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Thursday, 11 June 2026

क्या इजरायल अमेरिका की जासूसी कर रहा है?

ईरान युद्ध को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन  नेतन्याहू के बीच टकराव व बढ़ती रणनीतिक दूरियों ने पेंटागन की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी रक्षा मुख्यालय को इजरायली जासूसी का भय लगने लगा है। उसने चेतावनी दी है कि वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी कड़ी इजरायली निगरानी का निशाना बन सकते हैं? एनबीसी न्यूज की एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के दो मौजूदा व एक पूर्व अधिकारी ने बताया कि पेंटागन की डिफैंस इंटेलिजेंस एजेंसी (डीआईए) ने हाल ही में इजरायल के लिए काउंटर इंटेलिजेंस खतरे के स्तर को क्रिटिकल यानी गंभीर कर दिया है। यह उनका सबसे ऊंचा आंतरिक मूल्यवान स्तर है। एक मौजूदा अधिकारी ने अमेरिकी पत्रकार को बताया कि अमेरिका पहले से ही इजरायल की आधिकारिक यात्राओं के दौरान सुरक्षा उपाय बरतता है क्योंकि इजरायली जासूसी एजेंसियों को जानकारी जुटाने के मामले में बहुत आक्रामक माना जाता रहा है। पेंटागन की नई चिंताओं से पता चलता है कि इजरायल पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के संबंध में अमेरिकी रणनीतिक चर्चाओं व फैसलों की जानकारी हासिल करने की कोशिश कर रहा है। इजरायली जासूसी नेटवर्क खासकर उनकी खुफिया एजेंसी ऐसे कामों के लिए दुनिया में बदनाम है। चौंकाने वाली बात यह है कि मोसाद ने अपने सबसे भरोसेमंद साथी अमेरिका को भी नहीं बक्शा है? 

-अनिल नरेन्द्र

पत्रकार को कहा: बेईमान और बेवकूफ

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्राध्यक्षों से तो बदतमीजी से पेश आते ही हैं पर अपने देश के पत्रकारों खासकर महिला पत्रकारों से कैसे पेश आते हैं ताजा घटना से पता चलता है। ट्रंप ने एनबीसी जैसी बड़ी टीवी नेटवर्क से एक इंटरव्यू के दौरान अचानक बातचीत बीच में ही खत्म कर दी। कार्यक्रम की होस्ट क्रिस्टन वेल्कर बार-बार उनके (ट्रंप के) कई दावों पर सवाल उठा रही थीं। रविवार को प्रसारित हुए कार्यक्रम ‘मीट द प्रेस' में ट्रंप ने दावा किया कि कैलिफोर्निया में चल रहे प्राइमरी चुनाव और साल 2020 का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव दोनों ही धांधली पूर्ण थे। जब वेल्कर ने चुनावों में धांधली के दावे के समर्थन में सुबूत मांगे तो ट्रंप ने कहा, ‘मुझे बस देखना और सुनना भर है।' इस पर वेल्कर ने कहा यह सुबूत नहीं है। इसके बाद ट्रंप ने मीडिया पर बेईमान होने का आरोप लगाया और इंटरव्यू समाप्त करते हुए कहा, माफ कीजिए, अब इसे यहीं खत्म करते हैं। मेरे लिए बहुत हो गया यह इंटरव्यू अब खत्म है। इंटरव्यू शुरू होने के लगभग 50 मिनट बाद इसे छोड़ दिया। वेल्कर के सवालों के जवाब में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए कार्रवाई करनी जरूरी थी और यह अंतहीन युद्ध नहीं होगा। हम वहां कुछ महीनों के लिए रहेंगे और उसके बाद खतरा काफी हद तक समाप्त हो जाएगा। इसके बाद बातचीत उस दंगे पर पहुंची और जब ट्रंप ने साल 2020 के चुनाव में धांधली का अपना पुराना, बिना सुबूत वाला दावा दोहराया तो क्रिस्टन वेल्कर ने उन्हें  चुनौती दी। ट्रंप ने फिर कैलिफोर्निया  के प्राथमिक चुनावों का जिक्र किया, जहां गवर्नर सहित कई पदों के लिए नवम्बर में होने वाले मध्यावधि चुनावों में कौन से दो उम्मीदवार होंगे। यह तय करने के लिए वोटों की गिनती जारी थी। उन्होंने फिर आरोप लगाया, वे चुनाव में धांधली कर रहे हैं, पलटकर वेल्कर ने पूछा: क्या आपके पास इसके समर्थन में कोई सुबूत है? ट्रंप ः मुझे सिर्फ देखना और सुनना है। वेल्कर ने बीच में टोका, लेकिन यह कोई सुबूत नहीं हैं। ट्रंप ने आगे कहा वे बेईमान हैं बिल्कुल आपकी तरह। इस पर वेल्कर ने जवाब दिया निष्पक्षता की बात करें तो मैं बेईमान नहीं हूं। लेकिन बातचीत जारी रखें, इस पर ट्रंप ने उनसे कहा या तो आप बेईमान हैं या फिर बेवकूफ और यह कहते हुए ट्रंप उठ गए  और कहा इसे यहीं खत्म करते हैं। मेरे लिए बहुत हो गया। शुक्रिया डार्लिंग, आपको अपने प्रेस को सुधारना चाहिए क्योंकि एक देश कभी महान नहीं बन सकता अगर उसकी प्रेस बेईमान है। हम इस महान पत्रकार को सलाम करते हैं जिन्होंने अपनी बेइज्जती सही पर डटी रहीं। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 9 June 2026

युद्ध विराम के नाम पर धोखा?

क्या अमेरिका ईरान पर जमीनी हमले की तैयारी कर रहा है और सीजफायर के नाम पर ईरान को बेवकूफ बना रहा है? अमेरिकी वारशिप यूएसएस त्रिपोली की तैनाती के बाद  सवाल फिर यह उठ गया है कि अमेरिका की असल नीयत क्या है? त्रिपोली की तैनाती के बाद यह सवाल उठाना लाजमी है। अमेरिकी सेना ने शनिवार को ईरान की ओर से लांच किए गए ड्रोन को तबाह कर देने का दावा किया। वहीं अब होर्मूज में यूएसएस त्रिपोली की तैनाती की ताजा खबर आई है। सवाल उठता है कि क्या ईरान पर अब जमीनी हमला होने जा रहा है? अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता कहने को तो अभी जारी है। लेकिन जमीन और समुद्र पर जो स्थिति दिख रही है वे कुछ और ही कहानी की ओर इशारा कर रही है। पिछले 72 घंटों में हुई कई सैन्य कार्रवाईयों ने पश्चिम एशिया में नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका सिर्फ  ईरान पर दबाव बना रहा है या फिर होर्मूज जलडमरूमध्य पर निर्णायक बढ़त हासिल करने की तैयारी कर रहा है?  क्योंकि जो तैनाती अमेरिका कर रहा है, उसे देखकर तो ऐसा लगता है कि ट्रंप अब ईरान के आइलैंड पर कब्जा करने जा रहा है?  घटनाओं की शुरुआत उस खबर से हुई जिसमें बताया गया कि ईरानी झंडे वाले चार तेल टैंकर होर्मूज पार करने में सफल रहे। ये जहाज कथित तौर पर करीब 70 लाख बैरल तेल लेकर निकले थे और प्रतिबंधों के बावजूद आगे बढ़ गए। लेकिन इसके कुछ ही घंटों बाद अमेरिकी इंडो-पैसेफिक कमांड ने घोषणा की कि उसने हिंद महासागर में प्रतिबंधित तेल टैंकर एमटी डेविना को रोककर इस पर कब्जा कर लिया है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि कब्जे में लिया गया जहाज उन्हीं चार टैंकरों में से एक था या नहीं। लेकिन टाइमिंग ने कई अटकलों को जन्म दिया है। इसे मसले पर संभल ही रहा था कि उस पर अमेरिका ने हमला कर दिया। शनिवार को ही अमेरिकी सैंट्रल कमांड ने दावा किया कि उसने होर्मूज की ओर बढ़ रहे चार ईरानी हमलावर ड्रोन मार गिराए। इसके तुरंत बाद अमेरिकी सेना ने ईरान के गोसक और केशम द्वीप पर मौजूद तटीय रडार ठिकानों पर हमले किए। पहली बार नहीं है जब केशम को निशाना बनाया गया है। लेकिन मौजूदा हालात में इस द्वीप का नाम बार-बार सामने आना सैन्य विश्लेषकों का ध्यान खींच रहा है। जवाब में ईरान ने भी कुवैत और बहरीन की ओर सात मिसाइलें दागी। इनमें से 6 को अमेरिका ने रोकने का दावा किया। इस बीच अमेरिका ने यूएसएस त्रिपोली की अरब सागर और होर्मूज क्षेत्र में तैनाती की है। यूएसएस त्रिपोली कोई साधारण युद्ध पोत नहीं है। यह एक उभयचर हमलावर जहाज है, जिसका मतलब है कि ये जहाज पानी से तो हमला कर ही सकता है, जरूरत पड़ने पर जमीन के बेहद करीब जाकर सैनिकों को उतार भी सकता है। ऐसे जहाज समुद्र से सीधे सैन्य अभियान चलाए जाने के लिए बनाए जाते हैं। उधर केशम ईरान का सबसे बड़ा द्वीप है और होर्मूज के मुहाने पर मौजूद है। इसे न डूबने वाला एयरक्राफ्ट कैरियर भी कहा जाता है। ईरान ने यहां वर्षों से रडार सिस्टम, ड्रोन बेस, एंटी शिप मिसाइलें, अंडरग्राउंड सुरंगे और नौ सैनिक अड्डे बनाए हुए हैं। अगर अमेरिका इस द्वीप पर कब्जा कर लेता है तो उसे  कई बड़े स्ट्रेटिजिक फायदे मिल सकते हैं। वैसे अमेरिका के लिए केशम पर कब्जा बिल्कुल भी आसान नहीं होने वाला है। इसका मतलब होगा सीधे अंगारों को हाथ में लेना। केशम ईरानी जमीन से बेहद करीब है। अगर अमेरिका अपने सैनिकों को यहां उतारता है तो उसे ईरान की मिसाइलों, ड्रोन, नौ सैनिक हमलों और संभावित गुरिल्ला प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है। यूएसएस त्रिपोली की मौजूदगी, केशम पर लगातार हमले और टैंकरों को रोकने जैसी कार्रवाईयों ने यह बहस तेज कर दी है कि अमेरिका होर्मूज पर रणनीतिक बढ़त लेने की कोशिश कर रहा है। यही वजह है कि शांति वार्ता चलने के बावजूद पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की बजाए और बढ़ता दिखाई दे रहा है। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 6 June 2026

अयातुल्लाह अली खामेनेई को अंतिम विदाई

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के लिए तीन दिन के राजकीय अंतिम संस्कार का ऐलान किया गया है। तीन महीने बाद अयातुल्लाह अली खामेनेई को दी जाएगी अंतिम विदाई, मशहद में होंगे सुपुर्द-ए-खाक। ईरान सरकार ने पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के लिए तीन दिन के राजकीय अंतिम संस्कार का ऐलान किया है। फिलहाल तारीख घोषित नहीं हुई है। अंतिम संस्कार और श्रद्धांजलि कार्यक्रम इस्लामिक कैलेंडर के अखिरी महीने जिलहिज्जा के अंत में हो सकता है। यानी 15 जून के आसपास। अधिकारियों ने बताया कि खामेनेई की इच्छा के अनुसार उन्हें मशहद के इमाम रजा दरगाह में दफनाया जाएगा। तेहरान, कोम और मशहद में अंतिम कार्यक्रम होंगे। इन शहरों में बड़े पैमाने पर शोभा यात्राएं और श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित की जाएंगी। ईरान के सरकारी टीवी चैनल आईआरआईबी से बातचीत में तवाकोली-जादेह ने कहा कि तीनों शहरों में करोड़ों लोगों के शामिल होने की उम्मीद है। तेहरान के डिप्टी मेयर मोहम्मद अमीन तवाकोली-जादेह ने कहा कि ईरान के कई अन्य प्रांत भी श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित करना चाहते हैं। बताया जा रहा है कि तेहरान में होने वाला मुख्य कार्यक्रम कम से कम 24 घंटे चलेगा। सिर्फ तेहरान में ही 1.5 करोड़ से दो करोड़ लोग अपने शहीद सुप्रीम लीडर को अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंच सकते हैं। इतनी बड़ी भीड़ को संभालने के लिए प्रशासन सुरक्षा, यातायात और अन्य जरूरी व्यवस्थाओं की तैयारी कर रहा है। यह फैसला अयातुल्लाह अली खामेनेई की शहादत के 3 महीने बाद लिया गया है। आमतौर पर इस्लामी परम्परा के अनुसार किसी व्यक्ति का अंतिम संस्कार मौत के कुछ दिनों के भीतर कर दिया जाता है, लेकिन ईरानी अधिकारियों ने पहले इस कार्यक्रम को टाल दिया था। पहले क्यों नहीं हुआ अंतिम संस्कार? अयातुल्लाह अली खामेनेई 23 फरवरी को अमेरिकी-इजरायली हमले में मारे गए थे। उनकी शहादत के बाद मार्च में ईरान के अधिकारियों ने बयान दिया था कि भारी भीड़ और व्यवस्थाओं को लेकर आ रही चुनौतियों की वजह से अंतिम संस्कार तुरंत करना संभव नहीं है। ईरान की सरकारी एजेंसी ईरना के मुताबिक राजकीय अंतिम संस्कार जून के मध्य में आयोजित किया जाएगा। हालांकि इसकी सटीक तारीख और समय की अभी अधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। अंतिम संस्कार बहुत बड़े स्तर पर होगा और इसमें ईरान के साथ-साथ कई मुस्लिम देशों से भी बड़ी संख्या में लोग शामिल होंगे। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत, बांग्लादेश से भी बड़ी संख्या में लोगों के मशहद पहुंचने की उम्मीद है। अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में करोड़ों लोग एक साथ इकट्ठे होंगे। यह भी खतरा है कि मौके का फायदा उठाकर कहीं इजरायल कोई उल्टी-सीधी हरकत न कर दे। अमेरिका भी इस मौके का फायदा उठा सकता है। ऊपर वाला ऐसा होने से बचाए। उम्मीद करते हैं कि इस पवित्र मौके का इजरायल-अमेरिका कोई नाजायज फायदा नहीं उठाएगा और अयातुल्लाह अली खामेनेई की अंतिम विदाई में कोई बाधा नहीं डालेगा। खामेनेई 86 साल के थे। वह तीन दशक से ज्यादा समय तक ईरान के सुप्रीम लीडर रहे। आज जो ईरान है उसके पीछे अयातुल्लाह अली खामेनेई की दूरदृष्टि और प्लानिंग ही थी। हम अयातुल्लाह अली खामेनेई को अपनी श्रद्धांजलि देते हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 4 June 2026

अमेरिकी एफ-15 गिराने में चीनी मिसाइल

पिछले महीने दक्षिण-पश्चिमी ईरान के ऊपर मार गिराए अमेरिकी एफ-15 ई स्ट्राईक ईगल को चीन निर्मित मिसाइल से निशाना बनाया गया था। अमेरिका की एनबीसी न्यूज ने सूत्रों के हवाले से बताया कि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि ईरान ने जिस मिसाइल से एफ-15 को गिराया, वह हाल ही में मिली थी या ईरान के पुराने जखीरे में से थी। अमेरिकी अधिकारी अप्रैल में हुई इस घटना की अभी भी जांच कर रहे हैं। दशकों में पहली बार किसी अमेरिकी लड़ाकू विमान को दुश्मन की गोलीबारी से मार गिराया गया। उस समय ट्रंप ने कहा था कि विमान कंधे पर रखकर दागी जाने वाली मिसाइल से हमला किया गया। इन हथियारों को आमतौर पर मैन-पोर्टबल एयर डिफैंस सिस्टम के नाम से जाना जाता है, ये करीब 7 फीट लंबी और इसमें लगभग 40 पाउंड वजन होता है। ईरान के चीन से बने सैन्य उपकरणों के इस्तेमाल से अमेरिका-चीन संबंधों में एक नया आयाम जोड़ दिया है। 

-अनिल नरेन्द्र

कुवैत पर क्यों कोहराम मचा रहा ईरान?

ईरान ने अमेरिका के जवाबी हमले के विरोध में कुवैत को निशाने पर लिया है। कुवैत पर 72 घंटे में दो बड़े हमले किए गए। कुवैत में अमेरिका के कम से कम 7 बड़े बेस हैं। वहीं करीब 13 हजार अमेरिकी जवानों को कुवैत में रखा गया है। यूएई को छोड़कर कुवैत क्यों ईरान के निशाने पर आ गया इसके पीछे भी कारण है। ईरान इस कदर कुवैत से नाराज है कि महज 72 घंटों में उसने कुवैत पर ड्रोनों और मिसाइलों से बड़े हमले किए। ईरान का कहना है कि यह हमले बदला लेने के लिए किए गए हैं। ईरान ने स्पष्ट किया कि यह हमले कुवैत के रिहाइशी इलाकों पर नहीं बल्कि कुवैत स्थित अमेरिकी बेसों पर किए जा रहे हैं। बता दें कि अब तक अमेरिका से बदला लेने के लिए यूएई ईरान के निशाने पर था और ईरान ने यूएई पर सबसे ज्यादा हमले किए। फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक ईरान जंग के दौरान तेहरान से यूएई पर करीब 2400 हमले किए थे। हालांकि वर्तमान में ईरान कुवैत के ठिकानों पर ही हमला कर रहा है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि यूएई को छोड़कर ईरान कुवैत को क्यों निशाने पर ले रहा है? इसके पीछे कई कारण नजर आते हैं। कुवैत फारस की खाड़ी के एक छोर पर स्थित है। यह ईरान के पड़ोस में है, जो अमेरिका का सहयोगी मुल्क है। यहां पर अमेरिका के कई बड़े सैन्य बेस हैं। इनमें कैंप अरिफिजान, कैंप बुहिरिंग और अल सलेम  एयरबेस प्रमुख हैं। द हिल की रिपोर्ट के मुताबिक कुवैत में अमेरिका के 13 हजार जवान तैनात हैं। यूएई के मुकाबले कुवैत कूटनीति तौर पर काफी कमजोर है। मई के मध्य में ईरान ने कुवैत के एक द्वीप पर कब्जा करने का प्रयास किया था। हालांकि तेहरान को असफलता मिली थी। यूएई ईरान पर हमले करने में सक्षम है। अगर अमेरिका के बदले ईरान यूएई पर हमला करता है तो अबू धाबी पलटवार कर सकता है, इससे खाड़ी युद्ध में तेजी आ सकती है। बातचीत के बीच ईरान नो-रिस्क मोड में है। सबसे बड़ा कारण है कि हाल ही में ईरान पर जो हमले हुए वह कुवैत के अमेरिकी बेसों से ही हुए थे। इसीलिए जवाबी कार्रवाई में ईरान ने कुवैत को निशाने पर लिया है। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 2 June 2026

अगर रूबियो इतिहास जानते तो फोटो नहीं खिंचवाते?

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्के रूबियो जब भारत के चार दिवसीय दौरे पर आए थे तो वह भारत के प्रधानमंत्री व शीर्ष राजनयिकों से तो मिले ही थे, साथ ही कई भारतीय मशहूर पर्यटन स्थलों पर भी गए। इन्हीं में से एक आगरा के ताजमहल की यात्रा सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बनी। अमेरिकी विदेश मंत्री ने ताजमहल के सामने अपनी पत्नी के साथ यादगार फोटो सोशल मीडिया पर साझा की। ये फोटो जल्दी ही सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बन गई। इस मामले ने उस समय एक अलग मोड़ लिया जब हैदराबाद में स्थित ईरानी दूतावास ने रूबियो के ताजमहल दौरे पर खुलेतौर पर व्यंग्य किया। ईरानी वाणिज्य दूतावास ने अपने बयान में याद दिलाया कि उनके अनुसार, ताजमहल मुगल बादशाह (शाहजहां) की ईरानी मूल की बेगम मुमताज महल की मोहब्बत की निशानी है और इसके निर्माण में फारसी वास्तुकारों की कुशलता शामिल थी। बयान में अमेरिका की भी आलोचना की गई और अमेरिकी सरकार पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया गया। दूतावास ने लिखा ः अगर मार्के रूबियो को इतिहास और वास्तुकला की समझ होती तो वो यहां तस्वीर खिंचवाने के लिए खड़े नहीं होते। यह स्मारक एक बादशाह की ईरानी पत्नी के प्रेम में बनाया गया था और इसे ईरानी वास्तुकारों की प्रतिभा ने गढ़ा था। आज उनकी सरकार ईरानी सभ्यता को मिटाने की धमकी दे रही है और दूसरी सभ्यताओं का अपमान करती है। ईरानी व्यंग्य के बाद यह मामला सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो गया। कुछ उपयोगकर्ताओं ने रूबियो को व्यंग्य का निशाना बनाते हुए कहा कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझे बिना ऐसे स्थानों पर तस्वीरें खिंचवाना उचित नहीं है। कुछ टिप्पणियां इससे भी आगे बढ़ गई और अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के संदर्भ में देखा जाने लगा। एक उपयोगकर्ता ने कहा कि यह इमारत एक ईरानी मल्लिका के लिए फारसी वास्तुकारों ने बनाई थी और यह एक ऐसी संस्कृति का प्रतीक है जिसे उनकी सरकारें इस समय में खतरे में डाल रही हैं और उनका सम्मान नहीं कर रही हैं। बता दें कि संगमरमर जो राजस्थान के मकराने से आया था। इससे बना ताजमहल दुनिया के अजूबों में से एक है, जिसे मुगल सम्राट शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल की प्रेम स्मृति में 1632 ईसवीं में बनवाना शुरू किया था जो 1653 ईसवीं में ही पूरा हुआ था। इसके निर्माण में हिन्दू, इस्लामिक, मुगल समेत कई भारतीय वास्तुकला का समावेश किया गया है। इस भव्य और शानदार इमारत को करीब 20 हजार मजदूरों ने मुगल शिल्पीकार उस्ताद अहमद लाहौरी के नेतृत्व में बनाया था। इस मकबरे को बनाने में उस समय करीब 20 लाख रुपए खर्च किए गए थे। आज के हिसाब से यह लागत करीब 827 मिलियन डॉलर लगभग 52.8 अरब रुपए है। इस इमारत के निर्माण में करीब 28 अलग-अलग तरह के पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है, जो हमेशा चमकते रहते हैं। इनकी दीवारों पर बेहद खूबसूरत नक्काशी की गई है। ताजमहल को 1983 में यूनेस्को ने विश्व विरासत स्थल घोषित किया था। 

-अनिल नरेन्द्र

Monday, 1 June 2026

📣 Thrilled to Announce My Latest Publication!

I am incredibly honored to share that my latest article has been officially published in Echo of Islam, a prestigious, internationally circulated magazine based in Tehran.

Since the early 1980s, Echo of Islam has served as a vital global platform for geopolitics, philosophy, and strategic discourse. Because it is distributed worldwide to international libraries, academic institutions, and embassies, it holds a unique and highly influential space in global media.

Being selected for a publication of this caliber is an absolute privilege.

Why this article matters right now:🎯 The Core Focus: It analyzes the highly critical question of succession in Iran, examining the strategic case for stability and political continuity.

🌐 Global Relevance: Understanding the future leadership of the Islamic Republic is vital for navigating regional stability and shifting Middle Eastern geopolitics.

💡 The Main Takeaway: It offers a detailed perspective on why Ayatollah Sayyid Mojtaba Hosseini Khamenei represents the logical choice for Supreme Leader.This piece represents deep analysis and dedication to a subject that carries immense weight in global current affairs today.

📖 Read the full piece in Issue No. 295 (2026).

Thank you to everyone who follows my work and supports these deep-dive analyses. I would love to hear your thoughts on the piece—let's discuss in the comments below! 👇#AcademicPublication #GlobalPolitics #Iran #Tehran #InternationalRelations #EchoOfIslam #Research #AuthorLife #CurrentAffairs #MiddleEastPolitics







Saturday, 30 May 2026

अब्राहम समझौते पर फंसे अरब मुल्क

 
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से साबित कर दिया कि अमेरिका ईरान पर जो युद्ध कर रहा है वह दरअसल उसका अपना युद्ध नहीं। यह सब कुछ ट्रंप इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के कहने पर कर रहे हैं। यह युद्ध ट्रंप ने अमेरिका के हितों के लिए नहीं बल्कि इजरायल के हितों की रक्षा करने के लिए किया है। यह किसी से छिपा नहीं कि ट्रंप को नेतन्याहू ब्लैकमेल कर रहे हैं और वह सब कुछ कहने और करने पर करवा रहे हैं जो वो और शक्तिशाली यहूदी लॉबी करवा रही है। सभी जानते हैं कि ट्रंप ऐसा क्यों कर रहे हैं? इसके पीछे एपस्टीन फाइल्स का भूत है। अगर ऐसा नहीं होता तो ट्रंप ये नई शर्त क्यों डालते। ट्रंप ने हाल ही में पाकिस्तान, सऊदी अरब, कतर, तुर्किए, मिस्र और जार्डन से ईरान शांति समझौते में शामिल होने की अपील करते हुए इन अरब देशों से कहा कि ईरान से समझौता तभी पूरा माना जाएगा, जब सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किए, मिस्र और जार्डन और बहरीन से अरब मुस्लिम देश अब्राहम अकॉर्ड में शामिल हों। यानि इजरायल को मान्यता दें और उससे रिश्ते जोड़ें। ट्रंप ने आगे चेताया कि जो देश ऐसा नहीं करेंगे, उन्हें अमेरिका-ईरान डील का हिस्सा नहीं होना चाहिए। ट्रंप ने सऊदी व कतर से तुरंत इजरायल से संबंध जोड़ने को कहा। ट्रंप ने आगे कहा, डील के बाद ईरान को भी अब्राहम अकॉर्डस में शामिल करना सम्मान की बात होगी। अब्राहम अकॉर्ड की शुरुआत सितम्बर 2020 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान हुई थी। यह एक कूटनीतिक समझौता था जिसके तहत यूएई और बहरीन ने अधिकारिक तौर पर इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए थे। बाद में मोरक्को और सूडान भी इस फ्रेमवर्क में शामिल हो गए। दशकों तक अधिकांश अरब मुल्कों का रुख यह था कि जब तक फिलिस्तीन मुद्दे का समाधान नहीं होगा, तब तक वे इजरायल को मान्यता नहीं देंगे। लेकिन इस समझौते ने उस नीति को बदलने की कोशिश की। इस समझौते की सबसे बड़ी आलोचना यह रही कि इसमें फिलिस्तीन मुद्दे को नजरअंदाज कर दिया गया। न तो फिलिस्तीन राज्य को लेकर कोई स्पष्ट रोडमैप दिया गया और न ही इजरायली बस्तियों पर रोम की बात हुई। सभी जानते हैं कि इजरायल एक ग्रेटर इजरायल की भावना पाले बैठा है जिसमें कुछ अरब मुल्कों की जमीनें लेकर एक ग्रेटर (बड़ा इजरायल) बनाना चाहता है और उसमें अब ट्रंप खुलकर बेशमी से मदद कर रहे हैं। पाकिस्तान ने इस प्रस्ताव को तुरंत खारिज कर दिया। पाकिस्तान ने आज तक इजरायल को अधिकारिक मान्यता नहीं दी है। हालांकि, यह बात पाकिस्तान के लिए इतनी आसान नहीं है, क्योंकि ट्रंप जिस तरह के शख्स हैं और अपनी बात मनवाने के लिए जिस तरह से गैर-राजनीतिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, उससे माना जा रहा है कि हो सकता है कि पाकिस्तान विदेश नीति के सामने आने वाले समय में यह मुद्दा बड़ी चुनौती बनकर सामने आए। सऊदी अरब ने भी इस प्रस्ताव को यह कहकर रद्द कर दिया है कि पहले 1967 की वह स्थिति बहाल करो जब इजरायल जबरन फिलिस्तीन की जमीन काटकर बसाया गया था। तुर्किए ने तो साफ कह दिया कि हमारी तो नीति स्पष्ट है, हम तो इजरायल की मौजूदगी को मानते ही नहीं, इसलिए हमारा इजरायल को मान्यता देने का सवाल ही नहीं उठता। सवाल यह उठता है कि ट्रंप ने आखिर में दांव क्यों चला? ट्रंप ईरान डील को सिर्फ युद्ध रोकने वाला समझौता नहीं रखना चाहते। वे इसे पश्चिम एशिया की नई राजनीतिक व्यवस्था बनाना चाहते हैं। इसलिए सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किए जैसे देशों पर जुड़ने का दबाव दे रहा है। अगर ऐसा होता है तो सबसे बड़ी सफलता इजरायल को मिलेगी। इजरायल को गल्फ में मान्यता मिलेगी।  
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 28 May 2026

ईरान की फ्रीज पड़ी संपत्ति


पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता में तेहरान का फ्रीज छह अरब डॉलर की संपत्ति को जारी करना एक अहम मुद्दा है। यह संपत्ति अभी कतर में जमा है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक एक ईरानी सूत्र ने बताया कि कतर समेत विदेश में फ्रीज संपत्तियों को जारी करना, हार्मूज से सुरक्षित आवाजाही तय करने से सीधे तौर पर जुड़ा है। छह अरब डालर की यह राशि सबसे पहले 2018 में रोकी गई थी। वाशिंगटन तथा तेहरान के बीच कैदियों की अदला-बदली के समझौते के तहत इसे 2023 में जारी किया जाना था, पर 7 अक्टूबर, 2023 को इजरायल पर हमास के हमले के बाद बिडेन प्रशासन ने संपत्तियों को फिर से फ्रीज कर दिया। उधर, अमेरिका ने ईरान की इस दावे को खारिज कर दिया है जिसमें कहा गया था कि इस्लामाबाद वार्ता में जब्त संपत्तियों को छोड़ेगा। अमेरिका ने स्पष्ट कहा कि वह ईरानी संपत्तियों को वापस नहीं करेगा। इससे पहले ईरान ने दावा किया था कि अमेरिका इस बात पर सहमत हो गया है कि जब्त संपत्तियों को छोड़ेगा। पिछले कुछ दिनों में एक बार फिर युद्ध विराम और शांति वार्ता की बात हो रही है। देखें, अमेरिका और ईरान में किन-किन मुद्दों पर समझौता होता है, अगर होता भी है? 
-अनिल नरेन्द्र

ट्रंप के पास तीसरी बार फायरिंग

 
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आधिकारिक आवास एवं कार्यालय व्हाइट हाउस की सुरक्षा जांच चौकी के पास एक व्यक्ति ने गोली बारी कर दी। सुरक्षा कर्मियों ने जवाबी कार्रवाई में संदिग्ध हमलावर को ढेर कर दिया। पिछले एक महीने में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आसपास गोलीबारी की यह तीसरी घटना थी। इससे पहले अप्रैल में व्हाइट हाउस संवाददाता संघ रात्रि भोज और मई की शुरुआत में वाशिंगटन मॉन्यूमेंट के पास घटनाएं हुईं। कानून प्रर्वतन एजेंसी ने सोशल मीडिया पर जारी एक बयान में बताया कि 17वीं स्ट्रीट और पेंसिल्वेनिया एवेन्यू में मौजूद हमलावर ने शनिवार शाम छह बजे अपने बैग से हथियार निकाला और गोलीबारी शुरू कर दी। सीक्रेट सर्विस जवानों की जवाबी कार्रवाई में यह घायल हो गया और बाद में उसकी मौत हो गई। बताया जाता है कि हमलावर ने 30 राउंड गोलियां चलाईं। शनिवार को हुई घटना के दौरान एक राहगीर को भी गोली लगी है लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि वह संदिग्ध द्वारा शुरू में चलाई गोलियों से घायल हुआ या अधिकारियों द्वारा जवाबी कार्रवाई में उसे गोली लगी? ट्रंप घटना के समय व्हाइट हाउस में मौजूद थे। एक कानून प्रवर्तन अधिकारी ने अपनी पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर बताया कि संदिग्ध की पहचान 21 वर्षीय नासिरे बेस्ट के रूप में हुई है। बेस्ट को पहले भी गिरफ्तार किया गया था। वह जब उसने बिना अनुमति के व्हाइट हाउस की एक अन्य जांच चौकी में प्रवेश करने की कोशिश की थी। बेस्ट को जुलाई 2025 में इस सिलसिले में गिरफ्तार भी किया गया था। बेस्ट खुद को भगवान यीशु मसीह का मॉर्डन अवतार मानता था। डोनाल्ड ट्रंप पर तीन बार गोली बारी हो चुकी है। एक बार तो बाल-बाल बचे जब गोली उनके कान के पास से निकली। कुछ आलोचकों का मानना है कि इन हमलों के पीछे सहानुभूति लेने की और अमेरिकी जनता का ज्वलंत मुद्दों से ध्यान हटाने का नाटक शामिल है। खैर, जो भी हो एक बात तो साफ लगती है कि ट्रंप की जान को खतरा है और उन्हें अपनी सुरक्षा में किसी प्रकार की ढील नहीं देनी चाहिए। 
अनिल नरेंद्र 

Tuesday, 26 May 2026

ट्रंप पर आगबबूला हुए नेतन्याहू

अमेरिका-इजरायल ने मिलकर ईरान के खिलाफ जंग शुरू की थी, लेकिन अब इस जंग को रोकने के लिए दोनों देश आपस में सहमत नहीं हो रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू में भारी मतभेद सामने आ रहे हैं। नेतन्याहू एक बार फिर से ईरान पर हवाई हमले शुरू करना चाहते हैं, वहीं ट्रंप हथियार से पहले कूटनीति के जरिए मामले को शांत करना चाह रहे हैं और अमेरिका को इस युद्ध से बाहर निकालने के लिए ईरान से कोई डील करने के चक्कर में हैं। बताया जा रहा है कि इस मुद्दे पर दोनों नेताओं के बीच लगभग एक घंटे तक बातचीत हुई। लेकिन दोनों एक मत नहीं हो पाए। नेतन्याहू का कहना था कि ईरान की सैन्य क्षमता जब तक पूरी तरह बर्बाद न हो जाए, उनके यूरेनियम पर कब्जा न हो जाए हमले जारी रहने चाहिए। राष्ट्रपति ट्रंप ने नेतन्याहू से कहा कि मध्यस्थ कतर और पाकिस्तान एक लेटर ऑफ इंटेंट पर काम कर रहे हैं ताकि युद्ध को औपचारिक रूप से खत्म किया जा सके। इस पर दस्तख्त होने के बाद 30 दिनों की बातचीत का दौर शुरू होगा। नेतन्याहू ट्रंप की नीति से सहमत नहीं थे। अब देखना यह होगा कि क्या ईरान युद्ध रुकेगा और क्या नेतन्याहू अकेले ही ईरान युद्ध को आगे बढ़ाएंगे या फिर ट्रंप की चलेगी। 

-अनिल नरेन्द्र 


संसद में ही अपनों ने घेरा ट्रंप को

अमेरिका की कांग्रेस (संसद) ने ईरान युद्ध के दौरान अमेरिकी सेना व देश को हुए भारी नुकसान पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है जिसमें कहा गया है कि लड़ाई के दौरान 42 अमेरिकी विमान नष्ट हुए हैं या क्षतिग्रस्त हो गए हैं। ऐसी खबरें पहले भी मीडिया में आईं थी पर ट्रंप प्रशासन ने कभी इसकी पुष्टि नहीं की थी। यह रिपोर्ट अमेरिकी कांग्रेस की कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस (सीआरएस) ने संकलित की है और यह अमेरिकी कांग्रेस की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है। सीआरएस किसी भी राजनीतिक दल से संबंध की परवाह किए बिना अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों को नीतिगत मुद्दों पर विश्लेषण मुहैया करता है। रिपोर्ट में अमेरिकी रक्षा विभाग, पेंटागन, सेंट्रल कमांड (सेटकॉम) और समाचार लेखों का हवाला दिया गया है। जिनके अनुसार क्षतिग्रस्त या नष्ट हुए विमानों में मानवरहित हवाई वाहन, लड़ाकू जेट और ड्रोन शामिल थे। ईरान से युद्ध अमेरिका के लिए काफी भारी पड़ रहा है। विश्लेषकों का दावा है कि इस युद्ध में अमेरिका ने एक लाख करोड़ (एक ट्रिलियन) डॉलर के करीब पूंक चुका है। हालांकि सरकार ने इसे काफी कम करके दिखाया है। पेंटागन के एक वरिष्ठ बजट अधिकारी ने संसद को बताया कि युद्ध में  अमेरिका को अब तक 29 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है जबकि बजट 25 अरब डॉलर का था। ईरान युद्ध के कारण भारी खर्च और हथियार भंडार में आई कमी के मुद्दे पर ट्रंप के विपक्ष के साथ-साथ अपनी पार्टी के सांसदों के भी भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर ईरान ने अभी तक युद्ध में हुए नुकसान का विवरण जारी नहीं किया है और अब भी दावा करता है कि वह अमेरिका के खिलाफ युद्ध जारी रखने में सक्षम है। राष्ट्रपति ट्रंप अब ईरान युद्ध को लेकर घर के अंदर ही बुरी तरह घिरते जा रहे हैं। जहां एक तरफ अमेरिकी जनता सड़कों पर उतर रही है वहीं अमेरिकी सेना और संसद सभी जगह ट्रंप को अपने ही उन्हें घेर रहे हैं। 

-अनिल नरेन्द्र 


Saturday, 23 May 2026

इमरान का तख्ता पलट अमेरिका की साजिश थी

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की सरकार गिराने को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। लीक दस्तावेजों के आधार पर दावा किया गया है कि इमरान की कुसी सिर्फ अविश्वास के प्रस्ताव से नहीं गिरी थी। इसके पीछे अमेरिकी साजिश और पाक सेना की भूमिका थी। दरअसल, इमरान ने 24 फरवरी 2022 को रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से मॉस्को में मुलाकात की थी। ठीक उसी दिन रूस ने यूव्रेन पर हमले शुरू किए थे। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका इमरान की इस यात्रा से नाराज था। वह चाहता था कि पाकिस्तान यूक्रेन युद्ध पर रूस की खुलकर आलोचना करे, लेकिन इमरान सरकार ने तटस्थ रुख अपनाया। 7 मार्च 2022 को वाशिंगटन में पाक के तत्कालीन राजदूत असद मजीद खान और अमेरिकी सहायक विदेशी मंत्री डोनाल्ड लू के बीच बातचीत हुई। लू ने मजीद से कहा, यदि इमरान अविश्वास प्रस्ताव में टूट जाते हैं तो अमेरिका ‘सब माफ' कर देगा। इसके 33 दिन बाद, 9 अप्रैल 2022 को इमरान सरकार गिर गई। वाशिंगटन के एक होटल में लू ने मजीद को लंच पर इमरान को हटाने का दबाव दिया था। इमरान के हटने के अगले दिन ही शाहबाज ने सत्ता संभाल ली। नवम्बर 2022 में जनरल बाजवा पद से सेवानिवृत हुए और आमी चीफ आसिम मुनीर का उदय हुआ। इमरान ने आरोप लगाया था कि मुनीर की नियुक्ति पूर्व पीएम नवाज शरीफ से परामर्श के बाद हुई थी। बाकी तो इतिहास है। अमेरिका किसी भी ऐसी सरकार को बर्दाश्त नहीं करता जो उसका विरोध करे और जिसकी रूस से नजदीकी हो।

-अनिल नरेन्द्र

ट्रंप ने कैसे ईरान जंग में कमाए पैसे?

डोनाल्ड ट्रंप पर पहली बार किसी अमेरिकी राष्ट्रपति पर जंग से कमाई करने पर सवाल उठने लगे हैं। अब ट्रंप ट्रेडिंग वॉर में घिर गए हैं। नए वित्तीय खुलासों के अनुसार 2026 की पहली तिमाही यानी जनवरी से मार्च 2026 के बीच ट्रंप या उनके सलाहकारों की मंडली ने 3700 से ज्यादा शेयर सौदे किए। रोज लगभग 40 शेयर सौदे हुए। इनमें ट्रंप को लगभग 800 करोड़ रुपए यानी लगभग 83 मिलियन डॉलर से ज्यादा की कमाई हुई। ये शेयर एनवीडिया, बोइंग, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, अमेजन, ओरेकल और कॉस्टको जैसी कंपनियों के थे। ट्रंप विवादों में इसलिए हैं क्योंकि ये कंपनियां रक्षा सौदों, एआई नियमों और चिप और सेमीकंडक्टर आयात या फिर निर्यात से जुड़ी हुई हैं। वॉल स्ट्रीट की कंपनी एरिक प्रिंस के मुताबिक अमेरिका के इतिहास में ये पहली बार है जब कोई अमेरिकी राष्ट्रपति वित्तीय लेन-देन और हितों के टकराव के मुद्दे पर सवालों के घेरे में है। उधर व्हाइट हाउस ने एक बयान जारी कर शेयर ट्रेडिंग को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर लगे आरोपों से इंकार किया है। ट्रंप आर्गेनाइजेशन पूरे कारोबार को संभालता है। बेटे जूनियर ट्रंप के पास अमेरिका और यूरोप से निवेश लाने की जिम्मेदारी है। जबकि दामाद जेरेड कुशनर की कंपनी एफिनिटी पार्टनर्स सउदी अरब और अन्य खाड़ी देशों के सरकारी वेल्थ फंड से मिले अरबों डालर के निवेश को संभालती है। इस रकम को शेयरों में डायवर्ड करते हैं। ट्रंप के पोर्टफोलियो में पिछले साल के अंतिम तीन महीनों में कई सौ शेयर ट्रेडिंग के रिकार्ड हैं। जबकि इस साल 10 फरवरी को ही ट्रंप ने माइक्रोसॉफ्ट, मेटा और अमेजन में अपने शेयरों की हिस्सेदारी को बेचकर लगभग 350 करोड़ रुपए की कमाई की। इससे कुछ दिन पहले ही ट्रंप ने एंटी ट्रस्ट और एआई रेगुलेशन और डाटा नीतियों से संबंधित बड़े फैसले किए। ईरान युद्ध के दौरान ट्रंप के कभी युद्ध तो कभी वार्ता के बयानों से तेल और स्टॉक वायदा बाजारों में तेज उथल-पुथल रही। जब भी ट्रंप युद्ध का बयान देते तो तेल के दाम उछल जाते, जबकि वार्ता वाले बयान से शेयर बाजारों में तेजी आ जाती।

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 21 May 2026

यूएई के बराकाह न्यूक्लियर प्लांट पर हमला

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के अल दफरा क्षेत्र में स्थित बराकाह न्यूक्लियर पावर प्लांट के परिसर में रविवार को एक ड्रोन हमला हुआ और उसके बाद आग लग गई। हालांकि किसी के घायल होने की सूचना नहीं है। ईरान और यूएई अब जानी दुश्मन बन चुके हैं। ड्रोन से बराकाह न्यूक्लियर प्लांट को निशाना बनाया गया। इस अटैक को यूएई ने बिना किसी कारण के आतंकी हमला बताया। बहरहाल इस हमले की जिम्मेदारी  फिलहाल किसी भी समूह ने नहीं ली है। मगर यूएई का आरोप ईरान की तरफ ही है। यूएई का मानना है कि यह हमला ईरान ने ही ड्रोन के जरिए किया है। पिछले कई दिनों से ईरान-यूएई में तनातनी चल रही है। ईरान का मानना है कि यूएई खुलकर अमेरिका और इजरायल की मदद कर रहा है और उसकी भूमि से ही अमेरिकी हमले हो रहे हैं। खबर तो यहां तक है कि वर्तमान जंग के दौरान ही इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके मोसाद  प्रमुख ने यूएई का गुप्त दौरा किया था। ड्रोन हमले से बराकाह संयंत्र के बाहरी क्षेत्र में स्थित एक इलैक्ट्रिक जेनेरेटर में आग लग गई। यह आग संयंत्र की भीतरी परिधि के बाहर लगी थी। संघीय परमाणु नियामक प्राधिकरण (एफएएनआर) ने भी इस हमले की पुष्टि की कि आगे से संयंत्र की सुरक्षा या उसके जरूरी सिस्टम पर कोई असर नहीं पड़ा है और सभी यूनिट सामान्य रूप से काम कर रही है। सभी जरूरी एहतियाती कदम उठा लिए गए हैं और लोगों से अपील की गई है कि वे सिर्फ आधिकारिक स्रोतों से ही जानकारी लें और अफवाहों से बचें। बयान में ड्रोन हमले के स्त्राs के बारे में कोई भी जानकारी नहीं दी गई। ईरानी सूत्रों का कहना है कि हमने कोई हमला नहीं किया है तो फिर हमला किसने किया? क्या कोई तीसरी शक्ति अपना खेल तो नहीं खेल रही जो दोनों मुल्कों को लड़वा कर अपना उल्लू सीधा करना चाहती है। इससे पहले भी 5 मई को यूएई ने कहा था कि उसके कुछ क्षेत्रों पर ईरान से दागी गई मिसाइलों और ड्रोन से हमला किया गया, लेकिन ईरान की सैन्य कमान ने इस आरोप से इंकार किया था। ईरानी अधिकारियों ने यूएई के उन आरोपों को भी खारिज किया था जिसमें ईरान पर हमला करने का दावा किया गया था। दरअसल यूएई को ईरान इसलिए अपना दुश्मन मान रहा है, क्योंकि उसे लगता है कि यूएई की धरती का इस्तेमाल करके ही अमेरिका ने उस पर अटैक किए हैं। बहरहाल इस हमले ने ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच चल रहे नाजुक संघर्ष विराम को लेकर चिंताओं को और बढ़ा दिया है। ऐसा लग रहा है कि कूटनीतिक प्रयास भी अब काफी तनावपूर्ण होते जा रहे हैं। संयुक्त अरब अमीरात ने इस हमले के पीछे के लोगों पर बिना किसी उकसावे के आतंकवादी हमला करने का आरोप लगाया और चेतावनी दी कि वह अपनी देश की संप्रभुता पर किसी भी तरह के खतरे को बर्दाश्त नहीं करेगा। दक्षिण कोरिया की मदद से बने और 2020 से चालू बराकाह  परमाणु संयंत्र अरब दुनिया का एक मात्र परमाणु ऊर्जा संयंत्र है। 20 अरब डालर की लागत से बना यह संयंत्र यूएई की लगभग एक चौथाई ऊर्जा जरूरतों को पूरा करता है।

-अनिल नरेन्द्र