Sunday, 29 April 2012

सचिन और रेखा के तीर से कांग्रेस ने साधे कई निशाने

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 29 April 2012
अनिल नरेन्द्र
गुरुवार को राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने मनोनीत राज्यसभा सदस्यों की सूची पर हस्ताक्षर कर सचिन तेंदुलकर, फिल्म अभिनेत्री रेखा और कारोबारी अनु आगा को राज्यसभा सदस्य बना दिया। क्रिकेट के मैदान से शुरू हुई सचिन तेंदुलकर की पारी अब संसद तक पहुंच गई। किसी खेलते हुए खिलाड़ी को राज्यसभा के लिए मनोनीत करने का यह पहला मौका है। शतकों पर शतक लगाने के बाद सचिन को भारत रत्न दिए जाने की मांग उठती रही थी। गुरुवार को सचिन ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से उनके निवास 10 जनपथ पर मुलाकात की और तब से इस बात की अटकलें तेज हो गई थीं कि वह राज्यसभा में मनोनीत सदस्य के तौर पर आ सकते हैं। सोनिया ने गुरुवार को औपचारिक रूप से सचिन को इस बात का प्रस्ताव दिया जिसे वह मान गए। पार्टी सूत्रों का कहना है कि सचिन ने जब अपना सौवां अंतर्राष्ट्रीय शतक बनाया था तभी से कांग्रेस अध्यक्ष इन्हें बधाई देना चाहती थीं और गुरुवार को बधाई देने के बहाने उन्होंने सचिन के सामने राज्यसभा में आने का प्रस्ताव औपचारिक तौर पर रख दिया। सोनिया के साथ सचिन ने आधा घंटा बिताया। सचिन को राज्यसभा में मनोनीत कर कांग्रेस ने एक तीर से कई शिकार करने का प्रयास किया है। अब कांग्रेस ने उस विवाद को भी खत्म कर दिया कि ध्यान चन्द और सचिन को भारत रत्न दिया जाए। शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत ने कांग्रेस की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि कांग्रेस बिना स्वार्थ के किसी को कोई पद नहीं देती। ऐसे में सचिन को कांग्रेसी झांसे से सावधान रहना चाहिए। उनका मानना है कि कांग्रेस नेता महाराष्ट्र में अपनी राजनीति के लिए सचिन की लोकप्रियता को भुनाना चाहते हैं। टीम अन्ना की सिपहसालार किरण बेदी ने भी कहा कि सचिन को कांग्रेस के राजनीतिक जाल से बचकर रहना चाहिए। उन्हें समझना चाहिए कि केंद्र सरकार और कांग्रेस तमाम संकटों से घिरी है, ऐसे में वह सचिन का इस्तेमाल करना चाहती है जबकि सचिन तो पूरे देश के हीरो हैं। कांग्रेस की राजनीति की बात का `रेखा को मनोनीत करने पर' हमें आश्चर्य कम नहीं हुआ। मेरे पास तरह-तरह के एसएमएस आ रहे हैं। एक आया कि जो काम अमिताभ तमाम जिन्दगी नहीं कर सके वह कांग्रेस ने कर दिखाया। जया और रेखा को एक हाउस में लाकर बिठा दिया। एक अन्य आया हेमा, रेखा, जया और सुषमा सब की पसंद (निरमा) राज्यसभा। अब निरमा का अगला विज्ञापन राज्यसभा में बनेगा। समाजवादी पार्टी ने जया बच्चन को अपनी संख्या के बल पर यूपी के कोटे से राज्यसभा पहुंचाया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कभी कांग्रेस से जुड़े रहे और फिर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के हम सफर अमिताभ बच्चन को काउंटर करने के लिए कांग्रेस ने जो दांव चला है उसे रेखा के माध्यम से एक तीर से कई शिकार किए गए हैं। फिल्मी दुनिया से राज्यसभा सदस्यों को लाने की भले ही परम्परा और संवैधानिक व्यवस्था रही हो लेकिन इस कड़ी में सुनील दत्त एक ऐसी शख्सियत थे कि उनकी राजनीतिक सूझ-बूझ और कार्यकुशलता की आज भी मिसाल दी जाती है। तुलनात्मक दृष्टिकोण से रेखा अब 57 वर्ष की उम्र में राजनीतिक जमीन पर क्या देश के लिए एक मिसाल स्थापित कर पाएंगी? बहरहाल सचिन तेंदुलकर और रेखा को बधाई।
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पाक सुप्रीम कोर्ट का विवादास्पद फैसला

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Published on 29 April 2012
अनिल नरेन्द्र
हालांकि पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका और चुनी हुई सरकार में टकराव टालने का प्रयास करते हुए प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को गुरुवार को अदालत की अवमानना का दोषी तो ठहराया पर कोर्ट ने उन्हें `अदालत के उठने तक' यानि सुनवाई के समापन तक कक्ष में मौजूद रहने की सांकेतिक सजा सुनाई पर इससे हमें नहीं लगता कि यह विवाद यहीं खत्म होगा। यह सांकेतिक सजा सिर्प 30 सैकेंड की थी पर इस 30 सैकेंड ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। कानून का कद कभी भी अवाम से बड़ा नहीं हो सकता। दरअसल कानून बनाया ही अवाम की सहूलियत के लिए जाता है। हमारा मानना है कि पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री गिलानी को सजा देकर कोई अच्छा उदाहरण पेश नहीं किया है। अदालत को यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रधानमंत्री भी चुनी हुई सरकार का प्रतिनिधि और पाकिस्तान में जम्हूरियत का प्रतीक है। यूसुफ रजा गिलानी की हिम्मत की दाद देनी होगी, आज भी वह अपने स्टैंड पर कायम हैं। अभी भी मूल मुद्दा वहीं टिका हुआ है कि प्रधानमंत्री इस बात के लिए तैयार नहीं हैं कि वे राष्ट्रपति जरदारी के खातों की जांच के लिए स्विटजरलैंड के अधिकारियों को पत्र लिखें। अगर प्रधानमंत्री इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से समझौता करते हैं तो सम्भव है कि उनकी सरकार अविलम्ब गिर जाए। प्रधानमंत्री अगर नहीं मानते तो सुप्रीम कोर्ट कहीं ज्यादा सख्त कदम उठा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा था कि जरदारी को भ्रष्टाचार के खिलाफ मामलों में जो माफी पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने दी थी, वह गैर कानूनी तौर पर मान्य नहीं है, इसलिए प्रधानमंत्री गिलानी को स्विटजरलैंड सरकार को चिट्ठी लिखनी चाहिए। सरकार सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश नहीं मान सकती। 2007 में सैनिक राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस चौधरी इफ्तिखार मोहम्मद को बर्खास्त कर दिया था। उसके कुछ समय बाद वे वापस बहाल किए गए पर कोर्ट के तमाम पुराने मुलाजिम बदल दिए गए और ऐसे ही लोग रखे गए जो यह फैसला सुना सकें कि जनरल मुशर्रफ वहां राष्ट्रपति का चुनाव लड़ सकें। एक सैनिक राष्ट्रपति के हाथों इस तरह अपमानित होने के बाद से पाकिस्तान की न्यायपालिका उस अवसर की तलाश कर रही थी, जब वह फिर से अपनी ताकत दिखा सके। पाकिस्तान सरकार की रणनीति अब यही है कि सुप्रीम कोर्ट कोई ज्यादा सख्त कदम उठाए तो वह लोकतंत्र के पक्ष में शहादत के मुद्दे पर जनता की सहानुभूति पाए। सुप्रीम कोर्ट भी सरकार की इस रणनीति से वाकिफ है, इसलिए उसकी कोशिश है कि अगले चुनावों तक इस प्रकार की विश्वसनीयता इतनी कम हो जाए कि वह चुनाव नहीं जीत सके। इस लड़ाई में न्यायपालिका को पाक सेना का पूरा समर्थन हासिल है। फिलहाल राहत की बात यह है कि सेना खुद सत्ता सीधे नहीं हथियाना चाहती। पाकिस्तानी सेना के सबसे करीबी अमेरिका भी यह नहीं चाहता कि पाक में लोकतंत्र हटे। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को इतना बढ़ाया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से पाक संसद भी शायद ही सहमत हो। जरदारी की यह सरकार पांच वर्ष पूरा करने जा रही है। यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है। संसद के चुनाव निकट भविष्य में होने वाले हैं। बेहतर होता कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले को अवाम की अदालत पर छोड़ देता। बेहतर होता कि इस मामले में गिलानी की तीन बार कोर्ट में उपस्थिति को ही इस बात का सुबूत मान लेता कि निर्वाचित सरकार न्यायपालिका का सम्मान करती है और उसने अपनी भूल समझ ली है। सजा देकर कोर्ट ने अपने अहंकार का एक तरह से सुबूत ही दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि उसके इस कदम से पाकिस्तान में गैर लोकतांत्रिक ताकतों को फिर से लामबंद होने का मौका मिलेगा और दांव पर सिर्प जरदारी सरकार ही नहीं खुद न्यायपालिका और पाकिस्तानी अवाम का भविष्य भी होगा।
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Saturday, 28 April 2012

अगले राष्ट्रपति की रेस शुरू हो चुकी है

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Published on 28 April 2012
अनिल नरेन्द्र
बजट सेशन के दूसरे सत्र की शुरुआत के साथ ही राष्ट्रपति चुनाव की चर्चा जोर पकड़ने लगी है। देश के सर्वोच्च पद पर इस बार कौन बैठेगा? राजनीतिक दलों ने अभी से एक-दूसरे को टटोलना शुरू कर दिया है। पार्टियां राष्ट्रपति चुनाव को अपने शक्ति प्रदर्शन का लिटमस टेस्ट मान रही हैं। वर्तमान राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का कार्यकाल जुलाई के अंतिम हफ्ते में पूरा हो रहा है। फरवरी-मार्च महीने में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम और फिर उसके ठीक बाद 58 राज्यसभा सीटों के लिए एक साथ चुनाव होने के बाद राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलने लगे। राजनीतिक परिणाम गैर कांग्रेस, गैर बीजेपी दलों के पक्ष में अधिक रहे और इससे थर्ड फ्रंट की दिशा में काम कर मुलायम सिंह यादव और ममता बनर्जी जैसे नेता सक्रिय हो गए। वहीं एनसीपी नेता शरद पवार ने भी संकेत दिया है कि वे भी अपनी बात मजबूती से रखेंगे। तथाकथित थर्ड फ्रंट के नेताओं को सक्रिय होते देख दोनों कांग्रेस और भाजपा भी अब अपनी-अपनी पसंद आगे बढ़ाने में जुट गए हैं। कांग्रेस हाई कमान ने यूपीए के उम्मीदवार को ही रायसीना हिल्स पहुंचाने की मुहिम का आगाज कर दिया है। यह शुरुआत सोनिया गांधी ने एनसीपी नेता शरद पवार से की है। भले ही कांग्रेस के उम्मीदवार के नाम पर कोई खुलासा नहीं हुआ है, मगर कयास है कि `नम्बर गेम' देखते हुए प्रणब मुखर्जी कांग्रेस का चेहरा हो सकता है। कांग्रेस जानती है कि उनके नाम पर गैर एनडीए दलों को भी राजी किया जा सकता है। अगर सपा, बसपा, तृणमूल का साथ कांग्रेस को मिल जाता है तो कांग्रेस अपना उम्मीदवार जिता सकती है। किसी कांग्रेसी उम्मीदवार पर सहमति नहीं बनने की स्थिति में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को ही यूपीए का राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाने का बैकअप प्लान तैयार है। भारतीय जनता पार्टी की पहली पसंद पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम हो सकती है। इस मसले पर भाजपा ने अपने घटक दलों के साथ गैर यूपीए अन्य सियासी दलों का मन टटोलने की प्रक्रिया धीरे-धीरे शुरू कर दी है। भाजपा कलाम के अलावा किसी दूसरे नाम पर उसी सूरत में विचार करेगी जब उसे जीतने के लिए जरूरी समर्थन उनके नाम पर मिलता नजर नहीं आए। राष्ट्रपति चुनाव की घड़ी को भले ही समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव बहुत दूर बता रहे हों, लेकिन पार्टी अपना होमवर्प पूरा करने में जुटी हुई है। 2014 में लोकसभा की चुनावी जंग पर नजर रखते हुए सपा पूरी शिद्दत के साथ मुस्लिम उम्मीदवार की खोज कर रही है। इसी क्रम में मुलायम के निर्देश पर सपा के दो आला नेताओं ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी से गुप्त मुलाकात की थी। दूसरी ओर सपा की पसंदीदा सूची में अब्दुल कलाम का नाम लगभग बाहर हो चुका है। कुरैशी के साथ हामिद अंसारी के नाम पर भी सपा में गम्भीरता से विचार चल रहा है। कांग्रेस में और भी कई नाम चल रहे हैं। एक धड़ा लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार को जाति के समीकरणों को देखते हुए आगे बढ़ा रहा है और डॉ. कर्ण सिंह, सुशील शिंदे, फारुख अब्दुल्ला और सैम पित्रोदा जैसे नाम भी उछाले जा रहे हैं। रेस आरम्भ हो चुकी है। फिलहाल यह भविष्यवाणी नहीं की जा सकती कि भारत का अगला राष्ट्रपति कौन होगा।
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भारत की मिसाइल लेडी उर्प अग्नि पुत्री टेसी

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Published on 28 April 2012
अनिल नरेन्द्र
टेसी थामस अब भारत की मिसाइल लेडी के नाम से जानी जाएगी। अग्नि-5 सुपर पॉवर मिसाइल का सफल परीक्षण
19 अप्रैल को हो चुका है। 5000 किलोमीटर तक मार करने वाली अंतर्महाद्वीपीय मिसाइल तैयार करके भारत ने एक नया इतिहास तो रचा ही साथ-साथ दुनिया को भारत को एक नए चश्मे से देखने का काम भी किया है। इस कामयाबी का बड़ा श्रेय डिफेंस रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) की अग्नि परियोजना की निदेशक टेसी थामस को जाता है। 48 वर्षीय टेसी का सपना है कि एक ऐसी अग्नि मिसाइल तैयार की जाए जो अब तक दुनिया में न बनी हो। टेसी की टीम अग्नि-5 की सफलता के बाद एक ऐसी मिसाइल बनाने के काम में जुटने वाली है, जिससे निकला वार हैड निशाने पर पहुंचकर कामयाबी की रिपोर्ट भी बेस लैब में देखी जा सके। टेसी का जन्म 1964 में केरल के अलपुझा जिले में हुआ था। उनके पिता एक फर्म में एकाउंटेंट थे। बचपन से ही टेसी ने रॉकेट बनाने का सपना देखना शुरू कर दिया था। इसकी वजह थी कि अलपुझा के पास ही डीआरडीओ का एक रॉकेट सेंटर है। जहां से प्रयोग के तौर पर रॉकेट लांच होते रहते हैं। वे 1988 में अग्नि टीम में शामिल हुईं। त्रिशूर इंजीनियरिंग कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद 1985 में टेसी डीआरडीओ से जुड़ गई थीं। बाद में उन्होंने पुणे के डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस टेक्नोलॉजी से `गाइडिड मिसाइल' तकनीक में एम.टेक की डिग्री ली। टेसी याद करती हैं कि अग्नि-3 का पहला प्रयोग असफल रहा था। इस दौर में मिसाइल परियोजना के प्रमुख डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम थे। टेसी कहती हैं कि मिसाइल क्षेत्र में डॉ. कलाम ही सबके रोल मॉडल होते थे। वे तो डॉ. कलाम को अपना गुरु मानती हैं। कहती हैं कि आज भले लोग उन्हें अग्नि पुत्री या मिसाइल वूमैन कहें लेकिन मिसाइल तकनीक के वास्तव हीरो तो डॉ. कलाम ही हैं। टेसी अपनी 75 वर्षीया मां को अपना सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत मानती हैं। उनका नाम उनकी मां ने नोबल पुरस्कार विजेता मदर टेरेसा के नाम से प्रेरित होकर रखा था। टेसी कहती भी हैं कि जिस तरह से मदर टेरेसा ने पूरी मानवता के लिए काम किया था, ठीक उसी तरह से वे भी देश की भलाई के काम के लिए जुटी हुई हैं। जब उनसे यह पूछा गया कि मिसाइलों का प्रयोग तो विध्वंस और विनाश के लिए ही होगा, तो ऐसे में आप अपने काम को मानवता की शांति से कैसे जोड़ पाती हैं? इस पर उनका जवाब था कि जब कोई देश ताकतवर बन जाता है तो दूसरा देश उसके खिलाफ युद्ध करना तो दूर, उसे आंख तक दिखाने की हिम्मत नहीं करता। ऐसे में परोक्ष रूप से अग्नि-5 जैसी मिसाइलें `शांतिदूत' की भूमिका निभाती हैं। उल्लेखनीय है कि अग्नि-5 की रेंज में पूरा चीन आ जाता है। इस तरह से सामरिक क्षेत्र में इस सफलता के बाद से भारत को एक नई ताकत मिल गई है। अब वह मिसाइल क्षेत्र में अमेरिका, फ्रांस, रूस और चीन की बराबरी पर खड़ा हो गया है। इस सफल प्रयोग के बाद चीन की भाषा भी बदल गई है और अब वह भारत को अपना पड़ोसी मित्र देश कहने लगा है।

Friday, 27 April 2012

राजधानी के बच्चियों के सौदागरों का धंधा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27 April 2012
अनिल नरेन्द्र
राजधानी दिल्ली में छोटी बच्चियों के सौदागरों ने आफत मचा रखी है। पिछले दिनों ऐसी उठाई गई आठ बच्चियों को छुड़ाया गया। एक एजेंसी ने छापा मारकर जिन आठ बच्चियों को छुड़ाया तो उन्होंने अपनी आपबीती चाइल्ड वैलफेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी) को बताई। इसके बाद सीडब्ल्यूसी ने पुलिस को निर्देश दिया कि इन लड़कियों से मिले सुरागों के आधार पर प्लेसमेंट एजेंसियों और ट्रेफिकिंग रैकेट में शामिल लोगों की पहचान की जाए और उन पर कार्रवाई की जाए। सीडब्ल्यूसी, लाजपत नगर ने पुलिस को निर्देश दिया है कि ट्रेफिकिंग के जाल में फंसी बाकी बच्चियों को भी छुड़ाया जाए। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों सीडब्ल्यूसी के निर्देश पर दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक प्लेसमेंट एजेंसी पर छापा मारकर आठ बच्चियों को आजाद कराया था। इन बच्चियों को पश्चिम बंगाल के अलग-अलग गांवों से ट्रेफिकर्स यहां लाए थे। प्लेसमेंट एजेंसी ने इन्हें नौकरानी के काम पर लगा दिया था। आरोप है कि वहां इनका शोषण हो रहा था। सूत्रों के मुताबिक कम से कम 20 बच्चियां इनके जाल में हैं। वसंत विहार जैसे पॉश इलाके से पिछले दिनों एक आठ साल की बच्ची को एक घर से छुड़ाया गया। यह बच्ची वहां नौकरानी थी। बटरफ्लाई चाइल्ड हेल्पलाइन ने वसंत विहार थाने में इस बारे में शिकायत दर्ज की थी। एडीशनल डीसीपी (साउथ) प्रमोद कुशवाहा ने बताया कि बच्ची बिहार के छपरा की रहने वाली है। जिस घर से बच्ची को छुड़ाया गया है, उसके मालिक का कहना है कि बच्ची उनकी दूर की रिश्तेदार है और 10 दिन पहले ही उसकी दादी उसे वहां छोड़कर आई थी। छुड़ाई गई आठ लड़कियों को सीडब्ल्यूसी के सामने पेश किया गया। दो लड़कियों ने साफ बताया कि उनके साथ बहुत कूरता की गई। उन्होंने कहा कि एम्प्लायर ने उन्हें फिजिकली अब्यूज किया और ये यौन प्रताड़ना की शिकार बनीं। प्लेसमेंट एजेंसी के मालिक के खिलाफ भी शिकायत है कि उसने बच्चियों को कोई मेहनताना भी नहीं दिया। एक लड़की ने बताया कि मालवीय नगर में जहां वह काम करती थी, उसका मालिक उसे छोटी-छोटी बातों पर पीटता था। उसे कभी पैसा नहीं दिया। दूसरी लड़की ने बताया कि उसे बुरी तरह मारा जाता था। उसने दाईं आंख पर चोट के निशान भी दिखाया। उसने बताया कि किस तरह मालिक का बेटा कई बार उसके शरीर को छूता था। जब कोई घर में नहीं होता था तो वह मुझे अपने कमरे में बुलाता था। जब मैंने यह सब करने से मना कर दिया तो उसने बुरा बर्ताव शुरू किया। मैंने डर के मारे किसी को कुछ भी नहीं बताया। एक नाबालिक लड़की जो मेड का काम करती थी, उसको पुलिस और बचपन बचाओ आंदोलन कार्यकर्ताओं ने गीता कॉलोनी से हाल में छुड़ाया। इलाके के घर में नौकरानी का काम करने वाली पर मालिक का डर इतना हावी था कि उसने चार साल पहले अपनी मां को ही पहचानने से इंकार कर दिया। बुधवार को जब वह अपने परिवार से मिली तो उसके आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। राजधानी में मेडों के नाम पर ट्रेफिकिंग का धंधा फलफूल रहा है और इनमें कुछ प्लेसमेंट एजेंसियों का बहुत बड़ा हाथ है। इसे कैसे रोका जाए, यह पुलिस के अलावा मां-बाप और समाज की भी जिम्मेदारी बनती है।
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और अब डीजल भी लगा सकता है आग

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Published on 27 April 2012
अनिल नरेन्द्र
देश की जनता को अब डीजल की कीमतों में वृद्धि के लिए तैयार हो जाना चाहिए। सरकार ने पेट्रोल की तरह डीजल की कीमतें भी सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने की तैयारी कर ली है यानि अब आम आदमी खासकर किसानों को महंगा डीजल मिलेगा। सरकार ने ऐलान किया है कि डीजल को नियंत्रण से मुक्त किया जाएगा। इस फैसले को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी गई है, लेकिन इसे लागू करने की तारीख का संकेत नहीं दिया गया है। वित्त राज्यमंत्री नमो नारायण मीणा ने राज्य सरकार को यह जानकारी दी। मीणा ने एनके सिंह द्वारा पूछे गए सवाल के लिखित उत्तर में सदन को बताया कि सरकार ने डीजल की कीमतों को बाजार द्वारा निर्धारित करने पर सिद्धांत अपनी सहमति दे दी है। हालांकि अभी इसे अमल में नहीं लाया गया है। लेकिन रसोई गैस की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किए जाने का अभी कोई प्रस्ताव नहीं है। हालांकि मीणा ने इस सन्दर्भ में सरकार की प्रतिबद्धता भी बताई। उन्होंने कहा कि सरकार अंतर्राष्ट्रीय तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और घरेलू महंगाई की स्थिति में आम आदमी को बचाने के लिए डीजल की खुदरा कीमतों को ठीक करने का प्रयास जारी रखेगी। जैसे ही मीणा ने यह जवाब दिया इसकी प्रतिक्रिया हो गई। विपक्षी दलों के साथ ही सहयोगी दलों की भृकुटियां तन गईं। सबसे पहले भाजपा ने इसकी आलोचना की। पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने कहाöऐसा लगता है कि सरकार बहुत जल्द ही डीजल की कीमत बढ़ाने जा रही है। सरकार के इस तरह के किसी कदम का भाजपा पूरा विरोध करेगी। इससे न सिर्प यात्रा खर्च बढ़ेगा बल्कि दूसरी चीजों में भी तेजी आएगी। भाजपा के बाद संप्रग की सहयोगी तृणमूल कांग्रेस ने भी साफ कर दिया कि वह पेट्रो मूल्य वृद्धि पर अपने अड़ियल रुख में कोई बदलाव नहीं करने जा रही है। पार्टी सांसद राय ने कहा कि डीजल की कीमत तय करने का अधिकार तेल कम्पनियों को देने का विरोध किया जाएगा। दरअसल डीजल मूल्य विनियंत्रण का सैद्धांतिक फैसला पिछले वर्ष जून में ही हो गया था, लेकिन विरोध के चलते इस पर कभी अमल नहीं हुआ। डीजल की कीमत अभी भी सरकार ही तय करती है। यही वजह है कि सरकारी तेल कम्पनियां डीजल को 12 रुपये प्रति लीटर के घाटे में बेच रही हैं। घाटे से आजिज आकर तेल कम्पनियों ने धमकी दी है कि या तो कीमत बढ़ाने की इजाजत दी जाए वरना आगे ईंधन की आपूर्ति करना सम्भव नहीं होगा। राजनीतिक वजहों, खासकर पांच राज्यों के बीते विधानसभा चुनावों के कारण संप्रग सरकार दिसम्बर 2011 के बाद से पेट्रोलियम पदार्थों में कोई मूल्यवृद्धि नहीं कर पाई है। अब सरकार बजट सत्र की समाप्ति के बाद पेट्रोलियम उत्पादों की खुदरा कीमत बढ़ाने की इजाजत तेल कम्पनियों को देना चाहती है। लेकिन लगता नहीं कि उसके लिए अब भी ऐसा करना आसान होगा। डीजल सारे जनमानस को प्रभावित करेगा। किसान से लेकर पब्लिक ट्रांसपोर्ट, रेलवे इत्यादि सभी सीधे प्रभावित होंगे। सरकार को कोई भी फैसला करने से पहले सारे पहलुओं पर गम्भीरता से विचार करना बेहतर होगा। एक बार डीजल को सरकारी नियंत्रण से हटा लिया तो स्थिति बिल्कुल बेकाबू हो सकती है।
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Thursday, 26 April 2012

बुरे फंसे सिंघवी ः इधर पुंआ तो उधर खाई

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 26 April 2012
अनिल नरेन्द्र
संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण शुरू होने से पहले ही कांग्रेस पार्टी ने पार्टी प्रवक्ता तेज-तर्रार अभिषेक मनु सिंघवी से सोमवार को संसदीय समिति के चेयरमैन और कांग्रेस प्रवक्ता से इस्तीफा ले लिया। पार्टी ने अपनी और सरकार की फजीहत बचाने का प्रयास किया है। अश्लील वीडियो देखने के मामले में पहले से बदनाम भारतीय जनता पार्टी को अब कांग्रेस से बदला लेने का मौका मिल गया है। अभिषेक मनु सिंघवी सीडी के मामले में बुरी तरह फंस गए हैं। सिंघवी से संबंधित एक सीडी 10 दिन पहले सोशल मीडिया पर जारी की गई थी। इसमें वे कथित तौर पर किसी महिला के साथ आपत्तिजनक स्थिति में दिखाए गए हैं। सीडी में दिखाई गई महिला वकील बताई गई है। इसके मुताबिक सिंघवी ने उसे जज बनवाने का लालच देकर उसके साथ संबंध बनाए। सीडी के प्रसारण पर दिल्ली हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है पर इंटरनेट पर यह सीडी खूब चल रही है। कहा जा रहा है कि सिंघवी के ड्राइवर ने यह सीडी बनाई। बाद में उसने सीडी से छेड़छाड़ किए जाने की बात भी मानी। सिंघवी ने इस मामले में सफाई देते हुए कहा कि मैंने इस्तीफे का फैसला अपने बारे में वितरित की जा रही सीडी को लेकर संसद की कार्यवाही में व्यवधान होने की आशंकाओं को खत्म करने की खातिर लिया है। मुझ पर लगे सभी आरोप पूरी तरह से निराधार और झूठे हैं। सीडी पर अटकलें लगाने के बजाय लोगों को निजता का सम्मान करना चाहिए। बेशक सिंघवी ने इस्तीफा तो दे दिया है पर हमें नहीं लगता कि कांग्रेस की फजीहत इतनी आसानी से खत्म होगी। सिंघवी ने स्वेच्छा से इस्तीफा नहीं दिया, उन्हें ऐसा करने पर मजबूर किया गया। बजट सत्र के दूसरे चरण में सरकार पहले से ही दबाव में है और वह एक और सिरदर्द नहीं बढ़ाना चाहती पर भाजपा पहले से झेल रही सीडी प्रकरण (कर्नाटक विधानसभा) भला ऐसा मौका अपने हाथ से कैसे जाने देती? भाजपा नेता व राज्यसभा में नेता विपक्ष अरुण जेटली इस मामले में राज्य सभापति हामिद अंसारी से मिले और उन्होंने सभापति को कहा कि ऐसा व्यक्ति किसी संसदीय समिति का चेयरमैन नहीं रह सकता जिस पर बेहद आपत्तिजनक आरोप लग रहे हों। यह संदेश कांग्रेस के फ्लोर मैनेजरों तक भी पहुंचाए गए। भाजपा ने दोतरफा तरीके से सरकार और कांग्रेस को संसद में घेरने की रणनीति बनाई है। भाजपा नेताओं का कहना है कि अगर कांग्रेस ने सांसद के इस तर्प को मान लिया कि सीडी सही नहीं है और इसके साथ छेड़छाड़ की गई है और उनका ड्राइवर ब्लैकमेल कर रहा है तो यह मामला संसदीय विशेषाधिकार नियमों के तहत जांच की परिधि में आ जाता है। इसके मुताबिक किसी संसद सदस्य के साथ इस तरह का आचरण अवमानना की परिधि में आता है। दूसरी तरफ सीडी के कथित रूप से किसी को जज बनवाने के वादे का आरोप सही है तो यह मामला सदन की एथिक्स कमेटी के पास भेजा जाना चाहिए। सिंघवी के इस्तीफे के बाद भी भाजपा इस मामले को छोड़ने को तैयार नहीं है। जेटली ने कहा कि वह संसद में यह मामला जरूर उठाएंगे। संसद सदस्य होने की हैसियत से श्री सिंघवी को यह बताना पड़ सकता है कि उन्होंने इस्तीफा किस वजह से दिया है। संसद सदस्य होने की वजह से सिंघवी की यह निजी जीवन का तर्प इसलिए ढेर हो सकता है कि वह सार्वजनिक जीवन में हैं और इसके चलते ऐसा मामला प्राइवेट नहीं हो सकता। चूंकि वह सार्वजनिक जीवन में हैं, इसी वजह से संसद की विधि मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष बनाए गए थे। इसलिए संसद को यह जानने का अधिकार है कि वह ऐसा कौन-सा निजी कारण है जो उनके सार्वजनिक जीवन को प्रभावित कर रहा है? दूसरी ओर अगर वह कहते हैं कि यह सीडी उन्हें बदनाम करने या उनकी प्रतिष्ठा को समाप्त करने के लिए किसी ने गलत तरीके से बनाई है तो यह किसी भी सांसद के विशेषाधिकार हनन का सीधा मामला है और अगर सीडी सच्ची है तो यह संसद की शिष्टाचार समिति का मामला बनता है जिसमें किसी भी सांसद के सार्वजनिक जीवन में आने पर सामाजिक व्यवहार का संज्ञान लिया जाता है। वैसे अगर सिंघवी को इससे संतोष होता है कि उनकी सेक्सी सीडी यू ट्यूब में डालने वाले शख्स ने दावा किया है कि उसके पास गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की रूसी वेश्या के साथ सेक्स सीडी है जिसे वह तब जारी करेगा जब सिंघवी को कांग्रेस से निकाला नहीं जाएगा। बुरे फंसे सिंघवी `इधर पुंआ तो उधर खाई।
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...और फिर पड़ी फूट टीम अन्ना में

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Published on 26 April 2012
अनिल नरेन्द्र
टीम अन्ना में फूट पड़ चुकी है। टीम अन्ना की कोर कमेटी की बैठक में रविवार को जमकर हंगामा हुआ। रविवार को नोएडा के सेक्टर-43 में टीम की कोर कमेटी की बैठक हुई। बैठक का एजेंडा था आंदोलन की रणनीति तैयार करना। इसमें बाबा रामदेव के साथ साझा आंदोलन पर भी चर्चा होनी थी। टीम अन्ना की कोर कमेटी की इस अहम बैठक में अरविन्द केजरीवाल, प्रशांत भूषण, किरण बेदी, एकमात्र मुस्लिम चेहरा मौलाना शमून कासमी, गोपाल राय, मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास मौजूद थे। रामदेव के साथ आंदोलन के सवाल पर किरण बेदी कहाöजब बुरे लोग साथ आ सकते हैं तो अच्छे लोग क्यों नहीं? इस पर कासमी ने कहा कि महत्व कम होने की आशंका केजरीवाल को है। इसलिए आपत्ति उन्हें ही ज्यादा है। बहस चल ही रही थी कि कोर कमेटी के सदस्य गोपाल राय की नजर शमून कासमी पर गई। वे मोबाइल पर बातें कर रहे थे, राय ने कासमी से मोबाइल मांगा, अलग कमरे में जाकर चैक करने पर बैठक की उपलिकिंग मिली। प्रशांत भूषण ने कासमी से पूछा कि आखिर आपने ये रिकार्डिंग क्यों की? इस पर कासमी चुप रहे। भूषण ने उन्हें टीम से हटने और बैठक से बाहर जाने को कहा। कासमी बिना किसी प्रकार की सफाई दिए शाम 4 बजे बैठक से उठकर चले गए। कुमार विश्वास ने बाद में कहा कि कासमी बैठक का ऑडियो रिकार्ड करते रंगे हाथों पकड़े गए हैं। प्रशांत भूषण ने कहा कि सभी रिकार्ड करने की कोई खास वजह नहीं बता पाए। अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि अग्निवेश की तरह रंगे हाथों पकड़े गए कासमी। शाजिया इल्मी ने कहा कि विश्वासघात करने पर टीम से हटा दिया गया है। उधर मौलाना शमून कासमी ने कहा कि मैं शुरुआत से ही आंदोलन से जुड़ा रहा हूं। केजरीवाल अन्ना का इस्तेमाल कर रहे हैं। आंदोलन मुस्लिम विरोधी हो रहा है। एक मुस्लिम को ये देखना नहीं चाहते। अन्ना हजारे भी कसम खाने लगे हैं अब। कोर कमेटी की बैठक में जो हुआ, वह पहले से ही तय था। उन्होंने कहा कि अन्ना का आंदोलन राजनीति और सांप्रदायिकता का शिकार हो गया है। वे खुद ही कोर कमेटी छोड़ रहे हैं। कासमी ने टीम अन्ना के कई सदस्यों पर सनसनीखेज आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि कोर कमेटी की बैठक में अरविन्द केजरीवाल और कुमार विश्वास के बीच जोरदार झड़प हुई। विश्वास पर राज्य सरकार की दलाली का आरोप लगाया गया। खुद अन्ना ने केजरीवाल के हिमाचल दौरे पर सवाल उठाए। उन्होंने यह भी कहा कि प्रशांत भूषण और कुछ अन्य सदस्य चुनाव लड़ना चाहते हैं। हालांकि केजरीवाल ने इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया देने से इंकार करते हुए कहा कि निकाले जाने की वजह से कासमी इस तरह की अनर्गल बात कर रहे हैं। अन्ना के आंदोलन में भीतरघात का यह दूसरा मौका है। इससे पहले पिछले साल जब जन लोकपाल आंदोलन चरम पर था, उसी दौरान स्वामी अग्निवेश पर भी सरकार के लिए जासूसी करने का आरोप लगा था। कासमी और अग्निवेश के अलावा पीवी राजगोपाल और जल पुरुष राजेन्द्र सिंह भी टीम अन्ना से अलग हो चुके हैं। दुःख से कहना पड़ता है कि अन्ना हजारे की चमक दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है, वह बात नहीं रही।
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Wednesday, 25 April 2012

थाली से गायब होती सब्जियां असल कारण?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25 April 2012
अनिल नरेन्द्र
महंगाई बढ़ती ही जा रही है। जनता को दो वक्त की रोटी खाने में भी अब मुश्किल हो रही है। तमाम सब्जियों के रेट आसमान पर जा पहुंचे हैं। आम आदमी का सारा किचन बजट बिगड़ चुका है। आमतौर पर जब गर्मी बढ़ती है तब सब्जियों के रेट बढ़ते थे लेकिन इस बार अप्रैल में सब्जियों के दाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं। 15 दिन पहले तक 12 रुपये से 14 रुपये किलो बिकने वाला आलू 18 रुपये तक में बिक रहा है। जो लोग 25 से 28 रुपये किलो तक टमाटर खरीद रहे थे, उसके रेट अब 55 से 60 रुपये किलो हो चुके हैं। भिण्डी और टिण्डे जैसे सब्जियों के दाम 75 रुपये से 100 रुपये किलो के बीच हैं। गौरतलब है कि राजधानी की थोक बाजार वाली सब्जी मण्डी में पिछले एक माह में विभिन्न सब्जियों के दायरे में तीन गुना से ज्यादा बढ़ोतरी हो चुकी है। इसके चलते आम आदमी की थाली से सब्जियां पूरी तरह गायब हो चुकी हैं। प्याज, टमाटर और आलू जैसी सब्जियां भी लोगों की पहुंच से बाहर हो गई हैं। व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा सब्जियों की आपूर्ति में आई भारी कमी के चलते हो रहा है। कारोबारी नेता इसके पीछे मुख्यत दो कारण बता रहे हैं। पहला तो उत्पादन में कमी और दूसरा पाकिस्तान को हो रहे निर्यात हैं। राजधानीवासियों के हिस्से की सब्जियां पाकिस्तानी खा रहे हैं। आजादपुर मण्डी के एक प्रमुख कारोबारी ने बताया कि मौसम में आए तेजी से बदलाव के चलते सब्जियों के उत्पादन में कमी आई है। मैदानी इलाकों में एक साथ धूप बढ़ जाने से उत्पादन गिरा है। पहाड़ों की सब्जियों की आवक बेहद कम है। मांग के अनुसार सब्जियां आने में अभी कम से कम एक पखवाड़े का समय लगेगा। इसके बाद ही जनता थोड़ी राहत की उम्मीद कर सकती है। ग्रीन वेजिटेबल्स एसोसिएशन के सदस्य पंकज शर्मा का कहना है कि इस साल पाकिस्तान को सब्जियों का निर्यात भारी मात्रा में हुआ है, अब भी हो रहा है। इसके चलते घरेलू मण्डियों में सब्जियां पहुंच ही नहीं पा रहीं। इस बार भिण्डी, टमाटर, लौकी जैसी सब्जियों के दाम एक बार भी नीचे नहीं आए। शिमला और हिमाचल प्रदेश के विभिन्न शहरों में सब्जियों की आवक मामूली ही रही है। 200 गाड़ियों के बजाय 2 गाड़ियां ही आ रही हैं। पाकिस्तान एक्सपोर्ट होने वाली सब्जियों में टमाटर और प्याज प्रमुख हैं। गर्मी के मौसम में स्टोरेज की दिक्कतें भी होती हैं। भिण्डी और टिण्डे के दाम ज्यादा होने से लोग इसे 250 ग्राम या आधा किलोग्राम ही खरीदते हैं। कम बिक्री होने के चलते सब्जी बेचने वालों को भी अपना प्रॉफिट मार्जिन निकालना होता है। इस वजह से मण्डी में ही महंगी मिल रही इन सब्जियों के रेट आम आदमी तक पहुंचते-पहुंचते काफी ज्यादा हो जाते हैं। सवाल यह है कि जब घरेलू मार्केट के लिए सब्जियों की पर्याप्त सप्लाई नहीं है तो भारत सरकार सब्जियों को पाकिस्तान क्यों एक्सपोर्ट कर ही है? पहले अपने देशवासियों को तो पूरी सब्जियां उपलब्ध करवा दो, उनकी थाली में सब्जियों का प्रबंध करवा दो फिर इन्हें पाकिस्तान भेजने की सोचो। गर्मी के महीने में पाक निर्यात को तुरन्त बन्द किया जाए जब पर्याप्त मात्रा में आ जाएं तब एक्सपोर्ट की सोचना।
Anil Narendra, Daily Pratap, Inflation, Price Rise, Vir Arjun

तीन साल का यूपीएसरकार का रिपोर्ट कार्ड

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25 April 2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा विधानसभा चुनावों में हार के बाद दिल्ली नगर निगम में कांग्रेस की लगातार पांचवीं हार है। कांग्रेस नीत यूपीए सरकार 22 मई को अपने तीन साल पूरे कर रही है। परम्परा के मुताबिक सरकार इसी दिन `रिपोर्ट टू द पीपुल' पेश करेगी। पता नहीं मनमोहन सिंह सरकार और कांग्रेस पार्टी अपनी इस दौरान क्या-क्या उपलब्धियां दिखाएगी। समय आ गया है कि कांग्रेस पार्टी आत्ममंथन करे कि आखिर वह किस ओर जा रहे हैं। यह इसलिए भी जरूरी है कि अब लोकसभा चुनाव ज्यादा दूर नहीं हैं और इससे पहले पार्टी को गुजरात, हिमाचल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में विधानसभा चुनाव का सामना भी करना है। यूपीए सरकार की दूसरी पारी लगातार विवादों में फंसती जा रही है। राष्ट्रमंडल खेल, 2जी स्पेक्ट्रम और आदर्श हाउसिंग सोसाइटी जैसे तमाम घोटाले-महाघोटाले चर्चा में रहे। इनके चलते कांग्रेस को लगातार फजीहत झेलनी पड़ी है और घोटालों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। कांग्रेस नेतृत्व को कहीं से भी राजनीतिक राहत मिलती नहीं दिखाई पड़ती है। संसद में पिछले कई महीनों से गैर-कांग्रेसी दिग्गज यूपीए सरकार के खिलाफ लामबंदी तेज कर रहे हैं। खुद यूपीए के अन्दर कई घटक सरकार का सिरदर्द बढ़ा रहे हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी की तरफ से है। लगातार यह ऊहापोह बना हुआ है कि टीएमसी कब तक सरकार में बनी रहेगी? क्योंकि हर महीने दो महीने में ममता, सरकार के खिलाफ कोई न कोई राजनीतिक टंटा खड़ा कर देती हैं। बिगड़ते ट्रेक रिकॉर्ड के चलते यूपीए-2 सरकार और पार्टी में अविश्वास बढ़ रहा है। कांग्रेस के तमाम नेता अब एक-दूसरे पर तोहमत लगा रहे हैं। सरकार और पार्टी में तालमेल की बातें जरूर हो रही है लेकिन तस्वीर कुछ और ही है। बड़े नेताओं की नूराकुश्ती फुल स्विंग में है। 10 जनपथ में बड़ी-बड़ी बैठकें हो रही हैं। लेकिन पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक इकाई कांग्रेस कार्यसमिति में हाल फिलहाल एक भी बड़े मुद्दे पर चर्चा नहीं हो पाई। अगर आ रही खबरों पर विश्वास किया जाए तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को गत मुलाकात में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दो टूक कह दिया है कि वे या तो लम्बित पड़े मामलों पर फैसला लेकर काम शुरू करें वरना पार्टी नेतृत्व उनसे आगे के बारे में सोचना शुरू करेगा। इसी तरह राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन की आग थमी नहीं है। आंध्र प्रदेश, हरियाणा और उत्तराखंड में भी नेतृत्व के लिए समस्याएं खड़ी हैं। इन परिस्थितियों में पार्टी रणनीतिकारों को एक मजबूत और कारगर रणनीति बनानी होगी जिससे कि योजनाबद्ध तरीके से आगे आने वाली चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके। कांग्रेस के एक शीर्ष नेता का कहना है कि यूपीए के दोबारा केंद्र में सत्तासीन होने के बाद उसकी छवि एक भ्रष्टाचारी और महंगाई बढ़ाने वाली सरकार की बनती चली गई और आज तक यही छवि दिन प्रतिदिन और अधिक मजबूत होती जा रही है जिसके कारण से कांग्रेस को पिछले तीन सालों में देशभर में हुए चुनाव और उपचुनावों में लगभग हर जगह हार का मुंह देखना पड़ा है। लिहाजा पार्टी रणनीतिकार चाहते हैं कि संगठन के सभी शीर्ष नेता इस बात के लिए बैठकर आत्मचिन्तन व आत्ममंथन करें कि केंद्र सरकार कौन-कौन से ऐसे कदम उठाए जिससे उसकी छवि बदले। उन्हें यह भी सोचना होगा कि सहयोगी दलों के दबाव से कैसे मुक्त हुआ जाए। गठबंधन आधारित राजनीति को कितना महत्व दिया जाए। आम लोगों में पैठ बनाने के और पुरानी लोकप्रियता को हासिल करने के लिए क्या किया जाए जिससे कि पार्टी कार्यकर्ता फिर से नए जोश के साथ मैदान में उतर सकें। हाथ पर हाथ धरे बैठने से काम नहीं चलेगा।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Mamta Banerjee, Manmohan Singh, Scams, UPA, Vir Arjun

Tuesday, 24 April 2012

भाजपा में सत्ता की तीन धुरियां

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24 April 2012
अनिल नरेन्द्र
भारतीय जनता पार्टी में नगर निगम चुनाव जीतने के बाद एक नया उत्साह है। उन्हें लगता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी बाजी मार सकती है पर सबसे बड़ी कमी जो उभर कर आ रही है वह है क्लीयर नेतृत्व का अभाव। यह किसी से छिपा नहीं कि पार्टी के एक बड़े धड़े खासकर सांसदों के मन में एक सवाल बार-बार कौंध रहा था कि आखिर यूपीए-2 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटालों के मुद्दे पर घिरी रही। लेकिन सरकार की विफलता का भाजपा को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। इसके चलते केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल को भुनाने के लिए पार्टी को लोकसभा चुनाव पूर्व अपना पीएम उम्मीदवार घोषित करने की दरकार है। इस समय यह स्थिति है कि भाजपा तीन धुरियों पर चल रही है। सबसे पहले हैं श्री नितिन गडकरी जो पार्टी अध्यक्ष हैं और उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन है। दूसरी तरफ हैं डी-4 नेता। इनमें आडवाणी जी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली प्रमुख हैं। तीसरी धुरी नरेन्द्र मोदी हैं जो अपने आपको पार्टी से ऊपर मानते हैं और प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार मानते हैं। इन तीनों धुरियों में सभी नेता अपनी-अपनी दिशा में चल रहे हैं। नितिन गडकरी के एक तरफ नरेन्द्र मोदी से मतभेद हैं वहीं दूसरी ओर 5-4 से अकसर खींचतान होती रहती है। ताजा उदाहरण सुरेन्द्र सिंह आहलूवालिया का पहले राज्यसभा से टिकट काटना और फिर जब डी-4 ने जोरदार विरोध किया तो उन्हें फिर से उम्मीदवार घोषित करना। कई माह से गडकरी और नरेन्द्र मोदी के बीच बातचीत तक नहीं हो रही है। संवादहीनता की इस स्थिति को गडकरी ने खुद स्वीकारा है। सवाल यह भी किया जा रहा है कि गडकरी ने मोदी से संवादहीनता की बात सार्वजनिक रूप से क्यों कही? यह बात किसी से छिपी नहीं कि नरेन्द्र मोदी भाजपा के पूर्व संगठन महासचिव संजय जोशी को पुन भाजपा में सक्रिय किए जाने के फैसले से नाराज हैं। गडकरी ने संजय जोशी को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में खासा महत्व दिया। इसी के बाद दोनों में `कुट्टी' हो गई। रहा सवाल भाजपा की ओर से कौन होगा पीएम उम्मीदवार तो भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू ने गुरुवार को हैदराबाद में कहा कि अगले आम चुनाव से पहले पार्टी अपना प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित कर देगी। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले हम अपना उम्मीदवार घोषित करेंगे, अभी हम अपना उम्मीदवार बताने की स्थिति में नहीं हैं। उधर नरेन्द्र मोदी ने केंद्रीय राजनीति में आने के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं। पिछले दिनों प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र के विरोध में सारे मुख्यमंत्री दिल्ली में एकत्र हुए थे। मोदी ने विशेष रूप से तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और बीजू जनता दल प्रमुख और उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के साथ बैठक की। हालांकि ऊपरी स्तर पर तो यह बैठक केंद्र सरकार के प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र को लेकर थी पर अन्दर खाते 2014 लोकसभा चुनावों पर भी चर्चा हुई होगी। मोदी ने अपने आपको पीएम उम्मीदवार दर्शाने की चालें चलनी शुरू कर दी हैं। आने वाले दिनों में यह अंतर्पलह और तेज होना स्वाभाविक है।
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सियाचिन पर जनरल कयानी के बयान की विश्वसनीयता?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24 April 2012
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान में सेना और जरदारी सरकार में मतभेद हैं इसका एक उदाहरण हमें पाक सेनाध्यक्ष अशफाक परवेज कयानी के ताजा सियाचिन संबंधी बयान से मिलता है। बहुत कम पब्लिक में बोलने वाले जनरल कयानी ने पिछले दिनों कहा कि भारत और पाकिस्तान दोनों देशों को सियाचिन से अपनी सेना वापस बुला लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि दोनों देशों को सियाचिन के मुद्दे को बातचीत से सुलझाना चाहिए। ज्ञात हो कि सियाचिन में इस महीने की शुरुआत में हिमस्खलन में 125 पाक सैनिक सहित 139 लोग दब गए थे। जहां हमें इस बात का दुख है कि इतने पाक सैनिकों की मृत्यु हुई और हम उनके परिवारों के दुख में शरीक हैं वहीं हम यह भी कहना चाहेंगे कि हमें जनरल कयानी की बातों पर ज्यादा यकीन नहीं है। इधर जनरल कयानी का बयान आया तो उधर कुछ देर बाद ही पाक विदेश मंत्रालय ने स्पष्टीकरण दे दिया कि सियाचिन मुद्दे पर पाकिस्तान के रुख में कोई तब्दीली नहीं हुई। इससे सवाल उठता है कि क्या जनरल कयानी के सियाचिन के उस जगह दौरे जहां बर्प में धंसने से पाक सैनिकों की मौत हुई थी वह इस अति दुर्गम स्थल पर मौत के तांडव के प्रति उनकी महज जज्बाती प्रतिक्रिया थी? क्या हम इसका यह मतलब भी निकाल सकते हैं कि राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की भारत के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिशों को पाक सेना का समर्थन प्राप्त है? संयोग से पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भी जरदारी की भारत यात्रा का समर्थन किया और सरकार से मांग की कि सियाचिन मुद्दे का हल ढूंढने के लिए वह अपनी ओर से पहल करें। मुश्किल यह है कि पाकिस्तान की कथनी और करनी में बहुत फर्प है। पाकिस्तान से मिलने वाले विरोधाभास संदेश अकसर दुविधा पैदा कर देते हैं। वैसे हाल में पाकिस्तानी नेताओं के बयानों से कुछ सकारात्मक संकेत मिले हैं। मसलन गृहमंत्री रहमान मलिक का भारत को आगाह करना कि तालिबानी आतंकवादी भारत में घुसपैठ कर सकते हैं और इसे रोकने के लिए पाकिस्तान भारत से पूरा सहयोग करने को तैयार है। लेकिन इन्हीं रहमान मलिक ने नवाज शरीफ के इस सुझाव की निन्दा कर दी कि पाकिस्तान को एकतरफा कदम उठाते हुए सियाचिन से अपनी फौज हटा लेनी चाहिए। ऐसे सन्दर्भों की वजह से हम जनरल कयानी की बातों को गम्भीरता से नहीं ले सकते। जो देश अपने अस्तित्व को भारत से दुश्मनी के सन्दर्भ में परिभाषित करता रहा हो और जहां विभाजन के अपूर्ण एजेंडे को पूरा करने की बातें खुलेआम कही जाती हों, वहां के सेनाध्यक्ष की ऐसी बातों पर सहज विश्वास न होना स्वाभाविक ही है। इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान ने कम से कम तीन बार सियाचिन से भारत की फौजों को हटाने के लिए असफल सैन्य अभियान किए। यहां का मौसम इतना जानलेवा है कि युद्ध की बनिस्पत हिमस्खलन और शीत से ज्यादा लोग मरते हैं। दोनों ही देशों को यहां अपनी रक्षा सेनाओं पर जितना खर्च करना प़ड़ता है, उसकी तुलना में उन्हें कोई खास लाभ नहीं। भारत का कहना है कि हम अपनी सेनाओं की वापसी पर बातचीत कर सकते हैं पर इससे पहले दोनों भारत और पाक की फौजें इस समय कहां-कहां हैं, इसे अडेंटीफाई किया जाए और यह करने को पाक तैयार नहीं है।
Anil Narendra, Daily Pratap, General Kayani, Indo Pak War, Pakistan, Siachin, Vir Arjun

Monday, 23 April 2012

UPA Government’s Anti-Hindu face re-surfaces again on Ram Setu issue

- Anil Narendra 

It is unfortunate that the UPA Government of Manmaohan Singh has not clarified its stand on the Ram Setu issue, which touches the sentiments of millions of Hindus. Refusing to put forward its views on the Ram Setu issue, the Union Government appealed to the Supreme Court to give direction in the matter. In view of the Union Government not submitting its stand, the Supreme Court has decided to finally hear the matter in August. The Court had asked the Government to file its reply in this matter, while hearing a petition filed by the Janata Party Chairman, Dr. Subramaniam Swami, but with choosing not to reply in the matter, the Government had made it clear that it does not want to involve itself in this burning matter, that is linked to the sentiments of millions of Hindus. The Additional Solicitor General, Haren Rawal submitted before the Bench of the Supreme Court that the Government has considered the matter in details and decided not to put forward its views. He said that the Government stands firm on the reply filed in the Court in 2008, which said that it respects all religions, but it must not comment on the matter of religious faith. The Bench is hearing the petition filed on behalf of Janata Party Chief Dr. Subramaniam Swami, which had demanded the Ram Setu to be declared a mythological heritage. The apex Court had already given two weeks' time to the Government on this matter, but the Centre has clarified that it doesn't want to comment on the matter and has left the decision on the Court. On this, the apex Court said that if the Government is not interested in filing an affidavit, then it would move towards the process of arguments.

 

It is unfortunate that the UPA Government dares to ignore the sentiments of millions of Hindus. Hindus believe that this bridge was constructed by Hanuman to facilitate Lord Rama to cross over to Lanka. Even today, this bridge is clearly visible. A sad aspect of the matter is that no community of any other religion has objection in declaring the Ram Setu as a national heritage. Even millions of Muslims, Sikhs, Christians have also supported this view. The Ramayan is respected by all the faiths equally. The only opposition to it is from the DMK. These descendants of the Ravana want to demolish this ancient bridge and construct a sea lane. The intention behind such move is clear. It is all the more sad that the BJP, which claims itself the Hindu Party, has also not openly supported the proposal of Dr. Swamy in view of vote bank politics. Vishwa Hindu Parishad has supported this move of Dr Swamy. Acting Chairman of the BHP, Praveen Bhai Togadia has said that by not submitting an affidavit for winding up the Setu Samudram project, the Government has once again displayed its anti-Hindu stance. Every one has his or her own beliefs and no body can demolish this bridge constructed by Hanumanji. Jai Shri Hanuman, Jai Shri Ram.

New fatwas : Muslim women not to work in Beauty parlours, men to avoid second marriage

- Anil Narendra 

Fatwas by Deoband's most important education centre are once again being talked about. In a recent fatwa, Deoband has advised women not to work in beauty parlours, as it is against the Shariat laws. This decision of Deoband has attracted sharp political and social criticism. Keeping in view the social and economic upliftment of women, some Muslim leaders have called it a wrong decision. Steering clear of the controversy, the Congress Spokesman Rashid Alvi said that it is not proper to comment on religious matters. BJP Spokesperson Nirmala Sitaraman was of the view that like women of other religions, Muslim women must also be given unhindered opportunity to prosper. Fatwas should not be allowed to obstruct the economic-social development of women. On the other hand, Independent Rajya Sabha MP, Mohammed Adeeb has said that we should keep in mind as to what made Deoband to issue such a fatwa? He was of the view that somebody must have asked Deoband that if men frequent beauty parlours, then should women work in such parlours? This fatwa must have been issued in response to such a question that it is not right for women to work at these places. Adversely, social activist Rajani Kumari has declared this as a completely wrong fatwa. She said that such decisions prove hindrance in the economic-social development of women. The religious institutions must consider the changes being brought about in the society. Beauty parlours continue to be a main source of employment for women and what is wrong, if a woman tries to earn her livelihood through such means.

 

Another Deoband advice to Muslims is regarding second marriage. In a major change in its earlier policy, Darul Ulum has advised Muslims to avoid more than one marriage. Such marriages are considered lawful under Muslim laws, but now Deoband has cautioned Muslim men intending to perform second marriage that considering the need and demand of the time, it is more right and more Indian to have one wife only. According to Sharia, a Muslim man has right to keep two wives at a time. Darul Ifta, the department responsible for issuing on-line fatwas, said that usually, such things (more than one marriage) are not recognized in Indian traditions. Such marriages in India mean inviting lot of troubles. Besides, it is very difficult for a person to treat both the wives equally. As such, please forget about performing second marriage. The Chairman of the Fatwa Committee, Mufti Arshad Farooqui said, 'One should not perform second and third marriage without any sound base or reason. Trivial domestic disputes must not be made basis for divorce or second marriage. No doubt, the Sharia has allowed a Muslim man to perform four marriages, but it has also said clearly that all the four should be treated equally. A member of the All India Muslim Personal Law Board, Dr. Naeem Hamid has said that polygamy was allowed in earlier days, as a number of girls from poor families remained unmarried due to various economic and social reasons, but now Muslim men  should avoid second marriage, what to talk of four marriages. The second marriage adversely affects the family structure. Darul Ulum used to allow polygamies earlier, but now its focus is on economic and social upliftment of Muslims.

Sunday, 22 April 2012

नए फतवे ः मुस्लिम महिलाएं ब्यूटी पार्लर में काम न करें, मर्द दूसरी शादी से बचें

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22 April 2012
अनिल नरेन्द्र
देवबंदी मसलक के सबसे बड़े इस्लामिक तालीमी केंद्र दारुल उलूम के फतवे एक बार फिर चर्चा में हैं। देवबंद ने एक फैसले में महिलाओं के ब्यूटी पार्लर में काम करने से मना करते हुए कहा है कि ऐसा करना शरीयत के खिलाफ है। देवबंद के इस फैसले पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया हो रही है। कुछ मुस्लिम नेताओं ने इस फैसले को औरतों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान की दृष्टि से गलत तो माना है। कांग्रेस के प्रवक्ता राशिद अल्वी ने कन्नी काटते हुए कहा कि किसी मजहबी मामले में प्रतिक्रिया देना ठीक नहीं है। वहीं भाजपा प्रवक्ता निर्मला सीतारमण का कहना है कि मुस्लिम महिलाओं को आगे बढ़ने की उसी तरह स्वतंत्रता होनी चाहिए जिस तरह दूसरे धर्मों में महिलाओं को मिली हुई है। फतवे महिलाओं के आर्थिक-सामाजिक विकास में बाधा नहीं बनने चाहिए। दूसरी ओर राज्यसभा के निर्दलीय सांसद मोहम्मद अदीब का कहना है, देखना चाहिए कि देवबंद ने यह फतवा क्यों जारी किया? उनका कहना है कि दारुल उलूम से किसी ने पूछा होगा कि यदि किसी ब्यूटी पार्लर में मर्द भी आते हैं तो क्या ऐसे पार्लर में महिलाओं का काम करना उचित होगा? इसके जवाब में यह फतवा आया होगा कि ऐसी जगहों पर औरतों का काम करना ठीक नहीं है। इसके उलट सामाजिक कार्यकर्ता रजनी कुमारी ने इस फतवे को पूरी तरह गलत बताया। उनका कहना है कि ऐसे फैसले औरतों के आर्थिक-सामाजिक विकास में बाधक बनते हैं। धार्मिक संस्थाओं को ऐसे फतवे जारी करने से पहले सामाजिक स्तर पर हो रहे परिवर्तनों को ध्यान में रखना चाहिए। महिलाओं के लिए ब्यूटी पार्लर आज रोजगार का प्रमुख जरिया बने हुए हैं और इसके जरिए यदि कोई महिला अपने परिवार का पालन करता है तो इसमें आखिर क्या बुराई हो सकती है?
दूसरी सलाह मुसलमानों द्वारा दूसरी शादी करने संबंधी है। दारुल उलूम ने अपने रुख में एक महत्वपूर्ण बदलाव लाते हुए एक से अधिक शादियां करने से बचने की सलाह दी है। मुस्लिम कानून के अंतर्गत एक से अधिक शादी जायज है पर अब देवबंद ने दूसरी शादी के इच्छुक एक व्यक्ति को सलाह दी है कि आधुनिक समय की मांग और जरूरत के हिसाब से यह ज्यादा सही और ज्यादा भारतीय है कि एक ही पत्नी काफी है। इस व्यक्ति की पहली शादी से दो बच्चे हैं। शरिया के अनुसार एक मुस्लिम व्यक्ति को एक ही साथ दो बीवियां रखने का हक है। लेकिन दारुल इफ्ता, जो कि दारुल का ऑनलाइन फतवा जारी करने का विभाग है, ने कहा है कि इस तरह की बातें (एक से अधिक शादी) सामान्यत भारतीय परम्पराओं में मान्य नहीं है। भारत में ऐसा करना सैकड़ों मुसीबतों को दावत देना है। इसके अलावा इस तरह की शादी में दोनों बीवियों के साथ बराबरी का सलूक करना किसी भी आदमी के लिए काफी मुश्किल है। इसलिए आप दूसरी शादी का इरादा त्याग दीजिए। फतवा कमेटी के चेयरमैन मुफ्ती अरशद फारुकी ने कहाöबिना किसी ठोस आधार या कारण के दूसरी और तीसरी शादी नहीं करनी चाहिए। घर के छोटे-मोटे झगड़ों को तलाक और दूसरी शादी का आधार कभी नहीं बनाना चाहिए। शरिया ने एक मुस्लिम आदमी को एक साथ चार शादियां करने की इजाजत जरूर दी है पर साथ ही साफ-साफ कहा है कि चारों के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए। ऑल इंडियन मुस्लिम पर्सनल-लॉ बोर्ड के सदस्य डॉ. नईम हामिद का कहना है कि पहले बहुविवाह की इजाजत इसलिए थी कि कई गरीब लड़कियां विभिन्न आर्थिक और सामाजिक कारणों से पुंआरी ही रह जाती थीं पर अब मुस्लिम लोगों को चार तो क्या दूसरी शादी से भी बचना चाहिए। दूसरी शादी करना पारिवारिक ढांचे को बुरी तरह प्रभावित करता है। पहले दारुल उलूम बहुविवाह को मना नहीं करता था पर अब उसका अधिक फोकस मुसलमानों को आर्थिक और सामाजिक रूप से उठाना है।

रामसेतु मुद्दे पर फिर सामने आया संप्रग सरकार का हिन्दू विरोधी चेहरा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22 April 2012
अनिल नरेन्द्र
यह बहुत दुख की बात है कि मनमोहन सिंह की संप्रग सरकार ने करोड़ों
हिन्दुओं की आस्था से जुड़ा रामसेतु-सेतु समुद्रम केस में अपना स्टैंड स्पष्ट नहीं किया। केंद्र सरकार ने बृहस्पतिवार को रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने के मसले पर अपना पक्ष रखने से इंकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट से ही इस मामले पर फैसला सुनाने की अपील की। केंद्र की ओर से पक्ष नहीं रखे जाने पर अदालत ने इस मुद्दे पर अगस्त में अंतिम सुनवाई करने का निर्णय लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी के आवेदन पर सरकार से जवाब-तलब किया था, लेकिन सरकार ने जवाब देने से इंकार कर यह साफ कर दिया कि वह हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं से जुड़े इस ज्वलंत मुद्दे से दूर रहना चाहती है। पीठ के समक्ष एडिशनल सालिसिटर जनरल हरेन रावल ने कहा कि गहन विचार-विमर्श के बाद सरकार इस नतीजे पर पहुंची है कि रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने के मसले पर वह कोई पक्ष नहीं रखना चाहती। उन्होंने कहा कि सरकार अपने 2008 में दाखिल किए गए जवाब पर कायम है, जिसमें कहा गया था कि वह सभी धर्मों का सम्मान करती है, लेकिन धार्मिक विश्वास के मसले पर उसे जवाब नहीं देना चाहिए। पीठ जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी की ओर से दायर इस आवेदन पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें पौराणिक धरोहर रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने की मांग की गई थी। शीर्षस्थ अदालत की ओर से इस मसले पर सरकार को 29 मार्च को पहले भी दो सप्ताह का समय दिया जा चुका है। केंद्र ने कहा कि वह कोई पक्ष नहीं पेश करना चाहता। ऐसे में अदालत इस मसले पर निर्णय ले। इस पर पीठ ने कहा कि यदि सरकार हलफनामा नहीं दाखिल करना चाहती तो अदालत दलीलें पेश करने की प्रक्रिया की ओर रुख करेगी।
यह बहुत दुख की बात है कि संप्रग की यह सरकार करोड़ों हिन्दुओं की भावनाओं को दरकिनार करने का साहस दिखा रही है। करोड़ों हिन्दुओं में यह मान्यता है कि यह सेतु हनुमान जी ने भगवान श्रीराम को लंका पहुंचाने के लिए बनाया था। यह सेतु आज भी साफ नजर आता है। दुखद पहलू यह है कि रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने में किसी और धर्म के किसी समुदाय को कोई एतराज नहीं। यहां तक कि देश के करोड़ों मुसलमान, सिख, ईसाई भी इसका समर्थन करते हैं। रामायण सभी का पूज्य ग्रंथ है। हां विरोध कर रही है तो द्रमुक पार्टी कर रही है। रावण वंश के ये लोग इस सेतु को तोड़कर रास्ता बनाना चाहते हैं। इसके पीछे उनकी क्या नीयत है यह किसी से छिपा नहीं। उससे भी ज्यादा दुखद बात यह है कि अपने आपको हिन्दू पार्टी कहने वाली भारतीय जनता पार्टी ने भी वोटों की खातिर डॉ. स्वामी का कभी खुलकर समर्थन नहीं किया। हां विश्व हिन्दू परिषद ने जरूर समर्थन किया है। विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण भाई तोगड़िया ने कहा कि केंद्र सरकार ने सेतु समुद्रम परियोजना को समाप्त करने का हलफनामा न देकर एक बार फिर हिन्दू विरोधी मानस का परिचय दिया है। अपनी-अपनी मान्यता है, श्री हनुमान द्वारा बनाए गए इस सेतु को कोई नहीं तोड़ सकता। जय श्री हनुमान, जय श्री राम।

Saturday, 21 April 2012

अकेली शीला दीक्षित हार की जिम्मेदार नहीं हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21 April 2012
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली नगर निगम चुनाव में कांग्रेस की हार का जिम्मेदार कौन है? वैसे कांग्रेस में पोस्टमार्टम करने की प्रथा नहीं और हार के बाद शायद ही किसी को जिम्मेदार माना जाता है। हमारे सामने उत्तर प्रदेश, पंजाब के विधानसभा परिणाम हैं। इतने दिन बीतने के बाद भी बैठकें हो रही हैं पर हार की जिम्मेदारी तय नहीं हो पा रही है। दिल्ली में अकेले मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को जिम्मेदार मानना सही नहीं है। बेशक दिल्ली नगर निगम को तीन हिस्सों में बांटना शीला जी का आइडिया था और इस हद तक हार के लिए वह जिम्मेदार हो सकती हैं पर दिल्ली से तमाम कांग्रेसी सांसद, दिल्ली सरकार के मंत्री व विधायक भी कम जिम्मेदार नहीं। पहले बात करते हैं सांसदों की। सबसे ज्यादा खराब हालत नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की रही जहां केंद्रीय मंत्री अजय माकन की पसंद से टिकट बांटी गई। इस क्षेत्र में 32 वार्ड हैं और कांग्रेस को सिर्प सात वार्डों पर जीत मिल सकी। यहां से कांग्रेस के तीन बागी जीतने में सफल रहे। बीजेपी ने यहां सबसे ज्यादा 22 सीटों पर परचम फहराया। वेस्ट दिल्ली के सांसद महाबल मिश्र के इलाके में कांग्रेस की टिकटों के लिए घमासान हुआ और नतीजा यह निकला कि 10 सीटें ही कांग्रेस को मिल सकीं। बीजेपी 19 पर जीती। बीएसपी एक और आरएलडी दो सीटों पर काबिज हुई। कई दागी जीत गए। केंद्रीय मंत्री कृष्णा तीरथ को टिकटों के वितरण के दौरान अपने विधायकों का विरोध सहना पड़ा और कांग्रेस ने उनके इलाके में भी खराब प्रदर्शन किया। यहां कांग्रेस 11 सीटें ही जीत पाई। बीएसपी को सबसे ज्यादा छह सीटों पर सफलता मिली। प्रदेशाध्यक्ष और नॉर्थ ईस्ट दिल्ली से सांसद जयप्रकाश अग्रवाल को फ्रीहैंड मिला लेकिन उनकी स्थिति भी काफी विकट रही। वह 12 उम्मीदवारों को ही जिता सके। कांग्रेस के हैवीवेट मंत्री कपिल सिब्बल चांदनी चौक से हल्के ही साबित हुए। यहां कांग्रेस को 14 सीटें मिलीं। बीजेपी को 21 सीटें मिली जबकि शोएब इकबाल आरएलडी टिकट पर तीन सीटें जिता पाए। बीएसपी को एक और एक निर्दलीय को जीत मिली। हालांकि सीएम के बेटे संदीप दीक्षित भी आधे नम्बरों से भी पास नहीं हो सके और 15 सीटें ही जिता सके लेकिन बाकी सांसदों से इनका प्रदर्शन बेहतर रहा। बीजेपी ने ईस्ट दिल्ली से 18 सीटें जीती यानी कांग्रेस से सिर्प तीन ज्यादा पर तीन बागियों ने खेल बिगाड़ दिया। अब बात करते हैं दिल्ली सरकार में कांग्रेसी मंत्रियों की। सभी छह मंत्रियों की परफार्मेंस खराब रही। सबसे बुरा हाल सरकार के वरिष्ठ मंत्री डॉ. एके वालिया का रहा। उनकी विधानसभा लक्ष्मी नगर में चारों वार्डों किशन पुंज, लक्ष्मी नगर, शकरपुर व पांडव नगर में कांग्रेस हार गई। सरकार के दूसरे मंत्री हारुन यूसुफ भी अपनी विधानसभा बल्लीमारान के तीन वार्डों में पार्टी प्रत्याशी को जिता नहीं पाए। उनके वार्ड बल्लीमारान, राम नगर, कसाबपुरा में पार्टी प्रत्याशी हार गए जबकि एकमात्र वार्ड ईदगाह रोड में पार्टी लाज बचा पाई। रमाकान्त गोस्वामी की राजेन्द्र नगर विधानसभा में तीन वार्ड राजेन्द्र नगर, इन्द्रपुरी, नारायणा में पार्टी प्रत्याशी हार गए जबकि पूसा वार्ड में ही कांग्रेस जीती। यही हाल समाज कल्याण मंत्री प्रो. किरण वालिया का रहा है। उनकी विधानसभा मालवीय नगर के तीन वार्ड मालवीय नगर, सफदरजंग एन्क्लेव, हौजखास में कांग्रेस प्रत्याशी को हार मिली जबकि एक सीट विलेज हौजरानी में पार्टी अपनी जीत दर्ज कर सकी। राजकुमार चौहान का बहरहाल रिकॉर्ड बराबरी पर छूटा। उनकी विधानसभा मंगोलपुरी के चार वार्ड में से दो मंगोलपुरी ईस्ट और मंगोलपुरी में पार्टी प्रत्याशी जीते हैं जबकि रोहिणी साउथ व मंगोलपुरी वेस्ट में हार गए। हार-जीत के रिकॉर्ड में मंत्री अरविन्दर सिंह लवली का रिकॉर्ड बेहतर माना जा सकता है। उनके विधानसभा गांधी नगर के चार में से तीन वार्ड, धर्मपुरा, गांधी नगर और रघुबरपुरा में पार्टी प्रत्याशी जीते जबकि आजाद नगर में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है। इसी तरह यमुना पार विकास बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. नरेन्द्र नाथ अपने चारों वार्ड हार गए हैं तो दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष डॉ. योगानन्द शास्त्राr चार में से दो और वरिष्ठ विधायक मुकेश शर्मा के तीन वार्डों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है। दूसरी ओर बीजेपी के वरिष्ठ विधायकों की परफार्मेंस ठीक मानी जा सकती है। प्रतिपक्ष के नेता प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा तीन, जगदीश मुखी दो और डॉ. हर्ष वर्धन के दो वार्डों में बीजेपी प्रत्याशियों ने फतह हासिल की। इसलिए अकेले शीला दीक्षित को जिम्मेदार ठहराना गलत है। इस हमाम में तो सभी नंगे हैं। विधानसभा चुनाव डेढ़ साल बाद होने हैं। अगर कांग्रेसी सांसदों, मंत्रियों और विधायकों का यही हाल रहा तो अंजाम भुगतने के लिए कांग्रेस आला कमान को तैयार रहना होगा।
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अग्नि-5 का सफल परीक्षण ः जय हिंद, जय भारत

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21 April 2012
अनिल नरेन्द्र
सैन्य शक्ति के विकास की दिशा में भारत ने एक और गौरवशाली इतिहास रच डाला। भारत ने बृहस्पतिवार को परमाणु क्षमता से लैस पांच हजार किलोमीटर दूर स्थित लक्ष्य को भेदने में सक्षम इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) अग्नि-5 के कामयाब परीक्षण के साथ ही जहां मिसाइल के क्षेत्र में बादशाहत हासिल करके पूरी दुनिया में भारत का डंका पीट दिया वहीं इतिहास भी रच दिया। ओडिशा से तट के समीप स्थित इनरव्हील द्वीप से सुबह आठ बजकर सात मिनट पर प्रक्षेपित की गई इस मिसाइल ने निर्धारित प्रक्षेपण मार्ग (ट्रेजैक्ट्री पाथ) का शत-प्रतिशत अनुसरण करते हुए जब 20 मिनट बाद सुदूर लक्ष्य को भेदा, तो रक्षा वैज्ञानिक खुशी से उछल पड़े। इस सफल परीक्षण के साथ ही भारत अमेरिका, रूस, फ्रांस और चीन के साथ उन चुनिन्दा देशों के समूह में शामिल हो गया है जिनके पास आईसीबीएम की क्षमता है। इस मिसाइल के सफल प्रक्षेपण से भारत ने पेइचिंग सहित चीन, पूर्वी यूरोप, पूर्वी अफ्रीका और आस्ट्रेलियाई तट के लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता हासिल कर ली है। अग्नि-5 का सफल परीक्षण एकीकृत मिसाइल विकास कार्यक्रम में भारत की लम्बी छलांग को प्रदर्शित करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मिसाइल विशेषताओं वाली है। फिलहाल केवल अमेरिका, रूस, फ्रांस और चीन के पास आईसीबीएम को प्रक्षेपित करने की क्षमता है। भारत ने अपनी सबसे ताकतवर और पहली आईसीबीएम का कामयाब टेस्ट क्या किया, पड़ोसी चीन का मीडिया बौखला गया। एक चीनी अखबार ने अग्नि-5 के टेस्ट के बाद पहली प्रतिक्रिया में लिखा है कि भारत को इससे कुछ भी हासिल नहीं होगा और न्यूक्लियर हथियारों के मामले में भारत चीन के आगे कहीं नहीं ठहरता है। चीन की बौखलाहट हमें समझ आती है। अग्नि-5 मिसाइल की कई खूबियां बेमिसाल हैं। एटमी वारहैड से लैस यह मिसाइल किसी भी युद्ध की बाजी पलटने की ताकत रखती है। दो और परीक्षणों के बाद इसे 2014-15 तक सेना के हवाले कर दिया जाएगा। इस मिसाइल की रेंज को जरूरत के अनुसार बढ़ाया जा सकता है। भारतीय मिसाइल बेड़े में यह पहला प्रक्षेपास्त्र है जो भारत को जरूरत पड़ने पर चीन के सभी हिस्सों तक मार करने की क्षमता रखता है। हालांकि अग्नि-5 अभी चीन की डोंगफेंग-31 का छोटा जवाब ही है क्योंकि यह चीनी मिसाइल दुनिया के किसी भी हिस्से में प्रहार कर सकती है पर इससे भारत कम से कम जवाबी कार्रवाई तो कर सकता है। अग्नि-5 भारत की सबसे तेजी से विकसित मिसाइल है। इसे महज तीन साल में तैयार किया गया है। इसे अचूक बनाने के लिए भारत ने माइक्रो नेविगेशन सिस्टम, कार्बन कम्पोजिट मैटेरियल से लेकर मिशन कम्प्यूटर व सॉफ्टवेयर तक ज्यादातर चीजें स्वदेशी तकनीक से विकसित की हैं। संयोग से 1975 में 19 अप्रैल को ही भारत ने आर्यभट्ट उपग्रह को लांच किया था और अंतरिक्ष में अपनी सफलता का सितारा रखा था। इस मिसाइल के सफल परीक्षण ने भारत के दुश्मनों पर बल डाल दिए हैं। अब हम पर कोई पड़ोसी हमला करने से पहले दस बार सोचेगा। तमाम वैज्ञानिकों को इस शानदार सफलता पर बधाई।
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Friday, 20 April 2012

एमसीडी चुनाव की झलकियां

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20 April 2012
अनिल नरेन्द्र
इस बार के नगर निगम चुनाव में कई दिलचस्प किस्से सामने आए हैं। दिल्ली के इस एमसीडी चुनाव में लोगों ने युवाओं और बुजुर्गों सभी को चौंका दिया है। बात विश्वास की है, लोगों को जिस पर विश्वास हुआ उसी के सिर पर सेहरा बांध दिया। सबसे बुजुर्ग नेताओं में गिने जाने वाले कांग्रेस के रमेश दत्ता को एक बार फिर जीत का सेहरा पहनाया गया वहीं दूसरी तरफ केवल 21 साल की उम्र वाले दो युवा नेताओं को भी अपना लीडर चुना गया। तुर्पमान गेट से चुनकर आए आले मोहम्मद इकबाल केवल 21 साल और एक महीने की उम्र में सबसे यंग पार्षदों में से एक हैं। इकबाल राष्ट्रीय लोकदल के उम्मीदवार थे। वहीं 21 साल की बसपा प्रत्याशी पूनम परेरा भी सबसे यंग महिला प्रत्याशी हैं। वह मंगोलपुरी वेस्ट वार्ड से विजयी रही। पिछले कई वर्षों से दिल्ली की राजनीति में सक्रिय रमेश दत्ता बेहद बुजुर्ग हैं और इस बार चुनाव में उन्हें हार्ट अटैक भी आया था पर घर से परिचित रमेश दत्ता का इतने सालों से लोगों के प्यार में कोई कमी नहीं आई। बात अगर मुस्लिम पार्षदों की अब करें तो नगर निगम चुनाव में राजनीतिक दलों का मुस्लिम उम्मीदवारों पर लगाया दांव कामयाब रहा। इस बार सबसे ज्यादा मुस्लिम पार्षद कांग्रेस से चुने गए हैं। इसके अलावा रालोद से तीन एवं भाजपा, बसपा और सपा से भी एक-एक पार्षद चुना गया है। इस बार चुनाव में खास बात यह रही कि मुस्लिम आबादी वाले इलाके कसाबपुरा की सीट भाजपा के खाते में गई, वहीं ओखला से सपा ने भी खाता खोलकर दिल्ली नगर निगम में अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। तीनों नगर निगमों में सबसे ज्यादा सात मुस्लिम प्रत्याशी पूर्वी दिल्ली से जीते हैं। इसके बाद उत्तरी दिल्ली से छह और दक्षिण दिल्ली नगर निगम में सबसे कम तीन मुस्लिम उम्मीदवारों के सिर पर जीत का सेहरा बंधा। कुल मिलाकर 16 मुस्लिम उम्मीदवारों के सिर बंधा जीत का सेहरा। एक महत्वपूर्ण पहलू इस चुनाव में यह भी रहा कि निर्दलीय उम्मीदवार काफी तादाद में जीते। 24 निर्दलीय उम्मीदवारों ने धमाकेदार जीत दर्ज कराई है। निर्दलीय उम्मीदवारों में से अधिकतर कांग्रेस और भाजपा के बागी उम्मीदवार हैं, जिन्हें पार्टी की टिकट नहीं मिली और वे निर्दलीय खड़े हो गए। लेकिन इन्होंने अपनी जीत दर्ज कराकर अपने को साबित जरूर कर दिया। माना जा रहा है कि इसमें से कुछ उम्मीदवार फिर से पार्टी में एंट्री ले सकते हैं। इस चुनाव में बागियों ने पार्टी प्रत्याशियों को हरवाने में अहम भूमिका निभाई है। दक्षिण दिल्ली की बात करें तो यहां की मुनिरका सीट से कांग्रेस की बागी प्रत्याशी प्रमिला टोकस चुनाव जीत गई। गीता कॉलोनी से बागी हुए बंसी लाल ने सीट निकाल ली। नेहरू विहार से भाजपा के शिव कुमार शर्मा इसलिए हार गए क्योंकि उनके खिलाफ पांच बागी खड़े हो गए। बगावत के चलते खजूरी सीट भी भाजपा के हाथ से चली गई। इस सीट से भाजपा के चौ. रामवीर सिंह पार्षद थे। इस बार उनका टिकट काटकर डॉ. अनिल गुप्ता को दिया गया था। नतीजा यह हुआ कि चौ. रामवीर दूसरी पार्टी से चुनाव लड़ गए और भाजपा का वोट बंट गया। पश्चिमी दिल्ली से निर्दलीय पूनम भारद्वाज जीत गईं। विवेक विहार से निर्दलीय प्रीति जीत गईं। महिपालपुर से भाजपा के बागी कृष्ण सहरावत ने बाजी मारी तो मारी तो नवादा सीट से कांग्रेस के बागी नरेश बाल्यान चुनाव जीत गए। उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी को हरा दिया। भाजपा पार्षद रहे विजय पंडित के कहने के बावजूद टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने अपनी पत्नी सीमा पंडित को रालोद के टिकट से चुनाव लड़ाया और वह चुनाव जीत गईं। भाजपा के पूर्व पार्षद रहे प्रवीण राजपूत बागी होकर चुनाव जीत गए। बिन्दापुर सीट से कांग्रेस के बागी देशराज राघव चुनाव जीत गए। बाहरी दिल्ली में भाजपा की बागी पुष्पा विजय विहार सीट से जीत गईं। उन्होंने पार्टी की प्रत्याशी सरिता को हराया। दिल्ली नगर निगम चुनाव में कांग्रेस की हार की एक वजह बसपा, एनसीपी सहित सपा का भी हाथ रहा। दिल्ली नगर निगम के पिछले चुनाव में बसपा ने 17 सीटें जीतकर जोरदार शुरुआत की और दर्जनों अन्य सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशियों की हार सुनिश्चित की। इस बार बसपा ने 15 सीटें जीती हैं तो घड़ी चुनाव चिन्ह निशान वाली एनसीपी ने बदरपुर सीट पर कब्जा कर लिया। एनसीपी के पूर्व विधायक रामवीर सिंह बिधूड़ी का गढ़ कहे जाने वाले इस इलाके में उनकी पार्टी ने छह सीटें जीती हैं। इनमें बदरपुर की जैतपुर, मीठापुर, मोलडबंद व बदरपुर की सीटें शामिल हैं। यहां से बसपा के राम सिंह नेताजी विधायक हैं। एनसीपी ने हरकेश नगर तथा महरौली की सीटों पर भी कब्जा कर लिया। हद तो यह है कि इस इलाके में कांग्रेस का प्रत्याशी तीसरे से पांचवें स्थान पर पहुंच गया। क्या दिल्ली में तीसरा मोर्चा तैयार हो रहा है? चुनाव परिणाम तो इसी ओर इशारा कर रहे हैं। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि छोटे दलों के प्रत्याशी चुनाव जीत गए हैं जिन्हें राष्ट्रीय पार्टियों ने नजरंदाज कर दिया था। गौर करने वाली बात यह है कि भाजपा की इस चुनाव में 36 सीटें कम आई हैं। 2007 के चुनाव में भाजपा ने 174 सीटें जीती थीं। यह अधिक महत्वपूर्ण है कि हारने वाली कई सीटें वे सीटें हैं जो पूर्वांचल के लोगों ने जीती हैं। चाहे वे निर्दलीय हों या किसी छोटे दलों के टिकट पर चुनाव लड़े हों। ऐसे लोगों में शामिल हैं पूर्वांचलवासियों के बाहुल्य वाले इलाके संगम विहार वेस्ट से निर्दलीय प्रत्याशी कल्पना झा। दक्षिण दिल्ली से एनसीपी की शिखा शाह जीत गईं। सकारावती सीट से पूर्वांचल पृष्ठभूमि के सत्येन्द्र राणा निर्दलीय चुनाव जीत गए। यहां यह भी गौर करने वाली बात है कि दिलशाद कॉलोनी से पूर्वांचली प्रत्याशी राम नारयण दूबे ने कांग्रेस के उन चौधरी अजीत सिंह को हराया है जो शीला दीक्षित के करीबी कहे जाते हैं। कांग्रेस ने इस सीट को जीतने के लिए सभी तरीके अपनाए, पूरी ताकत झोंक दी थी। इसी तरह नई सीमापुरी सीट पर भाजपा कार्यकर्ता सुनील झा ने सीट निकाल ली जबकि मतदान से पहले तक इस सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी वेद प्रकाश बेदी को मजबूत बताया जा रहा था। भाजपा के उच्चपदस्थ सूत्रों का कहना है कि जो भी निर्दलीय व छोटे दलों के पूर्वांचली जीते हैं, वे कुछ समय पहले तक भाजपा से जुड़े रहे हैं। मगर पार्टी की उपेक्षा के चलते उन्होंने दूसरी ओर रुख किया है। भाजपा न ही उन्हें अब सम्मान दे रही है और न ही पूर्वांचल के बड़े नेताओं को पार्टी में उचित महत्व मिल रहा है।

Thursday, 19 April 2012

भाजपा की जीत नहीं वोट तो महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटालों के खिलाफ है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19 April 2012
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने जिस एमसीडी को तीन टुकड़ों में बांटने का जो दांव चला था, वह उल्टा पड़ गया। भाजपा ने तीनों ही हिस्सों में कांग्रेस को पछाड़ दिया। नॉर्थ और ईस्ट में बीजेपी बहुमत में आ गई और दक्षिण में वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। अगर मुझसे पूछा जाए तो मैं यही कहूंगा कि यह कांग्रेस के खिलाफ एक नेगेटिव वोट है। इसमें भाजपा की उपलब्धियों के कारण वोट नहीं पड़ा यह तो लोगों का कांग्रेस से गुस्से का परिचायक वोट है। जनता महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटालों से तंग आ चुकी है और चूंकि दिल्ली सरकार भी कांग्रेस की है और केंद्र सरकार भी कांग्रेस की है, इसलिए जनता ने कांग्रेस को उखाड़ फेंकने के लिए पार्टी के खिलाफ वोट दिया। यह वोट शीला दीक्षित की दिल्ली सरकार के खिलाफ भी है और केंद्र में मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ भी है। शीला जी ने तो सोचा था कि एमसीडी को तीन हिस्सों में बांटकर बीजेपी को हमेशा के लिए कमजोर कर देंगी पर दांव उल्टा पड़ा। शीला जी की स्थिति खराब हुई है। कुछ लोग इसे शीला के खिलाफ वोट भी मान रहे हैं। कांग्रेस कह सकती है कि हमारे अन्दर बहुत फूट थी, बागियों ने हमें हरवा दिया पर फूट तो बीजेपी में आपसे ज्यादा थी और बागी तो वहां भी खड़े थे। आपके तो कई दिग्गज धूल चाट गए। लीडर विपक्ष जय किशन शर्मा नजफगढ़ से हार गए। पिछले तीन बार से लगातार पार्षद रहे कांग्रेस के सीनियर नेता चौधरी अजीत दिलशाद कॉलोनी से हार गए। तीन बार पार्षद रही कांग्रेस की अनीता बब्बर तिलक नगर से बीजेपी की रितु वोहरा से हार गई। दिलचस्प बात यह रही कि दोनों कांग्रेस और बीजेपी के बागी अधिकतर हारे पर उन्होंने वोट काटने का काम किया। पूर्वी दिल्ली का चुनाव कांग्रेस के लिए विशेष महत्व और प्रतिष्ठा रखता था। शीला दीक्षित, संदीप दीक्षित, जय प्रकाश अग्रवाल, अशोक वालिया, अरविन्दर सिंह लवली सभी की प्रतिष्ठा दांव पर थी। शीला दीक्षित ने खुद तो हार पर कुछ नहीं कहा, लेकिन उनके बेटे और पूर्वी दिल्ली के सांसद संदीप दीक्षित ने महंगाई और 2जी स्पेक्ट्रम जैसे घोटालों को हार का कारण स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि सीएजी की रिपोर्ट और अन्ना के आंदोलन से ऐसा माहौल बना कि लोगों को लगा कि कांग्रेस की सारी गलतियों का केंद्र में है। उन्होंने कहा कि हमने लोकल मुद्दों को रखा जबकि पूरे देश और दिल्ली में ऐसा माहौल था कि बीजेपी ने महंगाई और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को फोकस किया। कांग्रेस के मंत्री राजकुमार चौहान बयान देते हैं कि अगर महंगाई बढ़ी है तो वेतन भी तो बढ़े हैं। यह बयान जनता को पसंद नहीं आया। पूरे प्रचार में बीजेपी ने कहीं भी एमसीडी में पिछले पांच साल के अपने रिकॉर्ड पर वोट नहीं मांगा, उसने केंद्र सरकार और शीला सरकार को निशाने पर रखा। इससे भी यही साबित होता है कि अगर बीजेपी जीती है तो वह अपने कारनामों से नहीं बल्कि केंद्र और दिल्ली में कांग्रेस सरकारों के खिलाफ नेगेटिव वोट से जीती है। चूंकि इन चुनावों में स्थानीय दिग्गज भी असर रखते हैं, इसलिए जनता ने कई स्थानों पर दोनों प्रमुख दलों को नकारते हुए उम्मीदवार को व्यक्तिगत शख्सियत को वोट दिए तभी तो 37 निर्दलीय जीतकर आए। दिल्ली नगर निगम में बीजेपी की जीत का सेहरा प्रदेशाध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता के सिर पर बंधता है। उन्होंने जीतोड़ मेहनत की। इस जीत से अति-प्रसन्न पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा कि ये परिणाम कांग्रेस विरोधी जन भावना का पक्का सुबूत है और उनका दल आगामी दिल्ली विधानसभा तथा लोकसभा चुनावों में भी विजयी होगी। दिल्ली विधानसभा का चुनाव लगभग डेढ़ साल में होने हैं और 2014 में लोकसभा चुनाव होने हैं। सवाल यह उठता है कि क्या केंद्र सरकार अब भी चेतेगी? यह चुनाव एक तरह से केंद्र सरकार की नीतियों, कारगुजारियों, घोटालों पर था। इस सरकार को जनता की भावनाओं की कोई परवाह नहीं है और अपनी जन विरोधी नीतियों पर चलती जा रही है। जनता के पास अपना विरोध करने का एकमात्र हथियार अपना वोट है और उसने कांग्रेस के खिलाफ वोट देकर अपना रोष और बदलने की भावना को साफ रूप से प्रकट कर दिया है। बाकी इन चुनाव परिणामों का विश्लेषण तो कई दिनों तक चलता रहेगा।
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आखिर कौन है यह निर्मल बाबा?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19 April 2012
अनिल नरेन्द्र
लोगों की परेशानियों को दूर करने का दावा करने वाले निर्मल नरूला उर्प निर्मल बाबा आजकल सुर्खियों में हैं। गौरतलब है कि निर्मल बाबा झारखंड के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एवं लोकसभा सांसद इन्दर सिंह नामधारी के साले हैं। सन् 1950 में जन्में निर्मल जीत सिंह सिख परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके एक पुत्र और पुत्री है। श्री नामधारी के मुताबिक उन्होंने निर्मल जीत की बहन से 1964 में विवाह किया था। उस समय निर्मल जीत की उम्र 14-15 साल थी। पटियाला के समाना गांव में रहने वाले निर्मल बाबा का परिवार 1947 में देश के बंटवारे के समय भारत आया था। बाबा शादी-शुदा हैं और उनके एक पुत्र और पुत्री है। निर्मल जीत सिंह नरूला उर्प निर्मल बाबा पर अब कानूनी शिकंजा कसता जा रहा है। मुजफ्फरपुर सहित मेरठ और भोपाल में बाबा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई है। बाबा जी मुझे गाड़ी दिला दीजिए, बाबा जी मैंने जो विश मांगी है वह भी पूरी कर दीजिए। बाबा जी मेरा वर्प टार्गेट पूरा करने का आशीर्वाद दें। मुझे अच्छा घर दिला दें, अच्छी नौकरी दिला दें इत्यादि-इत्यादि कुछ इस प्रकार की फरमाइशें देश के 36 चैनलों पर सिर्प एक व्यक्ति (निर्मल बाबा) से पूरा करने को कहा जाता है। निर्मल बाबा के इंटरनेट पर 30 लाख से अधिक लिंक्स हैं। टीवी चैनलों पर विज्ञापन के माध्यम से बाबा की लोकप्रियता काफी बढ़ गई है। काला पर्स रखने के बाबा के टिप्स से उनकी बिक्री काफी बढ़ गई है। अकेले रांची में काले पर्स की बिक्री अब लगभग हर महीने 115 की हो रही है। 10 रुपये के नए नोट की गड्डी बाहर में 1200 रुपये में बिकने लगी है। बाबा के समागम में फर्जीवाड़ा ः पहले बुकिंग करानी पड़ती है, रजिस्ट्रेशन शुल्क 2000 रुपये प्रति व्यक्ति है, दो वर्ष के ऊपर के बच्चों का भी पूरा पैसा लगता है। समागम में हिस्सा लेने के लिए पंजाब नेशनल बैंक ने पे-फी का सिस्टम शुरू किया है ताकि प्रोसेस जल्द हो। इसके लिए चालान वेबसाइट से डाउनलोड किए जा सकते हैं। मुजफ्फरपुर के सदर थाने क्षेत्र प्रहलादपुर पताही निवासी वकील सुधीर ओझा ने बाबा पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया है। उन्होंने इस संबंध में सीजेएम कोर्ट में आपराधिक मामला (धारा 420, 406, 295) दर्ज कराया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि बाबा ने अपने भक्तों से धर्म के नाम पर उनकी कमाई का 10 फीसदी हिस्सा प्रलोभन देकर लेने का काम किया। इससे बाबा ने लगभग 235 करोड़ रुपये अपने दो खातों में अर्जित कर लिए। कोर्ट ने शिकायत पर नोटिस लिया है। प्रथम श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी रंजुला भारती को जांच का आदेश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 2 मई को है। इसी तरह मेरठ और भोपाल में भी बाबा के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। निर्मल बाबा के खाते में करोड़ों रुपये हैं। बात यह समझ नहीं आती कि बाबा ने एक साथ इतने सारे लोगों को बेवकूफ बनाया या फिर उनमें कोई ऐसी चमत्कारी शक्ति है जो लोगों को आकर्षित करती है? ऐसा नहीं लगता कि उन्होंने जबरन किसी से पैसे ऐंठे? लोगों ने स्वेच्छा से पैसे दिए। मामले की जांच शुरू हो गई है, देखें कि बाबा की असलियत क्या है?
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Wednesday, 18 April 2012

जुर्म की दुनिया में महिलाओंकी बढ़ती सक्रियता

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18 April 2012
अनिल नरेन्द्र
राजधानी दिल्ली और एनसीआर में क्राइम की दुनिया में महिलाओं की सक्रियता चिन्ता का विषय बनता जा रहा है। एक समय था जब जुर्म की दुनिया में पुरुष बिग बॉस हुआ करते थे पर पिछले कुछ दिनों से ऐसी खबरें आ रही हैं, जिनसे पता चलता है कि अब इस क्षेत्र में केवल पुरुष ही सरगना नहीं रहा महिलाएं भी कूदती जा रही हैं। विजय विहार थाना पुलिस ने शुक्रवार को कम्प्यूटर की मदद से घर में नकली नोट छापकर उन्हें सप्लाई करने वाली एक महिला को गिरफ्तार किया है। आरोपी महिला की पहचान 42 वर्षीय अलका ग्रोवर के रूप में हुई है। उसके पास से 25,800 रुपये के नकली नोट व छपाई में इस्तेमाल किया जाने वाला सामान भी जब्त किया गया है। उसके दो फरार साथियों की तलाश जारी है। महिला दिल्ली से पंजाब तक यह नकली नोट सप्लाई करती थी। पुलिस उपायुक्त भोला शंकर ने बताया कि शुक्रवार को सूचना मिली थी कि विजय विहार सी ब्लॉक के एक घर में नकली नोट छापे जा रहे हैं। पुलिस ने छापा मारकर घर से 500 रुपये के 46,100 रुपये के 27 और 50 रुपये के दो नकली नोट बरामद किए। पति के जेल में होने की वजह से महिला के आर्थिक हालात बेहद खराब थे। उसके बच्चे पंजाब के स्कूल में पढ़ते हैं। वह जेल में एक दिन जब अपने पति से मुलाकात करने गई तो वहां उसे तेजेन्द्र और विनोद मिले, उसके आर्थिक हालात के बारे में जानकर उन्होंने उसे अपने गिरोह में शामिल कर लिया और यहीं से शुरू हुआ उसका घर में नकली नोट छापने का धंधा। छानबीन कर रही पुलिस ने जब नोट जब्त किए तो इसके नकली होने का उन्हें भी विश्वास नहीं हुआ। दरअसल इन नोटों को बनाने में बेहतरीन क्वालिटी के कागज का इस्तेमाल किया गया। इसके अलावा वॉटर मार्प और सिक्यूरिटी थ्रेड भी नोट में होने की वजह से इसके नकली होने का किसी को शक नहीं होता था।

कुछ दिन पहले खबर आई थी कि दिल्ली में शराब तस्करी में भी एक महिला लेडी डॉन को गिरफ्तार किया। आउटर दिल्ली पुलिस को सूचना मिली कि रोहिणी इलाके में लिव-इन रिलेशन में रहने वाला एक जोड़ा शराब की तस्करी के धंधे को अंजाम दे रहा है। देर रात पुलिस ने रेड कर शिवानी, ब्रजमोहन और विनोद नामक युवक को गिरफ्तार कर लिया। सूत्रों के अनुसार शिवानी और ब्रजमोहन लिव-इन रिलेशन में रहते हैं। ब्रजमोहन और विनोद हरियाणा से देशी शराब लाने का काम करते थे। फिर महिला के इशारे पर उसे लैला, जॉनी वॉकर आदि जैसी महंगी ब्रांड की बोतलों में भरा जाता था। तस्करी पर शक न हो इसके लिए शिवानी खुद ही ग्राहक ढूंढने और डिलीवरी करने का काम करती थी। लाखों की संख्या में बरामद हुई शराब की बोतलों को पुलिस ने जब्त किया है। पूछताछ में पता चला है कि भारी मात्रा में बरामद शराब को एमसीडी चुनाव में खपाया जाना था। इन दोनों किस्सों के अलावा भी जुर्म की दुनिया में महिलाओं की बढ़ती सक्रियता के किस्से सामने आए हैं। यह दुःख की बात है कि अवैध धंधों में अब महिलाएं भी बढ़चढ़ कर भाग लेने लगी हैं।
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तालिबानी हमले से कांपा अफगानिस्तान

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18 April 2012
अनिल नरेन्द्र
तालिबान ने काबुल में अफगानिस्तानी संसद और कई देशों के दूतावासों पर हमला कर यह संकेत दे रहा है कि तालिबान पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो चुका है। यह हमला तालिबान की ताकत का तो अहसास कराता ही है पर साथ-साथ यह भी बताता है कि अफगानिस्तान का भविष्य अंधकार में है, तालिबान के निहायत खतरनाक इरादे हैं। ओसामा बिन लादेन की बरसी से 17 दिन पहले तालिबान ने दुनिया को चुनौती दी है। आत्मघाती हमलावरों ने रविवार को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और रूस के दूतावासों पर हमले किए। साथ ही नेशनल असेम्बली में घुसने की भी कोशिश की। इसके अलावा तीन और शहरों में भी हमले हुए। कुल 11 जगहों पर हुए हमलों में 48 लोग मारे गए हैं। इनमें 19 आतंकी भी शामिल हैं। आतंकियों ने राकेट, ग्रेनेड और मशीनगनों से फायरिंग की। दिन के तीन बजे शुरू हुई गोलीबारी कुछ जगहों पर देर शाम तक चलती रही। 2001 के बाद से इसे काबुल पर अब तक का सबसे भीषण हमला बताया जा रहा है। तालिबान प्रवक्ता जबीउल्ला मुजाहिद ने हमलों की जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि यह महज शुरुआत है। हमले की तैयारी एक माह से चल रही थी। आने वाले समय में और हमले होंगे। इस हमले के पीछे हक्कानी गुट का हाथ होने की आशंका जताई जा रही है। 1994 से सक्रिय इस समूह का संचालन पाकिस्तान से होता है। अमेरिका कई बार पाक को हक्कानी पर लगाम लगाने की हिदायत दे चुका है। गुट की कमान मौलवी जियाउद्दीन हक्कानी और उसके बेटे सिराजुद्दीन हक्कानी के हाथों में है। संगठन तालिबान से मिला हुआ है। हक्कानी गुट पर इसलिए शक जाता है क्योंकि विगत सितम्बर में अमेरिकी दूतावास को इसी ने निशाना बनाया था। दरअसल पिछले दिनों अमेरिकी अधिकारियों की तालिबान के साथ बातचीत के पटरी से उतर जाने के बाद से ही अफगानिस्तान में आतंकवादी हिंसा की आशंका जताई जा रही थी। 2014 में अमेरिका और उसके सहयोगी अफगानिस्तान से कूच करने की तैयारी में हैं। यह चिन्ता का विषय है कि लगभग 1,25,000 नाटो सैनिकों की उपस्थिति के बावजूद हामिद करजई सरकार राजधानी काबुल की सुरक्षा में भी सक्षम नहीं दिखती। जाहिर है कि तालिबान का मनोबल इसलिए भी बढ़ा हुआ है, क्योंकि उन्हें मालूम है कि अमेरिका और उसके सहयोगी अब अफगानिस्तान में चन्द दिनों के ही मेहमान हैं। जाते-जाते अमेरिकी सैनिक भी ऐसी हरकतें कर रहे हैं जिससे आग और ज्यादा भड़के। कुरान को जलाना, एक अमेरिकी सैनिक द्वारा 16 निर्दोष अफगानियों को मौत के घाट उतारने से भी तालिबान को बल और जन समर्थक बढ़ा है। पिछले ही दिनों में हामिद करजई ने विदेशी सैनिकों को ग्रामीण इलाकों को छोड़ शहरी क्षेत्र में मुख्य कैम्पों में लौट जाने को कहा था। काबुल की मांग यह भी है कि अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से वापसी की प्रक्रिया पहले ही शुरू कर दें। समझ नहीं आता कि करजई किस बिनाह पर ऐसा कह रहे हैं। अफगानिस्तान के मौजूदा परिदृश्य से हमें भी चिंतित होना चाहिए। यह राहतकारी है कि ताजा कार्रवाई से भारतीय दूतावास अछूता रहा, लेकिन यह सही समय है जब भारत सरकार इस पर गम्भीरता से विचार करे कि अफगानिस्तान के पुनरुत्थान में वह जो अरबों रुपये खर्च कर रही है उससे भारत को क्या हाथ लगने वाला है?
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Tuesday, 17 April 2012

पाकिस्तान में हिन्दू नरक की जिंदगी व्यतीत करने पर मजबूर

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17 April 2012
अनिल नरेन्द्र
पिछले सप्ताह वीर अर्जुन में एक पाठक का पत्र छपा। इस पत्र में बड़ी भावुकता से पाकिस्तान से आए हिन्दुओं की वहां की स्थिति बयान की गई है। मैं पाठकों के लिए श्री रमन गुप्ता, रोहताश नगर, शाहदरा का पत्र प्रस्तुत कर रहा हूं ताकि हम पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुओं की वास्तविक स्थिति को समझ सकें और जान सकें कि वह कैसे जिंदगी बसर कर रहे हैं। रमन गुप्ता लिखते हैं ः चाहे कुछ भी करो साहब। हमें वापस पाकिस्तान न भेजो। वहां हम पर जुल्म ढाया जाता है, बहु-बेटियों की अस्मत को रौंदा जाता है, हमें दुश्मन की नजर से देखा जाता है, वहां हमारी जिंदगी नरक हो गई है। हम पर रहम कीजिए साहब। हम पाकिस्तान नहीं जाना चाहते। यह करुणा पुकार उन 27 हिन्दू परिवारों की है जो पाकिस्तान से दुखी, हताश होकर भारत में शरण लेने के लिए आए हैं। गाजियाबाद पुलिस ने उन्हें 16 दिसम्बर की ठंडी सर्द रात में 12.15 बजे गाजियाबाद के डासना देवी मंदिर से जबरदस्ती बसों में ठूंसकर वापस दिल्ली के मजनूं के टीले पर भेज दिया। एक तरफ तो हमारे देश की सरकार मुस्लिमों को विभिन्न प्रकार के आरक्षण तथा उनको सरकारी धन और हिन्दुओं के मंदिरों के धन की तरह-तरह की योजनाएं चलाकर आर्थिक सहायता कर रही है। पाकिस्तान तथा बंगलादेश से आए लगभग 4 करोड़ मुस्लिम घुसपैठियों को राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस बनाकर दे रही है। इनका वोटर लिस्ट में नाम तक चढ़ा रही है जबकि ये मुस्लिम घुसपैठियों की वजह से कई जिले मुस्लिम बहुल हो चुके हैं। ये जिन इलाकों में रहते हैं वहां के हिन्दुओं का इन्होंने जीना दूभर कर दिया है। आए दिन वहां दंगे होते हैं। हिन्दुओं की बहु-बेटियों का अपहरण कर उनके साथ जबरदस्ती तथा जबरन धर्म परिवर्तन किया जाता है। कई इलाकों में तो हिन्दू अपने घरों को छोड़ने पर मजबूर हो चुके हैं। इन घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय, भारत सरकार को कई बार कहा जा चुका है पर सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। इसके उल्टा पाकिस्तान से भारत में शरण लेने के लिए आए भारत भक्त 27 हिन्दू परिवारों को किसी भी कीमत पर मरने के लिए पाकिस्तान वापस भेजने पर आमादा है। ये हिन्दू भारत को अपना देश, यहां के हिन्दू धर्म को अपना धर्म मानते हैं। भारत माता के ये पुत्र अपनी भारत माता की गोद के लिए तरस रहे हैं। सब जानते हैं कि भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हिन्दू तथा मुसलमानों के आधार पर कांग्रेस के बड़े नेताओं की सहमति से हुआ था।
श्री रमन गुप्ता का यह पत्र मैंने इसलिए प्रस्तुत किया है ताकि हम पाकिस्तान में रह रहे बचे-खुचे हिन्दुओं का दुख-दर्द समझ सकें। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की अध्यक्ष जोहरा यूसुफ ने एक न्यूज एजेंसी, आईएएनएस को इस्लामाबाद से फोन से बताया कि हिन्दू समुदाय डरा हुआ नहीं है बल्कि नाराज है और असहाय महसूस कर रहा है। उन्होंने कहा कि बलूचिस्तान और सिंध प्रांतों में हिन्दू लड़कियों का जबरन धर्मांतरण और फिरौती के लिए अपहरण किया जा रहा है। हाल ही में जबरन धर्म परिवर्तन का एक मामला उच्चतम न्यायालय में आया, जिसमें एक युवा महिला ने कहा कि वह अपने परिवार के पास वापस लौटना चाहती है। मानवाधिकार कार्यकर्ता ने कहा कि हिन्दू समुदाय के लोग जबरन धर्म परिवर्तन को खत्म करने के लिए एक कानून की मांग कर रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार पाकिस्तान की कुल 17 करोड़ की आबादी में 5.5 प्रतिशत हिन्दू लोग हैं। इनमें 90 फीसदी सिंध में रहते हैं जबकि शेष पंजाब और बलूचिस्तान प्रांत में बसे हुए हैं। पाकिस्तान में कुछ राजनीतिक पार्टियां और हिन्दू संगठन सिंध प्रांत में हिन्दू समुदाय की लड़कियों के अपहरण और उनके धर्म परिवर्तन के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। मानवाधिकार क्लब, युवा हिन्दू फोरम, पाकिस्तान अल्पसंख्यक आयोग, आवामी जमहूरी पार्टी, पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ और पाकिस्तान हिन्दू परिषद ने रविवार को इन घटनाओं के विरोध में कराची प्रेस क्लब के सामने प्रदर्शन भी किया था। इन सभी ने आरोप लगाया है कि मीरपुर मठेलो शहर में एक हिन्दू लड़की रिंकल कुमारी का अपहरण कर उसका जबरन धर्म परिवर्तन (हिन्दू से इस्लाम) कर दिया गया। पाकिस्तान हिन्दू परिषद के संरक्षक रमेश कुमार वकवानी ने कराची से टेलीफोन पर बताया कि देश में हिन्दुओं के लिए वातावरण सुरक्षित नहीं है। हिन्दुओं के खिलाफ अपराधों में वृद्धि हुई है। हिन्दुओं के अपहरणों की तादाद 2007 के बाद से तेज हुई है। प्रत्येक वर्ष हमारे पास लगभग 50 हिन्दू लड़कियों के जबरन धर्म परिवर्तन की शिकायतें आती हैं। भारत सरकार को पाकिस्तान सरकार से यह मुद्दे उठाने चाहिए। जहां भारत में अल्पसंख्यकों के लिए उनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त कानून है तो पाकिस्तान पर ऐसा करने के लिए क्यों नहीं दबाव बनाया जा सकता? रहा सवाल भारत में पाकिस्तान से आए सताए हिन्दुओं को भारत में रहने की इजाजत तो दी ही जानी चाहिए।
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इस रेट से तो ममता की छवि और लोकप्रियता तेजी से घटेगी

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जिद और अक्कड़पन से अब सब परिचित हो चुके हैं। लगता है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद तो उनमें अहंकार और तानाशाह प्रवृत्ति में इजाफा हो गया है। अब तो वह अपने खिलाफ बना कार्टून को भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कार्टून लगाने के आरोप में जादवपुर विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर को शुक्रवार को गिरफ्तार कर लिया गया। यह कार्टून दिनेश त्रिवेदी को रेल मंत्री पद से हटाकर उनकी जगह मुकुल रॉय को नया रेल मंत्री बनाने के संदर्भ में यह कार्टून बनाया गया था। रसायन शास्त्र के प्रोफेसर अम्बिकेश महापात्रा की गिरफ्तारी से आक्रोश फैल गया और माकपा एवं शैक्षणिक समुदाय ने कहा कि पुलिस कार्रवाई बिल्कुल दमनात्मक है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के न्यूनतम लोकतांत्रिक अधिकार पर स्पष्ट हमला है। बाद में अलीपुर की अदालत ने प्रोफेसर को जमानत पर रिहा कर दिया। प्रोफेसर महापात्रा ने आरोप लगाया कि कार्टून डालने के कारण गुरुवार रात तृणमूल कांग्रेस के 15 समर्थकों ने उनके साथ बदसलूकी भी की। प्रोफेसर ने कहा कि वे अपनी सुरक्षा को लेकर खतरा महसूस कर रहे हैं। वहीं विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल माकपा ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार अखबारों पर अंकुश लगाकर लोकतंत्र और आजीविका के अधिकार पर हमला कर रही है। वहीं पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने कार्टून विवाद पर कहा कि कार्टून लोकतंत्र का हिस्सा है। उन्होंने कहा, मेरा मानना है कि कार्टून स्वस्थ लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है। कार्टून आपकी छवि को खराब नहीं कर सकते हैं। माकपा के वरिष्ठ नेता अब्दुर रज्जाक मोल्ला ने शनिवार को आरोप लगाया कि राज्य सरकार अखबारों पर अंकुश लगाकर लोकतंत्र और आजीविका के अधिकार पर हमला कर रही है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने फरमान जारी किया कि सरकारी पुस्तकालयों में सिर्प चुनिंदा अखबार ही रखे जाएं। सरकार विरोधी अखबारों के लिए पुस्तकालय में कोई जगह नहीं है। मोल्ला ने स्टूडेंट्स हॉल में माकपा (माले) लिबरेशन की ओर से आयोजित सम्मेलन में कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वहीं सम्मेलन में मौजूद कवि नवारुण भट्टाचार्य ने कार्टून बनाने वाले के खिलाफ कार्रवाई को राज्य सरकार की मनमानी और अराजकता कहा। शिक्षाविद् सुनन्दा सान्याल ने प्रोफेसर की गिरफ्तारी की निंदा करते हुए कहा कि ममता बनर्जी ने राज्य में सत्ता परिवर्तन का नारा उछाल कर सत्ता हथियाने में कामयाबी हासिल की। सच तो यह है कि राज्य में कहीं भी परिवर्तन की झलक नहीं दिख रही है। यह दुःखद, दुर्भाग्यपूर्ण व निंदनीय है। ममता धीरे-धीरे फासिस्ट होती जा रही हैं। हमारा मानना है कि ममता बनर्जी में अपने खिलाफ किसी प्रकार की आलोचना या व्यंग्य बर्दाश्त करने की क्षमता कम होती जा रही है। लोकतंत्र में कार्टून बनाना कोई अपराध नहीं है और ऐसा रोकना प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला करना है। जिस तरह से ममता चल रही हैं उससे तो यही लगता है कि वह बहुत तेजी से अलोकप्रिय हो जाएंगी और उनकी बनी छवि धूमिल हो जाएगी। वाम नेताओं से उनको इतनी नफरत है कि वह अब यह भी ठीक से फैसला नहीं कर पा रही कि क्या ठीक है क्या गलत?
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