पिछले दिनों फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सर्कोजी राष्ट्रपति चुनाव हार गए थे। ज्यादातर लोग सर्कोजी की हार उनके दक्षिणपंथी विचारधारा और मॉडल कार्ला ब्रूनी से इश्क होने की वजह बता रहे थे। उनकी हार को दक्षिणपंथी हार और वामपंथ की जीत के रूप में देखा जा रहा है पर दरअसल निकोलस सर्कोजी को हराने में फ्रांस के प्रोग्रेसिव सोशलिस्ट तबके के अलावा अनिवासी मुसलमानों का भी बड़ा हाथ है। पश्चिमी मीडिया जानबूझ कर इस बात को दबा या नजरअन्दाज कर रहा है। निकोलस की जीत में भी मुस्लिम दुश्मनी का बड़ा हाथ था। यही वजह थी कि उनके जीतने पर पेरिस समेत फ्रांस के लगभग हर शहर में बड़े पैमाने पर हिंसा और आगजनी हुई थी। यह शायद पहला मौका था जब किसी फ्रैंच प्रेसिडेंट के जीतने पर जश्न की बजाय हर तरफ आग और धुआं फैल गया था। लियोन में तो 10,000 कारें पूंक दी गई थीं। निकोलस ने जीत के लिए किया गया वादा पूरा भी किया और फ्रांस में हिजाब-नकाब को बैन कर दिया। उनके नक्शे कदम पर चलते हुए यूरोप के कुछ और देशों ने भी बुर्के पर पाबंदी लगा दी। जाहिर है कि इससे यूरोप के मुसलमानों के खिलाफ माहौल बन रहा है। माना जा रहा है कि 9/11 का खाका जर्मनी के हैम्बर्ग शहर में तैयार किया गया। नीदरलैंड में कई मुस्लिम चरमपंथी हमले हो चुके हैं। फिल्म मेकर क्योवेन गाग 2004 में मार दिया गया जिसने एक लड़की के बदन पर कुरान की आयतें लिख दी थीं और फिर उसकी एक फिल्म बनाई थी। जर्मनी के म्यूनिख शहर में भी मुस्लिम चरमपंथी इजरायली खिलाड़ियों को मौत की नींद सुला चुके हैं। ब्रिटेन में तो कई आतंकवादी हमले हो चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया का डाक्टर हनीफ प्रकरण भी सभी को याद होगा। इन हालात का नतीजा है कि यूरोप एक नई किस्म की चुनौती में उलझ गया है। यूरोप की सरकारें अब मुसलमानों के मामलों में पहले से ज्यादा संवेदनशील होने पर कुछ हद तक मजबूर हो रही हैं। मुसलमान वहां की सरकारों के बनने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे हैं। इस तब्दीली की वजह यह भी है कि यूरोप में मुसलमानों की तादाद बढ़ती जा रही है। कुल 27 देशों के यूरोपीय यूनियन की करीब 50 करोड़ की आबादी में पौने दो करोड़ मुसलमान हैं। फ्रांस सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाला देश बन चुका है। वहां हर 10वां व्यक्ति मुसलमान है। निकोलस को इसलिए भी जिताया गया था कि पेरिस और लियोन की मुख्य आबादी वाली जगहों पर ये मुसलमान और एशियाई-अफ्रीकी अपनी सम्पत्ति बढ़ाते जा रहे हैं और फ्रैंच मूल के लोग आउटस्कर्टस में बसने पर मजबूर हो रहे हैं। पेरिस की कई सड़कों पर छोले-भटूरे, समोसे, इमरती बिरयानी, कबाब, भुट्टे, पाए, सीख कबाब, शीरमाल और पूरी-कचौड़ी बिक रही है। पूरी मार्केट में बॉलीवुड की सीडी, डीवीडी, साड़ी और भारतीय परिधान बिक रहे हैं। वीआईपी की तर्ज पर `बीआईपी' यानि बंगलादेश, इंडिया, पाकिस्तान संगठन चल रहे हैं। किसी को फ्रैंच किराएदार तंग करते हैं तो यह संगठन भारतीय शैली में उससे निपटता है। फ्रैंच समाज इस बदलते माहौल से बुरी तरह परेशान है। ऐसे में मूलत उदार फ्रैंच समाज ने उस वामपंथी सौम्य समाजवादी औलाद को राष्ट्रपति चुना। यह वही समाज है जिसने निर्वासित जीवन जीने के लिए बेनजीर भुट्टो का पनाह दी थी और उस आयतुल्लाह खोमैनी को पनाह दी जिसने पेरिस में रहकर ईरानी इस्लामी इंकलाब का खाका तैयार किया।
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Wednesday, 27 June 2012
Friday, 15 June 2012
4.5 फीसद कोटे पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाईं फटकार
वेंद्र सरकार ने उत्तर प्रादेश सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले जिस हड़बड़ी से बिना सोचे-समझे वोट बैंक के चक्कर में पिछड़े वर्ग यानी ओबीसी के 27 फीसदी आरक्षण के भीतर पिछड़े अल्पसंख्यकों को 4.5 फीसदी आरक्षण देने का पैसला किया था, उसका हश्र वही होना था जो हुआ। अब सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रादेश हाईं कोर्ट के पैसले पर स्थगन देने से इंकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा है कि पास आरक्षण देने के पर्यांप्त आधार नहीं हैं। गौरतलब है कि आंध्र प्रादेश की कांग्रोस सरकार ने मुस्लिमों को 4.5 फीसद आरक्षण दिया था। वेंद्र सरकार ने काफी उधेड़बुन के बाद हाईं कोर्ट के पैसले पर स्टे लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। मनमोहन सरकार ने जब यह पैसला लिया था तभी यह जाहिर हो गया था कि आरक्षण का मुद्दा न्यायिक विवेक से भटक कर खालिस राजनीतिक फायदेनुकसान पर वेंद्रित था। जनता बेववूफ नहीं है वह तब ही समझ गईं थी कि मनमोहन सरकार लोकपाल बिल से चौतरफा दबाव में है और वह जनता का ध्यान बंटाने के लिए यह आरक्षण का शोशा लाईं है। दुर्भाग्य से वेंद्र सरकार की यह चाल सफल नहीं हुईं और अल्पसंख्यक सरकार के इस लालीपॉप के चक्कर में नहीं आए और कांग्रोस को यूपी में मुंह की खानी पड़ी। कांग्रोस का आलम यह रहा कि मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के लिए तब वेंद्र सरकार के मंत्री संवैधानिक मर्यांदाओं को ताक पर रखकर बेतुकी बयानबाजी पर उतारू हो गए थे। अच्छी बात यह रही कि जो झटका पहले कांग्रोस को आंध्र प्रादेश ने दिया, तकरीबन उसी तरह का झटका पाटा को उत्तर प्रादेश के चुनावी जनादेश से भी मिला।
बावजूद इन दो झटकों के कांग्रोस की अगुवाईं वाली यूपीए सरकार मुस्लिमों की हिमायती दिखने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंची पर यहां भी उसे हताशा ही हाथ लगी। यह समझने की जरूरत है कि आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था और इसकी आड़ में होने वाली राजनीति, ये दोनों भिन्न चीजें हैं। आरक्षण के जरिये समाज के उपेक्षित वर्ग को मुख्यधारा से जोड़ने में निाित मदद मिली है पर प्राकारांतर में राजनीतिक दलों और सरकारों ने आरक्षण को अपने राजनीतिक हित साधने का जरिया भी बना लिया जबकि किसी उपेक्षित वर्ग के उत्थान के लिए आरक्षण सिर्प एक जरिया है और वह भी समुचित अवसर उपलब्ध कराए बिना सम्भव नहीं है। सरकार अदालत को यह भी नहीं बता सकी कि किस आधार पर अल्पसंख्यकों को 4.5 फीसद आरक्षण देने का पैसला किया गया था। अभी तक सरकार के पास अदालत में कहने के लिए सिवाय इसके कोईं पुष्ट आधार नहीं है कि आरक्षण देने का पैसला उसने एक डिटेल सव्रे के बाद लिया। इस मुद्दे पर वेंद्र सरकार और कांग्रोस पाटा की फजीहत जहां एक तरफ बढ़ गईं है वहीं दूसरी तरफ एक अच्छी बात यह भी है कि आरक्षण की शुद्ध राजनीति के खिलाफ सबसे तीखा विरोध इस बार मुस्लिम समाज की तरफ से उठा है। वेंद्र सरकार अब भी अल्पसंख्यकों को बेववूफ बनाने से बाज नहीं आ रही। सलमान खुशाद संविधान संशोधन की बात कर रहे हैं। कांग्रोस मुस्लिमों में बुरी तरह से एक्सपोज हो चुकी है अब वह सरकार के झांसे में नहीं आएंगे।
बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी आरक्षण देने के निर्णय को निरस्त करने से साफ इंकार कर दिया। न्यायमूर्ति केएस राधावृष्णन और न्यायमूर्ति जेएस खेहड़ की अवकाशकालीन पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल गौरव बनजा की दलीलें सुनने के बाद दो टूक शब्दों में कहा—हम उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक नहीं लगाएंगे। न्यायाधीशों ने भी सरकार से वही सवाल किया कि अन्य पिछड़े वर्गो के आरक्षण में से क्या धर्म के आधार पर इस तरह का वगाकरण किया जा सकता है?
Tuesday, 3 April 2012
मास्को ः तेजी से बदलता मास्कोवाबाद
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 3 April 2012
अनिल नरेन्द्र
मार्च के ठंडे शुक्रवार को मास्को के बीचो-बीच गुजरने वाली बोलशाया तातरस्काया स्ट्रीट पर सन्नाटा पसरा है। यह सड़क रूस की राजधानी की सबसे पुरानी मस्जिद के पास से गुजरती है। मास्को में आजकल 20 लाख से ज्यादा मुसलमान रहते हैं और काम करते हैं। यह अब यूरोप में मुस्लिम लोगों का सबसे बड़े शहरों में से एक हो गया है और कुछ मस्जिदें इतनी बड़ी आबादी के लिए काफी नहीं ंहैं। जुमे की नमाज के दौरान इस ऐतिहासिक इमारत में लोगों का जमघट लगा है और हजारों लोग खुले में बर्पबारी के बीच नमाज अता करने पर मजबूर हैं। ज्यादातर मुसलमान मध्य एशिया के पूर्व सोवियत गणराज्यों से आम युवा आप्रवासी हैं। गरीबी और संघर्ष ने उन्हें रूस में नई जिन्दगी शुरू करने के लिए मजबूर किया है। लाखों उज्बेक, ताजिक और किरगिज लोग मास्को में नौकरियां कर रहे हैं। उज्बेकिस्तान से आए युवा अलबेक कहते हैं, `हम इस बात के आभारी हैं कि मास्को में इतनी मस्जिदें हैं।' लेकिन दूसरे कुछ लोग कहते हैं कि प्रशासन मुसलमानों की जरूरतों की अनदेखी कर रहे हैं। शहर की ऐतिहासिक मस्जिद के इमाम हसन का मानना है कि मौजूदा सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं। वे कहते हैं, `हम प्रशासन से और मस्जिदें बनवाने की अनुमति मांग रहे हैं लेकिन वह हमारी बात नहीं मान रहे हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि लोगों को अब खुले में बारिश और बर्प के बीच नमाज पढ़नी पड़ रही है।' मास्को की पुरानी ततार मस्जिद की अब नई इमारत बनाई जा रही है लेकिन इसके बावजूद भी सभी नमाजियों के लिए यह जगह कम पड़ रही है। पुरानी मस्जिद के पास टहल रही दो युवा महिलाओं ने बीबीसी संवाददाता को बताया कि मास्को बढ़ रहा है और ज्यादा से ज्यादा आप्रवासियों को आकर्षित कर रहा है जिसमें कई मुसलमान हैं। रूस में गिरिजाघर भी बनाए जा रहे हैं। इसलिए मुसलमानों को भी मस्जिद बनाने से रोका नहीं जाना चाहिए। लेकिन कई रूसियों को डर है कि अधिक विदेशियों के होने की वजह से रूस की संस्कृति और जीवनशैली बदल रही है। एक राष्ट्रीय संगठन रुसावेट के कार्यकर्ता यूरी गोसर्की कहते हैं, `लोग मजाक कर रहे हैं कि मास्को अब मास्कोवाबाद बन गया है। अब सड़कों पर स्लाविक देशों के चेहरे नहीं दिखाई देते। हमें इस्लामिक देशों से आए लोगों पर आपत्ति नहीं है लेकिन हमें इन मुसलमानों को रोकना होगा।' पहले रूस में मुसलमान आप्रवासियों पर हमले हुआ करते थे लेकिन अब इनकी संख्या में काफी कमी आई है। रूसी मानवाधिकार संगठन सोवा के अनुसार जातीय हमलों में 2011 के दौरान सात लोगों की मौत हुई है और 28 लोग घायल हुए हैं जबकि 2008 में इन हमलों में मरने वालों की संख्या 57 थी। बाहर से आए अधिकतर लोगों को वह काम करने में कोई संकोच नहीं है जिसे स्थानीय लोग करने में हिचकिचाते हैं। पूरे शहर में हलाल दुकानों और कैफे का जाल-सा बिछ गया है। इनमें महंगे रेस्तरां से लेकर जहां एक बार के खाने की कीमत 10,000 रुपये तक है, सस्ते टेक अवे भी शामिल है। जहां मध्य एशियाई लोगों को सिकी हुई तंदूरी रोटियां मिल जाती हैं, समोसे भी बनते हैं। हलाल समोसा रूस का सबसे लोकप्रिय टेक अवे बन गया है। रूस में बड़ी संख्या में लोग इस्लाम धर्म अपना रहे हैं। एक केंद्र में धर्म बदलने वाली मुस्लिम महिलाओं का पंजीकृत किया जाता है। इस्लाम हमेशा से रूस का दूसरा बड़ा धर्म रहा है लेकिन वह इतना दृष्टिगोचर कभी नहीं रहा जितना आज है।
Anil Narendra, Daily Pratap, Moscow, Muslim, Russia, Vir Arjun
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Saturday, 24 March 2012
मुस्लिम औरतों की बदहाली पर कोई सियासी पार्टी बोलने को तैयार नहीं
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 24 March 2012
अनिल नरेन्द्र
देश में मुस्लिमों के पारिवारिक कानून में सुधार व मुस्लिम निजी कानून संहिताबद्ध किए जाने की मांग अब जोर पकड़ रही है। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन से जुड़ी मुस्लिम महिला शिक्षा, सुरक्षा, रोजगार, कानून एवं सेहत के मुद्दों पर जागरुकता लाने का काम कर रही है। उत्तर प्रदेश के कई शहरों में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन व परचम संस्था संयुक्त रूप से मुस्लिम महिलाओं के बीच जाकर उन्हें सशक्त करने की नई राह दिखा रही हैं। देश में मुस्लिम महिलाओं की स्थिति हमेशा से बहस में रही है। मुस्लिम पारिवारिक कानून में सुधार करने का समय आ गया है। दिल के अरमां आंसुओं में बह गए...। हिन्दी फिल्म का यह गीत मुस्लिम बिरादरी की महिलाओं का दर्द बयां करता है। एक पति के भरोसे ही लड़कियां अपना मायका छोड़कर ससुराल आती हैं। लेकिन पति जब एक के अलावा तीन और बीवी रखने का हक शरीयत के जरिये यानि कानून न मिला हो तो हालात बदतर हो जाते हैं। इस्लाम धर्म में मुसलमानों को हालात के आधार पर चार बीवी रखने की छूट है। धर्म की आड़ में हालात कुछ लोग खुद ही गढ़ लेते हैं और इस्लाम में बताई गई परिस्थितियों को नजरअंदाज कर देते हैं। मन मुताबिक उसकी व्याख्या करते हैं। सूबे या मुल्क के सियासी दल भले ही वोटों की सियासत में चुप्पी साधे हैं। लेकिन हालात ज्यादा बिगड़ते नजर आ रहे हैं। सियासी दल अल्पसंख्यक के रूप में मुस्लिमों को आरक्षण देने की वकालत तो करते हैं लेकिन महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार पर चुप्पी साध लेते हैं। गम्भीर मुद्दों पर बोल देने के बाद वोट खिसकने के डर से दल इससे कन्नी काटना ही मुनासिब समझते हैं। ऐसा नहीं कि सभी मुस्लिम घरों में हालात बदतर हैं। लेकिन जितने भी मामले परिवार परामर्श केंद्र में पारिवारिक बिखराव के आते हैं वे ज्यादातर मुस्लिम परिवारों के ही होते हैं। 21वीं सदी में बिना किसी सुधार के डेढ़ हजार साल पहले के कानून में सुधार होना जरूरी है। शरीयत के आगे पुलिस, वर्तमान कानून और काउंसलर सभी लाचार नजर आते हैं। अली बुन्निशा की हालत कुछ ऐसी ही है। वह ग्राम सलेमपुर, थाना सादुल्लाह जनपद बलरामपुर की रहने वाली है। वह बेजुबान है। उसकी शादी फिरोज पुत्र किताबुल्लाह, ग्राम बरधार, थाना भवानीगंज जनपद सिद्धार्थ नगर में हुई थी। फिरोज कमाने के लिए सऊदी अरब चला गया। वहां उसने दूसरी शादी कर ली। अब अलीबुखशा अपने पांच साल के बेटे के साथ इंसाफ की भीख मांग रही है। बेजुबान होने की वजह से आंखों से अपना दर्द निकालती है। अब महिला थाने में चलने वाले परिवार परामर्श केंद्र के काउंसलरों नईम खान और सुनीता पांडे ने बीच का रास्ता निकालते हुए फैसला किया कि आगामी एक अप्रैल को महिला थाने से ही अली बुन्निशा की विदाई होगी। उसकी विदाई उसके जेठ से इस आशय का शपथ पत्र लेने के बाद होगी कि वह उसके पति के आने तक उसकी देखरेख और खाने-पीने का इंतजाम करेगा। दूसरा मामला हसीना खातून का है। हसीना छह बच्चों की मां हैं। शौहर आलम पर इश्क का भूत इस कदर सवार हुआ कि वह गांव की ही एक नाबालिग लड़की को भगा ले गया। बाद में 376 का आरोपी बनते हुए जेल की सजा काटकर वापस आने के बाद अपनी बीवी हसीना को छोड़ने के लिए प्रताड़ित करने लगा। इतना ही नहीं, उसने अदालत में बीवी हसीना पर विदाई का दावा भी ठोंक दिया। तीसरा मामला शबनम का है। ग्राम चंदापुर थाना शोहरतगढ़ की रहने वाली शबनम बानो के पिता मोहम्मद जकी के दरवाजे पर हाथी बांधे जाते थे। अब वे नहीं है। शबनम का निकाह मोहम्मद इस्तेकार पुत्र मोहम्मद कैशरनाथ ग्राम मैना, थाना इटावा जनपद सिद्धार्थ नगर के साथ हुआ। माता-पिता की इकलौती संतान शबनम की विदाई से पहले ही इस्तेकार अपनी पत्नी से कहने लगा कि पहले तीन लाख रुपये और पूरी जमीन मेरे नाम कर दो, तब हम तुम्हें विदा करेंगे। खास बात यह है कि 20 से 30 साल की महिलाओं का ही घर टूटता है। जनपद सहित सुबाई इलाके में दिन-प्रतिदिन महिलाओं के प्रताड़ना संबंधित घटनाओं में तेजी से इजाफा हुआ है और किसी को इसकी चिन्ता नहीं।
Anil Narendra, Daily Pratap, Muslim, Muslim Personel Law, Muslim Reservation, Muslim Women, Vir Arjun
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Sunday, 11 March 2012
यूपी के मुस्लिम मतदाताओं ने सोच समझकर होशियारी से वोट दिया
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Published on 11 March 2012
अनिल नरेन्द्र
यूपी के मुसलमानों ने विधानसभा चुनाव में कुछ हद तक टेक्निकल वोटिंग की, यह कहें तो शायद गलत नहीं होगा। मैं समझता हूं कि पहली बार उन्होंने ढंग से मुस्लिम हितों को ऊपर रखकर मैच्योर वोटिंग की है। उन्होंने देखा कि कौन-सी पार्टी से कौन-सा मुस्लिम उम्मीदवार जीत सकता है, उसे ही वोट दो। नतीजों ने मुस्लिम मठाधीशों को धूल चटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उत्तरी राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल से लेकर शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी की सिफारिश के उम्मीदवारों को नकार दिया गया। उलेमा काउंसिल तो प्रदेश में अपना खाता तक नहीं खोल पाई। अपने गढ़ आजमगढ़ की निजामाबाद सीट पर खड़े काउंसिल के महासचिव ताहिर मदनी चौथे स्थान पर रहे। बेहट सीट से इमाम बुखारी के दामाद और सपा उम्मीदवार अमर अली खान चुनाव हार गए। वहीं लखीमपुर खीरी से सपा उम्मीदवार इमरान हार गए। पेशे से बिल्डर इमरान को टीले वाली मस्जिद के इमाम मौलाना शाह फजल-ए-रहमान वाहवी नदवी ने टिकट दिलवाया था। मुस्लिम मतदाताओं का यह फैसला पार्टी नहीं बल्कि उम्मीदवारों के खिलाफ था। समाजवादी पार्टी अधिकांश मुस्लिम बहुल सीटों पर कामयाब रही। इसका नमूना है कि आजमगढ़ की 10 सीटों में से 9 पर सपा उम्मीदवार विजयी रहे। गौरतलब है कि यूपी की चुनावी बिसात में करीब 150 सीटें ऐसी थीं जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में थे। इसके लिए सियासी पार्टियों के बीच रस्साकसी भी खूब चली। चुनावी लाभ के लिए मुसलमानों को आरक्षण देने की होड़ से लेकर साहित्य मेले में सलमान रुशदी की आमद तक मुद्दे उठाए गए। उत्तर प्रदेश की 403 सदस्यों वाली विधानसभा में इस बार 63 मुस्लिम उम्मीदवार चुनकर आए हैं। 2007 में यह आंकड़ा 52 था। सपा के कुल 224 उम्मीदवार जीते हैं, जिनमें मुस्लिम प्रत्याशियों की संख्या 40 है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने 83 तो सपा ने 81 मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे। दोनों पार्टियों ने सभी 403 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। कांग्रेस ने अपने 359 प्रत्याशियों में 58 मुस्लिम को टिकट दिए थे। मुस्लिम बहुल इलाके में भारी मतदान हुआ। इनमें मुस्लिम महिलाओं ने अच्छी भागीदारी निभाई। सहारनपुर और आजमगढ़ के मुस्लिम बहुल क्षेत्र में तो 70 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ। बसपा के 14 मुस्लिम उम्मीदवार जीतकर आए जबकि पिछली बार 29 प्रत्याशी जीते थे। पिछले चुनाव में सपा के मुस्लिम विधायकों की संख्या 17 थी। पीस पार्टी के चार प्रत्याशी जीते जिनमें तीन मुस्लिम हैं। पार्टी के अध्यक्ष डाक्टर अयूब खलीलाबाद सीट से जीते हैं। कौमी एकता दल की ओर से माफिया से राजनीतिज्ञ बने मुख्तार अंसारी मऊ सीट से जीते हैं। सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान रामपुर से तथा वकार अहमद शाह बहराइच से जीते हैं। कांग्रेस के काजी अली खाँ रामपुर की स्बार सीट से जीते हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो यूपी के मुस्लिम मतदाताओं ने सोच-समझकर हिसाब से मतदान किया है।
Anil Narendra, Bahujan Samaj Party, Congress, Daily Pratap, Muslim, Muslim Reservation, Samajwadi Party, State Elections, Uttar Pradesh, Vir Arjun
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Sunday, 5 February 2012
पहले चरण का मतदान तय करेगा यूपी की दिशा
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 5th February 2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश में 16वीं विधानसभा के लिए पहले चरण में 55 सीटों के लिए आठ फरवरी को मतदान होगा। पहले चरण के लिए सभी राजनीतिक दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। सभी दल अपने को दूसरे से बेहतर बताने में लगे हुए हैं। लेकिन यदि पिछले पांच चुनावों के आंकड़ों को देखा जाए तो सरकार बनाने के लिए कम से कम 30 फीसदी वोटों का आंकड़ा पार करना जरूरी होगा। बहरहाल यूपी विधानसभा चुनाव की जंग अपने चरम तक पहुंचती नजर आ रही है। गंगा, यमुना, घाघरा, राप्ती और गोमती के पानी के प्रभाव की तरह राजनीति भी निरन्तर परिवर्तनशील है। राजनीति आगे क्या गुल खिलाएगी और किसका पलड़ा भारी होगा, यह तो मतदाता ही तय करेंगे। सत्तारूढ़ बसपा और विपक्षी दल सपा के अलावा कांग्रेस, भाजपा, पीस पार्टी और रालोद ने सभी ने अपनी ताकत झोंक दी है। सत्तारूढ़ बसपा जहां अपनी सरकार के `काम के दम पर' और जातीय समीकरण के आधार पर वापसी का दावा कर रही है, वहीं समाजवादी पार्टी को भरोसा है कि सूबे में प्रमुख प्रतिपक्षी दल हेने के नाते `बसपा सरकार' की कथित विफलताओं के कारण चल रही सत्ता परिवर्तन की हवा का उसे लाभ होगा और इसके मद्देनजर मतदाताओं की पहली प्राथमिकता सपा होगी। कांग्रेस को उम्मीद है कि 22 साल तक गैर कांग्रेसी सरकारें देख चुकी प्रदेश की जनता युवराज राहुल गांधी के करिश्मे का भरोसा करके इस बार उसे ही प्राथमिकता देने वाली है जबकि भाजपा भ्रष्टाचार के विरोध में गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के आंदोलन को मिले जन समर्थन को अपने अनुकूल मानकर अति-प्रसन्न है। फिर जिस तरह से अल्पसंख्यकों को आरक्षण के मामले में अन्य सभी दलों की किरकिरी हुई है उससे भी भाजपा को लगता है कि हिन्दू वोट विशेषकर सवर्ण जातियों का वोट उसके हिस्से में आएगा। उत्तर प्रदेश में विधानसभा की कुल 403 सीटें हैं। प्रदेश में वर्ष 1991 से लेकर 2007 तक हुए विधानसभा के पांच चुनावों पर नजर डालें तो नम्बर एक की पार्टी बनने और बहुमत पाने अथवा उसके करीब पहुंचने के लिए कम से कम 30 फीसदी वोट का आंकड़ा पार करना जरूरी है। उत्तर प्रदेश के यह चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक होने जा रहे हैं। देश के सबसे बड़े राज्य में इस बार रिकार्ड तादाद में छोटी पार्टियां बड़े दम-खम के साथ उतरी हैं। बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा को इनसे नुकसान होने की सम्भावना है। वे इन्हें केवल वोट काटने वाली या वोट बर्बाद करने वाली पार्टियां बता रही हैं, जैसे पीस पार्टी के बारे में भाजपा को छोड़कर तीन बाकी दलों को यही लग रहा है। जिस भाजपा को इससे लाभ हो रहा है उसके बारे में बाकी पार्टियां कह रही हैं कि पीस पार्टी को आर्थिक मदद तो वहीं से मिती है। राज्य में पीस पार्टी का इस समय वही दर्जा है जो अपनी शुरुआती अवस्था में बीएसपी का हुआ करता था। इस बार राज्य में 150 के करीब पार्टियां चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। जो अलग-अलग जाति समूहों का प्रतिनिधित्व का दावा कर रही हैं। पिछली बार करीब 125 पार्टियों ने चुनाव लड़ा था जिनमें छह राष्ट्रीय दल, 12 राज्य स्तरीय दल और 112 गैर मान्यताप्राप्त पार्टियां थीं। उत्तर प्रदेश में परिसीमन के बाद बनी 113 सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक हो सकते हैं जिन्हें पाने के लिए राजनीतिक दलों ने दिन-रात एक कर दिया है। मुस्लिम मत पाने के लिए भाजपा को छोड़ सभी राजनीतिक दल जोर-आजमाइश में लगे हैं। लेकिन अभी भी कोई दल दावे से कहने की स्थिति में नहीं कि उसे मुस्लिम वोट एक ब्लॉक मिलेगा। आमतौर पर माना जा रहा है कि मुस्लिम टैक्टिकल वोटिंग कर सकते हैं यानि भाजपा को हराने के लिए उन्हें उस सीट पर जो भी उम्मीदवार जीतता दिखेगा उसे वोट दे देंगे। इस तरह हमें लगता है कि मुस्लिम वोट कांग्रेस, सपा, बसपा, पीस पार्टी में बंटेगा। हार-जीत का अन्तर बहुत कम होगा। जो उम्मीदवार 10,000 वोट ले लेगा, वह जीतने की स्थिति में आ सकता है। देखें ऊंट किस करवट बैठता है?
Saturday, 17 December 2011
यूपी में राहुल गांधी ने चला अपना मुस्लिम कार्ड
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 18th December 2011
अनिल नरेन्द्र
कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी आजकल उत्तर प्रदेश के दौरे पर हैं। जैसा कि मैंने इसी कॉलम में कुछ दिन पहले लिखा था कि जैसे-जैसे यूपी विधानसभा चुनाव करीब आएंगे सियासी पार्टियां अपने तरकश से सभी जमा तीर चलाएंगी। इनमें मुस्लिम कार्ड भी शामिल है। राहुल गांधी ने मुस्लिम कार्ड चल दिया है। बदायूं में एक सभा में राहुल ने अपना कार्ड चला। राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार पर सच्चर समिति की सिफारिशों पर जानबूझ कर अमल नहीं करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि क्या आपको सच्चर समिति की रिपोर्ट का फायदा मिला? हरियाणा, दिल्ली और महाराष्ट्र जाइए, वहां इस रिपोर्ट पर अमल हो रहा है राहुल ने अपने संबोधन में कहा। प्रदेश के तीन लाख बुनकरों के 50,000 तक के कर्ज की माफी, विधानसभा चुनाव से पहले पिछड़ों के कोटे में मुसलमानों को अलग आरक्षण देने की घोषणा, राहुल गांधी के लखनऊ प्रवास के दौरान दिग्विजय सिंह का सार्वजनिक मंच से आरक्षण में धार्मिक आधार पर भेदभाव खत्म करने की पैरवी करने का वादा करना और एक दिन बाद दिल्ली के मदरसा शिक्षकों की मांगों को लेकर दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में यूपी के कांग्रेसियों की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात। कांग्रेस पार्टी द्वारा पिछले दिनों उठाए गए यह कुछ ऐसे कदम हैं जिससे संकेत मिल रहे हैं कि कांग्रेस अपने और मुसलमानों के बीच रिश्तों की बर्प पिघलाना चाहती है। स्वाभाविक तौर से इस पहल का ज्यादा श्रेय राहुल गांधी की झोली में जाता हुआ दिख रहा है। राहुल गांधी ने दोनों मुलायम सिंह यादव और मायावती के गढ़ों में भी हल्ला बोल दिया है। बुधवार को राहुल गांधी ने समाजवादी पार्टी के गढ़ बदायूं जिले में जन सभाओं में कहा कि मुलायम सिंह यादव अंग्रेजी और कम्प्यूटर पढ़ाई को गैर जरूरी बताते हैं जबकि उनके अपने बेटे अखिलेश यादव को इन दोनों ही चीजों की शिक्षा दी गई है। इस मुस्लिम बहुल इलाके में मतदाताओं की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि हमने सच्चर समिति की सिफारिशों को लागू कर दिया है? क्या आपको इसका लाभ मिला? उत्तर प्रदेश की सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। वह कुछ करना ही नहीं चाहती। यहां बीस साल के दौरान सत्ता में आए लोगों ने दूरदर्शिता नहीं दिखाई। इसका नुकसान यूपी की जनता को हुआ है। उत्तर प्रदेश सरकार पर केंद्र द्वारा विभिन्न विकास योजनाओं के लिए भेजे गए धन के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि राजीव गांधी कहते थे कि सरकार के भेजे गए एक रुपये में सिर्प 15 पैसे ही जनता तक पहुंचते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश में तो एक भी पैसा नहीं पहुंचता। राहुल ने कहा कि लखनऊ में बैठा हाथी पैसा खाता है। यह धन न तो उत्तर प्रदेश सरकार का है और न ही केंद्र का। यह धन प्रदेश की प्रगति में आपके योगदान से आया है। हम वह पैसा प्रदेश की जनता के लिए भेजते हैं, लेकिन वह हाथी खा जाता है। राहुल अपनी तरफ से हर मुस्लिम एंगल को कवर कर रहे हैं। मुसलमानों के सबसे बड़े इदारे ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मुखिया मौलाना रावे हसनी नदवी हैं, राहुल ने उनसे भी हाल के दौरे में मुलाकात की। राहुल से मुलाकात के बाद मौलाना ने कहाöअच्छा लगता है जब मुल्क के लीडर मुल्क के लिए फिक्रमंद दिखते हैं। गरीबों के लिए फिक्रमंद होने का जज्बा होना चाहिए। राहुल के लिए यह मौका जैसा था, अपने को मौलाना के सामने पेश करने का। बोलेö`मैं गरीब-अमीर में फर्प नहीं समझता।' मेरे लिए सब इंसान हैं। मेरी कोशिश है कि मैं हिन्दुस्तान के ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिल सपूं। सच्चर कमेटी से लेकर मुस्लिम आरक्षण तक के मुद्दों पर बातचीत हुई। अपने चिर-परिचित अंदाज में राहुल ने शाहजहानपुर में मायावती सरकार पर जबरदस्त धावा बोला। राहुल ने कहा कि अभी मायावती के हाथी का पेट नहीं भरा। आम जनता का पैसा खा रहा है। यह सब आपका ही पैसा है जो बसपा सरकार के मंत्रियों की तिजोरियों में जमा हो रहा है। उन्होंने बसपा को सबसे भ्रष्ट बताते हुए कहा कि यहां कोई भी काम रिश्वत के बिना नहीं होता। केंद्र से यूपी के लिए कोई भी योजना आती है तो उसका लाभ लेने वालों को रिश्वत देनी पड़ती है। इन्दिरा आवास योजना पाने वाले गरीबों से अधिकारी 10-10 हजार रुपये वसूलते हैं। मनरेगा का हाल भी किसी से छिपा नहीं है। राहुल ने आम जनता से अपील की कि इस बार पांच साल के लिए कांग्रेस को मौका दो क्योंकि कांग्रेस जहां सरकार चलाती है, वहां प्रगति होती है। पहले आपने सपा को चुना कुछ नहीं मिला। बसपा पर भरोसा किया, भ्रष्टाचार और घोटाले मिले। जाति और धर्म के जाल में फंसकर यह 22 सालों में यूपी लूट गई। जैसा मैंने कहा राहुल गांधी सभी पत्ते चल रहे हैं। उनका खास निशाना मुस्लिम मतदाता हैं और उन्हें पटाने के लिए वह सब कुछ कर रहे हैं।
Anil Narendra, Bahujan Samaj Party, Congress, Daily Pratap, Muslim, Muslim Reservation, Rahul Gandhi, Uttar Pradesh, Vir Arjun
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Wednesday, 23 November 2011
मुस्लिम पारिवारिक कानून में सुधार की मांग
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 23th November 2011
अनिल नरेन्द्र
देश में मुस्लिम पारिवारिक कानून में सुधार व मुस्लिम निजी कानून संहिताबद्ध किए जाने की मांग अब जोर पकड़ रही है। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन से जुड़ी मुस्लिम महिला शिक्षा, सुरक्षा, रोजगार, कानून व सेहत के मुद्दों पर जागरुकता लाने व राजनीतिक चेतना विकसित करने में काम कर रही है। अब उत्तर प्रदेश के कई शहरों में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन व परचम संस्था संयुक्त रूप से महिलाओं के बीच जाकर उन्हें सशक्त करने की नई राह दिखा रही हैं। देश में मुस्लिम महिलाओं की स्थिति हमेशा से बहस का विषय रही है। मुस्लिम महिलाओं की स्थिति व मुस्लिम पारिवारिक कानून में सुधार की संभावना पिछले काफी समय से भारतीय मुस्लिम आंदोलन एवं परचम संस्था जता रही है। लखनऊ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर सहित उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में इस मंच की ओर से जो मुद्दे उठाए जा रहे हैं उसमें मुस्लिम महिला अब काफी रुचि लेने लगी हैं। अब वे खुद चाहती हैं कि उनकी जिन्दगी के फैसले और पारिवारिक मुद्दे पर उन्हें भी सहारा मिले ताकि अपने फैसले वे खुद कर सकें। भारतीय मुस्लिम आंदोलन अब देश के 15 राज्यों में सक्रिय है। इस आंदोलन से जुड़ी नाइस हसन ने बताया कि वे इस मुद्दों को हर जगह जाकर मुस्लिम महिलाओं में जागरुकता पैदा कर रही हैं। इस आंदोलन को गांव तक ले जाया गया है। राष्ट्रीय स्तर व संसद पर दबाव बनाने के लिए जागरुकता व राजनीतिक चेतना विकसित करने का काम कर रहा है। वह मानती हैं कि कोई भी समाज पिछड़ा नहीं रहना चाहिए। आंदोलन भारतीय संविधान के दायरे में अपने अधिकारों व विकास की मांग को आगे बढ़ाने में विश्वास रखता है। हसन ने बताया कि एक ओर भारतीय संविधान की धारा 14, 15, 21, 26, 29, 30 और 350ए भारत के सभी नागरिकों के लिए समान अवसर की उद्घोषणा करती है। एक तरफ कानूनी बराबरी की बात करती है वहीं दूसरी ओर देखा जाए तो इन धाराओं को व्यावहारिक रूप में अमल में नहीं लाया जा रहा है। किसी भी धर्म के निजी कानून महिलाओं को सुरक्षा नहीं देते। जहां तक मुस्लिम निजी कानून का सवाल है, वे एक संहिताबद्ध नहीं है। यह कानून औरतों को सुरक्षा नहीं देता। तीन तलाक की घटनाएं आए दिन सामने आती रहती हैं। मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम 1939 ने मुस्लिम महिलाओं को अधिकार तो दिया पर पुरुषों के एक तरफा जुबानी तीन तलाक के अधिकार पर अंकुश नहीं लगाया। जहां मुस्लिम पुरुष मध्यस्थता की कोई कोशिश किए बगैर अपनी बीवी को एकतरफा तलाक दे सकता है। शरीयत में क्या प्रावधान दिए गए हैं, इससे जुड़ी व्याख्याएं कई सारी जानी-मानी कानूनी हस्तियों ने की हैं। लेकिन कोई संवैधानिक कानून नहीं है। कानून की व्याख्याएं तब तक कानून नहीं बनती, जब तक कि उसे संसद पास नहीं करती। संसद में केवल 1937, 1939 व 1986 के कानून को अनुमोदित किया है। हसन ने बताया कि अल्जीरिया में पारिवारिक कानून कोड 1984, मिस्र में व्यक्तिगत स्थिति (संशोधन) कानून 1985, इराक में व्यक्तिगत स्थिति का कानून (संशोधन) 1987, जॉर्डन, व्यक्तिगत स्थिति का कानून 1976, कुवैत में 1984, लीबिया में 1984 इत्यादि कई मुस्लिम देशों में नए संशोधन हुए हैं पर भारत में ऐसा नहीं हुआ। राज्य मुस्लिम समुदाय और मुस्लिम महिलाओं की खराब स्थिति को खत्म करने में विश्वास कर रहे हैं। लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ पर चर्चा से मुस्लिम समाज के सभी वर्ग दूर भागते हैं। अब देश में मुस्लिम निजी कानून के संहिताबद्ध किए जाने की मांग हर स्तर पर उठाई जाएगी। सरकार मुस्लिम महिलाओं के लिए बात करना नहीं चाहती है।Anil Narendra, BJP, Daily Pratap, L K Advani, Manmohan Singh, Rath Yatra, Sushma Swaraj, Vir Arjun
Thursday, 26 May 2011
विधानसभा चुनावों में मुस्लिम पार्टियों को शानदार सफलता मिली
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 26th May 2011
अनिल नरेन्द्र
भारत के मुसलमानों का मैं समझता हूं कि यह दुर्भाग्य रहा है कि राजनीति के क्षेत्र में उन्हें अपने समुदाय का कभी सही नेतृत्व नहीं मिला और प्रमुख राजनीतिक दलों ने हमेशा इनका शोषण किया और वोट बैंक की तरह व्यवहार किया। अब यह बात हमारे मुसलमान भाइयों को समझ में आ रही है और वह राजनीतिक रूप से संगठित होने का प्रयास कर रहे हैं, यह अच्छी डेवलपमेंट है। यूं तो आजादी के बाद से ही भारतीय राजनीति में छोटे-मोटे मुस्लिम राजनीतिक दल हमेशा बने रहे हैं लेकिन अब उन्हें शानदार सफलताएं मिलने लगी हैं। हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि मुसलमान राष्ट्रीय राजनीतिक दलों से निराश हैं। वे क्षेत्रीय मुस्लिम राजनीतिक दलों के आसपास गोलबंद हो रहे हैं। केरल में मुस्लिम लीग और असम में ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोकेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) को मिली सफलता और तमिलनाडु में नई बनी मुस्लिम राजनीतिक पार्टी एमएनएमके को भी दो सीटें मिलना इस तरफ इशारा करता है। इसका असर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों पर पड़ना लाजिमी है। खासकर उत्तर प्रदेश में मुस्लिम राजनीतिक दलों में मुस्लिम वोटों के लिए जबरदस्त जोर-आजमाइश होगी। यूं तो केरल में मुस्लिम लीग हमेशा से ही ताकतवर रही है लेकिन इस बार उसने सफलता के सभी पुराने रिकार्ड तोड़ दिए हैं। उसके 24 में से 20 उम्मीदवार जीते हैं। वहीं असम में एआईयूडीएफ की सीटें 10 से बढ़कर 19 हो गई हैं। यह इस बात का सबूत है कि इन राज्यों के मुसलमानों ने एकजुट होकर इन क्षेत्रीय मुस्लिम पार्टियों को वोट दिया। केरल में मुस्लिम लीग यूडीएफ का हिस्सा थी तो एआईयूडीएफ ने असम में अकेले चुनाव लड़कर अपनी ताकत बढ़ाई। तमिलनाडु में एमएनएमके जयललिता के गठबंधन का हिस्सा थी। लेकिन चुनाव के तुरन्त बाद उसका मन जयललिता से खट्टा हो गया क्योंकि उन्होंने अपने शपथ ग्रहण समारोह में नरेन्द्र मोदी को बुलाया था। प. बंगाल में ममता बनर्जी की सफलता में मुस्लिम वोटों की अहम भूमिका रही। परम्परागत तौर पर माकपा का जनाधार रहे मुसलमानों ने इस बार ममता के प्रति ममता दिखाई। मुस्लिम मतदाताओं के रुख को ममता की तरफ मोड़ने में मुस्लिम संगठन जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द की महत्वपूर्ण भूमिका रही। आंध्र प्रदेश में भी एक मुस्लिम राजनीतिक दल मजलिस-ए-मुशावरत को हैदराबाद और उसके आसपास के इलाकों में अच्छी सफलता मिली है। उसके नेता ओबेसी लोकसभा सदस्य हैं।
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटों की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। वहां 6-7 मुस्लिम राजनीतिक दल राज्य के 18 फीसद मुस्लिम वोटों को हथियाने के लिए मैदान में होंगे। यूपी में सबसे ताकतवर मुस्लिम पार्टी है पीस पार्टी। इसने पिछले उपचुनावों में अच्छे-खासे वोट हासिल कर राजनीतिक हल्कों में खलबली मचा दी है। लेकिन इसका प्रभाव पूरे सूबे में नहीं हो पाया और ज्यादातर गोरखपुर और उसके आसपास के इलाकों तक ही फिलहाल सीमित लगता है। हाल में जमाते इस्लामी ने भी पार्टी बनाई हैöवेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया। एआईयूडीएफ ने भी यूपी के चुनाव में उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है। हैरानी की बात यह है कि देश के मुस्लिम सांसदों में से एक भी शिया नहीं है। इसलिए कई शिया संगठनों ने यह महसूस किया है कि उन्हें भी संगठित होकर अपनी पार्टी बनानी चाहिए ताकि शियाओं को सही प्रतिनिधित्व मिल सके। यह पार्टियां कितनी सफल होती हैं यह तो चुनाव के बाद पता चलेगा पर इतना जरूर है कि कुछ सैक्युलर दलों की नींद हराम हो रही है।
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटों की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। वहां 6-7 मुस्लिम राजनीतिक दल राज्य के 18 फीसद मुस्लिम वोटों को हथियाने के लिए मैदान में होंगे। यूपी में सबसे ताकतवर मुस्लिम पार्टी है पीस पार्टी। इसने पिछले उपचुनावों में अच्छे-खासे वोट हासिल कर राजनीतिक हल्कों में खलबली मचा दी है। लेकिन इसका प्रभाव पूरे सूबे में नहीं हो पाया और ज्यादातर गोरखपुर और उसके आसपास के इलाकों तक ही फिलहाल सीमित लगता है। हाल में जमाते इस्लामी ने भी पार्टी बनाई हैöवेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया। एआईयूडीएफ ने भी यूपी के चुनाव में उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है। हैरानी की बात यह है कि देश के मुस्लिम सांसदों में से एक भी शिया नहीं है। इसलिए कई शिया संगठनों ने यह महसूस किया है कि उन्हें भी संगठित होकर अपनी पार्टी बनानी चाहिए ताकि शियाओं को सही प्रतिनिधित्व मिल सके। यह पार्टियां कितनी सफल होती हैं यह तो चुनाव के बाद पता चलेगा पर इतना जरूर है कि कुछ सैक्युलर दलों की नींद हराम हो रही है।
Tags: Anil Narendra, Assam, Kerala, Muslim, State Elections, Tamil Nadu, Uttar Pradesh, West Bengal
Wednesday, 20 April 2011
34 साल के शासन को दीदी की चुनौती से लेफ्ट हलकान
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
प्रकाशित: 20 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र
-अनिल नरेन्द्र
सोमवार को पश्चिम बंगाल के छह उत्तरी जिलों की 54 विधानसभा सीटों पर पहले चरण का मतदान हो गया। पहले चरण के इस मतदान में 74.27 फीसदी मतदान हुआ। इस दौरान कहीं से भी किसी बड़ी अप्रिय घटना का समाचार नहीं है। यह विधानसभा चुनाव वाम मोर्चा के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे ने 21 जून 1977 को सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ली थी और सत्ता में लगातार बने रहते हुए 34 साल पूरे होने को आ गए हैं। इस उपलब्धि के साथ ही प. बंगाल में लेफ्ट फ्रंट की सरकार ने लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता में बनी रहने वाली सबसे लम्बी कम्युनिस्ट सरकार का रिकार्ड बना लिया है। लेकिन इन विधानसभा चुनावों में इसी बात को इस मोर्चे की सबसे बड़ी कमजोरी भी बताया जा रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो पूरे राज्य में एक सत्ता विरोधी लहर दौड़ रही है जो सत्ताधारी सीपीएम की गले की फांस बन गई है। हालांकि मार्क्सवादी नेताओं ने 2009 में जारी एक पार्टी दस्तावेज में इन मुद्दों को उठाया और पार्टी नेतृत्व ने इस बात को स्वीकार किया है कि उनके परम्परागत वोटर अब उनकी नीतियों से विमुख हो रहे हैं। सत्ताधारी पार्टी के समक्ष मुस्लिम मतदाताओं को अपने खेमे में बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। पिछले चुनावी नतीजों और अल्पसंख्यकों के इलाकों का आकलन करने के बाद पता चलता है कि कुल 214 सीटों में से 75-77 सीटें ऐसी हैं जहां उन्हीं की जीत की सम्भावना है जहां मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन मिलेगा। इन चुनावों में ऐसा ही कहा जा रहा है कि एक लम्बे समय तक लेफ्ट का समर्थन करते रहने के बाद अब ज्यादातर मुस्लिम मतदाताओं ने अपना समर्थन बन्द कर दिया है। साथ ही लेफ्ट पार्टी के अपने धड़ों में और खासतौर से एसएफआई जैसे छात्र संगठनों में अब मनमुटाव खुलकर सामने आने लगे हैं। पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिवेश में सत्ताधारी वाम नेताओं के जनता को नजरंदाज करने वाले रवैये की भी इन चुनावों में एक महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी ने अपने करिश्में से वाम मोर्चा की नींद उड़ा रखी है। एकजुट विपक्ष की एक मात्र नेता बनकर उभरी ममता बनर्जी को लेकर गांवों और शहरों में काम करने वालों में बराबर का उत्साह है। ममता की पार्टी के खिलाफ माओवादियों के एक गुट द्वारा दिए गए फरमान भी उन इलाकों में वोट काट सकते हैं जो झारखंड राज्य से सटे हुए हैं पर इन सबके बावजूद लेफ्ट फ्रंट का चुनाव जीतना बहुत मुश्किल लग रहा है। अगर बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में वाम मोर्चा चुनाव जीत गया तो प. बंगाल के चुनावी इतिहास में यह सबसे महत्वपूर्ण घटना होगी। चुनाव पूर्व दो सर्वेक्षणों की मानें तो तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिल रहा है। ओआरजी द्वारा हेडलाइंस टुडे समाचार चैनल के लिए किए ए सर्वेक्षण के मुताबिक तृणमूल-कांग्रेस गठबंधन को 182 सीटें मिलेंगी जो कि बहुमत के लिए जरूरी 148 सीटों से काफी अधिक है जबकि वाम मोर्चा को 101 सीटें मिलेंगी जो 2006 के चुनाव की तुलना में 126 कम है। बाकी तो मतपेटियां खुलने के बाद ही पता लगेगा।
तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी ने अपने करिश्में से वाम मोर्चा की नींद उड़ा रखी है। एकजुट विपक्ष की एक मात्र नेता बनकर उभरी ममता बनर्जी को लेकर गांवों और शहरों में काम करने वालों में बराबर का उत्साह है। ममता की पार्टी के खिलाफ माओवादियों के एक गुट द्वारा दिए गए फरमान भी उन इलाकों में वोट काट सकते हैं जो झारखंड राज्य से सटे हुए हैं पर इन सबके बावजूद लेफ्ट फ्रंट का चुनाव जीतना बहुत मुश्किल लग रहा है। अगर बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में वाम मोर्चा चुनाव जीत गया तो प. बंगाल के चुनावी इतिहास में यह सबसे महत्वपूर्ण घटना होगी। चुनाव पूर्व दो सर्वेक्षणों की मानें तो तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिल रहा है। ओआरजी द्वारा हेडलाइंस टुडे समाचार चैनल के लिए किए ए सर्वेक्षण के मुताबिक तृणमूल-कांग्रेस गठबंधन को 182 सीटें मिलेंगी जो कि बहुमत के लिए जरूरी 148 सीटों से काफी अधिक है जबकि वाम मोर्चा को 101 सीटें मिलेंगी जो 2006 के चुनाव की तुलना में 126 कम है। बाकी तो मतपेटियां खुलने के बाद ही पता लगेगा।
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