Sunday, 25 August 2019

बिस्कुट कंपनी पारले पर जीएसटी की मार

भारतीय अर्थव्यवस्था की मंदी का असर देश की सबसे बड़ी बिस्कुट निर्माता कंपनी पारले पर देखने को मिल रहा है। इस वजह से आने वाले दिनों में पारले के 10 हजार कर्मचारियों की नौकरी पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक पारले अपने प्रॉडक्ट्स के इस्तेमाल में सुस्ती की वजह से हजारों कर्मचारियों की छंटनी कर सकती है। बता दें कि पूरे देश में प्रसिद्ध पारले जी बिस्कुट का निर्माता है पारले। पारले जी आज घर-घर की पसंद बन चुका है और अगर इस पर प्रभाव पड़ा तो उसका बहुत बुरा असर पड़ेगा। कंपनी के कैटेगरी हैड मयंक शाह के मुताबिक यह सुस्ती गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) की वजह से आई है। मयंक शाह ने कहा कि हम लगातार सरकार से बिस्कुट पर जीएसटी घटाने की मांग कर रहे हैं। मगर सरकार ने हमारी बात नहीं मानी या कोई विकल्प नहीं बताया तो हमें मजबूरन आठ से 10 हजार लोगों की छंटनी करनी पड़ सकती है। मयंक शाह ने बताया कि हमने सरकार से 100 रुपए प्रति किलो या उससे कम कीमत वाले बिस्कुट पर जीएसटी घटाने की मांग की है। दरअसल जीएसटी लागू होने से पहले 100 रुपए प्रति किलो से कम कीमत होने वाले बिस्कुट पर 12 प्रतिशत टैक्स लगाया जाता था। लेकिन सरकार ने दो साल पहले जब जीएसटी लागू किया तो सभी बिस्कुटों को 18 प्रतिशत स्लैब में डाल दिया। इसका असर यह हुआ कि बिस्कुट कंपनियों को इनके दाम बढ़ाने पड़े और इस वजह से बिक्री में गिरावट आ गई है। मयंक शाह के मुताबिक पारले ने बिस्कुट पर पांच प्रतिशत दाम बढ़ाया है। इस वजह से बिक्री में बड़ी गिरावट आई है। शाह ने बिक्री में गिरावट की वजह बताते हुए कहा कि कीमतों को लेकर ग्राहक बहुत ज्यादा भावुक होते हैं। वे यह देखते हैं कि उन्हें कितने बिस्कुट मिल रहे हैं। इस अंतर को समझने के  बाद ग्राहक सतर्प हो जाते हैं। यहां बता दें कि 90 साल पुरानी बिस्कुट कंपनी पारले के 10 प्लांट अपने 125 कांट्रैक्ट वाले हैं। इनमें एक लाख कर्मचारी जुड़े हुए हैं। कंपनी का सालाना रवेन्यू करीब 9940 करोड़ रुपए का है। बीते दिनों पारले के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज के मैनेजिंग डायरेक्टर वरुण बेरी ने भी बिक्री में गिरावट का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि ग्राहक पांच रुपए के बिस्कुट पैकेट भी खरीदने से कतरा रहे हैं। बेरी ने कहा कि हमारी ग्रोथ सिर्प छह प्रतिशत हुई है। मार्केट ग्रोथ हमसे भी सुस्त है। इससे पहले मार्केट रिसर्च फर्म नीलसन ने कहा था कि इकोनॉमिक स्लो डाउन की वजह से कंज्यूमर गुड्स इंडस्ट्री ठंडी पड़ी है क्योंकि ग्रामीण इलाकों में खपत घट गई है। उनकी रिपोर्ट के मुताबिक नमकीन, बिस्कुट, मसाले, साबुन में अधिक सुस्ती दिख रही है।

-अनिल नरेन्द्र

जज कुहार की अदालत में चला कोर्ट रूम लाइव

पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदम्बरम को सीबीआई ने गुरुवार को भोजनावकाश के बाद कड़ी सुरक्षा के बीच 3.15 मिनट पर राऊज एवेन्यू स्थित न्यायाधीश अजय कुमार कुहार की अदालत में पेश किया। चिदम्बरम पर गंभीर आरोप लगाते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने विशेष अदालत को बताया कि वे पूछताछ में सहयोग नहीं कर रहे हैं। वे कुछ जानकारी नहीं दे रहे हैं। उनके पास आईएनएक्स मीडिया मामले से संबंधित कई दस्तावेज हैं, उन्होंने पहले हामी भरी और बाद में मुकर गए। दिल्ली हाई कोर्ट ने भी उनकी अग्रिम जमानत निरस्त करते हुए उन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ करने की बात कही है। उन्होंने कहा कि जांच अभी चल रही है और उनसे और पूछताछ करनी है। उनके खिलाफ काफी आपत्तिजनक दस्तावेज मिले हैं। कई दस्तावेज चिदम्बरम के नाम हैं। वे उसे दे नहीं रहे हैं। उनके विदेशी निवेश की अनुमति देने से पहले और बाद में भी षड्यंत्र करने की बात सामने आई है। अभी तक आरोप पत्र दाखिल नहीं किया गया है। इसलिए उन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ करने की जरूरत है। उन्हें पांच दिनों की सीबीआई हिरासत में सौंपा जाए क्योंकि सारे काम उनके कार्यकाल में हुए हैं। इस तरह के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी हिरासत में लेकर पूछताछ करने की बात कही है। चिदम्बरम की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि सीबीआई उनसे 22 बार पूछताछ कर चुकी है। हमेशा उन्होंने सहयोग किया है। इस मामले में उनके पुत्र कार्ति चिदम्बरम को नियमित जमानत व भास्कर को अग्रिम जमानत मिल चुकी है। विदेशी निवेश की अनुमति देने वाले छह अधिकारियों में से अभी तक किसी को भी गिरफ्तार नहीं किया गया है। इस मामले में इंद्राणी मुखर्जी भी जमानत पर हैं। इसलिए चिदम्बरम को हिरासत में सौंपने की जरूरत नहीं है। अगर सीबीआई को फिर से पूछताछ करनी है तो वह उन्हें बुला सकती है। सीबीआई सभी प्रश्नों की सूची दे दे और उसका जवाब दे दिया जाएगा। इस मामले में आरोप पत्र का मसौदा भी तैयार हो चुका है। वरीय अधिवक्ता ने कहा कि जमानत अधिकार है और हिरासत विशेष परिस्थितियों में ही दी जाती है। इसलिए उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया जाए। केस डायरी को साक्ष्य नहीं माना जा सकता है। उनके खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य नहीं हैं। सॉलिसिटर जनरल ने जवाब दिया कि केस डायरी भले ही साक्ष्य न हो, लेकिन अभी जांच का समय है और सीबीआई सभी बातों का खुलासा नहीं कर सकती है। वे जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं। यह सीबीआई अधिकारी पर निर्भर करता है कि वह प्रश्न कैसे पूछे। इसके लिए उस पर दबाव नहीं बनाया जा सकता। सीबीआई ने हाई कोर्ट में भी केस डायरी सौंपी है और वहां भी कहा है कि उसकी जांच जारी है। इसलिए जांच समाप्त होने की बात नहीं कही जा सकती और न ही आरोप पत्र तैयार होने की बात। अभिषेक मनु सिंघवी ने चिदम्बरम की ओर से पेश होते हुए कहा कि केस डायरी सबूत नहीं होती। इसमें सिर्प अधिकारी द्वारा लिखी बातें हैं। पूरा मामला इंद्राणी मुखर्जी के बयान पर आधारित है। उसके चार महीने बाद चिदम्बरम से पूछताछ हुई। सीबीआई इसलिए हिरासत मांग रही है क्योंकि उसके मन मुताबिक जवाब नहीं मिल रहे। सीबीआई चिदम्बरम से क्या पूछना चाहती है? सवाल कोर्ट में बताएं। मेहताöकोर्ट में कैसे बता दें? आप मेरा पूछताछ का हक नहीं छीन सकते। हम देशहित में काम कर रहे हैं। शातिर लोगों से निपट रहे हैं। सिंघवीöजून 2018 में इस मामले में सीबीआई ने एक नया शब्द गढ़ा हैöग्रेविटी। इसका कानून में कोई मतलब नहीं। जमानत खारिज करने के तीन आधार हो सकते हैं। जांच में असहयोग, कानून से भागने का जोखिम और सबूतों से छेड़छाड़। इनमें से कोई भी इस केस में चिदम्बरम पर लागू नहीं होता। विशेष न्यायाधीश अजय कुमार कुहार ने सीबीआई से यह जानना चाहा कि उसने चिदम्बरम की अग्रिम जमानत पर सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय में क्या हलफनामा दिया है। इसका जवाब देते हुए मेहता ने कहा कि उच्च न्यायालय में भी हलफनामा दाखिल कर चिदम्बरम को हिरासत में लेकर पूछताछ करने की इजाजत मांगी थी। अदालत में इस मामले में करीब पौने दो घंटे जोरदार बहस हुई। इस दौरान चिदम्बरम कठघरे में खड़े रहे। मामले की सुनवाई के दौरान चिदम्बरम ने कहा कि वे कुछ कहना चाहते हैं। इस पर सीबीआई की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि पहले से ही दो वरिष्ठ अधिवक्ता उनका पक्ष रख रहे हैं, इसलिए उन्हें बोलने की अनुमति नहीं दी जा सकती। पर अदालत ने इजाजत दे दी। चिदम्बरम ने अदालत को बताया कि जब उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया था तो इस मामले से जुड़ा कोई सवाल नहीं किया। उन्होंने बताया कि सीबीआई ने सिर्प इतना पूछा था कि आपके विदेश में बैंक खाते हैं। करीब 4.55 बजे अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। इसके बाद करीब छह बजकर 35 मिनट पर अदालत ने चिदम्बरम को पांच दिन के लिए पुलिस हिरासत में भेजने के आदेश  दे दिए। 26 अगस्त को उन्हें दोबारा पेश किया जाएगा। सीबीआई की हिरासत में रहने के दौरान वकील और परिवार के लोग रोज आधा-आधा घंटा चिदम्बरम से मिल सकेंगे। जज अजय कुमार ने कहा कि तथ्यों और हालात को देखते हुए सीबीआई की हिरासत न्यायोचित है। आरोप बेहद गंभीर हैं। इसलिए लेनदेन की तय सीमा तक पहुंचना जरूरी है। लेकिन आरोपी की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए। कोर्ट में सारा समय चिदम्बरम की पत्नी और बेटे कार्ति मौजूद रहे।

Friday, 23 August 2019

30 साल में 490 अरब डॉलर का काला धन बाहर गया है

वित्त मंत्रालय की स्थायी समिति द्वारा काले धन को लेकर जो रिपोर्ट दी गई है, वह बेहद चिंतनीय है। यह और भी चौंकाने वाली बात है कि भाजपा जो दो बार काले धन के मुद्दे को लेकर देश की सत्ता में आई, आज वह कह रही है कि विदेशों में जो अनुमानित नौ लाख 41 हजार करोड़ रुपए गरीबों, किसानों और मजदूरों के हक का पैसा काले धन के रूप में चन्द नेताओं, उद्योगपतियों और अधिकारियों ने लूटकर रखा है, उसे वापस नहीं लाया जा सकता, यह कहना था आम आदमी पार्टी (आप) के सांसद संजय सिंह का। सांसद संजय सिंह ने बयान जारी कर कहा कि मेरा मानना है कि अगर विदेशों में जमा काला धन वापस आ जाए तो देश में बेरोजगारी कम की जा सकती है, किसानों के कर्ज माफ किए जा सकते हैं, किसानों को उनकी फसल का डेढ़ गुना दाम दिया जा सकता है, नए स्कूलों, कॉलेजों व अस्पतालों का निर्माण किया जा सकता है। राष्ट्र निर्माण में यह पैसा अहम भूमिका निभा सकता है। उन्होंने कहा कि नीरव मोदी, विजय माल्या जैसे लोग जो देश का हजारों करोड़ रुपए लूटकर विदेशों मे बैठे हैं, सरकार को उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए और करनी पड़ेगी। वित्त पर स्थायी समिति ने तीन प्रतिष्ठित आर्थिक और वित्तीय शोध संस्थानों की रिपोर्ट के हवाले से जानकारी दी है कि भारतीयों द्वारा 1980 से लेकर 2010 तक की अवधि में 216.48 अरब डॉलर से 490 अरब डॉलर का काला धन देश के बाहर भेजा गया। काले धन पर राजनीतिक विवाद के बीच मार्च 2010 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने तीन संस्थाओं को देश के बाहर भारतीयों के काले धन का अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी थी। इन तीन संस्थानों में राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान (एनआईपीएफपी) राष्ट्रीय व्यवहारिक आर्थिक शोध परिषद (एनसीएईआर) और राष्ट्रीय वित्तीय प्रबंध संस्थान (एनआईएफएम) शामिल हैं। कांग्रेस के वीरप्पा मोइली वाली इस स्थायी समिति ने 16वीं लोकसभा भंग होने से पहले गत 28 मार्च को ही लोकसभा अध्यक्ष को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। 7000 करोड़ रुपए जमा हैं स्विस बैंकों में भारतीयों के 2018 के मुताबिक। 100 लाख करोड़ रुपए जमा हैं सभी विदेशी ग्राहकों का पैसा स्विस बैंकों में। काला धन बाहर भेजने वाले शीर्ष पांच देशों में भारत चौथे नम्बर पर है। पहला चीन है, दूसरा रूस, तीसरा मैक्सिको, चौथा भारत और पांचवा मलेशिया। लगभग एक अरब डॉलर का काला धन विकासशील देशों से हर साल बाहर जाता है। खबर यह भी आई है कि स्विट्जरलैंड के बैंकों में भारतीयों के जमा धन में कमी आई है। स्विस नेशनल बैंक की ओर से जारी डेटा के मुताबिक 2018 में छह प्रतिशत की गिरावट के साथ स्विस बैंकों में भारतीयों के 6,757 करोड़ रुपए थे। दो दशक में यह दूसरा सबसे निचला स्तर है। कुछ रिपोर्टों में यह गिरावट 11 प्रतिशत बताई गई है।

-अनिल नरेन्द्र

चिदम्बरम की गिरफ्तारी का हाईवोल्टेज ड्रामा

आईएनएक्स मीडिया मामले में गिरफ्तारी से  बचने के लिए 27 घंटे तक लापता रहे पूर्व वित्तमंत्री, गृहमंत्री पी. चिदम्बरम को नाटकीय घटनाक्रम के बाद आखिरकार बुधवार रात को गिरफ्तार कर लिया गया। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के जोरबाग स्थित आवास पर लगभग एक घंटे चले हाईवोल्टेज ड्रामे के बाद सीबीआई उन्हें एजेंसी मुख्यालय ले गई। सीबीआई प्रवक्ता ने बताया कि कोर्ट द्वारा वारंट के आधार पर चिदम्बरम को गिरफ्तार किया गया है। इससे पहले मंगलवार शाम से लापता रहे चिदम्बरम रात 8.15 बजे अचानक कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के साथ पार्टी मुख्यालय की प्रेस कांफ्रेंस में पहुंचे। उन्होंने खुद को बेगुनाह बताया। कहा, वह कानून से भाग नहीं रहे  बल्कि कानून का सहारा ले रहे हैं। चिदम्बरम के पार्टी कार्यालय में होने की खबर मिलते ही सीबीआई की टीम वहां पहुंच गई। करीब सात मिनट का बयान देने के बाद चिदम्बरम पूर्व मंत्री व उनके वकील कपिल सिब्बल व अभिषेक मनु सिंघवी के साथ अपने घर रवाना हो गए। चिदम्बरम के पीछे-पीछे सीबीआई की तीन टीमें भी उनके घर जोरबाग पहुंच गईं। मुख्य गेट बंद होने से तीन अधिकारी दीवार फांदकर भीतर दाखिल हुए और गेट खोला। इस बीच ईडी की टीम भी वहां पहुंच गई। बड़ी संख्या में कांग्रेसी कार्यकर्ता भी पहुंच गए। अधिकारियों को कार्यकर्ताओं का भारी विरोध झेलना पड़ा। सीबीआई चिदम्बरम को लेकर घर से निकली तो एक कार्यकर्ता उस कार पर ही चढ़ गया जिसमें चिदम्बरम को ले जाया जा रहा था। इस बीच भाजपा के वर्पर भी वहां पहुंच गए। दोनों दलों के कार्यकर्ताओं में हाथापाई होने लगी। सीबीआई ने स्थिति बिगड़ती देख दिल्ली पुलिस और सीआरपीएफ के जवानों को भी बुला लिया। चिदम्बरम को हिरासत में लेकर सीबीआई मुख्यालय लाया गया। इस मुख्यालय का उद्घाटन अप्रैल 2011 में तब के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने किया था। इस कार्यक्रम में चिदम्बरम बतौर विशिष्ट अतिथि शरीक हुए थे। उनकी कानूनी लड़ाई लड़ रहे कपिल सिब्बल भी साथ थे। चुनाव में करारी हार के बाद से बुरी तरह बिखरी कांग्रेस पहली बार चिदम्बरम के पक्ष में एकजुट दिखी है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुक्रवार को तय होने के बाद कपिल सिब्बल ने अहमद पटेल के जरिये सोनिया गांधी को इसकी सूचना दी। सोनिया के कहने पर पार्टी ने रणनीति बनाई कि अब भगोड़ा दिखने के बजाय हालात का मुकाबला किया जाए। शाम 6.30 बजे तय हुआ कि प्रेस कांफ्रेंस करेंगे। सात बजे फोन पर बातचीत में सोनिया ने कहा कि चिदम्बरम भी प्रेस कांफ्रेंस में आएं। पहले चिदम्बरम को सामने लाने का जिक्र नहीं था। अब पार्टी इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई के तौर पर मुद्दा बनाने की तैयारी में है। पी. चिदम्बरम के  पीछे एकजुट कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि मोदी सरकार अब पार्टी के कुछ अन्य वरिष्ठ नेताओं को निशाना बना सकती है। भविष्य के इस खतरे को देखते हुए कांग्रेस अब और ज्यादा सतर्प और मुस्तैद हो गई है। पार्टी महासचिव प्रियंका वाड्रा और राहुल गांधी के ट्वीट में पार्टी ने स्पष्ट संदेश दिया था कि हमें चिदम्बरम के साथ एकजुट खड़े रहना है। इसी के तहत बुधवार रात पार्टी मुख्यालय में चिदम्बरम की प्रेस कांफ्रेंस के दौरान अहमद पटेल, केसी वेणुगोपाल, गुलाम नबी आजाद, मल्लिकार्जुन खड़गे, कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, सलमान खुर्शीद और विवेक तन्खा मौजूद थे। पार्टी इस मामले को राजनीतिक लड़ाई के तौर पर पेश करना चाहती है। कांग्रेसी खुलकर कह रहे हैं कि गृहमंत्री अमित शाह चिदम्बरम से बदला ले रहे हैं। सोहराबुद्दीन केस में चिदम्बरम ने शाह को जेल भिजवाया था। इसी का बदला अमित शाह ले रहे हैं। साथ ही कांग्रेस यह भी संदेश देना चाहती है कि सीबीआई, ईडी की जो भी कार्रवाई हो रही हैं, वह सत्ता का दुरुपयोग है और राजनीतिक बदले की भावना से की जा रही हैं। चिदम्बरम तो इस कड़ी में पहले शिकार हैं। रॉबर्ट वाड्रा, राहुल गांधी और खुद सोनिया गांधी का भी नम्बर आ सकता है। वैसे कई लोगों का मानना है कि जिस ढंग से सीबीआई ने चिदम्बरम को गिरफ्तार किया उसकी जरूरत नहीं थी। सीबीआई के पूर्व संयुक्त निदेशक एनके सिंह के अनुसार इस तरह से चिदम्बरम को गिरफ्तार किया जाना सीबीआई की ज्यादती है जिसमें बचा जा सकता था। उन्होंने कहाöयह सही है कि कानून की नजर में सब बराबर हैं। लेकिन केस को देखना पड़ेगा कि केस है क्या? केस बहुत पुराना है। 10 साल के बाद 2017 में केस रजिस्टर किया गया। इंद्राणी मुखर्जी जो खुद अपनी लड़की की हत्या के आरोप में जेल में बंद है और उनके खिलाफ मुकदमा चल रहा है। वो इस केस में सीबीआई के कहने पर सरकारी गवाह बन जाती है और उनके बयान पर चिदम्बरम के खिलाफ इस मामले की जांच हो रही है। जांच को पूरा किया जाता, अदालत के सामने रखा जाता। यह जो अभियोग है उसकी गंभीरता को देखते हुए यह पुराना मामला है और इसका जो आधार है उन सारी बातों को देखते हुए मुझे तो लगता है कि सीबीआई का एक्सेसिव एक्शन यानि अत्याधिक कार्रवाई है। आखिर सीबीआई शुक्रवार तक क्यों इंतजार नहीं कर सकी जब सुप्रीम कोर्ट चिदम्बरम की जमानत अर्जी की अपील सुनाने वाली थी? ऐसी क्या जल्दी थी? अब यह मामला पूरी तरह राजनीतिक बन गया है। मोदी जनता को संदेश देना चाहते हैं कि वो ताकतवर से ताकतवर लोगों को जेल भेज सकते हैं। मोदी-अमित शाह यह संदेश देना चाहते हैं कि सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूती से लड़ेगी, सरकार का मजबूत इरादा है।

Thursday, 22 August 2019

तीन साल और बने रहेंगे जनरल बाजवा सेना चीफ

पाकिस्तान के वर्तमान सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा नवम्बर में इसी साल रिटायर होने वाले थे लेकिन सोमवार को प्रधानमंत्री इमरान खान के ऑफिस ने घोषणा की कि जनरल बाजवा और तीन साल सेना प्रमुख बने रहेंगे। इससे पहले 2010 में तत्कालीन जनरल अशफाक परवेज कियानी को विस्तार दिया गया था। 58 वर्षीय बाजवा को पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने नवम्बर 2016 को सेना का प्रमुख नियुक्त किया था। शरीफ ने तब तीन अन्य जनरलों को दरकिनार करते हुए बाजवा को सेना प्रमुख बनाया था। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने इस फैसले पर कहा कि अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया और भारत के साथ कश्मीर पर बढ़े तनाव को लेकर यह जरूरी फैसला है। उन्होंने इस फैसले को पाकिस्तान की सुरक्षा से भी जोड़ा है। पाकिस्तान के पास दुनिया की छठी सबसे बड़ी सेना है जिसका देश के परमाणु हथियारों पर भी नियंत्रण है। पाकिस्तानी सेना ने पाकिस्तान बनने के बाद से कई तख्ता पलट किए हैं और अब तक करीब आधे समय तक देश पर उनका ही राज रहा है। इमरान खान को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाने में जनरल बाजवा की उल्लेखनीय भूमिका थी। यह कहा जाए कि इमरान का जो फेवर बाजवा ने किया था उसे इमरान ने रिटर्न कर दिया है। कई दिनों से यह कयास लगाए जा रहे थे कि प्रधानमंत्री जनरल बाजवा को दूसरा कार्यकाल दे सकते हैं क्योंकि दोनों मिलकर काम करते हैं। पीएम इमरान खान की हाल ही में अमेरिकी यात्रा पर बाजवा भी गए थे। पाक सेना प्रमुख की नियुक्ति पीएम व उनकी सरकार को प्राथमिकता है। सबसे वरिष्ठ अधिकारी को सेना प्रमुख बनाए जाने की परंपरा का पालन नहीं किया जाता। पीएम व सरकार द्वारा नियुक्ति को राष्ट्रपति मंजूरी देते हैं। 2016 में सेना प्रमुख बनने के बाद पाकिस्तान में सैनिक शासन की आशंकाएं बनी थीं पर उनको खारिज करने वाले जनरल बाजवा भी अपने पूर्ववर्तियों जैसे ही हैं। आमतौर पर कहा जाता है कि निर्वाचित प्रधानमंत्री इमरान खान उनके हाथों की कठपुतली माने जाते हैं। सेना प्रमुख के कार्यकाल को बढ़ाया जाना गैर-मुनासिब बताते हुए विपक्षी पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के वरिष्ठ सदस्य फरहतुल्लाह बाबर ने ट्वीट किया कि मजबूत संस्थाएं किसी व्यक्ति विशेष पर निर्भर नहीं करतीं चाहे वह व्यक्ति कितना भी मजबूत, सक्षम और प्रतिभावान ही क्यों न हो। वैसे मजेदार बात है कि सत्ता में आने से पहले इमरान खान सेना प्रमुख का कार्यकाल बढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने कहा था कि किसी भी सेना प्रमुख का कार्यकाल बढ़ाना सेना के नियमों को बदलने का काम है जो एक संस्था के रूप में सेना को कमजोर करता है। इमरान का यह बयान 2010 में पीपीपी के सेना प्रमुख अशफाक परवेज कियानी के कार्यकाल को बढ़ाए जाने के बाद आया था पर आज जो पाकिस्तान की अंदरूनी हालत है उस पर हम इमरान खान की इस नियुक्ति को समझ सकते हैं।

-अनिल नरेन्द्र

बालाकोट के वायुवीरों को वीरता सम्मान

तीनों सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की ओर से हर साल की तरह स्वतंत्रता दिवस के मौके पर वीरता पुरस्कारों की घोषणा की गई। इस साल बालाकोट एयर स्ट्राइक पुरस्कारों में छाया रहा। पाकिस्तान के बालाकोट में एयर स्ट्राइक के बाद गुलाम कश्मीर में पाकिस्तान के एफ-16 विमान को मार गिराने वाले विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान को वीर चक्र से नवाजा जाएगा। कमांडर अभिनंदन ने पाकिस्तान के अत्याधुनिक एफ-16 विमान को अपने मिग-21 बाइसन से मार गिराया था। इस दौरान अभिनंदन का भी विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिससे वह पाक सीमा में पहुंच गए थे और तीन दिन बंदी रहे थे। बता दें कि वीर चक्र युद्धकाल में बहादुरी के लिए दिया जाने वाला तीसरा सबसे बड़ा सैन्य सम्मान है। वहीं बालाकोट में जैश--मोहम्मद के ठिकानों पर हमला करने वाले वायुसेना के अन्य पायलट विंग कमांडर अमित रंजन, स्क्वाड्रन लीडर राहुल बोसाया, पंकज मुंजडे, बीएन रेड्डी, शशांक सिंह को वायुसेना मैडल से सम्मानित किया जाएगा। बालाकोट में एयर स्ट्राइक के बाद कश्मीर में पाक विमानों की घुसपैठ के दौरान फाइटर कंट्रोलर की जिम्मेदारी संभालने वाली स्क्वाड्रन लीडर मिंटी अग्रवाल को युद्ध सेवा मैडल दिया जाएगा। इस बार बहादुरी पाने वालों में मिंटी अकेली महिला हैं। मिंटी को यह पुरस्कार बालाकोट हवाई हमले के बाद भारत-पाक में हवाई संघर्ष के दौरान दिए गए योगदान के लिए दिया जाएगा। जब पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों ने उनके एयर बेस से उड़ान भरी और पीओके के रास्ते भारतीय वायु सीमा में प्रवेश करने के लिए आगे बढ़े, तभी मिंटी अग्रवाल जो उस समय वायुसेना के रडार कंट्रोल स्टेशन पर तैनात थीं, ने श्रीनगर स्थित वायुसेना के एयर बेस को सूचित कर दिया, जहां विंग कमांडर अभिनंदन सहित कई भारतीय लड़ाकू विमान हाई अलर्ट पर थे। फाइटर कंट्रोलर की भूमिका निभाने वाली स्क्वाड्रन लीडर मिंटी अग्रवाल से सूचना मिलते ही अभिनंदन वर्धमान ने उड़ान भरी और अपनी वायुसीमा पर पहुंच गए थे। इस बीच मिंटी अग्रवाल अभिनंदन को हर पल पाकिस्तानी जेट की स्थिति के बारे में उन्हें अवगत कराती रहीं, जिससे अभिनंदन ऑपरेशन को पूरा करने में सफल रहे। इसके अलावा पुलवामा हमले के मास्टरमाइंड गाजी रशीद का सफाया करने वाले आरआर राइफल्स के मेजर विभूति शंकर ढोंढियाल समेत उत्तराखंड के सात जांबाजों को स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति ने बहादुरी पुरस्कार का ऐलान किया। मेजर ढोंढियाल (मरणोपरांत) को शौर्य चक्र और उनके मित्र रहे मेजर चित्रेश बिष्ट (मरणोपरांत) को सेना मैडल दिया गया। मेजर ढोंडियाल और मेजर बिष्ट दोनों देहरादून के निवासी थे। साथ-साथ फौज में गए थे और इसी साल फरवरी में शहीद हुए थे। मेजर ढोंढियाल 18 फरवरी को पुलवामा के विंगलिया गांव में आतंकियों के साथ चले 100 घंटे के ऑपरेशन के बाद शहीद हो गए थे। हम इन जांबाजों को सलाम करते हैं। जय हिन्द।

Wednesday, 21 August 2019

जनसंख्या विस्फोट रोकना भी है देशभक्ति

दुनिया की आबादी तेजी से बढ़ रही है। इसमें सबसे चिंताजनक बात यह है कि भारत की जनसंख्या भी बहुत तेजी से बढ़ रही है। यही हालात रहे तो हम साल 2027 तक  चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएंगे। वैश्विक जनसंख्या पर संयुक्त राष्ट्र की ताजा fिरपोर्ट से यह बात सामने आई है। भारत की स्थिति  यह है कि 27.30 करोड़ लोग बढ़ जाएंगे 2019 से 2050 तक। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस सदी के अंत तक भारत की आबादी 150 करोड़ हो जाएगी। वहीं जनसंख्या को नियंत्रित करने की नीतियों के कारण चीन की आबादी 110 करोड़ पर रूक जाएगी। 40.30 करोड़ की आबादी के साथ पाकिस्तान पांचवे नंबर पर होगा। 15 अगस्त को लाल किले से देश को संबोधित करते हुए 90 मिनट के भाषण में जिस नए और अहम मामलों का जिक पधानमंत्री मोदी ने किया, वह है देश की बढ़ती जनसंख्या। पीएम मोदी ने कहा कि देश की जनसंख्या पर नियंत्रण के लिए सरकार और आम लोग क्या कर रहे हैं, क्या कर सकते हैं? मोदी ने कहा कि बेहताशा बढ़ रही जनसंख्या सभी के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। समाज का एक छोटा वर्ग जो अपना परिवार छोटा रखता है, वह सम्मान का हकदार है। वे जो कर रहे हैं वह भी एक पकार की देश भक्ति है। यह शायद पहली बार है जब पीएम ने इन शब्दों के जरिए जनसंख्या का मुद्दा उठाया है। पधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का देश में जनसंख्या विस्फोट पर चिंता जताना और इसकी रोकथाम के लिए हर नागरिक को जवाबदेही तय करने के लिए एकजुट होकर आगे आने का आह्वान सकारात्मक और असरदार भूमिका अदा कर सकता है। बढ़ती जनसंख्या व घटते जल व अन्य संसाधनों से यह तो तय है कि यदि केन्द्र समेत राज्य सरकारों के साथ हर युवा अलर्ट नहीं हुआ तो आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर समस्याएं खड़ी हो जाएंगी। परिवार नियोजन को स्वैच्छिक आंदोलन बनाना होगा। केन्द्र और राज्य सरकारें पहले से अधिक सुविधाएं और रियायतें देकर हम दो हमारे दो का और ध्यान खींचने का जो पयास कर रही है उसमें तेजी लानी होगी। देश को परिवार नियोजन में सख्ती का कड़ा अनुभव 1975-76 के इमरजेंसी में हो चुका है। इससे बढ़ाई सबसे बेहतर रास्ता है सामाजिक जागरुकता। पधानमंत्री मोदी के मुताबिक समय आ गया है जब देश छोटे परिवारों की पैरवी करे क्योंकि यदि पढ़े-लिखे, स्वस्थ नहीं होंगे तो न देश खुश होगा और न ही परिवार। 1.3 अरब लोगों वाला हमारा देश दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश है। यदि लोग देश के लिए कुछ करना चाहते हैं तो इस जरिए भी देशभक्ति कर सकते हैं।

-अनिल नरेन्द्र

और अब हुड्डा ने दिखाए बगावती तेवर

जब हाल में सोनिया गांधी ने पार्टी की बागडोर संभाली तो कांग्रेसियों की यह उम्मीद जगी कि अब पार्टी मौजूदा संकट से उबर जाएगी, पार्टी में गुटबाजी, अनुशासनहीनता एवं उसे छोड़ने की पवृत्ति खत्म हो जाएगी। पर हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने पार्टी से बगावती सुर दिखा दिए हैं। हुड्डा अपनी ही पार्टी से बागी हो गए हैं। उनका कहना है कि हरियाणा कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। कयास लगाए जा रहे हैं कि वो अपनी नई पार्टी की घोषणा करेंगे और रोहतक में एक बड़ी रैली कर उन्होंने रविवार को पार्टी हाईकमान के सामने एक तरह का शक्ति पदर्शन भी कर डाला। हुड्डा के मंच पर कांग्रेस के 16 में से 13 विधायक मौजूद थे। हुड्डा ने बागी होने का सबसे पहला संकेत तब दिया जब उन्हेंने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने का खुलकर समर्थन किया जबकि उनकी पार्टी का हाई-कमान इसका विरोध कर रहा था। भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने रोहतक में महापरिवर्तन रैली में जो तेवर दिखाए वे यही संकेत करते हैं कि पार्टी में अब भी सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है। उन्होंने कहा कि वह सभी बंधनों से मुक्त होकर आए हैं और जनता की लड़ाई के लिए कोई भी फैसला करने को तैयार हैं। उनका कहना कि जब जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 लगाया था तब उसका औचित्य था। मगर इतने सालों के बाद इसका कोई औचित्य नहीं है। अपनी पार्टी तक लाइन से अलग बोलते हुए हुड्डा ने अपनी ही पार्टियों की कमियों को गिनवाना शुरू कर दिया। हरियाणा कांग्रेस में आपसी खिंचतान काफी लंबे समय से जारी है और पदेश के नेता समय-समय पर दिल्ली में पार्टी हाईकमान से मिलकर अपनी शिकायत दर्ज कराते रहे हैं। हालांकि पदेश अध्यक्ष अशोक तंवर पर राहुल गांधी काफी भरोसा करते हैं। अब जब पार्टी की कमान एक बार फिर सोनिया गांधी के हाथों में गई है तब हुड्डा के करीबी माने-जाने वाले नेताओं को लगता है कि शायद अब हरियाणा कांग्रेस में उथल-पुथल होगी। हरियाणा में कांग्रेस का पदर्शन बहुत खराब रहा और हाल में हुए आम चुनावों में उसे एक भी सीट नहीं मिल पाई। हरियाणा की राजनीति पर नजर रखने वाले कहते हैं कि इतनी बड़ी रैली आयोजित कर भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने कांग्रेस हाई कमान को ये संदेश भी देने की कोशिश की कि वो आज भी हरियाणा में पार्टी के सर्वमान्य नेता हैं और दूसरों के मुकाबले उनका सियासी कद काफी ऊंचा है। सोनिया गांधी व उनके परिवार के लिए हुड्डा का महत्व बहुत ज्यादा है। राबर्ट वाड्रा केस में हुड्डा भी महत्वपूर्ण हैं। भाजपा हुड्डा को तोड़ लेती है तो इसका असर राबर्ट वाड्रा केस पर पड़ सकता है। खबर है कि हुड्डा अपनी नई पार्टी की घोषणा करने वाले थे पर रविवार रात कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से फोन पर बातचीत हुई। विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि सोनिया गांधी ने हुड्डा को सकारात्मक आश्वासन दिया और इसके बाद ही हुड्डा ने अपनी रणनीति में परिवर्तन किया। हुड्डा के समर्थकों ने यह उम्मीद लगाई हुई थी कि रविवार को इस महापरिवर्तन रैली में हुड्डा अपनी अलग पार्टी बनाने की घोषणा करेंगे पर ऐसा हुआ नहीं। इसका श्रेय सोनिया गांधी को जाता है। हुड्डा कहते हैं कि संगठन तो है ही नहीं, न कोई ढांचा है। पदेश स्तर पर नेता बड़ी-बड़ी बातें भले ही कर लें लेकिन सच तो यह है कि कांग्रेस का संगठन न तो जिला स्तर पर है और न ही पचंड स्तर पर। ऐसे कहीं चुनाव लड़ा जाता है? वैसे हरियाणा में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है जब कांग्रेस के किसी बड़े कद्दावर नेता ने पार्टी से बगावत की हो। वर्ष 1971 में चौधरी देवी लाल ने कांग्रेस से बगावत कर लोकदल की स्थापना की थी फिर बंसीलाल ने भी ऐसा किया। हुड्डा नई पार्टी बनाते हैं तो निश्चित ही कांग्रेस को हfिरयाणा में काफी नुकसान होगा। अकेले हरियाणा में ही कांग्रेस की गुटबाजी नहीं है, कई और राज्यों में भी कमोबेश यही स्थिति है। कांग्रेस नेतृत्व को इससे सूझ-बूझ से निपटना होगा। मगर संगठन के साथ-साथ उसे नीतिगत पहलू पर भी ध्यान केन्द्रित करना होगा। अगर ऐसा नहीं किया तो हरियाणा जैसा किस्सा अन्य राज्यों में भी हो सकता है।

Tuesday, 20 August 2019

इस्लामाबाद में लगे अखंड भारत के बैनर

यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों में रहने वाले बलोच समुदाय के लोगों ने 11 अगस्त को बलूचिस्तान दिवस मनाया। इस मौके पर उन्होंने सेमिनार आयोजित कर विश्व समुदाय से मांग की कि उन्हें पाकिस्तान के शिकंजे से आजाद कराया जाए। साथ ही आजादी मिलने तक अपना संघर्ष जारी रखने का संकल्प व्यक्त किया। इस मौके पर बलोच फ्रीडम फ्रंट ने ट्वीट कर दुनिया को बताया कि ब्रिटिश राज के दौरान 11 अगस्त 1947 को बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया गया था लेकिन 27 मार्च 1948 को पाकिस्तानी फौज ने बलूचिस्तान पर कब्जा कर उसे गुलाम बना लिया और इसे कल्पात प्रांत का नाम दे दिया। तभी से बलोच आबादी अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रही है। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान 14 अगस्त 1947 को गठित हुआ था। बर्लिन में बलोच नेशनल मूवमेंट ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया था। जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाली अनुच्छेद 370 को खत्म करने पर पाकिस्तान छाती पीट रहा है। लेकिन वह खुद अपने यहां बलूचिस्तान पर जो जुर्म ढा रहा है उसकी बात नहीं करता। हैरानी नहीं हुई जब हाल ही में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में कई जगह अखंड भारत के समर्थन वाले बैनर दिखाई दिए। इन इलाकों में रेड जोन क्षेत्र, पाकिस्तानी संसद और प्रधानमंत्री आवास से कुछ ही मीटर की दूरी शामिल है। इन बैनरों पर शिवसेना के नेता संजय राऊत का वह बयान लिखा था जिसमें कहा गया थाöआज जम्मू-कश्मीर लिया है, कल बलूचिस्तान व पीओके लेंगे। मुझे भरोसा है कि देश के पीएम नरेंद्र मोदी अखंड भारत का सपना पूरा करेंगे। इस संबंध में पुलिस ने छापे मारकार तीन लोगों को गिरफ्तार भी किया है। भारत सरकार द्वारा सोमवार को जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म करने के बाद इस्लामाबाद में ऐसे पोस्टर दिखाई देने से पाकिस्तान इस कदर बौखला गया है कि वहां के जिला प्रशासन ने नगर निगम को नोटिस जारी कर कहा है कि वह 24 घंटों में बताए कि पोस्टरों को हटाने में पांच घंटे क्यों लगे। कहा जा रहा है कि इन बैनरों और पोस्टरों को इस्लामाबाद में रातोंरात लगा दिया गया था। सुबह होने पर सबसे पहले अपने काम पर जा रहे स्थानीय लोगों ने इन्हें देखा। बैनरों के बारे में खबर फैलने से इस्लामाबाद के निवासियों में गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने सवाल किया कि इस्लामाबाद में कोई किस तरह ऐसी कार्रवाई को अंजाम दे सकता है। स्थानीय लोगों ने कहा कि यह हमारी कानून-व्यवस्था की विफलता है कि राजधानी की सुरक्षा के लिहाज से सबसे अहम क्षेत्रों में इस तरह के बैनर लगाए गए हैं और हमारी एजेंसियां उन्हें रोक तक नहीं पाईं। बता दें कि यह इलाका पाकिस्तान नेशनल असेम्बली, पेएम आवास, इंटेलीजेंस ब्यूरो और आईएसआई मुख्यालय के नजदीक है। यहां कई देशों के दूतावास, विदेश मंत्रालय और प्रमुख सरकारी दफ्तरों की इमारतें भी हैं। ऐसे में भारत के पक्ष में लगने वाले बैनरों का लगना जिला प्रशासन, पुलिस व अन्य पाकिस्तानी एजेंसियों को सवालों के घेरे में ले आया है।

-अनिल नरेन्द्र

मंदी की मार से प्रभावित हमारी अर्थव्यवस्था

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वित्त वर्ष 2024-25 तक भारत को पांच अरब अमेरिकी डॉलर वाली अर्थव्यवस्था बनाने का जो लक्ष्य रखा है वह काफी चुनौतीपूर्ण है। इस वक्त भारत की अर्थव्यवस्था करीब 2.7 अरब अमेरिकी डॉलर की है। मौजूदा स्थिति तो बहुत उत्साहजनक नहीं मानी जा सकती। भारत मंदी के दौर से गुजर रहा है। आर्थिक सर्वे का अनुमान है कि प्रधानमंत्री मोदी के तय किए गए लक्ष्य तक पहुंचने के लिए देश की जीडीपी को हर साल आठ प्रतिशत की दर से बढ़ना होगा। इस लक्ष्य के बरक्स, देश की अर्थव्यवस्था में तरक्की की रफ्तार धीमी हो गई है। ऐसा पिछले तीन साल से हो रहा है। उद्योगों के बहुत से सैक्टर में विकास की दर कई साल में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। देश की अर्थव्यवस्था की सेहत कैसी है, इसका अंदाजा हम इन पांच संकेतों से लगा सकते हैं। पहला जीडीपी (विकास दर) देश के घरेलू सकल उत्पाद यानि जीडीपी में पिछले तीन वित्तीय वर्षों से लगातार गिरावट आ रही है। 2016-17 में जीडीपी विकास दर 8.2 प्रतिशत प्रति वर्ष थी, तो 2017-18 में घटकर 7.2 प्रतिशत रह गई। वर्ष 2018-19 में यह और गिरकर 6.8 प्रतिशत हो गई। ताजा आधिकारिक आंकड़ों पर यकीन करें तो वर्ष 2019 की जनवरी से मार्च की तिमाही में जीडीपी विकास दर 5.8 प्रतिशत ही रह गई, जो पिछले पांच साल में सबसे कम है। केवल तीन साल में विकास दर की रफ्तार में 1.5 प्रतिशत की कमी बहुत बड़ी कमी है। जीडीपी की विकास दर घटने से लोगों की आमदनी, खपत, बचत और निवेश सब पर असर पड़ रहा है। विकास दर घटने से लोगों की आमदनी पर बुरा असर पड़ा है। मजबूरन लोगों को अपने खर्चों में कटौती करनी पड़ रही है। ग्राहकों की खरीददारी के उत्साह में कमी का बड़ा असर ऑटो उद्योग पर पड़ा है। जून 2019 के मुकाबले सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति की बिक्री 16.68 प्रतिशत तक गिरी है। दोपहिया वाहन हीरो मोटर कोर्प की बिक्री 12.45 प्रतिशत गिरी। यह निजी कंपनियों के आंकड़े हैं। बिक्री में गिरावट से निपटने के लिए गाड़ियों के खुदरा बिकेता अपने यहां नौकरियों में कटौती कर रहे हैं। देशभर में ऑटोमोबाइल डीलर्स ने पिछले तीन महीने में ही दो लाख नौकरियां घटाई हैं। यह आंकड़े फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन के हैं। नौकरियों में यह कटौती, ऑटो उद्योग में की गई उस कटौती से अलग है, जब अप्रैल 2019 से पहले 18 महीनों के दौरान देश के 271 शहरों में गाड़ियों के 286 शोरूम बंद हुए थे। इसकी वजह से 32,000 लोगों की नौकरियां चली गईं। खपत की कमी की वजह से टाटा मोटर्स जैसी कंपनी को अपनी गाड़ियों के निर्माण में कटौती करनी पड़ी है। इसका नतीजा यह हुआ कि कलपुर्जों और दूसरे तरीके से ऑटो सैक्टर से जुड़े हुए लोगों पर भी बुरा असर पड़ा है। जैसे कि जमशेदपुर और आसपास के इलाकों में 30 स्टील कंपनियां बंदी की कगार पर खड़ी हैं। जबकि एक दर्जन के करीब कंपनियां तो पहले ही बंद हो चुकी हैं। अर्थव्यवस्था का विकास धीमा होने का रियल एस्टेट सैक्टर पर भी सीधा असर हो रहा है। बिल्डरों का आकलन है कि इस वक्त देश के 30 बड़े शहरों में 12.76 लाख मकान बिकने को पड़े हैं। इसका मतलब है कि इन शहरों में जो मकान बिकने को तैयार हैं उनका कोई खरीददार नहीं है। आमदनी बढ़ नहीं रही, बचत की रकम बिना बिके मकानों में फंसी हुई है और अर्थव्यवस्था की दूसरी परेशानियों की वजह से घरेलू बचत पर भी बुरा असर पड़ रहा है। घरेलू बचत की जो रकम बैंकों के पास जमा होती है, उसे ही वो कारोबारियों को कर्ज पर देते हैं। जब भी बचत में गिरावट आती है बैंकों के कर्ज देने की विकास दर भी घट जाती है। आज सरकारी बैंकों की हालत खस्ता है। उनके पास लोन देने के लिए पैसा ही नहीं है। आमतौर पर जब घरेलू बाजार में खपत कम हो जाती है तो भारतीय उद्योगपति अपना सामान निर्यात करने और विदेश में माल का बाजार तलाशते हैं। लेकिन आज स्थिति यह है कि विदेशी बाजार में भी भारतीय सामान के खरीददारों का विकल्प बहुत सीमित हो गया है। पिछले दो साल से जीडीपी की विकास दर में निर्यात का योगदान घटता जा रहा है। मई महीने में निर्यात की विकास दर 3.9 प्रतिशत थी। लेकिन इस साल जून में निर्यात में (ö) 9.7 प्रतिशत गिरावट आई है। यह चार महीनों में सबसे कम निर्यात दर है। अगर अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल हों तो इसका सीधा असर विदेशी निवेश पर भी पड़ता है। अप्रैल 2019 में भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 7.3 अरब डॉलर था। लेकिन मई महीने में यह घटकर 5.1 अरब डॉलर ही रह गया है। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल का शानदार आगाज हुआ था। लेकिन जल्द ही वो दिशाहीन हो गया। अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक बदलावों के जिस ब्लूप्रिंट की घोषणा हुई थी, उसे 2015 के आखिर में ही त्याग दिया गया। श्रमिक, जमीन से जुड़े कानूनों में बदलाव अधूरे हैं। कृषि क्षेत्र के विकास दर की कमी से निपटने के लिए मेक इन इंडिया की शुरुआत की गई थी, लेकिन उसका हाल भी बुरा है। नोटबंदी, जीएसटी को हड़बड़ी से उठाए गए कदमों का सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। टैक्स सुधारों की जो उम्मीद थी वह इस साल के बजट में कोई इरादा नजर नहीं आया। वित्त मंत्रालय के अधिकारियों द्वारा पीएम कार्यालय को बार-बार आगाह किए जाने के बावजूद मनमोहन सरकार से विरासत में मिली देश की बदहाल बैंकिंग और वित्तीय व्यवस्था की कमियों को दूर करने की नीतियां बनाने पर कोई ध्यान नहीं दिया गया? पिछले कई दशकों में ऐसा पहली बार है जब वित्त मंत्रालय में ऐसा कोई आईएएस अधिकारी नहीं है, जिसके पास अर्थशास्त्र में पीएचडी की डिग्री हो और जो अर्थव्यवस्था की बढ़ती चुनौतियों से निपटने के लिए सरकारी नीतियां बनाने में मदद कर सके।

कश्मीर के हालात सामान्य बने 11 दिनों में?

कश्मीर घाटी में हालात तेजी से सामान्य होते जा रहे हैं। वहां लोगों के रोजमर्रा के कामकाज 11 दिन बाद फिर शुरू हो गए हैं। इसके मद्देनजर सरकार द्वारा संचार व्यवस्था पर लगी पाबंदी हटाने और पूरे राज्य के स्कूल सोमवार से खोलने का ऐलान स्वागतयोग्य है। गृह मंत्रालय के मुताबिक हालांकि आतंकवादी गतिविधियों की आशंका बनी हुई है। इस आशय के खुफिया इनपुट मिल रहे हैं। पाकिस्तान आए दिन भड़काने की पूरी कोशिश कर रहा है। आतंकी संगठन सीमापार से कश्मीरी युवाओं को उकसाने में लगा हुआ है पर हमारे सैन्य बल पूरी तरह से सतर्प हैं। वह किसी भी प्रकार का जोखिम उठाने को तैयार नहीं हैं। पांच अगस्त को जम्मू-कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे को निरस्त कर दिया गया था और उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया गया था। उसके बाद तनाव के हालात तेजी से बदल रहे हैं। शुक्रवार को कई स्थानों पर टेलीफोन और मोबाइल फोन की सेवा बहाल कर दी गई है। सोमवार को स्कूल खुल गए जिससे वहां की जनता को काफी राहत मिली है और जल्द ही सड़कों पर यात्री वाहनों की पाबंदियां भी हटा दी जाएगी। जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव बीआर सुब्रह्मण्यम के मुताबिक प्रदेश में स्थिति पूरी तरह से सामान्य है, तब से न किसी की जान गई है और न ही कोई घायल हुआ है। उन्होंने बताया कि अगले कुछ दिनों में पाबंदियों में व्यवस्थित तरीके से ढील दी जाएगी। गत शुक्रवार की नमाज के बाद हिंसा की कोई वारदात न होना अच्छा संकेत है। जम्मू-कश्मीर के 22 में से 12 जिलों में कामकाज सामान्य ढंग से चल रहा है और महज पांच जिलों में रात की पाबंदियां-भर हैं। आने वाले दिनों में और छूट बढ़ाई जाएगी। जम्मू-कश्मीर में हालात तेजी से सामान्य हो रहे हैं। इसका एक सबूत राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का 11 दिन बाद शुक्रवार को कश्मीर से लौट आने से भी मिलता है। कश्मीर प्रवास के दौरान उन्होंने आतंकियों का गढ़ कहलाने वाले दक्षिण कश्मीर के शोपियां का भी दौरा किया। उन्होंने स्थानीय लोगों के अलावा सुरक्षा बलों को मिलकर उनका मनोबल बढ़ाया। वह अनंतनाग, कुलगाम और पोम्पोर भी गए। इसके अलावा उन्होंने उत्तरी कश्मीर के बारामूला का भी दौरा किया। संबंधित अधिकारियों की मानें तो डोभाल ने वादी में कानून-व्यवस्था की स्थिति को यकीनी बनाए रखने की कवायद के तहत सभी सुरक्षा एजेंसियों को सख्त हिदायत दे रखी है कि वह किसी सूरत में अवाम जनहानि से बचें। डोभाल ने कश्मीर में तैनात पुलिस, सीआरपीएफ, सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठकों में भाग लेने के अलावा उनकी संयुक्त बैठकों को भी संबोधित किया। राज्य के भीतरी इलाको में आतंकरोधी अभियानों, कानून-व्यवस्था से जुड़ी कवायद और एलओसी पर घुसपैठ के मुद्दों पर संबंधित सुरक्षा एजेंसियां और खुफिया एजेंसियों में समन्वय-संवाद-संयुक्त कार्रवाई की कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया। यह प्रसन्नता की बात है कि कश्मीर घाटी में स्थिति सामान्य होती जा रही है। हालांकि ढील देने के पहले ही दिन में पत्थरबाजी शुरू हो गई।

-अनिल नरेन्द्र

पहलू खान को किसी ने नहीं मारा?

देशभर में चर्चित रहे अलवर जिले के पहलू खान मॉब लिंचिंग मामले में छह आरोपियों के कोर्ट से बरी हो जाने पर आश्चर्य भी हुआ और यह चौंकाने वाला फैसला है। न्याय से जुड़े सरोकारों में सबसे पहला यही है कि इस मामले में दुनिया के उन कई शहरों से बेहतर मान सकते हैं, जहां इंसाफ के तराजू को मजहबी और सत्ता के दबाव में जब तक मनमाफिक तरीके से एकतरफा झुका लिया जाता है। पर न्यायिक सक्रियता जैसे चमकदार तमाचे से विभूषित हमारी न्यायाकि व्यवस्था तब निस्संदेह बहुत निराश करती है जब सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि से किसी बड़े मामले में कसूरवार आसानी से बरी हो जाते हैं। गौरतलब है कि एक अप्रैल 2017 को हरियाणा के नूहं मेवात जिले के जयसिंहपुरा गांव में रहने वाले पहलू खान की हत्या भीड़ ने कर दी थी। उस वक्त वह अपने दो बेटों के साथ जयपुर के बाजार दुधारू पशु खरीद कर अपने घर जा रहा था। राजस्थान के अलवर के बहरोड़ पुलिया के पास भीड़ ने उनकी गाड़ी रुकवा कर पहलू खान और उनके बेटों से मारपीट की थी। जब इस घटना की जानकारी पुलिस को मिली तो घटनास्थल पर पुलिस ने पहुंचकर पहलू खान को बहरोड़ के एक अस्पताल में भर्ती कराया। यहां इलाज के दौरान चार अप्रैल 2017 को उनकी मौत हो गई थी। इस मामले में दो अप्रैल को मुकदमा दर्ज हुआ। पुलिस ने इस मामले में पहलू खान के बेटों सहित 44 गवाहों के बयान कोर्ट में करवाए थे। हालांकि पहलू खान के बड़े बेटे इरशाद ने आदेश अपने हक में न आने के बाद कहा कि पहले उन्हें आरोपित पक्ष की ओर से लगातार धमकियां मिल रही थीं। इससे केस प्रभावित हुआ। बता दें कि इस मामले में कुल नौ आरोपी थे। इनमें से तीन आरोपियों की उम्र कम थी यानि वह नाबालिग थे। अदालत ने छह आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। हालांकि उन सभी आरोपियों को जांच के दौरान क्लीन चिट दे दी थी। जिस तरह से सभी छह अभियुक्त बरी हुए हैं, वह हमारी पूरी व्यवस्था के लचर होने से ज्यादा संवेदनशून्य होने की सच्चाई बयां करता है। अलबत्ता सरकारी वकील यह कहकर अपने जमीर के न मरने की खुद गवाही जरूर दे रहे हैं कि वे इस मामले को ऊपरी अदालत में चुनौती देंगे पर जिस तरह जिला अदालत में वे जघन्य अपराध के इस मामले में सबूतों को लेकर ढीले साबित हुए हैं और एक के बाद एक कई गवाह पलटे हैं, उससे उनकी संजीदगी का पता चलता है और हर तरफ से इसे न्याय व्यवस्था की कमजोरी से आगे सिस्टम फेल्योर बताया गया। आप लोगों की समझ से भी यह बात हलक से नहीं उतर रही कि भीड़ के इतने चर्चित मामले में जिसमें घटना के वीडियो साक्ष्य मौजूद थे, पीड़ित ने मरने से पहले खुद बयान दिया था, सैकड़ों लोग इस घटना के गवाह रहे, उसे न्याय की मेज पर अपराध साबित करने में कहां चूक हो गई? अदालत ने वीडियो फुटेज को सबूत नहीं माना। पहलू खान के बेटे आरोपियों की पहचान करने में असफल रहे। जिस व्यक्ति के बारे में दावा किया गया कि उसने घटना की वीडियो बनाया था, उसने कोर्ट में आकर गवाही नहीं दी। मोबाइल लोकेशन से यह साबित नहीं होता कि आरोपियों के पास उस वक्त उनका मोबाइल था या वे वहां मौजूद थे। इस तरह के जघन्य कृत्य के बाद भी अपराधी अगर कानून के हाथों नहीं धरे जाते तो फिर देश-समाज में न्याय और कानून-व्यवस्था के प्रति अवाम की आस्था कैसे मजबूत होगी? पहलू खान मामले में अन्याय का मामला इसलिए भी बड़ा है क्योंकि भीड़ हिंसा देश में कम से कम सरकार की तरफ से ऐसा कुछ नहीं किया गया है जिससे ऐसे दोषियों का मनोबल टूटे और जनता का न्यायपालिका व सरकार द्वारा दोषियों को सजा न मिले। इससे घोर निराशा हुई है। ऐसे लोगों के मंसूबों को आखिर हौंसला कहां से मिल रहा है। ऐसे लोगों के मंसूबों को, हिंसा के खिलाफ अहिंसा का आख्यान अगर उदाहरण न बना, तो देश फिर न्यू इंडिया जैसे उत्साही आह्वानों का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। ऊपर वाला ही तय करेगा कि पहलू खान कैसे मरा? पहलू खान को किसी ने नहीं मारा?

पहले परमाणु नो फर्स्ट यूज की नीति अब हालात पर निर्भर होगी

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने के बाद लगातार भड़काऊ भाषण देने वाले और परमाणु हथियार इस्तेमाल करने की आए दिन धमकी देने पर पाकिस्तान को भारत ने उसी लहजे में जवाब दिया है। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ नियुक्त करने के पीएम नरेंद्र मोदी के ऐलान के बाद रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि भारत परमाणु हथियार के इस्तेमाल पर संयम के सिद्धांत को बदल सकता है। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कहाöनो फर्स्ट यूज भारत की परमाणु नीति है, लेकिन भविष्य में क्या होगा यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है। यह बयान सरकार के सामरिक नीति में बड़े बदलाव का संकेत है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की प्रथम पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि देने पोखरण गए रक्षामंत्री ने वहां से लौटने के बाद ट्वीट कर यह जानकारी दी। 13 मई 1998 को अटल सरकार ने पोखरण में दूसरा परमाणु परीक्षण किया था। फिर पाकिस्तान ने भी परमाणु परीक्षण किया। तब भारत ने कहा था कि वह इस शक्ति का इस्तेमाल पहले नहीं करेगा और भारत नो फर्स्ट यूज की नीति पर चलेगा। कश्मीर के मामले में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में पूरी तरह अलग-थलग हुए पाकिस्तान की इमरान खान की सरकार को व पाकिस्तानी सेना को अब यह सच्चाई समझने में देर नहीं करनी चाहिए कि परमाणु हथियारों के बार-बार सहारे जो ब्लैकमेलिंग की नीति उसने अपना रखी है अब उसकी कोई गुंजाइंश नहीं रह गई है और वह बार-बार युद्ध का जो डर दिखाते रहते हैं वह उनके खोखलेपन को ही उजागर करता है। गृहमंत्री के ताजा बयान से यह भी जाहिर होता है कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में देश मजबूत रहेगा ही नहीं, दिखेगा भी। जिस मजबूती से सर्जिकल स्ट्राइक की गई। जिस संकल्प के साथ अनुच्छेद 370 को हटाया गया उसी दृढ़ता से देश की सुरक्षा के इंतजाम किए जाएंगे। इसके लिए जरूरत हुई तो परंपरा से हटकर भी फैसले लिए जाएंगे। दबे लफ्जों में भारत ने स्पष्ट कर दिया कि वह पाकिस्तान द्वारा बम गिराने की प्रतीक्षा नहीं करेगा। अगर उसे लगा कि पाकिस्तान परमाणु हथियार चलाने वाला है तो भारत उससे पहले ही जवाबी कार्रवाई कर देगा। ध्यान रहे कि 2014 के भाजपा के घोषणा पत्र में वादा भी किया गया था कि परमाणु हथियारों के उपयोग को लेकर नीति का अध्ययन किया जाएगा और फिर उसमें बदलाव किया जाएगा। हालांकि 2019 के घोषणा पत्र में इसका जिक्र हटा लिया गया था। देश के प्रधानमंत्री के पास परमाणु हमले का अंतिम निर्णय होता है। मगर वह भी अकेले यह फैसला नहीं कर सकते। उनके पास स्मार्ट कोड होता है मगर परमाणु बम को दागने के लिए असली बटन परमाणु कमांड की सबसे नीची टीम के पास होता है, जो सही चैनल से मिले निर्देश पर ही काम करती है। प्रधानमंत्री इनसे लेकर ही अंतिम निर्णय ले सकते हैं। पहला, सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी। दूसरा, राष्ट्रीय सलाहकार। तीसरा, चेयरमैन ऑफ चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी से। पाकिस्तानी शासन और सेना के लिए यह समझ लेना आवश्यक है कि अगर परिस्थितियों ने भारत को इस संकल्प (नो फर्स्ट यूज) से बाहर निकलने के लिए विवश किया गया तो वह ऐसा करने में हिचकिचाएगा नहीं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने अब तो खुद स्वीकार कर लिया है कि बालाकोट में जो हुआ वह पाकिस्तान की देन है। उन्होंने पुलवामा आतंकी हमले के बाद सैन्य कार्रवाई करके आगे भी हमले करने के स्पष्ट संकेत दिए हैं। हम उम्मीद करते हैं कि पाकिस्तान परमाणु हमला करने का सोचें भी नहीं। अगर अपनी बौखलाहट में उसने ऐसा करने की ठान ही ली तो भारत उनके बम का इंतजार अब नहीं करेगा।

Saturday, 17 August 2019

आजम खान की मुश्किलें बढ़ीं, 27 प्राथमिकियां दर्ज

समाजवादी पार्टी के नेता एवं लोकसभा सांसद आजम खान की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। ताजा मामला हैöआरोप है कि उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में वह जो विश्वविद्यालय चला रहे हैं, उसे शत्रु सम्पत्ति कानून का उल्लंघन है और इस पर कब्जा किया गया जिसके बाद प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने धन शोधन मामले के तहत जांच शुरू कर दी है। शत्रु सम्पत्ति वह अचल सम्पत्ति है जिसे पाकिस्तान के बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए लोगों और 1962 भारत-चीन युद्ध के बाद चीन जा चुके लोग यहां छोड़ गए हैं। आंकड़ों के मुताबिक पाकिस्तानी नागरिकों ने करीब 9280 ऐसी सम्पत्तियां छोड़ी हैं जबकि चीनी नागरिकों ने 126 सम्पत्तियां छोड़ी हैं। रामपुर से लोकसभा सांसद और अखिलेश यादव के शासनकाल में राज्य के कैबिनेट मंत्री रहे आजम खान पर केंद्रीय एजेंसी धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर चुकी है। ईडी के निशाने पर मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय है जिसे खान ने 2006 में स्थापित किया था। बताया जाता है कि विश्वविद्यालय में तीन हजार छात्रों का नामांकन है और यह 121 हेक्टेयर में फैला हुआ है। सूत्रों के मुताबिक अगर जमीन हड़पने और शत्रु सम्पत्ति कानून का उल्लंघन करने के आरोप सही पाए जाते हैं तो प्रवर्तन निदेशालय धन शोधन निवारण कानून के प्रावधानों के तहत जल्द ही विश्वविद्यालय परिसर को जब्त कर सकता है। पिछले एक महीने में करीब 27 प्राथमिकियां दर्ज कराई जा चुकी हैं। पुलिस ने बताया कि यह सभी मामले रामपुर में उनके विश्वविद्यालय के लिए किसानों की जमीन हड़पने से जुड़े हैं। रामपुर के पुलिस अधीक्षक अजय पाल शर्मा ने कहा कि 11 जुलाई से करीब दो दर्जन किसान विश्वविद्यालय के लिए उनकी जमीन का अतिक्रमण किए जाने के आरोप के साथ पुलिस के पास आ चुके हैं। हमने इन मामलों में 27 प्राथमिकियां दर्ज की हैं और जांच जारी है। उन्होंने बताया कि यह मामले भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 323 (जानबूझ कर चोट पहुंचाना), 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना), 447 (आपराधिक अतिक्रमण), 389 (वसूली के लिए किसी व्यक्ति को आरोपी बनाए जाने का डर दिखाना) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दर्ज किए गए हैं। अब रामपुर में भू-माफिया घोषित आजम खान को गिरफ्तारी का भय सता रहा है। आजम खान ने गिरफ्तारी के डर से रामपुर जिला जज की कोर्ट में शरण ली है। अपनी संभावित गिरफ्तारी में अग्रिम जमानत के लिए अदालत में प्रार्थना पत्र दिए हैं। जमीन पर कब्जा करने के अलावा रामपुर पुलिस ने विश्वविद्यालय के अधिकारियों के खिलाफ 16 जून को एक आपराधिक मामले को दर्ज किया था। यह मामला 250 साल पुराने रामपुर के ओरियंटल कॉलेज के प्रधानाचार्य की शिकायत पर दर्ज किया गया था। आरोप है कि वहां से करीब 9000 किताबें चोरी कर उन्हें जौहर विश्वविद्यालय में रख लिया गया है।

-अनिल नरेन्द्र

प्रधानमंत्री के संबोधन से निकले संदेश और संकेत

दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त को प्रधानमंत्री का जो संबोधन होता है उसमें न सिर्प अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिनाना होता है बल्कि भावी रणनीति को भी दर्शाया जाता है। इसके साथ ही उससे अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संदेश भी दिए जाते हैं। इस बार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसे ही संदेश दिए। ज्वलंत कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने को लेकर देश में अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं उभर रही हैं, सो उस पर बोलना स्वाभाविक ही था। प्रधानमंत्री ने उन वजहों को रेखांकित किया, जिसके चलते इस धारा को हटाना अनिवार्य हो गया था और आगे के रोडमैप का भी जिक्र किया। मुझे याद है कि जब 2014 में उन्होंने इसी अवसर पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए लाल किले की प्राचीर से स्वच्छ भारत अभियान की घोषणा की थी, तब शायद ही किसी को अहसास था कि वह आने वाले समय में जन आंदोलन का रूप लेगा, जैसा उसने लिया। इस बार स्वतंत्रता दिवस की 73वीं वर्षगांठ पर उन्होंने जल संरक्षण की आवश्यकता जताते हुए घर-घर पानी पहुंचाने के लिए जल जीवन मिशन की घोषणा की है। इस लोक कल्याणकारी कदम के अलावा प्रधानमंत्री ने महात्मा गांधी की 150वीं जयंती को अविस्मरणीय बनाने के लिए दो अक्तूबर से प्लास्टिक की विदाई अभियान की भी घोषणा कर दी है। एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी का नेतृत्व कसौटी पर होगा। क्योंकि जन सामान्य की भागीदारी के बिना यह अभियान सफल नहीं हो सकता। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में बहुत कुछ उल्लेखनीय कहा, लेकिन जो महत्वपूर्ण है वह था जो उन्होंने बढ़ती आबादी की चुनौतियों को रेखांकित करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों से अपील की कि वे जनसंख्या नियंत्रण के उपायों के बारे में भी सोचें और भावी कदम उठाएं। उन्होंने जिस तरह सीधे-सपाट शब्दों में कहा कि छोटा परिवार रखना भी अपनी देशभक्ति प्रकट करने का तरीका है और हर किसी को यह सोचना चाहिए कि जो शिशु धरती पर आने वाला है उसकी आवश्यकताएं कैसे पूरी की जाएंगी, उस पर सभी को ध्यान देने की आवश्यकता है। इसके अलावा प्रधानमंत्री ने एक बड़ी घोषणा की कि सेना के तीन अंगों के सुचारू संचालन के लिए एक चीफ ऑफ डिफेंस की नियुक्ति की। यह मांग कारगिल युद्ध के समय से ही उठाई जा रही थी, पर किन्हीं वजहों से टलती जा रही थी। नई चुनौतियों का सामना करने के लिए रणनीतिक स्तर पर फैसला सराहनीय है। अपने दूसरे कार्यकाल में अपने पहले भाषण में प्रधानमंत्री ने अर्थव्यवस्था को खास तवज्जो देते हुए कहा कि इंफ्रास्ट्रक्चर पर 100 लाख करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। अगले पांच साल में भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी बनाने का लक्ष्य दोहराते हुए उन्होंने कहा कि 130 करोड़ देशवासी यदि छोटी-छोटी चीजों को लेकर चल पड़ें तो यह लक्ष्य हासिल करना संभव है। इसके लिए उन्होंने मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की बात कही और लकी कल के लिए लोकल कल का मंत्र दिया। प्रधानमंत्री ने स्वास्थ्य, पर्यावरण आदि के क्षेत्र में बेहतरी लाने के साथ पर्यटन क्षेत्र को मजबूत बनाने पर भी जोर दिया। देश में पर्यटन की आपार संभावनाएं हैं। अगर इस पर ठीक से ध्यान दिया जाए तो यह एक नए रोजगार पैदा करने और राजस्व की दृष्टि से बहुत मददगार साबित हो सकता है। करीब 94 मिनट के भाषण में मोदी ने राष्ट्रीय जीवन के विभिन्न पहलुओं को छूने की कोशिश की पर उनका मेन फोकस दो बातों पर केंद्रित थाöसरकार की 75 दिनों की उपलब्धियां और भावी एजेंडा। स्वाभाविक था कि वे तीन तलाक कानून और अनुच्छेद 370 35ए को हटाए जाने की चर्चा करते। विरोधियों को आड़े हाथों लेना नहीं भूले। ऐसा हुआ भी। इससे उन्होंने सरकार की नीति और दिशा को स्पष्ट कर दिया यानि एक देश, एक संविधान। देखना अब यह होगा कि आत्मविश्वास से भरपूर प्रधानमंत्री और उनकी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में अपने संकल्पों को साकार करने में कितनी कामयाब होती है। प्रधानमंत्री ने अपने दूसरे कार्यकाल के शुरुआती 75 दिनों में जैसे ऐतिहासिक फैसले लिए हैं उससे यह भरोसा मजबूत होता है कि लाल किले से प्रधानमंत्री ने जो भी घोषणाएं की हैं और भावी भारत का जो खाका खींचा है वैसा वास्तव में हो सकेगा।

Friday, 16 August 2019

देश की सुरक्षा के अहम रणनीतिकार अजीत डोभाल

चाणक्य जैसा दिमाग और बाजीराव जैसा हौंसला रखने वाले अजीत डोभाल का नाम आज बच्चा-बच्चा जानता है। अजीत डोभाल मोदी सरकार के रणनीतिक मास्टर हैं। अहम रणनीतिक व कूटनीतिक मामलों में उनकी राय मोदी सरकार में अहम रही है। 1945 में एक गढ़वाली उत्तराखंड ब्राह्मण परिवार में जन्मे अजीत डोभाल का जन्म हुआ। उनके पिता आर्मी में ब्रिगेडियर थे। 1968 में आईपीएस परीक्षा में उन्होंने टॉप किया और केरल बैच के आईपीएस अफसर बने। 17 साल की ड्यूटी के बाद ही मिलने वाला मैडल उन्हें छह साल की ड्यूटी के बाद ही मिल गया। डोभाल ने 33 साल से अधिक समय तक गुप्तचर अधिकारी के तौर पर काम किया। रॉ के अंडर कवर एजेंट के तौर पर डोभाल सात साल पाकिस्तान में मुस्लिम बनकर रहे। ऑपरेशन ब्लू स्टार में जीत के नायक बने। डोभाल रिक्शा वाला बनकर मंदिर में गए और आतंकवादियों की जानकारी सेना को दी। 1987 में खालिस्तानी आतंकवाद के समय पाकिस्तानी एजेंट बनकर दरबार साहब के अंदर पहुंचे। तीन दिन आतंकवादियों के साथ रहे और आतंकियों की सारी जानकारी लेकर ऑपरेशन ब्लैक थंडर को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। 1988 में कीर्ति चक्र मिला। वह देश के एकमात्र गैर-सैनिक थे जिन्हें यह सम्मान मिला। आरएसएस के करीब होने के कारण मोदी ने सत्ता में आते ही उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) बनाया। बलोचिस्तान में रॉ फिर से सक्रिय की। बलोचिस्तान का मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय बनाया। जब केरल की 45 नर्सों का आईसिस ने अपहरण किया तो डोभाल खुद इराक गए और पहली बार इस्लामिक स्टेट से अपहरण की गई नर्सों को जिन्दा, बिना बलात्कार हुए वापस सुरक्षित ले आए। डोभाल को राष्ट्रपति अवॉर्ड भी मिल चुका है।  मई 2015 में भारत के पहले सर्जिकल स्ट्राइक ऑपरेशन को उन्होंने ही अंजाम दिया। भारत की सेना म्यांमार में पांच किलोमीटर तक घुसी और 50 आतंकवादी मारे गए। सितम्बर 2016  आजाद भारत के इतिहास का 1971 के बाद सबसे ऐतिहासिक दिन रहा। डोभाल के बुने गए सर्जिकल ऑपरेशन को सेना ने दिया अंजाम। आजाद कश्मीर (पीओके) में तीन किलोमीटर भारतीय सेना घुसी और 40 आतंकी और नौ पाकिस्तानी सैनिक मारे गए। दोनों सर्जिकल स्ट्राइकों में भारत का कोई सैनिक नहीं मरा। एक वो बाजीराव था जो कहा करता था कि मैं दिल्ली जीत सकता हूं। एक डोभाल है जो कहते हैं कि मैं इस्लामाबाद जीत सकता हूं। अनुच्छेद 370 हटने के बाद से ही डोभाल कश्मीर घाटी में मोदी जी के मैन ऑन द स्पॉट बने हुए हैं। अजीत डोभाल लगातार कश्मीर के अलग-अलग हिस्से में नजर रखे हुए हैं। श्रीनगर, सौरा, पम्पोर, लाल चौक, हजरतबल, बड़गांव और दक्षिण कश्मीर के जिले पुलवामा, अवंतीपुर में लोगों से मिल रहे हैं। उन्होंने श्रीनगर के मशहूर लाल चौक पर लोगों से मिलकर उनकी समस्याएं और परेशानियों का जायजा लिया। कश्मीरी अवाम से मिलने के बाद अधिकारियों को जरूरी निर्देश भी दिए। उन्होंने घाटी की सुरक्षा स्थिति का जायजा लेने के लिए शहर और दक्षिण कश्मीर इलाकों का हवाई सर्वेक्षण भी किया। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी अधिकतर कार्रवाइयों का श्रेय अजीत डोभाल को जाता है।

-अनिल नरेन्द्र

हांगकांग की स्थिति विस्फोटक बनी हुई है, बम कभी भी फट सकता है

हांगकांग में पिछले करीब दो महीने से विरोध प्रदर्शनों का जो दौर जारी हुआ है वह थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। हांगकांग प्रशासन और चीन के लिए मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। बता दें कि लोकतंत्र समर्थक हजारों प्रदर्शनकारियों ने एयरपोर्ट पर धरना दे रखा है। इस वजह से विमानों का परिचालन रद्द करना पड़ा, उससे तो यही लगता है कि ताजा विवाद का कोई हल निकलने के बजाय यह मामला और ज्यादा उलझता जा रहा है। वहां हंगामे की जड़ है प्रत्यर्पण विधेयक, जिसमें प्रावधान है कि अगर कोई व्यक्ति चीन में अपराध करके हांगकांग में शरण लेता है तो उसे जांच प्रक्रिया में शामिल होने के लिए चीन भेज दिया जाएगा। यह बिल पास हुआ तो चीन को उन क्षेत्रों में भी संदिग्धों को प्रत्यर्पित करने की अनुमति मिल जाएगी, जिनके साथ हांगकांग के समझौते नहीं हैं। जैसे आरोपित व्यक्ति को ताइवान और मकाओ में भी प्रत्यर्पित किया जा सकेगा। खबरों के मुताबिक ताजा प्रदर्शन के दौरान लोगों के हाथों में मौजूद तख्तियों पर लिखा थाöहांगकांग हमारी हत्या कर रहा है, हांगकांग अब सुरक्षित नहीं रह गया है। लेकिन इसके बरक्स चीन ने इस प्रदर्शन के दौरान वहां के पुलिस अधिकारियों पर पेट्रोल बम फेंकने जैसी हिंसा को आतंकवाद से जोड़ा है तो हालात की जटिलता का अंदाजा लगाया जा सकता है। चीन की आधिकारिक संवाद एजेंसी शिन्हुआ ने प्रदर्शनकारियों को गुंडा करार देते हुए चेताया है कि उन्हें मनाया नहीं जाएगा और संभावना जताई कि प्रदर्शनकारियों पर काबू पाने के लिए चीनी सुरक्षा बल दखल देंगे। सीसीटीवी चैनल की ओर से चेतावनी दी गई है कि आतंक से निपटने में नरमी नहीं बरती जाएगी। सरकार संचालित मीडिया ने ऐसे वीडियो प्रदर्शित किए हैं, जिनमें चीनी सेना और उसके बख्तरबंद वाहन हांगकांग की सीमा से लगे शेनझेन शहर में एकत्र होते दिख रहे हैं। गौरतलब है कि हांगकांग अभी चीन का हिस्सा है, मगर वहां एक देश दो व्यवस्था के तहत शासन का संचालन होता है। इसका मतलब यह है कि हांगकांग के पास स्वायत्तता है और चीन के बाकी नागरिकों के मुकाबले इसके नागरिकों के पास कुछ विशेष अधिकार हैं। लेकिन वहां के प्रत्यर्पण बिल में किए गए नए बदलावों की घोषणा के बाद चीन को हांगकांग में  किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेकर पूछताछ करने और उसे वापस भेजने को लेकर कई अधिकार प्राप्त हो जाएंगे। बाकी मामलों पर चीन का जो रुख रहा है, उसे देखते हुए ताजा कवायद ने स्वाभाविक ही वहां के लोगों की चिन्ता को बढ़ा दिया है। हांगकांग निवासियों का मानना है कि नए बिल के लागू होने के बाद न सिर्प यहां के लोगों पर चीन का कानून लागू हो जाएगा, बल्कि यह सीधे तौर पर हांगकांग की स्वायत्तता को भी प्रभावित करेगा। जून में इस बिल को पास करने की कोशिश की गई तो इसका जबरदस्त विरोध शुरू हो गया। हांगकांग की चीफ एक्जीक्यूटिव कैरी लैम ने जनता के भारी विरोध को देखते हुए 15 जून को बिल को अस्थायी रूप से निलंबित करने का ऐलान कर दिया। लेकिन आंदोलनकारियों की मांग बिल को सिरे से रद्द करने की है। कैरी लैम की छवि हांगकांग की राजनीति में चीन समर्थक नेता की है। 1997 में ब्रिटेन और चीन के बीच हुए समझौते से चीन को अपना यह पुराना द्वीप वापस मिला। समझौते में एक देश-दो व्यवस्था की अवधारणा के साथ हांगकांग को अगले 50 वर्षों के लिए अपनी स्वतंत्रता के अलावा सामाजिक, कानूनी और राजनीतिक व्यवस्था भी बनाए रखने की गारंटी दी गई है। आंदोलनकारियों का मानना है कि प्रत्यर्पण विधेयक के लागू होने के बाद न सिर्प यहां के लोगों पर चीन का कानून लागू हो जाएगा, बल्कि यह सीधे तौर पर हांगकांग की स्वायत्तता को भी प्रभावित करेगा। चीन का वैसे ऐसे मामलों में जो रिकॉर्ड रहा है उसे देखते हुए इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस कानून के अस्तित्व में आने के बाद शक के घेरे में आए लोगों को मनमाने आरोपों के तहत गिरफ्तार और प्रताड़ित किया जाए। हांगकांग में स्थिति विस्फोटक बनी हुई है। चीन इस प्रकार के आंदोलनों को बलपूर्वक कुचलता है, कहीं हांगकांग में भी ऐसा न हो?

Thursday, 15 August 2019

370 मसले पर पाकिस्तान को मुस्लिम देशों का भी समर्थन नहीं मिला

मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे अनुच्छेद 370 को खत्म करने की संसद में घोषणा की तो पाकिस्तान तत्काल सक्रिय हो गया। भारत सरकार के इस फैसले पर पाकिस्तान की तत्काल और तीखी प्रतिक्रिया आई। इस फैसले की निन्दा करते हुए भारत के साथ लगभग सारे द्विपक्षीय संबंध तोड़ लिए। भारत के राजदूत को वापस भेज दिया गया और सारे व्यापारिक रिश्ते खत्म करने की घोषणा की। इसी के साथ पाकिस्तान ने डिप्लोमेटिक ओफेसिंव भी शुरू कर दिया। उसे बहुत उम्मीद थी कि कम से कम इस्लामिक देशों से तो उसे अपने स्टैंड पर समर्थन मिलेगा। पाकिस्तान इस मामले को लेकर मुस्लिम देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन यानि ओआईसी में भी ले गया। जिसके दुनियाभर के 57 मुस्लिम बहुल देश सदस्य हैं। ओआईसी ने जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन की तो निन्दा की पर साथ-साथ यह भी कहा कि इसे सुलझाने के लिए दोनों पक्षों में बातचीत शुरू की जाए। पाकिस्तान के विदेश मंत्री महमूद कुरैशी भारत की शिकायत लेकर चीन गए। चीन ने भी कहा कि कश्मीर समस्या का समाधान दोनों देश मिलकर सुलझाएं और भारत को चाहिए कि यथास्थिति बनाए रखे। चीन लद्दाख पर अपना दावा पेश करता रहा है इसलिए लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश पर बहरहाल उसने आपत्ति जरूर की पर फिर भी मसले को आपसी सहमति से सुलझाने की बात कही। पाकिस्तान ने बहुत ही उम्मीद के साथ मुस्लिम देशों की तरफ निगाहें टिकाईं। खासकर मध्य-पूर्व के मुस्लिम देशों की ओर। पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा झटका संयुक्त अरब अमीरात का रहा। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मोहम्मद फैसल से एक पत्रकार ने पूछा कि भारत का मुकाबला पाकिस्तान कैसे करेगा? इस पर उन्होंने कहा कि हम मुसलमान हैं और हमारी डिक्शनरी में डर नाम का कोई शब्द नहीं है। भारत में यूएई के राजदूत ने दिल्ली की लाइन को मान्यता देते हुए कहा कि भारत सरकार का जम्मू-कश्मीर में बदलाव का फैसला उसका आंतरिक मामला है और इससे प्रदेश की प्रगति में मदद मिलेगी। हालांकि इसके बाद यूएई के विदेश मंत्री ने थोड़ी नरमी दिखाते हुए कहा कि दोनों पक्षों को संयम और संवाद से काम लेना चाहिए। यूएई के बयान की तरह ही मध्य-पूर्व के बाकी मुस्लिम देशों का भी बयान आया। इनमें साऊदी अरब, ईरान और तुर्की शामिल हैं। तीनों देशों ने कहा कि भारत और पाकिस्तान आपस में बात कर मसले को सुलझाएं और तनाव कम करें। हालांकि तुर्की को लेकर पाकिस्तानी नेता और मीडिया ने दावा किया कि तुर्की के राष्ट्रपति रेयेप तैय्यब अर्दोवान से प्रधानमंत्री इमरान खान की बात हुई और तुर्की ने पाकिस्तान को इस मसले पर आश्वस्त किया है। आखिर मध्य-पूर्व से इतनी ठंडी प्रतिक्रिया क्यों आई? एक बड़ा कारण तो यह है कि मध्य-पूर्व के मुस्लिम देशों के लिए पाकिस्तान की तुलना में भारत ज्यादा महत्वपूर्ण कारोबारी साझेदार है। पाकिस्तान की तुलना में भारत की अर्थव्यवस्था का आकार नौ गुना बड़ा है। जाहिर है कि भारत इन देशों में कारोबार और निवेश का ज्यादा अवसर दे रहा है। इसके उलट पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था संकट से जूझ रही है। ओआईसी ने भारत का अहम मौकों पर समर्थन करने वाले मुस्लिम देश काफी मुखर रहे हैं। वो चाहे ईरान हो या इंडोनेशिया हो। भारत का संबंध सऊदी से भी अच्छा है और ईरान से भी। भले ही सऊदी और ईरान में शत्रुता क्यों न हो। ईरान कश्मीर मुद्दे पर भारत के साथ रहा है। ऐसा शायद इसलिए भी है कि उसे भी पाकिस्तान के साथ अपनी सीमाओं में समस्या है। ईरान पाकिस्तान पर आरोप लगाता रहा है कि वो सऊदी अरब के पीछे आंख मूंद कर चल रहा है और उसके लिए बलोच विद्रोहियों को मदद पहुंचाता है। बलोच विद्रोही ईरानी सुरक्षा बलों को निशाने पर लेते रहे हैं। पाकिस्तान हर हाल में चाहता है कि वो एफएटीएफ से ब्लैकलिस्ट न हो। कुल मिलाकर यह भारत की बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत है कि पाकिस्तान का आज मुस्लिम बहुल देश भी 370 पर समर्थन नहीं कर रहे हैं। हम पाकिस्तान की बौखलाहट को समझ सकते हैं।

-अनिल नरेन्द्र

कश्मीर पर सुप्रीम कोर्ट का दखल देने से इंकार

जम्मू-कश्मीर में संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को निरस्त करने के बाद राज्य में कुछ प्रतिबंध लगाने और अन्य कड़े उपाय करने के केंद्र के फैसले के खिलाफ विभिन्न दायर याचिकाओं पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई की। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 मामले में दखल देने से इंकार कर दिया है। कोर्ट ने मंगलवार को इस मुद्दे पर सुनवाई करते हुए कहा कि मामला गंभीर है और कानून-व्यवस्था से जुड़ा है। सरकार पर भरोसा रखना चाहिए। रातोंरात कुछ नहीं हो सकता। कांग्रेस एक्टिविस्ट तहसीन पूनावाला की ओर से दाखिल अर्जी में कहा गया था कि घाटी में फोन और इंटरनेट सेवाएं बंद होने के अलावा कई तरह के प्रतिबंध लागू हैं। वहां असल में क्या हो रहा है, किसी को नहीं पता। इनके खिलाफ केंद्र को तुरन्त निर्देश जारी किया जाए। जस्टिस अरुण मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने इससे इंकार करते हुए कहा कि हालात सामान्य होने का इंतजार किया जाए। कोर्ट ने केंद्र की तरफ से पेश अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से पूछा कि यह स्थिति कब तक बनी रहेगी? अटॉर्नी जनरल ने बताया कि सभी पहलुओं को देखा जा रहा है। हम रोजाना स्थिति का आकलन कर रहे हैं। 2016 में हिज्बुल आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद भी इसी तरह की स्थिति बनी थी, तब उसे काबू करने में तीन महीने लगे थे। उस दौरान 47 लोग मारे गए थे। लेकिन इस बार पिछले सोमवार से एक भी मौत नहीं हुई है। इस दौरान याचिकाकर्ता की वकील मेनका गुरुस्वामी ने आरोप लगाया कि लोग अस्पताल और थाने तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। इस पर कोर्ट ने पूछा कि ऐसे प्रभावित कौन हैं? अदालत ने साफ किया कि जम्मू-कश्मीर में यही स्थिति जारी रहती है तो तथ्यों के साथ सामने आएं। इस मामले को देखेंगे। सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि सरकार का प्रयास सामान्य स्थिति बहाल करने का है, इसलिए वह दैनिक आधार पर स्थिति की समीक्षा कर रहे हैं। यदि जम्मू-कश्मीर में कल कुछ हो गया तो इसके लिए जिम्मेदार कौन होगा? निश्चित ही केंद्र। वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी से कहा कि वह स्पष्ट रूप से  बताएं, जहां राहत की आवश्यकता है। पीठ ने कहा कि आप हमें स्पष्ट दृष्टांत बताएं और हम उन्हें राहत उपलब्ध कराने का निर्देश देंगे। मेनका जब यह दलील दे रही थीं कि राज्य में हर तरह के संचार माध्यम ठप कर दिए गए हैं और त्यौहार के अवसर पर लोग अपने परिजनों का हालचाल तक नहीं पूछ सकें, पीठ ने कहा कि रातोंरात कुछ भी नहीं हो सकता। कुछ गंभीर मुद्दे हैं। हालात सामान्य होंगे और हम उम्मीद करते हैं कि ऐसा समय के साथ होगा। इस समय यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि किसी की जान नहीं जाए। पीठ ने इस मसले को दो सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश देते हुए कहा कि लोगों की स्वतंत्रता के अधिकार के मुद्दे पर हम आपके साथ हैं। लेकिन इसके लिए हमारे सामने सही तस्वीर होनी चाहिए। इससे पहले सुनवाई शुरू होते ही गुरुस्वामी ने सवाल उठाया कि संचार व्यवस्था पर पूरी तरह पाबंदी कैसे लगाई जा सकती है? राज्य में तैनात सैनिक भी अपने परिवारों के सदस्यों से बात नहीं कर पा रहे हैं। इस पर पीठ ने जानना चाहा कि आप जवानों की समस्याओं को कैसे उठा रहे हैं, यह तो आपकी प्रार्थना नहीं है। जवानों को अनुशासन बनाकर रखना है और यदि उन्हें कोई शिकायत है तो उन्हें हमारे पास आने दीजिए। गुरुस्वामी ने जब अनुच्छेद 370 का हवाला देने का प्रयास किया तो पीठ ने उन्हें आगाह किया कि इस तरह का कोई बयान मत दीजिए। उन्होंने कहा था कि वह अनुच्छेद 370 पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहीं लेकिन वह लोगों के संवैधानिक अधिकार के मुद्दे पर हैं।

Tuesday, 13 August 2019

कराची में मीका की परफॉर्मेंस पर छिड़ा विवाद

बॉलीवुड सिंगर मीका सिंह का विवादों से पुराना संबंध है। वह अकसर किसी न किसी विवाद में फंसते नजर आते हैं। ताजा विवाद कश्मीर धारा 370 समाप्त होने के मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच मीका सिंह के कराची में एक अरबपति की बेटी की शादी में परफॉर्मेंस को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। मीका जिस अरबपति पाकिस्तानी की बेटी की शादी में परफॉर्म करने गए उसे पूर्व तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ का करीबी माना जाता है। अरबपति की बेटी मीका की बहुत बड़ी प्रशंसक है और वह अपनी शादी के मौके पर मीका को लाइव परफॉर्म करते देखना चाहती थी। खबरों के मुताबिक आठ अगस्त, गुरुवार को मीका ने कराची में इस शादी में परफॉर्म किया था। भारत ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को सोमवार को खत्म कर दिया था और उसके तीन दिन बाद मीका का कराची में यह शो हुआ। सूत्रों के मुताबिक मीका ने इस परफॉर्मेंस के लिए मोटी रकम ली थी। उनकी मौजूदगी की खबर तब सामने आई जब कुछ मेहमानों ने उनका वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किया। मीका की इसके लिए सोशल मीडिया पर जमकर आलोचना हो रही है। पाकिस्तान में भी इस मुद्दे पर सियासत शुरू हो गई है। बिलावल भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) ने दोनों मुल्कों में तनाव के बीच भारतीय गायक के कराची में परफॉर्मेंस पर सवाल उठाते हुए इमरान खान सरकार को घेरने की कोशिश की। पीपीपी नेता सैयद खुर्शीद शाह ने कहा कि इस मामले की जांच होनी चाहिए कि मीका को सुरक्षा मंजूरी किसने दी और उन्हें और उनके दल को पाकिस्तान का वीजा कैसे जारी किया गया? मीका को इस प्रस्तुति के लिए कहा जा रहा है कि करीब 1,50,000 अमेरिकी डॉलर का भुगतान किया गया। पंजाबी गायक के इस कार्यक्रम से उनके भारतीय प्रशंसक भी खफा हैं, जिन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर की एक ट्विटर यूजर ने लिखाöदेशद्रोही तुम्हें शर्म आनी चाहिए। एक अन्य ने लिखाöमीका सिंह पाजी हम भारतीयों ने आपको बहुत प्यार दिया और जब पाकिस्तान ने हमसे सारे संबंध तोड़ लिए हैं, सीमा पार से आतंकवादियों को भेज रहा है, हमारी चिंताएं बढ़ा दी हैं, ऐसे हालात में आप एक कार्यक्रम के लिए पाकिस्तान क्यों गए? क्या चन्द रुपए आपके लिए भारत से बड़े हैं?

-अनिल नरेन्द्र

क्या सोनिया कांग्रेस की डूबती नैया को पार लगा पाएंगी?

एक बार फिर मुश्किल दौर में सोनिया गांधी ने कांग्रेस का नेतृत्व थामने पर मजबूर हुईं। जब 1998 में वह अध्यक्ष बनी थीं तब भी कांग्रेस लगातार हार रही थी और पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा हुआ था। आज की तरह तब भी विपक्ष बिखरा हुआ था। तब भी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा से मुकाबला करना अगर मुश्किल था तो आज के नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी से मुकाबला करना तो और भी ज्यादा मुश्किल है। लोकसभा चुनाव में करारी हार के कारण राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद से कांग्रेस नेतृत्व संकट से जूझ रही थी। हालांकि कोई दूसरा चेहरा लाने से पहले राहुल को अंत तक मनाने की कोशिश होती रही। जब राहुल पार्टी के करीबी नेताओं की अपील के बाद भी अपने रुख पर कायम दिखे तो किसी और नेता पर आम सहमति नहीं बनी। मजबूरी में सोनिया गांधी को पार्टी को व लंबी विरासत को बचाने के लिए अध्यक्ष पद स्वीकार करना पड़ा। हालांकि यह मेक शिफ्ट अरेंजमेंट तब तक का है जब तक स्थायी अध्यक्ष नहीं चुना जाता। सोनिया गांधी के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। सोनिया को पार्टी को अनुशासित करने के लिए पार्टी को ऊपर से नीचे तक हर स्तर पर जरूरत है। पार्टी की हार के बाद भी राज्यों में बड़े नेताओं के बीच एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी बंद नहीं हो रही है। आने वाले दिनों में चुनाव वाले राज्योंöहरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र और दिल्ली का हाल तो और भी बुरा है। झारखंड के अध्यक्ष ने तीन दिन पहले दिए अपने इस्तीफे में लिखा है कि राज्य के बड़े नेताओं ने अपनी ओछी हरकतें जारी रखकर उन्हें काम नहीं करने दिया है और वह लाचार हैं। हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर का नेतृत्व मानने से इंकार कर दिया है। दिल्ली में शीला दीक्षित के जाने के बाद राज्य में नेतृत्व शून्य हो गया है। यूपी, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तेलंगाना और असम में  बड़े नेता और सांसद, विधायक पार्टी छोड़ गए हैं। अंतरिम अध्यक्ष के रूप में कांग्रेस की कमान संभालने के बाद सोनिया गांधी के समक्ष एक बड़ी चुनौती उनके नेतृत्व के साथ-साथ विपक्षी एकता को मजबूत करने की भी है। सूत्रों का मानना है कि सोनिया को आगे लाकर कांग्रेस ने एक काम किया है। सोनिया के नेतृत्व में धर्मनिरपेक्ष ताकतें एकजुट होंगी। सोनिया को समान विचारधारा वाले दलों के साथ तालमेल में महारथ हासिल है। उनके नेतृत्व संभालने के बाद तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस की उम्मीदें बढ़ी हैं। गौरतलब है कि दो नवम्बर को हरियाणा, 11 नवम्बर को महाराष्ट्र और पांच जनवरी 2020 को झारखंड विधानसभा का कार्यकाल पूरा हो रहा है। इन तीन राज्यों में अतिमजबूत भाजपा का सामना करना पड़ेगा। क्या सोनिया गांधी कांग्रेस की डूबती नैया को पार लगा पाएंगी?

पाक अधिकृत कश्मीर और अक्साईचिन भारत के मूल हिस्से हैं

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में अनुच्छेद 370 संबंधी संकल्प एवं राज्य पुनर्गठन विधेयक पर चर्चा करते हुए कहा कि पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (पीओके) और अक्साईचिन सहित संपूर्ण जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है। अमित शाह ने कहाöजब-जब मैंने जम्मू-कश्मीर बोला है तब-तब इसमें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) और अक्साईचिन भी समाहित है। इस बयान के बाद पाकिस्तान और चीन के सामने भारत ने कश्मीर को लेकर अपनी रणनीति जाहिर कर दी है। आईए जानते हैं कश्मीर के इन हिस्सों के बारे में। क्या है पीओकेöयह जम्मू-कश्मीर के पश्चिम में स्थित है। पीओके भारत के जम्मू राज्य का वह हिस्सा है, जिसे पाकिस्तान ने 1947 में हमला करके कब्जा कर लिया था। अब वह पाकिस्तान इसे आजाद कश्मीर कहता है। पाकिस्तान ने पीओके को दो भागों में बांटा है। एक हिस्सा कश्मीर है, जबकि दूसरा गिलगित-बाल्टिस्तान है। कश्मीर का क्षेत्रफल 13,300 वर्ग किलोमीटर (भारतीय कश्मीर का लगभग 3 गुना) है और इसकी आबादी लगभग 45 लाख है। पीओके की सीमाएं पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र, अफगानिस्तान व वाखान गलियारे, चीन के झिनजियांग क्षेत्र और भारतीय कश्मीर से पूर्व में लगती है। इसकी राजधानी मुज्जफराबाद है। इसमें आठ जिले, 19 तहसील और 182 संघीय परिषद हैं। पीओके की स्थिति बहुत खराब है। इस क्षेत्र को पाकिस्तान ने जानबूझ कर विकसित नहीं किया है ताकि इस क्षेत्र के गरीब लोग आतंकवादी के रूप में प्रशिक्षित हो सकें और भारत को अस्थिर कर सकें। मुंबई आतंकी हमले में जिंदा पकड़े गए आतंकी अजमल कसाब को पीओके की राजधानी मुज्जफराबाद में ही प्रशिक्षित किया गया था। गिलगित को कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने ब्रिटिश सरकार को पट्टे पर दिया था। बाल्टिस्तान पश्चिम लद्दाख का क्षेत्र था। इसके हुंजा-गिलगित का एक हिस्सा, शक्सगम घाटी, रक्सम और बाल्टिस्तान का क्षेत्र 1963 में पाकिस्तान द्वारा चीन को सौंप दिया गया था। इस क्षेत्र को ट्रांस-काराकोरम ट्रैक्ट भी कहा जाता है। वहीं अक्साईचिन जम्मू-कश्मीर का उत्तर पूर्वी हिस्सा है। भारत इस पर अपना दावा ठोकता रहा है। लेकिन चीन ने अक्साईचिन को अपने शिनयांग प्रदेश का इलाका बताया है। भारत का कहना है कि चीन ने 1962 की लड़ाई में यहां के 38 हजार वर्ग मील इलाके पर कब्जा कर लिया था। अक्साईचिन का यह इलाका वीरान और बर्फीला है। अक्साईचिन और अरुणाचल प्रदेश की संप्रभुता विवाद की जड़ थे। इसी दौरान दलाईलामा को शरण देना चीन को नागवार गुजरा। फारवर्ड पॉलिसी के तहत मैकमोहन रेखा पर भारतीय चौकियों की स्थापना व अक्साईचिन में सड़क के निर्माण ने दोनों देशों को युद्ध की ओर धकेल दिया। चीन ने अक्तूबर 1962 को भारत पर हमला कर दिया। 20 नवम्बर 1962 को युद्धविराम की घोषणा कर विवादित क्षेत्रों से दोनों ने सेना हटा ली थी। लद्दाख का हिस्सा ट्रांस-काराकोरम ट्रैक्ट पर भी चीन ने कब्जा कर रखा है, लेकिन गृहमंत्री ने स्पष्ट किया कि केंद्र शासित लद्दाख में अक्साईचिन व ट्रांस भी समाहित होगा।

बदला-बदला लगता है अरविन्द केजरीवाल का मिजाज

राजधानी में फिर से अनधिकृत कॉलोनियों में रहने वालों को दिल्ली सरकार ने चुनाव से पहले घोषणा करके अखबारों में सुर्खियां बटोर ली हैं। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने सभी 1797 अनधिकृत कॉलोनयों को नियमित करने की हाल में घोषणा की है। इससे करीब 60 लाख लोगों को सीधा फायदा पहुंचेगा। अब तो फ्री वाईफाई देने की भी घोषणा की जा चुकी है। 25 साल से इन कॉलोनियों को नियमित करने और वहां रहने वालों को मालिकाना हक देने की बातें हो रही हैं, लेकिन आज तक एक भी कॉलोनी न नियमित हुई और न ही रजिस्ट्री खुली। कॉलोनियों को पक्का करने में काफी पेच है और इसको लेकर विभिन्न विभागों ने ग्राउंड रिपोर्ट तक तैयार नहीं की है। खास बात यह है कि नियमित कॉलोनी में जिस कार्य या सुविधा की बात होती है, उनमें से अधिकतर इन कॉलोनियों को सालों से नहीं मिल रही है। दो साल पहले भी केजरीवाल ने घोषणा की थी कि 2017 तक की सभी कच्ची कॉलोनियों को नियमित किया जाएगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन कॉलोनियों की वैधानिक हैसियत क्या है? इस मसले को लेकर क्या कोई सर्वे कराया गया है? क्या कॉलोनियों की हदबंदी (बाउंड्री) की गई है? सबसे बड़ी समस्या यह है कि अधिकतर कॉलोनियों का संपूर्ण नक्शा उपलब्ध नहीं है और वहां सार्वजनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए अतिरिक्त जमीन तक नहीं है। ऐसे में नियमों के अनुसार ये कॉलोनियां कैसे नियमित हो पाएंगी? केजरीवाल ने इन सब दिक्कतों को जरूर ध्यान में रखा होगा? कटु सत्य तो यह है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का सियासी मिजाज बदला हुआ नजर आ रहा है। अब वे केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के साथ बिना झगड़े के मिलजुल कर काम करने को तैयार हैं। इतना ही नहीं, हाल के कई मौकों पर मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने केंद्र सरकार का धन्यवाद भी किया है। हाल में संगरपुर गांव में यमुना किनारे तालाब खोदने के पायलट प्रोजेक्ट के शुरू होने पर मुख्यमंत्री ने केंद्रीय मंत्री को धन्यवाद दिया। इससे पहले भी केजरीवाल ने परियोजना की मंजूरी मिलने पर केंद्र की मोदी सरकार और एनजीटी को धन्यवाद दिया था। राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि सियासी तौर पर बदले रुख के जरिये अरविन्द केजरीवाल जनता को यह खास संदेश देना चाहते हैं, जिससे लगे कि दिल्ली सरकार के संबंध केंद्र के संग सुधर गए हैं। दरअसल बदले रुख से पहले चार साल तक आम आदमी पार्टी (आप) के नेता केंद्र सरकार पर रोड़ा अटकाने का आरोप लगाते रहे हैं। लोकसभा चुनाव के बाद और विधानसभा के आखिरी साल में आप ने अपनी रणनीति बदल ली है। खैर, कारण कुछ भी हों, देर से आए दुरुस्त आए।

-अनिल नरेन्द्र

अनुच्छेद 370 के बाद अब अवाम का दिल जीतना होगा

जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को हटाने के बाद पहली बार बृहस्पतिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहां संविधान के अनुच्छेद 370 और 35ए को हटाने के अपनी सरकार के फैसले की जरूरत को रेखांकित किया। वहीं यह भी बताया कि इससे नए कश्मीर के निर्माण के साथ-साथ लद्दाख का विकास भी संभव हो सकेगा। वैसे बेहतर तो यह होता कि प्रधानमंत्री ने यह संबोधन धारा 370 को हटाने के पहले दिया होता। बहरहाल उनके संबोधन में इस बात का भरोसा साफ झलकता है कि कश्मीरियों के साथ भेदभाव के दिन अब लद चुके हैं। नरेंद्र मोदी से कश्मीर या भारत ही नहीं, पूरी दुनिया जानना चाहती थी कि इस राज्य से अनुच्छेद 370 के हटने के बाद अब आगे क्या? कश्मीरियों को उन सारे कष्टों और पीड़ा से मुक्ति मिलेगी जो दशकों से अनुच्छेद 370 के कारण उन्हें झेलने पड़े हैं। जाहिर है कि केंद्र सरकार का सारा जोर अब कश्मीर घाटी में हालात सामान्य बनाने और उसके विकास पर होगा। इसके लिए सबसे ज्यादा मैं यह समझता हूं कि कश्मीरियों का दिल जीतना जरूरी है। दरअसल 370 कागज पर तो हट गया है पर क्या कश्मीरियों के दिलों से यह रातोंरात हटाया जा सकता है या इसके लिए लंबा समय चाहिए? कश्मीरियों का दिल तभी जीता जा सकेगा जब सरकार की नीतियों के प्रति उनमें भरोसा पैदा होगा, वे राज्य में विकास होता देखेंगे, नौजवानों को रोजगार और बच्चों को शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ मिलने लगेगा। अगर सरकार कश्मीरियों के लिए इन कसौटियों पर खरी उतरती है तो निश्चित रूप से लोगों का दिल जीत पाना कोई मुश्किल काम नहीं है। जनता के मन में कई सवाल खड़े थे। मसलन लोग यह जानना चाहते थे कि जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने की आवश्यकता क्यों पड़ी, इसके लिए जो तरीका अपनाया गया क्या वह सबसे बेहतर तरीका था? बहरहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस बात को नकारा जाना कठिन है कि अनुच्छेद 370 के कारण अलगाववाद, आतंकवाद और परिवारवाद व भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन मिला। यह भी सच है कि अनुच्छेद 370 को ढाल बनाकर जिस प्रकार जम्मू-कश्मीर में कई केंद्रीय कानूनों और स्कीमों को लागू नहीं किया गया, उससे वहां जमीनी स्तर पर राजनीतिक विकास प्रक्रिया को समुचित बढ़ावा नहीं मिला। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में बताया कि जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे के कारण वहां शिक्षा का अधिकार, न्यूनतम मजदूरी कानून, सफाई कर्मचारी और अल्पसंख्यक सुरक्षा से संबंधित कानून लागू नहीं हुआ, बेटियां अधिकारों से वंचित रहीं तो दलितों, बाल्मीकियों को सामाजिक सुरक्षा आरक्षण का लाभ और पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को मतदान का अधिकार नहीं मिला। लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने की मांग तो बहुत पुरानी थी। जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख के सरकारी कर्मचारियों और पुलिसकर्मियों को जल्दी ही दूसरे केंद्रीय शासित प्रदेश की तरह सुविधाएं मिलने की बात प्रधानमंत्री ने की, तो जल्दी ही चुनाव कराने और फिर से जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा देने का आश्वासन देकर आम लोगों की आशंकाएं दूर कीं। प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि प्राइवेट इंवेस्टमेंट आएगा तो युवाओं की आज की सबसे बड़ी जरूरत पूरी होगी। अगर इन्हें रोजगार मिल जाएगा तो शायद इनकी पत्थरबाजी छूट जाए। पूरी दुनिया को भी यह एक संदेश है कि देखिए भारत पूरी शिद्दत से कश्मीर को आतंकवाद और हिंसा खत्म कर कश्मीरियों को मुख्य धारा में जोड़ने का प्रयास में लगा है। आतंकवादियों और अलगाववादियों की कमर तोड़नी होगी, राज्य को तेजी से विकास के रास्ते पर लाने और सबसे जरूरी है कि बल प्रयोग की नीति को छोड़कर कश्मीरी अवाम के दिल को जीतने की नीति पर चलना होगा तभी हम कश्मीरियों का सही मायनों में दिल जीत सकेंगे और प्रधानमंत्री के संदेश का मूल भाव यही है।

Saturday, 10 August 2019

राजधानी में रोड रेज की बढ़ती घटनाएं चिंता का विषय है

राजधानी दिल्ली में रोड रेज के मामले निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। मामूली-सी कार टच हो जाने से, गाड़ी को साइड न देने पर कुछ लोग मार-पिटाई व जानलेवा हमले करने से डरते नहीं हैं। ताजा केस बुधवार रात का है। हौजखास इलाके में बुधवार रात कार सवार बदमाशों ने रोड रेज के दौरान इस्पात कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (सेल) के चेयरमैन पर रॉड से जानलेवा हमला कर दिया। मौके पर अचानक पहुंची पुलिस ने चेयरमैन चौधरी को बचा लिया नहीं तो कुछ भी हो सकता था। दो बदमाशों को मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने उन पर हत्या के प्रयास का मामला दर्ज कर लिया है। घटना के वक्त चौधरी हुडको प्लेस स्थित अपने कार्यालय से घर लौट रहे थे। कुछ दूरी पर उनकी कार को पीछे से दूसरी कार ने टक्कर मार दी। श्री चौधरी अपने ड्राइवर के साथ कार से बाहर निकले तो दूसरी कार में बैठे चार लोगों ने उन पर हमला कर दिया। उनके सिर, घुटने और पैर पर चोट आई है। तभी पुलिस का गश्ती दल मौके से गुजर रह था। जब उसने देखा कि यह बदमाश रॉड से दूसरे पर हमला कर रहे हैं तो उसने तुरन्त पहुंच कर स्थिति संभाल ली। गनीमत रही कि क्षेत्र में गश्त कर रहे दो पुलिसकर्मी मौके पर पहुंच गए और उन्होंने दो को वहीं गिरफ्तार कर लिया। हालांकि दो अन्य फरार हो गए, अन्यथा चेयरमैन की जिंदगी खतरे में पड़ जाती। गंभीर चिंता का विषय यह भी है कि आरोपियों के पास रॉड के साथ-साथ चाकू भी था। साथ ही यह वारदात करीब रात के 11 बजे हुई, जबकि इस समय सड़क पर अच्छा-खासा ट्रैफिक होता है। ऐसे में यह आसानी से समझा जा सकता है ]िक आरोपी आपराधिक प्रवृत्ति के थे और उन्हें पुलिस का तनिक भी खौफ नहीं था। राजधानी में रोड रेज की घटनाएं आए दिन सामने आती हैं। वाहन जरा-सा टच कर जाए तो लोग आपा खो देते हैं और गाली-गलौज व मारपीट पर उतर आते हैं। यही नहीं, कई मामलों में तो वह जान तक ले लेते हैं। महानगर में भागदौड़ के बीच तनाव होना लाजिमी है, लेकिन इसे हर हाल में नियंत्रित किया जाना चाहिए और ऐसा कतई नहीं होना चाहिए कि उसकी वजह से किसी और को मानसिक या शारीरिक क्षति पहुंचे। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी रोड रेज की घटनाओं पर अंकुश लगे। इस केस में सुनिश्चित किया जाए कि चारों आरोपियों के खिलाफ सबूत जुटाए जाएं ताकि उन्हें सख्त से सख्त सजा मिले। यह घटना एक उदाहरण साबित हो और रोड रेज में मारपीट व हत्या जैसी घटनाओं को अंजाम देने से पहले अपराधी सौ बार सोचें।

-अनिल नरेन्द्र

बौखलाहट में पाकिस्तान ने उठाए हताशा के कदम

इस बात का पहले से ही अंदाजा था कि कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को भारत द्वारा हटाने पर पाकिस्तान की तरफ से प्रतिक्रिया जरूर होगी, रिएक्शन जरूर होगा और वैसा ही हुआ। पाकिस्तान ने भारतीय उच्चायुक्त को निष्कासित कर दिया और द्विपक्षीय व्यापार को स्थगित कर दिया, समझौता एक्सप्रेस को सीमा पर ही खड़ा कर दिया और कहा कि अपना ड्राइवर भेजो जो ट्रेन को दिल्ली ले जाए। भारतीय उच्चायुक्त अजय बिसारिया को वापस जाने को कह दिया और कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने का निर्णय लिया। इसके अलावा भारत के स्वतंत्रता दिवस को काले दिन के रूप में मनाने का भी फैसला किया है। अलबत्ता उसने साफ किया है कि वह अपना हवाई क्षेत्र भारतीय उड़ानों के लिए बंद नहीं कर रहा है। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान को न तो जमीनी हकीकत का अहसास है और न ही अतीत से उसने कुछ सीखा है। पाकिस्तान के हुक्मरान अपने आंतरिक संकटों से उबरने के लिए, अपनी अवाम का ध्यान बांटने के लिए जब भी मौका मिलता है, कश्मीर मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने की कोशिश करता है, यह उसका पुराना राग है। पाकिस्तान जानता है कि उसके इन कदमों पर भारत पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। उसके द्विपक्षीय व्यापार खत्म कर देने से भारत का नहीं, ज्यादा नुकसान उसी का होने वाला है। जब भारत ने कुछ दिन पहले पाकिस्तान का तरजीही राष्ट्र का दर्जा खत्म कर दिया था तो वह बहुत हताश हुआ था। इसकी प्रतिक्रिया में उसने भी भारत से भेजी जाने वाली करमुक्त वस्तुओं पर भारी टैक्स थोप दिया था। लेकिन इतने भर से उसको संतोष नहीं हुआ तो उसने तरजीही राष्ट्र का दर्जा खत्म करने के फैसले को अंतर्राष्ट्रीय अदालत में चुनौती देने की भी धमकी दी थी। अब उसी ने द्विपक्षीय व्यापार को खत्म करने का फैसला किया है। वास्तव में भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय व्यापार इतना है ही नहीं कि उसे बंद करने से भारत के हितों को चोट पहुंचे। यही नहीं, पुलवामा में भारतीय सुरक्षा बल के काफिले पर हुए हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से तरजीही देश का दर्जा हटाकर 200 वस्तुओं पर शुल्क भी बढ़ा दिया था। पाकिस्तान ने अनुच्छेद 370 के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय जैसे मंचों पर ले जाने की धमकी भी दी है, लेकिन वह भूल रहा है कि भारत ने अपने संविधान की व्यवस्था में ही परिवर्तन किया है, जिससे पाकिस्तान समेत किसी भी अन्य देश का कोई लेनादेना नहीं है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में साफ कहा है कि जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा विकास के नए अवसर पैदा करने के लिए खत्म किया गया है और यह भारत का आंतरिक मामला है। पाकिस्तान अपनी जवाबी कार्रवाई के तहत दो मोर्चों पर काम करने का प्रयास करेगा। पहला, राजनयिक माध्यमों से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत के खिलाफ शोर मचाकर भारत की छवि को खराब करना और दूसरा, भारत में कश्मीरी नागरिकों के माध्यम से आतंकवाद को बढ़ावा देना। अपने पहले प्रयास में वह अमेरिका से उम्मीद करेगा कि वह उसकी अफगानिस्तान से वापसी को लेकर उस पर दबाव डाले कि वह कश्मीर में मध्यस्थता के लिए भारत को मजबूर करे। लेकिन अमेरिका ने पहले ही इसे भारत का आंतरिक मामला बताकर पाकिस्तान को झटका दिया है। यही हाल संयुक्त राष्ट्र में भी होगा। संयुक्त राष्ट्र पाकिस्तान के पक्ष को कितनी गंभीरता से लेगा, दावा नहीं किया जा सकता। कश्मीर को मिली स्वायत्तता संविधान के एक अस्थायी प्रावधान के तहत थी। उसे समाप्त कर भारत ने उसे संघीय ढांचे में गूंथने का फैसला जो किया है इस पर संयुक्त राष्ट्र को भी क्या आपत्ति हो सकती है? पाकिस्तान की इमरान खान सरकार ने जो एकतरफा कदम उठाया है उससे उसकी बौखलाहट का पता चलता है। बहरहाल इसके बावजूद आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के आज जैसे हालात हैं, उससे भारत को सतर्प रहने की जरूरत है ताकि वह कोई ऐसा-वैसा दुस्साहस न करे।