Friday, 26 May 2017

ट्रंप ने शरीफ को दो दिन में डबल झटका दिया

सऊदी अरब में इस्लामिक सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान को अलग-थलग कर दिया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी में पाक पीएम नवाज शरीफ की बेइज्जती हुई। उन्हें सम्मेलन के दौरान आतंकवाद पर बोलने का मौका ही नहीं मिला जबकि वे काफी तैयारी के साथ आए थे। बताया जा रहा है कि शरीफ ने सऊदी सम्मेलन के लिए अपनी फ्लाइट के दौरान दो घंटे लगाकर लंबा भाषण तैयार किया था। गौर करने वाली बात यह है कि इस सम्मेलन में उन देशों के नेताओं को भी बोलने का मौका दिया गया जो आतंकवाद से फिलहाल ज्यादा प्रभावित नहीं हैं, जबकि नवाज शरीफ की पूरी तरह अनदेखी की गई। इतना ही नहीं, ट्रंप ने एक बार भी अपने भाषण में नवाज शरीफ या पाकिस्तान का जिक्र तक नहीं किया। शरीफ के सामने ही ट्रंप ने भारत को आतंकवाद से पीड़ित मुल्क बताया। ट्रंप ने सीधे तौर पर यह तो नहीं कहा कि भारत किस तरह के आतंक से प्रभावित है, लेकिन वैश्विक स्तर पर उनकी तरफ से भारत का नाम लेने के कई कूटनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। भारत लगातार यह कहता रहा है कि वह पाक समर्थित आतंकवाद से पीड़ित देश है और ट्रंप ने एक तरह से उसकी इस बात का समर्थन किया है। पाकिस्तान को यह बात इतनी नागवार गुजरी कि देर शाम इस्लामाबाद में पाकिस्तान के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा ने अमेरिकी राजदूत डेविड हेल से मुलाकात कर सफाई दी कि आतंकियों के समर्थन के लिए पाकिस्तान की धरती का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। घरेलू स्तर पर कई मोर्चों पर तनाव झेल रहे नवाज शरीफ के लिए यह सिर्फ परेशानी की बात नहीं है कि ट्रंप ने उनसे अलग द्विपक्षीय मुलाकात नहीं की, बल्कि उनकी परेशानी का कारण यह भी है कि ट्रंप ने दक्षिण एशियाई देशों में सिर्फ अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी से मुलाकात की। कूटनीतिक स्तर पर माना जा रहा है कि ट्रंप ने इस बैठक के जरिये पाकिस्तान और रूस को यह संकेत दिया है कि वह अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति और मजबूत करेगा। दरअसल हाल के महीनों में पाकिस्तान चीन और रूस की मदद से अफगान शांतिवार्ता में तालिबान को घुसाने की चेष्ठा कर रहा है। पाकिस्तान यह चाल अफगानिस्तान में भारत की भूमिका को खत्म करने के लिए चल रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को दो दिनों में दूसरा झटका दिया है। ट्रंप प्रशासन ने कांग्रेस के समक्ष पेश अपने वार्षिक बजट प्रस्ताव में कहा है कि पाक को दिए जाने वाला सैन्य अनुदान कर्ज में बदला जाना चाहिए। हालांकि ट्रंप प्रशासन ने इस मुद्दे पर अंतिम फैसला विदेश मंत्रालय पर छोड़ दिया है। अमेरिका का मानना है कि अमेरिकी आर्थिक मदद अनुदान के रूप में दी जाए न कि सब्सिडी के तौर पर। ट्रंप ने परोक्ष रूप से पाक पर निशाना साधते हुए कहा कि कुछ देश आतंकवाद को पाल रहे हैं। वे दुनियाभर में चरमपंथ को बढ़ावा देने में अपनी सरजमीं का इस्तेमाल कर रहे हैं।

-अनिल नरेन्द्र

...और अब मैनचेस्टर म्यूजिक कंसर्ट पर आतंकी हमला

मंगलवार को तड़के तीन बजे ब्रिटेन के मैनचेस्टर में जो घटित हुआ उसने ब्रिटेन को ही नहीं, पूरे यूरोप को दहला दिया है। असंख्य नजरें उत्सुकता के साथ कहीं लगी हों और अचानक आतंकी हमला हो जाए तो यह दूर तक और देर तक असर करने वाला हो सकता है। मैनचेस्टर एरेना में मशहूर पॉप गायिका एरियाना ग्रांडे के कंसर्ट के दौरान हुए इस आत्मघाती हमले में 22 लोगों के मारे जाने और दर्जनों लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की खबर है। मारे गए और घायल लोगों की तादाद से जाहिर है कि हमले के पीछे इरादा अधिक से अधिक कहर बरपाना और बड़े पैमाने पर आतंक पैदा करना था। इस हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन आईएस ने ली है। माना जा रहा है कि लंदन में 2005 के आतंकी हमले के बाद यह ब्रिटेन में अब तक की सबसे भयावह आतंकी घटना है, क्योंकि इसका निशाना देश के युवा थे। इसने अहसास दिलाया है कि आतंकवाद पर चाहे जितनी बौद्धिक जुगाली कर ली जाए, इसका नए-नए रूप-रंग में दिखना थमा नहीं। पहले जब भारत आतंकी वारदात की बात करता था तो विकसित माने जाने वाले देश इसे ज्यादा तवज्जो नहीं देते थे। लेकिन अब जब आतंकियों ने पांव पसारे तो अमेरिका के साथ यूरोप को भी निशाना बनाने से चूक नहीं रहे हैं। मैनचेस्टर में हुए धमाके के बाद एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि क्या आतंकियों से निपटने में विकसित देश भी सक्षम नहीं हैं? पिछले 10 साल में यूरोप के अलग-अलग देशों में सात बड़ी आतंकी वारदातें हो चुकी हैं। मैनचेस्टर विस्फोट में मारे जाने वालों में बच्चों और किशोरों की संख्या ज्यादा है क्योंकि 24 साल की एरियाना ग्रांडे उनके बीच बहुत लोकप्रिय है। बताया जा रहा है कि वहां 60 बच्चे बिना अपने मां-बाप के आए थे। अभी उनमें से कुछ ने पास के एक होटल में शरण ली, जबकि कई लापता हैं। जाहिर है कि कई परिवारों की जिन्दगी तहस-नहस हो गई है। इस हमले की सीधी जिम्मेदारी भले ही किसी ने न ली हो पर हमले के बाद इस्लामिक स्टेट के समर्थकों का ऑनलाइन जश्न तो किसी से छिपा नहीं है। सोशल मीडिया पर इसे सीरिया और इराक में हुए हवाई हमलों का बदला भी बताया जा रहा है। मैनचेस्टर जैसी घटनाएं हर उस समाज पर हमला है जो उन्मुक्त होकर सोचता है, खुली आंखों से देखता है, अपने विवेक का इस्तेमाल करता है। यह उस आजाद ख्याली पर हमला है, जो कट्टरवाद और आतंकवाद का निषेध करती हैं। यह भयावह और सतर्क करने वाला है, क्योंकि यह उसी भावना और सोच का विस्तार है, जो कभी इस तरह के आतंकवाद, तो कभी धर्म-संस्कृति के स्वयंभू ठेकेदार के रूप में अलग तरह के कट्टरवाद के रूप में दिखाई देता है। इस संकट की बेला में हम मैनचेस्टर के साथ हैं।

Thursday, 25 May 2017

कोयले की आंच में पहली बार लिपटे सरकारी अफसर

कोयला आवंटन घोटाले में कुल दर्ज 28 मामलों में यह तीसरा मामला है जिसमें अदालत ने फैसला सुनाया है। हालांकि इससे पहले दो मामलों में कंपनियों के अधिकारियों को सजा सुनाई गई थी। मगर यह पहला मौका है जब किसी सरकारी बाबू पर गाज गिरी है। शुक्रवार को विशेष सीबीआई जज भारत पराशर ने पूर्व कोयला सचिव एचसी गुप्ता, तत्कालीन निदेशक केसी समारिया और एमएसपीएल के प्रबंध निदेशक पवन कुमार आहलूवालिया को दोषी ठहराया। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में कुल 28 कोल आवंटन मामलों की जांच शुरू हुई है। इसमें सीबीआई सबसे पहले 2004 से 2010 के बीच के मामलों की जांच कर रही है। इसके बाद 1993 से 2004 तक के मामलों की जांच की जाएगी। सीबीआई की विशेष अदालत ने एचसी गुप्ता को दो साल की कैद की सजा सुना दी है। गुप्ता के अलावा अन्य आरोपियों को भी दो साल की सजा सुनाई गई है। सजा के अलावा दोषियों पर एक लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया है। हालांकि कोर्ट की ओर से सभी दोषियों को बेल भी दे दी गई है। तीनों सरकारी अधिकारियों के अलावा एक निजी फर्म कमल स्पंज एंड पावर लिमिटेड पर एक करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया गया है और फर्म के प्रबंध निदेशक पवन कुमार आहलूवालिया को तीन साल की सजा तथा 30 लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई गई है। यह सजा विशेष सीबीआई अदालत से मिली है और बचाव पक्ष के पास ऊपरी अदालतों में अपील करने का विकल्प उपलब्ध है, मगर एक समय देश की राजनीति को हिलाकर रख देने वाले इस घोटाले में यह फैसला खासा अहमियत रखता है। इस मामले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम भी उछला था। आरोपियों का कहना था कि खदान आवंटन के वक्त कोयला मंत्री की जिम्मेदारी भी प्रधानमंत्री ही निभा रहे थे, इसलिए उन्हें भी आरोपियों की सूची में शामिल किया जाए। मगर सीबीआई अपनी खोजबीन से इसी नतीजे पर पहुंची कि संबंधित मामलों में कोयला सचिव ने प्रधानमंत्री को अंधेरे में रखा था। ऐसे घोटालों में आमतौर पर राजनीति इस कदर छा जाती है कि बाकी पहलू उपेक्षित रह जाते हैं। खासकर नौकरशाही और निजी व्यवसायी घोटालों का फायदा तो सबसे अधिक उठाते हैं, लेकिन सिस्टम के हाथ इन तक पहुंचें, इसके पहले ही ये काफी दूर जा चुके होते हैं। यह मामला इस लिहाज से अहम है कि न केवल नौकरशाही के सबसे ऊंचे पायदान पर बैठे अधिकारी बल्कि निजी व्यवसायी भी सजा के दायरे में लाए गए हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस फैसले के बाद सरकारी संसाधनों से जुड़े सभी घोटालेबाजों में खौफ पैदा होगा।

-अनिल नरेन्द्र

रूहानी की जीत ः ईरान ने कट्टरपंथ को खारिज किया

ईरान में हसन रूहानी की राष्ट्रपति चुनाव में दोबारा जीत वाकई ही एक बड़ी उपलब्धि है। साफ है कि राष्ट्रपति के तौर पर अपने पहले कार्यकाल में रूहानी ने ईरान को उदारवाद की ओर ले जाने और पश्चिमी देशों से मेलजोल बढ़ाने के जो कदम उठाए थे, मतदाताओं ने उनका समर्थन किया है। हसन रूहानी की जीत लगभग तय सी थी। सारे सर्वेक्षण उन्हें आगे दिखा रहे थे। हालांकि यह इस मायने में ईरान की बड़ी घटना है कि रूहानी एक ही बार में करीब 57 फीसदी मत पाकर निर्वाचित हो गए। ईरान के संविधान के अनुसार यदि चुनाव में किसी भी उम्मीदवार को 50 फीसदी से अधिक वोट नहीं मिलते तो अगले सप्ताह दूसरे दौर का मुकाबला होता। ईरान में 1985 से ही प्रत्येक राष्ट्रपति का दोबारा चुनाव होता है। खुमेनी खुद दोबारा चुनाव में ही दूसरे कार्यकाल के लिए निर्वाचित हुए थे। यह रूहानी का नीतियों की जनता के बीच व्याप्त व्यापक समर्थन का द्योतक तो है ही लोकतंत्र के मजबूत होने का भी संकेत देता है। चुनाव जीतने के बाद राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कहा है कि उनका दोबारा चुना जाना बताता है कि मतदाताओं ने कट्टरपंथ को खारिज कर दिया है और वे बाहरी दुनिया से और अधिक सम्पर्क चाहते हैं। सरकारी टीवी पर प्रसारित अपने भाषण में कहाöईरान ने दुनिया के साथ बातचीत का रास्ता चुन लिया है। ये रास्ता हिंसा और कट्टरपंथ से बिल्कुल अलग है। अब चुनाव खत्म हो गए हैं, मुझे प्रत्येक ईरानी के सहयोग की जरूरत है, उनकी भी जो मेरा और मेरी नीतियों का विरोध करते हैं। अलबत्ता दूसरे कार्यकाल में रूहानी के सामने चुनौतियां भी ज्यादा बड़ी होंगी। एक तो यही कि प्रतिबंध हटा लिए जाने पर भी ईरान के आम लोगों पर उसका अनुकूल प्रभाव अभी तक देखा नहीं गया है। अर्थव्यवस्था बदहाल है और बेरोजगारी की समस्या भी विकट है। ऐसे ही मतदाताओं के बड़े हिस्से ने भले ही उदारवादी धर्मगुरु को राष्ट्रपति चुना हो पर सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्लाह अली खुमेनी इस बार रूहानी को शायद ही उतनी स्वतंत्रता दें, क्योंकि रूहानी से पराजित हुए इब्राहिम रईसी खुमेनी के नजदीकी माने जाते हैं। रूहानी को बड़ी चुनौती अमेरिका से भी मिलने वाली है, जहां अब राष्ट्रपति बराक ओबामा नहीं, बल्कि डोनाल्ड ट्रंप हैं। पिछले दिनों ट्रंप ने ईरान के साथ हुआ समझौता रद्द करने तक की बात कही थी। 68 वर्षीय रूहानी उदारवादी विचारों के वाहक हैं। कट्टरपंथी इस्लामिक कानूनों वाले ईरान में व्यक्तिगत आजादी को बढ़ाने के लिए काम करने के कारण जनता का रुझान उनकी ओर बढ़ा है। रूहानी दुनिया के दूसरे देशों के साथ ईरान के संबंध बेहतर करने के भी पक्षधर हैं। उन्होंने जब सत्ता संभाली ईरान आर्थिक प्रतिबंधों को झेल रहा था। रूहानी के पहले कार्यकाल में अमेरिका और ईरान के बीच जो परमाणु समझौता हुआ वह दुनिया में उसके अलग-थलग पड़ने के दौर पर राहत प्रदान करने वाला साबित हुआ। इसी समझौते के कारण अमेरिका और ईरान के बीच आपसी संबंध सामान्य हुए और इससे देश को हर स्तर पर लाभ हुआ। रूहानी ने बहुत हद तक ईरान की अर्थव्यवस्था को सुधारा है और यह दुनिया के देशों के साथ संबंध बेहतर करने के ईमानदार प्रयासों से ही संभव हुआ है। रूहानी भारत के दोस्त माने जाते हैं और चौबारा समझौता दोनों देशों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों का उदाहरण है। आतंकवाद के खिलाफ ईरान ने भी मोर्चा खोल दिया है। ईरान ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान इलाके में पांच मोर्टार भी दागे। पाकिस्तानी मीडिया ने इसकी पुष्टि की है। बता दें कि इसी महीने के पहले हफ्ते में ईरान ने पाकिस्तान को धमकी भरे शब्दों में अपने यहां के सभी आतंकी ठिकानों को ध्वस्त करने की नसीहत दी थी। ईरान ने कहा था कि अगर पाकिस्तान ऐसा नहीं करता तो फिर ईरान की सेना पाकिस्तान में घुसकर आतंकी ठिकानों को ध्वस्त कर देगी। गौरतलब है कि अपने 10 सीमा गार्ड्स की आतंकियों द्वारा की गई हत्या के बाद से ईरान ने आतंक के खिलाफ हमलावर रुख अख्तियार कर लिया है और पाकिस्तान के आतंकी ठिकाने ईराने के निशाने पर हैं। चूंकि ईरान से प्रतिबंध हटने के बाद नई दिल्ली और तेहरान ने कई समझौते किए हैं, इसलिए उम्मीद यही है कि रूहानी के दूसरे कार्यकाल में दोनों देश उन समझौतों को आगे बढ़ाएंगे। हम राष्ट्रपति हसन रूहानी को उनकी शानदार सफलता पर बधाई देते हैं।

Wednesday, 24 May 2017

How and where is Jadhav? Could Sarabjeet have been saved?

Even though India may have got instant relief in the International Court in KulbhushanJadhav case but apprehensions are still alive about the actual status of Jadhav. Pakistan has not informed about his health and whereabouts so far. Instead of clearing the case Pakistan now says the International Court has not ordered for diplomatic access to Jadhav, nor it can decide it. It has asked to merely hold the hanging of Jadhav till the final court decision comes, says Sartaj Aziz, the advisor of external affairs to  Pak PM Nawaz Sharif. We want that Pak should submit solid proofs of whereabouts and actual status of Jadhav. If Pak is sincere with clean intentions, it should produce proof of life. Does the Government of India have any information about the whereabouts of Jadhav in Pakistan, spokesperson on External Affairs Gopal Bagle said that Pakistan government has till date given no information about KulbhushanJadhav nor told about his whereabouts. I was just thinking whether we could have saved Sarabjeettoo? Experts and lawyers say there were also various such flaws in Sarbjeet case, on which grounds Pak could have been exposed before the world. India had solid base to go to the International Court. Sarabjeet was given death sentence by the Supreme Court in the absence of his advocate. If the advocate was missing, another advocate could have been hired. The alone witness of Sarabjeet case turned away in the Pak Supreme Court. The witness had said that forcible statement was taken, fake evidences were submitted. Pak court should have started the hearing again on this ground. Alike Jadhav, Sarabjeet was also given death sentence on false accusations. Both were accused of espionage and involvement in the terrorist incidents. Alike Jadhav, demand for release of Sarabjeet was in the headlines. After the death sentence of Jadhav, Sarbjeet’s sister Dalbeer Kaur broke out. She said had the then UPA Government taken the case of Sarabjeet to the ICJ he would have been among us in India. Sarabjeet’s advocate Owais Sheikh, afraid of orthodox living in Sweden has said that the decision of the ICJ will open the way for release of Jadhav. Sheikh said that alike Jadhav, Sarabjeet also fell prey to the hostility and politics between the two nations. He was threatened to death on defending Sarabjeet and had to leave his country.

-          Anil Narendra

मुस्लिमों को कोसने वाले ट्रंप पहले ही दौरे पर सऊदी पहुंचे?

अपने चुनाव प्रचार और राष्ट्रपति बनने के बाद मुस्लिमों को कोसने वाले और पूरी दुनिया में निन्दा के पात्र बने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी पहली विदेश यात्रा में सऊदी अरब पहुंचे। ट्रंप का सऊदी दौरा दो मायनों में आलोचकों के निशाने पर आया। ट्रंप मुसलमानों को न सिर्फ सबसे ज्यादा कोसने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति हैं बल्कि चुनाव प्रचार के दौरान 9/11 के आतंकी हमलों में सऊदी के कुछ नागरिकों का भी हाथ बता चुके हैं। राष्ट्रपति बनने के बाद यह उनकी पहली विदेश यात्रा थी। डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा के लिए सऊदी अरब को चुनकर सबको चौंका दिया। ट्रंप अमेरिका के पहले राष्ट्रपति हैं जिन्होंने सऊदी अरब को अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए चुना। अब तक ज्यादातर राष्ट्रपति अपनी पहली विदेश यात्रा में कनाडा और मैक्सिको जाते रहे हैं। ट्रंप अपने चुनावी अभियान के दौरान इस्लाम पर हमलावर रहे थे। सऊदी अरब एक इस्लामिक देश है। ऐसे में आखिर ट्रंप ने सऊदी अरब को तरजीह क्यों दी? फरवरी 2016 में ट्रंप ने कहा था कि 9/11 के हमले में सऊदी के लोग भी शामिल थे। राष्ट्रपति बनने से पहले ट्रंप ने कहा थाöवर्ल्ड ट्रेड सेंटर को किसने ध्वस्त किया था? वे इराकी नहीं थे। इसके पीछे सऊदी था। हमें दस्तावेजों को खोलना होगा। अभियान के दौरान ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका एक राजा के बचाव में अपना भारी आर्थिक नुकसान कर रहा है। अब वही ट्रंप राष्ट्रपति बनने के बाद सऊदी में राजसी स्वागत कबूल कर रहे हैं। आखिर ऐसा क्या हो गया कि जो दुनियाभर के मुसलमानों के लिए सबसे पवित्र देश है, वह उन्हें रास आ रहा है। यही नहीं, ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद सात मुस्लिम बहुल देशों के नागरिकों के अमेरिका आने पर पाबंदी लगा दी थी। अचानक से ट्रंप का समीकरण क्यों बदल गया? सऊदी के विदेश मंत्री अब्देल अल जुबैर ने द वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा थाöचुनावी कैंपेन के दौरान कई बातें कहीं जाती हैं और मैं इस बारे में राष्ट्रपति ट्रंप को लेकर कुछ भी नहीं सोचता हूं। जुबैर ने ट्रंप की पहली विदेश यात्रा सऊदी चुनने पर कहा कि वह इस्लामिक दुनिया से संबंध मजबूत करने की इच्छा रखते हैं और वह एक अच्छी साझेदारी चाहते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने रियाद में 40 से ज्यादा मुस्लिम देशों के नेताओं को संबोधित करते हुए सऊदी अरब की मेजबानी की दिल खोलकर तारीफ की। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने भाषण का इस्तेमाल अरब और मुस्लिम देशों को सख्त संदेश देने के लिए भी किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि या तो चरमपंथ को बढ़ावा देने वाली विचारधारा से अब निपट लो या फिर आने वाली कई पीढ़ियों तक इसके साथ संघर्ष करते रहो। ट्रंप आमतौर पर तीखी भाषा के लिए जाने जाते हैं लेकिन इस बार वो अपने तरीके के विपरीत बेहद संयमित रहे। ट्रंप ने सऊदी अरब के क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी ईरान की बार-बार आलोचना की और इससे खाड़ी के अरब देशों के नेता जरूर खुश हुए होंगे। अपने पूर्ववर्ती बराक ओबामा की तरह मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने भाषण में मानवाधिकारों या प्रजातंत्र का कोई उल्लेख नहीं किया। हालांकि उन्होंने महिलाओं के दमन की आलोचना जरूर की। खाड़ी क्षेत्र में सोशल मीडिया पर ट्रंप के भाषण को लेकर कई तरह की तीखी प्रतिक्रियाएं भी आई हैं। कुछ लोगों ने ध्यान दिलाया कि सऊदी अरब विश्व में आतंक फैलाने का सबसे बड़ा दोषी है और आप एक तरफ इस्लामिक कट्टरपंथ की बात करते हैं और दूसरी ओर कट्टरपंथ फैलाने वाले सऊदी अरब की गोद में जाकर बैठ जाते हैं? ट्रंप ने यह भी साबित कर दिया कि वह अमेरिकी हथियार लॉबी को प्राथमिकता देते हैं। रियाद पहुंचने के पहले दिन ही अमेरिका और सऊदी अरब के बीच कुल 380 अरब डॉलर के समझौते हुए। इस दौरान सऊदी अरब किंग सलमान ने ट्रंप को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से भी सम्मानित किया।

चुनाव आयोग ः ईवीएम पर आर-पार की लड़ाई

इलैक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर पिछले कुछ समय से भयंकर विवाद छिड़ा हुआ है। कई विपक्षी दलों ने इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाया है। कुछ ने तो चुनाव में अपनी हार का ठीकरा इन ईवीएम पर फोड़ दिया है। शनिवार को चुनाव आयोग ने आक्रामक तेवर अपनाते हुए इस मुद्दे पर ओपन चैलेंज का दांव खेलते हुए आर-पार की जंग छेड़ दी। चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को चुनौती दी है कि वे तीन जून से साबित कर दिखाएं कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ की जा सकती है या इसके जरिये किसी खास प्रत्याशी या पार्टी के पक्ष में चुनाव नतीजे मोड़े जा सकते हैं। यह खुली चुनौती पांच दिन तक रहेगी। ईसी ने सख्त अंदाज में कहा कि ईवीएम को लेकर जिस तरह तथ्यहीन खबरें सामने आ रही हैं उससे आयोग दुखी है। हालांकि आरोप लगाने वालों के खिलाफ क्या आयोग केस करेगा या कोई रिपोर्ट देगा, इस पर अधिकारियों ने चुप्पी साधे रखी। ईसी ने फिर कहा कि अब आने वाले चुनावों में वीवीपीटी का इस्तेमाल होगा और सभी वोटर्स को वोट डालने के बाद पुष्टि के लिए स्लिप मिलेगी। ईसी ने यह भी कहा कि ईवीएम के अलावा स्लिप के एक हिस्से की गिनती होगी। लेकिन यह कुल वोट का कितना हिस्सा होगी, अभी तय होना बाकी है। इससे पहले चुनाव आयोग ने ईवीएम को लेकर सभी दलों की दलील सुनने के लिए 12 मई को सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। इसमें आयोग ने ईवीएम से जुड़े तमाम सवालों और आशंकाओं को सुना था। सभी राजनीतिक दल तीन जून से ईवीएम हैकिंग की चुनौती में शामिल हो सकेंगे। सभी दल अपने अधिकतम तीन प्रतिनिधियों को (इनमें कोई भी एक्सपर्ट हो सकता है) इसमें भाग लेने के लिए भेज सकता है। बेशक कोई भी एक्सपर्ट हो सकता है पर उसका भारतीय होना जरूरी है। ईवीएम चैलेंज के लिए चार घंटे का समय मिलेगा। लेकिन इस दौरान मदर बोर्ड से छेड़छाड़ की इजाजत नहीं होगी। चैलेंज दो चरणों में होगा। पहले चरण में राजनीतिक दलों को छूट होगी कि वे पांच राज्यों में हुए चुनावों में किन्हीं चार पोलिंग स्टेशनों से ईवीएम मशीन मंगवा कर साबित करें कि इसमें गड़बड़ी हुई है। दूसरे चरण में आयोग की सुरक्षा में रखे ईवीएम को हैक या टैम्पर करने की भी चुनौती होगी। चैलेंज से पहले मशीनें खोलकर सभी दलों के प्रतिनिधियों को दी जाएंगी। लेकिन चैलेंज के बाद ऐसा करने की मनाही होगी। चैलेंज के दौरान सभी दलों के एक्सपर्ट ईवीएम पर लगे कई बटनों को एक साथ दबाकर, किसी वायरलेस या ब्लूटूथ डिवाइस का एक्सटर्नल डिवाइस का इस्तेमाल कर सकते हैं। हम चुनाव आयोग के चैलेंज का स्वागत करते हैं। अब उन रानीतिक दलों को साबित करना चाहिए कि ईवीएम टैम्पर, हैक नहीं है। आए दिन आरोप लगाने की बजाय आर-पार की लड़ाई लड़ें।

-अनिल नरेन्द्र