसी को पवेलियन भेज दिया था। इसके बाद मलिंगा ने पहली ही गेंद पर खतरनाक बल्लेबाज सुरेश रैना को भी पवेलियन शून्य स्कोर में वापस भेजकर धोनी के धुरंधरों के हौसले पस्त कर दिए। हालांकि यह धोनी का अंदाजा ही है कि उनके मैदान में रहते हुए कोई भी टीम जीत के प्रति पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो सकती। चेन्नई कैम्प में पिछले कुछ दिनों से जो चला उसका दुप्रभाव टीम परफार्मेंस पर जरूर नजर आया और टीम के कोच स्टीफन फ्लेमिंग ने इसे स्वीकार भी किया। खट्टी और मीठी यादें लिए आईपीएल-6 समाप्त हो गया। इस बार गेंदबाजी हो या बल्लेबाजी दोनों में ही विदेशी खिलाड़ी छाए रहे। बल्लेबाजी में आस्ट्रेलिया के माइक हसी सर्वाधिक स्कोर 733 रन के साथ ऑरेंज केप धारी बने तो गेंदबाजी में वेस्टइंडीज के ड्वेन ब्रावो 32 विकेट लेकर पर्पल केप धारी बने। बल्लेबाजी के टॉप-5 में दो ही भारतीय विराट कोहली (634) और सुरेश रैना (548) जगह बना सके। गेंदबाजी में भी टॉप-5 में तीन विदेशी रहे। ब्रावो (32 विकेट) मिशेल जॉनसन (24) और जेम्स धानकर (28) लेकर पहले तीन गेंदबाज रहे। भज्जी (24) और विनय कुमार (23) विकेट लेकर तीसरे और पांचवें स्थान पर रहे। सचिन तेंदुलकर की फाइनल जीतने के बाद आईपीएल से संन्यास लेने की घोषणा ने उनके समर्थकों में निराशा की लहर पैदा कर दी। सचिन ने कहा कि समय आ गया है आईपीएल को विदा करने का। मैंने विश्व कप के लिए 21 साल तक इंतजार किया था लेकिन आईपीएल छह साल में मिल गया। एक और खिलाड़ी मिस्टर डिपेडेवल राहुल द्रविड़ का भी यह आखिरी सीजन रहा। आईपीएल-6 बहुचर्चित और ग्लेमर भरे टूर्नामेंट की साख पर गहरा बट्टा भी लगा है। अगर हर गेंद, शॉट, पारी और मैच के परिणाम को संदेह से देखा जाने लगे तो उसकी लोकप्रियता और विश्वसनीयता के भविष्य पर स्वाभाविक रूप से चिन्ता होती है। इस वाद में दो बातें गौरतलब हैंöपहली यह कि आईपीएल पर विवादों का साया आरम्भ से ही रहा है पर फिर भी उसकी लोकप्रियता बढ़ी ही है। दूसरी यह कि क्रिकेट में भ्रष्ट आचरण की मिसाल सिर्प इसी टूर्नामेंट के साथ नहीं जुड़ी है बल्कि मैच या टेस्ट फिक्सिंग की घटनाएं वन डे और क्रिकेट के टेस्टों में भी हुई हैं। कटु सत्य यह है कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड और आईपीएल के संचालकों की तमाम गतिविधियों में पारदर्शिता का अभाव है, जबरदस्ती की राजनीति है। स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में अपने दामाद की गिरफ्तारी के बावजूद बीसीसीआई अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन पद से इस्तीफा देने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं। उसी से जुड़ा यह सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं कि क्रिकेट जगत से सीधे तौर पर जुड़े विभिन्न राजनेता भी इस मुद्दे पर चुप क्यों हैं? यह पालिटिशियन पवन बंसल और अश्विनी कुमार के मुद्दे पर तो कई दिनों तक संसद ठप कर देते हैं यहां पर 40,000 करोड़ रुपए का घपला है कोई एक शब्द नहीं बोल रहा। भाजपा के नरेन्द्र मोदी, अरुण जेटली, अनुराग ठाकुर अपने-अपने राज्यों के कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष हैं। सीपी जोशी, मंत्री राजीव शुक्ला, फारुख अब्दुल्ला, ज्योतिरादित्य सिंधिया यह भी अध्यक्ष हैं। बीसीसीआई के बोर्ड के कुल 30 मेम्बर हैं और ऊपर बताए गए महानुभाव सभी इसके सदस्य हैं। इनमें से एक का भी श्रीनिवासन के खिलाफ इस्तीफे की मांग न करना यही दर्शाता है कि इस हमाम में शायद सभी नंगे हैं। फिक्सिंग के बाद अब लीपापोती का प्रयास किया जा रहा है। जांच के लिए कमेटी गठित करना तो मजाक से ज्यादा कुछ नहीं है। क्योंकि इनमें अधिकांश तो उनके करीबी हैं। बोर्ड के जो सदस्य बहुमत के अभाव में श्रीनिवासन को बीसीसीआई से बाहर नहीं कर पा रहे, क्या वे उनके दामाद के बारे में पूछताछ कर पाएंगे? कुल मिलाकर मेरा तो यह मानना है कि आईपीएल तमाम विवादों के उपरांत एक अत्यंत सफल टूर्नामेंट रहा जिसका लुत्फ सभी ने उठाया है। विवादों की वजह से इसकी लोकप्रियता में कमी आएगी, मुझे ऐसा नहीं लगता। हां, इस बात का सभी स्तरों पर प्रयास होना चाहिए कि जहां तक सम्भव हो सट्टेबाजी, फिक्सिंग से बचने के उपायों को क्रियान्वयन किया जाए।

Wednesday, 29 May 2013

सत्ता पर आसीन राजनेताओं के सुर में सुर न मिलाएं सरकारी अफसर


 Published on 29 May, 2013 
 अनिल नरेन्द्र 
 चाहे केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार उनकी कारगुजारी का दारोमदार नौकरशाही पर निर्भर करता है। यूपीए की केंद्र सरकार तो अफसरों के दम पर ही चली रही है। खुद नौकरशाह प्रवृत्ति के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में अफसरशाही जितनी प्रभावशाली हुई है वह शायद इससे पहले किसी भी सरकार के कार्यकाल में नहीं हुई। अफसर बिरादरी भी यह भूल जाती है कि अपने राजनीतिक आकाओं को प्रसन्न करने के इरादे से वह  मर्यादाएं, संवैधानिक जिम्मेदारियों की अनदेखी कर सारी सीमाएं लांघ जाती है। इस संबंध में देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने सरकारी अफसरों की खिंचाई करते हुए सुझाव भी दिए हैं। सत्ता पर आसीन राजनीतिक नेताओं के दबाव में सहकारी बैंक के निर्वाचित निदेशक मंडल को भंग करके प्रशासक नियुक्त करने की मध्य प्रदेश सरकार की कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने देश के समस्त सहकारी निबंधकों को आगाह किया है कि सत्तासीन राजनीतिक आकाओं के सुर में सुर मिलाकर गैर कानूनी काम करने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मुकदमेबाजी में खर्च हुआ करदाता को पैसा उन सरकारी अफसरों से वसूला जाएगा जो कानून से हटकर राजनीतिक दबाव में फैसला लेते हैं। जस्टिस केएस राधाकृष्णन और दीपक मिश्र की बैंच ने मध्य प्रदेश के पन्ना स्थित जिला सहकारी बैंक के निर्वाचित निदेशक मंडल को बहाल करने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि जिस अवधि तक निदेशक मंडल को बर्खास्त रखा गया, उस अवधि तक वह निदेशक मंडल के रूप में काम करेगा। बैंच ने इस बात पर सख्त आपत्ति जताई कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करके निदेशक मंडल को बर्खास्त कर दिया गया है। बैंकिंग नियमों के अनुसार आरबीआई से परामर्श किए बिना निदेशक मंडल को उसके निर्वाचित कार्यालय से पहले हटाया नहीं जा सकता। सागर के संयुक्त रजिस्ट्रार ने निदेशक मंडल को कारण बताओ नोटिस जारी करने के ढाई साल बाद भंग कर दिया था। इससे साफ है कि सरकारी अफसरों ने राजनीतिक दबाव में यह फैसला किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुटबाजी को लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर करके करदाता के पैसे को पानी की तरह बहाना समझ से बाहर है। अदालत ने राज्य सरकार पर एक लाख रुपए जुर्माना भी किया। जुर्माने की यह राशि एक माह के अन्दर मध्य प्रदेश लीगल सर्विस अथारिटी में जमा करनी होगी। सागर के संयुक्त सहकारी रजिस्ट्रार पर भी 10 हजार रुपए जुर्माना किया गया है। यह राशि अफसर के वेतन से काटने के निर्देश दिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर सख्त एतराज किया कि ऑडिट रिपोर्ट में मामूली आपत्तियों की आड़ में निर्वाचित निदेशक मंडल को उसके वैधानिक अधिकार से वंचित कर दिया। आरबीआई ने भी सुप्रीम कोर्ट को भेजी अपनी रिपोर्ट में कहा कि ऑडिट रिपोर्ट की आपत्तियां रुटीन हैं। सहकारी बैंकों के इस तरह के केस बड़ी तादाद में अदालतों में विचाराधीन हैं, इसलिए इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी करने की सख्त जरूरत है। जब तक सरकारी अफसरों की जवाबदेही तय नहीं की जाएगी तब तक वह अपने राजनीतिक आकाओं के इशारों पर काम करते रहेंगे।


नक्सली तो गोली चलाने वाले हैं पर गोली चलवाने के पीछे कौन, क्यों?


 Published on 29 May, 2013 
 अनिल नरेन्द्र 
 छत्तीसगढ़ में हुए नक्सली हमले के पीछे गहरी साजिश की बू आ रही है। हथियारबंद गुरिल्लाओं द्वारा छत्तीसगढ़ कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश की जिस तरह चुन-चुन कर हत्या की गई उससे नक्सलियों की रणनीति के जानकार भी हैरान हैं। पटेल के साथ उसी वाहन में बैठे विधायक कावासी लकमा को छोड़ दिए जाने और पटेल व उनके बेटे को 400 मीटर दूर ले जाकर गोली मारने पर संदेह जाहिर होना स्वाभाविक है। जानकारों का कहना है कि पटेल माओवादियों की हिटलिस्ट में नहीं थे। इसके बावजूद उनके बेटे तक का खात्मा किया जाना पहले हुई माओवादी घटनाओं से मेल नहीं खाती। पटेल के छोटे बेटे उमेश ने भी आरोप लगाया कि उनके पिता की हत्या के पीछे राजनीतिक साजिश है। इस हत्याकांड से फायदा किस-किस को होता है? सत्तारूढ़ भाजपा चुनावी वर्ष में ऐसे हमलों से क्यों अपनी सम्भावनाएं धूमिल करेगी? मुख्यमंत्री रमन सिंह ने स्वीकार किया है कि हमले के लिए सुरक्षा इंतजामों की कमी भी जिम्मेदार है। मगर नेताओं को पर्याप्त सुरक्षा न देने के आरोप गलत हैं। जबकि कांग्रेस युवा नेता राहुल गांधी के अनुसार हमले के लिए सुरक्षा इंतजामों में कमी भी जिम्मेदार है, राज्य सरकार कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के प्रति गम्भीर नहीं है। मुख्यमंत्री यह बताएं कि आखिर यह घटना कैसे हो गई? आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला और तेज होगा क्योंकि यह चुनावी वर्ष है पर हमें मूल संदेहों से नहीं हटना चाहिए। पहली बात तो यह है कि 800-1000 नक्सली एक स्थान पर इकट्ठे कैसे हुए? क्या इतनी संख्या में नक्सलियों की मूवमेंट पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता? किसी भी प्रकार का सर्विलेंस नहीं होता खासतौर पर जब नक्सलियों ने ऐसे हमले की चेतावनी दी थी और कहा था कि कांग्रेस अपनी प्रस्तावित यात्रा को रद्द करे। फिर सवाल उठता है कि कांग्रेसी नेताओं के काफिले का रूट ऐन वक्त पर क्यों बदला गया? कांग्रेसी काफिले को पहले अलग रास्ते से गुजरना था, लेकिन परिवर्तन यात्रा का काफिला उसी रास्ते से वापस लौटा जिस रास्ते से वह पहले गुजरा था। नक्सली हमलों को करीब से जानने वाले लोगों का कहना है कि यात्रा के मार्ग में बदलाव की जानकारी किसी ने तो नक्सलियों को वक्त रहते दी होगी जिससे वह हमले की तैयारी कर सके। इतने बड़े स्तर का हमला बिना प्लानिंग के सम्भव नहीं है। सुकमा से जगदलपुर का रूट बदलने पर सवाल उठाए जाने स्वाभाविक ही हैं। कांग्रेसी नेता अजीत जोगी ने भी परिवर्तन यात्रा के रूट बदलने पर सवाल खड़े किए हैं। जानकार यह भी बताते हैं कि नक्सल इलाके में जो रास्ता आने के लिए चुना जाता है उससे वापस नहीं जाना चाहिए। इस हमले में कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेताओं सहित 27 लोग मारे गए। खबर है कि माओवादी पोलित ब्यूरो के सदस्य कटकम सुदर्शन उर्प आनंद हमले का मास्टर माइंड था। एनआईए की टीम मौके पर पहुंच चुकी है। सरकारी सूत्रों ने बताया कि पुलिस महानिरीक्षक संजीव कुमार सिंह के नेतृत्व वाली एनआईए की टीम से मिलकर  घटना की जांच में जुट गए हैं। इतना साफ है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता महेन्द्र कर्मा नक्सलियों के निशाने पर कई दिनों से थे। छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के खिलाफ आंदोलन का उन्हें सबसे मुखर और जुझारू नेता माना जाता था। इसीलिए उन्हें बस्तर का टाइगर भी कहा जाता था। जब सलवा जुडूम आंदोलन की शुरुआत हुई तो महेंद्र कर्मा को ही उसका नेता माना गया। छत्तीसगढ़ विधानसभा से 2003 से 2009 के  बीच नेता प्रतिपक्ष रहे महेन्द्र कर्मा ने अपने परिवार के दर्जनभर लोगों को नक्सली हमलों में खोया है। इससे पूर्व भी नक्सली चार बार कर्मा पर प्राणघातक हमला कर चुके थे जिनमें वह बच गए थे। जान हथेली पर रखकर राजनीति करने वाले इस बहादुर नेता का सोमवार को दंत्तेवाड़ा जिले में स्थित पैतृक गांव में अंतिम संस्कार कर दिया गया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य के रूप में अपनी राजनीति शुरू करने वाले महेंद्र कर्मा चार बार विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। ऐसे निडर, साहसी नेता के जाने से जहां कांग्रेस पार्टी को एक बहादुर, साहसी नेता की हानि हुई वहीं पूरा देश आज उन्हें सलाम करता है। काश! उनकी तरह और भी राजनेता साहसी होते तो आज नक्सली समस्या इतना गम्भीर रूप न धारण करती। यह संतोष की बात है कि इसी हमले में गम्भीर रूप से घायल हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल की मेदांता अस्पताल में चल रहे इलाज से सेहत में सुधार हुआ है। 84 वर्ष से अधिक उम्र होने के चलते श्री शुक्ल की रिकवरी प्रक्रिया में काफी समय लगेगा। इस हमले की बारीकी से जांच होनी चाहिए। हमें तो यह स्पष्ट किसी गम्भीर राजनीतिक साजिश का परिणाम लगता है।


Tuesday, 28 May 2013

लंदन में आतंकियों ने ब्रिटिश सैनिक का सिर कलम किया


 Published on 28 May, 2013 
 अनिल नरेन्द्र 
 ब्रिटेन में बुधवार को एक आतंकी हमले में दो हमलावरों ने एक ब्रिटिश सैनिक का सिर बेरहमी से काट दिया। यह हमला दक्षिण-पूर्वी लंदन के वुलविच के पास स्थित एक बैरक के नजदीक दिन दहाड़े दोपहर के 2 बजकर 20 मिनट पर हुआ। खबरों के अनुसार दो इस्लामिक आतंकियों ने हमले को अंजाम दिया। बाद में मौके पर पहुंचे पुलिस अधिकारियों ने हमलावरों पर गोलियां चलाईं जिससे वह घायल हो गए। पुलिस अधिकारियों का मानना है कि यह राजनीति  से पेरित इस्लामिक आतंकी हमला है। एक वीडियो में हमलावरों को अपने कृत्य को सही ठहराते हुए दिखाया गया है। घटना स्थल पर काफी संख्या में जमीन पर पड़े चाकू और खून दिखाई दे रहा था। जिस सैनिक पर हमला हुआ वह हेल्प फॉर हीरोज लिखी शर्ट पहने था। बीबीसी की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया कि  हमलावरों ने अल्ला हू अकबर के नारे लगाए। ब्रिटेन के पधानमंत्री डेविड कैमरन ने  इस सैनिक की हत्या को ब्रिटेन पर हमला और इस्लाम के साथ धोखा करार दिया है। उन्होंने कहा यह ब्रिटेन और यहां की जीवनशैली पर हमला भर नहीं है। यह इस्लाम और देश के विकास में बड़ा योगदान देने वाले मुस्लिम समुदाय के साथ धोखा भी है। इस्लाम में ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस नृशंस कर्म को जायज ठहराए। पता लगा है कि दोनों कातिल इस्लाम के समर्थन में नारे लगा रहे थे। मुस्लिम देशों से ब्रिटिश बलों की वापसी की मांग करते हुए वह कह रहे थे, हम अल्ला की कसम खाते हैं कि जब तक तुम लोग हमें अकेला नहीं छोड़ देते तब तक तुम्हारे खिलाफ लड़ाई जारी रखेंगे। गुरुवार को अपने निवास 10 डाउनिंग स्ट्रीट में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारियों से मुलाकात के बाद पधानमंत्री ने कहा कि ब्रिटेन कट्टरपंथ के खिलाफ अपने सख्त रुख पर कायम रहेगा। हम किसी भी सूरत में इस तरह की घटनाओं के आगे नहीं झुकेंगे। हम एकजुट होकर कट्टरपंथ की जहरीली विचारधारा  को चुनौती देकर आतंकवाद को मात देंगे। मृत सैनिक की पहचान हो चुकी है। इस सैनिक का नाम है ड्रमर ली गिरवी और वो द रायल बटालियन ऑफ फ्यूसिलियर्स के सैकेंड बटालियन में तैनात था। उसकी उम्र 25 साल थी और उसने अफगानिस्तान में भी अपनी सेवा दी थी। जिन दो हमलावरों ने सैनिक का सिर कलम किया उनमें से एक नाइजीरियाई मूल का ब्रिटिश नागरिक बताया जा रहा है। इसका नाम माइकल अदिबोलाजी है। 10 साल पहले वह कट्टरपंथी मुसलमान बन गया था। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसकी पहचान जाहिर नहीं कि गई है। एक ब्रिटिश रैपर ने सैनिक का सिर काटने वाली घटना को अपनी आंखों से देखा। उसने ट्विटर पर उसी वक्त इस घटना की आंखों देखी बयां कर दी। रैपर बोया डी ने लिखा ओह माई गॉड। अभी मेरी आंखों के सामने एक शख्स का सिर काट दिया गया। मैं दुकान पर फल-सब्जी खरीदने जा रहा था और तभी मैंने ऐसा होते हुए देखा। बोया ने वहां दो अश्वेत लोगों को अचानक कार से उतरते हुए देखा और उन्होंने एक शख्स का सिर काट दिया। इसके बाद उन्होंने रिवाल्वर निकालकर हवा में लहरानी शुरू कर दी। ब्रिटेन की स्काटलैंड यार्ड ने एक महिला समेत दो और लोगों को गिरफ्तार किया। अब तक इस मामले में चार लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। 
 

श्रीनिवासन साहब को इस्तीफा तो देना ही पड़ेगा कहीं यह गोरखधंधा जेल न दिखा दे?


 Published on 28 May, 2013 
 अनिल नरेन्द्र 
भारतीय  क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन की उलटी गिनती आरंभ हो चुकी है। उन्हें बचाने के लिए कोई बड़ा नेता भी आगे नहीं आ रहा। डूबते जहाज से सबसे पहले चूहे भागते हैं जबकि एनसीपी नेतृत्व सहित कई बड़े लोगों ने श्रीनिवासन पर इस्तीफे का दबाव बढ़ा दिया है। मुंबई की स्पेशल सेल भी श्रीनिवासन से पूछताछ के लिए तैयार है। कहा जा रहा है कि उनके दामाद गुरूनाथ मयप्पन ने गिरफ्तारी के बाद पूछताछ के दौरान कुछ ऐसे खुलासे किए हैं जिनकी वजह से ससुर जी भी शक के घेरे में आ गए हैं। हालांकि ससुर जी ने शनिवार को साफ कहा कि मुझे इस्तीफा देने के लिए कोई बाध्य नहीं कर सकता। कुछ लोग दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन मैंने कुछ गलत नहीं किया। हमारा अनुमान है कि न केवल श्रीनिवासन बल्कि बीसीसीआई से जुड़े कई दिग्गज जल्द ही धरे जाएंगे। इंतजार हो रहा है पूरी जांच पड़ताल होने का। बीसीसीआई कितनी बुरी पंस सकती है  शायद इसका अभी अंदाजा नहीं। गत सप्ताह मुंबई की अदालत में जांच अधिकारी पुलिस अफसर ने बताया कि पुलिस को शक है कि सट्टेबाजी से मिला सारा पैसा मुंबई से पहले दुबई जाता है, वहां से यह पाकिस्तान जाता है और पाकिस्तान में इस पैसे को आतंकी संगठनों में बांटा जाता है जिसका वह उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों में करते हैं। अगर यह सच है तो मामला बहुत संगीन हो जाता है, देशद्रोह का बन जाता है, आतंकियों को समर्थन, मदद करने का बन जाता है। सिर्प स्पॉट फिक्सिंग, मैच फिक्सिंग का नहीं रह जाता। पाकिस्तान तो जुड़ चुका है इस गोरखधंधे से। स्पॉट फिक्सिंग में कथित भूमिका के लिए पाकिस्तानी अम्पायर असद रऊफ पुलिस के जांच दायरे में हैं। पाकिस्तान किकेट बोर्ड के पमुख असरफ ने शुकवार को कहा कि उन्हें इस बात की जानकरी नहीं है कि पाकिस्तानी अम्पायर असद रऊफ आईपीएल फिक्सिंग पकरण जांच के दायरे में क्यों हैं और क्यों उन्हें आगामी चैम्पियंस ट्राफी किकेट टूर्नामेंट से हटाया गया है। आईसीसी ने हमें अब तक यह नहीं बताया कि क्यों हटाया गया है? स्पॉट फिक्सिंग में शुकवार को बॉलीवुड से जुड़े एक स्पॉट ब्वाय को गिरफ्तार किया गया। पुलिस सूत्रों के अनुसार इसके संबंध सुनील दुबई से हैं, जो दाउद के लिए काम करता है। मोहम्मद याहिया नाम का इस स्पॉट ब्वॉय को हैदराबाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया  है।  उसके संबंध राजस्थान रॉयल्य समेत कुछ अन्य टीमों के खिलाड़ियों से रहे हैं। पुलिस इसे भी सटोरियों व स्पॉट फिक्सिंग करने वाले खिलाड़ियों के बीच की अहम कड़ी बता रही है। याहिया के नाम का खुलासा गिरफ्तार सटोरिया व श्रीसंत के करीबी कहे जाने वाले चंद्रेश पटेल ने किया था। स्पॉट ब्वॉय 47 वर्षीय  मोहम्मद याहिया वही बंदा है जिसकी पुलिस को तलाश थी। यही है जो अंडरवर्ल्ड डान दाउद इब्राहिम के भाई अनीस इब्राहिम के मुख्य कर्ताधर्ता माने जाने वाले सुनील दुबई के गुर्गों के लिए काम करता था। श्रीनिवासन पर इस्तीफा देने का दबाव बढ़ता ही जाएगा। सुबह अगर शरद पवार के लोगों ने  इस्तीफा मांगा तो शाम होते-होते सहारा समूह के पमुख सुब्रत रॉय ने भी ऐसी ही बात कही। उन्होंने इस्तीफे के साथ-साथ चंद शर्तें भी जोड़ दां कि यदि श्रीनिवासन ने पद नहीं छोड़ा तो उनकी कंपनी टीम इंडिया को स्पांसर नहीं करेगी। सहारा आईपीएल से अपनी टीम पुणे वारियर्स को लीग से हटाने की पहले ही  घोषणा कर चुके हैं।  अंत में बता दें कि श्रीनिवासन के बेटे अश्विन ने क्या कहा? आखिर उन्होंने (श्रीनिवासन) ऐसा प्लेन क्यों खरीदा जिसमें बार-बार ईंधन भरवाने की जरूरत पड़ती है। वे ईंधन भरवाने के लिए दुबई ही क्यों रुकते हैं? कुवैत, शारजाह या और कहीं क्यों नहां? आखिर इतना शक्तिशाली व्यक्ति ईंधन भरवाने में चार-चार घंटे बर्बाद क्यों करता है? अश्विन ने यह भी कहा, गुरू (मयप्पन) के चेन्नई और दुबई के कई सट्टेबाजों से रिश्ते रहे हैं। आईपीएल शुरू होने से पहले कई  सट्टेबाजों के सम्पर्प में रहे हैं। कुल मिलाकर श्रीनिवासन साहब इस्तीफा तो देर-सवेर आपको देना ही पड़ेगा कहीं आपको यह गोरखधंधा जेल न पहुंचा दे?

Sunday, 26 May 2013

यूपीए-2 के चार साल का रिकार्ड ः डूबती साख, वक्त कम


 Published on 26 May, 2013 
 अनिल नरेन्द्र 
यूपीए सरकार ने बुधवार को सरकार की उपलब्धियों की रंगीन तस्वीर पेश करते हुए यूपीए-2 का रिपोर्ट कार्ड बड़ी धूमधाम से पेश किया। यूपीए-2 के चौथे वर्ष में पीएम और कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा जारी रिपोर्ट कार्ड में सरकार की तमाम उपलब्धियां, मनरेगा, खाद्य सब्सिडी और सोशल सेक्टर की योजनाओं के बारे में बताया गया है। अपनी-अपनी राय हो सकती है। चौथी सालगिरह मना रही यूपीए-2 सरकार की हमारी नजरों में जितनी उपलब्धियां हैं उससे कहीं ज्यादा उसने अपने खाते में अपयश कमाया है। चुनाव करीब आ रहा है और सरकार लोकप्रियता की बजाय लगातार जनाक्रोश से घिरती जा रही है। 2009 के लोकसभा चुनाव में खुद के 206 सांसदों की जीत के बलबूते कांग्रेस ने जोड़तोड़ कर यूपीए सरकार की इमारत बना ली। चुनावी जंग में कांग्रेस को मिलती सफलता को देखकर ही राजनीतिक पंडितों ने 2014 के चुनावी नतीजों का भी अनुमान लगा लिया। यूपीए सरकार की इन पंडितों ने तो तीसरी पारी भी तय कर दी है। मगर पिछले चार सालों में भ्रष्टाचार, घोटाले, महंगाई, सुस्त विदेश नीति, बिगड़ती कानून व्यवस्था, नीतिगत अपंगता और जन विरोधी आर्थिक सुधारों की फजीहत यूपीए सरकार की सबसे बड़ी पहचान बन गए हैं। नतीजतन यूपीए सरकार से उसके दो सबसे बड़े घटक दल द्रमुक और तृणमूल कांग्रेस ने पीछा छुड़ा लिया। यूपीए सरकार को चार साल हो गए हैं लेकिन इस सरकार का दुर्भाग्य यह है कि इसके बारे में आम राय यह बन चुकी है कि यह एक कमजोर सरकार है। आम जनता तो यह भी मानने लगी है कि यह सरकार नीतियों को पूरा नहीं कर सकती। 2009 की शानदार जीत के ठीक बाद ही इस यूपीए सरकार की फजीहत का सिलसिला शर्म-अल-शेख से शुरू हो गया। पाकिस्तान के साथ साझा बयान में बलूचिस्तान पर पहली बार उसको बढ़त देने से शुरू हुआ यूपीए का संकट, 2010 में 1.76 करोड़ रुपए के 2जी स्पेक्ट्रम के महाघोटाले का पर्दाफाश परवान चढ़ा। इसके बाद महंगाई का ग्रॉफ तेजी से बढ़ा। आम आदमी के लिए रोटी, कपड़ा और मकान का प्रबंध करना मुश्किल हो गया। यही नहीं खुद आर्थिक विशेषज्ञ मनमोहन सिंह उनकी विशेष आर्थिक टीम मोंटेक सिंह आहलूवालिया और सी. रंगाराजन ने देश की अर्थव्यवस्था को ही चौपट कर दिया। विकास दर साढ़े पांच फीसदी तक गिर गई। लाखों युवकों को नौकरियों से हाथ धोना पड़ा। फिर आया घोटालों का तूफान। भ्रष्टाचार को खत्म करने के तमाम दावे ठोंके गए मगर कोयला घोटाला, रक्षा सौदों में दलाली, हेलीकाप्टर अगस्ता सौदा और राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, आदर्श हाउसिंग, रेलवे घूसकांड जैसे एक के बाद एक घोटाले सामने आए। आर्थिक सुधारों पर ना-नुकुर करने के बाद सरकार ने खुदरा क्षेत्र में विदेशी  निवेश लाने की हिम्मत दिखाई तो ममता बनर्जी ने उससे नाता तोड़ लिया। कुछ महीने बाद श्रीलंका में तमिल लोगों की सुरक्षा के बहाने द्रमुक ने भी सरकार से नाता तोड़ लिया। संसद में अल्पमत का खतरा झेल रही सरकार सपा और बसपा की बैसाखी पर दिन काट रही है। इस लुंजपुंज सरकार पर आरोपों की लम्बी सूची है। सीबीआई के सहारे चार साल सत्ता में बने रहना सरकार की एकमात्र उपलब्धि मानी जा सकती है। शासन की नीतियों में अंतिम शब्द सोनिया गांधी का होता है प्रधानमंत्री का नहीं। मनमोहन सिंह जैसे हंसी, कटाक्ष और व्यंग्य के पात्र बने हैं वैसा आज तक कोई पीएम नहीं बना है। अनिर्णय, असमर्थता और चुप्पी के पर्याय बन चुके हैं प्रधानमंत्री। सीवीसी, निर्वाचन आयोग, मानवाधिकार आयोग के लिए यूपीए द्वारा नियुक्तियां विवादित हैं और संदेह के घेरे में हैं। पड़ोसियों के साथ इतने संकटपूर्ण रिश्ते कभी भी नहीं रहे। मालदीव जैसा छोटा देश भी आज भारत को आंखें दिखाने से बाज नहीं आ रहा। दिल्ली गैंगरेप के बाद सरकार पर महिलाओं और बच्चों के खिलाफ कड़ा कानून बनाया, मगर पांच महीने समाप्त होने पर भी दामिनी केस अभी अदालतों में ही फंसा है, सजा कब होगी कहा नहीं जा सकता। दिल्ली में बलात्कार के तमाम रिकार्ड टूट गए हैं और यह सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा। पाक के कूटनीतिक मोर्चे पर सरकार की विफलता का ताजा उदाहरण है पाक जेलों में भारतीय कैदियों की मौत व सीमा पर भारतीय जवानों का सिर काटकर ले जाना इस सरकार की नपुंसकता के ज्वलंत उदाहरण हैं। कांग्रेस का एक वर्ग खुलकर आज कह रहा है कि मनमोहन सिंह पार्टी और सरकार के लिए एक बोझ बन चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने Šजी से लेकर कोयला घोटाले तक प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका पर विपरीत टिप्पणियां की हैं। कांग्रेस के भीतर से कई बार ऐसी आवाजें भी आई हैं कि डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद पर अक्षम साबित हो रहे हैं और अब उन्हें अपने पद से हट जाना चाहिए। इसकी वजह से मनमोहन सिंह को बार-बार कांग्रेस से आक्सीजन लेनी पड़ती है। कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान इस कदर बढ़ गई है कि सत्ता के दो केंद्रों को अनुचित बताने संबंधी कांग्रेस के एक-एक महासचिव का बयान इसी का हिस्सा है। लोकसभा चुनाव से पहले इस आखिरी साल में सत्तारूढ़ दल कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती आज पिछले नौ वर्षों में तार-तार हुई छवि को सुधारना है। भ्रष्टाचार, महंगाई और कुशासन को लेकर यूपीए के दूसरे कार्यकाल में सरकार और पार्टी की छवि पर जो धब्बा लगा है, उससे न केवल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की साख पर बट्टा लगा है बल्कि कांग्रेस पार्टी की सम्भावनाओं को धूमिल करने का काम भी किया है। पार्टी के एक महासचिव के अनुसार नौ साल की उपलब्धियों पर कुछ बड़े घोटालों ने पानी फेरने का काम किया है। उनके अनुसार सबसे बड़ी चुनौती देश की जनता के मन पर घर कर चुकी उस छवि को धोने की है जिससे यह संदेश जा रहा है कि भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस नेतृत्व और प्रधानमंत्री गम्भीर नहीं हैं। प्रधानमंत्री के बारे में कहा जा रहा है कि वह टाइम पास कर रहे हैं जितने दिन और चल जाएं चलते रहें। उन्हें पार्टी की कतई चिन्ता नहीं है। बार-बार राहुल गांधी को सरकार का नेतृत्व सम्भालने का अनुरोध पास नहीं हो रहा है। पार्टी और इस सरकार की खुशकिस्मती यह है कि विपक्ष बंटा हुआ है और भाजपा अभी भी जनता में यह विश्वास नहीं बिठा सकी कि वह कांग्रेस का स्वाभाविक विकल्प है पर यह स्थिति तेजी से बदल रही है। नरेन्द्र मोदी और राजनाथ सिंह की जोड़ी ने माहौल अपने पक्ष में करने के लिए जी-जान लगा रखी है। कांग्रेस और सरकार के पास सब ठीक-ठाक करने के लिए समय कम है। जल्द उन्हें प्रभावी कदम उठाने होंगे।

Saturday, 25 May 2013

बहू घर की नौकरानी नहीं है


 Published on 25 May, 2013 
 अनिल नरेन्द्र 
 दहेज मामलों में कानून सख्त बनाने के बावजूद दहेज हत्याओं में कमी नहीं आ रही। इससे पति के परिवार वालों पर कभी-कभी गलत दबाव बनाने की रिपोर्टों के बारे में अखबारों में पढ़ते हैं। कुछ लोगों के लिए यह एक ब्लैकमेलिंग का हथियार बन गया है। आवश्यकता इस बात की है कि बहुओं को ससुराल में शुरू से ही वह इज्जत मिले जिसकी वह हकदार है। अगर मियां-बीवी में कोई गम्भीर मतभेद हैं तो वर्षों से सुलट नहीं सके तो कानून उन्हें तलाक की इजाजत देता है। उसकी कानूनी प्रक्रिया है जिसे दोनों को मानना पड़ेगा पर जो बात काबिले बर्दाश्त नहीं है वह है रोज-रोज बहू को अपमानित करना, प्रताड़ित करना। यह प्रसन्नता की बात है कि देश की सर्वोच्च अदालत ने इस मुद्दे को गम्भीरता से लिया है। देश में बहुओं को जलाने, प्रताड़ित करने और आत्महत्या करने पर मजबूर करने में वृद्धि से सुप्रीम कोर्ट चिंतित है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि बहू से नौकरानी नहीं बल्कि परिवार के सदस्य के रूप में व्यवहार किया जाना चाहिए और उसे किसी भी वक्त उसके वैवाहिक घर से बाहर नहीं निकाला जा सकता है। अदालत ने कहा है कि बहू का ससुराल में सम्मान होना चाहिए क्योंकि वह सभ्य समाज की संवेदनाओं को परिलक्षित करता है। न्यायमूर्ति एसके राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति दीपक मिश्र की खंडपीठ ने कहा कि बहू से एक अनजान व्यक्ति के रूप में बेरुखी की बजाय गर्मजोशी और स्नेह के साथ परिवार के सदस्य के रूप में व्यवहार किया जाना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि बहू से घर की नौकरानी जैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। ऐसा आभास भी नहीं किया जाना चाहिए कि उसे किसी भी समय ससुराल से बाहर निकाला जा सकता है। न्यायाधीशों ने कहा कि ससुराल में बहू के सम्मान से विवाह की  पवित्रता और धार्मिक क्रिया की गरिमा बनी रही है, यह सभ्य समाज की संवेदनशीलता को परिलक्षित करती है जो अंतत उसके मंगलमय जीवन का  प्रतीक है। लेकिन कभी-कभी बहू के प्रति घर में पति, ससुराल के सदस्यों और रिश्तेदारों का व्यवहार समाज में भावनाओं को संज्ञाशून्यता का अहसास कराती है। शीर्ष अदालत ने पत्नी को प्रताड़ित करने के जुर्म में पति को पांच साल की कैद की सजा सुनाते हुए यह टिप्पणियां कीं। पति की प्रताड़ना से परेशान होकर पत्नी ने आत्महत्या कर ली थी। अदालत ने कहा, यह चिन्ता का विषय है कि कई मामलों में बहुओं से बहुत बेरहमी का व्यवहार किया जाता है। जिसकी वजह से उनकी जीने की इच्छा ही मर जाती है। जजों ने कहा, यह बेहद चिन्ता का विषय है कि कई मामलों में दहेज की मांग और लोभ के कारण बहुओं को जला दिया जाता है या फिर शारीरिक और मानसिक यातनाओं के कारण उसके जीवन की खुशियों को बुझा दिया जाता है। कई बार तो कूरता और यातनाओं के कारण हताश होकर बहुएं आत्महत्या कर लेती हैं।

विनोद राय ने टीएन शेषन की याद ताजा कर दी


 Published on 25 May, 2013 
 अनिल नरेन्द्र 
 नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) के पद पर साढ़े पांच साल रहने के बाद विनोद राय बुधवार को रिटायर हो गए। नए कैग नियुक्त शशिकांत शर्मा ने गुरुवार को अपना कार्यभार सम्भाल लिया। श्री विनोद राय का कार्यकाल कुछ-कुछ पिछली सदी के आखिरी दशक में मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषन के कार्यकाल की याद दिलाता है। टीएन शेषन ने चुनाव आयोग को ताकतवर बनाने में अगर ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी तो भ्रष्टाचार के खिलाफ सिविल सोसायटी के सक्रिय होने के इस दौर में विनोद राय ने कैग को एक पारदर्शी और जिम्मेदार संस्था बनाने में पूरी ताकत झोंक दी। उन्होंने साबित कर दिया कि कैग एक सरकारी पिछलग्गू संस्था नहीं है और न ही कैग सरकारी खर्च के ऑडिट करने वाली एक संस्था बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग के बारे में देश को बताने का अधिकार जो उसे संविधान ने दिया है, को पूरा करेगी। तभी तो कैग के अब तक के इतिहास में यह पहली बार था जब 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन से लेकर कोल ब्लॉक आवंटन जैसे कई मामलों में उसकी शुरुआती रिपोर्टों ने न सिर्प सरकार के भ्रष्टाचार की पोल खोली बल्कि कई मंत्रियों को जाना भी पड़ा। देश के इस वक्त लोकतंत्र के विविध स्तम्भों व संवैधानिक पदों की जिम्मेदारियों और उनके दायरों को लेकर व्यापक विमर्श चल रहा है। कोलगेट की जांच में सरकारी दखल को लेकर सामने आए तथ्य इसका आधार बने। इसी बीच केयर्न-वेदांता करार पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा टिप्पणी की गई है कि किसी विषय पर कैग की रिपोर्ट अंतिम सत्य नहीं है। हालांकि संबंधित बैंच ने यह भी कहा कि कैग की रिपोर्ट को दरकिनार भी नहीं किया जा सकता। यह लोक लेखा समिति के ऊपर है कि वह कैग की आपत्तियों को स्वीकार करे या खारिज करे। गौरतलब है कि विनोद राय हाल के समय में यूपीए सरकार द्वारा बार-बार निशाने पर लिए जाते हैं। खासकर Šजी स्पेक्ट्रम मामले और कोयला आवंटन में भारी-भरकम नुकसान के कैग के आंकड़े पर सत्तापक्ष को हमेशा आपत्ति रही है। कभी कैग को शून्य बढ़ाने का आदी बताया गया तो कभी उसकी तुलना एक मुनीम से की गई। ऐसे में पूरी आशंका है कि सरकारी पक्ष के प्रवक्ताओं द्वारा शीर्ष अदालत की ताजा टिप्पणी के चुनिन्दा अंश का इस्तेमाल कैग की विश्वसनीयता को कम करने के लिए किया जाए। हालांकि सच्चाई यह है कि कैग द्वारा जिस किसी मामले में भी नुकसान के आंकड़े दिए गए, उसमें संशोधन और सुधार की गुंजाइश को भी सदैव रेखांकित किया गया। बहरहाल पहले तीन से चार साल में जारी होने वाली कैग रिपोर्टें विनोद राय के समय में सिर्प पांच से छह महीने में आने लगीं बल्कि इन्हें पाठकों के अनुकूल बनाया गया ताकि लोग समझ सकें कि सरकारी धन का खर्च किस तरह से हो रहा है। सरकारी धन के दुरुपयोग को बताने के लिए इन रिपोर्टों में अनुमानित क्षति की अवधारणा को पहली बार शामिल किया गया तो इसकी वजह यही है। कैग की कार्य संस्कृति में आए इस बदलाव के कारण ही पहली बार उसे संयुक्त राष्ट्र की कई संस्थाओं का ऑडिट करने का मौका मिला। विनोद राय ने इस संस्था को जिस ऊंचाई पर छोड़ा है शशिकांत शर्मा को न केवल उस ऊंचाई को बरकरार रखना होगा बल्कि और ऊपर ले जाना होगा।


Friday, 24 May 2013

लोकायुक्त रिपोर्ट में बसपा मुश्किल में तो दुविधा में सपा



 Published on 24 May, 2013 
 अनिल नरेन्द्र 
उत्तर प्रदेश में अगर पूर्व बसपा की सरकार मुश्किल में आ गई है तो मौजूदा अखिलेश यादव की सरकार की भी दुविधा बढ़ गई है। मायावती सरकार के दौरान दलित स्मारकों के खर्चे की जांच कर रहे लोकायुक्त ने बीएसपी कद्दावर नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी सहित 19 लोगों के खिलाफ एफआईआर लिखाने की सिफारिश की है। उल्लेखनीय है कि मायावती ने 2007 से 2012 के अपने कार्यकाल में लखनऊ और नोएडा में कई स्मारक बनवाए थे। इनके निर्माण के दौरान पैसे के दुरुपयोग का आरोप लगा। चुनावों से पहले समाजवादी पार्टी ने दावा किया कि उनकी पार्टी सत्ता में आई तो मामले की जांच होगी। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने स्मारकों के निर्माण के लिए पिंक स्टेडियम की सप्लाई की धांधली के आरोपों की जांच लोकायुक्त से कराने के आदेश दिए थे। उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा ने स्मारकों के निर्माण में 14 अरब 88 करोड़ रुपए का घोटाला उजागर किया है। दो पूर्व मंत्रियों के अलावा 199 को जिम्मेदार पाया है। दोनों पूर्व मंत्रियों नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा, निर्माण निगम के तत्कालीन एमडी सीपी सिंह, भू-वैज्ञानिक एसए फारुकी और 15 इंजीनियरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाकर विवेचना और अन्य के खिलाफ विवेचना के बाद एफआईआर की संस्तुती की है। जांच का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि स्मारकों के लिए धन आवंटन से लेकर निगरानी तक के कार्य में लगे रहे किसी भी आईएएस अधिकारी को दोषी नहीं पाया गया है। तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती को भी क्लीन चिट दे दी गई है। अखिलेश सरकार अभी यह तय नहीं कर पाई है कि उसे लोकायुक्त की सिफारिश मंजूर करनी चाहिए या फिर कानूनी राय लेने की आड़ में इसे ठंडे बस्ते में डालना चाहिए। वह कार्रवाई करने से पहले इस खतरे की टोह लेना चाह रही है कि कहीं इससे बीएसपी के पक्ष में कोई सहानुभूति तो पैदा नहीं हो सकती? खासतौर पर वह यह देखना चाहती है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी को जेल भेजने पर मुस्लिम वोटर उसे किस तरह लेते हैं? दूसरे आरोपी कुशवाहा की इतनी समस्या नहीं है, क्योंकि मायावती सरकार में खनन मंत्रालय का यह मंत्री इस समय एनआरएचएम घोटाले के मामले में डासना जेल में बन्द है। उधर लोकायुक्त की रिपोर्ट आने के बाद बीएसपी ने आक्रामक रुख दिखाया है और सड़क पर उतर आने व सरकार के खिलाफ संघर्ष का ऐलान कर दिया है। अखिलेश सरकार के कोर ग्रुप को सोचने पर मजबूर होना पड़ा है। कोर ग्रुप को लगता है कि अगर नसीमुद्दीन सिद्दीकी एण्ड कम्पनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराकर गिरफ्तारी करा दी जाती है तो कहीं यह दांव उलटा न पड़ जाए। नसीमुद्दीन के खिलाफ कार्रवाई से एसपी को मुसलमानों की नाराजगी का खतरा सताता रहता है। उसी खतरे को देखते हुए नसीमुद्दीन के खिलाफ आमदनी से ज्यादा प्रॉपर्टी के मामले में जब लोकायुक्त ने सीबीआई से जांच कराने की सिफारिश की थी तो उसे यूपी सरकार ने मंजूर नहीं किया था। बीएसपी के लिए मुश्किल यह है कि भ्रष्टाचार के आरोप में कई नेता जेल में बन्द हैं। अगर ताजा कार्रवाई होती है तो उसके दामन पर बदनामी का दाग कहीं और परेशानी का सबब न बन जाए।

और अब बॉलीवुड से जुड़े आईपीएल फिक्सिंग घोटाले



 Published on 24 May, 2013 
 अनिल नरेन्द्र 
 इंडियन फिक्सिंग लीग में जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे फिक्सरों के नाम जुड़ते जा रहे हैं। पैसा और ग्लैमर के आईपीएल में भले बॉलीवुड कैसे पीछे रह सकता है। अब बॉलीवुड के कनेक्शन के रूप में मशहूर पहलवान रुस्तम-ए-हिन्द रह चुके स्वर्गीय दारा सिंह के सुपुत्र बिग बॉस रिएलिटी शो के विजेता बिन्दु दारा सिंह (वीरेन्द्र रंधावा) का नाम जुड़ गया है। बिन्दु पर पुलिस ने धोखाधड़ी के आरोपों में आईपीसी की धाराओं 420, 465 के तहत मामला दर्ज किया है। पुलिस के मुताबिक बिन्दु सट्टेबाजों ज्यूपिटर, रमेश व्यास, पवन जयपुर, अनीस आदि के सम्पर्प में था। वह खुद भी सट्टा लगाता था। पुलिस ने दावा किया कि  उनके पास बिन्दु के खिलाफ पुख्ता सबूत हैं। खुद बिन्दु ने भी अपना गुनाह कबूल किया है। हमने उनका एक लैपटॉप, मोबाइल फोन और एक डायरी जब्त की है। मुंबई पुलिस के ज्वाइंट कमिश्नर हिमांशु राय ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि बिन्दु सक्रिय तौर पर सट्टेबाजी के सम्पर्प में था। बिन्दु को अभिनेता शाहरुख का भी करीबी माना जाता है। दक्षिण अफ्रीका में 2009 में हुए आईपीएल के दौरान शाहरुख का सभी पार्टियों का आयोजन बिन्दु के जिम्मे था। इस साल के आईपीएल में 6 अप्रैल को चेन्नई-मुंबई मैच के दौरान चेन्नई में धोनी की पत्नी के साथ मैच देखते हुए बिन्दु की फोटो भी सभी अखबारों में छपी है। बिन्दु को उनके पिता दारा सिंह ने 1994 में `करण' नाम की फिल्म से लांच किया था पर वह फिल्म उस साल की सबसे बड़ी फ्लॉप फिल्म साबित हुई थी। इसके बाद उसने कई फिल्मों में छोटे-मोटे रोल किए और उसका कोई खास नोटिस नहीं लिया गया। खासकर बिन्दु ने सन ऑफ सरदार, कमबख्त इश्क, हाउस फुल आदि में एाक्टिंग की। उसके पर्दे के कैरियर का सबसे सफल चैप्टर बिग बॉस तीन 2009 में विजेता होना माना जा सकता है। बिन्दु ने पहली शादी तब्बू की बहन फरहा से की थी। उसने दूसरी शादी दीना  अमारोवा से की है। पुलिस को बिन्दु पर शक तब हुआ जब गत 13 मई को क्राइम ब्रांच ने रमेश व्यास  नाम के बुकी को गिरफ्तार किया था। पुलिस के अनुसार रमेश बुकीज और खिलाड़ियों के बीच की कड़ी का काम करता था। रमेश मुंबई के कालबादेदी इलाके में एक इंटरनेशनल टेलीफोन एक्सचेंज चलाता था, जिसमें से 92 मोबाइल फोन और 18 सिम कार्ड बरामद हुए। उसी की मदद से वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर के बुकीज के सम्पर्प में था। पुलिस के अनुसार बिन्दु पर सबसे प्रमुख आरोप यह है कि उसने स्पॉट फिक्सिंग की जांच के दौरान दो प्रमुख बुकीज को भारत से बाहर दुबई भगाने में मदद की थी। पुलिस इन दो बुकीज संजय छाबड़ा और उसके भाई पवन छाबड़ा को पकड़ने ही वाली थी पर बिन्दु ने उनकी दुबई की टिकट की व्यवस्था की और 16 मई को दोनों दुबई भाग निकले। इस बात का पता तब चला जब पुलिस ने मुंबई एयरपोर्ट पर भागने की कोशिश कर रहे एक और बुकी प्रेम तरनेजा को एकदम प्लेन पर चढ़ने से पहली ही पकड़ लिया था। प्रेम से पूछताछ में खुलासा हुआ कि बिन्दु ने ही संजय और पवन को भारत से भगाने में मदद की थी, बिन्दु दारा सिंह की गिरफ्तारी से यह आशंका पुख्ता हो रही है कि ग्लैमर के व्यवसाय से जुड़े लोग भी इस फिक्सिंग के काले गोरखधंधे में शामिल हैं। आईपीएल क्रिकेट के नाम पर यह जो सारा मामला हुआ है उससे तो यही आभास होता है कि इसमें सब कुछ पाक-साफ नहीं है।  बेशक आईपीएल में भाग ले रहे तमाम क्रिकेटर फिक्सिंग में शामिल न हों, क्रिकेट के इस त्वरित संस्करण ने कई युवा प्रतिभाओं को सामने लाने का काम किया है, लेकिन एक सच यह भी है कि आईपीएल के हिस्से में बदनामी ही ज्यादा आई है और इसके लिए काफी हद तक भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ही जिम्मेदार है, जो आईपीएल के जरिए अपना खजाना भरने में तो लगा रहा लेकिन काले धंधे का सच न तो कभी खुद उजागर किया बल्कि काले धंधे का सच सामने आने के बाद उसने हाथ खड़े कर लिए हैं।

Thursday, 23 May 2013

आखिर कैसे होगा तोता पिंजरे से आजाद



 Published on 23 May, 2013 
 अनिल नरेन्द्र 
सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद अंतत केंद्र सरकार ने सीबीआई को स्वायत्तता देने और बाहरी दबाव से बचाने वाला नया कानून बनाने के उद्देश्य से एक मंत्रियों के समूह के गठन का फैसला किया है। इस जीओएम का गठन वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम करेंगे। आमतौर पर इस प्रकार के मंत्रियों के समूह या जीओएम का गठन तब होता है, जब मान लिया जाता है कि मामले को लम्बे वक्त तक ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए। सरकार को 10 जुलाई की सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट में पेश होना है इससे पहले इस कानून का मसौदा अदालत में पहुंच जाना चाहिए। लिहाजा डेढ़ महीने में तस्वीर साफ हो जाएगी कि मसौदे में क्या-क्या बिन्दु शामिल किए जाते हैं। देश की इस सर्वोच्च जांच एजेंसी के राजनीतिक दुरुपयोग की कहानी लम्बी है। यह आम धारणा है कि जो पार्टी केंद्र की सत्ता में होती है, अपने लोगों को बचाने और अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को फंसाने के लिए सीबीआई का इस्तेमाल करने से बाज नहीं आती पर जैसा पिछले दिनों के घटनाक्रम में देखने को मिला है कि इस यूपीए-2 सरकार ने तो सारी हदें पार कर दीं। यहां तक कि एजेंसी से सुप्रीम कोर्ट तक में झूठा हलफनामा दिलवा दिया। अब यह ग्रुप ऑफ मिनिस्टर क्या करता है देखना बाकी है। सवाल यह है कि क्या अब इस एजेंसी को लेकर लोकपाल बिल में किए गए प्रावधानों को छोड़ दिया जाएगा? या जीओएम इस बारे में लोकपाल बिल के प्रावधानों का ही जिक्र संसद में कर बिल पास कराने की तैयारी का हवाला देगी? या कुछ मिलाजुला रूप सामने आएगा? सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को राजनीतिक दखल से बचाने के लिए प्रभावशाली कानून बनाने के लिए एक तरह से कहा है, तो क्या पिंजरे में बन्द तोते की आजादी के लिए अलग से कारगर कानून बन पाएगा? जीओएम में चिदम्बरम अध्यक्ष हैं, कमेटी में अन्य सदस्य हैं विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद, दूरसंचार व कानून मंत्री कपिल सिब्बल, गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे और पीएमओ के राज्यमंत्री वी. नारायणस्वामी। सीबीआई के निदेशक इस समूह के विशेष आमंत्रित सदस्य बनाए गए हैं। सीबीआई प्रमुख रंजीत सिन्हा ने एक हिन्दी दैनिक पत्र को विशेष साक्षात्कार में कहा कि केंद्रीय एजेंसी को स्वतंत्र कहना सबसे बड़ा झूठ है। उनका कहना है कि इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि सीबीआई सरकारी तंत्र की गिरफ्त में है। सिन्हा सीबीआई के पहले ऐसे निदेशक हैं जिन्होंने इतनी बेबाकी से इस सच को स्वीकारा है। सिन्हा उस दिन का बेताबी से इंतजार कर रहे हैं जब 2010 से धूल खा रहा सीबीआई एक्ट कड़े संशोधनों के साथ कानून की शक्ल लेगा। इस प्रावधान में एजेंसी को स्वायत्त बनाने के कई बड़े फैसले लिए गए हैं। रंजीत सिन्हा की मानें तो सीबीआई को पूरी तरह से खुला छोड़ना भी खतरे से खाली नहीं है। सिन्हा ने कहा कि भले ही वह सीबीआई को पूरी तरह स्वतंत्र और स्वायत्त बनाने की कोशिश में हैं लेकिन सीबीआई के लोग पूर्ण स्वतंत्रता मिलने पर दुरुपयोग शुरू कर देंगे। इस खतरे को दूर करने के लिए सिन्हा ने अपने उच्च अधिकारियों से उपाय सुझाने को कहा है। उधर भारतीय जनता पार्टी ने पूरे मामले को धूल झोंकने वाला कदम बताया है। भाजपा ने कहा है कि जब इस मामले में पहले ही सिलेक्ट कमेटी अपनी सिफारिशें दे चुकी है तो ऐसे में जीओएम बनाने की क्या तुक है? सीबीआई को स्वतंत्र करने के मामले में लोकपाल बिल के दौरान काफी चर्चा हो चुकी है। इस मामले में संसद की सिलेक्ट कमेटी ने भी जो सिफारिशें दी हैं उन्हें कैबिनेट भी मंजूर कर चुकी है। सवाल सरकार की नीयत का है, जीओएम पता नहीं क्या नए सुझाव देगी? कटु सत्य तो यह है कि अब जनता भी चाहती है कि सीबीआई स्वायत्त हो और सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्त रुख अख्तियार कर लिया है, तो ऐसा लगता है कि सीबीआई की स्वायत्तता के लिए कानून बनाने से सरकार बच नहीं सकती। देर-सवेर उसे कुछ ठोस करना ही पड़ेगा। इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि सीबीआई आर्थिक दृष्टि से भी केंद्र सरकार के रहमोंकरम पर न निर्भर रहे। वह अपने यहां आईपीएस अफसरों की नियुक्ति के लिए गृह मंत्रालय पर निर्भर है, कोष और अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए कार्मिक मंत्रालय पर। जांच, मुकदमे और अन्य खर्चों के लिए वह वित्त मंत्रालय पर आश्रित है। मुकदमे की पैरवी के लिए विशेष वकील की नियुक्ति कानून मंत्रालय करता है। आरोपी अगर आला नौकरशाह या रसूख रखने वाला राजनीतिक हो, तो जांच शुरू करने और मुकदमा चलाने के लिए सरकार की मंजूरी की बाट जोहनी पड़ती है। कुछ मामलों में यह इंतजार लम्बा होता है और अधिकतर में मंजूरी ही नहीं मिल पाती। सीबीआई के लगभग सभी श्रेणियों के ढेर सारे पद खाली हैं। रिक्त पदों को समय से नहीं भरे जाने के कारण सीबीआई की कार्यक्षमता पर बुरा असर पड़ रहा है। आने वाले कानून से उम्मीद करते हैं कि उक्त कमियों को ध्यान में रखते हुए ऐसे प्रावधान अवश्य होने चाहिए जिनसे कि सीबीआई को इन निर्भरताओं से निजात मिल सके। अगर ऐसा कानून बनता है तो यह हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बड़ी जीत होगी। सरकार से कहीं ज्यादा उम्मीदें हमें सुप्रीम कोर्ट से हैं।

मोदी का दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से तय होगा



 Published on 23 May, 2013 
 अनिल नरेन्द्र 
 यदि अभी आम चुनाव हों तो यूपीए की हार तय है। प्रधानमंत्री पद की दौड़ में भाजपा नेता नरेन्द्र मोदी कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से काफी आगे हैं। मोदी को 36 फीसदी तो राहुल को 12 फीसदी लोग प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। यूपीए की सरकार धीरे-धीरे अपनी जमीन खोती जा रही है और इसकी सबसे बड़ी वजह है महंगाई और भ्रष्टाचार का बढ़ता जाना। लेकिन दोनों गठबंधनों के वोट प्रतिशत में बड़ा अन्तर नहीं पड़ेगा। सर्वे के मुताबिक 27 फीसदी लोग एनडीए को वोट देंगे जबकि यूपीए को 26 प्रतिशत वोट मिलेंगे। सर्वे करने वाली संस्था नीलसन और एक समाचार चैनल एपी न्यूज के हालिया सर्वे के आधार पर यह दावा किया गया है। नीलसन का दावा है कि 21 राज्यों के 152 लोकसभा क्षेत्रों में 33 हजार लोगों से सवाल पूछे गए। सर्वे एक मई से 10 मई के बीच किया गया। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014  के लोकसभा चुनाव के लिए अपनी गोटियां फिट करनी शुरू कर दी हैं। मोदी की प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं। दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से बन रहा है। मोदी ने अपने खासमखास अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी नियुक्त कराया है। शाह को यूपी का प्रभारी बनाए जाने पर भाजपा नेताओं ने खुशी जताई तो कामरेडों ने कहा कि भाजपा इस सूबे को फिर से सांप्रदायिक ताकतों के हवाले करने जा रही है। अमित शाह को प्रभारी बनाए जाने का राजनीतिक संदेश साफ है। एक तरफ सपा और बसपा जातीय सम्मेलन कर रहे हों और दूसरी तरफ भाजपा मजहबी गोलबंदी में जुट जाए तो आगामी लोकसभा में सबसे बड़ा दंगल होना तय है। भाजपा आलोचकों का कहना है कि राजनाथ सिंह के नेतृत्व में भाजपा उत्तर प्रदेश में फिर से राजनीतिक ध्रुवीकरण का बड़ा दांव खेलना चाहती है। इस रणनीति के तहत पहले वरुण गांधी को आगे किया गया, फिर गुजरात में नाम कमा चुके अमित शाह को प्रभारी बना दिया गया। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न देने की शर्त पर कहा कि राजनाथ सिंह और नरेन्द्र मोदी के बीच जो राजनीतिक समझौता हुआ है यह उसी का नतीजा है। मोदी को पता है कि बिना उत्तर प्रदेश के दिल्ली तक कोई रास्ता नहीं जा सकता है, इसलिए उन्होंने उत्तर प्रदेश की कमान अप्रत्यक्ष रूप से सम्भाल ली है। अमित शाह के आते ही जो संदेश भाजपा ने दिया है उसका असर जल्द दिखने लगेगा। शाह ने भाजपा के आंदोलन के तहत 29 मई को गिरफ्तारी के लिए सपा के तेज-तर्रार नेता और संसदीय कार्यमंत्री आजम खान के गढ़ रामपुर  को चुना है। शाह के खान के गृह शहर रामपुर से उत्तर प्रदेश के दौरे की शुरुआत से यह संदेश जाना शुरू हो गया है कि आगामी लोकसभा चुनाव में वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है, क्योंकि आजम खान का मुसलमानों में खासा प्रभाव माना जाता है जबकि शाह का गुजरात दंगों में नाम उभरकर आया था। हाल ही में खान ने भाजपा नेताओं को संयम बरतने की चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि भाजपा नेताओं को समझना होगा कि यह गुजरात नहीं  बल्कि उत्तर प्रदेश है। सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने भी कहा था कि यूपी में मोदी फैक्टर काम नहीं करेगा, क्योंकि यहां की जनता बाहरी लोगों को स्वीकार नहीं करती। भाजपा ने अमित शाह को यूपी राज्य का प्रभारी बनाकर एक तीर से कई निशाने साधते हुए यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह हिन्दुत्व के मुद्दे पर अभी पूर्व की तरह डटी हुई है। उत्तर प्रदेश की  मौजूदा राजनीति में बसपा और सपा मुख्य मुकाबले की पार्टियां हैं पर मजहबी गोलबंदी हुई तो सपा से ज्यादा नुकसान बसपा को हो सकता है। यूपी पुलिस का भी मानना है कि मजहबी गोलबंदी से सूबे में कानून व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। लोकसभा चुनाव से पहले अयोध्या, फैजाबाद से लेकर पूर्वांचल तक टकराव के हालात बन सकते हैं। अमित शाह की राजनीतिक शुरुआत अगर रामपुर से हो रही है तो भाजपा या मोदी की राजनीति के अगले कदम का अंदाजा लगाया जा सकता है।

Wednesday, 22 May 2013

मनमोहन-ली वार्ता का कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला



 Published on 22 May, 2013 
 अनिल नरेन्द्र 
 चीन के नए प्रधानमंत्री ली केकियांग पहली बार विदेश के दौरे पर निकले हैं और इसका आरम्भ उन्होंने भारत से किया है। खास बात है कि चीनी प्रधानमंत्री वर्तमान यात्रा को 27 वर्ष पूर्व की उस याद से जोड़ते दिखते हैं जब वह अपने देश के एक युवा प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई करते यहां आए थे। अमर प्रेम की गाथा सुनाने वाला ताजमहल आज भी उन्हें भावनाओं में बहा रहा है। लगता है कि चीन के प्रधानमंत्री ली केकियांग महज भारत की नब्ज टटोलने के इरादे से यहां आए हैं। ली की यात्रा को उनका देश ऐसे प्रचारित कर रहा था मानो वह रिश्तों का नया आयाम रचने की तैयारी में हैं। लेकिन जब दोनों प्रधानमंत्री दुनिया के सामने बातचीत का ब्यौरा लेकर आए तो इनमें सपाट बयानबाजी से अधिक कुछ नजर नहीं आया। बेशक चन्द समझौतों पर हस्ताक्षर हुए और दुनिया की दो सबसे बड़ी आबादियों को नेतृत्व देने वाले दोनों राजनेताओं ने शांति और सद्भाव के रास्ते विकास के वादे भी दोहराए। लेकिन इस अत्यंत महत्वपूर्ण मुलाकात का लम्बित विवादों के सन्दर्भ में नतीजा क्या रहा? चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग और भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच हुई शिखर वार्ता बेहद महत्वपूर्ण जरूर है क्योंकि एक ने अपने कार्यकाल के शुरुआत में इस शिखर वार्ता में हिस्सा लिया जबकि दूसरे ने अपने कार्यकाल की समाप्ति पर। दोनों पक्ष दिल पर हाथ रखकर भले ही दावा कर रहे हैं कि वार्ता का दौर `ऑल इज वेल' रहा है किन्तु सच तो यह है कि भारत के लिए यह वार्ता कितनी वेल रही, यह तथ्य एक बहुत बड़े सवाल के घेरे में है। यह सच है कि दोनों देशों के बीच आठ समझौतों पर हस्ताक्षर हुए और दावा किया गया कि शीर्ष वार्ता सफल रही किन्तु भारत ने इस वार्ता के दौरान न तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के सन्दर्भ में चीन का पक्ष जानने की कोशिश की और न ही भारतीय परमाणु विकास के सन्दर्भ में कोई आश्वासन। यही नहीं, भारतीय पक्ष ने इस शिखर वार्ता में चीनी पक्ष के सामने इस चिन्ता का इजहार भी नहीं किया कि वह पाकिस्तान को जो परमाणु और सैन्य सहायता दे रहा है उसका सीधा प्रहार भारत के खिलाफ ही करेगा, इसलिए पाकिस्तान को सैन्य सहायता तो समझ में आती है पर परमाणु रिएक्टर बनाने में मदद आजाद कश्मीर में चीनी सैनिकों की गतिविधियों पर एक शब्द न कहना हमारी समझ से तो बाहर है। इस अत्यंत महत्वपूर्ण मुलाकात का लम्बित विवादों के सन्दर्भ में नतीजा आखिर क्या रहा? क्या हम चीन को सहमत कर पाए कि सीमा विवाद को समयसीमा में बांधते हुए इसका स्थायी समाधान निकालने की गम्भीर पहल की जाए? क्या हमारे पड़ोसी को घुसैपठ की गलती समझ में आई? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो जरूर कहा कि इस घटना से दोनों देशों ने सबक लिया है और पुनरावृत्ति न हो इसके लिए विशेष प्रतिनिधि स्तरीय वार्ता पर सहमति बनी है। लेकिन ऐसी सहमति  तो पहले भी बनी थी और समाधान के तरीके भी निकाल लिए गए थे। फिर वे क्यों फेल हो गए और नया तरीका सफल रहेगा इसकी क्या गारंटी है? हर बार की तरह इस बार भी चीन की तरफ से सीमा विवाद को ऐसी ऐतिहासिक समस्या बता दिया गया जिसका हल निकालना मानो किसी तिलस्मी किले को फतह करना जैसा पेचीदा है। मामला सिर्प सीमा का ही नहीं है। चीन ब्रह्मपुत्र नदी को बांध कर भारत के बड़े हिस्से में तबाही का इंतजाम कर रहा है। भारत बार-बार चीन से अपनी चिन्ता के निराकरण की मांग करता रहा है पर चीन अपने इरादों पर अडिग है। एक और अन्य गम्भीर मामला है सीमा पर चीन की रक्षा तैयारियों का। चीन डेढ़ दशक से सीमा पर सड़कें, रेलमार्ग और एयरपोर्ट के जाल बिछा रहा है। अपने सैनिकों और भारी हथियारों को वह पलक झपकते हमारी सीमा तक पहुंचा सकता है। जब हमने जवाबी तैयारी शुरू की है तब वह आंखें तरेर रहा है। इस संवेदनशील मसले पर भी हमें चीन से प्रत्युत्तर की आशा थी, जो निराशा में बदल गई। जहां तक चीनी प्रधानमंत्री का सवाल है, उन्होंने बड़ी ही कुशलता से दोनों देशों के बीच समस्याओं का उल्लेख वार्ता के दौरान किया। सीमा विवाद, संवाद, एक-दूसरे से लगातार सम्पर्प एवं सलाह पर तो जोर दिया परन्तु चीनी पक्ष ने अपनी तरफ से कुछ भी नहीं छोड़ा और भारतीय पक्ष फिसड्डी की तरह चीन के साथ `यस नो वेरी गुड' में लीन रहा। यानि वही परम्परागत समस्याएं  जिसे लेकर भारत चीन के साथ जूझ रहा है वहीं की वहीं रहीं। भारत के चीन में गिरफ्तार दो हीरा व्यापारियों का मुद्दा उठाया तक नहीं गया। भारतीय निर्यातक चीन की धरती पर कदम रखने से घबराते हैं क्योंकि एक तरफ तो चीन दुनिया की सबसे बड़ी फैक्टरी यानि उत्पादक देश बनने के लिए लालायित है जबकि दूसरी तरफ अपने राष्ट्रीय कानूनों को कठोर बनाए रखा है। इतना ही नहीं, चीन एक तरफ तो दावा करता है कि यदि भारत और चीन एक साथ मिल जाएं तो वे दुनिया की 30 प्रतिशत आबादी को प्रभावित कर सकते हैं किन्तु उसका विरोधाभास यह है कि अपने देश में उसने जिन भारतीय उत्पादों पर प्रतिबंध लगा रखा है उसमें रत्तीभर छूट देने के लिए तैयार नहीं है। अपनी तरफ से चीनी प्रधानमंत्री ने बड़ी कूटनीतिक चतुराई से असल मुद्दों को टाल दिया। हमें उम्मीद थी कि चीन का नया नेतृत्व भारत से रिश्ते सुधारने में साहसिक फैसला लेगा और हमारे जायज हितों के प्रति गम्भीर दिखेगा। तब क्या केवल चीन के आर्थिक हित ली की इस यात्रा के सबब हैं। चीन की आर्थिक रफ्तार में मंदी के संकेत दिखने लगे हैं और वह शिद्दत से बड़े बाजारों की तलाश में है। वह जोर-शोर से भारत की सम्भावनाओं को टटोल रहा है और हमारा दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बनने में सफल भी रहा है लेकिन पिछले साल की तुलना में यह भागीदारी भी झटके खा रही है क्योंकि इसमें भी मलाई तो चीन के हिस्से जा रही है और भारत भारी घाटा उठाने को मजबूर है। लब्बोलुआब यह है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा भारत से शुरू करके केकियांग ने नई दिल्ली को स्पष्ट संदेश भी दिया है कि संबंधों में सुधार के साथ-साथ दक्षिण एशिया में चीनी हितों को भारत किसी भी प्रकार प्रभावित करने की कोशिश न करे। बहरहाल अपना तो मानना है कि चीन के लिए यह शिखर वार्ता भारतीय पक्ष की अपेक्षा ज्यादा सफल रही।

No positive outcome of Manmohan-Li talks


Anil Narendra
The new Chinese Premier Li Kequiang has embarked on his maiden foreign tour and has chosen India, as his first destination. Notably, he has linked his present India tour with the memories of his earlier tour, 27 years ago, when he had led a delegation to India. The symbol of eternal love, the Taj Mahal is still emotionally attracting him. It appears that the Chinese Prime Minister Li Kequiang has visited India with the purpose of feeling the pulse of India. China has been publicizing his visit, as if he is visiting India to provide new dimension to Indo-China relations. But, when both the Prime Ministers revealed the outcome of their talks to the world, it was nothing more than verbosity. No doubt, some agreements were signed and the leaders of the two most populous countries vowed to work for the development through peace and tranquility. But what has been the outcome of this very important meeting of the two leaders with reference to the long pending disputes? The summit between the Chinese Premier Li Kequiang and Indian Prime Minister Manmohan Singh was definitely an important event, as the former participated in the talks at the beginning of his tenure, whereas the latter at the end. Both the leaders may be claiming the round of talks as ‘all is well’, but the fact is that how far this talk has benefited India is shrouded with question marks. True, eight agreements were signed between the two countries and the summit was claimed to be a success, but neither India tried to ascertain Chinese views on the issue of permanent seat to India in the UN Security Council, nor there was any assurance given with reference to India’s nuclear development. Not only this, the Indian side did not express its reservations over the Chinese military and nuclear aid to Pakistan, which would be directly used against India. We can understand the military aid to Pakistan, but we fail to understand that not a word was spoken about the Chinese activities in PoK for construction of nuclear reactor. What was the outcome of this very important meeting with reference to the pending disputes between the two countries? Were we able to make China agree to seriously take initiatives for permanent solution to the border disputes within a stipulated time frame? Dr Manmohan Singh did say that both the countries have learnt a lesson from this incident and they have agreed for special representative level talks to stop recurrence of such incidents. But such an agreement already existed and methodology for solution to such disputes was outlined therein. Did these measures fail to deliver and what is the guarantee that the new set-up would succeed in solving these issues? As usual, this time also China described the border dispute as a complex historical problem, solution of which is not less than a Herculean task. The matter is not confined to the border only. China is trying to control the flow of Brahamputra River, which may play havoc in a large area of the country. India has been asking China for allaying its concerns, but China is stubbornly pursuing its intentions. China is making heavy defence preparations on the Indo-China border, which is another matter for concern to India. It has been constructing a network of roads, rail and airports along the border for last one and a half decade and it has achieved capability of deploying its forces and heavy equipment on the border within no time. When we responded by making preparations on our side of the border, it resorted to intimidation tactics. We were also expecting China’s reactions to this sensitive issue, but our hopes have been dashed. As far as Chinese Premier is concerned, he has ably mentioned the problems being faced by both the countries during talks. China stressed on border dispute, dialogue, constant contact and consultations with each other, but it did not add anything from its side on these concerns and like a back-bencher, India kept on saying ‘yes, no, very good’. It meant that traditional problems being faced by India remained unsolved. India did not even raise the issue of the arrest of two diamond merchants in China. Indian exporters fear entering China, because along with trying to become the most industrial country of the world, it has rigorously implemented its national laws, which are very strict and detrimental. Not only this, China claims that if India and China come together, they can influence 30 percent population of the world, but ironically, it is not ready to relax the laws restricting Indian goods. The Chinese Premier with deft diplomacy has evaded the real issues. We were expecting that the new leadership of China will take some historic decisions to improve relations with India and show concern towards our valid problems. Shouldn’t we conclude that the only aim of Li’s India visit is furthering the Chinese economic interests? There have been signs of slackness in the Chinese economic growth and it is vigorously tapping bigger markets. It is looking into possibilities in India and it has succeeded in becoming the second biggest business partner of India, but this partnership is proving detrimental to Indian interests. China is taking the lion’s share out of this partnership, whereas India has been left to face heavy deficit. In fact, starting his world tours with India, the Chinese Prime Minister, Li Kequiang has clearly given a message to India that along with improving relations, India must not adversely influence Chinese interests in South Asia. In any case, we feel that this summit between the two nations was more successful for China than for India.

Tuesday, 21 May 2013

लियाकत शाह को जमानत मिलना जांच एजेंसियों के मुंह पर तमाचा



 Published on 21 May, 2013 
 अनिल नरेन्द्र 
हिजबुल मुजाहिद्दीन के संदिग्ध आतंकवादी लियाकत शाह को फिदायीन आतंकी बनाकर वाहवाही लूटने वाली दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को जबरदस्त झटका लगा है। दिल्ली पुलिस ने उसके खिलाफ होली के मौके पर दिल्ली में बम विस्फोट की साजिश रचने का आरोप लगाया था। जिला न्यायाधीश आईएस मेहता ने लियाकत को जमानत प्रदान कर दी। राष्ट्रीय जांच एजेंसी की विशेष अदालत ने कहा कि एनआईए और दिल्ली पुलिस लियाकत के खिलाफ ऐसा कोई साक्ष्य नहीं जुटा सकी, जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि वह दिल्ली में हमले की योजना बना रहा था। जज महोदय ने 20 हजार रुपए के निजी मुचलके तथा इतनी ही राशि की जमानत देने पर लियाकत को जमानत पर रिहा करने के आदेश दिए। हालांकि उसकी जमानत पर कई शर्तें लगाई गई हैं। उसे देश छोड़ने का आदेश नहीं दिया गया है। लियाकत द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर जामा मस्जिद इलाके में एक गेस्ट हाउस से गत 21 मार्च को हथियार और गोला-बारुद बरामद किए जाने के दिल्ली पुलिस के दावे पर अदालत ने कहा कि यह काम आरोपी की अनुपस्थिति में किया गया था। इससे पहले एनआईए ने लियाकत की जमानत अर्जी का यह कहकर विरोध किया था कि अभी मामले की जांच जारी है, कॉल रिकार्ड की जांच, गवाहों से पूछताछ और मामले से जुड़ी कई अन्य कड़ियों की छानबीन की जा रही है। मगर कोर्ट ने इन दलीलों को नामंजूर कर दिया। वहीं जम्मू-कश्मीर पुलिस ने भी दावा किया था कि लियाकत आत्मसमर्पण करने यहां आ रहा था। इस संबंध में उसके परिजनों ने कुछ समय पहले आवेदन भी किया था। परिजनों का आरोप था कि दिल्ली पुलिस ने वाहवाही लूटने के लिए लियाकत को बलि का बकरा बनाया। 45 वर्षीय लियाकत को दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ ने अपने परिवार के साथ गत 29 मार्च को गोरखपुर में भारत-नेपाल सीमा को पार करने के दौरान गिरफ्तार किया था। अदालत ने नौ पन्नों के अपने आदेश में गौर किया कि एनआईए ने खुद कहा था कि कथित साजिश में लियाकत का संबंध जोड़ने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं हैं। इस बात को जोड़ने के लिए कोई सबूत नहीं कि कथित बरामदगी याचिकाकर्ता, आरोपों की निशानदेही पर की गई ताकि साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 लागू की जा सके। अभियोजन पक्ष के अनुसार गेस्ट हाउस में वह कमरा कथित तौर पर पाकिस्तान में बैठे आका की ओर से संदेश आने पर प्रकाश में आया। क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि जो हथियार इत्यादि जामा मस्जिद में कथित रूप से बरामद हुए वह खुद पुलिस ने वहां प्लांट किए थे? जामा मस्जिद के गेस्ट हाउस में जिस संदिग्ध आतंकी की तस्वीर जारी की गई थी वह भी सवालों के घेरे में है। जहां ऐसे केसों से पुलिस व जांच एजेंसी की साख पर सवाल तो लगता ही हैं साथ-साथ अल्पसंख्यक संगठनों को यह कहने का मौका भी मिलता है कि जांच एजेंसियां खानापूर्ति करने के लिए किसी भी अल्पसंख्यक को उठाकर उसे जबरन कथित आतंकी बना देती है। दिल्ली पुलिस की विश्वसनीयता वैसे भी बहुत कम है, इस प्रकार के केसों से रही-सही कसर भी निकल जाएगी।

क्या मनमोहन सिंह की कुर्सी पर बने रहने की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है


 Published on 21 May, 2013 
 अनिल नरेन्द्र 
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह हाल ही में जब गुवाहाटी में राज्यसभा की सदस्यता बरकरार रखने के लिए अपना नामांकन दाखिल कर रहे थे तो दिल्ली में उसी समय कांग्रेस यह घोषणा कर रही थी कि यदि अदालत अश्विनी कुमार की तरह किसी भी बड़े से बड़े पदाधिकारी (पीएम का नाम लिए बिना) पर ऐसी तल्ख टिप्पणी करेगी तो कांग्रेस उसे पद से हटाने में देर नहीं करेगी। आजकल के चुनावी माहौल में कांग्रेस के लिए अपनी साख और छवि दोनों बेहद अहम बन गई  है। कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद ने मनमोहन सिंह का नाम लिए बिना कहा कि अदालत ने अश्विनी कुमार और सीबीआई पर कोई फैसला नहीं दिया था सिर्प टिप्पणी की थी। लेकिन कांग्रेस ने इस पर गम्भीरता दिखाई। अश्विनी कुमार को मंत्रिपद से हटा दिया गया ताकि जुलाई में होने वाली सुनवाई में उनके कारण कोई अनावश्यक विवाद न पैदा हो और सीबीआई को और स्वायत्तता देने के लिए तत्काल पी. चिदम्बरम के नेतृत्व में मंत्री समूह का गठन कर दिया गया। उनसे जब पूछा गया कि यदि तत्कालीन कोयला मंत्रालय देखने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में सुप्रीम कोर्ट कोई विपरीत टिप्पणी करती है तो क्या उनका हश्र भी अश्विनी कुमार जैसा होगा? कांग्रेस प्रवक्ता का जवाब था कि कोई भी बड़े से बड़ा मंत्री क्यों न हो पार्टी दोहरे मापदंड नहीं अपनाएगी। कांग्रेस की यह टिप्पणी उस समय आई है जब राजनीतिक गलियारों में कांग्रेस अध्यक्ष और मनमोहन सिंह के बीच आपसी दरार की खबरें तेजी से फैल रही हैं। सूत्रों का तो यह भी कहना है कि अब कांग्रेस नेतृत्व का भरोसा मनमोहन सिंह पर वैसा नहीं रहा जैसा कि पहले हुआ करता था। जो लाभ 2009 के लोकसभा चुनाव में उनकी साफ-सुथरी छवि का पार्टी को मिला था वह अब नहीं मिलेगा। कांग्रेस में एक वर्ग ऐसा भी है जो मनमोहन सिंह पर तमाम घोटालों का ठीकरा फोड़ दे और उन्हें बलि का बकरा बना दे ताकि सरकार के तमाम घोटालों का ठीकरा उनके सिर फोड़ उन्हें चलता करे और नए सिरे से काम शुरू करके जनता के बीच जाएं। वैसे एक बड़े कांग्रेसी नेता ने यह भी कहा कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी मनमोहन सिंह बेहद कमजोर हो गए हैं। इसके अलावा अपने दोनों चहेतों अश्विनी कुमार और पवन कुमार बंसल को बचाने से नाराज मनमोहन सिंह मायूस हो गए हैं। कांग्रेस के दिग्गज महासचिव दिग्विजय सिंह भी खुले रूप से कह रहे हैं कि कांग्रेस में सत्ता के दो केंद्र सफल नहीं हो रहे, इसलिए निष्कर्ष यही निकलता है कि मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री पद के दिन गिने-चुने बचे हैं। शायद यह बात खुद मनमोहन सिंह भी समझ चुके हैं। उनकी बढ़ती अरुचि इसी ओर संकेत देती है। पिछले तीन महीने में कम से कम तीन बार मनमोहन सिंह सरकार का नेतृत्व कर पाने में अपनी असमर्थता जता चुके हैं। यूपीए-2 बनने के बाद से जिस तरह प्रधानमंत्री अलग-अलग कारणों के चलते आरोपों व आलोचना के केंद्र में रहे हैं उससे उनके दुखी होने को कांग्रेस रणनीतिकार स्वाभाविक मान रहे हैं। पार्टी रणनीतिकारों के समक्ष मनमोहन सिंह काफी खुलकर यह आग्रह भी कर चुके हैं कि वह राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए किसी भी वक्त अपनी कुर्सी छोड़ने को तैयार हैं।