अब जब राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव का मामला निपट गया है, लगता है कांग्रेस और संप्रग सरकार में फेरबदल का समय आ गया है। प्राप्त संकेतों से लगता है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अब संगठन में फेरबदल करने के मूड में आ चुकी हैं। खबर है कि कांग्रेस संगठन में कई दिग्गजों को हटाया जाएगा और कुछ के पर कतर दिए जाएंगे। कुछ को केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाकर संगठन में लगाया जा सकता है। संगठनात्मक फेरबदल के लिए सोनिया गांधी का वरिष्ठ सलाहकारों से सलाह मशविरा लगभग हो चुका है। यूपी और पंजाब के चुनाव में करारी हार को पार्टी पचा नहीं पा रही है। इस साल और 2013 में कई राज्यों में विधानसभा और आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भी यह जरूरी है कि कांग्रेस अपना संगठन दुरुस्त करे। क्या श्री दिग्विजय सिंह के पर कतरने से यह फेरबदल आरम्भ माना जाए? कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को लेकर मंगलवार को अफवाहों का बाजार गर्म रहा। कहा गया कि उत्तर प्रदेश की हार की वजह से सिंह से उत्तर प्रदेश और असम का प्रभार छीन लिया गया है। एक वजह यह भी सुनने को मिली कि दिग्विजय सिंह से इन राज्यों का प्रभार उनके विवादास्पद बयानों के चलते लिया गया तो दूसरी ओर यह भी सुनने में आया कि अपनी पत्नी की बीमारी की वजह से वह स्वयं ही अपनी इस जिम्मेदारी से मुक्त हो गए हैं। बात बढ़ती देख कांग्रेस महासचिव और मीडिया विभाग के अध्यक्ष जनार्दन द्विवेदी को इन सभी बातों का खंडन करने के लिए आगे आना पड़ा। बताया गया कि दिग्विजय सिंह राष्ट्रपति चुनाव को लेकर किसी और काम में व्यस्त हैं पर उन्हें लेकर उलझन तब शुरू हुई जब सोनिया गांधी से मिलने उत्तर प्रदेश के सांसदों के साथ कांग्रेस महासचिव बीके हरिप्रसाद दस जनपथ पहुंचे जबकि राज्य के प्रभारी दिग्विजय सिंह हैं। उससे पहले इलेक्ट्रानिक मीडिया के हाथ कांग्रेस संसदीय दल का वह पत्र लग गया जिसमें सांसदों के साथ सोनिया गांधी की मुलाकात का कार्यक्रम बनाया गया था। इस पत्र और हरिप्रसाद को उत्तर प्रदेश के सांसदों के साथ जाता देखकर इस बात की ऊहापोह बढ़ गई कि क्या सचमुच दिग्विजय से उत्तर प्रदेश और असम का प्रभार ले लिया गया है। सोनिया गांधी इन दिनों कांग्रेस सांसदों से मिल रही हैं। मंगलवार को वह यूपी के सांसदों से मिलीं। खबर है कि कुछ मंत्रियों ने जिनमें ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश और स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद के नाम प्रमुख हैं, ने केंद्र सरकार में मंत्री पद से इस्तीफा देकर पार्टी की सेवा करने की इच्छा जताई है। कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव के तुरन्त बाद दोनों केंद्रीय मंत्रिमंडल और कांग्रेस संगठन में बड़ा फेरबदल होगा। केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल के लिए कांग्रेस के सहयोगियों का भी दबाव है। श्री प्रणब मुखर्जी के जाने के बाद से वित्त मंत्री का पद भी भरना जरूरी है। लगता है कि दोनों सरकार और संगठन में फेरबदल होगा पर देखें क्या होता है?
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Friday, 20 July 2012
Wednesday, 20 June 2012
राष्ट्रपति चुनाव के दंगल का तीसरा अध्याय
राष्ट्रपति चुनाव का तीसरा अध्याय आरम्भ हो चुका है। यह चुनाव दोनों कांग्रेस गठबंधन और विपक्ष के लिए अपने-अपने कारणों से राजनीतिक चुनौती बन गया है। पहले बात करते हैं एनडीए की। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के चुनाव लड़ने से इंकार करने से एनडीए में अब आपसी फूट का खतरा बढ़ गया है। एनडीए घटक दलों की दो बैठकें हो चुकी हैं पर कोई रणनीति नहीं बन पा रही। इसकी खास वजह यही समझी जा रही है कि भाजपा के दिग्गज नेता भी यूपीए के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी के मुकाबले अपना उम्मीदवार उतारने या न उतारने को लेकर पशोपेश में हैं। यह बहस भी जारी है कि अब जब डॉ. कलाम दौड़ से बाहर हो गए हैं तो क्या ऐसे में लोकसभा के पूर्व स्पीकर पीए संगमा को ही अपना समर्थन दे दिया जाए? भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी राष्ट्रपति चुनाव लड़ने के इच्छुक बताए जा रहे हैं। आडवाणी जी कहते हैं कि लोकतंत्र में चुनाव लड़ना जरूरी होता है, वह यूपीए उम्मीदवार को निर्विरोध नहीं जिताना चाहते। सूत्रों के अनुसार भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी हार की फजीहत से बचने के लिए उम्मीदवार उतारने के पक्ष में नहीं हैं। अरुण जेटली भी गडकरी के साथ हैं। पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह, वेंकैया नायडू, डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने 2007 का इतिहास याद कराया जब तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत संख्याबल नहीं होने पर भी मैदान में कूद पड़े थे। उम्मीदवार उतारने के लिए आडवाणी, सुषमा की जिद के पीछे सुब्रह्मण्यम स्वामी का तर्प यह भी है कि हमें राष्ट्रपति चुनाव से आगे की सोचनी चाहिए। अगर हम जयललिता, नवीन पटनायक और ममता बनर्जी को यूपीए से दूर कर लेते हैं तो 2014 के लोकसभा चुनाव में हमें एनडीए को फैलाने का अच्छा अवसर मिलेगा। यह भी कहा जा रहा है कि अगर हम चुनाव पर अड़े रहे तो यूपीए हमें शायद उपराष्ट्रपति का पद दे दे? फिर यह भी कहा जा रहा है कि अब तक भारत के प्रेजीडेंट के लिए कोई निर्विरोध नहीं चुना गया, हर जीतने वाले उम्मीदवार को चुनाव लड़ना पड़ा है और चुनाव लड़ने के बाद ही वह रायसीना हिल्स पहुंचा है। हां अब चुनाव में काका जोगिन्दर सिंह धरतीपकड़ सरीखे के तमाशबीनों के लिए कोई जगह नहीं है। आडवाणी बार-बार 1969 के राष्ट्रपति चुनाव का जिक्र कर रहे हैं। राष्ट्रपति पद के लिए 1969 का चुनाव कई मायनों में अनोखा रहा जब वीवी गिरि और नीलम संजीवा रेड्डी के बीच कांटे का मुकाबला हुआ था। आडवाणी जी ने कहा कि 1969 का राष्ट्रपति चुनाव ऐतिहासिक था और 2012 का यह चुनाव सनसनीखेज है। उन्होंने कहा कि 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार को अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने की अपील कर हरवाया था। वह एक असाधारण चुनाव था, यह सनसनीखेज चुनाव है। राष्ट्रपति चुनाव के लिए तय लग रहे मुकाबले में दूसरी वरीयता के वोटों का गणित अहम साबित हो सकता है। अगर संप्रग प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी को दूसरी ओर से कड़ी टक्कर देने वाला कोई मजबूत उम्मीदवार मैदान में उतरता है तो 1969 की तरह राष्ट्रपति तय करने में निर्णायक साबित हो सकता है। अगर समीकरण बहुत नहीं बदलते हैं तो प्रणब और संगमा में टक्कर हो सकती है। मुखर्जी के नाम पर राजग में सहमति न बनना और संगमा का मैदान में डटे रहने की घोषणा द्वितीय वरीयता के गणित को रास्ता दे रही है। हालांकि अभी तक सिर्प एक बार 1969 में द्वितीय वरीयता निर्णायक साबित हुई है। उस समय वीवी गिरि द्वितीय वरीयता की गिनती से चुनाव जीते थे। विपक्ष यदि प्रणब के खिलाफ एकजुट हो जाता है और आदिवासी वर्ग का होने के कारण दूसरी वरीयता में पीए संगमा को क्रॉस वोट मिल जाएं तो मुकाबला रोचक हो सकता है। मसलन 1969 में कांग्रेस के उम्मीदवार नीलम संजीवा रेड्डी थे और वीवी गिरि निर्दलीय थे। कांग्रेस दो धड़ों में बंट चुकी थी। एक पुरानी कांग्रेस, जिसके मुखिया मोरारजी देसाई थे। दूसरी नई जिसकी कर्ताधर्ता इन्दिरा गांधी थीं। राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी व्हिप लागू नहीं होने का फायदा उठाते हुए इन्दिरा जी ने कांग्रेसियों से आत्मा की आवाज पर मत देने की अपील की। नतीजतन वीवी गिरि को दूसरी वरीयता में ज्यादा मत मिले और वह विजयी हुए। कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का विरोध टीम अन्ना भी कर रही है। टीम का कहना है कि राष्ट्रपति बनने से पहले उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। टीम अन्ना के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल ने रविवार को जोधपुर में कहा कि मुखर्जी देश के संवैधानिक पद के प्रत्याशी हैं, इसलिए जो इस पद पर बैठे, उसकी छवि साफ-सुथरी होनी चाहिए। साल 2005 को नेवी वॉर रूम लीक मामले में प्रणब की भूमिका पर संदेह है। उन पर चावल निर्यात घोटाले के भी आरोप हैं। इन मामलों में उनकी भूमिका की जांच होनी चाहिए। समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह ने सफाई दी है कि उन्होंने कांग्रेस से कोई डील नहीं की। डील तो दलाल लोग करते हैं। मुलायम कहते हैं कि अगर ममता सोनिया गांधी से मिलने के बाद यह घोषणा नहीं करतीं कि कांग्रेस दो नामों को आगे बढ़ा रही है, प्रणब मुखर्जी और हामिद अंसारी, तो सोनिया गांधी कुछ और ही खेल खेल सकती थीं। अगर 13 जून को 10 जनपथ जाने के पहले तक तृणमूल कांग्रेस की नेत्री ममता बनर्जी को ही नहीं मालूम था कि किस उम्मीदवार पर कांग्रेस दाव लगाना चाहती है तो फिर किसको पता था? सोनिया गांधी द्वारा बताए गए दो नामों प्रणब मुखर्जी और हामिद अंसारी को ममता जाहिर नहीं करतीं तो इस पर रहस्य ही बना रहता। 2007 में सोनिया गांधी ने अंतिम समय में प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का नामांकन कर यह संदेश दे दिया था कि वे किस प्रकार के व्यक्ति को राष्ट्रपति भवन देखना चाहती हैं। सम्भव था कि अगर ममता कांग्रेस की पसंद को सार्वजनिक नहीं करतीं तो अंतिम समय में सोनिया मीरा कुमार या हामिद अंसारी का नाम घोषित कर देतीं। मुलायम ने कहा कि हम तो हमेशा से प्रणब को चाहते थे पर सोनिया को प्रणब पर विश्वास नहीं था। इस बार राष्ट्रपति चुनाव को लेकर दिन-प्रतिदिन दृश्य बदल रहा है। कुछ भी दावे से कहना मुश्किल है। अभी समय है और भी अध्याय सामने आ सकते हैं।
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Saturday, 16 June 2012
राष्ट्रपति चुनाव के दंगल का पहला अध्याय
यूपीए ने राष्ट्रपति पद के लिए अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं निवर्तमान वित्त मंत्री का नाम तो घोषित कर दिया, उनके राष्ट्रपति चुने जाने में संदेह भी कम है किन्तु एक बात तो स्पष्ट है कि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव की अविश्वसनीयता एक बार फिर जगजाहिर हो गई है। पिछले दो दिनों से ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव की जुगलबंदी ने ऐसा पेंच फंसा दिया था कि कांग्रेस चारों खाने चित हो गई थी। कांग्रेस ने कभी उम्मीद नहीं की होगी कि ममता-मुलायम ऐसा पासा चलेंगे कि जिससे पार्टी के सारे समीकरण ही बदल जाएंगे। देखा जाए तो ममता ने एक तीर से कई निशाने लगाने की कोशिश की थी। यह वही मुलायम सिंह यादव हैं जिन्हें कुछ दिन पहले यूपीए-2 का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड पेश करने के लिए सरकार के प्रमुख मंत्रियों के साथ मंच पर खड़ा किया गया और रिपोर्ट को जारी किया गया था। ममता ने कांग्रेस से बदला लेने की कोशिश की थी। कांग्रेस ने यह चेतावनी देने की कोशिश की थी कि ममता आपके पास लोकसभा के 19 सांसद हैं तो हम समाजवादी पार्टी को गले लगाकर उनके 22 सांसदों का समर्थन पा सकते हैं, आप अपनी औकात में रहो। ममता ने एक झटके में कांग्रेस को उसकी औकात दिखाने की कोशिश की। अपने पैनल में सोमनाथ चटर्जी का नाम शामिल करके ममता ने यह भी जता दिया कि वह बंगालियों के खिलाफ नहीं हैं। प्रणब मुखर्जी का समर्थन इसलिए भी करने को ममता को मजबूर किया जा रहा था क्योंकि प्रणब बंगाली हैं और बंगाली होने के नाते ममता उनका समर्थन करने पर मजबूर होंगी पर ममता ने यहां भी कांग्रेस को मात दे दी और सोमनाथ चटर्जी का नाम लेकर इस आलोचना से भी अपने आपको बचा लिया। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की पसंद को खारिज करके ममता-मुलायम ने जो पासा फेंका था वह भले ही मुलायम सिंह की वजह से असफल हो गया किन्तु वह आने वाले दिनों में नए ध्रुवीकरण को जन्म देगा। अंतिम समय में जिस ढंग से दोनों नेताओं ने गुगली फेंकी थी उससे कांग्रेस की न सिर्प परेशानी ही बढ़ी थी बल्कि राष्ट्रपति चुनाव को बहुत पेचीदा बना दिया था। दरअसल राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम लेना एक सोची-समझी रणनीति का परिचायक है। कांग्रेस के अन्दर भी एक ऐसा धड़ा है जो मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद से हटाना चाहता है। मनमोहन सिंह का नाम सुझाना एक तरह से संप्रग सरकार के इन दोनों समर्थक दलों द्वारा प्रधानमंत्री में अविश्वास प्रकट करने के समान है। मनमोहन सिंह कांग्रेस पार्टी के लिए एक बोझ बन चुके हैं, वह एसेट कम लाइबिलिटी ज्यादा हैं। सभी जानते हैं कि मनमोहन को हटाना इस समय कांग्रेस के लिए सम्भव नहीं है पर ममता-मुलायम ने पंगा जरूर फंसा दिया है। दोनों ने सोनिया गांधी को यह भी स्पष्ट संदेश दे दिया था कि इस मामले में किसी भी निर्णय तक पहुंचने में तृणमूल और सपा की भूमिका को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। ममता और कांग्रेस में तल्खी बढ़ी है। एक कांग्रेसी सांसद अधीर चौधरी ने तो ममता की तुलना मीर जाफर से ही कर दी क्योंकि उन्होंने एक बंगाली (प्रणब मुखर्जी) का विरोध किया है। ममता के इस व्यवहार को सोनिया गांधी भूल नहीं सकतीं, इसलिए दोनों महिलाओं में एक ऐसी दरार पड़ गई है जिसे पाटना आसान नहीं होगा। ममता भी बहुत गुस्से में हैं।
यह तो पहले ही आशंका थी कि मुलायम यूपीए सरकार के सामने सीना तानकर खड़े होने की हैसियत में नहीं हैं लेकिन उन्होंने जिस तरह कांग्रेस को झटका दिया उससे एक बात तो साफ है कि उनके भरोसे कोई पार्टी या गठबंधन अपनी रणनीति तय नहीं कर सकता।
मुलायम तो तब झुके जब उन्हें लगा कि आय से अधिक सम्पत्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ तलवार लटक रही है और जुलाई में ही कांग्रेसी वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी द्वारा दायर मुकदमे की सुनवाई है तो उन्होंने ममता को गच्चा दे दिया। लेकिन इससे इतना तो स्पष्ट हो गया है कि ममता की नाराजगी यूपीए से बनी रहेगी जो किसी हद तक जा सकती है।
बहरहाल कांग्रेस को यूपीए घटक दलों एवं बाहर से समर्थन दे रही पार्टियों का प्रणब मुखर्जी के पक्ष में समर्थन तो हासिल हो गया और अब वह चाहेगी कि उसे एनडीए भी समर्थन दे दे ताकि उसके उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिए जाएं किन्तु लगता है कि अभी राष्ट्रपति चुनाव तक बहुत सारी राजनीतिक उठापटक होनी है। क्योंकि ममता ने कोलकाता पहुंच कर ऐलान कर दिया कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। मतलब यह कि राष्ट्रपति चुनाव के दंगल का पहला अध्याय ही खत्म हुआ है आगे महादंगल बाकी है।
Anil Narendra, Bahujan Samaj Party, Congress, Daily Pratap, Mamta Banerjee, Mulayam Singh Yadav, Pranab Mukherjee, President of India, Samajwadi Party, Sonia Gandhi, UPA, Vir Arjun
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Thursday, 14 June 2012
देश की अर्थव्यवस्था चौपट करने के लिए सोनिया-मनमोहन जिम्मेदार
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 14 June 2012
अनिल नरेन्द्र
जो बात हम अक्सर कहा करते हैं उसकी पुष्टि अब अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स (एस एंड पी) ने कर दी है। हम अक्सर कहा करते थे कि हमारे पधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की गलत नीतियों, अनिर्णय की आदत ने देश को कंगाली के कगार पर पहुंचा दिया है। भारत की गिरती आर्थिक साख के लिए सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह जिम्मेदार हैं। यह आरोप विपक्षी दलों का नहीं बल्कि एस एंड पी का है। एजेंसी ने भारत की केडिट रेटिंग को और कम करने की चेतावनी देते हुए सीधे शब्दों में कांग्रेस को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है। बकौल एजेंसी, पार्टी जहां अंदरूनी मतभेदों से भरी है वहीं संपग सरकार का ढांचा ही दोषपूर्ण है। एस एंड पी ने संपग सरकार के सियासी ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पास सर्वोच्च अधिकार हैं। लेकिन वह कैबिनेट में नहीं हैं। जबकि बिना चुने हुए नियुक्त पधानमंत्री के पास राजनीतिक फैसला लेने के लिए आधार नहीं है। पधानमंत्री का अपने मंत्रिमंडल पर ही कंट्रोल नहीं है। वह अपने मंत्रियों से भी अपनी बात नहीं मनवा सकते, कड़े फैसले लेने तो दूर रहा। आर्थिक सुधारों पर लगे ब्रेक का जिम्मा सहयोगी दलों के तेवर और विपक्ष के असहयोगी रुख पर थोपती रही सरकार के लिए एजेंसी की यह टिप्पणी बड़ा झटका है। एजेंसी ने इतना ही नहीं कहा बल्कि एक कदम और बढ़ते हुए सोमवार को महज केडिट पर ही नहीं बल्कि भारत की राजनीतिक स्थिति की भी रेटिंग नीचे गिरा दी। डॉलर के मुकाबले लगातार गिर रहे रुपए और आर्थिक सुधारों पर असमंजस की स्थिति का हवाला देते हुए एजेंसी ने चेतावनी दी कि अब भारत की रेटिंग खतरनाक स्थिति पर जा सकती है। सवाल राजनीतिक मंशा पर उठाया गया और कहा गया कि सुधार रोकने के लिए विपक्ष या सहयोगी दल नहीं खुद कांग्रेस और सरकार जिम्मेदार है। पार्टी के अंदर ही इसे रोका जा रहा है। पार्टी अध्यक्ष राजनीतिक रूप से मजबूत हैं लेकिन वह सरकार में नहीं हैं। जिसके हाथ में सरकार की लगाम है उसके पास राजनीतिक आधार और समर्थक नहीं हैं। निर्णायक नेतृत्व की कमी और नीतिगत फैसला लेने में अनिर्णय की छवि के कारण निवेशकों का विश्वास डगमगा गया है। एजेंसी ने भारत की साख घटाने की चेतावनी दी है। यदि ऐसा हुआ तो भारत ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, द. अफीका) देशों में साख गंवाने वाला पहला मुल्क होगा। एजेंसी की चेतावनी की कई वजह हैं जिनका उसने उल्लेख किया है। देश में अर्थव्यवस्था बिगड़ रही है। औद्योगिक वृद्धि के ताजे आंकड़े से यह बात साबित भी होती है। पूंजीगत उत्पादों और विनिर्माण उत्पादन में गिरावट के कारण औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर इस साल अपैल महीने में भारी गिरावट के साथ 0.1 फीसद पर आ गई है। यह पिछले साल अपैल में 5.3 फीसद थी। इसमें कोई दोराय नहीं कि पिछले कई सालों की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था की तस्वीर अच्छी नहीं है। अपैल में जीडीपी में पिछले नौ वर्षों की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज हुई। राजकोषीय घाटा बढ़ा है और व्यापार घाटा भी। सबसे दुखद पहलू तो यह है कि इस सरकार में देश को इस आर्थिक दलदल से उभारने के लिए न तो कोई प्लान है और न ही इच्छाशक्ति।Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Indian Economy, Inflation, Manmohan Singh, Sonia Gandhi, UPA, Vir Arjun
Sunday, 13 May 2012
ऐसी लीपापोती समीक्षा से कांग्रेस का कोई भला नहीं होगा
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस चुनाव हारी इसकी समीक्षा करने के लिए पिछले कई दिनों से कांग्रेस में आत्म मंथन चल रहा है। कई बैठकें हुईं, कई कमेटियां बनीं पर अंत में नतीजा वही सिफर निकला। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने लीपापोती करते हुए कहा कि पार्टी में गुटबाजी और अनुशासनहीनता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। हमने सोचा था कि सोनिया जी पार्टी के लिए हार के जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई करेंगी पर उन्होंने ऐसा न करना बेहतर समझा और डरा-धमका कर मामले को रफा-दफा करने का प्रयास किया। ऐसी चेतावनियां सोनिया पहले भी दे चुकी हैं। बुराड़ी में दो साल पहले हुए कांग्रेस के सम्मेलन में सोनिया गांधी ने कार्यकर्ताओं से गुटबाजी छोड़ कमर कसने को कहा था। पिछले साल दिल्ली में भी पार्टी के एक सम्मेलन में सोनिया ने पद की लालसा करने वालों पर चुटकी लेते हुए कहा था कि कांग्रेस में सबका नंबर आता है। सोनिया के कथन का कांग्रेसियों पर कोई असर नहीं हुआ और न ही उन्होंने सोनिया की बात को संजीदगी से ही लिया, नतीजा सामने है। कांग्रेस पिछले दो साल में बिहार, यूपी, पंजाब, गोवा हार चुकी है। आंध्र प्रदेश में भी उसकी हालत खस्ता है। राजस्थान में गहलोत सरकार के हालात भी दुरुस्त नहीं हैं। मुंबई नगर पालिका रही हो या फिर दिल्ली नगर निगम सब जगह कांग्रेस को झटके पर झटके लग रहे हैं। बिहार और यूपी में तो चुनावी कमान राहुल गांधी के हाथों में थी पर सोनिया ने खुद पर और राहुल पर जिम्मेदारी लेकर एक नए विवाद को जन्म देने से पहले ही खत्म कर दिया और इससे पहले कि कोई राहुल पर उंगली उठाए, मामले को समाप्त कर दिया। यह ठीक है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की धुरी चुनाव है लेकिन जिस आधार पर चुनावी कामयाबी मिलती है और उसकी सोच व कार्यपद्धति भी मायने रखती है। उसके जरिए ही सत्ता मिलती है जो जनकल्याण के काम को सम्भव करा पाती है। कांग्रेस को यह समझ विरासत में मिली है, फिर भी वह हाल के दशक में अगर इससे डिगी हुई लगती है तो इस पर उसको गम्भीरता से आत्म मंथन करना चाहिए पर आत्म मंथन ऐसा नहीं होना चाहिए जिसका कोई अर्थ ही नहीं निकले। मौजूदा हालात में यह कहना दुखद है कि कांग्रेस भी अपनी कमजोरी और पराजय के कारणों पर बस मंथन कहने भर के लिए करती है। वास्तविक अर्थों में वह ऐसा करने से हिचकिचाती है। अगर कांग्रेस गम्भीर होती तो विभिन्न प्रदेशों में समय-समय पर हुई पराजयों और उसकी समीक्षा के लिए गठित समितियों की तरफ से गिनाए जाने वाले कारण अब तक दूर कर लिए गए होते। निश्चित रूप से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को यह मालूम है कि प्रदेश में सभी क्षत्रपों के अपने-अपने गुट हैं और आम कार्यकर्ताओं की जगह उनके ही चापलूस हैं जिनसे ही वे घिरे रहते हैं। वे आम कार्यकर्ताओं के भी नेता हैं, ऐसा नहीं मानते। सम्भवत इसका एक कारण नेताओं के कार्यकर्ताओं में जोश भरने की जगह अपने स्वार्थ हावी होना है। वे यह मान कर चलते हैं कि वोट डलवाने के लिए गांधी परिवार काफी है। इसके आगे न तो उन्हें महंगाई का न भ्रष्टाचार का और न ही बढ़ती बेरोजगारी मुद्दा हो सकती है। इनके सामने बुनियादी सुविधाएं जैसे बिजली, पानी है पर अंकुश लगाने के लिए लोकपाल, लोकायुक्त की नियुक्ति जरूरी है। विडम्बना यह है कि कांग्रेसी छुट भैया यह भी नहीं समझना चाहते कि अब गांधी परिवार का वह करिश्मा नहीं रहा। पहले बिहार और फिर उत्तर प्रदेश ने यह जता दिया है गांधी परिवार वोट खींचू या चुनाव जिताने-जीतने की गारंटी अब नहीं है। सारा जोर लगाकर भी गांधी परिवार की तीसरी पीढ़ी के वारिस उत्तर प्रदेश में दृश्य प्रवर्तक नहीं हो सके। बिहार ने तो सिरे से राहुल गांधी को खारिज कर दिया। इसलिए कि उनकी टीम के बाकी नेताओं ने कुछ ठोस काम ही नहीं किया और जनमानस में वह यह विश्वास पैदा नहीं कर सके कि कांग्रेस को वोट देने में ही उनकी भलाई है। गौर तो इस पर होना चाहिए था कि टीम राहुल सरजमीनी कम हवाई ज्यादा क्यों रही? पर पार्टी अध्यक्ष ने राहुल को केंद्र में रखकर चुनावी समीक्षा नहीं की। अगर कांग्रेस वाके ही पार्टी में सुधार चाहती है तो हार के सही कारणों पर चर्चा करने का साहस दिखाए और कसूरवार नेताओं पर सख्त कार्रवाई करे ताकि पार्टी के बाकी नेताओं में एक भय पैदा हो सके। कांग्रेस को अगर इस साल होने वाले गुजरात और हिमाचल प्रदेश समेत कई राज्यों में चुनावों को फतह करना है तो उसे केंद्र में अपनी लुंज-पुंज मनमोहन सरकार की कमियों पर भी गौर करना चाहिए। अनुशासनहीनता और गुटबाजी से परहेज की नसीहत को पालन लायक बनाने के लिए उदाहरणों का ऐसा आधार दिया जाना चाहिए ताकि उस पर पार्टी की निष्ठा टिक सके। यह लीपापोती समीक्षा का कोई फायदा नहीं।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Rahul Gandhi, Sonia Gandhi, State Elections, Vir Arjun
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Tuesday, 13 March 2012
Nehru-Gandhi Family charm vanishes
Anil Narendra
Assembly election results for five States have been disappointing for the Congress Party on the one hand, and on the other these have proved a high voltage shock for the Nehru-Gandhi family. When asked about her reactions, the Congress President Sonia Gandhi told media on Wednesday that wrong selection of candidates and weak Party organization in UP led to the miserable performance of the Party. She said that defeat and victory are the way of life; we have lost Rai Bareilly and Amethi seats earlier also, etc. Meanwhile, her son Rahul Gandhi has accepted the responsibility for Party's election debacle. If it is a normal defeat, then question arises as to why a review is required? If Rahul has taken the responsibility, then the matter almost ends, but the question which was not replied to by Sonia Gandhi, is still there – does this defeat indirectly impact the Nehru-Gandhi family? The Congress has thrown in its present and future in UP. Rahul shouldered the election campaign, whereas the entire Gandhi-Wadra family (including children) entered the fight to save the family fort of Amethi-Rai Bareilly. People have completely rejected Nehru-Gandhi-Wadra family in Uttar Pradesh. Despite Rahul Gandhi's herculean efforts, the Congress has returned to the position of 2007 in UP. On the other hand, in the areas where Priyanka along with her husband and children took the command of the electioneering, the Congress had difficulty in saving its face. Rahul Gandhi organized more than 200 rallies. Sonia Gandhi also addressed many rallies. Party might have been able to secure more seats than 22 Assembly seats in 2007, but if we compare these with the Lok Sabha elections of 2009, then it would be sufficiently worrisome for Congress and Rahul Gandhi himself. The Rahul wave had been totally ineffective in UP and it is a bad omen for the Congress. When the elections in all these five States are being considered as the semi-final for power in the 2014 General Elections, the big jolt, that the Party has received in other States excepting Manipur, is an indication of people's apathy towards the UPA government at the Centre, especially for the Congress. Another shock for the Congress is the fact that the young SP leader Akhilesh has outweighed Rahul Gandhi who had been championing the cause of youths. In fact, it would not be wrong to say that for the present, Mulayam Singh family has outweighed the Nehru-Gandhi family. Not only the youth would be cause of concern for the Congress, but it would have to worry about Muslim votes, which have gone en masse in favour of Samajwadi Party, whereas the Congress leaders had left no stone unturned to win these votes. The blow to charismatic image of Rahul Gandhi in UP after Bihar, has led to concern in the Party. The UP election results have, however, confirmed that the magic of Nehru-Gandhi family has faded. Rahul had, with great fanfare entered into an alliance with the Rashtriya Lok Dal of Ajit Singh, but it did not prove beneficial to the Party. Performance of the Congress in Amethi-Rai Bareilly, considered to be the stronghold for Nehru-Gandhi family, has been a big blow for the Party, as in the last elections, it had secured 7 out of 10 seats in the area, when Mayawati tsunami had hit the area. This time, loosing all the five assembly seats in the parliamentary constituency of Sonia Gandhi and securing just two seats in the Rahul Gandhi parliamentary constituency and clean sweep in the district Sultanpur are the personal defeats for the Nehru-Gandhi family. Rahul Gandhi had left no stone unturned in the electioneering in the UP Assembly elections. He stayed continuously in UP for 46 days and held 211 rallies and 18 big road shows. No doubt, Rahul Gandhi has accepted the responsibility for this embarrassing defeat, but other Congress leaders, however, are not prepared to accept it as a defeat for the Nehru-Gandhi family. Boastful General Secretary Digvijay Singh has welcomed these results and called these the defeat of corrupt BSP. This is another thing that during the elections, Congress had targeted SP rather than BSP. The Party also lost on the Phulpur Lok Sabha seat near Allahabad, of Pandit Jawaharlal Nehru, Indira Gandhi seat of Rai Berreilly, Amethi seat of Sanjay Gandhi and Rajeev Gandhi. It appears that the party organizers got an inkling of Party's weaker position. That is why Priyanka was brought here, but Party failed to open its account in Sonia Gandhi parliamentary constituency. The way the people of the area have rejected the Nehru-Gandhi family, will have far reaching impact on the Centre.
Saturday, 10 March 2012
नेहरू-गांधी परिवार का हवाई करिश्मा हवा-हवाई हो गया
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 10 March 2012
अनिल नरेन्द्र
पांच राज्यों के चुनाव परिणाम जहां कांग्रेस पार्टी के लिए निराशाजनक हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम नेहरू-गांधी परिवार के लिए बहुत बड़ा व्यक्तिगत झटका है। जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से उनकी प्रतिक्रिया पूछी गई तो बुधवार को दिल्ली में मीडिया को उन्होंने कहा कि यूपी में उम्मीदवारों का गलत चयन और उत्तर प्रदेश में कमजोर संगठन पार्टी के खराब प्रदर्शन का कारण बना। उन्होंने कहाöहार-जीत तो होती रहती है, हम रायबरेली और अमेठी में पहले भी हारे हैं इत्यादि-इत्यादि। उधर सुपुत्र राहुल गांधी ने हार की सारी जिम्मेदारी ले ली। अगर यह हार सामान्य है तो प्रश्न उठता है कि समीक्षा की जरूरत क्या है? वैसे भी जब राहुल ने जिम्मेदारी ले ली है तो मामला खत्म-सा है पर जिस बात का सोनिया ने जवाब नहीं दिया वह है कि क्या यह हार नेहरू-गांधी परिवार पर सीधी आंच नहीं लाती? कांग्रेस ने वर्तमान और भविष्य सब कुछ उत्तर प्रदेश में झोंक दिया। राहुल ने पूरे प्रदेश का अभियान अपने कंधों पर ढोया तो अमेठी-रायबरेली का घरेलू किला बचाने के लिए पूरा गांधी-वाड्रा परिवार (बच्चे भी शामिल) मैदान में उतर गए। उत्तर प्रदेश की जनता ने नेहरू-गांधी वाड्रा परिवार को सिरे से खारिज कर दिया। राहुल के भागीरथी प्रयासों के बावजूद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस 2007 की हालत में ही पहुंच गई है, वहीं प्रियंका ने जिन इलाकों में अपने पति और बच्चों के साथ प्रचार की कमान संभाली वहां तो कांग्रेस के लिए इज्जत बचानी भी मुश्किल हो गई। राहुल गांधी ने 200 से अधिक रैलियां की। सोनिया गांधी ने भी कई रैलियां की। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव की 22 सीटों की तुलना में पार्टी को भले ही ज्यादा सीटें मिली हों पर यदि वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव को देखें तो यह कांग्रेस और स्वयं राहुल गांधी को परेशान करने के लिए काफी होगा। राहुल लहर का असर न होना कांग्रेस के लिए अशुभ संकेत है। ऐसे में जबकि इन पांच राज्यों के चुनाव को वर्ष 2014 के सत्ता के सिंहासन का सेमीफाइल कहा जा रहा था तो मणिपुर को छोड़कर अन्य जगह पार्टी को झटका लगना इस बात का संकेत है कि केंद्र की यूपीए सरकार विशेषकर कांग्रेस को लेकर लोगों में बहुत ज्यादा उत्साह नहीं है। गांधी परिवार के लिए एक झटका यह भी है कि युवाओं की बात करने वाले राहुल गांधी पर सपा के युवा नेता अखिलेश यादव भारी पड़े। देखा जाए तो यह कहना गलत न होगा कि फिलहाल तो नेहरू-गांधी परिवार पर मुलायम यादव परिवार भारी पड़ा। कांग्रेस के लिए चिन्ता की बात केवल युवा ही नहीं होगी बल्कि जिन मुस्लिमों के मतों को अपने पाले में करने के लिए कांग्रेसी नेताओं ने दिन-रात एक किए, उसकी भी बड़ी संख्या ने कांग्रेस की जगह सपा को चुना। बिहार के बाद उत्तर प्रदेश में राहुल की करिश्माई छवि को झटका लगना पार्टी के अन्दर चिन्ता का विषय बन गया था। अब उत्तर प्रदेश के परिणामों ने तो इस पर मोहर लगा दी कि नेहरू-गांधी परिवार का जादू समाप्त हो गया है। राहुल ने बड़ी धूमधाम से अजीत सिंह की रालोद से गठबंधन किया था। इस गठबंधन से उलटा पार्टी को नुकसान ही हुआ। पार्टी के लिए नेहरू-गांधी परिवार के गढ़ माने जाने वाले अमेठी-रायबरेली में कांग्रेस का प्रदर्शन इस लिहाज से बड़ा झटका है कि पिछले चुनावों में जब मायावती की आंधी चली थी तब भी इस क्षेत्र से पार्टी ने 10 में से 7 सीटों पर जीत हासिल की थी। इस बार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली की पांचों विधानसभा सीटें हारना और राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र में मात्र दो सीटें जीतना तथा सुल्तानपुर जिले में पार्टी का सूपड़ा साफ होना नेहरू-गांधी परिवार की व्यक्तिगत हार है। राहुल गांधी ने दिन-रात एक कर दिया था। उन्होंने उत्तर प्रदेश में लगातार 46 दिन रुककर 211 रैलियां और 18 बड़े रोड शो किए। इस शर्मनाक परिणाम की बेशक राहुल गांधी ने जिम्मेदारी ले ली हो लेकिन कांग्रेस के दूसरे नेता इसे गांधी परिवार की हार मानने को तैयार नहीं हैं। बड़बोले महासचिव दिग्विजय सिंह ने इन नतीजों पर खुशी जताई और कहा कि भ्रष्टाचारी बसपा की हार हुई है। यह बात अलग है कि चुनाव के दौरान कांग्रेस के मुख्य निशाने पर बसपा से ज्यादा सपा थी। जिस इलाहाबाद के पास फूलपुर से पंडित जवाहर लाल नेहरू, रायबरेली से इन्दिरा गांधी, अमेठी से संजय गांधी और राजीव गांधी लोकसभा में पहुंचते रहे वहां से भी पार्टी विफल रही। लगता है कि पार्टी की हिलती चूलों की भनक पार्टी प्रबंधकों को पहले से ही लग गई थी। इसीलिए यहां पर प्रियंका को उतारा लेकिन सोनिया के संसदीय क्षेत्र में पार्टी का खाता तक नहीं खुला। प्रदेश की जनता ने गांधी परिवार के हवाई करिश्में को जिस तरह से नकारा है, उसके केंद्र तक में खासे प्रभाव पड़ेंगे।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Goa, Priyanka Gandhi Vadra, Punjab, Rahul Gandhi, Sonia Gandhi, State Elections, Uttar Pradesh, Uttara Khand, Vir Arjun
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Monday, 20 February 2012
The Angry Young Man of Congress
- Anil Narendra
We have witnessed many faces of the Congress prince Rahul Gandhi during the Assembly election campaign in Uttar Pradesh. We have seen a mild mannered, calm and quite Rahul Gandhi, who had been sharing food with Dalit families and had been sensitive to their sufferings, but today we are witnessing a different bearded face of Rahul Gndhi dramatically tearing off documents on the stage. With the passage of time, the increasing anger of Rahul Gandhi has not only started surfacing, but his aggressive postures have become sharper. Now, he has even started publicly expressing his anger by tearing off papers on the stage. Perhaps he is trying to convey a message to the youth of UP that 'this uncomplaining attitude of yours will not help you, if you want to survive in the present age, make noise so that your voice could be heard'. It is this posture of his, which has earned the status of an angry young man for him in the Congress Party. Besides being 'the prince' of Congress, Rahul is also the only star campaigner for the Congress for the Assembly elections. In fact, this time whole of the Gandhi Family has thrown its weight in UP elections. Sonia Gandhi, Priyanka Gandhi and Robert Wadra, all the three have come out in the open. This is something unprecedented for the Gandhi Family. However, Congress is keeping its fingers crossed and waiting for the Rahul magic to work. That is why, with the completion of election-phases in UP, enthusiasm of the Congress is also increasing. The Congress has, even started claiming that elections in UP have now been restricted to Rahul vs others, that is why leaders of SP, BSP and BJP have started targeting Rahul Gandhi in their speeches. It appears that Prince Rahul has taken a vow to take the Congress to the seat of power in UP single-handedly and when he comes across obstacles on his way, he becomes angry. Meanwhile, he has also learnt the politics of cashing on this anger. So, whenever he exhibits aggressiveness, the audience applauds him. It happened during the election meeting at Lucknow, the other day. With slightly grown beard, Rahul Gandhi took mike in his hand at the election meeting at DAV College courtyard and started speaking like a Bollywood hero. Angry Rahul said that both the SP and BSP have been making empty promises in these years, which have made your condition bad to worse. I have in my hand a list of promises made by SP, which promises of electricity, roads, employment, if they come to power. If they fail to provide employment, they promise unemployment allowance at enhanced rate. This is the list, which the SP provided to the people during last elections. You need employment, not a list of promises. That is why I am tearing this list. Then, like a hero, he tore the paper in his hands into many pieces and threw it in the air. This action by Rahul has created a new controversy. BJP President, Nitin Gadkari said that by doing so, Rahul has exhibited his immaturity. It shows that he is still unaware of political nuances. Best comment came from SP President Akhilesh Yadav, who called Rahul's anger a drama and a stunt. Sometimes, he tears papers and sometimes he asks the audience to leave his meeting. I'm afraid; he may not jump off from the stage one day. What effect the anger of Rahul Gandhi will have, will be known only after the counting of the votes.
Sunday, 19 February 2012
कांग्रेस के नए एंग्री यंग मैन राहुल गांधी
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान हमने कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के कई रूप देख लिए हैं। कहां तो एक शांत-सौम्य चेहरा जो दलितों के घर रोटी-पानी खाकर उनके दर्द को समझने वाला शालीन स्वभाव का था और कहां वह अब दाढ़ी बढ़ाकर फिल्मी अन्दाज में मंच पर कागज फाड़ रहे हैं। वक्त की रफ्तार के साथ राहुल का गुस्सा थोड़ा और बढ़ने के साथ ही न सिर्प दिखने लगा है बल्कि उनके तेवरों की आक्रामकता भी बढ़ गई है। यहां तक कि अब वह मंच से ही कागज फाड़कर गुस्से का सार्वजनिक अहसास भी कराने लगे हैं। शायद वह यूपी के युवाओं को फलसफा देना चाहते हैंö`ये खामोश मिजाजी तुम्हें जीने नहीं देगी, इस दौर में जीना है तो कोहराम मचा दो।' इनके इसी तेवर पर कांग्रेस ने उन्हें `एंग्री यंग मैन' का तमगा पहना दिया है। राहुल कांग्रेस के `युवराज' तो हैं ही साथ-साथ वह कांग्रेस पार्टी के चुनावी अभियान के अकेले सुपर स्टार भी हैं। वैसे इस बार गांधी परिवार ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। श्रीमती सोनिया गांधी, राहुल, प्रियंका व रॉबर्ट वाड्रा सभी इस बार मैदान में आ गए। इतनी ताकत तो गांधी परिवार ने शायद ही पहले कभी झोंकी हो। खैर! कांग्रेस को राहुल के करिश्मे का इंतजार है। यही वजह है कि यूपी में जैसे-जैसे चरणों में चुनाव सम्पन्न हो रहा है, कांग्रेस का उत्साह भी बढ़ता जा रहा है। कांग्रेस तो अब दावा कर रही है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव अब केवल राहुल बनाम अन्य होकर रह गया है, इसलिए सपा, बसपा से लेकर भाजपा तक के नेता अपने भाषणों में केवल राहुल गांधी पर निशाना साध रहे हैं। लगता है कि राहुल बाबा ने तो सपना पाल लिया है कि इस चुनाव में कांग्रेस को अपने दम पर सिंहासन तक पहुंचाएंगे और ऐसे में जब उन्हें ज्यादा भव-बाधाएं दिखाई पड़ती हैं तो उन्हें गुस्सा आ जाता है। अब इस गुस्से को भुनाने की राजनीतिक कला भी उन्होंने सीख ली है। सो, अब वे जब एंग्री युवा लीडर के तेवर दिखाते हैं तो दर्शक खूब तालियां पीटते हैं। कुछ ऐसा ही उस दिन लखनऊ की एक चुनावी सभा में हुआ। डीएवी कॉलेज के प्रांगण में एक चुनावी सभा में, हल्की दाढ़ी उगाए राहुल गांधी ने माइक थामा। इसके बाद वे किसी बॉलीवुड नायक की तरह बोल पड़े। चेहरे पर गुस्से के भाव लेकर वे बोले कि सपा और बसपा ने सालों से केवल वादे किए हैं। हकीकत में कुछ नहीं किया। इसी के चलते आपके हाल बदतर हुए हैं। मेरे हाथ में सपा की चुनावी लिस्ट है। यही कि चुनाव जीते, तो सड़कें देंगे, बिजली देंगे, रोजगार देंगे। यदि रोजगार नहीं दे पाए तो बढ़ा हुआ बेरोजगारी भत्ता देंगे। यह वही लिस्ट है, जो पिछले चुनाव में भी सपा ने आम लोगों को दी थी। आम लोगों को काम चाहिए वादों की लिस्ट नहीं। ऐसे में सपा की यह लिस्ट फाड़ रहा हूं। यह कहकर उन्होंने हीरोगीरी के अन्दाज में हाथ में लिया कागज फाड़कर नीचे फेंक दिया। राहुल के इस एक्शन पर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा कि ऐसा करके राहुल ने अपना बचपना दिखाया है। लगता यही है कि उन्हें अभी राजनीति की समझ नहीं है। सबसे अच्छा कमेंट सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का था। अखिलेश ने कहा राहुल का गुस्सा नाटक है और स्टंट है। कभी पर्चा फाड़ते हैं तो कभी श्रोताओं को अपनी सभा से चले जाने को कहते हैं। कहीं ऐसा न हो कि किसी दिन वह मंच से ही कूद जाएं। राहुल गांधी के यह तेवर क्या रंग खिलाते हैं, इसका तो मतों की गिनती पर ही पता चलेगा।
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Saturday, 4 February 2012
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को सुनाए दूरगामी महत्वपूर्ण फैसले
यकीनन बृहस्पतिवार का दिन सुप्रीम कोर्ट के लिए बहुत महत्वपूर्ण दिन था। अदालत को तीन अहम मुद्दों पर अपना फैसला देना था। तीनों ही बहुत महत्वपूर्ण थे जिनके दूरगामी असर होने हैं। बृहस्पतिवार को सबसे महत्व फैसला 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले का था। इस पर देश और दुनिया की निगाहें टिकी थीं। इस घोटाले में गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की कथित भूमिका की सीबीआई जांच, दूरसंचार कम्पनियों के लाइसेंस निरस्त करने और 2जी मामले की निगरानी के लिए एसआईटी गठित करने की मांग पर फैसला आना था। इन सबको छोड़कर एक और महत्वपूर्ण घटना थी उस जज के रिटायर होने का आखिरी दिन जिन्होंने 15 महीनों में सुप्रीम कोर्ट की उस बैंच की शोभा बढ़ाई जिसने हर उस रसूखदार को जेल की हवा खिलाई जिसके बारे में आम आदमी सोच भी नहीं सकता था। मैं बात कर रहा हूं जस्टिस एके गांगुली की जिनका अपने कार्यकाल का अंतिम दिन था बृहस्पतिवार। जस्टिस गांगुली की बेबाक टिप्पणियां इतिहास में दर्ज हो गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तीनों मुद्दों पर अपना फैसला सुना दिया। पहला, कम्पनियों के 122 लाइसेंस रद्द करना और सात कम्पनियों पर भारी जुर्माना। दूसरा, चिदम्बरम के मामले में फैसला निचली अदालत पर छोड़ना और तीसरा सीबीआई जांच की निगरानी का काम सीवीसी की देखरेख में करना। तीनों फैसलों के दूरगामी असर होना लाजिमी है। शीर्ष अदालत ने तीन कम्पनियों पर पांच-पांच करोड़ रुपये का जुर्माना ठोंका है और चार कम्पनियों पर 50-50 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। अदालत ने यह भी कहा है कि यदि सरकार की नीति जनहित के खिलाफ है तो अदालत कर सकती है अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग। कोर्ट के इस फैसले का मतलब है कि तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा के समय में लाइसेंस हासिल करने वाली कम्पनियां प्रभावित होंगी। कोर्ट ने कहा कि 10 जनवरी 2008 को लाइसेंस मनमाने और असंवैधानिक तरीके से जारी किए गए थे जिन्हें जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती। वहीं शीर्ष अदालत ने पी. चिदम्बरम की कथित भूमिका की जांच की मांग पर निर्णय निचली अदालत पर छोड़ दिया। पटियाला हाउस स्थित विशेष अदालत को दो हफ्ते में फैसला सुनाने को कहा गया है। सम्भव है कि विशेष अदालत अपना फैसला शनिवार, चार फरवरी को ही सुना दे। शीर्ष अदालत ने टेलीकॉम नियामक `ट्राई' को निर्देश दिया है कि वह दो माह में 2जी लाइसेंस आवंटन के लिए नई सिफारिशें दे। जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस एके गांगुली की पीठ ने सरकार से ट्राई की सिफारिशों पर एक माह के अन्दर अमल करने को कहा है। फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए याचिकाकर्ता जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा कि यह सरकार की सामूहिक विफलता है। उसने चेतावनियों की अनदेखी की। भाजपा नेता अरुण जेटली का कहना है कि यह एक व्यक्ति का नहीं बल्कि यूपीए सरकार का निर्णय था। ट्राई के अध्यक्ष जेएस शर्मा ने कहा कि इस फैसले से पांच फीसदी उपभोक्ताओं पर असर पड़ेगा यानि मोबाइल कॉलें अब महंगी हो जाएंगी। यह फैसला ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। निश्चित रूप से विपक्ष इसे भुनाने का प्रयास करेगा और उसे एक ऐसा नया मुद्दा मिल गया है जिससे यूपीए सरकार की फजीहत बढ़ जाएगी। चूंकि यह दूरगामी फैसले हैं, इनके प्रभाव को समझने में भी टाइम लगेगा पर इस फैसले से उद्योग जगत में भूचाल आ गया है। उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी कि इतनी प्रभावशाली औद्योगिक कम्पनियों को यह दिन भी देखना पड़ेगा। इस बीच एक टीवी चैनल के साथ बातचीत में डॉ. स्वामी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर गम्भीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि 2जी मामले में 60 फीसदी रकम सोनिया गांधी ने ली है और इसका सुबूत उनके पास है। अब सबकी नजरें चार फरवरी को पटियाला हाउस स्थित विशेष अदालत पर टिकी हुई हैं जिसने पी. चिदम्बरम के भाग्य का निर्णय सुनाना है। चिदम्बरम की निजी सियासत इस फैसले पर टिकी है। कुछ हद तक यूपीए सरकार का भी भविष्य इस पर टिका है। अगर चिदम्बरम पर केस चलता है तो निश्चित रूप से इसका प्रभाव मनमोहन सरकार पर जरूर पड़ेगा। देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों से सरकार कैसे लड़ती है?
2G, A Raja, Anil Narendra, Daily Pratap, P. Chidambaram, Sonia Gandhi, Subramaniam Swamy, Supreme Court, Vir Arjun
2G, A Raja, Anil Narendra, Daily Pratap, P. Chidambaram, Sonia Gandhi, Subramaniam Swamy, Supreme Court, Vir Arjun
Saturday, 21 January 2012
सोनिया, राहुल के बाद अब पियंका भी उतरीं मैदान में
कांग्रेस के युवा महासचिव और युवा सम्राट राहुल गांधी ने उत्तर पदेश विधानसभा चुनाव में दिन-रात एक कर दी है। अपने मिशन 2012 को पूरा करने के लिए क्या कुछ नहीं कर रहे राहुल। आजकल वह बुंदेलखंड के दौरे पर हैं। दुख यह है कि उनकी मीटिंगों में भीड़ कम आ रही है। पूर्वांचल के मुकाबले बुंदेलखंड में भीड़ का आमाद कांग्रेस के लिए चिंता का सबब है। भारी संख्या में पड़ी खाली कुर्सियों को देख कांग्रेस आलाकमान इसलिए भी चिंतित है क्योंकि न केवल भीड़ कम आ रही है बल्कि राहुल को कई जगह विरोध भी झेलना पड़ा। पिछले दिनों राहुल पूर्वी उत्तर पदेश के दौरे पर थे। गोरखपुर, आजमगढ़, मऊ और बलिया में उतनी भीड़ नहीं जुटी जितनी की उम्मीद की जा रही थी। यूपी में कांग्रेस का सारा दारोमदार सोनिया गांधी परिवार पर टिका हुआ है। इसीलिए तमाम कांग्रेसी दिग्गज अपने परिवार की साख बचाने के लिए गांधी परिवार की पतिष्ठा को आगे करने की कोशिश में हैं। जमीनी सच्चाई का हवाला देकर राहुल गांधी से जातिवादी और धार्मिक आधार पर बयानबाजी करवा चुके ये नेता अब इसी उत्तर पदेश के चुनाव में अपना हुकुम का इक्का चलाने के लिए मैदान बनाने में जुट गए हैं। यह हुकुम का इक्का है पियंका गांधी वाढरा। पियंका पर अमेठी व रायबरेली के बाहर भी हर हाल में रैली कराने के लिए सभी दिग्गज नेता और केन्द्राrय मंत्रियों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। दरअसल उत्तर पदेश के सभी कांग्रेसी नेता यह मान रहे हैं कि एक-दो फीसदी मत भी अगर कांग्रेस के पक्ष में पलट जाए तो नतीजे पूरी तरह बदले हुए होंगे। उनका यह भी मानना है कि वोटों का इतना पतिशत पलटने में पियंका पूरी तरह सक्षम हैं। पियंका गांधी वाढरा का सबसे बड़ा आकर्षण उनका व्यक्तित्व स्वर्गीय इंदिरा गांधी जैसा होना है। चुनाव पचार के दौरान जब वह बात करते हुए मुस्कुराती हैं तो पास खड़ी औरतें कहती हैं, बिटिया ऐसे ही मुस्कुराती रहना, मुस्कान तुम पर अच्छी लगती है। यह मुस्कुराहट ही पियंका को अपनी दादी इंदिरा की सबसे करीबी झलक देती है। लोग उनमें बहुत कुछ इंदिरा गांधी जैसा पाते हैं। चेहरे की बनावट, वैसे ही नाक और पावर ड्रेसिंग का स्टाइल। इंदिरा जी की पुरानी तस्वीरें पियंका के आज के दिनों की याद कराती नजर आती हैं। अगर कुछ अलग है तो वह इस मुस्कुराहट में गाल पर पड़ने वाला डिम्पल। बॉलीवुड के बड़े सितारे जॉन इब्राहिम पियंका को देश की सबसे खूबसूरत महिला बताते हैं। पार्टी पचार में जब पियंका उतरती हैं तो सबसे पहले अपनी दादी की याद कराती हैं। इंदिरा की तरह ही वह लोगों के साथ घुलमिल जाती हैं। जब वह किसी सभा में आ रही होती हैं तो वहां बैठी जनता कहती है देखो इंदिरा जी आ रही हैं। पियंका ने पता नहीं अनजाने में या सोची समझी रणनीति के तहत अपने बालों का स्टाइल भी दादी इंदिरा गांधी की तरह रखा हुआ है। राहुल और पियंका दोनों को देखने भीड़ आती है पर सवाल यह है कि क्या जो लोग सभा में आते हैं वह कांग्रेस के वोटर हैं? राहुल की कोशिशों से यूपी में कांग्रेस की स्थिति पहले से अच्छी हुई है। अब पियंका के आने से यह और अच्छी होने की कई कांग्रेसी उम्मीद लगाए बैठे हैं। कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत चुनाव में झोंक दी है। सोनिया गांधी, राहुल और अब पियंका। देखें इनका मतदाताओं पर क्या असर पड़ता है?
Anil Narendra, Congress, Priyanka Gandhi Vadra, Rahul Gandhi, Sonia Gandhi, Uttar Pradesh, Uttara Khand
Tuesday, 27 December 2011
तो बिछ गई है पांच राज्यों में चुनावी बिसात
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 27th December 2011
अनिल नरेन्द्र
देश की भावी रणनीति तय करने वाले उत्तर पदेश समेत पांच राज्यों में बिछ गई है चुनाव की बिसात। शनिवार को चुनाव आयोग ने पांचों राज्यों में विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा कर दी। उत्तर पदेश में 5 चरणों में चुनाव होंगे। यहां चार फरवरी, आठ फरवरी, 11 फरवरी, 15 फरवरी, 19 फरवरी, 23 फरवरी और 28 फरवरी को मतदान होगा। जबकि उत्तराखंड और पंजाब में एक ही चरण में 30 जनवरी को मतदान होगा। गोवा में तीन मार्च और मणिपुर में 28 जनवरी को मतदान कराया जाएगा। पाचों राज्यों के चुनावों की मतगणना एक ही दिन चार मार्च को होगी। चुनाव आयोग द्वारा तय की गई पांच राज्यों की चुनावों की तारीखों से कांग्रेस पार्टी तो खुश होगी। उसे केन्द्र सरकार द्वारा घोषित हालिया जन लुभावन योजनाओं का लाभ मिलने की उम्मीद है और जाड़े का मौसम होने के चलते साग-सब्जी तथा दूसरी खाद्य वस्तुओं के दाम कम हो जाने का फायदा भी उसे दिख रहा है। मणिपुर और गोवा जैसे छोटे राज्यों में उसे सत्ता विरोधी जनमत का सामना करना है। वहीं पंजाब और उत्तराखंड में वह सत्ताधारी दलों की अकेली विकल्प है। यानि सत्ता विरोधी मतों का उसे सीधा लाभ मिलेगा। यदि मणिपुर और गोवा में सरकार में होने का उसे नुकसान होता है तो उसकी कुछ हद तक भरपाई वह पंजाब और उत्तराखंड में कर सकती है। मणिपुर और गोवा के मुकाबले में दोनों राज्य ज्यादा सियासी महत्व नहीं रखते। कांग्रेस अध्यक्ष तो यहां तक कह चुकी हैं कि पंजाब और उत्तराखंड में उनकी पार्टी सत्ता बदलेगी। असल सवाल तो उत्तर पदेश का है। उत्तर पदेश में किसी तरह अपनी खोई जमीन को वापस पाने की कवायद में जुटे दोनों पमुख राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा की चुनावी तैयारियां बाकी राज्यों में पिछड़ सी गई हैं। खासतौर से पंजाब और उत्तराखंड में जहां दोनों दलों का सीधा मुकाबला है पर यहां दोनों दल ही अभी तक अपने उम्मीदवारों का चयन तक नहीं कर सके। दरअसल, चुनावी कैलेंडर के लिहाज से पंजाब और उत्तराखंड में पहले चुनाव होने थे, लेकिन सभी ने भांप लिया था कि उत्तर पदेश में भी समय से पहले चुनाव हो सकते हैं। यही कारण है कि राज्य के दो पमुख दल बसपा और सपा हैं या फिर भाजपा और कांग्रेस सभी ने अपनी पूरी ताकत उत्तर पदेश में झोंक दी थी। रोड शो से लेकर रैलियां, आरोप-पतिआरोप, दावों और राज्य की बसपा व केन्द्र की कांग्रेस सरकार के बीच लोक-लुभावन घोषणाओं की जंग करीब तीन महीने पहले से ही छिड़ गई थी। उत्तर पदेश में 28 फरवरी तक चलने वाले चुनाव का असर केन्द्राrय बजट के कार्यकमों में भी पड़ सकता है। दरअसल गोवा चुनाव के कारण 3 मार्च तक लागू आचार संहिता के बीच ही बजट सत्र भी होगा और 29 फरवरी तक दोनों रेल व आम बजट पेश करने की बाध्यता भी होगी। लिहाजा केन्द्र को आचार संहिता की आंच से बचने के लिए सीमित रास्तों को तलाशना होगा जिसमें संबंधित राज्यों के लिए घोषणाएं टालने या विशेष परिस्थितियों में रेल और आम बजट पेश करने का समय या तिथि बदलने की उम्मीद को भी नकारा नहीं जा सकता। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने राज्य में चुनाव की तिथियों में परिवर्तन करने की मांग की है। उनका कहना है कि जनवरी में उत्तराखंड में कड़ाके की ठंड होती है और दूसरा 30 जनवरी को शहीद दिवस होता है। इस दिन चुनाव करवाना ठीक नहीं है। उत्तराखंड में 30 जनवरी को ही मतदान है जबकि वहां की विधानसभा का कार्यकाल 12 मार्च तक का है। उत्तर पदेश की मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 20 मई 2012, पंजाब विधानसभा का 14 मार्च, उत्तराखंड का 12 मार्च, मणिपुर का 15 मार्च और गोवा विधानसभा का 14 जून तक है। सामान्य तौर पर उत्तराखंड के चुनाव फरवरी और मार्च के पहले हफ्ते सम्पन्न कराए जाते हैं लेकिन इस बार जनवरी में ही कराए जा रहे हैं। कांग्रेस की सारी जान यूपी में टिकी हुई है। पार्टी के दोनों शीर्ष नेता सोनिया व राहुल इसी सूबे से सांसद हैं। राहुल गांधी जमकर मेहनत कर रहे हैं। पश्चिमी उत्तर पदेश में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए पार्टी ने रालोद से भी हाथ मिलाया है। मुस्लिम वोटों को घेरने के लिए पार्टी ने साढ़े चार फीसदी आरक्षण का कार्ड खेला है। पिछली बार कांग्रेस को 12 फीसदी मुसलमानों ने वोट दिया था इस बार उसे यह आंकड़ा बढ़ने की उम्मीद है। बुनकरों के लिए मोटा आर्थिक पैकेज, किसानों के लिए दो बड़ी सिंचाई योजनाओं की घोषणा केन्द्र सरकार कर चुकी है। उसका लाभ भी उसे मिलने की उम्मीद है। ऐसे में उसे अगड़ी जातियों, खासकर ब्राह्मणों को बसपा से तोड़ने में सफलता मिलने की उम्मीद पार्टी को है। पार्टी के दोनों पदेश अध्यक्ष तथा विधानमंडल दल के नेता ब्राह्मण हैं, रीता बहुगुणा जोशी और पमोद तिवारी जबकि ठाकुर नेता के रूप में पदेश पभारी हैं दिग्विजय सिंह। कांग्रेस को एक वर्ग की मुराद कि चुनाव जल्दी हो चुनाव आयोग ने पूरी कर दी है।
हर सत्तारूढ़ पार्टी को एंटी एनकंवैंसी फैक्टर के भूत से निपटना होता है। कुछ हद तक बहुजन समाज पार्टी को भी इसका नुकसान हो सकता है। बहनजी द्वारा काफी सिटिंग एमएलए के टिकट काटने से पार्टी में विद्रोह की स्थिति बनी हुई है। बसपा का मूल आधार गरीब और कमजोर दलित वर्ग है। भ्रष्टाचार, पार्प, मूर्तियां बनाना भी पार्टी के खिलाफ चुनावी मुद्दे होंगे। सपा सुपीमो मुलायम सिंह यादव की पार्टी पहले से बेहतर हुई है। उनके युवा बेटे ने एक युवा नेता के तौर पर अपनी यात्राओं से पार्टी के लिए अच्छा माहौल बनाया है, उन्होंने अपनी धाक जमाई है। मुसलमान वोटों पर अब भी मुलायम सिंह की पकड़ बरकरार है। राजपूत भी उनके साथ हैं। बसपा का मुकाबला मुलायम ही कर सकते हैं ऐसी हवा बनाकर सपा को फायदा मिलने की उम्मीद है। मुलायम की मिलनसार छवि पतिद्वंद्वियों पर भारी पड़ सकती है पर उनका इतिहास उनके खिलाफ जरूर रहेगा। पार्टी थाने चलाती है, यह छवि टूट नहीं पाई है। मुसलमान वोटों का बंटवारा तय है। कांग्रेस, बसपा में यह वोट बटेगा, मुलायम यह नहीं मान कर चल सकते कि मुस्लिम वोट एक ब्लाक उन्हें पड़ेगा। रही बात भाजपा की पार्टी को उम्मीद है कि मुस्लिमों को आरक्षण का मुद्दा उसके हक में जाएगा। सवर्ण वोट का धुवीकरण होगा। अन्ना हजारे के आंदोलन का सबसे ज्यादा फायदा उसें ही मिलने का चांस है। राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र और आडवाणी की यात्राओं से सरकार विरोधी माहौल जो बना है, भाजपा को उम्मीद है कि चुनाव में पार्टी को इसका फायदा मिलेगा पर राज्य में स्थानीय नेताओं के आपसी संघर्ष पार्टी को भारी पड़ सकता है। कुल मिलाकर अब जब मतदान की तिथि की घोषणा हो चुकी है तो सभी राज्यों में सियासत तेज होगी। कांग्रेस के लिए जहां उत्तर पदेश सबसे बड़ी चुनौती होगी वहीं भारतीय जनता पार्टी के लिए पंजाब व उत्तराखंड में अपनी सरकारों को पुन जिताना जरूरी होगा। वैसे उत्तराखंड में आज तक कोई सत्तारूढ़ पार्टी फिर से अगली बार नहीं जीती। क्या पता इस बार यह इतिहास भुवनचन्द्र खंडूरी बदल दें।
हर सत्तारूढ़ पार्टी को एंटी एनकंवैंसी फैक्टर के भूत से निपटना होता है। कुछ हद तक बहुजन समाज पार्टी को भी इसका नुकसान हो सकता है। बहनजी द्वारा काफी सिटिंग एमएलए के टिकट काटने से पार्टी में विद्रोह की स्थिति बनी हुई है। बसपा का मूल आधार गरीब और कमजोर दलित वर्ग है। भ्रष्टाचार, पार्प, मूर्तियां बनाना भी पार्टी के खिलाफ चुनावी मुद्दे होंगे। सपा सुपीमो मुलायम सिंह यादव की पार्टी पहले से बेहतर हुई है। उनके युवा बेटे ने एक युवा नेता के तौर पर अपनी यात्राओं से पार्टी के लिए अच्छा माहौल बनाया है, उन्होंने अपनी धाक जमाई है। मुसलमान वोटों पर अब भी मुलायम सिंह की पकड़ बरकरार है। राजपूत भी उनके साथ हैं। बसपा का मुकाबला मुलायम ही कर सकते हैं ऐसी हवा बनाकर सपा को फायदा मिलने की उम्मीद है। मुलायम की मिलनसार छवि पतिद्वंद्वियों पर भारी पड़ सकती है पर उनका इतिहास उनके खिलाफ जरूर रहेगा। पार्टी थाने चलाती है, यह छवि टूट नहीं पाई है। मुसलमान वोटों का बंटवारा तय है। कांग्रेस, बसपा में यह वोट बटेगा, मुलायम यह नहीं मान कर चल सकते कि मुस्लिम वोट एक ब्लाक उन्हें पड़ेगा। रही बात भाजपा की पार्टी को उम्मीद है कि मुस्लिमों को आरक्षण का मुद्दा उसके हक में जाएगा। सवर्ण वोट का धुवीकरण होगा। अन्ना हजारे के आंदोलन का सबसे ज्यादा फायदा उसें ही मिलने का चांस है। राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र और आडवाणी की यात्राओं से सरकार विरोधी माहौल जो बना है, भाजपा को उम्मीद है कि चुनाव में पार्टी को इसका फायदा मिलेगा पर राज्य में स्थानीय नेताओं के आपसी संघर्ष पार्टी को भारी पड़ सकता है। कुल मिलाकर अब जब मतदान की तिथि की घोषणा हो चुकी है तो सभी राज्यों में सियासत तेज होगी। कांग्रेस के लिए जहां उत्तर पदेश सबसे बड़ी चुनौती होगी वहीं भारतीय जनता पार्टी के लिए पंजाब व उत्तराखंड में अपनी सरकारों को पुन जिताना जरूरी होगा। वैसे उत्तराखंड में आज तक कोई सत्तारूढ़ पार्टी फिर से अगली बार नहीं जीती। क्या पता इस बार यह इतिहास भुवनचन्द्र खंडूरी बदल दें।
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Thursday, 22 December 2011
लोकपाल बिल पर टकराव की पूरी सम्भावना है
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 23rd December 2011
अनिल नरेन्द्र
सरकार और अन्ना हजारे का टकराव अब होना सम्भावित लग रहा है। सरकार ने साफ कर दिया है कि न तो उसे टीम अन्ना से कोई डर है और न ही अब वह उसके सामने झुकने को तैयार है। वह टीम अन्ना से लम्बी लड़ाई लड़ने को तैयार है। अब तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी मैदान में आ गई हैं और उन्होंने कमान सम्भाल ली है। सोनिया गांधी न लोकपाल को आधार बनाते हुए अन्ना हजारे और विपक्षी दलों को सीधी चुनौती दे दी है। सरकारी लोकपाल बिल का समर्थन करते हुए उन्होंने बुधवार को कहा कि इसे अब अन्ना और विपक्ष को स्वीकार कर लेना चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं करते तो कांग्रेस पांच राज्यों के आगामी चुनाव में इन दोनों चुनौतियों से निपटने तथा लम्बी लड़ाई लड़ने को तैयार है। बुधवार को कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में आक्रामक तेवर दिखाते हुए सोनिया ने पहली बार लोकपाल पर अपने विचार रखे। सरकार और संगठन के बीच किसी भी मतभेद को दरकिनार करते हुए सोनिया गांधी ने कहा कि यह बिल बहुत अच्छा बना है और इसे पारित कराने में विपक्ष को अड़चन पैदा नहीं करनी चाहिए और अन्ना हजारे को भी इसे स्वीकार कर लेना चाहिए पर अन्ना हजारे को वर्तमान स्वरूप में लोकपाल बिल स्वीकार्य नहीं है। सबसे बड़ा मतभेद सीबीआई और ग्रुप सी की ब्यूरोकेसी को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने को है। अन्ना ने अपना अभियान तेज करते हुए कहा कि सीबीआई को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने के पीछे सरकार की मंशा नेताओं को बचाने की है। यदि सीबीआई (लोकपाल से) बाहर रहेगा तो लोकपाल कैसे मजबूत होगा? यदि सीबीआई लोकपाल के आधीन आ जाती है तो (गृहमंत्री) पी. चिदम्बरम जेल के अन्दर होंगे। आप भ्रष्ट नेताओं को बचा रहे हैं और कह रहे हैं कि यह मजबूत लोकपाल है। उन्होंने कहा कि यह सरकार लोगों को धोखा दे रही है। जनता उसे सबक सिखा देगी। उन्होंने कहा कि अगले साल उत्तर प्रदेश और जिन चार अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं वहां संप्रग के खिलाफ अभियान चलाएंगे। विधेयक को खारिज करते हुए अन्ना ने कहा कि अलग से सिटीजन चार्टर विधेयक लाने के लिए भी सरकार ने जनता के हितों को नजरंदाज किया है। आम आदमी को अपनी शिकायत के निवारण के लिए प्रस्तावित तंत्र के तहत बेमतलब यहां से वहां दौड़ना पड़ेगा। यह लोगों से धोखा है। उधर सरकार ने मंगलवार को भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए अपनी रणनीति के तहत लोकसभा में सिटीजन चार्टर बिल पेश कर दिया। विधेयक में हर नागरिक को समयबद्ध तरीके से सामान और सेवाओं की उपलब्धता के साथ-साथ शिकायतों के निवारण का अधिकार दिया गया है यानि सरकारी महकमों में कौन-से काम कितने दिनों में होंगे। इसके लिए कौन जिम्मेदार है, यह पहले से बताना होगा। ऐसा न होने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ शिकायत की जा सकेगी। हमें नहीं लगता कि लोकसभा में इसी सत्र में यह बिल पास हो सकेगा? क्रिसमस की छुट्टी के बाद सदन की कार्यवाही 27, 28 और 29 दिसम्बर तक बढ़ाने को लेकर सांसदों में भारी विरोध है। क्रिसमस के बाद सदन चलाने को लेकर खासतौर से केरल और अरुणाचल प्रदेश के सांसदों का विरोध इसलिए है कि उन्होंने पहले से ही साल के अन्त में परिवार के साथ छुट्टियां मनाने का प्रोग्राम बना रखा है। उनमें से कई विदेश भी जाना चाह रहे हैं। उधर भाजपा सहित अन्य विपक्षी दलों का भी सरकारी लोकपाल बिल पर स्टैंड स्पष्ट नहीं। लोकपाल के कई प्रावधानों पर अब भी सहमति नहीं है। सरकारी प्रवक्ता कह रहे हैं कि सिर्प दो दिन में ही लोकपाल पारित हो सकता है बशर्ते विपक्ष साथ दे और पारित कराने में सहयोग दे। लेकिन सरकारी मसौदा देखने से पहले विपक्ष खासतौर से भाजपा कोई भी आश्वासन देने को तैयार नहीं था। दूसरे विपक्षी दल भी तेवर बनाए हुए हैं। ऐसे में 23 दिसम्बर तक विस्तृत चर्चा के बाद लोकपाल पारित कराना सम्भव नहीं लगता। अगर संसद में विधेयक को लेकर आम सहमति न बनी तो आगे क्या होगा? सम्भव है कि विधेयक को सिलैक्ट कमेटी को सौंप दिया जाए। इससे सभी पक्षों का स्टैंड बरकरार रहेगा।
Anil Narendra, Anna Hazare, BJP, CBI, Daily Pratap, Lokpal Bill, P. Chidambaram, Sonia Gandhi, Vir Arjun
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सोनिया गांधी का ड्रीम पोजेक्ट खाद्य सुरक्षा विधेयक
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का एक ड्रीम पोजेक्ट हकीकत होने जा रहा है। सोनिया गांधी के वीटो से खाद्य सुरक्षा विधेयक को केन्द्राrय मंत्रिमंडल ने मंजूर कर लिया है। पधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई केन्द्राrय मंत्रिमंडल की बैठक में इस विधेयक पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई। इस विधेयक को लेकर पूरी सरकार पर इतना ज्यादा दबाव था कि बैठक में इस पर तुरत-फुरत सहमति की मुहर लग गई। खाद्य मंत्री शरद पवार एवं दूसरे सहयोगी दलों की चिंताओं को भी संपग अध्यक्ष का `ड्रीम' बताते हुए इसे अब न रोकने के लिए मनमोहन सिंह ने सभी सहयोगियों को मना लिया। हम सोनिया जी की भावना की कद्र करते हैं। देश में लगभग 47 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं और हर साल हजारों लोगों की मौत कुपोषण और भुखमरी की वजह से होती है। पिछले दिनों आई संयुक्त राष्ट्र की मानवविकास रिपोर्ट बताती है कि भारत में पति व्यक्ति आय तो बढ़ी है मगर इसी के साथ भूखे लोगों की तादाद भी बढ़ी है। इस गम्भीर समस्या के मद्देनजर अगर सरकार ने देश के लगभग 63.5 फीसदी आबादी यानि गांव और शहर के लगभग 80 करोड़ गरीब लोगों को भोजन का बुनियादी अधिकार दिलाने वाला कानून बनाने की दिशा में पहल करते हुए बहुपतिष्ठित खाद्य सुरक्षा विधेयक को मंजूरी दी है तो इसका एक लोक कल्याणकारी कदम माना जाएगा और इसका इस हद तक स्वागत किया जाना चाहिए। परन्तु नेक इरादे रखना और उन्हें हकीकत में बदलना आसान नहीं होता। पहली बात तो यह है कि इतना रुपया आएगा कहां से? इस कानून को लागू करने में सरकार पर पहले साल 95,000 करोड़ रुपए की सब्सिडी का बोझ आएगा। यह तीसरे साल तक 1.50 लाख करोड़ हो जाएगा। वर्तमान में सरकार 31,000 करोड़ रुपए खाद्य सब्सिडी पर खर्च कर रही है। इसके अतिरिक्त तीसरे साल देश के कृषि उत्पादों के भंडारण के लिए गोदाम बनाने के लिए 50,000 करोड़ रुपए की अतिरिक्त राशि की आवश्यकता होगी। हमारी मौजूदा व्यवस्था में हमारे पास इतने गोदाम नहीं कि गेंहू और सब्जियों के भंडारों को सुरक्षित रखा जाए। किसान अपनी फसलें नष्ट करने के लिए मजबूर हैं। वैसे भी ग्रामीण आंचल में हर व्यक्ति को दो वक्त की रोटी तो मिल ही जाती है। एक हकीकत हमारे देश की यह भी है कि सरकार द्वारा चलाई जा रही कोई भी योजना का लाभ उस उपभोक्ता को नहीं पहुंचता जिसके लिए यह लागू की गई है। ध्वस्त राशन पणाली पर खाद्य सुरक्षा विधेयक का बोझ डालने का कहीं यह मतलब न निकले कि खाद्य सब्सिडी में लूट दोगुनी हो जाए? सरकार इसी बीमार राशन पणाली व पब्लिक डिस्ट्रीव्यूशन के भरोसे देश की तीन चौथाई जनता को रियायती मूल्य पर अनाज बांटने की योजना इतनी आसान नहीं होगी। अनाज की यह लूट भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के गोदामों से लेकर राशन के दुकानदारों तक होती है। राशन पणाली में फिलहाल 35 करोड़ लोगों को सस्ता खाद्यान्न वितरित किया जाता है (?) पस्तावित विधेयक में जब 80 करोड़ लोगों को राशन देने का पावधान है। जाहिर है कि मौजूदा राशन पणाली के लिए यह बड़ा बोझ होगा। इसके बावजूद सरकार ने राशन पणाली में मामूली सुधार करने का बहुत जोर कभी नहीं दिया गया। जब तक सार्वजनिक वितरण पणाली को चुस्त-दुरुस्त नहीं किया जाता हमें नहीं लगता कि सोनिया जी अपने मकसद में कामयाब हो सकेंगी। यह कम आश्चर्य की बात नहीं कि जब सरकार, विपक्ष और टीम अन्ना के बीच लोकपाल विधेयक को लेकर होने वाली खींचतान के शोर शराबे में देश डूबा था तब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने `खाद्य सुरक्षा विधेयक' को लेकर सबसे ज्यादा गम्भीर थीं। क्या यह इसलिए लाया गया ताकि लोकपाल से बड़ी लकीर खींची जा सके या फिर इसलिए लाया गया कि उत्तर पदेश के सियासी दंगल में राहुल को खाद्य सुरक्षा विधेयक का अस्त्र मुहैया कराया जाए ताकि आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी को इसका सियासी लाभ मिल सके?
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Food Security Bill, Manmohan Singh, Sonia Gandhi, Vir Arjun
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Saturday, 17 December 2011
क्या लोकपाल पर सरकार और अन्ना का टकराव टलेगा?
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 17th December 2011
अनिल नरेन्द्र
लोकपाल को लेकर स्थिति असमंजस की बनी हुई है। लोकपाल बिल क्या इस सत्र में आएगा, नहीं आएगा, आएगा तो कब और किस स्वरूप में? यह हैं प्रश्न जिनका आज दावे से उत्तर नहीं दिया जा सकता। बुधवार को सरकार की तरफ से सर्वसम्मति बनाने का प्रयास विफल हो गया। बुधवार को प्रधानमंत्री निवास पर तीन घंटे चली सर्वदलीय बैठक बेनतीजा रही। इस बैठक में सरकार ने सभी दलों की राय तो ली पर अपने पत्ते नहीं खोले। फिर चाहे प्रधानमंत्री का मसला हो या सीबीआई और ग्रुप सी को लोकपाल के दायरे में लाने का। ऐसे में कोई सर्वमान्य फार्मूला नहीं निकला। अब मामला फिर सरकारी पाले में आ गया है। सरकार की मुसीबतें काफी बढ़ गई हैं। असहमतियों की लम्बी लिस्ट के बीच से ही बिल का मसौदा तैयार करना होगा। सूत्रों के मुताबिक मौजूदा सत्र में बिल के पास होने की संभावना मुश्किल दिखती है। संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल ने कहा कि दलों की अलग-अलग राय से मसौदे में बदलाव करना होगा। इससे सरकार के पास काम बढ़ गया है, फिर भी उसे भरोसा है कि वह मौजूदा सत्र में बिल पास कर देगी। सूत्रों के अनुसार कुछ शर्तों के साथ पीएम को लोकपाल में शामिल कर सकती है। सरकार लोअर ब्यूरोकेसी पर मतभेदों को लेकर सरकार लोकपाल के दायरे में रखे जाने और इसके लिए एक जरूरी सटीक मैकेनिज्म बनाने पर विचार कर रही है। सीबीआई पर कोई सहमति बनना मुश्किल है। रविवार को रूस से लौटकर प्रधानमंत्री कैबिनेट मीटिंग करेंगे जिसमें लोकपाल बिल को संशोधित मसौदे को मंजूरी दी जा सकती है। सोमवार को सभी पार्टियों के सांसदों के बीच इस बिल के मसौदे की कॉपी दी जा सकती है। इसके अगले दिन मंगलवार को इसे संसद के पटल पर रखा जा सकता है। संसद का सत्र गुरुवार को खत्म होने वाला है। जरूरत पड़ने पर सत्र को एक दिन के लिए बढ़ाया जा सकता है। दूसरी ओर सरकार के मसौदे से असंतुष्ट अन्ना हजारे ने कहा कि इस बार वे अनशन पर नहीं बैठ रहे बल्कि सीधे कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के खिलाफ सड़कों पर उतरेंगे। अगर सख्त लोकपाल नहीं आया तो एक जनवरी से संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके पुत्र एवं कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के घर के सामने खुद धरना भी देंगे। अन्ना ने गुरुवार को कहा कि उन्हें उम्मीद है कि सरकार संसद के इसी सत्र में सख्त प्रावधानों वाला लोकपाल बिल पेश करेगी। उन्होंने कहा कि अगर सरकार ऐसा करती है तो वो खुद उसका आभार जताएंगे। सरकार के शीर्ष लोगों को गुलाब पेश करेंगे। साथ ही उन्होंने संप्रग को चेतावनी भी दे डाली, कहा कि सख्त लोकपाल बिल नहीं आया तो इस बार सिर्प रामलीला मैदान या आजाद मैदान तक सीमित नहीं रहेगा। 27 दिसम्बर से शुरू होने वाले अनशन के अलावा एक जनवरी से जेल भरो आंदोलन भी चलाया जाएगा। लोकपाल का विरोध करने वाले सांसदों का विरोध किया जाएगा। टीम अन्ना के प्रमुख सिपहसालार प्रशांत भूषण का कहना है कि यूपीए सरकार बहानेबाजी पर उतर आई है। देश के सभी लोगों को अब यह महसूस होने लगा है कि सरकार मजबूत लोकपाल कानून बनाना ही नहीं चाहती। विधेयक संसद में रखने से पहले ही सरकार ने टालमटोल का रवैया अपनाना शुरू कर दिया है। उम्मीद की जाती है कि सरकार और अन्ना हजारे का टकराव नहीं होगा। वैसे भी सर्दी का मौसम है सभी का प्रयास यही होना चाहिए कि मामला सुलट जाए। कुछ सरकार झुके, कुछ लचीलापन टीम अन्ना दिखाए। आखिर जो मामला पिछले 40 सालों से लटका है वह इतनी आसानी से तो नहीं सुलटेगा।
Anil Narendra, Anna Hazare, BJP, Congress, Daily Pratap, Lokpal Bill, Rahul Gandhi, Sonia Gandhi, Vir Arjun
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चौतरफा घिरते गृहमंत्री पी. चिदम्बरम
गृहमंत्री पी. चिदम्बरम को घेरने के लिए 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के बाद विपक्ष के हाथ एक और मुद्दा लग गया है। एक टीवी चैनल आईबीएन-7 ने खुलासा किया है कि दिल्ली के एक होटल कारोबारी के खिलाफ तीन एफआईआर वापस लेने के मामले में अपने पद का दुरुपयोग किया है। आरोप है कि यह होटल व्यवसायी चिदम्बरम का मुवक्किल रह चुका है। मीडिया में आई रिपोर्टों के अनुसार एसपी गुप्ता, चेयरमैन सन एयर होटल (नई दिल्ली) पर आरोप है कि उन्होंने वीएलएस फाइनेंस को करोड़ों का चूना लगाया। उन्होंने राजीव गांधी के नाम पर एक चैरिटेबल ट्रस्ट बनाया, जिसकी संरक्षक सोनिया गांधी को बनाया था। कुछ सांसदों के फर्जी लैटरपेड का इस्तेमाल किया गया। गृह मंत्रालय ने 9 मई को यह निर्देश देने का फैसला किया कि गृह सचिव को दी गई गुप्ता की याचिका के आधार पर एफआईआर रद्द की जाए। सन एयर होटल मालिक एसपी गुप्ता के खिलाफ पूर्व के फैसले को वापस लेने का निर्णय उपराज्यपाल तेजेन्द्र खन्ना ने किया। दिल्ली सरकार की विज्ञप्ति के अनुसार, `अभियोजन विभाग के निदेशक की सिफारिशों के आलोक में इस मामले को फिर से उपराज्यपाल के पास भेजा गया जिसमें यह सिफारिश की गई कि मामले को आगे नहीं बढ़ाने के पूर्ण निर्णय पर जोर नहीं डाला जाएगा और सुनवाई मामले के दोष-गुण के आधार पर किया जाएगा।' दिल्ली सरकार के अनुसार उपराज्यपाल ने 15 दिसम्बर 2011 को इस सिफारिश को मंजूरी दे दी। सरकार द्वारा फैसले को निरस्त करने का मतलब साफ है कि आरोप सही है। चिदम्बरम ने एसपी गुप्ता के खिलाफ दर्ज एफआईआर को निरस्त करने के लिए दबाव डाला और इस तरह उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग किया। मामला इसलिए भी ज्यादा गंभीर बन जाता है कि जो फर्जी ट्रस्ट बनाया गया वह स्वर्गीय राजीव गांधी के नाम था और उसके संरक्षक में सोनिया गांधी का नाम दिया गया था। ऐसे आदमी की सिफारिश करने से पहले खुद चिदम्बरम को सोचना चाहिए था कि वह क्या करने जा रहे हैं। पी. चिदम्बरम एक के बाद एक विवाद में फंसते जा रहे हैं। आखिर सरकार और पार्टी कब तक उनका बचाव करेगी। अगर किसी अदालत ने चिदम्बरम के खिलाफ कोई टिप्पणी कर दी तो क्या स्थिति बनेगी? वैसे भी सरकार बहुत कमजोर स्थिति में है, चौतरफा दबाव में है। ऐसे में एक और सिरदर्द? सरकार को चाहिए कि चिदम्बरम को अब अपने आपको खुद को डिफेंड करने दे। सरकार के ऊपर और बहुत प्रेसिंग समस्याएं हैं उन पर ज्यादा ध्यान दें। बहरहाल विपक्ष के हाथ एक नया मुद्दा जरूर लग गया है और ऐसा नहीं लगता कि वह पी. चिदम्बरम को अब आसानी से छोड़ेगी।
2G, Anil Narendra, Daily Pratap, P. Chidambaram, Sonia Gandhi, Subramaniam Swamy, Vir Arjun
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Sunday, 4 December 2011
मनमोहन ने अपनी सरकार, पार्टी व देश को दाव पर लगा दिया है
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 4th December 2011
अनिल नरेन्द्र
क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस पार्टी देश और संसद का ध्यान ज्वलंत मुद्दों, भ्रष्टाचार, महंगाई, ब्लैक मनी से हटाने के लिए यह खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) का मुद्दा लाए हैं? माकपा नेता सीताराम येचुरी तो कम से कम यह मानते हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि सरकार संसद की कार्यवाही में बाधा को जानबूझ कर जारी रख रही है। यह लोकपाल, भ्रष्टाचार, महंगाई आदि मुद्दों पर चर्चा और बहस से बचने की राजनीति का एक हिस्सा है। यह दिन-ब-दिन साफ होता जा रहा है कि सरकार इस सत्र में कामकाज नहीं होने देना चाहती। येचुरी की इस दलील में कुछ दम है। यह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की रणनीति का एक हिस्सा हो सकता है पर जहां तक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का इस रणनीति में शामिल होने का सवाल है, हमें नहीं लगता कि वह ऐसा करने को अपनी हामी दे सकती हैं। अंदरुनी खबर तो यह है कि सोनिया गांधी व राहुल गांधी मनमोहन सिंह की इस हठधर्मिता से सख्त नाराज हैं। एफडीआई मुद्दे पर फंसी मनमोहन सिंह सरकार को सोनिया गांधी ने उसके हाल पर छोड़ दिया है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक दो दिन पहले हुई कांग्रेस कोर कमेटी की बैठक में सोनिया गांधी उस समय झल्ला गईं जब प्रधानमंत्री ने पूरा मामला सोनिया पर छोड़ना चाहा। डॉ. मनमोहन सिंह ने तो दो टूक कहा कि सरकार संसद में मतदान का सामना करे या फिर एफडीआई पर फैसला ले। इस पर पहले से ही नाराज चल रहीं सोनिया गांधी ने कहा कि जब केंद्र को एफडीआई पर निर्णय लेना था तो उनसे क्यों नहीं पूछा गया था और जब स्वयं अपने विवेक पर उन्होंने (प्रधानमंत्री ने) यह फैसला लिया है तो फिर उनको (प्रधानमंत्री) ही इस संकट से निपटना चाहिए। डॉ. मनमोहन सिंह पता नहीं क्यों अपना और अपनी सरकार व पार्टी का सब कुछ इस मुद्दे को लेकर दाव पर लगाने पर तुले हुए हैं। बार-बार वह यह दोहराते नहीं थकते कि अगर उन्होंने एफडीआई को वापस लिया या रोल बैक किया तो उनकी सरकार की साख घटेगी। उन्होंने सरकार के सहयोगी दलों तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक के नेताओं से मुलाकात कर कहा कि इस पर वह अपनी जिद्द छोड़ दें, क्योंकि कोई भी फैसला वापस लेने से सरकार की विश्वसनीयता कम होती है। हम डॉ. मनमोहन सिंह से पूछना चाहते हैं कि आपकी और सरकार की विश्वसनीयता है कहां जो कम होगी? आप इतनी-सी बात नहीं समझ रहे कि आज पूरा देश आपके इस निर्णय के खिलाफ है और सड़कों पर उतर आया है। 22 नवम्बर से शुरू हुए संसद के शीतकालीन सत्र में एक दिन भी कामकाज नहीं हुआ है। अगर हम विभिन्न राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, उड़ीसा, प. बंगाल, केरल, पंजाब, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, झारखंड और उत्तराखंड एफडीआई के विरोध में हैं। सिर्प दिल्ली, आंध्र, अरुणाचल, राजस्थान, हरियाणा, मिजोरम, मणिपुर असम, गोवा और महाराष्ट्र (कांग्रेस शासित) राज्य ही इसके हक में हैं। अगर हम लोकसभा में सांसदों की बात करें तो कुल 543 में से 278 सांसद विरोध में हैं। इनमें भाजपा (115), अकाली दल (4), सपा (22), बसपा (21), जद (यू) (20), तृणमूल (18), लेफ्ट (24), द्रमुक (18), बीजद (14), अन्ना द्रमुक (9), शिवसेना (11) और तेदेपा (6) सांसद। सरकार के साथ कांग्रेस के 207 और एनसीपी के 9 सांसद हैं। अगर कल को वोटिंग की नौबत आई तो कुछ भी हो सकता है। सरकार गिर भी सकती है। प्रधानमंत्री पता नहीं यह क्यों नहीं समझ रहे कि उनके साथ तो उनके गठबंधन सहयोगी भी नहीं हैं। प्रधानमंत्री की तमाम कोशिशों के बावजूद तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने दो टूक कह दिया है कि उनकी पार्टी इस फैसले का समर्थन नहीं कर सकती। हालांकि ममता ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी संप्रग सरकार को गिराने के पक्ष में नहीं है। तृणमूल कांग्रेस ही क्यों, हमें नहीं लगता कि कोई भी विपक्षी दल इस समय संप्रग सरकार को गिराने में दिलचस्पी रखता है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। कोई भी दल देश को मध्यावधि चुनाव में घसीटना नहीं चाहेगा। हां, पर सरदार मनमोहन सिंह ने अपनी जिद्द को पूरा करने के लिए पूरे देश को, अपनी सरकार व अपनी पार्टी को दाव पर जरूर लगा दिया है। यह कहावत है न `सनम हम तो डूबेंगे तुम्हें साथ ले डूबेंगे' फिट बैठती है। जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है वह दिन-रात लोकसभा में आंकड़े पूरे करने में लग गई है। कल को अगर वोटिंग की नौबत आए तो सरकार को बचाने के लिए उसके पास पर्याप्त सांसद संख्या होनी चाहिए और यह नौबत केवल एक आदमी की हठधर्मिता के कारण आएगी।Anil Narendra, Bhanwri Devi, CBI, Daily Pratap, Mhipal Maderna, Rajasthan High Court, Sex, Sex Scandal, Vir Arjun
Friday, 2 December 2011
संसद गतिरोध तोड़ने में बीच का रास्ता निकालने में सरकार असफल
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 2nd December 2011
अनिल नरेन्द्र
रिटेल एफडीआई पर छिड़ी रार से निकलने के रास्ते को लेकर मनमोहन सरकार पसोपेश में फंस गई है। सरकार की ओर से फेंके गए सारे पासे बेअसर साबित हो रहे हैं। कांग्रेस के अन्दर शुरू हुए खुले विरोध ने भी सरकार की दुविधा बढ़ा दी है। पहले महंगाई, भ्रष्टाचार और अब एफडीआई के मुद्दे पर घिरी मनमोहन सरकार और कांग्रेस को संकट से निकालने के लिए एक तरफ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी खुलकर मैदान में आ गई हैं, वहीं दूसरी तरफ एफडीआई को लेकर विपक्ष के हमलों की धार को पुंद करने के लिए उत्तर प्रदेश के सांसद और सोनिया के करीबी संजय सिंह ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी से पुनर्विचार करके किसानों, व्यापारियों और उपभोक्ताओं के हितों के सुरक्षा कवच के साथ एफडीआई लाने का अनुरोध किया है। जहां कैबिनेट की बैठक में एके एंटनी और जयराम रमेश समेत कुछ मंत्रियों की असहमति जगजाहिर हो चुकी है, वहीं अब सुल्तानपुर के सांसद संजय सिंह ने सरकार और पार्टी को इस पर पुनर्विचार करने की अपील करके उत्तर प्रदेश में पार्टी के डैमेज कंट्रोल की पहल कर दी है। सूत्रों का कहना है कि यूपी अधिसंख्य नेताओं और सांसदों की राय है कि राहुल गांधी के दौरे के बाद कांग्रेस के पक्ष में बने माहौल को एफडीआई के फैसले से नुक्सान हो सकता है। इसलिए संजय सिंह ने पहल करके कांग्रेस के खिलाफ बसपा, सपा और भाजपा द्वारा पैदा किए जा रहे जन असंतोष को कम करने की कोशिश की है। सम्भव है कि संजय सिंह ने सोनिया गांधी की पहल पर ही यह बयान दिया हो ताकि मनमोहन सिंह को समझ आए कि उनकी जिद पार्टी पर भारी पड़ सकती है। सूत्रों का कहना है कि वित्तमंत्री और कांग्रेस के संकट मोचक प्रणब मुखर्जी भाजपा की शरण में गए थे। उन्होंने भाजपा के वरिष्ठतम नेता लाल कृष्ण आडवाणी से गुप्त मुलाकात करके कोई बीच का रास्ता निकालने और गतिरोध तोड़ने की अपील की थी पर इसमें उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। भाजपा ने बुधवार को आरोप लगाया कि सरकार ने यह निर्णय अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों के दबाव में किया है। उसने यह भी आरोप लगाया है कि वैश्विक रिटेल कम्पनियों ने इसके लिए काफी लाबिंग की है और पैसा दिया है। भाजपा ने कहा कि सरकार संसद की कार्यवाही चलाने का मार्ग प्रशस्त करने के लिए अपने निर्णय को वापस ले या फिर कार्य स्थगित प्रस्ताव के तहत इस विषय पर चर्चा कराकर संसद की भावना को स्वीकार करे। भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि मल्टी ब्रांड खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ः एफडीआई की अनुमति दिए जाने का सभी विपक्षी दलों और सरकार में शामिल कुछ पार्टियों तक ने विरोध किया है। लेकिन सरकार ने देशहित के खिलाफ एकतरफा ढंग से संसद सत्र के दौरान यह निर्णय किया है। उन्होंने कहा कि सरकार को दो सुझाव दिए गए हैंöया तो वह इस निर्णय को वापस लेकर संसद में कल से महंगाई, कालाधन पर चर्चा शुरू करवाए अथवा खुदरा क्षेत्र में एफडीआई पर कार्यस्थगन प्रस्ताव के तहत बहस कराए। इन्हीं स्थितियों में संसद चल सकती है। इसमें बीच का अब कोई रास्ता नहीं है।Anil Narendra, BJP, Congress, Corruption, Daily Pratap, FDI in Retail, Inflation, Manmohan Singh, Murli Manohar Joshi, Sonia Gandhi, Vir Arjun
Sunday, 27 November 2011
शरद पवार को थप्पड़ आखिर क्यों पड़ा?
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 27th November 2011
अनिल नरेन्द्र
बृहस्पतिवार को नई दिल्ली के एनडीएमसी सेंटर में इफ्को के एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि आए केंद्रीय कृषि मंत्री ने कभी अन्दाजा नहीं लगाया होगा कि उस दिन उनसे क्या घटना घटेगी। कार्यक्रम के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए पवार जब बाहर की तरफ बढ़े तभी एक सिख युवक ने आगे बढ़कर उनके मुंह पर तमाचा मार दिया। पवार को समझ नहीं आया कि क्या हुआ। वह चुपचाप आगे बढ़ गए। मंत्री के स्टाफ की धक्का-मुक्की से नाराज युवक ने अपनी कृपाण निकाल ली। विरोधस्वरूप अपने हाथ पर वार भी किया। एनडीएमसी के गार्डों ने युवक को बड़ी मुश्किल से काबू कर पुलिस को सौंपा। हमलावर युवक का नाम हरविन्दर सिंह है और वह दिल्ली के विजय विहार में रहता है। वह नारा लगा रहा था, `वह भ्रष्ट हैं।' मैं यहां मंत्री को थप्पड़ मारने ही आया था। वे सभी भ्रष्ट हैं। उसने आगे कहा कि आज गुरु तेग बहादुर की शहादत का दिन है। हालात और भी बुरे हो सकते थे। मैंने ही रोहिणी कोर्ट में सुखराम को भी मारा था। मैं सिख हूं, चप्पल नहीं मारूंगा। सिर्प भाषण देते हो। भगत सिंह को भूल गए जिसने कुर्बानी दी। मारो-मारो मुझे खूब मारो। पागल...हूं मैं। इनके पास घोटालों के अलावा कुछ नहीं है। मैं गलत नहीं हूं।शरद पवार पर तमाचे की गूंज ने दिल्ली की सियासत को हिला दिया है। विपक्ष ने इस घटना की निन्दा तो की है, लेकिन इसे महंगाई से उपजा गुस्सा करार देकर सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। वहीं कांग्रेस ने इस घटना के लिए भाजपा नेता यशवंत सिन्हा के गैर जिम्मेदाराना बयान पर निशाना साधा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पवार से बातचीत कर पूरे घटनाक्रम की निन्दा की। कांग्रेस के संसदीय कार्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि यशवंत सिन्हा के बयान, महंगाई नहीं रुकी तो हिंसा होगी, वापस होना चाहिए। ऐसी धारणा बनाना गलत है। वहीं भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने कहा कि यह शख्स मेरे बयान से पहले ही सुखराम को भी थप्पड़ मार चुका है। ऐसे में इसे मुझसे जोड़ा जाना ठीक नहीं है। भाजपा की ही सुषमा स्वराज की टिप्पणी थी, भाजपा इसकी निन्दा करती है। अहिंसक तरीके से जताया जाना चाहिए अपना मतभेद। पवार उम्र के कारण आदर योग्य हैं। वहीं सबसे दिलचस्प टिप्पणी अन्ना हजारे की थी। अन्ना हजारे ने पवार पर हमले की सूचना मिलने पर पहली प्रतिक्रिया के तौर पर पूछा, `केवल एक थप्पड़?' बाद में उन्होंने इसकी आलोचना करते हुए कहा कि लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं है। उन्होंने कहा कि पवार को थप्पड़ पड़ा लोकतंत्र को तमाचा है। जनता में इस घटना की क्या प्रतिक्रिया हुई, कुछ टिप्पणियां प्रस्तुत हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को पड़ा थप्पड़ किसी नेता या मंत्री पर नहीं बल्कि इनके द्वारा बनाई गई उस व्यवस्था पर है जिससे आम लोगों का पूरा बजट गड़बड़ा गया है। वह आम आदमी क्या करे, जिसकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया हो। दिल्ली वालों ने इसी तरह की प्रतिक्रिया दी। `महंगाई घरों की किचन के साथ लोगों के सपनों पर भी हमला कर रही है। एक इंसान अपने बच्चे को पढ़ाकर कुछ बनाने के सपने देखने से पहले यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि उसके लिए पैसे कैसे बचाए' कोटला की एक महिला की प्रतिक्रिया थी। मयूर विहार की एक कामकाजी महिला ने कहा कि यह थप्पड़ एक आदमी का नहीं, पूरे देश की जनता का है। देश के नेताओं और मंत्रियों को यह समझ जाना चाहिए कि जनता अपने तरीके से जवाब देना सीख रही है। उसे पांच साल तक बहला-फुसलाकर बेवकूफ नहीं बना सकते हैं। कोटला फिरोजशाह की एक महिला का कहना था कि परेशानी है तभी तो लोग ऐसा करने को मजबूर हो रहे हैं। मंत्री दफ्तर में बैठकर जो नीति तैयार करते हैं, वह आम आदमी की कमर तोड़ने वाली होती है। ऐसे में लोग क्या करें? उनके पास कोई विकल्प नहीं है। सेवा नगर में एक सियासी कार्यकर्ता का कहना था कि परेशानी अपनी जगह है, लेकिन हर जगह थप्पड़ मारना ठीक नहीं है। सबक सिखाना है तो चुनाव में सिखाएं। लेकिन लोग भी क्या करें जब उनके प्रतिनिधि उम्मीद पर खरे नहीं उतरते तो वह तनाव में आ जाते हैं और यही तनाव थप्पड़ के रूप में दूर होता है। एक व्यवसायी की टिप्पणी थी, `सरकार जब सो रही हो तो उसे जगाने के लिए इससे बेहतर तरीका और कुछ नहीं हो सकता।' सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता आरके शर्मा का मानना है कि लोगों का गुस्सा जायज है। मंत्री, नेता और उनके रिश्तेदार करोड़ों-अरबों में खेल रहे हैं और आम आदमी भरपेट खाने से पहले भी सोचता है। यह स्थिति खतरनाक है और देश के नीति-निर्धारकों को अब गम्भीरता से जनता के दुःख-दर्द के बारे में सोचना ही होगा। मैक्स अस्पताल के मनोचिकित्सक डाक्टर समीर पारिख का कहना है कि अपने आक्रोश को निकालने का यह तरीका काफी कैट कहा जा सकता है, जब लोग दूसरे की नकल करते हुए किसी पर हमला करते हैं और उसे चोट पहुंचाते हैं तो वह चीप पब्लिसिटी के भूखे होते हैं। हमला करने वाला पहले की घटना से कहीं न कहीं प्रेरित होता है और उसे लगता है कि उसे भी लोगों का आकर्षण मिल सकता है।
शरद पवार पर हुए हमले से सियासी पारा भी तेज होगा। पवार की पार्टी राकांपा अन्दरखाते कांग्रेस से बेहद नाराज है। उसे लग रहा है कि जिस तरह से कांग्रेस ने पवार को महंगाई का प्रतीक बनाया, उसकी वजह से हालात यहां तक पहुंचे। यद्यपि तुरन्त कांग्रेस के नेता पवार के बचाव में जरूर उतरे, लेकिन राकांपा इस घटना से बेहद व्यथित है। भारी उद्योग मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि बड़े नेताओं की सुरक्षा पर संसद में चर्चा होनी चाहिए। पवार पर हमले के बाद महाराष्ट्र में कुछ इलाकों में पार्टी कार्यकर्ताओं के उग्र रवैये पर पटेल ने संयम रखने की अपील की। मामले के पीछे भाजपा का हाथ होने का खुद पवार ने ही काट किया। उन्होंने कहा, मुझे नहीं लगता कि इसमें किसी राजनीतिक दल का हाथ है। इस बारे में पार्टी इसलिए भी नाराज है कि कांग्रेस लगातार महंगाई के मसले पर शरद पवार को ही आगे करती रही है। बेशक भ्रष्टाचार और महंगाई से देश त्रस्त है और भारी गुस्से में है लेकिन इसका समाधान यह नहीं है कि हम चारों तरफ आग लगाना शुरू कर दें और जो सामने आए टूट पड़ें। इससे समाधान तो क्या निकलेगा, हां चारों ओर अराजकता जरूर फैल जाएगी। वहीं राजनीतिज्ञों को भी समझ लेना चाहिए कि पब्लिक का मूड क्या है। हमारे सामने मध्य पूर्व का उदाहरण है जहां एक छोटी-सी चिंगारी ने देश में आग लगा दी थी। सियासतदानों को इस किस्से से डरना चाहिए और सबक लेना चाहिए।
Anil Narendra, Anna Hazare, Congress, Daily Pratap, Maharashtra, Manmohan Singh, NCP, Sharad Pawar, Sonia Gandhi, Sushma Swaraj, Vir Arjun, Yashwant Sinha
Friday, 11 November 2011
क्या राहुल गांधी की बहुत जल्द ताजपोशी होने जा रही है
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 11th November 2011
अनिल नरेन्द्र
पिछले कुछ दिनों से राहुल गांधी को जल्द कमान सौंपने की चर्चा जोरों पर है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी का स्वास्थ्य चिन्ता का विषय बना हुआ है इसलिए वह चाहती हैं कि जल्द से जल्द राहुल की ताजपोशी हो जाए। इसके पीछे उद्देश्य यह भी हो सकता है कि लम्बित पड़े अहम फैसलों को अंतिम रूप दिया जा सके और सुस्त पड़े संगठन में नई ऊर्जा भरी जा सके। कहा जा रहा है कि श्रीमती सोनिया गांधी इलाज के लिए दोबारा विदेश रवाना हो सकती हैं और कांग्रेस का एक धड़ा चाहता है कि राहुल की ताजपोशी इससे पहले सोनिया कर दें। संगठन विस्तार और युवा एवं किसान से सीधा संवाद स्थापित करने में अपनी भूमिका से ऊपर उठकर राहुल सीधे नेतृत्व सम्भालें इसकी इच्छा कई वरिष्ठ कांग्रेसी प्रकट कर चुके हैं। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार की ही तरह कांग्रेस संगठन में भी कामकाज एकदम ढीला पड़ा है। कई अहम और बड़े फैसले सोनिया गांधी की ओर ताक रहे हैं। अरुणाचल प्रदेश में पार्टी के भीतर बगावत चरम पर है। राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की उनके मंत्री नहीं सुन रहे हैं। वे बार-बार दिल्ली चक्कर लगा रहे हैं पर मैडम ने कोई अंतिम आदेश उन्हें नहीं दिया है। तेलंगाना पर पार्टी क्या फैसला करे इस पर गुलाम नबी आजाद 10 जनपथ आए और बिना किसी उत्तर के वापस चले गए। हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के विरोधी सोनिया गांधी से मिलरक उन्हें हिसार की हार का मुख्य कारण बताना चाहते हैं, हुड्डा को अपनी शिकायतें हैं पर मैडम से मिलने का दोनों धड़ों को टाइम नहीं मिल रहा है। इसके अलावा कांग्रेस के सहयोगी गठबंधन साथी भी उस पर समन्वय के अभाव का आरोप लगा रहे हैं। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने संकेत दिए हैं कि वह राज्य का विभाजन चाहती हैं। इस पर कांग्रेस पार्टी और केंद्र सरकार का क्या रिएक्शन होगा? खबर यह भी है कि अपने खराब स्वास्थ्य के कारण सोनिया उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों में प्रचार करने भी शायद न जा सकें। लिहाजा पार्टी नेता राहुल को पार्टी की बागडोर सौंप दिए जाने की बात कह रहे हैं और सूत्रों का यह भी कहना है कि सोनिया ने उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बनाने की पूरी तैयारी कर ली है पर सुना है इसके लिए राहुल फिलहाल राजी नहीं हैं। कुछ कांग्रेसियों का कहना है कि सम्भव है कि परनाना पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन यानि 14 नवम्बर से लेकर दादी इन्दिरा गांधी की जयंती 19 नवम्बर के बीच कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में बड़ा फैसला हो सकता है। कांग्रेस महासचिव और मीडिया प्रभारी जनार्दन द्विवेदी से जब इस संबंध में पूछा गया तो उनका कहना था कि राहुल गांधी की राजनीति और संगठन में भूमिका बढ़ रही है और कांग्रेस के लोग भी चाहते हैं कि उनकी भूमिका बढ़े। जहां तक उन्हें अध्यक्ष बनाए जाने का सवाल है तो यह फैसला खुद श्रीमती गांधी को करना है। कांग्रेस के संविधान के अनुसार पार्टी अध्यक्ष को यह अधिकार है कि वो बिना कांग्रेस कार्य समिति की मंजूरी से यह फैसला कर सकें। कांग्रेस के इतिहास में कार्यकारी अध्यक्ष बनाने की वैसे तो परम्परा नहीं है पर स्वर्गीय इन्दिरा गांधी ने खुद कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए पंडित कमलापति त्रिपाठी को एक बार कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था। सम्भवत अपनी सासू मां के पदचिन्हों पर चलते हुए सोनिया भी पार्टी जनों की भावनाओं का ख्याल रखते हुए जल्द यह फैसला करें। वैसे राहुल का पार्टी मामलों में दखल एक तरह से बढ़ गया है। जब सोनिया इलाज के लिए विदेश गई थीं तो राहुल ने यह जिम्मेदारी कुछ हद तक सम्भाली थी। सोनिया अपनी गैर मौजूदगी में राहुल की अध्यक्षता में संगठन के फैसलों के लिए एक कोर कमेटी बना गई थीं। कांग्रेस संगठन में राहुल की मौजूदगी का अच्छा प्रभाव होगा। राहुल एक नेक नीयत, ईमानदार छवि के नेता हैं। कई मुद्दों पर उन्होंने सीधी प्रधानमंत्री तक जनता की समस्याओं को पहुंचाया है। मगर अभी तक एक-दो विषयों को छोड़ दें तो वह ज्यादातर मामलों में बहुत मुखरता से अपनी राय रखने से बचते रहे हैं। राहुल लगता है कि अभी खुद भी बड़ी जिम्मेदारी सम्भालने को तैयार नहीं लगते। उन्हें मौके की नजाकत को समझना चाहिए कि दोनों कांग्रेस पार्टी और यूपीए सरकार की हालत ठीक नहीं है। अगर गिरते ग्रॉफ को कोई सम्भाल सकता है तो वह केवल राहुल गांधी ही हैं।Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Manmohan Singh, Rahul Gandhi, Sonia Gandhi, Vir Arjun
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