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Saturday, 9 June 2012

ममता अब एकला चलो नीति पर अमल करना चाहती हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9 June 2012
अनिल नरेन्द्र
तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी का आत्मविश्वास चरम सीमा पर है। पश्चिम बंगाल में छह में से चार नगर निगम चुनाव जीतने के बाद से उसकी ऐसी अधीरता अब छलकने लगी है। इन परिणामों से कई संदेश निकले हैं। पहला, विधानसभा चुनावों के बाद वाम मोर्चे के सामने एक बार फिर यह सवाल मुंह बाए खड़ा है कि जनता उस पर भरोसा क्यों नहीं कर पा रही है। दूसरे, यूपीए सरकार का हिस्सा होने के बावजूद कई मुद्दों पर प्रत्यक्ष रूप से असहमति जताकर केंद्र के लिए असुविधाजनक स्थिति पैदा करने के बाद तृणमूल कांग्रेस अब कांग्रेस को कह सकती है कि अगर उसके महत्व को कम करके आंका गया तो वह राज्य में अकेले चलने से नहीं हिचकिचाएगी। तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी के विश्वासपात्र और केंद्रीय रेल मंत्री मुकुल रॉय ने नतीजों के तुरन्त बाद घोषणा कर दी कि उनकी पार्टी बंगाल में अकेले शासन चलाने में सक्षम है। ममता के एक अन्य विश्वास पात्र और केंद्र सरकार में पर्यटन मंत्री सुल्तान अहमद तो इससे भी एक कदम आगे निकल गए। उन्होंने भारतीय पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष पद पर गुजरात के कांग्रेसी नेता शंकर सिंह बघेला की नियुक्ति का विरोध करते हुए सवाल उठा दिया कि इसमें उन्हें क्यों विश्वास में नहीं लिया गया। अहमद यह शिकायत करने में भी नहीं चूके कि बकौल राज्यमंत्री उनके पास काम का कोई दायित्व ही नहीं है। पिछले माह हुए विधानसभा चुनावों के बाद यह पहला मौका था जब तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ा। इस तरह मुकाबला इस बार तिकोना था पर आम धारणा रही कि पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वाम मोर्चे की पराजय की एक बड़ी वजह कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का गठजोड़ था। लेकिन ममता बनर्जी यह संदेश देने में कुछ हद तक कामयाब रहीं कि वे अकेले भी वाम मोर्चे से पार पा सकती हैं। चुनाव नतीजे आने के बाद तृणमूल नेताओं ने यह कहने में कोई संकोच भी नहीं किया कि उनकी पार्टी राज्य में अपने दम-खम पर राज करने की ताकत रखती है और वह भविष्य में होने वाले चुनाव अकेले लड़ेगी। अभी यह साफ नहीं कि तृणमूल ने अंतिम फैसला कर लिया है या फिर उसकी चेतावनी सिर्प नगर निगम चुनावों के दौरान दोनों पार्टियों के बीच हुई खटास का नतीजा है। बंगाल में कांग्रेस इकाई ने तृणमूल की धमकी का कड़ा जवाब दिया, यह कह कर कि वह चाहे तो गठबंधन तोड़ ले पर चारों तरफ से समस्याओं से घिरी केंद्र में मनमोहन सरकार ममता से पंगा लेने को तैयार नहीं है। बृहस्पतिवार को ही ममता का प्रभाव नजर आ गया। उस दिन सरकार के आर्थिक एजेंडे से जुड़े बहुचर्चित पेंशन बिल को कैबिनेट की मंजूरी के लिए लाना था पर ममता के एतराज को देखते हुए केंद्र सरकार को इसे टालना पड़ा और ममता बनर्जी के दबाव में केंद्र सरकार को कदम पीछे लेने पड़े। केंद्र सरकार के लिए ममता का समर्थन बहुत मायने रखता है, इसलिए उसकी कोशिश तृणमूल से अपना गठबंधन हर हाल में जारी रखने की ही होगी। मगर तृणमूल ने कोयला आवंटन में सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों की अनदेखी किए जाने के मुद्दे उठाकर कांग्रेस की दुखती रग छेड़ दी है। नगर निकायों के चुनावों को आमतौर पर स्थानीय या अधिक से अधिक राज्य के भीतर के समीकरणों के हिसाब से देखा जाता है मगर प. बंगाल में नगर पालिका चुनाव ने जहां सत्तारूढ़ गठबंधन में दरार के संकेत दिए हैं वहीं केंद्र सरकार और कांग्रेस पार्टी की मुसीबत बढ़ा दी है।
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Tuesday, 17 April 2012

इस रेट से तो ममता की छवि और लोकप्रियता तेजी से घटेगी

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जिद और अक्कड़पन से अब सब परिचित हो चुके हैं। लगता है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद तो उनमें अहंकार और तानाशाह प्रवृत्ति में इजाफा हो गया है। अब तो वह अपने खिलाफ बना कार्टून को भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कार्टून लगाने के आरोप में जादवपुर विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर को शुक्रवार को गिरफ्तार कर लिया गया। यह कार्टून दिनेश त्रिवेदी को रेल मंत्री पद से हटाकर उनकी जगह मुकुल रॉय को नया रेल मंत्री बनाने के संदर्भ में यह कार्टून बनाया गया था। रसायन शास्त्र के प्रोफेसर अम्बिकेश महापात्रा की गिरफ्तारी से आक्रोश फैल गया और माकपा एवं शैक्षणिक समुदाय ने कहा कि पुलिस कार्रवाई बिल्कुल दमनात्मक है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के न्यूनतम लोकतांत्रिक अधिकार पर स्पष्ट हमला है। बाद में अलीपुर की अदालत ने प्रोफेसर को जमानत पर रिहा कर दिया। प्रोफेसर महापात्रा ने आरोप लगाया कि कार्टून डालने के कारण गुरुवार रात तृणमूल कांग्रेस के 15 समर्थकों ने उनके साथ बदसलूकी भी की। प्रोफेसर ने कहा कि वे अपनी सुरक्षा को लेकर खतरा महसूस कर रहे हैं। वहीं विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल माकपा ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार अखबारों पर अंकुश लगाकर लोकतंत्र और आजीविका के अधिकार पर हमला कर रही है। वहीं पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने कार्टून विवाद पर कहा कि कार्टून लोकतंत्र का हिस्सा है। उन्होंने कहा, मेरा मानना है कि कार्टून स्वस्थ लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है। कार्टून आपकी छवि को खराब नहीं कर सकते हैं। माकपा के वरिष्ठ नेता अब्दुर रज्जाक मोल्ला ने शनिवार को आरोप लगाया कि राज्य सरकार अखबारों पर अंकुश लगाकर लोकतंत्र और आजीविका के अधिकार पर हमला कर रही है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने फरमान जारी किया कि सरकारी पुस्तकालयों में सिर्प चुनिंदा अखबार ही रखे जाएं। सरकार विरोधी अखबारों के लिए पुस्तकालय में कोई जगह नहीं है। मोल्ला ने स्टूडेंट्स हॉल में माकपा (माले) लिबरेशन की ओर से आयोजित सम्मेलन में कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वहीं सम्मेलन में मौजूद कवि नवारुण भट्टाचार्य ने कार्टून बनाने वाले के खिलाफ कार्रवाई को राज्य सरकार की मनमानी और अराजकता कहा। शिक्षाविद् सुनन्दा सान्याल ने प्रोफेसर की गिरफ्तारी की निंदा करते हुए कहा कि ममता बनर्जी ने राज्य में सत्ता परिवर्तन का नारा उछाल कर सत्ता हथियाने में कामयाबी हासिल की। सच तो यह है कि राज्य में कहीं भी परिवर्तन की झलक नहीं दिख रही है। यह दुःखद, दुर्भाग्यपूर्ण व निंदनीय है। ममता धीरे-धीरे फासिस्ट होती जा रही हैं। हमारा मानना है कि ममता बनर्जी में अपने खिलाफ किसी प्रकार की आलोचना या व्यंग्य बर्दाश्त करने की क्षमता कम होती जा रही है। लोकतंत्र में कार्टून बनाना कोई अपराध नहीं है और ऐसा रोकना प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला करना है। जिस तरह से ममता चल रही हैं उससे तो यही लगता है कि वह बहुत तेजी से अलोकप्रिय हो जाएंगी और उनकी बनी छवि धूमिल हो जाएगी। वाम नेताओं से उनको इतनी नफरत है कि वह अब यह भी ठीक से फैसला नहीं कर पा रही कि क्या ठीक है क्या गलत?
Anil Narendra, Daily Pratap, Kolkata, Mamta Banerjee, Trinamool congress, Vir Arjun, West Bengal

Wednesday, 11 April 2012

पश्चिम बंगाल से कार्ल मार्क्स और एंजेल्स की विदाई

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 11 April 2012
अनिल नरेन्द्र
पश्चिम बंगाल में 34 साल तक कामरेडों ने कार्ल मार्क्स की नीतियों पर चलकर राज किया। इस दौरान सारी दुनिया से मार्क्स और एंजेल्स का नामोनिशान लगभग साफ हो गया पर हमारे कामरेड उसी ढर्रे पर चलते रहे। यह समय के अनुसार बदले नहीं। नतीजा यह हुआ कि पश्चिम बंगाल की जनता ने इन्हें उखाड़ फेंका। केवल प. बंगाल से ही नहीं बल्कि केरल से भी। ममता बनर्जी अब कोशिश कर रही हैं कि मार्क्स वापस प. बंगाल में न आ सकें। इसलिए उन्होंने 34 साल बाद कार्ल मार्क्स की तैयारी कर ली है। प्रदेश की स्कूली शिक्षा पाठ्यक्रम समिति ने मार्क्स और फ्रेडरिक एंजेल्स का पाठ स्कूली किताबों से हटाने की सिफारिश की है। फैसला ममता सरकार को करना है। स्कूली किताबों से जो प्रमुख पाठ हटाए जा रहे हैं उनमें मार्क्सवाद के संस्थापक कार्ल मार्क्स की जीवनी, मार्क्स की मदद करने वाले दोस्त फ्रेडरिक एंजेल्स की कहानी और रूस में 1917 में बालेशेविक क्रांति की पूरी कहानी है। तृणमूल के सत्ता में आते ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पाठ्यक्रम समीक्षा समिति का गठन कर दिया था। समीक्षा समिति को स्कूल पाठ्यक्रम आधुनिक बनाने और छात्रों पर अनावश्यक बोझ कम करने का काम सौंपा गया। समिति ने 695 पेज की रिपोर्ट सौंपी है। ममता अकेली नहीं जिन्होंने कार्ल मार्क्स से निजात पाने के लिए कदम उठाए हैं। अब तो हमारे कामरेड भी कहने लगे हैं कि हमें देश की मौजूदा हालातों के अनुसार बदलाव करना होगा। माकपा नेता सीताराम येचुरी ने पार्टी के 20वें अखिल भारतीय सम्मेलन में उन्होंने कहा कि हमें रूस, चीन, क्यूबा तथा अन्य लैटिन अमेरिकी देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों से अलग नजरिया अपनाना होगा। पार्टी सिद्धांत बदलेगी। साथ ही अपने कार्यक्रमों की समीक्षा करेगी। पार्टी लोकतांत्रिक ताकतों और वाम शक्तियों को मिलाकर राजनीतिक विकल्प बनने की प्रक्रिया में है। सम्मेलन में पेश प्रस्ताव में कहा गया है कि 1894 के भूमि अधिनियम का कारपोरेट घराने दुरुपयोग कर रहे हैं, विशेष आर्थिक क्षेत्र के वास्ते, भूमि अधिग्रहण और खनन के लिए ऐसा होता है। इस कानून के कारण देश के कई किसानों और कृषि श्रमिकों को संघर्ष करते देखा गया है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि माकपा अपनी पराजय से कुछ सीखना नहीं चाहती। वह कांग्रेस और भाजपा को पराजित करने की बात तो कर रही है, लेकिन उसके रोड मैप में तीसरे विकल्प के लिए कोई जगह नहीं है। इसके विपरीत वह वामपंथी लोकतांत्रिक विकल्प के लिए प्रयास करने की बात कर रही है। मगर ऐसा कोई विकल्प हवा में तो तैयार होने से रहा। पिछले लोकसभा चुनाव में ही वामदलों की सीटें पिछली बार के मुकाबले आधी से कम रह गई थीं। यदि सम्भावित परिदृश्य को देखें तो नीतीश कुमार, जयललिता, ममता, नवीन पटनायक और चन्द्रबाबू नायडू के रहते गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपाई राजनीति में माकपा के लिए जगह नजर नहीं आ रही? सच तो यह है कि पार्टी आज भी अंतर्द्वंद्व और गुटबाजी से जूझ रही है। वह माने या न माने, लेकिन केरल में पार्टी मतभेदों और गुटबाजी के कारण ही हार हुई। पार्टी महासचिव प्रकाश करात की बेड़ागर्प करने वाली नीतियां जब तक बदलती नहीं, हमें माकपा का राजनीतिक भविष्य चमकता नहीं दिखता।
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Thursday, 2 February 2012

... और अब ममता ने मनमोहन सिंह पर सीधा हमला किया

यूपीए के घटक दलों के बढ़ते दबाव से कांग्रेस का राजनीतिक संकट बढ़ता जा रहा है। ममता बनर्जी व शरद पवार दोनों ने कांग्रेस की नाक में दम कर रखा है। सोमवार को ममता ने सारी हदें पार कर लीं। उन्होंने सीधा पधानमंत्री मनमोहन सिंह पर हमला बोल दिया। सोमवार को ममता ने मनमोहन सिंह पर सीधा हमला करते हुए आरोप लगाया कि पधानमंत्री ने सिंगूर में भूमि अधिग्रहण विरोधी उनके आंदोलन के दौरान उनसे बात नहीं की थी। ऐसा उन्होंने माकपा के डर से किया था। वह माकपा को नाराज नहीं करना चाहते थे। ममता ने आश्चर्यजनक ढंग से एनसीपी नेता और कृषि मंत्री शरद पवार की लाइन लेते हुए खाद्य सुरक्षा अधिनियम को लागू करने पर सवालिया निशान लगाया। हैरानी जताते हुए उन्होंने पूछा, आखिर सरकार इसके लिए धन कहां से लाएगी? बांग्लाभाषी तीन चैनलों पर पसारित इंटरव्यू में ममता ने अपनी पार्टी को यूपीए गठबंधन का एक जिम्मेदार घटक दल बताया। गठबंधन बरकरार रखने की हमारी जिम्मेदारी है लेकिन हमारी उन लोगों के पति भी जिम्मेदारी है जिन्होंने हमें चुना है, ममता ने कहा। इसलिए जन विरोधी नीतियों का हम हमेशा विरोध करेंगे। उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस ने अपनी गतिविधियों को नीतियों के आधार पर बढ़ाया है। इसी वजह से हमने लोगों को सीधे तौर पर पभावित करने वाले खुदरा व्यापार में पत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोत्तरी का विरोध किया। लेकिन कांग्रेस के कुछ नेता माकपा की तरह काम कर रहे थे। एक सवाल के जवाब में तृणमूल नेता ने केन्द्र पर राज्य के लिए पैकेज देने में आनाकानी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि राज्य में चुनाव से पहले पधानमंत्री ने राज्य की मदद का वादा किया था। इस सिलसिले में पिछले आठ महीने में मैं वित्तमंत्री पणब मुखर्जी से पांच बार मिल चुकी हूं। उन्होंने कहा कि मैं भीख मांगने नहीं जाऊंगी कुछ भी हो जाए, हम सम्मान से सिर उठाकर चलेंगे। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में दरार चौड़ी होती जा रही है। कांग्रेस महसूस करने लगी है कि तृणमूल की योजना है कांग्रेस के गढ़ वाले इलाके में पैठ बनाना। निशाने पर हैं ममता के धुर विरोधी माने-जाने वाले कांग्रेस के नेता दीपादास मुंशी, अधीर चौधरी और मौसम बेनजीर नूर के पभाव वाले जिले हैं। पिछले दिनों कांग्रेस और तृणमूल गठबंधन में चल रही खींचतान नेताओं के बीच वाद-विवाद से आगे निकलकर जनता की अदालत में चली गई। तृणमूल के नेताओं ने जनसभा कर कांग्रेसियों को गठबंधन छोड़ने की चुनौती दे डाली। तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने एक सुर में कहा कि यह कांग्रेस को तय करना है कि उन्हें पिछले दरवाजे से बाहर निकलना है या मुख्य द्वार से। जिस रफ्तार से दोनों पार्टियों में दरार चौड़ी होती जा रही है उससे तो लगता है कि वह दिन ज्यादा दूर नहीं जब दोनों अलग-अलग रास्ते अपना लें। बहुत कुछ निर्भर करता है इन पांच विधानसभा चुनावों के परिणामों पर अगर इनमें कांग्रेस का पदर्शन संतोषजनक नहीं रहा तो कुछ भी हो सकता है।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Kolkata, Mamta Banerjee, Manmohan Singh, Trinamool congress, Vir Arjun, West Bengal

Tuesday, 13 December 2011

कोलकाता के अभागे गए तो ठीक होने थे, लौटा उनका जला हुआ शव

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13th December 2011
अनिल नरेन्द्र
पिछले कुछ समय से कोलकाता के अस्पतालों की चर्चा अखबारों की सुर्खियां बनती रही हैं और दुनिया को पश्चिम बंगाल में मरीजों की दयनीय स्थिति का पता चला है। शुक्रवार तड़के कोलकाता के एडवांस मेडिकेयर एण्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट (एएमआरआई) में भयंकर आग लग गई। कोलकाता के इस निजी अस्पताल में आग लगने से करीब 90 लोगों की मौत हो गई। इनमें से अधिकतर मरीज तो आए तो अस्पताल में ठीक होने पर अस्पताल से निकला उनका जला हुआ शव। क्या इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ हो सकता है कि लोग जहां जीवन रक्षा की उम्मीद में जाएं वहीं काल का शिकार बन जाएं। मरने वालों में न्यू बार्न बेबीज भी शामिल थे। शुक्रवार तड़के हुई आगजनी पैसे और रसूख के दम पर सरकारी तंत्र के साथ मिलीभगत कर कायदे-कानूनों की धज्जियां उड़ाने की ताजा मिसाल है। यह घटना हमारी उस बीमार व्यवस्था की भी पोल खोलती है, जिसमें संवेदना निरन्तर खत्म होती जा रही है और निजी अस्पताल कमाई करने का गारंटीशुदा धंधा बन गए हैं। इस बहुमंजिले निजी अस्पताल मे जब आग लगी, तब वहां इससे बचने के एहतियाती उपाय तक नहीं थे। अधिकांश लोगों की मौत दम घुटने से हुई क्योंकि शीशे के पैनलों के कारण कार्बन मोनो-आक्साइड और अमोनिया का जहरीला धुआं बाहर नहीं निकल पाया और वहां आक्सीजन की कमी हो गई। इस हादसे के लिए अस्पताल के कर्ताधर्ता तो जिम्मेदार हैं ही, मगर शासन-प्रशासन को भी जवाब देने होंगे। लाइसेंस देने वाले और इसकी इजाजत देने वाले अपनी जवाबदेही से कैसे बच सकते हैं। आखिर महज चार-पांच साल पहले इस पूर्णतया वातानुकूल अस्पताल भवन में इतना बड़ा हादसा कैसे हो गया? इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने घटना की उच्चस्तरीय जांच के आदेश देने के साथ ही अस्पताल का लाइसेंस रद्द कर दिया है और प्रबंधन के लोगों को लापरवाही एवं गैर इरादतन हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है। शासन-प्रशासन को इस सवाल का भी जवाब देना होगा कि आखिर इस अभागे अस्पताल में सुरक्षा के पर्याप्त प्रबंध क्यों नहीं थे? अस्पताल के जिस तहखाने का इस्तेमाल पार्किंग के लिए होना चाहिए था वहां ज्वलनशील सामग्री क्यों रखी थी? क्या वजह रही कि अस्पताल प्रबंधन ने अग्निशमन और पुलिस की उस चेतावनी की अनदेखी कर दी जिसमें उसे तहखाने के दुरुपयोग को लेकर चेताया गया था? क्या यह लापरवाही की पराकाष्ठा नहीं कि आग का शिकार हुआ सात मंजिला अस्पताल वैसे तो एयरकंडीशंड था, लेकिन आग के बचाव के उपाय नदारद थे। पश्चिम बंगाल की सरकार इस हादसे के बाद यह तर्प देकर अपना बचाव नहीं कर सकती कि वाम दलों के लम्बे शासन ने सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है। ममता बनर्जी को सत्ता सम्भाले करीब छह महीने हो रहे हैं और सुधारों की दिशा में काम आगे बढ़ाने के लिए उन्हें फुर्सत नहीं है। पिछले कुछ समय से राज्य में अस्पतालों की दुर्दशा के मामले भी सुर्खियां बने तब भी राज्य सरकार की आंखें नहीं खुलीं। दुःखद पहलू तो यह है कि अन्य शहरों में भी अधिकतर अस्पतालों की यही दशा है। उम्मीद की जाती है कि राज्यों की सरकारें इस आग से सबक लेंगी और अपने-अपने राज्यों में अस्पतालों में सख्ती से अग्नि से निपटने के लिए पर्याप्त उपायों पर खास ध्यान देंगी।
AMRI Hospital, Anil Narendra, Daily Pratap, Kolkata, Mamta Banerjee, Vir Arjun, West Bengal

Wednesday, 7 December 2011

India must amend its China policy

- Anil Narendra
India's relations with China have always been sweet and sour. It was India, who preached Buddhism to the Chinese. With the Communist Party coming to power in China in 1949, relations between both the countries were established. India was the only non-communist country that recognized the Chinese Communist Government and it also helped China in getting recognition by the UNO. An eight-year agreement was signed between India and China in 1954, under which India surrendered its additional regional rights over Tibet to China, on the basis of which both the countries affirmed Panchsheela principles. Relations between both started deteriorating in 1957. The Tibetan religious leader, Dalai Lama had to flee Tibet and take refuge in India on 31st March 1959 in view of Chinese repression, which also became one of the reasons for 1962 Indo-China war. Tension between India and China due to Dalai Lama and his followers mounted and it still continues. Meanwhile, China has now adopted a more rigid and aggressive stand on the issue of Dalai Lama and his followers. Recently, I was in Kolkata, in connection with a programme, in which Dalai Lama was invited. The Governor, AK Narayanan and the Chief Minister, Mamata Bannerjee were also to participate in the programme. China wrote a formal letter to the West Bengal Government demanding that Governor and Chief Minister stay away from the programme. This demand of China was not agreed upon. The Governor attended the programme, but the Chief Minister could not participate in view of the illness of her mother, however, her representative, MP Derek O'Brian attended the programme. India decided to lodge a protest in this matter and to ask China, why it wrote such a letter to the West Bengal Government. Earlier, also China had demanded to cancel the Buddhist scholar meet being held in New Delhi, which was to be addressed by the Dalai Lama. When the request was turned down, China decided not to participate in the proposed meeting on border disputes. China does not desist from interfering it India's internal affairs and its attitude towards India, of late, has turned more aggressive. For example, what the state government of a country should do or not do, must not be the concern for any foreign government. In fact, China has started regarding itself a super power like US and wants that all its obstinate demands must be agreed to. Government of India, too, appears to give in to China to some extent. That is why, the J&K Chief Minister, Omar Abdullah said that India must clarify its China policy. Addressing a gathering in Mumbai on Saturday, Omar said that India must deal with China firmly, because it claims parts of the country as disputed areas and it has also questioned the sovereignty of India over a number of its territories. A few hours earlier, his father Farooq Abdullah said in Delhi that India must accept the fact that the PoK cannot be taken back neither from Pakistan nor from China. His son, Omar asked, if you consider PoK as an integral part of India, then why didn't you cross the LoC during the Kargil war? If you respect the LoC during war, it means that you have lost hope of getting it back. Omar pleaded with New Delhi to give up its always forgiving posture in it its relations with Pakistan and China. He seriously wished that India exhibit more firmness while dealing with China. It appears that China never hesitates in declaring Kashmir as a disputed area, while we are expected to follow 'One China' policy and not to raise questions on the status of China over Tibet and Taiwan. Why it is so that we follow 'One China' policy, whereas China is ignoring the policy of United India. We had been moralistic and fearful in our relations with China, though it is not required. I feel that time has now come when we should deal with China with firmness. If China can question our sovereignty, then we also have every right to raise our fingers over its sovereignty (which includes Tibet also).

चीन के प्रति भारत को अपनी नीति बदलनी होगी



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

Published on 7th December 2011
अनिल नरेन्द्र
भारत और चीन के बीच संबंध हमेशा सर्द-गर्म के रहे हैं। भारत से ही चीन में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ था। 1949 में चीन की कम्युनिस्ट सरकार की स्थापना हुई और दोनों देशों के बीच संबंधों की स्थापना हुई। भारत ने प्रारम्भ से ही चीन के प्रति मैत्री व सद्भावना का इजहार किया। भारत एक ऐसा पहला गैर कम्युनिस्ट देश था जिसने चीन की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता दी थी और संयुक्त राष्ट्र संघ में भी चीन को मान्यता दिलाने का प्रयास किया था। 1954 में चीन और भारत के बीच एक 8वर्षीय समझौता हुआ जिसके अंतर्गत भारत ने तिब्बत में अपने अतिरिक्त देशीय अधिकारों को चीन को सौंप दिया। इसके आधार पर दोनों देशों के बीच पंचशील सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया। 1957 में दोनों देशों के बीच तिब्बत को लेकर संबंध खराब होने शुरू हो गए। 31 मार्च 1959 को तिब्बत में चीनी दमन की वजह से वहां के धर्मगुरु दलाई लामा ने भारत में राजनीतिक शरण ली इसी तनाव की परिणति 1962 में भारत-चीन युद्ध के रूप में भी हुई। आज भी दलाई लामा और उनके अनुयायियों को लेकर भारत-चीन में तनाव बना हुआ है। दलाई लामा के मुद्दे पर चीन अब कुछ ज्यादा ही आक्रामक रुख अपनाए हुए है। पिछले दिनों कोलकाता में एक कार्यक्रम था जहां दलाई लामा ने आना था। इस कार्यक्रम में राज्यपाल एके नारायणन और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी उपस्थित होना था। चीन ने पश्चिम बंगाल सरकार को बाकायदा एक चिट्ठी लिखी जिसमें यह मांग की गई थी कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री इस कार्यक्रम में न जाएं। यह मांग नहीं मानी गई, राज्यपाल इस कार्यक्रम में शामिल हुए और मुख्यमंत्री अपनी मां की बीमारी की वजह से उसमें शामिल नहीं हो पाईं, लेकिन उनके प्रतिनिधि के तौर पर सांसद डेरेक ओब्राइन शामिल थे। भारत ने इस बात का विरोध दर्ज करने का फैसला किया है कि चीन ने पश्चिम बंगाल सरकार को आखिर ऐसी चिट्ठी क्यों लिखी? कुछ ही दिन पहले चीन ने नई दिल्ली में बौद्ध विद्वानों के सम्मेलन को रद्द करने की मांग की थी जिसे दलाई लामा को संबोधित करना था। जब चीन की जिद्द नहीं मानी गई तो उसने सीमा विवाद पर प्रस्तावित बैठक में शामिल न होने का फैसला किया। चीन भारत के अंदरुनी मामलों में दखलंदाजी से बाज नहीं आता। उसने ज्यादा ही आक्रामक रुख अपना लिया है। मसलन देश की एक राज्य सरकार के मुखियाओं को क्या करना चाहिए या नहीं करना चाहिए, यह सीधे तौर पर किसी विदेशी सरकार को नहीं बताना चाहिए था। चीन दरअसल अपने आपको अमेरिका की तरह एक महाशक्ति मानने लगा है और अपनी हर जिद्द को मनवाना चाहता है। भारत सरकार भी कुछ हद तक चीन के सामने घुटने टेकती दिख रही है। तभी तो हाल में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भारत से कहा कि वह अपनी चीनी नीति को स्पष्ट करे। मुंबई में एक सभा में बोलते हुए उमर ने कहा कि भारत को थोड़ा और दृढ़ता के साथ चीन से पेश आना चाहिए क्योंकि यह देश को विवादित क्षेत्र कहता है और कई हिस्सों पर भारत की सप्रभुता पर सवाल भी खड़े करता है। उमर शनिवार को मुंबई में एक्सप्रेस अड्डे में बोल रहे थे। कुछ ही घंटे पहले उमर के पिता फारुख अब्दुल्ला ने दिल्ली में कहा था कि भारत को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि वह पाक अधिकृत कश्मीर को न तो पाकिस्तान से और न ही चीन से वापस ले सकता है। बेटे उमर ने कहा कि अगर सचमुच आपको विश्वास है कि पाक अधिकृत कश्मीर भारत का हिस्सा है तो कारगिल संघर्ष के दौरान आपने नियंत्रण रेखा को क्यों नहीं लांघा? अगर आप संघर्ष के समय भी नियंत्रण रेखा का सम्मान करते हैं तो इसका मतलब यही है कि आपने उस इलाके को वापस पाने की उम्मीद छोड़ दी है। उमर ने नई दिल्ली से गुजारिश की कि चीन व पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों में हमेशा क्षमाप्रार्थी हेने की मुद्रा त्याग दें। उन्होंने कहा कि मेरी दिली इच्छा है कि चीन के साथ पेश आते समय भारत थोड़ा और दृढ़ता दिखाए। ऐसा लगता है कि कश्मीर को विवादित क्षेत्र करार देने में चीन को जरा भी झिझक नहीं है जबकि हमसे `एक चीन' की नीति का पालन करने और तिब्बत व ताइवान के दर्जे पर सवाल नहीं खड़े करने की अपेक्षा की जाती है। ऐसा क्यों है कि हम अखंड चीन की नीति का पालन करें जबकि चीन अखंड भारत की नीति का पालन नहीं कर रहा है। चीन और पाकिस्तान दोनों के ही साथ अपने संबंधों में हम अरसे से शील-संकोची रहे हैं जबकि वाकई इसकी जरूरत नहीं थी। मुझे लगता है कि चीन के साथ थोड़ा सख्त होना अब जरूरी है। अगर हमारी सप्रभुता को लेकर चीन सवाल खड़ा करता है तो हमें भी कई हिस्सों में उसकी सप्रभुता (जिनमें तिब्बत भी शामिल है) पर सवाल खड़े करने का हक है।
Aksai Chin, Anil Narendra, China, Daily Pratap, Dalai Lama, India, Mamta Banerjee, Vir Arjun, West Bengal

Sunday, 27 November 2011

सरकार के नक्सल विरोधी अभियान में महत्वपूर्ण उपलब्धि



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27th November 2011
अनिल नरेन्द्र
सरकार को अपने एंटी-नक्सली आपरेशंस में एक शानदार सफलता मिली है। सीपीआई (माओवादी) की मिलिट्री यूनिट के मुखिया और पोलित ब्यूरो सदस्य कोटेश्वर राव उर्प किशन जी को सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ में मार गिराया है। सुरक्षा बलों के हाथों मुठभेड़ में मौत की गृह मंत्रालय द्वारा पुष्टि के साथ ही भारत में `नक्सल आंदोलन' का एक अध्याय खत्म हो गया। सीआरपीएफ की नक्सल विरोधी कमांडो बटालियन 207 कोबरा के जवानों ने किशन जी को मौत के घाट उतारा है। मूल रूप से आंध्र प्रदेश का रहने वाला कोटेश्वर राव उर्प किशन जी लम्बे समय से नक्सल आंदोलन से जुड़ा था। पिछले तीन साल से उसने पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्र सरकार की नाक में दम कर रखा था। सूत्रों के अनुसार किशन जी ने दो नक्सली माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी और पीपुल्स वॉर ग्रुप के आपस में विलय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। करीब छह साल पहले हुए इस विलय के कारण नक्सलियों की ताकत काफी बढ़ गई थी। किशन जी के दोनों नेपाल के माओवादियों और उनके जरिये चीन से भी सम्पर्प में था। करीमगंज जिले के नाफपल्ली गांव से नक्सलवाद का सफर शुरू करने वाला किशन जी गुरिल्ला युद्ध में माहिर था। उसने सम्भाल रखी थी बंगाल से महाराष्ट्र तक की कमान। उसका मुख्य उद्देश्य था पश्चिमी मदिनापुर, बाकुड़ा व पुरुलिया बेल्ट को झारखंड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ से जोड़ना। किशन जी की मौत के बाद नक्सली हिंसा से ग्रसित राज्यों, बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ व आंध्र प्रदेश में शुक्रवार को हाई अलर्ट घोषित किया गया है। नक्सली हमले की आशंका को देखते हुए यह हाई अलर्ट घोषित किया गया है। छत्तीसगढ़ के अतिरिक्त महानिदेशक राम निवास ने बताया कि नक्सली बदले की कार्रवाई कर सकते हैं। पुलिस को डर है कि नक्सली थाना व 40,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले नक्सल प्रभावित बस्तर इलाके में आम लोगों को निशाना बना सकते हैं। बस्तर के आंतरिक इलाकों में नक्सलियों की समानांतर सरकार चलती है। किशन जी की मौत से नक्सली-माओवादी समस्या तो खत्म नहीं होगी पर यह जरूर है कि यह इनके लिए एक बहुत बड़ा झटका है जिससे उन्हें उभरने में वक्त जरूर लगेगा। सरकार की नक्सल विरोधी कार्रवाई में यह एक शानदार उपलब्धि जरूर है।
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Thursday, 10 November 2011

ममता बनर्जी से ऐसी नौटंकी की उम्मीद नहीं थी



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10th November 2011
अनिल नरेन्द्र
यह बहुत दुःख की बात है कि तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री अब दबाव और ब्लैकमेलिंग की राजनीति पर उतर आई है। पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी पर ममता की समर्थन वापस लेने की धमकी दरअसल समर्थन देने का मोल था। यह स्टाइल ममता का पुराना है और पेट्रोल के दामों से पैदा हुई राजनीतिक आग को ठंडा करने की कीमत 19 हजार करोड़ रुपये लगाई गई है। 4 नवम्बर को ममता ने कहा था कि हमारे समर्थन वापस लेने से सरकार गिर सकती है। लेकिन प्रधानमंत्री बाहर हैं, हम उनसे बातचीत करना चाहते हैं। उनसे मिलने के लिए समय मांगा है। दरअसल ममता का मकसद प्रधानमंत्री से सौदेबाजी करने का था। उन्हें पेट्रोल की बढ़ी कीमतों से कोई दिलचस्पी नहीं थी, यह तो महज एक दबाव बनाने का हथियार था। मंगलवार को तृणमूल कांग्रेस के सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की। प्रधानमंत्री ने इस प्रतिनिधिमंडल को पेट्रोल की कीमत में 1.80 पैसे की बढ़ोतरी वापस लेने पर कोई आश्वासन नहीं दिया। या यूं कहें कि प्रधानमंत्री ने एक तरह से प्रतिनिधिमंडल को मना कर दिया। करीब 45 मिनट चली बातचीत महज एक ड्रामा था और इस नाटकबाजी के बाद प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि हम सरकार से अभी नहीं हटेंगे पर हम बढ़ोतरी के सख्त खिलाफ हैं। मीडिया में एलपीजी और डीजल के डी कंट्रोल को लेकर आ रही खबरों पर भी डेलीगेशन ने पीएम से सवाल करके विरोध जताया पर पीएम ने इस मसले पर कोई जानकारी होने से मना कर दिया। उधर कोलकाता में ममता ने प्रणब मुखर्जी ने मुलाकात की। उन्होंने कहा कि अगर पेट्रो पदार्थों के दाम फिर बढ़ाए गए तो मेरी पार्टी यूपीए सरकार में नहीं रहेगी। बढ़ोतरी वापस लेने का आश्वासन देने के बजाय पीएम ने तृणमूल सांसदों को इस फैसले की बारीकियां समझाईं। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि स्थिति को देखते हुए सरकार डीजल से सरकारी नियंत्रण हटाएगी। डीजल को डी कंट्रोल करना यूपीए के आर्थिक एजेंडे में है। सांसदों ने जब उनसे पेट्रोल के दाम बढ़ाने के फैसले पर तृणमूल को अनजान रखने की बात की तो पीएम ने कहा कि कम्पनियां अपना निर्णय बेशक सरकार को बताती हैं, मगर यह औपचारिकता होती है। वे फैसला लेने को आजाद हैं। हालांकि जब भी कम्पनियां दाम बढ़ाने को लेकर हमसे बात करेंगी हम सहयोगियों को जानकारी देंगे। पेट्रोल की बढ़ी कीमतें तो वापस नहीं होंगी पर हां इस चक्कर में पश्चिम बंगाल की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए ममता दीदी को केंद्र से 19 हजार करोड़ रुपये का पैकेज जल्द मिलने की सम्भावना है। कोलकाता में सीएम ममता बनर्जी ने वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी से बैठक के बाद कहा कि पश्चिम बंगाल की आर्थिक स्थिति काफी बदहाल है। इसे पटरी पर लाने के लिए राज्य को केंद्र सरकार से वित्तीय सहायता की जल्द जरूरत है। फिलहाल उन्होंने केंद्र सरकार से 19 हजार करोड़ रुपये की सहायता मांगी है। जब केंद्र सरकार खुद पेट्रोल के मूल्यों को लेकर राजनीति करेगी तो वह अपने घटक दलों को ऐसा न करने की नसीहत नहीं दे सकती। यदि ममता बनर्जी पेट्रोल के मूल्यों में वृद्धि पर अपनी नाराजगी के जरिये केंद्र सरकार से आर्थिक पैकेज हासिल करना चाहती हैं तो इसके लिए एक हद तक खुद केंद्र जिम्मेदार है। ममता बनर्जी को अपने राज्य की समस्याओं से मुक्ति के लिए केंद्रीय पैकेज की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन उसे हासिल करने के लिए उनकी ओर से जो तरीका अपनाया जा रहा है वह सौदेबाजी की राजनीति के अलावा कुछ नहीं।
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Friday, 22 July 2011

गोरखा समस्या का समाधान एक नई दिशा प्रदान कर सकता है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22nd July 2011
अनिल नरेन्द्र
पश्चिम बंगाल सरकार, केंद्र सरकार और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के बीच हुआ समझौता दार्जिलिंग इलाके में शांति बहाली का एक ऐतिहासिक कदम है। वाम मोर्चा ने इस क्षेत्र से कभी न्याय नहीं किया और हमेशा इसे कुचलने का ही प्रयास किया पर ममता बनर्जी ने सत्ता सम्भालते ही पहाड़ी क्षेत्र की इस ज्वलंत समस्या को सुलझा दिया। निश्चित रूप से यह उनकी एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कठिन राजनीतिक चुनौती का फौरी तौर पर हल निकालने के काम को सफलता से हल करके अपनी राजनैतिक काबलियत का एक सुबूत दिया है। गोरखा मूल के लोगों के लिए अलग राज्य की मांग तीन दशकों से बंगाल की राजनीति में उथल-पुथल मचाती रही है पर अलग राज्य के लिए पश्चिम बंगाल का बंटवारा ऐसा संवेदनशील मुद्दा था जिसे छूने की हिम्मत किसी में नहीं थी। 23 साल पहले ऐसा ही एक समझौता तात्कालिक गोरखा मुक्ति मोर्चा के साथ हुआ था जिसमें दार्जिलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद की स्थापना की गई थी और सुभाष घीसिंग को इसका नेता बनाया गया था। हालांकि यह भी स्वायत्तशासी परिषद थी और इसमें दार्जिलिंग, कलिम्पोंग और करस्योंग के इलाके शामिल किए गए थे लेकिन इसके अधिकार सीमित थे। वाम मोर्चे ने इस 42 सदस्यीय परिषद में एक-तिहाई सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार अपने पास रख लिया था जिसे लेकर खींचतान मची रहती थी। ममता बनर्जी ने नई व्यवस्था को गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन का नाम देकर गोरखा भावनाओं को काफी हद तक संतुष्ट किया है। तात्कालिक तौर पर इसमें वही इलाके रखे गए हैं जो सुभाष घीसिंग की पहली परिषद में थे। ताजा तितरापा समझौते के बाद परिषद की पुलिना में जीटीए के पास ज्यादा अधिकार होंगे। परिषद के सदस्यों की संख्या 50 करने का प्रावधान किया गया है और मनोनीत किए जाने वाले सदस्यों की संख्या घटाकर पांच कर दी गई है। स्वायत्तता की पुंजी से किसी क्षेत्रीय या अस्मितामूलक समस्या का समाधान का यह देश में पहला उदाहरण नहीं है। असम में बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद को इससे ज्यादा स्वायत्तता हासिल है। यही बात मेघालय के तीन यानि खासी, ज्यंतिया और गारो परिषद के बारे में भी कही जा सकती है। इन निकायों को प्रशासनिक कामों के अलावा कुछ हद तक न्यायिक अधिकार भी हासिल हैं। लेकिन ममता के फॉर्मूले में भी एक पेंच फंस सकता है। बेशक एक कमेटी का गठन जरूर किया गया है जो तराई और सिलीगुड़ी के गोरखा बाहुल हिस्सों को नई व्यवस्था का अंग बनाने की मांग करेगी, लेकिन पेंच यही फंसता है। इन इलाके के बंगाली, आदिवासी तथा अन्य गैर-गोरखा समुदाय के लोग इस व्यवस्था के साथ जाने को तैयार नहीं हैं। यही वजह है कि जहां नई व्यवस्था को लेकर गोरखा समुदाय के लोग आतिशबाजियां कर रहे थे, उस समय सिलीगुड़ी और तराई क्षेत्र के कई भागों में हड़ताल चल रही थी। चुनाव में मुंह की खाने के बाद वाम मोर्चा राजनीतिक रोटियां सेंकने की फिराक में है और इसे बंगाल का बंटवारा बता रहा है। हालांकि ममता बनर्जी ने गोरखालैंड प्रशासन की घोषणा के वक्त साफ तौर पर कह दिया था कि राज्य का विभाजन किसी भी हालत में नहीं किया जाएगा। गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन ऐसा मध्यमार्गी प्रयोग है जिसे अलग राज्य की मांग उठा रहे तेलंगाना, विदर्भ जैसे आंदोलनों का हल निकल सकता है। वैसे भी देखा जाए तो अलग राज्य बनाने से और राज्यों के बंटवारे करने से तो यह रास्ता कहीं बेहतर है।
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Thursday, 26 May 2011

विधानसभा चुनावों में मुस्लिम पार्टियों को शानदार सफलता मिली

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 26th May 2011
अनिल नरेन्द्र
भारत के मुसलमानों का मैं समझता हूं कि यह दुर्भाग्य रहा है कि राजनीति के क्षेत्र में उन्हें अपने समुदाय का कभी सही नेतृत्व नहीं मिला और प्रमुख राजनीतिक दलों ने हमेशा इनका शोषण किया और वोट बैंक की तरह व्यवहार किया। अब यह बात हमारे मुसलमान भाइयों को समझ में आ रही है और वह राजनीतिक रूप से संगठित होने का प्रयास कर रहे हैं, यह अच्छी डेवलपमेंट है। यूं तो आजादी के बाद से ही भारतीय राजनीति में छोटे-मोटे मुस्लिम राजनीतिक दल हमेशा बने रहे हैं लेकिन अब उन्हें शानदार सफलताएं मिलने लगी हैं। हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि मुसलमान राष्ट्रीय राजनीतिक दलों से निराश हैं। वे क्षेत्रीय मुस्लिम राजनीतिक दलों के आसपास गोलबंद हो रहे हैं। केरल में मुस्लिम लीग और असम में ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोकेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) को मिली सफलता और तमिलनाडु में नई बनी मुस्लिम राजनीतिक पार्टी एमएनएमके को भी दो सीटें मिलना इस तरफ इशारा करता है। इसका असर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों पर पड़ना लाजिमी है। खासकर उत्तर प्रदेश में मुस्लिम राजनीतिक दलों में मुस्लिम वोटों के लिए जबरदस्त जोर-आजमाइश होगी। यूं तो केरल में मुस्लिम लीग हमेशा से ही ताकतवर रही है लेकिन इस बार उसने सफलता के सभी पुराने रिकार्ड तोड़ दिए हैं। उसके 24 में से 20 उम्मीदवार जीते हैं। वहीं असम में एआईयूडीएफ की सीटें 10 से बढ़कर 19 हो गई हैं। यह इस बात का सबूत है कि इन राज्यों के मुसलमानों ने एकजुट होकर इन क्षेत्रीय मुस्लिम पार्टियों को वोट दिया। केरल में मुस्लिम लीग यूडीएफ का हिस्सा थी तो एआईयूडीएफ ने असम में अकेले चुनाव लड़कर अपनी ताकत बढ़ाई। तमिलनाडु में एमएनएमके जयललिता के गठबंधन का हिस्सा थी। लेकिन चुनाव के तुरन्त बाद उसका मन जयललिता से खट्टा हो गया क्योंकि उन्होंने अपने शपथ ग्रहण समारोह में नरेन्द्र मोदी को बुलाया था। प. बंगाल में ममता बनर्जी की सफलता में मुस्लिम वोटों की अहम भूमिका रही। परम्परागत तौर पर माकपा का जनाधार रहे मुसलमानों ने इस बार ममता के प्रति ममता दिखाई। मुस्लिम मतदाताओं के रुख को ममता की तरफ मोड़ने में मुस्लिम संगठन जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द की महत्वपूर्ण भूमिका रही। आंध्र प्रदेश में भी एक मुस्लिम राजनीतिक दल मजलिस-ए-मुशावरत को हैदराबाद और उसके आसपास के इलाकों में अच्छी सफलता मिली है। उसके नेता ओबेसी लोकसभा सदस्य हैं।
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटों की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। वहां 6-7 मुस्लिम राजनीतिक दल राज्य के 18 फीसद मुस्लिम वोटों को हथियाने के लिए मैदान में होंगे। यूपी में सबसे ताकतवर मुस्लिम पार्टी है पीस पार्टी। इसने पिछले उपचुनावों में अच्छे-खासे वोट हासिल कर राजनीतिक हल्कों में खलबली मचा दी है। लेकिन इसका प्रभाव पूरे सूबे में नहीं हो पाया और ज्यादातर गोरखपुर और उसके आसपास के इलाकों तक ही फिलहाल सीमित लगता है। हाल में जमाते इस्लामी ने भी पार्टी बनाई हैöवेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया। एआईयूडीएफ ने भी यूपी के चुनाव में उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है। हैरानी की बात यह है कि देश के मुस्लिम सांसदों में से एक भी शिया नहीं है। इसलिए कई शिया संगठनों ने यह महसूस किया है कि उन्हें भी संगठित होकर अपनी पार्टी बनानी चाहिए ताकि शियाओं को सही प्रतिनिधित्व मिल सके। यह पार्टियां कितनी सफल होती हैं यह तो चुनाव के बाद पता चलेगा पर इतना जरूर है कि कुछ सैक्युलर दलों की नींद हराम हो रही है।
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Tuesday, 24 May 2011

34 साल बाद ईश्वर लौटे राइटर्स बिल्डिंग में

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

 Published on 24th May 2011
अनिल नरेन्द्र
पश्चिम बंगाल में शुक्रवार को पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेकर ममता बनर्जी ने एक नए युग की शुरुआत की। 34 साल बाद भगवान पश्चिम बंगाल में लौटे। ममता ने शुक्रवार को दोपहर ठीक 1ः01 बजे ईश्वर के नाम पर शपथ ली। इससे पहले वाम मोर्चा के मंत्रियों ने 34 साल के शासन में भगवान का नाम नहीं लिया और शपथ हमेशा संविधान के नाम पर ही ली जाती रही। आखिर इस समय
1 बजकर 1 मिनट के पीछे क्या खास बात है? ज्योतिषियों का कहना है कि यह समय ममता बनर्जी के लिए शुभ है जो उन्हें पांच साल की पारी पूरी कराएगा, थोड़ा सतर्प रहते हुए। अपने शपथ ग्रहण समारोह के बाद जनभावनाओं का ध्यान रखते हुए परम्परा तोड़कर ममता बनर्जी राजभवन से राइटर्स बिल्डिंग (मुख्यमंत्री) तक जुलूस के साथ पैदल गईं। उनके समर्थकों की भीड़ देखते हुए राइटर्स बिल्डिंग के सभी गेट खोल दिए गए। राजभवन में दोपहर ठीक एक बजकर एक मिनट पर राज्यपाल एमके नारायणन ने ममता को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। अपनी ट्रेड मार्प साड़ी, रबड़ की चप्पल और सफेद सूती शाल पहनें ममता ने बंगला में ईश्वर के नाम पर शपथ ली। वाम मोर्चा राज में राजनीतिक हिंसा के शिकार हुए परिवारों के लोगों को खासतौर पर बुलाया गया था। ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास से राजभवन तक एक किलोमीटर के रास्ते में दोनों ओर जमा भीड़ उनके समर्थन में नारे लगा रही थी। समर्थक शंखध्वनि कर रहे थे और फूल बरसा रहे थे। भीड़ की वजह से ममता बनर्जी को राजभवन पहुंचने में आधा घंटा लगा। समारोह के दौरान राजभवन के बाहर खड़ी भीड़ ममता के समर्थन में नारे लगाती रही।
ममता ने अपनी 43 सदस्यीय मंत्रिपरिषद में अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और महिलाओं यानि समाज के सभी वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया है। यों कहने को तो किताबी सिद्धांतों के अनुसार वाम मोर्चा के रूप में पश्चिम बंगाल में सर्वहारा वर्ग का शासन था लेकिन ममता बनर्जी का शपथ ग्रहण समारोह देखकर कहा जा सकता है कि व्यवहारिक रूप से सर्वहारा शासन अब स्थापित हुआ है। 1977 में पहली बार वाम मोर्चा सरकार बनने पर उसके मुख्यमंत्री ज्योति बसु से अपमान का बदला 18 वर्ष बाद ममता ने लिया। ममता ने तब कसम खाई थी कि वे अब राज्य की मुख्यमंत्री के रूप में ही राइटर्स बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़ेंगीं। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन के जरिये जनता में अपनी पैठ बनाने वाली ममता का सपना पूरा हुआ। वे राज्य में 11वीं मुख्यमंत्री बनीं। लगभग ढाई दशक तक पश्चिम बंगाल में जिस वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ ममता ने निरन्तर संघर्ष किया, उस मोर्चे के शीर्ष नेताओं को शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित कर ममता ने राजनीतिक भद्रता के साथ यह भी संकेत दिया कि वे टकराव के नहीं मेल-मिलाप और संवाद के रास्ते पर चलेंगी। ममता ने अपने शपथ ग्रहण में नंदीग्राम, नेताई और सिंगूर के आंदोलन में मारे गए लोगों के परिजनों के अलावा विशिष्ठ अतिथियों के रूप में सोनागाछी की सेक्स वकर्स और रिक्शा चालकों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित कर आश्वस्त किया कि वे अब वाकई एक नए बंगाल बनाने के लिए काम करेंगी। ममता के सामने चुनौतियों का अम्बार है। हिंसा और वित्तीय मोर्चे पर हालात काबू से बाहर बताए जा रहे हैं। राजकोष खाली है। पूरी गाड़ी ही पटरी से उतरी हुई है। गाड़ी को वापस पटरी पर लाना आसान काम नहीं होगा। ममता बनर्जी की शानदार सफलता पर हमारी बधाई और उम्मीद है कि शायद अब उनके नेतृत्व में प. बंगाल की किस्मत संवरे।
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Wednesday, 18 May 2011

5 राज्यों के क्वार्टर फाइनल के बाद सेमीफाइनल यूपी की बारी है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18 May 2011
-अनिल नरेन्द्र
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव केंद्र में सत्ता के खेल का एक तरह से क्वार्टर फाइनल मैच था। अब बारी है सेमीफाइनल की। सेमीफाइनल 10 महीने बाद उत्तर प्रदेश में होगा। अगर बहन जी ने चाहा तो यह उससे पहले भी हो सकता है। रोचक बात यह होगी कि यूपी के सेमीफाइनल में वह दो टीमें खासतौर पर खेलेंगी जो क्वार्टर फाइनल में सिर्प `सहायक' की भूमिका में नजर आई हैं। यह पुरानी कहावत है कि दिल्ली की गद्दी का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। इस दृष्टि से यूपी विधानसभा चुनाव और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। कांग्रेस और भाजपा के लिए न केवल सूबे की राजनीति इस पर निर्भर करती है बल्कि केंद्रीय राजनीति में भी यूपी का अपना महत्व है। सबकी आंखें सुश्री मायावती पर टिकी हुई हैं। शुक्रवार को पांच राज्यों के परिणाम आए, संयोग ही है कि उसी दिन यूपी में मायावती सरकार ने भी शुक्रवार को ही चार साल पूरे किए। अब उसका काउंट-डाउन शुरू हो रहा है। अगले 12 महीने यूपी के लिए राजनीतिक रूप से बेहद गहमागहमी भरे रहेंगे। यूपी में ए और बी टीम तो बसपा और सपा की ही है। मुख्य लड़ाई भी इन्हीं दोनों में होनी है। स्पष्ट बहुमत पाकर पहली बार `स्थायी' सरकार बचाने में सफल हुई मायावती के लिए यह साल बेहद अहम है। अपना गढ़ बचाए रखने की वह हर सम्भव कोशिश करेंगी। उधर मुलायम सिंह अपनी खोई ताकत वापस पाने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं। सपा अपने दम पर चुनाव लड़ेगी और पार्टी ने 403 में से 270 प्रत्याशी तो घोषित भी कर दिए हैं। मुलायम ने पूरा जोर अपने पारम्परिक यादव और मुस्लिम वोट पर लगा रखा है।
बंगाल से लेकर तमिलनाडु तक सत्ता विरोधी रुझान बहन जी के लिए चिन्ता का विषय होना चाहिए। अगर बंगाल में नंदीग्राम और सिंगूर ने सत्तारूढ़ दल के खिलाफ माहौल बनाया तो उत्तर प्रदेश में घोड़ी बछेड़ा, टप्पल और भट्टा पारसौल का किसान आंदोलन मायावती सरकार के खिलाफ माहौल बना रहा है। हालांकि कानून व्यवस्था स्थिति में सुधार हुआ है पर कुछ बसपा विधायकों के कारण वसूली, फिरौती, लूट, बलात्कार व हत्या, आदि की वारदातों ने माहौल दूषित जरूर किया है। शुक्रवार को जब कई राज्यों के चुनाव परिणाम आ रहे थे तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में पिपटाइम विधानसभा सीट का भी नतीजा आया था। इस सीट पर बसपा कहने को तो खुद चुनाव नहीं लड़ रही थी पर एक शराब व्यापारी को पूरा समर्थन दिए हुई थी। यह उम्मीदवार बुरी तरह से हारा। इस चुनाव ने उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए दो सन्देश दिए हैं। सत्तारूढ़ दल से अगर विपक्ष एकजुट होकर लड़ा तो बसपा की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। दूसरा अब फिरकापरस्त ताकतों के लिए भी जीत आसान नहीं है। इस चुनाव में पूर्वांचल में हिन्दुत्व के सबसे बड़े नेता योगी आदित्यनाथ की भी हार हुई जो इस चुनाव को प्रतिष्ठा का सवाल बनाए हुए थे। मायावती के जन्मदिन के सिलसिले में चल रही वसूली के बाद एक इंजीनियर की हत्या से जो माहौल खराब हुआ वह एक के बाद एक घटनाओं से बसपा के कई मंत्रियों और विधायकों को बेनकाब कर गया। इनकी हरकतों से मायावती की छवि कि वह सख्त प्रशासक हैं, को भी धक्का लगा है। लोग मायावती के उस नारे को याद दिलाते हैं `चढ़ गुंडों की छाती पर, मुहर लगाओ हाथी पर।' इन सब कमियों के बावजूद मायावती का आज भी पलड़ा भारी है। राज्य में उन्होंने काफी काम किया है पर आने वाले कुछ महीने सभी के लिए महत्वपूर्ण हैं।
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Tuesday, 17 May 2011

परिणाम कांग्रेस के लिए ज्यादा खुशी-कम गम लेकर आए हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

Publish on 17 May 2011
अनिल नरेन्द्र
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए थोड़ी खुशी थोड़ा गम लेकर आए हैं। खुशी इसलिए कि तमिलनाडु और उसके पड़ोसी केंद्र शासित क्षेत्र पुडुचेरी को छोड़कर कांग्रेस और उसके गठबंधन का परचम हर जगह लहराया है। वहीं केंद्र में मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी का इन पांच राज्यों में तकरीबन सूपड़ा साफ हो गया है। पार्टी के लिए सबसे ज्यादा राहत असम से है जहां उसने न केवल तीसरी बार सत्ता में वापसी की है बल्कि पिछली बार से भी ज्यादा सीटें हासिल की हैं। केरल में उसके नेतृत्व वाला यूडीएफ सत्ता में जरूर पहुंचा है लेकिन मामूली बढ़त के साथ जहां उसकी नैया कभी भी डूब सकती है। बंगाल में पूरी जीत ममता बनर्जी की है जबकि तमिलनाडु जहां 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला बड़ा मुद्दा था वहां उसका तथा द्रमुक का सूपड़ा साफ हो गया है। पुडुचेरी भी कांग्रेस के हाथ से निकल गया और सबसे खतरनाक समाचार कांग्रेस के लिए आंध्र प्रदेश से आया है जहां अपने सबसे बड़े गढ़ में हुए उपचुनाव में उसके बड़े नेता बुरी तरह हारे हैं बल्कि उसके बागी नेता जगन मोहन रेड्डी तथा उनकी मां को भारी जीत मिली है।
अगर केंद्रीय भावी राजनीति को देखें तो पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का अकेला बहुमत पा जाना कांग्रेस और यूपीए नेतृत्व के लिए दिक्कत खड़ी कर सकती है। ममता का अब यूपीए सरकार में न केवल दबदबा बढ़ जाएगा बल्कि उसकी बार्गेनिंग पॉवर भी ज्यादा हो जाएगी। यही हाल जयललिता का भी होगा। जयललिता की बार्गेनिंग शक्ति के बारे में तो कांग्रेस को अच्छा अनुभव है। ममता ने कांग्रेस को पश्चिम बंगाल सरकार में शामिल होने को कहा है। अब सरकार में शामिल होने का फैसला कांग्रेस को करना है। वैसे देखा जाए तो उसके पास हां कहने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं है। अगर केंद्र सरकार में यदि दोनों पार्टियां शामिल हैं तो पश्चिम बंगाल में क्यों नहीं? कांग्रेस के कुछ नेताओं की मानें तो ममता की भारी जीत ने कांग्रेस की रणनीति कुछ समय के लिए पंचर कर दी है। कुल मिलाकर राज्य और केंद्र, दोनों की राजनीति के हिसाब से तृणमूल का ग्रॉफ इस समय काफी ऊंचा है।
इन पांच राज्यों के नतीजों को कांग्रेस नेतृत्व ने लीग मैच मानते हुए अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड के क्वार्टर फाइनल की तैयारी शुरू कर दी है। नतीजों की समीक्षा और आगे की रणनीति बनाने के लिए बैठकों के दौर आरम्भ हो चुके हैं। सूत्रों के मुताबिक सरकार में जहां बंगाल के नतीजे प्रणब मुखर्जी की ताकत में इजाफा कर सकते हैं वहीं तमिलनाडु में कांग्रेस की दूरदर्शी पी. चिदम्बरम के महत्व पर सवाल खड़े कर सकती है। ममता के मुख्यमंत्री बनने से खाली होने वाले रेल मंत्रालय की कमान किसी को सौंपने के साथ-साथ कई वरिष्ठ मंत्रियों के विभागों में फेरबदल करके सरकार और संगठन को अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड और आखिर में गुजरात और हिमाचल चुनावों के लिए तैयार करना कांग्रेस नेतृत्व की अब प्राथमिकता होनी चाहिए। कुल मिलाकर यही निष्कर्ष निकलता है कि इन पांच राज्यों के परिणाम कांग्रेस के लिए ज्यादा खुशी और कम गम लेकर आए हैं।

Friday, 13 May 2011

34 साल के बाद वाम मोर्चा का सफाया लगभग तय लगता है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

प्रकाशित: 13 मई 2011
अनिल नरेन्द्र

आमतौर पर चुनाव परिणामों के बारे में दावे से तो कुछ नहीं कहा जा सकता पर मतदान होने के बाद राजनीतिज्ञ, चुनाव विश्लेषकों व विशेषज्ञों को इतना अहसास हो जाता है कि हवा किस रुख चली है। वैसे आजकल तो चुनाव बाद सर्वेक्षण भी आ जाते हैं। हालांकि यह कभी-कभी बहुत गलत साबित होते हैं पर आमतौर पर 70-80 प्रतिशत सटीक बैठते हैं। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव बाद और मतगणना पूर्व सर्वेक्षणों के मुताबिक पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की आंधी से तीन दशक से भी पुराने वाम मोर्चा शासन का किला ढहने के संकेत हैं। प. बंगाल विधानसभा चुनाव के छठे और अंतिम चरण में मंगलवार को 85 प्रतिशत मतदान हुआ 13 मई को नतीजे घोषित होंगे। एक्जिट पोल के मुताबिक तृणमूल और कांग्रेस गठबंधन को राज्य में 210 से 220 सीटें मिलने की संभावना है। वहीं 34 साल से लगातार सत्ता में रहने वाला वाम मोर्चा सिर्प 62 से 65 सीटों तक सिमट सकता है। ममता बनर्जी के जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य पूरा होने जा रहा है। वह पश्चिम बंगाल की अगली मुख्यमंत्री बनने जा रही हैं। कांग्रेस के लिए केरल से भी अच्छी खबर है। यहां कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ की सरकार बन सकती है। वहीं तमिलनाडु और असम के बारे में टीवी चैनलों की राय बंटी हुई है। हालांकि असम में विपक्ष के बिखराव की वजह से कांग्रेस की मजबूत स्थिति मानी जा रही है। वहीं स्टार न्यूज ने तमिलनाडु में डीएमके-कांग्रेस गठबंधन को सत्ता के करीब बताया है जबकि सीएनएन-आईबीएन ने एआईडीएमके को ज्यादा सीटों की भविष्यवाणी की है। तमिलनाडु में कांटे की टक्कर है। ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है। प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी की इन राज्यों में न के बराबर मौजूदगी है।
कांग्रेस सावधानी से चल रही है। दरअसल कांग्रेस चुनाव परिणामों को लेकर ज्यादा उत्साहित नजर नहीं आ रही। इसीलिए उसने कहना शुरू कर दिया है कि हम इन चुनाव को केंद्र सरकार के लिए जनादेश नहीं मानते। यह चुनाव स्थानीय आधार पर लड़े गए हैं। दरअसल कांग्रेस को चुनाव परिणामों से मिलीजुली तस्वीर उभरने के आसार लग रहे हैं। अगर प. बंगाल में ममता की भारी जीत होती है और तमिलनाडु में द्रमुक की हार तो इसका सीधा असर मनमोहन सरकार पर पड़ सकता है। ममता की भारी जीत भी कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बजाती है क्योंकि यदि ममता राइटर्स बिल्डिंग में बिना कांग्रेस मदद के पहुंच गई तो वे अपनी आदत के मुताबिक केंद्र सरकार को पग-पग पर ब्लैकमेल करेंगी। जैसा कि उसने पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को लेकर होने वाली वृद्धि को लेकर किया है। वहीं यदि तमिलनाडु में यदि संभावना के मुताबिक द्रमुक की हार हो जाती है तो वह बौखला कर केंद्र सरकार से हट सकती है। क्योंकि अपने नेताओं पर सीबीआई के लगातार कस रहे शिकंजे से वह पहले ही काफी क्षुब्ध है। ऐसे में यदि चुनावी नतीजों ने उन्हें झटका दे दिया तो वे केंद्र को भी झटका दे सकती है। वहीं दूसरी ओर केरल और असम में जहां कांग्रेस अपने लिए काफी संभावनाएं लेकर चल रही है वहां भी कांटे की टक्कर की भविष्यवाणी ने पार्टी के माथे पर बल डाल दिया है। पुडुचेरी में कांग्रेस पहले से ही हार मान चुकी है। वैसे भी इसका कोई खास महत्व नहीं है। देखें 13 मई को मतपेटियों में क्या भरा है?

Wednesday, 20 April 2011

34 साल के शासन को दीदी की चुनौती से लेफ्ट हलकान

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

प्रकाशित: 20 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र

सोमवार को पश्चिम बंगाल के छह उत्तरी जिलों की 54 विधानसभा सीटों पर पहले चरण का मतदान हो गया। पहले चरण के इस मतदान में 74.27 फीसदी मतदान हुआ। इस दौरान कहीं से भी किसी बड़ी अप्रिय घटना का समाचार नहीं है। यह विधानसभा चुनाव वाम मोर्चा के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे ने 21 जून 1977 को सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ली थी और सत्ता में लगातार बने रहते हुए 34 साल पूरे होने को आ गए हैं। इस उपलब्धि के साथ ही प. बंगाल में लेफ्ट फ्रंट की सरकार ने लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता में बनी रहने वाली सबसे लम्बी कम्युनिस्ट सरकार का रिकार्ड बना लिया है। लेकिन इन विधानसभा चुनावों में इसी बात को इस मोर्चे की सबसे बड़ी कमजोरी भी बताया जा रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो पूरे राज्य में एक सत्ता विरोधी लहर दौड़ रही है जो सत्ताधारी सीपीएम की गले की फांस बन गई है। हालांकि मार्क्सवादी नेताओं ने 2009 में जारी एक पार्टी दस्तावेज में इन मुद्दों को उठाया और पार्टी नेतृत्व ने इस बात को स्वीकार किया है कि उनके परम्परागत वोटर अब उनकी नीतियों से विमुख हो रहे हैं। सत्ताधारी पार्टी के समक्ष मुस्लिम मतदाताओं को अपने खेमे में बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। पिछले चुनावी नतीजों और अल्पसंख्यकों के इलाकों का आकलन करने के बाद पता चलता है कि कुल 214 सीटों में से 75-77 सीटें ऐसी हैं जहां उन्हीं की जीत की सम्भावना है जहां मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन मिलेगा। इन चुनावों में ऐसा ही कहा जा रहा है कि एक लम्बे समय तक लेफ्ट का समर्थन करते रहने के बाद अब ज्यादातर मुस्लिम मतदाताओं ने अपना समर्थन बन्द कर दिया है। साथ ही लेफ्ट पार्टी के अपने धड़ों में और खासतौर से एसएफआई जैसे छात्र संगठनों में अब मनमुटाव खुलकर सामने आने लगे हैं। पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिवेश में सत्ताधारी वाम नेताओं के जनता को नजरंदाज करने वाले रवैये की भी इन चुनावों में एक महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी ने अपने करिश्में से वाम मोर्चा की नींद उड़ा रखी है। एकजुट विपक्ष की एक मात्र नेता बनकर उभरी ममता बनर्जी को लेकर गांवों और शहरों में काम करने वालों में बराबर का उत्साह है। ममता की पार्टी के खिलाफ माओवादियों के एक गुट द्वारा दिए गए फरमान भी उन इलाकों में वोट काट सकते हैं जो झारखंड राज्य से सटे हुए हैं पर इन सबके बावजूद लेफ्ट फ्रंट का चुनाव जीतना बहुत मुश्किल लग रहा है। अगर बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में वाम मोर्चा चुनाव जीत गया तो प. बंगाल के चुनावी इतिहास में यह सबसे महत्वपूर्ण घटना होगी। चुनाव पूर्व दो सर्वेक्षणों की मानें तो तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिल रहा है। ओआरजी द्वारा हेडलाइंस टुडे समाचार चैनल के लिए किए ए सर्वेक्षण के मुताबिक तृणमूल-कांग्रेस गठबंधन को 182 सीटें मिलेंगी जो कि बहुमत के लिए जरूरी 148 सीटों से काफी अधिक है जबकि वाम मोर्चा को 101 सीटें मिलेंगी जो 2006 के चुनाव की तुलना में 126 कम है। बाकी तो मतपेटियां खुलने के बाद ही पता लगेगा।