Sunday, 24 June 2018

सही मायनों में योद्धा हैं इरफान खान

फिल्म अभिनेता इरफान खान इन दिनों लंदन में एक दुर्लभ किस्म के कैंसर न्यूरोएंड्रोक्राइन से जंग लड़ रहे हैं। इरफान एक योद्धा की तरह इस बीमारी से लड़ रहे हैं। इरफान ने पहली बार अपनी बीमारी के दर्द का जिक्र चिट्ठी के माध्यम से किया है। ट्विटर पर साझा पत्र में इरफान ने कहाöउन्होंने नतीजे की चिन्ता किए बगैर ब्रह्मांडीय शक्ति में भरोसा करते हुए दर्द, भय और अनिश्चितता के जरिये अपनी लड़ाई लड़ी। इरफान ने कहाöउन्हें इस बात की जानकारी मिली थी कि बीमारी दुर्लभ प्रकार की है। उपचार से संबंधित अनिश्चितता और कुछ मामलों के अध्ययन के बाद वह इलाज का सामना करने के लिए तैयार थे। उन्होंने कहाöउस दौर में ऐसा महसूस हुआ कि वह तेज रफ्तार ट्रेन से यात्रा कर रहे हों और अचानक किसी ने यह संकेत देते हुए ट्रेन से उतरने को कहा कि वह गंतव्य तक पहुंच चुके थे। एक योद्धा की तरह इरफान अपनी जिन्दगी के अलग-अलग पड़ावों पर अलग-अलग हालातों से लड़ने के आदी रहे हैं। वह संघर्ष चाहे अपने भीतर के अभिनेता को दुनिया तक पहुंचाने का रहा हो या चिकने-चुपड़े हीरो पर मर-मिटने वाली इंडस्ट्री में हीरोइज्म की नई परिभाषा गढ़ने का रहा है। इरफान हर बार लड़े और जीते भी। इरफान के जिस अभिनय की आज दुनिया दीवानी है, उसे लोगों तक पहुंचाने के लिए भी उन्होंने लंबी लड़ाई लड़ी थी। तब छोटे पर्दे से बड़े पर्दे तक की खाई को मिटा पाना उनके लिए बड़ी जद्दोजहद बन चुकी थी। मीरा नायर की ऑस्कर तक पहुंची फिल्म सलाम बॉम्बे में उन्हें वह मौका मिला भी, लेकिन हुनर लोगों तक तब भी नहीं पहुंचा पाए। फिल्म में उनके छोटे से रोल पर एडिटिंग के दौरान कैंची चल गई और इरफान का इंतजार कुछ लंबा हो गया। फिर हासिल, मकबूल जैसी फिल्मों में उन्हें शौहरत मिली। फिर तो क्या था इरफान ने बॉलीवुड में हीरो की परिभाषा ही बदल दी। वह चिकने-चुपड़े, चॉकलेट या मायो हीरो जिस पर लड़कियां लट्टू हो जाएं इस इमेज को इरफान ने अपने शानदार परफार्मेंस से एक तरह से बदल दिया। आज वे बॉलीवुड की सबसे रोमांटिक फिल्म लंच बॉक्स के नायक हैं। इस श्रेणी में लाइफ इन मेट्रो, पीक, करीब-करीब सिंगल, हिन्दी मीडियम जैसी फिल्मों का नाम लिया जा सकता है। वहीं उनका हीरोइज्म देखना हो तो पान सिंह तोमर में देख लीजिए। इरफान के पत्र में हमें उम्मीद दिखाई दे रही है। आज बॉलीवुड से लेकर इरफान के लाखों फैन उनके ठीक होने की प्रार्थना कर रहे हैं। हम भी उनकी सलामती की दुआ करते हैं। वह जल्द इस मनहूस बीमारी पर फतेह पाएं और घर लौटें।

-अनिल नरेन्द्र

निजाम बदलते ही भूल गए पत्थरबाजी, आतंकियों की अब खैर नहीं

निजाम बदलते ही कश्मीर घाटी में बदलाव भी दिखने लगा। गवर्नर राज में अलगाववादियों की ओर से बंद के पहले आह्वान पर बृहस्पतिवार को पूरी घाटी में कहीं भी पत्थरबाजी की घटना सामने नहीं आई। इतना ही नहीं, अलगाववादियों के गढ़ डाउन टाउन में पाबंदियां भी नहीं रहीं। अमूमन बंद के दौरान सुरक्षाबलों पर पथराव की घटनाएं होती रही हैं। बम-बम भोले के जयघोष के साथ 28 जून से शुरू हो रही अमरनाथ यात्रा के लिए भी काउंट डाउन शुरू हो गया है। जम्मू-कश्मीर के प्रवेश द्वार लखनपुर से पवित्र गुफा तक यात्रा की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। बेस कैंपों सहित अन्य यात्रा ट्रेक पर सुरक्षाबलों ने डेरा डाल लिया है। आधिकारिक तौर पर पारंपरिक पहलगाम और बालटाल ट्रेक से यात्रा 28 जून से शुरू होकर दो माह की होगी। अब तक दो लाख से अधिक यात्रियों ने पंजीकरण करवा लिया है। जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू होने के बाद से देश के कुछ सबसे चर्चित अधिकारियों को राज्य में बहाल किया गया है। छत्तीसगढ़ के अडिशनल चीफ सैकेटरी बीबी सुब्रह्मण्यम को राज्यपाल ने मुख्य सचिव और पूर्व आईपीएस अधिकारी विजय कुमार को राज्यपाल का सलाहकार नियुक्त किया गया है। सुब्रह्मण्यम की गिनती देश के काबिल अधिकारियों में होती है और उन्हें नक्सल प्रभावित इलाकों में शांति बहाल करने के लिए खासतौर पर जाना जाता है। कुख्यात चन्दन तस्कर वीरप्पन को अक्तूबर 2004 में एक मुठभेड़ में मारने वाली टीम का नेतृत्व उन्हीं ने किया था। मनमोहन सिंह के खास अधिकारियों में भी सुब्रह्मण्यम का नाम था और उन्हें यूपीए-1 में मनमोहन सिंह ने अपना निजी सचिव नियुक्त किया था। वहीं राज्यपाल एनएन वोहरा के सलाहकार नियुक्त किए गए पूर्व आईपीएस अधिकारी विजय कुमार जंगल में उग्रवाद निरोधक अभियान चलाने में माहिर माने जाते हैं। जम्मू-कश्मीर में आतंकियों का खात्मा करने की जिम्मेदारी अब ब्लैक कैट के नाम से मशहूर नेशनल सिक्यूरिटी गार्ड्स (एनएसजी) के कमांडों को सौंपी जाएगी। 57 एनएसजी के करीब 24 कमांडों का दस्ता दो हफ्ते पहले श्रीनगर के पास हुमहमा बीएसएफ कैंप पहुंच चुका है। स्थानीय माहौल में ढलने के लिए कमांडों यहां कड़ा प्रशिक्षण ले रहे हैं। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार माहौल के अनुकूल होते ही कमांडों आतंकियों के खिलाफ आपरेशंस में उतर जाएंगे। जल्द ही यहां 100 कमांडों पहुंच जाएंगे। उधर हड़ताल के आह्वान के बीच प्रदर्शन नाकाम करने के लिए गुरुवार को बड़े स्तर पर अलगाववादियों की धरपकड़ हुई। विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने जा रहे जेकेएलएफ के अध्यक्ष यासिन मलिक को गिरफ्तार कर लिया गया। हुर्रियत कांफ्रेंस के कट्टरपंथी धड़े के चेयरमैन सैयद अली शाह गिलानी, अलगाववादी नेता मीरवाइज उमर फारुक और मोहम्मद अशरफ सहराई को घरों में नजरबंद कर दिया गया। श्रीनगर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद बंद कर दी गई है। मीरवाइज उमर फारुक की गढ़ इस मस्जिद में कोई नमाज के लिए भी नहीं जा सका। पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या और सुरक्षाबलों के साथ झड़पों में लोगों की मौत के विरोध में अलगाववादियों ने गुरुवार को हड़ताल का आह्वान किया था। जम्मू-कश्मीर में अमन-शांति व खुशहाली का रास्ता लंबा है। पाकिस्तान और उनके पिट्ठू इतनी आसानी से मानने वाले नहीं। लातों के भूत बातों से नहीं मानते। राष्ट्रपति शासन के पहले ही दिन दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले में श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग पर बुधवार शाम को आतंकियों ने पुलिस की एक गाड़ी पर फायरिंग की। इसमें एक जवान शहीद हो गया जबकि दो घायल हो गए। मैं समझता हूं कि घरों में छिपकर, फायरिंग करके जंगलों में भागने वाले आतंकियों से सही ढंग से निपटने में ब्लैक कैट कमांडों ज्यादा कारगर साबित हो सकते हैं। आतंकी अकसर घनी आबादी वाले इलाकों के घरों में छिपते हैं। ऐसे में सुरक्षाबलों के समक्ष चुनौती रहती है कि आम लोगों को कम से कम नुकसान हो। ऐसे में शहादतों की संख्या भी बढ़ रही है। घाटी पहुंचे कमांडों हिट एंड रन यानि हाउस इंटरवेंशन टीम का हिस्सा है। घाटी के बदले राजनीतिक हालात के बीच अमरनाथ यात्रा पर भी किसी बड़े हमले का इनपुट है। किसी भी स्थिति से निपटने के लिए कमांडों स्टैंड-बाई मोड में हैं।

Saturday, 23 June 2018

महंगाई ः दवाएं 1500 फीसदी महंगी बिक रही हैं

मई में थोक महंगाई का चार फीसदी से ऊपर यानि 4.3 प्रतिशत पर पहुंचने से आम आदमी की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। खुदरा महंगाई इससे अधिक ही होगी और उपभोक्ताओं का वास्ता खुदरा कीमतों से ही पड़ता है। गत गुरुवार को जारी हुए थोक मुद्रास्फीति के आंकड़े बता रहे हैं कि थोक महंगाई की यह दर पिछले 14 महीनों में सबसे ज्यादा है। पिछले साल मई में थोक महंगाई की यह दर 2.26 प्रतिशत रही थी। चीनी की 14 महीनों में थोक महंगाई दोगुनी हो गई। इस साल अप्रैल से मई के बीच महंगाई का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। अप्रैल में खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर 0.87 प्रतिशत थी, जो अगले महीने यानि मई में 1.60 प्रतिशत पर पहुंच गई। इसी तरह ईंधन, बिजली क्षेत्र में महंगाई दर मई में 11.22 प्रतिशत दर्ज रही थी। मई महीने में ही फलों और सब्जियों के दामों ने भी लोगों का बजट बिगाड़ा। आलू की महंगाई दर 18.93 प्रतिशत रही। फलों की महंगाई दर भी 15.40 प्रतिशत दर्ज हुई। एक क्षेत्र जहां इस महंगाई की मार ने उपभोक्ताओं की कमर तोड़ दी है वह है दवाओं की बेतहाशा कीमतें बढ़ना। देश में इस समय दवाएं 1500 प्रतिशत तक ज्यादा दामों में बेची जा रही हैं। यह खुलासा देश की सबसे बड़ी निजी दवा निर्माता कंपनी की रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक यूरिन संबंधी बीमारी की नौ रुपए की दवा सिडनेफिल 149 रुपए में बेची जा रही है। वहीं हड्डियों को मजबूत करने वाली सात रुपए की दवा कैल्शियम कार्बोनोट 120 में, डायबिटीज की सात रुपए की दवा ग्लियप्राइड 97 रुपए में, हृदय रोग में इस्तेमाल होने वाली 11 रुपए की एटोरवस्टेटिन दवा 131 रुपए में बेची जा रही है। दवाओं की यह सूची लंबी है। रिपोर्ट तैयार करने वाली निजी कंपनी देश में कुल खपत का 15 प्रतिशत दवा बनाती है। देश में सिर्प 850 तरह की दवाइयां ऐसी हैं, जिन्हें सरकार ने जरूरी दवा की श्रेणी में रखा है और इन्हीं दवाइयों की कीमतों पर सरकारी नियंत्रण होता है। दवा निर्माता कंपनी ने बताया कि 12 प्रतिशत जीएसटी और 20 प्रतिशत लाभ के बाद जिस दवा की कीमत नौ रुपए होती है उसी दवा को बाजार में दवा की मार्केटिंग करने वाली कंपनियां 150 रुपए तक में बेचती हैं। देश में ढाई लाख करोड़ रुपए का दवा कारोबार है और दवाइयों की बिक्री के मामले में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर है। चौतरफा महंगाई की मार से आम आदमी की कमर टूट गई है। न वो ढंग से जी सकता है और न ही बीमारी में ढंग से सही इलाज करवा सकता है। उम्मीद है कि भारत सरकार और संबंधित राज्य सरकारें आम आदमी की इस मुश्किलों को दूर करने का अविलंब प्रयास करेंगे।

-अनिल नरेन्द्र

नौ दिन में चले अढ़ाई कोस

नौ दिन में चले अढ़ाई कोस। जी हां, बिल्कुल यही कहावत दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और उनके मंत्रियों पर सटीक बैठती है। दिल्ली के सियासी गलियारों में नौ दिनों तक चला हठ योग तो समाप्त हो गया। लेकिन इसने इस कहावत को पूरी तरह चरितार्थ कर दिया कि वाकई दिल्ली सरकार नौ दिन में चली अढ़ाई कोस। इस सियासी ड्रामे में हर कोई अपनी जीत के दावे कर रहा है लेकिन सवाल वही है कि इन नौ दिन के धरने से आखिर हासिल क्या हुआ? जो अपील इन नौ दिनों के धरने के बाद अधिकारियों से की गई वो चार महीने पहले क्या नहीं हो सकती थी? यह सब पहले भी हो सकता था बस फिर दिल्ली सरकार को एलजी के सोफे पर पसरने का मौका भला कैसा मिलता? अधिकारी भी तो अपना महत्व समझाते तो भला कैसे? चलो देर आए दुरुस्त आए। न तो यह इन सियासी गलियारों का पहला स्ट्रीट प्ले था और न ही आखिरी। दिल्ली में इस समय इस बात की बहस भी हो रही है कि काम कौन कर रहा है? सरकार काम नहीं कर रही और इसकी वजह से अधिकारी काम नहीं कर रहे। दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के अनुसार कि विभिन्न विभागों में 181 फाइलें मंत्रियों के पास स्वीकृति के लिए पेन्डिंग पड़ी थीं। जो उनके टेबल में धूल चाट रही थीं। इनमें परिवहन विभाग की 81 अतिमहत्वपूर्ण फाइलें शामिल हैं। इस विभाग के मंत्री कैलाश गहलोत हैं। जब ये मंत्री बने थे तो दावा कर रहे थे कि परिवहन के क्षेत्र में क्रांति लाएंगे। मगर इनकी स्थिति सबसे खराब है। गौरतलब है कि दिल्ली सरकार के मंत्री बार-बार आरोप लगा रहे हैं कि अधिकारी उनके साथ सहयोग नहीं कर रहे हैं, जबकि कई महत्वपूर्ण योजनाओं की फाइलें उन्हीं के पास पड़ी हैं। अब फाइलें क्लीयर होनी शुरू हुई हैं। पर पेन्डिंग फाइलों के निपटारे में भी तो समय लगेगा। अब बात करते हैं खुद मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की। धरने के दौरान कथित तौर पर खानपान में गड़बड़ी से उनका शर्परा बढ़ गया है। लिहाजा इलाज के लिए बेंगलुरु जा रहे हैं। मुख्यमंत्री मधुमेह के मरीज हैं और पहले भी इनका इलाज बेंगलुरु स्थित प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र, जिन्दल फार्म में होता रहा है। पार्टी के बागी विधायक कपिल मिश्रा ने भी ट्वीट कर मुख्यमंत्री के इलाज के लिए 10 दिनों के लिए शहर से बाहर जाने की बात लिखी है। उन्होंने मुख्यमंत्री पर दिल्ली के लोगों को ठगने का आरोप लगाया। दूसरी ओर विधानसभा में विपक्ष के नेता विजेन्द्र गुप्ता ने भी तंज कसा कि मुख्यमंत्री ने दिल्ली की जनता के साथ विश्वासघात किया है। उन्होंने कहा कि यह बड़ा दिलचस्प है कि उधर धरना खत्म हुआ और इधर छुट्टी शुरू हो गई। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले साढ़े चार महीने में मुख्यमंत्री महज 15 दिन के लिए अपने कार्यालय आए। दूसरी ओर आप सरकार को लेकर नौकरशाही की नाराजगी अब भी बरकरार है, अधिकारियों का कहना है कि वह डिप्टी सीएम के साथ मीटिंग नहीं करेंगे।

Friday, 22 June 2018

मिशन-2019 के लिए कुर्बान हुई जम्मू-कश्मीर सरकार

यह तो होना ही था। भाजपा ने पीडीपी से गठबंधन तोड़ लिया, महबूबा मुफ्ती ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया है। शुरू से ही यह एक अस्वाभाविक या असामान्य गठबंधन था और पहले दिन से ही कहा जा रहा था कि यह गठबंधन टिकाऊ नहीं है और ज्यादा दिन नहीं चलेगा। मंगलवार की दोपहर उसके समापन की औपचारिक घोषणा हो गई। जम्मू-कश्मीर में करीब तीन साल तक नोकझोंक और आपसी तनातनी के साथ सरकार चलाने के बाद भाजपा और पीडीपी का बेमेल गठबंधन टूटना ही था। विधानसभा के त्रिशंकु नतीजे के बाद जब कोई सरकार नहीं बन रही थी तो भाजपा ने पीडीपी के साथ सरकार बनाने का जो जोखिम उठाया वह पीडीपी से ज्यादा भारी भाजपा को पड़ने लगा। भाजपा को लगने लगा था कि इस सरकार से भाजपा का हिन्दू वोट बैंक प्रभावित हो रहा है।  जम्मू क्षेत्र जिसके बलबूते पर भाजपा ने सरकार बनाई थी उसी की उपेक्षा हो रही थी। महबूबा का सारा जोर घाटी पर था। जम्मू क्षेत्र में न तो कोई विकास हो रहा था और न ही भाजपा समर्थकों में पार्टी की छवि ही बन रही थी। पाकिस्तान ने रणनीतिक तौर पर जम्मू के सीमावर्ती गांवों को निशाना बनाकर वहां से पलायन आरंभ करा दिया था। महबूबा सरकार ने जम्मू के लोगों की कोई मदद नहीं की। यहां तक कि सीमावर्ती गांवों में पाक गोलीबारी के शिकार लोगों को अपने परिजनों के शव तक अपने ट्रैक्टरों में लाने पड़ रहे थे। अब तो नौबत यहां तक आ चुकी थी कि जम्मू शहर से हिन्दू पलायन करने पर मजबूर हो गए थे। भाजपा आला कमान को यह डर सताने लगा कि कहीं देश के शेष भागों में जम्मू की वजह से उनका हिन्दू वोट बैंक प्रभावित न हो जाए। इसलिए उन्होंने बेहतर समझा कि इस सरकार से छुटकारा पाएं। बेशक कई कारण गिनाए जा रहे हैं उनमें से कुछ में दम भी है। महबूबा की जिद्द पर न चाहते हुए भी भाजपा को रमजान के महीने में एकतरफा युद्धविराम करना पड़ा। इस एकतरफा कार्रवाई पर रोक से आतंकियों के खिलाफ सेना की मुहिम को जबरदस्त झटका लगा। जबकि आतंकी बराबर हमला करते रहे और आतंकी हिंसा में खास कमी नहीं आई। इस प्रकार सेना द्वारा अभियान न चलाने से इस एक महीने में 52 आतंकी बच गए। एकतरफा कार्रवाई पर रोक के दौरान कुल 46 आतंकी हमले हुए, जबकि इसके पहले महीने के दौरान 55 घटनाएं हुईं। महबूबा तो रमजान के बाद भी सीजफायर बढ़ाने पर जोर दे रही थीं पर भाजपा ने कहा बहुत हो चुका अब आगे नहीं। पिछले तीन सालों में सुरक्षाबलों के हाथ बांधने और अलगाववादियों के प्रति नरमी बरतने के कारण हालात बेकाबू हो गए और जम्मू-कश्मीर की आंतरिक स्थिति लगभग 90 के दशक तक पहुंच गई। दरअसल राज्य में सरकार तो गठबंधन की थी लेकिन सारे निर्णय मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती लेती थीं। महबूबा का हमेशा से रूझान अलगाववादियों की तरफ था जबकि मुफ्ती मोहम्मद सईद के कार्यकाल में अलगाववादी नियंत्रण में थे। पत्थरबाजी और आतंकवादी घटनाएं बढ़ती रहीं। पत्थरबाजों के खिलाफ सख्त कदम उठाने से महबूबा सेना को रोकती रहीं। सैनिक पिटते गए और इससे सेना में भारी असंतोष होने लगा। महबूबा ने उल्टे पत्थरबाजों का साथ दिया और 11 हजार एफआईआर वापस ले ली गईं। बाद में महबूबा भी लाचार हो गईं और स्थिति बिगड़ती ही चली गई। इस दौरान सशस्त्र बल विशेष प्रावधान अधिनियम (आफ्सपा) को कमजोर करने और अर्द्धसैनिक बलों का हौंसला तोड़ा गया। पत्थरबाजों के चक्कर में पूरी दुनिया का ध्यान घाटी पर टिक गया जबकि जम्मू और लद्दाख के लोग अपने आपको उपेक्षित महसूस करने लगे। विधानसभा चुनाव में भाजपा को कश्मीर घाटी से कुछ नहीं मिला। उसका जनाधार जम्मू तक सीमित था। यहां कि 37 में से 25 सीटें भाजपा को मिली थीं। जबकि लद्दाख में कांग्रेस को बढ़त मिली थी। आरएसएस और भाजपा कैडर ने केंद्रीय नेतृत्व को साफ तौर पर संदेश दिया था कि पीडीपी को समर्थन देते रहे तो जम्मू हाथ से निकल जाएगा। बीते शनिवार की रात को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और आरएसएस की कोर कमेटी की बैठक देर रात हुई जिसमें पीडीपी से समर्थन वापस लेने का फैसला लिया गया। भाजपा ने दरअसल मिशन-2019 की राह के कांटे दूर करने के लिए ही पीडीपी से नाता तोड़ने का फैसला लिया है। भाजपा को उम्मीद है कि इस फैसले का सकारात्मक संदेश जाएगा। दरअसल संघ तो दो वर्ष पहले ही नाता तोड़ने के पक्ष में था। हालांकि तब सरकार और पार्टी को हालात अपने पक्ष में कर लेने की उम्मीद थी। संघर्षविराम की घोषणा के बाद जवान औरंगजेब व पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या और सेना के अफसरों पर एफआईआर जैसे मामलों के कारण भाजपा-पीडीपी के रिश्ते खराब हुए। नतीजतन केंद्र ने महबूबा की ईद के बाद भी संघर्षविराम जारी रखने की सलाह ठुकरा दी। बीते हफ्ते सूरजपुंड में हुई संघ की अनुषांगिक संगठनों और भाजपा संगठन मंत्रियों की बैठक में इस पर गहन चर्चा हुई। जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया है। फिलहाल तो यहां राज्यपाल का शासन चलेगा। राज्यपाल एनएन वोहरा जे एंड के में राज्यपाल के रूप में करीब 10 वर्षों से कार्य कर रहे हैं। उनकी सभी पक्षों में स्वीकार्यता इसकी बड़ी वजह है। यही कारण है कि भाजपा-पीडीपी सरकार के पतन के बाद केंद्र सरकार ने उनका कार्यकाल बढ़ाने का फैसला किया है।

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 21 June 2018

...और अब केजरीवाल के बहाने विपक्षी एकजुटता का पदर्शन

हाल ही में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के धरने ने एक बार फिर विपक्षी दलों को एक मंच पर आने का  मौका दे दिया। विपक्षी एकता के पैरवीकार चंद्र बाबू नायडू, ममता बनर्जी और माकपा का साथ आना इसका संकेत था। इसलिए चार दलों के मुख्यमंत्रियों की मुहिम को भावी विपक्षी एकता के रूप में देखा जा सकता है। सामने जो भी रहा हो, लेकिन परदे के पीछे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री तृणमूल कांग्रेस की पमुख ममता बनर्जी ही इन पयासों को आगे बढ़ा रही हैं। विपक्षी एकता को लेकर वह काफी दिनों से सकिय हैं। उनके पयास सिर्प केजरीवाल को समर्थन देने तक सीमित नहीं हैं। वह बीजद पमुख नवीन पटनायक, एनसीपी पमुख शरद पवार एवं कांगेस के वरिष्ठ नेताआंs से भी संपर्प  में हैं। दरअसल एनडीए सरकार की घेराबंदी के लिए विपक्ष दोहरी रणनीति अपना रहा है। पहली रणनीति यह है कि लोकसभा और उससे पहले होने वाले विधानसभा चुनाव पदेशों में क्षेत्रीय दल मिलकर लड़ें जिससे भाजपा विरोधी वोटों का बंटवारा न हो। रणनीति तो यह है कि चाहे वह विधानसभा चुनाव हो चाहे, लोकसभा जहां तक संभव हो सके वन टू वन फाइट हो। अगर विधानसभाओं में उन्हें सफलता मिलती है तो क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय स्तर पर तीसरा मोर्चा या अन्य किसी वैकल्पिक गठबंधन का खाका तैयार करेंगे। इधर नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल की दो दिवसीय बैठक में शामिल होने आए बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) अध्यक्ष नीतिश कुमार ने नीति आयोग की बैठक में पधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जोरदार झटका देते हुए न केवल आंध्र पदेश के मुख्यमंत्री चंद्र बाबू नायडू का समर्थन किया बल्कि बिहार के लिए भी विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग कर डाली। इस बैठक में चंद्र बाबू नायडू ने राज्य विभाजन, राज्य को विशेष श्रेणी का दर्जा देने और पोलावरम परियोजना से संबंधित मुद्दों को उठाया। उन्होंने नोटबंदी और जीएसटी का मुद्दा भी नीति आयोग के सामने उठाया। नायडू के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने भी बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठाई। उन्होंने आंध्र पदेश के मुख्यमंत्री चंद्र बाबू नायडू की मांग का समर्थन किया। ममता बनर्जी ने भी नायडू की मांग का समर्थन किया। उधर कांग्रेस ने कहा कि अगर बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार भाजपा का साथ छोड़ने का फैसला करते हैं तो महागठबंधन में वापस लेने के लिए वह सहयोगी दलों के साथ विचार करेगी। कांग्रेस का यह बयान उस वक्त आया है जब हाल के दिनों में अगले लोकसभा चुनाव में सीटों के तालमेल के संदर्भ में जदयू और भाजपा के बीच कुछ मनमुटाव चल रहा है जिस वजह से यह कयास लगाए जा रहे हैं कि दोनों दलों के बीच सब कुछ ठीक नहीं है। विपक्ष मोदी सरकार के खिलाफ एकजुटता का पदर्शन करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहा है।

-अनिल नरेन्द्र

दिल्ली में खून सस्ता पानी महंगा

दिल्ली में खून सस्ता और पानी महंगा हो गया है। पिछले दो महीने में पानी को लेकर तीन लोगों की हत्या कर दी गई। दिल्ली के इतिहास में इस तरह की स्थिति पहली बार हुई है जब लोग पानी के लिए एक-दूसरे की जान ले रहे हैं और पानी का मंत्री भूख हड़ताल पर है या उपराज्यपाल के एसी कमरे में धरने पर है। दिल्ली के नेता पतिपक्ष ने कहा कि गर्मी के दिनों में दिल्ली में 1200 एमजीडी (बिलियन गैलन पतिदिन) पानी की आवश्यकता होती है, लेकिन आपूर्ति 870 एमजीडी से भी कम की हो रही है, आम आदमी पार्टी से निकाले गए कपिल मिश्रा ने कहा कि दिल्ली जल बोर्ड की कोई भी फाइल उपराज्यपाल व केंद्र सरकार के पास नहीं जाती है। जल बोर्ड का पूरा बजट एक बार में पास होता है। इसे कोई नहीं रोक सकता है, लेकिन जल बोर्ड के चेयरमैन अरविंद केजरीवाल अपना काम छोड़कर धरने पर एसी कमरे में बैठे हुए हैं। केंद्रीय मंत्री विजय गोयल ने भी माना है कि दिल्ली के संगम विहार में ज्यादातर लड़ाई-झगड़े का कारण पानी की किल्लत रही है। वह संगम विहार में बृहस्पतिवार रात पानी के कनेक्शन के विवाद में जान गंवाने वाले किशन भड़ाना के परिजनों से मिलने उनके घर शनिवार को पहुंचे थे। उन्हें किशन भड़ाना के परिजनों ने बताया कि कुछ दबंग लोग क्षेत्र में दिल्ली सरकार की मिलीभगत से पानी की कालाबाजारी करते हैं। सरकारी पाइप लाइन से कनेक्शन जोड़ने नहीं देते। इस बात पर संगम विहार में अक्सर लड़ाई होती है। चिंता की बात यह है कि संगम विहार में जहां एक तरफ पानी के लिए लोग एक-दूसरे का खून बहा रहे हैं, वहीं माफिया सरकारी टैंकरों का पानी ब्लैक में बेचकर चांदी काट रहा है। पानी माफिया दिल्ली जल बोर्ड के टैंकरों का पानी पहले अपने अंडरग्राउंड टैंक में स्टोर करते हैं, फिर अपने निजी टैंकरों में भरकर लोगों को ब्लैक करते हैं। दिल्ली सरकार भले ही लोगों को निशुल्क पानी उपलब्ध कराने का दावा कर रही हो, लेकिन कम से कम संगम विहार में तो लोगों से इसकी बूंद-बूंद की कीमत वसूली जा रही है। लोगों का ऐसा भी कहना है कि स्थानीय जनता के पतिनिधि और दिल्ली जल बोर्ड के अधिकारियों के साथ मिलीभगत से पानी माफिया सरकारी पानी बेच रहा है। इससे भी बड़ी चिंता की बात दिल्लीवासियों के लिए यह है कि अगले महीने दिल्ली में पेयजल किल्लत और बढ़ सकती है क्योंकि हरियाणा ने 30 जून तक ही अतिरिक्त पानी आपूर्ति की बात कही है। ऐसा हुआ तो कई इलाकों में लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस जाएंगे। इस हालत को देखते हुए जल बोर्ड ने उत्तर पदेश से गुहार लगाई है लेकिन अभी वहां से अतिरिक्त पानी मिलने की उम्मीद बहुत कम है। आशा करते हैं कि पानी की समस्या का जल्द समाधान होगा।