Saturday, 2 June 2012

ब्रह्मेश्वर की हत्या से कहीं फिर से हिंसा का दौर आरंभ न हो जाए

Editorial Publish on 3 June 2012

- अनिल नरेन्द्र

 

जब से बिहार में श्री नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली है तब से राज्य में कोई बड़ी हिंसा की घटना नहीं हुई है। इससे लगने लगा कि कभी हिंसा के लिए बदनाम बिहार में यह हिंसा का दौर खत्म हो गया है। पर शुकवार को एक नया तूफान उठ गया। कुख्यात जातीय गुट रणवीर सेना के संस्थापक ब्रह्मेश्वर सिंह उर्प मुखिया की बड़ी सनसनीखेज ढंग से हत्या कर दी गई। वे आरा में अपने निवास से सुबह की सैर पर निकले ही थे कि मोटरसाइकिल से आए अज्ञात हमलावरों ने उन पर गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। करीब चालीस गोलियों से ब्रह्मेश्वर को छलनी कर दिया। 1990 के दौर में जब नक्सलियों का आतंक था तो इससे निपटने के लिए भूस्वामियों ने जिनमें सारी सवर्ण जातीयां शामिल थी, ने रणवीर सेना का गठन ब्रह्मेश्वर सिंह ने गठन किया था। इस निजी सेना पर कई नरसंहारों के आरोप हैं। इनमें लक्ष्मणपुर बाथे, सिंचापुर और बकसीटोला के चर्चित नरसंहार शामिल हैं। सन् 1994 से लेकर 2002 के बीच करीब 250 लोगों की हत्या के 26 मामलों में मुख्य आरोपी ब्रह्मेश्वर मुखिया को सबूतों के अभाव के चलते जुलाई 2011 में अदालत ने जमानत दी थी। ब्रह्मेश्वर सिंह एक दौर में आतंक का पर्याय बन गए थे। उन्हें हत्याओं के 16 मामलों में बरी किया गया था और छह मामलों में जमानत पर थे। नौ साल तक जेल में रहने के बाद पिछले महीने ही वे बाहर आए थे। उनकी तैयारी चुनावी राजनीति में पूंदने की थी। उनकी हत्या के बाद उनके समर्थकों में गुस्सा फूट गया। इन लोगों ने पहले बीडीओ कार्यालय को निशाना बनाया, वहां जमकर तोड़फोड़ के बाद आग लगा दी। इसके बाद करीब एक हजार लोगों के हुजूम ने सर्पिट हाउस पर धावा बोल दिया, जाते-जाते इसमें भी आग लगा दी। पूरे राज्य में हाईअलर्ट जारी कर दिया गया है। भागलपुर जिले में सेवा यात्रा में व्यस्त मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कहना है कि हत्यारों को पकड़ा जाएगा और उन्हें सजा मिल कर रहेगी। डर यह है कि कहीं फिर से बिहार में जातिवादी हिंसा न भड़क पड़े। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं में इस हत्या का राजनीतिक लाभ लेने की होड़ शुरू हो गई है। बिहार की बुनियादी समस्या जमीन की मिलकियत से जुड़ी हुई है। लंबे वक्त तक भूमि सुधार न होने की वजह से विभिन्न जातियों के बीच विरोध और टकराव तेज होता गया। न बिहार में उस हद तक औद्योगीकरण हुआ, न ही हरित कांति जैसा बदलाव हुआ, जो आर्थिक और जातिगत संबंधों को बदलता। ऐसे ठहराव के दौर में गरीब और भूमिहीन दलितों के बीच नक्सलियों का पभाव बढ़ता गया जिन्होंने आर्थिक और सामाजिक बेहतरी की उनकी आकांक्षाओं को उग्र और हिंसक रूप दिया। इसकी पतिकिया में सभी जातियों ने अपनी हिंसक सेनाएं बना डाली। मंडलवाद के दौर में बदली गई राजनीति से भी जमीन से जुड़े आर्थिक संबंधों को व्यवस्थित रूप से ठीक करने की कोशिश नहीं की, इसके बदलाव अराजक हिंसक तरीके से हुआ। ब्रह्मेश्वर सिंह जैसे नेता ऐसे में सभी जातियों के नायक बन गए। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। पतिकिया स्वरूप फिर से बिहार में जातीय संघर्ष को हर हालत में रोकना होगा।

अर्थशास्त्राr पधानमंत्री का नौ साल का आर्थिक रिकार्ड

Editorial Publish on 3 June 2012

- अनिल नरेन्द्र

जाने-माने अर्थशास्त्राr पधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह को पधानमंत्री बने नौ साल पूरे हो चुके हैं। इन नौ सालों में उनकी आर्थिक नीतियों, आर्थिक सुधारों की बड़ी तारीफ होती रही है। कहा गया कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। सारी दुनिया में भारत की वाह-वाह होने लगी जबकि आंकड़े कुछ और ही कहानी कह रहे हैं। ताजा आंकड़े बताते हैं कि बीते वित्त वर्ष 2011-12 की चौथी तिहाई में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर छह पतिशत से नीची रही है। पिछले नौ सालों में यह देश की सबसे कम आर्थिक विकास दर है। सरकार की नाकामी से बदहाल हुई अर्थव्यवस्था साफ संकेत दे रही है कि चालू वित्त वर्ष 2012-13 में विकास की रफ्तार और घट जाएगी। सरकार के ताजा आंकड़ों के मुताबिक चौथी तिमाही (जनवरी-मार्च) में जीडीपी की दर घटकर 5.3 पतिशत आ गई है। बीते वर्ष की तीसरी तिमाही में यह दर 6.1 पतिशत थी। विकास दर घटने के पीछे वैसे तो भारी भरकम सब्सिडी, पेंशन और रिटेल में एफडीआई जैसे अटके पड़े विधेयक, उद्योग क्षेत्र की दुर्दशा, तलहटी पर पहुंचा रुपया, आपूर्ति के मोर्चे पर बदहाली और रुके हुए विदेशी निवेश जैसी कई वजहें हैं। लेकिन कृषि और उत्पादन क्षेत्र की खराब हालत हमारी अर्थव्यवस्था के लिए सबसे चिंतनीय है। तेज आर्थिक विकास दर के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा मैन्यूफैक्चरिंग, कृषि और खनन क्षेत्र की खराब स्थिति साबित हो रही है। देश की अर्थव्यवस्था में लगभग 40 फीसद हिस्सेदारी रखने वाले इन तीनों क्षेत्रों की खस्ताहाल स्थिति आम जनता के हितों से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर सरकार के आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि इन तीनों क्षेत्रों में इस वित्त वर्ष के दौरान बद से बदतर होती गई है। मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में माना जा रहा था कि कृषि क्षेत्र का बेहतर पदर्शन उद्योग क्षेत्र की दुर्दशा को शायद ढक देगा, लेकिन चौथी तिमाही में कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर घटकर 1.7 फीसदी रह गई, जो 2010-11 की चौथी तिमाही में 7.5 पतिशत थी। जिस मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र के दमदार पदर्शन के कारण हमारी आर्थिक विकास दर कभी दोहरे अंकों के नजदीक पहुंची थी, उसी मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की वृद्धि दर चौथी तिमाही में नकारात्मक रह गई। उसकी दो वजह हो सकती हैं। पहली कि हमने इसके बजाए उस सेवा क्षेत्र को ज्यादा महत्व देना शुरू कर दिया जो फिलहाल भले दुधारू गाय की तरह लगे लेकिन इसके अकेले बूते पर हम मजबूत अर्थव्यवस्था नहीं बना सकते। दूसरे चीन के संबंधित आयात ने भी हमारी मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र पर असर डाला, इससे रोजगार पर भी पतिकूल असर पड़ा। चूंकि बढ़े तेल मूल्यों के कारण महंगाई का दौर अभी बना रहेगा। ऐसे में आर्थिक विकास दर की बढ़ोतरी की संभावना फिलहाल कम ही नजर आती है। जिस तरह से यह संपग सरकार और उसके मुखिया चल रहे हैं उससे तो हमें भारत की अर्थव्यवस्था सुधरने के चांस कम ही नजर आते हैं। आर्थिक मंदी के दौर की तो यह शुरुआत है, आगे देखते रहिए क्या-क्या होता है?

 

आमिर के सत्यमेव जयते से बौखलाए डाक्टर

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 2 June 2012
अनिल नरेन्द्र
आमिर खान के ताजा सत्यमेव जयते कार्यकम से डाक्टर बिरादरी का बौखलाना स्वाभाविक ही है। आमिर ने वह कड़ी सच्चाई दर्शाई है जो आजकल हो रहा है। पैसों की खातिर जबरदस्ती टेस्ट करवाना, जरूरत न होने पर भी सर्जरी करना, गलत सर्जरी करना इत्यादि-इत्यादि यह सब धांधलियां चल रही हैं। डाक्टरों की जवाबदेही कुछ भी नहीं। आमिर खान ने अपने बेहद चर्चित कार्यकम सत्यमेव जयते में डाक्टर बिरादरी की दुखती रग पर हाथ रख दिया है, वे तिलमिला उठे हैं। इस मामले में हमारा भी बहुत खराब अनुभव है। हमने अपने पिता स्वर्गीय श्री के. नरेन्द्र को पूर्वी दिल्ली के एक पतिष्ठित अस्पताल में भर्ती करवाया। उन्हें जुकाम की शिकायत थी जिससे उन्हें निमोनिया हो गया था। निमोनिया के इलाज के लिए भर्ती तो कराया पर वापस उनका मृत शरीर लाए। इस चक्कर में लाखों रुपए का बिल अलग बन गया। बहुत गुस्सा था, पहले अस्पताल पर केस करने की सोची पर फिर हमें बताया गया कि हर बड़ा अस्पताल कोर्ट केसों के लिए तैयार रहता है और इस काम के लिए उन्होंने वकीलों की फौज भी रखी हुई है। जहां तक रिकॉर्ड का सवाल है वह इतना पक्का बना कर रखते हैं कि अदालत में उसे गलत साबित करना आसान नहीं। हार कर चुप बैठ गए। हमने अस्पताल में देखा कि किस तरह मरीज को तभी भर्ती किया जाता है जब वह हजारों रुपए एडवांस में देता है। डाक्टर बिरादरी आमिर खान पर आज कार्यकम के बाद उल्टा आरोप लगा रही है। डाक्टर बिरादरी उनके कार्यकम को सत्य से दूर तो मान ही रही है, वह यह आरोप भी लगा रही है कि उन्हें इसमें केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद की शह की बू भी आती है। आजाद और डाक्टरों के देश के सबसे बड़े संगठन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के बीच लम्बे समय से चल रहा झगड़ा जगजाहिर है। डाक्टर इतने गुस्से में हैं कि वे आमिर खान पर जवाबी हमला भी कर सकते हैं। उनके गुस्से को देखकर आमिर खान की यह आशंका लाजमी है कि अभी उन्हें कुछ हो जाए तो उन्हें इलाज मिलना मुहाल हो जाएगा। कभी भगवान के पर्याय माने जाने वाले डाक्टरों की आम लोगों में पहले से ही छवि काफी बिगड़ी हुई है। कार्यकम के बाद अपने लिए शैतान जैसे शब्द उन्हें पिघले शीशे की तरह लग रहे हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के सूत्रों की मानें तो उन डाक्टरों को भी बिरादरी को विलेन पेंट करना अच्छा नहीं लगा जिनके अच्छे कामों पर कार्यकम में तालियां बजीं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के संयुक्त सचिव डाक्टरों के खिलाफ लंबे अरसे से अभियान चला रहे हैं। उन्हें भी आमिर के कार्यकम पर ऐतराज है। वह कहते हैं कि आमिर को अपने कार्यकम का नाम सत्यमेव जयते में जो दिखा रहे हैं उसका सत्य से दूर-दूर तक का रिश्ता नहीं है। उन्होंने सस्ती लोकपियता के लिए केवल डिग्रीधारी डाक्टरों को निशाना बनाया। उन्होंने देश में लोगों की जान से हर सेकेण्ड खिलवाड़ कर रहे झोलाछाप डाक्टरों एवं दवा की दुकान में इलाज कर रहे कैमिस्टों को क्यों बख्श दिया? देश में अगर 8 लाख डिग्रीधारी डाक्टर हैं तो 15 लाख फर्जी डाक्टर हैं। वे बताएं कि वे उनकी डिग्री कैसे छिनवाएंगे? आमिर खान बताएं कि वे किसे डाक्टर मानते हैं? क्या युवराज सिंह को गलत सलाह देने वाले उनके तथाकथित फीजियो डा. जतिन चौधरी को वह डाक्टर मानते हैं या नहीं? अनिल बंसल कहते हैं कि मेरा मानना है कि 90 पतिशत से अधिक डाक्टर ईमानदारी से अपना काम कर रहे हैं। 10 पतिशत अगर गड़बड़ी कर रहे हैं तो उन्हें दंडित करने से रोक कौन रहा है। आमिर खान पहले लाखों नकली डाक्टरों से देश को निजात दिलाएं जो लोगों को डाक्टरी के नाम पर लूट रहे हैं और उनकी जान भी ले रहे हैं। हार्ट केयर फाउंडेशन के अध्यक्ष डा. केके अग्रवाल ने कहा कि आमिर खान को डाक्टरों की जगह सिस्टम (व्यवस्था) को निशाने पर लेना चाहिए था। उन्होंने सरकार को क्यों बख्श दिया। स्वास्थ्य सेवा को सुधारने में क्या सरकार की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। डा. अग्रवाल बताते हैं कि मैंने आज 10 मरीजों को जेनरिक दवा लिखी, सब वापस आ गए, उन्हें वे दवाएं कहीं मिली ही नहीं। जेनरिक दवा की दुकानें सरकार क्यों नहीं खोलती? मुझे तो लगता है कि पूरा सत्यमेव जयते कार्यकम ही डाक्टरों को निशाने पर लेने के लिए बनाया गया है। अभी तक 4 कार्यकम हुए हैं और उन चार में से तीन में डाक्टरों को ही निशाना बनाया गया है।
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भावुक जवाब देकर मनमोहन सिंह अपनी जिम्मेदारी टाल नहीं सकते

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 2 June 2012
अनिल नरेन्द्र
टीम अन्ना के आरोपों पर पधानमंत्री मनमोहन सिंह का जवाब शायद ही किसी को संतोषजनक लगे। पधानमंत्री का यह भावुक कथन कि अगर उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप कोई साबित कर सकता है तो वह राजनीति से संन्यास ले लेंगे हमारे गले तो उतरा नहीं। हमें तो पधानमंत्री का जवाब मुख्य मुद्दे से ध्यान हटकर अपने सारे दागी सहयोगियों को बचाने का लगता है। टीम अन्ना ने पधानमंत्री और उनके 15 मंत्रियों की सूची जारी की है। उसमे उन्होंने बस यही तो कहा है कि कोयला खदान आवंटन को लेकर कैग की एक रिपोर्ट में कुछ भ्रष्टाचार दर्शा रहा है और चूंकि यह मंत्रालय पधानमंत्री के आधीन है इस लिहाज से वह जिम्मेदार हैं। अगर पधानमंत्री निर्दोष हैं तो जांच क्यों नहीं करवा लेते? डा. मनमोहन सिंह इस देश के पधानमंत्री भी हैं। इसका मतलब यह है कि साझा जिम्मेदारी (ज्वाइंट रिस्पांसिबिलिटी) के आधार पर मुखिया होने के नाते वह अपने मंत्रिमंडल साथियों के आचरण के लिए भी जिम्मेदार हैं। टीम अन्ना ने उनके मंत्रिमंडल के 15 सदस्यों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। अगर सरकार का मुखिया अपनी टीम का जिम्मेदार नहीं तो और कौन जिम्मेदार है। यह समय भावुकता भरे बयान देने और खुद को टीम अन्ना से आहत दिखाने का नहीं बल्कि देश के समक्ष यह स्पष्ट करने का है कि आप पिछले 8 सालों से पधानमंत्री हैं और इस दौरान आप घोटालों पर रोक लगाने में असफल क्यों हैं? घपलों, घोटालों का सिलसिला थम नहीं रहा। राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों के नाम पर अनगिनत घपलों के साथ ही 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आया। इसके बाद तो एक के बाद एक घपलों की लाइन सी लग गई। कभी सोलह आना ईमानदार जाने वाले मनमोहन सिंह किसी सौदेबाजी में शामिल होंगे, यह आज भी कोई यकीन करने वाला नहीं है। लेकिन वे सब कुछ जानकर भी आंख बंद किए हुए हैं या गठबंधन की मजबूरी या फिर सिर्प राज करने के लोभ में चुप हैं, इस बात पर शक जरूर होने लगा है। आखिर मुखिया होने के नाते मनमोहन सिंह जी ने कोई भी घोटाला रोकने की कोशिश क्यों नहीं की और यह जानते हुए कि घोटाला दर घोटाला हो रहा है वह चुपचाप तमाशा देखते रहे का मतलब साफ है कि उन्हें न तो इनकी परवाह है और न ही वह इसे रोकने के इच्छुक हैं। वह तो बस पधानमंत्री बने रहना चाहते हैं। वह जानते हैं कि अब अगर वह पीएम कुर्सी से हट गए तो सिवाय रिटायर होने के और कोई दूसरा रास्ता उनके लिए नहीं बचेगा। जब तक सम्भव हो चिपके रहो इस कुर्सी से। आज स्थिति यह आ गई है कि अपने भ्रष्ट साथियों को बचाते-बचाते खुद को शिखंडी का खिताब देने वाले पशांत भूषण को भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं। उल्टा भावुकता से सारे मामले को दबाना चाह रहे हैं। टीम अन्ना के पमुख सलाहकार अरविंद केजरीवाल ने कहा कि पधानमंत्री किसी जांच के बिना अपने आपको पाक-साफ कैसे घोषित कर रहे हैं? वह यह क्यों नहीं कहते कि मामले की जांच करवा लो। पर पधानमंत्री की व्यक्तिगत जिम्मेदारी से कहीं बड़ा पश्न है इस यूपीए-2 सरकार की जवाबदेही जो बिल्कुल नजर नहीं आती और न ही वह ऐसे कदम उठाने को ही तैयार हैं जिससे दूध का दूध, पानी का पानी हो जाए।
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Friday, 1 June 2012

लादेन की खबर देने वाले डा. अफरीदी को 33 साल कैद

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1 June 2012
अनिल नरेन्द्र
गत दिनों अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को मार गिराने के अभियान में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए का साथ देने वाले पाकिस्तानी डा. शकील अफरीदी को एक अदालत ने देशद्रोही करार देते हुए 33 साल की कैद की सजा सुना दी। हमें यह फैसला सुनकर आश्चर्य भी हुआ और अजीबोगरीब भी लगा। खैबर कबाइली क्षेत्र के राजनीतिक पतिनिधि मुताहिर जेबखान ने पाकिस्तानी अखबार `डान' को बताया कि शकील को चार सदस्यीय कबाइली अदालत में पेश किया गया। अदालत ने उन्हें 33 साल की कैद और 3.2 लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई। सजा सुनाए जाने के बाद शकील को पेशावर स्थित केन्द्राrय कारागार भेज दिया गया। शकील को पाकिस्तान अपराध संहिता की बजाए ब्रिटिश कालीन कानून, पंटियर काइम रेगुलेशन एक्ट के तहत दोषी करार दिया गया। इस एक्ट के तहत राजद्रोह के मामले में मौत की सजा का पावधान नहीं है। डा. शकील ने सीआईए के निर्देश पर एबटाबाद में एक टीका अभियान चलाया था, ताकि इसकी मदद से ओसामा और उसके परिवार के सदस्यों के डीएनए नमूने लिए जा सकें। अभियान से मिले सबूतों के आधार पर ही अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन के खिलाफ बीते मई महीने में कार्रवाई कर उसे मार गिराया था। पाकिस्तान द्वारा उठाए गए इस कदम से यह फिर साबित हो जाता है कि पाकिस्तान आतंकवाद से लड़ने के पति गंभीर नहीं है। यह भी साबित होता है कि अंदरखाते पाकिस्तान हर वर्ग के आतंकवादी चाहे वह अलकायदा से हो या फिर लश्कर से हो, संबंध और सहानुभूति रखता है। पाकिस्तान उस आदमी से बदला ले रहा है जिसने दुनिया के मोस्ट वांटेड टेरोरिस्ट को खत्म करने में मदद की थी। दुनिया के किसी और कोने में शायद डा. अफरीदी का सम्मान किया जाता पर पाकिस्तान में वह एक देशद्रोही है जिसने देश के खिलाफ एक विदेशी खुफिया एजेंसी की मदद की। अगर पाकिस्तान की डबल गेम इस किस्से से एक्सपोज होती है तो अमेरिका पर भी सवाल उठते हैं कि वह अपने `सोर्स' यानि मुखबिर को बचा नहीं पाया। इस किस्से से पाकिस्तान और अमेरिकी रिश्तों में और तनाव बढ़ेगा। अमेरिका की विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने फैसले को अन्यायपूर्ण तथा अवांछित बताया। साथ ही अमेरिकी सीनेट के एक पैनल ने इस्लामाबाद को दी जाने वाली सहायता में कटौती भी कर दी। हिलेरी ने कहा कि अफरीदी के साथ जो किया गया है वह अन्यायपूर्ण है। उन्हें दोषी ठहराए जाने पर अफसोस है। उन्होंने जो मदद की वह दुनिया के सर्वाधिक कुख्यात हत्यारों में से एक का खात्मा करने में कारगर रही। यह स्पष्ट रूप से पाकिस्तान के, हमारे और पूरी दुनिया के हित में था। दूसरी ओर पीपीपी अध्यक्ष बिलावल भुट्टो ने कहा कि विदेशी खुफिया एजेंसियों के साथ सहयोग करना किसी भी देश के कानून के खिलाफ है। अमेरिका में इजराइल के लिए जासूसी करने पर उम्रकैद की सजा दी गई। हमारी स्वतंत्र न्यायपालिका है जिसे पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने बहाल किया है। पाकिस्तान और अमेरिका के पहले से तनावपूर्ण रिश्तों में यह एक और अध्याय जुड़ गया है। हमारी राय में पाकिस्तान का यह कदम आतंकवादियों के उत्साह को बढ़ाने वाला है।

आरक्षण के नाम पर अल्पसंख्यकों को गुमराह करने का असफल पयास

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1 June 2012
अनिल नरेन्द्र
केंद्र सरकार को यह मालूम था कि उत्तर पदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उसने जो कांग्रेस पार्टी को अल्पसंख्यक वोट दिलवाने की उम्मीद से अल्पसंख्यकों के लिए जो साढ़े चार पतिशत आरक्षण किया है उसे अदालत रद्द कर सकता है पर फिर भी केंद्र ने ऐसा किया। जैसी उम्मीद थी वैसा ही हुआ। आंध्र पदेश हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को तगड़ा झटका देते हुए मजहब के आधार पर आरक्षण देने से इंकार कर दिया। उल्लेखनीय है कि उत्तर पदेश विधानसभा चुनावों के दौरान केंद्र ने ओबीसी के 27 फीसद कोटे से साढ़े चार फीसद आरक्षण देने की घोषणा की थी। यह आरक्षण सभी अल्पसंख्यक वर्गों के लिए था। हालांकि माना जा रहा था कि इस घोषणा के पीछे मुस्लिम वोट बैंक को लुभाना था। ऐन वक्त पर की गई घोषणा पर चुनाव आयोग ने विधानसभा चुनावों तक इसके अमल पर रोक लगा दी थी। सरकार ने नतीजा घोषित होने के साथ ही इसे लागू कर दिया। केंद्र सरकार ने एक शगूफा छोड़ा था जो अब अदालत ने रद्द कर दिया है। सभी जानते हैं कि भारत के संविधान में धर्म आधारित आरक्षण के लिए कोई जगह नहीं है। केंद्र सरकार का यूपी विधानसभा से ठीक पहले उठाया यह कदम शुद्ध राजनीति से पेरित था और अल्पसंख्यकों को खासतौर से यूपी के मुसलमानों को बेवकूफ बनाने का एक पयास था। उच्च न्यायालय ने साफ कहा कि केंद्र सरकार का यह फैसला केवल धार्मिक आधार पर लिया गया है। इतना ही नहीं हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर लापरवाही से काम करने के लिए केंद्र सरकार को आड़े हाथ भी लिया। सरकार की ओर से यह दलील दी गई थी कि यह फैसला सच्चर समिति की सिफारिशों के आधार पर लिया गया और ऐसा करके उसने 2009 के घोषणा पत्र में दर्ज अपने वादे को पूरा किया है। बावजूद इस सबके वह यह नहीं बता सकी कि जो वादा 2009 में किया गया था उसे पूरा करने की याद 2012 में तब क्यों आई जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव कार्यकम की घोषणा होने वाली थी? शायद यही कारण रहा कि निर्वाचन आयोग ने चुनाव होने तक इस फैसले के अमल पर रोक लगा दी। निर्वाचन आयोग द्वारा इस पर रोक लगाने से साबित हो गया कि यह चुनावी लाभ के लिए लिया गया एक राजनीतिक फैसला था। अब सरकार और कांग्रेस दोनों अल्पसंख्यक आरक्षण पर हाईकोर्ट की इस चाबुक की मार से उभरने का रास्ता खोजने में लग गए हैं। सलमान खुर्शीद ने कहा है कि सरकार आंध्र पदेश हाईकोर्ट के इस फैसले को सुपीम कोर्ट में चुनौती देगी। दलील यह दी जाएगी कि यह फैसला धार्मिक नहीं भाषाई आधार पर लिया गया था। सरकार अपनी पार्टी कांग्रेस को दिलासा दे रही है कि सुपीम कोर्ट में ठीक से पक्ष रखने से अल्पसंख्यक आरक्षण का मामला सुलझ जाएगा। सरकार अपनी हार को वकीलों द्वारा ठीक से केस पस्तुत न कर पाने की वजह मान रही है। सुपीम कोर्ट में पिछड़ों के कोटे के अंदर मुस्लिमों के लिए एक निश्चित कोटे की बात रखने की मजबूत दलील देनी होगी। कोर्ट चाहेगा कि सरकार बताए कि अल्पसंख्यकों में जो पिछड़े हैं वे वास्तव में कितने पिछड़े हैं? कानून मंत्री सलमान खुर्शीद से जब यही सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि एटार्नी जनरल के लिए अदालत को समझाना मुश्किल नहीं होगा क्योंकि सरकार अल्पसंख्यक पिछड़ों की अलग से सूची नहीं बनाने जा रही है। उन्होंने कहा कि पिछड़ों का आरक्षण तय करने वाले मंडल आयोग ने जो खाका दिया है, सरकार उसके दायरे के भीतर ही कोर्ट में बात करेगी। कानून मंत्री ने स्वीकार किया कि सरकार संविधान के बाहर नहीं जा रही है। सुपीम कोर्ट इस मुद्दे पर क्या रुख अख्तियार करता है समय ही बताएगा। इससे इंकार नहीं कि अल्पसंख्यकों और विशेष तौर पर मुस्लिम समाज की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा के लिए अतिरिक्त कदम उठाए जाने की जरूरत है लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं कि ऐसा सिर्प चुनावी लाभ या वोट हासिल करने के लिए किया जाए। मुस्लिम समाज अब राजनीतिक चालबाजियों में फंसने वाला नहीं। उसने देख लिया है कि पिछले छह दशकों से इन राजनीतिक दलों ने उन्हें कैसे गुमराह कर महज वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया है।
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Thursday, 31 May 2012

मार्क्सवादी अपने प्रतिद्वंद्वियों को मारने से भी कतराते नहीं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 31 May 2012
अनिल नरेन्द्र
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अकसर मार्क्सवादियों पर आरोप लगाती रहती हैं कि यह अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की हत्या तक करने से परहेज नहीं करते। अब खुद माकपा के एक वरिष्ठ नेता ने केरल की एक जनसभा में यह स्वीकार किया है कि ऐसे मौके आए थे जब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने विरोधियों की हत्या करने से गुरेज नहीं किया। केरल के वरिष्ठ माकपा नेता एमएम मणि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के इडुकी जिले के सचिव हैं। उन्होंने थोडुपुझा में एक सार्वजनिक सभा के दौरान यह विवादास्पद बयान दिया। शनिवार रात एक सार्वजनिक सभा में कहा कि पार्टी की ओर से अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों का सफाया करने के कई उदाहरण रहे हैं। मणि ने यह बयान उस समय दिया जब पार्टी कोझिकोड और कन्नूर जिले के कुछ कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के दौरान रक्षात्मक मुद्रा में आई है। कार्यकर्ताओं को मार्क्सवादी नेता टीपी चन्द्रशेखरन की हत्या के संबंध में गिरफ्तार किया गया। मणि ने हालांकि यह सभा सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करने के लिए बुलाई थी कि चन्द्रशेखरन की हत्या में पार्टी का कोई हाथ नहीं है। बाद में मणि ने कहा कि उनका मतलब शारीरिक हत्या से नहीं है परन्तु तब तक बवाल की जमीन तैयार हो चुकी थी। माकपा के राज्य सचिव पिनारई विजयन ने कहा कि मणि का भाषण पार्टी की विचारधारा से मेल नहीं खाता और उन्होंने यह बात कहकर गलती की है। विजयन ने कहा कि मणि के विचार पार्टी के राजनीतिक विचारधारा से अलग हैं। मणि के इस बयान को राज्य में कांग्रेस और भाजपा ने कड़ी आलोचना की और कहा है कि वामपंथी दलों की हिंसा पर से पर्दा उठ गया है। एमएम मणि यह बयान देकर फंस गए हैं। पुलिस ने उनके खिलाफ हत्या व अन्य मामलों में केस दर्ज कर लिया है। थोडुपुझा पुलिस ने मणि के इस बयान के मद्देनजर मामला दर्ज किया है कि इडुकी जिले में 1980 के दशक में राजनीतिक हत्याओं के पीछे सीपीआई-एम का हाथ था। राज्य के गृहमंत्री राधाकृष्णन ने कहा कि सरकार कानून को अपना काम करने देगी। पार्टी के वरिष्ठ नेता अच्युतानन्दन ने मणि की टिप्पणी पर कहा कि इसकी भर्त्सना की जानी चाहिए। मणि जिस समय की इडुकी जिले में राजनीतिक हत्याओं का जिक्र कर रहे हैं उस समय अच्युतानन्दन पार्टी के राज्य सचिव थे। श्री मणि ने अपनी पार्टी के हिंसक तौर-तरीकों का जो व्यापक खुलासा किया है, वह सिर्प स्तब्ध करने वाला नहीं है इससे यह भी पता चलता है कि वर्ग भेद के खात्मे की बात करने वाला वाम किस तरह अपने विरोधियों को ही खत्म करने में विश्वास करता है। यह मामला दरअसल माकपा के एक बागी नेता टीपी चन्द्रशेखरन की पिछले दिनों हुई हत्या से जुड़ा है, जिसके सिलसिले में माकपा के कई कार्यकर्ता गिरफ्तार किए गए हैं। यह संयोग नहीं है कि मणि के सनसनीखेज खुलासे से कुछ ही समय पहले बंगाल में माकपा के एक पूर्व मंत्री को इसलिए गिरफ्तार किया गया, क्योंकि उनके घर के सामने नरकंकालों का ढेर बरामद हुआ था। केरल सरकार ने मणि के खुलासे के आधार पर जांच के आदेश दिए हैं। लाजिमी है कि बन्द हो चुके पुराने मामले भी खुल जाएंगे और न जाने कितने नरकंकाल और मिलेंगे। हमारे कामरेड अपने प्रतिद्वंद्वियों की आवाज बन्द करने के लिए हत्या का हथियार इस्तेमाल करने से गुरेज नहीं करते।
Anil Narendra, Communist, Daily Pratap, Kerala, Political Murder, Vir Arjun