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Friday, 13 July 2012

समाजवादी पार्टी का मिशन ः प्रधानमंत्री मुलायम सिंह

समाजवादी पार्टी का अब अगला मिशन केंद्र में सरकार बनाने का है और श्री मुलायम सिंह यादव को प्रधानमंत्री बनाने का। इस मिशन पर अब पार्टी लग भी गई है। श्री मुलायम सिंह कई बार कह चुके हैं कि अगले लोकसभा चुनाव किसी भी समय हो सकते हैं। दो दिन पहले भी उन्होंने यह दोहराया। उन्होंने कहा कि पार्टी नेता और कार्यकर्ता आगामी लोकसभा चुनाव के लिए कमर कस लें क्योंकि लोकसभा चुनाव समय से पहले 2013 में ही हो सकते हैं। लोकसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर पार्टी कार्यालय (लखनऊ) में आयोजित वरिष्ठ नेताओं की बैठक में मुलायम ने मंगलवार को कहा कि वर्तमान राजनीतिक हालातों को देखते हुए चुनाव निर्धारित समय (2014) से पहले होने से इंकार नहीं किया जा सकता। अकेले मुलायम सिंह ही इस विचार के नहीं कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का भी यही मानना है कि मनमोहन सिंह सरकार अब ज्यादा दिन तक नहीं चल सकती। अब तो पार्टी के संकट मोचक प्रणब मुखर्जी भी बचाने के लिए नहीं हैं। मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी से न तो पार्टी सम्भल रही है और न ही सरकार। मुलायम सिंह को लगता है कि विधानसभा में जिस प्रकार अखिलेश को जीत मिली है उसे देखते हुए पार्टी 50 सीटें जीत सकती है। मुलायम ने लोकसभा चुनाव के लिए जिताऊ प्रत्याशियों की चयन प्रक्रिया शुरू कर दी है। उन्होंने जिताऊ प्रत्याशियों की तलाश के लिए 58 पर्यवेक्षक भी नियुक्त कर दिए हैं। साथ ही यह भी ताकीद कर दी है कि कोई भी विधायक या मंत्री लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी नहीं बनाया जाएगा। केंद्र में सपा को सरकार बनानी है इसलिए टिकट उसी को दिया जाएगा जिसकी जीतने की सम्भावना हो। प्रत्याशियों के चयन के लिए इच्छुक लोगों से दस हजार रुपए देकर आवेदन भरने को कहा गया है। आवेदन पत्र जमा करने के बाद पर्यवेक्षकों से प्रत्याशी के बारे में रिपोर्ट देने को कहा जाएगा। जिस प्रत्याशी को पर्यवेक्षक जिताऊ मानेगा, उसी को टिकट दिया जाएगा। पार्टी ने अपना सारा ध्यान उन 58 संसदीय क्षेत्रों पर लगाया है जहां से पार्टी चुनाव हारी थी। पर्यवेक्षकों को 30 जुलाई तक अपनी रिपोर्ट देने को कहा गया है। चुनाव कभी भी हो सकते हैं इसलिए सारी तैयारी विधानसभा की तर्ज पर समय से पहले कर लिए जाने पर जोर दिया गया। पार्टी की यह रणनीति रहेगी कि अखिलेश यादव की उज्ज्वल छवि को लोकसभा चुनाव में भी इस्तेमाल किया जाएगा। समाजवादी पार्टी अकेली ही नहीं जो लोकसभा चुनावों की तैयारियों में जुट गई हो। मायावती ने भी तैयारियां आरम्भ कर दी हैं। हाल के विधानसभा चुनाव में पार्टी की पराजय के बाद बसपा ने संगठन में बदलाव हेतु कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। एक महत्वपूर्ण फेरबदल में दल के प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य को हटाकर पूर्व मंत्री राम अचल राजभर को जिम्मेदारी सौंप दी गई है। उधर नगर निगम चुनावों में भारी जीत के बाद भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी में नई ऊर्जा आ गई है। वह भी मिशन लोकसभा में जुट गए हैं। देखना यह है कि लोकसभा के चुनाव समय से पहले होंगे या फिर संप्रग सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी और चुनाव समयानुसार 2014 में होंगे?

Wednesday, 11 July 2012

अखिलेश के 100 दिनों ने मुलायम राज की याद ताजा कर दी है

उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार ने कार्यकाल के 100 दिन पूरे कर लिए हैं। पिता मुलायम सिंह यादव ने बेटे को 10 में से 10 नम्बर दिए हैं पर आम जनता में इस सरकार की छवि बहुत उत्साहवर्द्धक नहीं बन सकी। बेशक इस दौरान कुछ अच्छे काम भी हुए पर आमतौर पर यूपी की जनता में निराशा है। आम धारणा यह बन रही है कि वही समाजवादी पार्टी का शासन जो मुलायम के समय था वैसा ही शासन अखिलेश के नेतृत्व में सरकार का हो रहा है। 100 दिन के राज में अपराध बेतहाशा बढ़े हैं। इन 100 दिनों में 1149 हत्याएं हुई हैं। गत दिनों राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के घर भोजन करने गए। वह राष्ट्रपति चुनाव के लिए वोट मांगने यूपी गए थे। इस भोज में सब यह देखकर चौंक गए कि बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी (15 केस) व विजय मिश्रा (25 केस) भी मुख्यमंत्री निवास में शान से बैठे थे जबकि जेल में बन्द इन दोनों कुख्यात नेताओं को सिर्प विधानसभा आने की इजाजत थी। इस घटना से बवाल मचा, लेकिन यह स्पष्ट संकेत गया कि सपा का पुराना राज लौट आया है, कुछ भी नहीं बदला। हत्या, लूट, बलात्कार के मामले ही बीते साल की तुलना में डेढ़ गुना बढ़े हैं। लेकिन यूपी सरकार के नागरिक सुरक्षा मंत्री दुर्गा यादव की दलील है कि उत्तर प्रदेश में भगवान भी सरकार बना लें तो भी अपराधों पर काबू नहीं पा सकते। सूबे के लगभग हर थाने पर यादव थानेदार नियुक्त हो गया है। हर महत्वपूर्ण पद पर पहले यादवों को एडजस्ट किया जाता है, अगर कोई पद बचे या कोई यादव जाति का अफसर न मिले तो फिर दूसरी जाति के अफसर को मौका मिलता है। अखिलेश की जीत के बाद प्रतिक्रिया स्वरूप थोड़ी राजनीतिक बदले की वारदातें होना स्वाभाविक ही था पर सपा छुटभैया नेताओं की दबंगई ने तो सारी हदें तोड़ दी हैं। पिछले तीन महीनों में पुलिस बल ने प्रदेश भर से करीब 30 शिकायतें लखनऊ भेजी हैं। ज्यादातर मामले सपा नेताओं से संबंधित हैं। इन पर कार्रवाई तो दूर, उलटे कुछ मामलों में पुलिस अफसरों को ही रातोंरात लाइन हाजिर कर दिया गया। चुनाव के वक्त यूपी की जनता को यह डर तो सता रहा था कि कहीं वहीं मुलायम राज दोबारा न लौट आए और इसी वजह से मुलायम सिंह को यह आश्वासन भी देना पड़ा था कि हम किसी को नहीं बख्शेंगे। वोटरों को अखिलेश पर ज्यादा विश्वास था जो अब धीरे-धीरे टूट रहा है। भाजपा प्रवक्ता विजय पाठक का आरोप है कि पिछले तीन महीने में बुंदेलखंड में 18 किसानों ने खुदकुशी कर ली है। क्या कुछ सपा नेता जानबूझ कर रणनीति के तहत अखिलेश को फेल साबित करने पर तुले हैं? अखिलेश सरकार मंत्रिमंडल में ज्यादातर मंत्री मुलायम सिंह यादव के पुराने साथी हैं जिन्हें अखिलेश बचपन में चाचा कहा करते थे। लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में अब यह कहावत चल पड़ी है कि मुख्यमंत्री भतीजे पर चाचा मंत्री भारी पड़ रहे हैं। खासतौर पर शिवपाल सिंह यादव, जो उनके असली चाचा हैं और आजम खां। ऐसे दिग्गजों के सामने अखिलेश बौने साबित हो रहे हैं। मुलायम सिंह भी इस कहावत से परिचित हैं और वह सारा दोष मायावती शासन के कुछ नजदीकी अफसरों पर थोपने का प्रयास कर रहे हैं कि यह लोग अखिलेश सरकार की बदनामी कराने में जुटे हैं। अखिलेश को अपने स्टाइल में परिवर्तन करना होगा नहीं तो उनकी बनी छवि मिट्टी में मिल जाएगी।

Sunday, 24 June 2012

राशिद अल्वी जैसे दोस्त हों तो दुश्मनों की जरूरत नहीं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24 June 2012
अनिल नरेन्द्र
कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी जैसे दोस्त हों तो कांग्रेस को दुश्मनों की कोई जरूरत नहीं है। गौरतलब है कि मुरादाबाद की एक चुनावी सभा में बोलते हुए राशिद अल्वी ने कहा कि मुलायम सिंह यादव भाजपा के एजेंट हैं। उन्होंने कहा कि मैं यह बात बहुत पहले से कहता आ रहा हूं। मैं पिछले 10 वर्षों से कह रहा हूं कि इस देश में अगर भारतीय जनता पार्टी का सबसे बड़ा एजेंट कोई है तो वो मुलायम सिंह यादव हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर इस देश में भारतीय जनता पार्टी के इशारे पर कोई नाचता है तो वो मुलायम सिंह यादव हैं। सपा का इस बयान से नाराज होना स्वाभाविक ही था। सपा महासचिव राम गोपाल यादव ने प्रतिक्रिया स्वरूप कहा कि अल्वी की दिमागी हालत ठीक नहीं है, वह पगला गए हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राजेन्द्र चौधरी ने कहा है कि कांग्रेस अपने सांसद को सबक सिखाए। कांग्रेस को सोचना चाहिए कि उसे अल्वी जैसे पुंठित और वाचाल नेताओं का इलाज कैसे करना है। राशिद अल्वी का बयान उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता और बीमार मानसिकता का द्योतक है। वे इतने अज्ञानी हैं कि यह नहीं जानते कि मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सपा ने यदि सांप्रदायिक भाजपा के विरुद्ध मोर्चा नहीं खोला होता तो केंद्र में यूपीए सरकार बन ही नहीं पाती। परमाणु करार के समय भी मुलायम सिंह यादव ने ही केंद्र की सरकार बचाई थी। कांग्रेस को ऐसे ही अनर्गल बयानों की वजह से पिछले चुनावों में कीमत चुकानी पड़ी है। अल्वी को `मुस्लिमों के हत्यारे' नरेन्द्र मोदी का समर्थक बताते हुए उत्तर प्रदेश के चिकित्सा एवं परिवार कल्याण मंत्री अहमद हसन ने कहा कि अल्वी उन मुलायम सिंह यादव के बारे में ऐसा बयान दे रहे हैं जिन्होंने बाबरी मस्जिद को बचाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। मुलायम ही देश के एकमात्र ऐसे राजनेता हैं जिन्होंने मुसलमानों के हितों से जुड़े मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाया। सपा की नाराजगी भांपकर कांग्रेस पार्टी ने अल्वी के बयान को सिरे से खारिज करते हुए इसे अनुचित बताया। कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि पार्टी इस बयान से सहमत नहीं है। उन्होंने कहा कि अल्वी शायद चुनावी आवेश में बोल गए। उधर जनता पार्टी अध्यक्ष डाक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी ने मौके का पूरा फायदा उठाते हुए कांग्रेस पर हल्ला बोल दिया। जनता पार्टी के मेयर पद के प्रत्याशी के प्रचार में लखनऊ आए डॉ. स्वामी ने गुरुवार को पीए संगमा की वकालत करते हुए कहा कि देश में अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाने की जरूरत है। प्रणब मुखर्जी पर उन्होंने सोनिया गांधी के भ्रष्टाचार में हिस्सेदार होने का आरोप लगाते हुए कहा कि विदेशों में जमा नेहरू खानदान के 70 लाख करोड़ रुपये को बचाने के लिए प्रणब मुखर्जी को समर्थन देने की उनकी मजबूरी है। उन्होंने कहा कि संगमा ईसाई भी हैं और कोई ईसाई राष्ट्रपित नहीं बना है। मुलायम सिंह यादव को अपना भाई बताते हुए उन्होंने कहा कि वह उन्हें समझाएंगे कि यूपीए का दामन छोड़ें और बेइज्जत न हों, अपना सम्मान बचाएं। स्वामी ने कहा कि राशिद अल्वी का मुलायम को भाजपा का एजेंट बताना अनायास नहीं है। भले ही कांग्रेस अल्वी के बयान को उनके निजी विचार बताए लेकिन यह कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। एक तरह से कहा जाए कि मुलायम सिंह यादव से सोनिया गांधी 1999 का बदला ले रही हैं जब मुलायम की वजह से सोनिया प्रधानमंत्री नहीं बन पाई थीं। स्वामी ने मुलायम को नसीहत देते हुए कहा कि मौका अच्छा है। मुलायम कांग्रेस का साथ छोड़ दें वरना इसी तरह से बेइज्जत होते रहेंगे। उन्होंने अखिलेश यादव की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे नेहरू खानदान के लोगों जैसे मैट्रिक फेल नहीं हैं।
Anil Narendra, Daily Pratap, Vir Arjun, Rashid Alvi, Mulayam Singh Yadav, Akhilesh Yadav, Congress, Samajwadi Party, 

Saturday, 16 June 2012

राष्ट्रपति चुनाव के दंगल का पहला अध्याय

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 16 June 2012
अनिल नरेन्द्र
यूपीए ने राष्ट्रपति पद के लिए अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं निवर्तमान वित्त मंत्री का नाम तो घोषित कर दिया, उनके राष्ट्रपति चुने जाने में संदेह भी कम है किन्तु एक बात तो स्पष्ट है कि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव की अविश्वसनीयता एक बार फिर जगजाहिर हो गई है। पिछले दो दिनों से ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव की जुगलबंदी ने ऐसा पेंच फंसा दिया था कि कांग्रेस चारों खाने चित हो गई थी। कांग्रेस ने कभी उम्मीद नहीं की होगी कि ममता-मुलायम ऐसा पासा चलेंगे कि जिससे पार्टी के सारे समीकरण ही बदल जाएंगे। देखा जाए तो ममता ने एक तीर से कई निशाने लगाने की कोशिश की थी। यह वही मुलायम सिंह यादव हैं जिन्हें कुछ दिन पहले यूपीए-2 का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड पेश करने के लिए सरकार के प्रमुख मंत्रियों के साथ मंच पर खड़ा किया गया और रिपोर्ट को जारी किया गया था। ममता ने कांग्रेस से बदला लेने की कोशिश की थी। कांग्रेस ने यह चेतावनी देने की कोशिश की थी कि ममता आपके पास लोकसभा के 19 सांसद हैं तो हम समाजवादी पार्टी को गले लगाकर उनके 22 सांसदों का समर्थन पा सकते हैं, आप अपनी औकात में रहो। ममता ने एक झटके में कांग्रेस को उसकी औकात दिखाने की कोशिश की। अपने पैनल में सोमनाथ चटर्जी का नाम शामिल करके ममता ने यह भी जता दिया कि वह बंगालियों के खिलाफ नहीं हैं। प्रणब मुखर्जी का समर्थन इसलिए भी करने को ममता को मजबूर किया जा रहा था क्योंकि प्रणब बंगाली हैं और बंगाली होने के नाते ममता उनका समर्थन करने पर मजबूर होंगी पर ममता ने यहां भी कांग्रेस को मात दे दी और सोमनाथ चटर्जी का नाम लेकर इस आलोचना से भी अपने आपको बचा लिया। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की पसंद को खारिज करके ममता-मुलायम ने जो पासा फेंका था वह भले ही मुलायम सिंह की वजह से असफल हो गया किन्तु वह आने वाले दिनों में नए ध्रुवीकरण को जन्म देगा। अंतिम समय में जिस ढंग से दोनों नेताओं ने गुगली फेंकी थी उससे कांग्रेस की न सिर्प परेशानी ही बढ़ी थी बल्कि राष्ट्रपति चुनाव को बहुत पेचीदा बना दिया था। दरअसल राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम लेना एक सोची-समझी रणनीति का परिचायक है। कांग्रेस के अन्दर भी एक ऐसा धड़ा है जो मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद से हटाना चाहता है। मनमोहन सिंह का नाम सुझाना एक तरह से संप्रग सरकार के इन दोनों समर्थक दलों द्वारा प्रधानमंत्री में अविश्वास प्रकट करने के समान है। मनमोहन सिंह कांग्रेस पार्टी के लिए एक बोझ बन चुके हैं, वह एसेट कम लाइबिलिटी ज्यादा हैं। सभी जानते हैं कि मनमोहन को हटाना इस समय कांग्रेस के लिए सम्भव नहीं है पर ममता-मुलायम ने पंगा जरूर फंसा दिया है। दोनों ने सोनिया गांधी को यह भी स्पष्ट संदेश दे दिया था कि इस मामले में किसी भी निर्णय तक पहुंचने में तृणमूल और सपा की भूमिका को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। ममता और कांग्रेस में तल्खी बढ़ी है। एक कांग्रेसी सांसद अधीर चौधरी ने तो ममता की तुलना मीर जाफर से ही कर दी क्योंकि उन्होंने एक बंगाली (प्रणब मुखर्जी) का विरोध किया है। ममता के इस व्यवहार को सोनिया गांधी भूल नहीं सकतीं, इसलिए दोनों महिलाओं में एक ऐसी दरार पड़ गई है जिसे पाटना आसान नहीं होगा। ममता भी बहुत गुस्से में हैं।
यह तो पहले ही आशंका थी कि मुलायम यूपीए सरकार के सामने सीना तानकर खड़े होने की हैसियत में नहीं हैं लेकिन उन्होंने जिस तरह कांग्रेस को झटका दिया उससे एक बात तो साफ है कि उनके भरोसे कोई पार्टी या गठबंधन अपनी रणनीति तय नहीं कर सकता।
मुलायम तो तब झुके जब उन्हें लगा कि आय से अधिक सम्पत्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ तलवार लटक रही है और जुलाई में ही कांग्रेसी वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी द्वारा दायर मुकदमे की सुनवाई है तो उन्होंने ममता को गच्चा दे दिया। लेकिन इससे इतना तो स्पष्ट हो गया है कि ममता की नाराजगी यूपीए से बनी रहेगी जो किसी हद तक जा सकती है।
बहरहाल कांग्रेस को यूपीए घटक दलों एवं बाहर से समर्थन दे रही पार्टियों का प्रणब मुखर्जी के पक्ष में समर्थन तो हासिल हो गया और अब वह चाहेगी कि उसे एनडीए भी समर्थन दे दे ताकि उसके उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिए जाएं किन्तु लगता है कि अभी राष्ट्रपति चुनाव तक बहुत सारी राजनीतिक उठापटक होनी है। क्योंकि ममता ने कोलकाता पहुंच कर ऐलान कर दिया कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। मतलब यह कि राष्ट्रपति चुनाव के दंगल का पहला अध्याय ही खत्म हुआ है आगे महादंगल बाकी है।
Anil Narendra, Bahujan Samaj Party, Congress, Daily Pratap, Mamta Banerjee, Mulayam Singh Yadav, Pranab Mukherjee, President of India, Samajwadi Party, Sonia Gandhi, UPA, Vir Arjun

Wednesday, 30 May 2012

डिनर डिप्लोमेसी से एक तीर से कई शिकार करने का प्रयास

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30 May 2012
अनिल नरेन्द्र
जोड़-तोड़ की राजनीति में माहिर कांग्रेस ने एक बार फिर एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। यूपीए-2 के तीन वर्ष पूरे होने के मौके पर हुए आयोजन में मुलायम सिंह यादव को दिए सम्मान का तात्कालिक महत्व भले ही न हो पर इससे कांग्रेस की रणनीति की साफ झलक जरूर मिलती है। मजेदार बात यह है कि युवराज राहुल गांधी ने जिस समाजवादी पार्टी का हाल ही में सम्पन्न हुए यूपी विधानसभा चुनाव में घोषणा पत्र फाड़ा था उसी के मुलायम सिंह यादव न केवल यूपीए सरकार की उपलब्धियों की रिपोर्ट कार्ड ही जारी करते दिखे बल्कि डिनर टेबल पर उन्हें सोनिया गांधी ने अपने टेबल पर स्थान दिया। यूपीए खासतौर से कांग्रेस और सपा के रिश्ते को 1999 से देखना चाहिए, जब मुलायम सिंह यादव ने एनडीए सरकार के एक वोट से गिरने के बाद ऐन मौके पर सोनिया गांधी को समर्थन देने की चिट्ठी देने से इंकार कर दिया। अगर उस समय सोनिया गांधी प्रधानमंत्री नहीं बन सकीं तो इसकी एक वजह मुलायम का विरोध था। इसके बाद 2004 को दूसरा मोड़ आया जब मुलायम उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक जीत हासिल करने के बाद भी यूपीए सरकार के बुलावे का इंतजार ही करते रह गए। अब यह तीसरा दौर शुरू हो रहा है। राजनीति में न तो कोई स्थायी शत्रु होता है और न ही स्थायी मित्र। इसलिए हमें ताज्जुब नहीं हुआ कि जिस समाजवादी पार्टी का घोषणा पत्र राहुल ने फाड़ा आज उसी के मुखिया को इतना सम्मान वही पार्टी दे रही है। कांग्रेस ने मुलायम के सम्मान के माध्यम से सीधा संदेश ममता बनर्जी को देने का प्रयास किया है। बात-बात पर यूपीए सरकार को आंखें दिखाने वाली ममता के लिए यह संकेत है कि यदि वह किसी बात पर सरकार से समर्थन वापस लेती हैं तो सपा की ठंडी छांव में सरकार को सहारा मिल सकता है। मुलायम के सहारे से कांग्रेस ने सहयोगी दल तृणमूल कांग्रेस को यह एहसास करा दिया कि उसने बात-बात पर केंद्र सरकार पर ज्यादा दबाव बनाया तो सपा सरकार का हिस्सा बन सकती है। मगर इसके बावजूद आज मुलायम का पलड़ा भारी दिखता है। यूपी विधानसभा चुनाव में 225 सीटें जीतने के बाद यदि उनकी पार्टी उन्हें प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर देख रही है तो इसमें ही भावी राजनीति की पुंजी भी छिपी है। इसलिए हमें तो नहीं लगता कि मुलायम सिंह जैसा राजनीति में शातिर खिलाड़ी कांग्रेसियों की चालबाजी में इतनी आसानी से फंसेंगे। हां उत्तर प्रदेश में केंद्र की मदद के लिए यूपीए के साथ मधुर संबंध रखना सपा की मजबूरी है पर यदि वह यूपीए में शामिल होते हैं तो यह उनके लिए आत्मघाती भी हो सकता है। यही बात ममता पर भी लागू होती है, जिनकी कीमत पर मुलायम के साथ आने की अटकलें हैं। ममता भी जानती हैं कि अभी यूपीए में बने रहना ही उनके लिए लाभदायक है, क्योंकि सरकार में रह कर पश्चिम बंगाल के लिए वह जो दबाव अन्दर रहकर बना सकती है वह सरकार से बाहर निकलने पर नहीं बना सकेगी। कांग्रेस का मुलायम को सम्मान देने के पीछे एक और कारण यह हो सकता है कि राष्ट्रपति चुनाव सिर पर हैं। बिना सपा के समर्थन से कांग्रेस अपना उम्मीदवार चुनवाने में दिक्कत महसूस कर सकती है।
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Thursday, 10 May 2012

बटला हाउस फरार आतंकियों ने मुलायम से मांगी मदद

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10 May 2012
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली की बहुचर्चित बटला हाउस मुठभेड़ 19 सितम्बर 2008 को हुई थी। इस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हुए थे। इस मुठभेड़ में शामिल कुछ आतंकवादी तब से फरार हैं। इनमें इंडियन मुजाहिदीन के कथित आतंकवादी आरिज खान उर्प जुनैद भी शामिल हैं। खबर आई है कि जुनैद अब आत्मसमर्पण करना चाहता है और इस काम के लिए उसने सपा पमुख मुलायम सिंह यादव की मदद मांगी है। जुनैद और इंडियन मुजाहिदीन के अन्य कथित आतंकवादी असदुल्लाह अख्तर के परिवार वालों ने इस बाबत मध्यस्थों के जरिए मुलायम सिंह और समाजवादी पार्टी के अन्य पदाधिकारियों और पशासन से संपर्प किया है। परिजनों ने दिल्ली की अदालत में कथित आतंकियों ने सुरक्षित समर्पण के लिए मदद मांगी है। जुनैद और असदुल्लाह दोनों आजमगढ़ के रहने वाले हैं। जुनैद और वह साढ़े तीन साल से पुलिस से बचकर छिपे हुए हैं। माना जा रहा है कि ये दोनों आतंकी उत्तर पदेश में ही कहीं छिपे हैं। ये दोनों उन बारह इंडियन मुजाहिदीन आतंकवादियों में हैं जिन पर दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा ने इनाम घोषित कर रखा है। जुनैद पर पांच लाख का इनाम है जबकि असदुल्लाह पर एक लाख का इनाम है। दिल्ली पुलिस को जिन बारह कथित आतंकवादियों की तलाश है उनमें से नौ आजमगढ़ के हैं। तीन आतंकी शहजाद उर्प पप्पू, हाकिम और सलमान को यूपी एटीएस ने गिरफ्तार कर दिल्ली पुलिस के हवाले कर दिया था। शरिज उर्प जुनैद की तलाश जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली में हुए विस्फोट के सिलसिले में भी है। कुछ गिरफ्तार आतंकियों से पूछताछ में पता चला है कि जुनैद 23 नवंबर को उत्तर पदेश की अदालतों और सात मार्च 2006 में वाराणसी के संकट मोचन मंदिर में 50 धमाकों में भी शामिल रहा है। असदुल्लाह सिर्प दिल्ली बमकांड में शामिल बताया जाता है। जुनैद आजमगढ़ के बाजबहादुर मौहल्ले का रहने वाला है। जबकि असदुल्लाह गुलाम का पुरवा का वासी है। बताते हैं कि इन कथित आतंकियों के परिजनों ने उत्तर पदेश सरकार और पशासन में अपने सम्पर्प सूत्रों को बताया कि जुनैद और असदुल्लाह अदालत में समर्पण करना चाहते हैं। उन्हें इस बात का डर है कि अगर पुलिस के हाथ पड़ गए तो उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाएगा। परिजनों ने इस बात का आश्वासन मांगा है कि इन दोनों को उत्तर पदेश पुलिस, आतंकवादी विरोधी दस्ता, दिल्ली पुलिस के हवाले नहीं करेगा। असदुल्लाह के वालिद और आजमगढ़ के मशहूर चिकित्सक डा. जावेद अख्तर ने बताया कि हम लोगों ने मुलायम सिंह यादव को खत लिखकर दोनों के महफूज समर्पण के लिए मदद मांगी है। अख्तर के अनुसार पत्र में लिखा गया है कि दिल्ली पुलिस ने बटला हाउस मुठभेड़ में आजमगढ़ के युवाओं को बेवजह फंसाया है। हमने मुलायम सिंह यादव से कहा है कि वे इंसाफ दिलाने के लिए इस मामले में दखल दें क्योंकि उनकी पार्टी केंद्र सरकार को समर्थन कर रही है। अख्तर ने बताया कि गोपालपुर के समाजवादी पार्टी विधायक और मंत्री वसीम अहमद सरकार के साथ उनकी बातचीत में मदद कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें अपने बेटे के ठिकाने के बारे में कुछ नहीं पता। पिछले चार साल से उनका उससे कोई सम्पर्प नहीं है।
दिल्ली की बहुचर्चित बटला हाउस मुठभेड़ 19 सितम्बर 2008 को हुई थी। इस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हुए थे। इस मुठभेड़ में शामिल कुछ आतंकवादी तब से फरार हैं। इनमें इंडियन मुजाहिदीन के कथित आतंकवादी आरिज खान उर्प जुनैद भी शामिल हैं। खबर आई है कि जुनैद अब आत्मसमर्पण करना चाहता है और इस काम के लिए उसने सपा पमुख मुलायम सिंह यादव की मदद मांगी है। जुनैद और इंडियन मुजाहिदीन के अन्य कथित आतंकवादी असदुल्लाह अख्तर के परिवार वालों ने इस बाबत मध्यस्थों के जरिए मुलायम सिंह और समाजवादी पार्टी के अन्य पदाधिकारियों और पशासन से संपर्प किया है। परिजनों ने दिल्ली की अदालत में कथित आतंकियों ने सुरक्षित समर्पण के लिए मदद मांगी है। जुनैद और असदुल्लाह दोनों आजमगढ़ के रहने वाले हैं। जुनैद और वह साढ़े तीन साल से पुलिस से बचकर छिपे हुए हैं। माना जा रहा है कि ये दोनों आतंकी उत्तर पदेश में ही कहीं छिपे हैं। ये दोनों उन बारह इंडियन मुजाहिदीन आतंकवादियों में हैं जिन पर दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा ने इनाम घोषित कर रखा है। जुनैद पर पांच लाख का इनाम है जबकि असदुल्लाह पर एक लाख का इनाम है। दिल्ली पुलिस को जिन बारह कथित आतंकवादियों की तलाश है उनमें से नौ आजमगढ़ के हैं। तीन आतंकी शहजाद उर्प पप्पू, हाकिम और सलमान को यूपी एटीएस ने गिरफ्तार कर दिल्ली पुलिस के हवाले कर दिया था। शरिज उर्प जुनैद की तलाश जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली में हुए विस्फोट के सिलसिले में भी है। कुछ गिरफ्तार आतंकियों से पूछताछ में पता चला है कि जुनैद 23 नवंबर को उत्तर पदेश की अदालतों और सात मार्च 2006 में वाराणसी के संकट मोचन मंदिर में 50 धमाकों में भी शामिल रहा है। असदुल्लाह सिर्प दिल्ली बमकांड में शामिल बताया जाता है। जुनैद आजमगढ़ के बाजबहादुर मौहल्ले का रहने वाला है। जबकि असदुल्लाह गुलाम का पुरवा का वासी है। बताते हैं कि इन कथित आतंकियों के परिजनों ने उत्तर पदेश सरकार और पशासन में अपने सम्पर्प सूत्रों को बताया कि जुनैद और असदुल्लाह अदालत में समर्पण करना चाहते हैं। उन्हें इस बात का डर है कि अगर पुलिस के हाथ पड़ गए तो उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाएगा। परिजनों ने इस बात का आश्वासन मांगा है कि इन दोनों को उत्तर पदेश पुलिस, आतंकवादी विरोधी दस्ता, दिल्ली पुलिस के हवाले नहीं करेगा। असदुल्लाह के वालिद और आजमगढ़ के मशहूर चिकित्सक डा. जावेद अख्तर ने बताया कि हम लोगों ने मुलायम सिंह यादव को खत लिखकर दोनों के महफूज समर्पण के लिए मदद मांगी है। अख्तर के अनुसार पत्र में लिखा गया है कि दिल्ली पुलिस ने बटला हाउस मुठभेड़ में आजमगढ़ के युवाओं को बेवजह फंसाया है। हमने मुलायम सिंह यादव से कहा है कि वे इंसाफ दिलाने के लिए इस मामले में दखल दें क्योंकि उनकी पार्टी केंद्र सरकार को समर्थन कर रही है। अख्तर ने बताया कि गोपालपुर के समाजवादी पार्टी विधायक और मंत्री वसीम अहमद सरकार के साथ उनकी बातचीत में मदद कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें अपने बेटे के ठिकाने के बारे में कुछ नहीं पता। पिछले चार साल से उनका उससे कोई सम्पर्प नहीं है।
Anil Narendra, Batla House Encounter, Daily Pratap, Mulayam Singh Yadav, Samajwadi Party, Vir Arjun

Saturday, 28 April 2012

अगले राष्ट्रपति की रेस शुरू हो चुकी है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 28 April 2012
अनिल नरेन्द्र
बजट सेशन के दूसरे सत्र की शुरुआत के साथ ही राष्ट्रपति चुनाव की चर्चा जोर पकड़ने लगी है। देश के सर्वोच्च पद पर इस बार कौन बैठेगा? राजनीतिक दलों ने अभी से एक-दूसरे को टटोलना शुरू कर दिया है। पार्टियां राष्ट्रपति चुनाव को अपने शक्ति प्रदर्शन का लिटमस टेस्ट मान रही हैं। वर्तमान राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का कार्यकाल जुलाई के अंतिम हफ्ते में पूरा हो रहा है। फरवरी-मार्च महीने में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम और फिर उसके ठीक बाद 58 राज्यसभा सीटों के लिए एक साथ चुनाव होने के बाद राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलने लगे। राजनीतिक परिणाम गैर कांग्रेस, गैर बीजेपी दलों के पक्ष में अधिक रहे और इससे थर्ड फ्रंट की दिशा में काम कर मुलायम सिंह यादव और ममता बनर्जी जैसे नेता सक्रिय हो गए। वहीं एनसीपी नेता शरद पवार ने भी संकेत दिया है कि वे भी अपनी बात मजबूती से रखेंगे। तथाकथित थर्ड फ्रंट के नेताओं को सक्रिय होते देख दोनों कांग्रेस और भाजपा भी अब अपनी-अपनी पसंद आगे बढ़ाने में जुट गए हैं। कांग्रेस हाई कमान ने यूपीए के उम्मीदवार को ही रायसीना हिल्स पहुंचाने की मुहिम का आगाज कर दिया है। यह शुरुआत सोनिया गांधी ने एनसीपी नेता शरद पवार से की है। भले ही कांग्रेस के उम्मीदवार के नाम पर कोई खुलासा नहीं हुआ है, मगर कयास है कि `नम्बर गेम' देखते हुए प्रणब मुखर्जी कांग्रेस का चेहरा हो सकता है। कांग्रेस जानती है कि उनके नाम पर गैर एनडीए दलों को भी राजी किया जा सकता है। अगर सपा, बसपा, तृणमूल का साथ कांग्रेस को मिल जाता है तो कांग्रेस अपना उम्मीदवार जिता सकती है। किसी कांग्रेसी उम्मीदवार पर सहमति नहीं बनने की स्थिति में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को ही यूपीए का राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाने का बैकअप प्लान तैयार है। भारतीय जनता पार्टी की पहली पसंद पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम हो सकती है। इस मसले पर भाजपा ने अपने घटक दलों के साथ गैर यूपीए अन्य सियासी दलों का मन टटोलने की प्रक्रिया धीरे-धीरे शुरू कर दी है। भाजपा कलाम के अलावा किसी दूसरे नाम पर उसी सूरत में विचार करेगी जब उसे जीतने के लिए जरूरी समर्थन उनके नाम पर मिलता नजर नहीं आए। राष्ट्रपति चुनाव की घड़ी को भले ही समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव बहुत दूर बता रहे हों, लेकिन पार्टी अपना होमवर्प पूरा करने में जुटी हुई है। 2014 में लोकसभा की चुनावी जंग पर नजर रखते हुए सपा पूरी शिद्दत के साथ मुस्लिम उम्मीदवार की खोज कर रही है। इसी क्रम में मुलायम के निर्देश पर सपा के दो आला नेताओं ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी से गुप्त मुलाकात की थी। दूसरी ओर सपा की पसंदीदा सूची में अब्दुल कलाम का नाम लगभग बाहर हो चुका है। कुरैशी के साथ हामिद अंसारी के नाम पर भी सपा में गम्भीरता से विचार चल रहा है। कांग्रेस में और भी कई नाम चल रहे हैं। एक धड़ा लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार को जाति के समीकरणों को देखते हुए आगे बढ़ा रहा है और डॉ. कर्ण सिंह, सुशील शिंदे, फारुख अब्दुल्ला और सैम पित्रोदा जैसे नाम भी उछाले जा रहे हैं। रेस आरम्भ हो चुकी है। फिलहाल यह भविष्यवाणी नहीं की जा सकती कि भारत का अगला राष्ट्रपति कौन होगा।
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Saturday, 17 March 2012

अखिलेश की अग्निपरीक्षा तो अब शुरू हुई है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17 March 2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की पारी आरम्भ हो गई है। बृहस्पतिवार को खांटी गंवई रंग-ढंग में अभिजात्य छुअन, नए तेवर और कलेवर के साथ अपने बलबूते पर उत्तर प्रदेश में पहली बार बहुमत के साथ काबिज हुई सपा के 38 वर्षीय युवा चेहरे अखिलेश यादव और उनके मंत्रिपरिषद के सदस्यों ने पद की गोपनीयता की शपथ ली। राज्यपाल बीएल जोशी ने लखनऊ के स्थानीय `लॉ मार्टिनियर कॉलेज' मैदान में आयोजित भव्य समारोह में प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री की पारी शुरू कराई। अखिलेश के साथ 19 मंत्रियों ने भी शपथ ली। हालांकि इससे पहले अखिलेश के पिता श्री मुलायम सिंह यादव तीन बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने पर उन्हें हर बार दूसरों के समर्थन की बैसाखी पर ही खड़ा होना पड़ा है। इस बार सत्ता के लिए स्पष्ट जनादेश मिला है तो नए मुख्यमंत्री के लिए चुनौतियों का भी पहाड़ सामने है। शपथ समारोह से भी विवाद आरम्भ हो गए हैं। उनकी ताजपोशी के साथ विवादास्पद निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्प राजा भैया का कैबिनेट मंत्री बनना चौंकाने वाला था। राजा भैया के खिलाफ हत्या की कोशिश, डकैती, अपहरण समेत आठ आपराधिक मुकदमें दर्ज हैं। अखिलेश ने सफाई देते हुए कहा कि राजा भैया के खिलाफ लगे आरोप राजनीतिक साजिश थे। शपथ के बाद का अखिलेश और शपथ से पहले में फर्प आ गया है। यही अखिलेश हैं जिन्होंने डीपी यादव के पार्टी में प्रवेश पर आपत्ति की थी। अखिलेश के लिए एक बड़ी चुनौती गुंडाराज न लौटने की है। इधर अखिलेश शपथ ले रहे थे तो उधर उनकी पार्टी वाले ग्रेटर नोएडा के दादरी क्षेत्र में बसपा परिवारों को मारने-पीटने में लगे थे। उल्लेखनीय है कि इसी क्षेत्र में पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का गांव बादलपुर भी है। मायावती राज में सपा कार्यकर्ताओं की बहुत पिटाई हुई थी अब स्वाभाविक है कि वह बदला लेना चाहेंगे। इसी पर अखिलेश को नियंत्रण लगाना होगा। उनके मंत्रिपरिषद और पार्टी में बहुत वरिष्ठ नेता गण हैं। उन पर अंकुश लगाना आसान नहीं होगा। बच्चा कहकर कुछ मंत्री, संत्री अपनी मनमानी करना चाहेंगे। देखें अखिलेश इस समस्या का क्या समाधान निकालते हैं और सीनियरों की मनमानियों को रोकते हैं। 11 लाख युवाओं की उम्मीदों पर खरा उतरना आसान नहीं होगा। बेरोजगारी भत्ता का चुनावी वादा पूरा करने के लिए अखिलेश को डेढ़ हजार करोड़ रुपये जुटाने होंगे। पार्टी ने इससे पहले के कार्यकाल में जहां 500 रुपये महीना भत्ता दिया था वहीं इस बार बेरोजगार नौजवानों को 1000 रुपये देने का वादा किया है। अखिलेश ने दो वर्ष में गांवों के लिए 20 घंटे व शहर को 22 घंटे बिजली देने का वादा किया है। किसानों की तरह गरीब बुनकर को भी मुफ्त बिजली देने की बात घोषणा पत्र में कही गई है। उद्योग व कृषि क्षेत्र को भरपूर बिजली देने के साथ ही निजी व सरकारी क्षेत्र में बिजली उत्पादन को प्राथमिकता देते हुए नए बिजली घरों का निर्माण व पुराने का सुधार तथा बिजली चोरी रोकने को लाइन लॉस घटाने की घोषणा की गई है। गौर करने की बात यह है कि अभी बिजली उत्पादन व उपलब्धता की जो स्थिति है उससे ज्यादातर शहरों को ही
16-18 घंटे बिजली नहीं मिल पाती जबकि गांवों को तो औसतन 9 घंटे बिजली की आपूर्ति हो रही है। चूंकि बिजली घर स्थापित करने में 4 वर्ष लगते हैं इसलिए फिलहाल बिजली की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार अखिलेश के लिए चुनौती होगी। मुफ्त बिजली देने से डेढ़-दो हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का अतिरिक्त बोझ उस पॉवर कारपोरेशन पर पड़ेगा जो पहले से ही 8 हजार करोड़ रुपये से अधिक के घाटे में है। अब बारी आती है टैबलेट व लैपटॉप देने के मुद्दे पर। सपा के हाई स्कूल व इंटर पास विद्यार्थियों को मुफ्त लैपटॉप और टैबलेट पीसी बांटने का वादा किया है। इस वर्ष हाई स्कूल पास विद्यार्थियों की संख्या 25 लाख व इंटर पास 21 लाख रहने का अनुमान है। अगर टैबलेट पीसी का न्यूनतम मूल्य 50 डालर यानि 2500 रुपये ही माना जाए तो हाई स्कूल उत्तीर्ण विद्यार्थियों को उसे देने के लिए सालाना 625 करोड़ का खर्च आएगा। दोनों को मिलाकर अखिलेश को 3800 करोड़ रुपये का प्रबंध करना होगा। विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि अगर सपा सरकार अपने वादों पर अमल शुरू करने लगी तो उसे करीब 66 हजार करोड़ रुपये की सालाना व्यवस्था करने का प्रबंध करना पड़ेगा जबकि जगजाहिर है कि प्रदेश की आर्थिक स्थिति काफी खोखली हो चुकी है। पिछले वित्त वर्ष में यहां पर 18,959 करोड़ रुपये के घाटे का बजट था। इस वर्ष यह घाटा और बड़ी छलांग लगा सकता है। जाहिर है ऐसे में अखिलेश की सरकार को अपने चुनावी वादे पूरा करना आसान नहीं होगा। लेकिन इतना तय है कि यदि अखिलेश सरकार ने वाकई दृढ़ राजनीतिक संकल्प जताया तो इस लक्ष्य को पाना असम्भव भी नहीं है। हम अखिलेश को बधाई देने के साथ उम्मीद करते हैं कि वह प्रदेश की जनता की उम्मीदों पर खरे उतरेंगे।
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Sunday, 11 March 2012

पहले से ही पंगु यूपीए सरकार के लिए चुनौतियां मुंह फाड़े खड़ी हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 11 March 2012
अनिल नरेन्द्र
यूपीए की सरकार का कार्यकाल 2014 तक का है। अब से लोकसभा चुनाव का समय मनमोहन सिंह सरकार के लिए कांटों भरा होगा। उत्तर प्रदेश के विधानसभा परिणाम ने संप्रग सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। पिछले कुछ दिनों से लगभग पंगु हुई मनमोहन सरकार अगले दो साल किस तरह काटेगी, यह कहना बहुत मुश्किल है। आमतौर पर देखा गया है कि कोई भी सरकार अपने कार्यकाल के अंतिम एक-दो वर्षों में पूरी ताकत लगा देती है और लोकलुभावने कदम उठाती है ताकि पिछले सालों की जनता को आई तकलीफ वह भूल जाए पर इस सरकार के लिए अब ज्यादा लोकलुभावने कदम उठाना भी मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि अब वह लोकसभा और राज्यसभा में अपनी मनमानी इतनी आसानी से नहीं चला सकेगी। वह महत्वपूर्ण विधेयक नहीं ला सकती, क्योंकि दोनों सदनों में उसकी स्थिति पहले से भी कमजोर हो जाएगी। एक तरह से यह कहें कि यूपीए सरकार पर आचार संहिता लागू हो गई है। यूपी परिणाम से साफ है कि क्षेत्रीय पार्टियां मजबूत हो रही हैं और केंद्र कमजोर। ऐसे में कांग्रेस के बहुमत वाले यूपीए के सामने भी कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। इस समय मनमोहन सरकार के सामने कम से कम पांच चुनौतियां हैं जिनसे पार पाना उसके लिए टेढ़ी खीर साबित होगा। बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पंजाब, उत्तर प्रदेश, गोवा, महाराष्ट्र हर राज्य में कांग्रेस की स्थिति कमजोर हुई है। जुलाई में राष्ट्रपति चुनाव होना है। क्षेत्रीय पार्टियों के मजबूत होने के बाद अब कांग्रेस के लिए अपनी पसंद का राष्ट्रपति चुनना व चुनवाना आसान नहीं होगा। निर्वाचन मंडल और राज्यों के विधायकों के वोटों को जोड़कर राष्ट्रपति चुनाव के लिए संख्याबल बनता है। यूपी में भारी जीत के बाद समाजवादी पार्टी के 83824 वोट हो गए हैं। इसके अलावा ममता के 45,640 वोट, जयललिता के 35392 वोट की ताकत कांग्रेस के खिलाफ एकजुट होगी। ये राष्ट्रपति चुनाव के लिए जरूरी कुल वोटों का 15 फीसद है। इसलिए कांग्रेस को ऐसा उम्मीदवार लाना होगा जो बीजेपी समेत क्षेत्रीय दलों को भी मंजूर हो। मार्च में होने वाले उपराष्ट्रपति चुनाव कांग्रेस की पहली चुनौती होगी। यूपीए के सामने संसद में एफडीआई, खाद्य सुरक्षा जैसे दर्जनों बिल पास कराने की चुनौती अब पहले से भी ज्यादा हो गई है। जोड़तोड़ के सहारे सरकार लोकसभा में बेशक महत्वपूर्ण बिल पास करवा ले पर राज्यसभा में शायद यह इतना आसान न हो। राज्यसभा में तो वैसे ही कांग्रेस अल्पमत में है और अब विपक्ष और ज्यादा मजबूत हो जाएगा। इसी महीने राज्यसभा के भी 10 सदस्यों का चुनाव होने जा रहा है। एसपी की भारी जीत के बाद उसके 5-6 नए सदस्य आ सकते हैं। ऐसे में सपा जैसी क्षेत्रीय पार्टियों की अहमियत और बढ़ जाती है। कोई भी बिल पास कराने के लिए यूपीए को मुलायम, ममता समेत भाजपा और अन्य क्षेत्रीय पार्टियों का सहयोग और सुझाव लेना ही पड़ेगा। दिवालिया होने की कगार पर खड़ा देश मनमोहन सरकार की नुकसानदेय आर्थिक प्राथमिकताओं से जूझ रहा है। आर्थिक घाटे को कम करने के लिए सख्त बजट लाना और पास करवाना प्रणब मुखर्जी जैसे सुलझे नेता के लिए भी अब आसान नहीं होगा। संसद का बजट सत्र 12 को शुरू हो रहा है। विपक्षी दलों के हमलों के साथ ही तृणमूल कांग्रेस से चल रही अनबन के बीच सरकार को बजट पास करवाना है। महंगाई से जूझती जनता पर बजट में किसी भी प्रकार के सख्त कदम थोपने का भाजपा समेत यूपीए के घटक दल विरोध करेंगे। परिणाम आने से ठीक पहले सीएनजी की कीमत बढ़ा दी गई, पेट्रोल के दाम में भी वृद्धि की चर्चा है। ऐसे में मनमोहन सिंह सरकार के लिए अपनी सरकार की जनहित योजनाओं को पार करने के लिए अतिरिक्त बोझ डालना अब पहले से भी मुश्किल होगा और अगर वह धन उपलब्ध करा पाएगी तो इन लोकलुभावनी योजनाओं का क्या होगा? केंद्र और कांग्रेस ने एनसीटीसी यानि राष्ट्रीय आतंकवादी रोधी केंद्र का गठन प्रतिष्ठा का सवाल बना हुआ है। गृहमंत्री पी. चिदम्बरम इसे पारित करवाने पर तुले हुए हैं। केंद्र के इस फैसले का ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, नवीन पटनायक, शिवराज सिंह चौहान, नरेन्द्र मोदी, रमन सिंह के विरोध में अब मुलायम सिंह और गोवा के मुख्यमंत्री भी शामिल होंगे। ऐसे में बिना इनकी सहमति के यह बिल पास नहीं हो सकता। इन विधानसभा परिणामों से साफ हो गया है कि क्षेत्रीय पार्टियों के मुकाबले कांग्रेस और भाजपा कमजोर हुई है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या एक बार फिर चौथे मोर्चे की कवायद शुरू होगी? अभी लोकसभा में सपा के 22 सांसद हैं जो सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे हैं। यूपी के नतीजों के बाद महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी इत्यादि जैसे मुद्दों पर सपा का दूसरे दलों के साथ एक चौथा मोर्चा खड़ा करने की सम्भावना से कांग्रेस की चुनौतियां और बढ़ गई हैं। अगले दो साल में मनमोहन सरकार के और ज्यादा पंगु होने की सम्भावना है। देखें, मनमोहन सिंह सरकार इन मुंह फाड़े खड़ी चुनौतियों से कैसे निपटती है।
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Thursday, 8 March 2012

माया के खिलाफ नैगेटिव वोट और अखिलेश की आंधी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 8 March 2012
अनिल नरेन्द्र
पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के डिब्बे खुल चुके हैं। नया इतिहास रचा गया है। कारणों के लम्बे-चौड़े विश्लेषण होने लगे हैं। मोटे तौर पर जो प्रमुख कारण मुझे लगे वह कुछ इस प्रकार हैं। पहले बात हम करते हैं उत्तर प्रदेश की। यह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थे कि साइकिल ने हाथी को रौंद दिया। समाजवादी पार्टी की जीत का सबसे बड़ा कारण था मायावती सरकार के खिलाफ नैगेटिव वोट। यूपी की जनता ने तय कर लिया था कि मायावती की बसपा सरकार को हटाना था और सामने विकल्प के रूप में अखिलेश यादव नजर आए। अखिलेश यादव प्रदेश की जनता की नब्ज को पहचानने में सफल रहे। जीतोड़ मेहनत की और जमीन पर चलने वाले अखिलेश ने एक नई उम्मीद पैदा की। मेहनत तो राहुल गांधी ने भी कम नहीं की। उन्होंने भी दो महीने से यूपी की खाक छानी, 200 से ज्यादा रैलियां की पर जनता ऐसा नेता चाहती थी जिसके पास वह जाकर अपनी नाली, बिजली, पानी की समस्या कह सके। वह हर बार राहुल से आकर दिल्ली में तो कह नहीं सकते थे। राहुल की कड़ी मेहनत पर यूपी की कांग्रेसी इकाई ने सारा पानी फेर दिया। चुनावी माहौल तो राहुल ने बना दिया पर फसल काटने के लिए संगठन तैयार नहीं था। न कोई बूथ कमेटी थी न ही जिला कमेटी। जिन मुसलमानों को खुश करने के लिए कांग्रेस ने हर हथकंडा अपनाया, उन्होंने मुलायम की झोली में जाना बेहतर समझा। मुस्लिम वोट सपा, कांग्रेस और बसपा में बंटा, एकमुश्त किसी को नहीं गया पर बहुमत सपा के साथ गया। मायावती अपनी हार के लिए खुद जिम्मेदार हैं। उनका तानाशाह तरीका जनता को नहीं भाया। महारानियों की तरह उनके व्यवहार से खुद उनकी पार्टी वाले दुःखी थे। मुझे तो नहीं लगता कि दलित वोट भी पूरी तरह से बसपा को मिला। आखिर वह वोट देते भी क्यों? जिन दलितों के उद्धार के लिए मायावती शासन में आईं, उसी दलित को कॉलेज में एक क्लर्प की नौकरी पाने के लिए चार लाख रिश्वत देनी पड़ी थी। लोग भूखों मर रह थे और बहनजी हाथी बनवाने में लगी हुई थीं। पिछले पांच सालों में न तो किसी कॉलेज में चुनाव हुआ और न ही स्थानीय निकायों का चुनाव। सारी चुनावी प्रक्रिया ठप कर दी बहन जी ने। युवाओं में आक्रोश था। किसानों की जमीनें बिल्डरों को औने-पौने भाव में लुटा दीं और पैसा बनाने की फैक्टरी बन गई बसपा। फिर बहुजन समाज पार्टी में मायावती का विकल्प क्या था? उन्होंने कभी दूसरी पंक्ति की लीडरशिप खड़ा करने का प्रयास किया। कोई युवा चेहरा था उनके पास पेश करने को? विकल्प के रूप में युवा चेहरा नजर आया अखिलेश यादव का। नेता जी (मुलायम) शायद अपने बलबूते पर यह चुनाव न जीत पाते। आज भी उनके गुंडे राज को कोई नहीं भूला। 2007 में उनका इसीलिए सफाया किया गया था, क्योंकि हर थाने में, हर गांव में, तहसील में मुलायम खड़ा मिला। दरअसल सपा के वर्पर सत्ता में आने से सभी मुलायम बन जाते हैं और वही गुंडा राज आ जाता है। इसी से दुःखी जनता ने मायावती को चांस दिया था। अखिलेश यादव के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती होगी अपने कार्यकर्ताओं पर लगाम रखना। आते ही दो स्थानों पर तो गोली चल चुकी है, मारपीट हो चुकी है। यूपी की जनता ने यह साबित कर दिया है कि रणनीतियों से ज्यादा वह नीतियों को प्राथमिकता देती है। भाजपा को यही रणनीति चाट गई। इस बार का सारा यूपी का चुनाव राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने लड़ा। संजय जोशी, नितिन गडकरी ने उम्मीदवारों से लेकर रैलियों तक सब कुछ संघ के इशारों पर हुआ। संघ ने कहा कि आडवाणी सहित किसी बड़े नेता को दिल्ली, गुजरात से नहीं बुलाना, नहीं बुलाया गया। उमा भारती को जबरदस्ती लाकर यूपी के नेताओं में घमासान करा दिया। भाजपा इस चुनाव में विभाजित पार्टी की तरह उतरी और नतीजा सामने है। इस चुनाव में भाजपा की इतनी हार नहीं हुई है जितनी संघ की हुई है। भाजपा तो पहले से भी ज्यादा गिर गई। इसी रणनीति, गलत नीतियों की वजह से उत्तराखंड में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा। उत्तराखंड की विडम्बना देखिए कि वह रमेश पोखरियाल निशंक चुनाव जीत गए जिन्हें भ्रष्ट होने के आरोप में हटाया गया और वह भुवनचन्द खंडूरी चुनाव हार गए जिनकी ईमानदार छवि पर भाजपा ने दाव लगा दिया। इससे तो शायद बेहतर होता कि निशंक को ही बनाए रखते और चुनाव से तीन महीने पहले उठाकर पार्टी को नुकसान पहुंचा दिया। इस चुनाव में पर्सनेलिटी का बड़ा योगदान रहा है। पंजाब में प्रकाश सिंह बादल और कैप्टन अमरिन्दर सिंह आमने-सामने थे, जहां बादल अत्यंत मिलनसार, जनता के दुःख-दर्द में साथ देने वाले हैं वहीं कैप्टन का महाराजा स्टाइल बदला नहीं। उन्होंने वही शाही अन्दाज में चुनाव लड़ा। जब जनता को बादल और अमरिन्दर में से एक को चुनने का समय आया, उन्होंने बादल को प्राथमिकता दी। पंजाब में अकालियों के खिलाफ माहौल था पर कांग्रेस उसका फायदा नहीं उठा सकी। 44 साल में यह पहली बार है कि सत्तारूढ़ पार्टी-गठबंधन फिर से चुनाव जीता है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव नतीजे खासकर बहुमत का दावा करने वाली कांग्रेस के लिए बेहद निराशाजनक और चिन्ताजनक है। पार्टी को कहां तो दिग्विजय सिंह जैसे बड़बोले नेता 125 सीटों का दावा करते नहीं थकते थे, कांग्रेस को सिर्प 28 सीटें ही मिल सकीं। अगर लोकसभा चुनाव में 22 सीटें जीतने वाली इस पार्टी का आंकलन था कि इस बिनाह पर उसे 100 सीटें तो मिलनी चाहिए। सहयोगी राष्ट्रीय लोकदल जिसने पश्चिमी उत्तर प्रदश में आंधी का दावा किया कुल नौ सीटें ही जीत सकी जो पिछले जीत से भी कम हैं। चुनाव में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन की हद तो तब हो गई जब उसके गढ़ कहे जाने वाले अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली में कांग्रेस सभी पांचों सीट हार गई जबकि इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक देने वाले महासचिव राहुल गांधी के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र वाले जिले अमेठी में कांग्रेस पांच में से तीन सीटें गंवा बैठी। अमिता सिंह जैसी दिग्गज अमेठी में हार गईं। तमाम ड्रॉमे करने के बावजूद सलमान खुर्शीद अपनी पत्नी लुइस खुर्शीद की जमानत नहीं बचा सके। चुनाव में अपने बड़बोलेपन के लिए सुर्खियों में बने रहे केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के बेटे राकेश वर्मा दरियाबाद चुनावी होड़ में तीसरे पायदान पर रहे। वैसे अगर दिग्गजों की हार की बात करें तो भाजपा का हाल भी कांग्रेस जैसा रहा। सिवाय उमा भारती के चुनावी मैदान में उतरे सभी क्षत्रप चुनाव हार गए। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सूर्यप्रताप शाही, पूर्व अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र, विधानमंडल के नेता ओम प्रकाश सिंह तथा पूर्व प्रदेशाध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी को पराजय का मुंह देखना पड़ा।
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Thursday, 16 February 2012

उत्तर पदेश में चल रहा है एक साइलैंट करंट

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 16th February  2012
अनिल नरेन्द्र
ऐसा कौन सा मुद्दा है जिसे यूपी के नेता समझ नहीं पा रहे और जनता समझ गई है? मंडल-कमंडल के उन्मादी और उत्तेजक माहौल में भी जब उत्तर पदेश में 57 फीसदी से ज्यादा मतदान नहीं हुआ, इस बार पता नहीं कौन सा अंडर करंट चल रहा है कि इतना भारी मतदान हो रहा है। सतह पर बिल्कुल शांति है, न किसी का विरोध और न ही किसी के पक्ष में साफ हवा। मगर फिर भी मतदान 60 फीसदी के लगभग रहा है। उत्तर पदेश में आजादी के बाद पहली मर्तबा यह करिश्मा हो रहा है। इससे भी ज्यादा सुखद है कि पहले दो चरणों के मतदान में आधी आबादी का डिस्टिंगशन से पास होना। पहले चरण में बारिश के बावजूद पुरुषों से ज्यादा मतदान पतिशत महिलाओं का था। ज्यादा मतदान को उत्तर पदेश में सत्ता विरोधी लहर के रूप में ही देखा जाता है। इस बेहद सहज धारणा के लिए पिछले ढाई दशकों के नतीजे ही जिम्मेदार हैं। 1985 के बाद से कोई भी सत्तारूढ़ पार्टी लगातार दूसरी बार सरकार बनाने में असफल रही है। ऐसे में बढ़े मतदान को सपा, भाजपा व कांग्रेस जाहिर तौर पर सत्ता बसपा विरोधी लहर के रूप में पेश कर रहे हैं। कांग्रेस को तो राहुल का करिश्मा दिख रहा है। सपा को बसपा सरकार का भ्रष्टाचार तो भाजपा को केंद्र सरकार के खिलाफ यूपी के लोगों का गुस्सा। मगर ऐसा क्या है कि आजादी के बाद पहली बार मतदाता ऐसे सड़कों पर उतरे। आजादी के बाद से हुए कुल 15 चुनावों में कभी इस तरह जनता सड़कों पर मतदान के लिए नहीं निकली। आपातकाल के बाद 1977 रहा हो या फिर 1991 में राम जन्म भूमि आंदोलन की लहर में भी मतदान पतिशत 55 फीसदी के पास ही रह पाया। भाजपा को रोकने के लिए 1993 में सामाजिक न्याय व दलित राजनीति को कांशीराम और मुलायम ने गठजोड़ कर सामाजिक परिवर्तन का बिगुल पूंका लेकिन मतदान 60 फीसदी के जादूई अंक तक नहीं पहुंच सका। छह मार्च को नतीजे आने से पहले तक राजनीतिक पंडित और दल अपने तर्प और गणित पेश करेंगे लेकिन वास्तविकता है कि हवा के मिजाज को कोई भी भांप नहीं पा रहा है, मगर मतदान में महिलाओं और युवाओं की बढ़ती भागीदारी से हमारे लोकतंत्र के परिपक्व होने का स्पष्ट संकेत है। साफ है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन का असर है तभी तो कुछ मतदाताओं ने राइट टू रिजेक्ट विकल्प का भी इस्तेमाल किया है। पर उत्तर पदेश के पूर्वी इलाके में दो चरणों में हुए मतदान से जो हवा चली है वह पश्चिमी हिस्से तक आते-आते बदल भी सकती है। इस इलाके में फैसले की चाबी मुसलमानों और जाटों के हाथों में है। आमतौर पर वेस्टर्न यूपी में जाटों का दबदबा माना जाता है। जाटों के नेता के रूप में चौधरी अजीत सिंह करीब दो दशकों से स्थापित हैं। कांग्रेस के साथ समझौता करने वाली अजीत सिंह को कुल 59 सीटें मिली हैं। अगर जमीनी स्तर पर यह समझौता सही मायनों में लागू होता है तो दोनों कांग्रेस और रालोद को फायदा होगा। वेस्टर्न यूपी में मुसलमान वोटों का भी खासा महत्व है। हालांकि सत्तारूढ़ होने के नाते पश्चिमी उत्तर पदेश में बीएसपी के पति नाराजगी है। लेकिन यह भी सच है कि इस इलाके की ज्यादातर सीटों पर मुख्य मुकाबला बसपा से ही है। दरअसल बीएसपी के 20 फीसदी दलित वोट उसका बड़ा हथियार है। स्थानीय स्तर पर दलितों के अलावा सभी जातियां अपने बीच का उम्मीदवार ढूंढ रही हैं सिर्प दलित ही बहनजी के इशारे पर वोट करते हैं। क्षेत्र में बसपा से नाराज मुसलमान एसपी और कांग्रेस को वोट दे सकते हैं। ऐसा हुआ तो बसपा ही फायदे में रहेगी। अगर मुसलमान वोट एकजुट हुआ तो बसपा ही सबसे ज्यादा घाटे में रहेगी। पूरे पश्चिमी उत्तर पदेश में हर सीट पर जातीय समीकरण अलग-अलग है। कुछ इलाकों में भाजपा भी मजबूत स्थिति में है। खासतौर पर शहरी इलाकों में उसका पभाव साफ दिख रहा है। पर इस बार का चुनाव बहुत कुछ उम्मीदवारों पर भी निर्भर है। कुल मिलाकर देखना यह है कि जो हवा पहले दो दौर के मतदान में चली वह तीसरे में भी बरकरार रहती है या नहीं?
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Sunday, 5 February 2012

पहले चरण का मतदान तय करेगा यूपी की दिशा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 5th February  2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश में 16वीं विधानसभा के लिए पहले चरण में 55 सीटों के लिए आठ फरवरी को मतदान होगा। पहले चरण के लिए सभी राजनीतिक दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। सभी दल अपने को दूसरे से बेहतर बताने में लगे हुए हैं। लेकिन यदि पिछले पांच चुनावों के आंकड़ों को देखा जाए तो सरकार बनाने के लिए कम से कम 30 फीसदी वोटों का आंकड़ा पार करना जरूरी होगा। बहरहाल यूपी विधानसभा चुनाव की जंग अपने चरम तक पहुंचती नजर आ रही है। गंगा, यमुना, घाघरा, राप्ती और गोमती के पानी के प्रभाव की तरह राजनीति भी निरन्तर परिवर्तनशील है। राजनीति आगे क्या गुल खिलाएगी और किसका पलड़ा भारी होगा, यह तो मतदाता ही तय करेंगे। सत्तारूढ़ बसपा और विपक्षी दल सपा के अलावा कांग्रेस, भाजपा, पीस पार्टी और रालोद ने सभी ने अपनी ताकत झोंक दी है। सत्तारूढ़ बसपा जहां अपनी सरकार के `काम के दम पर' और जातीय समीकरण के आधार पर वापसी का दावा कर रही है, वहीं समाजवादी पार्टी को भरोसा है कि सूबे में प्रमुख प्रतिपक्षी दल हेने के नाते `बसपा सरकार' की कथित विफलताओं के कारण चल रही सत्ता परिवर्तन की हवा का उसे लाभ होगा और इसके मद्देनजर मतदाताओं की पहली प्राथमिकता सपा होगी। कांग्रेस को उम्मीद है कि 22 साल तक गैर कांग्रेसी सरकारें देख चुकी प्रदेश की जनता युवराज राहुल गांधी के करिश्मे का भरोसा करके इस बार उसे ही प्राथमिकता देने वाली है जबकि भाजपा भ्रष्टाचार के विरोध में गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के आंदोलन को मिले जन समर्थन को अपने अनुकूल मानकर अति-प्रसन्न है। फिर जिस तरह से अल्पसंख्यकों को आरक्षण के मामले में अन्य सभी दलों की किरकिरी हुई है उससे भी भाजपा को लगता है कि हिन्दू वोट विशेषकर सवर्ण जातियों का वोट उसके हिस्से में आएगा। उत्तर प्रदेश में विधानसभा की कुल 403 सीटें हैं। प्रदेश में वर्ष 1991 से लेकर 2007 तक हुए विधानसभा के पांच चुनावों पर नजर डालें तो नम्बर एक की पार्टी बनने और बहुमत पाने अथवा उसके करीब पहुंचने के लिए कम से कम 30 फीसदी वोट का आंकड़ा पार करना जरूरी है। उत्तर प्रदेश के यह चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक होने जा रहे हैं। देश के सबसे बड़े राज्य में इस बार रिकार्ड तादाद में छोटी पार्टियां बड़े दम-खम के साथ उतरी हैं। बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा को इनसे नुकसान होने की सम्भावना है। वे इन्हें केवल वोट काटने वाली या वोट बर्बाद करने वाली पार्टियां बता रही हैं, जैसे पीस पार्टी के बारे में भाजपा को छोड़कर तीन बाकी दलों को यही लग रहा है। जिस भाजपा को इससे लाभ हो रहा है उसके बारे में बाकी पार्टियां कह रही हैं कि पीस पार्टी को आर्थिक मदद तो वहीं से मिती है। राज्य में पीस पार्टी का इस समय वही दर्जा है जो अपनी शुरुआती अवस्था में बीएसपी का हुआ करता था। इस बार राज्य में 150 के करीब पार्टियां चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। जो अलग-अलग जाति समूहों का प्रतिनिधित्व का दावा कर रही हैं। पिछली बार करीब 125 पार्टियों ने चुनाव लड़ा था जिनमें छह राष्ट्रीय दल, 12 राज्य स्तरीय दल और 112 गैर मान्यताप्राप्त पार्टियां थीं। उत्तर प्रदेश में परिसीमन के बाद बनी 113 सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक हो सकते हैं जिन्हें पाने के लिए राजनीतिक दलों ने दिन-रात एक कर दिया है। मुस्लिम मत पाने के लिए भाजपा को छोड़ सभी राजनीतिक दल जोर-आजमाइश में लगे हैं। लेकिन अभी भी कोई दल दावे से कहने की स्थिति में नहीं कि उसे मुस्लिम वोट एक ब्लॉक मिलेगा। आमतौर पर माना जा रहा है कि मुस्लिम टैक्टिकल वोटिंग कर सकते हैं यानि भाजपा को हराने के लिए उन्हें उस सीट पर जो भी उम्मीदवार जीतता दिखेगा उसे वोट दे देंगे। इस तरह हमें लगता है कि मुस्लिम वोट कांग्रेस, सपा, बसपा, पीस पार्टी में बंटेगा। हार-जीत का अन्तर बहुत कम होगा। जो उम्मीदवार 10,000 वोट ले लेगा, वह जीतने की स्थिति में आ सकता है। देखें ऊंट किस करवट बैठता है?

Wednesday, 11 May 2011

कहीं यह किसान आंदोलन मायावती को भारी न पड़ जाए?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 11 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
जमीन अधिग्रहण के खिलाफ भट्टा-पारसौल में भड़की आग ग्रेटर नोएडा से आगरा तक फैल गई है। जेवर, अलीगढ़, मथुरा और आगरा तक पूरे यमुना एक्सप्रेस-वे पर किसानों के साथ पुलिस की झड़पें हुई हैं। भट्टा-पारसौल में 17 जनवरी से शुरू हुआ किसानों का आंदोलन मायावती सरकार के लिए चिन्ता का विषय बनता जा रहा है। सरकार के अफसर और सलाहकारों ने सत्ता के अंतिम साल में मायावती को ठीक वहीं पहुंचा दिया है जहां पिछली बार मुलायम सिंह सत्ता के अंतिम साल में पहुंच गए थे। तब अनिल अम्बानी के लिए किसान आंदोलन हुआ तो अब की जेपी समूह के लिए हो रहा है। किसानों पर 2007 से अब तक छह बार लाठी-गोली चल चुकी है और करीब दर्जनभर किसान मारे जा चुके हैं।

नोएडा से आगरा के लिए यमुना एक्सप्रेस-वे का निर्माण किया जा रहा है। इसकी लम्बाई 165 किलोमीटर है। गौतम बुद्धनगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, मथुरा और आगरा के 334 गांवों की जमीन इस रोड के लिए अधिग्रहित की गई है। किसान महीनों से यह मांग करते आए हैं कि उनको मुआवजे की बेहतर दरें दी जाएं और सरकार भूमि अधिग्रहण के कानून में बदलाव करे। दरअसल यमुना एक्सप्रेस-वे प्रोजेक्ट को लेकर किसानों का टकराव एकदम नया नहीं है। पिछले सालों में कई जगह आंदोलन भड़क चुका है। इसमें 11 किसानों की जान जा चुकी है पर ये विदर्भ के किसान नहीं हैं संकट में घिरने पर फांसी पर चढ़ जाएं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज्यादातर किसान पूर्वांचल के मुकाबले बड़ी जोत वाले तो हैं ही साथ ही कद, काठी और लाठी में भी मजबूत हैं। जमीनें बिकीं तो किसानों के एक वर्ग ने गाड़ी, मकान और असलहा पर भी निवेश किया। शनिवार को अब पारसौल में जो मुठभेड़ हुई तो उसमें गोली दोनों तरफ से चली। यह बदली हुई संस्कृति और अपरिपक्व नेतृत्व का भी नतीजा है। इस सबसे तो यह साफ है कि करीब सौ साल पुराने अंग्रेजों के बनाए भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर किसानों की नाराजगी विस्फोटक होती जा रही है। किसानों का तर्प है कि प्रदेश सरकार जमीन की तिजारत में क्यों लगी है? किसानों से आठ-नौ सौ रुपये वर्ग मीटर की जमीन लेकर व्यापारियों और उद्योगपतियों को बीस हजार रुपये वर्ग मीटर के हिसाब बेचने से किसका फायदा होता है।

इस प्रकरण में अब सियासत भी नए रंग भरने लगी है। रविवार को रालोद के प्रमुख चौ. अजीत सिंह अपने काफिले के साथ घटनास्थल पर जाने के लिए निकले थे लेकिन उनके काफिले को नोएडा की सीमा में ही रोक दिया गया। अजीत सिंह का कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार एक खास कम्पनी को मालामाल करने के लिए किसानों का गला काटने पर उतारू है। कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा ने इस खूनी जंग की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री मायावती पर डाल दी है। उनका आरोप है कि मायावती सरकार किसान विरोधी है, इसलिए जायज मुआवजा मांगने वाले किसानों पर गोली बरसा रही है। किसान आंदोलन के नेता महेन्द्र सिंह टिकैत के बेटे राकेश टिकैत का कहना है कि भट्टा-पारसौल की घटनाओं से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के स्वाभिमान को ललकारा गया है, ऐसे में अब किसान जान की बाजी लगाकर भी इंसाफ लेने के लिए आगे आएंगे। समय रहते अगर मुख्यमंत्री मायावती ने स्थिति को नहीं सम्भाला तो किसान आंदोलन सरकार के लिए भारी पड़ सकता है।