Tuesday, 17 October 2017

दो राज्यों के चुनाव एक साथ करा नहीं सकते तो पूरे देश के कैसे?

चुनाव आयोग ने बृहस्पतिवार को हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव की घोषणा कर दी, जबकि गुजरात की विधानसभा चुनाव की घोषणा के लिए अभी इंतजार करना होगा। हालांकि चुनाव आयोग ने यह कहा है कि गुजरात चुनाव के लिए मतदान हिमाचल की मतगणना से पहले करा लिया जाएगा। चुनाव आयोग ने अकेले हिमाचल के चुनाव की घोषणा करके विवाद जरूर खड़ा कर दिया। यह स्वाभाविक भी है। उम्मीद की जा रही थी कि हिमाचल और गुजरात के विधानसभा चुनावों की तारीखें एक साथ घोषित होंगी। लेकिन निर्वाचन आयोग ने हिमाचल के लिए मतदान की तारीख नौ नवम्बर तो घोषित कर दी पर गुजरात की बाबत कहा कि तारीख बाद में घोषित की जाएगी। आयोग के इस फैसले पर कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। पार्टी ने सवाल किया है कि लोकसभा और देश की तमाम विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की वकालत करने वाले प्रधानमंत्री और तमाम भाजपा नेताओं को अब बताना चाहिए कि जब उन्हें दो राज्यों में एक साथ चुनाव कराना गवारा नहीं है, तो समूचे देश में एक साथ चुनाव कराने की बात वे किस मुंह से करते हैं। आखिर यह बहुत से लोगों को खटक क्यों रहा है? इसलिए कि यह नियम और परिपाटी के विरुद्ध है। जिन राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल पूरा होने में छह महीने से अधिक का अंतर नहीं होता, उनके चुनावों की घोषणा आयोग एक साथ करता आया है। जबकि हिमाचल प्रदेश और गुजरात की विधानसभाओं का कार्यकाल पूरा होने में बस दो हफ्ते का अंतर है। कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया है कि ऐसा प्रधानमंत्री के कहने पर किया जा रहा है। कांग्रेस के आरोप को एक सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता। उसने वर्षों तक देश पर शासन किया है। हो सकता है कि कांग्रेस अपने पुराने अनुभवों के आधार पर इस तरह का आरोप लगा रही हो। फिर भी विश्वास नहीं होता कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक, स्वतंत्र संस्था प्रधानमंत्री या केंद्र सरकार के इशारे पर काम करेगी। यह जरूर है कि लोकतंत्र में परंपराओं का विशेष महत्व होता है। किसी विशेष परिस्थिति में ही परंपराओं की अनदेखी की जानी चाहिए। हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त ने सफाई दी है कि गुजरात में  बाढ़ के कारण सड़कें टूटी हैं और बचाव एवं राहत कार्य चल रहा है। लेकिन चुनाव आयोग की इस सफाई में ज्यादा दम नजर नहीं आता, शायद ही इस पर कोई विश्वास करेगा। इसमें दो राय नहीं है कि गुजरात चुनाव की घोषणा न होने का भाजपा को फायदा मिल सकता है। कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री की आगामी 16 अक्तूबर को गुजरात यात्रा आरंभ हो रही है और इस बात की पूरी संभावना है कि वह अपनी सभा में कई नई योजनाओं का शिलान्यास करेंगे। चूंकि चुनाव घोषणा के बाद यहां आदर्श चुनाव संहिता लागू हो जाती इसलिए गुजरात विधानसभा के चुनाव की तिथि को टाला गया है।

-अनिल नरेन्द्र

क्या इस बार गुजरात भाजपा के लिए वॉकओवर होगा

हिमाचल प्रदेश विधानसभा के चुनाव इसी महीने होने वाले हैं और अगले माह गुजरात के। गुजरात में विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार चरम पर आ रहा है। सत्ताधारी पार्टी भाजपा किसी भी तरह यह मौका नहीं खोना चाहती। पिछले महीने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने गुजरात का दौरा किया था, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दो दिवसीय दौरे के दौरान 12 हजार करोड़ रुपए की योजनाओं का उद्घाटन किया, शिलान्यास किया। अब वो 16 अक्तूबर को फिर से गुजरात जाने वाले हैं। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी लगातार गुजरात का दौरा कर रहे हैं। दोनों पार्टियों ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है। अगर हम हाल की कुछ घटनाओं पर नजर डालें तो क्या यह गुजरात की राजनीति पर असर डाल सकती हैं? अमित शाह के बेटे जय शाह अचानक विवादों में आ गए हैं। एक न्यूज वेबसाइट ने जय शाह की कंपनी का टर्नओवर एक साल के अंदर 16 हजार गुणा बढ़ने का दावा किया है। इसके बाद से विपक्षी दल इस मामले की जांच की मांग कर रहे हैं। कांग्रेस के प्रवक्ता कपिल सिब्बल ने वेबसाइट में प्रकाशित खबर का हवाला देते हुए आरोप लगाया है कि 2015-16 में जय शाह की कंपनी का सालाना टर्नओवर 50 हजार रुपए से बढ़कर 80.5 करोड़ रुपए तक पहुंचने की जांच होनी चाहिए। अमित शाह ने कांग्रेस को चुनौती दी है कि वह जय शाह के खिलाफ सबूत पेश करें, महज आरोप लगाने से काम नहीं चलेगा। पर देखना यह होगा कि विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा बनता है या नहीं? इसके अलावा गुजरात के आणंद जिले में एक अक्तूबर को गरबा आयोजन में शामिल होने पर एक समूह ने एक 19 वर्षीय दलित युवक प्रकाश सोलंकी की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। इससे पहले गांधी नगर जिले के कलोल के लिबोदरा गांव में मूछ रखने पर 17 और 24 साल के दो युवकों के साथ मारपीट हुई थी। दशहरे के दिन अहमदाबाद में 300 दलित परिवारों ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। इस घटना को लेकर सत्ताधारी भाजपा निशाने पर है। राज्य की कुल आबादी छह करोड़ 38 लाख के करीब है, जिनमें दलितों की आबादी 35 लाख 92 हजार के करीब है। यह जनसंख्या का 7.1 प्रतिशत है। गुजरात में अगस्त के महीने में हुए राज्यसभा चुनाव में अहमद पटेल की जीत से भाजपा को करारा झटका लगा था। पार्टी ने इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी लेकिन अंतिम समय में अहमद पटेल ने बाजी मार ली। भाजपा राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस को हराकर उसका मनोबल तोड़ना चाहती थी। अहमद पटेल की जीत के बाद गुजरात में कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल जरूर बढ़ गया है। गुजरात में पाटीदार आरक्षण का मामला अभी तक शांत नहीं हुआ है। पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के संयोजक हार्दिक पटेल राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं। वह अपनी मांगें मानने वाली किसी भी पार्टी के साथ जाने की बात कर चुके हैं। वहीं पाटीदारों में भाजपा को लेकर गुस्सा बना हुआ है। अमित शाह तक को पाटीदार युवाओं का विरोध झेलना पड़ा था। जैसे ही अमित शाह ने सभा को संबोधित करना शुरू किया वैसे ही कुछ युवाओं ने नारे लगाने शुरू कर दिए थे। इसके बाद हार्दिक पटेल ने आरोप लगाया था कि पुलिस ने उन युवाओं को पीटा है। आम आदमी पार्टी की हार्दिक पटेल से नजदीकियां बढ़ती दिख रही हैं। पाटीदारों का गुजरात में दबदबा रहा है। हालांकि पाटीदार आरक्षण मामले के बाद यह समुदाय सत्ताधारी पार्टी का विरोध करता रहा है। कांग्रेस से निकले शंकर सिंह बाघेला पाटीदारों का कुछ वोट अपनी ओर खींचने की कोशिश जरूर करेंगे। लेकिन आरक्षण न मिलने और हार्दिक पटेल को जेल होने को लेकर उपजी पाटीदारों की नाराजगी का नुकसान भाजपा को हो सकता है। एक जुलाई से लागू हुए वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के बाद देश में आर्थिक मंदी की खबरें लगातार आ रही हैं। गुजरात के कपड़ा व्यापारियों में जीएसटी लगने को लेकर नाराजगी बनी हुई है। सूरत में जुलाई में टेक्सटाइल ट्रेडर्स ने जीएसटी के विरोध में भव्य प्रदर्शन भी किया था। उन्होंने जीएसटी के कारण कपड़ा महंगे होने और व्यापार पर असर पड़ने की चिन्ता जताई थी। वहीं इस साल जून के अंत तक 682 टेक्सटाइल मिलें बंद हो गई थीं। बाजार में मंदी की वजह से बेरोजगारी बढ़ने और महंगाई की मार के चलते और भाजपा की गुजरात सरकार के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी फैक्टर की वजह से भाजपा की गुजरात में राह आसान नहीं होगी।

Sunday, 15 October 2017

रॉक स्टार से सुनारिया जेल ः सीन नम्बर दो

गुरमीत राम रहीम सिंह की फिल्मी कहानी तब शुरू हुई जब उन्हें दो साध्वियों से बलात्कार करने के आरोप में दोषी पाया गया और उन्हें 20 साल की सजा हुई। अब इसी फिल्म का दूसरा सीन देखने को मिल रहा है। गुरमीत राम रहीम की कथाकथित पुत्री व राजदार हनीप्रीत इंसा ने स्वीकार कर लिया है कि 25 अगस्त की पंचकूला हिंसा में उसकी अहम भूमिका थी। सूत्रों का कहना है कि तीन दिन की रिमांड बढ़ने के बाद हनीप्रीत थोड़ी टूटी है और उसने दंगे की साजिश में खुद के शामिल होने की बात कबूली है। सूत्र यह भी बता रहे हैं कि हनीप्रीत ने इस दौरान न केवल देशभर के डेरा समर्थकों बल्कि इंटरनेशनल कॉल के जरिये विदेश में रहने वाले डेरे के करीबियों से भी कई अहम जानकारियां साझा कीं। हालांकि सबूत न होने पर पुलिस अधिकारी इसकी पुष्टि करने से बच रहे हैं। पुलिस के सामने तमाम सच्चाई बयां करने की बात हनीप्रीत अदालत में भी कह चुकी है। छह दिनों की रिमांड के दौरान उसने टुकड़ों में गुनाह कबूले हैं, जिसके सबूत जुटाने में एसआईटी जुटी हुई है। पंचकूला पुलिस की एसआईटी के मुताबिक हनीप्रीत ने कबूला है कि 17 अगस्त को सिरसा डेरे में हुई मीटिंग की अध्यक्षता उसी ने की थी। इसी मीटिंग में ही पंचकूला में दंगों की साजिश रची गई थी। डेरा समर्थकों को पहले ही पंचकूला पहुंचने को कहा गया और सेक्टर-23 में तैयारी रखने को कहा गया। उपद्रवियों को एंट्री और बाहर निकलने का प्लान हनीप्रीत के लैपटॉप में तैयार हुआ। तय हुआ कि अहम रोल निभाने वाले वाट्सएप कॉलिंग के जरिये कांटैक्ट में रहेंगे, नॉर्मल कॉलिंग का प्रयोग नहीं करेंगे। डेरा सच्चा सौदा राम रहीम की राजदार हनीप्रीत इंसा ने माना है कि 25 अगस्त को अगर राम रहीम को कोर्ट से रिहा कर दिया जाएगा तो पंचकूला में सत्संग होगा। सारी प्लानिंग कोर्ट के फैसले पर टिकी थी। मैप पर मार्किंग करने, ब्लैक मनी से फंडिंग कराने, देश के खिलाफ वीडियो वायरल करने के साथ ही कई जुर्म कबूले हैं। दंगे में ब्लैक मनी का प्रयोग हुआ। इसे व्हाइट करने के लिए हनीप्रीत ने फर्जी दस्तावेज बनाने को कहा था। करीब पांच करोड़ रुपए हनीप्रीत ने चमकौर इंसा के हाथों खुद भिजवाए। हरियाणा पुलिस की रिमांड में हनीप्रीत ने कई खुलासे किए हैं। लैपटॉप, मोबाइल की जानकारी के बाद अब हनीप्रीत ने एक और बड़ा खुलासा किया है। दरअसल 25 अगस्त के दिन राम रहीम को पुलिस के चंगुल से छुड़ाने का एक बड़ा प्लान तैयार किया गया था। जिसके तहत उसे छुड़ाकर विदेश भेजना था। हालांकि हरियाणा पुलिस की मुस्तैदी के चलते यह प्लान कामयाब नहीं हो सका। राम रहीम को उम्मीद थी कि सुरक्षाकर्मी उसे पुलिस की गिरफ्त से छुड़वा लेंगे। फिर उसे सिरसा डेरा मुख्यालय या किसी सुरक्षित जगह पर पहुंचा दिया जाएगा। हनीप्रीत राम रहीम को विदेश भगाने की पूरी तैयारी कर चुकी थी। प्रतीक्षा कीजिए फिल्म के अगले सीन का।

-अनिल नरेन्द्र

आखिर आरुषि और हेमराज की हत्या तो हुई है

नौ साल पहले दुनियाभर को झकझोर देने वाला आरुषि-हेमराज हत्याकांड एक बार फिर चर्चा में है। सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा दोषी करार दिए गए आरुषि के माता-पिता को बृहस्पतिवार को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हत्याकांड के आरोपों से बरी कर दिया। अदालत के इस फैसले ने यह सवाल फिर से खड़ा कर दिया है कि आखिर दोनों की हत्या किसने और क्यों की? साढ़े चार साल तक राज्य पुलिस के साथ ही सीबीआई की दो टीमों ने जांच की। पांच लोग गिरफ्तार किए गए। पुलिस व सीबीआई की जांच में अलग-अलग नतीजे निकले और लगा कि शायद देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री से पर्दा उठ गया। पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राजेश और नूपुर तलवार को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। और तो और आरुषि मर्डर केस  पर अब तक दो फिल्में बन चुकी हैं। लेकिन दोनों फिल्में किसी नतीजे तक नहीं पहुंच पाईं। जनवरी 2015 में आई फिल्म रहस्य और उसी साल आई फिल्म तलवार में देश को झकझोरने वाली इस मर्डर मिस्ट्री के तमाम सिरों को पकड़ने का प्रयास किया गया था। मनीष गुप्ता निर्देशित फिल्म रहस्य में केके मेनन, टिस्का चोपड़ा और आशीष विद्यार्थी जैसे मंझे हुए कलाकारों ने अभिनय किया था तो तलवार की क्रिप्ट जाने-माने निर्देशक विशाल भारद्वाज ने महीनों की रिसर्च के बाद लिखी थी। फिल्म को मेघना गुलजार ने निर्देशित किया था। इनमें आरुषि मर्डर मिस्ट्री को रीक्रिएट करने का प्रयास किया गया था। मर्डर की रात क्या-क्या हुआ होगा, मर्डर में किन हथियारों का इस्तेमाल किया गया होगा, मामले कैसे खुले आदि बिन्दुओं के तह में जाने का प्रयास किया गया था, लेकिन दोनों फिल्में किसी नतीजे (कंक्लूजन) तक नहीं पहुंच सकीं। फिल्म रहस्य का तो तलवार दम्पति ने काफी विरोध भी किया था। बाद में मनीष गुप्ता ने सफाई देते हुए कहा कि फिल्म सस्पेंस ड्रामा है। इसका आरुषि मर्डर से सीधा ताल्लुक नहीं है। मर्डर मिस्ट्री पर पत्रकार अविरुक सेन की किताब आरुषि भी काफी चर्चा में रही। इस किताब में अविरुक सेन ने सीबीआई की जांच प्रक्रिया पर कई सवाल खड़े किए हैं और सिलसिलेवार इसे बयान किया है। दूसरी तरफ एक अन्य पत्रकार ने भी घटना पर कातिल जिन्दा हैöएक थी आरुषि नाम से किताब लिखी है। इसमें पूरी घटना की पड़ताल करने की कोशिश की गई है। 10वीं में पढ़ रही आरुषि 16 मई 2008 को अपने कमरे में मृत पाई गई थी और उसके अगले दिन डेंटिस्ट तलवार दम्पति के उसी घर की छत से उनके नौकर हेमराज का शव बरामद हुआ था। इस दोहरे हत्याकांड ने नोएडा की उस मध्यवर्गीय आवासीय कॉलोनी को ही नहीं, बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था और मीडिया ने इसे सनसनीखेज हत्याकांड को इतनी तवज्जो दी कि एकाधिक बार तो आईपीएल से भी कहीं अधिक रेटिंग इसकी रिपोर्टिंग को मिली। इलाहाबाद हाई कोर्ट की खंडपीठ में शामिल दो जजों ने अपना अलग-अलग फैसला सुनाया। आदेश में कहा गया कि सीबीआई इस हत्याकांड में नूपुर दम्पति की संलिप्तता संदेह से परे साबित करने में असमर्थ रही ः सिर्फ शक के आधार पर किसी को सजा नहीं दी जा सकती। संभावना है कि सीबीआई इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी क्योंकि असल सवाल तो आज भी बना हुआ है। शुरू से ही विचित्र मोड़ों के लिए चर्चित इस मामले में तीन-तीन जांचों के बावजूद बुनियादी सवालों के जवाब आज तक नहीं मिले। सच पूछा जाए तो तलवार दम्पति को न तो सजा देने का कोई पुख्ता सबूत था, न ही उन्हें निर्दोष मानने का कोई ठोस आधार। उनकी रिहाई सिर्फ न्यायशास्त्र के इस मूल सिद्धांत के तहत हुई है कि सौ अपराधी भले ही छूट जाएं पर एक भी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए। पर आरुषि और हेमराज की हत्या तो हुई है। सवाल वहीं का वहीं है कि हत्यारा या हत्यारे आखिर कौन हैं? क्या इस मर्डर मिस्ट्री से कभी भी पर्दा उठेगा?

Saturday, 14 October 2017

बढ़ती महंगाई और पिसती जनता

जब वस्तु एवं सेवा टैक्स यानि जीएसटी लगाया गया था तो कहा गया था कि इससे वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें घटेंगी। मगर इसके तो शुरुआती चरण में ही महंगाई पिछले पांच महीने के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। प्याज समेत सब्जियों एवं अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी के चलते अगस्त महीने में थोक मूल्य आधारित मुद्रास्फीति बढ़कर चार महीने के उच्च स्तर 3.24 प्रतिशत पर पहुंच गई। हालांकि अनेक आम उपभोक्ता वस्तुओं पर करों की दर काफी कम रखी गई है। इसके बावजूद खुदरा बाजार में वस्तुओं की कीमतें बढ़ी हैं। कहा जा रहा है कि जीएसटी का शुरुआती चरण होने की वजह से बहुत सारे खुदरा कारोबारी भ्रम में हैं और वे अपने ढंग से वस्तुओं की कीमतें बढ़ा रहे हैं। पर थोक मूल्य सूचकांक में महंगाई की दर बढ़कर 3.36 प्रतिशत पर पहुंच गई तो यह केवल भ्रम के चलते नहीं हुआ है। रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाली गैस, फलों व सब्जियों की कीमतें बढ़ी हैं, खानपान तैयार भोजन पर करों की दोहरी मार के चलते महंगाई बढ़ रही है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि केंद्रीय कर-प्रणाली लागू होने के बाद भी अगर महंगाई पर काबू नहीं पाया गया तो इससे पार पाने के क्या उपाय होने चाहिए? देश में अर्थव्यवस्था की सुस्ती ने समस्या और बढ़ा दी है। बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़ें परेशान करने वाले हैं। उद्योग बंद हो रहे हैं, बाजार में ग्राहक गायब हैं। त्यौहारों का सीजन सिर पर है और दुकानें खाली पड़ी हैं। आज या तो जनता के पास पैसे का अभाव है या फिर उनको महीने के खर्च पूरे करने के बाद कुछ पैसा बचता ही नहीं है। नोटबंदी के फैसले के बाद अनेक कारोबार पहले ही प्रभावित हो चुके थे। उसके बाद जीएसटी लागू होने से बहुत सारे कारोबारियों के लिए लालफीताशाही सिरदर्द बनी हुई है। सरकार थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर महंगाई का स्तर मामूली है, जबकि खुदरा बाजार में वस्तुओं की कीमतें उससे कई गुना ज्यादा होती हैं। जीएसटी परिषद कर-प्रणाली को व्यावहारिक बनाने का प्रयास अगर नहीं करेगा तो महंगाई और विकास दर दोनों को साधना कठिन बना रहेगा। बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी आज यह देश की जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल बने हुए हैं। सरकार को इस ओर जल्द ध्यान देना होगा क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में रोटी, कपड़ा और मकान आज भी प्राथमिकता रखते हैं।

-अनिल नरेन्द्र

18 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध रेप माना जाएगा

नाबालिग पत्नी के साथ संबंध बनाना अब दुष्कर्म यानि रेप माना जाएगा। भले ही संबंध पत्नी की सहमति से बनाए गए हों। अभी तक ऐसे मामलों में दुष्कर्म के आरोप से बचाने वाली आईपीसी की धारा 375(2) के अपवाद को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया है। इस अपवाद के तहत 15 से 18 साल तक से संबंध बनाना दुष्कर्म नहीं माना जाता था। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि 18 साल की उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना रेप माना जाएगा। कोर्ट के अनुसार नाबालिग पत्नी इस घटना के एक साल के अंदर शिकायत दर्ज कर सकती है। कोर्ट ने माना कि बलात्कार संबंधी कानूनों में अपवाद अन्य अधिनियमों के सिद्धांतों के प्रति विरोधाभासी है। यह बच्ची के अपने देह पर सम्पूर्ण अधिकार व स्वनिर्णय के अधिकार का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मदन बी. लोकुर और दीपक गुप्ता की बैंच ने बुधवार को सरकार की दलीलें खारिज करते हुए कहाöसंबंध बनाने के लिए तय 18 साल की आयु घटाना असंवैधानिक है। सरकार की दलील थी कि इस फैसले से सामाजिक समस्या पैदा होगी। बैंच ने यह फैसला एनजीओ इंडिपेंडेंट थॉट की याचिका पर दिया। कोर्ट ने कहा कि शादीशुदा नाबालिग लड़की वस्तु नहीं है। उसे गरिमा से जीने का हक है। संसद ने ही कानून बनाया है कि 18 साल से कम उम्र की छोटी बच्ची संबंधों की सहमति नहीं दे सकती। संसद ने ही बाल विवाह को भी अपराध माना है। उसी बच्ची का विवाह होने पर पति संबंध बनाए तो यह अपराध नहीं है? ये बेतुका है। जेजे एक्ट, पॉस्को, बाल विवाह कानून और आईपीसी को एक जैसा बनाएं। विशेषज्ञों का कहना है कि सभी धर्मों पर लागू होगा यह फैसला। पुराने मामलों में नहीं। यह फैसला बाल विवाह पर सीधा असर डालेगा। कानूनन लड़की के लिए 18 साल और लड़के के लिए 21 साल की उम्र विवाह के लिए तय है। वहीं परिवार कल्याण विभाग के सर्वेक्षण से उजागर होता है कि कानूनी पाबंदियों के बावजूद अभी भी 27 प्रतिशत नाबालिग बच्चियों के विवाह हो रहे हैं। इस फैसले का सीधा प्रभाव यह होगा कि मुकदमे और सजा के डर से लोग बच्चियों को अपनी बहू बनाने में संकोच करेंगे। देश के कई इलाकों में आज भी बाल विवाह प्रचलित है। खासकर लड़कियों की शादी कम उम्र में ही कर दी जाती है। 2016 के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक देश में तकरीबन 27 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र में हो जाती है। 2005 के नेशनल हेल्थ सर्वे में यह आंकड़ा तकरीबन 47 प्रतिशत था यानि सिर्फ 10 वर्षों में 18 साल से कम उम्र वाली लड़कियों की शादी में 20 प्रतिशत गिरावट आई है और नए कानून के डर से उम्मीद की जाती है कि इस प्रक्रिया में और तेजी आएगी। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश मानते हुए अब राज्य सरकारों को बाल विवाह रोकने के लिए कठोर कदम उठाने चाहिए। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2005 के अनुसार देश में  दो करोड़ 30 लाख बालिकावधु मौजूद हैं।

Thursday, 12 October 2017

हर लोकतंत्र में अपना जंतर-मंतर है

पिछले करीब ढाई दशक से जंतर-मंतर आंदोलनकारियों का केंद्र बना हुआ है पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के ताजा निर्देश के बाद जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन पर रोक लग जाएगी। एनजीटी ने जंतर-मंतर रोड पर धरना और प्रदर्शन करने पर स्थायी रोक लगाकर संदेश दिया है कि लोकतंत्र में काक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है। वह साफ-सुथरे और शांत जीवन के अधिकार से बड़ी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की एक शाखा के रूप में काम करने वाला एनजीटी प्रदूषण हटाने, पर्यावरण को बचाने और साफ-सफाई कायम रखने के आदेश देता रहता है। सरकारें कभी उसे लागू करती हैं और कभी मुंह फेर लेती हैं। इसके बावजूद एनजीटी का 1981 के वायु प्रदूषण कानून के उल्लंघन के आधार पर दिया गया यह आदेश तत्काल प्रभाव से लागू किया गया है। एनजीटी ने जिस कारण जंतर-मंतर को प्रदर्शनकारियों से मुक्त करने का निर्देश दिया है, उससे असहमत नहीं हुआ जा सकता। हमें अभिव्यक्ति की आजादी भी चाहिए और साफ-सुथरा पर्यावरण भी। लगातार लाउड स्पीकर चलने के कारण वहां ध्वनि प्रदूषण तो है ही, खुले में नहाने, पशुओं को बांधकर रखना तथा कूड़ा फेंकने के कारण समस्या भयावह हो गई है। पर यह भी मानना थोड़ा कठिन है कि प्रदर्शन स्थल को रामलीला मैदान में स्थानांतरित करना समस्या का समाधान है। बोट क्लब में आंदोलनकारियों द्वारा गंदगी फैलाने के कारण ही आंदोलनों का स्थान बदलकर जंतर-मंतर किया गया था। समस्या प्रदर्शनकारियों की इतनी नहीं है जितनी व्यवस्था की है। जिन लोगों पर जंतर-मंतर को साफ-सुथरा रखने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। एनजीटी के इस फैसले का विभिन्न संगठनों और प्रदर्शनकारियों ने विरोध किया है और इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। जंतर-मंतर पर डटे प्रदर्शनकारियों का कहना है कि एनजीटी ने जगह छोड़ने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। इसी दौरान वह अपनी कार्रवाई करेंगे। चूंकि नई पीढ़ी जंतर-मंतर को वेधशाला के बजाय आंदोलनकारियों के गढ़ के रूप में ज्यादा जानती है और अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर निर्भया के साथ हुए अत्याचार के खिलाफ आक्रोश जैसे अनेक आंदोलनों का जंतर-मंतर गवाह रहा है, लिहाजा उसे प्रदर्शनकारियों से मुक्त कराने का यह संदेश भी नहीं जाना चाहिए कि विरोध की आवाज को दबाया जा रहा है। सिर्फ यही नहीं कि संसद के नजदीक होने के कारण देश के किसी भी हिस्से से दिल्ली में अपनी आवाज लोगों तक पहुंचाने वाले लोग यहां आते हैं, बल्कि इस दौरान हमारी विद्रूप व्यवस्था का रूपक भी बन गया, जिसके एक कोने में अगर कोई वर्षों से शराब के खिलाफ आंदोलन कर रहा था तो कहीं पुलिस अत्याचार के खिलाफ एक महिला बैठी है। हर देश में ऐसा एक स्थान है जहां जनता अपनी आवाज उठा सकती है।

-अनिल नरेन्द्र