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Wednesday, 30 May 2012

आईपीएल-5 रोमांचक रहा पर शक के दायरे में ही आया

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30 May 2012
अनिल नरेन्द्र
आईपीएल-5 शानदार तरीके से समाप्त हुआ। रविवार को खेला गया फाइनल मैच बहुत ही रोमांचक था। अगर यह कहें कि आईपीएल-5 का समापन मैच इससे अच्छा नहीं हो सकता था तो शायद गलत न होगा। शाहरुख खान की टीम कोलकाता नाइट राइडर्स आखिरकार पांचवीं कोशिश में पास हो गई। रविवार को खेले गए फाइनल में केकेआर ने पिछले दो बार के चैंपियन चेन्नई सुपरकिंग्स को पांच विकेट से हरा दिया। मैच का फैसला आखिरी ओवर की चौथी गेंद पर हुआ। विजेता टीम को 10 करोड़ और उपविजेता को 7.50 करोड़ रुपये की इनामी राशि मिली। किस्मत ने केकेआर का निश्चित रूप से साथ दिया। कम से कम दो किस्से ऐसे हुए जिससे केकेआर की जीत सम्भव हो सकी। पहला तब हुआ जब कैलिस ने एक शाट मारा। बाउंड्री पर खड़े माइक हसी ने कैच लपक तो लिया पर वह बाउंड्री लाइन क्रॉस कर गए। जिस बॉल पर कैलिस को आउट होना था वह छक्के में बदल गई। दूसरा किस्सा तब हुआ जब हिलफेन हास ने शाकीब अल हसन को गेंद फेंकी। शाकीब ने शाट मारा और और कैच हो गए पर कैच होने से पहले वह दो रन भाग चुके थे। एम्पायर ने इस बॉल को कमर से ऊपर होने के कारण वाइट करार दिया। वाइट होने के कारण हिलफेन हास को दोबारा बॉल करनी पड़ी और इस बार शाकीब ने चौका मार दिया। इस तरह एक ही बॉल से केकेआर को 7 रन मिल गए और उस समय केकेआर को 7 बॉलों में 16 रनों की दरकार थी। इन 7 रनों ने आखिरी ओवर का लक्ष्य आसान कर दिया। मनोज तिवारी ने दो चौके लगा दिए और केकेआर चैंपियन बन गया। केकेआर की यह पहली जीत थी। मालिक शाहरुख खान की खुशी का ठिकाना देखने लायक थी। शानदार टूर्नामेंट का शानदार क्लाइमैक्स रहा पर आईपीएल-5 विवादों से नहीं बच सका। सबसे बड़ा विवाद तो दिल्ली डेयर डेविल्स की परफार्मेंस को लेकर था। विवादित क्रिकेट लीग बनकर उभरी आईपीएल में गड़बड़ी का शक भी होने लगा है। क्या आईपीएल के रिजल्ट पहले से ही तय थे? शक करने के कई कारण दिखाई देते हैं। क्वालीफायर-1 और क्वालीफायर-2 में दिल्ली डेयर डेविल्स के अजीबो-गरीब फैसलों और आईपीएल की वेबसाइट में क्वालीफायर-2 के रिजल्ट के पहले ही दोनों फाइनलिस्टों के नाम आने के बाद शक होना लाजिमी है। 22 मई को केकेआर के खिलाफ पहले क्वालीफायर में भी सहवाग की कप्तानी में ऐसे फैसले देखने को मिले जिससे लगा कि दिल्ली हारने के लिए ही उतरी है। स्पिन ट्रैक होने के बावजूद सहवाग ने उस मैच में सिर्प एक स्पिनर को खिलाया जबकि केकेआर की ओर से तीन स्पिनर उतरे। यही नहीं लक्ष्य का पीछा करने उतरी दिल्ली ने टेलर और इरफान पठान से पहले अपेक्षाकृत धीमी बल्लेबाजी करने वाले वेणुगोपाल राव और पवन नेगी को बल्लेबाजी के लिए उतारा। इन दोनों की धीमी बल्लेबाजी की वजह से बाद में टेलर और इरफान के लिए लक्ष्य पाना बहुत मुश्किल हो गया। यह सिलसिला यहीं नहीं थमा। क्वालीफायर-2 में तो सहवाग ने बीसीसीआई अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन की टीम चेन्नई सुपरकिंग्स के फाइनल में जाने के सारे रास्ते खोल दिए। शुक्रवार को हुए इस मैच में सहवाग ने चेन्नई की पिच पर टास जीतने के बावजूद पहले गेंदबाजी की। यही नहीं पूरे टूर्नामेंट में टाप फार्म में रहे दक्षिण अफ्रीकी तेज गेंदबाज मोर्नी मोर्केल को इस मैच में नहीं खिलाया गया और इनकी जगह कैरेबियाई आलराउंडर आद्रेरसल को शामिल कर लिया। सहवाग के इस निर्णय पर धोनी ने भी आश्चर्य जाहिर किया। यही नहीं पूरे टूर्नामेंट में बढ़िया प्रदर्शन करने वाले स्पिनर शाहबाज नदीम की जगह इस मैच में सन्नी गुप्ता को शामिल किया और उनसे पहला ही ओवर करवा डाला। गुप्ता ने तीन ओवर में 47 रन दिए और एक भी सफलता उनके हाथों में नहीं लगी। यही नहीं सहवाग ने इस टूर्नामेंट में पहली बार गेंदबाजी में हाथ आजमाए और एक ही ओवर में 21 रन दिए। सबसे आश्चर्य की बात यह रही कि 223 रन की विशाल लक्ष्य का पीछा करने उतरी दिल्ली के ओपनिंग बल्लेबाजों में वीरेन्द्र सहवाग नदारद थे। उन्होंने वार्नर के साथ ओपनिंग में माहेला जयवर्द्धने को उतारा। उनमें न तो कांफिडेंस नजर आई और उनकी बाडी लैंग्वेज ने सारी कहानी कह डाली। वह सिर्प एक रन बनाकर चलते बने। माहेला जयवर्द्धने अच्छा खेल रहे थे पर एक बॉल पर जब वह बीट हुए तो वह खड़े तमाशा देखते रहे। उन्होंने वापस बैट रखने की कोई कोशिश नहीं की जबकि वह सम्भव है कि स्टम्प होने से बच सकते थे। दिल्ली डेयर डेविल्स ने अपने दिल्ली के फैंस को न केवल नाराज किया बल्कि सहवाग के आचरण से शक भी पैदा किया पर कुल मिलाकर आईपीएल-5 सफल रहा और सब ने इसका खूब मजा लिया। ऐसा नहीं कि टूर्नामेंट से कुछ अच्छा नहीं उभरा। कई युवा खिलाड़ी उभरे। बोर्ड ने यह भी फैसला किया कि आईपीएल नियमों की समीक्षा होगी और अगले सत्र में सभी घरेलू खिलाड़ियों की भी नीलामी होगी।
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Saturday, 19 May 2012

शाहरुख खान फिर फंसे विवाद में

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19 May 2012
अनिल नरेन्द्र
आईपीएल यानि इंडियन प्रीमियर लीग अभी स्टिंग ऑपरेशन का सदमा झेल रही थी कि एक नया विवाद पैदा हो गया। मामला फिल्मों के सुपर स्टार किंग खान से संबंधित है। कोलकाता नाइट राइडर्स के मालिक शाहरुख खान महाराष्ट्र क्रिकेट संघ के अधिकारियों से कथित तौर पर भिड़ गए। मामला कुछ यूं था ः शाहरुख खान कुछ बच्चों के साथ कोलकाता नाइट राइडर्स बनाम मुंबई इंडियन मैच की समाप्ति पर वानखेड़े स्टेडियम पहुंचे और अपनी टीम के खिलाड़ियों से मिलने ड्रेसिंग रूम की तरफ चले गए और उनके साथ आए बच्चे मैदान में जाने का प्रयास करने लगे तो सुरक्षा गार्डों ने उन्हें रोक दिया। शाहरुख को जब इसका पता चला तो वह बाहर आकर सुरक्षा गार्डों से भिड़ गए और आपस में कहासुनी शुरू हो गई। एमसीए (महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन) अधिकारियों ने उन्हें बताया कि वे मैदान में नहीं जा सकते हैं। इस पर शाहरुख ने कहा कि मैं टीम का मालिक हूं और मुझे कैसे रोका जा सकता है? शाहरुख और एमसीए अफसर से बहस हो रही थी तभी यूसुफ पठान बीच-बचाव करने पहुंचे। सहायक पुलिस आयुक्त इकबाल शेख ने मौके की नजाकत समझी और वह शाहरुख को समझा-बुझाकर अपनी गाड़ी में बैठाकर स्टेडियम से ले गए। एमसीए की शुक्रवार को आपात बैठक होगी जिसमें शाहरुख पर स्टेडियम में प्रवेश पर आजीवन प्रतिबंध लगाने पर विचार होगा। दोनों पक्षों ने एक दूसरे पर बदसलूकी और उकसाने का आरोप लगाया है। एमसीए ने शाहरुख के खिलाफ मैरीन ड्राइव थाने में रिपोर्ट दर्ज करवा दी। उधर शाहरुख का कहना है कि वह नशे की हालत में नहीं थे और एमसीए अधिकारियों ने उनके बच्चों के साथ बदतमीजी की। शाहरुख ने आनन-फानन में बुलाई प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि मैं इस बात से इंकार नहीं करूंगा कि मैंने गाली दी, लेकिन यह सब तब शुरू हुआ जब एक शख्स पीछे से आया और मराठी में कुछ ऐसा अभद्र कहा जिसे मैं दोहराना नहीं चाहता। मैंने शराब नहीं पी रखी थी। मैं अपने बच्चों को लेने गया था। मेरे बच्चों के साथ सुरक्षा अधिकारियों ने हाथापाई की, जिसके बाद मेरा एमसीए अधिकारियों के साथ झगड़ा हुआ। सुरक्षा के नाम पर बच्चों के साथ हाथापाई नहीं की जा सकती। यह माफ करने लायक बात नहीं है। उन्हें मुझसे माफी मांगनी चाहिए। मामला पेचीदा है। यह ठीक है कि सेलीब्रेटी स्टेटस होने के कारण फिल्म सितारों की छोटी सी छोटी बात हैडलाइंस बन जाती है पर फिल्म सितारों को भी इसका अहसास होना चाहिए कि वह क्या कर रहे हैं और उसके क्या परिणाम होंगे। कुछ फिल्मी सितारे अपने आपको देश के कानून से ऊपर मानते हैं और हर जगह अपनी चलाना चाहते हैं। पुलिस और शाहरुख के बयानों में बहुत फर्प है। मामला दर्ज हो चुका है और छानबीन से ही पता चलेगा कि आखिर हुआ क्या? इस मामले में एक और नुकसान शाहरुख को यह भी हो सकता है कि उनकी टीम ने मुंबई की टीम को हराया था। सचिन को हराया था और शाहरुख मुंबई के खिलाफ ही मैदान में उतर गए। आखिर शाहरुख आज जो भी हैं वह मुंबई की वजह से हैं। मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री की वजह से हैं। एक ट्विट आया कि शाहरुख को अपनी टीम का नाम कोलकाता नाइट राइडर्स से बदलकर कोलकाता नाइट फाइटर्स कर लेना चाहिए।
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Tuesday, 17 April 2012

इस रेट से तो ममता की छवि और लोकप्रियता तेजी से घटेगी

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जिद और अक्कड़पन से अब सब परिचित हो चुके हैं। लगता है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद तो उनमें अहंकार और तानाशाह प्रवृत्ति में इजाफा हो गया है। अब तो वह अपने खिलाफ बना कार्टून को भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कार्टून लगाने के आरोप में जादवपुर विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर को शुक्रवार को गिरफ्तार कर लिया गया। यह कार्टून दिनेश त्रिवेदी को रेल मंत्री पद से हटाकर उनकी जगह मुकुल रॉय को नया रेल मंत्री बनाने के संदर्भ में यह कार्टून बनाया गया था। रसायन शास्त्र के प्रोफेसर अम्बिकेश महापात्रा की गिरफ्तारी से आक्रोश फैल गया और माकपा एवं शैक्षणिक समुदाय ने कहा कि पुलिस कार्रवाई बिल्कुल दमनात्मक है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के न्यूनतम लोकतांत्रिक अधिकार पर स्पष्ट हमला है। बाद में अलीपुर की अदालत ने प्रोफेसर को जमानत पर रिहा कर दिया। प्रोफेसर महापात्रा ने आरोप लगाया कि कार्टून डालने के कारण गुरुवार रात तृणमूल कांग्रेस के 15 समर्थकों ने उनके साथ बदसलूकी भी की। प्रोफेसर ने कहा कि वे अपनी सुरक्षा को लेकर खतरा महसूस कर रहे हैं। वहीं विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल माकपा ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार अखबारों पर अंकुश लगाकर लोकतंत्र और आजीविका के अधिकार पर हमला कर रही है। वहीं पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने कार्टून विवाद पर कहा कि कार्टून लोकतंत्र का हिस्सा है। उन्होंने कहा, मेरा मानना है कि कार्टून स्वस्थ लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है। कार्टून आपकी छवि को खराब नहीं कर सकते हैं। माकपा के वरिष्ठ नेता अब्दुर रज्जाक मोल्ला ने शनिवार को आरोप लगाया कि राज्य सरकार अखबारों पर अंकुश लगाकर लोकतंत्र और आजीविका के अधिकार पर हमला कर रही है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने फरमान जारी किया कि सरकारी पुस्तकालयों में सिर्प चुनिंदा अखबार ही रखे जाएं। सरकार विरोधी अखबारों के लिए पुस्तकालय में कोई जगह नहीं है। मोल्ला ने स्टूडेंट्स हॉल में माकपा (माले) लिबरेशन की ओर से आयोजित सम्मेलन में कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वहीं सम्मेलन में मौजूद कवि नवारुण भट्टाचार्य ने कार्टून बनाने वाले के खिलाफ कार्रवाई को राज्य सरकार की मनमानी और अराजकता कहा। शिक्षाविद् सुनन्दा सान्याल ने प्रोफेसर की गिरफ्तारी की निंदा करते हुए कहा कि ममता बनर्जी ने राज्य में सत्ता परिवर्तन का नारा उछाल कर सत्ता हथियाने में कामयाबी हासिल की। सच तो यह है कि राज्य में कहीं भी परिवर्तन की झलक नहीं दिख रही है। यह दुःखद, दुर्भाग्यपूर्ण व निंदनीय है। ममता धीरे-धीरे फासिस्ट होती जा रही हैं। हमारा मानना है कि ममता बनर्जी में अपने खिलाफ किसी प्रकार की आलोचना या व्यंग्य बर्दाश्त करने की क्षमता कम होती जा रही है। लोकतंत्र में कार्टून बनाना कोई अपराध नहीं है और ऐसा रोकना प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला करना है। जिस तरह से ममता चल रही हैं उससे तो यही लगता है कि वह बहुत तेजी से अलोकप्रिय हो जाएंगी और उनकी बनी छवि धूमिल हो जाएगी। वाम नेताओं से उनको इतनी नफरत है कि वह अब यह भी ठीक से फैसला नहीं कर पा रही कि क्या ठीक है क्या गलत?
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Wednesday, 11 April 2012

पश्चिम बंगाल से कार्ल मार्क्स और एंजेल्स की विदाई

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 11 April 2012
अनिल नरेन्द्र
पश्चिम बंगाल में 34 साल तक कामरेडों ने कार्ल मार्क्स की नीतियों पर चलकर राज किया। इस दौरान सारी दुनिया से मार्क्स और एंजेल्स का नामोनिशान लगभग साफ हो गया पर हमारे कामरेड उसी ढर्रे पर चलते रहे। यह समय के अनुसार बदले नहीं। नतीजा यह हुआ कि पश्चिम बंगाल की जनता ने इन्हें उखाड़ फेंका। केवल प. बंगाल से ही नहीं बल्कि केरल से भी। ममता बनर्जी अब कोशिश कर रही हैं कि मार्क्स वापस प. बंगाल में न आ सकें। इसलिए उन्होंने 34 साल बाद कार्ल मार्क्स की तैयारी कर ली है। प्रदेश की स्कूली शिक्षा पाठ्यक्रम समिति ने मार्क्स और फ्रेडरिक एंजेल्स का पाठ स्कूली किताबों से हटाने की सिफारिश की है। फैसला ममता सरकार को करना है। स्कूली किताबों से जो प्रमुख पाठ हटाए जा रहे हैं उनमें मार्क्सवाद के संस्थापक कार्ल मार्क्स की जीवनी, मार्क्स की मदद करने वाले दोस्त फ्रेडरिक एंजेल्स की कहानी और रूस में 1917 में बालेशेविक क्रांति की पूरी कहानी है। तृणमूल के सत्ता में आते ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पाठ्यक्रम समीक्षा समिति का गठन कर दिया था। समीक्षा समिति को स्कूल पाठ्यक्रम आधुनिक बनाने और छात्रों पर अनावश्यक बोझ कम करने का काम सौंपा गया। समिति ने 695 पेज की रिपोर्ट सौंपी है। ममता अकेली नहीं जिन्होंने कार्ल मार्क्स से निजात पाने के लिए कदम उठाए हैं। अब तो हमारे कामरेड भी कहने लगे हैं कि हमें देश की मौजूदा हालातों के अनुसार बदलाव करना होगा। माकपा नेता सीताराम येचुरी ने पार्टी के 20वें अखिल भारतीय सम्मेलन में उन्होंने कहा कि हमें रूस, चीन, क्यूबा तथा अन्य लैटिन अमेरिकी देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों से अलग नजरिया अपनाना होगा। पार्टी सिद्धांत बदलेगी। साथ ही अपने कार्यक्रमों की समीक्षा करेगी। पार्टी लोकतांत्रिक ताकतों और वाम शक्तियों को मिलाकर राजनीतिक विकल्प बनने की प्रक्रिया में है। सम्मेलन में पेश प्रस्ताव में कहा गया है कि 1894 के भूमि अधिनियम का कारपोरेट घराने दुरुपयोग कर रहे हैं, विशेष आर्थिक क्षेत्र के वास्ते, भूमि अधिग्रहण और खनन के लिए ऐसा होता है। इस कानून के कारण देश के कई किसानों और कृषि श्रमिकों को संघर्ष करते देखा गया है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि माकपा अपनी पराजय से कुछ सीखना नहीं चाहती। वह कांग्रेस और भाजपा को पराजित करने की बात तो कर रही है, लेकिन उसके रोड मैप में तीसरे विकल्प के लिए कोई जगह नहीं है। इसके विपरीत वह वामपंथी लोकतांत्रिक विकल्प के लिए प्रयास करने की बात कर रही है। मगर ऐसा कोई विकल्प हवा में तो तैयार होने से रहा। पिछले लोकसभा चुनाव में ही वामदलों की सीटें पिछली बार के मुकाबले आधी से कम रह गई थीं। यदि सम्भावित परिदृश्य को देखें तो नीतीश कुमार, जयललिता, ममता, नवीन पटनायक और चन्द्रबाबू नायडू के रहते गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपाई राजनीति में माकपा के लिए जगह नजर नहीं आ रही? सच तो यह है कि पार्टी आज भी अंतर्द्वंद्व और गुटबाजी से जूझ रही है। वह माने या न माने, लेकिन केरल में पार्टी मतभेदों और गुटबाजी के कारण ही हार हुई। पार्टी महासचिव प्रकाश करात की बेड़ागर्प करने वाली नीतियां जब तक बदलती नहीं, हमें माकपा का राजनीतिक भविष्य चमकता नहीं दिखता।
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Thursday, 2 February 2012

... और अब ममता ने मनमोहन सिंह पर सीधा हमला किया

यूपीए के घटक दलों के बढ़ते दबाव से कांग्रेस का राजनीतिक संकट बढ़ता जा रहा है। ममता बनर्जी व शरद पवार दोनों ने कांग्रेस की नाक में दम कर रखा है। सोमवार को ममता ने सारी हदें पार कर लीं। उन्होंने सीधा पधानमंत्री मनमोहन सिंह पर हमला बोल दिया। सोमवार को ममता ने मनमोहन सिंह पर सीधा हमला करते हुए आरोप लगाया कि पधानमंत्री ने सिंगूर में भूमि अधिग्रहण विरोधी उनके आंदोलन के दौरान उनसे बात नहीं की थी। ऐसा उन्होंने माकपा के डर से किया था। वह माकपा को नाराज नहीं करना चाहते थे। ममता ने आश्चर्यजनक ढंग से एनसीपी नेता और कृषि मंत्री शरद पवार की लाइन लेते हुए खाद्य सुरक्षा अधिनियम को लागू करने पर सवालिया निशान लगाया। हैरानी जताते हुए उन्होंने पूछा, आखिर सरकार इसके लिए धन कहां से लाएगी? बांग्लाभाषी तीन चैनलों पर पसारित इंटरव्यू में ममता ने अपनी पार्टी को यूपीए गठबंधन का एक जिम्मेदार घटक दल बताया। गठबंधन बरकरार रखने की हमारी जिम्मेदारी है लेकिन हमारी उन लोगों के पति भी जिम्मेदारी है जिन्होंने हमें चुना है, ममता ने कहा। इसलिए जन विरोधी नीतियों का हम हमेशा विरोध करेंगे। उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस ने अपनी गतिविधियों को नीतियों के आधार पर बढ़ाया है। इसी वजह से हमने लोगों को सीधे तौर पर पभावित करने वाले खुदरा व्यापार में पत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोत्तरी का विरोध किया। लेकिन कांग्रेस के कुछ नेता माकपा की तरह काम कर रहे थे। एक सवाल के जवाब में तृणमूल नेता ने केन्द्र पर राज्य के लिए पैकेज देने में आनाकानी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि राज्य में चुनाव से पहले पधानमंत्री ने राज्य की मदद का वादा किया था। इस सिलसिले में पिछले आठ महीने में मैं वित्तमंत्री पणब मुखर्जी से पांच बार मिल चुकी हूं। उन्होंने कहा कि मैं भीख मांगने नहीं जाऊंगी कुछ भी हो जाए, हम सम्मान से सिर उठाकर चलेंगे। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में दरार चौड़ी होती जा रही है। कांग्रेस महसूस करने लगी है कि तृणमूल की योजना है कांग्रेस के गढ़ वाले इलाके में पैठ बनाना। निशाने पर हैं ममता के धुर विरोधी माने-जाने वाले कांग्रेस के नेता दीपादास मुंशी, अधीर चौधरी और मौसम बेनजीर नूर के पभाव वाले जिले हैं। पिछले दिनों कांग्रेस और तृणमूल गठबंधन में चल रही खींचतान नेताओं के बीच वाद-विवाद से आगे निकलकर जनता की अदालत में चली गई। तृणमूल के नेताओं ने जनसभा कर कांग्रेसियों को गठबंधन छोड़ने की चुनौती दे डाली। तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने एक सुर में कहा कि यह कांग्रेस को तय करना है कि उन्हें पिछले दरवाजे से बाहर निकलना है या मुख्य द्वार से। जिस रफ्तार से दोनों पार्टियों में दरार चौड़ी होती जा रही है उससे तो लगता है कि वह दिन ज्यादा दूर नहीं जब दोनों अलग-अलग रास्ते अपना लें। बहुत कुछ निर्भर करता है इन पांच विधानसभा चुनावों के परिणामों पर अगर इनमें कांग्रेस का पदर्शन संतोषजनक नहीं रहा तो कुछ भी हो सकता है।
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Tuesday, 13 December 2011

कोलकाता के अभागे गए तो ठीक होने थे, लौटा उनका जला हुआ शव

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13th December 2011
अनिल नरेन्द्र
पिछले कुछ समय से कोलकाता के अस्पतालों की चर्चा अखबारों की सुर्खियां बनती रही हैं और दुनिया को पश्चिम बंगाल में मरीजों की दयनीय स्थिति का पता चला है। शुक्रवार तड़के कोलकाता के एडवांस मेडिकेयर एण्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट (एएमआरआई) में भयंकर आग लग गई। कोलकाता के इस निजी अस्पताल में आग लगने से करीब 90 लोगों की मौत हो गई। इनमें से अधिकतर मरीज तो आए तो अस्पताल में ठीक होने पर अस्पताल से निकला उनका जला हुआ शव। क्या इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ हो सकता है कि लोग जहां जीवन रक्षा की उम्मीद में जाएं वहीं काल का शिकार बन जाएं। मरने वालों में न्यू बार्न बेबीज भी शामिल थे। शुक्रवार तड़के हुई आगजनी पैसे और रसूख के दम पर सरकारी तंत्र के साथ मिलीभगत कर कायदे-कानूनों की धज्जियां उड़ाने की ताजा मिसाल है। यह घटना हमारी उस बीमार व्यवस्था की भी पोल खोलती है, जिसमें संवेदना निरन्तर खत्म होती जा रही है और निजी अस्पताल कमाई करने का गारंटीशुदा धंधा बन गए हैं। इस बहुमंजिले निजी अस्पताल मे जब आग लगी, तब वहां इससे बचने के एहतियाती उपाय तक नहीं थे। अधिकांश लोगों की मौत दम घुटने से हुई क्योंकि शीशे के पैनलों के कारण कार्बन मोनो-आक्साइड और अमोनिया का जहरीला धुआं बाहर नहीं निकल पाया और वहां आक्सीजन की कमी हो गई। इस हादसे के लिए अस्पताल के कर्ताधर्ता तो जिम्मेदार हैं ही, मगर शासन-प्रशासन को भी जवाब देने होंगे। लाइसेंस देने वाले और इसकी इजाजत देने वाले अपनी जवाबदेही से कैसे बच सकते हैं। आखिर महज चार-पांच साल पहले इस पूर्णतया वातानुकूल अस्पताल भवन में इतना बड़ा हादसा कैसे हो गया? इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने घटना की उच्चस्तरीय जांच के आदेश देने के साथ ही अस्पताल का लाइसेंस रद्द कर दिया है और प्रबंधन के लोगों को लापरवाही एवं गैर इरादतन हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है। शासन-प्रशासन को इस सवाल का भी जवाब देना होगा कि आखिर इस अभागे अस्पताल में सुरक्षा के पर्याप्त प्रबंध क्यों नहीं थे? अस्पताल के जिस तहखाने का इस्तेमाल पार्किंग के लिए होना चाहिए था वहां ज्वलनशील सामग्री क्यों रखी थी? क्या वजह रही कि अस्पताल प्रबंधन ने अग्निशमन और पुलिस की उस चेतावनी की अनदेखी कर दी जिसमें उसे तहखाने के दुरुपयोग को लेकर चेताया गया था? क्या यह लापरवाही की पराकाष्ठा नहीं कि आग का शिकार हुआ सात मंजिला अस्पताल वैसे तो एयरकंडीशंड था, लेकिन आग के बचाव के उपाय नदारद थे। पश्चिम बंगाल की सरकार इस हादसे के बाद यह तर्प देकर अपना बचाव नहीं कर सकती कि वाम दलों के लम्बे शासन ने सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है। ममता बनर्जी को सत्ता सम्भाले करीब छह महीने हो रहे हैं और सुधारों की दिशा में काम आगे बढ़ाने के लिए उन्हें फुर्सत नहीं है। पिछले कुछ समय से राज्य में अस्पतालों की दुर्दशा के मामले भी सुर्खियां बने तब भी राज्य सरकार की आंखें नहीं खुलीं। दुःखद पहलू तो यह है कि अन्य शहरों में भी अधिकतर अस्पतालों की यही दशा है। उम्मीद की जाती है कि राज्यों की सरकारें इस आग से सबक लेंगी और अपने-अपने राज्यों में अस्पतालों में सख्ती से अग्नि से निपटने के लिए पर्याप्त उपायों पर खास ध्यान देंगी।
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