Sunday, 17 December 2017

माननीयों के केस निपटाने के लिए विशेष अदालतें

सांसदों-विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों (आपराधिक) के निपटारे के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि इन मामलों को निपटाने के लिए 12 विशेष अदालतें गठित की जाएंगी। हालांकि सरकार ने सांसदों और विधायकों के खिलाफ इन लंबित मामलों की जानकारी एकत्रित करने के लिए और समय की मांग भी की है। सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों-विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों के निपटारे के लिए केंद्र को विशेष अदालतें गठित करने की योजना पेश करने के लिए कहा था। यह अच्छा हुआ कि पहले दागी नेताओं के मामलों की सुनवाई की अलग से व्यवस्था करने के सुझाव से असहमत सुप्रीम कोर्ट अब यह महसूस कर रहा है कि राजनीति के अपराधीकरण पर लगाम लगाने की सख्त जरूरत है और यह काम दागी जनप्रतिनिधियों के मामलों में निस्तारण पर ध्यान देकर ही किया जा सकता है। एक आंकड़े के अनुसार इस समय करीब डेढ़ हजार सांसद और विधायक ऐसे हैं जो किसी न किसी आपराधिक मामले में घिरे हैं। यह आंकड़ा इन नेताओं के चुनावी हलफनामों के आधार पर तैयार किया गया है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि तमाम विधायक एवं सांसद ऐसे हैं जिन पर संगीन आरोप हैं, लेकिन सभी को एक ही तराजू से नहीं तोला जा सकता। एक समस्या यह भी है कि कई बार विशेष और यहां तक कि फास्ट ट्रैक अदालतें भी मामलों का निपटारा लंबा खींच देती हैं। ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया के तौर-तरीकों में अपेक्षित बदलाव और सुधार नहीं हो पाए। इसका परिणाम है कि हर तरह के मुकदमों का अम्बार लगता जा रहा है। क्या यह विचित्र नहीं कि सबसे बड़ी मुकदमेबाजी राज्य सरकारों की ही है? बेहतर हो कि जहां सरकारें यह देखें कि नौकरशाह बात-बात पर अदालत पहुंचने से बाज आएं वहीं न्यायपालिका भी मामलों के जल्द निस्तारण के वैकल्पिक तौर-तरीके खोजें। सरकार व न्यायपालिका की तमाम चिन्ताओं के बावजूद लोगों को तेजी से इंसाफ मिलने का सिलसिला अभी दूर की कौड़ी नजर आता है। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (एनजेडीजी) के अनुसार देश के सभी 24 उच्च न्यायालयों में 2016 तक कुल 40.15 लाख मुकदमे लंबित थे। लगभग छह लाख केस तो ऐसे हैं जो एक दशक से भी अधिक समय से निस्तारण के इंतजार में हैं। चन्द दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने एक सम्मेलन में जोर दिया था कि विवादों के निपटारे की वैकल्पिक प्रणाली के तौर पर संस्थागत मध्यस्थता महत्वपूर्ण साबित होगी।

-अनिल नरेन्द्र

अध्यक्ष पद से रिटायर होंगी, राजनीति से नहीं

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी 19 साल पद पर रहने के बाद शनिवार को इस पद से रिटायर हो गईं। उन्होंने पार्टी की कमान अपने बेटे और नवनिर्वाचित अध्यक्ष राहुल गांधी को सौंप दी। सोनिया गांधी के राजनीति से रिटायर होने की अटकलों को विराम लगाते हुए कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि वह सिर्फ कांग्रेस अध्यक्ष पद से रिटायर हो रही हैं। इससे पहले सोनिया गांधी ने शुक्रवार को संसद परिसर में पत्रकारों से कहा थाöमेरी भूमिका अब रिटायर होने की है। सोनिया गांधी ने अपना दायित्व राहुल गांधी को सौंपा है, लेकिन वह सदैव पार्टी का मार्गदर्शन करती रहेंगी। सोनिया गांधी आगे भी कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष बनी रहेंगी। यानी वो आगे से पार्टी की बजाय संसद में अधिक भूमिका निभाएंगी। बताया तो यह जा रहा है कि विपक्षी दलों के साथ तालमेल बनाए रखने का दायित्व सोनिया के जिम्मे होगा। सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने काफी उतार-चढ़ाव देखे हैं। सोनिया एकमात्र ऐसी कांग्रेस अध्यक्ष रहीं, जिनके नेतृत्व में कांग्रेस ने लगातार दो पूरे कार्यकाल तक केंद्र की सत्ता संभाली। 1998 में विपरीत परिस्थितियों में कांग्रेस की कमान संभालने के बाद छह साल के भीतर ही उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार से सत्ता छीन ली। उस समय उनके प्रधानमंत्री बनने की अटकलें जोरों पर थीं, लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री की कुर्सी को ठुकरा कर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री चुना। अगले चुनाव अर्थात 2009 के चुनाव में उनके सामने भाजपा के दूसरे बड़े नेता लाल कृष्ण आडवाणी थे, लेकिन उनके नेतृत्व में भी कांग्रेस ने भाजपा को पराजित कर सत्ता बरकरार रखी। फिर से मनमोहन सिंह को ही प्रधानमंत्री चुना। यह महज संयोग है कि जब सोनिया ने कांग्रेस की कमान संभाली थी, तब वह विपक्ष में थीं और अभी जब राहुल गांधी कमान संभाल रहे हैं तब भी वह विपक्ष में हैं। उस समय कांग्रेस के पास चार राज्यों में सरकारें थीं। इस समय पांच राज्यों में सरकारें हैं। तब उनके पास लोकसभा के 141 सांसद थे और इस समय 46 सांसद हैं। पिछले तीन सालों से सभी फैसले राहुल गांधी ही ले रहे थे। गौरतलब है कि सोनिया गांधी सियासत से दूर रहना चाहती थीं। 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद पार्टी संभालने के आग्रह को ठुकरा दिया था। 1997 में अंदरूनी कलह से पार्टी को बचाने के लिए वह सियासत में आने को राजी हुईं। सोनिया 1998 में कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गईं और 19 साल तक पार्टी अध्यक्ष के तौर पर काम किया। सोनिया कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटी हैं पर सियासत से नहीं। उनकी कांग्रेस और देश दोनों ही जगह भूमिका रहेगी और वह पार्टी को दिशा देती रहेंगी।

Saturday, 16 December 2017

मदरसों में छात्र या तो मौलवी बन रहे हैं या आतंकवादी ः पाक सेना प्रमुख

पाकिस्तान में कुकुरमुत्तों की तरह फैल रहे मदरसों पर सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने तीखी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि ज्यादातर इस्लाम की शिक्षा देने वाले मदरसों की अवधारणा पर एक बार फिर ध्यान देना होगा, क्योंकि पाकिस्तान के मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे या तो मौलवी बन रहे हैं या आतंकवादी। पाक अखबार डॉन में बाजवा के बयान का उल्लेख किया गया है। बलूचिस्तान के प्रमुख शहर क्वेटा में एक युवा सम्मेलन में उन्होंने कहा कि मैं मदरसों के खिलाफ नहीं हूं लेकिन मदरसों की मूल भावना कहीं खो गई है। पाकिस्तान में मदरसों की शिक्षा अपर्याप्त है, क्योंकि वह छात्रों को आधुनिक दुनिया के लिए तैयार नहीं करती है। जनरल बाजवा ने कहा कि मदरसों में करीब 25 लाख बच्चे पढ़ते हैं लेकिन वे क्या बनेंगेöक्या वे मौलवी बनेंगे अथवा आतंकवादी बनेंगे। उन्होंने कहा कि देश में इतने छात्रों को नियुक्त करने के लिए नई मस्जिदें खोलना असंभव है। जनरल बाजवा ने कहा कि पाक मदरसों पर अकसर आरोप लगाता है कि वे युवाओं को कट्टरपंथी बना रहे हैं। इधर हमारे उत्तर प्रदेश में करीब ढाई हजार से ज्यादा मदरसों में अब मजहबी किताबों के साथ-साथ राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी की पुस्तकें भी दिखाई देंगी। योगी आदित्यनाथ की सरकार ने यह फैसला मदरसों के पाठ्यक्रम को सुधारने के लिए बनी 40 सदस्यीय समिति की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद यह निर्णय लिया है। आमतौर पर मदरसों को लेकर आम जनों में यह भ्रांति है कि यहां सिर्फ मजहबी शिक्षा दी जाती है और ऐसे केंद्र से निकले बच्चे मामूली ज्ञान अर्जित करते हैं, जिससे आगे चलकर उनके लिए रोजगार का गंभीर संकट पैदा हो जाता है। सरकार की असली चिन्ता इसी बात को लेकर है कि मदरसों की शिक्षा देने की पद्धति में बदलाव आए। वे भी समय के साथ चलें। आज जो हालात हैं, वह चिन्ताजनक इसलिए हैं कि मदरसों ने खुद को मध्ययुगीन खांचे से बाहर निकलने की नहीं सोची। सरकार इस बात का महत्व समझती है कि मदरसा शिक्षा को आधुनिक और पारदर्शी बनाना कितना जरूरी है? आज के दौर में बच्चों को विकासपरक शिक्षा की आवश्यकता है। वैश्विक माहौल तेजी से बदल रहा है और उसमें बच्चों को ज्यादा अपडेट किया जाना जरूरी है। अगर पाकिस्तान के सेना प्रमुख मदरसों में शिक्षा के सुधार की बात कर रहे हैं तो कुछ मदरसों में कट्टरपंथी तालीम को रोकना कितना जरूरी है। रोजगारपरक शिक्षा मिलेगी तो बेरोजगारी का संकट भी काफूर होगा। पाक में सेना की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है ऐसे में जनरल बाजवा का बयान मायने रखता है।

-अनिल नरेन्द्र

वैज्ञानिकों ने भी माना रामसेतु मानव निर्मित है

भारत में संकीर्ण राजनीति की वजह से भले ही रामसेतु को विवादित मुद्दा बना दिया गया और इसकी प्रमाणिकता पर भी सवाल उठाए गए, लेकिन भूगर्भ वैज्ञानिकों, आर्कियोलॉजिस्ट की टीम ने सैटेलाइट से प्राप्त चित्रों और सेतु स्थल के पत्थरों और बालू का अध्ययन करने के  बाद यह पाया गया है कि भारत और श्रीलंका के बीच एक सेतु का निर्माण किए जाने के संकेत मिलते हैं। दुनियाभर के वैज्ञानिक भी अब यह मानने पर विवश हैं कि भारत और श्रीलंका के बीच स्थित प्राचीन एडम्स ब्रिज यानी रामसेतु असल में मानव निर्मित है। भारत के रामेश्वरम के करीब स्थित द्वीप पमबन और श्रीलंका के द्वीप मन्नार के बीच 50 किलोमीटर लंबा अद्भुत पुल कहीं और से लाए पत्थरों से बनाया गया है। वैज्ञानिक इसको एक सुपर ह्यूमन उपलब्धि मान रहे हैं। इनके अनुसार भारत-श्रीलंका के बीच 30 मील के क्षेत्र में बालू की चट्टानें पूरी तरह से प्राकृतिक हैं, लेकिन इन पर रखे गए पत्थर कहीं और से लाए गए प्रतीत होते हैं। यह करीब सात हजार साल पुरानी है जबकि इन पर मौजूद पत्थर करीब चार-पांच हजार वर्ष पुराने हैं। बता दें कि रामसेतु पुल को श्रीराम के निर्देशन में कोरल चट्टानों और रीफ से बनाया गया था। जिसका विस्तार से उल्लेख बाल्मीकि रामायण में मिलता है। रामसेतु की उम्र रामायण के अनुसार 3500 साल पुराना बताया जाता है। कुछ इसे आज से 7000 साल पुराना बताते हैं। रामसेतु का उल्लेख कालिदास की रघुवंश में सेतु का वर्णन है। भारतीय सैटेलाइट और अमेरिका के अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान नासा ने उपग्रह से खींचे चित्रों में भारत के दक्षिण में धनुषकोटी तथा श्रीलंका के उत्तर पश्चिम पमबन के मध्य समुद्र में 48 किलोमीटर चौड़ी पट्टी के रूप में उभरे एक भूभाग की रेखा दिखती है, उसे ही आज रामसेतु या राम का पुल माना जाता है। प्राचीन वास्तुकारों ने इस संरचना की परत का उपयोग बड़े पैमाने पर पत्थरों और गोल आकार की विशाल चट्टानों को कम करने में किया और साथ ही कम से कम घनत्व तथा छोटे पत्थरों और चट्टानों का उपयोग किया जिससे आसानी से एक लंबा रास्ता तो बना ही साथ ही समय के साथ यह इतना मजबूत भी बन गया कि मनुष्यों व समुद्र के दबाव को भी सह सके। तत्कालीन यूपीए-1 सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया था कि कोई सबूत नहीं है कि रामसेतु कोई पूजनीय स्थल है। साथ ही सेतु को तोड़ने की इजाजत मांगी गई थी। बाद में कड़ी आलोचना के बीच तत्कालीन सरकार ने यह हलफनामा वापस ले लिया था। वैज्ञानिक इसे सर्वश्रेष्ठ मानवीय कृति बता रहे हैं। जय श्रीराम।

Thursday, 14 December 2017

नोटबंदी और जीएसटी के झटके से उबरने में अभी लगेगा समय

आठ नवम्बर 2016 को नोटबंदी का ऐलान हुआ था। रात आठ बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीवी क्रीन पर आकर इसका ऐलान करके सबको हैरान-परेशान कर दिया था। इस फैसले के कई राजनीतिक-आर्थिक, सामाजिक असर और पहलू रहे। उस दिन पीएम मोदी ने नोटबंदी को भारतीय राजनीति में गेम चेंजर क्षण कहा था। तत्काल प्रभाव से 500 और 1000 रुपए के नोट पर रोक लगाने की घोषणा की और उसे बदलने के लिए एक खास समय सीमा दी। इसके बाद शुरू हुआ आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर इस बड़े फैसले के नफे-नुकसान का आकलन का दौर। जिस समय नोटबंदी हुई उस समय शायद ही किसी को यह अंदाजा रहा हो कि इसके इतने दूरगामी असर होंगे। नोटों को बदलने के लिए लंबी-लंबी लाइनें लगने लगीं। 100 से ज्यादा लोगों ने ऐसा करते-करते दम तोड़ दिया। एक साल बाद भी लोग इस फैसले से उबर नहीं पाए हैं। रही-सही कसर जीएसटी ने पूरी कर दी है। दोनों ही कदम बगैर ठीक से होमवर्क किए लागू कर दिए गए। भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर वाईवी रेड्डी ने नोटबंदी और जीएसटी जैसे कदमों से अर्थव्यवस्था को लगे झटके को देखते हुए कहा है कि अर्थव्यवस्था को इस स्थिति से पूरी तरह उबरने और उच्च वृद्धि के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए दो साल के समय की और जरूरत है। उन्होंने कहा कि यह एक झटका है जिसकी नकारात्मक धारणा के साथ शुरुआत हुई है। इसमें कुछ सुधार आ सकता है और उसके बाद ही कुछ फायदा मिल सकता है। फिलहाल इस समय इसमें परेशानी है और लाभ बाद में आएगा। कितना फायदा होगा और कितने अंतराल के बाद यह होगा, यह देखने की बात है। रेड्डी ने मुंबई में सप्ताहांत पर संवाददाताओं के एक समूह के सवालों के जवाब में कहा कि इस समय आर्थिक वृद्धि को लेकर कोई अनुमान लगाना काफी मुश्किल काम है। उन्होंने कहा कि यह कहना अभी मुश्किल है कि अर्थव्यवस्था फिर से सात से आठ प्रतिशत की संभावित उच्च वृद्धि के रास्ते पर कब लौटेगी। उन्होंने याद किया कि जब वह आरबीआई के गवर्नर थे, उसके मुकाबले पिछले तीन साल में कच्चे तेल के दाम एक-तिहाई पर आ गए थे। हालांकि इस बीच जीएसटी लागू होने, नोटबंदी का कदम उठाने और बैंकों में भारी एनपीए की वजह से आर्थिक वृद्धि के दौरान पिछली सरकार में बिना सोच-विचार के दिए गए कर्ज और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर टेलीकॉम तथा कोयला क्षेत्र में घटे घटनाक्रम से कंपनी क्षेत्र पर काफी दबाव बढ़ गया है। इस समूचे घटनाक्रम से बैंकिंग तंत्र में फंसा कर्ज 15 प्रतिशत तक बढ़ गया है।

-अनिल नरेन्द्र

कांग्रेस में राहुल युग की शुरुआत

आखिर राहुल गांधी की ताजपोशी हो ही गई। सोमवार को राहुल ने कांग्रेस अध्यक्ष पद संभाल लिया। वे निर्विरोध चुने गए। कांग्रेस के इस शीर्ष पद के लिए केवल राहुल गांधी ने ही नामांकन किया था। राहुल 16 दिसम्बर को अपना काम संभालेंगे। इस चुनाव के साथ ही पार्टी में पीढ़ीगत बदलाव हुआ है। राहुल गांधी अब अपनी मां सोनिया गांधी की जगह संभालेंगे। बता दें कि सोनिया गांधी 19 साल तक इस पद पर रहीं। अध्यक्ष के तौर पर सोनिया के 19 साल के कार्यकाल के समापन के बाद देश की इस सबसे पुरानी पार्टी की कमान संभालना राहुल के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होगा। विपक्षी नेता पिछले कुछ सालों से उन्हें शहजादा और कई अन्य नामों से पुकार कर उनके महत्व को कम करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते रहे हैं। राहुल अपनी दादी इंदिरा गांधी की 1984 में हत्या के बाद उनके अंतिम संस्कार के समय राष्ट्रीय टेलीविजन और अखबारों में छपी तस्वीरों में अपने पिता राजीव गांधी के साथ प्रमुखता से दिखाई दिए थे। उसके बाद उनके पिता राजीव गांधी की 1991 में हत्या के बाद उनके अंतिम संस्कार में राहुल लगभग पूरे देश की सहानुभूति के केंद्र में रहे। राहुल का जन्म 19 जून 1970 को हुआ था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की आधिकारिक वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक राहुल ने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज, हार्वर्ड कॉलेज और फ्लोरिडा के रोलिस कॉलेज से कला में स्नातक तक की पढ़ाई की है। इसके बाद उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के ट्रीनिटी कॉलेज से डेवलपमेंट स्टडीज में एम.फिल किया। नेहरू-गांधी परिवार के वारिस राहुल गांधी का अभी तक का राजनीतिक जीवन सुर्खियों का मौहताज नहीं रहा है किन्तु कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनकी असली परीक्षा चुनावी मझधार में पिछले कुछ समय से पार्टी की डगमगाती नैया को विजय के तट तक सही सलामत पहुंचाने की होगी। राहुल को जब 2013 में पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया था उन्होंने जयपुर में भाषण के दौरान अपनी मां और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की इस बात को बड़े भावनात्मक ढंग से कहा था कि सत्ता जहर पीने के समान है। हालांकि इसके ठीक पांच साल बाद अब उन्हें यह विषपान करना पड़ेगा क्योंकि अब वह कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित हो चुके हैं। कांग्रेस की कमान संभालने जा रहे राहुल नेहरू-गांधी परिवार में पांचवीं पीढ़ी के नेता हैं। यह सिलसिला आजादी से पहले मोती लाल नेहरू से शुरू हुआ था। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार गुजरात चुनाव राहुल के लिए एक कड़ी परीक्षा साबित होगी। अगर इस चुनाव में पार्टी कुछ बेहतर भी कर पाती है तो निश्चित तौर पर पार्टी के भीतर और बाहर उनकी विश्वसनीयता में इजाफा होगा। उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद राहुल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे मझे हुए नेता और कुशल वक्ता से मुकाबले के लिए अपनी रणनीति में काफी बदलाव किए हैं। उन्होंने जहां गब्बर सिंह टैक्स जैसे जुमले बोलने शुरू कर दिए हैं वहीं ट्विटर के माध्यम से उन्होंने भाजपा सरकार पर आक्रमण तेज कर दिया है। गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान राहुल ने अपनी छवि सुधारी है। अब लोग उन्हें न केवल गंभीरता से सुनते हैं बल्कि बड़ी संख्या में उनकी रैलियों को अटैंड भी करते हैं। कांग्रेस में अब राहुल युग की शुरुआत हो चुकी है।

Wednesday, 13 December 2017

ईवीएम पर फिर उठा विवाद

गुजरात के विधानसभा चुनाव में फिर ईवीएम का मुद्दा उठ गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अर्जुन मोढवाडिया ने शनिवार को पोरबंदर के मुस्लिम बहुल इलाके मेमनवाड़ा के तीन मतदान केंद्रों पर ईवीएम से संभावित छेड़छाड़ की शिकायत की और कहा कि कुछ मशीनें ब्लूटूथ के जरिये बाहरी उपकरणों से जुड़ी पाई गईं। इससे पहले उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में मेयर की सीट पर खाता खोलने में नाकाम रही समाजवादी पार्टी (सपा) ने हार के लिए ईवीएम को जिम्मेदार ठहराया था। शनिवार को सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ट्वीट किया, जिन जगहों पर बैलेट पेपर से मतदान हुआ वहां भाजपा सिर्फ 15 प्रतिशत सीटें जीत पाई। जबकि जिन जगहों पर ईवीएम का इस्तेमाल किया गया, उन जगहों पर भाजपा 46 प्रतिशत सीटें जीती। आम आदमी पार्टी के सीनियर नेता और यूपी के प्रभारी संजय सिंह ने आरोप लगाते हुए कहा है कि भाजपा नगर निगम में ही बहुमत के साथ जीती है, क्योंकि वहां ईवीएम के साथ चुनाव हुए थे। आम आदमी पार्टी बार-बार यह कहती आई है कि जब तक ईवीएम से चुनाव होंगे, तब तक भाजपा जीतती रहेगी। इस बीच अर्जुन मोढवाडिया की शिकायत पर चुनाव आयोग ने कहा है कि उनकी शिकायत की जांच कराई गई है, किसी भी ईवीएम में टैम्परिंग की शिकायत नहीं पाई गई है। वहीं कांग्रेस के शक्ति सिंह गोहिल ने आरोप लगाया है कि दलित समुदाय के इलाकों में ईवीएम में गड़बड़ियों की शिकायत ज्यादा है। ईवीएम की गड़बड़ी की वजह से वीपी, पोरबंदर और वालसाड समेत तमाम जिलों में मतदान में रुकावट आई। बताया जाता है कि गड़बड़ी की शिकायत के बाद सूरत में 70 और राजकोट में 35 ईवीएम बदली गईं। भाजपा का कहना है कि मोढवाडिया की ओर से की गई शिकायतें दिखाती हैं कि विपक्षी कांग्रेस कोई बहाना तलाश रही है, क्योंकि वह जानती है कि चुनावों में उसे करारी शिकस्त मिलने वाली है। उधर बसपा प्रमुख मायावती ने यूपी निकाय चुनाव में मिली सफलता से खुश भाजपा को चुनौती देते हुए कहा है कि यदि वह लोकतंत्र में यकीन करती है तो आम चुनाव ईवीएम के बदले बैलेट पेपर से करवाएं। ईवीएम का मुद्दा थमने का नाम ही नहीं ले रहा। अब वापस बैलेट पेपर पर जाना तो मुश्किल है पर ईवीएम को टैम्परप्रूफ बनाने का काम चुनाव आयोग का है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना उसका दायित्व भी है।

-अनिल नरेन्द्र