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Thursday, 25 April 2024

सपा और बसपा क्या मौका तलाश रही हैं?


पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ ठाकुर बिरादरी के नेताओं का गुस्सा दिख रहा है। पार्टी ने इस बिरादरी के उम्मीदवारों को उम्मीद से कम टिकट दिए हैं। इससे ठाकुरों में नाराजगी की खबरें आ रही हैं। अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस ने इस पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है। अखबार लिखता है कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को इस नाराजगी में अपने लिए मौका नजर आ रहा है और वे ऊंची जातियों के उम्मीदवारों से संपर्क बढ़ाने की कोशिश में लग गई है। खबर के मुताबिक रविवार को गाजियाबाद में मायावती ने एक रैली में भाजपा पर क्षत्रियों (ठाकुर, राजपूत) की अनदेखी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने टिकट बंटवारे में हर समुदाय को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है। अखबार लिखता है कि गाजियाबाद के बीएसपी उम्मीदवार नंद किशोर पुंडीर ठाकुर हैं जबकि बागपत के बीएसपी उम्मीदवार प्रवीण बंसल गुर्जर हैं। मायावती ने कहा यूपी की ऊंची जातियों में क्षत्रिय समुदाय के लोगों की आबादी काफी ज्यादा है और ये देखना निराशाजनक है कि इस बिरादरी को समर्थन देने का दावा करने वाली भाजपा ने उत्तर प्रदेश खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उन्हें काफी कम टिकट दी है। उन्होंने कहा गाजियाबाद में हमने क्षत्रिय उम्मीदवार को टिकट दिया है। पहले हमने पंजाबी कैंडिडेट उतारा था लेकिन फिर हमें लगा कि उनकी संख्या लखीमपुर खीरी में ज्यादा है इसलिए वहां हमने पंजाबी सिख उम्मीदवार को टिकट दिया। मायावती ने कहा कि वो क्षत्रिय समुदाय की उन महापंचायतों का समर्थन करती हैं जो उन पार्टियों का समर्थन करने की बात कर रही हैं जो ठाकुर उम्मीदवार उतार रही हैं। मायावती का ये बयान सपा प्रमुख अखिलेश यादव के उस बयान के बाद आया है जिसमें उन्होंने अपनी रैलियों में ठाकुरों की मौजूदगी पर टिप्पणी की थी। उन्होंने नोएडा की एक रैली में कहा था मैं उनके सिर पर सम्मान की पगड़ी देख रहा हूं जो लोग पारंपरिक रूप से दूसरे दलों के लिए वोटिंग करते थे, वे आज यहां हैं। मैं उनकी राजनीतिक चेतना के प्रति आभारी हूं। इस बार वो साइकिल का समर्थन करने जा रहे हैं। बीएसपी ने गौतमबुद्ध नगर में क्षत्रिय समुदाय के राजेन्द्र सोलंकी पर दांव लगाया है। सोलंकी ने कहा है कि इस सीट पर 4.5 लाख वोटर हैं। बीएसपी उनसे जुड़ने की पूरी कोशिश कर रही है। पिछले शुक्रवार को यूपी की जिन आठ सीटों पर वोटिंग हुई उनमें सिर्फ एक ठाकुर उम्मीदवार कुंवर सर्वेश सिंह को मुरादाबाद सीट पर भाजपा ने टिकट दिया था। मतदान के बाद सर्वेश सिंह का निधन हो गया था। 26 अप्रैल को जिन आठ सीटों पर वोटिंग होगी उनमें भाजपा की तरफ से कोई भी ठाकुर उम्मीदवार नहीं है। इन उम्मीदवारों में दो ब्राह्मण, दो वैश्य, एक गुर्जर और एक जाट बिरादरी के उम्मीदवार हैं। पश्चिमी यूपी में ठाकुर बिरादरी के जिस बड़े नेता का इस बार भाजपा की ओर से टिकट काटा गया। उनमें भारतीय सेना के पूर्व अध्यक्ष जनरल वीके सिंह शामिल हैं। भाजपा के एक बड़े नेता ने बताया कि पार्टी के बीच असंतोष का अहसास हो गया है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता ठाकुरों को मनाने में जुट गए हैं ताकि ठाकुरों की वोटों का नुकसान कम से कम हो।

Friday, 13 July 2012

समाजवादी पार्टी का मिशन ः प्रधानमंत्री मुलायम सिंह

समाजवादी पार्टी का अब अगला मिशन केंद्र में सरकार बनाने का है और श्री मुलायम सिंह यादव को प्रधानमंत्री बनाने का। इस मिशन पर अब पार्टी लग भी गई है। श्री मुलायम सिंह कई बार कह चुके हैं कि अगले लोकसभा चुनाव किसी भी समय हो सकते हैं। दो दिन पहले भी उन्होंने यह दोहराया। उन्होंने कहा कि पार्टी नेता और कार्यकर्ता आगामी लोकसभा चुनाव के लिए कमर कस लें क्योंकि लोकसभा चुनाव समय से पहले 2013 में ही हो सकते हैं। लोकसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर पार्टी कार्यालय (लखनऊ) में आयोजित वरिष्ठ नेताओं की बैठक में मुलायम ने मंगलवार को कहा कि वर्तमान राजनीतिक हालातों को देखते हुए चुनाव निर्धारित समय (2014) से पहले होने से इंकार नहीं किया जा सकता। अकेले मुलायम सिंह ही इस विचार के नहीं कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का भी यही मानना है कि मनमोहन सिंह सरकार अब ज्यादा दिन तक नहीं चल सकती। अब तो पार्टी के संकट मोचक प्रणब मुखर्जी भी बचाने के लिए नहीं हैं। मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी से न तो पार्टी सम्भल रही है और न ही सरकार। मुलायम सिंह को लगता है कि विधानसभा में जिस प्रकार अखिलेश को जीत मिली है उसे देखते हुए पार्टी 50 सीटें जीत सकती है। मुलायम ने लोकसभा चुनाव के लिए जिताऊ प्रत्याशियों की चयन प्रक्रिया शुरू कर दी है। उन्होंने जिताऊ प्रत्याशियों की तलाश के लिए 58 पर्यवेक्षक भी नियुक्त कर दिए हैं। साथ ही यह भी ताकीद कर दी है कि कोई भी विधायक या मंत्री लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी नहीं बनाया जाएगा। केंद्र में सपा को सरकार बनानी है इसलिए टिकट उसी को दिया जाएगा जिसकी जीतने की सम्भावना हो। प्रत्याशियों के चयन के लिए इच्छुक लोगों से दस हजार रुपए देकर आवेदन भरने को कहा गया है। आवेदन पत्र जमा करने के बाद पर्यवेक्षकों से प्रत्याशी के बारे में रिपोर्ट देने को कहा जाएगा। जिस प्रत्याशी को पर्यवेक्षक जिताऊ मानेगा, उसी को टिकट दिया जाएगा। पार्टी ने अपना सारा ध्यान उन 58 संसदीय क्षेत्रों पर लगाया है जहां से पार्टी चुनाव हारी थी। पर्यवेक्षकों को 30 जुलाई तक अपनी रिपोर्ट देने को कहा गया है। चुनाव कभी भी हो सकते हैं इसलिए सारी तैयारी विधानसभा की तर्ज पर समय से पहले कर लिए जाने पर जोर दिया गया। पार्टी की यह रणनीति रहेगी कि अखिलेश यादव की उज्ज्वल छवि को लोकसभा चुनाव में भी इस्तेमाल किया जाएगा। समाजवादी पार्टी अकेली ही नहीं जो लोकसभा चुनावों की तैयारियों में जुट गई हो। मायावती ने भी तैयारियां आरम्भ कर दी हैं। हाल के विधानसभा चुनाव में पार्टी की पराजय के बाद बसपा ने संगठन में बदलाव हेतु कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। एक महत्वपूर्ण फेरबदल में दल के प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य को हटाकर पूर्व मंत्री राम अचल राजभर को जिम्मेदारी सौंप दी गई है। उधर नगर निगम चुनावों में भारी जीत के बाद भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी में नई ऊर्जा आ गई है। वह भी मिशन लोकसभा में जुट गए हैं। देखना यह है कि लोकसभा के चुनाव समय से पहले होंगे या फिर संप्रग सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी और चुनाव समयानुसार 2014 में होंगे?

Sunday, 24 June 2012

राशिद अल्वी जैसे दोस्त हों तो दुश्मनों की जरूरत नहीं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24 June 2012
अनिल नरेन्द्र
कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी जैसे दोस्त हों तो कांग्रेस को दुश्मनों की कोई जरूरत नहीं है। गौरतलब है कि मुरादाबाद की एक चुनावी सभा में बोलते हुए राशिद अल्वी ने कहा कि मुलायम सिंह यादव भाजपा के एजेंट हैं। उन्होंने कहा कि मैं यह बात बहुत पहले से कहता आ रहा हूं। मैं पिछले 10 वर्षों से कह रहा हूं कि इस देश में अगर भारतीय जनता पार्टी का सबसे बड़ा एजेंट कोई है तो वो मुलायम सिंह यादव हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर इस देश में भारतीय जनता पार्टी के इशारे पर कोई नाचता है तो वो मुलायम सिंह यादव हैं। सपा का इस बयान से नाराज होना स्वाभाविक ही था। सपा महासचिव राम गोपाल यादव ने प्रतिक्रिया स्वरूप कहा कि अल्वी की दिमागी हालत ठीक नहीं है, वह पगला गए हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राजेन्द्र चौधरी ने कहा है कि कांग्रेस अपने सांसद को सबक सिखाए। कांग्रेस को सोचना चाहिए कि उसे अल्वी जैसे पुंठित और वाचाल नेताओं का इलाज कैसे करना है। राशिद अल्वी का बयान उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता और बीमार मानसिकता का द्योतक है। वे इतने अज्ञानी हैं कि यह नहीं जानते कि मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सपा ने यदि सांप्रदायिक भाजपा के विरुद्ध मोर्चा नहीं खोला होता तो केंद्र में यूपीए सरकार बन ही नहीं पाती। परमाणु करार के समय भी मुलायम सिंह यादव ने ही केंद्र की सरकार बचाई थी। कांग्रेस को ऐसे ही अनर्गल बयानों की वजह से पिछले चुनावों में कीमत चुकानी पड़ी है। अल्वी को `मुस्लिमों के हत्यारे' नरेन्द्र मोदी का समर्थक बताते हुए उत्तर प्रदेश के चिकित्सा एवं परिवार कल्याण मंत्री अहमद हसन ने कहा कि अल्वी उन मुलायम सिंह यादव के बारे में ऐसा बयान दे रहे हैं जिन्होंने बाबरी मस्जिद को बचाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। मुलायम ही देश के एकमात्र ऐसे राजनेता हैं जिन्होंने मुसलमानों के हितों से जुड़े मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाया। सपा की नाराजगी भांपकर कांग्रेस पार्टी ने अल्वी के बयान को सिरे से खारिज करते हुए इसे अनुचित बताया। कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि पार्टी इस बयान से सहमत नहीं है। उन्होंने कहा कि अल्वी शायद चुनावी आवेश में बोल गए। उधर जनता पार्टी अध्यक्ष डाक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी ने मौके का पूरा फायदा उठाते हुए कांग्रेस पर हल्ला बोल दिया। जनता पार्टी के मेयर पद के प्रत्याशी के प्रचार में लखनऊ आए डॉ. स्वामी ने गुरुवार को पीए संगमा की वकालत करते हुए कहा कि देश में अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाने की जरूरत है। प्रणब मुखर्जी पर उन्होंने सोनिया गांधी के भ्रष्टाचार में हिस्सेदार होने का आरोप लगाते हुए कहा कि विदेशों में जमा नेहरू खानदान के 70 लाख करोड़ रुपये को बचाने के लिए प्रणब मुखर्जी को समर्थन देने की उनकी मजबूरी है। उन्होंने कहा कि संगमा ईसाई भी हैं और कोई ईसाई राष्ट्रपित नहीं बना है। मुलायम सिंह यादव को अपना भाई बताते हुए उन्होंने कहा कि वह उन्हें समझाएंगे कि यूपीए का दामन छोड़ें और बेइज्जत न हों, अपना सम्मान बचाएं। स्वामी ने कहा कि राशिद अल्वी का मुलायम को भाजपा का एजेंट बताना अनायास नहीं है। भले ही कांग्रेस अल्वी के बयान को उनके निजी विचार बताए लेकिन यह कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। एक तरह से कहा जाए कि मुलायम सिंह यादव से सोनिया गांधी 1999 का बदला ले रही हैं जब मुलायम की वजह से सोनिया प्रधानमंत्री नहीं बन पाई थीं। स्वामी ने मुलायम को नसीहत देते हुए कहा कि मौका अच्छा है। मुलायम कांग्रेस का साथ छोड़ दें वरना इसी तरह से बेइज्जत होते रहेंगे। उन्होंने अखिलेश यादव की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे नेहरू खानदान के लोगों जैसे मैट्रिक फेल नहीं हैं।
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Saturday, 16 June 2012

राष्ट्रपति चुनाव के दंगल का पहला अध्याय

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 16 June 2012
अनिल नरेन्द्र
यूपीए ने राष्ट्रपति पद के लिए अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं निवर्तमान वित्त मंत्री का नाम तो घोषित कर दिया, उनके राष्ट्रपति चुने जाने में संदेह भी कम है किन्तु एक बात तो स्पष्ट है कि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव की अविश्वसनीयता एक बार फिर जगजाहिर हो गई है। पिछले दो दिनों से ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव की जुगलबंदी ने ऐसा पेंच फंसा दिया था कि कांग्रेस चारों खाने चित हो गई थी। कांग्रेस ने कभी उम्मीद नहीं की होगी कि ममता-मुलायम ऐसा पासा चलेंगे कि जिससे पार्टी के सारे समीकरण ही बदल जाएंगे। देखा जाए तो ममता ने एक तीर से कई निशाने लगाने की कोशिश की थी। यह वही मुलायम सिंह यादव हैं जिन्हें कुछ दिन पहले यूपीए-2 का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड पेश करने के लिए सरकार के प्रमुख मंत्रियों के साथ मंच पर खड़ा किया गया और रिपोर्ट को जारी किया गया था। ममता ने कांग्रेस से बदला लेने की कोशिश की थी। कांग्रेस ने यह चेतावनी देने की कोशिश की थी कि ममता आपके पास लोकसभा के 19 सांसद हैं तो हम समाजवादी पार्टी को गले लगाकर उनके 22 सांसदों का समर्थन पा सकते हैं, आप अपनी औकात में रहो। ममता ने एक झटके में कांग्रेस को उसकी औकात दिखाने की कोशिश की। अपने पैनल में सोमनाथ चटर्जी का नाम शामिल करके ममता ने यह भी जता दिया कि वह बंगालियों के खिलाफ नहीं हैं। प्रणब मुखर्जी का समर्थन इसलिए भी करने को ममता को मजबूर किया जा रहा था क्योंकि प्रणब बंगाली हैं और बंगाली होने के नाते ममता उनका समर्थन करने पर मजबूर होंगी पर ममता ने यहां भी कांग्रेस को मात दे दी और सोमनाथ चटर्जी का नाम लेकर इस आलोचना से भी अपने आपको बचा लिया। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की पसंद को खारिज करके ममता-मुलायम ने जो पासा फेंका था वह भले ही मुलायम सिंह की वजह से असफल हो गया किन्तु वह आने वाले दिनों में नए ध्रुवीकरण को जन्म देगा। अंतिम समय में जिस ढंग से दोनों नेताओं ने गुगली फेंकी थी उससे कांग्रेस की न सिर्प परेशानी ही बढ़ी थी बल्कि राष्ट्रपति चुनाव को बहुत पेचीदा बना दिया था। दरअसल राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम लेना एक सोची-समझी रणनीति का परिचायक है। कांग्रेस के अन्दर भी एक ऐसा धड़ा है जो मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद से हटाना चाहता है। मनमोहन सिंह का नाम सुझाना एक तरह से संप्रग सरकार के इन दोनों समर्थक दलों द्वारा प्रधानमंत्री में अविश्वास प्रकट करने के समान है। मनमोहन सिंह कांग्रेस पार्टी के लिए एक बोझ बन चुके हैं, वह एसेट कम लाइबिलिटी ज्यादा हैं। सभी जानते हैं कि मनमोहन को हटाना इस समय कांग्रेस के लिए सम्भव नहीं है पर ममता-मुलायम ने पंगा जरूर फंसा दिया है। दोनों ने सोनिया गांधी को यह भी स्पष्ट संदेश दे दिया था कि इस मामले में किसी भी निर्णय तक पहुंचने में तृणमूल और सपा की भूमिका को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। ममता और कांग्रेस में तल्खी बढ़ी है। एक कांग्रेसी सांसद अधीर चौधरी ने तो ममता की तुलना मीर जाफर से ही कर दी क्योंकि उन्होंने एक बंगाली (प्रणब मुखर्जी) का विरोध किया है। ममता के इस व्यवहार को सोनिया गांधी भूल नहीं सकतीं, इसलिए दोनों महिलाओं में एक ऐसी दरार पड़ गई है जिसे पाटना आसान नहीं होगा। ममता भी बहुत गुस्से में हैं।
यह तो पहले ही आशंका थी कि मुलायम यूपीए सरकार के सामने सीना तानकर खड़े होने की हैसियत में नहीं हैं लेकिन उन्होंने जिस तरह कांग्रेस को झटका दिया उससे एक बात तो साफ है कि उनके भरोसे कोई पार्टी या गठबंधन अपनी रणनीति तय नहीं कर सकता।
मुलायम तो तब झुके जब उन्हें लगा कि आय से अधिक सम्पत्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ तलवार लटक रही है और जुलाई में ही कांग्रेसी वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी द्वारा दायर मुकदमे की सुनवाई है तो उन्होंने ममता को गच्चा दे दिया। लेकिन इससे इतना तो स्पष्ट हो गया है कि ममता की नाराजगी यूपीए से बनी रहेगी जो किसी हद तक जा सकती है।
बहरहाल कांग्रेस को यूपीए घटक दलों एवं बाहर से समर्थन दे रही पार्टियों का प्रणब मुखर्जी के पक्ष में समर्थन तो हासिल हो गया और अब वह चाहेगी कि उसे एनडीए भी समर्थन दे दे ताकि उसके उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिए जाएं किन्तु लगता है कि अभी राष्ट्रपति चुनाव तक बहुत सारी राजनीतिक उठापटक होनी है। क्योंकि ममता ने कोलकाता पहुंच कर ऐलान कर दिया कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। मतलब यह कि राष्ट्रपति चुनाव के दंगल का पहला अध्याय ही खत्म हुआ है आगे महादंगल बाकी है।
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Tuesday, 12 June 2012

डिम्पल ने न केवल इतिहास रचा बल्कि करोड़ों का खर्च बचाया


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 12 June 2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव (35) ने शनिवार को नया राजनीतिक इतिहास रच डाला। कन्नौज की लोकसभा सीट से शनिवार को जिलाधिकारी सेल्वा कुमारी ने डिम्पल को निर्विरोध सांसद घोषित कर दिया। 23 साल बाद लोकसभा में निर्विरोध कोई सांसद चुना गया। कन्नौज को इतिहास के पन्नों में जगह बनाने को बस अधिकृत घोषणा का इंतजार था जो शनिवार को पूरा हो गया। समाजवादी आंदोलन के महानायक डॉ. राममनोहर लोहिया को लोकसभा में भेजने के साथ ही मुलायम सिंह को जिताने व अखिलेश यादव को सांसद कन्नौज ने ही बनाया था। कन्नौज ने यह भी जता दिया है कि मायावती की पूर्व सरकार के कुशासन के खिलाफ जो जनाक्रोश कन्नौज में पहले था, वह आज भी कायम है। डिम्पल यादव प्रदेश की पहली ऐसी महिला हैं जिनके खिलाफ चुनाव लड़ने को कोई तैयार नहीं हुआ। डिम्पल 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में फिरोजाबाद सीट से चुनाव लड़ी थीं। उस चुनाव में बॉलीवुड अभिनेता और कांग्रेस उम्मीदवार राज बब्बर ने शिकस्त दी थी। कांग्रेस, बीजेपी और बीएसपी पहले ही उम्मीदवार न उतारने का फैसला कर चुकी थी। बाकी बचे निर्दलीय उम्मीदवारों संजू कटियार और दशरथ संखवार ने शुक्रवार को पर्चे वापस ले लिए। आजादी के बाद से अब तक 44 सांसद निर्विरोध चुने जा चुके हैं लेकिन 1989 के बाद यह पहला मौका है जब कोई सांसद निर्विरोध चुनकर लोकसभा पहुंचेगा। डिम्पल के विरोध में किसी प्रत्याशी के नहीं होने से न केवल चुनाव के तामझाम से छुटकारा मिला बल्कि सरकार के करीब 30 करोड़ रुपये भी बच गए। कर्मचारियों को ड्यूटी कटाने के लिए न तो अधिकारियों के आगे गिड़गिड़ाना पड़ा और न ही मतदाताओं को धूप में खड़ा रहना पड़ा। पार्टी कार्यकर्ता भी भागदौड़ से बच गए। साथ ही चुनावी तामझाम नहीं होने से अधिक फायदा राजकोष को हुआ है, अगर चुनाव होता तो मतदान की तैयारियों से लेकर मतगणना तक करीब 30 करोड़ रुपये खर्च हो जाते। सर्वाधिक खर्च तो कर्मचारियों और पैरामिलिट्री फोर्स के भत्ते और उनके रहने पर खर्च होता। अधिकारियों के मुताबिक पांचों विधानसभाओं में 10-15 हजार पुलिस, पीएसी और अन्य पैरामिलिट्री मंगाने की तैयारी थी। साथ ही पूरे चुनाव में 12,500 से अधिक कर्मचारियों को लगाना पड़ता। 200 ऐसे बूथ थे जिनकी हालत खराब थी और उसे ठीक करने में लाखों रुपये का खर्च आता। यह सब बच गया। डिम्पल यादव मुलायम सिंह परिवार की पांचवीं ऐसी सदस्य हैं जो इस समय सांसद हैं। इस दृष्टि से मुलायम सिंह यादव परिवार आज देश का सबसे हाई पॉवर परिवार बन गया है। कुछ मायनों में तो यह नेहरू-गांधी परिवार से भी ज्यादा ताकतवर बन गया है। मुलायम सिंह खुद लोकसभा सांसद हैं। बेटा अखिलेश उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। भाई रामगोपाल यादव राज्यसभा सांसद हैं। भाई शिवपाल यादव यूपी सरकार में मंत्री हैं। बहू डिम्पल यादव लोकसभा सांसद हैं। इसके अलावा संगठन, पंचायतों में यादव परिवार के कई सदस्य विभिन्न पदों पर आसीन हैं। कहने को नेता लोग वंशवाद को बढ़ावा न देने की बात करते हैं पर वंशवाद के बढ़ावे का यह एक उदाहरण है।
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Thursday, 17 May 2012

यूपी सरकार का सशर्त फैसला ः ठगा महसूस कर रहे हैं बेरोजगार युवक

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17 May 2012
अनिल नरेन्द्र
राजनीतिक पार्टियां चुनाव के दौरान अकसर ऐसे-ऐसे वादे कर देते हैं जिन्हें वह भी जानते हैं कि अगर जीत गए तो उन्हें पूरा करना आसान नहीं होगा। समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में ऐसा ही एक वादा किया था। यह था कि सरकार हर बेरोजगार को भत्ता देगी। सपा ने वादा तो कर दिया था पर तभी लगने लगा था कि जो हालत उत्तर प्रदेश सरकारी खजाने की है उसमें इसे पूरा करना बहुत टेढ़ी खीर होगी, वही हुआ। वोट की खातिर चुनावी एजेंडे में बेरोजगारों को भत्ता दिए जाने के वादे से लगता है कि `भैया जी' पलट गए हैं। भैया जी उर्प मुख्यमंत्री अखिलेश यादव। दरअसल शुक्रवार को मुख्यमंत्री द्वारा किए गए एक फैसले के बाद विधानसभा चुनाव में साइकिल पर मोहर लगाने वाले बेरोजगार खुद को ठगा-सा महसूस कर रहे हैं। अकेले गाजियाबाद में लाइन लगाकर इस भत्ते की खातिर नाम दर्ज कराने के लिए पुलिस की लाठियां खाने वाले बीस हजार बेरोजगारों में से अधिकांश के हाथ निराशा ही लगी है। 15 मार्च के बाद इन लोगों ने सेवायोजन कार्यालय में पंजीकरण कराया। मुख्यमंत्री ने 15 मार्च के बाद कराए गए पंजीकरणों को बेरोजगार भत्ते की सूची से बाहर कर दिया है। इतनी ही नहीं, योग्यता और उम्र के निर्धारण के साथ ही हजारों बेरोजगारों के अरमानों पर पानी फिर गया है। अकेले गाजियाबाद जनपद में कुल पंजीकृत 46,186 बेरोजगारों में मात्र 29 प्रतिशत यानि 13,228 बेरोजगारों को ही भत्ता मिल सकेगा। 32,958 बेरोजगारों को राज्य सरकार के इस निर्णय के बाद सूची से बाहर का रास्ता देखना पड़ेगा। इन्हें नौकरी तो शायद ही मिले अब भत्ता भी नहीं मिलेगा। बेशक राज्य सरकार से कुछ युवक प्रभावित होंगे पर कई लाख बेरोजगारों को इसका फायदा भी होगा। उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश के नौ लाख बेरोजगार युवक-युवतियों को बेरोजगारी भत्ता देने के अपने लुभावने प्रस्ताव पर शुक्रवार को मुहर लगा दी। मंत्रिमंडल ने फैसला किया है कि इस योजना का लाभ हाई स्कूल उत्तीर्ण 30 से 40 वर्ष की आयु वर्ग के वे लोग ही ले सकेंगे जो सरकारी या गैर सरकारी नौकरी में नहीं हैं। इस वर्ष पर 1113 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। बेरोजगारी भत्ता पाने वालों से समय-समय पर काम भी लिया जा सकता है और काम न करने पर भत्ता रोका जा सकता है। बेरोजगारों को हर साल अपने बेरोजगार होने या फिर रोजगार मिले जाने की सूचना खुद देनी पड़ेगी। प्रत्येक बेरोजगार को प्रतिमाह एक हजार रुपये का बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा। यह त्रैमासिक किश्तों में किया जाएगा। खास बात यह है इस वर्ष योजना का लाभ सिर्प उन्हीं लोगों को मिल सकेगा, जिन्होंने पंजीकरण 15 मार्च से पहले रोजगार दफ्तर में करा लिया था। यह लाभ केवल उन्हीं बेरोजगारों को मिलेगा, जो यूपी के मूल निवासी हैं तथा वर्तमान में राज्य में निवास कर रहे हैं। योजना का लाभ आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के लोग ही ले सकेंगे। मंत्रिपरिषद द्वारा लिए गए फैसले के अनुसार बेरोजगार व्यक्ति के परिवार की समस्त स्रोतों से आय 36 हजार रुपये वार्षिक से कम हो तथा उसके माता-पिता अथवा ससुर-सास (जैसी भी स्थिति हो) की समस्त स्रोतों से आय एक लाख 50 हजार रुपये वार्षिक अथवा इससे कम हो। खजाना खाली है और योजनाएं लागू करना मजबूरी। कुछ युवा अपने आपको इसलिए ठगा महसूस कर रहे हैं क्योंकि सपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में वादा किया था कि सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए अधिकतम उम्र सीमा 35 साल की जाएगी। इससे ज्यादा उम्र के बेरोजगारों को हर महीने एक-एक हजार रुपये भत्ता दिया जाएगा।
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Thursday, 10 May 2012

बटला हाउस फरार आतंकियों ने मुलायम से मांगी मदद

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10 May 2012
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली की बहुचर्चित बटला हाउस मुठभेड़ 19 सितम्बर 2008 को हुई थी। इस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हुए थे। इस मुठभेड़ में शामिल कुछ आतंकवादी तब से फरार हैं। इनमें इंडियन मुजाहिदीन के कथित आतंकवादी आरिज खान उर्प जुनैद भी शामिल हैं। खबर आई है कि जुनैद अब आत्मसमर्पण करना चाहता है और इस काम के लिए उसने सपा पमुख मुलायम सिंह यादव की मदद मांगी है। जुनैद और इंडियन मुजाहिदीन के अन्य कथित आतंकवादी असदुल्लाह अख्तर के परिवार वालों ने इस बाबत मध्यस्थों के जरिए मुलायम सिंह और समाजवादी पार्टी के अन्य पदाधिकारियों और पशासन से संपर्प किया है। परिजनों ने दिल्ली की अदालत में कथित आतंकियों ने सुरक्षित समर्पण के लिए मदद मांगी है। जुनैद और असदुल्लाह दोनों आजमगढ़ के रहने वाले हैं। जुनैद और वह साढ़े तीन साल से पुलिस से बचकर छिपे हुए हैं। माना जा रहा है कि ये दोनों आतंकी उत्तर पदेश में ही कहीं छिपे हैं। ये दोनों उन बारह इंडियन मुजाहिदीन आतंकवादियों में हैं जिन पर दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा ने इनाम घोषित कर रखा है। जुनैद पर पांच लाख का इनाम है जबकि असदुल्लाह पर एक लाख का इनाम है। दिल्ली पुलिस को जिन बारह कथित आतंकवादियों की तलाश है उनमें से नौ आजमगढ़ के हैं। तीन आतंकी शहजाद उर्प पप्पू, हाकिम और सलमान को यूपी एटीएस ने गिरफ्तार कर दिल्ली पुलिस के हवाले कर दिया था। शरिज उर्प जुनैद की तलाश जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली में हुए विस्फोट के सिलसिले में भी है। कुछ गिरफ्तार आतंकियों से पूछताछ में पता चला है कि जुनैद 23 नवंबर को उत्तर पदेश की अदालतों और सात मार्च 2006 में वाराणसी के संकट मोचन मंदिर में 50 धमाकों में भी शामिल रहा है। असदुल्लाह सिर्प दिल्ली बमकांड में शामिल बताया जाता है। जुनैद आजमगढ़ के बाजबहादुर मौहल्ले का रहने वाला है। जबकि असदुल्लाह गुलाम का पुरवा का वासी है। बताते हैं कि इन कथित आतंकियों के परिजनों ने उत्तर पदेश सरकार और पशासन में अपने सम्पर्प सूत्रों को बताया कि जुनैद और असदुल्लाह अदालत में समर्पण करना चाहते हैं। उन्हें इस बात का डर है कि अगर पुलिस के हाथ पड़ गए तो उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाएगा। परिजनों ने इस बात का आश्वासन मांगा है कि इन दोनों को उत्तर पदेश पुलिस, आतंकवादी विरोधी दस्ता, दिल्ली पुलिस के हवाले नहीं करेगा। असदुल्लाह के वालिद और आजमगढ़ के मशहूर चिकित्सक डा. जावेद अख्तर ने बताया कि हम लोगों ने मुलायम सिंह यादव को खत लिखकर दोनों के महफूज समर्पण के लिए मदद मांगी है। अख्तर के अनुसार पत्र में लिखा गया है कि दिल्ली पुलिस ने बटला हाउस मुठभेड़ में आजमगढ़ के युवाओं को बेवजह फंसाया है। हमने मुलायम सिंह यादव से कहा है कि वे इंसाफ दिलाने के लिए इस मामले में दखल दें क्योंकि उनकी पार्टी केंद्र सरकार को समर्थन कर रही है। अख्तर ने बताया कि गोपालपुर के समाजवादी पार्टी विधायक और मंत्री वसीम अहमद सरकार के साथ उनकी बातचीत में मदद कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें अपने बेटे के ठिकाने के बारे में कुछ नहीं पता। पिछले चार साल से उनका उससे कोई सम्पर्प नहीं है।
दिल्ली की बहुचर्चित बटला हाउस मुठभेड़ 19 सितम्बर 2008 को हुई थी। इस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हुए थे। इस मुठभेड़ में शामिल कुछ आतंकवादी तब से फरार हैं। इनमें इंडियन मुजाहिदीन के कथित आतंकवादी आरिज खान उर्प जुनैद भी शामिल हैं। खबर आई है कि जुनैद अब आत्मसमर्पण करना चाहता है और इस काम के लिए उसने सपा पमुख मुलायम सिंह यादव की मदद मांगी है। जुनैद और इंडियन मुजाहिदीन के अन्य कथित आतंकवादी असदुल्लाह अख्तर के परिवार वालों ने इस बाबत मध्यस्थों के जरिए मुलायम सिंह और समाजवादी पार्टी के अन्य पदाधिकारियों और पशासन से संपर्प किया है। परिजनों ने दिल्ली की अदालत में कथित आतंकियों ने सुरक्षित समर्पण के लिए मदद मांगी है। जुनैद और असदुल्लाह दोनों आजमगढ़ के रहने वाले हैं। जुनैद और वह साढ़े तीन साल से पुलिस से बचकर छिपे हुए हैं। माना जा रहा है कि ये दोनों आतंकी उत्तर पदेश में ही कहीं छिपे हैं। ये दोनों उन बारह इंडियन मुजाहिदीन आतंकवादियों में हैं जिन पर दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा ने इनाम घोषित कर रखा है। जुनैद पर पांच लाख का इनाम है जबकि असदुल्लाह पर एक लाख का इनाम है। दिल्ली पुलिस को जिन बारह कथित आतंकवादियों की तलाश है उनमें से नौ आजमगढ़ के हैं। तीन आतंकी शहजाद उर्प पप्पू, हाकिम और सलमान को यूपी एटीएस ने गिरफ्तार कर दिल्ली पुलिस के हवाले कर दिया था। शरिज उर्प जुनैद की तलाश जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली में हुए विस्फोट के सिलसिले में भी है। कुछ गिरफ्तार आतंकियों से पूछताछ में पता चला है कि जुनैद 23 नवंबर को उत्तर पदेश की अदालतों और सात मार्च 2006 में वाराणसी के संकट मोचन मंदिर में 50 धमाकों में भी शामिल रहा है। असदुल्लाह सिर्प दिल्ली बमकांड में शामिल बताया जाता है। जुनैद आजमगढ़ के बाजबहादुर मौहल्ले का रहने वाला है। जबकि असदुल्लाह गुलाम का पुरवा का वासी है। बताते हैं कि इन कथित आतंकियों के परिजनों ने उत्तर पदेश सरकार और पशासन में अपने सम्पर्प सूत्रों को बताया कि जुनैद और असदुल्लाह अदालत में समर्पण करना चाहते हैं। उन्हें इस बात का डर है कि अगर पुलिस के हाथ पड़ गए तो उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाएगा। परिजनों ने इस बात का आश्वासन मांगा है कि इन दोनों को उत्तर पदेश पुलिस, आतंकवादी विरोधी दस्ता, दिल्ली पुलिस के हवाले नहीं करेगा। असदुल्लाह के वालिद और आजमगढ़ के मशहूर चिकित्सक डा. जावेद अख्तर ने बताया कि हम लोगों ने मुलायम सिंह यादव को खत लिखकर दोनों के महफूज समर्पण के लिए मदद मांगी है। अख्तर के अनुसार पत्र में लिखा गया है कि दिल्ली पुलिस ने बटला हाउस मुठभेड़ में आजमगढ़ के युवाओं को बेवजह फंसाया है। हमने मुलायम सिंह यादव से कहा है कि वे इंसाफ दिलाने के लिए इस मामले में दखल दें क्योंकि उनकी पार्टी केंद्र सरकार को समर्थन कर रही है। अख्तर ने बताया कि गोपालपुर के समाजवादी पार्टी विधायक और मंत्री वसीम अहमद सरकार के साथ उनकी बातचीत में मदद कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें अपने बेटे के ठिकाने के बारे में कुछ नहीं पता। पिछले चार साल से उनका उससे कोई सम्पर्प नहीं है।
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Wednesday, 2 May 2012

इस बार राष्ट्रपति चुनाव बहुत पेचीदा बन गया है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 2 May 2012
अनिल नरेन्द्र
देश का अगला राष्ट्रपति कौन होगा, यह चर्चा आजकल राजनीतिक गलियारों में तेज हो गई है। इसका कारण है कि फैसला करने का समय आ चुका है। राष्ट्रपति का चुनाव अगले महीने जून में होना है और अभी तक न तो यूपीए ने न एनडीए ने और न ही क्षेत्रीय दलों ने अपना कोई उम्मीदवार घोषित किया है। फैसला मुख्यत तो कांग्रेस पार्टी को करना है पर मुश्किल यह हो गई है कि अकेले अपने दम-खम पर इस बार कांग्रेस अपना उम्मीदवार जीताने की स्थिति में नहीं है। पिछली बार जैसे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अचानक श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का नाम घोषित कर सबको चौंका दिया था, इस बार ऐसा नहीं हो सकता। एक बहुत बड़ा फर्प तब और अब में क्षेत्रीय दलों की बढ़ती ताकत है। राष्ट्रपति के होने वाले चुनाव में क्षेत्रीय दलों की दबंगई साफ नजर आने लगी है। पूरी कोशिश इस बात की हो रही है कि इस बार राष्ट्रपति भवन में क्षेत्रीय दलों का उम्मीदवार पहुंचे। इसके लिए जोड़-तोड़ शुरू हो चुकी है। राष्ट्रपति चुनाव को लेकर क्षेत्रीय दलों की सक्रियता आने वाले दिनों में दोनों कांग्रेस और भाजपा के लिए एक नई चिन्ता का सबब बन सकती है। क्षेत्रीय दल अपनी ताकत को पहचान रहे हैं कि इस बार उनके समर्थन के बिनाह न तो कांग्रेस और न ही भाजपा अपनी मनमानी कर सकती है और उनके सहयोग के बिना रायसीना हिल्स पर कौन विराजमान होगा, इसका फैसला नहीं हो सकता। दरअसल राष्ट्रपति चुनाव के बहाने क्षेत्रीय दल आगामी लोकसभा चुनाव के राजनीतिक समीकरणों की इबादत भी लिखने को तैयार हैं। सबसे ज्यादा सक्रिय समाजवादी पार्टी दिख रही है। इसके पीछे उसके अपने राजनीतिक निहितार्थ हैं। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद सपा देश की राष्ट्रीय राजनीति में बड़े बदलाव देख रही है। दोनों बड़ी पार्टियां कांग्रेस और भाजपा की पकड़ कमजोर होती जा रही है और क्षेत्रीय दलों की ताकत में लगातार इजाफा हो रहा है। सपा की कोशिश है कि अगला प्रधानमंत्री गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा का बने। इसके लिए वह अभी से जुट गई है। क्षेत्रीय दलों को इकट्ठा करके वह पहले राष्ट्रपति चुनाव में अपनी संयुक्त ताकत को आजमाना चाहती है। मगर वह इसमें सफल रहती है तो निश्चित रूप से लोकसभा चुनाव में नए-नए समीकरण नजर आएंगे। राष्ट्रपति चुनाव में इस बार सपा के अलावा तृणमूल कांग्रेस, राकांपा, अन्नाद्रमुक, बसपा और बीजद भी प्रमुख भूमिका निभाएगी। किसी तटस्थ उम्मीदवार के उतरने पर राजग में शामिल जद (यू) और शिरोमणि अकाली दल का समर्थन भी उन दलों को मिल सकता है। क्षेत्रीय दलों का गठबंधन यदि किसी एक नाम पर आमराय बना लेता है तो दोनों बड़े दलों कांग्रेस और भाजपा को उसे सिरे से नकारना मुश्किल हो सकता है। संख्या बल देखें तो यूपीए के सभी घटक यदि एक साथ रहें तो उनके पास 40 फीसद मत हैं जबकि अकेले कांग्रेस के पास 71 फीसद मत हैं। यही हाल राजग का है, उसके पास कुल मिलाकर 31 फीसद मत हैं जबकि अकेले भाजपा के पास 24 फीसद मत हैं। हां कांग्रेस और भाजपा मिलकर कोई उम्मीदवार तय करें तो वह उम्मीदवार जीत सकता है।
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Sunday, 29 April 2012

सचिन और रेखा के तीर से कांग्रेस ने साधे कई निशाने

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 29 April 2012
अनिल नरेन्द्र
गुरुवार को राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने मनोनीत राज्यसभा सदस्यों की सूची पर हस्ताक्षर कर सचिन तेंदुलकर, फिल्म अभिनेत्री रेखा और कारोबारी अनु आगा को राज्यसभा सदस्य बना दिया। क्रिकेट के मैदान से शुरू हुई सचिन तेंदुलकर की पारी अब संसद तक पहुंच गई। किसी खेलते हुए खिलाड़ी को राज्यसभा के लिए मनोनीत करने का यह पहला मौका है। शतकों पर शतक लगाने के बाद सचिन को भारत रत्न दिए जाने की मांग उठती रही थी। गुरुवार को सचिन ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से उनके निवास 10 जनपथ पर मुलाकात की और तब से इस बात की अटकलें तेज हो गई थीं कि वह राज्यसभा में मनोनीत सदस्य के तौर पर आ सकते हैं। सोनिया ने गुरुवार को औपचारिक रूप से सचिन को इस बात का प्रस्ताव दिया जिसे वह मान गए। पार्टी सूत्रों का कहना है कि सचिन ने जब अपना सौवां अंतर्राष्ट्रीय शतक बनाया था तभी से कांग्रेस अध्यक्ष इन्हें बधाई देना चाहती थीं और गुरुवार को बधाई देने के बहाने उन्होंने सचिन के सामने राज्यसभा में आने का प्रस्ताव औपचारिक तौर पर रख दिया। सोनिया के साथ सचिन ने आधा घंटा बिताया। सचिन को राज्यसभा में मनोनीत कर कांग्रेस ने एक तीर से कई शिकार करने का प्रयास किया है। अब कांग्रेस ने उस विवाद को भी खत्म कर दिया कि ध्यान चन्द और सचिन को भारत रत्न दिया जाए। शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत ने कांग्रेस की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि कांग्रेस बिना स्वार्थ के किसी को कोई पद नहीं देती। ऐसे में सचिन को कांग्रेसी झांसे से सावधान रहना चाहिए। उनका मानना है कि कांग्रेस नेता महाराष्ट्र में अपनी राजनीति के लिए सचिन की लोकप्रियता को भुनाना चाहते हैं। टीम अन्ना की सिपहसालार किरण बेदी ने भी कहा कि सचिन को कांग्रेस के राजनीतिक जाल से बचकर रहना चाहिए। उन्हें समझना चाहिए कि केंद्र सरकार और कांग्रेस तमाम संकटों से घिरी है, ऐसे में वह सचिन का इस्तेमाल करना चाहती है जबकि सचिन तो पूरे देश के हीरो हैं। कांग्रेस की राजनीति की बात का `रेखा को मनोनीत करने पर' हमें आश्चर्य कम नहीं हुआ। मेरे पास तरह-तरह के एसएमएस आ रहे हैं। एक आया कि जो काम अमिताभ तमाम जिन्दगी नहीं कर सके वह कांग्रेस ने कर दिखाया। जया और रेखा को एक हाउस में लाकर बिठा दिया। एक अन्य आया हेमा, रेखा, जया और सुषमा सब की पसंद (निरमा) राज्यसभा। अब निरमा का अगला विज्ञापन राज्यसभा में बनेगा। समाजवादी पार्टी ने जया बच्चन को अपनी संख्या के बल पर यूपी के कोटे से राज्यसभा पहुंचाया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कभी कांग्रेस से जुड़े रहे और फिर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के हम सफर अमिताभ बच्चन को काउंटर करने के लिए कांग्रेस ने जो दांव चला है उसे रेखा के माध्यम से एक तीर से कई शिकार किए गए हैं। फिल्मी दुनिया से राज्यसभा सदस्यों को लाने की भले ही परम्परा और संवैधानिक व्यवस्था रही हो लेकिन इस कड़ी में सुनील दत्त एक ऐसी शख्सियत थे कि उनकी राजनीतिक सूझ-बूझ और कार्यकुशलता की आज भी मिसाल दी जाती है। तुलनात्मक दृष्टिकोण से रेखा अब 57 वर्ष की उम्र में राजनीतिक जमीन पर क्या देश के लिए एक मिसाल स्थापित कर पाएंगी? बहरहाल सचिन तेंदुलकर और रेखा को बधाई।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Rekha, Sachin, Samajwadi Party, Vir Arjun

Saturday, 28 April 2012

अगले राष्ट्रपति की रेस शुरू हो चुकी है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 28 April 2012
अनिल नरेन्द्र
बजट सेशन के दूसरे सत्र की शुरुआत के साथ ही राष्ट्रपति चुनाव की चर्चा जोर पकड़ने लगी है। देश के सर्वोच्च पद पर इस बार कौन बैठेगा? राजनीतिक दलों ने अभी से एक-दूसरे को टटोलना शुरू कर दिया है। पार्टियां राष्ट्रपति चुनाव को अपने शक्ति प्रदर्शन का लिटमस टेस्ट मान रही हैं। वर्तमान राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का कार्यकाल जुलाई के अंतिम हफ्ते में पूरा हो रहा है। फरवरी-मार्च महीने में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम और फिर उसके ठीक बाद 58 राज्यसभा सीटों के लिए एक साथ चुनाव होने के बाद राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलने लगे। राजनीतिक परिणाम गैर कांग्रेस, गैर बीजेपी दलों के पक्ष में अधिक रहे और इससे थर्ड फ्रंट की दिशा में काम कर मुलायम सिंह यादव और ममता बनर्जी जैसे नेता सक्रिय हो गए। वहीं एनसीपी नेता शरद पवार ने भी संकेत दिया है कि वे भी अपनी बात मजबूती से रखेंगे। तथाकथित थर्ड फ्रंट के नेताओं को सक्रिय होते देख दोनों कांग्रेस और भाजपा भी अब अपनी-अपनी पसंद आगे बढ़ाने में जुट गए हैं। कांग्रेस हाई कमान ने यूपीए के उम्मीदवार को ही रायसीना हिल्स पहुंचाने की मुहिम का आगाज कर दिया है। यह शुरुआत सोनिया गांधी ने एनसीपी नेता शरद पवार से की है। भले ही कांग्रेस के उम्मीदवार के नाम पर कोई खुलासा नहीं हुआ है, मगर कयास है कि `नम्बर गेम' देखते हुए प्रणब मुखर्जी कांग्रेस का चेहरा हो सकता है। कांग्रेस जानती है कि उनके नाम पर गैर एनडीए दलों को भी राजी किया जा सकता है। अगर सपा, बसपा, तृणमूल का साथ कांग्रेस को मिल जाता है तो कांग्रेस अपना उम्मीदवार जिता सकती है। किसी कांग्रेसी उम्मीदवार पर सहमति नहीं बनने की स्थिति में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को ही यूपीए का राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाने का बैकअप प्लान तैयार है। भारतीय जनता पार्टी की पहली पसंद पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम हो सकती है। इस मसले पर भाजपा ने अपने घटक दलों के साथ गैर यूपीए अन्य सियासी दलों का मन टटोलने की प्रक्रिया धीरे-धीरे शुरू कर दी है। भाजपा कलाम के अलावा किसी दूसरे नाम पर उसी सूरत में विचार करेगी जब उसे जीतने के लिए जरूरी समर्थन उनके नाम पर मिलता नजर नहीं आए। राष्ट्रपति चुनाव की घड़ी को भले ही समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव बहुत दूर बता रहे हों, लेकिन पार्टी अपना होमवर्प पूरा करने में जुटी हुई है। 2014 में लोकसभा की चुनावी जंग पर नजर रखते हुए सपा पूरी शिद्दत के साथ मुस्लिम उम्मीदवार की खोज कर रही है। इसी क्रम में मुलायम के निर्देश पर सपा के दो आला नेताओं ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी से गुप्त मुलाकात की थी। दूसरी ओर सपा की पसंदीदा सूची में अब्दुल कलाम का नाम लगभग बाहर हो चुका है। कुरैशी के साथ हामिद अंसारी के नाम पर भी सपा में गम्भीरता से विचार चल रहा है। कांग्रेस में और भी कई नाम चल रहे हैं। एक धड़ा लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार को जाति के समीकरणों को देखते हुए आगे बढ़ा रहा है और डॉ. कर्ण सिंह, सुशील शिंदे, फारुख अब्दुल्ला और सैम पित्रोदा जैसे नाम भी उछाले जा रहे हैं। रेस आरम्भ हो चुकी है। फिलहाल यह भविष्यवाणी नहीं की जा सकती कि भारत का अगला राष्ट्रपति कौन होगा।
Anil Narendra, APJ Abdulkalam, BJP, Congress, Daily Pratap, Hamid Ansari, Mulayam Singh Yadav, Pranab Mukherjee, President of India, Samajwadi Party, Vir Arjun

Sunday, 1 April 2012

क्षेत्रीय दलों के अंतर्विरोध यूपीए सरकार के लिए बने संजीवनी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1 April 2012
अनिल नरेन्द्र
यह बजट सत्र है और इस लम्बे सत्र में सरकार को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। अगर एक भी मनी बिल (वित्त विधेयक) पर वोटिंग में सरकार हार जाती है तो उसे त्याग पत्र देना पड़ सकता है। ममता बनर्जी, मुलायम सिंह यादव ने मध्यावधि चुनाव होने की सम्भावना प्रकट की है। सवाल महत्वपूर्ण यह है कि मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार की क्या तैयारी है, इस सम्भावना को खत्म करने की? यह ठीक है कि कोई भी सांसद आज की तारीख में चुनाव नहीं चाहता पर हमने पहले देखा है कि सांसदों की कभी चलती है कभी नहीं। पार्टियों के नेतृत्व फैसले करते हैं और न चाहते हुए भी सांसदों को पार्टी अनुशासन का पालन करना होता है। इसलिए यह कहना कि कोई भी सांसद मध्यावधि चुनाव नहीं चाहता महत्वहीन हो जाता है। खबर है कि मध्यावधि चुनावों के शोर के बीच कांग्रेस के सियासी प्रबंधक `बैक अप प्लान' बनाने में जुट गए हैं। ममता बनर्जी के लगातार तीखे होते तेवरों और मुलायम सिंह की मध्यावधि चुनाव जल्दी होने की सम्भावना के बयान के बाद कांग्रेसी प्रबंधकों की नजरें मायावती की बहुजन समाज पार्टी की ओर घूम गई हैं। उधर बसपा भी नहीं चाहती है कि ममता से मार खा रही कांग्रेस राहत के लिए मुलायम के ज्यादा करीब आए। इसलिए बसपा से कांग्रेस को सकारात्मक संदेश मिल रहे हैं। कांग्रेस ने फिर दोहराया है कि संप्रग सरकार के पास जरूरी बहुमत का आंकड़ा है। कांग्रेस के इस दावे के पीछे दरअसल केंद्र की राजनीति में विभिन्न क्षेत्रीय दलों के राजनीतिक हितों का विरोधाभास है जिसका फायदा उठाकर यूपीए सरकार को बचने की बाजीगरी की जा रही है। प. बंगाल में ममता बनर्जी की लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन घट रही है, उसकी वजह से मध्यावधि चुनावों की सबसे ज्यादा छटपटाहट है। क्योंकि ममता को लगता है कि अगर लोकसभा चुनाव अपने तय समय यानि मई 2014 में हुए तो प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा सांसदों की संख्या घट सकती है जबकि निकट भविष्य में चुनाव हो जाएं तो ममता को पिछले चुनावों से ज्यादा सीटें मिलने की उम्मीद है। उधर केंद्र सरकार पर पूरी तरह हमलावर होने के बावजूद वाम मोर्चा मध्यावधि चुनावों के पक्ष में नहीं है। उसे लगता है कि अपने कैडर और संगठन को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए जरूरी है कि चुनाव दो साल बाद हों। तब तक प. बंगाल और केरल की सरकारों की विफलता और एंटी इंकम्बैंसी फैक्टर का लाभ उसे मिल सकता है। समाजवादी पार्टी को भी लगता है कि अखिलेश यादव की लोकप्रियता का लाभ उठाकर सपा 50 से ज्यादा लोकसभा सीटें जीत सकती है जबकि दो साल बाद प्रदेश में हवा कैसी हो यह निश्चित नहीं। जिस तरह वाम मोर्चा चुनाव के लिए तैयार नहीं है। वैसी ही स्थिति बसपा की भी है। मायावती लखनऊ छोड़कर दिल्ली राज्यसभा में आ गई हैं। वह नहीं चाहती कि अभी लोकसभा चुनाव हों और माहौल के कारण सपा उसका लाभ उठा ले। लेकिन कांग्रेस किसी एक या दो समर्थक दल पर यूपीए सरकार को निर्भर नहीं करना चाहती इसलिए मुलायम से मुलायम रिश्ते बनाने के बावजूद रेल मंत्री को बदल कर ममता को संतुष्ट रखने का प्रयास हुआ है। मायावती नहीं चाहती हैं कि यूपीए और मुलायम के बीच घनिष्ठता बढ़े, इसलिए उन्होंने अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से कह दिया है कि यूपीए सरकार की निर्भरता सिर्प सपा पर नहीं रहनी चाहिए। क्षेत्रीय दलों के यही अंतर्विरोध यूपीए सरकार के लिए संजीवनी का काम कर रहे हैं।

Tuesday, 27 March 2012

यूपी की फतह के बाद अब मुलायम की नजरें दिल्ली तख्त पर

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27 March 2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश की सत्ता हासिल करने के बाद समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की नजर अब दिल्ली के तख्त पर लग गई है। अब मुलायम ने मध्यावधि चुनाव कभी भी सम्भव की बात कही है। इससे पहले तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने भी मध्यावधि चुनाव के लिए तैयार रहने की बात कही थी। ममता, मुलायम के सुर में सुर मिलाते हुए भाजपा की सुषमा स्वराज ने भी देश में मध्यावधि चुनाव की सम्भावना जताई है। देवास (मध्य प्रदेश) में जिला निगरानी एवं सतर्पता समिति की बैठक में भाग लेने आई सुषमा ने मीडिया कर्मियों से कहा कि देश की राजनीति हर दिन बदल रही है और वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए मध्यावधि चुनाव की सम्भावना है। सुषमा ने कहा कि केंद्र के लिए 272 का जादुई आंकड़ा नहीं रह गया है तथा वह मात्र 227 सांसदों पर टिकी हुई है। उन्होंने कहा कि केंद्र में सरकार की अल्पमत की स्थिति को देखते हुए भाजपा मध्यावधि चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार है। मुलायम का निशाना प्रधानमंत्री बनने का है। उन्होंने शुक्रवार को समाजवादी चिन्तक डॉ. राम मनोहर लोहिया की 102वीं जयंती पर लखनऊ में अपने कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि अब लोकसभा के मध्यावधि चुनाव के लिए कमर कस लें क्योंकि लोकसभा चुनाव कभी भी हो सकते हैं। इस साल या फिर अगले साल, इसलिए सारे कार्यकता पूरी ताकत अभी से लगा दें। उन्होंने कार्यकर्ताओं के सामने यूपी की विराट विजय के बाद प्रदेश की सभी 80 लोकसभा सीटें जीतने का भी लक्ष्य दिया है। दरअसल श्री मुलायम सिंह यादव ने एक तीर से कई शिकार करने की कोशिश की है। ऐसे समय जब समाजवादी पार्टी का रुख कांग्रेस के प्रति मुलायम होता दिख रहा था और ममता बनर्जी की भरपायी के लिए सपा को केंद्र में जगह मिलने की अटकलें तेज हो रही थीं तभी मुलायम ने मध्यावधि चुनाव की बात कहकर कांग्रेस की हवा निकाल दी। एक ओर उन्होंने कांग्रेस के प्रति मुलायम होने का अपने रुख का अप्रत्यक्ष रूप से खंडन कर दिया वहीं दूसरी ओर अपने कार्यकर्ताओं को कांग्रेस के खिलाफ धार तेज करने का सन्देश दे दिया। यही नहीं, उन्होंने अपने बेटे और मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह को यह बता दिया कि उनकी सरकार के कामकाज पर ही लोकसभा चुनाव लड़े जाएंगे। भले ही मुख्यमंत्री का कार्यकाल पांच साल का हो पर उनके कसौटी पर होने वाले कामकाज की अग्निपरीक्षा एक साल के भीतर ही हो जाएगी। मुलायम को मध्यावधि चुनाव इसलिए भी सूट करता है क्योंकि अभी उन्होंने न केवल अपने `भाई' (मुस्लिम-यादव) समीकरण को ठीक से बांध रखा है बल्कि समावेशी राजनीति की ओर कदम बढ़ाते हुए सभी जातियों के वोट बैंक हथियाने का करिश्मा दिखाया है। जिस तरह अखिलेश ने अपनी पहली ही बैठक में लैपटॉप, टैबलेट और बेरोजगारी भत्ता सरीखे की घोषणा पत्र की प्रमुख मांगों को हरी झंडी दिखा दी, उससे यह अटकलें भी खारिज हो गईं कि आखिर सपा की इन महत्वाकांक्षी योजनाओं के लिए धनराशि कहां से आएगी। मध्यावधि चुनाव की स्थिति में मुलायम सिंह को यह फायदा होने की उम्मीद होनी चाहिए कि सालभर तक लोग कम से कम मायावती राज की यादें ताजा ही रखेंगे। मायावती के प्रति नाराजगी का फायदा भी सपा को लोकसभा में जरूर मिलेगा। उत्तर प्रदेश के नजरिये से देखा जाए तो मध्यावधि चुनाव बसपा सुप्रीमो मायावती के लिए भी कम मुफीद नहीं कहा जा सकता। चुनाव में पराजय के बाद अपनी पहली प्रेसवार्ता में बहन जी ने उम्मीद जताई थी कि सपा के लोगों की अराजकता उन्हें फिर अगले चुनाव में जीतने का मौका देगी। हालांकि मायावती के लिए सपा कार्यकाल में जितने दिनों बाद चुनाव हो, वह मुफीद रहेगा क्योंकि उन्होंने उम्मीद पाल रखी है कि सपा की गलतियों से उनकी पार्टी को फायदा होगा। वैसे उनकी यह उम्मीद बेमानी नहीं है क्योंकि पहली बार अगर मुलायम सिंह यादव बसपा के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ते तो उत्तर प्रदेश में पांव पसारने का मौका बसपा को इतनी जल्दी नहीं मिलता। यही नहीं, गेस्ट हाउस कांड नहीं हुआ होता तो भी भाजपा मायावती को मुख्यमंत्री बनाने की गलती नहीं करती। मुलायम सरकार के तीसरे कार्यकाल में सपा कार्यकर्ताओं के उत्पात ने ही मायावती को 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का अवसर दिया। ऐसे में मायावती की खुशफहमी वाजिब है लेकिन जिस तरह सपा सरकार चल रही है उसके मद्देनजर जरूर इसे बेमानी कहा जाएगा। बसपा के संस्थापक कांशीराम अपने भाषणों में साफ तौर पर कहा करते थे कि कमजोर सरकार और बार-बार चुनाव उनकी पार्टी के लिए फायदेमंद हैं।
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Sunday, 25 March 2012

क्या कहती है यूपी की हार पर कांग्रेस की गोपनीय रिपोर्ट?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25 March 2012
अनिल नरेन्द्र
हाल ही में खत्म हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार पार्टी नेतृत्व पचा नहीं पा रहा है। बावजूद कड़ी मशक्कत के पार्टी को करारी हार का मुंह देखना पड़ा। पार्टी को सबसे ज्यादा चिन्ता सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र और युवराज राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र में हार की है। इस हार के कारणों को जानने के लिए पार्टी ने कई रिपोर्टें तैयार कराई हैं। राहुल गांधी के करिश्मे का फायदा न मिल पाने के लिए जहां कांग्रेस नेतृत्व कमजोर संगठन, गलत टिकटों का बंटवारा बता रहा है वहीं हकीकत कुछ और ही उभरकर आ रही है। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी की अगुवाई में सेंट्रल इलेक्शन कमेटी के लिए बनी एक विशेष रिपोर्ट में कहा गया है कि पार्टी के युवराज राहुल गांधी की मंडली भी हार के लिए जिम्मेदार है। इसमें कहा गया है कि एक-दूसरे से बेहद ईर्ष्या करने वाले लोगों के छोटे लेकिन प्रभावशाली गुट और राजनीतिक दमखम की कमी वाले उम्मीदवारों को टिकट दिए जाने से चुनाव के नतीजे पार्टी के लिए निराश करने वाले रहे। रिपोर्ट में कहा गया है कि जातिवाद और वरिष्ठ नेताओं के अहंकार को भी हार का कारण माना गया है जिसकी वजह से जमीनी कार्यकर्ता चुनाव में पूरी ताकत लगाने के बजाय तटस्थ रहा। कांग्रेस की इस हार की `पोस्टमार्ट्म' की इस पहली रिपोर्ट में सूबे के 33 सीटों पर फोकस किया गया है। इन सभी सीटों पर कांग्रेस का प्रदर्शन खराब रहा है, जहां राहुल के करीबियों ने दखल देकर अपनी मर्जी के उम्मीदवारों को टिकट दिलाए थे। इन सभी सीटों पर कांग्रेस के पर्यवेक्षकों द्वारा चुने गए उम्मीदवारों और स्थानीय कार्यकर्ताओं की अनदेखी की गई। फिरोजाबाद में सिरसागंज सीट का उदाहरण सामने है जहां कांग्रेस उम्मीदवार हरिशंकर यादव महज 4224 वोट लेकर पांचवें स्थान पर रहे। पर्यवेक्षकों और स्थानीय कार्यकर्ताओं की पहली पसंद ठाकुर दलबीर सिंह तोमर थीं। राहुल ने विशेष जोर देकर यादव को टिकट दिलवाया। इसी तरह एटा जिले में अलीगंज सीट पर पार्टी के उम्मीदवार रज्जन पाल सिंह 8160 मतों के साथ पांचवें स्थान पर रहे। इस सीट पर पार्टी के आब्जर्वर ने बिजनेसमैन सुभाष वर्मा को टिकट की वकालत की थी। लोध राजपूत से ताल्लुक रखने वाले वर्मा जिला पंचायत के सदस्य भी हैं। वे इस विधानसभा क्षेत्र में लोध समुदाय के एकमात्र उम्मीदवार थे, जो 27,000 लोध वोटरों के अधिकतर वोट हासिल कर सकते थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं की उपेक्षा से उन्होंने पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ ही काम किया और उसे हरवाने में जुट गए। प्रदेश के एक मुस्लिम सांसद ने कहा कि जो रिपोर्टें अब मिल रही हैं हम लोगों को तो पहले से ही पता था। इस बारे में राहुल गांधी को भी सचेत किया गया था लेकिन उन्होंने इस ओर ध्यान नहीं दिया। मुस्लिम नेता के रूप में केवल सलमान खुर्शीद को आगे बढ़ाया गया जबकि मुस्लिम उन्हें अपना नेता मानते ही नहीं हैं। इसी तरह राहुल गांधी ने समाजवादी पार्टी से आए रशीद मसूद और बेनी प्रसाद वर्मा को अहमियत दी जबकि यह लोग दूसरे दलों से आए थे और इसी वजह से कांग्रेस कार्यकर्ता इस चुनाव में दूर रहा। प्रदेश के कई सांसद और नेता यह चाहते हैं कि हार के जिम्मेदार लोगों को सजा दी जाए जिन लोगों को इस चुनाव में अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यकों वाली सीटों को जीतने के लिए लगाया गया था, उन पर गाज गिरनी चाहिए।
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Friday, 23 March 2012

सपा यूपीए सरकार में शामिल होगी?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23 March 2012
अनिल नरेन्द्र
रविवार को एक पत्रकार ने लखनऊ में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से प्रश्न किया कि क्या समाजवादी पार्टी यूपीए सरकार में शामिल होगी? जवाब में अखिलेश ने कहा कि हम यूपीए सरकार में शामिल होंगे या नहीं, इस पर अंतिम फैसला पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव (नेता जी) ही करेंगे। सपा के केंद्र सरकार में सहयोगी बनने संबंधी दिग्विजय सिंह के बयान पर अखिलेश ने कहा कि नेता जी दिल्ली जा रहे हैं। केंद्र में सपा की भूमिका का फैसला वही करेंगे। मुलायम सिंह यादव (नेता जी) से जब दिल्ली में यही प्रश्न पूछा गया तो उन्होंने कहा कि न तो हमसे किसी ने ऐसा करने का अनुरोध किया है और न ही हमने किसी से अनुरोध किया है। नेता जी की बातों से ऐसा लगा कि वह मनमोहन सिंह सरकार में शामिल होने के लिए ज्यादा उत्साहित नहीं हैं। केंद्र सरकार बेशक ममता से आजिज मुलायम सिंह की तरफ भले ही बड़ी हसरत से देख रही हो, लेकिन सपा की इसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं लगती। यहां तक कि सपा न तो केंद्र सरकार में शामिल होगी और न ही उसे उपसभापति के पद की दरकार है। हालांकि यह भी साफ है कि सपा मनमोहन सिंह सरकार को गिराने का कोई प्रयास नहीं करेगी और समर्थन जारी रखेगी। संप्रग सरकार को लेकर सपा का नजरिया बिल्कुल साफ है। सूत्रों के मुताबिक उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारी-भरकम जीत के बाद सपा अब आगामी लोकसभा चुनाव तक उस पर कोई आंच नहीं आने देना चाहती। खासतौर से उस स्थिति के मद्देनजर जब बीते वर्षों में भ्रष्टाचार एवं घोटालों जैसे कई मोर्चों पर केंद्र सरकार का दामन दागदार रहा है। इतना ही नहीं, पार्टी उत्तर प्रदेश में किसानों की बेहतरी के कई वादों पर भी जीती है जबकि केंद्रीय बजट में आने वाले समय में डीजल के मूल्य वृद्धि के संकेत हैं। पार्टी का मानना है कि ऐसे में केंद्र सरकार में शामिल होकर उन्हें गुनाहों का भागीदार बनना इसके लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। लिहाजा उसे दूर रहने में ही भलाई है। सपा के उच्च पदस्थ सूत्रों ने तो दावा किया कि कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र सरकार में शामिल होने का सवाल ही नहीं। इसके पीछे एक तर्प यह भी है कि बीते वर्षों में सपा ने भले ही कई मोर्चों पर आगे बढ़कर केंद्र सरकार का साथ दिया हो, लेकिन उत्तर प्रदेश के बीते विधानसभा के चुनाव तक कांग्रेस ने भी कभी उसके साथ दोस्ताना रिश्ते का परिचय नहीं दिया। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बसपा एवं मायावती को छोड़कर सपा पर ही सबसे ज्यादा हमलावर रही थी। एक अन्य सपा नेता ने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार में शामिल होने के लिए कांग्रेस की तरफ से कोई ठोस प्रस्ताव वैसे भी अभी तक नहीं आया है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने सोमवार को मुलायम सिंह की जमकर तारीफ की थी। सपा की प्राथमिकता हमें तो साफ लगती है। सपा की प्राथमिकता उत्तर प्रदेश में एक अच्छी सरकार चलाना और उत्तर प्रदेश में पार्टी को और मजबूत करना है, न कि किसी दूसरी पार्टी की गलतियों में शरीक होना।
रविवार को एक पत्रकार ने लखनऊ में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से प्रश्न किया कि क्या समाजवादी पार्टी यूपीए सरकार में शामिल होगी? जवाब में अखिलेश ने कहा कि हम यूपीए सरकार में शामिल होंगे या नहीं, इस पर अंतिम फैसला पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव (नेता जी) ही करेंगे। सपा के केंद्र सरकार में सहयोगी बनने संबंधी दिग्विजय सिंह के बयान पर अखिलेश ने कहा कि नेता जी दिल्ली जा रहे हैं। केंद्र में सपा की भूमिका का फैसला वही करेंगे। मुलायम सिंह यादव (नेता जी) से जब दिल्ली में यही प्रश्न पूछा गया तो उन्होंने कहा कि न तो हमसे किसी ने ऐसा करने का अनुरोध किया है और न ही हमने किसी से अनुरोध किया है। नेता जी की बातों से ऐसा लगा कि वह मनमोहन सिंह सरकार में शामिल होने के लिए ज्यादा उत्साहित नहीं हैं। केंद्र सरकार बेशक ममता से आजिज मुलायम सिंह की तरफ भले ही बड़ी हसरत से देख रही हो, लेकिन सपा की इसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं लगती। यहां तक कि सपा न तो केंद्र सरकार में शामिल होगी और न ही उसे उपसभापति के पद की दरकार है। हालांकि यह भी साफ है कि सपा मनमोहन सिंह सरकार को गिराने का कोई प्रयास नहीं करेगी और समर्थन जारी रखेगी। संप्रग सरकार को लेकर सपा का नजरिया बिल्कुल साफ है। सूत्रों के मुताबिक उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारी-भरकम जीत के बाद सपा अब आगामी लोकसभा चुनाव तक उस पर कोई आंच नहीं आने देना चाहती। खासतौर से उस स्थिति के मद्देनजर जब बीते वर्षों में भ्रष्टाचार एवं घोटालों जैसे कई मोर्चों पर केंद्र सरकार का दामन दागदार रहा है। इतना ही नहीं, पार्टी उत्तर प्रदेश में किसानों की बेहतरी के कई वादों पर भी जीती है जबकि केंद्रीय बजट में आने वाले समय में डीजल के मूल्य वृद्धि के संकेत हैं। पार्टी का मानना है कि ऐसे में केंद्र सरकार में शामिल होकर उन्हें गुनाहों का भागीदार बनना इसके लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। लिहाजा उसे दूर रहने में ही भलाई है। सपा के उच्च पदस्थ सूत्रों ने तो दावा किया कि कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र सरकार में शामिल होने का सवाल ही नहीं। इसके पीछे एक तर्प यह भी है कि बीते वर्षों में सपा ने भले ही कई मोर्चों पर आगे बढ़कर केंद्र सरकार का साथ दिया हो, लेकिन उत्तर प्रदेश के बीते विधानसभा के चुनाव तक कांग्रेस ने भी कभी उसके साथ दोस्ताना रिश्ते का परिचय नहीं दिया। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बसपा एवं मायावती को छोड़कर सपा पर ही सबसे ज्यादा हमलावर रही थी। एक अन्य सपा नेता ने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार में शामिल होने के लिए कांग्रेस की तरफ से कोई ठोस प्रस्ताव वैसे भी अभी तक नहीं आया है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने सोमवार को मुलायम सिंह की जमकर तारीफ की थी। सपा की प्राथमिकता हमें तो साफ लगती है। सपा की प्राथमिकता उत्तर प्रदेश में एक अच्छी सरकार चलाना और उत्तर प्रदेश में पार्टी को और मजबूत करना है, न कि किसी दूसरी पार्टी की गलतियों में शरीक होना।
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Saturday, 17 March 2012

अखिलेश की अग्निपरीक्षा तो अब शुरू हुई है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17 March 2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की पारी आरम्भ हो गई है। बृहस्पतिवार को खांटी गंवई रंग-ढंग में अभिजात्य छुअन, नए तेवर और कलेवर के साथ अपने बलबूते पर उत्तर प्रदेश में पहली बार बहुमत के साथ काबिज हुई सपा के 38 वर्षीय युवा चेहरे अखिलेश यादव और उनके मंत्रिपरिषद के सदस्यों ने पद की गोपनीयता की शपथ ली। राज्यपाल बीएल जोशी ने लखनऊ के स्थानीय `लॉ मार्टिनियर कॉलेज' मैदान में आयोजित भव्य समारोह में प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री की पारी शुरू कराई। अखिलेश के साथ 19 मंत्रियों ने भी शपथ ली। हालांकि इससे पहले अखिलेश के पिता श्री मुलायम सिंह यादव तीन बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने पर उन्हें हर बार दूसरों के समर्थन की बैसाखी पर ही खड़ा होना पड़ा है। इस बार सत्ता के लिए स्पष्ट जनादेश मिला है तो नए मुख्यमंत्री के लिए चुनौतियों का भी पहाड़ सामने है। शपथ समारोह से भी विवाद आरम्भ हो गए हैं। उनकी ताजपोशी के साथ विवादास्पद निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्प राजा भैया का कैबिनेट मंत्री बनना चौंकाने वाला था। राजा भैया के खिलाफ हत्या की कोशिश, डकैती, अपहरण समेत आठ आपराधिक मुकदमें दर्ज हैं। अखिलेश ने सफाई देते हुए कहा कि राजा भैया के खिलाफ लगे आरोप राजनीतिक साजिश थे। शपथ के बाद का अखिलेश और शपथ से पहले में फर्प आ गया है। यही अखिलेश हैं जिन्होंने डीपी यादव के पार्टी में प्रवेश पर आपत्ति की थी। अखिलेश के लिए एक बड़ी चुनौती गुंडाराज न लौटने की है। इधर अखिलेश शपथ ले रहे थे तो उधर उनकी पार्टी वाले ग्रेटर नोएडा के दादरी क्षेत्र में बसपा परिवारों को मारने-पीटने में लगे थे। उल्लेखनीय है कि इसी क्षेत्र में पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का गांव बादलपुर भी है। मायावती राज में सपा कार्यकर्ताओं की बहुत पिटाई हुई थी अब स्वाभाविक है कि वह बदला लेना चाहेंगे। इसी पर अखिलेश को नियंत्रण लगाना होगा। उनके मंत्रिपरिषद और पार्टी में बहुत वरिष्ठ नेता गण हैं। उन पर अंकुश लगाना आसान नहीं होगा। बच्चा कहकर कुछ मंत्री, संत्री अपनी मनमानी करना चाहेंगे। देखें अखिलेश इस समस्या का क्या समाधान निकालते हैं और सीनियरों की मनमानियों को रोकते हैं। 11 लाख युवाओं की उम्मीदों पर खरा उतरना आसान नहीं होगा। बेरोजगारी भत्ता का चुनावी वादा पूरा करने के लिए अखिलेश को डेढ़ हजार करोड़ रुपये जुटाने होंगे। पार्टी ने इससे पहले के कार्यकाल में जहां 500 रुपये महीना भत्ता दिया था वहीं इस बार बेरोजगार नौजवानों को 1000 रुपये देने का वादा किया है। अखिलेश ने दो वर्ष में गांवों के लिए 20 घंटे व शहर को 22 घंटे बिजली देने का वादा किया है। किसानों की तरह गरीब बुनकर को भी मुफ्त बिजली देने की बात घोषणा पत्र में कही गई है। उद्योग व कृषि क्षेत्र को भरपूर बिजली देने के साथ ही निजी व सरकारी क्षेत्र में बिजली उत्पादन को प्राथमिकता देते हुए नए बिजली घरों का निर्माण व पुराने का सुधार तथा बिजली चोरी रोकने को लाइन लॉस घटाने की घोषणा की गई है। गौर करने की बात यह है कि अभी बिजली उत्पादन व उपलब्धता की जो स्थिति है उससे ज्यादातर शहरों को ही
16-18 घंटे बिजली नहीं मिल पाती जबकि गांवों को तो औसतन 9 घंटे बिजली की आपूर्ति हो रही है। चूंकि बिजली घर स्थापित करने में 4 वर्ष लगते हैं इसलिए फिलहाल बिजली की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार अखिलेश के लिए चुनौती होगी। मुफ्त बिजली देने से डेढ़-दो हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का अतिरिक्त बोझ उस पॉवर कारपोरेशन पर पड़ेगा जो पहले से ही 8 हजार करोड़ रुपये से अधिक के घाटे में है। अब बारी आती है टैबलेट व लैपटॉप देने के मुद्दे पर। सपा के हाई स्कूल व इंटर पास विद्यार्थियों को मुफ्त लैपटॉप और टैबलेट पीसी बांटने का वादा किया है। इस वर्ष हाई स्कूल पास विद्यार्थियों की संख्या 25 लाख व इंटर पास 21 लाख रहने का अनुमान है। अगर टैबलेट पीसी का न्यूनतम मूल्य 50 डालर यानि 2500 रुपये ही माना जाए तो हाई स्कूल उत्तीर्ण विद्यार्थियों को उसे देने के लिए सालाना 625 करोड़ का खर्च आएगा। दोनों को मिलाकर अखिलेश को 3800 करोड़ रुपये का प्रबंध करना होगा। विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि अगर सपा सरकार अपने वादों पर अमल शुरू करने लगी तो उसे करीब 66 हजार करोड़ रुपये की सालाना व्यवस्था करने का प्रबंध करना पड़ेगा जबकि जगजाहिर है कि प्रदेश की आर्थिक स्थिति काफी खोखली हो चुकी है। पिछले वित्त वर्ष में यहां पर 18,959 करोड़ रुपये के घाटे का बजट था। इस वर्ष यह घाटा और बड़ी छलांग लगा सकता है। जाहिर है ऐसे में अखिलेश की सरकार को अपने चुनावी वादे पूरा करना आसान नहीं होगा। लेकिन इतना तय है कि यदि अखिलेश सरकार ने वाकई दृढ़ राजनीतिक संकल्प जताया तो इस लक्ष्य को पाना असम्भव भी नहीं है। हम अखिलेश को बधाई देने के साथ उम्मीद करते हैं कि वह प्रदेश की जनता की उम्मीदों पर खरे उतरेंगे।
Akhilesh Yadav, Anil Narendra, Daily Pratap, Mulayam Singh Yadav, Samajwadi Party, Uttar Pradesh, Vir Arjun

Thursday, 15 March 2012

मायावती अब आगे क्या करेंगी?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15 March 2012
अनिल नरेन्द्र
बहुजन समाज पार्टी प्रमुख व उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के भविष्य को लेकर सभी को चिन्ता थी कि अब आगे वह क्या करेंगी? चुनाव में करारी हार के बाद बहन जी के राजनीतिक भविष्य में अनिश्चितता जरूर पैदा हो गई थी। फिलहाल लगता है कि बहन जी केंद्र की राजनीति करेंगी। उन्होंने मंगलवार को राज्यसभा का नामांकन दाखिल कर दिया है। इससे पहले सोमवार को लखनऊ में एक ऐसा सीन हुआ, जिसकी कल्पना करना भी कुछ समय पहले तक असम्भव था। मायावती के सामने जब वह मुख्यमंत्री थीं, मजाल है कि बराबर की कुर्सी में कोई बैठ सकता हो चाहे वह सांसद हो, पार्टी का वरिष्ठ पदाधिकारी हो या विधायक, सभी को जमीन पर बैठना पड़ता था, मायावती अकेली कुर्सी पर बैठती थीं। हार के बाद सोमवार को बसपा विधायकों की बैठक हुई तो राज्यसभा में पार्टी के उम्मीदवारों का चयन होना था। राज्यसभा की 10 सीटों के लिए सोमवार से नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गई है। बसपा के विधायकों की संख्या के हिसाब से दो सीटें बसपा जीत सकती है। एस सीट पर तो खुद बहन जी खड़ी हो रही हैं दूसरी पर वह चाहती थीं कि मायावती सरकार में कैबिनेट सचिव शशांक शेखर नामांकन भरें पर उनके नाम पर बसपा विधायकों ने विरोध कर दिया। चूंकि मायावती सरकार में वह मंत्रियों व विधायकों पर भारी थे। मुख्यमंत्री से मुलाकात से लेकर उनके सिफारिशों पर अमल तभी होता था जब कैबिनेट सचिव उस पर अपनी हामी भरते थे। अपनी उपेक्षा से बसपा विधायकों में नाराजगी थी। सोमवार को जब राज्यसभा उम्मीदवारों पर सहमति बनाने के लिए बसपा मुख्यालय में पार्टी विधायकों की बैठक बुलाई गई तो उन्होंने शशांक शेखर पर विरोध कर दिया। विधायकों ने कहा कि जिस अधिकारी ने गद्दी पर रहते उन लोगों की नहीं सुनी, उसे कैसे राज्यसभा के लिए वोट करा सकते हैं। विधायकों द्वारा बताए गए कार्यों की अनदेखी के चलते ही वह जनता की समस्याओं को दूर नहीं कर सके। नाराज जनता ने पार्टी प्रत्याशियों को विधानसभा चुनाव में हरा दिया। सूत्रों का कहना है कि बसपा प्रमुख मायावती ने नेताओं की इस नाराजगी का संज्ञान लेते हुए दावा किया कि पार्टी किसी धन्ना सेठ और नौकरशाह को राज्यसभा भेजने की पहल नहीं करेगी बल्कि मुस्लिम समाज या ओबीसी के किसी व्यक्ति को राज्यसभा भेजेगी। इस तरह मुनकाद अली का फैसला हुआ। हार से पहले क्या कोई कल्पना कर सकता था कि बहन जी की बात का खुला विद्रोह सम्भव है। मायावती ने केंद्र की राजनीति का फैसला इसलिए भी किया है कि उन्हें लगता है कि लोकसभा के मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं। मायावती 2003 में भी अपनी सरकार के पतन के बाद राज्यसभा की सदस्य बनी थीं। चूंकि राज्य में अब सपा की सरकार का गठन 15 मार्च को हो जाएगा और मायावती ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी निकाय चुनाव में भाग नहीं लेगी, ऐसे में बसपा के लिए राज्य में राजनीतिक गतिविधियों की अब ज्यादा गुंजाइश नहीं बची है। सपा के राज्यसभा सदस्यों की संख्या अभी पांच है जो बढ़कर 10 हो जाएगी। बसपा आगामी अप्रैल में विधान परिषद में होने वाले चुनावों में भी अपने सदस्य खोएगी। विधान परिषद की 100 सीटों की कुल संख्या में बसपा के 65 सदस्य हैं। देखें दिल्ली में मायावती क्या गुल खिलाती हैं।
बहुजन समाज पार्टी प्रमुख व उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के भविष्य को लेकर सभी को चिन्ता थी कि अब आगे वह क्या करेंगी? चुनाव में करारी हार के बाद बहन जी के राजनीतिक भविष्य में अनिश्चितता जरूर पैदा हो गई थी। फिलहाल लगता है कि बहन जी केंद्र की राजनीति करेंगी। उन्होंने मंगलवार को राज्यसभा का नामांकन दाखिल कर दिया है। इससे पहले सोमवार को लखनऊ में एक ऐसा सीन हुआ, जिसकी कल्पना करना भी कुछ समय पहले तक असम्भव था। मायावती के सामने जब वह मुख्यमंत्री थीं, मजाल है कि बराबर की कुर्सी में कोई बैठ सकता हो चाहे वह सांसद हो, पार्टी का वरिष्ठ पदाधिकारी हो या विधायक, सभी को जमीन पर बैठना पड़ता था, मायावती अकेली कुर्सी पर बैठती थीं। हार के बाद सोमवार को बसपा विधायकों की बैठक हुई तो राज्यसभा में पार्टी के उम्मीदवारों का चयन होना था। राज्यसभा की 10 सीटों के लिए सोमवार से नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गई है। बसपा के विधायकों की संख्या के हिसाब से दो सीटें बसपा जीत सकती है। एस सीट पर तो खुद बहन जी खड़ी हो रही हैं दूसरी पर वह चाहती थीं कि मायावती सरकार में कैबिनेट सचिव शशांक शेखर नामांकन भरें पर उनके नाम पर बसपा विधायकों ने विरोध कर दिया। चूंकि मायावती सरकार में वह मंत्रियों व विधायकों पर भारी थे। मुख्यमंत्री से मुलाकात से लेकर उनके सिफारिशों पर अमल तभी होता था जब कैबिनेट सचिव उस पर अपनी हामी भरते थे। अपनी उपेक्षा से बसपा विधायकों में नाराजगी थी। सोमवार को जब राज्यसभा उम्मीदवारों पर सहमति बनाने के लिए बसपा मुख्यालय में पार्टी विधायकों की बैठक बुलाई गई तो उन्होंने शशांक शेखर पर विरोध कर दिया। विधायकों ने कहा कि जिस अधिकारी ने गद्दी पर रहते उन लोगों की नहीं सुनी, उसे कैसे राज्यसभा के लिए वोट करा सकते हैं। विधायकों द्वारा बताए गए कार्यों की अनदेखी के चलते ही वह जनता की समस्याओं को दूर नहीं कर सके। नाराज जनता ने पार्टी प्रत्याशियों को विधानसभा चुनाव में हरा दिया। सूत्रों का कहना है कि बसपा प्रमुख मायावती ने नेताओं की इस नाराजगी का संज्ञान लेते हुए दावा किया कि पार्टी किसी धन्ना सेठ और नौकरशाह को राज्यसभा भेजने की पहल नहीं करेगी बल्कि मुस्लिम समाज या ओबीसी के किसी व्यक्ति को राज्यसभा भेजेगी। इस तरह मुनकाद अली का फैसला हुआ। हार से पहले क्या कोई कल्पना कर सकता था कि बहन जी की बात का खुला विद्रोह सम्भव है। मायावती ने केंद्र की राजनीति का फैसला इसलिए भी किया है कि उन्हें लगता है कि लोकसभा के मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं। मायावती 2003 में भी अपनी सरकार के पतन के बाद राज्यसभा की सदस्य बनी थीं। चूंकि राज्य में अब सपा की सरकार का गठन 15 मार्च को हो जाएगा और मायावती ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी निकाय चुनाव में भाग नहीं लेगी, ऐसे में बसपा के लिए राज्य में राजनीतिक गतिविधियों की अब ज्यादा गुंजाइश नहीं बची है। सपा के राज्यसभा सदस्यों की संख्या अभी पांच है जो बढ़कर 10 हो जाएगी। बसपा आगामी अप्रैल में विधान परिषद में होने वाले चुनावों में भी अपने सदस्य खोएगी। विधान परिषद की 100 सीटों की कुल संख्या में बसपा के 65 सदस्य हैं। देखें दिल्ली में मायावती क्या गुल खिलाती हैं।
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Sunday, 11 March 2012

यूपी के मुस्लिम मतदाताओं ने सोच समझकर होशियारी से वोट दिया

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Published on 11 March 2012
अनिल नरेन्द्र
यूपी के मुसलमानों ने विधानसभा चुनाव में कुछ हद तक टेक्निकल वोटिंग की, यह कहें तो शायद गलत नहीं होगा। मैं समझता हूं कि पहली बार उन्होंने ढंग से मुस्लिम हितों को ऊपर रखकर मैच्योर वोटिंग की है। उन्होंने देखा कि कौन-सी पार्टी से कौन-सा मुस्लिम उम्मीदवार जीत सकता है, उसे ही वोट दो। नतीजों ने मुस्लिम मठाधीशों को धूल चटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उत्तरी राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल से लेकर शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी की सिफारिश के उम्मीदवारों को नकार दिया गया। उलेमा काउंसिल तो प्रदेश में अपना खाता तक नहीं खोल पाई। अपने गढ़ आजमगढ़ की निजामाबाद सीट पर खड़े काउंसिल के महासचिव ताहिर मदनी चौथे स्थान पर रहे। बेहट सीट से इमाम बुखारी के दामाद और सपा उम्मीदवार अमर अली खान चुनाव हार गए। वहीं लखीमपुर खीरी से सपा उम्मीदवार इमरान हार गए। पेशे से बिल्डर इमरान को टीले वाली मस्जिद के इमाम मौलाना शाह फजल-ए-रहमान वाहवी नदवी ने टिकट दिलवाया था। मुस्लिम मतदाताओं का यह फैसला पार्टी नहीं बल्कि उम्मीदवारों के खिलाफ था। समाजवादी पार्टी अधिकांश मुस्लिम बहुल सीटों पर कामयाब रही। इसका नमूना है कि आजमगढ़ की 10 सीटों में से 9 पर सपा उम्मीदवार विजयी रहे। गौरतलब है कि यूपी की चुनावी बिसात में करीब 150 सीटें ऐसी थीं जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में थे। इसके लिए सियासी पार्टियों के बीच रस्साकसी भी खूब चली। चुनावी लाभ के लिए मुसलमानों को आरक्षण देने की होड़ से लेकर साहित्य मेले में सलमान रुशदी की आमद तक मुद्दे उठाए गए। उत्तर प्रदेश की 403 सदस्यों वाली विधानसभा में इस बार 63 मुस्लिम उम्मीदवार चुनकर आए हैं। 2007 में यह आंकड़ा 52 था। सपा के कुल 224 उम्मीदवार जीते हैं, जिनमें मुस्लिम प्रत्याशियों की संख्या 40 है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने 83 तो सपा ने 81 मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे। दोनों पार्टियों ने सभी 403 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। कांग्रेस ने अपने 359 प्रत्याशियों में 58 मुस्लिम को टिकट दिए थे। मुस्लिम बहुल इलाके में भारी मतदान हुआ। इनमें मुस्लिम महिलाओं ने अच्छी भागीदारी निभाई। सहारनपुर और आजमगढ़ के मुस्लिम बहुल क्षेत्र में तो 70 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ। बसपा के 14 मुस्लिम उम्मीदवार जीतकर आए जबकि पिछली बार 29 प्रत्याशी जीते थे। पिछले चुनाव में सपा के मुस्लिम विधायकों की संख्या 17 थी। पीस पार्टी के चार प्रत्याशी जीते जिनमें तीन मुस्लिम हैं। पार्टी के अध्यक्ष डाक्टर अयूब खलीलाबाद सीट से जीते हैं। कौमी एकता दल की ओर से माफिया से राजनीतिज्ञ बने मुख्तार अंसारी मऊ सीट से जीते हैं। सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान रामपुर से तथा वकार अहमद शाह बहराइच से जीते हैं। कांग्रेस के काजी अली खाँ रामपुर की स्बार सीट से जीते हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो यूपी के मुस्लिम मतदाताओं ने सोच-समझकर हिसाब से मतदान किया है।
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Thursday, 8 March 2012

माया के खिलाफ नैगेटिव वोट और अखिलेश की आंधी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 8 March 2012
अनिल नरेन्द्र
पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के डिब्बे खुल चुके हैं। नया इतिहास रचा गया है। कारणों के लम्बे-चौड़े विश्लेषण होने लगे हैं। मोटे तौर पर जो प्रमुख कारण मुझे लगे वह कुछ इस प्रकार हैं। पहले बात हम करते हैं उत्तर प्रदेश की। यह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थे कि साइकिल ने हाथी को रौंद दिया। समाजवादी पार्टी की जीत का सबसे बड़ा कारण था मायावती सरकार के खिलाफ नैगेटिव वोट। यूपी की जनता ने तय कर लिया था कि मायावती की बसपा सरकार को हटाना था और सामने विकल्प के रूप में अखिलेश यादव नजर आए। अखिलेश यादव प्रदेश की जनता की नब्ज को पहचानने में सफल रहे। जीतोड़ मेहनत की और जमीन पर चलने वाले अखिलेश ने एक नई उम्मीद पैदा की। मेहनत तो राहुल गांधी ने भी कम नहीं की। उन्होंने भी दो महीने से यूपी की खाक छानी, 200 से ज्यादा रैलियां की पर जनता ऐसा नेता चाहती थी जिसके पास वह जाकर अपनी नाली, बिजली, पानी की समस्या कह सके। वह हर बार राहुल से आकर दिल्ली में तो कह नहीं सकते थे। राहुल की कड़ी मेहनत पर यूपी की कांग्रेसी इकाई ने सारा पानी फेर दिया। चुनावी माहौल तो राहुल ने बना दिया पर फसल काटने के लिए संगठन तैयार नहीं था। न कोई बूथ कमेटी थी न ही जिला कमेटी। जिन मुसलमानों को खुश करने के लिए कांग्रेस ने हर हथकंडा अपनाया, उन्होंने मुलायम की झोली में जाना बेहतर समझा। मुस्लिम वोट सपा, कांग्रेस और बसपा में बंटा, एकमुश्त किसी को नहीं गया पर बहुमत सपा के साथ गया। मायावती अपनी हार के लिए खुद जिम्मेदार हैं। उनका तानाशाह तरीका जनता को नहीं भाया। महारानियों की तरह उनके व्यवहार से खुद उनकी पार्टी वाले दुःखी थे। मुझे तो नहीं लगता कि दलित वोट भी पूरी तरह से बसपा को मिला। आखिर वह वोट देते भी क्यों? जिन दलितों के उद्धार के लिए मायावती शासन में आईं, उसी दलित को कॉलेज में एक क्लर्प की नौकरी पाने के लिए चार लाख रिश्वत देनी पड़ी थी। लोग भूखों मर रह थे और बहनजी हाथी बनवाने में लगी हुई थीं। पिछले पांच सालों में न तो किसी कॉलेज में चुनाव हुआ और न ही स्थानीय निकायों का चुनाव। सारी चुनावी प्रक्रिया ठप कर दी बहन जी ने। युवाओं में आक्रोश था। किसानों की जमीनें बिल्डरों को औने-पौने भाव में लुटा दीं और पैसा बनाने की फैक्टरी बन गई बसपा। फिर बहुजन समाज पार्टी में मायावती का विकल्प क्या था? उन्होंने कभी दूसरी पंक्ति की लीडरशिप खड़ा करने का प्रयास किया। कोई युवा चेहरा था उनके पास पेश करने को? विकल्प के रूप में युवा चेहरा नजर आया अखिलेश यादव का। नेता जी (मुलायम) शायद अपने बलबूते पर यह चुनाव न जीत पाते। आज भी उनके गुंडे राज को कोई नहीं भूला। 2007 में उनका इसीलिए सफाया किया गया था, क्योंकि हर थाने में, हर गांव में, तहसील में मुलायम खड़ा मिला। दरअसल सपा के वर्पर सत्ता में आने से सभी मुलायम बन जाते हैं और वही गुंडा राज आ जाता है। इसी से दुःखी जनता ने मायावती को चांस दिया था। अखिलेश यादव के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती होगी अपने कार्यकर्ताओं पर लगाम रखना। आते ही दो स्थानों पर तो गोली चल चुकी है, मारपीट हो चुकी है। यूपी की जनता ने यह साबित कर दिया है कि रणनीतियों से ज्यादा वह नीतियों को प्राथमिकता देती है। भाजपा को यही रणनीति चाट गई। इस बार का सारा यूपी का चुनाव राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने लड़ा। संजय जोशी, नितिन गडकरी ने उम्मीदवारों से लेकर रैलियों तक सब कुछ संघ के इशारों पर हुआ। संघ ने कहा कि आडवाणी सहित किसी बड़े नेता को दिल्ली, गुजरात से नहीं बुलाना, नहीं बुलाया गया। उमा भारती को जबरदस्ती लाकर यूपी के नेताओं में घमासान करा दिया। भाजपा इस चुनाव में विभाजित पार्टी की तरह उतरी और नतीजा सामने है। इस चुनाव में भाजपा की इतनी हार नहीं हुई है जितनी संघ की हुई है। भाजपा तो पहले से भी ज्यादा गिर गई। इसी रणनीति, गलत नीतियों की वजह से उत्तराखंड में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा। उत्तराखंड की विडम्बना देखिए कि वह रमेश पोखरियाल निशंक चुनाव जीत गए जिन्हें भ्रष्ट होने के आरोप में हटाया गया और वह भुवनचन्द खंडूरी चुनाव हार गए जिनकी ईमानदार छवि पर भाजपा ने दाव लगा दिया। इससे तो शायद बेहतर होता कि निशंक को ही बनाए रखते और चुनाव से तीन महीने पहले उठाकर पार्टी को नुकसान पहुंचा दिया। इस चुनाव में पर्सनेलिटी का बड़ा योगदान रहा है। पंजाब में प्रकाश सिंह बादल और कैप्टन अमरिन्दर सिंह आमने-सामने थे, जहां बादल अत्यंत मिलनसार, जनता के दुःख-दर्द में साथ देने वाले हैं वहीं कैप्टन का महाराजा स्टाइल बदला नहीं। उन्होंने वही शाही अन्दाज में चुनाव लड़ा। जब जनता को बादल और अमरिन्दर में से एक को चुनने का समय आया, उन्होंने बादल को प्राथमिकता दी। पंजाब में अकालियों के खिलाफ माहौल था पर कांग्रेस उसका फायदा नहीं उठा सकी। 44 साल में यह पहली बार है कि सत्तारूढ़ पार्टी-गठबंधन फिर से चुनाव जीता है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव नतीजे खासकर बहुमत का दावा करने वाली कांग्रेस के लिए बेहद निराशाजनक और चिन्ताजनक है। पार्टी को कहां तो दिग्विजय सिंह जैसे बड़बोले नेता 125 सीटों का दावा करते नहीं थकते थे, कांग्रेस को सिर्प 28 सीटें ही मिल सकीं। अगर लोकसभा चुनाव में 22 सीटें जीतने वाली इस पार्टी का आंकलन था कि इस बिनाह पर उसे 100 सीटें तो मिलनी चाहिए। सहयोगी राष्ट्रीय लोकदल जिसने पश्चिमी उत्तर प्रदश में आंधी का दावा किया कुल नौ सीटें ही जीत सकी जो पिछले जीत से भी कम हैं। चुनाव में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन की हद तो तब हो गई जब उसके गढ़ कहे जाने वाले अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली में कांग्रेस सभी पांचों सीट हार गई जबकि इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक देने वाले महासचिव राहुल गांधी के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र वाले जिले अमेठी में कांग्रेस पांच में से तीन सीटें गंवा बैठी। अमिता सिंह जैसी दिग्गज अमेठी में हार गईं। तमाम ड्रॉमे करने के बावजूद सलमान खुर्शीद अपनी पत्नी लुइस खुर्शीद की जमानत नहीं बचा सके। चुनाव में अपने बड़बोलेपन के लिए सुर्खियों में बने रहे केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के बेटे राकेश वर्मा दरियाबाद चुनावी होड़ में तीसरे पायदान पर रहे। वैसे अगर दिग्गजों की हार की बात करें तो भाजपा का हाल भी कांग्रेस जैसा रहा। सिवाय उमा भारती के चुनावी मैदान में उतरे सभी क्षत्रप चुनाव हार गए। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सूर्यप्रताप शाही, पूर्व अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र, विधानमंडल के नेता ओम प्रकाश सिंह तथा पूर्व प्रदेशाध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी को पराजय का मुंह देखना पड़ा।
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Thursday, 16 February 2012

उत्तर पदेश में चल रहा है एक साइलैंट करंट

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 16th February  2012
अनिल नरेन्द्र
ऐसा कौन सा मुद्दा है जिसे यूपी के नेता समझ नहीं पा रहे और जनता समझ गई है? मंडल-कमंडल के उन्मादी और उत्तेजक माहौल में भी जब उत्तर पदेश में 57 फीसदी से ज्यादा मतदान नहीं हुआ, इस बार पता नहीं कौन सा अंडर करंट चल रहा है कि इतना भारी मतदान हो रहा है। सतह पर बिल्कुल शांति है, न किसी का विरोध और न ही किसी के पक्ष में साफ हवा। मगर फिर भी मतदान 60 फीसदी के लगभग रहा है। उत्तर पदेश में आजादी के बाद पहली मर्तबा यह करिश्मा हो रहा है। इससे भी ज्यादा सुखद है कि पहले दो चरणों के मतदान में आधी आबादी का डिस्टिंगशन से पास होना। पहले चरण में बारिश के बावजूद पुरुषों से ज्यादा मतदान पतिशत महिलाओं का था। ज्यादा मतदान को उत्तर पदेश में सत्ता विरोधी लहर के रूप में ही देखा जाता है। इस बेहद सहज धारणा के लिए पिछले ढाई दशकों के नतीजे ही जिम्मेदार हैं। 1985 के बाद से कोई भी सत्तारूढ़ पार्टी लगातार दूसरी बार सरकार बनाने में असफल रही है। ऐसे में बढ़े मतदान को सपा, भाजपा व कांग्रेस जाहिर तौर पर सत्ता बसपा विरोधी लहर के रूप में पेश कर रहे हैं। कांग्रेस को तो राहुल का करिश्मा दिख रहा है। सपा को बसपा सरकार का भ्रष्टाचार तो भाजपा को केंद्र सरकार के खिलाफ यूपी के लोगों का गुस्सा। मगर ऐसा क्या है कि आजादी के बाद पहली बार मतदाता ऐसे सड़कों पर उतरे। आजादी के बाद से हुए कुल 15 चुनावों में कभी इस तरह जनता सड़कों पर मतदान के लिए नहीं निकली। आपातकाल के बाद 1977 रहा हो या फिर 1991 में राम जन्म भूमि आंदोलन की लहर में भी मतदान पतिशत 55 फीसदी के पास ही रह पाया। भाजपा को रोकने के लिए 1993 में सामाजिक न्याय व दलित राजनीति को कांशीराम और मुलायम ने गठजोड़ कर सामाजिक परिवर्तन का बिगुल पूंका लेकिन मतदान 60 फीसदी के जादूई अंक तक नहीं पहुंच सका। छह मार्च को नतीजे आने से पहले तक राजनीतिक पंडित और दल अपने तर्प और गणित पेश करेंगे लेकिन वास्तविकता है कि हवा के मिजाज को कोई भी भांप नहीं पा रहा है, मगर मतदान में महिलाओं और युवाओं की बढ़ती भागीदारी से हमारे लोकतंत्र के परिपक्व होने का स्पष्ट संकेत है। साफ है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन का असर है तभी तो कुछ मतदाताओं ने राइट टू रिजेक्ट विकल्प का भी इस्तेमाल किया है। पर उत्तर पदेश के पूर्वी इलाके में दो चरणों में हुए मतदान से जो हवा चली है वह पश्चिमी हिस्से तक आते-आते बदल भी सकती है। इस इलाके में फैसले की चाबी मुसलमानों और जाटों के हाथों में है। आमतौर पर वेस्टर्न यूपी में जाटों का दबदबा माना जाता है। जाटों के नेता के रूप में चौधरी अजीत सिंह करीब दो दशकों से स्थापित हैं। कांग्रेस के साथ समझौता करने वाली अजीत सिंह को कुल 59 सीटें मिली हैं। अगर जमीनी स्तर पर यह समझौता सही मायनों में लागू होता है तो दोनों कांग्रेस और रालोद को फायदा होगा। वेस्टर्न यूपी में मुसलमान वोटों का भी खासा महत्व है। हालांकि सत्तारूढ़ होने के नाते पश्चिमी उत्तर पदेश में बीएसपी के पति नाराजगी है। लेकिन यह भी सच है कि इस इलाके की ज्यादातर सीटों पर मुख्य मुकाबला बसपा से ही है। दरअसल बीएसपी के 20 फीसदी दलित वोट उसका बड़ा हथियार है। स्थानीय स्तर पर दलितों के अलावा सभी जातियां अपने बीच का उम्मीदवार ढूंढ रही हैं सिर्प दलित ही बहनजी के इशारे पर वोट करते हैं। क्षेत्र में बसपा से नाराज मुसलमान एसपी और कांग्रेस को वोट दे सकते हैं। ऐसा हुआ तो बसपा ही फायदे में रहेगी। अगर मुसलमान वोट एकजुट हुआ तो बसपा ही सबसे ज्यादा घाटे में रहेगी। पूरे पश्चिमी उत्तर पदेश में हर सीट पर जातीय समीकरण अलग-अलग है। कुछ इलाकों में भाजपा भी मजबूत स्थिति में है। खासतौर पर शहरी इलाकों में उसका पभाव साफ दिख रहा है। पर इस बार का चुनाव बहुत कुछ उम्मीदवारों पर भी निर्भर है। कुल मिलाकर देखना यह है कि जो हवा पहले दो दौर के मतदान में चली वह तीसरे में भी बरकरार रहती है या नहीं?
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Saturday, 11 February 2012

पहले चरण के मतदान से कांग्रेस और सपा ज्यादा उत्साहित

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 11th February  2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश में विधानसभा का पहला राउंड पूरा हो गया है। बारिश के बीच बुधवार को वोटों की भी झमाझम बरसात हुई। विधानसभा चुनाव के पहले चरण में मतदान में बारिश और सर्द हवाएं भी वोटरों का जोश ठंडा नहीं कर सकी। इसे वोटरों की जागरुकता कहें या अन्ना हजारे व चुनाव आयोग की मुहिम का नतीजा, आजादी के बाद प्रदेश में पहली बार 62 फीसदी मतदान हुआ। खास बात यह भी रही कि पहले चरण का मतदान पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा, नहीं तो उत्तर प्रदेश में चुनावी हिंसा मशहूर है पर इस दौर में कहीं से हिंसा तो दूर छोटे-मोटे झगड़े की शिकायत भी नहीं हुई। भारी मतदान के सियासी दल अपने-अपने ढंग से मतलब निकाल रहे हैं। पहली बात तो यह मानी जा रही है कि भारी मतदान कभी भी सत्तारूढ़ दल को नहीं भाती। माना यही जाता है कि वोटर सत्ता के प्रति विरोध जताने के लिए हमेशा उत्साह दिखाता है। इस बार के चुनाव में सबसे बड़ी पहेली है कि प्रदेश के करीब 46 फीसदी युवा वोटर (उम्र 18 से 39 वर्ष) में से लगभग 55 लाख वोटर 18 वर्ष के हैं। एक करोड़ से ऊपर ऐसे वोटर हैं जो पहली बार अपना वोट देंगे। अहम मुद्दा यह भी है कि युवा वर्ग का यह वोटर क्या करेगा? इस वर्ग को राजनीति में कम दिलचस्पी है, कैरियर, भविष्य, नौकरी, रोजगार आदि शायद इनके लिए महत्वपूर्ण हैं। युवा वर्ग चाहे शहरी इलाके का हो या ग्रामीण क्षेत्रों का वह अपने भविष्य को लेकर कहीं ज्यादा उत्सुक एवं अधीर रहता है। यही वजह है कि वह राजनीति में झाड़ू लगाकर कुछ सफाई का काम कर सकता है। भ्रष्टाचार या राजनीति के अपराधीकरण को चुपचाप स्वीकार करने के बजाय इस वर्ग में प्रदेश की खुशहाली, सरकार के स्थायित्व, रोजगार के नए अवसर जैसे मुद्दों को तरजीह देकर बदलाव लाने की क्षमता रखता है। इसलिए शायद हर बड़ी सियासी पार्टी ने चाहे रोजगार हो या मुफ्त लैपटॉप जैसे प्रलोभन खुलकर सामने रखे हैं। इस नए वर्ग के वोटर की वजह से अगर राहुल गांधी कांग्रेस को उत्साहित कर रहे हैं तो अखिलेश यादव सपा के तुरुप के पत्ते बने हुए हैं। बसपा और भाजपा में इस वर्ग के सशक्त नेताओं की कमी साफ खटक रही है। उत्तर प्रदेश में चुनाव का आखिरी राजनीतिक नतीजा जो भी हो, पहले चरण के मतदान ने यह संकेत दे दिया है कि सामान्यता उदासीन रहने वाले वोटरों का जमाना गया। उन उम्मीदवारों के लिए भी आशा क्षीण हो गई है जो महज 20-20 फीसदी वोट लेकर जीतते रहे हैं। आशा यह जताई जा रही है कि बाकी के छह चरणों में मतदान 65 फीसदी को भी पार कर सकता है। बहरहाल राज्य की 55 सीटों पर शांतिपूर्ण मतदान के बावजूद चुनौतियां कम नहीं हैं। पूरे उत्तर प्रदेश में अब तक जिन 15 लाख से ज्यादा संदिग्धों को पकड़ा गया है, उनमें से दो लाख से कुछ ज्यादा इन सीटों वाले क्षेत्रों के हैं। पूरे राज्य में अब तक 33 करोड़ नकदी के साथ-साथ 4345 गैर-कानूनी हथियार, 6636 कारतूस और 2,43,415 लीटर गैर-कानूनी शराब जब्त की गई है।
बुधवार के पहले चरण के मतदान के दौरान कांग्रेस, सपा और बसपा सभी सियासी दलों की सांसें अटकी रहीं। दोपहर पहले बेहद धीमी मतदान की रफ्तार से कांग्रेस खासी चिन्ता में पड़ गई लेकिन शाम को आई अचानक तेजी ने पार्टी में नया उत्साह भर दिया। पहले चरण के मतदान में जिन सीटों पर वोट पड़े उनमें कांग्रेस को अच्छी खासी उम्मीद है। इन 10 जिलों में विधानसभा की 55 सीटें हैं जिनमें से कांग्रेस को 10 से 15 सीटें मिलने की उम्मीद है। इस क्षेत्र में पार्टी को अन्य पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम मतदाताओं से उम्मीद है कि वे कांग्रेस के पक्ष में मतदान करेंगे। पहले चरण के मतदान को कांग्रेस इसलिए भी महत्वपूर्ण मान रही है क्योंकि इससे सूबे का ट्रेंड पता चलेगा। इस चरण में कांग्रेस की तरफ मतदाताओं का रुझान दिखा तो यह बाकी चरणों में भी पुर-असर दिख सकता है। इसके पीछे कोई कर्मकांडी टोटके जैसी वजह नहीं है। जिन 10 जिलों में 55 सीटों के लिए बुधवार को मतदान हुआ, उस क्षेत्र में 2007 के विधानसभा और 2009 के लोकसभा चुनाव के नतीजों का विश्लेषण इसके पीछे कारण है। इस क्षेत्र में मुस्लिम, दलित और अतिपिछड़ों के मत ज्यादा हैं, जिन पर कांग्रेस ने पूरे चुनाव पर जोर दिया है। कांग्रेस मतदान से ठीक पहले यह स्पष्ट संकेत देने में जुटी कि कांग्रेस इस बार अपने ही दम पर सरकार बना लेगी। राहुल गांधी ने कई मीटिंगों में और सोनिया गांधी ने उन्नाव में अपनी आखिरी मीटिंग में कहा कि कांग्रेस किसी के साथ गठबंधन नहीं करेगी, से स्पष्ट संकेत देना था कि कांग्रेस सरकार बनाने की काफी कांफिडेंट है। इसके पीछे उन अवसरवादी वोटरों को भी पटाना था जो अन्त तक देखते रहते हैं कि सरकार किसकी बनेगी। अगर कांग्रेस बहुत उत्साहित है तो उत्साह तो समाजवादी पार्टी का भी चरम पर है। सपा का दावा है कि अगली सरकार उसी की बनेगी। बहुमत में कमी रही तो उसका भी बंदोबस्त हो जाएगा। पार्टी का दावा है कि अखिलेश यादव की चुनावी सभाओं में जिस कदर भीड़ उमड़ रही है, उसके भविष्य के संकेत साफ दिख रहे हैं। पार्टी की एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि अपराधियों से पार्टी को अलग रखने की अखिलेश यादव के फैसले से तमाम उन वर्गों में भी पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ी है जो सपा से अतीत में सदा दूर रहे। उनका दावा है कि इस बार बहुजन समाज पार्टी के तमाम किले ढह जाएंगे। कहना होगा कि यह चुनाव इस नजरिये से भी महत्वपूर्ण होगा कि सभी पार्टियों ने अपने पारम्परिक वोट बैंक के अलावा दूसरों पर खास ध्यान दिया है। इन वोटों में ब्राह्मण, राजपूत जैसी अगड़ी जातियां, यादव को छोड़कर दूसरी पिछड़ी जातियां, कोइरी, राजभर, निषाद-मल्लाह जैसी अतिपिछड़ी जातियां, मुस्लिम वोट शामिल हैं और इन सभी के बीच जबरदस्त मंथन है। कांग्रेस और सपा की तरफ से दलित जातियों में भी जाटव बनाम गैर-जाटव के आधार पर इस मंथन की कोशिश हुई। राहुल गांधी का दलित परिवारों के बीच जाकर उठना-बैठना, इसी नजरिये से देखा जा रहा है। बहरहाल, इन सभी कोशिशों के अंतिम नतीजों को अपने-अपने पक्ष में लेकर जो पार्टियां दावा कर रही हैं, उनमें कांग्रेस सबसे आगे है। इसकी वजह भी है। कांग्रेस के पास इस चुनाव में पाना ही पाना है, खोना कुछ नहीं है। कांग्रेस विश्लेषक इसी आधार पर मान रहे हैं कि इस चरण में अगर कुछ निश्चित कारक उसके हक में काम आए तो यह अगले चरण के चुनाव में भी असर दिखा सकते हैं।