Sunday, 20 May 2018

जहां रोज 100 किमी रफ्तार के 4 से 6 तूफान आते हैं

आंधी-तूफान ने रविवार को देश के उत्तर से लेकर दक्षिणी और पूर्व से लेकर पश्चिमी हिस्सों में तबाही मचाई। दिल्ली में 109 किलोमीटर की रफ्तार से आंधी चली। 24 घंटे के दौरान आंधी-तूफान और बारिश की वजह से हुए हादसों में छह राज्यों में 50 से ज्यादा लोग मारे गए, सैकड़ों पेड़ गिर गए, कई घर तबाह हो गए। हवा की रफ्तार की बात करें तो दैनिक भास्कर में मैंने एक दिलचस्प रिपोर्ट पढ़ी। इस साल दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ माउंट एवरेस्ट पर जाने के लिए भारत की आठ महिलाओं को परमिट मिला है। इन आठ में एक मध्यप्रदेश की मेघा परमार भी हैं। मेघा अभी सफर में हैं। करीब 23 हजार फुट की ऊंचाई तक पहुंच चुकी हैं। 15 मई के आसपास वह 29 हजार फुट ऊंचाई वाले शिखर के लिए निकलेंगी। यह रिपोर्ट एवरेस्ट के रास्ते से उन्होंने भेजी है। रविवार दोपहर तीन बजकर 30 मिनट पर। मैं माउंट एवरेस्ट के कैंप दो यानि 21 हजार फुट पर हूं। तापमान माइनस 18 डिग्री है। तीन घंटे पहले आए बर्फीले तूफान से बचने के लिए हम कैंप के अंदर बैठे हैं। बाहर करीब 100 किलोमीटर की रफ्तार से बर्फीली हवाएं चल रही हैं लेकिन मुझे अपने गांव की मिट्टी को चोटी तक पहुंचाना है। यहां रोज चार से छह बर्फीले तूफान आते हैं। कई बार तो बर्प के बड़े टुकड़े भी खिसक आते हैं। ऐसे तूफान दिन में ज्यादा आते हैं। इसलिए चढ़ाई रात दो बजे के बाद करते हैं। हम लोग प्रेस्टीज एडवेंचर ग्रुप के साथ हैं और मेरे अलावा इसमें ईरान से मेहर दादशहलाए, इटली की मार्को जाफरोनी और पोलैंड की पावेल स्टम्पनिस्वस्की हैं। पिछले सप्ताह जब हम कैंप दो से तीन के बीच सीधी पहाड़ी पर चढ़ रहे थे तब रात दो बजे तेज हवाएं हमारा रास्ता रोक रही थीं और आठ घंटे लगातार सीधी चढ़ाई के बाद हम कैंप तीन पर पहुंचे थे। कैंप दो से तीन के बीच पीठ पर बंधा ऑक्सीजन सिलेंडर हमेशा सांस लेने में मदद करता है। कैंप तीन से आने के बाद भी हम लगातार यहां आसपास मौजूद छोटी-छोटी पहाड़ियों पर चढ़ने की प्रैक्टिस करते रहते हैं ताकि एनर्जी बनी रहे। बेस कैंप से शिखर तक कुल चार कैंप हैं। बर्फीली पहाड़ियों पर चढ़ने पर शरीर में पानी की कमी भी हो जाती है। इसे दूर करने के लिए पहाड़ पर जमी बर्प को काटकर एल्युमीनियम के बर्तन में गरम करते हैं। यही पानी पीते हैं। अभी-अभी खबर आई है कि आठ शेरपा शिखर पर पहुंच चुके हैं। ऐसा करने वाले इस साल के पहले पर्वतारोही हैं। मेरे ग्रुप का 15 मई के आसपास शिखर पर जाने का प्लान है। अब जैसे-जैसे हम ऊंचाई तक पहुंचेंगे ऑक्सीजन कम होती जाएगी। फेफड़ों में पानी भरने व दिमाग शून्य होने का खतरा होता है। इस साल भारत से आठ महिलाएं माउंट एवरेस्ट पर जाने वाली हैं, मुझे लगता है कि सबसे पहले मैं ही शिखर पर पहुंचूंगी। बैस्ट ऑफ लक मेघा परमार।

-अनिल नरेन्द्र

कैराना और फूलपुर उपचुनाव का महत्व

उत्तर प्रदेश में गोरखपुर और फूलपुर में हाल ही में उपचुनाव में विपक्ष को मिली जीत से उत्साहित राष्ट्रीय लोक दल ने घोषणा कर दी कि वह 28 मई को होने वाले कैराना लोकसभा चुनाव में संयुक्त विपक्ष के पूर्ण समर्थन में उतरेगी। कुछ दिन पहले लखनऊ में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और रालोद उपाध्यक्ष जयंत चौधरी के बीच हुई लंबी मुलाकात में इस पर सहमति बनी थी कि तबस्सुम सपा के बजाय रालोद के टिकट पर चुनाव लड़ेंगी और सपा उनका समर्थन करेंगी। कैराना और नूरपुर में होने वाले दोनों उपचुनाव के नतीजे सत्तारूढ़ पार्टी और विपक्ष के लिए काफी महत्वपूर्ण होंगे क्योंकि इन्हीं नतीजों के आधार पर एक साल से भी कम में होने वाले लोकसभा चुनाव का कुछ अंदाजा लग सकेगा। तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा है कि आगामी लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी बसपा का समाजवादी पार्टी से गठबंधन होगा। विधानसभा उपचुनाव में सपा-बसपा गठबंधन को मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के संसदीय क्षेत्र गोरखपुर और फूलपुर में मिली सफलता को देखते हुए इसकी पहले से उम्मीद की जा रही थी। अगर उत्तर प्रदेश में बसपा, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस व रालोद मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो इनका वोटर शेयर (पिछले लोकसभा चुनाव में) 49.3 प्रतिशत बनता है। भाजपा का 2014 के लोकसभा चुनाव में कुल वोट शेयर था 43.3 प्रतिशत। इस तरह अगर वोट बंटते नहीं और फाइट वन टू वन होती है तो भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। कैराना और नूरपुर चुनाव से थोड़ा अंदाजा हो जाएगा। उधर उत्तर प्रदेश सरकार के प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा ने सपा और बसपा के बीच भ्रष्टाचार का पैक्ट होने और कांग्रेस तथा रालोद पर इसकी अनदेखी का आरोप लगाते हुए कहा कि सीबीआई प्रदेश की पूर्ववर्ती मायावती सरकार के कार्यकाल में 21 चीनी मिलें औने-पौने दाम पर बेचे जाने की जांच में सच सामने लाकर इस कॉकटेल को खत्म करेगी। भाजपा ने दिवंगत सांसद हुकुम सिंह की पुत्र मृगांका सिंह को कैराना लोकसभा सीट पर उपचुनाव के लिए उतारा है। इनका मुकाबला संयुक्त विपक्ष की उम्मीदवार तबस्सुम बेगम से होगा। भाजपा को हाल ही में गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में भी इसी प्रकार के मुकाबले का सामना करना पड़ा था। भाजपा सांसद हुकुम Eिसह के निधन के बाद यह सीट फरवरी से रिक्त है। वहीं बिजनौर जिले के उपचुनाव नूरपुर विधानसभा सीट पर भाजपा ने दिवंगत भाजपा विधायक लोकेन्द्र चौहान की पत्नी अवनी सिंह को उम्मीदवार बनाया है। इस सीट पर सपा ने नईमुल हसन को मैदान में उतारा है। आम चुनाव के सेमीफाइनल माने जा रहे कैराना उपचुनाव को लेकर बड़ा सवाल यह है कि इसके परिणाम से क्या वैस्ट यूपी की आगे की सियासत में कोई बदलाव आएगा? अगर विपक्ष का प्रयोग यहां भी सफल हो गया तो इसका सीधा असर आगामी लोकसभा चुनाव में पड़ेगा। वहीं अगर यहां कमल खिलता है तो यह संदेश जाएगा कि दंगे के बाद जाट और मुस्लिम के बीच खड़ी हुई नफरत की दीवार अब भी नहीं टूटी है। वैस्ट यूपी में हमेशा से दलित और जाट के बीच टकराव जगजाहिर रहा है लेकिन संदेश जाएगा कि बसपा के साथ आने के बाद भी जातीय टकराव कम नहीं हुआ है।

Saturday, 19 May 2018

कैराना और फूलपुर उपचुनाव का महत्व

 उत्तर प्रदेश में गोरखपुर और फूलपुर में हाल ही में उपचुनाव में विपक्ष को मिली जीत से उत्साहित राष्ट्रीय लोक दल ने घोषणा कर दी कि वह 28 मई को होने वाले कैराना लोकसभा चुनाव में संयुक्त विपक्ष के पूर्ण समर्थन में उतरेगी। कुछ दिन पहले लखनऊ में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और रालोद उपाध्यक्ष जयंत चौधरी के बीच हुई लंबी मुलाकात में इस पर सहमति बनी थी कि तबस्सुम सपा के बजाय रालोद के टिकट पर चुनाव लड़ेंगी और सपा उनका समर्थन करेंगी। कैराना और नूरपुर में होने वाले दोनों उपचुनाव के नतीजे सत्तारूढ़ पार्टी और विपक्ष के लिए काफी महत्वपूर्ण होंगे क्योंकि इन्हीं नतीजों के आधार पर एक साल से भी कम में होने वाले लोकसभा चुनाव का कुछ अंदाजा लग सकेगा। तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा है कि आगामी लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी बसपा का समाजवादी पार्टी से गठबंधन होगा। विधानसभा उपचुनाव में सपा-बसपा गठबंधन को मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के संसदीय क्षेत्र गोरखपुर और फूलपुर में मिली सफलता को देखते हुए इसकी पहले से उम्मीद की जा रही थी। अगर उत्तर प्रदेश में बसपा, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस व रालोद मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो इनका वोटर शेयर (पिछले लोकसभा चुनाव में) 49.3 प्रतिशत बनता है। भाजपा का 2014 के लोकसभा चुनाव में कुल वोट शेयर था 43.3 प्रतिशत। इस तरह अगर वोट बंटते नहीं और फाइट वन टू वन होती है तो भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। कैराना और नूरपुर चुनाव से थोड़ा अंदाजा हो जाएगा। उधर उत्तर प्रदेश सरकार के प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा ने सपा और बसपा के बीच भ्रष्टाचार का पैक्ट होने और कांग्रेस तथा रालोद पर इसकी अनदेखी का आरोप लगाते हुए कहा कि सीबीआई प्रदेश की पूर्ववर्ती मायावती सरकार के कार्यकाल में 21 चीनी मिलें औने-पौने दाम पर बेचे जाने की जांच में सच सामने लाकर इस कॉकटेल को खत्म करेगी। भाजपा ने दिवंगत सांसद हुकुम सिंह की पुत्र मृगांका सिंह को कैराना लोकसभा सीट पर उपचुनाव के लिए उतारा है। इनका मुकाबला संयुक्त विपक्ष की उम्मीदवार तबस्सुम बेगम से होगा। भाजपा को हाल ही में गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में भी इसी प्रकार के मुकाबले का सामना करना पड़ा था। भाजपा सांसद हुकुम Eिसह के निधन के बाद यह सीट फरवरी से रिक्त है। वहीं बिजनौर जिले के उपचुनाव नूरपुर विधानसभा सीट पर भाजपा ने दिवंगत भाजपा विधायक लोकेन्द्र चौहान की पत्नी अवनी सिंह को उम्मीदवार बनाया है। इस सीट पर सपा ने नईमुल हसन को मैदान में उतारा है। आम चुनाव के सेमीफाइनल माने जा रहे कैराना उपचुनाव को लेकर बड़ा सवाल यह है कि इसके परिणाम से क्या वैस्ट यूपी की आगे की सियासत में कोई बदलाव आएगा? अगर विपक्ष का प्रयोग यहां भी सफल हो गया तो इसका सीधा असर आगामी लोकसभा चुनाव में पड़ेगा। वहीं अगर यहां कमल खिलता है तो यह संदेश जाएगा कि दंगे के बाद जाट और मुस्लिम के बीच खड़ी हुई नफरत की दीवार अब भी नहीं टूटी है। वैस्ट यूपी में हमेशा से दलित और जाट के बीच टकराव जगजाहिर रहा है लेकिन संदेश जाएगा कि बसपा के साथ आने के बाद भी जातीय टकराव कम नहीं हुआ है।

वॉलमार्ट के आने से छोटे कारोबारियों- दुकानदारों को भारी नुकसान होगा

कुछ साल पहले अपने देश में बहुत सारे लोगों ने वॉलमार्ट का नाम पहली बार तब सुना था जब खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी देने की पहल हुई थी। तब बड़े पैमाने पर यह आशंका भी जताई गई थी कि अगर यह पहल आगे बढ़ी तो भारत के खुदरा कारोबार पर वॉलमार्ट जैसी मल्टीनेशनल कंपनियों का कब्जा हो जाएगा और इससे करोड़ों छोटे दुकानदारों की आजीविका पर खराब असर पड़ेगा। उस समय वॉलमार्ट के भारत आने के विरोध करने वालों में भाजपा भी शामिल थी। विरोध के फलस्वरूप आखिरकार मनमोहन सिंह सरकार को बहु-खुदरा व्यवसाय में एफडीआई को मंजूरी देने का प्रस्ताव वापस लेना पड़ा था। लेकिन जिस वॉलमार्ट को यूपीए सरकार के समय तीखे विरोध के कारण रुक जाना पड़ा था, अब उसने राजग सरकार के समय भारत में प्रवेश के लिए अपने कदम बढ़ा दिए हैं। खुदरा क्षेत्र की दिग्गज कंपनी वॉलमार्ट ने कई महीनों की चर्चा के बाद आखिरकार भारतीय ऑनलाइन कंपनी फ्लिपकार्ट की 77 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने का ऐलान किया है जिससे भारतीय ऑनलाइन बाजार की पूरी तस्वीर बदल जाएगी। अमेरिकी कंपनी वॉलमार्ट 16 अरब डॉलर (1.07 लाख करोड़ रुपए) में फ्लिपकार्ट की 77 प्रतिशत हिस्सेदारी लेगी। दुनिया की यह सबसे बड़ी ई-कॉमर्स डील है। डील में फ्लिपकार्ट की वैलुएशन 20.8 अरब डॉलर (1.39 लाख करोड़ रुपए) आंकी गई है। इस लिहाज से यह ई-कॉमर्स में दुनिया की सबसे बड़ी डील है। वैसे यह हमारी समझ से परे है ]िक एक फली-फूलती कंपनी के मुख्य साझेदारों ने इस तरह अपने को क्यों बेच दिया? 77 प्रतिशत का मतलब है कंपनी का अधिग्रहण है। हालांकि एक मायने में यह अद्भुत भी है। सामान्य स्टार्टअप के तहत खड़ी की गई कंपनी वॉलमार्ट ने 20.8 अरब डॉलर की कीमत लगाई। इस नाते फ्लिपकार्ट की उपलब्धि भी मानी जा सकती है। हालांकि इसके कुछ शेयरधारकों ने अभी इस डील को अपनी स्वीकृति नहीं दी है। इस डील का विरोध भी हो रहा है। वॉलमार्ट के विरोध में देश व दिल्ली के व्यापारियों ने विरोध में एक विशेष रैली के आयोजन का फैसला किया है। आयोजकों का कहना है कि इस डील से स्पष्ट है कि वॉलमार्ट हमारे देश में बैक डोर एंट्री लेने में सफल रहा है। अगर एफडीआई की बात करें तो हमारे देश में केवल सिंगल ब्रांड की अनुमति है, जबकि वॉलमार्ट मल्टी ब्रांड है। संयोजकों ने कहा कि हमारा विरोध न केवल वॉलमार्ट के खिलाफ है बल्कि केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ भी है, जिसने हमारे देश के छोटे व मझौले व्यापारियों के भविष्य का ख्याल रखे बगैर इस समझौते को होने दिया है। लेकिन इस डील का एसोचैम जैसे कारपोरेट संघ ने स्वागत किया है। वहीं स्वदेशी जागरण मंच ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि यह सौदा छोटे और मझौले कारोबारियों व दुकानदारों को खत्म करेगा और रोजगार सृजन के अवसर भी खत्म करेगा। यह भी आशंकाएं खड़ी की जा रही हैं कि कहीं यह खुदरा बाजार में परोक्ष तरीके से प्रवेश का प्रयास तो नहीं? हालांकि अभी भारत में ई-कॉमर्स को लेकर एकदम साफ नीति-नियम नहीं है, इसलिए यह देखना होगा कि इस सौदे को सरकार की किस तरह मंजूरी मिलती है? वास्तव में वॉलमार्ट को भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग सहित कई संस्थाओं से मंजूरी लेनी होगी। सब कुछ होते हुए एक वर्ष तो लग जाएगा। जो भी हो एक विदेशी मल्टीनेशनल कंपनी का आम सामानों की खरीद-फरोख्त में इस तरह का वर्चस्व कोई सुखद प्रगति नहीं मानी जा सकती है।

-अनिल नरेन्द्र

प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में निर्माणाधीन फ्लाइओवर का गिरना

वाराणसी में एक निर्माणाधीन फ्लाइओवर के दो स्लैब गिरने से हमें पता चलता है कि अतीत में हुए इसी प्रकार के हादसों से कोई सबक नहीं लिया गया। वाराणसी के चौका घाट से कैंट रेलवे स्टेशन होते हुए लहरतारा तक जाने वाले फ्लाइओवर का काम चल रहा था। मंगलवार की शाम लगभग साढ़े पांच बजे कैंट रेलवे स्टेशन के पास दो पिलर को जोड़ने वाली स्लैब असंतुलित होकर नीचे चलते ट्रैफिक पर जा गिरा। इस हादसे में कम से कम 20 लोगों की मौत हो गई जबकि 30 से ज्यादा घायल हैं। आधा दर्जन से ज्यादा वाहन इन बीमों के नीचे दब गए। एनडीआरएफ, सेना, पुलिस, पीएसी व स्थानीय लोगों की मदद से चार घंटे तक चले राहत और बचाव कार्य के बाद दोनों बीमों को मौके से हटा दिया गया। उत्तर प्रदेश सेतु निर्माण निगम की लापरवाही से यह हादसा हुआ। तेज धमाका सुनकर लोग घरों से निकल कर भागे। राहगीरों में भी भगदड़ मच गई। आधे घंटे के बाद पुलिस पहुंची व डेढ़ घंटे बाद बचाव कार्य शुरू हो सका। नौ केनों से बीम को हल्का से उठाया गया तो दो ऑटो, दो बोलेरो कार को निकाला गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ देर रात को वाराणसी पहुंचे। उन्होंने डीएम-कमिश्नर से पूछा कि बीम कैसे गिरा? इस सवाल का जवाब अफसरों से देते नहीं बना। उन्होंने कहा कि हादसे की जांच रिपोर्ट आने के बाद दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी। हादसे की हकीकत जानने के लिए तकनीकी टीम का गठन किया गया है। योगी आदित्यनाथ ने मृतकों को पांच-पांच लाख और घायलों को दो-दो लाख रुपए देने की घोषणा की है। वह बीएचयू ट्रॉमा सेंटर भी गए और वहां घायलों का हाल जाना। हालांकि राष्ट्रीय आपदा दल की टीम के जल्द वहां पहुंचने से अनेक घायल लोगों को समय रहते चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई जा सकी, लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि हमारे यहां ऐसे बड़े निर्माण के दौरान आम लोगों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने की कोई व्यवस्था नहीं है। अलबत्ता दिल्ली में मेट्रो लाइन के निर्माण के दौरान संबंधित इलाके की इस तरह से घेराबंदी की जाती है जिससे नियमित यातायात न तो प्रभावित हो, न लोगों को परेशानी हो, पर इसके बावजूद हादसे हुए हैं। कुछ दिन पहले गुड़गांव और गाजियाबाद में ऐसे हादसे हुए थे जब निर्माणाधीन पुल के हिस्से गिर गए थे। वाराणसी में हुआ हादसा घनघोर आपराधिक लापरवाही का उदाहरण है, जहां प्रशासन ने सावधानी बरती होती तो यह हादसा टाला जा सकता था। हादसे की असली वजह निश्चय ही जांच से पता चलेगी, लेकिन जो शहर प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र हो वहां ऐसी लापरवाही की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। मुझे याद है कि जब कोलकाता में फ्लाइओवर गिरा था तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि यह भगवान का संदेश है कि बंगाल की तृणमूल कांग्रेस से बचाया जाए। आज मोदी जी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में एक फ्लाइओवर गिर गया है, अब इसे क्या समझें?

Thursday, 17 May 2018

नतीजों के बाद सबकी नजरें टिकीं राजभवन पर

कर्नाटक विधानसभा चुनाव पर देश भर की निगाहें लगी हुई थीं। 224 संसदीय विधानसभा की 222 सीटों पर शनिवार को मतदान हुआ था। मतदान के बाद विभिन्न चैनलों के एग्जिट पोल में त्रिशंकू विधानसभा की संभावना सही साबित हुई है। एग्जिट पोल की बात करें तो पांच चैनलों के एग्जिट पोल में भाजपा और चार में कांग्रेस को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में fिदखाया गया था। हालांकि दो चैनलों में तो भाजपा और कांग्रेस के बहुमत का अनुमान भी व्यक्त किया गया था। परिणामों में वह चार एग्जिट पोल तो कुछ हद तक सही साबित हुए जिन्होंने दावा किया था कि भाजपा सबसे बड़ी पाटी बनकर उभरेगी। यह भी सही रहा कि त्रिशंकू विधानसभा होगी। फाइनल परिणाम कुछ इस पकार रहे ः भाजपा 104 (46.4 पतिशत), कांग्रेस 78 (34.8 पतिशत) और जेडीएस (37)। यह भी सही रहा कि जेडीएस किंग मेकर की भूमिका में रहेगी। त्रिशंकू विधानसभा के हालात सामने आने के बाद भाजपा और कांग्रेस-जद(एस) गठबंधन दोनों ने सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया है। इसके बाद राज्य में भावी सरकार को लेकर संशय और गहरा गया है और जोड़-तोड़ की सियासत शुरू हो गई है। अब सारी नजरें राज्यपाल वनुभाई वाला पर टिक गई हैं। उन्हें फैसला करना है कि वे सरकार बनाने के लिए सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी भाजपा को आमंत्रित करें या कांग्रेस-जद(एस) गठबंधन को। भारतीय राजनीति में हमेशा बोली की मर्यादा का ख्याल रखा गया है पर दुख से कहना पड़ता है कि इस चुनाव में यह मर्यादा टूट गई। पूर्व पधानमंत्री मनमोहन सिंह और अन्य कांग्रेसी नेताओं ने राष्ट्रपति कोविंद को चिट्ठी लिखकर पधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाषा पर आपत्ति जताई है। कर्नाटक चुनाव में डा. सिंह के अनुसार पधानमंत्री कांग्रेस को धमकाने का काम कर रहे हैं। दरअसल कर्नाटक के हुबली में 6 मई को चुनाव पसार के दौरान पीएम मोदी ने भाषण देते हुए कहा था, `कांग्रेस के नेताओं कान खोलकर सुन लीजिए, अगर सीमाओं को पार करेंगे तो ये मोदी है लेने के देने पड़ जाएंगे।' कांग्रेस ने इस भाषण का उल्लेख करते हुए इसे आपत्तिजनक बताया है और राष्ट्रपति से पीएम को चेतावनी जारी करने के लिए कहा है। कांग्रेस ने आगे लिखा है कि यह सोचना मुश्किल है कि हमारे जैसे लोकतांत्रिक देश में पीएम के पद पर बैठा कोई व्यक्ति इस तरह की डटने वाली भाषा का इस्तेमाल करे। इस चुनाव में एक नया रिकार्ड भी बना है। वह है कि यह चुनाव अब तक का सबसे महंगा चुनाव रहा। यह सर्वेक्षण सेंटर फार मीडिया स्टडीज ने किया है। यह सेंटर खुद को अपनी वेबसाइट पर एक गैर सरकारी संगठन और थिक टैंक बताता है। इसके द्वारा किए गए सर्वेक्षण में कर्नाटक चुनाव को धन पीने वाला बताया है। सीएमएस के अनुसार विभिन्न राजनीतिक पार्टियों और उसके उम्मीदवारों द्वारा कर्नाटक चुनाव में 9,500 से 10,500 करोड़ केंद्रीय धन खर्च किया गया है। यह खर्च राज्य में आयोजित पिछले विधानसभा चुनाव के खर्च से दोगुना है। सर्वेक्षण में बताया गया कि इसमें पधानमंत्री के अभियान में हुआ खर्चा शामिल नहीं है। सीएमएस के एन भास्कर राव ने खर्च की दर अगर यही रही तो 2019 के लोकसभा चुनाव में 50,000-60,000 कऱोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। पधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस चुनाव के लिए कड़ी मेहनत और मुश्क्कत की। हालांकि कर्नाटक की उत्तर पदेश से आधी सीटें हैं, आबादी भी एक तिहाई है, पर मोदी ने ताकत बराबर लगाई। पीएम ने 21 रैलियां कीं। दो बार नमो एप से मुखातिब हुए। करीब 29 हजार किलोमीटर की दूरी तय की। मोदी कर्नाटक में एक भी धार्मिक स्थल पर नहीं गए। इनके मुकाबले में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 20 रैलियां कीं और 40 रोड शो-नुक्कड़ सभाएं कीं। राहुल ने मोदी से दोगुनी अधिक दूरी तय की। 55 हजार किलोमीटर की यात्रा की। कांग्रेस की बात करें तो ऐसा पतीत होता है कि इस बार उसे यह एहसास हो गया था कि उसे बहुमत नहीं मिलने वाला है और त्रिशंकू विधानसभा होगी। इसलिए कांग्रेस के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने मतगणना से पहले दलित कार्ड खेला। कांग्रेस गोवा की गलती दोहराने को तैयार नहीं थी और उसने पार्टी हाई कमान से सबक लिया। जैसे ही परिणाम आए सोनिया गांधी ने पार्टी नेताओं को आदेश दिया कि वह कुमार स्वामी से जाकर मिलें और उनसे कहें कि कांग्रेस मुख्यमंत्री पद के लिए उन्हें समर्थन देने को तैयार है। यह राजनीति के लिहाज से एक बड़ा दांव रहा। अब कम से कम कांग्रेस-जेडीएस सरकार बनाने की रेस में शामिल तो है। कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए यह चुनाव बहुत महत्वपूर्ण थे। यह लड़ाई कांग्रेस के अस्तित्व की और भाजपा के लिए 2019 के चुनाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था बोमई बनाम केंद्र सरकार के एक अहम मामले की सुनवाई करते हुए सुपीम कोर्ट ने यह आदेश दिया था कि बहुमत का फैसला विधानमंडल के पटल पर होगा न कि राजनिवास में। अगर राज्यपाल भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं तो जाहिर है कि उसे जेडीएस का समर्थन चाहिए। ऐसे में विधायकों की खरीद-फरोख्त की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। अलबत्ता हार्स ट्रेडिंग को रोकने के लिए और राजनीति में शुचिता स्थापित करने के लिए कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना बेहतर होगा। देखें, राज्यपाल महोदय क्या फैसला करते हैं?

-अनिल नरेन्द्र

Wednesday, 16 May 2018

जनरल रावत की पथराव करने वालों को चेतावनी

कश्मीर घाटी में पथराव की बढ़ती घटनाओं और आतंकवाद बढ़ने के संकेतों के बीच सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने उपद्रवियों को कड़ा संदेश दिया है। जनरल रावत ने स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें आजादी कभी नहीं मिलने वाली और इसके लिए हथियार उठाने वालों से हम सख्ती से निपटेंगे। जम्मू-कश्मीर की अस्थिर स्थिति पर यह उनका सबसे बड़ा बयान है। उन्होंने सीधा हमला उस आजादी पर बोला है जिसके नाम पर इन नौजवानों को भड़काया जा रहा है। इसलिए जनरल रावत जब कहते हैं कि यह आजादी उन्हें नहीं मिलने वाली तो इसका सीधा अर्थ यह है कि घाटी में जिस तरह से और जिस तरह की आजादी के सपने बेचे जा रहे हैं। वे बेमतलब तो हैं ही, साथ ही अव्यावहारिक भी हैं। यह सीमा पार से आई एक चुनौती है जिसे नौजवानों के रूप में भारतीय सेना के सामने खड़ा किया जा रहा है। जाहिर है इसका जवाब भारतीय फौज को ही देना है और वह माकूल जवाब दे भी रही है। जनरल रावत ने स्पष्ट किया कि सेना का व्यवहार कभी बर्बर नहीं रहा। इसी स्थिति में सीरिया व पाकिस्तान में टैंक और हवाई हमलों का इस्तेमाल किया जा रहा है। जनरल रावत के बयान की पुष्टि लश्कर--तैयबा के आतंकी एजाज गुजरी के वीडियो से भी होती है, जिसमें उसने माना है कि वह झाड़ियों में छिपा था, जहां सेना उसे मार सकती थी लेकिन उसे बंदी बनाकर उसकी जान बचाई। उसने कहा कि सेना ने मुझे नई जिन्दगी दी है। गुजरी ने गलत रास्ते पर चल रहे अपने साथियों को भी हथियार छोड़कर सामान्य जिन्दगी जीने की अपील की है। पाकिस्तानी करतूतों का भी पर्दाफाश करते हुए उसने बताया कि जिस दिन वह पकड़ा गया उसी दिन पाकिस्तान से आतंकियों को निर्देश मिले थे कि भारतीय सेना बर्बरता कर रही है, इसलिए वे उपद्रव फैलाएं। घाटी में शिक्षित युवाओं का आतंकी गुटों में शामिल होना भी पाकिस्तानी साजिश का ही संकेत है। जनरल रावत ने राज्य की महबूबा मुफ्ती सरकार को भी संदेश दे दिया है जो ईद और अमरनाथ यात्रा का हवाला देकर पथराव करने वालों के खिलाफ कार्रवाई रोकने पर जोर दे रही हैं। सेना और सुरक्षा बल कश्मीर में हमेशा से ही अपनी भूमिका अच्छे से निभाते रहे हैं। वहां आपत्ति दरअसल राजनीतिक दलों से ज्यादा है, हुर्रियत कांफ्रेंस जैसे अलगाववाद संगठनों से ज्यादा है। यह अपनी भूमिका को सही ढंग से नहीं निभाते। कश्मीरी नौजवानों का मुख्य धारा में शामिल करने का मुद्दा हमेशा ही राजनीति की भेंट चढ़ा है। समस्या के समाधान में राजनीतिक दल भी एक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन इन सबको अंजाम देने में प्रदेश की राजनीति नाकाम रही है। इसलिए नौजवानों को समझाने का काम भी थलसेना प्रमुख को ही करना पड़ रहा है। हम जनरल रावत के बयान से पूरी तरह सहमत हैं और बहादुर जवानों को अत्यंत कठिन स्थिति से निपटने के लिए सलाम करते हैं।

-अनिल नरेन्द्र