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Saturday, 2 May 2026

खाड़ी देशों में उभरते मतभेद


अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद से खाड़ी देशों में आपसी मतभेद तेजी से बढ़ते नजर आने लगे हैं। होर्मूज स्ट्रेट के बंद होने से स्थिति विस्फोटक होती जा रही है। इस रास्ते के बंद होने से खाड़ी के बड़े देश जिनकी अर्थव्यवस्था तेल के निर्यात पर निर्भर है वह खासे उत्तेजित हैं। इसका एक नतीजा संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का प्रमुख तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक और ओपेक प्लस से बाहर जाने का फैसला। यह फैसला ईरान जंग की वजह से ऐतिहासिक रूप से दुनियाभर में ऊर्जा को लेकर एक बड़ा संकट पैदा हुआ है और जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। यूएई ने कहा है कि यह फैसला उसकी दीर्घकालिक रणनीति इकोनॉमिक विजन और बदलती एनजी प्रोफाइल को दर्शाती है। यूएई के ऊर्जा मंत्री सुहैल मोहम्मद अल मजरूई ने कहा है कि इस समूहों के तहत किसी बाध्यता से मुक्त होने पर देश को ज्यादा लचीलापन मिलेगा। ओपेक को 60 साल बाद छोड़ने का फैसला यूएई ने अचानक नहीं लिया, बल्कि इसके पीछे लंबे समय से पनप रहा असंतोष है। अबू धाबी को लगातार यह खटक रहा था कि सऊदी अरब ओपेक के जरिए तेल उत्पादन को नियंत्रित करता है और यूएई को अपनी क्षमता के हिसाब से ज्यादा तेल निकालने नहीं देता। जब यूएई ज्यादा उत्पादन करना चाहता था, तब सऊदी कम उत्पादन पर जोर देता रहा, जिससे दोनों देशों में तनाव बढ़ता चला गया। इस तनाव को हवा और तब मिली जब पाकिस्तान की भूमिका सामने आई। यूएई को पाकिस्तान का रवैया बिल्कुल पसंद नहीं आया, खासकर तब जब अमेरिका और ईरान के बीच वह मध्यस्थ बनने की कोशिश कर रहा था। एमएसटी फाइनेंशियल में ऊर्जा अनुसंधान के प्रमुख शाऊल कावर्निक ने कहा कि यह गठबंधन के अंत की शुरुआत हो सकती है। यूएई के जाने के साथ ओपेक अपनी क्षमता का लगभग 15 प्रतिशत खो देगा। इस फैसले को ओपेक के साथ-साथ इस गुट के सर्वेसर्वा माने जाने वाले सऊदी अरब के लिए झटका माना जा रहा है। यूएई का बाहर जाना अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक जीत माना जा रहा है जिन्होंने पहले ओपेक पर दुनिया का शोषण करने का आरोप लगाया था। जनवरी में उन्होंने सऊदी अरब और अन्य ओपेक देशों से तेल की कीमत कम करने को कहा था और टैरिफ लगाने की अपनी धमकी को भी दोहराया था। यूएई का ओपेक से अलग होने का निर्णय सिर्फ एक सदस्य देश का प्रस्थान नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक अहम मोड़ है। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव, होर्मूज जलडमरूमध्य पर अनिश्चितता और वैश्विक मुद्रास्फीति पहले से ही तेल बाजार को अस्थिर बनाए हुए है। यूएई ओपेक का तीसरा बड़ा उत्पादक सदस्य देश था और समूह के उत्पादन में करीब 12 फीसदी का योगदान करता था। ऐसे में उसका बाहर निकलना ओपेक की आपूर्ति क्षमता को प्रभावित जरूर करेगा। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। अगर ओपेक की शर्तें से मुक्त यूएई वैश्विक तेल बाजार को अतिरिक्त आपूर्ति करता है तो इससे तेल की कीमतों में कमी आ सकती है। यह स्थिति भारत जैसे उन देशों के लिए विशेष तौर पर फायदेमंद है जो ऊर्जा के आयात पर ही निर्भर है। गौरतलब है कि भारत अपने ऊर्जा सुरक्षा संबंधी तथ्यों से निपटने के लिए लंबे समय से ओपेक देशों से तेल के उत्पादन में बढ़ोतरी करने की मांग करता रहा है। भारत का कुल तेल जरूरतों का लगभग 40 फीसदी हिस्सा ओपेक देशों से आता है। हालांकि यह देखते हुए कि वैश्विक ऊर्जा बाजार कभी स्थिर नहीं रहता, वह निरंतर भू-राजनीतिक, आर्थिक, पर्यावरणीय बदलावों से प्रभावित होता रहता है। सऊदी अरब के लिए अब बाकी ओपेक देशों को एकजुट रखना बड़ी चुनौती बन गया है। यूएई ने शुरुआत कर दी है, अब देखना होगा कि और कौन-कौन से देश इसके नक्शे-कदम पर चलते हैं। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 30 April 2026

पागलों की दुनिया : मुझे मरने का डर नहीं



यह कहना था अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर में एक फायरिंग की घटना के बाद। ट्रंप ने घटना के बाद सीबीएस न्यूज को दिए इंटरव्यू में बताया कि जब फायरिंग हुई तो मैं जमीन पर गिर गया और फर्स्ट लेडी भी। सिक्योरिटी फोर्सेस के तुरन्त एक्टिव होने पर ट्रंप ने कहा कि मैं देखना चाहता था कि आखिर हो क्या रहा है? ट्रंप से पूछा गया कि क्या आपको पता है कि आप शूटर के निशाने पर थे? इसके जवाब में उन्होंने कहा- मुझे नहीं पता। मैंने एक मैनिफेस्टो पढ़ा। वह रेडिकलाइज्ड है। वह एक क्रिश्चियन विश्वासी था और फिर वह एंटी क्रिश्चियन बन गया और उसमें बहुत बदलाव आया। व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर के दौरान हुई फायरिंग में निशाने पर ट्रंप और उनके अधिकारी ही थे। यह बात एक्टिंग यूएस अटार्नी जनरल टॉड ब्लेंच ने कही। संदिग्ध की पहचान 31 साल के कोल टॉमस एलन के रूप में की गई है। उधर गोलीबारी के मामले में गिरफ्तार संदिग्ध कोल एलन ने कथित घोषणा पत्र में कई गंभीर आरोप लगाए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार एलन ने घटना से कुछ मिनट पहले अपने परिवार के एक सदस्य को एक कथित घोषणा पत्र भेजा था। जिसमें उसने अपने इरादों और विचारों का जिक्र किया। इस कथित दस्तावेज में एलन ने दावा किया कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन से जुड़े लोगों को निशाना बनाने की योजना बना रहा था। हालांकि उसने एफबीआई डायरेक्टर श्री पटेल को छोडने की बात भी कही। उसने लिखा कि प्रशासन के अधिकारियों को वह प्राथमिकता के आधार पर तथ्य बनाएगा, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि उसके शब्दों का पूरा अर्थ क्या है? घोषणा पत्र में एलन ने बेहद गंभीर भाषा का इस्तेमाल करते हुए कहा कि वह ऐसे लोगों को स्वीकार नहीं कर सकता जिन्हें वह अपराधी या देशद्रोही मानता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उसने कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग भी किया जिसमें उसने ट्रंप प्रशासन से जुड़े विवादों और आरोपों का जिक्र किया। उसने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी टिप्पणियां कीं और दावा किया कि आयोजन स्थल पर सुरक्षा का ध्यान मुख्य रूप से प्रदर्शनकारियों और सामान्य आगंतुकों पर था, न कि किसी संभावित खतरे पर। इस हादसे से यह तो साफ हो जाता है कि सिक्योरिटी की कमी थी। किसी हथियारबंद व्यक्ति का राष्ट्रपति के कार्यक्रम के इतने करीब पहुंचना भी बेहद गंभीर लापरवाही है। वहां ट्रंप ही नहीं, उनके प्रशासन से जुड़े सभी महत्वपूर्ण लोग मौजूद थे जो निशाना बन सकते थे। कथित हमलावर भी कोई अनपढ़, गंवार, भाड़े का हत्यारा नहीं है वह मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ा सम्मानजनक टीचर था। विडम्बना यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति पद जितना ताकतवर माना जाता है उससे जुड़े खतरे उतने ही बड़े हैं। अब्राहम लिंकन से लेकर जॉन एफ. कैनेडी तक अमेरिका के चार राष्ट्रपतियों की हत्या हो चुकी है। ट्रंप पर यह तीसरा असफल हमला है। संयोग या कुछ और? व्हाइट हाउस की स्पोक्समैन लेविट के बयान के बाद से सोशल मीडिया पर नई बहस छिड़ गई है। लोग हैरान हैं कि आखिर उन्होंने ऐसे शब्दों का इस्तेमाल क्यों किया जो बाद में हकीकत बन गई। हालांकि उनके समर्थकों का कहना है कि लेविट का मतलब ट्रंप की तीखी बयानबाजी से था, न कि असली गोलियों से। सोशल मीडिया में कुछ लोग इसे स्टेज्ड ड्रामा भी बता रहे हैं। उनका कहना है कि चारों तरफ से घिरे डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी जनता की सहानुभूति लेने के लिए यह ड्रामा करवाया है। सम्भव है कि इस घटना के बाद इस बार भी कुछ मोर्चे पर चुनौती झेल रहे ट्रंप प्रशासन को थोड़ी राहत मिल जाए। बाकी सत्य कभी निकलेगा या नहीं यह नहीं कहा जा सकता। ऐसी घटनाओं का सत्य शायद ही सामने आता है।
- अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 28 April 2026

डील होने की संभावना

पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम से उम्मीद जगी है कि अगले कुछ दिनों में अमेरिका-ईरान में कोई डील हो जाए और युद्ध भविष्य में होने से टल जाए। जिस तरह से ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची 48 घंटे में दो बार इस्लामाबाद गए, वहां से मस्कट (ओमान) गए और वहां से मास्को गए उससे तो लगता है कि ईरान ने डील की शर्तें तय कर ली हैं और ईरान भी अमेरिका से बातचीत करने को तैयार है। दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी थोड़ी नरमी दिखाई और युद्ध विराम को अनिश्चितकाल तक बढ़ा दिया और ईरान के प्रतिनिधिमंडल से इस्लामाबाद में अगले प्रतिनिधिमंडल को भेजने की इजाजत दी उससे साफ है कि ट्रंप इस युद्ध से हर हालत में बाहर निकलना चाहते हैं। वह जानते हैं कि वह यह  युद्ध हार चुके हैं। आगे लड़ने के लिए न तो उनमें मादा है और न ही युद्ध लड़ने के संसाधन? ट्रंप की एक बड़ी मजबूरी यह भी है कि उन्हें 2 मई तक अमेरिकी कांग्रेस (संसद) से ईरान युद्ध को जारी रखने के लिए स्वीकृति भी लेनी होगी। जोकि शायद मुश्किल हो। क्योंकि अमेरिका के 63 प्रतिशत नागरिक ट्रंप के इस युद्ध के खिलाफ हैं और वह नहीं चाहते कि अमेरिका इजरायल का युद्ध लड़े। इसके अलावा अमेरिकी सेना ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके पास  अब हथियारों का जखीरा आधा हो चुका है और यह वह किसी भविष्य इमरजेंसी के लिए रखना चाहता है। सो मुझे नहीं लग रहा कि ट्रंप में अब मादा है कि यह युद्ध जारी रखें। देखा जाए तो असहमति के भी दो-तीन मुद्दे ही बचे हैं। होर्मुज स्ट्रेट को खोलना, ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कंट्रोल और मिसाइलों को सीमित करना, होर्मुज पर टोल लेना? इत्यादि यही प्रमुख मुद्दे बचे हैं। ईरान के विदेश मंत्री के इतनी बार इस्लामाबाद के चक्कर लगाना यह संकेत देता है कि ईरान भी अब किसी समझौते को चाहता है। ट्रंप को अपने उकसावे वाले फिजूल बयान  बंद करने होंगे। खामखां वह उल्टे सीधे बयान देकर माहौल खराब करते हैं। दो दिन पहले हुए जानलेवा हमले का भी ट्रंप पर जरूर असर पड़ा होगा। सैन्य टकराव से दोनों पक्ष जितना हासिल कर सकते थे, कर लिया है। अमेरिका ने जिन तथ्यों को लेकर जंग छेड़ी थी वे अब भी दूर है और पता नहीं वह लड़ाई से इन्हें पूरा कर भी सकते हैं या नहीं? इसी तरह ईरान को भी अंदाजा होगा कि वह ट्रंप की जिद पर एक सीमा तक ही झुक सकता है। ऐसे में एक ही रास्ता बचा है शांति। तेल और नेचुरल गैस को लेकर इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की चेतावनी कि इनकी सप्लाई 2027 तक भी सामान्य नहीं होगी, जंग के गंभीर नतीजों का बस एक पहलू है। गतिरोध लंबा खिंचने से वैश्विक मंदी आ सकती है और इसकी सबसे ज्यादा कीमत आम आदमी को चुकानी पड़ती है। वैसे भी जंग में भी मरता तो आम आदमी है चाहे वह किसी भी देश का हो। इसलिए कुल मिलाकर डील हो जाए तो उसका सारी दुनिया स्वागत करेगी। देखें, यह चमत्कार क्या इस्लामाबाद कर पाएगा?

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 25 April 2026

हारा हुआ कैसे तय कर सकता है युद्ध की शर्तें?

सीजफायर की समय-सीमा अनिश्चितता समय बढ़ाने की घोषणा करते हुए ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी सेना पूरी तरह से तैयार है और युद्ध विराम केवल तब तक है जब तक चर्चा किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच जाती। इसे ईरान ने न केवल ठुकरा दिया, बल्कि उन्हें अमेरिका की कमजोरी बताया। ईरानी संसद के अध्यक्ष के सलाहकार मेहदी मोहम्मदी ने कड़े शब्दों में कहा कि युद्ध के मैदान में हारा देश अपनी शर्तें नहीं थोप सकता। पिछड़ने वाला देश कैसे शर्तें तय कर सकता है? उन्होंने लिखा, ट्रंप के युद्ध विराम विस्तार का कोई मतलब नहीं है। बंदरगाहों की घेराबंदी जारी रखना बमबारी करने से अलग नहीं है। कटु सत्य तो यह है कि ईरान युद्ध में अमेरिका के बुरी तरह से फ्लाप होने के सुबूत सामने आने लगे हैं। जंग में सफलता न दिलाने की वजह से अमेरिका में पिछले 25 दिनों में सेना के चार बड़े अफसरों को बर्खास्त कर दिया गया है। लिस्ट में ताजा नाम नेवल सेकेट्री जॉन फेलन का है। होर्मूज में ईरानी नाकाबंदी को ध्वस्त न कर पाने की वजह से पेंटागन ने केवल फेलन को बर्खास्त ही नहीं किया बल्कि फेलन से पहले आमी चीफ जनरल रैंडी, मेजर जनरल डेविड होंडले और मेजर जनरल विलियम ग्रीन जूनियर को बर्खास्त किया जा चुका है। फेलन राष्ट्रपति ट्रंप के बेहद करीबी अफसर माने जाते हैं। फेलन पर कमांड को दरकिनार करने और युद्ध में अपेक्षित सफलता नहीं दिलाने का आरोप है। हालांकि आधिकारिक बयान में कहा गया है कि फेलन ने खुद ही इस्तीफे की पेशकश की है। उधर फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक होर्मूज के बाहर अमेरिका नाकाबंदी करने में पूरी तरह विफल साबित हुआ है। सेटकॉम के बयान के उलट 22 अप्रैल को 34 ईरानी जहाज होर्मूज से गुजर गए। इन जहाजों को अमेरिका रोक नहीं पाया। उधर सेटकॉम का कहना है कि उसने होर्मूज में 10 हजार सैनिक लगा रखे हैं। मंगलवार 21 अप्रैल को इस्लामाबाद में ईरान-अमेरिका के बीच शांति वार्ता को लेकर प्रस्तावित बैठक में ईरान ने शामिल होने से मना कर दिया। सीएनएन के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप ईरान जंग से बाहर निकलना चाहते हैं। इसकी एक वजह संभावित मिड टर्म इलेक्शन हैं। ट्रंप को लगता है कि मिड टर्म इलेक्शन तक अगर युद्ध जारी रहता है तो उनकी पार्टी को काफी ज्यादा नुकसान हो सकता है। इसलिए ट्रंप ने ईरान से बिना बात किए सीजफायर को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया है। होर्मूज अभी जल्द खुलने वाला भी नहीं है, बेशक ट्रंप कितना भी चाहें। अमेरिकी थिंक टैंक का मानना है कि होर्मूज स्ट्रेट के बिछी माइंस हटाने में छह महीने तक का समय लग सकता है। इससे तेल सप्लाई, वैश्विक व्यापार लंबे समय तक प्रभावित रहेगा। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम नहीं हुआ है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करे। संवर्धित यूरेनियम सौंप दे और होर्मूज को पूरी तरह खोल दे। दूसरी तरफ ईरान ने कहा है कि जब तक अमेरिका उसकी नाकाबंदी खत्म नहीं करेगा, वह बातचीत नहीं करेगा। जैसा मेहदी मोहम्मद ने कहा है हारे युद्ध में बुरी तरह फ्लाप हुए अमेरिका युद्ध की शर्तें कैसे तय कर सकता है?

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 23 April 2026

बंद-खुला-बंद-होर्मुज पर सस्पेंस


होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर पहुंच रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच पिछले करीब 50 दिनों से जारी तनाव के कारण शांति वार्ता खटाई में पड़ती दिख रही है। इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका में सक्रिय बना हुआ है। होर्मुज की ताजा तनातनी को देखते हुए पाकिस्तानी मध्यस्थता टीम वापस इस्लामाबाद लौट चुकी है। पाकिस्तान में पहले दौर की शांति वार्ता के बाद अमेरिका ने होर्मुज का ब्लॉकेड लागू कर दिया है। वहीं ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला बताया है। समुद्र में ईरानी जहाजों तक को भी रोका जा रहा है और तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। दुनिया की नजर अब इस पर है कि इस टकराव का अगला कदम क्या होगा? सवाल यह भी है कि आखिर होर्मुज पर किसका राज है और आगे किसका राज चलेगा? ईरान और अमेरिका के बीच लगभग 40 दिनों तक भीषण युद्ध चला। इसके बाद बड़ी मुश्किल से सीजफायर का ऐलान किया गया और इस्लामाबाद में शांति वार्ता बुलाई गई। लेकिन यह बातचीत बेनतीजा रही। बातचीत फेल होने का सबसे बड़ा कारण होर्मुज रहा। होर्मुज पर किसका दबदबा रहेगा इसका फैसला नहीं हो सका। फिलहाल तो शांति वार्ता के बाद ईरान और अमेरिका के बीच होर्मुज पर कब्जे को लेकर सस्पेंस की आग धधक रही है। अमेरिका और ईरान आमने-सामने खड़े हैं। दुनिया में तेल के इस अहम रास्ते पर किसका कब्जा है, किसके हाथ में है? सवाल हर किसी को परेशान कर रहा है। दोनों खेमे अपने-अपने दावों पर अड़े हुए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्ती ने माहौल और गरमा दिया है। कई देशों की अर्थव्यवस्था इसी रास्ते पर टिकी हुई है। बता दें कि दुनिया की आधी से ज्यादा तेल सप्लाई इसी रास्ते पर निर्भर है। एक छोटी सी गलती भी ग्लोबल इकॉनामी को हिला सकती है। अमेरिका का ब्लॉकेड कितना कारगर साबित हो रहा है? या ईरान की धमकी में दम है? सस्पेंस हर घंटे बढ़ता जा रहा है। गुरुवार को ईरानी जहाज को अमेरिका ने होर्मुज से वापस लौटाया है इसके बाद तनाव चरम सीमा पर पहुंच गया है। सीजफायर के बावजूद अमेरिका की इस हरकत से ईरान का गुस्सा सातवें आसमान पर है। ईरान ने अमेरिका को जवाबी कार्रवाई की सख्त चेतावनी दी है। डर इसका है कि युद्ध विराम जो 23 अप्रैल को खत्म हो रहा है वह आगे बढ़ेगा या नहीं? होर्मुज के बंद होने से अब यह टकराव सिर्फ दो देशों का नहीं रहा। इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है। तेल बाजार में उथल-पुथल है, शिपिंग कंपनियां सतर्क हो गई हैं। हर देश चाहता है कि यह अहम रास्ता खुला रहे। लेकिन जमीन और समुद्र पर चल रही रणनीतिक चालें इस रास्ते को सबसे बड़ा फ्लैश पाइंट बना रहा है। ट्रंप ने रायटर्स को दिए एक और बयान में दावा किया कि ब्लॉकेड पूरी तरह लागू है और ईरान अब सामान्य व्यापार नहीं कर पा रहा है। सेटकॉम के अनुसार अब तक 10 जहाजों को वापस भेजा जा चुका है। इस बीच खबर यह भी आई है कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने ट्रंप को सुझाव दिया है कि अगर शांति वार्ता आगे बढ़ानी है तो होर्मुज से ब्लॉकेड समाप्त करना होगा। कहा जा रहा है कि ट्रंप ने कहाö मैं विचार करूंगा।
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 21 April 2026

ईरान-अमेरिका, इजरायल युद्ध: आगे क्या होगा?

फिलहाल 23 अप्रैल तक युद्ध विराम चल रहा है। पाकिस्तान दोनों पक्षों के बीच डील करवाने में जुटा हुआ है। आसिम मुनीर तेहरान में हैं और शाहबाज रियाद के चक्कर लगा रहे हैं। उधर इजरायल-लेबनान युद्ध में ट्रंप की बदौलत दस दिन का सीजफायर चल रहा है। उम्मीद की जा रही है कि पाकिस्तान में दूसरे दौर की बातचीत संभव है। पर इसमें अभी कई पेंच फंसे हुए हैं। दोनों पक्ष अपनी-अपनी बड़ी शर्तों पर अड़े हुए हैं। अब सवाल उठता है कि आगे क्या हो सकता है? हमें तो चार संभावित परिदृश्य दिखाई दे रहे हैं। रणनीतिक विराम के रूप में नाजुक युद्ध विराम ः कई हफ्तों की लड़ाई के बाद, अमेरिका-ईरान युद्ध विराम संकट को सीमित करने की इच्छा का संकेत देता दिखा। हालांकि शुरुआत से ही इसके साथ कई तरह की बातें जुड़ी रहीं। युद्ध विराम के प्रावधानों की व्याख्या को लेकर मतभेद सामने आए। इन मतभेदों के कारण कुछ पर्यवेक्षकों ने इसे एक स्थायी ढांचे के बजाए रणनीतिक विराम के रूप में देखना शुरू कर दिया। एक अमेरिकी विश्लेषक के अनुसार संघर्ष शुरू होने के बाद से ही समझौते तक पहुंचने की संभावना लगभग शून्य थी। ये सिद्धांतों, स्थितियों और नीतियों का एक ऐसा समूह है, जिन पर अमेरिका और ईरान सालों से असहमत रहे हैं और युद्ध इन मतभेदों को कम करने में नाकाम रहा है। दोनों पक्षों के परस्पर विरोधी बयानों से स्थिति और बिगड़ गई है। डोनाल्ड ट्रंप की ओर से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकाबंदी की घोषणा से टकराव और बढ़ गया है। हालांकि तनाव बढ़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। दावे से कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि युद्ध रुकेगा या नहीं? एक परिदृश्य जो शायद सबसे अधिक मुमकिन है, वो है टकराव की नियंत्रित तनाव के रूप में वापसी। इसका मतलब होगा कि संघर्ष खुली जंग के स्तर तक नहीं पहुंचेगा और न ही दोनों पक्ष पूरी तरह सैन्य कार्रवाई से परहेज करेंगे। इसमें बुनियादी  ढांचे, सैन्य ठिकानों या आपूर्ति लाइनों पर सीमित हमले जारी रह सकते हैं। इसके बाद प्राक्सी समूहों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी। कुछ विश्लेषक इस स्थिति को शैडो वॉर कहते हैं। जैसे-जैसे तनाव बढ़ता है, गलत आंकलन का खतरा बढ़ता है, और भले ही कोई पक्ष तनाव बढ़ाना न चाहता हो, एक छोटी गलती भी संघर्ष को अनियंत्रित स्तर तक पहुंचा सकता है। पाकिस्तान में वार्ता विफल होने के बावजूद यह निष्कर्ष निकालना अभी संभव नहीं है कि कूटनीति खत्म हो चुकी है या वार्ता पूरी तरह टूट चुकी है। अमेरिका का 15 सूत्रीय प्रस्ताव और ईरान का 10 सूत्रीय जवाबी प्रस्ताव यह जरूर दिखता है कि दोनों पक्ष बजाए किसी मध्य मार्ग पर पहुंचने के अभी भी अपनी-अपनी शर्तों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसलिए भले ही वार्ता का नया दौर संभव हो। लेकिन जल्दी और व्यापक समझौते की उम्मीद करना सही नहीं लगता। अगर अमेरिकी नाकाबंदी जारी रहती है तो ईरानी सेना ने खाड़ी, लाल सागर और ओमान की खाड़ी में शिपिंग की खतरे की चेतावनी दी है। ट्रंप ने घोषणा की है कि देश की नौसेना ईरान पर समुद्री नाकाबंदी जारी रखेगा जिससे वह हर गुजरते जहाज को रोक सकता है और यह ईरान को किसी हालत में स्वीकार नहीं है। ईरान ने यह धमकी दी है कि अंतर्राष्ट्रीय जल क्षेत्र में उन जहाजों को रोका जाएगा जो होर्मुज से गुजरने के लिए ईरान को ट्रांजिट शुल्क नहीं देंगे तो नतीजा अच्छा नहीं होगा। ट्रंप चाहते हैं ईरान की तेल आय को रोकना, उसकी अर्थव्यवस्था को कमजोर करना और ईरान को मजबूर करना कि वह अमेरिका की शर्तों को माने। लेकिन अन्य विश्लेषकों ने इस नीति से अमेरिका को होने वाली भारी लागत की ओर इशारा किया है क्योंकि इससे उसकी सैन्य ताकत भौगोलिक रूप से ईरान के करीब आ जाएगी और हमलों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाएगी। मौजूदा माहौल में रणनीतिक फैसले, सुरक्षा से जुड़े सवाल और जमीनी स्तर पर छोटे घटनाक्रम भी संकट की दिशा पर बड़ा असर डाल सकते हैं।

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 18 April 2026

ट्रंप के डाकिया आसिम मुनीर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आजकल आंख और कान पाकिस्तान सेना अध्यक्ष आसिम मुनीर बने हुए हैं या यूं कहें कि ट्रंप की नाक के बाल बने हुए हैं। ट्रंप मुनीर पर इतना विश्वास करते हैं कि उसे व्हाइट हाउस में लंच पर बुलाते हैं। वन टू वन मीटिंग करते हैं। शायद इस समय आसिम मुनीर दुनिया के एक मात्र सेनाध्यक्ष होंगे जिन्हें व्हाइट हाउस में बुलाकर ट्रंप उनके साथ बाकायदा लंच करते हैं। इन परिस्थितियों में हमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ जब इस्लामाबाद में पहले राउंड की वार्ता विफल हो गई तो दोबारा वार्ता करने के लिए ट्रंप ने मुनीर को अपना डाकिया चुना और उन्हें ईरानी नेतृत्व से बातचीत करने और दोबारा इस्लामाबाद में शांति वार्ता में शामिल होने के लिए खासतौर पर भेजा। मजेदार बाद यह भी है कि आसिम मुनीर जहां ट्रंप के विश्वासपात्र हैं वहीं चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भी भरोसेमंद हैं। खैर! हम बात कर रहे थे मुनीर के ईरान पहुंचने की। ईरान और अमेरिका के बीच जारी जंग को लेकर 2 हफ्ते का संघर्ष विराम चल रहा है। दोनों  देशों के बीच जारी जंग को खत्म करने के लिए पहला दौर इस्लामाबाद में आयोजित किया गया। लेकिन यह बैठक कामयाब नहीं रही थी। अब दोनों फिर से बातचीत के टेबल पर आने की कवायद में लगे हैं। बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का संदेश लेकर ईरान पहुंचे। सूत्रों का कहना है कि ईरान-अमेरिका की अगली बैठक पर आसिम मुनीर द्वारा दी गई रिपोर्ट के बाद ही ट्रंप फैसला करेंगे। तस्नीम न्यूज एजेंसी के अनुसार पाकिस्तानी सेना प्रमुख मुनीर की अगुवाई वाले पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल की ईरानी अधिकारियों के साथ मुलाकात के बाद, ईरानी पक्ष मामले की जारी समीक्षा करेगा और फिर वह अमेरिका के बीच बातचीत के अगले दौर को लेकर कोई फैसला करेगा। ट्रंप इस यात्रा को महत्व दे रहे हैं कि उन्होंने यहां तक कहा है कि यह संभव है कि अगले दौर की शांति वार्ता के लिए मैं खुद भी इस्लामाबाद जा सकता हूं। मुनीर के इस दौरे का मकसद ईरानी नेतृत्व तक अमेरिका का संदेश पहुंचाना और बातचीत के अगले दौर की योजना बनाना है। सोशल मीडिया पर अटकलें लगाई जा रही हैं कि मुनीर की इस यात्रा के पीछे असली मकसद क्या है? कहा जा रहा है कि ट्रंप यह जानना चाहते हैं कि ईरान का शासन आखिर चला कौन रहा है? क्या आयतुल्लाह मुजतबा खामेनेई चला रहे हैं? उनकी हालत क्या है? क्या वह घायल हैं और फैसले लेने में असमर्थ हैं? ट्रंप जानना चाहते हैं कि वह शांति वार्ता आखिर ईरान में किससे कर रहे हैं? मुनीर ने ईरान के सभी दिग्गज नेताओं से बातचीत की है। वह आईआरजीसी के वरिष्ठ अधिकारियों से भी मिले हैं। तेहरान पहुंचने पर पाकिस्तानी डेलीगेशन को लेने हवाई अड्डे पर खुद विदेश मंत्री अब्बास अराघची पहुंचे थे। इससे पता चलता है कि ईरान भी इस पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल की यात्रा को कितना महत्व देता है। आसिम मुनीर ट्रंप का संदेश तो लेकर गए ही हैं साथ ही यह भी संभव है कि वह शी जिनपिंग का भी कोई संदेश लेकर गए हैं। अभी डिटेल्स नहीं आई, जल्द पता चल जाएगा कि मुनीर की यात्रा सफल रही या नाकाम रही।

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 16 April 2026

मेलानिया ने अमेरिका में नई जंग छेड़ दी


ईरान युद्ध में सीजफायर होते ही अमेरिका के अंदर एक और जंग शुरू हो गई है। आप हैरान होंगे कि यह कौन सी जंग है? बता दें कि एपस्टीन फाइल्स की यह जंग फिर शुरू हो गई है। एपस्टीन फाइल्स का जिन्न फिर बाहर आया है और उसे बाहर निकाला है (चौंकिए मत) अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बीवी मेलानिया ट्रंप ने। अमेरिका की फर्स्ट लेडी मेलानिया ने एपस्टीन फाइल्स पर धमाकेदार खुलासा किया है जिससे व्हाइट हाउस में खलबली मचनी स्वाभाविक ही है। जेफरी एपस्टीन से जुड़ी अफवाहों पर हमला बोलते हुए मेलानिया ने पीड़ितों की सुनवाई की मांग कर डाली है। मेलानिया ने 9 अप्रैल 2026 को व्हाइट हाउस से अचानक एक सनसनीखेज बयान जारी किया। उन्होंने जेफरी एपस्टीन से जुड़ी सभी झूठी खबरों, अफवाहों को साफ तौर पर खारिज कर दिया। एपस्टीन दोषी यौन अपराधी था। मेलानिया ने कहा कि ये अफवाहों को मैं साफतौर पर खारिज करती हूं। ये अफवाहें मुझे बदनाम करने की कोशिश हैं और इन्हें अब तुरन्त रोकना चाहिए। मेलानिया ने साफ शब्दों में कहा, जेफरी एपस्टीन से मेरे नाम को जोड़ने वाली झूठी बातें आज ही खत्म होनी चाहिए। मैं एपस्टीन की दोस्त कभी नहीं रही। डोनाल्ड और मैं कभी-कभी उसी पार्टी में जाते थे जहां एपस्टीन भी होता था। क्योंकि न्यूयार्क और पाम बीच के सोशल सर्कल में ऐसा आम है। लेकिन मैंने एपस्टीन या उसकी साथी घिस्लेन मैक्सवेल के साथ कभी कोई रिश्ता नहीं रखा। उन्होंने कहा- मैं कांग्रेस से कहती हूं कि इन पीड़ित महिलाओं को शपथ लेकर अपनी कहानी बताने का मौका दें। हर महिलाओं, अगर वह चाहे, अपनी बात सार्वजनिक रूप से कहने का अधिकार है। जेफरी एपस्टीन पर मेलानिया की प्रेस काफ्रेंस से बहस फिर तेज हो गई है। जुलियट ब्रायंट ने मेलानिया को सीधी चुनौती देते हुए कहाः मैं शपथ लेकर सच बोलने को तैयार हूं। जुलियट ब्रायंट के वीडियो मैसेज से अमेरिका में हड़कंप मच गया। कुख्यात यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन से जुड़ा मामला एक बार फिर वैश्विक राजनीति और न्याय व्यवस्था के केंद्र में आ गया है। मेलानिया की टिप्पणी के बाद सर्वाइवर्स ने इसे पीड़ितों पर जिम्मेदारी डालने की कोशिश बताते हुए अपना विरोध जताया। इस बीच एपस्टीन सवीवर जूलियट ब्रायंट का एक वीडियो मैसेज तेजी से वायरल हो रहा है। उन्होंने मेलानिया ट्रंप को सीधे संबोधित करते हुए कहा कि अगर शपथ के तहत गवाही देने की बात है तो मैं खुद इसके लिए तैयार हूं और जो कुछ उन्होंने कहा है, वह सच है यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका में इस मामले पर संभावित सुनवाई की चर्चा भी हो रही है। जूलियट ब्रायंट पहले भी गंभीर आरोप लगा चुकी हैं। उनका दावा है कि उन्हें माडलिंग के झांसे में विदेश ले जाया गया, जहां उनका यौन शोषण किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें एपस्टीन के निजी द्वीप पर ले जाया गया और उनका पासपोर्ट छीन लिया गया। वीडियो में ब्रायंट ने यह भी दावा किया कि इस मामले में गवाही देने वाली कई लड़कियां अब जीवित नहीं हैं। वीडियो के अंत में ब्रायंट ने ट्रंप और मेलानिया से भी शपथ के तहत गवाही देने की मांग की। उनका कहना है कि देश के सामने प्रभावशाली लोगों के असली चेहरे सामने आएं।
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 14 April 2026

जिसका डर था वही हुआ

अमेरिका-ईरान के बीच शांति वार्ता विफल हो गई है। वार्ता बेनतीजा ही खत्म हो गई है। पाकिस्तान के इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच पहले दो राउंड में 21 घंटे से ज्यादा शांति को लेकर बातचीत चली, लेकिन यह बेनतीजा रही। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अपनी टीम के साथ अमेरिका के लिए रवाना भी हो गए। वेंस जाने से पहले बोले- समझौता न होने के लिए बुरी खबर ः वेंस ने एक प्रेस कांफ्रेंस में बताया कि समझौता न होना अमेरिका से ज्यादा ईरान के लिए बुरी खबर है। उन्होंने साफ कहा कि अमेरिका बिना किसी डील के ही लौट रहा है। किसी भी समझौते के लिए जरूरी है कि ईरान ये वादा करे कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। सीजफायर डील में अमेरिका की ओर से जेडी वेंस (उपराष्ट्रपति), स्टीव विटकॉफ (विशेष दूत), जेरेड कुशकर (सीनियर एडवाइजर और ट्रंप के दामाद) और ब्रैड कूपर (सैन्य अधिकारी शामिल हुए। ईरान की तरफ से मोहम्मद बागेर गालिबाफ (संसद अध्यक्ष), अब्बास अराघची (विदेश मंत्री) और मजीद तख्त खांची (उप-विदेश मंत्री) शामिल हुए। वार्ता में पाकिस्तान की ओर से प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सेना प्रमुख आसिम मुनीर, विदेश मंत्री इशाक डार व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार आसिम मलिक शामिल हुए। ईरान से 71 सदस्यीय डेलिगेशन पाकिस्तान पहुंचा। इस टीम में सिर्फ बातचीत करने वाले लोग ही नहीं थे बल्कि एक्सपर्ट सलाहकार, मीडिया प्रतिनिधि, डिप्लोमेट और सुरक्षा से जुड़े अधिकारी भी शामिल थे। ईरानी संसद के स्पीकर बागेर गलिबाफ जिस विमान से आए, वह बहुत खास था। वह पूरी दुनिया को अमेरिका का सितम दिखाने के लिए पाकिस्तान सुबूत लेकर आए थे। उनके साथ ऐसे यात्री भी आए जो इस दुनिया में अब नहीं हैं। दरअसल, इस विमान में बागेर गालिबाफ के साथ पाकिस्तान आने वाले दो बच्चे हैं। जो अमेरिकी-इजरायली हवाई हमले में अपनी जान गंवा चुके हैं। प्लेन की सीटों पर उन नन्हें बच्चों की तस्वीर रखी हुई थी। गालिबाफ ने वार्ता से पहले यह तस्वीर शेयर की जिसमें विमान की सीटों पर चार बच्चों की तस्वीरें रखी दिखाई देती थी, जिसके साथ एक-एक स्कूल बैग और फूल भी रखा गया था। ईरानी शहर मिनाब के स्कूल में 28 फरवरी को एक प्राइमरी स्कूल पर हमला हुआ था। इसमें 168 लोगों की मौत हो गई थी, जिसमें 160 स्कूली लड़कियां थीं। गालिबाफ ने वार्ता से पहले दिए बयान में कहा था कि उनका देश बातचीत और समझौते के लिए तैयार है। लेकिन इसके लिए अमेरिका को ईमानदारी से समझौते की पेशकश करनी होगी और ईरान के अधिकारों को स्वीकार करना होगा। उन्होंने साफ कहा कि ईरान के पास सद्भावना है, लेकिन अमेरिका पर भरोसा नहीं। उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वार्ता शुरू होने से पहले ही कहा कि वाशिंगटन ईरान को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों पर रोक लगाने की इजाजत नहीं देगा। ट्रंप ने आगे कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य जल्द ही फिर से खुल जाएगा, चाहे ईरान सहयोग करे या न करे। ट्रंप ने आगे कहा कि ईरान के साथ किसी भी समझौते में उनका मुख्य ध्यान तेहरान की परमाणु क्षमताओं को सीमित करने पर होगा। उन्होंने कहा, कोई परमाणु हथियार नहीं। यही 99 प्रतिशत बात है। वार्ता तो फेल होनी ही थी। दोनों पक्षों की मांगों में बहुत बड़ा फासला था जिसे पाटना मुश्किल ही नहीं असंभव था।

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 11 April 2026

मिट जाएंगे पर झुकेंगे नहीं


जंगे हथियारों से नहीं जीती जाती, यह जज्बातों से जीती जाती है। ईरानी आवाम ने यह साबित कर दिया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी दी थी कि आज रात हम ईरान की सभ्यता को ही मिटा देंगे। इसके जवाब में ईरानी आवाम सड़कों पर उतर आई। अपने देश के अस्तित्व और ट्रंप की धमकी के जवाब में ईरानी आवाम अपने देश के पुलों और पावर प्लांटों को बचाने के लिए अमेरिका के सामने सीना तानकर खड़ी हो गई। ईरान के अहवाज, तबरीज, ईलाम सहित कई शहरों में हजारों लोगों ने बिजली संयंत्रों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों के चारों ओर लंबी मानव श्रृंखला बना ली। ईरानी समाचार एजेंसी तसनीम के अनुसार पुरुषों, महिलाओं और यहां तक कि बच्चों सहित बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हुए और ह्यूमन चेन बनाकर डट गए। प्रतिभागियों के हाथों में ईरानी झंडे और राष्ट्रीय नेताओं की तस्वीरों वाले पोस्टर थे और कई लोग मुख्य मार्ग पर एक-दूसरे का हाथ पकड़कर लंबी कतार में खड़े थे। ईरान के अ"ाज में व्हाइट ब्रिज में पावर प्लांट सहित कई स्थानों पर मानव श्रृंखला बनाई गई। यह मानव श्रृंखला वाशिंगटन की ओर से बढ़ती आक्रामक बयानबाजी का सीधा जवाब था। ईलाम के लोगों ने देश को निशाना बनाने वाली किसी भी सैन्य कार्रवाई का विरोध करने के लिए इस मानव श्रृंखला का सहारा लिया। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रीय एकता दिखाने के लिए देश भक्ति का यह जबरदस्त प्रदर्शन किया। इसका सीधा असर वाशिंगटन पर पड़ा। शायद उसको सद्बुद्धि आई कि ईरानी जनता जो सड़कों पर मानव श्रृंखला बनाकर खड़ी है उस पर हम हमला करेंगे तो सारी दुनिया में हमारी थू-थू हो जाएगी। इसीलिए ईरान की सभ्यता को खत्म करने की धमकी देने वाले डोनाल्ड ट्रंप आखिरी क्षणों में पीछे हट गए। ईरान का मौजूदा सैन्य रुख स्पष्ट संकेत देता है कि उसकी प्राथमिकता अपने शासन और सेना ढांचे को बचाए रखना है। इस्लामिक रिपब्लिक के नेतृत्व और सैन्य कमांडरों ने पिछले 3-4 दशकों से ऐसे ही संभावित टकराव की तैयारी की है। शहीद अयातुल्लाह अली खामेनेई ने कई वर्षें पहले ही यह देख लिया था कि किसी न किसी दिन यह स्थिति आएगी और अमेरिका-इजरायल हम पर हमला करेगा। आज अगर ईरान की इस जंग में जीत हुई है तो इसका असल हकदार शहीद अयातुल्लाह खामेनेई ही है। दरअसल मोसाद और नेतन्याहू ने ट्रंप को यह आश्वासन दिया था कि अगर हम अयातुल्लाह खामेनेई और ईरान कि वरिष्ठतम सैन्य कमांडरों को मार देंगे तो ईरान में अंदरूनी विद्रोह हो जाएगा और हम अपने समर्थक को सत्ता में बिठा देंगे पर उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि अयातुल्लाह खामेनेई की शहादत का ईरान की आवाम पर क्या असर होगा। असर उल्टा हुआ जो ईरानी इस्लामी सत्ता के खिलाफ भी थे वे भी अयातुल्लाह खामेनेई की शहादत के बाद सरकार के समर्थन में आ गए और इस जंग में ईरान का पलड़ा भारी हो गया। जैसे मैंने कहा कि गैर परमाणु युद्ध में जीत हथियारों से नहीं होती, जीत जज्बे से होती है, जिसका प्रदर्शन ईरानी जनता ने बाखूबी किया। दरअसल ईरान अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 9 April 2026

एटमी प्लांटों पर चौथा हमला कितना खतरनाक है


ईरान के बुशहर परमाणु केन्द्र के पास चौथी बार अमेरिकी-इजरायली हमला हुआ है। इस हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गई। शनिवार को ईरान के बेहद महत्वपूर्ण बुशहर परमाणु पर से जानलेवा विकिरण का सीधा खतरा तो नहीं है लेकिन हवाओं के जरिए रेडियोधर्मी धूल गल्फ राज्यों और यहां तक कि भारत के पश्चिमी राज्यों तक पहुंचने का खतरा है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की चर्चा होने लगी है। अगर ईरान-इजरायल के बीच जंग खतरनाक स्तर पर पहुंचती है और ईरान की धरती पर परमाणु धमाका होता है, तो सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है? क्या ईरान से उड़ने वाली रेडियोएक्टिव धूल हमारे शहरों तक पहुंचकर तबाही मचा सकती हैं? वैधानिक और रणनीतिक नजरिए से यह समझना जरूरी है कि हवा का रुख और दूरी इस खतरे को कैसे तय करती हैं? ईरान में अगर कोई परमाणु घटना होती है, तो सबसे ज्यादा तबाही उसके पड़ोसी देशों में देखने को मिलेगी। ईरान के 500 से 1000 किलोमीटर के दायरे में आने वाले इराक, तुर्किए, आर्मिनिया, अजरबैजान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे देशों को बेहद घातक रेडिएशन का सामना करना पड़ेगा। इन देशों में रेडियोधर्मी धूल (फॉलआउट) सीधे तौर पर लोगों की सेहत और पर्यावरण को बर्बाद कर सकती है। हवा का बहाव के आधार पर इन देशों की सुरक्षा पूरी तरह दांव पर लगी होगी। ईरान के दक्षिण में स्थित खाड़ी देश जैसे सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, कतर और यूएई भी इस खतरे की चपेट में हैं। अगर ईरान के बुशहर जैसे तटीय परमाणु बिजली संयंत्रों को निशाना बनाया गया तो रेडियो एक्टिव रिसाव सीधे फारस की खाड़ी और अरब सागर के पानी को जहरीला बना सकता है। इससे समुद्री जीव-जंतुओं के साथ-साथ इन देशों की पेयजल व्यवस्था और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ेगा। समुद्री लहरें इस प्रदूषण को भारतीय तटों तक भी पहुंचा सकती हैं। विज्ञान के मुताबिक किसी भी परमाणु विस्फोट के बाद निकलने वाले सबसे खतरनाक और भारी रेडियोधर्मी कण धमाके वाले नगर से कुछ सौ किलोमीटर के दायरे में ही जमीन पर गिर जाते हैं। इतनी लंबी दूरी तय करते समय रेडिएशन का असर काफी हद तक कम हो जाता है। इसलिए तकनीकी रूप से भारत में तत्काल एक्यूट रेडिएशन सिकनेस यानि विकिरण से होने वाली गंभीर बीमारी का सीधा खतरा कम नजर आता है। भले ही भारत ईरान से काफी दूर है, लेकिन वायुमंडल में घुले रेडियोधर्मी कणों को हवाएं दूर तक ले जा सकती हैं। अगर हवा का रुख पश्चिम से पूर्व की ओर रहता है तो परमाणु बादल 48 से 72 घंटों के भीतर भारतीय आसमान तक पहुंच सकते हैं। ऐसी स्थिति में गुजरात, राजस्थान, पंजाब और दिल्ली जैसे राज्यों में रेडियो एक्टिव कणों की मौजूदगी दर्ज की जा सकती है। हालांकि भारत तक पहुंचते-पहुंचते ये कण इतने फैल और हल्के हो चुके होंगे कि इनसे जानलेवा खतरा होने की आशंका बहुत ही कम रहती है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि खाड़ी देशों और ईरान के आसपास बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं। हम ऊपर वाले से प्रार्थना करते हैं कि ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध में परमाणु केंद्रों पर सीधे हमले से बचें। अगर ऐसा होता है तो इसका सीधा असर पूरी कायनात पर पड़ेगा।
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 7 April 2026

फाइटर जेट गिरने से तिलमिलाए ट्रंप


ईरान युद्ध में अपने फाइटर जेट गंवाने के बाद तिलमिलाए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को नया अल्टीमेटम दे दिया है। ट्रंप ने शनिवार को कहा, ईरान ने 48 घंटे में होर्मुज को नहीं खोला तो तबाही झेलने को तैयार रहे, अब आर-पार होगा। उन्होंने कहा- ईरान के लिए वक्त तेजी से निकल रहा है। उसे पीस डील पर साइन कर देना चाहिए। ईरान ने इस धमकी का जवाब अमेरिका के बहु-प्रतिष्ठित एफ-15ई लड़ाकू विमान को मार गिराकर दिया। ईरान ने शुक्रवार को अमेरिका के एक और विमान एफ-35 को मार गिराने का भी दावा किया। वहीं दो अमेरिकी अधिकारियों के सूत्रों ने दावा किया है कि उसका दो सीटर लड़ाकू विमान एफ-15ई ईरान में गिरा है। एक पायलट मिल गया है जबकि ईरान दावा कर रहा है कि दूसरा पायलट उसके कब्जे में है, हालांकि अमेरिका ने इसकी पुष्टि नहीं की है। पेंटागन और सैंट्रल कमांड ने इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव केरोलिन लेविट ने बयान जारी कर बताया कि लड़ाकू विमान गिरने की जानकारी राष्ट्रपति ट्रंप को दे दी गई है। ईरान की आईआरजीसी ने दावा किया कि एफ-35 विमान को दक्षिण पश्चिम ईरान में मार गिराया है। उधर अमेरिकी समाचार पोर्टल एक्सियोस का दावा है कि ईरान ने मार गिराए गए लड़ाकू विमान की जो तस्वीर साझा की है वो एफ-15ई विमान की है। एफ-15ई के स्ट्राइक ईगल एक उन्नत श्रेणी का अमेरिकी लड़ाकू विमान है, जिसे खासतौर पर लंबी दूरी तक गहराई में जाकर दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमला करने के लिए विकसित किया गया है। इस विमान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह हर मौसम में मिशन पूरा कर सकता है। अमेरिका के प्रमुख मीडिया आउटलेट्स में से एक सीएनएन ने इस घटना पर लिखा है कि ईरान के साथ चल रहा युद्ध जो पहले से ही अमेरिकी जनता के बीच काफी अलोकप्रिय साबित हो रहा था एक नए और अधिक जटिल चरण में पहुंच गया है। चैनल ने लिखा कि पहले खबर आई कि ईरान के ऊपर एक अमेरिकी लड़ाकू विमान को गिरा दिया गया है। इसके बाद शुक्रवार को खबर आई कि ईरान ने दूसरे अमेरिकी लड़ाकू विमान को निशाना बनाया है। जबकि सीएनएन ने लिखा है, लेकिन एक ऐसे संघर्ष में जिसमें सैन्य वर्चस्व अमेरिका के पक्ष में हो, ये घटना एक विषम युद्ध के खतरों को दिखाती है। इसकी लागत को अमेरिकी जनता पहले से नामंजूर करती आ रही है। सीएनएन आगे लिखता हैः इन घटनाओं से ईरान के आसमान पर पूरे वर्चस्व के बारे में ट्रंप प्रशासन के दावों के साथ-साथ पिछले महीने से बनाए जा रहे अभेद्य होने के दिखावे की भी धज्जियां उड़ती है। एनबीसी न्यूज ने ईरान की ओर से विमान गिराने के दावे का जिक्र करते हुए लिखा हैö यह पहली बार है जब इस ताजा संघर्ष के तहत ईरान के अंदर अमेरिकी विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ है जिससे यह धारणा गलत साबित होती है कि अमेरिका का ईरानी हवाई क्षेत्र पर पूर्ण नियंत्रण है। एनबीसी लिखता है ः ट्रंप ने इस युद्ध में जीत की घोषणा करते हुए कहा है कि उन्होंने ईरान पर युद्ध समाप्त करने पर सहमत होने के लिए दबाव डाला है। वहीं अब ईरान की ओर से जो दावे किए जा रहे हैं उससे अमेरिका-इजरायल के ईरानी हवाई वर्चस्व के दावों पर संदेह पैदा होता है। इजरायल-अमेरिका के संयुक्त अभियान का प्रमुख मकसद ईरान की मिसाइल रक्षा प्रणाली को नष्ट करना और कमजोर करना रहा है, लेकिन ईरान ने पूरे क्षेत्र में जवाबी हमला करने की क्षमता को बरकरार रखा है। अमेरिका की ओर से छेड़े गए युद्ध के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप और रक्षा सचिव पीट हेगसेव ने बार-बार कहा है कि ईरान की क्षमताओं को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया है। उन्होंने दावा किया कि ईरान के विमानरोधी सिस्टम को खत्म कर दिया है, लेकिन शुक्रवार को उस दावे पर सवाल उठने लगे जब ईरान ने अपने क्षेत्र में एक अमेरिकी लड़ाकू विमान, एफ-15ई को मार गिराया। एक झटके में ईरान ने ट्रंप की सारी हेकड़ी निकाल दी।
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 4 April 2026

ट्रंप निकलने के प्रयास में फंस गए हैं?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय समयानुसार गुरुवार सुबह साढ़े छह बजे व्हाइट हाउस में ईरान जंग पर भाषण दिया। ट्रंप ने फिर धमकी दी है कि अमेरिका आने वाले हफ्तों में ईरान पर इतनी बमबारी करेगा कि उसे पाषण युग में पहुंचा देगा। 20 मिनट के इस प्राइम टाइम भाषण में ज्यादातर वही बातें दोहराईं जो वो कई बार पहले कह चुके थे। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि हम अगले दो से तीन हफ्तों में उन (ईरान) पर बहुत बड़ा हमला करने जा रहे हैं। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकाöजरायल सैन्य अभियान मुख्य रणनीतिक मकसदों को लेकर लगभग पूरा करने के करीब है। उन्होंने अनुमान लगाया कि यह युद्ध अभी दो से तीन हफ्ते और चल सकता है। अगर आप पिछले एक हफ्ते में ट्रंप के ट्रुथ सोशल पर किए गए पोस्ट पर कॉपी-पोस्ट करें तो वह इस राष्ट्र के नाम उनके संबोधन से काफी मिलता-जुलता पाएंगे। राष्ट्रपति ट्रंप ने इस युद्ध के फायदे अमेरिकी जनता को समझाने की भी कोशिश की। इसकी वजह भी है, क्योंकि अमेरिका के कई सर्वे बताते हैं कि 28 फरवरी को शुरू किए गए इस सैन्य अभियान को लेकर ज्यादातर मतदाता असहमति जता रहे हैं। ट्रंप ने अमेरिकी जनता से इस युद्ध को अपने भविष्य में एक निवेश के रूप में देखने की अपील की और कहा कि यह पिछले एक सदी या उससे भी अधिक समय से इस सैन्य संघर्ष की तुलना में कुछ भी नहीं है, जिनमें अमेरिका कहीं अधिक लंबे समय तक शामिल रहा है। लेकिन ट्रंप के भाषण से अमेरिकी जनता नाराज हुई। वह जानना चाहती थी कि यह युद्ध किस दिशा में जा रहा है या अमेरिका के लिए इससे बाहर निकलने के संभावित रास्ते क्या हो सकते हैं? इसमें कई सवालों के जवाब नहीं मिल पाए। पहला ः इजरायल अभी ईरान पर हमले कर रहा है? साथ ही इजरायल को ईरान के ड्रोन और मिसाइल हमलों का सामना भी करना पड़ रहा है जिसमें बुधवार को तेल अवीव के पास कुछ हमले भी शामिल हैं। एक अहम सवाल यह है कि क्या इजरायली प्रधानमंत्री बेन्जामिन नेतन्याहू की सरकार ट्रंप के बताए गए कुछ हमलों की समय-सीमा से सहमत हैं? फिलहाल इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। कम से कम मौजूदा हालात में तो इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है। फिर इस 15 सूत्रीय शांति योजना का क्या हुआ, जिसे व्हाइट हाउस कुछ दिन पहले ईरान से स्वीकार करने के लिए कह रहा था? अपने संबोधन में ट्रंप ने इसका कोई जिक्र नहीं किया। क्या अब अमेरिका अपनी कई मांगों से पीछे हट रहा है, जिसमें समृद्ध यूरेनियम के भंडार को वापस लेने की मांग भी शामिल थी? इजरायल ने अभी ईरान पर हमले नहीं रोके हैं। अब दुनिया के सबसे तेल शिपिंग मार्गें में से एक होर्मुज स्ट्रेट इस संघर्ष का फोकस बन गया है। ईरान ने इस तेल मार्ग को बंद कर रखा है। हालांकि राष्ट्रपति का इस पर कोई ठोस और तय रुख नजर नहीं आता। अभी वो ईरान से टैंकरों को रास्ता देने की मांग करते हैं और अगले ही पल सहयोगी देशों से कहते हैं कि वह खुद जाकर इसे संभालें। बुधवार को उन्होंने कहा, होर्मुज पर जाओ और बस उसे अपने नियंत्रण में ले लो, उसकी सुरक्षा करो और अपने इस्तेमाल के लिए उसे खोलो। मुश्किल हिस्सा पूरा हो चुका है, इसलिए यह आसान होना चाहिए। उन्होंने ब्रिटेन और फ्रांस जैसे अपने सहयोगियों को होर्मुज खुद जाकर तेल हासिल करने की नसीहत दे डाली। इसके बाद उन्होंने बिना ज्यादा विस्तार से बताए सिर्फ इतना कहा कि युद्ध खत्म होने पर होर्मुज स्वाभाविक रूप से फिर से खुल जाएगा। तेल की कीमतों को लेकर चिंतित लोगों के लिए चार बात शायद ज्यादा भरोसा देने वाली नहीं होगी। व्हाइट हाउस में दिए गए ताजा भाषण में ट्रंप का वो तेवर पूरी तरह गायब था, जबकि ब्रीफिंग में संकेत दिए गए थे कि यह उनके संबोधन का एक अहम हिस्सा होगा। एक और बड़ा अनसुलझा सवाल मैदान में सैनिकों की मौजूदगी को लेकर है। क्षेत्र में लगातार पहुंच रहे हजारों मरीन और पैराट्रूपर्स आखिर वहां क्या कर रहे हैं या क्या करने वाले हैं? ट्रंप के बयान हर अगले दिन बदल रहे हैं या यूं कहें कि सुबह कुछ कहते हैं, शाम को कुछ कहते हैं। इस बीच अमेरिका से गैस की औसत कीमत लगभग चार साल में पहली बार 4 डालर प्रति गैलन से ऊपर चली गई है और ट्रंप की लोकप्रियता रेटिंग तेजी से गिर रही है। -अनिल नरेन्द्र

Thursday, 2 April 2026

दुबई को चुकानी पड़ी सबसे बड़ी कीमत

यूएई यानी संयुक्त अरब अमीरात को बनाने में 40 वर्ष लगे और तबाह होने में मुश्किल से 10 दिन ही लगे। दुबई जो दुनिया के सबसे आधुनिक शहरों में से एक माना जाता था, सुरक्षित माना जाता था जो दुनिया का नया हब बन गया था उसको ईरान ने ऐसा तबाह किया कि वह इतने पीछे चला गया कि अब उसे वर्षें लगेंगे उसी स्थिति में पहुंचने पर। अमेरिका-इजरायल के साथ जंग के बीच ईरान लगातार खाड़ी देशों पर हमला कर रहा है। एक खास बात सामने आई है कि ईरान सबसे ज्यादा यूएई को निशाना बना रहा है। जिस दिन से (29 फरवरी) जंग शुरू हुई तब से ईरान ने 1714 ड्रोन, 334 बैलिस्टिक मिसाइल दागकर तबाही की इबारत लिख दी है। आखिर ईरान दुबई, आबू धाबी पर लगातार हमले क्यों कर रहा है? अमेरिका-इजरायल-ईरान की इस जंग में ईरान ने हमलों में दुबई के आलीशान होटल, रिफाइनरी, एयरपोर्ट और प्रमुख कॉमर्शियल जोन को काफी प्रभावित किया है। आखिर दुबई को तबाह करने के पीछे ईरान की रणनीति क्या है? क्या इसका कारण सिर्फ इतना है कि अमेरिका वहां से अपने सैन्य अ़ड्डे संचालित करता है? या इन हमलों के पीछे ईरान के कुछ और इरादे हैं? तो इसका जवाब हथियारों से ज्यादा इकोनॉमिक्स और इंवेस्टमेंट के आसपास घूमती है। दरअसल दुबई वाशिंगटन की वह कमजोर नस है, जिसे दबाते ही दर्द सीधे ट्रंप को व्हाइट हाउस में बैठे होने लगता है। मागा (मेक अमेरिका ग्रेट आगेन) के नाटो के साथ डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिकी सत्ता में दूसरी बार वापसी हुई। जबसे वे सत्ता में लौटे हैं, उनका पूरा फोकस अमेरिका की अर्थव्यवस्था को बूस्ट करने और बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश खींचने पर रहा है। व्हाइट हाउस के आंकड़ों के मुताबिक 2025 में अमेरिका को अगले दस वर्षों में निवेश के लिए 5.2 ट्रिलियन डॉलर की विदेशी कमिटमेंट्स मिली है तो इस 5.2 ट्रिलियन डॉलर में से सबसे बड़ा हिस्सा यूएई इनवेस्ट कर रहा है। अकेले 1.4 ट्रिलियन डॉलर (यानी कुल निवेश का 27 प्रतिशत) सिर्फ यूएई ने वादा किया है। सीधे शब्दों में कहा जाए तो यूएई अमेरिका के लिए कमजोर कड़ी बन गया है। ईरान अच्छी तरह जानता है कि अगर दुबई पर मिसाइलें गिरेंगी तो वहां की अर्थव्यवस्था डगमगाएगी और अगर दुबई की अर्थव्यवस्था हिली तो अमेरिका में आने वाले 1.4 ट्रिलियन डॉलर का वह निवेश सीधे तौर पर खतरे में पड़ जाएगा, जिस पर ट्रंप अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। ईरान का निशाना सिर्फ अमेरिका में जाने वाला दुबई का पैसा नहीं है, बल्कि ग्लोबल इंवेस्टमेंट हब के रूप में दुबई और यूएई की पहचान तबाह करना है। दुबई जो आर्थिक, डिजिटल और मीडिया हब रहा है, इस युद्ध में बुरी तरह प्रभावित हुआ है। मुख्य शेयर सूचकांक एडीएक्स जनरल में पिछले महीने में 11.42 प्रतिशत की गिरावट आई है। हवाई क्षेत्र बंद हेने और उड़ानों के रद्द होने से पर्यटन और एविएशन सेक्टर में दुबई को करीब 9 करोड़ डॉलर का नुकसान हुआ है। यूएई सरकार और मीडिया ने देश को सुरक्षित जगह वाली छवि बनाएं रखने की कोशिश की। राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायेद ने लोगों को भरोसा दिलाया है कि सब कुछ नियंत्रण में है और देश हर खतरे से निपटने के लिए तैयार है। साथ ही अटानी जनरल हमाद सैफ अल शम्सी ने हमलों की तस्वीरें और वीडियो साझा करने की सख्त चेतावनी दी। इस आदेश के तहत कई विदेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया गया, जिस पर कम से कम एक साल की सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है। ईरान दुनिया को यह कड़ा संदेश दे रहा है कि युद्ध के मैदान से हजारों किलोमीटर दूर बैठकर भी वह अमेरिका की दुखती आर्थिक नस को काट सकता है। हर ड्रोन हमला, मिसाइल स्ट्राइक दुबई और यूएई और खाड़ी देशों की उस सुरक्षित और स्थिर छवि पर एक करारा प्रहार है, जिसे उन्होंने सालों के रिफार्म और शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर के दम पर बनाया है। -अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 31 March 2026

जमीनी जंग की तैयारी कर रहा है अमेरिका?


पश्चिम एशिया में संघर्ष विराम की कोशिशें कमजोर पड़ती जा रही है। अमेरिका और ईरान की युद्ध बंदी की शर्तें ऐसी हैं कि हमें नहीं लगता कि इन पर कोई भी झुकने को तैयार होगा। तो क्या अब अमेरिका मुंह छिपाने के लिए और अमेरिकी जनता को इस हिमाकत युद्ध को जस्टिफाई करने के लिए जमीनी युद्ध पर उतर सकता है? अमेरिका और ईरान दोनों ने ही अपने रुख और कड़े कर लिए हैं। अमेरिका पश्चिम एशिया में और सैनिक भेजकर सैन्य तैनाती बढ़ाता चला जा रहा है। करीब 2500 मरीन कमांडों के साथ अमेरिकी वॉरशिप यूएसएस ट्रिपोली पश्चिम एशिया के करीब पहुंच चुका है। इसी तरह 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के 2000 पैराट्रूपर्स भेजे जा रहे हैं। दूसरा वॉरशिप यूएसएस बॉक्सर भी 2300 मरीन कमांडों के साथ अप्रैल में पहुंच रहा है। इस तरह करीब 7000 अमेरिकी सैनिक इलाके में पहुंच जाएंगे। इसके अलावा 50 हजार सैनिक पहले से ही मध्य-पूर्व में मौजूद हैं। इससे संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका कूटनीति के साथ जमीनी हमले समेत सभी विकल्प खुले रखना चाहता है। जानकारों का कहना है कि अगर कूटनीति नाकाम रहती है तो इन अमेरिकी सैनिकों का इस्तेमाल मुख्य रूप से चार उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है। पहला-ईरान के मुख्य तेल निर्यात केंद्र खार्ग द्वीप पर कब्जा या उसकी नाकाबंदी। इस द्वीप पर हाल में अमेरिकी सेना ने 90 से ज्यादा टारगेट पर हमले किए। दूसराöहोर्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित करना और उस रास्ते में जहाजों की आवाजाही को फिर शुरू करना। तीसराöईरान के तटीय इलाकों पर कार्रवाई और चौथाö उसके एटमी ठिकानों को सुरक्षित करना और ईरान के यूरेनियम भंडार को कब्जे में लेना। उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जमीनी जंग के मंसूबों के जवाब में ईरान ने बड़ी तैयारी कर ली है। ईरान ने 10 लाख सैनिकों की फौज जुटाई है। साथ ही ईरान ने कसम खाई है कि अगर अमेरिकी सैनिक ईरान की धरती पर युद्ध के लिए उतरते हैं तो उनके लिए हम यह फैसला ऐतिहासिक नरक तैयार कर देंगे। चलिए एक नजर इस बात पर डालते हैं कि अगर अमेरिका ईरान पर अपने सैनिक उतार देता है और खार्ग द्वीप और ईरान के दक्षिणी तेल भंडार पर कब्जा करने में सफल हो जाता है तो इससे ईरान के तेल के निर्यात को लगभग पूरी तरह अलग-थलग किया जा सकता है। शायद इससे होर्मुज जलडमरूमध्य का मुद्दा पूरी तरह हल नहीं हो। अमेरिका इसके कुछ हिस्सों पर कब्जा कर सकता है। लेकिन ईरान असंभावित युद्ध रणनीति (जैसे गुरिल्ला वॉर) का इस्तमाल करके इसके कुछ हिस्सों पर नियंत्रण बनाए रख सकता है। दोनों पक्षों में भारी सैन्य हताहत होते हैं और ईरान में नागरिक हताहत होते हैं तो इसके भयंकर परिणाम होंगे। यह भी संभावना है कि अमेरिकी सेना सीमित या बड़े पैमाने पर ईरान में फंस सकती है। उदाहरण के लिए वियतनाम और अफगानिस्तान सामने हैं। सैन्य अभियान आसान रास्ता नहीं हो सकता है। यह कभी भी साफ-सुथरा अभियान नहीं हो सकता। ऐसे अभियान कभी भी पूरी तरह सफल नहीं होते और यही इस युद्ध की सच्चाई है।
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 28 March 2026

न ट्रंप पर विश्वास न ही पाक की मध्यस्थता मंजूर


पश्चिम एशिया में संघर्ष खत्म करने के लिए अमेरिका के 15 सूत्रीय प्रस्ताव को खारिज करते हुए ईरान ने उल्टा अपनी पांच शर्तें रख दीं। ईरान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 15 सूत्रीय शांति प्रस्ताव को एकतरफा बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया है और युद्ध खत्म करने के लिए अपनी पांच बड़ी शर्तें सामने रख दीं हैं। ईरान ने स्पष्ट कहा कि वह यह युद्ध तब ही खत्म करेगा, जब उसकी मांगे पूरी होंगी। अमेरिका ने अपना प्रस्ताव पाकिस्तान के जरिए ईरान तक पहुंचाया था। ईरान ने दो टूक कहा कि न तो हमें ट्रंप पर विश्वास है और न ही हमें पाकिस्तान की मध्यस्थता मंजूर है। ईरान ने अपनी पांच शर्तें में युद्ध के नुकसान का भारी मुआवजा, टारगेट किलिंग पर रोक और सबसे महत्वपूर्ण स्टेट ऑफ होर्मुज पर पूर्ण संप्रभुता शामिल है। तेहरान का स्पष्ट रुख है कि शांति तभी होगी जब अमेरिका उसकी शर्तें को मानेगा और क्षेत्र के सभी रेजिस्टेंस ग्रुप्स पर हमले बंद करेगा। ईरान और अमेरिका के बीच छिड़ी इस भीषण जंग में अब तेहरान ने भी अपने तेवर कड़े कर लिए हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 15 सूत्रीय प्रस्ताव दिया था। यह कुछ इस प्रकार थाः ईरान अपने तीनों प्रमुख परमाणु ठिकानों को बंद करे। यूरेनियम संवर्धन को पूरी तरह रोके। बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को निलंबित किया जाएगा। विद्रोही समूह जैसे हमास, हिजबुल्लाह, हूती आदि को मदद बंद करें। होर्मुज को पूरी तरह खोला जाए। ईरान ये वादा करे कि वह कभी परमाणु हथियार बनाने की कोशिश नहीं करेगा। एक प्रमुख मांग यह भी थी कि मौजूदा संवर्धित यूरेनियम को अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को सौंपना होगा। बाकी भी कुछ मांगे थीं, मैंने प्रमुख अमेरिकी मांगों का जिक्र किया है, ईरान और अमेरिका एक-दूसरे से जो चाहते हैं, मुझे तो उन पर सहमति होना मुश्किल लगता है। कमोबेश इन्हीं मामलों पर फरवरी में भी बातचीत हुई थी। इन बिंदुओं को वह रेड लाइन कह सकते हैं, जिस पार करना दोनों देशों के लिए असंभव है। वहीं, ईरान के विदेशी मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि उनका देश संघर्ष का स्थायी अंत चाहता है। उन्होंने कहा कि युद्ध विराम के प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है, लेकिन ईरान की अमेरिका से वार्ता की कोई इच्छा नहीं है। उन्होंने कहा, अमेरिका मध्यस्थों के जरिए संदेश भेज रहा है। ऐसे संदेशों के आदान-प्रदान का मतलब वार्ता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ने जिस मकसद से युद्ध छेड़ा था, उसे हासिल नहीं कर पाया। अमेरिका युद्ध में जीत और ईरान में सत्ता परिवर्तन चाहता था, जो दोनों ही नहीं हुए। वहीं ईरान के संयुक्त सैन्य कमान के प्रवक्ता इब्राहिम जोल्फकारी ने कहा जिस अमेरिकी रणनीतिक ताकत का ट्रंप शेखी बघारते थे, वह अब रणनीतिक हार में बदल गई। आज कोई भी अमेरिका के झूठे प्रचार से भ्रमित नहीं होगा। इससे पहले, अमेरिका ने पाकिस्तान के जरिए भेजे प्रस्ताव में युद्ध विराम के लिए ईरान को पाकिस्तान, तुर्किए में से किसी जगह वार्ता का सुझाव दिया था जिसे ईरान ने सिरे से खारिज कर दिया। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बेघाई ने कहा कि पिछले साल जब परमाणु वार्ता हो रही थी उसी बीच अमेरिका ने ईरान पर हमला किया था। उन्होंने उसे कूटनीतिक विश्वासघात बताते हुए कहा, हमें अमेरिका पर कोई भरोसा नहीं है। ट्रंप दो बार धोखा दे चुके हैं और अब हम ऐसा नहीं होने देंगे। हमारी राय में ताकत कोई समाधान नहीं है। बातचीत पर आगे बढ़ने के लिए यह भी जरूरी है कि पहले ईरान पर हमले बंद हों। यह नहीं हो सकता कि आप एक तरफ शांति प्रस्ताव भेजें और संघर्ष विराम की एक तरफा घोषणा करके हमले जारी रखें? यही नहीं अमेरिका लगातार अपनी थल सेना के सैनिक बढ़ाता जा रहा है। नए-नए युद्ध पोत, फाइटर विमान भेजे जा रहा है और दूसरी ओर शांति की बात करता है। यह दोगुलापन नहीं तो और क्या है? क्या आप ईरान को दोष दे सकते हो अगर वो यह कहता है कि हमें ट्रंप पर कतई विश्वास नहीं है।
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 26 March 2026

डिमोना : इजरायल का सीक्रेट न्यूक्लियर रिएक्टर


ईरान-इजरायल युद्ध का एक-दूसरे के परमाणु केंद्रों तक पहुंच जाना बेहद भयावह है। शनिवार की सुबह अमेरिका-इजरायल ने संयुक्त कार्रवाई में ईरान के नतांज परमाणु केंद्र को निशाना बनाया तो तेहरान ने पलटवार करते हुए अराद के साथ-साथ डिमोना शहर पर भी मिसाइलें दागी। डिमोना इजरायल का वह दक्षिणी हिस्सा है, जहां से महज 13 किलोमीटर दूर उसका मुख्य परमाणु केंद्र है। तेल अवीव की मानें तो यह हमला दरअसल उसके परमाणु ठिकाने को केंद्र में रखकर ही किया गया था। इस हमले में 180 से अधिक लोग घायल होने की बात की जा रही है। इजरायली सेना ने बताया कि वह इस बात की भी जांच कर रही है कि ईरानी बैलिस्टिक मिसाइल को रोका क्यों नहीं जा सका। इससे इस बात को भी बल मिलता है कि ईरान के दावे में कुछ सच्चाई है कि उसकी मिसाइलों ने इजरायली एयर डिफेंस सिस्टम को तबाह कर दिया है। इजरायली सेना के अनुसार वायु रक्षा प्रणाली ने मिसाइल को रोकने की कोशिश की, लेकिन इंटरसेप्टर उसे मार गिराने में सफल नहीं हो सके। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने इन हमलों के कारण (पा है) किसी तरह के रेडिएशन यानि विकिरण से इंकार किया है, जो यकीनन सुखद बात है लेकिन दोनों जगहों पर जान-माल का भारी नुकसान हुआ है। डिमोना, दक्षिणी इजरायल के नेगेव रेगिस्तान में स्थित है और यहां एक प्रमुख परमाणु संयंत्र है। इजरायल की अपने परमाणु कार्पाम को लेकर कोई साफ नीति नहीं है और आधिकारिक तौर पर उसका कहना है कि डिमोना रिएक्टर केवल रिसर्च के लिए है। हालांकि स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार उसके पास लगभग 90 परमाणु वॉरहैड है, जिससे वह मध्य-पूर्व का एक मात्र परमाणु शक्ति संपन्न देश बन जाता है। डिमोना रिएक्टर को शिमोन पेरेस नेगेव न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर कहा जाता है। यह इजरायल के परमाणु कार्पाम की रीढ़ माना जाता है। परिसर करीब 36 वर्ग किलोमीटर में फैला है। करीब 2700 वैज्ञानिक और तकनीशियन यहां काम करते हैं। डिमोना को इजरायल के लिटिल इंडिया के नाम से जाना जाता है। यहां बड़ी संख्या में भारतीय-यहूदी समुदाय रहता है। करीब 30 प्रतिशत आबादी भारतीय मूल की है और मराठी आम भाषा इस्तेमाल होती है। दुकानों में सोन पापड़ी, गुलाब जामुन, पापड़ी चाट और भेलपुरी मिल जाती है। अमेरिका-ईरान-इजरायल की यह जंग जैसी घातक रूप अख्तियार कर रही है, वह न सिर्फ पश्चिम एशिया बल्कि पूरे विश्व के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए। डिमोना और ईरानी परमाणु केंद्रों में यूरेनियम और प्लूटोनियम के भंडार हैं। अगर इनमें रिसाव हुआ तो न सिर्फ आस-पास के लोग शिकार होंगे, बल्कि पूरा मध्य-पूर्व इससे प्रभावित हो सकता है। परमाणु विकिरण किस हद तक खतरनाक होते हैं, इसकी पीड़ा दायक नजीरें मौजूद हैं। जब दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापानी शहर हिरोशिमा व नागासाकी पर अमेरिका ने परमाणु बम गिराए थे। लिटिर बॉय (यूरेनियम) और फैटमैन (प्लूटोनियम) नामक इन बमों ने करीब 2 लाख लोगों की जिंदगी खत्म कर दी थी और जापान को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया था। आज इनकी तुलना में कहीं अधिक विनाशक बम कई देशें के पास हैं। ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध को और फैलने से रोकने के लिए दुनिया को सामने आना पड़ेगा। स्वहित नहीं, विश्व हित को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। भारत इन पर लगातार जोर देता रहा है और कहता रहा है कि समस्या का हल युद्ध नहीं मेज पर बैठकर समझौता करना होगा। इसका हल युद्ध से नहीं बातचीत से करना होगा। यह काम जितनी जल्दी हो, यह युद्ध रुके, विश्व का इसी में कल्याण है। 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 24 March 2026

4000 किलोमीटर दूर ईरान के हमले ने चौंका दिया


ईरान और अमेरिका-इजरायल जंग खतरनाक मेड़ पर पहुंच गई है। अमेरिका-इजरायल की वायुसेना ने शनिवार सुबह ईरानी न्यूक्लियर हार्ट नतांज परमाणु संवर्धन केंद्र पर भीषण हमला किया। ईरानी परमाणु ऊर्जा संगठन ने इसे आपराधिक हमला करार दिया। हालांकि प्लांट से किसी रेडियोधर्मी रिसाव की खबर नहीं है। अमेरिका-इजरायल के इस हमले का असर अब वैश्विक जंग फैलने का खतरा हो गया है। नतांज पर हमले के कुछ ही घंटों के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई (आपरेशन टू प्रामिस-4) में हिंद महासागर स्थित अमेरिका ब्रिटेन के एयरबेस डिएगो गार्सिया पर दो बैलिस्टिक मिसाइलें दाग कर दुनिया को चौंका दिया। ईरान ने पहली बार पूर्व घोषित 2000 किमी की रेंज की लिमिट तोड़ 4000 किमी दूर प्रहार की क्षमता दिखाई। रिपोर्ट के मुताबिक एक मिसाइल उड़ान के दौरान विफल हो गई, जबकि दूसरी को रोकने के लिए अमेरिकी युद्धपोत ने एसएम-3 इंटरसेप्टर का इस्तेमाल किया, हालांकि इसकी सफलता की पुष्टि नहीं हुई है। यह हमला इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि डिएगो गार्सिया ईरान से करीब 4000 किलोमीटर दूर है, जो ईरान की घोषित 2000 किलोमीटर की रेंज से दोगुना है। यदि यह रिपोर्ट सही है तो ईरान की मिसाइल क्षमता को लेकर बनी पुरानी धारणाएं टूट चुकी हैं। ईरान को लेकर धारणा थी कि उसके पास 2000 किलोमीटर तक की रेंज की क्षमता है। लेकिन इस हमले से दुनिया सन्न रह गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक 4000 किलोमीटर की रेंज ईरान को इंटरमीडिएट रेंज मिसाइल क्षमता के करीब ले जाती है। इसका मतलब है कि अब यूरोप के कई बड़े शहर जैसे पेरिस, बर्लिन और रोम भी संभावित दायरे में आ सकते हैं। जबकि लंदन भी खतरे से बाहर नहीं है। यह बदलाव बताता है कि खतरा अब सिर्फ खाड़ी देशों या इजरायल तक सीमित नहीं रहा। यदि इसकी पुष्टि होती है तो यह हमला केवल सैन्य कार्रवाई नहीं बल्कि एक बड़ा रणनीतिक संदेश भी माना जाएगा। सेंटर फॉर स्ट्रेटिजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के अनुसार ईरान के पास पश्चिम एशिया में सबसे बड़े और सबसे विविध मिसाइल का जखीरा है। इस जखीरे में कई लंबी दूरी की मिसाइलें शामिल हैं, जो इजरायल तक पहुंचने में सक्षम है। इनमें सेजिल, खुर्रमशहर और गद्र शामिल है। एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी मिसाइलें इजरायल तक तो तबाही मचा ही रही हैं पर अब यह दायरा बढ़ भी सकता है। ईरान के पास अलग-अलग प्रांतों में कम से कम 5 भूमिगत मिसाइल शहर भी हैं। ईरान के मिसाइल जखीरे में मोर्टार, रॉकेट, ड्रोन बैलिस्टिक और ाtढज मिसाइलें शामिल हैं। बता दें कि डिएगो गार्सिया ईरान से लगभग 4000 किलोमीटर दूर मध्य हिंद महासागर में भारत के दक्षिण और श्रीलंका के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। यह चोगास द्वीप समूह का सबसे बड़ा द्वीप हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थित दो महत्वपूर्ण अमेरिकी बमवर्षक लड़ाकू विमानों के बेस में से एक है। दूसरा अड्डा, गुआम में स्थित एंडरसैन वायुसेना अड्डा है। अमेरिका-ब्रिटेन संचालित किए जाने वाला सबसे ज्यादा रणनीतिक महत्व वाले बेहद गोपनीय मिलिट्री ठिकानों में से एक है। ईरान अगर यहां तक पहुंचा है तो यह एक बहुत महत्वपूर्ण घटपाम है। 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 21 March 2026

नेतन्याहू की साजिशों का नतीजा

 
अगर ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध फैलता जा रहा है तो इसकी सबसे बड़ी वजह नेतन्याहू की साजिशें हैं। यह सारी करी कराई नेतन्याहू की है। 28 फरवरी को सबसे पहला काम नेतन्याहू ने यह किया कि ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई और सर्वोच्च सैन्य कमांडरों, गुप्तचर प्रमुख इत्यादि को शहीद कर दिया। नेतन्याहू यही नहीं रूके। उन्होंने अगला निशाना बनाया ईरान के सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव अली लारिजानी को मार डाला। यह इसलिए भी किया गया ताकि उस नेता को रास्ते से हटा दिया जाए जो एक उदारवादी, लायक और बीच-बचाव करके इस युद्ध को किसी तरह से रोकने में मदद कर सकता था और यही नेतन्याहू नहीं चाहते थे। लारिजानी ईरान के नंबर 2 नेता थे। यह ट्रांजिशनल काउंसिल के जरिए देश चला रहे थे। ईरान के संविधान के अनुच्छेद 111 के अनुसार सर्वोच्च नेता की मृत्यु या अक्षमता की स्थिति में एक परिषद देश चलाती है। लेकिन लारिजानी इन सबसे ऊपर थे। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर यानि सेना भी उनके आदेश मानती थी। संसद के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ नीति सलाहकार के तौर पर अली लारिजानी को ट्रंप प्रशासन के साथ परमाणु वार्ता की रणनीति पर दिवंगत अयातुल्लाह खामेनेई को सलाह देने के लिए नियुक्त किया गया था। अली लारिजानी की हत्या के साथ-साथ नेतन्याहू ने जनरल गुलाम रजा सुलेमानी को भी मार डाला। रिवोल्यूशनरी गार्ड की वसीज सेना के वे प्रमुख थे। दरअसल नेतन्याहू ने सोचा था कि अगर वह ईरान की टॉप लीडरशिप को खत्म कर देंगे तो युद्ध जीतने में आसानी हो जाएगी, ईरान बिखर जाएगा। पर हुआ इसका उलटा। ईरानी आवाम हमदर्दी में सड़कों पर उतर आई। जो अयातुल्लाह निजाम से नाराज भी था वह भी निजाम के समर्थन में उतर गया। नेतन्याहू को शायद यह अंदाजा भी नहीं था कि ईरान का टॉप नेतृत्व अगर खत्म हो जाएगा तो इतनी जल्दी उसका विकल्प सामने आकर मोर्चा संभाल लेगा। जब इजरायल ने देखा कि यह तो मामला उलटा हो गया तो उसने नई साजिश रची। इस बीच यह संकेत भी आने लगे कि अमेरिकी राष्ट्रपति घरेलू दबाव के कारण इस युद्ध से हटने की तैयारी कर रहा है तो नेतन्याहू परेशान हो गए। याद रहे कि पिछले साल जब 12 दिनों तक युद्ध हुआ था तो सबसे पहले इजरायल ने ही हमला किया था। बाद में उसने अमेरिका को जबरदस्ती इस युद्ध में शामिल होने पर मजबूर किया था। जब बाजी हाथ से निकलते देख नेतन्याहू ने एक नई और निहायत खतरनाक चाल चली। उसने बिना अमेरिका से पूछे ईरान के सबसे बड़े ऊर्जा प्रतिष्ठानों में से एक बुराहट स्थित असलुयेह गैस प्लांट (साउथ पार्स) पर हमला कर दिया। इस कार्रवाई से ईरान का भड़कना स्वाभाविक ही था। उसने खाड़ी में मौजूद तेल और गैस ठिकानों की सैटेलाइट इमेज जारी कर चेतावनी दी कि इन इलाकों को तत्काल खाली करें। इजरायली हमले के जवाब में कतर के रास लफान की एलएनजी गैस फील्ड पर हमला कर दिया। यह कतर की मुख्य एलएनजी प्रोसेसिंग साइट है और देश के ऊर्जा नेटवर्क का अहम केंद्र है। सऊदी अरब ने कहा कि हालांकि उन्होंने कई ईरानी मिसाइलों को नष्ट कर दिया पर उसकी तेल भंडार के स्टारेज पर भी कुछ नुकसान हुआ है। रही सही कसर ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट को बंद करके पूरी कर दी। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापारिक रास्तों में से एक है। उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी माना है कि उन्हें इस हमले (साउथ पार्स गैस फील्ड) के बारे में कुछ पता नहीं था। उन्होंने लिखा इजरायल इस बहुत जरूरी और कीमती साउथ पार्स फील्ड पर कोई और हमला नहीं करेगा। क्या यह बयान ट्रंप ने बेंजामिन नेतन्याहू को सुनाने के लिए दिया था? इससे साबित होता है कि जंग को आगे बढ़ाने के लिए नेतन्याहू अपनी साजिशों से बाज नहीं आ रहे हैं। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 19 March 2026

नेतन्याहू अगर जिंदा है तो ढूंढ़कर मारेंगे


ईरान रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) ने कहा है कि अगर इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू जिंदा है तो वो उनका पीछा करके उन्हें मार डालेंगे। आईआरजीसी ने नेतन्याहू को बच्चों का हत्यारा बताया है। ईरान की सरकारी न्यूज एजेंसी इरना ने एक स्पेशल पोस्ट में इसकी जानकारी दी है। वहीं दक्षिण अफ्रीका में ईरानी दूतावास ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा हैö इससे बिल्कुल भी फर्क नहीं पड़ता कि नेतन्याहू जिंदा है या मर चुके हैं। एक मिनाबी लड़की का बाल का एक भी रेशा, उनके पूरे वजूद से कहीं ज्यादा कीमती है। इस मामले में सवाल यह भी उठता है कि अगर नेतन्याहू जिंदा है तो ऐसा आईआरजीसी ने क्यों कहा है और यह दावा या अफवाह कहां से शुरू हुई है कि बेंजामिन नेतन्याहू जिंदा है या नहीं। हालांकि कई खबरों के मुताबिक, इजरायली प्रधानमंत्री कार्यालय ने नेतन्याहू की बात को फेक न्यूज बताया है। वहीं रविवार शाम को नेतन्याहू ने एक्स पर अपना एक वीडियो पोस्ट किया है। इसमें वो कॉफी पीते हुए कैफे के बाहर कुछ महिलाओं से बात करते हुए नजर आ रहे हैं। इस दौरान वो एक-एक कर दोनों हाथों को कैमरे के सामने ला रहे हैं और अपनी पांचों उंगलियां गिना रहे हैं। इजरायल और ईरान के बीच जंग की शुरुआत में ही ईरानी अधिकारियों ने बताया था कि दक्षिण ईरान के शहर मिनाब में लड़कियों के एक स्कूल पर हमला हुआ, जिसमें 180 से ज्यादा लोग मारे गए थे। इनमें 160 के लगभग छोटी-छोटी बच्चियां और उनके टीचर भी मारे गए थे। बता दें कि ईरान के मिनाब में प्राथमिक स्कूल पर भीषण एयरस्ट्राइक को लेकर अमेरिका के भीतर भी विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। अमेरिका के 40 से अधिक सीनेटरों ने पेंटागन को पत्र लिखकर इस हमले का कड़ा विरोध जताया है। सांसदों ने रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ से इस सैन्य कार्रवाई की जांच, जवाबदेही और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन पर स्पष्टीकरण मांगा है। सीनेटरों ने अपने पत्र में विशेष रूप से चिंता जताई है कि मरने वालों में ज्यादातर 7 से 13 साल की मासूम बच्चियां थीं। घटना 28 फरवरी की है, जब अमेरिका ने बहरीन सैन्य बेस से एक टोमाहॉक मिसाइल से मिनाब स्थित लड़कियों के एक स्कूल को निशाना बनाया। ईरान में इस हमले से लोगों में काफी ज्यादा आाढाsश देखा गया और इन लड़कियों के जनाजे में लाखों ईरानी जनता शामिल हुई। आईआरजीसी ने एक बयान में कहा जियोनिस्ट अपराधी प्रधानमंत्री का अज्ञात और उनकी मौत या कब्जे वाले इलाकों से अपने परिवार के साथ उनके भाग निकलने की पूरी संभावना है। यह एक संकट और जियोनिस्ट की डगमगाती स्थिति को उजागर करती है। आईआरजीसी ने आगे कहा, अगर बच्चों की हत्या करने वाला अपराधी जीवित है तो हम पूरी ताकत से पीछा करके उन्हें मार डालेंगे। यह धमकी इजरायली प्रधानमंत्री कार्यालय के उस खंडन के बाद आई है जिसमें नेतन्याहू के मारे जाने की खबरों को गलत बताया गया है। साथ ही उसने यह दावा किया था कि इजरायल ने उनके तथ्यों और क्षेत्र में तीन अमेरिकी बेस को 52वीं बार किए गए हमले में नष्ट कर दिया गया है। 13 मार्च को नेतन्याहू के एक्स अकाउंट पर एक वीडियो पोस्ट किया गया था जिसमें वो ईरान के हमलों के बारे में जानकारी दे रहे थे। सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने इसे एआई जेनरटिड बताया था और दावा किया था कि नेतन्याहू की मौत हो चुकी है। अब देखना यह है कि क्या नेतन्याहू जिंदा है और अगर वह जिंदा है तो क्या ईरानी आईआरजीसी उनकी हत्या करने में कामयाब होती है या नहीं? 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 17 March 2026

युद्ध के लंबे खिंचने की संभावना

 
ईरान-अमेरिका व इजरायल का युद्ध 28 फरवरी को ईरान पर हमले से शुरू हुआ था। अमेरिका-इजरायल को उम्मीद थी कि यह युद्ध चंद दिन चलेगा और ईरान अपने घुटनों पर आ जाएगा। उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि ईरान इतना जवाबी हमला करेगा और यह युद्ध इतना लम्बा खिंचेगा। ईरान अमेरिका-इजरायल को मुंह तोड़ जवाब दे रहा है। ईरान के नए सुप्रीम अयातुल्लाह मोजतबा खामेनेई ने अपने पहले संदेश में ही स्पष्ट कर दिया कि ईरान झुकने वाला नहीं है। खामेनेई का पहला संदेश ईरानी टीवी पर प्रसारित करते हुए एंकर ने पढ़कर सुनाया। खामेनेई ने संदेश में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकाबंदी जारी रखने और मिनाब स्कूल के बच्चों सहित शहीद हुए लोगों के खून का बदला लेने पर जोर दिया। अमेरिका और इजरायल के ईरान के साथ चल रहे युद्ध का पा करते हुए खामेनेई ने लगातार हमले जारी रखने का आ"ान करते हुए आगे कहा कि अन्य मोर्चों को खोलने पर भी विचार किया जा रहा है। इसके अलावा उन्होंने यमन में ईरान के सहयोगियों, लेबनान में हिजबुल्लाह और इराक में रेजिस्टेंस की तारीफ की है। खामेनेई का यह संदेश उनके स्वास्थ्य और शारीरिक स्थिति को लेकर चल रही अटकलों के बीच आया है। उधर अमेरिका ने ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई और उनसे जुड़े कई वरिष्ठ अधिकारियों के बारे में जानकारी देने पर बड़ा इनाम घोषित किया है। अमेरिकी विदेश विभाग के रिकार्ड्स फॉर जस्टिस के तहत इन लोगों के बारे में ठोस जानकारी देने वालों को अधिकतम एक करोड़ डॉलर तक का ईनाम दिया जा सकता है। यह कदम ईरान की सैन्य और सुरक्षा संरचना से जुड़े नेटवर्क पर दबाव बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के नेताओं को मारना सम्मान की बात है। उन्होंने पावार को कहा, हम ईरान के आतंकवादी शासन को सैन्य, आर्थिक और अन्य रूप से पूरी तरह नष्ट कर रहे हैं। वे 47 वर्षों से निर्दोषों को मार रहे हैं और अब मैं उन्हें मार रहा हूं। ऐसा करना सम्मान की बात है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने उधर दावा किया है कि अमेरिकी सेना ने ईरान के खार्ग आइलैंड पर बड़े हमले किए और सैन्य ठिकानों को तबाह कर दिया। ट्रंप ने दावा किया कि यह अमेरिका-इजरायल का ईरान पर अब तक का सबसे बड़ा हमला है। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि अमेरिका ने ईरान के इस रणनीतिक द्वीप पर बड़े हवाई हमले में सैन्य ठिकानों को पूरी तरह तबाह कर दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान अब बुरी तरह कमजोर हो चुका है और समझौता चाहता है, लेकिन ऐसा समझौता नहीं होगा जिसे वह स्वीकार करे। साथ ही ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही रोकने की कोशिश हुई तो अमेरिका तेल ढांचे पर हमला करने का फैसला भी बदल सकता है। अफवाहें तो यह भी है कि ट्रंप अब अमेरिकी थल सेना को भी ईरान में उतारने का प्रयास कर रहे हैं। बता दें कि खार्ग आइलैंड से ईंधन का बहुत बड़ा हिस्सा दूसरे देशों पर थोपा जाता है। अमेरिका अपनी मरीन कार्प के जरिए खार्ग आइलैंड पर जबरन कब्जा करने की योजना बना रहा है। खबर तो यह भी है कि इसकी पूर्ति के लिए अमेरिका ने 2500 मरीन ईरान की तरफ रवाना भी कर दिए हैं। उधर ईरान ने भी अपने हमले तेज कर दिए हैं। लेबनान में हिजबुल्लाह ने उत्तरी इजरायल पर ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए हैं और इजरायल ने भी जबरदस्त जवाबी कार्रवाई की है। इजरायली विमानों ने लेबनान में भारी तबाही मचाई है। इस बढ़ती जंग से वैश्विक तेल बाजार को भी लेकर चिंता बढ़ गई है। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि भले तेल सुविधाओं को सीधा निशाना नहीं बनाया गया हो, लेकिन सैन्य हमलों का असर निर्यात व्यवस्था पर पड़ सकता है। युद्ध लंबा खिंचने की आशंका ने खाड़ी क्षेत्रों में तो बेचैनी बढ़ाई ही है साथ ही पूरे विश्व में इसको लेकर टेशनें बढ़ा दी हैं। 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 14 March 2026

नेतन्याहू ने बुरा फंसाया ट्रंप को


ईरान युद्ध के बाद दुनियाभर में एक्सपर्ट अब ये बात कहने लगे हैं कि असल में इजरायल ने अपने हितों के लिए अमेरिका को बुरी तरह फंसा दिया है यानि कि नेतन्याहू ने डोनाल्ड ट्रंप को ऐसा फंसाया है कि अब उन्हें पीछे हटने का बहाना नहीं मिल रहा है। न केवल अमेरिका को ही फंसाया है बल्कि गल्फ के अन्य अरब देशों को भी फंसा दिया है। इससे धीरे-धीरे खाड़ी में अमेरिका के सहयोगी देश भी उससे नाराज हो रहे हैं। अमेरिका में हुए हालिया पोल्स कह रहे हैं कि अमेरिकी जनता इस ईरान युद्ध को अनावश्यक मान रही है, जो अमेरिका पर बुरी तरह आर्थिक बोझ को बढ़ाएगी। अमेरिका और इजरायल द्वारा मिलकर ईरान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध को लेकर कई विश्लेषक सामने आ रहे हैं। युद्ध अब 15वें दिन में प्रवेश कर चुका है। इजरायल ने अमेरिका को ऐसा फंसाया है कि ट्रंप को समझ नहीं आ रहा है कि आगे क्या करें? विश्लेषक कह रहे हैं कि इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी हितों की बजाए इजरायल के विशेष उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अमेरिका को युद्ध में खींच लिया। कई विश्लेषकों का मानना है कि इजरायल ने ईरान के परमाणु कार्पाम को खतरे के रूप में पेश कर ट्रंप को युद्ध में उलझा दिया है। वास्तव में इजरायल के हित कहीं और हैं वे इस युद्ध के जरिए सबको भटकाना चाहता है। वास्तव में इजरायल का इस हमले के जरिए मुख्य उद्देश्य ईरान के साथ अमेरिकी कूटनीति को बाधित करना और गाजा में इजरायली कार्रवाइयों से वैश्विक ध्यान भटकाना था। नेतन्याहू का एक मकसद यह भी है कि उन पर चल रहे भ्रष्टाचार के केसों से इजरायली जनता का ध्यान भटकाना। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप डोनाल्ड को इजारयल की कार्रवाई में ाsढडिट लेने की चाहत ने फंसाया है। शुरू में तटस्थ रहने वाले ट्रंप ईरान पर हमले से बचते रहे पर नेतन्याहू के पास पता नहीं ट्रंप की कौन सी गुप्त कुंजी है कि न चाहते हुए भी ट्रंप ने ईरान युद्ध छेड़ दिया। मजबूरी में ट्रंप अब दावे कर रहे हैं कि हम ईरान के आकाश पर पूर्ण नियंत्रण रखते हैं। ऐसे दावे कर रहे हैं, जो इजरायल की आाढामकता को बढ़ावा दे रहा है। वह जबरदस्ती अमेरिका को एक लंबे अभियान में धकेल रहा है। जो अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचाएगा। दरअसल अमेरिका ईरान का सही आकलन नहीं कर पाया। इजरायल और अमेरिका ने सोचा था कि ईरान जल्दी टूट जाएगा, लेकिन ईरानी मिसाइलों के हमलों और प्राक्सी समूहों की सािढयता ने संघर्ष को क्षेत्रीय बना दिया। सुप्रीम लीडर और ईरान के रहबर अयातुल्लाह खामेनेई की हत्या जैसे कदमों न सिर्फ दुनिया के शिया मुसलमानों को एक किया बल्कि तमाम सुन्नी भी अमेरिका-इजरायल के खिलाफ हो गए। अमेरिकी ठिकानों पर पूरे मध्य एशिया अरब मुल्को पर ईरान ताबड़तोड़ हमले कर रहा है। अमेरिका के 17 सैनिक अड्डों को तबाह कर दिया है और इजरायल का तो यह हाल है कि वहां के अखबार जेरुस्लम पोस्ट ने स्वीकार किया है कि 11 दिन की लड़ाई में इजरायल पर 9,115 मिसाइल, राकेट हमले हुए हैं और वहां की इंशोरेंस कंपनियों पर जो मुआवजे के दावे हुए हैं उनमें बताया गया है कि ईरानी-हिजबुल्लाह हमलों में 6,586 इमारतें तबाह हुई हैं। अब आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि एक इमारत में कितने लोग रहते होंगे जो या तो मारे गए या फिर घायल हुए। इजरायल में 1485 कारों को नष्ट कर दिया गया है, 1044 इक्विपमेंट तबाह हो चुके हैं। बता दें कि इजरायल में नुकसान की खबरों पर सेंसर लगा हुआ है। इसलिए सही से पता नहीं चल रहा है कि असल में कितना नुकसान हुआ है। यह तो जेरुस्लम पोस्ट के बीमा दावों का हवाला है। ट्रंप अब बाहर निकलने के रास्ते तलाश रहे हैं। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 12 March 2026

खामेनेई कभी मरते नहीं हैं


ईरान ने अपना सुप्रीम लीडर चुन लिया है। अयातुल्लाह अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई ईरान के नए सुप्रीम लीडर चुने गए हैं। दुनिया के स्वयंभू बादशाह सलामत डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की थी कि अयातुल्लाह अली खामेनेई की शहादत के बाद ईरान का अगला सुप्रीम लीडर कौन होगा यह मैं चुनूंगा। ईरान ने ट्रंप को मुंहतोड़ जवाब दिया है और साफ बता दिया है कि ईरान ट्रंप-नेतन्याहू के सामने झुकने वाला नहीं है। ईरान के सरकारी मीडिया ने बताया कि असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स 88 सदस्यीय धार्मिक संस्था है जिसकी जिम्मेदारी सुप्रीम लीडर को चुनने की है। संस्था द्वारा जारी एक बयान को ईरानी टीवी पर एंकर ने पढ़कर सुनाया। बयान में कहा गया कि युद्ध में बेहद गंभीर हालात और हमारी संस्था के खिलाफ दुश्मनों की सीधी धमकियों के बावजूद और असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के सचिवालय के दफ्तरों पर बमबारी से उसके कई कर्मचारियों और सुरक्षा टीम के सदस्यों के शहीद हो जाने के बावजूद ईरानी व्यवस्था के नेतृत्व के चयन और उसकी घोषणा की प्रािढया एक पल के लिए भी नहीं रूकी। इसके बाद एंकर ने नारा लगाया-अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर खामेनेई ही रहबर। अमेरिकी-इजरायल के हवाई हमलों में अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद कई लोगों को आशंका थी कि उनके बेटे मोजतबा खामेनेई भी मारे गए हैं। कई दिनों तक मोजतबा के बारे में कोई खबर नहीं आई। लेकिन तीन मार्च को ईरान की सरकारी मीडिया ने बताया कि मोजतबा जिंदा हैं और उन्हें ईरान का सर्वोच्च नेता चुन लिया गया है। बता दें कि मोजतबा खामेनेई ने तो कभी कोई सार्वजनिक भाषण दिया ही नहीं, न कोई सरकारी पद संभाला, न कोई साक्षात्कार दिया और उनकी बहुत कम तस्वीरें और वीडियो प्रकाशित हुए हैं। अमेरिकी राजनयिक दस्तावेजों में उन्हें पर्दे के पीछे असली ताकत बताया गया था। उनको शासन के भीतर एक सक्षम और दृढ़ नेता माना जाता है। 8 सितम्बर 1969 को ईरान के उत्तर पूर्वी शहर माशहद में जन्मे मोजतबा इमाम अली खामेनेई के 6 बच्चों में दूसरे स्थान पर हैं। मीडिया के मुताबिक 17 साल की उम्र में मोजतबा ने ईरान-इराक युद्ध के दौरान सेना में सेवा दी थी। मदरसों की व्यवस्था में अयातुल्लाह के पदवी का होना और धार्मिक कक्षाओं को पढ़ाना किसी व्यक्ति की विद्वत क्षमता और ज्ञान का प्रमाण माना जाता है। ये भविष्य में नेता चुने जाने की आवश्यक शर्तों में से एक है। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक जैसे ही नाम की घोषणा हुई, ईरान की सेना, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) और राजनीतिक नेताओं ने तुरन्त मोजतबा खामेनेई के प्रति निष्ठा की शपथ ली। आईआरजीसी ने बयान जारी करते हुए कहा हम नए नेता आयतुल्लाह सैय्यद मोजतबा खामेनेई के हुक्म का पालन करने और खुद को कुर्बान करने के लिए तैयार हैं। सेना के शीर्ष नेतृत्व ने भी अपनी पूरी वफादारी का वादा किया है। ईरान के नए सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह मोजतबा खामेनेई के सबसे शक्तिशाली पद संभालते ही ईरान ने इजरायल पर मिसाइलों से हमला किया। मानों यह संकेत था कि अयातुल्लाह अली खामेनेई की शहादत से भी उसकी रणनीति में कोई बदलाव नहीं आया बल्कि यूं कहें कि ईरान अब और शक्ति से हमला करेगा। यह इससे साबित होता है कि अयातुल्लाह मोजतबा खामेनेई के नेतृत्व में इस युद्ध में जबरदस्त नई मिसाइलों से हमला किया। देखना यह है कि क्या अयातुल्लाह मोजतबा खामेनेई अपने पिता अयातुल्लाह अली खामेनेई के उस फतवे को बदलेंगे जिसमें कहा गया था कि ईरान कोई परमाणु हथियार नहीं बनाएगा? 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 10 March 2026

ईरान पर हमले की कीमत?

 
डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ तो नेतन्याहू के उकसावे पर युद्ध तो शुरू कर दिया पर उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि यह लड़ाई लम्बी और महंगी पड़ सकती है। जो संघर्ष चार दिन में खत्म होने की भविष्यवाणी की जा रही थी वह आज दसवें दिन भी खत्म होना तो दूर की बात वह बढ़ती जा रही है। अमेरिका को सैनिकों की मौत और आर्थिक मार मार झेलनी पड़ रही है जिसका उसने कभी अनुमान भी नहीं लगाया होगा। डोनाल्ड ट्रंप ने अब संकेत दिया है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल की यह लड़ाई 4-5 हफ्ते तक चल सकती है। वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक सीएसआईएस और ािढस पार्क द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार ईरान के खिलाफ ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत जंग के पहले 100 घंटों में अमेरिका को लगभग 3.7 अरब डॉलर (करीब 31,000 करोड़ रुपए) खर्च उठाना प़ड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार युद्ध के शुरूआती 100 घंटों में अमेरिका का औसत खर्च लगभग 891 मिलियन डॉलर प्रतिदिन यानि करीब 90 करोड़ डॉलर रोज रहा है। शुरुआती चरण में सबसे अधिक खर्च महंगी मिसाइलों, हथियारों और बमों के इस्तेमाल पर हुआ है, इसलिए शुरुआती दिनों में लागत सबसे अधिक है। थिंक टैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि 1.7 अरब डॉलर पैट्रियट जैसे एयर डिफेंस इंटरसेप्टर सिस्टम पर खर्च किए गए हैं जबकि 1.5 अरब डॉलर मिसाइलों और अन्य आाढामक हथियारों पर किए गए हैं। इसके अलावा 125 मिलियन डॉलर लड़ाकू विमानों और हवाई अभियानों के परिचालन पर खर्च किए गए हैं। सीएसआईएस के मुताबिक खर्च में से केवल लगभग 200 बिलियन डॉलर ही पहले से अमेरिकी रक्षा बजट में शामिल था जबकि करीब 3.5 अरब डालर का खर्च अतिरिक्त है, जिसके लिए अलग से फंड की जरूरत पड़ सकती है। इसका मतलब है कि अमेरिकी रक्षा मंत्रालय को जल्द ही युद्ध जारी रखने के लिए अतिरिक्त बजट की मांग करनी पड़ सकती है। इसके अलावा कतर, जार्डन, यूएई में जो एयर डिफेंस के रडार व अन्य यंत्र जो तबाह हुए हैं जिनकी कीमत अरबों डॉलर रही है का तो हिसाब ही नहीं है। रिपोर्ट का अनुमान है कि युद्ध के पहले 100 घंटों में अमेरिका के 2000 से अधिक प्रकार के हथियार और मिसाइलों का इस्तेमाल किया है। इन हथियारों के स्टाक को दो बार भरने में लगभग 3.1 अरब डॉलर खर्च हो सकते हैं। थिंक टैंक ने अपने आंकलन में कहा है कि युद्ध का मानवीय नुकसान भी तेजी से बढ़ रहा है। ईरान में ही लगभग 1500 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें 180 छोटी बच्चियां भी शामिल हैं जिनके स्कूल पर अमेरिका ने बहरीन से बम मारा। अमेरिका के कितने सैनिक मरे हैं यह संख्या भी बहुत हो सकती है। अमेरिका ने फिलहाल 6-7 सैनिकों के मरने की पुष्टि की है। पर ईरानी दावा कर रहे हैं कि यह संख्या सैंकड़ों में है। खर्च के अलावा, कुवैत में फ्रेंडली फायर की घटना में तीन अमेरिकी एफ-15 लड़ाकू विमान गिर गए। बता दें कि एक एफ-15 अत्याधुनिक फाइटर जेट की कीमत लगभग 800 करोड़ रुपए है। ईरान पर हमला करते वक्त अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप ने शायद यह सोचा भी नहीं होगा कि यह जंग उसे कितनी महंगी पड़ेगी। लड़ाई लंबी खिंचने और ईरानी जवाबी कार्रवाई ने ट्रंप की नींद उड़ा रखी है। आए दिन वह धमकियों पर उतर आए हैं। ट्रंप फंस तो गए हैं पर बाहर कैसे निकलें ये उन्हें समझ नहीं आ रहा है। खर्च के अलावा अंदरूनी राजनीतिक दबाव, एपस्टीन फाइल, सहयोगी अरब मुल्कों का दबाव यह सब अमेरिका और ट्रंप पर भारी पड़ रहा है। हताश होकर ट्रंप कोई ऐसा कदम न उठा लें जिससे पूरी दुनिया सकते में आ जाए? 
-अनिल नरेन्द्र

Friday, 6 March 2026

जंग तुम शुरू करोगे खत्म हम करेंगे


यह चेतावनी दी थी अयातुल्लाह अली खामेनेई ने शहीद होने से पहले। उन्होंने एक बार नहीं बार-बार यह चेतावनी दी और साथ ही कहा था कि अगर अमेरिका-इसरायल ईरान पर हमला करते हैं तो हम मुंह तोड़ जवाब देंगे। ऐसा जवाब देंगे जिसकी अमेरिका ने कभी कल्पना भी नहीं की हो। इतना ही नहीं अयातुल्लाह खामेनेई ने भी चेताया था कि अगर ईरान पर हमला होगा तो जवाबी कार्रवाई पूरे मध्य एशिया के देशों पर अमेरिकी सैन्य अड्डों पर भी होगी और यह क्षेत्रीय युद्ध में बदल जाएगा। इसके जवाब में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि हम 4 दिन में ईरान को घुटनों पर ला देंगे और नई सत्ता स्थापित कर देंगे। अब जंग के 7-8 दिन बाद वहीं ट्रंप अब यह कह रहे हैं कि यह जंग चार-पांच सप्ताह खिच सकती है। दरअसल अमेरिका फंस गया है। तालिबान अगर 20 साल बाद भी लड़ाई के बाद जिंदा रहा तो उसके पीछे उसकी रणनीति और अफगानिस्तान के भौगोलिक हालात थे। ईरान भी अमेरिका के लिए ऐसी ही चुनौती पेश करने वाला है। डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान में अपनी सेना भेजने से इंकार नहीं किया है। लेकिन यकीन मानिए अगर अमेरिकी सैनिक ईरान पहुंचते हैं तो वियतनाम और अफगानिस्तान की तरह उसे जलील होकर भागना पड़ सकता है। दशकों से खाड़ी देशों को अमेरिकी सुरक्षा को लेकर भ्रम बना हुआ था। लेकिन आसमान से बरसती ईरानी मिसाइलों ने उस भरोसे को तोड़ दिया है। ईरान ने खाड़ी के देशों यूएई, सऊदी अरब, कुवैत और बहरीन में जमकर मिसाइले मारी हैं और अमेरिकी टारगेट्स को नष्ट किया है। ईरानी हमलों का मकसद और संदेश साफ था कि जो देश अमेरिकी सेना को हमले के लिए अपनी जमीन दे रहे हैं उन्हें बख्शा नहीं जाएगा। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराधची ने कहा है कि तेहरान ने इस इलाके में दुश्मनों के मिलिट्री बेस पर हमला करके शुरुआत की है। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि युद्ध अगले 4-5 हफ्तों तक और चल सकता है। जिससे मध्य-पूर्व में और तबाही फैलने की आशंका बढ़ गई है। अयातुल्लाह खामेनेई की हत्या के बाद मध्य-पूर्व के कई देशों में स्थित अमेरिकी ठिकाने पर ताबड़तोड़ ईरानी हमले हो रहे हैं। इनमें सऊदी अरब में अमेरिकी दूतावास, कतर के अल उदीद एयरबेस, बहरीन में अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े के मुख्यालय और दुबई के कई होटलों और महत्वपूर्ण सैन्य इमारतों पर हमले यह दर्शाते हैं कि अब जंग पूरे मध्य-पूर्व में फैल चुकी है। अमेरिकी-सऊदी के आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचाने के लिए ईरान ने वहां की सबसे बड़ी अरामको रिफाइनरी पर बम बरसाए। ये हमले इतने खतरनाक है कि अमेरिका ने मध्य-पूर्व में अपने दूतावासों को बंद कर दिया है। इसके अलावा अमेरिका ने इजरायल से अपने नागरिकों को निकालने को लेकर हाथ खड़े कर दिए हैं। अमेरिका और इजरायल ने पहले ही हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई को मार दिया था और ट्रंप को उम्मीद थी कि सिर काटने से सिस्टम गिर जाएगा लेकिन हुआ उल्टा। सड़कों पर बगावत नहीं, खामेनेई के लिए लाखों मातम करते दिखे। सड़कों पर बगावत नहीं, उल्टा सरकार का बढ़ता समर्थन दिखा और इंतकाम लेने के इरादे दिखे। सत्ता ढही नहीं, बल्कि ईरान ने पूरे मध्य-पूर्व को हिला दिया। अब ट्रंप भी समझ गए हैं कि जंग लम्बी चलेगी। कुछ विशेषज्ञों का दावा है कि इस जंग की तैयारी ईरान पिछले 40 सालों से कर रहा था और वह लम्बी लड़ाई लड़ने की क्षमता रखता है। वहीं दूसरी ओर अमेरिकी सैनिकों के बॉडी बैग अमेरिका पहुंचने शुरू हो चुके हैं। देखना यह होगा कि अब यह जंग क्या रूप अख्तियार करती है? संकेत साफ हैं कि यह आग और फैलने वाली है और विनाशकारी होगी। 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 3 March 2026

अयातुल्लाह खामेनेई की शहादत


मैं सबसे पहले ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को अपनी श्रद्धांजलि पेश करना चाहता हूं। दुनिया अयातुल्लाह खामेनेई की शहादत को याद रखेगी। उनकी बहादुरी की मिसाल शहादत के हर पा में अव्वल रहेगी। वह यह जानते थे कि वह अमेरिका और इजरायल के निशाने पर हैं और उन पर किसी भी क्षण हमला हो सकता है। फिर भी वह तेहरान छोड़कर नहीं भागे। न तो किसी बने शैल्टर में गए और न ही किसी गुप्त स्थान पर। उन्होंने अपने दफ्तर में काम करते हुए शहादत को गले लगाना चुना। वह अपने देश के लिए कुर्बान हो गए पर दुश्मन के सामने पीठ नहीं दिखाई। बेशक आज डोनाल्ड ट्रंप और नेतन्याहू खामेनेई को मारकर विजेता होने का दावा कर रहे हैं। लेकिन उन्होंने खामेनेई की हत्या करके बड़ा जोखिम मोल ले लिया है। खामेनेई की शहादत ने सारे ईरान व इस्लामी जगत को अमेरिका और इसरायल के खिलाफ खड़ा कर दिया है। उसके नतीजे सामने आने भी लगे हैं। कुवैत, यूएई, कतर, बहरीन पर ईरानी मिसाइलें गिर रही हैं। यूएई पर तो इस लेख लिखने तक 167 मिसाइलें गिर चुकी हैं। ईरानी पलटवार का कहर सबसे ज्यादा यूएई पर टूटा है। यूएई के रक्षा मंत्रालय ने कहा, ईरान की तरफ से देश के कई हिस्सों में अब तक 165 बैलिस्टिक मिसाइल, 2 ाtढज मिसाइल और 541 ईरानी ड्रोन से हमला किया जा चुका है। इनमें से 506 को हवा में रोककर नष्ट कर दिया गया, जबकि 35 देश के अन्य इलाके में गिरी। दुबई विशेष टारगेट पर है क्योंकि यहां अमेरिकी कंपनियों के मुख्यालय हैं और ईरान अमेरिका की आर्थिक ताकत को भारी नुकसान पहुंचाता है। इसलिए वह ऐसे स्थानों पर हमले कर रहा है जहां अमेरिका की सबसे बड़ी कंपनियां हैं। अयातुल्लाह अली खामेनेई मारे कैसे गए? यह प्रश्न सब पूछ रहे हैं। क्या कोई मोसाद-सीआईए का स्लीपर एजेंट था जिसने सटीक जानकारी दी थी कि खामेनेई किस समय कहां होंगे और मीटिंग में कौन-कौन होगा? बिना इस सटीक जानकारी के यह हमला संभव ही नहीं था। फिर सवाल यह भी उठता है कि ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम क्या कर रहे थे? वह इस मिसाइल या बमों को इंटरसेप्ट क्यों नहीं कर सके? क्या अमेरिका ने ईरान के राडार हमले से पहले जाम कर दिए थे? इसरायल के एफ-35 फाइटर जेट्स ने ईरान एयर डिफेंस को भेदते हुए तेहरान में खामेनेई बेत-ए-रहबरी पैलेस पर दो हजार किलो के 40 बंकर बस्टर बम गिराए। ये लेजर गाइडेड पैनिट्रेटर है यानि पैलेस के अंडरग्राउंड में भी छिपे खामेनेई को मार गिराया जा सके। इजरायली सेना ने कई तरह की मिसाइलों से भी हमला किया। हमले में रक्षा मंत्री अजीज नासिरजादेह, आर्मी चीफ आमिर हातामी और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के चीफ मोहम्मद पाकपुर समेत लगभग 40 आला अफसर और धार्मिक नेता मारे गए। सूत्रों के अनुसार इनमें से लगभग 15 खामेनेई के पैलेस में एक मीटिंग के लिए जमा हुए थे। अमेरिका और इजरायल चाहता है कि ईरान में निजाम यानि रजीम चेंज हो। देखना यह होगा कि वह अपने इस उद्देश्य में कितना कामयाब रहता है। फिलहाल तो ईरान की बदले की कार्रवाई से बचने का प्रयास हो रहा है। तेहरान ने बड़ी जवाबी कार्रवाई में कुवैत, कतर और बहरीन में अमेरिका के कई बड़े मिलिट्री बैस पर बैलिस्टिक मिसाइल दागी हैं। इनमें नुकसान की खबर भी आई है। सऊदी अरब और जार्डन में भी हमले की खबर है। अयातुल्लाह खामेनेई मरने से पहले ही दूसरी पंक्ति खड़ी करके गए थे। ईरान ने हमले के तुरन्त बाद ही जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी है। देखें, यह जंग आगे कितनी बढ़ती है, कहीं यह तीसरे विश्व युद्ध की शक्ल तो नहीं लेता? 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 28 February 2026

मोदी की इजरायल यात्रा और अरब मीडिया


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इजरायल यात्रा, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ उनके करीबी रिश्ते और इजरायली संसद में दिया गया उनका भाषण इन सबकी चर्चा अरब मीडिया में खूब हो रही है। अरब मीडिया इस यात्रा को सिर्फ भारत-इजरायल संबंधों के तौर पर नहीं बल्कि बड़े क्षेत्रीय समीकरणों के तौर पर पेश कर रहे हैं। कई अरब विश्लेषकों ने पा किया है कि जहां ऐतिहासिक रूप से भारत टू नेशन थ्योरी की बात कहता है और फिलस्तीनी क्षेत्र में शांति प्रयासों का समर्थन करता है, वहीं मोदी की लीडरशिप में वो इजरायल के बेहद नजदीक आ चुका है। अरब मीडिया इस बात पर भी फोकस कर रहा है कि भारत का मौजूदा स्टैंड इजरायल और फिलस्तिनियों के संबंध में उसके पारम्परिक स्टैंड से अलग दिशा में जा रहा है। जहां पहले भारत की विदेश नीति में इस बात पर जोर था कि इजरायल और फिलस्तीनी महत्वकांक्षा, दोनों से ही समान दूरी बनाए रखेगा, वहीं अब भारत की विदेश नीति के केंद्र में हित आधारित संबंध ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं। अरब मीडिया के मुताबिक भारत अपने पड़ोसियों से तनावपूर्ण रिश्तों और अपनी सैन्य जरूरतों के मद्देनजर आज वो इजरायल के ज्यादा नजदीक जा रहा है। अरब मीडिया ने प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा के पा के साथ-साथ गाजा में इजरायल पर लगे नरसंहार के आरोपों को भी हाइलाइट किया। साथ ही भारत के विपक्षी नेताओं की उन टिप्पणियों को भी अपनी कवरेज में शामिल किया है जिनमें वो इजरायल पर लगे इन आरोपों के मद्देनजर पीएम की यात्रा का विरोध कर रहे हैं। अल जजीरा के इजरायल-फिलस्तीन मामलों के जानकार अन्जाम अबु अल अदस कहते हैं कि भारतीय प्रधानमंत्री की ये यात्रा गहरे रणनीतिक बदलाव का प्रतीक है। भारत-इजरायल साझेदारी इस क्षेत्र में एक नए क्षेत्रीय ध्रुवीकरण को जन्म देगी। आने वाले समय में मध्य पूर्व और एशिया की राजनीति में भारत-इजरायल की अहम भूमिका होगी। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी अपने भाषण में भारत के साथ सैन्य साझेदारी का संकेत दिया। इससे साफ है कि इस क्षेत्र में पाकिस्तान, तुर्की व सउदी अरब के संभावित गठबंधन को चुनौती पेश करने के लिए भारत और इजरायल सहयोगी देशों के रूप में नजदीक आ रहे हैं। भारत इजरायल के साथ इस गठबंधन को पाकिस्तान के साथ अपने क्षेत्रीय संघर्ष और एशिया में अपनी सैन्य, कूटनीतिक स्थिति मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। वहीं अल जजीरा ने मोदी के इजरायली संसद में दिए गए संबोधन पर लिखा ः गाजा में इजरायल पर नरसंहार के गंभीर आरोपों के बावजूद भारत ने इजरायल से एकजुटता दिखाई और प्रधानमंत्री मोदी ने गाजा में इजरायल के विनाशकारी युद्ध का बचाव करते हुए कहा कि इजरायल के साथ खड़ा है। भारत में अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने के लिए मोदी सरकार हिंदू राष्ट्रवाद का सहारा ले रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर हमास के हमले का पा करते हुए कहा, हम आपका दर्द महसूस करते हैं, आपका दुख समझते हैं। कारण कोई भी हो नागरिकों की हत्या को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। गल्फ न्यूज ने भारत में नरेन्द्र मोदी की इस यात्रा की जिन विपक्षी नेताओं ने विरोध किया उसे भी कवर किया है और कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी के उस बयान को जगह दी है जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मोदी इजरायली संसद में इजरायल के गाजा में किए गए नरसंहार का भी पा करेंगे। लंदन बेस्ड द न्यू अरब लिखता है कि मोदी एक कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी नेता है। जिन्होंने 7 अक्टूबर के हमले के बाद सबसे पहले इजरायल के साथ एकजुटता दिखाई थी। लेकिन भारत उन 100 से ज्यादा देशों में भी शामिल है जिन्होंने हाल ही में इजरायल के वेस्ट बैंक पर नियंत्रण के प्रयासों की और फिलस्तीनी प्राधिकरण के सीमित शक्तियों को कमजोर करने के इजरायल के इजरायल के प्रयासों की निंदा भी की है। इस समय यात्रा का क्या यह मतलब निकाला जाए कि भारत की विदेश नीति में भारी परिवर्तन आ रहा है। भारत को अब अरब देशों के रिएक्शन की कोई चिंता नहीं है? 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 26 February 2026

ट्रंप की धमकी, रमजान की रौनक


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हमले की लगातार धमकियों के बीच ईरान में रमजान को लेकर उत्साह में कोई कमी नहीं दिख रही है। स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार ईरान के भीतर सार्वजनिक जीवन नियमित रूप से चल रहा है। उधर ईरान से सटे इलाके में अमेरिकी सेना की लगातार बढ़ती तैनाती अब सिर्फ संकेत देने तक सीमित नहीं लगती बल्कि ये वास्तविक जंग के स्पष्ट संकेत हैं। अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस अब्राहिम लिंकन और यूएसएस फोर्ड के ईरानी जल क्षेत्र के पास पहुंचने से स्थिति बहुत गंभीर बनी हुई है। इसके अलावा सैकड़ों अमेरिकी फाइटर जेट व अन्य साजोसामान भी इस इलाके में पिछले कुछ दिनों में लाए गए हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका-इजराइल यहां कई स्तरों पर सैन्य कार्रवाई के लिए विकल्प तैयार कर रहे हैं। ईरान में यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि ट्रंप अपनी बात मनवाने के लिए सैन्य दबाव बढ़ा रहा है। जंग की आहट के बावजूद ईरान में सब सामान्य दिख रहा है। मस्जिदों में विशेष नमाज, बड़े इफ्तार आयोजन और सदका-फितर प्रमुखता से हो रही है। इस्लामिक रिपब्लिकन न्यूज एजेंसी ने रमजान के अवसर पर राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन का संदेश प्रकाशित किया है। इसमें उन्होंने इस महीनों को आत्मचिंतन और एकजुटता का समय बताया। उन्होंने कहा कि दुनिया की शक्तियां हमें अपना सिर झुकाने के लिए साजिश कर रही है... लेकिन वे हमारे लिए जो भी समस्याएं पैदा करें, हम अपना सिर नहीं झुकाएंगे। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामनेई ने अमेरिका को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि अगर अमेरिका हमला करता है तो इससे पश्चिम एशिया में एक क्षेत्रीय (रीजनल) युद्ध छिड़ सकता है, तनाव और अधिक बढ़ सकता है। खामनेई ने कहा कि ईरान उकसाने की नीति नहीं अपनाता लेकिन उन्होंने साफ किया कि ईरानी राष्ट्र पर अगर कोई हमला या उत्पीड़न किया गया तो ईरान ऐसा कडा जवाब देगा जिसका अमेरिका-इजराइल को अंदाजा नहीं। हम पर कोई भी स्ट्राइक हो चाहे वह लिमिटेड स्ट्राइक ही क्यों न हो पर उसका पूरी ताकत से जवाब देंगे। मध्यपूर्व के तमाम अमेरिकी सैन्य बेसों सहित उनके युद्धपोत भी सुरक्षित नहीं रहेंगे। उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार अपनी शर्तें बदल रहे हैं। पहले उन्होंने तीन शर्तें रखी थीं: ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम खत्म करे, अपनी मिसाइलों की प्रोडक्शन और क्षमता कम करे। ईरान से अमेरिका की इस सिलसिले में दो बार जेनेवा में वार्ता विफल हो चुकी है। अब तीसरे और अंतिम राउंड की बात हो रही है। इस बीच डोनाल्ड ट्रंप ने अब कहा है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन से बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता। अमेरिका इन तरीकों से ईरान को घेरने की युद्ध नीति पर काम कर रहा है। जंगी जहाजों की तैनाती, अरब सागर में तैनात अमेरिका के विशाल विमान वाहक पोतों को घेरने की है। पहले बड़ी संख्या में टैंक से जहाजों के सुरक्षा सिस्टम को उलझाएंगे, ताकि वे मिसाइल को रोकने में कामयाब रहें। दूसरीः खाड़ी देशों के मौजूद अमेरिका के 19 ठिकानों पर करीब 50,000 सैनिक किसी भी समय हमले में भाग ले सकते हैं। हालांकि यही सैनिक ईरान के निशाने पर होंगे। तीसरीः तेल सप्लाई रोकना। अमेरिका इस प्रयास में है कि ईरान किसी भी देश को अपने यहां से तेल सप्लाई न कर सके ताकि उसकी आर्थिक स्थिति बिगड़े। उसने भारत पर भी दबाव डाला है कि भारत ईरान से तेल लेना बंद करे। इस बीच इजराइल से एक अपुष्ट खबर सोशल मीडिया पर चल रही है कि इजराइल ने अब चेतावनी दी है कि अगर उसके अस्तित्व पर खतरा हुआ तो वह ऐसे हथियार चलाएगा जो अभी तक इस्तेमाल नहीं हुए। इशारा साफ है कि परमाणु बम का इस्तेमाल भी कर सकता है। कुल मिलाकर बड़ी विस्फोटक स्थिति बनी हुई है। उम्मीद की जाती है कि जंग टले क्योंकि अगर यह होती है तो इसका असर पूरे विश्व पर पड़ सकता है।
- अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 24 February 2026

फैसला ट्रंप के टैरिफ रद्द करने का

मानना पड़ेगा कि अमेरिका में आज भी लोकतंत्र जिंदा है। संविधान सवरेपरि है। अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने दिखा दिया कि वह संविधान की रक्षा करने में किसी के सामने न तो झुकने को तैयार है और न ही किसी दबाव में आएगी। चाहे वह अमेरिका के राष्ट्रपति ही क्यों न हों। अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने शुव्रवार को फैसला सुनाया कि राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप का वैश्विक टैरिफ अवैध है। अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश चीफ जस्टिस जॉन रॉबट्र्स ने पैसला 6-3 के बहुमत से दिया। यानि छह जजों ने टैरिफ को अवैध बताया और तीन इससे असहमत थे। ट्रंप अमेरिकी व्यापार समझौतों को नए सिरे से करने के लिए दुनियाभर में टैरिफ को दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहे थे। यह पहली बार है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के दूसरे कार्यंकाल की किसी नीति को निर्णायक रूप से रद्द किया है। अन्य क्षेत्रों में अदालत के वंजर्वेटिव बहुमत ने अब तक ट्रंप को कार्यंकारी शक्तियों के व्यापाक उपयोग की छूट दी थी। इस बार सुप्रीम कोर्ट में छह जजों के बहुमत, तीन वंजर्वेटिव और तीन लिबरल ने कहा कि बिना कांग्रेस (अमेरिकी संसद) की स्पष्ट अनुमति के इतने व्यापक टैरिफ लागू कर ट्रंप ने सीमा लांघी हैं। अदालत ने ट्रंप के इस तर्व को खारिज कर दिया कि 1977 का कानून इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट, अप्रत्यक्ष रूप से टैरिफ की अनुमति देता है। जस्टिस रॉबट्र्स ने कहा कि राष्ट्रपति जिस अधिकार का दावा कर रहे हैं, वह किसी भी पैमाने पर सीमा से बाहर का था। चीफ जस्टिस ने पैसले में लिखा है, अगर कांग्रेस टैरिफ लगाने जैसी असाधारण शक्ति देना चाहती कि वह इसे स्पष्ट रूप से कर सकती है। उन्होंने यह भी लिखा कि ट्रंप प्रशासन के कानूनी तर्को को स्वीकार करना व्यापार नीति पर कार्यंपालिका और विधायिका के लम्बे सहयोग को समाप्त कर राष्ट्रपति को अनियंत्रित ताकत देना होगा। ट्रंप के टैरिफ को अवैध बताने के पैसले से तीन वंजर्वेटिव जजों क्लेरेंस थॉमस, सैमुअल एलिटो और ब्रेट वैवनॉ ने असहमति जताईं। ट्रंप ने तीन जजों की तारीफ भी की है। वैदनो ने कहा कि कईं कानून राष्ट्रपतियों को टैरिफ और आयात प्रतिबंध लगाने की अनुमति देते हैं। उनके अनुसार 1977 का कानून राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान विदेशी खतरों से निपटने के लिए राष्ट्रपति को अनुमति देते हैं। उधर, ट्रंप ने एक प्रेस कॉन्प्रेंस में पैसले को भयानक और हास्यास्पद बताया और कहा कि वह अदालत के वुछ सदस्यों से शर्मिदा हैं। उन्होंने कहा कि यह निर्णय गलत है। लेकिन इससे कोईं फर्व नहीं पड़ता क्योंकि हमारे पास बहुत शक्तिशाली विकल्प है। ट्रंप के पास दो बड़े विकल्प हैं। पहला: ट्रंप अमेरिकी कांग्रेस यानि प्रतिनिधि सभा और सीनेट में टैरिफ के प्रस्ताव को पास कराने के लिए रख सकते हैं। 435 की प्रतिनिधि सभा में ट्रंप के रिपब्लिकन 218 जबकि विपक्षी डेमोव्रेट 213 है जबकि 100 सीनेट में रिपब्लिकन 53 और डेमोव्रेट 47 हैं। टैरिफ के खिलाफ सेंटीमेंट को देख ट्रंप संसद में टैरिफ को रखने से शायद परहेज करें। अन्य प्रावधान लागू कर सकते हैं, पर लम्बी प्रव्रिया होगी। ट्रंप अमेरिकी संविधान की धारा 301 के तहत टैरिफ के प्रावधान लागू कर सकते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा के तहत टैरिफ को जायज ठहराया जाता है। ट्रंप ने चीन, कनाडा और मैक्सिको पर इन्हीं प्रावधानों के तहत टैरिफ लगाया था। हालांकि इन्हीं प्रावधानों को भी कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। ट्रंप ने भी ऐलान कर दिया है कि वह पीछे नहीं हटेंगे। शुव्रवार रात उन्होंने कहा कि अन्य कानूनी अधिकारों के आधार पर नया 10 प्रतिशत वैश्विक टैरिफ लगाने के आदेश पर हस्ताक्षर किए हैं। ट्रंप ने कहा कि हम पीछे नहीं हटेंगे, हम और ज्यादा पूंजी जुटाएंगे। देखें, आगे क्या होता है। सारी दुनिया में अब रिपंड की मांग भी उठनी शुरू हो गईं है। आगे-आगे देखते हैं होता है क्या? ——अनिल नरेन्द्र

Saturday, 21 February 2026

अजित पवार विमान हादसा

 
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित दादा पवार के विमान हादसे के करीब 20 दिन बाद उनके बेटे ने चुप्पी तोड़ी। अजित पवार के छोटे बेटे जय पवार ने एक बेहद भावुक पोस्ट के जरिए जांच पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जय पवार ने सीधे तौर पर कहा है कि विमान का ब्लैक बाक्स इतनी आसानी से नष्ट होने वाली चीज नहीं है। बता दें कि किसी भी विमान हादसे में जब सब कुछ नष्ट हो जाता है तो उसके अंदर ब्लैक बॉक्स न तो आग से, पानी से, जमीन पर गिरने से, विस्फोट से नष्ट नहीं होता। 20 वर्षों तक वह सुरक्षित रहता है। जय पवार ने साफ तौर पर कहा है कि ब्लैक बॉक्स  इतनी आसानी से नष्ट होने वाली चीज नहीं है, जैसा कि दावा किया जा रहा है। जनता को सब जानने का हक है। जय पवार ने सिस्टम को कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने लिखा विमान दुर्घटना में ब्लैक बॉक्स आसानी से  नष्ट नहीं हो सकते। महाराष्ट्र की जनता को इस दिल दहला देने वाली दुर्घटना का पूरा, पारदर्शक और निर्विवाद सत्य जानने का अधिकार है। जय पवार ने विमान कंपनी वीएसआर के खिलाफ तत्काल सख्त कदम उठाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि इस कंपनी के उड़ान व संचालन पर तुरन्त प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए और विमानों के रखरखाव में हुई संभावित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। पोस्ट के अंत में उन्होंने बेहद भावुक होकर लिखा ः मिस यू डैड। उधर अजित पवार के भतीजे और विधायक रोहित पवार ने कहा कि अजित दादा पवार की आकस्मिक मृत्यु में साजिश की आशंका है। रोहित पवार ने मुंबई में दावा किया कि कई सूत्रों से विस्तृत जानकारी जुटाने के बाद ही वह प्रेस कांफ्रेंस कर रहे हैं। प्रेस कांफ्रेंस में रोहित पवार ने कहा कि उन्हें एयरलाइंस कंपनी वीएसआर, बुकिंग संभालने वाली कंपनी एरो और पायलट सुमित कपूर पर संदेह हैं। उन्हेंने कहा कि उन्हें इस मामले में जानकारी इसलिए जुटानी पड़ी क्योंकि जांच एजेसियां बहुत धीमी गति से काम कर रही है। अजित दादा पवार परिवार और एनसीपी ने अब इस मामले की सीबीआई जांच की मांग तेज कर दी है। उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस से मुलाकात कर इस मामले में उच्चस्तरीय जांच का निवेदन सौंपा है। प्रफुल्ल पटेल, हसन मुश्रीफ, सुनील तटकरे और पार्थ पवार जैसे दिग्गजों की मौजूदगी में सरकार से मांग की गई है कि इस हादसे के पीछे की हर साजिश या लापरवाही का पर्दाफाश होना चाहिए। इनका सीधा निशाना उस एविएशन कंपनी पर है जिसका विमान इस हादसे का शिकार हुआ। आरोप लग रहे हैं कि क्या विमान की सर्विसिंग और सुरक्षा मानकों में कोई कोताही बरती गई थी? 28 जनवरी को हुए इस हादसे में अजित दादा पवार सहित कुल 5 लोगों ने अपनी जान गंवाई। इस घटना के बाद से ही यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह मात्र एक दुर्घटना थी या कोई गहरी साजिश? आदरणीय अजित दादा पवार के आकस्मिक निधन से पूरे महाराष्ट्र को गहरा धक्का लगा है, यह कहना है सांसद सुप्रिया सुले का। एनसीपी (शरद गुट) ने मांग की है कि इस दुर्घटना की जांच पूरी होने तक नागर विमानन मंत्री के राममोहन नायडू को उनके पद से हटा दिया जाए। हमारा भी मानना है कि इस मामले की निष्पक्ष, स्वतंत्र जांच आवश्यक है ताकि दुर्घटना के कारणों का साफ पता चले पर ऐसा होगा क्या? 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 19 February 2026

निखिल गुप्ता को हो सकती है 40 साल जेल


एक भारतीय व्यक्ति ने पावार को न्यूयार्क में सिख अलगाववादी नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू की 2023 में हत्या की नाकाम साजिश रचने के आरोप में दोष स्वीकार किया है। पता नहीं पिछले कुछ दिनों से भारत और अमेरिका के ग्रह टकरा रहे हैं। एक के बाद एक नई समस्या खड़ी होती जा रही है। पहले गौतम अडानी का मामला फंसा, फिर भारत-अमेरिका ट्रंप डील पर विवाद खड़ा हो गया और अब पन्नू की हत्या की साजिश में मामला फंस गया है। अमेरिकी अखबार न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा है कि यह उस मामले में पहली बार अपराध स्वीकार किया गया है जिसे कनाडा और अमेरिका के अधिकारियों ने भारत सरकार की ओर से असंतुष्टों की हत्या के अभियान से जुड़ा बताया था। अमेरिका में भारतीय मूल के निखिल गुप्ता ने अलगाववादी नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की कथित साजिश रचने के मामले में अपना अपराध स्वीकार कर लिया है। इस मामले की सुनवाई न्यूयार्क की एक अदालत में हो रही है। अटार्नी के दफ्तर से जारी हुए बयान के मुताबिक गुप्ता ने हत्या के लिए सुपारी देने, हत्या की साजिश रचने के साथ ही मनी लांड्रिंग की साजिश से जुड़े तीनों आरोपों को स्वीकार कर लिया है। गुप्ता को 27 मई को सजा सुनाई जाएगी। अमेरिका में इन तीनों आरोपों में सम्मिलित तौर पर 40 साल की सजा हो सकती है। गुप्ता के 30 जून 2023 को चेक रिपब्लिक से गिरफ्तार किया गया था और बाद में उसका प्रत्यर्पण किया गया। आरोप है कि निखिल गुप्ता ने ये साजिश भारतीय सरकारी कर्मचारी रहे विकास यादव के कहने पर रची, इस संबंध में विकास यादव को सीसी-1 कहकर संबोधित किया गया है। इस संबंध में मार्च 2025 में ही विदेश मंत्रालय ने कहा था कि वो (विकास यादव) अब भारत सरकार के कर्मचारी नहीं है। आरोप पत्र के मुताबिक 2023 में यादव ने गुप्ता को हत्या का काम सौंपा था। यादव के कहने पर गुप्ता ने एक ऐसे व्यक्ति से संपर्क किया जो असलियत में अमेरिका की जांच एजेंसी डीईए का ही अंडरकवर एजेंट था विकास यादव ने एक सहयोगी के जरिए इस हिटमैन को अग्रिम भुगतान के तौर पर 15 हजार डालर दिए। 2023 में ही विदेश मंत्रालय ने कहा था कि निखिल गुप्ता को तीन बार चेक गणराज्य में काउंसलर मदद दी गई। यूं तो मामला अमेरिका में 2023 से चर्चा में है, लेकिन इस मामले में इस हालिया घटपाम की टाइमिंग को भी अहम माना जा रहा है। जब भारत और अमेरिका के संबंध बहुत सहज नहीं हैं और दोनों देशों के बीच ट्रेड को लेकर एक व्यापार के अंतरिम समझौते के अगले महीने तक आखिरी रूप लेने की उम्मीद है। ऐसे में भारत के लिए आगे की राह आसान नहीं दिखती। न्याय विभाग ने पन्नू की हत्या को साजिश और 18 जुलाई को कनाडा में खालिस्तानी निज्जर की हत्या के बीच कई लिंक जोड़े हैं। एफबीआई के सहायक निदेशक रोमन रोज से जावस्की ने कहा अमेरिकी नागरिक सिर्फ बोलने की आजादी का इस्तेमाल करने के लिए ट्रांसनेशनल रिप्रेशन का निशाना बना। यानी दमन के लिए किसी दूसरे देश की धरती का इस्तेमाल की साजिश है। इन शब्द का इस्तेमाल कनाडाई अधिकारियों ने कनाडा में निज्जर की हत्या पर किया था। भारत सरकार के इशारे पर की गई बताई गई है जिसे भारत सिरे से खारिज कर चुका है। भारत ने पिछले साल नवम्बर में अमेरिका की ओर से उठाई गई सुरक्षा चिंताओं पर विचार करने के लिए एक उच्चस्तरीय जांच एजेंसी गठित की थी। अक्टूबर 2024 में भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस बात की पुष्टि की थी कि पन्नू के खिलाफ नाकाम हत्या की साजिश से जुड़े अमेरिकी न्याय विभाग के अभियोग में जिस व्यक्ति (विकास यादव) का नाम सामने आया था, वह अब भारत सरकार की सेवा में नहीं है। मूल अभियोग में सरकारी अधिकारी को सीसी-1 कहा गया था। अक्टूबर 2024 में ही अमेरिकी अधिकारियों ने दूसरा संशोधित अभियोग सार्वजनिक किया, जिसमें सीसी-1 की पहचान विकास यादव के रूप में की गई। बाद में विदेश मंत्रालय ने कहा कि विदेश विभाग ने हमें सूचित किया कि अभियोग में उल्लेखित व्यक्ति अब भारत में कार्यरत नहीं है। हम पुष्टि करते हैं कि वह अब भारत सरकार के कर्मचारी नहीं हैं। अब देखना यह है कि निखिल गुप्ता के खिलाफ अमेरिकी अदालत में केस आगे कैसे बढ़ता है। यह भी देखना होगा कि विकास यादव को लेकर अमेरिका भारत पर कितना दबाव बनाता है और भारत सरकार आगे क्यों करेगी? 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 17 February 2026

जैफ्री एपस्टीन फाइल्स


आपने ताशकंद फाइल्स, केरला फाइल्स, कश्मीर फाइल्स और बंगाल फाइल्स का तो नाम सुना होगा और आप में से कईयों ने इन्हें देखा भी होगा पर आज मैं आपको विश्व चर्चित एपस्टीन फाइल्स के बारे में बताता हूं। जैफ्री एपस्टीन कौन था? एपस्टीन फाइल्स जी हां, यही वो दो शब्द हैं जो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके प्रशासन को महीनों से परेशान कर रहे हैं। जैफ्री एपस्टीन अमेरिका का एक अमीर फाइनेंसर था। उस पर महिलाओं और नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण और तस्करी के गंभीर आरोप लगे थे। समय के साथ उसने काफी दौलत बनाई और उसके बाद उसके संबंध बड़े कारोबारियों, राजनेताओं और अंतर्राष्ट्रीय हस्तियों से जुड़ते चले गए। साल 2019 में उसे अमेरिका के फ्लोरिडा और न्यूयार्क में नाबालिगों की यौन तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इससे पहले वह 2008 में भी ऐसे ही मामलों में जेल जा चुके थे। लेकिन तब उसे बहुत कम सजा मिली थी। अगस्त 2019 में जेल में उसकी रहस्यमय ढंग से मौत हो गई। जिसे अमेरिकी सरकार ने आत्महत्या बताया। एपस्टीन फाइलें उन सरकारी डाक्यूमेंट का संग्रह है जो उनके खिलाफ जांच से जुड़े हैं। इनमें पूछताछ के रिकार्ड, अदालत से जुड़े कागजात और अन्य सुबूत शामिल हैं। एपस्टीन की रहस्यमय मौत के बाद से ही लोग ये जानना चाहते थे कि उसके मामलों में किन-किन लोगों का हाथ रहा है। जब ये फाइलें सामने आई तो वहीं बड़े नामों का पा होने के कारण बहस और तेज हो गई। बाल यौन शोषण के दोषी जैफ्री एपस्टीन के यौन अपराधों को लेकर ट्रंप प्रशासन लगातार संकट से जूझ रहा है। अमेरिका की हाउस ओवर साइट कमेटी ने एपस्टीन से जुड़े लाखों दस्तावेज जारी किए हैं। इनमें ई-मेल, वीडियो, चैट इत्यादि शामिल हैं। मामला एक नाबालिग लड़की से छेड़छाड़ के बाद सामने आया। तब एक लड़की (14 वर्ष) के माता-पिता ने फ्लोरिडा में पुलिस को बताया कि जैफ्री एपस्टीन ने अपने पाम बीच स्थित घर में उनकी बेटी से छेड़छाड़ की थी। पूरे घर में लड़कियों की तस्वीरें मिलीं और उसे एक नाबालिग से वेश्यावृत्ति कराने का दोषी ठहराया गया। एपस्टीन को यौन अपराधी के रूप में पंजीकृत किया गया। 11 साल बाद 2019 में उस पर फिर आरोप लगा कि वह नाबालिग लड़कियों का सैक्स रैकेट व नेटवर्क चला रहा है। जेल में ट्रायल का इंतजार करते हुए उसकी मौत हो गई। जिसे आत्महत्या बताया गया। इन दिनों चर्चा में बहुत सारे दस्तावेज जमा हुए हैं। जैसे पीड़ितों और गवाहों के बयान उनके घरों में छापे में मिली चीजें। 2025 में अमेरिका के न्याय विभाग के एक मंत्री के मुताबिक इस मामले में एफबीआई के पास 300 गीगाबाइट (जीबी) से ज्यादा डेटा और सबूत हैं। न्याय विभाग कहता है कि इनमें पीड़ितों की बहुत सारी तस्वीरें और वीडियो हैं। जो बच्चों के शोषण से जुड़ी हुई है। इन्हें सार्वजनिक नहीं किया जाएगा क्योंकि नया कानून सर्वाइवर की पहचान छिपाने की इजाजत देता हैं। यही जानकारी एपस्टीन फाइल्स हैं, जो समय-समय पर जारी हो रही है। एपस्टीन फाइल्स से जुड़े 30 लाख नए दस्तावेज जारी किए गए हैं। कुछ सामग्री पहले ही सार्वजनिक हो चुकी है। जैफ्री एपस्टीन से जुड़े मामलों में एक अत्यन्त गंभीर और चौंकाने वाला आरोप सामने आया है। अमेरिका के न्याय विभाग द्वारा हाल ही में जारी कई फाइलों में नाबालिग लड़कियों और महिलाओं से दरिंदगी का खुलासा हुआ है। एक फाइल के अनुसार दो विदेशी महिलाओं की मौत यौन संबंधों के दौरान गला घोंटने के कारण हुई थी। बाद में एपस्टीन के एक कर्मचारी ने उन्हें न्यू मैक्सिको स्थित फार्म हाउस जोरो रैंच में दफना दिया। इसमें एपस्टीन की करीबी सहयोगी गिस्लेन मैक्सवेल भी शामिल थीं। यह गिस्लेन मैक्सवैल कौन थीं, इसके बारे में फिर बताऊंगा। एक अन्य फाइल के अनुसार एक नाबालिग लड़की ने खुद को ह्यूमन इंक्यूवेटर की तरह इस्तेमाल किए जाने का दावा किया है। ई-मेल के अनुसार जोरो रैंच में लड़कियों को लंबे समय तक बंद रखा गया और उनसे जबरन गर्भधारण कराया गया। बच्चे पैदा कराए गए और जन्म के बाद ये बच्चे गायब हो गए। मैंने जैफ्री एपस्टीन जो कि एक मनुष्य नहीं था जानवर से भी बदतर था उसके बारे में कुछ जानकारी दी है। चूंकि यह मामला अभी चल रहा है इसलिए जो भी अपडेट होगी आप तक लाने की कोशिश करूंगा। इस नरभक्षी की परतें खुलती जा रही हैं। 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 14 February 2026

एपस्टीन से मेरी मुलाकात हुई थी


सारी दुनिया में इस समय इस एपस्टीन फाइल्स की चर्चा हो रही है। अमेरिका में नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण और मानव तस्करी के आरोपी अरबपति जेफ्री एपस्टीन से जुड़े गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक होते ही दुनिया की सत्ता और रसूख के गलियारों में हलचल मच गई है। जैफ्री एपस्टीन की पूरी कहानी किसी और दिन बताऊंगा, आज तो एपस्टीन फाइल्स और भारत के एक मंत्री का नाम सामने आने के बारे में बताऊंगा। एक लंबे गतिरोध के बाद बुधवार को लोकसभा में बजट पर बोलते हुए विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अमेरिका और भारत की ट्रेड डील पर मोदी सरकार पर कई आरोप लगाए। उन्होंने कई आर्थिक मुद्दों पर सवाल उठाएं। अपने भाषण में नेता प्रतिपक्ष ने जेफ्री एपस्टीन फाइल्स, अनिल अंबानी और अडानी से जुड़े मामलों पर भी बोले। उन्होंने अनिल अंबानी और केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी पर भी आरोप लगाए। राहुल गांधी की ओर से इन मुद्दों को उठाने के बाद सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तनाव बढ़ गया। चूंकि लोकसभा की चर्चा में हरदीप पुरी का नाम आ गया था। इसलिए मंत्री हरदीप पुरी ने बाद में बाकायदा एक प्रेस कांफ्रेंस की और अपना पक्ष रखा। हरदीप पुरी ने कहा कि एपस्टीन से उनकी मुलाकात केवल तीन-चार मौकों पर वह भी एक प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के तौर पर हुई थी और उनके साथ सिर्फ एक ई-मेल का आदान-प्रदान हुआ था। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी के आरोपों को निराधार बताया और स्पीकर से अनुरोध किया कि राहुल गांधी के भाषण की गलत बातों को कार्रवाई से हटा दिया जाए। उधर राहुल गांधी ने एपस्टीन फाइल्स का पा करते हुए कहा कि केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी ने कि अनिल अंबानी का परिचय अमेरिकी निवेशक और यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन से कराया था। उन्होंने कहा एक बिजनेसमैन है अनिल अंबानी, मैं पूछना चाहता हूं कि वो जेल में क्यों नहीं है? मैं हरदीप पुरी से भी पूछना चाहता हूं, जिन्होंने उन्हें एपस्टीन से परिचय करवाया था। हरदीप पुरी ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में कई बातें कहीं। उन्होंने कहा एपस्टीन से जुड़ी 30 लाख फाइलें रिलीज हुई है और मैं न्यूयार्क में आठ साल रहा। मैं संयुक्त राष्ट्र में भारत का राजदूत बनकर 2009 में पहुंचा था और 2017 में मैं मंत्री बना और आठ सालों में संभवत तीन या चार मीटिंग का संदर्भ है। अमेरिका में भारतीय राजदूत के पद से रिटायर होने के कुछ महीने बाद मुझे इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट (आईपीआई) में आयोजित किया गया था। मैं आईसीएम के अध्यक्ष जो आस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री थे के साथ एक डेलीगेशन में एपस्टीन से मिला था। हरदीप पुरी का कहना था कि एपस्टीन से जुड़े अन्य मामलों से उनका कोई लेना-देना नहीं है। हरदीप पुरी की प्रेस कांफ्रेंस के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने एक्स पर पोस्ट डालते हुए पुरी से कुछ 6 सवाल पूछे। पवन खेड़ा ने लिखा ः हरदीप पुरी ने कहा कि उनके सदस्यों ने उन्हें रीड हाफमैन से मिलवाया था। लेकिन जो उन्होंने नहीं कहा, वह ज्यादा मायने रखता है। 4 अक्टूबर 2014 को एपस्टीन ने हरदीप पुरी को ई-मेल किया गया रीड से मुलाकात हुई? पुरी ने जवाब दियाः क्या मैं आज दोपहर एक मीटिंग के लिए सैन फ्रांसिस्को में हूं। मेरे दोस्त, तुम तो चीजें करवा देते हो। कोई सलाह? इसके बाद खेड़ा ने एक्स पर की गई पोस्ट में 6 सवाल पूछे, ये सवाल थे - पहला ः एपस्टीन की रीड के साथ उनकी मुलाकात के बारे में पहले ही कैसे पता चल गया? दूसरा ः क्या एपस्टीन ही वह कंटैक्ट था जिसने रीड हॉफमैन के साथ मुलाकात करवाई थी? तीसरा ः हरदीप उनसे मुलाकात की जानकारी क्यों डिस्कस कर रहे थे? चौथा ः एपस्टीन को दोस्त कह के क्यों संबोधित किया था? पांचवां ः एपस्टीन हरदीप के लिए क्या करवा रहा था? छठा ः अगर उनका संबंध महज एक संयोगवश या सतही था तो हरदीप पुरी एपस्टीन से सलाह क्यों मांग रहे थे? एपस्टीन फाइल्स में लाखों दस्तावेज, वीडियो, ईमेल हैं। अभी बहुत से खुलासे बाकी हैं। इन फाइल्स के खुलासों के कारण अब तक 10 देशों में महत्वपूर्ण पदों पर बैठे राजनेता, उद्योगपति, नौकरशाह, राजघराने से जुड़े महत्वपूर्ण लोगों के इस्तीफे हो चुके हैं और 80 की जांच जारी है। अभी तो मामला शुरू हुआ है, आगे-आगे देखिए होता है क्या? 
-अनिल नरेन्द्र