Saturday, 18 July 2020

महिला कांस्टेबल से दुर्व्यवहार में मंत्री का बेटा गिरफ्तार

गुजरात के सूरत में महिला कांस्टेबल से दुर्व्यवहार के आरोप में मंत्री के बेटे को गिरफ्तार कर लिया। सूरत में कर्फ्यू का उल्लंघन करने के मामले में स्वास्थ्य राज्यमंत्री किशोर कानाणी के पुत्र प्रकाश सहित सात युवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिस ने प्रकाश सहित तीन को रविवार को गिरफ्तार किया। इस घटना के बाद सूरत व अन्य शहरों में लोग वी सपोर्ट सुनीता यादव के बैनर लेकर सड़कों पर उतर पड़े। इससे पहले मंत्री ने अपने पुत्र का बचाव करते हुए कहा कि उनके खिलाफ राजनीति के तहत साजिश की जा रही है। उनके मुताबिक वह सौराष्ट्र में मजबूत हैं और आगामी स्थानीय निकाय चुनाव को देखते हुए विरोधी उनको कमजोर करना चाहते हैं। उनके पुत्र ने भी महिला कांस्टेबल पर गाली-गलौज करने व वर्दी का रौब दिखाने का आरोप लगाया था। सोशल मीडिया में वायरल ऑडियो को एडिट कर चलाने का भी उनका आरोप है। कांस्टेबल सुनीता यादव शनिवार को इस्तीफा देने के बाद से भूमिगत है। यह घटना गत आठ जुलाई रात की बताई जा रही है। प्रकाश ने महिला कांस्टेबल की बात अपने मंत्री पिता से भी कराई, लेकिन सुनीता यादव नहीं मानी। सूरत में कोरोना संक्रमित के बढ़ते मामलों के चलते प्रशासन व पुलिस रात्रि कर्फ्यू से लेकर हीरा व टेक्सटाइल बाजार बंद कराने जैसे सख्त कदम उठ रही है। ऐसे में मंत्री के बेटे बिना मास्क घूमते पकड़े गए और दोस्तों को छुड़ाने पहुंच गए। इन युवकों ने महिला कांस्टेबल के साथ दुर्व्यवहार किया। मंत्री के बेटे प्रकाश कानाणी भी एमएलए गुजरात लिखी कार लेकर पहुंचे और कांस्टेबल के साथ कहासुनी हुई। गौरतलब है कि घटना के दौरान सुनीता ने पुलिस निरीक्षक बीएन सागर को इसकी जानकारी दी तो उन्होंने कहा कि उनका काम वहां डायमंड व टेक्सटाइल फैक्ट्री नहीं चलने देने का है। प्वाइंट पर किसी को रोकने का नहीं। सुनीता यादव ने इस पर अपना इस्तीफा दे दिया। -अनिल नरेन्द्र

अगले महीने मिल जाएगी कोरोना वैक्सीन

रूस की जिस यूनिवर्सिटी ने सबसे पहले दावा किया था कि उसने कोरोना वैक्सीन बना ली है। वह अगस्त इसी साल यानि अगले महीने तक मरीजों को वैक्सीन उपलब्ध कराने की तैयारी में है। स्मॉल स्केल पर हुए ह्यूमन ट्रायल में यह वैक्सीन इंसानों के लिए सेफ पाई गई है। मॉस्को की सेचेनोव यूनिवर्सिटी ने 38 वॉलंटियर्स पर क्लिनिकल ट्रायल पूरा किया था। रूस की सेना में भी पैरलल सारे ट्रायल दो महीने में सरकारी गमलेई नेशनल रिसर्च सेंटर में पूरे किए। गमलेई सेंटर के हैड अलेक्जेंडर जिंट्सबर्ग ने बताया कि उन्हें उम्मीद है कि वैक्सीन 12 से 14 अगस्त के बीच सिविल सर्कुलेशन में आ जाएगी। अलेक्जेंडर के मुताबिक प्राइवेट कंपनियां सितम्बर से वैक्सीन का बड़े पैमाने पर प्रॉडक्शन शुरू कर देंगी। गमलेई सेंटर हैड के मुताबिक वैक्सीन ह्यूमन ट्रायल में पूरी तरह सेफ साबित हुई है। अगस्त में जब मरीजों को वैक्सीन दी जाएगी तो यह उसके फेज-3 ट्रायल जैसा होगा क्योंकि जिन्हें डोज मिलेगी, उनकी मॉनिटरिंग की जाएगी। फेज-1 और 2 में आमतौर पर किसी वैक्सीन/दवा की सेफ्टी जांच होती है। इंस्टीट्यूट ने 18 जून से ट्रायल शुरू किया था। नौ वॉलंटियर्स को एक डोज दी गई और दूसरे नौ वॉलंटियर्स के ग्रुप को बूस्टर डोज मिली। किसी वॉलंटियर पर वैक्सीन के साइड इफैक्ट देखने को नहीं मिले और उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। सेचेनोव यूनिवर्सिटी में वॉलंटियर्स के दो ग्रुप को अगले हफ्ते डिस्चार्ज किया जाएगा। उन्हें 23 जून को डोज दी गई थी। अब यह सभी 28 दिन तक आइसोलेशन में रहेंगे ताकि किसी और को इंफैक्शन न हो। 18 से 65 साल के इन वॉलंटियरों को छह महीने तक मॉनिटर किया जाएगा। रूस आम जनता को वैक्सीन देने की तैयारी में इसलिए है क्योंकि वह कोरोना वैक्सीन टेस्टिंग की रेस में सबसे आगे निकलना चाहता है। अमेरिका, ब्राजील और भारत के बाद से सबसे ज्यादा केस वहीं पर हैं। रूसी सरकार पहले कह चुकी है कि 50 से ज्यादा अलग-अलग वैक्सीन पर काम कर रहे हैं। उनके वैज्ञानिकों ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वैक्सीन डेवलप करना राष्ट्रीय सम्मान का सवाल है। अलेक्जेंडर जिंट्सबर्ग का दावा है कि यह वैक्सीन अगले दो साल तक कोरोना से बचाएगी।

विदेशी छात्रों के वीजा पर ट्रंप का यूटर्न

ट्रंप प्रशासन ने हैरानी भरा कदम उठाते हुए अपना वह आदेश वापस ले लिया जिसमें कहा गया था कि भारतीयों समेत हजारों छात्रों को उनके देश वापस भेजा जाएगा। उन छात्रों को वापस भेजा जाना था जिनकी यूनिवर्सिटी कोरोना की वजह से सिर्फ ऑनलाइन क्लास देगी। ट्रंप सरकार को इस फैसले पर यूटर्न लेना पड़ा है। फैसले को देश के 17 राज्यों समेत गूगल, फेसबुक जैसी कई टेक कंपनियों तथा हार्वर्ड व एमआईटी विश्वविद्यालयों ने अदालत में चुनौती दी थी। याचिका में कहा गया था कि नए दिशानिर्देशों से कई तरह की कानूनी अड़चनें पैदा होंगी। वित्तीय नुकसान भी होगा। अमेरिका की संघीय अदालत के एक जज ने जब इस बारे में पूछा तब ट्रंप प्रशासन ने अपने छह जुलाई के नियम को रद्द करने पर सहमति जताई। देशभर में आक्रोश था और शैक्षणिक संस्थानों ने इसका खुलकर विरोध किया था। अब ट्रंप प्रशासन के उस आदेश को पलटने के बाद छात्रों ने राहत की सांस ली। जज एलिसन बरो (बोस्टन संघीय जिला न्यायाधीश) ने मुकदमे की सुनवाई के दौरान कहाöमुझे सूचित किया गया है कि प्रशासन इस संबंध में पुरानी स्थिति में लौट आएगा। मार्च में लागू की गई नीति को दोबारा लागू कर दिया गया है। विदेशी छात्र ऑनलाइन क्लास लेते हुए भी छात्र वीजा पर अमेरिका रह सकते हैं। इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एजुकेशन के मुताबिक 2018-19 के शैक्षणिक वर्ष के लिए अमेरिका में 10 लाख विदेशी छात्र थे। विदेशी छात्रों ने साल 2018 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 44.7 अरब डॉलर का योगदान दिया था। हार्वर्ड के अध्यक्ष लॉरेंस एस बैकॉ ने इसे ऐतिहासिक जीत करार दिया है। उन्होंने कहाöसरकार एक नया निर्देश जारी कर सकती है। हमारी कानूनी दलीलें मजबूत हैं और कोर्ट ने उसे बरकरार रखा है, जो हमें न्यायिक राहत दिलाएगी। यह घोषणा हजारों विदेशी छात्रों के लिए राहत लेकर आई है। इनमें हजारों भारतीय छात्र भी शामिल हैं। सांसद ब्रैड श्नाइडर ने कहा कि यह अंतर्राष्ट्रीय छात्रों और कॉलेजों के लिए बड़ी जीत है।

Thursday, 16 July 2020

ताहिर हुसैन ने दंगाइयों को मानव हथियार बना लिया

आम आदमी पार्टी के निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन को जमानत देने से इंकार करते हुए सोमवार को दिल्ली की एक अदालत ने उत्तर पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा के दौरान आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि ताहिर हुसैन प्रभावशाली व्यक्ति हैं। अदालत ने कहा कि निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन ने कथित तौर पर दंगाइयों का इस्तेमाल मानव हथियार के रूप में किया जो उसके उकसाने पर किसी की भी हत्या कर सकते थे। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने कहा कि हुसैन जैसे ताकतवर लोग जमानत पर छूटने पर मामले में गवाहों को धमका सकते हैं। उन्होंने कहा, इस स्तर पर मुझे लगता है कि इस बात के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं कि आवेदक अपराध स्थल पर मौजूद था और एक समुदाय विशेष के दंगाइयों को निर्देशित कर रहा था। उसने अपने हाथों का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि मानव हथियार के तौर पर दंगाइयों का इस्तेमाल किया जो उसके उकसाने पर किसी की भी जान ले सकते थे। जज ने कहा, इस मामले में जिन गवाहों के बयान दर्ज किए गए हैं, वे उसी इलाके के निवासी हैं और आवेदक (हुसैन) जैसे ताकतवर लोग उन्हें आसानी से धमका सकते हैं। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि आदेश में जो भी कहा गया है वह इस स्तर पर ऑन रिकार्ड उपलब्ध सामग्रियों के प्रारंभिक विश्लेषण पर आधारित है जिसकी मुकदमे की कसौटी पर परख अभी होनी है। दिल्ली पुलिस ने मामले में अपने आरोप पत्र में आरोप लगाया था कि अंकित शर्मा की हत्या के पीछे गहरी साजिश की गई और ताहिर हुसैन की अगुवाई में भीड़ ने उन्हें ही खासतौर पर निशाना बनाया। मामले में आरोपी ताहिर हुसैन के वकील जावेद अली ने अपने मुवक्किल को जमानत देने की पैरवी करते हुए कहा कि उनके मुवक्किल के अंकित शर्मा की हत्या में शामिल होने को लेकर पुलिस के पास कोई ठोस सुबूत नहीं है। दूसरा पुलिस जानबूझकर गवाहों के बयान दर्ज करने में देरी कर रही है। तीसरा उनका मुवक्किल मौका-ए-वारदात पर मौजूद नहीं था। -अनिल नरेन्द्र

रोम जल रहा है और नीरो चैन की नींद सो रहे हैं

पहले कर्नाटक में सरकार गई, फिर मध्यप्रदेश में। अब राजस्थान सरकार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। छत्तीसगढ़ का किला भी बहुत सुरक्षित नहीं है। आखिर क्या वजह है कि सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस किसी भी राज्य में एक-दो वर्ष से ज्यादा सत्ता में बने रहने में विफल साबित हो रही है? हर जगह उनके अपने विधायकों की बगावत ही उसके लिए संकट का सबब बन रही है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि कांग्रेस मे अब कोई संकटमोचक नहीं बना है। पार्टी अध्यक्ष सोनिया अपने घर तक ही सीमित होकर रह गई हैं। राहुल गांधी सिर्फ ट्विटर पर सक्रीय हैं। कमोबेश यही स्थिति प्रियंका की भी है। इन तीनों के अलावा पार्टी में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो संकट की घड़ी में राह निकाल सके। अशोक गहलोत, दिग्विजय सिंह और कमलनाथ जैसे नेताओं के मुकाबले संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल कहीं जूनियर हैं और उनकी आवाज नक्कार खाने में तूती के समान है। अधिकतर वरिष्ठ नेताओं को पहले ही किनारे लगा दिया गया है। यही वजह है कि एक के बाद एक कांग्रेस के किले ध्वस्त होते जा रहे हैं और गांधी परिवार सिर्फ मूकदर्शक बनने पर विवश है। इसके चलते जहां कांग्रेस कई राज्यों में आई सत्ता खो चुकी है, वहीं दूसरी ओर इनके चलते कई जगह सत्ता में आते-आते रह गई। लेकिन कांग्रेस सबक सीखने को तैयार नहीं है। हालिया तस्वीर राजस्थान की है। जहां कांग्रेस सरकार पर खतरा मंडरा रहा है, अशोक गहलोत की कुर्सी हिलती दिख रही है। शुक्रवार तक कांग्रेस जहां प्रदेश में अस्थिरता के लिए बीजेपी को दोषी ठहरा रही थी, वहीं शनिवार की शाम बीतते-बीतते तस्वीर बदलने लगी और पार्टी का एक धड़ा असंतोष होकर वैसे ही रूठा दिखाई देने लगा, जैसे चार महीने पहले मध्य प्रदेश में तस्वीर सामने आई थी। वहां डिप्टी सीएम व प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट नाराज बताए जा रहे हैं। भले ही कांग्रेस अपने यहां अस्थिरता के लिए बीजेपी को दोषी करार देती आई हो, लेकिन सच्चाई यह है कि कांग्रेस का नेतृत्व अपने यहां की वर्चस्व की लड़ाई और गुटबाजी पर काबू पाने में नाकाम दिख रही है। राजस्थान में सीएम और डिप्टी सीएम के बीच आपसी गुटबाजी व मनमुटाव कोई नई चीज नहीं है। पायलट के प्रदेशाध्यक्ष बनने के बाद से ही दोनों के बीच पावर की जंग और अपने वर्चस्व की लड़ाई रही है। भले ही असेंबली चुनाव के दौरान ही पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के चलते दोनों नेताओं ने आपसी मतभेद भुलाकर, मिलकर काम करने की बात कही हो, लेकिन हकीकत यही रही कि दोनों के बीच दूरियां कभी कम नहीं हुई। राज्य में होने वाले स्थानीय निकायों के चुनाव के मद्देनजर भी पायलट को लग रहा है कि पार्टी अध्यक्ष होने के बावजूद फैसले कहीं और से हेंगे। वहां पार्टी समझ रही है कि पायलट मेहनती और महत्वाकांक्षी हैं। यह भी अफवाह है कि सारा झगड़ा पायलट को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मुहिम से शुरू हुआ। रोम जल रहा है और नीरो चैन की नींद सो रहे हैं।

मरने से पहले विकास ने सारे राज उगल दिए

दैनिक जागरण और राष्ट्रीय सहारा में छपी खबर के अनुसार आठ पुलिस कर्मियों के हत्यारे और पांच लाख के ईनामी विकास दुबे को एसटीएफ ने भले ही मुठभेड़ में मार गिराया हो, लेकिन मरने के पूर्व उज्जैन से कानपुर के रास्ते में विकास दुबे ने अपने सहयोगियों के नाम एसटीएफ को बता दिए थे। किससे उसका व्यापारिक संबंध था, कौन अधिकारी उसकी मदद करता था और कौन-कौन नेता उसकी राजनीतिक गलियों में पहुंच बनाते थे। विकास ने उन सभी के नाम एसटीएफ को मरने से पहले बता दिए थे। विकास के एनकाउंटर के बाद उसके मददगारों ने सोचा कि अब तो उनके सारे राज दफन हो गए हैं और विकास की कहानी खत्म हो गई है। पर उन्हें यह मालूम नहीं था कि एसटीएफ ने उसके एनकाउंटर से पहले सारे राज उगलवा लिए थे। एसटीएफ ने उसके बयानों की वीडियोग्राफी कराकर सीडी शासन को सौंप दी है। विकास के पूरे नेटवर्क को नेस्तनाबूद करने को कटिबद्ध शासन के निर्देश पर अब जांच एजेंसियां विकास द्वारा बताए गए लोगों पर शिकंजा कसने की तैयारी कर रही है। उल्लेखनीय है कि दुर्दान्त विकास को उज्जैन पुलिस ने 9 जुलाई की सुबह महाकाल मंदिर से गिरफ्तार किया था। विकास को कानपुर शहर लाने के लिए एसटीएफ सीओ तेज बहादुर सिंह के नेतृत्व में एसटीएफ के पचास कमांडो और मामले के विवेचक इंस्पेक्टर नवाब गंज पचौरी पांच पुलिस कर्मियों के साथ उज्जैन गए थे। एसटीएफ और पुलिस विकास को सड़क के रास्ते शहर ला रही थी। कई घंटे के लंबे सफर में एसटीएफ ने विकास दुबे से पूछताछ शुरू की थी। एसटीएफ सूत्रों के मुताबिक विकास से करीब पचास से ज्यादा प्रश्न पूछे गए थे, उसमें कुछ प्रश्न घटना से संबंधित, कुछ उसके साथियों से और कुछ उसके सहयोगियों से संबंधित थे। एसटीएफ सूत्रों के अनुसार विकास ने अपने सहयोगियों में सबसे पहले चार बड़े कारोबारियों के नाम लिए। यह कारोबारी ऊंची पहुंच रखने वाले हैं। विकास की उनके साथ पार्टनरशिप है। विकास जयराम के जरिए होने वाली कमाई को इन चार बड़े कारोबारियों के धंधे में लगाता था। जिसका एक बंधा हिस्सा उसे हर माह कारोबारियों द्वारा पहुंचा दिया जाता था। इसके अलावा यह चारों कारोबारी अन्य मामलों में भी विकास की मदद करते थे। इसके बाद विकास ने पांच उच्च पदें पर तैनात पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से दोस्ती होने की बात बताई। विकास ने बताया कि वह इन अधिकारियों के जरिए उस पर पड़ने वाले पुलिस के दबाव को खत्म कराने, अपने खिलाफ हुई शिकायत को दबाने के साथ ही अपने चेहते लोगों की ट्रांसफर पोस्टिंग का काम भी करता था। उसने कुछ माह पूर्व एक अधिकारी (का नाम भी बताया) के जरिए एक थानेदार और चार चौकी प्रभारियें की तैनाती बताई थी। देखना अब यह है कि विकास दुबे द्वारा लिए गए नामों पर क्या एक्शन होता है? क्या शासन उनके नाम सार्वजनिक करेगा? या मामले को ऐसे हर मामलों की तरह दबा देगा?

Saturday, 11 July 2020

अमेरिका का अजीबोगरीब फैसला

कोरोना संकट के बीच अमेरिकी सरकार का एक अजीबोगरीब फैसला समझ नहीं आया। अमेरिका के इमिग्रेशन और कस्टम इनफोर्समेंट डिपार्टमेंट ने आदेश में कहा था कि ऐसे विश्वविद्यालय जहां कोविडकाल में ऑनलाइन क्लास चल रही हैं वहां के विदेशी स्टूडेंट्स को देश छोड़ना होगा। दो तरह के वीजाöनॉन इमिग्रेंट एफ-1 और एच-1 वाले स्टूडेंट्स को अमेरिका में आने की अनुमति नहीं होगी। इनका अगले सेमेस्टर के लिए वीजा जारी नहीं किया जाएगा। बता दें कि अमेरिका में लगभग 30 प्रतिशत यूनिवर्सिटी ऑनलाइन कोर्स चला रही हैं। अमेरिकी सरकार के फैसले के खिलाफ वहां की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी ने आवाज उठा दी है। अमेरिका की दो टॉप यूनिवर्सिटी हॉवर्ड और एमआईटी ने इस फैसले पर घोर आपत्ति जताते हुए इस पर दोबारा विचार करने की मांग की है। दोनों यूनिवर्सिटी ने कहा है कि अचानक लिए गए फैसले से वहां रह रहे स्टूडेंट्स को काफी परेशानी हो सकती है और यह स्टूडेंट्स के हित के लिए नहीं है। हॉवर्ड क्रिमसन की एक रिपोर्ट के मुताबिक दोनों प्रतिष्ठित संस्थानों ने यह नियम बनाने वाले आब्रजन अधिकारियों और गृह सुरक्षा विभाग को कोर्ट में घसीटा है। हॉवर्ड क्रिमसन की एक रिपोर्ट के मुताबिक दोनों प्रतिष्ठित संस्थानों ने बुधवार को बोस्टन जिला अदालत में दोनों संघीय एजेंसियों के खिलाफ मुकदमा किया। इसमें कहा गया है कि गृह सुरक्षा विभाग और आब्रजन विभाग को सीधे संघीय दिशानिर्देश को लागू करने से रोका जाए जिसमें विदेशी छात्रों को अमेरिका छोड़कर जाने को कहा जा रहा है। कोर्ट से इसके लिए अस्थायी आदेश जारी करने की मांग की। इसमें कहा गया कि निर्णय प्रशासनिक प्रक्रिया कानून का उल्लंघन है। यह इससे होने वाली मुश्किलों की समीक्षा किए बिना ही जारी कर दिया गया। यह किसी सूरत में तर्कसंगत नहीं है। हॉवर्ड विश्वविद्यालय के अध्यक्ष लारेंस बैको ने कहाöसिर्फ सभी संबद्धों को ई-मेल के जरिये यह आदेश पारित कर दिया गया। इसका न कोई नोटिस दिया गया और न किसी से चर्चा ही की गई। यह लापरवाही में लिया गया फैसला है और लगता है कि आदेश गलत जननीति है। हम इसे गैर-कानूनी मानते हैं। ध्यान रहे, यह विदेशी स्टूडेंट्स कुल अमेरिकी छात्रों का 5.5 प्रतिशत है और साल 2019 में इन्होंने अमेरिकी विश्वविद्यालयों में 41 अरब डॉलर तो सिर्फ फीस भरी थी। यह भी विचित्र है कि वीजा नियमों में ऐसे फेरबदल की खबरें कहीं और से नहीं आ रहीं जबकि कोरोना काल में लगभग सभी देशों के विश्वविद्यालय ऑनलाइन पढ़ाई ही करा रहे हैं। बहरहाल अमेरिकी विश्वविद्यालयों को इस मसले पर पहल करते हुए सरकार से बातचीत करने की कोई राह निकालनी चाहिए, क्योंकि मौजूदा व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा भी वही ले रहे हैं। वैध तरीके से वहां रहने वाले लोगों के सामने अचानक ही देश से बाहर निकलने के हालात पैदा कर देना किस तरह महामारी से बचाव की लड़ाई है? -अनिल नरेन्द्र