शुक्रवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उस समय करारा झटका लगा जब कोलकाता हाई कोर्ट ने उनकी सरकार द्वारा बनाए गए सिंगूर लैंड रीहैबिलिटेशन एण्ड डेवलपमेंट एक्ट-2011 को असंवैधानिक एवं अवैध ठहरा दिया। उल्लेखनीय है कि प. बंगाल में सरकार गठित करने के बाद ममता बनर्जी की कैबिनेट का पहला फैसला था सिंगूर की जमीन किसानों को लौटाने का। वहां की 997.3 एकड़ में से लगभग 400 एकड़ जमीन को उन इच्छुक किसानों की मानते हुए उन्हें लौटाने की कवायद शुरू कर दी गई। विधानसभा में अधिनियम पारित कर अधिसूचना भी जारी कर दी गई। जब प्रशासन ने जमीन लौटाने की कार्रवाई शुरू की तो टाटा समूह अदालत चला गया। दरअसल सिंगूर की जमीन का मुद्दा ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक रूप से कल्पवृक्ष बन गया था। सिंगूर की जमीन लौटाने के सवाल पर उनके आंदोलन से बंगाल में जमीन अधिग्रहण का मुद्दा खड़ा हुआ और सिंगूर और उसके बाद नंदीग्राम के आंदोलनों के जरिए ममता बनर्जी मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गईं। चुनाव जीत जाने के बाद ममता बनर्जी के लिए सिंगूर में बस इतना ही काम बाकी रह गया था कि वह किसानों को उनसे ली गई जमीनें वापस दिलवाएं और बाकी सब भूल जाएं। उन्होंने यह किया भी। किसानों को उनकी जमीन वापस मिल सके, इसके लिए सिंगूर भूमि सुधार अधिनियम तैयार तो किया पर न जाने किस उत्साह में इस अधिनियम पर राष्ट्रपति की सहमति हासिल करना किसी को याद नहीं रहा। इस कानून को अब कोलकाता हाई कोर्ट ने न सिर्प निरस्त कर दिया है बल्कि उसे असंवैधानिक भी कहा है। शुक्रवार को न्यायमूर्ति पिनाकी चन्द्र घोष और न्यायमूर्ति मृणाल कांति चौधरी की खंडपीठ ने दो बातों पर जोर दिया। एक तो यह कि बंगाल सरकार के सिंगूर अधिनियम में मुआवजे की धाराएं भूमि अधिग्रहण अधिनियम-1894 से मेल नहीं खातीं। दूसरी, अधिनियम राष्ट्रपति की मंजूरी के बगैर लागू कर दिया गया। अदालत के इस फैसले पर बंगाल सरकार की ओर से आधिकारिक टिप्पणी राज्य के उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने दी। उन्होंने कहा कि हम किसानों और बटाईदारों के हितों के प्रति वचनबद्ध हैं। हम हमेशा उनके साथ हैं और रहेंगे। किसानों को चिंतित नहीं होना चाहिए। खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने फेसबुक एकाउंट में लिखा, `मैं सत्ता में रहूं या न रहूं, किसानों का साथ देती रहूंगी।' हाई कोर्ट की खंडपीठ ने फैसला देने के साथ ही अपने आदेश का क्रियान्वयन दो महीने के लिए स्थगित कर दिया। इस अवधि में बंगाल सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकती है। लेकिन इस अंतरिम अवधि के दौरान सरकार वहां की जमीन किसानों में वितरित नहीं कर सकेगी। कटु सत्य तो यह है कि भारतीय राजनीति में सिंगूर मसले का महत्व सिर्प इतना ही नहीं है कि इसने प. बंगाल से वाम मोर्चे को उखाड़ फेंका और ममता को सत्ता में पहुंचा दिया। सिंगूर के बाद ही यह सवाल उठा कि निजी कम्पनियों के लिए भूमि अधिग्रहण में सरकार उद्योगपतियों के दलालों की तरह भूमिका क्यों निभाए? साथ ही यह भी कि हर भूमि अधिग्रहण के बाद किसान ही घाटे में क्यों रहें? इसी के दबाव में केंद्र सरकार को नए कानून का मसौदा तैयार करना पड़ा जिसमें अधिग्रहण के साथ-साथ लोगों के पुनर्वास पर भी ध्यान रखा है।
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Tuesday, 26 June 2012
Wednesday, 20 June 2012
राष्ट्रपति चुनाव के दंगल का तीसरा अध्याय
राष्ट्रपति चुनाव का तीसरा अध्याय आरम्भ हो चुका है। यह चुनाव दोनों कांग्रेस गठबंधन और विपक्ष के लिए अपने-अपने कारणों से राजनीतिक चुनौती बन गया है। पहले बात करते हैं एनडीए की। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के चुनाव लड़ने से इंकार करने से एनडीए में अब आपसी फूट का खतरा बढ़ गया है। एनडीए घटक दलों की दो बैठकें हो चुकी हैं पर कोई रणनीति नहीं बन पा रही। इसकी खास वजह यही समझी जा रही है कि भाजपा के दिग्गज नेता भी यूपीए के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी के मुकाबले अपना उम्मीदवार उतारने या न उतारने को लेकर पशोपेश में हैं। यह बहस भी जारी है कि अब जब डॉ. कलाम दौड़ से बाहर हो गए हैं तो क्या ऐसे में लोकसभा के पूर्व स्पीकर पीए संगमा को ही अपना समर्थन दे दिया जाए? भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी राष्ट्रपति चुनाव लड़ने के इच्छुक बताए जा रहे हैं। आडवाणी जी कहते हैं कि लोकतंत्र में चुनाव लड़ना जरूरी होता है, वह यूपीए उम्मीदवार को निर्विरोध नहीं जिताना चाहते। सूत्रों के अनुसार भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी हार की फजीहत से बचने के लिए उम्मीदवार उतारने के पक्ष में नहीं हैं। अरुण जेटली भी गडकरी के साथ हैं। पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह, वेंकैया नायडू, डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने 2007 का इतिहास याद कराया जब तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत संख्याबल नहीं होने पर भी मैदान में कूद पड़े थे। उम्मीदवार उतारने के लिए आडवाणी, सुषमा की जिद के पीछे सुब्रह्मण्यम स्वामी का तर्प यह भी है कि हमें राष्ट्रपति चुनाव से आगे की सोचनी चाहिए। अगर हम जयललिता, नवीन पटनायक और ममता बनर्जी को यूपीए से दूर कर लेते हैं तो 2014 के लोकसभा चुनाव में हमें एनडीए को फैलाने का अच्छा अवसर मिलेगा। यह भी कहा जा रहा है कि अगर हम चुनाव पर अड़े रहे तो यूपीए हमें शायद उपराष्ट्रपति का पद दे दे? फिर यह भी कहा जा रहा है कि अब तक भारत के प्रेजीडेंट के लिए कोई निर्विरोध नहीं चुना गया, हर जीतने वाले उम्मीदवार को चुनाव लड़ना पड़ा है और चुनाव लड़ने के बाद ही वह रायसीना हिल्स पहुंचा है। हां अब चुनाव में काका जोगिन्दर सिंह धरतीपकड़ सरीखे के तमाशबीनों के लिए कोई जगह नहीं है। आडवाणी बार-बार 1969 के राष्ट्रपति चुनाव का जिक्र कर रहे हैं। राष्ट्रपति पद के लिए 1969 का चुनाव कई मायनों में अनोखा रहा जब वीवी गिरि और नीलम संजीवा रेड्डी के बीच कांटे का मुकाबला हुआ था। आडवाणी जी ने कहा कि 1969 का राष्ट्रपति चुनाव ऐतिहासिक था और 2012 का यह चुनाव सनसनीखेज है। उन्होंने कहा कि 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार को अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने की अपील कर हरवाया था। वह एक असाधारण चुनाव था, यह सनसनीखेज चुनाव है। राष्ट्रपति चुनाव के लिए तय लग रहे मुकाबले में दूसरी वरीयता के वोटों का गणित अहम साबित हो सकता है। अगर संप्रग प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी को दूसरी ओर से कड़ी टक्कर देने वाला कोई मजबूत उम्मीदवार मैदान में उतरता है तो 1969 की तरह राष्ट्रपति तय करने में निर्णायक साबित हो सकता है। अगर समीकरण बहुत नहीं बदलते हैं तो प्रणब और संगमा में टक्कर हो सकती है। मुखर्जी के नाम पर राजग में सहमति न बनना और संगमा का मैदान में डटे रहने की घोषणा द्वितीय वरीयता के गणित को रास्ता दे रही है। हालांकि अभी तक सिर्प एक बार 1969 में द्वितीय वरीयता निर्णायक साबित हुई है। उस समय वीवी गिरि द्वितीय वरीयता की गिनती से चुनाव जीते थे। विपक्ष यदि प्रणब के खिलाफ एकजुट हो जाता है और आदिवासी वर्ग का होने के कारण दूसरी वरीयता में पीए संगमा को क्रॉस वोट मिल जाएं तो मुकाबला रोचक हो सकता है। मसलन 1969 में कांग्रेस के उम्मीदवार नीलम संजीवा रेड्डी थे और वीवी गिरि निर्दलीय थे। कांग्रेस दो धड़ों में बंट चुकी थी। एक पुरानी कांग्रेस, जिसके मुखिया मोरारजी देसाई थे। दूसरी नई जिसकी कर्ताधर्ता इन्दिरा गांधी थीं। राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी व्हिप लागू नहीं होने का फायदा उठाते हुए इन्दिरा जी ने कांग्रेसियों से आत्मा की आवाज पर मत देने की अपील की। नतीजतन वीवी गिरि को दूसरी वरीयता में ज्यादा मत मिले और वह विजयी हुए। कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का विरोध टीम अन्ना भी कर रही है। टीम का कहना है कि राष्ट्रपति बनने से पहले उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। टीम अन्ना के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल ने रविवार को जोधपुर में कहा कि मुखर्जी देश के संवैधानिक पद के प्रत्याशी हैं, इसलिए जो इस पद पर बैठे, उसकी छवि साफ-सुथरी होनी चाहिए। साल 2005 को नेवी वॉर रूम लीक मामले में प्रणब की भूमिका पर संदेह है। उन पर चावल निर्यात घोटाले के भी आरोप हैं। इन मामलों में उनकी भूमिका की जांच होनी चाहिए। समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह ने सफाई दी है कि उन्होंने कांग्रेस से कोई डील नहीं की। डील तो दलाल लोग करते हैं। मुलायम कहते हैं कि अगर ममता सोनिया गांधी से मिलने के बाद यह घोषणा नहीं करतीं कि कांग्रेस दो नामों को आगे बढ़ा रही है, प्रणब मुखर्जी और हामिद अंसारी, तो सोनिया गांधी कुछ और ही खेल खेल सकती थीं। अगर 13 जून को 10 जनपथ जाने के पहले तक तृणमूल कांग्रेस की नेत्री ममता बनर्जी को ही नहीं मालूम था कि किस उम्मीदवार पर कांग्रेस दाव लगाना चाहती है तो फिर किसको पता था? सोनिया गांधी द्वारा बताए गए दो नामों प्रणब मुखर्जी और हामिद अंसारी को ममता जाहिर नहीं करतीं तो इस पर रहस्य ही बना रहता। 2007 में सोनिया गांधी ने अंतिम समय में प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का नामांकन कर यह संदेश दे दिया था कि वे किस प्रकार के व्यक्ति को राष्ट्रपति भवन देखना चाहती हैं। सम्भव था कि अगर ममता कांग्रेस की पसंद को सार्वजनिक नहीं करतीं तो अंतिम समय में सोनिया मीरा कुमार या हामिद अंसारी का नाम घोषित कर देतीं। मुलायम ने कहा कि हम तो हमेशा से प्रणब को चाहते थे पर सोनिया को प्रणब पर विश्वास नहीं था। इस बार राष्ट्रपति चुनाव को लेकर दिन-प्रतिदिन दृश्य बदल रहा है। कुछ भी दावे से कहना मुश्किल है। अभी समय है और भी अध्याय सामने आ सकते हैं।
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Saturday, 16 June 2012
राष्ट्रपति चुनाव के दंगल का पहला अध्याय
यूपीए ने राष्ट्रपति पद के लिए अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं निवर्तमान वित्त मंत्री का नाम तो घोषित कर दिया, उनके राष्ट्रपति चुने जाने में संदेह भी कम है किन्तु एक बात तो स्पष्ट है कि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव की अविश्वसनीयता एक बार फिर जगजाहिर हो गई है। पिछले दो दिनों से ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव की जुगलबंदी ने ऐसा पेंच फंसा दिया था कि कांग्रेस चारों खाने चित हो गई थी। कांग्रेस ने कभी उम्मीद नहीं की होगी कि ममता-मुलायम ऐसा पासा चलेंगे कि जिससे पार्टी के सारे समीकरण ही बदल जाएंगे। देखा जाए तो ममता ने एक तीर से कई निशाने लगाने की कोशिश की थी। यह वही मुलायम सिंह यादव हैं जिन्हें कुछ दिन पहले यूपीए-2 का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड पेश करने के लिए सरकार के प्रमुख मंत्रियों के साथ मंच पर खड़ा किया गया और रिपोर्ट को जारी किया गया था। ममता ने कांग्रेस से बदला लेने की कोशिश की थी। कांग्रेस ने यह चेतावनी देने की कोशिश की थी कि ममता आपके पास लोकसभा के 19 सांसद हैं तो हम समाजवादी पार्टी को गले लगाकर उनके 22 सांसदों का समर्थन पा सकते हैं, आप अपनी औकात में रहो। ममता ने एक झटके में कांग्रेस को उसकी औकात दिखाने की कोशिश की। अपने पैनल में सोमनाथ चटर्जी का नाम शामिल करके ममता ने यह भी जता दिया कि वह बंगालियों के खिलाफ नहीं हैं। प्रणब मुखर्जी का समर्थन इसलिए भी करने को ममता को मजबूर किया जा रहा था क्योंकि प्रणब बंगाली हैं और बंगाली होने के नाते ममता उनका समर्थन करने पर मजबूर होंगी पर ममता ने यहां भी कांग्रेस को मात दे दी और सोमनाथ चटर्जी का नाम लेकर इस आलोचना से भी अपने आपको बचा लिया। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की पसंद को खारिज करके ममता-मुलायम ने जो पासा फेंका था वह भले ही मुलायम सिंह की वजह से असफल हो गया किन्तु वह आने वाले दिनों में नए ध्रुवीकरण को जन्म देगा। अंतिम समय में जिस ढंग से दोनों नेताओं ने गुगली फेंकी थी उससे कांग्रेस की न सिर्प परेशानी ही बढ़ी थी बल्कि राष्ट्रपति चुनाव को बहुत पेचीदा बना दिया था। दरअसल राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम लेना एक सोची-समझी रणनीति का परिचायक है। कांग्रेस के अन्दर भी एक ऐसा धड़ा है जो मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद से हटाना चाहता है। मनमोहन सिंह का नाम सुझाना एक तरह से संप्रग सरकार के इन दोनों समर्थक दलों द्वारा प्रधानमंत्री में अविश्वास प्रकट करने के समान है। मनमोहन सिंह कांग्रेस पार्टी के लिए एक बोझ बन चुके हैं, वह एसेट कम लाइबिलिटी ज्यादा हैं। सभी जानते हैं कि मनमोहन को हटाना इस समय कांग्रेस के लिए सम्भव नहीं है पर ममता-मुलायम ने पंगा जरूर फंसा दिया है। दोनों ने सोनिया गांधी को यह भी स्पष्ट संदेश दे दिया था कि इस मामले में किसी भी निर्णय तक पहुंचने में तृणमूल और सपा की भूमिका को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। ममता और कांग्रेस में तल्खी बढ़ी है। एक कांग्रेसी सांसद अधीर चौधरी ने तो ममता की तुलना मीर जाफर से ही कर दी क्योंकि उन्होंने एक बंगाली (प्रणब मुखर्जी) का विरोध किया है। ममता के इस व्यवहार को सोनिया गांधी भूल नहीं सकतीं, इसलिए दोनों महिलाओं में एक ऐसी दरार पड़ गई है जिसे पाटना आसान नहीं होगा। ममता भी बहुत गुस्से में हैं।
यह तो पहले ही आशंका थी कि मुलायम यूपीए सरकार के सामने सीना तानकर खड़े होने की हैसियत में नहीं हैं लेकिन उन्होंने जिस तरह कांग्रेस को झटका दिया उससे एक बात तो साफ है कि उनके भरोसे कोई पार्टी या गठबंधन अपनी रणनीति तय नहीं कर सकता।
मुलायम तो तब झुके जब उन्हें लगा कि आय से अधिक सम्पत्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ तलवार लटक रही है और जुलाई में ही कांग्रेसी वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी द्वारा दायर मुकदमे की सुनवाई है तो उन्होंने ममता को गच्चा दे दिया। लेकिन इससे इतना तो स्पष्ट हो गया है कि ममता की नाराजगी यूपीए से बनी रहेगी जो किसी हद तक जा सकती है।
बहरहाल कांग्रेस को यूपीए घटक दलों एवं बाहर से समर्थन दे रही पार्टियों का प्रणब मुखर्जी के पक्ष में समर्थन तो हासिल हो गया और अब वह चाहेगी कि उसे एनडीए भी समर्थन दे दे ताकि उसके उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिए जाएं किन्तु लगता है कि अभी राष्ट्रपति चुनाव तक बहुत सारी राजनीतिक उठापटक होनी है। क्योंकि ममता ने कोलकाता पहुंच कर ऐलान कर दिया कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। मतलब यह कि राष्ट्रपति चुनाव के दंगल का पहला अध्याय ही खत्म हुआ है आगे महादंगल बाकी है।
Anil Narendra, Bahujan Samaj Party, Congress, Daily Pratap, Mamta Banerjee, Mulayam Singh Yadav, Pranab Mukherjee, President of India, Samajwadi Party, Sonia Gandhi, UPA, Vir Arjun
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Saturday, 9 June 2012
ममता अब एकला चलो नीति पर अमल करना चाहती हैं
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 9 June 2012
अनिल नरेन्द्र
तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी का आत्मविश्वास चरम सीमा पर है। पश्चिम बंगाल में छह में से चार नगर निगम चुनाव जीतने के बाद से उसकी ऐसी अधीरता अब छलकने लगी है। इन परिणामों से कई संदेश निकले हैं। पहला, विधानसभा चुनावों के बाद वाम मोर्चे के सामने एक बार फिर यह सवाल मुंह बाए खड़ा है कि जनता उस पर भरोसा क्यों नहीं कर पा रही है। दूसरे, यूपीए सरकार का हिस्सा होने के बावजूद कई मुद्दों पर प्रत्यक्ष रूप से असहमति जताकर केंद्र के लिए असुविधाजनक स्थिति पैदा करने के बाद तृणमूल कांग्रेस अब कांग्रेस को कह सकती है कि अगर उसके महत्व को कम करके आंका गया तो वह राज्य में अकेले चलने से नहीं हिचकिचाएगी। तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी के विश्वासपात्र और केंद्रीय रेल मंत्री मुकुल रॉय ने नतीजों के तुरन्त बाद घोषणा कर दी कि उनकी पार्टी बंगाल में अकेले शासन चलाने में सक्षम है। ममता के एक अन्य विश्वास पात्र और केंद्र सरकार में पर्यटन मंत्री सुल्तान अहमद तो इससे भी एक कदम आगे निकल गए। उन्होंने भारतीय पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष पद पर गुजरात के कांग्रेसी नेता शंकर सिंह बघेला की नियुक्ति का विरोध करते हुए सवाल उठा दिया कि इसमें उन्हें क्यों विश्वास में नहीं लिया गया। अहमद यह शिकायत करने में भी नहीं चूके कि बकौल राज्यमंत्री उनके पास काम का कोई दायित्व ही नहीं है। पिछले माह हुए विधानसभा चुनावों के बाद यह पहला मौका था जब तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ा। इस तरह मुकाबला इस बार तिकोना था पर आम धारणा रही कि पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वाम मोर्चे की पराजय की एक बड़ी वजह कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का गठजोड़ था। लेकिन ममता बनर्जी यह संदेश देने में कुछ हद तक कामयाब रहीं कि वे अकेले भी वाम मोर्चे से पार पा सकती हैं। चुनाव नतीजे आने के बाद तृणमूल नेताओं ने यह कहने में कोई संकोच भी नहीं किया कि उनकी पार्टी राज्य में अपने दम-खम पर राज करने की ताकत रखती है और वह भविष्य में होने वाले चुनाव अकेले लड़ेगी। अभी यह साफ नहीं कि तृणमूल ने अंतिम फैसला कर लिया है या फिर उसकी चेतावनी सिर्प नगर निगम चुनावों के दौरान दोनों पार्टियों के बीच हुई खटास का नतीजा है। बंगाल में कांग्रेस इकाई ने तृणमूल की धमकी का कड़ा जवाब दिया, यह कह कर कि वह चाहे तो गठबंधन तोड़ ले पर चारों तरफ से समस्याओं से घिरी केंद्र में मनमोहन सरकार ममता से पंगा लेने को तैयार नहीं है। बृहस्पतिवार को ही ममता का प्रभाव नजर आ गया। उस दिन सरकार के आर्थिक एजेंडे से जुड़े बहुचर्चित पेंशन बिल को कैबिनेट की मंजूरी के लिए लाना था पर ममता के एतराज को देखते हुए केंद्र सरकार को इसे टालना पड़ा और ममता बनर्जी के दबाव में केंद्र सरकार को कदम पीछे लेने पड़े। केंद्र सरकार के लिए ममता का समर्थन बहुत मायने रखता है, इसलिए उसकी कोशिश तृणमूल से अपना गठबंधन हर हाल में जारी रखने की ही होगी। मगर तृणमूल ने कोयला आवंटन में सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों की अनदेखी किए जाने के मुद्दे उठाकर कांग्रेस की दुखती रग छेड़ दी है। नगर निकायों के चुनावों को आमतौर पर स्थानीय या अधिक से अधिक राज्य के भीतर के समीकरणों के हिसाब से देखा जाता है मगर प. बंगाल में नगर पालिका चुनाव ने जहां सत्तारूढ़ गठबंधन में दरार के संकेत दिए हैं वहीं केंद्र सरकार और कांग्रेस पार्टी की मुसीबत बढ़ा दी है।
Anil Narendra, Communist, Cpi, CPM, Daily Pratap, Mamta Banerjee, Trinamool congress, UPA, Vir Arjun, West Bengal
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Wednesday, 30 May 2012
डिनर डिप्लोमेसी से एक तीर से कई शिकार करने का प्रयास
जोड़-तोड़ की राजनीति में माहिर कांग्रेस ने एक बार फिर एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। यूपीए-2 के तीन वर्ष पूरे होने के मौके पर हुए आयोजन में मुलायम सिंह यादव को दिए सम्मान का तात्कालिक महत्व भले ही न हो पर इससे कांग्रेस की रणनीति की साफ झलक जरूर मिलती है। मजेदार बात यह है कि युवराज राहुल गांधी ने जिस समाजवादी पार्टी का हाल ही में सम्पन्न हुए यूपी विधानसभा चुनाव में घोषणा पत्र फाड़ा था उसी के मुलायम सिंह यादव न केवल यूपीए सरकार की उपलब्धियों की रिपोर्ट कार्ड ही जारी करते दिखे बल्कि डिनर टेबल पर उन्हें सोनिया गांधी ने अपने टेबल पर स्थान दिया। यूपीए खासतौर से कांग्रेस और सपा के रिश्ते को 1999 से देखना चाहिए, जब मुलायम सिंह यादव ने एनडीए सरकार के एक वोट से गिरने के बाद ऐन मौके पर सोनिया गांधी को समर्थन देने की चिट्ठी देने से इंकार कर दिया। अगर उस समय सोनिया गांधी प्रधानमंत्री नहीं बन सकीं तो इसकी एक वजह मुलायम का विरोध था। इसके बाद 2004 को दूसरा मोड़ आया जब मुलायम उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक जीत हासिल करने के बाद भी यूपीए सरकार के बुलावे का इंतजार ही करते रह गए। अब यह तीसरा दौर शुरू हो रहा है। राजनीति में न तो कोई स्थायी शत्रु होता है और न ही स्थायी मित्र। इसलिए हमें ताज्जुब नहीं हुआ कि जिस समाजवादी पार्टी का घोषणा पत्र राहुल ने फाड़ा आज उसी के मुखिया को इतना सम्मान वही पार्टी दे रही है। कांग्रेस ने मुलायम के सम्मान के माध्यम से सीधा संदेश ममता बनर्जी को देने का प्रयास किया है। बात-बात पर यूपीए सरकार को आंखें दिखाने वाली ममता के लिए यह संकेत है कि यदि वह किसी बात पर सरकार से समर्थन वापस लेती हैं तो सपा की ठंडी छांव में सरकार को सहारा मिल सकता है। मुलायम के सहारे से कांग्रेस ने सहयोगी दल तृणमूल कांग्रेस को यह एहसास करा दिया कि उसने बात-बात पर केंद्र सरकार पर ज्यादा दबाव बनाया तो सपा सरकार का हिस्सा बन सकती है। मगर इसके बावजूद आज मुलायम का पलड़ा भारी दिखता है। यूपी विधानसभा चुनाव में 225 सीटें जीतने के बाद यदि उनकी पार्टी उन्हें प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर देख रही है तो इसमें ही भावी राजनीति की पुंजी भी छिपी है। इसलिए हमें तो नहीं लगता कि मुलायम सिंह जैसा राजनीति में शातिर खिलाड़ी कांग्रेसियों की चालबाजी में इतनी आसानी से फंसेंगे। हां उत्तर प्रदेश में केंद्र की मदद के लिए यूपीए के साथ मधुर संबंध रखना सपा की मजबूरी है पर यदि वह यूपीए में शामिल होते हैं तो यह उनके लिए आत्मघाती भी हो सकता है। यही बात ममता पर भी लागू होती है, जिनकी कीमत पर मुलायम के साथ आने की अटकलें हैं। ममता भी जानती हैं कि अभी यूपीए में बने रहना ही उनके लिए लाभदायक है, क्योंकि सरकार में रह कर पश्चिम बंगाल के लिए वह जो दबाव अन्दर रहकर बना सकती है वह सरकार से बाहर निकलने पर नहीं बना सकेगी। कांग्रेस का मुलायम को सम्मान देने के पीछे एक और कारण यह हो सकता है कि राष्ट्रपति चुनाव सिर पर हैं। बिना सपा के समर्थन से कांग्रेस अपना उम्मीदवार चुनवाने में दिक्कत महसूस कर सकती है।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Lalu Prasad Yadav, Mamta Banerjee, Mulayam Singh Yadav, UPA, Vir Arjun
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Thursday, 10 May 2012
हिलेरी क्लिंटन की यात्रा का हिडन एजेंडा?
अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की तीन दिवसीय भारतीय यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण है। आमतौर पर अमेरिका एक तीर से कई शिकार करता है। हिलेरी का पश्चिम बंगाल आना और ममता को इतना भाव देना बिना किसी ठोस उद्देश्य के नहीं हो सकता। क्या यह पधानमंत्री मनमोहन सिंह के कहने पर कोलकाता आईं? क्योंकि पिछले कई दिनों से ममता बनर्जी यूपीए सरकार के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं। चाहे मामला भारत-बांग्लादेश का तीस्ता जल संधि का रहा हो, चाहे वह रिटेल में पत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का रहा हो ममता अपने स्टैंड पर अड़ी हुई हैं। मैंने इन दोनों मुद्दों का इसलिए भी जिक किया है क्योंकि हिलेरी क्लिंटन कोलकाता सीधा ढाका से आईं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता के साथ उनकी बैठक को किसी भी अमेरिकी विदेश मंत्री की इस तरह की पहली कवायद माना जा रहा है। हिलेरी की इस यात्रा से साफ हो गया है कि अमेरिकी सरकार बनर्जी और उनकी सरकार को कितनी तवज्जो दे रही हैं। अपने दौरे के दूसरे दिन सोमवार को हिलेरी ने राज्य सचिवालय रायटर्स बिल्डिंग में ममता बनर्जी से मुलाकात की। इस मुलाकात का इंतजार तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को 'टाइम' पत्रिका की ओर से दुनिया की सौ सबसे ताकतवर लोगों में शुमार किए जाने और अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के भारत दौरे के एलान के समय से ही था। हिलेरी ने ढाका के बाद कोलकाता आकर जिस तरह यह अपेक्षा जताई कि भारत और बांग्लादेश के बीच जल बटवारे का मुद्दा सुलझे उसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं, लेकिन यह उल्लेखनीय है कि उन्होंने यह बात कोलकाता में कही। सम्भवत वह इससे अच्छी तरह अवगत हैं कि दोनों देशों के बीच जल बंटवारे और विशेष रूप से तीस्ता नदी का मामला तभी सुलझ सकता है जब ममता बनर्जी अनुकूल रवैया अपनाएंगी। बावजूद इसके उन्हें अपनी अपेक्षा कोलकाता की बजाए नई दिल्ली में व्यक्त करनी चाहिए थी। उन्होंने नई दिल्ली आने से पहले जिस तरह यह स्पष्ट करने में संकोच नहीं किया कि भारत को ईरान से दूर रहना चाहिए उससे यह साफ हो जाता है कि उनका एजेंडा क्या है? विदेश नीति के मोर्चे पर भारत के ढुलमुल रवैए के कारण अमेरिका को अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद मिल रही है। अमेरिका न केवल यह भी चाह रहा है कि भारत ईरान से दूर रहे बल्कि इसके लिए सारे जतन भी कर रहा है कि वह उससे तेल खरीदना भी बंद कर दे। जो बात भारत सरकार को अमेरिका से स्पष्ट करनी चाहिए वह है कि अगर भारत ईरान से तेल खरीदना बंद कर देगा तो अपनी जरूरतें पूरी कैसे करेगा? आखिर अमेरिका कोई वैकल्पिक उपाय तो सुझा नहीं रहा। अमेरिका का अपना एजेंडा है और वह अपने हितों के अनुसार ही काम करता है। उनकी चाहे ईरान हो, चाहे पाकिस्तान हो अपने हितों के अनुसार नीतियां बनती हैं और उसे भारत के हितों की चिंता नहीं है। यह बात केंद्र सरकार को भी समझनी चाहिए और दीदी को भी। ममता को हिलेरी का इतना भाव देने से अपना दिमाग और सोच खराब नहीं करनी चाहिए। अगर हिलेरी उन्हें भाव दे रही हैं तो इसके पीछे अमेरिकी नीति है।
America, Anil Narendra, Daily Pratap, Hillary Clinton, India, Iran, Mamta Banerjee, Pakistan, USA, Vir Arjun
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Wednesday, 25 April 2012
तीन साल का यूपीएसरकार का रिपोर्ट कार्ड
उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा विधानसभा चुनावों में हार के बाद दिल्ली नगर निगम में कांग्रेस की लगातार पांचवीं हार है। कांग्रेस नीत यूपीए सरकार 22 मई को अपने तीन साल पूरे कर रही है। परम्परा के मुताबिक सरकार इसी दिन `रिपोर्ट टू द पीपुल' पेश करेगी। पता नहीं मनमोहन सिंह सरकार और कांग्रेस पार्टी अपनी इस दौरान क्या-क्या उपलब्धियां दिखाएगी। समय आ गया है कि कांग्रेस पार्टी आत्ममंथन करे कि आखिर वह किस ओर जा रहे हैं। यह इसलिए भी जरूरी है कि अब लोकसभा चुनाव ज्यादा दूर नहीं हैं और इससे पहले पार्टी को गुजरात, हिमाचल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में विधानसभा चुनाव का सामना भी करना है। यूपीए सरकार की दूसरी पारी लगातार विवादों में फंसती जा रही है। राष्ट्रमंडल खेल, 2जी स्पेक्ट्रम और आदर्श हाउसिंग सोसाइटी जैसे तमाम घोटाले-महाघोटाले चर्चा में रहे। इनके चलते कांग्रेस को लगातार फजीहत झेलनी पड़ी है और घोटालों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। कांग्रेस नेतृत्व को कहीं से भी राजनीतिक राहत मिलती नहीं दिखाई पड़ती है। संसद में पिछले कई महीनों से गैर-कांग्रेसी दिग्गज यूपीए सरकार के खिलाफ लामबंदी तेज कर रहे हैं। खुद यूपीए के अन्दर कई घटक सरकार का सिरदर्द बढ़ा रहे हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी की तरफ से है। लगातार यह ऊहापोह बना हुआ है कि टीएमसी कब तक सरकार में बनी रहेगी? क्योंकि हर महीने दो महीने में ममता, सरकार के खिलाफ कोई न कोई राजनीतिक टंटा खड़ा कर देती हैं। बिगड़ते ट्रेक रिकॉर्ड के चलते यूपीए-2 सरकार और पार्टी में अविश्वास बढ़ रहा है। कांग्रेस के तमाम नेता अब एक-दूसरे पर तोहमत लगा रहे हैं। सरकार और पार्टी में तालमेल की बातें जरूर हो रही है लेकिन तस्वीर कुछ और ही है। बड़े नेताओं की नूराकुश्ती फुल स्विंग में है। 10 जनपथ में बड़ी-बड़ी बैठकें हो रही हैं। लेकिन पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक इकाई कांग्रेस कार्यसमिति में हाल फिलहाल एक भी बड़े मुद्दे पर चर्चा नहीं हो पाई। अगर आ रही खबरों पर विश्वास किया जाए तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को गत मुलाकात में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दो टूक कह दिया है कि वे या तो लम्बित पड़े मामलों पर फैसला लेकर काम शुरू करें वरना पार्टी नेतृत्व उनसे आगे के बारे में सोचना शुरू करेगा। इसी तरह राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन की आग थमी नहीं है। आंध्र प्रदेश, हरियाणा और उत्तराखंड में भी नेतृत्व के लिए समस्याएं खड़ी हैं। इन परिस्थितियों में पार्टी रणनीतिकारों को एक मजबूत और कारगर रणनीति बनानी होगी जिससे कि योजनाबद्ध तरीके से आगे आने वाली चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके। कांग्रेस के एक शीर्ष नेता का कहना है कि यूपीए के दोबारा केंद्र में सत्तासीन होने के बाद उसकी छवि एक भ्रष्टाचारी और महंगाई बढ़ाने वाली सरकार की बनती चली गई और आज तक यही छवि दिन प्रतिदिन और अधिक मजबूत होती जा रही है जिसके कारण से कांग्रेस को पिछले तीन सालों में देशभर में हुए चुनाव और उपचुनावों में लगभग हर जगह हार का मुंह देखना पड़ा है। लिहाजा पार्टी रणनीतिकार चाहते हैं कि संगठन के सभी शीर्ष नेता इस बात के लिए बैठकर आत्मचिन्तन व आत्ममंथन करें कि केंद्र सरकार कौन-कौन से ऐसे कदम उठाए जिससे उसकी छवि बदले। उन्हें यह भी सोचना होगा कि सहयोगी दलों के दबाव से कैसे मुक्त हुआ जाए। गठबंधन आधारित राजनीति को कितना महत्व दिया जाए। आम लोगों में पैठ बनाने के और पुरानी लोकप्रियता को हासिल करने के लिए क्या किया जाए जिससे कि पार्टी कार्यकर्ता फिर से नए जोश के साथ मैदान में उतर सकें। हाथ पर हाथ धरे बैठने से काम नहीं चलेगा।
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Tuesday, 17 April 2012
इस रेट से तो ममता की छवि और लोकप्रियता तेजी से घटेगी
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जिद और अक्कड़पन से अब सब परिचित हो चुके हैं। लगता है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद तो उनमें अहंकार और तानाशाह प्रवृत्ति में इजाफा हो गया है। अब तो वह अपने खिलाफ बना कार्टून को भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कार्टून लगाने के आरोप में जादवपुर विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर को शुक्रवार को गिरफ्तार कर लिया गया। यह कार्टून दिनेश त्रिवेदी को रेल मंत्री पद से हटाकर उनकी जगह मुकुल रॉय को नया रेल मंत्री बनाने के संदर्भ में यह कार्टून बनाया गया था। रसायन शास्त्र के प्रोफेसर अम्बिकेश महापात्रा की गिरफ्तारी से आक्रोश फैल गया और माकपा एवं शैक्षणिक समुदाय ने कहा कि पुलिस कार्रवाई बिल्कुल दमनात्मक है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के न्यूनतम लोकतांत्रिक अधिकार पर स्पष्ट हमला है। बाद में अलीपुर की अदालत ने प्रोफेसर को जमानत पर रिहा कर दिया। प्रोफेसर महापात्रा ने आरोप लगाया कि कार्टून डालने के कारण गुरुवार रात तृणमूल कांग्रेस के 15 समर्थकों ने उनके साथ बदसलूकी भी की। प्रोफेसर ने कहा कि वे अपनी सुरक्षा को लेकर खतरा महसूस कर रहे हैं। वहीं विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल माकपा ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार अखबारों पर अंकुश लगाकर लोकतंत्र और आजीविका के अधिकार पर हमला कर रही है। वहीं पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने कार्टून विवाद पर कहा कि कार्टून लोकतंत्र का हिस्सा है। उन्होंने कहा, मेरा मानना है कि कार्टून स्वस्थ लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है। कार्टून आपकी छवि को खराब नहीं कर सकते हैं। माकपा के वरिष्ठ नेता अब्दुर रज्जाक मोल्ला ने शनिवार को आरोप लगाया कि राज्य सरकार अखबारों पर अंकुश लगाकर लोकतंत्र और आजीविका के अधिकार पर हमला कर रही है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने फरमान जारी किया कि सरकारी पुस्तकालयों में सिर्प चुनिंदा अखबार ही रखे जाएं। सरकार विरोधी अखबारों के लिए पुस्तकालय में कोई जगह नहीं है। मोल्ला ने स्टूडेंट्स हॉल में माकपा (माले) लिबरेशन की ओर से आयोजित सम्मेलन में कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वहीं सम्मेलन में मौजूद कवि नवारुण भट्टाचार्य ने कार्टून बनाने वाले के खिलाफ कार्रवाई को राज्य सरकार की मनमानी और अराजकता कहा। शिक्षाविद् सुनन्दा सान्याल ने प्रोफेसर की गिरफ्तारी की निंदा करते हुए कहा कि ममता बनर्जी ने राज्य में सत्ता परिवर्तन का नारा उछाल कर सत्ता हथियाने में कामयाबी हासिल की। सच तो यह है कि राज्य में कहीं भी परिवर्तन की झलक नहीं दिख रही है। यह दुःखद, दुर्भाग्यपूर्ण व निंदनीय है। ममता धीरे-धीरे फासिस्ट होती जा रही हैं। हमारा मानना है कि ममता बनर्जी में अपने खिलाफ किसी प्रकार की आलोचना या व्यंग्य बर्दाश्त करने की क्षमता कम होती जा रही है। लोकतंत्र में कार्टून बनाना कोई अपराध नहीं है और ऐसा रोकना प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला करना है। जिस तरह से ममता चल रही हैं उससे तो यही लगता है कि वह बहुत तेजी से अलोकप्रिय हो जाएंगी और उनकी बनी छवि धूमिल हो जाएगी। वाम नेताओं से उनको इतनी नफरत है कि वह अब यह भी ठीक से फैसला नहीं कर पा रही कि क्या ठीक है क्या गलत?
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Wednesday, 11 April 2012
पश्चिम बंगाल से कार्ल मार्क्स और एंजेल्स की विदाई
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 11 April 2012
अनिल नरेन्द्र
पश्चिम बंगाल में 34 साल तक कामरेडों ने कार्ल मार्क्स की नीतियों पर चलकर राज किया। इस दौरान सारी दुनिया से मार्क्स और एंजेल्स का नामोनिशान लगभग साफ हो गया पर हमारे कामरेड उसी ढर्रे पर चलते रहे। यह समय के अनुसार बदले नहीं। नतीजा यह हुआ कि पश्चिम बंगाल की जनता ने इन्हें उखाड़ फेंका। केवल प. बंगाल से ही नहीं बल्कि केरल से भी। ममता बनर्जी अब कोशिश कर रही हैं कि मार्क्स वापस प. बंगाल में न आ सकें। इसलिए उन्होंने 34 साल बाद कार्ल मार्क्स की तैयारी कर ली है। प्रदेश की स्कूली शिक्षा पाठ्यक्रम समिति ने मार्क्स और फ्रेडरिक एंजेल्स का पाठ स्कूली किताबों से हटाने की सिफारिश की है। फैसला ममता सरकार को करना है। स्कूली किताबों से जो प्रमुख पाठ हटाए जा रहे हैं उनमें मार्क्सवाद के संस्थापक कार्ल मार्क्स की जीवनी, मार्क्स की मदद करने वाले दोस्त फ्रेडरिक एंजेल्स की कहानी और रूस में 1917 में बालेशेविक क्रांति की पूरी कहानी है। तृणमूल के सत्ता में आते ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पाठ्यक्रम समीक्षा समिति का गठन कर दिया था। समीक्षा समिति को स्कूल पाठ्यक्रम आधुनिक बनाने और छात्रों पर अनावश्यक बोझ कम करने का काम सौंपा गया। समिति ने 695 पेज की रिपोर्ट सौंपी है। ममता अकेली नहीं जिन्होंने कार्ल मार्क्स से निजात पाने के लिए कदम उठाए हैं। अब तो हमारे कामरेड भी कहने लगे हैं कि हमें देश की मौजूदा हालातों के अनुसार बदलाव करना होगा। माकपा नेता सीताराम येचुरी ने पार्टी के 20वें अखिल भारतीय सम्मेलन में उन्होंने कहा कि हमें रूस, चीन, क्यूबा तथा अन्य लैटिन अमेरिकी देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों से अलग नजरिया अपनाना होगा। पार्टी सिद्धांत बदलेगी। साथ ही अपने कार्यक्रमों की समीक्षा करेगी। पार्टी लोकतांत्रिक ताकतों और वाम शक्तियों को मिलाकर राजनीतिक विकल्प बनने की प्रक्रिया में है। सम्मेलन में पेश प्रस्ताव में कहा गया है कि 1894 के भूमि अधिनियम का कारपोरेट घराने दुरुपयोग कर रहे हैं, विशेष आर्थिक क्षेत्र के वास्ते, भूमि अधिग्रहण और खनन के लिए ऐसा होता है। इस कानून के कारण देश के कई किसानों और कृषि श्रमिकों को संघर्ष करते देखा गया है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि माकपा अपनी पराजय से कुछ सीखना नहीं चाहती। वह कांग्रेस और भाजपा को पराजित करने की बात तो कर रही है, लेकिन उसके रोड मैप में तीसरे विकल्प के लिए कोई जगह नहीं है। इसके विपरीत वह वामपंथी लोकतांत्रिक विकल्प के लिए प्रयास करने की बात कर रही है। मगर ऐसा कोई विकल्प हवा में तो तैयार होने से रहा। पिछले लोकसभा चुनाव में ही वामदलों की सीटें पिछली बार के मुकाबले आधी से कम रह गई थीं। यदि सम्भावित परिदृश्य को देखें तो नीतीश कुमार, जयललिता, ममता, नवीन पटनायक और चन्द्रबाबू नायडू के रहते गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपाई राजनीति में माकपा के लिए जगह नजर नहीं आ रही? सच तो यह है कि पार्टी आज भी अंतर्द्वंद्व और गुटबाजी से जूझ रही है। वह माने या न माने, लेकिन केरल में पार्टी मतभेदों और गुटबाजी के कारण ही हार हुई। पार्टी महासचिव प्रकाश करात की बेड़ागर्प करने वाली नीतियां जब तक बदलती नहीं, हमें माकपा का राजनीतिक भविष्य चमकता नहीं दिखता।
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Sunday, 1 April 2012
क्षेत्रीय दलों के अंतर्विरोध यूपीए सरकार के लिए बने संजीवनी
यह बजट सत्र है और इस लम्बे सत्र में सरकार को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। अगर एक भी मनी बिल (वित्त विधेयक) पर वोटिंग में सरकार हार जाती है तो उसे त्याग पत्र देना पड़ सकता है। ममता बनर्जी, मुलायम सिंह यादव ने मध्यावधि चुनाव होने की सम्भावना प्रकट की है। सवाल महत्वपूर्ण यह है कि मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार की क्या तैयारी है, इस सम्भावना को खत्म करने की? यह ठीक है कि कोई भी सांसद आज की तारीख में चुनाव नहीं चाहता पर हमने पहले देखा है कि सांसदों की कभी चलती है कभी नहीं। पार्टियों के नेतृत्व फैसले करते हैं और न चाहते हुए भी सांसदों को पार्टी अनुशासन का पालन करना होता है। इसलिए यह कहना कि कोई भी सांसद मध्यावधि चुनाव नहीं चाहता महत्वहीन हो जाता है। खबर है कि मध्यावधि चुनावों के शोर के बीच कांग्रेस के सियासी प्रबंधक `बैक अप प्लान' बनाने में जुट गए हैं। ममता बनर्जी के लगातार तीखे होते तेवरों और मुलायम सिंह की मध्यावधि चुनाव जल्दी होने की सम्भावना के बयान के बाद कांग्रेसी प्रबंधकों की नजरें मायावती की बहुजन समाज पार्टी की ओर घूम गई हैं। उधर बसपा भी नहीं चाहती है कि ममता से मार खा रही कांग्रेस राहत के लिए मुलायम के ज्यादा करीब आए। इसलिए बसपा से कांग्रेस को सकारात्मक संदेश मिल रहे हैं। कांग्रेस ने फिर दोहराया है कि संप्रग सरकार के पास जरूरी बहुमत का आंकड़ा है। कांग्रेस के इस दावे के पीछे दरअसल केंद्र की राजनीति में विभिन्न क्षेत्रीय दलों के राजनीतिक हितों का विरोधाभास है जिसका फायदा उठाकर यूपीए सरकार को बचने की बाजीगरी की जा रही है। प. बंगाल में ममता बनर्जी की लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन घट रही है, उसकी वजह से मध्यावधि चुनावों की सबसे ज्यादा छटपटाहट है। क्योंकि ममता को लगता है कि अगर लोकसभा चुनाव अपने तय समय यानि मई 2014 में हुए तो प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा सांसदों की संख्या घट सकती है जबकि निकट भविष्य में चुनाव हो जाएं तो ममता को पिछले चुनावों से ज्यादा सीटें मिलने की उम्मीद है। उधर केंद्र सरकार पर पूरी तरह हमलावर होने के बावजूद वाम मोर्चा मध्यावधि चुनावों के पक्ष में नहीं है। उसे लगता है कि अपने कैडर और संगठन को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए जरूरी है कि चुनाव दो साल बाद हों। तब तक प. बंगाल और केरल की सरकारों की विफलता और एंटी इंकम्बैंसी फैक्टर का लाभ उसे मिल सकता है। समाजवादी पार्टी को भी लगता है कि अखिलेश यादव की लोकप्रियता का लाभ उठाकर सपा 50 से ज्यादा लोकसभा सीटें जीत सकती है जबकि दो साल बाद प्रदेश में हवा कैसी हो यह निश्चित नहीं। जिस तरह वाम मोर्चा चुनाव के लिए तैयार नहीं है। वैसी ही स्थिति बसपा की भी है। मायावती लखनऊ छोड़कर दिल्ली राज्यसभा में आ गई हैं। वह नहीं चाहती कि अभी लोकसभा चुनाव हों और माहौल के कारण सपा उसका लाभ उठा ले। लेकिन कांग्रेस किसी एक या दो समर्थक दल पर यूपीए सरकार को निर्भर नहीं करना चाहती इसलिए मुलायम से मुलायम रिश्ते बनाने के बावजूद रेल मंत्री को बदल कर ममता को संतुष्ट रखने का प्रयास हुआ है। मायावती नहीं चाहती हैं कि यूपीए और मुलायम के बीच घनिष्ठता बढ़े, इसलिए उन्होंने अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से कह दिया है कि यूपीए सरकार की निर्भरता सिर्प सपा पर नहीं रहनी चाहिए। क्षेत्रीय दलों के यही अंतर्विरोध यूपीए सरकार के लिए संजीवनी का काम कर रहे हैं।
Wednesday, 21 March 2012
ममता ने साबित कर दिया कि वह अपनी जिद की पक्की हैं
14 मार्च को दिनेश त्रिवेदी ने संसद में रेल बजट पेश किया था। इसमें उन्होंने यात्री किरायों में बढ़ोतरी का प्रस्ताव किया था। इस प्रस्ताव को लेकर तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी इतनी खफा हुईं कि उन्होंने त्रिवेदी को तुरन्त पद से इस्तीफा देने को कह दिया। उन्होंने ऐलान किया कि त्रिवेदी ने कांग्रेस के कुछ नेताओं से साठगांठ करके यात्री किराया बढ़ाने का फैसला कर लिया है जबकि इस बारे में उन्होंने किसी भी स्तर पर पार्टी से मंत्रणा नहीं की। ऐसे में उन्होंने पार्टी का विश्वास खो दिया है। नाराज ममता ने उसी दिन प्रधानमंत्री को एक फैक्स भेज दिया था। इसमें कहा गया था कि दिनेश त्रिवेदी की जगह उनकी पार्टी से मुकुल रॉय को रेल मंत्री बना दिया जाए। चार दिन के हाई वोल्टेज ड्रॉमे के बाद दिनेश त्रिवेदी को अंतत इस्तीफा देना पड़ा जो स्वीकार भी हो गया है। दिनेश त्रिवेदी ने दरअसल वह काम किया जो पूर्ववर्ती रेल मंत्रियों, ममता बनर्जी खुद और लालू प्रसाद यादव के आठ साल से रेल यात्री किराया न बढ़ाने के फैसले की परम्परा तोड़कर किया। वैसे दिनेश त्रिवेदी एक अच्छे नेता हैं। 61 वर्षीय त्रिवेदी तृणमूल कांग्रेस के गठन से ही ममता के खास रहे हैं। उनकी वफादारी की वजह से ही उन्हें ममता ने अपनी जगह केंद्रीय कैबिनेट में दी। ममता ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के बाद स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री से पदोन्नत कर उन्हें अपनी जगह रेल मंत्री बनाया। त्रिवेदी राजनीति के आपराधिकरण के खिलाफ वर्षों से लड़ रहे हैं। उन्होंने कई जनहित याचिकाएं भी दायर कीं। वोहरा कमेटी की वजह से ही सूचना अधिकार कानून बन सका। यह समिति त्रिवेदी की कोर्ट में दायर याचिका की वजह से ही गठित की गई थी। अन्ना हजारे के पिछले पांच अप्रैल से जन्तर-मन्तर पर जब अनशन शुरू किया तो त्रिवेदी ने उन्हें पत्र भेजकर पद छोड़ने की इच्छा जताई थी। वह अन्ना हजारे और अरविन्द केजरीवाल से भी जुड़े रहे। इनसे दिनेश ने कहा कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को मजबूती देने को तैयार हैं। राज्यसभा में दो बार चुने गए त्रिवेदी ने 2009 के लोकसभा चुनाव में माकपा के हेवीवेट तारित टोपदार को बैरकपुर से हराया था। मूल रूप से कांग्रेसी त्रिवेदी वीपी सिंह के नेतृत्व वाली जनता दल में भी शामिल हो गए थे। कोलकाता यूनिवर्सिटी से बी.कॉम, टैक्सास यूनिवर्सिटी से एमबीए किए दिनेश त्रिवेदी ने पायलट का लाइसेंस भी हासिल किया। दिनेश त्रिवेदी को रेलवे में यात्री किराये में बढ़ोतरी के अपने बहादुरी भरे फैसले के कारण अपना पद गंवाना पड़ा। त्रिवेदी के अपने रेल बजट में सभी श्रेणियों के रेल किराये में वृद्धि के प्रस्ताव का सबसे पहले विरोध उन्हीं के पार्टी के नेता और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री सुदीप बंदोपाध्याय ने किया था। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री, दोनों ने ममता को बहुत समझाने की कोशिश की कि बजट खत्म होने दो फिर बदल देना पर ममता तैयार नहीं हुईं। चार दिनों तक सियासी ड्रॉमा होता रहा। विपक्ष को भी हथियार मिल गया सरकार को कठघरे में खड़ा करने का। दिनेश त्रिवेदी ने भी कह दिया कि मुझसे लिखकर इस्तीफा मांगा जाएगा तब दूंगा पर फिर जब ममता से उनकी फोन पर बात हुई तो वह इस्तीफा देने को तैयार हो गए। ममता ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वह अपनी जिद की पक्की हैं और एक बार वह जो कुछ ठान लें, उसे पूरा करके ही मानती हैं। ऐसा करने की कीमत चाहे उन्हें कुछ भी चुकानी पड़े। अब मुकुल रॉय नए रेल मंत्री होंगे।
Anil Narendra, Daily Pratap, Mamta Banerjee, Manmohan Singh, Prime Minister, Rail Minister, Vir Arjun
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Wednesday, 14 March 2012
फिर शुरू हुई थर्ड-चौथे फ्रंट की सुगबुगाहट
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 14 March 2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने से केंद्र में नई हलचल शुरू हो गई है। मुलायम सिंह यादव ने एक झटके में युवा अखिलेश को नरेन्द्र मोदी, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, जयललिता, प्रकाश सिंह बादल, भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, उमर अब्दुल्ला, शीला दीक्षित, नवीन पटनायक, शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह, पृथ्वीराज चव्हाण जैसे दिग्गज मुख्यमंत्रियों के न सिर्प बराबर बल्कि उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े सूबे का मुखिया बनाकर उनसे आगे खड़ा कर दिया है। हमेशा राजनीति में जोखिम उठाने वाले मुलायम ने अखिलेश को कमान सौंपकर सबसे पहले अपने परिवार में विरासत के सवाल का समाधान तो कर ही लिया, साथ ही साथ उन्होंने समाजवादी पार्टी को भी अपना भविष्य का नेता दे दिया। सवाल यह है कि अब मुलायम सिंह क्या करेंगे? जाहिर है कि वह केंद्र की राजनीति करेंगे। इसकी सुगबुगाहट आरम्भ भी हो गई है। अब थर्ड फ्रंट, चौथे फ्रंट की चर्चा आरम्भ हो गई है। तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता द्वारा चौथा मोर्चा बनाने में सक्रियता दिखाने से वाम दलों की चिन्ता बढ़ना स्वाभाविक ही है। चुनावों में कांग्रेस और भाजपा की असफलता के बाद वाम दल, थर्ड फ्रंट को एक बार फिर संजीवनी देने में जुट गए हैं। सीपीआई के महासचिव एबी वर्धन ने कहा कि समय आ गया है जब तीसरे मोर्चे को एक बार फिर सक्रिय किया जाए। उन्होंने कहा कि भाजपा को गोवा और कांग्रेस को मणिपुर में जीत हासिल हुई। लेकिन भाजपा ने यूपी में मुंह की खाई और पंजाब में 7 सीटें पिछली बार की तुलना में कम हुईं। उत्तराखंड में दूसरे नम्बर पर पहुंच गई। इसी तरह कांग्रेस यूपी में चौथे नम्बर पर रही और पंजाब में सत्ता वापसी नहीं कर पाई। इसलिए अब लोकसभा चुनाव में इन दोनों पार्टियों का वर्चस्व केंद्रीय राजनीति में कम होगा। वर्धन ने कहा कि यही सही समय है कि 2014 के आम चुनाव के लिए अभी से थर्ड फ्रंट को सक्रिय किया जाए। दरअसल वाम दलों को ममता बनर्जी की बढ़ती सक्रियता सताने लगी है। ममता उड़ीसा, बिहार, पंजाब और तमिलनाडु के मुख्यमंत्रियों से सम्पर्प कर चौथे मोर्चे को गठित करने की तैयारी में लगी हैं। इसी उद्देश्य से ममता ने कहा कि वह पंजाब और यूपी के मुख्यमंत्रियों की शपथ समारोह में भाग लेंगी पर घबराई कांग्रेस धमकियों पर उतर आई है। कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने ममता को चेतावनी तक दे डाली कि वह लक्ष्मण रेखा न पार करें और अपनी सीमा में रहें। कांग्रेस की सख्ती से ममता पर असर भी फिलहाल दिख रहा है क्योंकि ममता की ओर से कहा गया है कि अब वह पंजाब, यूपी मुख्यमंत्रियों की शपथ समारोह में नहीं जाएंगी। कांग्रेस, भाजपा को छोड़कर बाकी सभी दलों को एकत्र कर एक अलग तीसरा-चौथा मोर्चा बनाने की एक बार फिर सक्रियता हो गई है। फिलहाल कांग्रेस गठबंधन ने कहा है कि संसद में उनके पास पर्याप्त संख्या है और उन्हें किसी की चिन्ता नहीं है। बजट सत्र आरम्भ हो गया है। देखें क्या रंग खिलाता है यह बजट सत्र। शायद तीसरे-चौथे मोर्चे की कोशिश रंग लाए?
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने से केंद्र में नई हलचल शुरू हो गई है। मुलायम सिंह यादव ने एक झटके में युवा अखिलेश को नरेन्द्र मोदी, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, जयललिता, प्रकाश सिंह बादल, भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, उमर अब्दुल्ला, शीला दीक्षित, नवीन पटनायक, शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह, पृथ्वीराज चव्हाण जैसे दिग्गज मुख्यमंत्रियों के न सिर्प बराबर बल्कि उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े सूबे का मुखिया बनाकर उनसे आगे खड़ा कर दिया है। हमेशा राजनीति में जोखिम उठाने वाले मुलायम ने अखिलेश को कमान सौंपकर सबसे पहले अपने परिवार में विरासत के सवाल का समाधान तो कर ही लिया, साथ ही साथ उन्होंने समाजवादी पार्टी को भी अपना भविष्य का नेता दे दिया। सवाल यह है कि अब मुलायम सिंह क्या करेंगे? जाहिर है कि वह केंद्र की राजनीति करेंगे। इसकी सुगबुगाहट आरम्भ भी हो गई है। अब थर्ड फ्रंट, चौथे फ्रंट की चर्चा आरम्भ हो गई है। तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता द्वारा चौथा मोर्चा बनाने में सक्रियता दिखाने से वाम दलों की चिन्ता बढ़ना स्वाभाविक ही है। चुनावों में कांग्रेस और भाजपा की असफलता के बाद वाम दल, थर्ड फ्रंट को एक बार फिर संजीवनी देने में जुट गए हैं। सीपीआई के महासचिव एबी वर्धन ने कहा कि समय आ गया है जब तीसरे मोर्चे को एक बार फिर सक्रिय किया जाए। उन्होंने कहा कि भाजपा को गोवा और कांग्रेस को मणिपुर में जीत हासिल हुई। लेकिन भाजपा ने यूपी में मुंह की खाई और पंजाब में 7 सीटें पिछली बार की तुलना में कम हुईं। उत्तराखंड में दूसरे नम्बर पर पहुंच गई। इसी तरह कांग्रेस यूपी में चौथे नम्बर पर रही और पंजाब में सत्ता वापसी नहीं कर पाई। इसलिए अब लोकसभा चुनाव में इन दोनों पार्टियों का वर्चस्व केंद्रीय राजनीति में कम होगा। वर्धन ने कहा कि यही सही समय है कि 2014 के आम चुनाव के लिए अभी से थर्ड फ्रंट को सक्रिय किया जाए। दरअसल वाम दलों को ममता बनर्जी की बढ़ती सक्रियता सताने लगी है। ममता उड़ीसा, बिहार, पंजाब और तमिलनाडु के मुख्यमंत्रियों से सम्पर्प कर चौथे मोर्चे को गठित करने की तैयारी में लगी हैं। इसी उद्देश्य से ममता ने कहा कि वह पंजाब और यूपी के मुख्यमंत्रियों की शपथ समारोह में भाग लेंगी पर घबराई कांग्रेस धमकियों पर उतर आई है। कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने ममता को चेतावनी तक दे डाली कि वह लक्ष्मण रेखा न पार करें और अपनी सीमा में रहें। कांग्रेस की सख्ती से ममता पर असर भी फिलहाल दिख रहा है क्योंकि ममता की ओर से कहा गया है कि अब वह पंजाब, यूपी मुख्यमंत्रियों की शपथ समारोह में नहीं जाएंगी। कांग्रेस, भाजपा को छोड़कर बाकी सभी दलों को एकत्र कर एक अलग तीसरा-चौथा मोर्चा बनाने की एक बार फिर सक्रियता हो गई है। फिलहाल कांग्रेस गठबंधन ने कहा है कि संसद में उनके पास पर्याप्त संख्या है और उन्हें किसी की चिन्ता नहीं है। बजट सत्र आरम्भ हो गया है। देखें क्या रंग खिलाता है यह बजट सत्र। शायद तीसरे-चौथे मोर्चे की कोशिश रंग लाए?
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उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने से केंद्र में नई हलचल शुरू हो गई है। मुलायम सिंह यादव ने एक झटके में युवा अखिलेश को नरेन्द्र मोदी, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, जयललिता, प्रकाश सिंह बादल, भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, उमर अब्दुल्ला, शीला दीक्षित, नवीन पटनायक, शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह, पृथ्वीराज चव्हाण जैसे दिग्गज मुख्यमंत्रियों के न सिर्प बराबर बल्कि उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े सूबे का मुखिया बनाकर उनसे आगे खड़ा कर दिया है। हमेशा राजनीति में जोखिम उठाने वाले मुलायम ने अखिलेश को कमान सौंपकर सबसे पहले अपने परिवार में विरासत के सवाल का समाधान तो कर ही लिया, साथ ही साथ उन्होंने समाजवादी पार्टी को भी अपना भविष्य का नेता दे दिया। सवाल यह है कि अब मुलायम सिंह क्या करेंगे? जाहिर है कि वह केंद्र की राजनीति करेंगे। इसकी सुगबुगाहट आरम्भ भी हो गई है। अब थर्ड फ्रंट, चौथे फ्रंट की चर्चा आरम्भ हो गई है। तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता द्वारा चौथा मोर्चा बनाने में सक्रियता दिखाने से वाम दलों की चिन्ता बढ़ना स्वाभाविक ही है। चुनावों में कांग्रेस और भाजपा की असफलता के बाद वाम दल, थर्ड फ्रंट को एक बार फिर संजीवनी देने में जुट गए हैं। सीपीआई के महासचिव एबी वर्धन ने कहा कि समय आ गया है जब तीसरे मोर्चे को एक बार फिर सक्रिय किया जाए। उन्होंने कहा कि भाजपा को गोवा और कांग्रेस को मणिपुर में जीत हासिल हुई। लेकिन भाजपा ने यूपी में मुंह की खाई और पंजाब में 7 सीटें पिछली बार की तुलना में कम हुईं। उत्तराखंड में दूसरे नम्बर पर पहुंच गई। इसी तरह कांग्रेस यूपी में चौथे नम्बर पर रही और पंजाब में सत्ता वापसी नहीं कर पाई। इसलिए अब लोकसभा चुनाव में इन दोनों पार्टियों का वर्चस्व केंद्रीय राजनीति में कम होगा। वर्धन ने कहा कि यही सही समय है कि 2014 के आम चुनाव के लिए अभी से थर्ड फ्रंट को सक्रिय किया जाए। दरअसल वाम दलों को ममता बनर्जी की बढ़ती सक्रियता सताने लगी है। ममता उड़ीसा, बिहार, पंजाब और तमिलनाडु के मुख्यमंत्रियों से सम्पर्प कर चौथे मोर्चे को गठित करने की तैयारी में लगी हैं। इसी उद्देश्य से ममता ने कहा कि वह पंजाब और यूपी के मुख्यमंत्रियों की शपथ समारोह में भाग लेंगी पर घबराई कांग्रेस धमकियों पर उतर आई है। कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने ममता को चेतावनी तक दे डाली कि वह लक्ष्मण रेखा न पार करें और अपनी सीमा में रहें। कांग्रेस की सख्ती से ममता पर असर भी फिलहाल दिख रहा है क्योंकि ममता की ओर से कहा गया है कि अब वह पंजाब, यूपी मुख्यमंत्रियों की शपथ समारोह में नहीं जाएंगी। कांग्रेस, भाजपा को छोड़कर बाकी सभी दलों को एकत्र कर एक अलग तीसरा-चौथा मोर्चा बनाने की एक बार फिर सक्रियता हो गई है। फिलहाल कांग्रेस गठबंधन ने कहा है कि संसद में उनके पास पर्याप्त संख्या है और उन्हें किसी की चिन्ता नहीं है। बजट सत्र आरम्भ हो गया है। देखें क्या रंग खिलाता है यह बजट सत्र। शायद तीसरे-चौथे मोर्चे की कोशिश रंग लाए?
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Wednesday, 22 February 2012
ऐसी स्थिति में तो हम लड़ चुके आतंकवाद की चुनौती से
यह दुःख की बात है कि आतंकवाद से प्रभावी ढंग से लड़ने के लिए तैयार किए जा रहे राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) पर भी राजनीतिक ग्रहण लग गया है। उल्लेखनीय है कि सुरक्षा पर कैबिनेट कमेटी (सीसीए) ने इस साल 11 जनवरी को आतंकवाद से निपटने के लिए शक्तिशाली राष्ट्रीय आतंकवाद रोधी केंद्र (एनसीटीसी) के गठन की घोषणा की। यह एजेंसी एक मार्च 2012 को अस्तित्व में आ जाएगी। यह आतंकी खतरों का पता लगाने के अलावा सर्च ऑपरेशन और सन्देह के आधार पर लोगों को गिरफ्तार कर सकेगी। इसको यह शक्तियां गैर-कानूनी गतिविधि (निरोधक) कानून से प्राप्त होंगी। आतंकी मॉड्यूल का पता लगाना, आतंकियों और उनके सहयोगियों का पता लगाना इसका मकसद है। यह सीबीआई, एनआईए, नेटग्रिड समेत सातों केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों से सूचनाएं प्राप्त कर सकेगी। इसका मुखिया डायरेक्टर कहलाएगा जो आईबी एडिशनल डायरेक्टर के समकक्ष स्तर का होगा। एनसीटीसी सूचना एकत्र करने के लिए दूसरी एजेंसी पर निर्भर रहेगी। आधे दर्जन से ज्यादा गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने इस केंद्र के गठन पर आपत्ति जताई है और आशंका है कि आतंकियों के खिलाफ खड़े किए जा रहे इस एकीकृत कमान की कहीं भ्रूणहत्या न हो जाए। इस प्रस्तावित आतंक निरोधी केंद्र को राज्यों के मामलों में हस्तक्षेप और संविधान की मर्यादा का उल्लंघन बताया जा रहा है। इस पर भी गौर किया जाना चाहिए कि एनसीटीसी नाम से चर्चा में आए इस राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र के खिलाफ ठीक उस समय आवाज बुलन्द हो रही है जब उसके विधिवत काम करने का समय नजदीक आ गया है। क्या यह महज एक दुर्योग है कि एक मार्च से सक्रिय होने जा रहे एनसीटीसी के खिलाफ राज्य सरकारों की सक्रियता यकायक बढ़ गई है। चन्द दिन पहले तक केवल ममता बनर्जी और नवीन पटनायक को ही यह केंद्र रास नहीं आ रहा था लेकिन अब सारे भाजपा शासित मुख्यमंत्रियों व तमिलनाडु की मुख्यमंत्री को भी यह लगने लगा है कि राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण होने जा रहा है। हमारी राय में इस केंद्र का विरोध करने वालों के कारणों में भी दम है। कुछ मायनों में तो यह पोटा से भी ज्यादा खतरनाक है। बिना राज्यों को सूचना दिए इसमें किसी को भी गिरफ्तार करने का जो प्रावधान है, उससे राज्यों का भयभीत होना समझ आता है। इस यूपीए सरकार और विशेषकर गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की विश्वसनीयता इतनी गिर चुकी है कि इन पर अब कोई विश्वास करने को तैयार नहीं। अगर यही करना था तो पोटा को हटाया ही क्यों? 26/11 के हमलो के बाद देश में एक माहौल ऐसा बना था कि अगर उसी समय इस केंद्र को स्थापित किया जाता तो शायद इतना विरोध नहीं होता पर संप्रग सरकार सोती रही और इतने साल निकल गए, अब आकर उसे होश आया है। इस विरोध की असलियत में राज्यों का यह डर छिपा है कि केंद्र सरकार इस कानून के तहत अपना राजनीतिक एजेंडा उन पर थोप सकती है। यह आतंक निरोधी व्यवस्था केंद्र के खुफिया विभाग `इंटेलीजेंस ब्यूरो' के तहत चलेगी और राज्यों को आशंका है कि सीबीआई की तरह इसे भी कहीं केंद्र की सत्ता पर काबिज दल के हित-पोषण का साधन न बना दिया जाए। ऐसी स्थिति में तो हम लड़ चुके आतंकवाद से।
Anil Narendra, CBI, Daily Pratap, Mamta Banerjee, NCTC, P. Chidambaram, Terrorist, Vir Arjun
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Thursday, 2 February 2012
... और अब ममता ने मनमोहन सिंह पर सीधा हमला किया
यूपीए के घटक दलों के बढ़ते दबाव से कांग्रेस का राजनीतिक संकट बढ़ता जा रहा है। ममता बनर्जी व शरद पवार दोनों ने कांग्रेस की नाक में दम कर रखा है। सोमवार को ममता ने सारी हदें पार कर लीं। उन्होंने सीधा पधानमंत्री मनमोहन सिंह पर हमला बोल दिया। सोमवार को ममता ने मनमोहन सिंह पर सीधा हमला करते हुए आरोप लगाया कि पधानमंत्री ने सिंगूर में भूमि अधिग्रहण विरोधी उनके आंदोलन के दौरान उनसे बात नहीं की थी। ऐसा उन्होंने माकपा के डर से किया था। वह माकपा को नाराज नहीं करना चाहते थे। ममता ने आश्चर्यजनक ढंग से एनसीपी नेता और कृषि मंत्री शरद पवार की लाइन लेते हुए खाद्य सुरक्षा अधिनियम को लागू करने पर सवालिया निशान लगाया। हैरानी जताते हुए उन्होंने पूछा, आखिर सरकार इसके लिए धन कहां से लाएगी? बांग्लाभाषी तीन चैनलों पर पसारित इंटरव्यू में ममता ने अपनी पार्टी को यूपीए गठबंधन का एक जिम्मेदार घटक दल बताया। गठबंधन बरकरार रखने की हमारी जिम्मेदारी है लेकिन हमारी उन लोगों के पति भी जिम्मेदारी है जिन्होंने हमें चुना है, ममता ने कहा। इसलिए जन विरोधी नीतियों का हम हमेशा विरोध करेंगे। उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस ने अपनी गतिविधियों को नीतियों के आधार पर बढ़ाया है। इसी वजह से हमने लोगों को सीधे तौर पर पभावित करने वाले खुदरा व्यापार में पत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोत्तरी का विरोध किया। लेकिन कांग्रेस के कुछ नेता माकपा की तरह काम कर रहे थे। एक सवाल के जवाब में तृणमूल नेता ने केन्द्र पर राज्य के लिए पैकेज देने में आनाकानी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि राज्य में चुनाव से पहले पधानमंत्री ने राज्य की मदद का वादा किया था। इस सिलसिले में पिछले आठ महीने में मैं वित्तमंत्री पणब मुखर्जी से पांच बार मिल चुकी हूं। उन्होंने कहा कि मैं भीख मांगने नहीं जाऊंगी कुछ भी हो जाए, हम सम्मान से सिर उठाकर चलेंगे। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में दरार चौड़ी होती जा रही है। कांग्रेस महसूस करने लगी है कि तृणमूल की योजना है कांग्रेस के गढ़ वाले इलाके में पैठ बनाना। निशाने पर हैं ममता के धुर विरोधी माने-जाने वाले कांग्रेस के नेता दीपादास मुंशी, अधीर चौधरी और मौसम बेनजीर नूर के पभाव वाले जिले हैं। पिछले दिनों कांग्रेस और तृणमूल गठबंधन में चल रही खींचतान नेताओं के बीच वाद-विवाद से आगे निकलकर जनता की अदालत में चली गई। तृणमूल के नेताओं ने जनसभा कर कांग्रेसियों को गठबंधन छोड़ने की चुनौती दे डाली। तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने एक सुर में कहा कि यह कांग्रेस को तय करना है कि उन्हें पिछले दरवाजे से बाहर निकलना है या मुख्य द्वार से। जिस रफ्तार से दोनों पार्टियों में दरार चौड़ी होती जा रही है उससे तो लगता है कि वह दिन ज्यादा दूर नहीं जब दोनों अलग-अलग रास्ते अपना लें। बहुत कुछ निर्भर करता है इन पांच विधानसभा चुनावों के परिणामों पर अगर इनमें कांग्रेस का पदर्शन संतोषजनक नहीं रहा तो कुछ भी हो सकता है।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Kolkata, Mamta Banerjee, Manmohan Singh, Trinamool congress, Vir Arjun, West Bengal
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Saturday, 7 January 2012
कांग्रेस और तृणमूल गठबंधन टूटने की कगार पर
तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच गठबंधन टूटने की सम्भावनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। दोनों के बीच तल्खी का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ममता बनर्जी ने कहा कि कांग्रेस उनके कट्टर दुश्मन सीपीएम के साथ मिलकर उनकी पार्टी पर हमला कर रही है। ममता ने यह भी चेतावनी दी कि लोकपाल बिल पर आखिरी फैसला लेने से पहले सभी राजनीतिक दलों की राय लेनी चाहिए। उन्होंने साफ कर दिया कि राज्यों में लोकायुक्त के गठन को लेकर वह अपने रुख पर अब भी कायम हैं कि यह राज्यों पर छोड़ देना चाहिए कि वह किस तरह का लोकायुक्त का गठन करना चाहते हैं। वहीं कांग्रेस को ममता के खिलाफ शिकायतों की लिस्ट लम्बी होती जा रही है। कांग्रेस के लिए नया सिरदर्द तृणमूल कांग्रेस के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवारों को उतारने की सुगबुगाहट से पैदा हो गया है। सूत्रों ने बताया कि ममता बनर्जी यूपी चुनाव में 40 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने पर गम्भीरता से विचार कर रही हैं। इतना ही नहीं, मणिपुर और गोवा में भी अपने उम्मीदवारों को चुनावी दंगल में झोंकने के लिए कमर कस रही हैं। ममता की यह पूरी कवायद राष्ट्रीय राजनीति में अपना सितारा बुलंद करने की है और इसी बहाने वह कांग्रेस को परेशान करना चाहती हैं। दरअसल ममता कांग्रेस के लिए रोज एक नई परेशानी पैदा कर रही हैं। पहले खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के सरकार के फैसले और लोकपाल व लोकायुक्त की नियुक्ति मामले पर तृणमूल कांग्रेस की आपत्ति से सरकार की खूब किरकिरी हुई। फिर कोलकाता स्थित इन्दिरा भवन का नाम नजरुल इस्लाम भवन करने के चलते भी कांग्रेस और तृणमूल के रिश्तों में खटास पड़ी। कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने कहा कि काजी नजरुल इस्लाम एक बड़ी शख्सियत थे और किसी भवन का नाम उनके नाम पर रखना उचित होगा लेकिन इसके लिए इन्दिरा भवन का नाम बदलना ठीक नहीं है। तृणमूल कांग्रेस की तरफ से कांग्रेस को रोज-रोज मिल रहे तनाव को देखते हुए कांग्रेस ने अब लगता है कि ममता को उन्हीं के अन्दाज में जवाब देने की रणनीति बना ली है। जिस तरह केंद्र में सहयोगी दल होने के नाते ममता बनर्जी आए दिन सरकार के हर फैसले में अपना वीटो लगा देती हैं उसी तरह अब कांग्रेस पश्चिम बंगाल सरकार के हर उस फैसले का विरोध करेगी जो उसकी नीतियों के खिलाफ होगी। इसी रणनीति के तहत इन्दिरा भवन का नाम बदलने पर मंगलवार को युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने ममता का विरोध किया और बुधवार को धान की बिक्री के लिए किसानों के हक में कांग्रेस खड़ी हुई। सहयोगी दलों के लगातार तल्ख हो रहे तेवरों के कारण कमजोर पड़ रही केंद्र की कांग्रेस सरकार को अब उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों से थोड़ी उम्मीद है। पार्टी को भरोसा है कि अगर इन चुनावों में उसने उम्दा प्रदर्शन किया तो इससे प्रदेश के साथ-साथ केंद्र में भी उसे मजबूती मिलेगी। यही वजह है कि यूपी चुनावों में हर तरह का हथकंडा पार्टी अपना रही है। तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी मनमोहन सरकार के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरी हैं। कांग्रेस को यह डर भी सता रहा है कि आगे भी ममता उसके लिए सिरदर्द बनी रहेगी। इसलिए वह केंद्र में एक मजबूत सहयोगी चाहती है। सूत्रों के मुताबिक आम बजट और रेल बजट में भी ममता अपनी मनमानी करेंगी। अगर यूपी चुनाव में कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन नहीं करती तो बजट सत्र कांग्रेस के लिए बुरी खबर लेकर आ सकते हैं जिसकी झलक सरकार हाल ही में राज्यसभा में देख चुकी है।
तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच गठबंधन टूटने की सम्भावनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। दोनों के बीच तल्खी का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ममता बनर्जी ने कहा कि कांग्रेस उनके कट्टर दुश्मन सीपीएम के साथ मिलकर उनकी पार्टी पर हमला कर रही है। ममता ने यह भी चेतावनी दी कि लोकपाल बिल पर आखिरी फैसला लेने से पहले सभी राजनीतिक दलों की राय लेनी चाहिए। उन्होंने साफ कर दिया कि राज्यों में लोकायुक्त के गठन को लेकर वह अपने रुख पर अब भी कायम हैं कि यह राज्यों पर छोड़ देना चाहिए कि वह किस तरह का लोकायुक्त का गठन करना चाहते हैं। वहीं कांग्रेस को ममता के खिलाफ शिकायतों की लिस्ट लम्बी होती जा रही है। कांग्रेस के लिए नया सिरदर्द तृणमूल कांग्रेस के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवारों को उतारने की सुगबुगाहट से पैदा हो गया है। सूत्रों ने बताया कि ममता बनर्जी यूपी चुनाव में 40 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने पर गम्भीरता से विचार कर रही हैं। इतना ही नहीं, मणिपुर और गोवा में भी अपने उम्मीदवारों को चुनावी दंगल में झोंकने के लिए कमर कस रही हैं। ममता की यह पूरी कवायद राष्ट्रीय राजनीति में अपना सितारा बुलंद करने की है और इसी बहाने वह कांग्रेस को परेशान करना चाहती हैं। दरअसल ममता कांग्रेस के लिए रोज एक नई परेशानी पैदा कर रही हैं। पहले खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के सरकार के फैसले और लोकपाल व लोकायुक्त की नियुक्ति मामले पर तृणमूल कांग्रेस की आपत्ति से सरकार की खूब किरकिरी हुई। फिर कोलकाता स्थित इन्दिरा भवन का नाम नजरुल इस्लाम भवन करने के चलते भी कांग्रेस और तृणमूल के रिश्तों में खटास पड़ी। कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने कहा कि काजी नजरुल इस्लाम एक बड़ी शख्सियत थे और किसी भवन का नाम उनके नाम पर रखना उचित होगा लेकिन इसके लिए इन्दिरा भवन का नाम बदलना ठीक नहीं है। तृणमूल कांग्रेस की तरफ से कांग्रेस को रोज-रोज मिल रहे तनाव को देखते हुए कांग्रेस ने अब लगता है कि ममता को उन्हीं के अन्दाज में जवाब देने की रणनीति बना ली है। जिस तरह केंद्र में सहयोगी दल होने के नाते ममता बनर्जी आए दिन सरकार के हर फैसले में अपना वीटो लगा देती हैं उसी तरह अब कांग्रेस पश्चिम बंगाल सरकार के हर उस फैसले का विरोध करेगी जो उसकी नीतियों के खिलाफ होगी। इसी रणनीति के तहत इन्दिरा भवन का नाम बदलने पर मंगलवार को युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने ममता का विरोध किया और बुधवार को धान की बिक्री के लिए किसानों के हक में कांग्रेस खड़ी हुई। सहयोगी दलों के लगातार तल्ख हो रहे तेवरों के कारण कमजोर पड़ रही केंद्र की कांग्रेस सरकार को अब उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों से थोड़ी उम्मीद है। पार्टी को भरोसा है कि अगर इन चुनावों में उसने उम्दा प्रदर्शन किया तो इससे प्रदेश के साथ-साथ केंद्र में भी उसे मजबूती मिलेगी। यही वजह है कि यूपी चुनावों में हर तरह का हथकंडा पार्टी अपना रही है। तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी मनमोहन सरकार के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरी हैं। कांग्रेस को यह डर भी सता रहा है कि आगे भी ममता उसके लिए सिरदर्द बनी रहेगी। इसलिए वह केंद्र में एक मजबूत सहयोगी चाहती है। सूत्रों के मुताबिक आम बजट और रेल बजट में भी ममता अपनी मनमानी करेंगी। अगर यूपी चुनाव में कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन नहीं करती तो बजट सत्र कांग्रेस के लिए बुरी खबर लेकर आ सकते हैं जिसकी झलक सरकार हाल ही में राज्यसभा में देख चुकी है।
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तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच गठबंधन टूटने की सम्भावनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। दोनों के बीच तल्खी का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ममता बनर्जी ने कहा कि कांग्रेस उनके कट्टर दुश्मन सीपीएम के साथ मिलकर उनकी पार्टी पर हमला कर रही है। ममता ने यह भी चेतावनी दी कि लोकपाल बिल पर आखिरी फैसला लेने से पहले सभी राजनीतिक दलों की राय लेनी चाहिए। उन्होंने साफ कर दिया कि राज्यों में लोकायुक्त के गठन को लेकर वह अपने रुख पर अब भी कायम हैं कि यह राज्यों पर छोड़ देना चाहिए कि वह किस तरह का लोकायुक्त का गठन करना चाहते हैं। वहीं कांग्रेस को ममता के खिलाफ शिकायतों की लिस्ट लम्बी होती जा रही है। कांग्रेस के लिए नया सिरदर्द तृणमूल कांग्रेस के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवारों को उतारने की सुगबुगाहट से पैदा हो गया है। सूत्रों ने बताया कि ममता बनर्जी यूपी चुनाव में 40 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने पर गम्भीरता से विचार कर रही हैं। इतना ही नहीं, मणिपुर और गोवा में भी अपने उम्मीदवारों को चुनावी दंगल में झोंकने के लिए कमर कस रही हैं। ममता की यह पूरी कवायद राष्ट्रीय राजनीति में अपना सितारा बुलंद करने की है और इसी बहाने वह कांग्रेस को परेशान करना चाहती हैं। दरअसल ममता कांग्रेस के लिए रोज एक नई परेशानी पैदा कर रही हैं। पहले खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के सरकार के फैसले और लोकपाल व लोकायुक्त की नियुक्ति मामले पर तृणमूल कांग्रेस की आपत्ति से सरकार की खूब किरकिरी हुई। फिर कोलकाता स्थित इन्दिरा भवन का नाम नजरुल इस्लाम भवन करने के चलते भी कांग्रेस और तृणमूल के रिश्तों में खटास पड़ी। कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने कहा कि काजी नजरुल इस्लाम एक बड़ी शख्सियत थे और किसी भवन का नाम उनके नाम पर रखना उचित होगा लेकिन इसके लिए इन्दिरा भवन का नाम बदलना ठीक नहीं है। तृणमूल कांग्रेस की तरफ से कांग्रेस को रोज-रोज मिल रहे तनाव को देखते हुए कांग्रेस ने अब लगता है कि ममता को उन्हीं के अन्दाज में जवाब देने की रणनीति बना ली है। जिस तरह केंद्र में सहयोगी दल होने के नाते ममता बनर्जी आए दिन सरकार के हर फैसले में अपना वीटो लगा देती हैं उसी तरह अब कांग्रेस पश्चिम बंगाल सरकार के हर उस फैसले का विरोध करेगी जो उसकी नीतियों के खिलाफ होगी। इसी रणनीति के तहत इन्दिरा भवन का नाम बदलने पर मंगलवार को युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने ममता का विरोध किया और बुधवार को धान की बिक्री के लिए किसानों के हक में कांग्रेस खड़ी हुई। सहयोगी दलों के लगातार तल्ख हो रहे तेवरों के कारण कमजोर पड़ रही केंद्र की कांग्रेस सरकार को अब उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों से थोड़ी उम्मीद है। पार्टी को भरोसा है कि अगर इन चुनावों में उसने उम्दा प्रदर्शन किया तो इससे प्रदेश के साथ-साथ केंद्र में भी उसे मजबूती मिलेगी। यही वजह है कि यूपी चुनावों में हर तरह का हथकंडा पार्टी अपना रही है। तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी मनमोहन सरकार के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरी हैं। कांग्रेस को यह डर भी सता रहा है कि आगे भी ममता उसके लिए सिरदर्द बनी रहेगी। इसलिए वह केंद्र में एक मजबूत सहयोगी चाहती है। सूत्रों के मुताबिक आम बजट और रेल बजट में भी ममता अपनी मनमानी करेंगी। अगर यूपी चुनाव में कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन नहीं करती तो बजट सत्र कांग्रेस के लिए बुरी खबर लेकर आ सकते हैं जिसकी झलक सरकार हाल ही में राज्यसभा में देख चुकी है।
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Tuesday, 13 December 2011
कोलकाता के अभागे गए तो ठीक होने थे, लौटा उनका जला हुआ शव
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 13th December 2011
अनिल नरेन्द्र
पिछले कुछ समय से कोलकाता के अस्पतालों की चर्चा अखबारों की सुर्खियां बनती रही हैं और दुनिया को पश्चिम बंगाल में मरीजों की दयनीय स्थिति का पता चला है। शुक्रवार तड़के कोलकाता के एडवांस मेडिकेयर एण्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट (एएमआरआई) में भयंकर आग लग गई। कोलकाता के इस निजी अस्पताल में आग लगने से करीब 90 लोगों की मौत हो गई। इनमें से अधिकतर मरीज तो आए तो अस्पताल में ठीक होने पर अस्पताल से निकला उनका जला हुआ शव। क्या इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ हो सकता है कि लोग जहां जीवन रक्षा की उम्मीद में जाएं वहीं काल का शिकार बन जाएं। मरने वालों में न्यू बार्न बेबीज भी शामिल थे। शुक्रवार तड़के हुई आगजनी पैसे और रसूख के दम पर सरकारी तंत्र के साथ मिलीभगत कर कायदे-कानूनों की धज्जियां उड़ाने की ताजा मिसाल है। यह घटना हमारी उस बीमार व्यवस्था की भी पोल खोलती है, जिसमें संवेदना निरन्तर खत्म होती जा रही है और निजी अस्पताल कमाई करने का गारंटीशुदा धंधा बन गए हैं। इस बहुमंजिले निजी अस्पताल मे जब आग लगी, तब वहां इससे बचने के एहतियाती उपाय तक नहीं थे। अधिकांश लोगों की मौत दम घुटने से हुई क्योंकि शीशे के पैनलों के कारण कार्बन मोनो-आक्साइड और अमोनिया का जहरीला धुआं बाहर नहीं निकल पाया और वहां आक्सीजन की कमी हो गई। इस हादसे के लिए अस्पताल के कर्ताधर्ता तो जिम्मेदार हैं ही, मगर शासन-प्रशासन को भी जवाब देने होंगे। लाइसेंस देने वाले और इसकी इजाजत देने वाले अपनी जवाबदेही से कैसे बच सकते हैं। आखिर महज चार-पांच साल पहले इस पूर्णतया वातानुकूल अस्पताल भवन में इतना बड़ा हादसा कैसे हो गया? इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने घटना की उच्चस्तरीय जांच के आदेश देने के साथ ही अस्पताल का लाइसेंस रद्द कर दिया है और प्रबंधन के लोगों को लापरवाही एवं गैर इरादतन हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है। शासन-प्रशासन को इस सवाल का भी जवाब देना होगा कि आखिर इस अभागे अस्पताल में सुरक्षा के पर्याप्त प्रबंध क्यों नहीं थे? अस्पताल के जिस तहखाने का इस्तेमाल पार्किंग के लिए होना चाहिए था वहां ज्वलनशील सामग्री क्यों रखी थी? क्या वजह रही कि अस्पताल प्रबंधन ने अग्निशमन और पुलिस की उस चेतावनी की अनदेखी कर दी जिसमें उसे तहखाने के दुरुपयोग को लेकर चेताया गया था? क्या यह लापरवाही की पराकाष्ठा नहीं कि आग का शिकार हुआ सात मंजिला अस्पताल वैसे तो एयरकंडीशंड था, लेकिन आग के बचाव के उपाय नदारद थे। पश्चिम बंगाल की सरकार इस हादसे के बाद यह तर्प देकर अपना बचाव नहीं कर सकती कि वाम दलों के लम्बे शासन ने सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है। ममता बनर्जी को सत्ता सम्भाले करीब छह महीने हो रहे हैं और सुधारों की दिशा में काम आगे बढ़ाने के लिए उन्हें फुर्सत नहीं है। पिछले कुछ समय से राज्य में अस्पतालों की दुर्दशा के मामले भी सुर्खियां बने तब भी राज्य सरकार की आंखें नहीं खुलीं। दुःखद पहलू तो यह है कि अन्य शहरों में भी अधिकतर अस्पतालों की यही दशा है। उम्मीद की जाती है कि राज्यों की सरकारें इस आग से सबक लेंगी और अपने-अपने राज्यों में अस्पतालों में सख्ती से अग्नि से निपटने के लिए पर्याप्त उपायों पर खास ध्यान देंगी।AMRI Hospital, Anil Narendra, Daily Pratap, Kolkata, Mamta Banerjee, Vir Arjun, West Bengal
Thursday, 8 December 2011
एफडीआई पर रोल बैक या होल्ड बैक स्थिति स्पष्ट नहीं
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 8th December 2011
अनिल नरेन्द्र
एफडीआई पर स्थिति अभी भी साफ नहीं है। दरअसल मनमोहन सिंह सरकार की नीयत साफ नहीं है। पहले तो ममता बनर्जी से कह दिया कि आप इसको होल्ड पर रखने की घोषणा कर दो पर जब विपक्ष इस बात पर अड़ गया कि सरकार को घोषणा करनी चाहिए न कि एक सहयोगी दल को तो वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने सोमवार को लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, भाजपा के वरिष्ठ नेता एलके आडवाणी और माकपा सांसद सीताराम येचुरी सहित विपक्ष के नेताओं से चर्चा कर बताया कि मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 प्रतिशत एफडीआई का फैसला `होल्ड' कर लिया गया है। सभी दलों की सहमति के बाद ही उस पर कोई अंतिम फैसला किया जाएगा यानि कुल मिलाकर सरकार ने इसे वापस नहीं लिया है, होल्ड पर रखा है। रोल बैक नहीं किया है। अरुण जेटली ने मंगलवार को कहा कि भाजपा एफडीआई मुद्दे पर रोल बैक के लिए कोई ढील नहीं देगी। जेटली ने कहा एफडीआई से किसानों, छोटे दुकानदारों और आम लोगों के हितों पर सिर्प विदेशी कम्पनियों का फायदा होगा। एक प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा कि बीजेपी सुधार के पक्ष में है, लेकिन ऐसा भी सुधार नहीं चाहिए, जिसमें हित ही नहीं देखा जाए। इस प्रस्ताव के पीछे विदेशी दबाव लग रहा है और हम किसी भी सूरत में इसका समर्थन नहीं करेंगे, क्योंकि इससे भारत के बाजार चीन में बने सस्ते सामान से लद जाएंगे। उधर सीपीएम ने कहा कि होल्ड करने से कोई हल नहीं निकलेगा। पार्टी तब तक इसका विरोध करती रहेगी जब तक इसे वापस नहीं ले लिया जाएगा। माकपा महासचिव प्रकाश करात ने प्रेस कांफ्रेस में कहा कि सरकार की मंशा संसद के शीतकालीन सत्र के बाद इसे लागू करने की है, लेकिन इसे पूरा नहीं होने दिया जाएगा। सरकार पहले इस प्रस्ताव को रद्द करे तभी संसद चल पाएगी।एफडीआई का प्रस्ताव होल्ड पर हो या बोल्ड हो दोनों ही सूरत में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यह व्यक्तिगत हार है और वह एक बार फिर बुरी तरह एक्सपोज हो गए हैं। अपने इतने वर्षों के कार्यकाल में बतौर पीएम मनमोहन सिंह ने केवल दो मुद्दों पर अपना सब कुछ दाव पर लगाया था। पहली थी अमेरिका से न्यूक्लियर डील और दूसरा यह एफडीआई का प्रस्ताव। प्रधानमंत्री बार-बार यह कहते रहे कि यह प्रस्ताव किसी भी हालत में वापस नहीं होगा, अगर ऐसा हुआ तो सरकार की साख पर धब्बा लगेगा। राजनीतिक क्षेत्रों में यह आम संकेत जा रहा है कि मनमोहन सिंह सरकार ने रिटेल में एफडीआई का फैसला अमेरिकी दबाव में लिया था और इसकी वजह यह है कि भारतीय बहुराष्ट्रीय लॉबी इसी मामले पर काम कर रही थी ताकि इस चालाकी भरी चाल को अमली जामा पहनाया जा सके। इसमें कोई शक नहीं कि वाणिज्य मंत्री आनन्द शर्मा इस मामले को लागू करने के लिए एक ऐसी ही ताकत के रूप में काम कर रहे हैं जिसका इस मामले पर एक खास लॉबी से रिश्ता है। एफडीआई पर कैबिनेट के फैसले के ऐलान करने के शीघ्र बाद वह चेन्नई रवाना हो गए। उन्होंने अपने स्टाफ को एक खास मल्टी नेशनल कम्पनी से सम्पर्प कराने और साथ ही इस निर्णय के समर्थन में किसानों की प्रतिक्रिया जानने के लिए एक आयोजन कराने को भी कहा। यह सब तब पता चला जब एक टीवी चैनल ने अगले ही दिन पंजाब में कुछ किसानों की बाइट्स दिखाई जो इस निर्णय को लेकर अपनी खुशी जाहिर कर रहे थे। इन किसानों ने सब्जियों के रेट मार्केट की तुलना में ज्यादा मिलने के लिए मल्टी नेशनल कम्पनियों की तारीफ भी की। जनता में यह सन्देश जा रहा है कि मनमोहन सिंह और उनके मंत्री अमेरिका और भारतीय उद्योगपतियों के लिए काम कर रहे हैं। वह इनके हितों को देश की जनता के हितों से ऊपर रख रहे हैं। देखना अब यह है कि इस मुद्दे पर मनमोहन सिंह का अंतिम फैसला क्या होता है, रोल बैक या होल्ड बैक?
Anil Narendra, Daily Pratap, Vir Arjun, FDI in Retail, UPA, Congress, Pranab Mukherjee, Mamta Banerjee,
Wednesday, 7 December 2011
India must amend its China policy
- Anil Narendra
India's relations with China have always been sweet and sour. It was India, who preached Buddhism to the Chinese. With the Communist Party coming to power in China in 1949, relations between both the countries were established. India was the only non-communist country that recognized the Chinese Communist Government and it also helped China in getting recognition by the UNO. An eight-year agreement was signed between India and China in 1954, under which India surrendered its additional regional rights over Tibet to China, on the basis of which both the countries affirmed Panchsheela principles. Relations between both started deteriorating in 1957. The Tibetan religious leader, Dalai Lama had to flee Tibet and take refuge in India on 31st March 1959 in view of Chinese repression, which also became one of the reasons for 1962 Indo-China war. Tension between India and China due to Dalai Lama and his followers mounted and it still continues. Meanwhile, China has now adopted a more rigid and aggressive stand on the issue of Dalai Lama and his followers. Recently, I was in Kolkata, in connection with a programme, in which Dalai Lama was invited. The Governor, AK Narayanan and the Chief Minister, Mamata Bannerjee were also to participate in the programme. China wrote a formal letter to the West Bengal Government demanding that Governor and Chief Minister stay away from the programme. This demand of China was not agreed upon. The Governor attended the programme, but the Chief Minister could not participate in view of the illness of her mother, however, her representative, MP Derek O'Brian attended the programme. India decided to lodge a protest in this matter and to ask China, why it wrote such a letter to the West Bengal Government. Earlier, also China had demanded to cancel the Buddhist scholar meet being held in New Delhi, which was to be addressed by the Dalai Lama. When the request was turned down, China decided not to participate in the proposed meeting on border disputes. China does not desist from interfering it India's internal affairs and its attitude towards India, of late, has turned more aggressive. For example, what the state government of a country should do or not do, must not be the concern for any foreign government. In fact, China has started regarding itself a super power like US and wants that all its obstinate demands must be agreed to. Government of India, too, appears to give in to China to some extent. That is why, the J&K Chief Minister, Omar Abdullah said that India must clarify its China policy. Addressing a gathering in Mumbai on Saturday, Omar said that India must deal with China firmly, because it claims parts of the country as disputed areas and it has also questioned the sovereignty of India over a number of its territories. A few hours earlier, his father Farooq Abdullah said in Delhi that India must accept the fact that the PoK cannot be taken back neither from Pakistan nor from China. His son, Omar asked, if you consider PoK as an integral part of India, then why didn't you cross the LoC during the Kargil war? If you respect the LoC during war, it means that you have lost hope of getting it back. Omar pleaded with New Delhi to give up its always forgiving posture in it its relations with Pakistan and China. He seriously wished that India exhibit more firmness while dealing with China. It appears that China never hesitates in declaring Kashmir as a disputed area, while we are expected to follow 'One China' policy and not to raise questions on the status of China over Tibet and Taiwan. Why it is so that we follow 'One China' policy, whereas China is ignoring the policy of United India. We had been moralistic and fearful in our relations with China, though it is not required. I feel that time has now come when we should deal with China with firmness. If China can question our sovereignty, then we also have every right to raise our fingers over its sovereignty (which includes Tibet also).
चीन के प्रति भारत को अपनी नीति बदलनी होगी
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 7th December 2011
अनिल नरेन्द्र
भारत और चीन के बीच संबंध हमेशा सर्द-गर्म के रहे हैं। भारत से ही चीन में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ था। 1949 में चीन की कम्युनिस्ट सरकार की स्थापना हुई और दोनों देशों के बीच संबंधों की स्थापना हुई। भारत ने प्रारम्भ से ही चीन के प्रति मैत्री व सद्भावना का इजहार किया। भारत एक ऐसा पहला गैर कम्युनिस्ट देश था जिसने चीन की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता दी थी और संयुक्त राष्ट्र संघ में भी चीन को मान्यता दिलाने का प्रयास किया था। 1954 में चीन और भारत के बीच एक 8वर्षीय समझौता हुआ जिसके अंतर्गत भारत ने तिब्बत में अपने अतिरिक्त देशीय अधिकारों को चीन को सौंप दिया। इसके आधार पर दोनों देशों के बीच पंचशील सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया। 1957 में दोनों देशों के बीच तिब्बत को लेकर संबंध खराब होने शुरू हो गए। 31 मार्च 1959 को तिब्बत में चीनी दमन की वजह से वहां के धर्मगुरु दलाई लामा ने भारत में राजनीतिक शरण ली इसी तनाव की परिणति 1962 में भारत-चीन युद्ध के रूप में भी हुई। आज भी दलाई लामा और उनके अनुयायियों को लेकर भारत-चीन में तनाव बना हुआ है। दलाई लामा के मुद्दे पर चीन अब कुछ ज्यादा ही आक्रामक रुख अपनाए हुए है। पिछले दिनों कोलकाता में एक कार्यक्रम था जहां दलाई लामा ने आना था। इस कार्यक्रम में राज्यपाल एके नारायणन और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी उपस्थित होना था। चीन ने पश्चिम बंगाल सरकार को बाकायदा एक चिट्ठी लिखी जिसमें यह मांग की गई थी कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री इस कार्यक्रम में न जाएं। यह मांग नहीं मानी गई, राज्यपाल इस कार्यक्रम में शामिल हुए और मुख्यमंत्री अपनी मां की बीमारी की वजह से उसमें शामिल नहीं हो पाईं, लेकिन उनके प्रतिनिधि के तौर पर सांसद डेरेक ओब्राइन शामिल थे। भारत ने इस बात का विरोध दर्ज करने का फैसला किया है कि चीन ने पश्चिम बंगाल सरकार को आखिर ऐसी चिट्ठी क्यों लिखी? कुछ ही दिन पहले चीन ने नई दिल्ली में बौद्ध विद्वानों के सम्मेलन को रद्द करने की मांग की थी जिसे दलाई लामा को संबोधित करना था। जब चीन की जिद्द नहीं मानी गई तो उसने सीमा विवाद पर प्रस्तावित बैठक में शामिल न होने का फैसला किया। चीन भारत के अंदरुनी मामलों में दखलंदाजी से बाज नहीं आता। उसने ज्यादा ही आक्रामक रुख अपना लिया है। मसलन देश की एक राज्य सरकार के मुखियाओं को क्या करना चाहिए या नहीं करना चाहिए, यह सीधे तौर पर किसी विदेशी सरकार को नहीं बताना चाहिए था। चीन दरअसल अपने आपको अमेरिका की तरह एक महाशक्ति मानने लगा है और अपनी हर जिद्द को मनवाना चाहता है। भारत सरकार भी कुछ हद तक चीन के सामने घुटने टेकती दिख रही है। तभी तो हाल में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भारत से कहा कि वह अपनी चीनी नीति को स्पष्ट करे। मुंबई में एक सभा में बोलते हुए उमर ने कहा कि भारत को थोड़ा और दृढ़ता के साथ चीन से पेश आना चाहिए क्योंकि यह देश को विवादित क्षेत्र कहता है और कई हिस्सों पर भारत की सप्रभुता पर सवाल भी खड़े करता है। उमर शनिवार को मुंबई में एक्सप्रेस अड्डे में बोल रहे थे। कुछ ही घंटे पहले उमर के पिता फारुख अब्दुल्ला ने दिल्ली में कहा था कि भारत को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि वह पाक अधिकृत कश्मीर को न तो पाकिस्तान से और न ही चीन से वापस ले सकता है। बेटे उमर ने कहा कि अगर सचमुच आपको विश्वास है कि पाक अधिकृत कश्मीर भारत का हिस्सा है तो कारगिल संघर्ष के दौरान आपने नियंत्रण रेखा को क्यों नहीं लांघा? अगर आप संघर्ष के समय भी नियंत्रण रेखा का सम्मान करते हैं तो इसका मतलब यही है कि आपने उस इलाके को वापस पाने की उम्मीद छोड़ दी है। उमर ने नई दिल्ली से गुजारिश की कि चीन व पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों में हमेशा क्षमाप्रार्थी हेने की मुद्रा त्याग दें। उन्होंने कहा कि मेरी दिली इच्छा है कि चीन के साथ पेश आते समय भारत थोड़ा और दृढ़ता दिखाए। ऐसा लगता है कि कश्मीर को विवादित क्षेत्र करार देने में चीन को जरा भी झिझक नहीं है जबकि हमसे `एक चीन' की नीति का पालन करने और तिब्बत व ताइवान के दर्जे पर सवाल नहीं खड़े करने की अपेक्षा की जाती है। ऐसा क्यों है कि हम अखंड चीन की नीति का पालन करें जबकि चीन अखंड भारत की नीति का पालन नहीं कर रहा है। चीन और पाकिस्तान दोनों के ही साथ अपने संबंधों में हम अरसे से शील-संकोची रहे हैं जबकि वाकई इसकी जरूरत नहीं थी। मुझे लगता है कि चीन के साथ थोड़ा सख्त होना अब जरूरी है। अगर हमारी सप्रभुता को लेकर चीन सवाल खड़ा करता है तो हमें भी कई हिस्सों में उसकी सप्रभुता (जिनमें तिब्बत भी शामिल है) पर सवाल खड़े करने का हक है।
Aksai Chin, Anil Narendra, China, Daily Pratap, Dalai Lama, India, Mamta Banerjee, Vir Arjun, West Bengal
Sunday, 4 December 2011
मनमोहन ने अपनी सरकार, पार्टी व देश को दाव पर लगा दिया है
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 4th December 2011
अनिल नरेन्द्र
क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस पार्टी देश और संसद का ध्यान ज्वलंत मुद्दों, भ्रष्टाचार, महंगाई, ब्लैक मनी से हटाने के लिए यह खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) का मुद्दा लाए हैं? माकपा नेता सीताराम येचुरी तो कम से कम यह मानते हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि सरकार संसद की कार्यवाही में बाधा को जानबूझ कर जारी रख रही है। यह लोकपाल, भ्रष्टाचार, महंगाई आदि मुद्दों पर चर्चा और बहस से बचने की राजनीति का एक हिस्सा है। यह दिन-ब-दिन साफ होता जा रहा है कि सरकार इस सत्र में कामकाज नहीं होने देना चाहती। येचुरी की इस दलील में कुछ दम है। यह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की रणनीति का एक हिस्सा हो सकता है पर जहां तक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का इस रणनीति में शामिल होने का सवाल है, हमें नहीं लगता कि वह ऐसा करने को अपनी हामी दे सकती हैं। अंदरुनी खबर तो यह है कि सोनिया गांधी व राहुल गांधी मनमोहन सिंह की इस हठधर्मिता से सख्त नाराज हैं। एफडीआई मुद्दे पर फंसी मनमोहन सिंह सरकार को सोनिया गांधी ने उसके हाल पर छोड़ दिया है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक दो दिन पहले हुई कांग्रेस कोर कमेटी की बैठक में सोनिया गांधी उस समय झल्ला गईं जब प्रधानमंत्री ने पूरा मामला सोनिया पर छोड़ना चाहा। डॉ. मनमोहन सिंह ने तो दो टूक कहा कि सरकार संसद में मतदान का सामना करे या फिर एफडीआई पर फैसला ले। इस पर पहले से ही नाराज चल रहीं सोनिया गांधी ने कहा कि जब केंद्र को एफडीआई पर निर्णय लेना था तो उनसे क्यों नहीं पूछा गया था और जब स्वयं अपने विवेक पर उन्होंने (प्रधानमंत्री ने) यह फैसला लिया है तो फिर उनको (प्रधानमंत्री) ही इस संकट से निपटना चाहिए। डॉ. मनमोहन सिंह पता नहीं क्यों अपना और अपनी सरकार व पार्टी का सब कुछ इस मुद्दे को लेकर दाव पर लगाने पर तुले हुए हैं। बार-बार वह यह दोहराते नहीं थकते कि अगर उन्होंने एफडीआई को वापस लिया या रोल बैक किया तो उनकी सरकार की साख घटेगी। उन्होंने सरकार के सहयोगी दलों तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक के नेताओं से मुलाकात कर कहा कि इस पर वह अपनी जिद्द छोड़ दें, क्योंकि कोई भी फैसला वापस लेने से सरकार की विश्वसनीयता कम होती है। हम डॉ. मनमोहन सिंह से पूछना चाहते हैं कि आपकी और सरकार की विश्वसनीयता है कहां जो कम होगी? आप इतनी-सी बात नहीं समझ रहे कि आज पूरा देश आपके इस निर्णय के खिलाफ है और सड़कों पर उतर आया है। 22 नवम्बर से शुरू हुए संसद के शीतकालीन सत्र में एक दिन भी कामकाज नहीं हुआ है। अगर हम विभिन्न राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, उड़ीसा, प. बंगाल, केरल, पंजाब, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, झारखंड और उत्तराखंड एफडीआई के विरोध में हैं। सिर्प दिल्ली, आंध्र, अरुणाचल, राजस्थान, हरियाणा, मिजोरम, मणिपुर असम, गोवा और महाराष्ट्र (कांग्रेस शासित) राज्य ही इसके हक में हैं। अगर हम लोकसभा में सांसदों की बात करें तो कुल 543 में से 278 सांसद विरोध में हैं। इनमें भाजपा (115), अकाली दल (4), सपा (22), बसपा (21), जद (यू) (20), तृणमूल (18), लेफ्ट (24), द्रमुक (18), बीजद (14), अन्ना द्रमुक (9), शिवसेना (11) और तेदेपा (6) सांसद। सरकार के साथ कांग्रेस के 207 और एनसीपी के 9 सांसद हैं। अगर कल को वोटिंग की नौबत आई तो कुछ भी हो सकता है। सरकार गिर भी सकती है। प्रधानमंत्री पता नहीं यह क्यों नहीं समझ रहे कि उनके साथ तो उनके गठबंधन सहयोगी भी नहीं हैं। प्रधानमंत्री की तमाम कोशिशों के बावजूद तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने दो टूक कह दिया है कि उनकी पार्टी इस फैसले का समर्थन नहीं कर सकती। हालांकि ममता ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी संप्रग सरकार को गिराने के पक्ष में नहीं है। तृणमूल कांग्रेस ही क्यों, हमें नहीं लगता कि कोई भी विपक्षी दल इस समय संप्रग सरकार को गिराने में दिलचस्पी रखता है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। कोई भी दल देश को मध्यावधि चुनाव में घसीटना नहीं चाहेगा। हां, पर सरदार मनमोहन सिंह ने अपनी जिद्द को पूरा करने के लिए पूरे देश को, अपनी सरकार व अपनी पार्टी को दाव पर जरूर लगा दिया है। यह कहावत है न `सनम हम तो डूबेंगे तुम्हें साथ ले डूबेंगे' फिट बैठती है। जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है वह दिन-रात लोकसभा में आंकड़े पूरे करने में लग गई है। कल को अगर वोटिंग की नौबत आए तो सरकार को बचाने के लिए उसके पास पर्याप्त सांसद संख्या होनी चाहिए और यह नौबत केवल एक आदमी की हठधर्मिता के कारण आएगी।Anil Narendra, Bhanwri Devi, CBI, Daily Pratap, Mhipal Maderna, Rajasthan High Court, Sex, Sex Scandal, Vir Arjun
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